• Hello Friends You can Register on the Forum and by posting you can earn money too.

कुदरत का इंसाफ

जब वह दरवाजा बंद करके पलटी तो सन्नी उससे बोला—“आपकी मम्मी कितना काम बोलती हैं—?”

बहुत धीमी मुस्कान डॉली के अधरों पर रेंगी और वह चलती हुई अपने कमरे में घुस गयी और दरवाजा बोल्ट कर लिया।

सन्नी सोफे से उठा। अभी तक उसने स्नान नहीं किया था। दिन के ग्यारह से ज्यादा का समय हो चुका था।

वह अपने कमरे में घुस गया।

☐☐☐

दिन के साढ़े ग्यारह बज रहे थे।

डॉली दरवाजा बोल्ट करके अपने बिस्तर पर लेटी थी, उसका फोन बजा।

उसने स्क्रीन देखी।

नम्बर स्पार्क हो रहा था। उसने नम्बर पहचान लिया, इसी के साथ धड़कन में हल्का-सा इजाफा हुआ।

उसने रिसीव कर लिया—“हैलो।”

दो क्षण फोन पर सन्नाटा रहा। उसके बाद कहा गया—“डॉली कैसी हो?”

नम्बर और आवाज पहचानने के बाद भी वह नाटकीय रूप से बोली—“कौन—?”

फिर उधर से सांस ली गयी। दो क्षण का अंतराल आया। बड़े बुझे हुए स्वर में कहा गया—“अपना नाम बताना पड़ेगा?”

डॉली ने नाटक का पटाक्षेप किया–“ओह... ऋषभ!”

“कैसी हो?”

अब डॉली ने गहरी सांस ली। कुछ कहने से पहले मुंहपर चुप्पी आयी।

फिर अजीब से मदहोश स्वर में बोली–“तुम कैसे हो?”

“जी रहा हूँ मगर अब जीने को मन नहीं करता।”

“क्यों?”

“जो एक गलती कर चुका हूँ उसका पश्चाताप नहीं होता।”

डॉली के अंदर का मौसम पूरी तरह बदल चुका था।हवाश पर रंगीनियां सवार हो गयी थीं।

वह बोली–“क्यों जीने का मन नहीं होता?”

वह रुदन भरे स्वर में बोला–“मैंने जीवन को आसानसमझ लिया थाडॉली–मैं समझ रहा था जैसे चाहे जी सकता हूँ मगर अब मुझे शिद्दत से अहसास हो रहा है कि तुम्हारेबिना मैं नहीं जी सकता–सांसें मेरा दम घोटने लगी हैं।”

“अब क्या हो सकता है, उस वक्त कहां थे तुम?”

“डॉली–मैं तुमसे लिपटकर रो लेना चाहता हूँ, बहुत मनभर गया है मेरा–यह दुनिया की झूठी रस्में मेरे लिए जानलेवासाबित हो रही हैं।”

डॉली नागवारी के स्वर में बोली–“बस बातें करनाआती हैं तुमसे–कुछ और नहीं आता–।”

“मैंने कोशिश बहुत की थी डॉली, अपनी फैमिली कोतैयार कर लिया था मगर मेरी फैमिली का एक ही कहना थाकि रिश्ता अगर घर आएगा तो हम स्वीकार कर लेंगे तुमबताओ, तुम अपनी फैमिली को तैयार कर पाई?”

“मेरी फैमिली तैयार नहीं हो पायी तो इसके लिए मैं उन्हेंमजा चखाने को तैयार थी मगर तुम कायर निकले।”

“नहीं डॉली, ऐसा ठीक नहीं था–दोनों फैमिली की बहुतबदनामी होती, तब भी हमें सुकून नहीं मिल पाता।”

“अब सुकून है तुम्हें–?”

“क्या करूं, जिंदगी ने दोराहे पर लाकर खड़ा कर दिया है,न जीते बनता है, न मरते–।”

डॉली ने गहरी सांस ली।

और बोली–“अब क्या हो सकता है?”

“कल शाम ऋचा मिली थी। उससे तुम्हारी कल दिन मेंबात हुई होगी–वह परसों भी मिली थी मुझे तो कल उससेतुम्हारी मुझे लेकर बात हुई होगी–बता रही थी, तुम बहुतपरेशान हो–।”

“उसने बताया तब फोन किया वरना फोन भी नहीं करसकते थे?”

उधर से गहरी सांस ली गयी।

दो क्षण ठहरकर कहा गया–“मैं समझ रहा था तुम खुशहो, सैटल हो रही हो इसलिए मैंने कभी फोन नहीं किया, अबफोन करने से कोई...फायदा नहीं था–पुराने जख्म हरे होजाते इसलिए फोन नहीं करता था–मुझे चलो इस बात कीखुशी थी कि तुम अपनी जिंदगी में खुश हो–हसबैंड भी तोतुम्हें बहुत सुंदर मिला है।”

“वह सुंदरी हसबैंड है।”

“सुंदरी हसबैंड–?” ऋषभ हंसा और बोला–“इसका क्यामतलब हुआ?”

“वह एक सुंदरी है।”

“मतलब?”

डॉली कुछ क्षण को चुप रह गयी।

फिर बोली–“अगर किसी रोज तुम्हें मेरे मरने की खबरमिले तो तुम्हें कैसे लगेगा?”

“कैसी बातें कर रही हो तुम?”

“तुमने तो मुझे मरने के लिए छोड़ ही दिया।”

“कोई चीज जब खो जाती है तब उसकी अहमियत कापता चलता है डॉली–आज तुम्हारे बगैर मैं कैसे जी रहा हूँ,ये मैं जानता हूँ –डॉली...मैंने तुम्हें बहुत प्यार किया था–मेरेआंसू, इस बात के गवाह हैं।”

“फोन कर लिया करो ऋषभ। तुम तो बात ही नहीं करते–तुमने अपनी डॉली को किसके सहारे छोड़ रखा है?”

“राज के साथ खुश हो न तुम?”

डॉली ने आंखें बंद कर लीं।

छोटे से अंतराल के बाद बोली–“हां बहुत खुश हूँ, कभीमेरा चेहरा देखा है तुमने –दो-तीन रोज के बाद मेरे घर आओ,अभी मत आना, दो-तीन रोज बाद आना।”

“तुम तो सहारनपुर में रह रही हो न?”

“हां एड्रेस सेंड कर दूंगी।”

“अभी क्यों नहीं आ सकता?”

“एक गेस्ट आया हुआ है, मैं बता दूंगी कि कब आना है।”

“तुम्हें देखे भी एक जमाना हो गया–कहां वो दिन भी थेजब कुछ घण्टों की जुदाई में बुरा हाल हो जाता था। तुम्हें मेरीयाद आती है–?”

“बिल्कुल नहीं–।”

ऋषभ हल्के से हंसा–“मैंने इसीलिए तुम्हें कभी फोन नहींकिया कि तुम मुझे भूल जाओ तो अच्छा है–।”

“क्या तुमने मुझे भुला दिया?”

“नामुमकिन है यह।”

डॉली ने गहरी सांस ली। उसे शब्दों से ज्यादा ऋषभ कालहजा संतुष्ट कर रहा था। मानो वह लहजा सीधे दिल मेंपैबस्त हो रहा होऔर कहीं जिंदगी के तार झंकृत कर रहाहो–।

ऋषभ ही आगे बोला–“तो कब आने का बुलावा है हमारा?”

“परसों मैं फोन करके बता दूंगी।”

“बेताबी और बढ़ गयी तो क्या होगा?”

“तुम्हारे अंदर बेताबी होती तो आज यह दिन नहीं देखनापड़ता।”

“राज के साथ खुश तो हो न तुम?”

“यह सवाल मत करो, क्या जवाब दूं?”

ऋषभ एकाएक चुप रह गया।

सांसें लेता रहा।

थोड़ा ठहरकर बोला–“लेकिन अब आगे हो क्या सकता है, हमारी कहानी का तो फुल स्टॉप हो गया।”

“क्या तुम्हें मुझे पाने की तमन्ना अब नहीं है?”

ऋषभ ने प्रतिप्रश्न किया–“क्या तुम अब भी मुझे मिलसकती हो?”

“तुम बताओ, तुम तो पहले ही इतने डरपोक थे कि अपनीफैमिली के खिलाफ नहीं जाऊंगा, ऐसा नहीं करूंगा, वैसा नहीं करूंगा...तो अब तुम क्या साथ दे सकते हो?”

“अब मैं ज्यादा मजबूत हो चुका हूँ ।” ऋषभ बोला–“खोखली रस्मों की हकीकत मेरे सामने आ गयी। तुम्हें खोकरमैंने जितना कुछ खोया है तुम्हें पाकर उसका लेशमात्र भी नहीं खोया होता।”

“क्या अब भी मैं तुम्हारे पास आ जाऊं?”

“अब...अपने हंसते...।”

“निकल गयी जान?”

“नहीं, ऐसी बात नहीं है, मुझे तुम्हारी बहुत जरूरत है–।”

“एक बच्चा भी फ्री में मिल जाएगा, बगैर मेहनत किये।” डॉली ने चुटीले स्वर में कहा।

“अच्छा–कांग्रेचुलेशन!”

“अब बताओ पापा बनना चाहते हो या मामा?”

स्वर इतना चुटीला था कि ऋषभ हंसे बगैर न रह सका।

डॉली भी मन-ही-न गुदगुदा रही थी। कई दिन बादउसके चेहरे पर आज बहाली आई थी।

ऋषभ हंसने के बाद बोला–“किस्मत ने पापा बनने कामौका ही कब दिया?”

“तो मामा बनने के इच्छुक हो?”

ऋषभ पुनः हंसा और बोला–“किस्मत का यह सितम भीसहेंगे।”

“किस्मत की ओट में अपनी बुजदिली को छिपाते रहो।”

ऋषभ ने एक लम्बी सांस खींची और आह के साथबोला–“जो भी इल्जाम लगाओ, तुम्हारा गुनाहगार हूँ ।”

“ऋषभ–।”

“हां–।”

“मेरा यहां बिल्कुल दिल नहीं लग रहा–क्या करूं मैं?”

“मुझे लगता है राज तुम्हें परेशान रख रहा है?”

“क्या बताऊँ –आओ फिर किसी दिन, मुझे देख जाओ।शायद फिर कभी देखने न मिलूं।”

“कैसी बातें कर रही हो तुम, ऐसी बातें कभी मत करना।”

“मैं बहुत परेशान हूँ ऋषभ, मेरी कोख अगर सूनी होती तोशायद मैं यह कदम उठा चुकी होती–।”

“प्लीज डॉली...ऐसा मत सोचो, तुम्हें क्या समस्या है–तुममेरी हो जाना चाहती हो न?”

“हां–।”

“मैं कोई रास्ता निकालता हूँ लेकिन तुम कुछ उल्टा-पुल्टामत सोचो–।”

“क्या रास्ता निकालोगे, तुम भी बहला रहे हो मुझे, बच्चेकी तरह–एक बच्चे वाली को बहला रहे हो–।” उसने फिरस्वर में विनोद भाव पैदा किया।

ऋषभ बोला–“मैंने एक खुशखबरी तो तुम्हें सुनाई नहीं।”

“क्या?”

“मेरी नौकरी लग गयी है एक बैंक में, जल्दी ही ज्वाइनिंगहोने वाली है।”

“कौन से बैंक में?”

“यस बैंक में–।”

“यस बैंक में? मेरे यहां जो गेस्ट ठहरा है, उसकी भी किसीबैंक में नौकरी लगी है–परसों ज्वाइनिंग है।”

“मेरी भी परसों ज्वाइनिंग है, उसकी किस बैंक में लगी है ।”

“यह तो मैंने नहीं पूछा।”

“यह कौन गेस्ट है?”

“राज का कोई पुराना दोस्त है।”

“ओह–!”

“अरे क्या टाइम हो गया–?” उसने मोबाइल कान सेहटाकर आंखों के आगे लिया–“माई गॉड –बारह बज गये, बातों में पता ही नहीं चला, उस गेस्ट को खाना भी खिलानाहै–चलो ऋषभ फिर बात करते हैं–।”

“डॉली...।”

“हां...।”

“खुद को सम्भालकर रखना...मैं...।”

“चलो घर आकर बात करते हैं।”

“ओके...।”

“बाय।”

“बाय।”

डॉली ने फोन काट दिया और तेजी से दरवाजे की तरफबढ़ी।

☐☐☐
 
डॉली दूसरे रूम के दरवाजे पर स्थिर हुई और उसेथपथपाया।

थोड़ी ही देर में दरवाजा खुल गया।

डॉली ने खाने को कहने के लिए मुँह खोला ही था कितीव्रता के साथ चेहरा दूसरी तरफ घुमा किया।

सन्नी अपने शरीर पर मात्र वी शेप अण्डरवियर पहने हएथा। उसका हृष्ट-पुष्ट शरीर अपने पैक दिखा रहा था।

वह चेहरा दूसरी तरफ को रखे बोली–“खाना कबखाओगे...?”

“आपके साथ खाऊंगा।” इस बार सन्नी तत्परता के साथकपड़े पहनने नहीं गया था बल्कि वहीं खड़ा रहा था और अपनेशरीर को ज्यादा उभार लिया था।

डॉली बोली–“मुझे अभी भूख नहीं है, आप कहो तोआपको लगा देती हूँ, फिर मुझे सोना है।”

सन्नी ढ़ीठता के साथ बोला–“डॉली तुम मुझसे इतनानफरत क्यों करती हो?”

“खाना कब खाओगे–?”

“मुझे तुमसे बहुत हमदर्दी है–तुम्हारी नफरत से मुझे प्यारहो गया है, क्या करूं मैं?”

“अपना प्यार अपनी पार्टनर पर उंडेलो।”

“मेरी तो अभी शादी नहीं हुई।”

“मंजू के साथ–...।”

“ओह!” सन्नी जबर्दस्त ठट्टा मारकर हंसा और बोला–“ठीकहै, मंजू मेरी पत्नी है और मंजू की तुम पत्नी हो तो तुम मेरीकौन हुई–?”

“मेरे साथ कभी हद क्रॉस करने की कोशिश मत करना।”इस बार वह आंखें तरेरकर बोली।

“डॉली प्लीज, मैं नफरत के काबिल नहीं हूँ, मैं मुहब्बतके काबिल हूँ ।” कहते हुए उसने डॉली के कंधे पर हाथ रखदिया।

पहली बार डॉली बहुत क्रोधित हुई। बोली–“हाथ हटाओ।”

“मुझे माफ नहीं करोगी?”

“मैंने कहा हाथ हटाओ।” डॉली का चेहरा लाल हो गयाथा।

उसे रीड करते ही सन्नी ने फुर्ती के साथ हाथ हटा लिया।बोला–“खाना लगाओ।”

वह कहते हुए किचन की तरफ बढ़ी–“कपड़े पहनकर आओ।”

हारी हुई सांस छोड़ते हुए सन्नी पुनः कमरे में घुस गया।

डॉली किचन में बर्तन उठाने लगी



☐☐☐

शाम आठ बजे घर में राज प्रविष्ट हआ।

पूर्व की भांति उसने स्टिल्ट में बाइक खड़ी करते ही डॉलीके मोबाइल पर रिंग दे दी थीं।

डॉली किचन में थी। रिंग देखकर दरवाजा खोलने गयी।

जब तक दरवाजा खुला, राज तेजी के साथ सीढ़ियां चढ़तेहुए प्रकट हो गया और डॉली से बोला–“मेरा साजन कहांहै?”कहताहुआ वह तेजी के साथ प्रविष्ट हुआ।

उसकी बेताबी को देखकर डॉली चौंकी थी और दरवाजाबंद करते हुए पलटकर देख रही थी।

सन्नी लिविंग हाल के सोफे पर बैठा था।

राज तेजी के साथ चलता हुआ उसके पास आया और बैग एक तरफ फेंकते हुए बोला–“मेरे साजन मत पूछो, दिनकैसे कटा–बसघड़ी देखते दिन गुजरा है कि शाम कैसे होगी।तुमने तो एक दिन में मेरा बुरा हाल कर दिया।” कहते हुए वहसन्नी की गोद में बैठ गया और बांहें उसके गले में डाल दीं।

यह सब देखते हुए डॉली किचन में चली गयी थी।

सन्नी थोड़ा अनिच्छा के साथ बोला–“मेरी छमिया पहलेफ्रेश तो हो लो, फिर तुम्हारी बेताबी मिटाएंगे।”

“नहीं, बस एक किस–बहुत बुरा हाल रहा है मेरा दिनभर।”

कहते हुए उसने उसके होंठ अपने होंठों में भर लिये।

कुछ देर चूसने के बाद राज बोला–“उफ! कैसी तड़प हैमेरे बदन में, तुमने ज्वाला भड़का दी।”

“अब जाओ, साज-शृंगार करो।”

“पहले मुझे अपनी जोरू कहो।”

“मेरी जोरू जाओ, तैयार हो जाओ।”

“मेरे राजा।” उसने बलखाते हुए उसके गाल पर उंगलियांफेरी।

और खड़े होकर कमरे में घुसा लेकिन तुरंत ही बाहर आयानिकलकर और सीधे किचन में गया और बोला–“आज तोकोई स्पेशल डिश बनाई होगी?”

डॉली के अंदर सन्नाटा खिंच गया।

थोड़ा ठहरकर बोली–“क्या बनाऊं, कुछ बताया आपने?”

राज की आंखों में चिंगारियां पनपी–“तू बौरी है, पागलहै क्या–तुझे नहीं पता है कि शाम को खाना खाया जाता है?”

