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घर पर पहुच कर गाड़ी रुकी तो अभ्युदय जी बोले।
"निशी आज अच्छा सपना देखना।"
"आप जो बोलते हैं,वही मेरे सपने में आ जाता है।तो आप शुभ-शुभ और अच्छा ही बोला कीजिये।"
"बाय पुच्चू।"
"फिर? बाय।"
मैं आ गई रुम पर।आज सामने गेट पर ही आंटी मिल गईं।
"आज बहुत लेट हो गई निशी।"
"जी आंटी वो तिलवारा चले गए थे।"
"खाना नही आया आज तुम्हारा?"
"अरे क्यों?" मैंने देखा टिफिन नही आया है।मैं बाहर रहती हूँ तो खाना टिफिन से ही आता है।जब कभी टिफिन नही आता तब बाहर से कुछ या खुद ही बना लेती हूं।
मैंने टिफिन वाले भैया को फोन किया तो पता चला आज मैस में आग लग गई थी तो सब बन्द है।
मैंने आंटी को बताया तो बोलीं तुम जाओ मैं देती हूं खाना।
आंटी ने एक प्लेट में 4 रोटियां और सब्जी अचार भेज दिया छोटू के हाथ।
मुँह हाथ धोकर,कपड़े बदल कर जब खाने बैठी तो देखा सब्जी परवल की।
यक,ये नही हो सकता।पता होता तो मना कर देती की खाकर आई हूं।मैंने अचार और जैम के साथ दो रोटी खाकर काम चलाया।साथ ही कुछ नमकीन बिस्किट भी ले ली। चाय पीने के मन को कैसे , बहलाऊँ ये नही समंझ आ रहा था।अभी रिया होती तो सब सेट कर देती।बात तो करू के अंकल आ गए या नहीं।
"हेलो"
"हाँ निशी बोल।"
"आ गए अंकल?"
"हाँ आ गए।कल सुबह जा आ भी रहे हैं।"
"क्यों क्या हुआ?"
"वही फिर एक लड़के की फ़ोटो, अब इससे मिलो।ये भी ज्यादा पैसे वाला निकल आया तो?"
"रिया शांत हो जा।"
"मैंने सोचा लिया है शादी होगी तो रवीश से ही होगी।"
"लेकिन घर वाले सब?"
"तू है न मेरी साइड?"
"हाँ मैं तो हूँ हमेशा पर?"
"पर-वर कुछ नही फिर।अब बस।बहुत तमाशे हो गए इन बड़ों के।"
"ऐसे नही बोलते।"
"क्यों नही बोलते?पैदा करने के टाइम नही पूछा गया ताऊ जी से अब ब्याहने के टाइम वो जो बोलेंगे वही होगा।"
"रिया सुन ना।"
"अब बोलने दे निशी.. बहुत भारी बैठी हूँ।"
"आज मैंने अभ्युदय जी को किस किया?"
"क्या? तूने?"
"मतलब हमने।"
"हाँ किस मतलब दो लोग ही करेंगे ना? कंहा किया किस?"
"पहले घर पर फिर तिलवारा।"
"मेरा मतलब था कंहा किया किस? किस मतलब।गाल पर,हाथ पर या??"
"तू नाटक मत मार समझी।दोनो गाल पर और.."
"और.."
"समझ जा ना।"
"निशी.. तू सच बोल रही है?"
"हम्म"
"या बस मुझे शांत करवाने के लिए बोली ये सब?"
"बहुत अलग सी फीलिंग है पता।अजीब सी गुदगुदी पेट में।सच मे जैसे तितलियां उड़ती हों जैसे पेट मे।प्यार से अच्छा कोई एहसास नही रिया।"
"तूने सच्ची में??"
"तुझे अभी भी झूठ लग रहा?"
"हाँ मतलब मैं तुझसे पीछे रह गई इस बात पर अफसोस हो रहा।"
"तुम नही सुधरोगी।कल आएगी न?"
"लेट आउंगी।पापा के जाने के बाद।लेकिन सुन कल आकर सब सुनुगी क्या कैसे कब?"
"हाँ मैडम जी।सब बताएंगे डिटेल में।कहो तो अभ्युदय जी को भी बुला लेंगे सामने डेमो देकर।"
"चुप हो जा बेशर्म।"
"क्यों बेशर्म? तू ही तो कहती है प्यार से अच्छी-सच्ची कोई चीज़ नही।फिर??"
