S
StoryPublisher
Guest
कुदरत का इंसाफ
शाम के आठ बज रहे थे ।
डॉली किचन में मशगूल थी, उसके पति राज के आने का समय हो चुका था । किचन में खाने की तैयारी चल रही थी ।
इस फ्लैट में दो ही लोग रहते थे । डॉली और उसका पति राज । अभी तीन महीने पहले ही उनकी शादी हुई थी । वह सहारनपुर के पास मीरगंज कस्बे के रहने वाले थे लेकिन चूँकि राज सिटी में एक फैक्ट्री में जॉब करता था इसलिए पिछले महीने वे लोग यहाँ शिफ्ट हो गये थे ।
डॉली घर पर ही रहती थी लेकिन अधिक दिन तक उसका हाउस वाइफ बने रहने का इरादा नहीं था । शहर के महंगे खर्चे भी इसकी परमिशन नहीं देते थे । राज की तरफ से भी सिग्नल मिलने लगे थे ।
डॉली के सपने उस कोण से साकार नहीं हुए थे जैसे उसने बुन रखे थे । राज अजब प्रवृति का व्यक्ति था, कई बार समझ में नहीं आता था कि वह चाहता क्या है, उसके हाव-भाव भी ठीक नहीं रहते थे । उसका नेचर लड़कियों से ज्यादा मैच करता था । वह अजीब-अजीब बातें करता था जो कम-से-कम एक ‘पति’ को तो हरगिज शोभा नहीं देती । डॉली को उस तरह की बातें बिल्कुल पसंद नहीं थीं और राज को मानो उसी में रस प्राप्त होता था ।
आज तो अजब घटित होने जा रहा था ।
जो कसर बाकी थी, वह मात्र कुछ क्षणोपरान्त पूरी होने जा रही थी ।
डॉली के पैरों के तले का फर्श बस निकलने ही वाला था ।
वह किचन के कार्य में व्यस्त थी कि उसका मोबाइल बजा ।
किचन के स्लेब पर रखे वाईब्रेट होते मोबाइल पर उसने डोर से ही नजर डाली ।
राज का नंबर था ।
वह जान चुकी थी कि राज दरवाजे पर आ गया है । अलबत्ता दस सेकंड में आ जाने वाला है ।
फ्लैट की कालबेल भी सुचारू थी मगर शायद ही राज कभी उसका उपयोग करता हो, क्योंकि कालबेल घनघनाने के लिए उसे दरवाजे तक आना पड़ेगा और घनघनाने के बाद खुलने तक की प्रतीक्षा करनी पड़ेगी, जो नि:संदेह उसके लिए काबिले बर्दाश्त नहीं था –
यही मोटा कारण था कि राज जब बिल्डिंग के ग्राउंड फ्लोर पर स्थित स्टिल्ट में अपनी बाइक स्टैंड करता था तो पहला काम डॉली को फोन करना होता था । जब तक डॉली दरवाजा खोलने आती थी, तब तक राज एक जीना चढ़कर फ्लैट के दरवाजे पर नमूदार हो जाता था ।
अब भी राज का नंबर स्पार्क हो रहा था । कदाचित राज आ चुका था और उसका एक जीना चढ़ना मात्र बाकी था ।
डॉली ने लाल निशान टच कर दिया और स्वयं दरवाजा खोलने के लिए किचन से निकली ।
हस्बे मामूल चूँकि दिन भर की ड्यूटी बजाकर नया नवेला पति घर पर आया है तो डॉली को इस आगमन की अपार ख़ुशी होनी चाहिए लेकिन इस प्रकार का कोई चिन्ह उसके चेहरे पर दृष्टिगोचर नहीं हुआ ।
उसने दरवाजे पर पहुंचकर सिटकनी गिरायी और पट खोल दिया ।
राज अभी जीना ही चढ़ रहा था, पदचाप उसे सुनाई दिए ।
उसने बाहर गर्दन निकालकर झांककर देखा ।
राज जीना चढ़ चुका था ।
मात्र दो सेकंड में वह सामने प्रकट हो गया। रोजमर्रा कीभांति डॉली ने उसके हाथ से हेलमेट लिया । उसका चेहरा सपाट था।
लेकिन न जाने क्यों राज आज चहक रहा था । वे दोनोंजब दरवाजा बंद करके भीतर आये तो राज ने डॉली केगले में हाथ डाला और भीतर चलते हुए बोला –“आज मैं बहुत खुश हूँ सखी।”
डॉली ने गर्दन मोड़कर राज को देखा और चेहरे पर जबर्दस्ती मुस्कान लाती हुई बोली –“ऐसा क्या?”
