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सीजर के नाम पर डॉली का दिल धक्क से रह गया था।न चाहते हुए भी आंख में आंसू उमड़ आया था।
उसने रोटी को जलता छोड़कर इस तरफ गर्दन मोड़कर देखा। आंख का आंसू मोटा हो गया था और पलक से बहपड़ा। गाल पर रेखा खींचता चला गया।
सीजर के नाम पर सन्नी भी चौंक उठा था। बड़े गौर सेराज की सूरत देखता रहा।
उसे यूं देखता पाकर राज बोला–“अब यूं दीदे फाड़करक्या देख रहे हो–प्यार से देखो, मैं प्यार से देखने की चीज हूँ –।”
“क्या तुम सीजर के लिए सीरियस हो?”
“मैं तो तुम्हारी हूँ । चाहे जिस हाल में रखो, जिसमें तुम्हेंखुशी मिले मगर अभी–।”
“मगर अभी?”
“सीजर के लिए सीरियस नहीं हो सकती–यह समाज, यहदुनिया, ये बहुत बुरी है, कभी दिल चाहता है, इस दुनिया मेंआग लगा दूं –बहुत बुरी है यह दुनिया मेरे राजा–किसी की खुशी बर्दाश्त नहीं करती, मेरा वश चले तो मैं यही कपड़ेपहनकर बाहर निकलूं, सुहागन बनकर, मगर यह दुनिया बर्दाश्तकर लेगी? कभी नहीं–साली इस दुनिया को तो ठोकर मारकरकहीं गर्क में डाल दूं।”
“कोई बात नहीं छम्मो।” वह उसका गाल सहलाता हुआबोला–“दुनिया बुरी नहीं है बल्कि हमारे दिल का डर बुरा होताहै। डरपोकआदमी के लिए दुनिया बुरी होती है–अभी यहकपड़े पहनकर तुम बाहर निकल जाओ तो कौन क्या करसकता है, मगर तुम डरपोक हो कि लोग क्या कहेंगे–अरे लोगोंका तो काम है कहना–हमारा काम है अपनी जिंदगी जीना–मेरीछम्मकछल्लो तुम डरपोक हो–।”
“तो–डरपोक तो इसीलिए हूँ कि यह दुनिया क्या-क्या बातेंकरती है, इसीलिए तो यह बुरी है।”
सन्नी कहकहा लगाकर हंस पड़ा–“तुम डरपोक भी होऔर कायर भी हो–अपने निकम्मेपन को दूसरे के कंधे परडालकर बरी हो जाना चाहती हो।”
“यह सारी बातें छोड़ो सनम हरजाई, प्यार का मौसम है,प्यार की बातें करो–।”
“अभी तो भूख की बातें कर लो।” सन्नी पुनः किचन कीतरफ देखते हुए बोला।
“हां, आज तो मेरा सजना आया है–डॉली ने जरूर कोईबेहतरीन डिश बनाई होगी।” कहकर वह छमछम करता किचनकी तरफ बढ़ा।
किचन में घुस गया।
डॉली निष्क्रिय रूप से व्यस्त थी।
सिर पर चुनरी रखे राज बोला–“क्या बनाया हैडॉली– ?”
डॉली कुछ नहीं बोली।
राज की दृष्टि हॉटपॉट में रखी जली हुई रोटियों पर पड़गयी। वह एक जली हुई रोटी को उठाते हुए बोला–“यह क्या है ?”
उस रोटी को देखकर डॉली पुनः काम में व्यस्त हो गयी।जब तक राज ने दूसरी रोटी उठा ली–“क्या है डॉलीयह–क्यों मेरा जी जला रही है, जानबूझकर रोटी जलाकर रखरही है, तुमसे आज से पहले तो कभी रोटी नहीं जली।”
डॉली अब भी कुछ नहीं बोली। कुछ बोलने को उसकेपास शब्द ही नहीं थे, क्या बोले?
राज बोला–“तेरी हरकतों को मैं खूब समझ रही हूँ, मगर तूने जो दिमाग में पाल रखा है, उसे निकाल दे, तू मेरे साथसही चलेगी तो मैं तेरे साथ सही चलूंगी वरना तू मुझे जानतीनहीं है।”
उसकी गुर्राहट को सुनकर सन्नी किचन में आ गया। उसेवैसे भी डॉली के पास आने का बहाना चाहिए था।
राज से बोला–“क्या हुआ, दोनों पत्नियां किस बात परलड़ रही हो?”
“इसके दिमाग में गलतफहमी बैठ गयी है, बड़े मुगालते मेंहै यह, इसे यह नहीं पता कि मैं कितनी खतरनाक चीज हूँ लेकिन मैं तो प्यार से ही बात कर रही हूँ और बता, तूनेडिश क्या बनाई है–?”राज सब्जी की कड़ाही की तरफगया। ऊपर रखी प्लेट हटाकर देखी तो उसकी त्यौरियां चढ़गयीं।
“क्या बनाया है यह?”
