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"ये आँसू क्यों?"मैंने धीरे से पास आकर पूछा।
"कुछ नहीं निशी।ये जन्मदिन बहुत यादगार था और बस इसी जन्मदिन के बाद मैंने जन्मदिन बनाना ही बंद कर दिया था।"
"ऐसा क्या हुआ था?"
"कुछ कड़वी याद जुड़ी है।आज रहने दो।"
मैंने सबकी तरफ नज़र घुमाई पर सभी अपनी-अपनी बातों में व्यस्त कुछ करते से लगे।
"आप बताएंगे या नहीं?"
"निशी इसी जन्मदिन पर केक काटने के बाद दादू को हार्ट अटैक आ गया था,अफरा-तफरी मच गई थी और बहुत सहम गया था मैं।पर दादू ठीक हो गए और तब से मैंने केक नही काटा।"
"लेकिन आज?"
"आज भी तुमने निशी मुझसे केक नही पेस्ट्री कटवाई।मैं खुद डर रहा था कि तुम्हें कैसे मना करूँगा।लेकिन तुम तो मेरी निशी हो,मेरे लिए कोई परेशानी खड़ी कर ही नही सकती हो।"
"अभी केक?मेरा मतलब वो चॉकलेट केक?"
"माँ जानती हैं मैं जो मान लेता हूँ वो मान लेता हूँ।देखते हैं आज माँ क्या करेंगी?"
थोड़ी ही देर में कप केक्स से बना एक केक आया।दादाजी की तबियत खराब जबसे हुई थी उनका उठना बन्द था पर अभ्युदय जी का मन वंहा ही था।मैंने आंटी जी के पास जाकर बस एक बार कहा ही था और वो मान भी गईं।मैं कप केक्स उठा कर दादा जी के कमरे में आ गई और मेरे पीछे-पीछे सब।
केक रख मैं वापिस आकर अभ्युदय जी का बांया हाथ पकड़ कर चलने लगी।सब हम दोनों को ही देख रहे थे।चिया जिया अपनी मम्मी के कान में कुछ खुसपुस करने में व्यस्त थीं।आंटी और दादा जी की आंखों में अलग ही प्यार था।
"मैं जानता था,तुम ही कर सकती हो नामुमकिन को मुमकिन।"दादा जी ने मुस्कुरा कर मुझसे कहा।
"मैंने तो कुछ किया ही नही दादा जी।"
"किया तो।मेरे अभ्यु को 3 महीने के पहले ही चला दिया अब इसे पहले जैसा ही कर दो।"
"कोशिश करूँगी दादा जी।"
"मैं भी हूँ दादू।या अब आपको बस यहीं दिखतीं हैं?" अभ्युदय जी ने चिढ़ कर मजाक में कहा।
"आजा मेरे शेर बच्चे।"दादा जी ने अभ्युदय जी का हाथ पकड़ कर उन्हें अपने पास ही बैठा लिया।कप केक लेकर सबने एक साथ हैप्पी बर्थडे गाना गाया।बहुत खुशनुमा माहौल था।बस कमी थी अभ्युदय जी के पापा जी की।वो इस पार्टी में नही थे।किसी कॉन्फ्रेंस की वजह से बाहर थे।
आज वाइट सॉस का पास्ता और चॉकलेट कप केक्स खाकर चिया,जिया मेरे गुन गा रही थीं।वंही इन सब में,इतने लोगों के बीच अभ्युदय जी की नज़र सिर्फ मुझ पर थीं।
ये नजर मुझपर हैं इस बात का पता तो था ही पर एक दो बार जब नजरें मिली तो बात साफ थी।
मैं भी कंहा कम हूँ, अभ्युदय जी को जानकर नजरअंदाज करती रही।पर जब दिल खुद ही बेकाबू हो तो कोई कैसे काबू में रहे?बस यही सोच की वजह से जैसे ही उन पर नजर जाती दिल मे कुछ हो जाता।
ये मुझे क्या होता जा रहा है?क्या ये प्यार है?लेकिन मैं तो बहुत ही प्रैक्टिकल लड़की हूँ, एक ऐसे व्यक्ति से प्रेम जो उम्र में मुझसे बड़ा है साथ ही पूरी तरह सक्षम भी नही अपनी बीमारी की वजह से।फिर ये क्या है? कोई लगाव है या शायद इसे ही पहली नजर का पहला प्यार कहते होंगे।स्कूल में कभी किसी लड़के की तरफ नही देखा आज तक कभी कोई हीरो भी नही पसन्द आया।लेकिन अब दिल ऐसे धड़कता है जैसे अभी-अभी 440 वाल्ट का झटका लगा हो।
सोच में डूबी मैं सिर्फ अभ्युदय जी की तरफ ही देखे जा रही थी तभी मासी जी पीछे से आईं और बोलीं "बस भी करो डॉक्टर साहिबा,नज़र लगाओगी क्या अभ्यु को?"