पहले राज ने होंठों पर रहस्यमयी मुस्कान समेटी। डॉलीने हेलमेट को फ्रिज के ऊपर रखा।
राज रहस्यपूर्ण मुस्कान के साथ बोला –“कल को मेरेपति आ रहे हैं – ।”
“पति–?”यह शब्द सुनाई तो दिया था परन्तु समझ मेंकुछ नहीं आया था, जैसे सिर के ऊपर से गुजर गया हो।
जबकि राज अजीब बेहयाई वाली मुस्कान में मुस्कुरा रहा था।
डॉली पुनः किचन में प्रविष्ट होने से पहले दो क्षण केलिए रुकी और आशय को स्पष्ट करने के उद्देश्य से बोली –“मैं समझी नहीं, किसके पति आ रहे हैं?”
“मेरे... ।”
फिर डॉली के चेहरे पर एक शून्य स्थापित हो गया।
राज अपना पिट्ठू बैग उतारकर और उसकी चेन खोलकर ताजा खरीदा सामान दिखाते हुए बोला –“देखो, आज यह मैं क्या-क्या खरीदकर लाई हूँ ।”
उसने सामान को डॉली के समक्ष ओपन कर दिया।
डॉली जड़वत रह गयी।
वो लाल ब्रा पेन्टी थी, चूड़ियाँ थी, लेडीज मेकअप का सारा सामान था।
डॉली उस सामान को गौर से देखती हुई बोली –“यह सब किसके लिए लाये हो –?”
“अपने लिए।”
“व्हाट, क्या मजाक है यह?”
“मेरी जान यह मजाक नहीं है, यह मेरी सच्चाई है, जिससेअभी तक तुम वाकिफ नहीं थी लेकिन अब हो जाओगी ।” वह फ्रिज से पानी की बोतल निकालते हुए बोला –“आज मैं बहुत खुश हूँ । तुमसे शादी करके मैं जरा भी खुश नहीं रहा हूँ क्योंकि मुझे तुम्हारी नहीं बल्कि एक पति की जरूरत थी ।”
डॉली फटी आंखों से कभी सामान को तो कभी राजको देख रही थी। उसकी बुद्धि कहीं अंतरिक्ष में तैर रही थी, उसे लग रहा था अभी वह गश खाकर गिर पड़ेगी।
☐☐☐
शाम के आठ बज रहे थे ।
डॉली किचन में मशगूल थी, उसके पति राज के आने का समय हो चुका था । किचन में खाने की तैयारी चल रही थी ।
इस फ्लैट में दो ही लोग रहते थे । डॉली और उसका पति राज । अभी तीन महीने पहले ही उनकी शादी हुई थी । वह सहारनपुर के पास मीरगंज कस्बे के रहने वाले थे लेकिन चूँकि राज सिटी में एक फैक्ट्री में जॉब करता था इसलिए पिछले महीने वे लोग यहाँ शिफ्ट हो गये थे ।
डॉली घर पर ही रहती थी लेकिन अधिक दिन तक उसका हाउस वाइफ बने रहने का इरादा नहीं था । शहर के महंगे खर्चे भी इसकी परमिशन नहीं देते थे । राज की तरफ से भी सिग्नल मिलने लगे थे ।
डॉली के सपने उस कोण से साकार नहीं हुए थे जैसे उसने बुन रखे थे । राज अजब प्रवृति का व्यक्ति था, कई बार समझ में नहीं आता था कि वह चाहता क्या है, उसके हाव-भाव भी ठीक नहीं रहते थे । उसका नेचर लड़कियों से ज्यादा मैच करता था । वह अजीब-अजीब बातें करता था जो कम-से-कम एक ‘पति’ को तो हरगिज शोभा नहीं देती । डॉली को उस तरह की बातें बिल्कुल पसंद नहीं थीं और राज को मानो उसी में रस प्राप्त होता था ।
आज तो अजब घटित होने जा रहा था ।
जो कसर बाकी थी, वह मात्र कुछ क्षणोपरान्त पूरी होने जा रही थी ।
डॉली के पैरों के तले का फर्श बस निकलने ही वाला था ।
वह किचन के कार्य में व्यस्त थी कि उसका मोबाइल बजा ।
किचन के स्लेब पर रखे वाईब्रेट होते मोबाइल पर उसने डोर से ही नजर डाली ।
राज का नंबर था ।
वह जान चुकी थी कि राज दरवाजे पर आ गया है । अलबत्ता दस सेकंड में आ जाने वाला है ।