वह जोर देते हुए बोली–“आपको बताना चाहिए न किक्या खाओगे।”

राज का जी चाहा कि अपने बाल नोच ले। दांत किटकिटातेहुए और गुस्से को पीते हुए वह बाहर आ गया था। सन्नी केपास खड़े होकर बोला–“इसके भेजे में थोड़ी अक्ल भर दो, इसेसमझा दो जरा, वरना मेरे हाथ से बहुत बुरा हो जाएगा, इसकुतिया को मार डालूंगा मैं।”

“तुम कमरे में जाओ मंजू, आज मेरी मनपसंद डिश बनरही है, मुझसे तो पूछा होता, तुम उसके ऊपर राशन-पानीलेकर चढ़ गयी।”

“तुम ज्यादा इसे सिर पर मत चढ़ाओ, बहुत खराब दिमागकी है यह–मैं भोग रहा हूँ इसे।”

“मैंने तुमसे क्या कहा कि तुम कमरे में जाओ और फ्रेशहोओ–जाओ कमरे में जाओ।”

नथुनों से फुफकारते हुए राज कमरे में घुस गया।

सन्नी पुनः मोबाइल चलाने में व्यस्त हो गया।

डॉली किचन में व्यस्त रही लेकिन थोड़ी देर बाद हीचलती हुई सन्नी के पास आई और बोली–“क्या खाओगे तुम?”उसका लहजाबहुत उदास था।

सन्नी मुस्कुराकर बोला–“क्या बना रही हो?”

“जो तुम कहोगे, मैं बना दूंगी।”

“अभी क्या बना रही थीं?”

“भिंडी और लौकी रखी है, उसे बना देती हूँ, चिकन, मटनकहो तो बाजार से ले आती हूँ ।”

“अब उसकी कोई जरूरत नहीं है, मुझसे दिन में कहतीं मैंले आता, अब भिंडी बना लो।”

वह वापस चली गयी।

सन्नी उसे जाते हुए पीछे से देखता रहा। लोभी दृष्टि से।

☐☐☐
 
आधा घण्टा पश्चात राज सजधजकर बाहर निकल आया।

आज साड़ी पहने हुए था।

उसे कोई देखे तो निःसंदेह धोखा खा जाए। उसका गोलचेहरा पूरी तरह लड़की के शेप में ढल चुका था।

लम्बे बालों की विग लगी थी जो पीछे को खुले पड़े थे ।दोनों हाथों में भरी हुई चूड़ियां थीं। होंठों पर गहरी लिपस्टिक लगी थी। चेहरेपर खूब क्रीम पाउडर लगा रखा था।

ब्लाऊज में उन्नत उरोज का शेप था।

पैरों में पायल। छम-छम करता हुआ सन्नी के सामने आयाऔर बोला–“कैसी लग रही हूँ ?”

नाटकीय स्वर में सन्नी उसे देखता रह गया और बोला–“मेराकत्ल करके रहोगी आज क्या–बिजली गिरा रही हो मेरीजान।”

राज खुश हो गया।

और उसके घुटनों पर बैठ गया। बांहों का हार गले में डालदिया और बोला–“काश यह पूरी जिंदगी ऐसे ही गुजर जाये, तुम्हारी बांहों में–।”

“ऐसे ही गुजरेगी, तुम क्या चिंता करती हो छम्मक छल्लो।”

डॉली तिरछी नजरों से इधर को देख लेती थी। उसनेअपनी साड़ी और ब्लाऊज पहचान लिया था। उसे पता भी नहींकि राज ने कब वो साड़ी उसकी अलमारी से निकालकरअपने कमरे में रख ली थी।

राज सन्नी के गले में हाथ डाले फुसफुसाकर बोला–“अबकमीनी एक नजर इधर नहीं देखेगी, देखेगी तो कटी-जलीनजरों से देखेगी,बहुत जलती है यह मुझसे।”

“तुम हो ही इतनी खूबसूरत।”

“अच्छा बताओ, मैं ज्यादा सुंदर लग रही हूँ या ये?”

“तुम–तुम तो बिजली गिरा रही हो, सड़क पर निकलजाओ तो सब तुम्हीं को देखने लगें।”

“सच्ची?”

“तो क्या मेरा दिल वैसे ही तुम पर फिदा है?”

“धोखा तो नहीं दोगे कभी?”

“न–कभी दिया है धोखा?”

“तभी छोड़कर भाग गये थे?”

“अब आ गया न तुम्हारी बांहों में।”

“अब तो कहीं नहीं जाओगे, सारी उम्र रहना है।”

“वादा।” कहते हुए सन्नी ने उसका गाल अपने दांतों मेंभर लिया।

राज बोला–“हाय दइया–खाओगे क्या?”

“तुम्हें देखकर रहा नहीं जाता।”

“चलो फिर कमरे में, तुम्हें शांत कर दूं।”

“पहले खाना हो जाये तभी।”

राज अपने कृत्रिम ब्रेस्ट को देखता हुआ बोला–“आज तो फिटिंग सही है–।”

“मस्त, एकदम नम्बर वन।”

“एक निशान तो बनता है तुम्हारे गाल पर।” कहते हुएराज ने गाढ़ी लिपस्टिक के होंठ उसके गाल पर रख दियेऔर जब हटाये तोस्पष्ट लिप मार्क बन चुका था।

मार्क देखते हुए राज हंसा।

और उसके गाल से अपना गाल सटाते हुए बोला–“क्याबना रही है यह?”

“तुम उधर ध्यान मत दो –तुम उसके सामने एकदम पागलक्यों हो जाती हो, वह बेचारी डर के मारे सहम जाती है।”

“बहुत चांडाल है यह, तुम नहीं जानते इसे, मैं इसकीनस-नस से वाकिफ हूँ –अभी बताओ, इसकी जगह कोई दूसरीहोती तो क्या ऐसे ही व्यवहार करती हमारे साथ? फूटे मुँह आंख उठाकर भी नहीं देखती है–जलती है, जलती रहती है –।”

“तुम उस पर इतनी खार मत खाया करो।”

“अच्छा, बड़ा लाड़ उमड़ रहा है उसके ऊपर तो–यह तोमेरी सौतन बनकर बैठ गयी है–।”

“सौतन–।” सन्नी हंसा–“वह तुम्हारी सौतन कैसे होसकती है?”

“लाड़ तो ऐसे ही लुटा रहे हो तुम उसके ऊपर।”

“उसका उदास चेहरा देखकर मुझे बड़ा तरस आता है।”

“किस बात की उदासी, क्यों उदास है, उसे तो खुश होनाचाहिए–उदासी किस बात की भई?”

“तुम जो उसे उल्टा-सीधा बोलती रहती हो।”

“जब काम ऐसे करेगी तो क्या बोलूंगी नहीं, आज देखियो तुम मैं क्या करूंगी। अगर इसने खाना अच्छा नहीं बनायातो–न मैंने प्लेट इसके मुंह पर मारी हो।”

“छोड़कर भाग जाएगी तुम्हें।”

“कहां जाएगी–? मां के घर कितने दिन रुक जाएगी?कौन इसे अपने घर में रखेगा? इसकी भावज को जानते होतुम, चार दिन में घर से बाहर निकाल देगी इसे–इसकी आदतको सब जानते हैं –।”

“फिर भी तुम थोड़ा संयम बरता करो, बेचारी इंसान ही तो है –।”

“देखो तुम इसका ज्यादा फेवर मत किया करो, मुझे बहुतबुरा लगता है–।”

“अच्छा मेरी छमिया को बुरा लगता है।” कहते हुए सन्नीने फिर राज का गाल काट लिया।

राज नशीली आंखों से सन्नी की तरफ देखने लगा। उसने कमरे की तरफ आंखों से इशारा किया।

सन्नी ने इंकार में गर्दन हिला दी।

उसी समय राज का मोबाइल बज उठा।

☐☐☐

राज सन्नी की गोदी से उठा और अपना मोबाइल उठाकर स्क्रीन देखी।

शन्नो कुमारी का नाम उभरकर आ रहा था।

“अब यह भी परेशान करेगी।” बड़बड़ाते हुए वह पुनःसन्नी की गोदी में बैठ गया और चूड़ियों वाला एक हाथ सन्नीके गले में डाला तथा रिसीव करते हुए बोला–“नमस्ते मम्मी–।”

“नमस्ते बेटा कैसे हो?”

“अच्छा हूँ ।”

“मैंने सोचा अपने बेटे की कुशलक्षेम ले लूं–आज घर भीआई थी मगर तुम ड्यूटी थे।”

“आप घर आई थीं–कब?”

“दोपहर से पहले आई थी–बेटे एक दिन छुट्टी लेकरडॉली को डॉक्टर के पास ले जाओ, पहला मामला है, बहुतसावधानी की जरूरत होती है–।”

“हां मम्मी समय निकालताहूँ ।”

“गुड बेटा...और तुम ठीक हो–?”

“हां मैं अच्छी...अच्छा हूँ ।”

“आज मैं घर आई थी तो कोई गेस्ट है तुम्हारे घर में...?”

“हां मेरा बचपन का दोस्त है, मेरी जान है।” कहते हुएराज ने सन्नी का गाल अपने होंठों में भर लिया।

“अच्छी बात है–पुराने दोस्त तो पुराने होते हैं, जब मिलजाते हैं तो बड़ा अच्छा लगता है।”

“अरे मत पूछो मम्मी–जब से यह आया है, मेरी तो जिंदगीमें बहार आ गयी।”

“कब तक रहेगा?”

“जब तक मेरी सांस में सांस रहेगी।”

“हो-हो-हो-हो–बहुत अच्छा बोलतेहो तुम–हो-हो-हो-हो-इसकी यहां कोई नौकरी लगी है–?”

“हां मम्मी, यस बैंक में–।”

यस बैंक का नाम सुनकर डॉली के कान खड़े हुए। इसअजीब संयोग पर उसे बड़ा आश्चर्य हुआ।

“तो बेटे दिन, दो दिन, चार दिन बतौर मेहमान उसे अपने घररखो और उसके बाद कहीं उसे कमरा दिला देना–कमरा दिलानेमें तुम उसकी मदद कर देना, वह तो नया है इस शहर में।”

“कहीं कमरा दिलाने की क्या जरूरत है, कमरा तो है नमम्मी घर में–।”

“किसके घर में?”

“अजी हमारे इसी घर में–दो कमरे हैं न मम्मी, देखा नहींक्या आपने–?”

“तुम बेटा अभी बहुत भोले हो, दुनिया को नहीं जानते–अपनेघर में ही रखोगे तो तरह-तरह की बातें बनेंगी।”

“कैसी बातें मम्मी? मैं तो अपने कमरे में सोती...सोता हूँ ।मैं कोई सन्नी के कमरे में थोड़ी न सोता हूँ, क्या आपसेडॉली ने कुछ कहा था–?”

“नहीं-नहीं, तुम्हें तो पता है डॉली तो कुछ बोलती हीनहीं है, तभी तो मुझे समझाना पड़ रहा है–बेटे दोस्ती अपनीजगह है और मान-मर्यादा अपनी जगह...।”

“तो मैंने कौन सी मान-मर्यादा तोड़ दी, क्या बताया डॉलीने आपको–?”

“उसने कुछ नहीं बताया–तुम सन्नी को कहीं बाहर कमरादिला देना।”

“नहीं मम्मी सन्नी तो यहीं रहेगा।”

फोन पर कुछ देर सन्नाटा रहा, उसके बाद कहा गया–“अबदेखो तुम्हारी मर्जी–मुझे जो उचित लगा मैंने समझाया–कलको कोई बात बने, उससे पहले हमें सावधान रहना चाहिए, मैंयह नहीं कह रही हूँ कि अभी कल ही कमरा दिला दो–हफ्ते-दोहफ्ते अपने घर रखो लेकिन अब उसे नौकरी करनी है तो कहींशिफ्ट तो होना पड़ेगा–।”

“मैं देख लूंगा मम्मी, इसकी चिंता आप मत करो।”

“...ठीक है...बेटा...किसी दिन ऑफ करके डॉली कोडॉक्टर के पास ले जाओ।”

“ले जाऊंगा...मैं ले जाऊंगा।”

“ओके बेटा...बाय... ।”

“बाय मम्मी...।”

फोन डिसकनेक्ट हुआ।

उसने ब्रेजरी में खोंसा।

और सन्नी के गाल से गाल मिलाता हुआ बोला–“मेरेराजा से तो मुझे कोई दूर नहीं कर सकता–यह तो जन्म-जन्मका सम्बन्ध है–क्या आज खडूस सास आई थी?”

“हां आई थी–बड़ा बोलने वाली है तुम्हारी सास–जब उसेपता चला कि मैं यहीं रहूंगा, तब न पूछो कितने भाषण देनेलगी–।”

“क्या कह रही थी मोटी?”

“समझा रही थी कि बेटा किसी के घर में नहीं रहनाचाहिए, ये दुनिया है, लोग क्या क्या सोचते हैं।”

“क्या इसे हम पर शक हो गया ?”

“नहीं-नहीं, हम पर कोई शक नहीं हुआ है।”

“तो फिर इतना क्यों जोर दे रही है–?”

“उस वक्त मैं और डॉली घर में अकेले थे न, तो चौंकरही थी।”

“अच्छा अब समझी मैं...तो यह बात है।”

“हूँ –मगर बहुत बोलती है भई–चपर-चपर जुबान चल हीरही थी।”

“इसने तो कुछ नहीं बता दिया?”

“नहीं, इसने कुछ नहीं बताया है।”

“अच्छा–यह भी देखो मेरे डर का कमाल है, इसीलिए मैंइसे इतना दाबकर रखती हूँ, तुम कहते हो कि ऐसा व्यवहारमत किया करो–अगर इसके दिल में डर न होता तो मम्मी कोजरूर बता देती।”

“हां यह बात तो है।”

“इसीलिए इसे डरा-धमकाकर रखना जरूरी है, तुम समझतेनहीं हो मेरे राजा।” कहते हुए उसने प्यार से उसका चुम्बन लेलिया।

फिर राज गोदी से उतरा।

अपनी चूड़ियां दुरुस्त कीं। साड़ी को सम्भाला और चलता हुआ किचन में घुसा।

डॉली अपने काम में व्यस्त थी।

राज उसके बराबर में खड़ा होते हुए बोला–“क्या बनारही है–?”

“भिण्डी...सन्नी को भिण्डी पसंद है, उन्होंने मुझे बतायाथा।”

“वैरी गुड–यह तो अच्छी बात है, आज मम्मी आई थींक्या –?”

“हां–।”

“तूने तो मुझे नहीं बताया ?”

“अभी बताने न बताने का समय ही कहां मिला हैं ?”

“हां यह भी ठीक है लेकिन तूने अपनी मम्मी को क्या-क्या बताया?”

“मैंने तो कुछ नहीं बताया–वह तो बस मेरी तबीयत के लिए आई थी–।”

“गुड–कुछ बताया तो नहीं न?”

“न–।”

“वैरी गुड! मेरी जोरू बहुत समझदार है और तुझे यह पताहै कि मैं किसकी जोरू हूँ –?”

“...।”

“बता न...?”

“मुझसे ऐसी बातें मत किया करो।”

राज के प्रसन्न चेहरे पर अचानक कहर नाच उठा। वहशब्दों को चबाते हुए बोला–“तभी तो साली मुझे तेरे ऊपरगुस्सा आता है, कभी खुशी-खुशी बात ही नहीं करती। हमेशामुंह बिगाड़े रखेगी।”

“तो मार डालो मुझे, झंझट खत्म करो।”

“मरेगी तो है ही किसी दिन मेरे हाथों से अगर यही रवैयारखेगी तो–।”

डॉली के नथुने फूलने-पिचकने लगे थे जैसे जानबूझकरवह घूंट को पी रही हो।

वह फिर बगैर बोले अपने काम में लगी रही।

राज उसके पीछे पड़ते हुए बोला–“देख मैं यह नहीं चाहता कि मैं तुझसे कुछ कहूँ मगर तू मजबूर करती हैमुझे–आखिर तू हम दोनों से हंस-हंसकर बात क्यों नहीं करसकती–?”

डॉली चुप ही रही।

“बस अब ठूठ की तरह खड़ी रहेगी। इसी बात पर मेराखून खौलता है–एक बार तो मेरी तारीफ कर दिया कर कि मैं अच्छी लग रही हूँ । कुछ कमी होगी तो मैं सुधार लूंगी–अच्छायह बता मेरे ऊपर सलवार-सूट कैसा लगेगा–वो बड़े घूम वालीसलवार–आज मैंने एक लड़की को पहने देखा था, बड़ी सेक्सीलग रही थी।”

वह जैसे जबर्दस्ती बोली –“अच्छा लगेगा।”

“तो तू चलियो, कपड़ा तो मैं खरीद लाऊंगी मगर दर्जी कोनाप तू दे आइयो–अब मैं तो नाप दे नहीं सकती–इसी बातका तो अफसोस है।”

“दे आऊंगी नाप–।” वह पीछा छुड़ाते हुए बोली।

“बस...सुसरी सीधे मुंह बात नहीं कर सकती–पता नहींकिस घमण्ड में रहती है, तुझे यह शरीर मिल गया और मुझेनहीं मिला इसी बात का घमण्ड है न तुझे–?”

डॉली ने असहाय दृष्टि से राज की तरफ देखा। जैसेगुहार लगा रही हो कि मुझे बख्श दो।

उसकी आंखों में आंसू थे।

“अब किस बात पर रो रही है तू रण्डी–साली तूने मेराजीना हराम कर रखा है, तुझे देखकर मेरा खून जल जाता है।”

जिस रहम की दृष्टि से डॉली ने राज को देखा था।राज ने विपरीत प्रतिक्रिया व्यक्त की थी।

वह लरज उठी।

लेकिन वह अपने किचन के कर्त्तव्य की इतिश्री में व्यस्तथी।

“धत्त साली नहीं तो।” वह बुरा-सा मुंह बनाते हुए किचनसे बाहर निकल आया और सन्नी के पास सोफे पर बैठते हुएबोला–“इस नकचढ़ी से तो मुझे बात ही नहीं करना चाहिए–बहुतही बुरे दिमाग की है– हर वक्त अपने अहम में चूर रहेगी–।”

“तुम उसके पास जाती ही क्यों हो–?”

“अरे यार...घर में है तो क्या बात नहीं कर सकते, हरवक्त नथुनेफुलाये रहेगी–यह कोई बात है, इंसान कभी तोहंसी-खुशी बात करे।”

“कुछ रोज लगेंगे नॉर्मल होने में। तुम मेंटिलिटी समझा करोछमिया–कुछ दिन बाद तुम देखना, सबकुछ सही हो जाएगा– ये हंसेगी भी बोलेगी भी और ठट्टे भी मारेगी–।”

“हूं...यह कुछ नहीं करेगी, इसके दिमाग में अपनी सुन्दरता का घमण्ड है, और कोई बात नहीं है।”

“शांत रहो करो तुम यार–बेवजह क्लेश पैदा करती हो–।”

“शांत ही हूँ, नहीं तो दिल चाहता है कि इसकी मुंडी पकड़कर कहीं दीवार में दे मारूं जैसी इसकी हरकतें हैं–।”

“इसे कल को डॉक्टर के पास ले जाओ।”

“पता नहीं किसका पाप लिये घूम रही है।”

“किसका पाप–?”सन्नी हंसा–“ऐसा मत कहो, सुनेगीतो बेचारी का दिल रोएगा।”

“मेरा तो नहीं हो सकता यह–मैं बाप बन सकती हैक्या–?”

