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अधूरी ख़्वाहिश

"निशी, अब हम जा रहे हैं।"

"रिया , मैं नही जा रही हूँ।"

हम दोनों के झगड़े में पंकज महाशय कूदे।

"रिया मत कर ना उसे परेशान।क्यों तू रियेक्ट कर रही है।तुझे पता है न निशी ने गलती से,,,,। "

"तू दूर हट पंकज।तुझे मना किया था कि हम दोनों है, तो ये सब मत लेकर आना। पर तुम सब लड़के हरामी ही होते हो।"

"रिया गाली मत दे।मैंने कुछ भी नहीं किया।मैं खुद भी नहीं जानता था कि ये लोग मेरे मना करने के बाद भी प्लान बना लेंगे।"

"तू रहने दे बस।जा यंहा से अभी।"

"नहीं।तू और निशी चल मैं होस्टल छोड़ देता हूँ।"

"उसको देख पहले।पागलों वाली हरकते तो खत्म हो उसकी।"

ये इशारा मेरी तरफ था जो पंकज के दोस्तो के साथ नए-नए पंगे ले रही थी।

"सॉरी यार रिया।यकीन कर मैं नही जानता था।"

"पंकज सुन।आज अगर निशी को कुछ भी हुआ तो तूने जितना सुना है न मेरे बारे में,मुझसे ही। उससे भी बुरी हूँ मैं।"

"क्यों डरा रही है यार। ठाकुर मैं भी हूँ। डरता नहीं किसी से, पर तू तो मतलब पंडित होकर राजपूत हो रखी है।"

"बेड़ा गरक।तू भी?"

"क्या तू भी?"

"तू भी ठाकुर है?मतलब कोई पंकज, सिंह..?"

"हाँ मैं पंकज सिंह तोमर।क्यों क्या हुआ?"

"हे प्रभु! एक मैं ही पंडित मिली थी तुम्हें इन ठाकुरों के बीच फ़साने को?"

"तुमने कभी पूछा नहीं।मैंने भी बताया नहीं।"

"दिखने में कश्मीरी पंडित दिखते हो न, इसलिए नहीं पूछा।पर पूछना चाहिए था यार।"

"रिया तुझे क्या हुआ?क्यों ऐसे बिहेव कर रही है जैसे तूने भी पी रखी हो?"

"नहीं मैं क्यों?पीने का ठेका तो तुम ठाकुरों ने ले रखा है ना? एक वो हैं मैडम निशी सिंह चौहान।आदर्शों पर जीने वाली,आज देखो आदर्श गए तेल लेने पंजे लड़ा रही हैं।"

"निशी भी राजपूत,मेरा मतलब ठाकुर है?"

"हाँ पंकज सिंह तोमर।वो जो उस दिन अभ्युदय जी थे वो भी ठाकुर ही हैं।तभी मैंने भगवान से पूछा कि मैं ही क्यों?"

"तू तो चाणक्य हुई हमारी।"

"बकवास बन्द कर और उसपर नजर रख।मैं फोन पर बात करके आई।"

पंकज अब निशी के पास पहुच चुका था।अब पंकज और निशी आपस मे पंजा लड़ा रहे थे लड़कियां निशी-निशी चिल्ला रही थीं और लड़के पंकज-पंकज।

ये अच्छा तरीका था शायद जो पंकज ने अपनाया था निशी के इर्द-गिर्द रहकर उसका ध्यान रखने का।

रिया बात करके आ चुकी थी।

आकर उसने सभी को बाय कहा और पंकज से मेरा एक हाथ पकडने का कहकर एक हाथ खुद पकड़ लिया।

हम नीचे आ गए और बाहर तक आने में मैंने शोर मचा लिया कि ये दोनों मुझे जबरजस्ती यंहा से भेज रहे हैं। सामने ही गाड़ी खड़ी थी अभ्युदय जी गाड़ी से उतर आए।

"रिया देख।अभ्यु है न ये?ये क्यों आये है?"

"निशी चुपचाप चल।"

हम तीनों गाड़ी के पास आ गए।अभ्युदय जी की आंखे गुस्से से लाल हो रखी थीं।चेहरे पर भी इतना गुस्सा मैंने तो कभी नही देखा था,पर नशे में होने की वजह से वो गुस्से में भी क्यूट ही लग रहे थे।

"आप क्यूट लग रहे हैं अभ्यु।"

"गाड़ी में बैठो निशी।"

"हाँ। गाड़ी में बैठेगी निशी।" मैं गाड़ी में रिया की मदद से बैठ चुकी थी।दरवाजा बंद था अंदर मेरी बड़-बड़ शुरू ही थी।

अभ्युदय जी ने पास खड़े पंकज को उन्होंने एक झापड़ लगा दिया।

पंकज ने कुछ भी नहीं कहा।पर मुझसे चुप नही रहा गया। मैं गाड़ी से उतरी और बरस पड़ी।

"अभ्यु दिस इस रॉंग।से सॉरी टू हिम एंड फ़ॉर योर काइंड इन्फॉर्मेशन इट्स हिज बर्थडे टुडे। हाऊ यू कैन बी सो रूड टू एवरीबॉडी? से सॉरी और आई एम नॉट गोइंग विथ यू।"

मैंने कब पंकज का हाथ कसकर पकड़ लिया और इतना कुछ कह गई पता नहीं पर जो याद है वो इतना कि पलट कर एक उल्टी की और बेहोश हो गई थी।

जब होश आया तब अभ्युदय जी के घर पर थी कब शाम हुई नही याद कभी सुबह नही याद।लेकिन कब उठी तब रिया भी साथ ही थी।

"मेरा बर्थडे?"कुछ भी नही याद कि क्या हुआ क्या नही।मेरा बर्थडे पूरा का पूरा निकल गया ऐसे ही।बिना पार्टी, बिना मस्ती।दर्द से सिर फट रहा था।मैंने अपना सिर पकड़ा और बीते कल के बारे में सोचने की कोशिश करने लगी।

मेरा फोन कंहा है?यंहा वंहा ढूंढने पर फोन मिल गया।कपड़े भी ऐसा लगता है आंटी के ही पहने हैं मैंने।पर कब?