मैं हड़बड़ा गई।बहुत ही ज़्यादा हाथ से प्लेट गिरने को ही थी पर संभाल लिया किसी तरह और बोली
"मासी जी वो किसी सोच में थी।अभ्युदय जी की तरफ तो ध्यान भी नही था।"
"हाँ पर नज़र जिस पर थी हम सबने देखा।"
"सॉरी।"
"अरे नहीं बेटा, सॉरी क्यों?ये कोई गलती थोड़े न है।ये इश्क है ही ऐसा मर्ज।"
"जी,इश्क?नही मासी आप गलत समझ रही हैं।"
"रहने दो।चेहरे की रंगत और इस सफेद साड़ी के रहते कहना मुश्किल है कि इश्क नही है।"
"मासी जी,लगाव है। इतने दिनों से उनके साथ हूँ।बहुत गहरा रिश्ता होता है एक मरीज से हमारा।बस वही रिश्ता है और कुछ भी नहीं।"
"निशी अगर ऐसा है तो अभ्यु को बता दो।उसका दिल बहुत बार टूटा है।वो अब नही सह पाएगा।"
"जी मतलब?"
"सच कहा अभ्यु ने,बहुत मतलब पूछती हो।"
मौसी जी चली गईं आंटी के पास और मेरी नजर एक बार फिर अभ्युदय जी पर।
सफेद शर्ट और ब्लैक जीन्स।स्पोर्ट शूज और हाथ मे स्टिक।बालों में हल्का तेल या जेल पता नही पर सलीके से कंघी किये बाल।क्लीन शेव और रौबदार मूछें बिल्कुल ठाकुरों वाली। तभी बाहर से आवाज़ आई
"बारिश होने लगी।"
आवाज़ चिया या रिया में से ही किसी की थी।ये आज इस मौसम की पहली बारिश थी।जुलाई की पहली बारिश।
बारिश के पड़ते ही मिट्टी की आती सौंधी खुशबू फैल गई।मुझसे रहा नही गया और मैं कमरे से निकल कर गेट पर आ गई।
गहरी सांस लेकर इस खुशबू को अपने अंदर तक समेट लेने की चाह, जो बचपन से रही है उसकी नाकामयाब कोशिश करने लगी।
मैं नही जानती थी ऐसा करते मुझे कोई देख रहा है या नही बस मैं तो व्यस्त थी वो खुशबू समेटने में।
पीछे से एक हाथ कंधे पर आया और मैं अपनी इस बचकानी हरकत से बाहर निकली।
"जी आंटी जी।वो मैं.."
"तुम्हें पसन्द है ये खुशबू?"
"जी।"
"निशी चलो खाना खा लो।"
"नहीं आंटी जी।बस अब घर निकलूंगी।पास्ता बहुत खा लिया है।पेट मे बिल्कुल भी जगह नही अब।"
"बिना कुछ खाए मैं जाने नही दूंगी।चलो आओ।"
मैं पीछे-पीछे आ गई।न जाने कब साड़ी पैर में फसी और मैं लड़खड़ा गई पर अभ्युदय जी ने मेरा हाथ पकड़ लिया और धीरे से बोले "मेरे रहते कभी नही गिरने दूंगा तुम्हें,न कुछ होने दूंगा।"
"थैंक्यू अभ्युदय जी।"
"ये जी बोलना कब बन्द करोगी?"
"जब आप बिलकुल ठीक हो जाएंगे।"
"मतलब कभी नही?"
"आप भी मतलब,मतलब शुरू हो गए?"
"तुम्हारा मतलब अलग होता है।अब पकाओ मत।चलो खाना खाने।"
"जी।"
डाइनिंग टेबल पर सभी थे मासी-मौसा जी,चिया-रिया,आंटी,अभ्युदय जी और मैं।
पालक की पुरिया और आलू की सब्जी।दही बड़े और इमली की चटनी।गुलाब जामुन और फ्रूट कस्टर्ड, साथ ही एक और चीज़ ये कैसे न रहती इधर ये तो हर समय होती ही है खाने में जी वही जो आप बिल्कुल सहि समझें हैं अखरोट।
इतनी लज़ीज चीज़ों को सामने देख भी मन खाने का नही था।थोड़ी ही भूख थी जो इन सब चीज़ों से नहीं भरती तभी देखा कि शर्मिला कटोरी में लेकर कुछ जा रही है।
"दूध रोटी?"
"जी।वो दादा जी के लिए मैडम।"
"मुझे भी मिल सकती है क्या?"
"दूध रोटी खाने का मन है निशी?" आंटी ने पूछा तो तुरंत ही मुंडी हाँ में हिला दी मैंने।
आज मजा आ गया था दूध रोटी खा कर।बिल्कुल घर जैसा स्वाद।अब घर निकलने की बारी थी।पर ये बारिश थमने का नाम नही ले रही थी।शायद ये साजिश है उस ऊपर वाले कि,क्या चाहता है वो? मैं अभ्युदय जी को देखकर बहुत कुछ सोच रही थी।
"चलो मैं चलता हूं, तुम्हें रास्ते मे घर छोड़ दूंगा।"अभ्युदय जी ने मुझे देखकर कहा।
"नहीं मैं निकल जाऊंगी।कोई दिक्कत नही है।आप घर पर ही आराम कीजिये आज बहुत एक्सरशन हो गया है।"
"अरे पर मुझे तो जाना ही है न?"
"मतलब?"