“क्यों नहीं बन सकती?”

“पता नहीं।” राज ने बुरा सा मुंह बनाकर सिर कोझटका।

☐☐☐
 
खाने से निवृत्त होते ही राज सन्नी का हाथ पकड़ता हुआ बोला–“चलो बालम, अब इतना न तड़पाओ।”

डॉली खुद खाने बैठ रही थी। जब तक सन्नी औरराज खाते थे तब तक डॉली को डायनिंग टेबल पर बैठनेकी परमीशन नहीं थी। क्योंकि राज को गर्मागर्म फूली हुईरोटियां चाहिए थीं।

उनके उठने के बाद ही डॉली बैठती थी।

जैसे ही सन्नी ने हाथ धोये राज ने सन्नी की बांह में हाथडाल लिया और उपरोक्त वाक्य बोला–“चलो बालम, अबइतना न तड़पाओ।”

“सब्र रखो छमिया–।” वह हाथ पोंछते हए बोला–“चलोबाहर थोड़ा टहलने चलते हैं।”

“हमारे ऐसे नसीब कहां बलमा जो तुम्हारे साथ हाथ में हाथ डालकर घूम सकें–यह दुनिया बहुत बुरी है जानेमन।”

सन्नी मुस्कराकर रह गया।

थोड़ी देर बाद वे पैक हो गये।

दरवाजा बंद कर लिया।

डॉली भी खाना खाकर अपने कमरे में लेट गयी औरदरवाजा बंद कर लिया।

उसने ऋषभ का नम्बर लगाया।

घंटी गयी। थोड़ी देर बाद रिसीव हुआ–“हैलो।”

“कैसे हो ऋषभ?”

“अब तो अच्छा हूँ –दिन में तुमसे बात होकर नई ऊर्जामिल गयी।”

“ये जो हमारा गेस्ट है सन्नी–।”

“हां-हां, तुम बता रही थीं कि जिसका किसी बैंक में ट्रांसफर हुआ है।”

“हां–तो वो यस बैंक में हुआ है।”

“उसी में तो मेरी जॉब है।”

“ओह यह कैसा इत्तेफाक है–।”

“कौन सी ब्रांच में?”

“यह तो मैंने नहीं पता किया।”

“कब अटेंड कर रहा है?”

“शायद परसों।”

“परसों ही मेरी ज्वाइनिंग है।”

“मुझे लगता है तुम दोनों की एक ही ब्रांच है।”

“तब तो अच्छी बात है–।”

“ऋषभ...।”

“बोलो...।”

“तुम मुझे लेकर सीरियस हो?”

“हां-हां डॉली, बहुत सीरियस हूँ –।”

“क्या कर सकते हो?”

“बताओ क्या करूं?”

“मुझे इस नर्क से निकाल लो–।”

“तुम एकदम होपलेस क्यों हो गयी, मेरी समझ में नहीं आ रहा –ऐसी क्या बात है, पहले तुम्हें लेकर ऋचा से मेरी बात होती थी तो पता चलता था कि तुम खुश हो,हँसी-ख़ुशी हो –अब अचानक ऐसा क्या हुआ, ऋचा भी मुझे बता रहीकि तुम अजीब-अजीब बातें कर रहीथीं।”

“मैं जिंदगी से तंग आ गयी हूँ ऋषभ मुझसे अब और नहींसहा जाता।” उसकी आंखों से आंसू लुढ़क कर तकिये पर गिरने लगे।

“मुझे पूरी बात बताओ, बात क्या है–राज कुछ कहता हैक्या, परेशान करता है–?’

“वह छक्का है।”

“छक्का –?”

“हां–वह गे है–सन्नी के साथ लेडीज कपड़े पहनकर सोता है ?”

“क्या कह रही हो तुम?” ऋषभ सन्न रह गया था।

“अभी किसी से जिक्र मत करना, ऋचा से भी नहीं, बातकहां-से-कहां पहुँचती है–उसे पता चल गया तो मेरे साथ बहुतबुरा सुलूककरेगा।”

उधर ऋषभ सकते जैसी हालत में था–राज लेडीज कपड़ेपहनकर सन्नी के साथ सोता है?”

“हां–।”

“माय गॉड!”

“मुझे इस नर्क से निकाल लो ऋषभ, मुझसे नहीं जियाजाता–मेरी जीने की इच्छा खत्म हो गयी।”

“माय गॉड!” ऋषभ अभी तक नहीं उभर पा रहा था।

“और उधर वह सन्नी मेरे पीछे पड़ा है। मुझे भोगनाचाहता है। मुझे इज्जत बचानी भारी पड़ रही है।”

“क्या तुम मेरा साथ दे सकोगी?”

“हां–अब मेरी जिन्दगी में कुछ नहीं बचा है जिसकी मैं परवाह करूं–।”

“मैं सोचता हूँ डॉली।”

“जितनी जल्दी हो सके मुझे यहां से निकाल लो।”

“मैं भी तुम्हारे बगैर नहीं जी सकता हूँ डॉली। मुझेतुम्हारी बहुत जरूरत है–मैंने किशोरवय से तुम्हीं को लेकरसपने देखे हैं, अब वोसपने मुझे बहुत रुलाते है।”

डॉली आंखों से आंसू पोंछते हुए बोली–“बहुत जालिमहै ये राज। मुझे बहुत गालियां देता है, हर वक्त गलियातारहता है–जब भीबात करेगा तो किचमिचाकर ही करेगा, बुराभला बकता रहेगा मुझे।”

“अब कहां है यह राज?”

“सन्नी के साथ कमरे में बंद है। साड़ी पहने हुए है, चूड़ियां पहने हुए हैं, लिपस्टिक लगाये हुए है–।”

“मेरे भगवान–मेरी डॉली का नसीब ऐसा निकला–मैंतो संतुष्ट था कि चलो डॉली खुश रहे तो मुझे कोई गम नहींहै–दुनिया मेंसभी को सबकुछ नहीं मिल जाता है–तुम खुशहालरहतीं तो मैं इस गम को हंसकर सह लेता–।”

“इसके साथ तो मैं एक मिनट नहीं रहना चाहती–चल वहजो कर रहा है वह जाने उसका काम जाने लेकिन मुझे तो मतसता–बड़ा बुराव्यवहार करता है मेरे साथ। हर वक्तगाली-गलौज और मारपीट पर उतारू रहता है, कभी गला पकड़लेगा कि तुझे मार डालूंगा।”

“तुमने अपनी मम्मी को बतायीं ये बातें–बड़ा टपर-टपरबोलती थीं कि ऐसा लड़का ढूंढा है मैंने, वैसा लड़का ढूंढा हैजैसे सारी दुनिया से निराला–कभी बताओ उन्हें उनके निरालेदामाद की सच्चाई।”

“नहीं ऋषभ, ऐसा कभी भूलकर भी मत करना। मम्मी कोपता चल गया तो वह चुप नहीं बैठेगी और पूरा तूफान खड़ा होजाएगा–मेरी फजीहत होगी और कुछ नहीं होगा।”

“अब तो कुछ करना ही पड़ेगा डॉली।”

“कुछ भी करो, मुझे अपने पास बुला लो–बस यहां सेनिकाल लो, मेरा दम घुट रहा है।”

“सोचता हूँ मैं–तुम उससे डायवोर्स ले लो।”

“नहीं देगा।”

“उसके खिलाफ सबूत बनाकर रखो कोर्ट से डायवोर्स जाएगा।”

“हम्म–।”

“तुम उसके फोटो खींचकर रखो।”

“पता चल गया तो मुझे जान से मार देगा।”

“चलोतुम मुझे दो चार दिन का टाइम दो–मैं जरूर रास्ता निकालता हूँ –अब मैं तुम्हें वहां बिल्कुल नहीं होसकता–मुझे क्या पता था कि तुम इस हाल में जी रही हो–।”

“डॉली...।”

“हां...।”

“मैं कुछ करता हूँ ।”

“ठीक है–।”

“तब तक तुम खुद को मेंटेन रखना, होपलेस मत होजाना–।”

☐☐☐

दो दिन बाद सन्नी ने बैंक में ज्वाइन कर लिया था।

उससे पहले वह यस बैंक की ही शाखा में कार्यरत था।

उसी दिन एक नई ज्वाइनिंग भी उस शाखा में हुई थी।

जिसका नाम ऋषभ कुमार था। क्लर्क के पद पर आसीनहुआ था।

उधर डॉली अपने इरादे स्पष्ट कर रही थी।

वह अब क्षणभर भी राज के साथ नहीं रहना चाहती थी।

लेकिन कोई भी कदम वह जल्दबाजी में उठाने को इच्छुकनहीं थी।

बोलती भले ही वह कम थी लेकिन सोचती बहुत थी।

यही कारण था कि वह कोई भी कदम फूंक फूंककर रखतीथी। भारतीय स्त्री की मर्यादा के प्रति वह दंडवत रही थी। यही कारण था कि विगत तीन महीने से उसने अपने मुंह से उफ तक न निकाली थीजबकि राज का जालिमाना करैक्टर तो शादी के दिन दो दिन बाद ही खुलने लगा था।

लेकिन चूंकि भारतीय स्त्री जिस देहरी में बहू बनकर प्रविष्टहोती है तो फिर वहां से उसकी अर्थी ही बाहर निकलती है।उस स्लोगन को वह चरितार्थ कर ही रही थी लेकिन अब...।

अब और नहीं।

अब सिर्फ दो रास्ते थे।

वह जीवन के दो राहे पर आ खड़ी थी।

सिर्फ दो रास्ते बच थे। या तो अर्थी अभी उठ जाए या फिरवह यह देहरी छोड़ दे।

ऋषभ की निसबत से दूसरा रास्ता उसे ज्यादा लुभा रहाथा। यदि ऋषभ की पात्रता नहीं होती तो वह पहले वालारास्ता निःसंकोच चुन लेती।

उसके अंदर एक कमी भी थी। यह शायद कम वाचालप्रवृति की वजह से स्वाभाविक थी कि वह प्रेशराइज जल्दी होजाती थी।

हालात का डटकर सामना नहीं कर पाती थी।

एकदम दबाव में आ जाती थी और घबरा जाती थी।

राज का प्रेशर पूरी तरह डॉली पर प्रभावी था।

आज सन्नी अपने बैंक चला गया था। घर में वह अकेलीथी। कई दिन बाद वह खुली सांस ले पा रही थी।

वरना अपने ही घर में अस्वतंत्र हो गयी थी। बस किचनऔर कमरे में कैद रह पाती थी। घर में इधर-उधर चलती थीतो सन्नी की नजरों की चुभन उसे पीड़ित करती थी और जबवह जबर्दस्ती बात करना चाहता था तो डॉली की घुटन औरघबराहट बहुत बढ़ जाती थी।

वह बुरी तरह त्रस्त हो जाती थी।

आज कुछ स्वछन्दता उसे उपलब्ध हो रही थी।

वह अपने ही घर में जहां चाहे बैठ सकती थी, उठ सकतीथी।

दोपहर के दो बजे तो उसने ऋषभ का फोन घनघना दिया।

कुछ देर बाद उधर से रिसीव हुआ–“हैलो।”

“कैसे हो ऋषभ?”

“बहुत अच्छा, अभी तुम्हीं के बारे में सोच रहा था मैं ।”

“कैसा रहा पहला दिन?”

“बस अच्छा रहा।”

“सन्नी मिला होगा?”

"हां–एक नया लोन ऑफिसर आया है, शायद वही है औरउससे मुलाकात नहीं की है।”

“थोड़ा लम्बे कद का है, लम्बा चेहरा है और हल्की-हल्की दाढ़ीरखे है–।”

“हां-हां वही है–देखने-भालने में तो भला लग रहा है, साला ऐसे गंदे काम करता है।”

“अब तो लंच टाइम चल रहा होगा?”

“यस–।”

डॉली दो क्षण को खामोश रही, तदुपरांत बोली–“क्यासोचा फिर तुमने ऋषभ। कुछ बताया नहीं?”

“क्या सोचूं यार, कुछ समझ में नहीं आ रहा।”

डॉली तो बहुत हतोत्साहित हो गयी। जैसे आशा परतुषारापात हो गया हो।

वह बोली–“क्या समझ में नहीं आ रहा?”

“राज तुम्हें फ्री नहीं करेगा, न डायवोर्स देगा–मैंने बतायान तुम्हें कि डायवोर्स के लिए कोर्ट में अपील करो और राजके कुछ फोटो खींचकर रखो।”

डॉली ने एक हारी हुई सांस छोड़ी और बोली–

“कानूनी पचड़े में कछ नहीं होगा ऋषभ। बल्कि मेरी हीछीछालेदारी होगी–मेरी मां ही मेरे साथ खड़ी नहीं होगी। मैंअकेली क्या करूंगी?”

“फिर क्या रास्ता निकलता है?”

“तुम कह रहे थे न कि मैं सोचूंगा।”

“बहुत सोचा मैंने मगर कुछ समझ में नहीं आया–एक लॉयर से मशवरा भी लिया, उसने भी यही कहा कि जब तकपहले पति से डायवोर्स नहीं हो जाता आप किसी विवाहिता को अपने संग नहीं रख सकते।”

“तो क्या कुछ नहीं हो सकता?”

“मेरे कोई बात समझ में नहीं आ रही। जब तक तुम कमरकसकर मैदान में नहीं आओगी, तब तक कुछ नहीं हो सकता–तुमएक तरफ बदनामी से भी डर रही हो और दूसरी तरफ इतनाबड़ा कदम भी उठाना चाहती हो, तो यह कैसे सम्भव है?”

“एक प्लानिंग मेरे दिमाग में आई है।”

“प्लानिंग–क्या प्लानिंग?”

“अगर तुम वास्तव में मुझसे सच्चा प्यार करते हो और मुझेपाना चाहते होगे तो जरूर प्लानिंग में मेरा साथ दोगे।”

डॉली ने गहरी सांस ली।

इतनी ही गहरी सांस जितनी गहरी प्लानिंग उसके मष्तिष्कमें पनपी थी

और उसके बाद वह सुनाती चली गयी।

☐☐☐

“क्या सर यही आपकी पहली ज्वाइनिंग है?”

“नहीं, यहां मेरा स्थानांतरण हुआ है, उससे पहले मैं गाजियाबाद ब्रांच में था।”

“ओह! मेरी तो सर पहली पोस्टिंग है।”

“कांग्रेचुलेशन।”

“थैंक्यू सर।” ऋषभ तुरन्त ही आगे बोला–“तो अभी आपकहां रहते है–कोई परेशनी हो तो अच्छा सा फ्लैट दिला सकता हूँ ।”

“अभी कोई जरूरत नहीं है–मैं बहुत अच्छी जगह रह रहा हूँ ।यूं समझो जन्नत में रह रहा हूँ ।” कहकर सन्नी हंसा।

“अच्छा।” ऋषभ भी मुस्कुराया और बोला–“इस सहारनपुर मेंऐसी जगह कहां है सर? हमें भी तो पता चले।”

सन्नी नार्मल हो गया और बोला–“आई मीन मेरे बचपनका दोस्त मुझे मिल गया है, वहीं रह रहा हूँ तो वो जगह जन्नतही हुई न–।”

“हां-हां सर–वैसे भी अगर आपको किसी मदद की जरूरतहो तो बोलना–मुझे बहुत खुशी होगी।”

☐☐☐

दो सप्ताह बाद–

एक दिन दोपहर में–

डॉली अपने कक्ष में लेटी थी कि उसके फोन की घन्टीबजी।

राज का नम्बर था।

उसने रिसीव कर लिया–“हेलो।”

“दरवाजा खोल।” राज बोला था।

अभी तो दिन का एक बज रहा था। डॉली बिस्तर सेउठी और गेट पर गयी।

सिटकनी गिराई।

दरवाजा खोला।

राज खड़ा था और उसके पीछे ऋषभ था।

ऋषभ को देखकर डॉली बिल्कुल नहीं चौंकी, न मुस्कुराई।

बस सपाट चेहरा लिए नार्मल रही। एक नजर ऋषभ को देखनेके बाद उसने दोबारा देखना गवारा भी नहीं किया था।

जबकि राज कहते हुए प्रविष्ट हुआ–“हैरानी से क्या देखरही है, मेरा नया खसम है–।”

वे दोनों भीतर आ गये।

राज के इस वाक्य पर धीमे से जरूर मुस्करा दी थी औरधीमे से ही राज से कह भी दिया था–“मुबारक हो–।”

राज निहाल हो गया था। वह डॉली से यही व्यवहारतो चाहता था कि डॉली उसकी खुशी में खुशी का प्रदर्शनकरे।

हंसे, बोले।

प्रसन्नचित्त रहे और उसके लिए वह समझा बुझाकर तथा डांट-डपटकर और धमकियां देकर थक गया था मगर मजालथी जो रत्ती भर भी उस पर असर हुआ होता।

आज पता नहीं कौन सा बोधुत्व घट गया था कि मुस्कराईभी थी और मुबारकबाद भी पेश कर रही थी।

यह तो कमाल हो गया था। इस दिन की तो वह जाने कबसे बाट जोह रहा था।

एक अजब सुकून सा मिला राज को।

वे लोग लिविंग हॉल में आये। राज ऋषभ को सोफे परबैठाते हुए बोला–“आप बैठिये, मैं जरा तैयार होकर आती हूँ ।”

ऋषभ डॉली की तरफ इशारा करते हए बोला–“यह कौन है, क्या आपकी बहन हैं?”

राज अकारण ठट्टा मारकर हंस छूटा और बोला–“बहन नहीं पत्नी है।”

“पत्नी?” ऋषभ को बहुत आश्चर्य हुआ। वह गोल आंखें राज पर डालता हुआ बोला–“क्या आपको भी पत्नी कीजरूरत पड़ गयी?”