"रिया उठ।"

"क्या है?सोने दे मुझे।"

"उठ ना। हम यंहा क्या कर रहे हैं?"

"वेरी सिली क़ुउसशन। हम सो रहे हैं।"

"बकबास बन्द कर।हम यंहा क्यों है?कल क्या हुआ?मेरा बर्थडे कब खत्म हो गया?"

"सोने दे यार प्लीज।"

"ये कपड़े किसके हैं?कल पंकज की पार्टी में मैंने? म..मैंने शराब ??" मेरी आँखों से बड़े-बड़े आंसू टपक रहे थे।ये क्या हो गया था।

बहुत देर रोने के बाद भी जब रिया नही उठी तो मैं कमरे से बाहर निकली।सामने ही छत थी।एक छोटा सा टेरेस,जिस पर हरे रंग की आर्टिफीसियल घास बिछी थी। एक आराम कुर्सी और एक टेबल भी पड़ी थी। एक तरफ झूला लगा था और एक तरफ एक पेड़ नकली था शायद।

मैं आकर आराम कुर्सी पर बैठ गई।धूप अच्छी लग रही थी सुबह की।मैंने नीचे देखा तो अभ्युदय जी नीचे गार्डन में बैठकर चाय पी रहे थे और पेपर भी पढ़ रहे थे।

"कितने खड़ूस हैं।नाराज भी इतना होते हैं और प्यार जताना तो आता ही नहीं।अब देखो जनाब को।हुह खड़ूस।"

बिना सोचे ही बोलती जा रही थी और पीछे से आवाज़ आई।

"ऐसा ही है मेरा अभ्यु।"

"शिट सॉरी आंटी।आपको देखा नहीं।"

"अच्छा हुआ न नही देखा वरना जानने नही मिलता कि क्या सोचती हो तुम?"

"सॉरी।"मैंने अपनी आंखें नीचे झुका लीं।

"हैप्पी बर्थडे बेटा।कल तुम्हारी तबियत ठीक नही थी।ऐसे मैं तुम्हें न भेजने का फैसला मेरा ही था।रिया तुम्हें अपने घर ले जाना चाहती थी पर उसे भी अपनी लैंडलॉर्ड कप जवाब देंना पड़ता।इसलिए ही मैंने तुम दोनों को यंही रोक लिया।"

"थैंक्यू आंटी।"

"ये अभ्यु का ही कमरा है निशी।"

मैंने अब कमरे की तरफ ध्यान दिया।बिल्कुल सफेद कमरा।दीवारों से लेकर कबर्ड तक सब सफेद।

ऐसा भी क्या पागलपन सफेद रंग के लिए।गुलदस्ता,फूल,तस्वीरें भी ब्लैक एंड व्हाइट।

अजीब हैं ये भी मन में सोचते हुए अभ्युदय जी पर नजर गई तो उनकी नज़र मुझ पर थी। एक अजीब सा अहसास हुआ।क्या था ये?

प्यार?

अपनापन?

इज्जत का और बढ़ जाना?

या कुछ ऐसा जो कहने या सुनने या समझने से भी ऊपर होता है।

प्यार से भी ऊपर कुछ होता है क्या?

शायद पूजा

लेकिन अभ्युदय अचानक से भगवान से पूज्यनीय क्यों हो गए?
 
मेरा जन्मदिन ऐसे ही निकल गया, सोचकर मुझे बुरा लग रहा था।लेकिन अभी-अभी मन में जिस भगवान की मूरत बसी थी उसे अपने सामने देख कर अच्छा लग रहा था।

"क्या सोच रही हो निशी?"

"कुछ नहीं आंटी जी।बस यूँही एक ख्याल आया कि रिश्ता क्या है हमारा?"

"रिश्ते जोड़ने वाला वो भगवान होता है निशी।तुम या हम कुछ नही कर सकते इसके लिए।लेकिन एक बात पूछना चाहती हूँ तुमसे?"

अब ये क्या पूछना चाहती हैं?कंही इन्हें ऐसा तो नही लगता कि मेरे और अभ्युदय जी के बीच कुछ है?हे प्रभु बचा लो।दिमाग में खुद से बातें करने से दिमाग हटाया और मैंने कहा।

"क्या आंटी जी?पूछिये न?" प्लीज-प्लीज ये नहीं के क्या तुम भी अभ्यु को प्यार,या चाहती टाइप का कुछ प्लीज भगवान जी।प्लीज4

मैंने अपनी आंखें बंद कर रही थीं।

"क्या हुआ?तुम क्या बड़बड़ा रही हो? अभी भी नशा है क्या?"

"नशा? ननहीं आंटी जी।"

"तुम्हें नशे की आदत तो नहीं है न?यही पूछना चाहती थी।"

"नहीं आंटी जी।ममैं बिल्कुल भी नही।कल पहली बार4 वो भी अनजाने में.. मैं ऐसी लड़की नहीं हूँ। सच मानिए।"

मेरे आंसू बह निकले थे ये कहते वक्त।आंटी ने आंसू पोछ ते हुए कहा "कोकिला अच्छी जगह नही है।अभ्यु डर गया था तुम्हारे लिए।वंहा के बहुत से केसेस सुनने में आ चुके हैं।"

"केसेस? कैसे केसेस आंटी?"