डॉली ने बड़ी असहाय और कंपकंपाती दृष्टि से राजकी तरफ देखा जो उसे आग्नेय नेत्रों से घूर रहा था। डॉलीडरे-सहमे स्वर में बोली –“आलू-मटर की सब्जी बनाई है।”
राज के दांत किटकिटा उठे। क्रोध इतना दिमाग पर हावीहुआ कि मन तो हुआ कड़ाही की सब्जी को उसी के सिर परदे मारे।
मगर कसमसाकर रह गया।
नथुनों से आग निकलती रही।
शब्दों को चबाकर वह फुफकारा–“आलू-मटर की सब्जीऔर जली हुई रोटी–? तुझे कल शाम ही मैंने बता दिया थाकि दोस्त आने वाला है आज और दोस्त भी कितना इम्पोर्टेड,फिर भी तूने यह बनाकर रखा है–मेरा कलेजा जलाने केलिए–।”
“बता जाते क्या बनेगा।” बड़े साहस के साथ उसने इनशब्दों को हलक से बाहर निकाला।
वह किचकिचाते हुए बोला–“क्या करूं तेरा मैंऽऽ?”
सन्नी बोला–“क्यों परेशान हो रही हो तुम–आलू मटर की सब्जी है न–अरे वाह–यह तो मेरी मनपसंद डिश है–तुम क्या भूल गयींजानेमन...मैं आलू मटर कितने शौक से खाता हूँ –स्वीट डिश।” सन्नी ने एक आलू उठाया और मुंह में डाललिया।
डाला तो इस इरादे से था कि खुलकर तारीफ करेगा मगर मुँह में पड़ते ही वह खुद चक्कर खा गया–
और राज से बोला–“क्या तुम्हारे घर में नमक नहींखाया जाता है–?”
“क्या इसमें नमक नहीं है?”राज की बुद्धि नाच उठी।
डॉली दहल गयी।
“है–है–।” वह बात सम्भालने लगा–“मगर कम है–गुड,मैं कम ही खाता हूँ ।”
तब तक राज ने मटर का दाना मुंह में डाल लिया थाऔर गर्जन भरे स्वर में बोला–“इसमें तो कोई स्वाद ही नहींहै–नमक तो डाला ही नहीं है–ओ मेरे भगवान!” वह दांतपीसने लगा।
उसने रोटी को जलता छोड़कर इस तरफ गर्दन मोड़कर देखा। आंख का आंसू मोटा हो गया था और पलक से बहपड़ा। गाल पर रेखा खींचता चला गया।
सीजर के नाम पर सन्नी भी चौंक उठा था। बड़े गौर सेराज की सूरत देखता रहा।
उसे यूं देखता पाकर राज बोला–“अब यूं दीदे फाड़करक्या देख रहे हो–प्यार से देखो, मैं प्यार से देखने की चीज हूँ –।”
“क्या तुम सीजर के लिए सीरियस हो?”
“मैं तो तुम्हारी हूँ । चाहे जिस हाल में रखो, जिसमें तुम्हेंखुशी मिले मगर अभी–।”
“मगर अभी?”
“सीजर के लिए सीरियस नहीं हो सकती–यह समाज, यहदुनिया, ये बहुत बुरी है, कभी दिल चाहता है, इस दुनिया मेंआग लगा दूं –बहुत बुरी है यह दुनिया मेरे राजा–किसी की खुशी बर्दाश्त नहीं करती, मेरा वश चले तो मैं यही कपड़ेपहनकर बाहर निकलूं, सुहागन बनकर, मगर यह दुनिया बर्दाश्तकर लेगी? कभी नहीं–साली इस दुनिया को तो ठोकर मारकरकहीं गर्क में डाल दूं।”
“कोई बात नहीं छम्मो।” वह उसका गाल सहलाता हुआबोला–“दुनिया बुरी नहीं है बल्कि हमारे दिल का डर बुरा होताहै। डरपोकआदमी के लिए दुनिया बुरी होती है–अभी यहकपड़े पहनकर तुम बाहर निकल जाओ तो कौन क्या करसकता है, मगर तुम डरपोक हो कि लोग क्या कहेंगे–अरे लोगोंका तो काम है कहना–हमारा काम है अपनी जिंदगी जीना–मेरीछम्मकछल्लो तुम डरपोक हो–।”
“तो–डरपोक तो इसीलिए हूँ कि यह दुनिया क्या-क्या बातेंकरती है, इसीलिए तो यह बुरी है।”
सन्नी कहकहा लगाकर हंस पड़ा–“तुम डरपोक भी होऔर कायर भी हो–अपने निकम्मेपन को दूसरे के कंधे परडालकर बरी हो जाना चाहती हो।”
“यह सारी बातें छोड़ो सनम हरजाई, प्यार का मौसम है,प्यार की बातें करो–।”
“अभी तो भूख की बातें कर लो।” सन्नी पुनः किचन कीतरफ देखते हुए बोला।
“हां, आज तो मेरा सजना आया है–डॉली ने जरूर कोईबेहतरीन डिश बनाई होगी।” कहकर वह छमछम करता किचनकी तरफ बढ़ा।
किचन में घुस गया।
डॉली निष्क्रिय रूप से व्यस्त थी।
सिर पर चुनरी रखे राज बोला–“क्या बनाया हैडॉली– ?”