"मतलब ये डॉ साहिबा कि अभी दोस्तों की पार्टी बाकी है,जो देर रात तक चलेगी।मुझे जाना ही है तुम्हें छोड़ते हुए निकल जाऊंगा।"
"जी।ठीक है।"
"अभ्यु ये दवाई लो।देखो ज्यादा देर नही करना और तुम्हारे किसी दोस्त ने कोई भी जबरदस्ती की तो मुझसे बुरा..।"आंटी ने पानी और दवाई अभ्युदय जी को दी।
"माँ चिल।मैं जल्दी आ जाऊंगा।"
हम दोनों गाड़ी में बैठ गए।
गाना चलता रहा, अचानक फोन बजा और, अभ्युदय जी बात करने लगे।
"मैं करवा दूंगा इंतजाम।एक-दो दिन तो रुकना पड़ेगा। हाँ, मैं ठीक हूँ।"
फोन रखकर अभ्युदय जी पीछे पलटे मैं उनकी तरफ न देखते हुए गाने और बारिश पर ही ध्यान लगाएं हुई थी।
"निशी।"
"जी।"
"क्या सोच रही हो?"
"इस बारिश को देख रही हूँ।"
"तुम्हें पसन्द है बारिश?"
"जी।बहुत।आपका ये कौन बनेगा करोड़पति खत्म हुआ हो तो मैं कुछ पूछ सकती हूँ?"
"पूछो।"
"आप किस से बात कर रहे थे अभी?"
"एक दोस्त है।"
"कोई लड़की है?"
"हाँ।"
"क्या हुआ उन्हें?एक लाख रुपये की जरूरत उन्हें ही है?"
"उसकी बहन की कुछ लोग ले गए हैं,ऐसा कहा है उसने।"
"और आपने मान लिया?क्या उन्हें पुलिस के पास नही जाना चाहिए?"
"निशी, तुम जानती नही हो उसे।इसलिए ऐसा कह रही हो।उसे लाख रुपये सिर्फ अपने लिए चाहिए जानता हूँ और दे भी दूंगा क्योंकि कभी कहा था उसे,कि उसकी हर जरूरत को पूरा करूँगा।"
"जायज़ हो या नाजायज़?तब भी?"
"हाँ सारी जरूरतें।"
"प्यार करते हैं उसे?"
"नहीं, वो करती थी।लेकिन "
"लेकिन क्या अभ्युदय जी?" डर लग रहा था मुझे।क्या कहेंगे अब अभ्युदय जी।ये कौन हैं जो आज ऐसे मेरे दिल को ऐसे कमजोर कर रही है।
"बताइए न?लेकिन क्या?"
"लेकिन कुछ रातें हैं जो मैंने साथ बिताईं है उसके।"
बस दिल टूट चुका था,दिल के जुड़ने की अभी खुशी भी ठीक से नही मनाई थी और ये गम,ये दर्द उफ्फ।दर्दनाक सी इस रात में मैं कुछ बोल नही पाई।आंखों से आंसू बह निकले और बिना कुछ आगे जानने के बजाय मैंने बिल्कुल चुप रहना सही समझा।
घर आ चुका था।मैं बिना कुछ कहे बारिश रुकने का इन्तेजार किये बगैर।साड़ी के खराब हो जाने की चिंता किये बगैर गाड़ी से उतरी अपना बैग लिया और बिना कुछ बोले चली गई।मुड़कर भी नही देखा एक भी बार।दिल टूटना क्या होता है ये अभी कंहा जाना था ये तो बस एक दर्द था जो अभी-अभी उठा था।
घर जाकर कपड़े बदल कर रेडियो ऑन किया और लेट कर रिया को फोन किया।
"हाँ बोल।"हमारी बातें हेलो से शुरू नही होती कभी भी।
"सुन घर आ जाना।"
"क्या हुआ?टाइम देख नालायक।"
"देख लिया टाइम।आजा न यार।"
"निशी क्या हुआ तुझे?"
मैं चुप थी पर आंसू गिर रहे थे।लगातार,बार-बार रिया पूछ रही थी "क्या हुआ बताएगी?"
"आ जा अभी के अभी बस।"
"जा चाबी लेकर रख आंटी से।आती हूँ।"
मैं पी जी में रहती हूँ, कुछ टाइम लिमिट्स हैं।लेकिन अगर कुछ जरूरी हो तो मेरी आंटी इतनी भी बुरी नही थीं।आज चाबी लेकर रखनी थी गेट की।जाकर आंटी की बेल बजाई।
"आंटी मेरी एक फ्रेंड आ रही है।थोड़ी देर में आ जायेगी अभी कितनी देर गेट खुला है?"
"निशी आज अंकल लेट आने वाले हैं।तो अभी 12 बजे तक खुला है गेट।"
"ओके आंटी।"
"लड़की ही है न निशी?"
ये आंटी भी क्या पलटी खाई इन्होंने।आजतक कभी कोई लड़का आया क्या अंदर?
"आंटी रिया आ रही है।"
"अच्छा।रिया आ रही है।आ जाना साथ मे चाय पियेंगे।"
आंटी की जरा सी तारीफ और रिया और मुझे चाय नाश्ता आंटी की तरफ से।पता नही कैसे पर रिया के लिए बड़ा आसान हुआ करता था ये सब।
"जी आंटी।"
बोलकर पलटी ही थी कि रिया मैडम गेट पर थीं।
"नमस्ते आंटी।गाड़ी अंदर लगाऊं न?"