"वंहा ssw जाती हैं।"

Ssw से हम भली भांति परिचित थे।वो रैगिंग में एक प्रश्न ये भी होता था।ssw का फुलफोर्म बताओ। जवाब न आने पर कहा जाता था दूर किसी सीनियर को दिखा कर की जाओ उनसे पूछ कर आओ।

पहुच भी गए थे एक सर के पास।आंखे और सिर नीची कर के पूछ ही लिया था "सर आपसे ssw का फुलफोर्म पूछने को कहा गया है।"

जवाब भी मिला था।

" बता तो दूंगा पर कभी कोई मिले तो भेज देना मेरे पास। सोशल सेक्स वर्कर।"

बस तब से ही इस ssw से परिचित थे।मेडिकल में बहुत आम सी बात होती थी ऐसी बातें या ऐसी रैगिंग।

"आंटी जी हमें नही पता था, वो तो पंकज का भी जन्मदिन था तो रिया ने कहा और चल दिये।ये सोचकर कि नया ही तो खुला है।"

"रिया से तो बात हो गई हिऐं अभ्यु की, लेकिन तुमसे नाराज है अब भी।"

"मेरा जन्मदिन खराब हुआ उसकी किसी को कोई चिंता नही पर उनका नाराज होना जरूरी है।हुह आये बड़े लाड साहब।खड़ूस एक नम्बर के।"

"हा हा बात तो सही कही तुमने निशी।"

"ओह शिट। सॉरी आंटी जी। व वो4 "

"अब कोई फायदा नहीं सब सुन लिया है मैंने।"

"लेकिन आपने ही तो कहा कि बात सही कही।प्लीज आप नाराज तो नहीं हैं न?"

"नहीं।बिल्कुल नही। आओ नीचे अब।वो कपड़े रखें हैं नहा कर पहन लो और नीचे आओ जल्दी।"

"जी आंटी जी।"

आंटी चली गईं।मैं आकर बैठकर अभ्युदय जी के कमरे को फिर से देखने लगी दीवारों पर लगी एक पेंटिंग पर अभिमन्यु लिखा था।जिसमें दो लड़कों की शक्लों सा ही कुछ बना था।

"कुछ भी कहो, बेहद ही बेकार सकेच है।जिसने भी बनाया।"

रिया नींद से जाग चुकी थी।

"बस कर।अभिदा ने बनाया है।"

"तुझे बड़ा पता है।क्या पता तेरे अभ्यु ने बनाया हो?"

"मेरे अभ्यु?क्या मतलब है तेरा?"

"क्यों कल तो बड़ा मेरे अभ्यु,मेरे अभ्यु कर रही थी।उनकी गोद में ही पली-बढ़ी हो जैसे?"

"मतलब? क्या बकवास कर रही है?"

"निशी मैडम।आप चिपकी हुई थीं अभ्युदय जी से।मेरे हैं अभ्यु और किसी के नहीं बोल-बोल कर।"

"क्या?और क्या हरकतें की हैं मैंने?अभी बता दे यार।" अपने सिर पर हाथ रख बैठ गई मैं।

"कभी उनके हाथों पर किस,कभी गालो पर।एक बार तो लिप पर भी पहुँच गई थी पर अभ्युदय जी बड़े नेक इंसान हैं।"

"मतलब?मैंने ऐसा किया?"

मैं रोने की कगार पर ही थी कि अभ्युदय जी अंदर आ गए।

"आगे मैं बताऊँ?"

मैं अब चुप रह पाती मुमकिन ही नही था। जोर-जोर से रोने लगी और जाकर अभ्युदय जी के गले लग गई।

"मुझे माफ़ कर दीजिए।मुझे नही पता था कोकिला के बारे में कुछ भी।मुझे नही पता कि कैसे मैंने वो शराब पी ली।कैसे ये सब हरकत कर गई।माफ कर दीजिए प्लीज।"

"निशी पागल हो गई है क्या? म मैं तो" रिया चुप हो गई।अभ्युदय जी ने चुप रहने का इशारा कर दिया था उसे।

मैं अब भी बड़-बड़ा ही रही थी।

"मैं आइंदा कभी आपसे बिना पूछे कंही नही जाऊंगी।रियली सॉरी।"

"आह्हा इससे अच्छी माफी आजतक कभी किसी ने नही मांगी।"

मैं चेतना में वापिस आई और दूर हट कर खड़ी हो गई।

"अरे!क्या हुआ?कल तो किस पर किस कर रही थीं आज दूर कर दिया एक झटके में?"

मैं फिर रोने लगी पर इस बार बेड पर बैठकर गले लगकर नहीं।

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"निशी बस कर।अभ्युदय जी मज़ाक कर रहे हैं ओ और मैंने भी किया।तूने कुछ भी नही किया ऐसा वैसा।"

"मतलब" तुरन्त ही अपने आंसू पोछकर गुस्से में दोनों की तरफ देखक कहा मैंने।

"निशी, कहा था न जरूरत से ज्यादा अच्छी लड़की हो।जब पी ही ली थी तो चिल मारना था लेकिन नही।"

"नहीं मतलब? कोई सच-सच बताएगा मैंने किया क्या?"

"तू कल बहुत रोइ।"

"हाँ अब एक और झूठ है न रिया?"

"नहीं निशी।अब सच बोल रहि हूँ।बहुत रोइ है तू कल।आंखे देख अपनी।"

आईने में देखा तो वाकई आंखे तो सूजी हुई थीं।

"क्या किया मैंने?बता दो न यार।"

"सुनो फिर- अभ्युदय जी ने पंकज को एक झापड़ मार दिया था।कोकिला के बारे में।पंकज भी नही जानता था।तुमने आकर अभ्युदय जी को बहुत बातें कहीं।खड़ूस है, किसी के जन्मदिन पर ऐसा नही करते,वैसा नही करते।जब बोलकर भी मन नही भरा तो बैठ कर रोने लगी। ऐसे कौन बोलता है जन्मदिन पर की मैं नही जानता तुम्हे अब आने की जरूरत नही।क्यों और कैसे ले लूं गिफ्ट्स आपसे?कल को आप कहने लगे कि शादी करो मुझसे घर वाले नही माने तो आप ही कह दोगे कि कैसी लड़की थी, पैसे खर्च कराने में एक नम्बर पर शादी किसी और से।"

"हे प्रभु।ये सब मैंने कहा?" मैं फिर अपने सिर पर हाथ रख बैठ गई।

"बस यही नहीं और भी बहुत कुछ कि पापा ने कितने विश्वास के साथ पढ़ने भेजा है ऐसे में मैं कुछ भी ऐसा नही कर सकती कि उनको कुछ भी सुनने का मौका भी आए।ताऊ जी को तो बस मौका ही चाहिए पापा को ताना मारने का।"

"ये सब भी कहा?"