“मुझे नहीं, मेरे पेरेन्टस को बहू की जरूरत पड़ गयी थी।”

“ओह!”

डॉली वही खड़ी थी। चेहरे पर कमाल की चमक लियेअचानक राज को आश्चर्य से सागर में डुबकी देते हुए?उसका मुट्ठा पकड़कर और सिर कंधे पर हाथ रखकर बोली–“जैसेभी हैं मेरे पति हैं। मुझे बहुत प्यार करते हैं, डांटते हैं या बुराभला कहते हैं तो सिर्फ इसलिएकि मुझे बहुत प्यार करते हैं।”

राज की तो बुद्धि चकरा गयी।

यूं लगा कि पूरा फ्लैट घूम रहा है।

डॉली के मुंह से वो सुन लिया जो कि असंभव लगा था।

और सबसे बड़ी बात, कितने प्यार से कंधे पर सिर रखेखड़ी थी।

राज भाव-विह्लल हो गया। उसका वश चलता तो वहआंखों से गर्व के आंसू बहाने लगता।

चकित दृष्टि से वह डॉली को देखने लगा जैसे उसेयकीन न हो कि यह डॉली ही है।

इतना आमूल चूल परिवर्तन।

राज ने उसके गाल पर अपनी हथेली रख दी और शायदजीवन में पहली बार इतने प्यार से बोला–“गेस्ट के लिए चायनहीं बनाओगी?”

“बिल्कुल बनाऊंगी, आपका गेस्ट मेरे सर आंखों पर ।”

फिर राज गौरवान्वित हो गया।

वह खुशी से आंसू छलका लेना चाहता था मगर उसकोशृंगार की जल्दी हो रही थी। वह डॉली का गाल थपथपातेहुए बोला–“तुम मेहमान की चाय-पानी करो, मैं अभी आई।”

डॉली मुस्कराकर किचन की तरफ चली गयी।

ऋषभ बहुत शरीफ व्यक्ति की तरह नीची नजरें करे बैठाथा।

राज कमरे में छुपा था।

डॉली ने पानी का गिलास लिया, ऋषभ के पास आई।बड़ी प्यासी दृष्टि से देखती हुई जैसे जन्म जन्मांतर की प्यासबुझा रही हो।
 
वह पानी लेकर पास आई। ऋषभ ने उसे पैरों के बीचफांस लिया और पानी के गिलास को झट उसके हाथों से पकड़लिया।

दोनों एक-दूसरे की आंखों में डूबे थे।

डॉली का तीव्र ध्यान इस पर भी था कि राज अचानककमरे से बाहर न आ जाये।

कुछ देर तक वे दोनों इसी पोज में रहे, फिर डॉली ने उसके हाथ से गिलास छोड़ा और उसकी टांगों से अपनी जांघें छुड़ाती हुई राजवाले कमरे की तरफ बढ़ गयी।

दरवाजा खुला था।

वो खुलता चला गया।

निशब्द।

☐☐☐

राज ड्रेसिंग टेबिल के समक्ष खड़ा था और अभी ब्रा पहनरहा था।

डॉली निःशब्द उसकी तरफ बढ़ी।

जब वह बिल्कुल सिर पर सवार हो गयी तब राज को आहट मिली और वह बुरी तरह चौंक उठा।

न जाने क्यों दिल में एक डर का सूत्रपात हुआ।

वह चौंका, फिर पलटते हुए बोला–“अरे डॉली...तुम...।”

डॉली के अधरों पर मुस्कान खिली थी। उसने पास रखी लंबे बालों वाली विग उठाते हुए कहा–“अपनी जानू को मैंअपने हाथ से सजाऊंगी।”

राज पुनः ओतप्रोत होकर उसे देखने लगा।

उसके इस तरह देखने पर डॉली ने उसे अपनी शरारतीचमकदार आंखों से देखा और उसका किस ले लिया तथाबोली–“ऐसे क्या देख रहे हो?”

“आज तुम पर बहुत प्यार आ रहा है मुझे। तुम्हारे ऐसेव्यवहार से तो मैं तरसा करती थी।”

“अपनी जान को मैं सजाऊंगी।” उसने ब्रा की बद्दी दुरुस्त की और बोली–“जानती हो मंजू, तुम सज-धज करकैसी लगती हो–?”

राज ने सांसों के बल पूछा–“कैसी लगती हूँ ?”

“एकदम शिल्पा शेट्टी–यह भोला मुखड़ा ऐसा लगता हैजैसे भगवान ने फुरसत में बनाया है।”

“तुम्हारे अंदर एकदम इतना बड़ा बदलाव कैसे आ गया?” वह चकित स्वर में पूछ रहा था।

“मुझे सन्नी से नफरत है, जब वह घर-घूरकर देखता है तोमुझे बहुत बुरा लगता है–मेरा दिन भर दिमाग खराब रहता हैइसलिए तुमसे बोल नहीं पाती–यह देखो न कितना शरीफलड़का है, नीची नजरें करे बैठा है। चेहरे से ही शरीफ लग रहाहै इसलिए आज मेरा मूड ठीक है।”

राज ने उसे अपनी बांहों में लिया और बोला–“जानतीहो जानू यह मेरे पिछले जन्म का पति है–।”

“क्या कहते हो?”

“सच कह रही हूँ –यह बिल्कुल सच्ची बात है। लम्बीदास्तान है। यह मैं तुम्हें आज रात में सुनाऊंगी–इसे दो घंटे लेकर आई हूँ –एक बैंक में नौकरी करता है।”

“अच्छा?”डॉली के चेहरे पर आश्चर्य ठहरा था। वहआगे बोली–“तुम्हें रात में फुरसत ही कब मिलती है। उसकेसाथ पैक हो जाते हो। मुझे नजर उठाकर ही कब देखते हो?”

“आज तुम्हारे पास ही लेटूंगी मैं–आज तुमने दिल खुशकर दिया–अब समय कम है। फटाफट मुझे तैयार करा दो–घण्टेभर बाद यह चला जाएगा। मुझे भी वापस ड्यूटी जाना है।”

“ओके मेरी जान।” डॉली ने बड़े प्यार से उसका चुंबनलिया और लंबे बालों की विग उसके सिर पर पहना दी।

राज बोला–“आज मैं तुम्हारे मनपंसद कपड़े पहनूंगी,कौन से कपड़े पहनूं?”

“वही सलवार-सूट जो तुमने सिलवाया था।”

राज प्रसन्नचित मुद्रा में बोला–“तुम मुझे कितना समझतीहो। मैं भी उसी सूट को सोच रही थी।”

“बहुत सेक्सी लगोगी तुम उसमें मेरी जान।”

“अब फटाफट तुम मुझे सजा दो–आज मैं बहुत निहाल हूँ मेरा रोयां-रोयां खड़ा हो रहा है।”

“अभी लो।”

कहकर डॉली उसे मनोयोग से सजाने लगी।

☐☐☐
 
थोड़ी देर बाद वे दोनों कक्ष से बाहर निकले।

डॉली राज को पकड़कर ला रही थी। जैसे कोई स्त्रीकिसी नवेली को सजा-धजाकर ला रही हो।

सिर पर चुनरी डाल रखी थी जो आंखों से थोड़ा नीचे तकभाग को ढकती थी। मात्र सुर्ख होंठ दृष्टिगोचर होते थे।

राज नीची नजरें किये चलता हुआ लिविंग हाल मेंआया। डॉली किसी घनिष्ठ सखी की तरह उसे पकड़े हुएथी।

जब वे ऋषभ के समीप आये और ऋषभ की दृष्टि राज पर पड़ी तो वह चहक उठा–“वाव, क्या सुंदरता है! मैं तो यकीननहीं कर सकता।”

डॉली धीमे-धीमे मुस्कुरा रही थी ।

डॉली बोली—“अपनी दुल्हन को संभालो । मैं तुम लोगों के लिए चाय बनाकर लाई । डॉली ने राज को ऋषभ को पकड़ा दिया ।”

ऋषभ ने खड़ा होकर उसे दोनों हाथों से पकड़ा और अपने बराबर में सोफे पर बैठा दिया तथा खुद भी बैठा और सरगोशी के से अंदाज में बोला-“संगीता- ।”

ऋषभ ने उसकी चुनरी उठाकर उसके सिर पर रखी और ठोड़ी उठाते हुए बोला—“तुम बिल्कुल वही हो । मेरी संगीता हो तुम—क्या तुम मुझे नहीं पहचान पा रही हो ?”

“मेरे आदर्श ।” राज उसकी आंखों में झांकता हुआ बोला ।

“हां संगीता—मैं तुम्हारा आदर्श—पिछली बार दुश्मनों ने हमें मौत के घाट उतार दिया था लेकिन हमारा रिश्ता किसी एक जन्म तक सीमित नहीं है—जब तक हमारे भीतर प्यास है हम जन्म लेते रहेंगे संगीता ।”

“लेकिन भगवान ने इस बार मेरे साथ इतना बड़ा मजाक क्यों किया ?”

“तब भी क्या हुआ ? आखिर मैंने तुम्हें पा लिया ना । भगवान ने तुम्हारा शरीर ही तो बदल दिया, इतना कैसे बदल सकता है वो ? मिलन तो दो आत्माओं का होता है । हम हर जन्म में मिलकर रहेंगे ।”

“मेरे आदर्श ।” राज ने ऋषभ के कंधे पर अपना सिर रख दिया ।

उतनी देर में डॉली चाय बना लाई ।

वह प्रसन्नचित्त स्वर में पास आती हुई बोली—

“नव जोड़े को गर्मा-गर्म चाय हाजिर है ।”

दोनों ने एक-एक कप चाय उठा ली ।

डॉली राज की चुनरी करीने से संभालने लगी ।

राज बोला—“आज मैं बहुत खुश हूं । जहां मुझे मेरा असली प्यार मिला । वहीं डॉली के व्यवहार ने मेरा दिल खुश कर दिया । मेरी एक कुढ़न खत्म हो गयी जिसमें मैं रात-दिन कुढ़ती रहती थी ।”

“देखो उसको तुम घर में तब लाओ...।” डॉली आगे भी कुछ कहती कि राज ने डॉली का पैर दबा दिया और डॉली चुप हो गयी ।

तब तक ऋषभ ने चाय का घूंट भरते हुए राज से पूछ लिया था—“किसकी बात हो रही है, कौन घर में नहीं आएगा ?”

“वह एक...है—तुम नहीं जानते हो ।” राज ने कहा ।

ऋषभ चुप हो गया ।

डॉली बलिहारी जाने वाली दृष्टि से राज को मुस्कुराकर देख रही थी । उसने राज के सिर पर हाथ फिराया और बोली—“किसी की नजर न लग जाए इस सलौने मुखड़े को —जैसे कोई चांद का टुकड़ा हो ।”

राज शरमा गया ।

डॉली के मुंह से अपनी प्रशंसा सुन गदगद था ।

उन्होंने जल्दी ही चाय खत्म कर दी ।

चाय खत्म करते ही राज उठ खड़ा हुआ और ऋषभ से बोला—“आओ आदर्श फिर लंच टाइम खत्म हो जाएगा ।”

ऋषभ भी उठ खड़ा हुआ ।

वे दोनों एक दूसरों के गले हाथ डालकर कमरे में घुस गये ।

डॉली धम्म से सोफे पर गिर गयी ।

चेहरे पर विजयात्मक मुस्कान थी ।

उसकी प्लानिंग जो सफल हो रही थी ।

अगले ही क्षण इस विजयात्मक मुस्कान ने दृढ़ता का रूप ले लिया ।

चेहरे पर कठोरता छाने लगी ।

क्योंकि प्लानिंग का अगला हिस्सा बड़ा क्रूर था ।

☐☐☐

वे दोनों ढाई बजे तक घर से निकल गये ।

राज ने कुछ देर को ही दुल्हन रूप धारण किया था । बाद में पुनः अपने परिधान को पहनकर ऋषभ के साथ बाहर निकल गया था । दोनों अपनी अपनी डयूटी पर चले गए थे ।

डॉली सोने चली गयी थी । अब कुछ घंटे घर में कोई आने वाला नहीं था । छः बजे के करीब सन्नी आता था, तब तक वह सो सकती थी ।

बहुत देर तक वह बिस्तर पर करवट बदलती रही थी । आश्चर्यजनक रूप से उसकी योजना सफल हो रही थी ।

इसकी प्रसन्नता उससे समायी नहीं जा रही थी ।

जो जिंदगी उसे बहुत बोझल नजर आने लगी थी । जो सिर्फ आंसुओं की सौगात बनकर रह गयी थी, जिसको अब गुजारा तब नहीं जा रहा था, वह मात्र एक मोड़ के बाद इतनी हसीन हो जाएगी, उसकी उससे कल्पना भी सहज नहीं थी ।

अब तो ऐसा लग रहा था जैसे सारे बिगड़े समीकरण सुधर गये हो ।

जिंदगी का पतझड़ बीत गया हो और खुशहाली के तराने दर पर दस्तक देने लगे हों ।

मगर अभी ऐसा मात्र आभास मिल रहा था ।

असली सफलता अभी दूर की कौड़ी थी । अभी तो गंगा में बहुत पानी बहना था ।

मगर प्रारम्भिक सफलता ने इस चीज की जमानत ले ली थी कि आगे भी सफलता के किले फतह होते चले जाएंगे ।

वह जानती थी कि अभी तो कुछ नहीं हुआ है । प्लानिंग का पहला चरण भी चौथाई पूर्ण नहीं हो पाया है ।

अभी तो बहुत खेल खेलना बाकी था ।

लेकिन यह विश्वास बलवती हो गया था कि जब आगाज अच्छा है तो अंजाम भी सुहाना होगा ।

इसी खुशी में वह बिस्तर पर करवटें बदल रही थी ।

चार बजते-बजते उसे नींद आ गयी ।

और उसकी आंख खुली कालबैल की ध्वनि पर ।

जब तीन बार कालबैल घनघनाई, तब उसकी नींद में विघ्न पड़ा और वह उठ गयी ।

वह मात्र पेटीकोट और ब्लाऊज में थी । बड़े गले का ब्लाउज उसके उरोज ढापने में नाकाम था । वह यह जानते हुए भी कि दरवाजे पर सन्नी है, बगैर खुद को दुरुस्त करे दरवाजा खोलने चली गयी ।

सिटकनी गिराई ।

दरवाजा खोला ।

सामने सन्नी खड़ा था । वह उसे देखकर मुस्कुरा रहा था ।

सन्नी भीतर आया ।

यह कहते हुए—“क्या सो रही थी ?”

डॉली दरवाजा बंद करते हुए बोली—“हां यार, अभी नींद आ गयी थी ।”

सन्नी की लालची दृष्टि डॉली के बड़े से उरोजों पर ही टिकी थी । वह शरारत से बोला—“आज तुमने एक चीज नहीं पहनी है— ।”

“ब्रा की बात कर रहे हो ?”

“क्या खूब समझी तुम !”

डॉली उसे मुस्कुराकर देखने लगी ।

सन्नी ने उसे गोदी में उठा लिया और सोफे की तरफ लेकर बढ़ा ।

डॉली ने उसकी गर्दन में हाथ डाल दिया और बोली—“मेरी जिंदगी का यह कांटा मुझसे कब दूर होगा ।”

“राज—?”

“हां वही छक्का—।”

“बस दूर होने वाला है ।”

“कब तक—?”

“अब शुभ मुहूर्त आने ही वाला है ।”

“क्या तुम्हें मुझे भोगने का विचार नहीं है ?”

“मैं तो बहुत उतावला हूं, अभी टूट पडूं ?”

डॉली मुस्कुराककर इंकार में गर्दन हिलाती हुई बोली—“पहले शादी, फिर सुहागरात—उससे पहले नहीं ।”

“अजी, अभी शादी रचाये लेते हैं ।”

फिर वह इंकार में गर्दन हिलाती हुई बोली—“भारतीय स्त्री एक पति के रहते दूसरी शादी नहीं कर सकती ।”

“साले को लगा देंगे ठिकाने ।”

“कब—कितने दिन हो गये तुम्हें यह कहते हुए ?”

“मैं तगड़ी प्लानिंग कर रहा हूं ।” कहते हुए उसने उसे सोफे पर डाला और उसके ऊपर झुक गया ।

उसके होंठ चूसने लगा ।

जैसे ही उसने हाथ नीचे बढ़ाया, डॉली ने हाथ पकड़ लिया और इंकार में गर्दन हिलाने लगी ।

सन्नी हंसते हुए सीधा हो गया । उसे पता था कि डॉली कितनी मन ही पक्की है जो निश्चय कर लिया वो समझो कर लिया ।

अधिक प्रयत्न का कोई फल नहीं था ।

अतः सन्नी सीधा हो गया और अपने कमरे कि तरफ बढ़ गया ।

☐☐☐
 
थोड़ी देर बाद वे दोनों सोफा चेयर पर पास-पास बैठे चाय सिप कर रहे थे ।

डॉली उसी तरह मात्र पेटीकोट और ब्लाऊज में थी जबकि सन्नी मात्र वी शेप अण्डर वियर में ।

लगभग पन्द्रह रोज पहले से जब से यह नया घटनाक्रम शुरू हुआ था, सन्नी राज की अनुपस्थिति में घर में मात्र अण्डरवियर में ही रहता था । वह अपने शरीर के पेक्स दिखता रहता था, उसका इरादा था की इस तरह डॉली अपना निश्चय तोड़ देगी और उसकी झोली में पके आम की रह गिर सकती है ।

मगर अभी तक तो यह सम्भव नहीं हो पाया था ।

बस उतना ही सम्भव हुआ था पंद्रह रोज पहले जितना डॉली ने घटाया था ।

छेड़छाड़ की और किस चुंबन की सन्नी को पूरी स्वतंत्रता थी और वह हमेशा इसका फायदा उठाता रहता था ।

डॉली को तो देखते ही वह उतावला हो उठता था ।

सन्नी मात्र अण्डरवियर में था उसके पास उससे सटकर बैठा था तथा उसके गले में हाथ डाल रखा था ।

किसी भी प्रकार की छेड़छाड़ से डॉली को कोई आपत्ति नहीं थी मानो यह सब सन्नी का अधिकार हो ।

डॉली घूंट भरकर बोली—“साला रोज ऐसे सजता संवरता है जैसे कितना बड़ा सुहागन है, इतना श्रृंगार तो औरतें नहीं करती हैं— ।”

सन्नी बोला—“मैं तो तंग आ चुका हूं इससे, मैं तो हैरत करता हूं कि इसके जिस्म को कितनी भूख है, अगर तुम्हारा सहारा नहीं होता तो मैं कभी का इस घर से भाग गया होता—रोज साला जागकर रखता है ।”

“मेरा ही नसीब फूटा था—मेरी मां को यही छक्का मिलना था, जैसे दुनिया में लड़के मर गये थे ।”

“तो फिर हम कैसे मिलते ?” उसने गर्दन में पड़े हाथ पर थोड़ा दबाव दे दिया ।

“हां यह तो सच है— ।” डॉली बोली—“आज मैं तुम्हारे बगैर जीने की कल्पना भी नहीं कर सकती ।”

“लेकिन शुरू का एक हफ्ता तो तुमने बहुत तरसाया ।”

“क्या करूं यार—भारतीय स्त्री हूं, भारतीय संस्कार भरे हैं । एक पति के रहते गैर मर्द को कैसे देख सकती हूं—?”