"तू जा न,सो जा।"
"बाय।अब लड़ना मत अंकल, से।"
"बाय।"
फोन रखकर आज फिर डायरी उठा ली मैंने।आज तो वैसे भी नींद नही आनी थी।
"निशी आज अच्छा सपना देखना।"
"आप जो बोलते हैं,वही मेरे सपने में आ जाता है।तो आप शुभ-शुभ और अच्छा ही बोला कीजिये।"
"बाय पुच्चू।"
"फिर? बाय।"
मैं आ गई रुम पर।आज सामने गेट पर ही आंटी मिल गईं।
"आज बहुत लेट हो गई निशी।"
"जी आंटी वो तिलवारा चले गए थे।"
"खाना नही आया आज तुम्हारा?"
"अरे क्यों?" मैंने देखा टिफिन नही आया है।मैं बाहर रहती हूँ तो खाना टिफिन से ही आता है।जब कभी टिफिन नही आता तब बाहर से कुछ या खुद ही बना लेती हूं।
मैंने टिफिन वाले भैया को फोन किया तो पता चला आज मैस में आग लग गई थी तो सब बन्द है।
मैंने आंटी को बताया तो बोलीं तुम जाओ मैं देती हूं खाना।
आंटी ने एक प्लेट में 4 रोटियां और सब्जी अचार भेज दिया छोटू के हाथ।
मुँह हाथ धोकर,कपड़े बदल कर जब खाने बैठी तो देखा सब्जी परवल की।
यक,ये नही हो सकता।पता होता तो मना कर देती की खाकर आई हूं।मैंने अचार और जैम के साथ दो रोटी खाकर काम चलाया।साथ ही कुछ नमकीन बिस्किट भी ले ली। चाय पीने के मन को कैसे , बहलाऊँ ये नही समंझ आ रहा था।अभी रिया होती तो सब सेट कर देती।बात तो करू के अंकल आ गए या नहीं।
"हेलो"
"हाँ निशी बोल।"
"आ गए अंकल?"
"हाँ आ गए।कल सुबह जा आ भी रहे हैं।"
"क्यों क्या हुआ?"
"वही फिर एक लड़के की फ़ोटो, अब इससे मिलो।ये भी ज्यादा पैसे वाला निकल आया तो?"
"रिया शांत हो जा।"
"मैंने सोचा लिया है शादी होगी तो रवीश से ही होगी।"
"लेकिन घर वाले सब?"
"तू है न मेरी साइड?"
"हाँ मैं तो हूँ हमेशा पर?"
"पर-वर कुछ नही फिर।अब बस।बहुत तमाशे हो गए इन बड़ों के।"
"ऐसे नही बोलते।"
"क्यों नही बोलते?पैदा करने के टाइम नही पूछा गया ताऊ जी से अब ब्याहने के टाइम वो जो बोलेंगे वही होगा।"
"रिया सुन ना।"
"अब बोलने दे निशी.. बहुत भारी बैठी हूँ।"
"आज मैंने अभ्युदय जी को किस किया?"
"क्या? तूने?"
"मतलब हमने।"
"हाँ किस मतलब दो लोग ही करेंगे ना? कंहा किया किस?"
"पहले घर पर फिर तिलवारा।"
"मेरा मतलब था कंहा किया किस? किस मतलब।गाल पर,हाथ पर या??"
"तू नाटक मत मार समझी।दोनो गाल पर और.."
"और.."
"समझ जा ना।"
"निशी.. तू सच बोल रही है?"
"हम्म"
"या बस मुझे शांत करवाने के लिए बोली ये सब?"
"बहुत अलग सी फीलिंग है पता।अजीब सी गुदगुदी पेट में।सच मे जैसे तितलियां उड़ती हों जैसे पेट मे।प्यार से अच्छा कोई एहसास नही रिया।"
"तूने सच्ची में??"
"तुझे अभी भी झूठ लग रहा?"
"हाँ मतलब मैं तुझसे पीछे रह गई इस बात पर अफसोस हो रहा।"
"तुम नही सुधरोगी।कल आएगी न?"
"लेट आउंगी।पापा के जाने के बाद।लेकिन सुन कल आकर सब सुनुगी क्या कैसे कब?"
"हाँ मैडम जी।सब बताएंगे डिटेल में।कहो तो अभ्युदय जी को भी बुला लेंगे सामने डेमो देकर।"
"चुप हो जा बेशर्म।"
"क्यों बेशर्म? तू ही तो कहती है प्यार से अच्छी-सच्ची कोई चीज़ नही।फिर??"
"तू जा न,सो जा।"
"बाय।अब लड़ना मत अंकल, से।"
"बाय।"
फोन रखकर आज फिर डायरी उठा ली मैंने।आज तो वैसे भी नींद नही आनी थी।