"जी मैडम, ये सब और.."

"और अब रहने दे।समझ गई सब दिल मे जो भी फंसा था कह गई शायद।"

"हाँ वो भी गंगा,जमुना सरस्वती बहा-बहा कर। हमारी नर्मदा जी मे बस बाढ़ आने ही वाली थी।"

"बस कर रिया।"

"क्यों? रिया बोलो और बताओ इन्हें कि क्या वो हरकत सही थी?जो ये तिलवारा से कूद कर मर जाना चाहती थीं।" अभ्युदय जी ने गुस्से से कहा।

"क्या? म मैं मरने के लिए? नही ये नही हो सकता।मैं कुछ भी करूँ,कितना भी रो लूं पर इतनी बुजदिल नही कि मरने की बातें करूँ।ये गलत कह रहे हैं आप अभ्युदय जी।"

"चलो तुम्हें कुछ तो पता है खुद के बारे में।अब आ जाओ वरना केक सड़ जाएगा।हम सभी इंतजार कर सकते हैं वो नहीं।"

अभ्युदय जी चले गए।रिया भी उठकर चली गई नहाने।मैं पास रखे कपड़ों को उठाकर देखने लगी। सफेद रंग के कुर्ते पर बटिक प्रिंट हल्के आसमानी रंग का।नीली ही सलवार और सफेद नीला दुप्पटा।जैसे नीले आकाश में सफेद बादल बह रहे हों।

पास ही रखे एक और इयरिंग जिसमें एक ब्लू स्टोन और एक वाइट स्टोन से बहुत सुंदर 8 बना था।गले का पेन्डेन्ट भी सैम ही था।

स्टोन वाली बिंदी का पैकेट,काजल और लाइट पिंक लिपस्टिक। "इतना भी कोई किसी का कैसे ख्याल रख सकता है?" खुद से ही बोल पड़ी मैं।

रिया आ गई थी।

"निशी, तू बहुत लकी है।ये सब आंटी जी लेकर आई हैं तेरे लिए।तू तो आकर सो गई थी पर सारी शाम मेरी वाट लगी है कल।"

"मतलब?"

"अरे मतलब अभ्युदय जी तो तुम्हें निहारने को तुम्हारे ही पास रुक गए लेकिन आंटी मुझे ले गईं।निशी के लिए ये,निशी के लिए वो।मेरी पसन्द का कुछ भी नही है वरना तू"

"हाँ जानती हूँ।वरना इतना सुंदर सोबर नही बल्कि सब झंटेक ही होता।"

"जहर बोलो मैडम, झँटेक नही।"

"हाँ वही जहर।लेकिन यार वो पंकज?"

"वो भी आता ही होगा।अभ्युदय जी से माफी मांगने और तुझसे भी।"

"तूने दिया एड्रेस?"

"रो रहा था बे।तेरे लिए गिफ्ट भी ला रहा था तो मैंने बता दिया।"

"रिया sss कब सुधरेगी तू? गिफ्ट,गिफ्ट बस एक ही जगह अटक जाती है न तेरी सुई?"

"निशी नहा जाकर।केक सड़ जाएगा।जा भग।"

"बचेगी नही तू।सुनना तो तुझे पड़ेगा।किस चीज़ की कमी है तुझे जो लोगों से गिफ्ट चाहिए होते हैं तुझे?"

"छोड़ न यार।नहा जाकर।"

"रिया सुन कोई भी अगर गिफ्ट दे रहा है तो बदले में वो भी कुछ चाहेगा ही। इसलिए समझाती हूँ हर किसी से गिफ्ट मत ले लिया कर।"

"जा गुरु माता जा।नहा कर आ फिर प्रवचन देना।"

मैं कपड़े उठा कर आ गई।नहा कर तैयार हुई और भगवान को सॉरी कहा।लेकिन ये कमरा तो अभ्युदय जी का है यंहा भगवान तो होंगे ही नही।मैं और रिया नीचे आ गई।
 
पूजा के कमरे में जाकर मैंने हाथ जोड़े और भगवान से फिर सॉरी कहा।कुमकुम उठा कर अपनी बिंदी के नीचे लगा लिया।दीपक जलाने का समय तो नही था पर दीपक बना रखा देख रोक नही पाई खुद को और जला दिया।

"नमो-नमो अम्बे दुःख हरनी,

नमो-नमो अम्बे सुख करनी5 "

आंख बंद कर दुर्गा चालीसा का पाठ शुरू किया ही था कि सभी एक-एक कर उसी कमरे में आ गए।चालीसा खत्म करके राम स्तुति श्री रामचन्द्र कृपालु भज मन जैसे ही शुरू की तालियों की आवाज सुनाई पड़ने लगी।

बेचैनी सी बढ़ गई और एक लाइन पर अटक गई मैं।

"मनु जांहि राचेउ,मिलहिं सौ वर" इसी लाइन को कम से कम 3 बार दोहराया और तभी पीछे से दादा जी की आवाज आई

"सहज सुंदर सांवरो, करुणा निधान सुजान सीलू,सनेहु जानत रावरो।"

इसके बाद मैं ने और दादा जी ने मिलकर स्तुति पूरी कर दी।

आंटी जी ने आकर थाली से कुमकुम लेकर मुझे लगाया और भोग में से कुछ मिश्री के दाने मेरे मुँह में डाल दिये।

दादा जी ने आकर पास रखे फूल से कुछ पंखुड़िया तोड़ी मेरे सिर पर रखीं और हाथ मे हजार-हजार के दो नोट थमा गए।

"दादा जी नहीं।"

"आशीर्वाद है बेटा।मना नही करते।"

"पर दादा जी।"

"पर क्या बेटा?रख लो और आज पैर छुओ।"

"जी? जी दादा जी।।"कहकर मैं झुकी तो दादा जी ने रोकते हुए कहा।

"क्योंकि 2000 रुपये तुम्हारे हाथ में थे इसलिए तुम्हे मेरी बात माननी पड़ी या वाकई तुम मेरे पैर छूना चाहती थीं?"