“पहले तो मुझे इस तरह अण्डरवियर में देखकर आंखें बंद कर लेती थीं ।”

“जब तक मैंने तुम्हें अपना भावी पति नहीं माना था तब तक मैं तुम्हें इस तरह कैसे देख पाती ?”

“अब जब पति मान लिया तो अब भी तुम्हारी गर्दन इंकार में ही हिलती रहती है ।”

“विधिवत तो अभी वही मेरा पति है—उसके जिंदा रहते मैं तुम्हें कैसे हासिल हो सकती हूं—पता नहीं कब मरेगा और मुझे आजादी मिलेगी ?”

“जल्दी ही ।”

“वो जल्दी कब होगी ?”

“देखो, अभी तुम पुलिस कानून को नहीं जानती हो—मैं इस घर में रह रहा हूं, अभी अचानक उसकी हत्या हो जाये तो पुलिस का शक सीधे हम पर ही जाएगा कि हमने ही मर्डर कर दिया— क्या तुम बाकी जिंदगी जेल की सलाखों के पीछे गुजारना चाहती हो—?”

डॉली कांपते हुए बोली—“नहीं-नहीं ।”

“फिर—?”

“कोई फुलप्रूफ योजना बनाओ न ।”

“वही तैयार कर रहा हूं— ।” वह कप नीचे फर्श पर रखते हुए बोला—“योजना का पहला हिस्सा यह है कि सबसे पहले तो मुझे इस घर से निकल जाना चाहिए और कम-से-कम महीना-दो महीना बाहर रहना चाहिए ।”

“महीना-दो महीना—? तब तक तो मेरा दम घुट जाएगा ।” डॉली सन्नी की बॉडी से लिपट गयी । अपने ब्रेस्ट का उसका सीने पर दबाव दे दिया ।

वह अपने अंक में भींचते हुए बोला—“इसी लालच के चलते तो मैं इस घर को नहीं छोड़ पा रहा हूं और मेरी योजना कोई मूर्त रूप नहीं ले पा रही है ।”

वह उसके उरोज में मुंह छिपाता हुआ बोला ।

“मैं भी तुम्हारे बगैर नहीं जी सकती सन्नी ।” उसने अणि बाहों के दायरे में उसके शरीर को ले लिया ।

सन्नी उफनते हुए बोला—“बस एक बार ।”

डॉली छिटककर दूर हो गयी—“असंभव—रेप कर सकते हो तो कर लो, लेकिन उसके बाद मैं जहर खा लूंगी, मैं पापी आत्मा को लेकर जिंदा नहीं रह सकती ।”

उसके मरने की धमकी से वह सिहर उठा ।

डॉली के कपड़े अस्त-व्यस्त हो गये थे ।

ब्लाऊज का सोल्डर उतरकर नीचे हो गया था जिसे उसने दुरुस्त किया ।

उसी समय घर की घण्टी बजी ।

डॉली घबरा गयी—“अब कौन हो सकता है ?”

उसने वाल क्लॉक देखा । अभी पौने सात हो रहे हैं । राज तो आठ बजे तक आता था ।

सन्नी कमरे की तरफ कूच कर गया था, पूरे कपड़े पहनने के लिए ।

डॉली भी तेजी के साथ अपने कमरे में घुसी और एक मेक्सी बदन पर डालने लगी ।

उसके बाद वह दरवाजा खोलने बढ़ी ।

☐☐☐

डॉली ने सिटकनी गिरायी ।

सामने शन्नो कुमारी खड़ी थी । डॉली के अंदर जो सस्पैंस था कि दरवाजे पर कौन होगा, शन्नो कुमारी को देखकर एकाएक वह घबराहट में तब्दील हुआ क्योंकि शन्नो कुमारी की आंखें स्कैन मशीन थीं ।

वह हमेशा डॉली को शक की दृष्टि से देखती थी ।

चूंकि चोर तो वह बन चुकी थी इसलिए दाढ़ी में तिनका होना कोई अतिश्योक्ति नहीं थी इसलिए वह शन्नो कुमारी को एकाएक देखकर घबरा उठी थी ।

लेकिन शीघ्र ही उसने खुद को नियंत्रित किया ।

और बोली—“नमस्ते मम्मी ।”

शन्नो कुमारी के माथे पर शिकन पड़ चुकी थी । वह बड़े गौर से डॉली का चेहरा देख रही थी ।

वह भीतर आई । डॉली ने दरवाजा बंद किया और जैसे ही डॉली पलटी, शन्नो कुमारी उसके गाल पर एक जगह सूख चुके थूक का निशान स्पष्ट नोट करती हुई बोली—“घर में कौन है ?”

“घर में—? घर में तो सन्नी है ।”

“उसी ने तेरा चुम्मा लिया है ?”

“चुम्मा—पागल हो गयी हो आप— ?”

“हां मैं पागल हो गयी हूं ।” शन्नो कुमारी ने उसका हाथ पकड़ा और उसे कमरे की तरफ लेकर गयी ।

हाल में कोई नहीं था । सन्नी अपने कमरे में था । शन्नो कुमारी उसे उसके कमरे में ले गयी और दरवाजा ढुका दिया ।

"क्या बात है मम्मी ?"

शन्नो कुमारी गौर से बिस्तर की चादर को देखने लगी ।

किसी इन्वेस्टीगेटर की तरह ।

शायद उसे वहां ऐसा कुछ नहीं मिला जिसकी उसे खोज थी ।

वह सीधी हुई ।

“क्या देख रही हो मम्मी ?”

“यहां लेट— ।”

“लेटूं—? क्यों ?”

“लेट ना— ।” उसने उसे पकड़कर लिटा दिया ।

और उसकी मेक्सी ऊपर सरकायी, अंदर का वस्त्र भी, और किसी स्थान का बारीकी से निरिक्षण करने लगी ।

उसके बाद सीधी हुई ।

“मम्मी तुम पागल तो नहीं हो गयी हो ।” डॉली उठकर बैठते हुई बोली ।

“तू बहुत गलत कर रही है जो कर रही है ।”

“क्या किया मैंने ?”

“वो तो नहीं किया जो नहीं करना चाहिए था लेकिन चुम्मा भी तूने क्यों दिया ?”

“किसे दिया चुम्मा मैंने ?”

“आ इधर आ, शीशे के पास ।” वह उसे मिरर के पास ले गई और बोली—“यह कैसा निशान है—?”

“यह पानी का—मैं सो रही थी, उठी होऊंगी तो आंख से पानी निकला होगा, उसी का निशान है ।”

“कब उठी ?”

“अभी थोड़ी देर पहले जब सन्नी आया था ।”

“देख डॉली— ।” शन्नो कुमारी अपेक्षाकृत नर्म रुख इख्तियार करती बोली—“नाजायज नाजायज होता है, थोड़ी देर को जरूर बहुत अच्छा लगता है लेकिन जिंदगी भर का नासूर बनकर रह जाता है—सोच, अगर राज को यह सब पता चलेगा तो तेरा क्या होगा ?”

“मम्मी तुम बेबात का बतंगड़ मत बनाया करो ।” अब मानो डॉली का धैर्य छलक उठा था—“बेसिर पैर की बातें कर रही हो, अपने दामाद को क्यों नहीं बोलतीं कि वह इसे घर से बाहर निकाले—न यह रहेगा, न तुम मुझ पर शक करोगी ।”

“उसकी भी आंखों पर पट्टी बंधी है, उसे मैंने समझाया था— देख डॉली, इसमें बुरा मानने की बात नहीं है—जवानी बहुत शैतान होती है—तुम्हारी उम्र ऐसी नहीं है कि तुम किसी जवान लड़के के साथ घर में अकेली रहो, दिमाग पर कब शैतान सवार हो जाये, कुछ नहीं कहा जा सकता—जवानी में शैतानियां सूझती हैं— ।”

“बस भगवन के लिए चुप हो जाओ—तुम्हारी इन्हीं बातों से मेरे सिर में दर्द रहने लगा है, मुझे मारकर ही पीछा छोड़ोगी तुम— ।”

“मैं क्या करूं जब मेरा दामाद ही अंधा है ।” वह कमरे से बाहर निकलती हुई दुसरे कमरे के दरवाजे पर जोर से बोलती हुई हाल में आई—“न इस बेगैरत को शर्म है कि मैं किसी के घर में क्यों रहूं—बेशर्म, बेहया—कोई शरीफ आदमी किसी की फैमिली के बीच में रहेगा क्या ?”

वह हाल में आकर सोफे पर बैठ गयी ।

डॉली फ्रिज से पानी की बोतल निकाल लाई और गिलास में उड़ेलकर पानी देने लगी ।

शन्नो कुमारी ने गटागट चढ़ाया ।

डॉली बोली—“तुम्हें याद पड़ता है, जीवन में तुमने कभी मुझसे प्यार की भाषा में बात की हो ।”

“हां मैं तो तेरी दुश्मन हूं—तेरा अच्छा कब चाहती हूं मैं—जब तक यह दम है कर लो बेटा बर्दाश्त, फिर याद करोगे— ।”

“हां सही है—पिण्ड तो छूटेगा ।” डॉली किचन की तरफ बढ़ी चाय बनाने के लिए ।

☐☐☐
 
आज रात को राज को राज डॉली के रूम में लेटा था । उसे डॉली के रूम में लेटना था तो ऐसा नहीं था कि उसने अपना मनपसंद परिधान न पहना हो ।

उस परिधान में तो जैसे उसकी आत्मा बसती थी । घर आते ही सबसे पहले जब वह कपड़े चेंज करता था तो लेडी सूट ही बदन पर डालता था ।

उससे पहले उसे चैन ही नहीं मिलता ।

सजता संवरता था । न जाने कितना शौक उसे सजने संवरने का था । आईने में खुद को देखता जाता था और प्रसन्न होता जाता था ।

पूरी तरह से स्त्री रूप धारण करके ही उसे चैन मिलता था । आज भी जब डॉली वाले कमरे में सज-संवर रहा था तो डॉली पास आकर चुटीले स्वर में बोली—“छमिया को मैं सजाऊं ?”

प्रत्युत्तर में राज के कपोल पर लाली उतर आई थी ।

डॉली ने उसे पीछे से बाहों में भर लिया था और छेड़खानी करने लगी थी ।

राज बोला—“आज तेरे पास ही लेटूंगी ।”

“क्यों, आज अपने पति को अकेला छोड़ दोगी ?”

“अब मुझे मेरा असली पति मिल गया है जिससे मेरा जन्मजन्मांतर का ताल्लुक है ।”

“ओह—कौन, वो जो दिन में आया था ?”

“हां—मेरा आदर्श ।”

“पिछले जन्म की क्या बात बता रही थीं तुम ?”

“बताऊंगी, रातभर पास ही लेटना है, बता दूंगी ।” उसने लिपस्टिक अधिक गाढ़ी करके होठों को फाइनल टच दिया ।

और डॉली की तरफ मुड़ता हुआ बोला—“कैसी लग रही हूं ?”

“वाव ! अति सुंदर ।” डॉली उसककी बलिहारी लेती हुई बोली—“भगवान बुरी नजर से बचाये ।”

“भगवान पर मुझे बहुत गुस्सा आता है—बहुत बुरा किया है उसने मेरे साथ, मैं उसे कभी माफ नहीं करूंगी ।”

"कमी क्या है तुम्हें—दो-दो पति हैं तुम्हारे पास, ये रूप श्रृंगार है, कमी किस बात की है ?"

राज की आह सी छूटी और बोला—“असली चीज असली होती है—चल, एनी वे— ।” उसने गहरी सांस ली और बोला—“खाना खाया जाये ।”

“क्यों नहीं, चलो ।”

वे डायनिंग टेबिल की तरफ बढ़ गये । सन्नी भी कमरे में से निकलकर आ गया ।

राज की मौजूदगी में सन्नी और डॉली साइलेंट रहते थे । वैसे ही एक दूसरे से रूखा व्यवहार करते थे जैसे पहले वास्तव में किया करते थे ।

सन्नी के सामने पड़ते ही राज उसे खुद को दिखाता हुआ बोला—“यह मेरा सूट कैसा लग रहा है ?”

“बहुत सुंदर ।” वह उसका गाल पकड़ते हुए बोला—

“तुम हो ही सुंदर तो सूट भी लगेगा ना ।”

“आज मैं बहुत खुश हूं सन्नी ।”

“अच्छा—ऐसा क्या ?”

“अब तुम मेरे और डॉली के बीच कभी लड़ाई या चिल्लपौ नहीं सुनोगे ।”

“अरे यह तो चमत्कार हो गया—यह अक्ल तुम्हें कब आई डार्लिंग ?”

“कुछ मैंने भी सोचा कि इस क्लेश से क्या फायदा है—मूड खराब हो जाता है तो बहुत देर तक डिस्टर्ब रहता है और कुछ डॉली ने भी खुद को बदल लिया ।”

“अच्छा—चलो यह तो बहुत ही अच्छा हुआ, मुझे तो बहुत खुशी हुई—तुम्हारी इस टेंशनबाजी से मेरा बड़ा दिमाग खराब रहता था ।”

डॉली ने खाना लगा दिया था ।

वे लोग खाने लगे ।

☐☐☐

कुछ देर हॉल में बैठने के बाद वे लोग सोने चले गये थे ।

राज डॉली के रूम में था ।

दोनों पास-पास लेटे थे । डॉली ने जिक्र छेड़ दिया—“वो पिछले जन्मवाला क्या चक्कर था ?”

राज डॉली की बांह पर सिर रखते हुए बोला—“जानती हो डार्लिंग पिछले जन्म में मैं एक लड़की थी ?”

“अच्छा ?” उसने नाटकीय रूप से आश्चर्य प्रकट किया—“तो एकाएक इसका रहस्योद्घाटन तुम्हारे आगे कैसे हुआ ?”

“और जानती हो पिछले जन्म में मेरा क्या नाम था ?”

“क्या नाम था ?”

“संगीता— ।”

“संगीता...ओ माई गाड ! उस दिन तुम सन्नी को बोल तो रहे थे कि मुझे संगीता नाम बहुत पसंद है लेकिन सन्नी तुम्हें मंजू ही कहकर बुलाता है ।”

“कह रहा था, नहीं कह रहा था—न जाने इस नाम में क्या बात है कि इस नाम पर मेरे दिल के तार झनझना उठते हैं—यह तो मैं कभी नहीं समझती कि इस नाम का कनेक्शन मेरे पिछले जन्म से हो सकता है क्योंकि ऐसा कोई ख्याल ही नहीं था, बस नाम अच्छा लगता था लेकिन जब आदर्श मिला तब पता चलता है कि मेरा नाम पिछले जन्म में संगीता था और मैं एक बहुत खूबसूरत लड़की थी ।”

“अब पूरी बात जल्दी से बता दो, अब बर्दाश्त नहीं हो रहा ।”

राज ने डॉली की टांग पर टांग रखी और बोला—“इस आदर्श ने मुझे कहीं देख लिया था और यह मुझे देखते ही हैरान रह गया था—इसे पिछले जन्म की कुछ बातें याद नहीं आता कि हम पिछले जन्म में कहां पैदा हुए थे और कौन हमारे सेज-सम्बन्धी थे, यह सबकुछ इसे याद नहीं आता—किसी-किसी के साथ ऐसा होता है कि पिछले जन्म की कोई खास घटना याद रह जाती है ।”

“हां-हां होता है ।” डॉली ने ऊपर नीचे गर्दन हिलाकर सत्यापन किया ।

“मगर इसे अपनी प्रेमिका संगीता के बारे में और उसका नाक-नक्शा सटीक याद है—पिछले जन्म में हम दोनों बहुत प्यार करते थे—जान की रिस्क पर एक दूसरे को चाहते थे और फिर वही हुआ जिसका हमें डर था कि हमें मार दिया गया ।”

“अरे— !” डॉली ने दुःख प्रकट किया । चेहरा यूं बना लिया जैसे बहुत दुःख हुआ हो—“यह तो बहुत बुरा हुआ ।”

“और जानती हो जब हम मरे थे तो एक-दूसरे की बाहों में थे—मेरे ऊपर लाठियां पड़ रहीं थीं मगर मैं आदर्श को छोड़ ही नहीं रही थी, दोनों लहुलुहान हो गये थे ।”

“च...च...च...च... ।”

“हमारे ऊपर इतनी लाठियां पड़ीं कि हम दोनों के वहीं प्राण उड़ गये— ।”

“क्या तुम्हें याद है ?”

“न—लेकिन अब हल्का-हल्का याद आ रहा है, दिमाग में एक हल्की-सी, झिलमिल सी तस्वीर बन रही है कि मैं आदर्श से लिपटी हुई हूं और चारों तरफ से लोग हमारे ऊपर लाठियां बरसा रहे हैं— ।”

“हूं—तो आदर्श को सबकुछ याद था ?”

“उसे बस मेरे बारे में याद था—बहुत प्यार करता था मुझे, मेरी खातिर मर गया—मैं भी तो बहुत प्यार करती थी उसे— ।”

“तो अब तुम दोनों कैसे मिले इस जन्म में ?”