डॉली कुछ नहीं बोली।
राज की दृष्टि हॉटपॉट में रखी जली हुई रोटियों पर पड़गयी। वह एक जली हुई रोटी को उठाते हुए बोला–“यह क्या है ?”
उस रोटी को देखकर डॉली पुनः काम में व्यस्त हो गयी।जब तक राज ने दूसरी रोटी उठा ली–“क्या है डॉलीयह–क्यों मेरा जी जला रही है, जानबूझकर रोटी जलाकर रखरही है, तुमसे आज से पहले तो कभी रोटी नहीं जली।”
डॉली अब भी कुछ नहीं बोली। कुछ बोलने को उसकेपास शब्द ही नहीं थे, क्या बोले?
राज बोला–“तेरी हरकतों को मैं खूब समझ रही हूँ, मगर तूने जो दिमाग में पाल रखा है, उसे निकाल दे, तू मेरे साथसही चलेगी तो मैं तेरे साथ सही चलूंगी वरना तू मुझे जानतीनहीं है।”
उसकी गुर्राहट को सुनकर सन्नी किचन में आ गया। उसेवैसे भी डॉली के पास आने का बहाना चाहिए था।
राज से बोला–“क्या हुआ, दोनों पत्नियां किस बात परलड़ रही हो?”
“इसके दिमाग में गलतफहमी बैठ गयी है, बड़े मुगालते मेंहै यह, इसे यह नहीं पता कि मैं कितनी खतरनाक चीज हूँ लेकिन मैं तो प्यार से ही बात कर रही हूँ और बता, तूनेडिश क्या बनाई है–?”राज सब्जी की कड़ाही की तरफगया। ऊपर रखी प्लेट हटाकर देखी तो उसकी त्यौरियां चढ़गयीं।
“क्या बनाया है यह?”
डॉली ने बड़ी असहाय और कंपकंपाती दृष्टि से राजकी तरफ देखा जो उसे आग्नेय नेत्रों से घूर रहा था। डॉलीडरे-सहमे स्वर में बोली –“आलू-मटर की सब्जी बनाई है।”
राज के दांत किटकिटा उठे। क्रोध इतना दिमाग पर हावीहुआ कि मन तो हुआ कड़ाही की सब्जी को उसी के सिर परदे मारे।
मगर कसमसाकर रह गया।
नथुनों से आग निकलती रही।
शब्दों को चबाकर वह फुफकारा–“आलू-मटर की सब्जीऔर जली हुई रोटी–? तुझे कल शाम ही मैंने बता दिया थाकि दोस्त आने वाला है आज और दोस्त भी कितना इम्पोर्टेड,फिर भी तूने यह बनाकर रखा है–मेरा कलेजा जलाने केलिए–।”
“बता जाते क्या बनेगा।” बड़े साहस के साथ उसने इनशब्दों को हलक से बाहर निकाला।
वह किचकिचाते हुए बोला–“क्या करूं तेरा मैंऽऽ?”
सन्नी बोला–“क्यों परेशान हो रही हो तुम–आलू मटर की सब्जी है न–अरे वाह–यह तो मेरी मनपसंद डिश है–तुम क्या भूल गयींजानेमन...मैं आलू मटर कितने शौक से खाता हूँ –स्वीट डिश।” सन्नी ने एक आलू उठाया और मुंह में डाललिया।
डाला तो इस इरादे से था कि खुलकर तारीफ करेगा मगर मुँह में पड़ते ही वह खुद चक्कर खा गया–
और राज से बोला–“क्या तुम्हारे घर में नमक नहींखाया जाता है–?”
“क्या इसमें नमक नहीं है?”राज की बुद्धि नाच उठी।
डॉली दहल गयी।
“है–है–।” वह बात सम्भालने लगा–“मगर कम है–गुड,मैं कम ही खाता हूँ ।”
तब तक राज ने मटर का दाना मुंह में डाल लिया थाऔर गर्जन भरे स्वर में बोला–“इसमें तो कोई स्वाद ही नहींहै–नमक तो डाला ही नहीं है–ओ मेरे भगवान!” वह दांतपीसने लगा।