"हाँ रिया इस तरफ।"
गाड़ी लगा कर मेरी तरफ देखा भी नही नालायक ने और आंटी को बोली
"क्या लगते हो आप गाउन में।आज पहली बार देखा मैंने।आपको आंटी भी नहीं कहा जा सकता सच।"
रिया के इस झुठ को इतनी शातिर आंटी भी समझ नही पाती, या यूं कहें कि समझना नहीं चाहतीं।
"आजाओ रिया,निशी चाय पीते हैं।अंकल को आने में बहुत टाइम है।छोटू भी सो चुका है,गप्पे मारेंगे।"
रिया ने मुझे फिर नजरअंदाज कर दिया और आंटी के ही पीछे चल दी।
"हाँ-हाँ भाभी बिल्कुल।" अब ये भाभी क्या बला है और आज अचानक आंटी को भाभी बोलने का तुक? ये सिर्फ रिया मैडम ही जान सकती है और दूजा कोई नही।मैं घर का दरवाजा लगा कर दोनों के पास आ गई जंहा पहली बार रिया ने मेरी तरफ देखा।
"भाभी पहले चाय।फिर आपकी पुरानी फोटोज देखेंगे।"
"हाँ तुम दोनों बैठो।मैं जल्दी आई।" भाभी मेरा मतलब आंटी जो कुछ ही देर पहले भाभी में तब्दील हो चुकी हैं चाय रखने चली गईं।रिया ने अपनी आई ब्रो ऊपर नीचे करके पूछा
"हाल कैसे हैं?"
मैं कुछ कह नहीं पाई।
"बोलोगी कुछ?क्या हुआ?"
तभी हमारी आज ही बनी भाभी कूद पड़ीं।
"जानती हो रिया ये निशी के दोस्त , अरे नही वो मरीज बहुत बद्तमीज हैं। खुद कितनी उम्र के होंगे मुझे कहते हैं एक ही बच्चा है आपका आंटी।"
रिया ने अपनी आंखें तरेर कर मेरी तरफ नजर की और गुस्से में पूछा।
"कौन से मरीज आये थे यंहा? और क्यों आये थे?"
मैं तो चुप थी।
"कोई बताएगा मुझे?"
"तुम नही जानती क्या उनको?हाथ पैर में लकवा लगा है जिनको? आज जन्मदिन था उनका निशी को पार्टी में लेकर जाने के लिए आये थे।" ये तय था कि आज मेरा खून होना है।पहले से ही दर्द कम था क्या? जो ये आंटी कम अभी बनी भाभी चक्कू पर धार तेज कर रही हैं?
"अच्छा, घर आए, थे।पार्टी थी और क्या जानना है अब?"
मेरी तरफ गुस्से से भड़की आंखे रिया की और ऐसे डायलॉग।मैं समझ गई थी अब मेरा कुछ नही हो सकता।ये वो गब्बर है जो कितने आदमी थे भी नही पूछेगी।ऊपर से ये आंटी,इन्हें भी आज ही ये प्रेम दिखाना है।फिर टपक कर बोलीं।
"आज तो निशी को तुमने देखा ही नही।साड़ी में कितनी सुंदर लग रही थी।"
बस यही बाकी था।
रिया ने और ग़ुस्से मे देखते हुए ही कहा "अच्छा साड़ी में।बहुत सही।तब तो मुझे केक खाने बुलाया होगा।क्यों है ना?"
"नहीं रिया अभी"
"क्या अभी?मैं पागल हूँ न?"
मैं अपनी बात रखती और रिया को कुछ बता समझा पाती वो आंटी फिर कूदी बीच में।लेकिन इस बार मेरे भले के लिए।
"मैं चाय लाती हूँ।कुछ खाओगी तुम दोनों?"
"न नहीं।" दोनो ने एक साथ ही कहा। आंटी चली गईं अंदर।
"मैं अभी सब बताती हूँ।सब बताने ही तो बुलाया है।फोन पर क्या बताती?"
"रहने दो।अब क्या बताओगी?"
"रिया भाव मत खा, मोटी हो जाएगी।"
"तू टेंशन न ले,मैं मोटी नहीं होऊँगी।"
"घर चलकर सब बताती हूँ।"
आंटी आ गईं।हम सबने चाय पी बिस्किट नमकीन भी ली और फिर रूम पर आ गए।
पहुचते ही मैंने रिया को जोर से पकड़ लिया और आंसू बहने लगे।
"क्या हुआ निशी?वो अभ्युदय जी ने कुछ गलत? या किसी ने कुछ कहा?"
मैं कुछ बोल नही पा रही थी।अब तक शांत कैसे थी नही जानती।रिया बहुत असमंजस में थी क्या करे,क्या नही?
"चुप होगी? या जाऊँ मैं?"
"हम्म.. हो गई चुप।" मेरा सिसकना बन्द हो गया था। लेकिन आंसू अबभी लगातार गिर रहे थे।
"निशी क्या हुआ? बता न पागल? मैं हूँ न?"