“एक दिन इसने मुझे देख लिया, चाार-पांच दिन पहले मैं अपनी फैक्ट्री से निकल रहा था—बाहर एक रेस्टोरेंट है, यह उसके आगे बाइक लिये खड़ा था, मुझे देखा तो चौंक पड़ा—इसने मुझे रोका और मुझसे बोला कि हम दो मिनट बात कर सकते हैं क्या ?”

मैं बोली—क्या बात ?

तो बड़े गौर से मेरा चेहरा देखने लगा । तभी धीरे से मुझसे बोला—तुम मेरी संगीता हो ।

मैं तो चौंक ही पड़ी । संगीता का नाम तो वैसे ही मुझे बहुत पसंद है, तुमने भी सुना है ।”

“हां उस दिन किचन में मैं थी तो तुम सन्नी को बता रहे थे कि मुझे संगीता नाम पसंद है— ।”

“हां और उसने मुझे डायरेक्ट संगीता कहा, मैं तो चौंक पड़ी, उसे गौर से देखने लगी—तभी वह मुझसे बोला...तुम मेरी पत्नी हो— ।”

राज ने गहरी सांस ली और अपना सिर थोड़ा और डॉली की बांह पर चढ़ाया तथा बोला—“एक खूबसूरत लड़का...देखा नहीं, तुमने कितना खूबसूरत था— ।”

“हां— ।”

“कोई खूबसूरत लड़का मुझे अपनी पत्नी कह दे तो मैं तो वैसे ही पिघल जाती हूं—मेरी रगों में खून का दौरान बढ़ जाता है, साथ में वह मुझे संगीता भी कह रहा था—मैं हैरान थी और बोली—आप कौन हैं और मुझसे क्या कह रहे हैं—कौन संगीता ?

वह बोला, हम थोड़ी देर रेस्टोरेन्ट में बैठकर बातें कर सकते हैं ?

मैं तो झट से तैयार हो गयी ।

हम दोनों भीतर गये ।

एक टेबिल पर आमने-सामने बैठे । तभी उसने मेरा हाथ अपने हाथों में ले लिया । मुझे तो झुरझुरी दौड़ गयी और वो बड़े दर्द भरे स्वर में बोला—तुम मेरे पिछले जन्म की पत्नी हो, मेरी संगीता हो ।

मैं हैरान रह गयी । उसे गौर से देखने लगी । उसके हाथों में मेरा हाथ था । उसका स्पर्श मुझे जादू की तरह असर कर रहा था, मेरा शरीर ढीला पड़ गया था ।

मगर तब भी मैं अवाक् स्वर में बोली—“पिछले जन्म की पत्नी, मैं समझी नहीं ।

अब मेरा जेंडर बदल चुका था, ग्रामर अपने आप बदल गया ।

वह बोला—क्या मैं तुम्हें याद नहीं आ रहा ?”

मैं उसका चेहरा गौर से देख रही थी, अब वह मुझे भी जाना-पहचाना लगने लगा था—जैसे कहीं देखा हो ।

डॉली बोल पड़ी—“उसे देजा वू कहते हैं ।”

“देजा वू ?”

“मनोविज्ञान की एक अवस्था है, जब हम किसी अपरिचित व्यक्ति या स्थान को पहली बार देखते हैं तो हमारा मानस मात्र दो क्षण में उस व्यक्ति या स्थान को स्वीकार कर लेता है, मानस पटल पर वो चीज अंकित हो जाती है । चूंकि व्यक्ति में रसायनिक अभि-क्रियाएं प्रतिक्षण होती हैं इसलिए हम जब उस अवस्था से उभरकर नयी स्तिथि का संज्ञान लेते हैं तो वो नया व्यक्ति या नया स्थान हमें बरसों बरस का परिचित लगने लगता है—व्यक्ति इस भ्रम का शिकार हो जाता है कि मैं उसे कैसे जानता हूं जबकि दो क्षण पहले की अवस्था को भूल चुका होता है जब उस व्यक्ति या स्थान से नया-नया परिचय हुआ था । मात्र दो क्षण में ही रसायनिक अभिक्रियाओं के परिवर्तन के कारण कोई भी देखा हुआ अपिरिचित चिन्ह अंतस की इतनी गहराई में पहुंच जाता है कि व्यक्ति भ्रमित हो जाता है कि यह तो मेरी बरसों पुरानी पहचान से बाबस्ता है ।”

राज चौंकते हुए उसे देखता हुआ बोला—“यह क्या परिभाषा सुना दी तुमने—विदेशी विचारक तो कुछ और कहते हैं—मैने भी देजा वू पर आलेख और रिपोर्टिग देखी है ।”

“विदेशी विचारक ?” डॉली ने बुरा सा मुंह बनाया—“वे सब मूर्ख हैं—विश्व गुरुता भारत से शुरू होती है—टेक्नोलोजी में कोई हमसे आगे हो सकता है लेकिन मानस की—गूढ़ जानकारी जो हमें है वो किसी को नहीं ।”

“यह परिभाषा तुमने कहां पढ़ी ?”

“इकराम फरीदी की किताब में ।”

“कौन सी किताब में ?”

“सम-प्रीत में ।”

राज थोड़ी देर सोचता रह गया, फिर बोला—उसे छोड़ो । वह याद करते हुए बोला कि उसने बात का सिरा कहा छोड़ा था, जैसे ही याद आया वह तुरन्त बोला—उसे देखते हुए मुझे लगातार यह लग रहा था कि उसका-मेरा पुराना सम्बन्ध है- ।”

थोड़े गैप के बाद वह पुनः बोला—“तुम चाहे कुछ भी कहो या इकराम फरीदी कुछ भी कहे, उसका कोई न कोई कनेक्शन पूर्व जन्म से तो है ।”

“आगे क्या हुआ ?”

“मैंने उससे पुछा आप ऐसा क्यों कह रहे हैं कि मैं आपकी संगीता हूं और पूर्व जन्म में आपकी पत्नी थी ?

तो वह मेरा हाथ थपथपाते हुए बोला, इन हाथों को मैन पहचान लिया है संगीता, इन हाथों में हमेशा भरी-भरी चूड़ियां होती थीं, तुम्हें बनने संवरते का बहुत शौक था ।”

राज एक सांस लेकर आगे बोला—“अब तो वह पुष्टि करता जा रहा था कि वह सच बोल रहा है, बनने संवरने का शौक तो मुझे अब भी बहुत है और हाथों में भरी हुई चुड़ियां भी बहुत पसंद हैं—अब मेरे पास कोई संदेह नहीं रह गया था ।”

उसने फिर छोटा सा अंतराल दिया ।

और उसके बाद बोला—“फिर वह आगे कहने लगा, मैंने तुम्हें कहां नहीं ढूढा संगीता । कभी-कभी मेरे दिमाग में एक बिजली सी कौंधती है और एक फिल्म सी चालू हो जाती है—मैं पिछले जन्म में तुम्हें देखने लगता हूं । वह घटना मुझे याद आती है, जब हम घर से भाग गये थे और हमारे गांव वालों ने हमें घेर लिया था ।

लाठी डंडे लेकर तुम मुझसे लिपटी थीं और गांव वाले जालिम बनकर हमारे ऊपर लाठियां बरसा रहे थे और हम दोनों ऑन द स्पाट वहीं डैथ कर गये थे ।”

“ओ माय गाड !” डॉली के मुंह से निकला ।

“उसकी बातें सुनकर मैं भी ऐसे ही विस्मय से भरा रह गया था—वह बड़े उदास लहजे में यह बातें बता रहा था—दस वर्ष के बाद ही मेरे दिमाग में कौंध होने लगी और पूर्व जन्म की फिल्म चलने लगी—मैं तुम्हें पागलों की तरह ढूंढने लगा मगर तुम मुझे कहीं नहीं मिली—कल मैने तुम्हें पहली बार देखा । तुम्हें देखते ही फिर दिमाग मे कौंध हुई और मुझे संगीता का चेहरा नजर आया—तुम संगीता के सेम टू सेम ही तो थीं—मैं हैरान रह गया—ओ मेरे भगवान यह क्या ? मेरी संगीता की आत्मा एक पुरुष के शरीर में डाल दी । इतना कहकर वह चुप हुआ ।

राज ने भी छोटा सा विराम लिया ।

डॉली ऐसे सुन रही थी जैसे बड़ी हैरान हो ।

डॉली ने राज की तरफ करवट ले ली और बड़ी जिज्ञासु दृष्टि से राज के आगे बोलने का इंतजार करने लगी ।

राज का मुंह लगभग डॉली के मुंह से बिलकुल सटा हुआ था ।

राज बोला—“मैं उसे देखती रह गयी थी, कितनी प्यास थी उसके आंखों में मेरे लिए—जब वह देखता था सीधे मेरे दिल में प्रविष्ट हो जाता था, अब मुझे यकीन हो चुका था कि वह जो कह रहा है, वो सौ प्रतिशत सच है वरना कोई किसी को अपनी पूर्व जन्म की पत्नी क्यों कहने लगेगा और वो भी एक लड़के को ?”

“सबसे बड़ी बात यह है कि उसने तुम्हारा नाम संगीता पुकारा ।”

“हां देखो—यही सबसे बड़ा सुबूत है, किसी को क्या पता कि मुझे संगीता नाम बहुत पसंद है ।”

“बिलकुल, अब तो मुझे भी लग रहा है ।”

राज सीधा लेटते हुए बोला—“मैं बहुत खुश हूं डॉली, मुझे मेरा पति मिल गया ।”

“तुम्हारे लिए तो वह लड़का मुझे भी पसंद है ।”

“है न अच्छा ?”

“बहुत शरीफ, चाकलेटी । तो अब मेरी छमिया दो-दो पतियों की पत्नी रहेगी ।”

“कोई बुराई नहीं है लेकिन मेरा दिल तो आदर्श के ही पास है— ।”

“उसका नाम आदर्श है ?”

“इस जन्म में उसका क्या नाम है, ये मैंने नहीं पूछा—जब उसने मुझे संगीता पुकारा और मुझे अपना किस्सा सुनाया तो मैंने ही फिर बाद में उससे उसका पिछले जन्म का नाम पुछा—तब उसने बताया कि मेरा नाम आदर्श था ।”

“तो क्या तुम्हें याद पड़ता है कि तुम्हारा आदर्श नाम से कोई लगाव हो ?”

“हां यार—लगता है ऐसा जैसा मेरा इस नाम से कोई दिली तअल्लुक हो ।”

“वैरी गुड, तुम्हारी तो जोड़ी खूब बनी, अब इसका क्या होगा ?”

“सन्नी का ?”

“हां ।”

“वही तो मैं आज पूरे दिन सोचती रही—अब मैं आदर्श के बिना नहीं जी सकता—शरीर हमारे जस्ट एक जैसे हों मगर आत्मा तो फीमेल की है ।”
 
“तो इसे बाहर निकाल दोगे ?”

“वही सोच रहा हूं कि क्या करूं ?”

“अब तुम्हारी मर्जी है, मैं इसमें क्या बता सकती हूं—दोनों में से जो तुम्हें ज्यादा पसंद हो, उसे यहां रखो, दूसरे को बाहर करो ।”

“ज्यादा तो मुझे आदर्श पसंद है ।”

“अब यह फैसला तुम खुद कर लो ।”

“पहले तो मैं आदर्श से बात करूं कि वह यहां शिफ्ट होने की हामी भर रहा है या नहीं, उसके बाद फिर कोई डिसीजन लेता हूं— ।”

“जो भी डिसीजन लो, मैं तो तुम्हारे साथ हूं ।”

राज बोला—“मुझे तुम्हारी मदद की बहुत जरुरत है डॉली—तुम जब मुझसे रूठी रहती हो तो मेरे दिमाग में टेंशन बैठी रहती है,दिमाग खराब ही रहता है, सुकून नहीं मिलता—अब देखो, तुमने व्यवहार बदला है तो कितना अच्छा लग रहा है, दिल में एक अलग सी खुशी है— ।”

“जब से यह आया है, तभी से मेरा स्वभाव चिड़चिड़ा हो गया था, खैर—अब मैं प्रामिस करती हूं अब मैं हमेशा ऐसे ही व्यवहार करूंगी ।”

प्यार भरी नजरों से राज डॉली को देखते हुए उसके ऊपर झुका ।

☐☐☐

ऋषभ और राज एक रेस्टोरेंट की एक टेबिल पर आमने-सामने बैठे थे ।

उनकी बातचीत का अंदाज और आपसी व्यवहार देखकर कोई भी उनके बीच किसी रिश्ते की पुष्टि कर सकता था ।

वो एक-दूसरे को निहार रहे थे ।

जैसे कोई प्रेमी युगल ।

इसी तरह आंखों में झांकता हुआ राज बोला—“अब तो सनम जुदाई की बेड़ियां तोड़ दो— ।”

“तोड़ तो दीं उस दिन घर जाकर ।”

“मुझे हमेशा के लिए अपना लो, अपनी संगीता को ।”

“भगवान ने इस बार मेरे साथ अच्छा मजाक किया है—मुझे मेरी संगीता मिली भी तो ऐसे रूप में कि मैं कहीं का नहीं रहा ।”

राज ने ऋषभ का हाथ पकड़ लिया—“ऐसा न कहो, हमारा रिश्ता शरीर का नहीं है आत्मा का है, मैं तुम्हारी संगीता हूं, शरीर चाहे कैसा हो, तुम्हारी सेवा करना मेरा परम धर्म है— ।”

“मैं भगवान के इस फैसले के आगे बहुत हैरान हूं ।”

“भगवान बहुत बुरा है, उसने मेरे साथ बहुत छल किया है, मैं उसे कभी माफ नहीं करूंगी, एक औरत से कभी उसका शरीर नहीं लेना चाहिए, यह सबसे बड़ा अपराध है । इस ब्रह्माण्ड का सबसे बड़ा अपराधी भगवान है, एक दिन मैं उसे झंझोड़कर ये सारे सवाल करूंगी ।”

ऋषभ चुप रहकर उसका रोष देखता रहा ।

राज उसका हाथ अपने हाथों में लिये बोला—“तुम मुझे अपनाओगे न—?”

“मैं तुम्हारे बगैर नहीं जी सकता संगीता लेकिन...।”

“लेकिन?”

“तुम बीवी वाले आदमी हो–अब मैं क्या करूं, मेरी समझमें नहीं आ रहा।”

“मेरी बीवी बहुत अच्छी है, तुम उसे अभी नहीं जानते।”

“क्या वो हमारे इस रिश्ते को एक्सेप्ट कर लेगी?”

“नो टेंशन, उस सबकी तुम्हें टेंशन लेने की जरूरत नहीं है ।”

“ऐसा कैसे हो सकता है–कोई भी पत्नी यह कैसे बर्दाश्तकर सकती है किउसके पति का भी एक पति हो।”

“तुम उसकी टेंशन छोड़ो न–क्या तुम उसे जानते हो?”

“नहीं–।”

“फिर–मैं जानता हूँ न, वह मेरी पत्नी है, वो मेरी खुशी मेंखुश है, तुमने देखा नउस दिन, मुझे सजा-संवारकर कौन लाया–?”

“हां, ये तो तुम ठीक कह रही हो संगीता, मैं तो यार हैरानरह गया–मुझे तो बड़ी शर्म लग रही थी कि कहीं वो मुझे कुछबोलने न लगे मगर वह तो काफी खुशनजर आ रही थी।”

“मैंने बताया न कि वह मेरी खुशी में खुश रहती है, उसकीटेंशन तुम छोड़ो–यह बताओ तुम मेरे घर पर शिफ्ट होजाओगे–?”

“तुम्हारे घर पर?”ऋषभ हँसा और बोला–“यह उल्टीबयार कब से बहने लगी, पत्नी ब्याह कर जाती है, पति भीब्याहकर आने लगा क्या?”

“इसका दोष भगवान को जाता है।”

“आपकी पत्नी यह स्वीकार कर लेगी कि हम दोनों वहांअपनी युगल जिंदगी गुजारें?”

“क्यों नहीं, यह गारंटी मैं दे रहा हूँ तुम्हें, तुम उस सबकीचिंता मत करो। अंकी को मेरे ऊपर छोड़ दो।”

“अंकी?”

“मेरी पत्नी।”

ऋषभ ने एक ठण्डी सांस ली थी और बोला–“ओके–तुममुझे थोड़ा टाइम दो।”

“अब टाइम नहीं रहा, हम किसी मोड़ पर मिले लेकिन हममिले तो सही, यही क्या कम है।”

अभी ऋषभ कुछ कहने ही जा रहा था कि उसका फोन बजउठा।

उसने जेब से मोबाइल निकाला।

और अगले क्षणों में राज के कानों में कुछ ऐसे धमाकेहुए कि उसका दिमाग सुन्न पड़ गया।

☐☐☐

ऋषभ ने कॉल रिसीव की–“हां सन्नी सर।”

सन्नी का नाम सुनकर राज के कान खड़े हुए।

उधर से कुछ कहा गया तो प्रत्युत्तर में ऋषभ बोला–“हाँ-हाँ वो आप बता तो रहेथे, क्या नाम बताया उसकाडॉली–हाँ डॉली–हाँ थोड़ी घमण्डीहोगी...क्या बहुत पसंदआ गयी...हर हाल में पाना है...तो...मर्डर करना है,किसका...उसका पति...क्या नाम बताया था आपने...हाँ राज...फिर...हाँ मैं तो सहारनपुर का ही रहने वाला हूँ...हाँ शूटर मिल जाएगा...अरे साहब किससे कहेंगे,हमें क्या अपनीनौकरी गंवानी है...आपको नाराज करके क्या मैं फिरनौकरीकर सकता हूँ, इम्पॉसिबल...तो मैं देखता हूँ...हाँ किसी कोपता नहीं चलेगा...काम हो जाएगा सर...अब आपके लिएइतना भी नहीं कर सकते क्या हम...ठीक है सर, मिलकर बातकरते हैं, ओके सर...ओके–।”

राज गोल-गोल आँखों से उसे देख रहा था।

उसके फोन रखे जाते ही उसने जल्दी से पूछ लिया–“किसकाफोन था?”

“वो ऑफिस से था।”

“कौन था?”

“मेरा साहब था। तो संगीता डार्लिंग मैं कह...।”

“क्या कह रहा था तुमसे?”