फ्लैट की कालबेल भी सुचारू थी मगर शायद ही राज कभी उसका उपयोग करता हो, क्योंकि कालबेल घनघनाने के लिए उसे दरवाजे तक आना पड़ेगा और घनघनाने के बाद खुलने तक की प्रतीक्षा करनी पड़ेगी, जो नि:संदेह उसके लिए काबिले बर्दाश्त नहीं था –
यही मोटा कारण था कि राज जब बिल्डिंग के ग्राउंड फ्लोर पर स्थित स्टिल्ट में अपनी बाइक स्टैंड करता था तो पहला काम डॉली को फोन करना होता था । जब तक डॉली दरवाजा खोलने आती थी, तब तक राज एक जीना चढ़कर फ्लैट के दरवाजे पर नमूदार हो जाता था ।
अब भी राज का नंबर स्पार्क हो रहा था । कदाचित राज आ चुका था और उसका एक जीना चढ़ना मात्र बाकी था ।
डॉली ने लाल निशान टच कर दिया और स्वयं दरवाजा खोलने के लिए किचन से निकली ।
हस्बे मामूल चूँकि दिन भर की ड्यूटी बजाकर नया नवेला पति घर पर आया है तो डॉली को इस आगमन की अपार ख़ुशी होनी चाहिए लेकिन इस प्रकार का कोई चिन्ह उसके चेहरे पर दृष्टिगोचर नहीं हुआ ।
उसने दरवाजे पर पहुंचकर सिटकनी गिरायी और पट खोल दिया ।
राज अभी जीना ही चढ़ रहा था, पदचाप उसे सुनाई दिए ।
उसने बाहर गर्दन निकालकर झांककर देखा ।
राज जीना चढ़ चुका था ।
मात्र दो सेकंड में वह सामने प्रकट हो गया। रोजमर्रा कीभांति डॉली ने उसके हाथ से हेलमेट लिया । उसका चेहरा सपाट था।
लेकिन न जाने क्यों राज आज चहक रहा था । वे दोनोंजब दरवाजा बंद करके भीतर आये तो राज ने डॉली केगले में हाथ डाला और भीतर चलते हुए बोला –“आज मैं बहुत खुश हूँ सखी।”
डॉली ने गर्दन मोड़कर राज को देखा और चेहरे पर जबर्दस्ती मुस्कान लाती हुई बोली –“ऐसा क्या?”
पहले राज ने होंठों पर रहस्यमयी मुस्कान समेटी। डॉलीने हेलमेट को फ्रिज के ऊपर रखा।
राज रहस्यपूर्ण मुस्कान के साथ बोला –“कल को मेरेपति आ रहे हैं – ।”
“पति–?”यह शब्द सुनाई तो दिया था परन्तु समझ मेंकुछ नहीं आया था, जैसे सिर के ऊपर से गुजर गया हो।
जबकि राज अजीब बेहयाई वाली मुस्कान में मुस्कुरा रहा था।
डॉली पुनः किचन में प्रविष्ट होने से पहले दो क्षण केलिए रुकी और आशय को स्पष्ट करने के उद्देश्य से बोली –“मैं समझी नहीं, किसके पति आ रहे हैं?”
“मेरे... ।”
फिर डॉली के चेहरे पर एक शून्य स्थापित हो गया।
राज अपना पिट्ठू बैग उतारकर और उसकी चेन खोलकर ताजा खरीदा सामान दिखाते हुए बोला –“देखो, आज यह मैं क्या-क्या खरीदकर लाई हूँ ।”
उसने सामान को डॉली के समक्ष ओपन कर दिया।
डॉली जड़वत रह गयी।
वो लाल ब्रा पेन्टी थी, चूड़ियाँ थी, लेडीज मेकअप का सारा सामान था।
डॉली उस सामान को गौर से देखती हुई बोली –“यह सब किसके लिए लाये हो –?”
“अपने लिए।”
“व्हाट, क्या मजाक है यह?”
“मेरी जान यह मजाक नहीं है, यह मेरी सच्चाई है, जिससेअभी तक तुम वाकिफ नहीं थी लेकिन अब हो जाओगी ।” वह फ्रिज से पानी की बोतल निकालते हुए बोला –“आज मैं बहुत खुश हूँ । तुमसे शादी करके मैं जरा भी खुश नहीं रहा हूँ क्योंकि मुझे तुम्हारी नहीं बल्कि एक पति की जरूरत थी ।”
डॉली फटी आंखों से कभी सामान को तो कभी राजको देख रही थी। उसकी बुद्धि कहीं अंतरिक्ष में तैर रही थी, उसे लग रहा था अभी वह गश खाकर गिर पड़ेगी।
☐☐☐