रिया की बेचैनी बढ़ती जा रही थी क्या हुआ आखिर जो निशी का ये हाल हो गया है।
"कुछ नहीं निशी।ये जन्मदिन बहुत यादगार था और बस इसी जन्मदिन के बाद मैंने जन्मदिन बनाना ही बंद कर दिया था।"
"ऐसा क्या हुआ था?"
"कुछ कड़वी याद जुड़ी है।आज रहने दो।"
मैंने सबकी तरफ नज़र घुमाई पर सभी अपनी-अपनी बातों में व्यस्त कुछ करते से लगे।
"आप बताएंगे या नहीं?"
"निशी इसी जन्मदिन पर केक काटने के बाद दादू को हार्ट अटैक आ गया था,अफरा-तफरी मच गई थी और बहुत सहम गया था मैं।पर दादू ठीक हो गए और तब से मैंने केक नही काटा।"
"लेकिन आज?"
"आज भी तुमने निशी मुझसे केक नही पेस्ट्री कटवाई।मैं खुद डर रहा था कि तुम्हें कैसे मना करूँगा।लेकिन तुम तो मेरी निशी हो,मेरे लिए कोई परेशानी खड़ी कर ही नही सकती हो।"
"अभी केक?मेरा मतलब वो चॉकलेट केक?"
"माँ जानती हैं मैं जो मान लेता हूँ वो मान लेता हूँ।देखते हैं आज माँ क्या करेंगी?"
थोड़ी ही देर में कप केक्स से बना एक केक आया।दादाजी की तबियत खराब जबसे हुई थी उनका उठना बन्द था पर अभ्युदय जी का मन वंहा ही था।मैंने आंटी जी के पास जाकर बस एक बार कहा ही था और वो मान भी गईं।मैं कप केक्स उठा कर दादा जी के कमरे में आ गई और मेरे पीछे-पीछे सब।
केक रख मैं वापिस आकर अभ्युदय जी का बांया हाथ पकड़ कर चलने लगी।सब हम दोनों को ही देख रहे थे।चिया जिया अपनी मम्मी के कान में कुछ खुसपुस करने में व्यस्त थीं।आंटी और दादा जी की आंखों में अलग ही प्यार था।
"मैं जानता था,तुम ही कर सकती हो नामुमकिन को मुमकिन।"दादा जी ने मुस्कुरा कर मुझसे कहा।
"मैंने तो कुछ किया ही नही दादा जी।"
"किया तो।मेरे अभ्यु को 3 महीने के पहले ही चला दिया अब इसे पहले जैसा ही कर दो।"
"कोशिश करूँगी दादा जी।"
"मैं भी हूँ दादू।या अब आपको बस यहीं दिखतीं हैं?" अभ्युदय जी ने चिढ़ कर मजाक में कहा।
"आजा मेरे शेर बच्चे।"दादा जी ने अभ्युदय जी का हाथ पकड़ कर उन्हें अपने पास ही बैठा लिया।कप केक लेकर सबने एक साथ हैप्पी बर्थडे गाना गाया।बहुत खुशनुमा माहौल था।बस कमी थी अभ्युदय जी के पापा जी की।वो इस पार्टी में नही थे।किसी कॉन्फ्रेंस की वजह से बाहर थे।
आज वाइट सॉस का पास्ता और चॉकलेट कप केक्स खाकर चिया,जिया मेरे गुन गा रही थीं।वंही इन सब में,इतने लोगों के बीच अभ्युदय जी की नज़र सिर्फ मुझ पर थीं।
ये नजर मुझपर हैं इस बात का पता तो था ही पर एक दो बार जब नजरें मिली तो बात साफ थी।
मैं भी कंहा कम हूँ, अभ्युदय जी को जानकर नजरअंदाज करती रही।पर जब दिल खुद ही बेकाबू हो तो कोई कैसे काबू में रहे?बस यही सोच की वजह से जैसे ही उन पर नजर जाती दिल मे कुछ हो जाता।
ये मुझे क्या होता जा रहा है?क्या ये प्यार है?लेकिन मैं तो बहुत ही प्रैक्टिकल लड़की हूँ, एक ऐसे व्यक्ति से प्रेम जो उम्र में मुझसे बड़ा है साथ ही पूरी तरह सक्षम भी नही अपनी बीमारी की वजह से।फिर ये क्या है? कोई लगाव है या शायद इसे ही पहली नजर का पहला प्यार कहते होंगे।स्कूल में कभी किसी लड़के की तरफ नही देखा आज तक कभी कोई हीरो भी नही पसन्द आया।लेकिन अब दिल ऐसे धड़कता है जैसे अभी-अभी 440 वाल्ट का झटका लगा हो।
सोच में डूबी मैं सिर्फ अभ्युदय जी की तरफ ही देखे जा रही थी तभी मासी जी पीछे से आईं और बोलीं "बस भी करो डॉक्टर साहिबा,नज़र लगाओगी क्या अभ्यु को?"