“वो ऑफिशियल बात थी।”

“मर्डर की बात हो रही थी?”

“मर्डर की–वो हाँ...तुम उसे छोड़ो–यह हमारी प्राइवेटबात थी, तुम्हारे सामनेमैंने बात कर ली, कोई दूसरा होता तोमैं बात करता भी नहीं।”

“पूरी बात बताओ मुझे कि क्या बात है?”

“अरे यार यह प्राइवेट बात है, मैं किसी को नहीं बतासकता –।”

“मैं तुम्हारी कौन हूँ –?”

“पार्टनर।”

“तो अपनी पत्नी से कोई छिपाता होगा?”

“ओफ्फो यार–।”

“यह राज कौन है और डॉली कौन है?”

“जहां पर मेरा साहब सन्नी रहता है...।” कहते-कहतेऋषभ ने अपने मुंह पर हाथ लगा लिया मानों रौ में बहकरकहता चला जा रहा हो।

“जहां वो रहता है, तो क्या वहां किसी का मर्डर करना चाहरहा है?”

“तुम क्यों किसी की कहानी सुनना चाह रहे हो? इतनीबड़ी दुनिया है, अजीब-अजीब घटनाएं घट रही हैं, हमें सबसेक्या मतलब है?”

“मुझे मतलब है, मुझे बताओ।”

“किसी से कहोगी तो नहीं?”

“सच्ची, तुम्हारे सिर की कसम।”

ऋषभ ने गहरी सांस ली जैसे अब मजबूर होकर वह कहनेको तैयार हो रहा हो।

थोड़ा ठहरकर वह बोला–“मेरा एक साहब है सन्नी...।”

“तुम क्या यस बैंक में नौकरी करते हो?”

“तुम्हें कैसे पता, मैंने तो अभी बताया ही नहीं है।”

राज को अपनी भारी भूल का अहसास हुआ। उसनेजल्दबाजी में प्रश्न कर दिया था। वह बात को संभालते हुएबोला–“अभी तुम बीच में बता गए थे,तुमने ध्यान नहींदिया।”

ऋषभ चुप रहकर सोचने लगा कि मैंने कब बताया था।

राज तुरंत बोला–“अरे छोड़ो, तुम्हारा साहब है सन्नी...फिरउसके आगे–?”

“तो सन्नी जहां रहता है, वह उसके बचपन का दोस्त हैऔर वो गे है–उस गे कीपत्नी डॉली बहुत खूबसूरत है,साहब का दिल डॉली पर आया हुआ है और वो उसे पानाचाहता है लेकिन डॉली उसे घास ही नहीं डालती–यह साहबहमारा डॉली के एक तरफा प्रेम में इतना पागल हुआ पड़ा हैकि अब यह उस गे का मर्डर करने का प्लान बना रहा है।”

“क्या?”राज का मुंह भक से खुला रह गया।

“हमारा साहब समझता है कि जब गे मर चुका होगा तोडॉली कहां जाएगी,आखिरकार उसी की झोली में आगिरेगी–प्लानिंग तो इसकी बहत तगड़ी है,तुम सुनोगे तो होशउड़ जाएंगे–।”

“क्या प्लानिंग है?”

“मर्डर इस तरह से करना चाह रहा है कि गे का मर्डर होनेके बाद डॉली को इस हत्या में लपेटने के सबूत इकट्ठे कर लेताकि बाद में उसे ब्लैकमेल कर सके कि या तो जेल जाओ, यामेरी रखैल बनो।”

राज के छक्के छूट गये।

चेहरे पर हल्दी पुत गयी। मौत का कत्थक चेहरे पर नजरआने लगा।

“तुम क्यों हलकान हुई जा रही हो?”

“कुछ नहीं, ऐसे ही।”

“तभी तो कहते हैं कि किसी को अपने घर पर नहीं रखनाचाहिए, सबसे पहलेवह घर की इज्जत पर हाथ डालता है।”

राज की पेशानी चुहचुहा आई थी।

थोड़ा गैप देकर वह बोला–“क्या तुम मुझे उसकी प्लानिंगसे अपडेट करते रहोगे?”

“अब जब पूरी कहानी बता ही दी तो अपडेट करने में क्याजा रहा है मगर तुम्हें किसी की कहानी से क्या मतलब है। येदुनिया है, किस-किसका गम अपने मन में संजोओगी?”

“मुझे इसकी अपडेटिंग चाहिए।”

“मिलती रहेगी...और बोलो।”

“और कोई शूटर करके मत देना।”

“ओके। तुम्हें उस गे से बड़ी हमदर्दी हो गयी?”

“अरे यार किसी की जान क्यों जानी चाहिए –किसी काहंसता-खेलता परिवार बर्बाद होगा और तुम इसमें साथ दे रहेहो, तुम्हें शर्म नहीं आती?”

“बॉस का हुक्म है, क्या करूं–?”

“बॉस का हुक्म है–।” वह नागवारी के साथ बोला–“बॉसअगर तुमसे कहेगा कि किसी को मार डालो तो क्या तुम मारडालोगे?”

“नहीं।” वह उसकी आंखों में झांकते हुए बोला।

“तुम गलत कर रहे हो, मुझे तुमसे ऐसी उम्मीद नहींथी–अब मुझे तुमसे नफरतहोने लगी।”

ऋषभ उसका चेहरा गौर से देखते हुए बोला–“शायद तुमठीक कह रही हो, मुझे शर्मिन्दगी का भाव पैदा हो रहा है,किसी का हंसता-खेलता परिवार बर्बाद नहीं होना चाहिए, जरूरमैं गलत था।”

“तुम इस काम से पीछे हट जाओ।”

“अपनी पत्नी का हुक्म सिर आंखों पर।” ऋषभ मुस्कुराकरबोला–“तभी तो कहते हैं कि पति को संभालने वाली पत्नी हीहोती है, आज तुमने मुझे सम्भाल लिया है–यार क्या बताऊंयह काम दिल से खुद मुझे भी पसंद नहीं था मगर एक बातबताओ, फिर सन्नी उस सुंदरी को कैसे पाये–”

“डॉली को?”

“हाँ –वह उसके दिल में चुभ गयी है यार, उसके बगैर वहऐसे छटपटाता है जैसे पानी बिन मछली, मुझे सन्नी सर कीबेकली नहीं देखी जाती।”

“यह क्या बात हुई–अगर आपको किसी की पत्नी पसंदआ जाये तो क्या आप उसको हथियाने के लिए कुछ भी करनेको तैयार हो जाएंगे–क्यों हथियाएंगे आप किसी की पत्नीको? और क्या डॉली भी तुम्हारे सन्नी सर को पसंद करती है ?”

“वो तो घास भी नहीं डालती।”

“फिर–किसी की पत्नी को चाहना ही अपराध है–यहपागलपंती है, अपने उससिरफिरे साहब को थामो।”

“तुमने मेरी आंखें खोल दी संगीता।” ऋषभ पुनः उसकाहाथ अपने हाथों में लेता हुआ बोला–“मैं वाकई गलत करनेजा रहा था, उसकी सहानुभूति ने मुझे अंधा कर दिया था–अबक्या करना चाहिए मुझे?”

“उससे साफ मना कर दो कि मैं तुम्हारे साथ नहीं हूँ –तुम्हेंनौकरी यस बैंक ने दीहै, कोई उसने तो दी नहीं है जो तुमइतना उसके प्रेशर में हो–कमाल है, मुझे तुमपर हैरत हो रहीहै कि तुम किसी के कहने पर कत्ल भी करवा सकते हो–कितनीगिरी हुई सोच है तुम्हारी?”

“सॉरी यार, मैं वाकई गलत था।”

“अब एक काम करो–सबसे पहले तो सन्नी की मददकरने से इंकार करो और दूसरी बात–उसे धमकी भी दो किवह किसी की पत्नी का ख्याल दिल से निकाल दे, अगर राजकी...क्या नाम बताया उसका–?”

“राज–।”

“हाँ राज की अगर हत्या हो जाती है तो तुम उससे कहोकि पुलिस को सच्चाई बता दूंगा।”

ऋषभ ने पसोपेश में पड़ने का शानदार अभिनय किया।बोला–“यार मैं तो घनचक्कर बन गया, क्या करूं–?”

“अरे तुम क्यों घनचक्कर बन गये, कमाल है, तुम्हें तो उसेसमझाना चाहिए,दुनिया में इतनी सुंदर स्त्रियां हैं तो क्या तुमकिसी को भी पाने के लिए उसके पति के कत्ल पर आमादा होजाओगे?”

“हां–है तो यह सचमुच गलत।”

“फिर–सबसे पहले उसकी मदद को इंकार करो और साथमें उसे धमकी भी दो कि किसी डॉली का ख्याल दिल सेनिकाल दे, अगर ऐसे में राज का मर्डर हो जाता है तो तुमकहो कि मैं पुलिस को तुम्हारी करतूत बता दूंगा।”

“हूँ –।”

“और शिफ्टिंग के बारे में बताओ।”

“क्या?”

राज ने उसकी आंखों में गहराई तक झांका और बोला–“तुम जल्दी मेरे घर परशिफ्ट हो जाओ।”

“...।” ऋषभ चुप्पी साधे रहा।

“हम जन्मों के बाद मिले हैं तो अब दूर-दूर नहीं रहसकते–।”

“हूँ –।”

“कब शिफ्ट होओगे?”

“बताता हूँ...।”

राज बड़ी प्यासी दृष्टि से ऋषभ को देखने लगा।

लेकिन अगले क्षण ही जब उसके जेहन में सन्नी का ख्यालआया तो दिल पर फिर से सकता तारी हो गया, वह तो सोचभी नहीं सकता था कि सन्नी उसकी पत्नी के लालच में इस कदर फंस जाएगा कि उसकी हत्या के मंसूबे बनाने लगेगा।

राज उसकी आंखों में गहराई तक झांकते हुए बोला–“तुमनेपत्नी को देखा है सजन जी?”

“हाँ-हाँहाँ, एक दिन देखा तो था।”

“तुम भी उसके लालच में तो नहीं फंस जाओगे?”

ऋषभ शुष्क स्वर में बोला–“मुझे मेरी संगीता मिल गयी,अब मुझे विश्व सुंदरी भी मिले तो बेकार है।”

राज ने उसका हाथ कसकर पकड़ लिया।

“तुम नहीं जानतीं।” ऋषभ पुनः बोला–“मैं तुम्हें कैसेपागलों की तरह ढूँढ रहा था, पिछले जन्म में तो हम नहीं मिलपाये लेकिन इस जन्म में मैं तुम्हें नहीं खोनाचाहता–मुझे तुमयानि मेरी संगीता चाहिए, मुझे किसी लड़की में कोई दिलचस्पीनहीं है।”

राज के अंदर गर्वोक्ति का भाव पैदा हुआ।

राज बोला–“जल्दी प्लान बनाओ, मेरे घर शिफ्ट होनेका–अब यह जुदाईसही नहीं जाती।”

“बनाता हूँ ।”

☐☐☐

छः बजते ही सन्नी घर आ जाता था।

और इस टाइम पर डॉली बड़ी तड़क-भड़क वाली ड्रेस मेंरहती थी, कोई देखे तो बस प्रभावित ही होता चला जाये।

अब भी वह एक गाऊन पहने हए थी जिसका यूँ तो बड़ा गला था और एक बटन भी लगा था जिसे उसने खोल रखाथा। गाऊन का रेशमी कपड़ा उसके हिप्स को छुपाता नहीं थाबल्कि उघाड़ता था।

वह कई प्रकार के परफ्यूम यूज करने लगी थी। जिनमेंमदहोश कर देने का माद्दा था।

चेहरे को अच्छे से सजा रखा था।

घर की घण्टी बजी। वह फुर्ती से दरवाजा खोलने बढ़ी।बटन वाले स्थान को खोलकर फैला दिया।

दरवाजा खोला।

सामने सन्नी था। उसे देखकर अनायास मुस्कुराया। प्रत्युत्तरमें डॉली बड़ी कातिल मुस्कान में मुस्कुराई।

वह अंदर आया। डॉली ने दरवाजा बंद किया। सन्नी नेउसके गले में हाथ डाल लिया–“क्या हाल है हमारी जानेमनके?”

“तड़प रहे हैं।”

“किसकी याद में?”

“सनम हरजाई की याद में।”

“अच्छा, हरजाई किसे बोला?”

“तुम्हें–तुम्हारी कुछ वश की नहीं है, बस ऐसे ही गप्पेहांकते रहोगे कि मैं यह करूंगा, वो करूंगा, तुम कुछ नहीं करोगे, मैं यूँ ही तिल-तिल मरती रहूंगी।”

“मेरी एक बात समझ में नहीं आती।”

“तुम्हारी कोई बात समझ में नहीं आएगी।”

“पूछो तो क्या?”

“क्या पूछूँ –?”वह मुंह फुलाये हुए फ्रिज की तरफ बढ़ीऔर पानी की बोतल तथा गिलास उठा लायी।

सन्नी समझाने वाले स्वर में बोला–“देखो हत्या करना बड़ादुरुह काम है–बड़ी तगड़ी प्लानिंग बनानी पड़ेगी जो कि बननहीं पा रही–।”

“बन नहीं रही? तुम तो कह रहे थे कि मैं ऐसा करूंगा,वैसा करूंगा, बस फूंकसरक गयी।”

“करूंगा मेरी जान, तुम्हारी खातिर करना पड़ेगा।”

“तो कब, जब हम बूढ़े हो जाएंगे।”

“इसी जवानी में मेरी जान।” कहते हुए उसने डॉली कोअपने ऊपर गिरा लिया।

और उससे छेड़छाड़ करने लगा।

“तुम छोड़ो बस मुझे–तुम भी बस हाथों में चूड़ियां ही पहनलो, वही अच्छा है।”

“क्या करूं यार, कुछ समझ नहीं आ रहा।” वह असमंजसमें पड़ता हुआ बोला–“अगर अभी राज को कुछ हो जाये तो पुलिस सीधे हम पर शक करेगी औरउसे कलई खोलते देर नहींलगेगी।”

“तुम कह रहे थे कि मैं फुलप्रूफ योजना बना रहा हूँ ।”

“बन भी तो रही हो साली।”

“मैं सुझा दूं ?”

“तुम?”

“और क्या–तुम्हें तो मुझे पाने की बेचैनी है नहीं मगर मुझेतुमने अपनी बॉडी दिखा-दिखाकर पागल दीवाना बना दिया है, मुझे ही प्लानिंग बनानी पड़ रही है।”

“क्या प्लानिंग है?”उसने उत्साह के साथ पूछा।

“उससे पहले एक चीज और बना दूं?”

“क्या?”

“चाय।” कहकर वह हंसी।

“यह तो सोने पर सुहागा हो जाएगा–चाय पीते हुए प्लानिंगसुनते हुए तो बड़ा मजा आएगा।”

“तुम्हारी मजे की ठेकेदारी भी मेरे ही ऊपर है, छोड़ो चायबनाकर लाती हूँ ।”

सन्नी ने उसके गाल पर एक चुंबन जड़कर उसे फ्री करदिया।

वह उठकर किचन की तरफ बढ़ी। उसे पीछे से जातादेखकर सन्नी का दिल उछलकर हलक में आने लगा था।

थोड़ी ही देर बाद वह चाय बना लाई और इस बीच वहअपनी कोई प्लानिंग बहुत धीमी आवाज में सन्नी को सुनानेलगी।

सन्नी बड़े उत्साह के साथ सुन रहा था।

☐☐☐
 
रात आठ बजे तक हस्बे मामूल राज घर आ जाता था।

आज भी आ गया।

आज उसका दिमाग भिन्नोट था।

चेहरा बुझा सा जा रहा था, कभी गुस्से का तूफान चेहरे परसजग हो उठता था।

वह घर में घुसा तो सन्नी को सामने सोफे पर बैठे पाया।

उसकी आंखों में कहर नाच उठा।

चिंगारी छोड़ती दृष्टि से उसने सन्नी को देखा।

इस समय तक डॉली अपने कपड़े भड़काऊ के स्थान परसाधारण कर लिया करती थी और मुंह धोकर चेहरा भीसाधारण कर लेती थी।

डॉली ने राज के हाथ से बैग ले लिया था औरमुस्कराकर उसका स्वागत किया।

प्रत्युत्तर में उसके चेहरे पर कोई खुशी का भाव नहीं उपजा।

चेहरे का रंग उड़ा हुआ था।

वह जब सन्नी के सामने से गुजरा तो सन्नी ने मुस्कराकरकहा–“हाय मंजू मेरीजान, कैसी हो ?”

राज ने कोई जवाब नहीं दिया, बेगाना सा भाव लेकर वहडॉली वाले कक्षकी तरफ बढ़ा।

वरना इस सम्बोधन पर तो वह सदके जाने लगता था।सन्नी द्वारा मंजू कहे जाते की उसकी गोदी में बैठ जाता थाऔर पूर्णरूपेण एक स्त्री के चोले में फिट होजाता था, यहीउसका परम आनंद था।

लेकिन आज बड़ा बेगाना भाव लिए वह डॉली वाले कक्षमें घुस गया।

पीछे-पीछे डॉली भी घुसी।

किवाड़ बंद किया और राज को संशय की दृष्टि से देखतेहुए बोली–“क्या हुआ मेरी जान, क्या तबियत सही नहीं है,बड़े उदास से हो?”

कहते हुए उसने गाल पर हाथ रखकर तबियत चेक की।

वह भावपूर्ण स्वर में उसका हाथ थामते हुए बोला–“मैंनेतुम्हें बहुत दुःख दियाहै ना?”

“कैसी बातें कर रहे हो, मैं तो बहुत खुश हूँ तुम्हारेसाथ–अपनी छम्मक छल्लो के साथ।” डॉली ने उसके गिर्दबांहें डाल दीं।

राज ओतप्रोत स्वर में बोला–“डॉली मेरे साथ धोखाहुआ है–।”

“अच्छा।” वह जैसे चाकित स्वर में बोली–“किसने धोखाकिया तुम्हारे साथ ?”

“इस कमीने ने?”

डॉली ने दरवाजे की तरफ दृष्टि उठाकर कहा–“सन्नीने?”

“यह इतना कमीना निकलेगा मैं सपने में भी नहीं सोचसकता था?”