"झुठ बोल नही पाती हूँ दादा जी।मेरा मानना है कि पैर छूने में कोई बुराई नही बड़ो के पर अभी मैं शायद पैसों के बोझ तले दबे कर झुकी थी।"

"मैं समझ गया था।तुम्हें समझने लगा हूँ।तुम बहुत ही नेक दिल और सच्ची बच्ची हो।"

"ये और सच्ची बच्ची दादू? आपका चश्मा बदलवाना पड़ेगा।"

"क्यों अभ्यु नेक दिल ही तो है।साफ कहती है झूठ नही बोलती और क्या चाहिए तुझे?"

"दादू कल की हरकतें आप नही जानते?"

"मैं जितना भी जानता हूँ न बेटा, उसके तजुर्बे से कह सकता हूँ। तू ढूंढ के दिखा दे इससे बेहतर कोई।चिराग लेकर भी ढूंढेगा तब भी नही।"

"बस भी करिए दादू।"

"डिंग डाँग।"

"अब कौन आया?"

आंटी बीच बातों से ही बाहर आ, गईं।
 
"पंकज ही होगा।" रिया पूरे विश्वास के साथ बोली। पर रिया गलत थी क्योंकि अभ्युदय जी की मासी और वही दोनो शैतान आई हुई थीं।

"हैप्पी बर्थडे बेटा जी।"

"नमस्ते मासी जी। थैंक्यू।"

"हैप्पी बर्थडे भाभी"

"भाभी?? क्यों?"

"सॉरी निशी डॉक्टर मैडम।"जिया चिया ने अपनी बातों को घुमाने की भरपूर कोशिश की। पर मैं खुद भी इस बात को खींचने के मूड में नहीं थी तो दुबारा पूछा ही नहीं।

अब हम सब डाइनिंग पर आ गए थे।

"निशी बहुत प्यारी लग रही हो।"मासी ने बहुत प्यार से गाल पर हाथ रख कर कहा।

"थैंक्यू मासी जी।"

"चलो अब केक काटने का टाइम हो गया।"चिया ने चिल्लाते हुए कहा। पर रिया का ध्यान अब भी घड़ी पर ही था।

"क्या हुआ तुझे?किसका इंतजार कर रही है?"

"तेरे गिफ्ट का यार।"

"अच्छा पंकज का इंतजार है मैडम को? प्यार-व्यार तो नही हो गया न तुझे?"

"चल बे। प्यार तो उसे तुझसे हो गया लगता है कल से निशी-निशी कर रहा है।"

"नहीं ssss ऐसा मत बोल, भगवान के लिए। तेरी काली जबान।हे प्रभु इसे माफ कर देना।"

"तू ज्यादा बन मत।"रिया अब भी अपनी घड़ी पर ही नजर टिका के बैठी थी।

इस बार बेल बजने पर पंकज आ गया था।वाइट शर्ट और ब्लैक ट्राउजर में फर्स्ट ईयर का स्टूडेंट लग रहा था।

अब केक आ गया था बहुत ही सिंपल केक था जिसमें चॉकलेट्स ही चॉकलेट्स दिख रही थीं।चिया-जिया को तो जन्नत दिख रहा था केक में।

"आओ मेरे साथ केक काटो।" दोनों अपनी माँ की तरफ देखने लगीं।मासी ने जब सिर हिला कर हामी भर दी तब दौड़ कर मेरे पास आ गईं।केक कटा सबने खाया और मासी आंटी ने मुझे एक बार फिर कुमकुम लगा कर आशीर्वाद दिया।

जिया-चिया अपने हाथ से बना कर कार्ड लाई थीं जिसमें मेरी कुछ पिक्स थीं जो अभ्युदय जी के जन्मदिन पर ली गई थीं।मासी ने नेलपेंट का सेट, एक लिपस्टिक का फूल कलर प्लेट और काजल सटीक दी।मरती क्या न करती लेना ही पड़ा सब।

पंकज ने एक बॉक्स दिया जो पैक्ड था।आंटी अंदर गई और रूम से अंकल को बाहर ले आईं।मैं और रिया अपनी जगह से उठ गए और गुड-मॉर्निंग सर विश किया।

"हैप्पी बर्थडे डॉ. निशी।"

"थैंक्यू सर।"

"दिस इस फ़ॉर यू।एंड वन मोर थिंग,बी ए लिटल मोर रिस्पांसिबल।"

"यस सर।आई एम सॉरी फ़ॉर यस्टरडे।"

"एन्जॉय पार्टी।डोंट बी अपसेट।इट्स योर डे।"

"यस सर।थैंक्स अगेन।"

सर ने भी एक पैकेट लाकर पकड़ा दिया था पैकेट पूरी तरह पैक था।अभ्युदय जी उठे और पास आकर बोले

"बहुत गिफ्ट मिल गए आपको तो डॉ साहिबा। अब हमारी बारी है।"

"मैं अब कुछ नहीं ले सकती अभ्युदय जी।इतना ही बहुत है मेरे लिए।यकीन मानिए ये सबसे बेस्ट बर्थडे है मेरा।"

"मैं जो लाया हूँ उसके लिए अगर तुम मना कर पाई तो नहीं दूंगा।"

"ऐसा क्या लेकर आ गए अब आप?"

"डॉल? आपको कैसे पता कि?ओह आपने वो पीछे लिखी कविता भी पढ़ ली?"

"जी। इतने पढ़े लिखे तो हैं हम।तो नहीं चाहिए न तुम्हे ये?"

"ये तो चाहिए ही चाहिए।"

डॉल को देखकर चिया भी शुरू हो गई।

"दादा मुझे भी।"

"जाओ कमरे में दो और हैं।"

मैं अभ्युदय जी को देख रही थी।कितने सुलझे हुए हैं।जानते हैं गुड़िया देख कर चिया,जिया का मन भी हो जाएगा तो तीन गुड़िया लाये हैं।

चिया अपनी और जिया की गुड़िया ले आई और आते ही बोली

"मेरी गुड़िया का नाम निशी।आपकी गुड़िया का नाम क्या है?"