मैं हड़बड़ा गई।बहुत ही ज़्यादा हाथ से प्लेट गिरने को ही थी पर संभाल लिया किसी तरह और बोली
"मासी जी वो किसी सोच में थी।अभ्युदय जी की तरफ तो ध्यान भी नही था।"
"हाँ पर नज़र जिस पर थी हम सबने देखा।"
"सॉरी।"
"अरे नहीं बेटा, सॉरी क्यों?ये कोई गलती थोड़े न है।ये इश्क है ही ऐसा मर्ज।"
"जी,इश्क?नही मासी आप गलत समझ रही हैं।"
"रहने दो।चेहरे की रंगत और इस सफेद साड़ी के रहते कहना मुश्किल है कि इश्क नही है।"
"मासी जी,लगाव है। इतने दिनों से उनके साथ हूँ।बहुत गहरा रिश्ता होता है एक मरीज से हमारा।बस वही रिश्ता है और कुछ भी नहीं।"
"निशी अगर ऐसा है तो अभ्यु को बता दो।उसका दिल बहुत बार टूटा है।वो अब नही सह पाएगा।"
"जी मतलब?"
"सच कहा अभ्यु ने,बहुत मतलब पूछती हो।"
मौसी जी चली गईं आंटी के पास और मेरी नजर एक बार फिर अभ्युदय जी पर।
सफेद शर्ट और ब्लैक जीन्स।स्पोर्ट शूज और हाथ मे स्टिक।बालों में हल्का तेल या जेल पता नही पर सलीके से कंघी किये बाल।क्लीन शेव और रौबदार मूछें बिल्कुल ठाकुरों वाली। तभी बाहर से आवाज़ आई
"बारिश होने लगी।"
आवाज़ चिया या रिया में से ही किसी की थी।ये आज इस मौसम की पहली बारिश थी।जुलाई की पहली बारिश।
बारिश के पड़ते ही मिट्टी की आती सौंधी खुशबू फैल गई।मुझसे रहा नही गया और मैं कमरे से निकल कर गेट पर आ गई।
गहरी सांस लेकर इस खुशबू को अपने अंदर तक समेट लेने की चाह, जो बचपन से रही है उसकी नाकामयाब कोशिश करने लगी।
मैं नही जानती थी ऐसा करते मुझे कोई देख रहा है या नही बस मैं तो व्यस्त थी वो खुशबू समेटने में।
पीछे से एक हाथ कंधे पर आया और मैं अपनी इस बचकानी हरकत से बाहर निकली।
"जी आंटी जी।वो मैं.."
"तुम्हें पसन्द है ये खुशबू?"
"जी।"
"निशी चलो खाना खा लो।"
"नहीं आंटी जी।बस अब घर निकलूंगी।पास्ता बहुत खा लिया है।पेट मे बिल्कुल भी जगह नही अब।"
"बिना कुछ खाए मैं जाने नही दूंगी।चलो आओ।"
मैं पीछे-पीछे आ गई।न जाने कब साड़ी पैर में फसी और मैं लड़खड़ा गई पर अभ्युदय जी ने मेरा हाथ पकड़ लिया और धीरे से बोले "मेरे रहते कभी नही गिरने दूंगा तुम्हें,न कुछ होने दूंगा।"
"थैंक्यू अभ्युदय जी।"
"ये जी बोलना कब बन्द करोगी?"
"जब आप बिलकुल ठीक हो जाएंगे।"
"मतलब कभी नही?"
"आप भी मतलब,मतलब शुरू हो गए?"
"तुम्हारा मतलब अलग होता है।अब पकाओ मत।चलो खाना खाने।"
"जी।"
डाइनिंग टेबल पर सभी थे मासी-मौसा जी,चिया-रिया,आंटी,अभ्युदय जी और मैं।
पालक की पुरिया और आलू की सब्जी।दही बड़े और इमली की चटनी।गुलाब जामुन और फ्रूट कस्टर्ड, साथ ही एक और चीज़ ये कैसे न रहती इधर ये तो हर समय होती ही है खाने में जी वही जो आप बिल्कुल सहि समझें हैं अखरोट।
इतनी लज़ीज चीज़ों को सामने देख भी मन खाने का नही था।थोड़ी ही भूख थी जो इन सब चीज़ों से नहीं भरती तभी देखा कि शर्मिला कटोरी में लेकर कुछ जा रही है।
"दूध रोटी?"
"जी।वो दादा जी के लिए मैडम।"
"मुझे भी मिल सकती है क्या?"
"दूध रोटी खाने का मन है निशी?" आंटी ने पूछा तो तुरंत ही मुंडी हाँ में हिला दी मैंने।
आज मजा आ गया था दूध रोटी खा कर।बिल्कुल घर जैसा स्वाद।अब घर निकलने की बारी थी।पर ये बारिश थमने का नाम नही ले रही थी।शायद ये साजिश है उस ऊपर वाले कि,क्या चाहता है वो? मैं अभ्युदय जी को देखकर बहुत कुछ सोच रही थी।
"चलो मैं चलता हूं, तुम्हें रास्ते मे घर छोड़ दूंगा।"अभ्युदय जी ने मुझे देखकर कहा।
"नहीं मैं निकल जाऊंगी।कोई दिक्कत नही है।आप घर पर ही आराम कीजिये आज बहुत एक्सरशन हो गया है।"
"अरे पर मुझे तो जाना ही है न?"
"मतलब?"