“क्या हुआ–हुआ क्या?”डॉली की आंखें गोल हो चुकी थीं।

“यह तुम्हें परेशान करता है?”

“बताओ, छिपाओ मत–मैं तुम्हारा दोषी हूँ, तुमने मेरीखातिर बहुत टार्चर झेला है, तुमने मुझे आज तक इसलिए कुछ नहीं बताया कि इसके खिलाफ मैं तुम्हारे मुंह से कोई शब्द नहीं सुन सकता था और यह कमीना मेरे इस विश्वास कानाजायजफायदा उठाता चला गया।”

डॉली ने गहरी सांस छोड़ी–

और बोली–“भगवान का शुक्र है कि तुम्हारी आंखें तो खुली–यह दरअसल भेड़िया है, तुम इस पर आंखें बंद किये हुएथे और यह मुझे हलकान किये रहता था, तुम्हारी खातिर मैं घरमें हूँ वरना इसकी हरकतों से तंग आकर कभी की घर छोड़करचली गयी होती।”

“क्या करता था तुम्हारे साथ?”

“चड्डी पहनकर मेरे सामने आ जाता था, अब मैं घर सेनिकलकर कहां भागूं –तुमसे भी शिकायत नहीं कर सकती, तुमसुनने को राजी नहीं।”

राज के चेहरे पर भूचाल नजर आने लगा।

डॉली आगे बोली–“कभी कंधे पर हाथ रख देता थाऔर ऐसी बातें करता थाकि मेरे कान फटे जाते थे–कहता थाकि तुम्हारा छक्का पति ऐसे ही हम पर फिदा नहीं है, एक बारहमसे मिलकर देखो, जिंदगी भर याद रखोगी।”

राज के नथुने फूलने-पिचकने लगे।

“मैं बहुत परेशान हूँ राज, इसे घर से निकाल दो–मैंइसकी सूरत भी देखना पसंद नहीं करती, इसकी सूरत से चिढ़है मुझे।”

“यह साला इतना हरामी निकलेगा, मैं सोच भी नहीं सकताथा।” वह शब्दों को चबा रहा था।

राज सोच रहा था कि डॉली को हत्या वाली बात बताईजाये या नहीं।सोचते हुए उसने गर्दन झटक दी कि नहीं बतानाहै वरना वह पूछने लगेगी कि यह सब तुम्हें कैसे पता चला चलातो फिर आदर्श वाली बात बतानी पड़ जाएगी, पता नहींडॉली कैसा रियेक्ट करे। कुछ असमंजस में पड़कर राज नेयही निर्णय लिया कि अभी नहीं बताना है।

“क्या सोचने लगे?”डॉली उसकी आंखों में झांकते हुएबोली।

“सोच रहा हूँ, इसका क्या करूं?”

“साले को धक्के मारकर बाहर निकालो, किस हैसियत सेयहां रह रहा है?”

“हूँ –यह खतरनाक भी है।”

“कैसा खतरनाक?”

“चलो रात में बात करेंगे, कोई बात मैं तुम्हें बताऊंगी–एकखास बात है।”

चुप रहकर डॉली ने उसकी बात को समझा।

“चलो बाहर चलो।”

वे दोनों कक्ष से बाहर आये।

☐☐☐

डिनर करने के बाद वे तीनों लिविंग हाल में बैठे थे।

राज बात को प्रारम्भ करते हुए बोला–“सन्नी...मेरेऊपर मम्मी का दबाव बढ़ता जा रहा है।”

“कौन मम्मी?”

“सासु मम्मी–।”

“अच्छा–क्या–?”

“वह कह रही है कि अपने घर में रखे गेस्ट को बाहरनिकालो–।”

“हूँ –तो–?”

“अब दबाव ज्यादा बढ़ गया है, मैंने बहुत समझाया लेकिनवह मान नहीं रही, क्या किया जाए, समझ नहीं आ रहा।”

सन्नी ने मुस्कराकर डॉली की तरफ देखा। डॉली बहुतधीमे से मुस्कराकरशून्य को देखने लगी।

सन्नी की इस मुस्कराहट का रहस्य यह था कि डॉली ने कुछ घण्टे पहले हीसन्नी को एक योजना सुझाई थी और अबउस योजना पर काम शुरू भी हो चुका था। डॉली ने बतायाकि आज शाम को ही राज तुम्हें बाहर निकालने की कार्यवाहीकरेगा जो कि सन्नी व डॉली की योजना का अहम चरणथा।

सन्नी राज से सम्बोधित हुआ–“फिर क्या किया जायेबताओ, मम्मी तोमुझसे भी कह चुकी हैं कि तुम्हें इस घर मेंनहीं रहना चाहिए–जब भी आती है लताड़ लगती है लेकिन मैंतुम्हारी वजह से यहां रह रहा हूँ ।”

“नहीं, अब यह ज्यादा नहीं चल सकता–मम्मी मान नहीं रही है–।”

“तो क्या करना चाहिए?”

“मैं तुम्हारे लिए कोई कमरा देख देता हूँ,तुम वहां शिफ्टहो जाना।”

सन्नी ने गहरी सांस छोड़ी और बोला–“जैसी तुम्हारीमर्जी।”

“कल मैं कमरा देख दूंगा, कल शिफ्ट हो जाना।”

सन्नी राज को देखते हुए बोला–“जान कुछ बदले बदलेनजर आ रहे हैं–।”

राज ने प्रश्नवाचक दृष्टि से उसे देखा।

सन्नी आगे बोला–“कहां वो ड्यूटी से आते ही सजनासंवरना शुरू हो जाता था और कहां आज अब तक कपड़े ही नहीं उतारे हैं, आज की आखिरी रात तो जश्न की होनीचाहिए–।”

“नहीं, आज मूड सही नहीं है लेकिन फिर भी...तैयारहोती हूँ, यह कपड़े तो मुझेबोझ लगते हैं शरीर पर, उन्हींकपड़ों में मजा आता है–।”

राज उठकर कमरे की तरफ बढ़ गया।

डॉली ने मुस्कराकर सन्नी की तरफ आंख मारी। सन्नीमुस्कराकर रह गया।

डॉली अपने स्थान से उठी और सन्नी से छेड़खानी करतेहुए राज के पीछे कमरे की तरफ चली।

प्रत्युत्तर में सन्नी भी उससे निःशब्द छेड़खानी करने लगा।

☐☐☐

“वो क्या बात थी जो तुम कह रहे थे कि रात कोबताऊंगा?”

राज आदमकद शीशे के समक्ष खड़ा था और खुद कोशृंगार में डुबो रहा था।लेडीज कपड़े वह पहन चुका था, अबचेहरे की सजावट में डूबा था।

खुद में इतना व्यस्त था कि एकाएक उसने डॉली के प्रश्नका कोई जवाब नहीं दिया और जिस काम में लगा था, उसे पूरीतल्लीनता से जारी रखा।

डॉली पीछे थी, उसने उसके कांधों पर अपनी ठोढ़ी रखदी और फुसफुसाकर बोली–“जब सन्नी के पास जाना नहीं है।तो इतना सजने-संवरने का क्या मतलब है?”

“मुझे मजा आता है।”

“या आखिरी बार आज उसके पास जाने का इरादा है?”

“सवाल ही पैदा नहीं होता, सख्त नफरत हो गयी है मुझेइससे, मेरा बस चले तो इसका कत्ल कर दूं।”

“ऐसा क्या हुआ?”डॉली ने उसके पेट पर अपने हाथबांधे और बोली– “कल तक जो तुम्हारी रातों का शहजादा था,उससे आज इतनी नफरत क्यों हो गयी, कोई बात सुन ली क्याऔर एक बात बताओ...तुम्हें यह सब कैसे पता चला कि यहमुझे तंग करता है–?”

“उस नीली छतरी वाले की कृपा है।”

“मतलब?”

“तुम्हें पता है कि यह मेरी हत्या करने वाला है ?”

“क्या कह रहे हो?”डॉली ने शानदार चौंकने का अभिनयकिया और उसके पेट से बांह खोलते हुए सामने आई औरबोली–“यह क्या कह रहे हो तुम?” जैसे उसकी जान निकलगयी थी।

“हां, यह सच है डॉली।” उसका शृंगार पूरा हो गया था।

“यह तुम्हारी हत्या क्यों करेगा, तुम तो इसकी जोरू हो?”

“लेकिन यह तुम्हें जोरू बनाना चाहता है।”

“मुझे–?”

“हां–इसीलिए यह समझता है कि मेरी हत्या होनी जरूरी है –।”

“क्या कह रहे हो तुम, मेरी कोई बात समझ में नहीं आरही।”

“आएगी–।” राज ने खन-खन करता अपना चूड़ियोंवाला हाथ उसके गले में डाला और बिस्तर की तरफ बढ़ताहुआ बोला–“यह तुम्हें पाने लिए पागल होचुका है और कुछभी कर सकता है–।”

“लेकिन...।” डॉली असमंजस में फंसी थी।

“मुझे आज इसकी पोल-पट्टी सब पता चल गयी।”

“कैसे पता चली?”

“वह भगवान बड़ा कारसाज है, वो आगे बढ़कर मेरी मददकरता है, उस दिन जो आदर्श आया था।”

“हाँ-हाँ –तुम्हारा पूर्व जन्म का पति?”

“हां–अच्छा यह पति शब्द कितना विस्फोटक है, इसे सुनतेही मुझे कुछ होने लगता है।”

“फिर क्या हुआ?”वह जैसे सस्पेंस में बोली।

“वह भी यस बैंक में ही नौकरी करता है।”

“जिसमें यह सन्नी करता है?”

“हाँ और इसी के अंडर में है, यह उसका साहब है–दोनोंमें गाढ़ी छनती है, उसने आदर्श को बता रखा है कि मैं जहांअपने दोस्त के घर रहता हूँ –वो गे है और उसकी पत्नी डॉली मेरे दिल में चुभ गयी है और उसको हर हाल में पानाचाहता हूँ।”

डॉली गोल-गोल आंखो से राज को देखने लगी।

“अच्छा अब एक बात का खास ध्यान रखना है।” राजतुरन्त ही आगे बोला–“आदर्श के सामने कभी मेरा नाम राजमत लेना और न मैं तुम्हे डॉली कहूंगा।”

“मतलब समझी नहीं।”

“अरे यार–।” वह दुविधा से उबरते हुए बोला–“उसने आदर्श को बता रखा हैकि मैं जहां रहता हूँ, उसकानाम राज है और उसकी पत्नी का नाम डॉली–आदर्श कोकिसी हाल में पता नहीं चलना चाहिए कि वे लोग हम हीहैं–वरना मैं उसकी नजरों में गिर जाऊंगी।”

“ओह समझी।”

“भूलकर भी यह गलती मत करना।”

“क्या आदर्श यहां रहने आ रहा है?”

“आएगा, मैं लेकर आऊंगी, वह मेरा पति है।” राज पूर्णविश्वास के साथ बोला।

वे लोग बिस्तर पर लेट गये थे।

डॉली चक्कर घिन्नी बनी थी–“तो आदर्श बता रहा थातुम्हें कि यह तुम्हारी हत्या करना चाहता है?”

“मेरे सामने इसका फोन आदर्श के पास आया था, आदर्शसे यह एक शूटर मांग रहा था।”

“शूटर–?”

“हां–?”

“अबे स्साला। डॉली के दांत किटकिटा उठे, चेहरे परकहर नाच उठा–“बड़ाहरामजादा निकला यह तो, तुम पुलिसमें कम्प्लेन्ट क्यों नहीं करते–तुम्हें पुलिस में कम्प्लेन्ट करनाचाहिए–।”

“पुलिस में–?”राज सोचता रहा।

“अरे यह सिरफिरा है, पागल है–जब इसके दिमाग में यहसबकुछ चल रहा है तो यह तो कभी भी कुछ भी कर सकता है ।”

“लेकिन पुलिस में कम्प्लेन्ट करने से मेरा आदर्श भी तोपुलिस के लपेटे में आ जाएगा।”

“हां यह तो है–फोन तो आदर्श के मोबाइल पर ही आयाथा लेकिन...।”

“लेकिन–?”

“हम आदर्श को बचा सकते हैं।”

“कैसे ?”

डॉली दुगने उत्साह के साथ बोली–“देखो तुम समझ नहीं रहे हो, यह सिरफिरेदिमाग का आदमी है, आदर्श को शूटर के लिए फोन किया है तो स्पष्ट सी बातहै कि यह मर्डर को लेकर सीरियस है–आज नहीं तो कल यह तुम्हारा मर्डर जरूर कर देगा।”

राज भय के भाव के साथ बोला–फिर क्या करूं मैं– ?

“सबसे पहले पुलिस में कंप्लेंट करो कि यह मुझे मार देनाचाहता है।”

“लेकिन उससे आदर्श भी तो लपेटे में आ जाएगा। पुलिसमुझसे पूछेगी कि तुम्हें कैसे पता चला तो मैं क्या जवाब दूंगा?”

“जवाब तुम नहीं मैं दूंगी।”

“मतलब?”

“मैं गवाही दूंगी कि मैंने अपने कानों से सुना है कि यहयानि सन्नी फोन पर किसी से कह रहा था कि मुझे एक शूटरकी जरूरत है, जहां रहता हूँ उसकी हत्या करवाना है ताकिउसकी बीवी को हासिल कर सकूं ।”

राज डॉली को अपलक देखते हुए बोला–“हम किसीपचड़े में तो नहीं पड़ जाएंगे?”

“कैसी बुद्धि है तुम्हारी–अरे तुम यह क्यों नहीं समझते कियह तुम्हारी हत्या करवाने के लिए सीरियस है, कभी भी तुम्हेंमरवा सकता है, तब भी तुम्हारी बुद्धि नहीं खुल रही।”

“यह तो अच्छा हुआ कि यह आदर्श पर डिपेन्ड है और मेरेसामने ही फोन आया था, जिससे मुझे पता चल गया वरना यहतो मेरा काम तमाम ही कर देता।”

“इसी लिए यह जरूरी हो जाता है।” डॉली जोर देती हुईबोली–“कि तुम पुलिस में कम्प्लेन्ट दर्ज कराकर आओ मैं साथचलूंगी–पुलिस इसको बुलाएगी और उसे हड़काए और इससे कहेगी कि अगर राज का मर्डर हो जाता है तो तुझे उठा लियाजाएगा, इसी से उसके मंसूबे टांय-टांय फिस्स हो जाएंगे।”

“फिर यह मर्डर नहीं करेगा–?”

“सवाल ही पैदा नहीं होता, फिर तो तुम्हारी रक्षा करेगा।

देखो मैंने कहीं पढ़ रखा है कि अधिकतर मुजरिम सिर्फ इसकारण से जुर्म को अंजाम दे जाते हैं कि उन्हें खामख्याली होतीहै कि वे पकड़े नहीं जाएंगे–अगर उन्हें एक परसेन्ट भी यहविश्वास हो कि वे पकड़े जा सकते हैं तो वे कदापि उस जुर्मको नहीं करेंगे। इसलिए यह पुलिस कम्प्लेन्ट बहुत जरूरी है।उसके दिमाग में खौफ बैठ जाएगा पुलिस का और यह मर्डर कीप्लानिंग दिमाग से निकाल देगा।”

“साला पागल है, क्या कहा जाये–मर्डर भी किसलिएकरना चाह रहा है–तुम्हें पाने के लिए तुम कोई रसमलाई होजो कोई भी उठकर जाए और चट करने लगे।”

“पागल तो है लेकिन उसका प्रबंध तो करना पड़ेगा।”

“बिल्कुल करना पड़ेगा, तुमने बिल्कुल सही मशवरा दियाहै–एक बार पुलिस उसे जब तलब करेगी और उसकी पिटाईकरेगी तो वहीं उसके पसीने छूट जाएंगे,सब भूल जाएगा खाईपी।”

“हां यही समझाना चाह रही हूँ तुम्हें।”

“कल जाऊँगा रपट लिखाने–।”

“लेकिन मेरी जान उससे पहले उसे इस घर से तो आऊटकरो वरना पुलिस उल्टी तुम पर ही शक करने लगेगी कि जोतुम्हारा मर्डर करना चाहता है, उसे अपने घर में क्यों रखे हुएहो?”

“हां कह तो दिया है मैंने–अब कल चला जाएगा।”

“उसके बाद ही तुम रपट दर्ज करना।”

राज ने डॉली को गर्व की दृष्टि से देखा और बोला–“अबतो तुम बहुत बोलने लगी हो, पहले कहां गूंगे का गुड़ खाये रहती थी।”

“बहुत कहां, इतना ही तो बोल रही हूँ –अब जहां परजितना बोलना होगा,उतना ही तो बोला जाएगा–बेवजहचपड़-चपड़ करने की आदत नहीं है मेरी–।”

“तुमने मुझे बहुत खुशियां दे दी हैं डॉली।” वह उसकेगाल पर हाथ रखते हुए बोला–“पहले तो मेरे दिमाग में यहीटेंशन रहती थी कि तुम मुझे एक्सेप्ट नहीं करतीं, तुम मेरे साथ सही व्यवहार नहीं करतीं लेकिन तुमने खुद को बदलकर मेरीजिंदगी सफल कर दी।”

डॉली ने गहरी सांस ली।

एक सर्द आह खींची।

बोली–“मुझे तुमसे बहुत प्यार है, बहुत प्यार करती हूँ लेकिन उसकी भोड़ियानजरें मुझे बहुत विचलित करती थींइसलिए मैं तुम्हारे साथ सही व्यवहार नहींकर पाती थी–मैंनेतुम्हें जो भी दुख दिये उसके लिए मैं तुमसे माफी चाहूंगी–सचमें मैं खुद बहुत परेशान रहती थी लेकिन तुमसे कुछ कह नहींपाती थी।”

“आदर्श यहां रहेगा तब तो तुम्हें कोई दिक्कत नहीं रहेगी?”

“बस मुझे भेड़िया नजरों से न देखे, मुझे कोई दिक्कत नहींहै, तुम आपस में कुछ भी करो। तुम खुश रहो। मुझे क्या प्रॉब्लम है?”

राज ने उसे चूम लिया पकड़कर–“तुम बहुत अच्छीहो।”

☐☐☐
 

Similar threads

S
Replies
65
Views
66
StoryPublisher
S
Back
Top