"मेरी गुड़िया का नाम थोड़ा कठिन है।"

"आप बताइए तो।"

"मेरी गुड़िया ईवाशका है।"

"ये कैसा नाम है?"

"ईवाशका मतलब संध्या आरती।" अभ्युदय जी ने अपनी मासी को बताया।

अब सब खाने में व्यस्त हो गए। आज शर्मिला दीदी ने साउथ इंडियन बनाया था।नारियल की चटनी तो बस क्या ही कहने थे।सब चटकारे ले लेकर खा रहे थे। खाने के बाद अब बातों का सिलसिला शुरू हुआ पर अभ्युदय जी अचानक ही बोले।

"निशी आज कोई गाना सुनाओ।"

"मैं?"

"नही, तू नहीं।तेरे भूत से बात कर रहे हैं।"रिया बीच मे कूदी।अब तक पंकज ने मुझसे कुछ भी नही कहा था।बस गिफ्ट देते समय हैप्पी बर्थडे।उसके बाद तो नजर भी नही मिलाई उसने। लेकिन अभी धीरे से उसने भी कहा "सुनाइये न निशी।"

मैं नही जानती कि सब आज इतनी जिद क्यों कर रहे थे।

"ओके सुनाती हूँ।पर कोई भी हँसेगा नहीं।"

सब एक साथ बोले।

"ठीक है।"

"ऐसा भी एक रंग है4 ओ sss

ऐसा भी एक रंग है.. जो करता है बातें भी..जो दिल इसको पहन लें वो, अपना सा लगता हैतुमको भूल न पाएंगे हम5 ऐसा लगता है।कंही-कंही से हर चेहरा तुम जैसा लगता है।तुमको भूल न पाएंगे हम5 "

सबने जोरों से तालियां बजाना शुरू कर दिया।अभ्युदय जी बहुत ही प्यार से मेरी ही तरफ देख रहे थे।उन्होंने अचानक ही गाना शुरू कर दिया।

"चंदा तुझे ओ ssss देखने को.. निकला करता है

आईना भी ओ sss दीदार को तरसा करता है

इतनी हसीन कोई नही, हुस्न दोनों जंहा का,एक तुझमें सिमट के आया तू मिले, दिल खिले और जीने को क्या चाहिए"

सबके लिए एक सरप्राइज था ये और शायद मेरे लिए एक ऐसा तोहफा जिसे मैं जिंदगी भर कभी नही भूल पाऊंगी।
 
आंटी जी को अचानक ही पैर में बहुत दर्द महसूस हुआ।हम सभी का ध्यान गानों पर से हट गया।प्लास्टर लगे होने के बावजूद आज बहुत देर तक काम भी किया उन्होंने और तो और ऊपर तक सीढ़ियों से आना-जाना भी।

"अब आप बैठ जाइए।उठेंगी नही बिल्कुल भी आप।क्या काम करना है बताइए सब हो जाएगा।"

मैंने गुस्सा दिखाते हुए कहा।

"दीदी ये तो आप पर हुकुम। अरे भगवान ये ही दिन दिखाने के लिए जिंदा रखा है क्या?" मासी को अचानक न जाने क्या सुझा जो ये सब कहने लगीं।

"मासी मेरा वो मतलब नही था।"

"समझ गए हम डॉ साहिबा मतलब आपका।" मासी के इतना बोलने पर सब जोर से हंस पड़े।आंटी भी हंस ही दीं, इतने दर्द में भी।

पार्टी तो खत्म थी पर सभी अब भी कुछ न कुछ मस्ती के मूड में ही थे।पंकज उठा और मेरे पास आकर बोला

"निशी मैं जा रहा हूं।कुछ बात करनी है बाहर तक आओगी?"

"चलो।" मैं पीछे-पीछे चल दी। जाने के पहले एक मिनट रुक कर अभ्युदय जी की तरफ देखा मैंने।उन्होंने जब सिर हिला के हामी भर दी तब मैं आगे बढ़ी।

बाहर गेट पर पहुच कर पंकज मुड़ा।

"निशी मुझे माफ़ कर दो।" पंकज ने मेरा हाथ अपने दोनों हाथों से पकड़ लिया।

"कोई बात नही पंकज।"

"मैं बहुत शर्मिंदा हूँ कल की वजह से।मैं नही जानता था कोकिला के बारे में न ड्रिंक पार्टी के बारे में।लेकिन यकीन मानो मैंने अपने उन सभी दोस्तों का साथ छोड़ दिया है।मैं कभी कुछ ऐसा नही करूँगा कि तुम हर्ट हो।मुझे माफ़ कर सको तो प्लीज एक फोन कर लेना रात तक।वरना मैं कभी भी तुमसे नजरें नहीं मिला पाऊंगा।"

"पंकज इट्स ओके।मैं ठीक हूँ और नाराज भी नही हूँ।"

"ए ब्यूटीफुल,ये सीरियस फेस सूट नही करता तुम्हें।हंसती रहा करो परी लगती हो।"

"पंकज चाहते हो मैं नाराज हो जाऊं?अगर नहीं तो अब जाओ।"

"कॉल करोगी न?"

"नम्बर नही है मेरे पास।"

"रात को काल किया था मैंने विश करने के लिए।"

"मैंने सेव नही किया था ।"

"चलो अब कर लो।"

"फोन अंदर है।"

"निशी..।"

"हम्म.."

"तुम बहुत अच्छी हो।ऐसी ही रहना।मैं काल करूँगा अपना नम्बर सेव कराने के लिए।"

"थैंक्यू पंकज।ठीक है बाय।"

"एक और बात निशी, गिफ्ट की कीमत कभी मत देखा करो।नियत देखा करो।कीमत से दोस्ती और प्यार को नापोगी तो गलती कर जाओगी।"

"तुम्हें भी ज्ञान देना सीखा दिया क्या रिया मैडम ने?"

"हाँ चाणक्य जो है वो।" हम दोनों साथ ही मुस्कुरा दिए।

"मेरा हाथ छोड़ने का क्या लोगे पंकज?"