"मतलब ये डॉ साहिबा कि अभी दोस्तों की पार्टी बाकी है,जो देर रात तक चलेगी।मुझे जाना ही है तुम्हें छोड़ते हुए निकल जाऊंगा।"
"जी।ठीक है।"
"अभ्यु ये दवाई लो।देखो ज्यादा देर नही करना और तुम्हारे किसी दोस्त ने कोई भी जबरदस्ती की तो मुझसे बुरा..।"आंटी ने पानी और दवाई अभ्युदय जी को दी।
"माँ चिल।मैं जल्दी आ जाऊंगा।"
हम दोनों गाड़ी में बैठ गए।
गाना चलता रहा, अचानक फोन बजा और, अभ्युदय जी बात करने लगे।
"मैं करवा दूंगा इंतजाम।एक-दो दिन तो रुकना पड़ेगा। हाँ, मैं ठीक हूँ।"
फोन रखकर अभ्युदय जी पीछे पलटे मैं उनकी तरफ न देखते हुए गाने और बारिश पर ही ध्यान लगाएं हुई थी।
"निशी।"
"जी।"
"क्या सोच रही हो?"
"इस बारिश को देख रही हूँ।"
"तुम्हें पसन्द है बारिश?"
"जी।बहुत।आपका ये कौन बनेगा करोड़पति खत्म हुआ हो तो मैं कुछ पूछ सकती हूँ?"
"पूछो।"
"आप किस से बात कर रहे थे अभी?"
"एक दोस्त है।"
"कोई लड़की है?"
"हाँ।"
"क्या हुआ उन्हें?एक लाख रुपये की जरूरत उन्हें ही है?"
"उसकी बहन की कुछ लोग ले गए हैं,ऐसा कहा है उसने।"
"और आपने मान लिया?क्या उन्हें पुलिस के पास नही जाना चाहिए?"
"निशी, तुम जानती नही हो उसे।इसलिए ऐसा कह रही हो।उसे लाख रुपये सिर्फ अपने लिए चाहिए जानता हूँ और दे भी दूंगा क्योंकि कभी कहा था उसे,कि उसकी हर जरूरत को पूरा करूँगा।"
"जायज़ हो या नाजायज़?तब भी?"
"हाँ सारी जरूरतें।"
"प्यार करते हैं उसे?"
"नहीं, वो करती थी।लेकिन "
"लेकिन क्या अभ्युदय जी?" डर लग रहा था मुझे।क्या कहेंगे अब अभ्युदय जी।ये कौन हैं जो आज ऐसे मेरे दिल को ऐसे कमजोर कर रही है।
"बताइए न?लेकिन क्या?"
"लेकिन कुछ रातें हैं जो मैंने साथ बिताईं है उसके।"
बस दिल टूट चुका था,दिल के जुड़ने की अभी खुशी भी ठीक से नही मनाई थी और ये गम,ये दर्द उफ्फ।दर्दनाक सी इस रात में मैं कुछ बोल नही पाई।आंखों से आंसू बह निकले और बिना कुछ आगे जानने के बजाय मैंने बिल्कुल चुप रहना सही समझा।
घर आ चुका था।मैं बिना कुछ कहे बारिश रुकने का इन्तेजार किये बगैर।साड़ी के खराब हो जाने की चिंता किये बगैर गाड़ी से उतरी अपना बैग लिया और बिना कुछ बोले चली गई।मुड़कर भी नही देखा एक भी बार।दिल टूटना क्या होता है ये अभी कंहा जाना था ये तो बस एक दर्द था जो अभी-अभी उठा था।
घर जाकर कपड़े बदल कर रेडियो ऑन किया और लेट कर रिया को फोन किया।
"हाँ बोल।"हमारी बातें हेलो से शुरू नही होती कभी भी।
"सुन घर आ जाना।"
"क्या हुआ?टाइम देख नालायक।"
"देख लिया टाइम।आजा न यार।"
"निशी क्या हुआ तुझे?"
मैं चुप थी पर आंसू गिर रहे थे।लगातार,बार-बार रिया पूछ रही थी "क्या हुआ बताएगी?"
"आ जा अभी के अभी बस।"
"जा चाबी लेकर रख आंटी से।आती हूँ।"
मैं पी जी में रहती हूँ, कुछ टाइम लिमिट्स हैं।लेकिन अगर कुछ जरूरी हो तो मेरी आंटी इतनी भी बुरी नही थीं।आज चाबी लेकर रखनी थी गेट की।जाकर आंटी की बेल बजाई।
"आंटी मेरी एक फ्रेंड आ रही है।थोड़ी देर में आ जायेगी अभी कितनी देर गेट खुला है?"
"निशी आज अंकल लेट आने वाले हैं।तो अभी 12 बजे तक खुला है गेट।"
"ओके आंटी।"
"लड़की ही है न निशी?"
ये आंटी भी क्या पलटी खाई इन्होंने।आजतक कभी कोई लड़का आया क्या अंदर?
"आंटी रिया आ रही है।"
"अच्छा।रिया आ रही है।आ जाना साथ मे चाय पियेंगे।"
आंटी की जरा सी तारीफ और रिया और मुझे चाय नाश्ता आंटी की तरफ से।पता नही कैसे पर रिया के लिए बड़ा आसान हुआ करता था ये सब।
"जी आंटी।"
बोलकर पलटी ही थी कि रिया मैडम गेट पर थीं।
"नमस्ते आंटी।गाड़ी अंदर लगाऊं न?"
"हाँ रिया इस तरफ।"
गाड़ी लगा कर मेरी तरफ देखा भी नही नालायक ने और आंटी को बोली
"क्या लगते हो आप गाउन में।आज पहली बार देखा मैंने।आपको आंटी भी नहीं कहा जा सकता सच।"
रिया के इस झुठ को इतनी शातिर आंटी भी समझ नही पाती, या यूं कहें कि समझना नहीं चाहतीं।
"आजाओ रिया,निशी चाय पीते हैं।अंकल को आने में बहुत टाइम है।छोटू भी सो चुका है,गप्पे मारेंगे।"
रिया ने मुझे फिर नजरअंदाज कर दिया और आंटी के ही पीछे चल दी।
"हाँ-हाँ भाभी बिल्कुल।" अब ये भाभी क्या बला है और आज अचानक आंटी को भाभी बोलने का तुक? ये सिर्फ रिया मैडम ही जान सकती है और दूजा कोई नही।मैं घर का दरवाजा लगा कर दोनों के पास आ गई जंहा पहली बार रिया ने मेरी तरफ देखा।
"भाभी पहले चाय।फिर आपकी पुरानी फोटोज देखेंगे।"
"हाँ तुम दोनों बैठो।मैं जल्दी आई।" भाभी मेरा मतलब आंटी जो कुछ ही देर पहले भाभी में तब्दील हो चुकी हैं चाय रखने चली गईं।रिया ने अपनी आई ब्रो ऊपर नीचे करके पूछा
"हाल कैसे हैं?"
मैं कुछ कह नहीं पाई।
"बोलोगी कुछ?क्या हुआ?"
तभी हमारी आज ही बनी भाभी कूद पड़ीं।
"जानती हो रिया ये निशी के दोस्त , अरे नही वो मरीज बहुत बद्तमीज हैं। खुद कितनी उम्र के होंगे मुझे कहते हैं एक ही बच्चा है आपका आंटी।"
रिया ने अपनी आंखें तरेर कर मेरी तरफ नजर की और गुस्से में पूछा।
"कौन से मरीज आये थे यंहा? और क्यों आये थे?"
मैं तो चुप थी।
"कोई बताएगा मुझे?"
"तुम नही जानती क्या उनको?हाथ पैर में लकवा लगा है जिनको? आज जन्मदिन था उनका निशी को पार्टी में लेकर जाने के लिए आये थे।" ये तय था कि आज मेरा खून होना है।पहले से ही दर्द कम था क्या? जो ये आंटी कम अभी बनी भाभी चक्कू पर धार तेज कर रही हैं?
"अच्छा, घर आए, थे।पार्टी थी और क्या जानना है अब?"
मेरी तरफ गुस्से से भड़की आंखे रिया की और ऐसे डायलॉग।मैं समझ गई थी अब मेरा कुछ नही हो सकता।ये वो गब्बर है जो कितने आदमी थे भी नही पूछेगी।ऊपर से ये आंटी,इन्हें भी आज ही ये प्रेम दिखाना है।फिर टपक कर बोलीं।
"आज तो निशी को तुमने देखा ही नही।साड़ी में कितनी सुंदर लग रही थी।"
बस यही बाकी था।
रिया ने और ग़ुस्से मे देखते हुए ही कहा "अच्छा साड़ी में।बहुत सही।तब तो मुझे केक खाने बुलाया होगा।क्यों है ना?"
"नहीं रिया अभी"
"क्या अभी?मैं पागल हूँ न?"
मैं अपनी बात रखती और रिया को कुछ बता समझा पाती वो आंटी फिर कूदी बीच में।लेकिन इस बार मेरे भले के लिए।
"मैं चाय लाती हूँ।कुछ खाओगी तुम दोनों?"
"न नहीं।" दोनो ने एक साथ ही कहा। आंटी चली गईं अंदर।
"मैं अभी सब बताती हूँ।सब बताने ही तो बुलाया है।फोन पर क्या बताती?"
"रहने दो।अब क्या बताओगी?"
"रिया भाव मत खा, मोटी हो जाएगी।"
"तू टेंशन न ले,मैं मोटी नहीं होऊँगी।"
"घर चलकर सब बताती हूँ।"
आंटी आ गईं।हम सबने चाय पी बिस्किट नमकीन भी ली और फिर रूम पर आ गए।
पहुचते ही मैंने रिया को जोर से पकड़ लिया और आंसू बहने लगे।
"क्या हुआ निशी?वो अभ्युदय जी ने कुछ गलत? या किसी ने कुछ कहा?"
मैं कुछ बोल नही पा रही थी।अब तक शांत कैसे थी नही जानती।रिया बहुत असमंजस में थी क्या करे,क्या नही?
"चुप होगी? या जाऊँ मैं?"
"हम्म.. हो गई चुप।" मेरा सिसकना बन्द हो गया था। लेकिन आंसू अबभी लगातार गिर रहे थे।
"निशी क्या हुआ? बता न पागल? मैं हूँ न?"
रिया की बेचैनी बढ़ती जा रही थी क्या हुआ आखिर जो निशी का ये हाल हो गया है।