"ओह मैं भूल ही गया था।सॉरी।बाय काल करूँगा।"

बाय बोलकर मैं अंदर आ गई पर अब अभ्युदय जी का मुंह बना हुआ था।वजह तो नही जानती लेकिन इस तरह नाराज होना उनकी आदत है तो नहीं। पास जाकर पूछना ही सही समझा।लेकिन मासी ने पास बुलाकर आंटी को रूम ले चलने को कह दिया।आंखे अभ्युदय जी पर और जल्दी से आंटी को रूम में पहुचाने के चक्कर में मेरा ही पैर फिसल गया।

मैं बेहोश हो गई।कुछ भी याद नही मुझे।लेकिन जब होश आया तो आंटी के कमरे में मैं लेती हुई थी।

"क्या हुआ मुझे?"

"कुछ नही निशी, तू बेहोश कैसे हो गई?"

"पता नही यार।अचानक ही जैसे आंखों के सामने अंधेरा छा गया और स्लिप भी हुई।"

"तू अपना धयान रख नही रही न?"

"रिया तुझे पता है न?मैं ठीक हूँ।"

"ह्म्म्म।"

अभ्युदय जी को अपने आस-पास न देखकर मेरा मन थोड़ा बेचैन हुआ।

मुझे समझ नही आया कि अचानक मुझे क्या हुआ? अभ्युदय जो भी आ ही गए बाहर से।उनके हाथ मे एक गिलास था।

"लो पियो।"

"क्या है ये अभ्युदय जी?"

"अब एक बार पी ली तो क्या हर बार वही समझोगी?"

"मतलब?"

"इनका मतलब ही खत्म नही होता।पानी है पी लो अच्छा लगेगा।ग्लूकोस भी डाल दिया है।"

मैंने ग्लास लेकर पानी गटक लिया।

"आंटी जी अब कैसी हैं?कंहा हैं?"

"वो ठीक हैं।आराम कर रही हैं।तुम चलोगी अब या आराम करना है?"

"कंहा जाना है अभ्युदय जी?"

रिया हम दोनों की बातों के बीच आई और बोली।

"मैं आप दोनो के साथ नही आ पाऊंगी।"

"लेकिन हम जा कंहा रहे हैं?"

"अभ्युदय जी तुझे मंदिर लेकर जा रहे हैं।"

"चलना रिया।उस दिन भी नही गई।"

"समझा करो कभी-कभी।अभी कितने दिन हुए हैं?"

"मत जा भग।"

"ओके भाग ही रही हूं अब।बाय अभ्युदय जी।"

रिया अपनी गाड़ी से चली गई।मेरे जन्मदिन को साथ मनाने कहा था और वही पूरा कर रहे हैं।

"अभ्युदय जी हम त्रिपुर सुंदरी जाएंगे?"

"नहीं आज एक नया मंदिर दिखाता हूँ। तुम्हें अच्छा लगेगा।"

"पाट बाबा?"

"नहीं निशी।चलोगी?"

"हाँ चलिए।"

हमारी गाड़ी भेड़ाघाट की तरफ चल दी।

"यंहा कौन सा मंदिर है?आप त्रिपुर सुंदरी ही लेकर जा रहे हैं न?"

"नही बाबा।शांत रहो ना।अभी चल ही तो रहे हैं।"

"हम्म पर यंहा औऱ कोई मंदिर नही है न?"

"शांत हो जाओ गदाधारी भीम।"

"मुझे भुट्टा खाना है।"

अभ्युदय जी ने ड्राइवर भैया को पैसे दिए और भुट्टा लाने कहा।वो चले गए।अभ्युदय जी पीछे मुड़े और बोले।

"तबियत ठीक हो गई है अब?"

"मुझे क्या हुआ था?मैं तो ठीक ही थी न जाने कैसे गिर गई।"

"निशी।"

"जी।"

"अपना हाथ दो।"

"क्यों?हाथ क्यों?"

"थोड़ी देर पकड़ कर बैठना चाहता हूँ।"

"ये क्या बात हुई? नहीं ऐसे ही बैठे रहिए।मैं नहीं बैठूंगी हाथ पकड़ के।"

"तुम मुझसे प्यार नही करती हो न?"

मैं इस प्रह्न के लिए बिल्कुल भी तैयार नही थी।

"क्या? क क्या मतलब?"

"क्या, क्या मतलब?"

"क्या?"

"अरे क्याssss??"

"अभ्युदय जी अब न ज्यादा नौटंकी नही।"

"मैं हाथ पकड़ने कह रहा तो नहीं।पूछा प्यार नही करती हो तो जवाब नही देना है और नौटंकी मैं कर रहा हूँ।"

मुझे हंसी आ रही थी अभ्युदय जी की ऐसी बातों पर।तभी मेरा भुट्टा आ गया।

"एक ही?आप नही खाएंगे अभ्युदय जी?"

"क्यों तुम अकेले ही खा जाओगी क्या?"

"मैं नही शेयर करूँगी बता रही हूं।अपना मंगवा लीजिये अलग।"

"मैं तो इसी में से खाऊंगा।"

गाड़ी चल दी हम भेड़ाघाट की तरफ मुड़ रहे थे।तेवर निकल चुका था।

"हम भेड़ाघाट जा रहे हैं?"

"पहले भुट्टा दो।फिर बताऊंगा।"

"मत बताइये।भुट्टा तो नही दूंगी,पहले ही बोल दिया था ।"

"ठीक है मत दो।" कहकर अभ्युदय जी सीधे होकर बैठ गए।आज पहली दफा था जब अभ्युदय जी तिरछे बैठे थे सामने की सीट पर ताकि मैं दिखती रहूँ बात करते समय पीछे।

गुस्सा होना तो इनसे सीखे कोई।मैंने मन ही मन सोचकर भुट्टा तोड़ा और आगे बढ़ा दिया।

"देखा प्यार तो करती हो तुम।"

"रहने दीजिए आप।मुँह फुला लेते हैं।"

हमारी गाड़ी एक बोर्ड के पास रुक गई।

"चौसंठ योगिनी मन्दिर।" मैंने जोर से पढ़ा और ऊपर जाती सीढ़ियों को देखा।

"देखा है इसे?"

"नहीं अभ्युदय जी।लेकिन सीढ़िया बहुत ज्यादा हैं आप कैसे?"

"हम दोनों में से कोई नही जा रहा है।"

"अरे पर क्यों?"

"क्योंकि ऊपर सुनसान रहता है।यंहा विश्व की इकलौती ऐसी मूर्ति है जिसमें शंकर पार्वती जी नंदी जी पर विराजे हुए हैं।"

"तब तो देखना चाहिए ना? चलिए न?"

"नहीं निशी।जिद नहीं, जब मना किया तो कोई वजह होगी।"

"ओके पर प्रोमिस कीजिये त्रिपुर सुंदरी लेकर चलेंगे?"

"हाँ।प्रोमिस।"

"आप भी चलेंगे अंदर?"

"हाँ ठीक है।"

हमारी गाड़ी आगे बढ़ी और एक दुकान पर जाकर रुक गई।एक भैया दौड़कर गाड़ी के पास आये और एक पार्सल अभ्युदय जी को पकड़ा दिया।

"चलो।"अभ्युदय जी ने ड्राइवर को कहा।

"ये क्या है?"

"कुछ नहीं निशी।"

"दिखाइए जरा।"

"कहा न,कुछ नहीं।तुम्हारे मतलब का तो बिल्कुल भी नही है।"

"आप ड्रग्स लेते हैं?"

"बकवास बातें नहीं।"

"तो क्या है दिखाइए न।" मैंने पीछे से ही बैठकर वो पैकेट छीन लिया।अखबार में लिपटा वो पैकेट अभी भी बंद ही था।

मैंने सलीके से एक किनारे को हटाया।अंदर संगमरमर पर बहुत प्यारी राइटिंग मे निशी लिखा था।

चमकदार लाल रंग का एक मोतियों की माला,इयरिंग्स भी थे।

"ये मेरे लिए?"

"नहीं।मैं 10-12 निशियों को जानता हूँ उनमें से किसी का है।"

"आप भी न,कुछ भी बोलते हैं। थैंक्यू सो मच।"

"खुश रहो बस।"

गाड़ी तेवर के मंदिर के लिए मुड़ गई।
 
"अभ्युदय जी।"

"हम्म।"

"अनार?"

"अभी भी लेकर जाना है?"

"हाँ।"

अभ्युदय जी ने ड्राइवर को कहा और एक फल के ठेले पर हैम वापिस मुड़ कर आये।

"अब ठीक है?"

"जी।" मैं बहुत खुश थी अब।

हम मंदिर पहुँचे।

"चलिए अब।"

आज अभ्युदय जी को भी माँ के दर्शन कराने थे तो बस जिद पकड़ ली मैंने और उन्होंने ज्यादा जिद नही की आ गए। हम दोनों मंदिर के अंदर गए।आज ज्यादा भीड़ नही थी।

पंडित जी अब भी नए ही थे।हम दोनों ने जाकर दर्शन किये।

मैंने पंडित जी से बूढ़े पंडित जी की तबियत के बारे में पूछा।नए पंडित जी ने बताया कि उसी दिन जब मैं मिलकर गई उनकी मृत्यु हो गई।

मैं अपने आप को रोक नही पाई और आंसू बह निकले।

अनार वंही माँ के पास रख दिये और आकार बाहर मंदिर प्रांगण में ही बैठ गई।

"निशी। उदास नही होते।सबको ही एक दिन जाना होता है।"

"जानती हूं।लेकिन दो दिन पहले ही तो मिली थी।"

"उदास मत हो।"

"अपने बेटे को याद करते रहे गए।उस दिन भी दुःखी थे।मैं जब भी आती थी हमारी बहुत बातें होती थीं।मुझे हमेशा कहते थे दिल के बजाय दिमाग की सुनो।दिल कमजोर करता है पर दिमाग ही सब ठीक करता है।" मेरी आँखों से आंसू लगातार निकल रहे थे।चाहते हुए भी रोक नही पा रही थी मैं।

"निशी, मैं गाड़ी में जा रहा हूँ।तुम्हारा रोना बन्द करो।तब मैं जाऊं।"

मैंने अभ्युदय जी का हाथ पकड़ लिया।मुझे बहुत डर लगता है अभ्युदय जी।किसी अपने के दूर जाने से।"

"मैं बाहर जा रहा हूँ गाड़ी में दूर नहीं।पागल लड़की।"

"नहीं अभी थोड़ी देर बस और प्लीज।"

"ठीक है बैठते हैं।"

मैं चुप थी पर आँखे अब भी बहना बंद नही हो रही थीं।मैंने अभ्युदय जी का हाथ अपने हाथों में पकड़ लिया,जिसे वो अभी हिला भी नही पाते थे।

"क्यों होता है ऐसा?"

"निशी यही तो जीवन चक्र है न?"

"कभी मैं आपको छोड़ गई तो आपको भी ऐसा ही फील होगा?"

"तुम अपनी तुलना उन पंडित जी से कर रही हो जिनसे तुम सिर्फ मंदिर में आकर मिलती थीं।तुम मेरे लिए क्या हो तुम भी नही जानती।"

"आज बता दीजिए क्या हूँ।"

"नहीं बताने जैसा कुछ है नही।"

"क्यों?"

"क्योंकि ये महसूस करोगी तो समझ जाओगी।मुझे बताने की जरूरत नहीं कि तुम क्या हो,कितनी जरूरी हो या तुम मेरी क्या हो।"

"अभ्युदय जी।"

"हम्म कहो।"

"मेरी आँखों मे देखकर एक बार निशी कहिए।"

"तुम पागल हो।चलो अब।"

ये मुस्कान।उफ्फ पहले ही दिल खोया हुआ है इस मुस्कुराहट पर कुछ कुर्बान करने के लिए कुछ बाकी ही नही है।जिंदगी कुर्बान कर दूं मैं तो इस मुस्कान पर।

लेकिन अभ्युदय जी ने निशी क्यों नही कहा?शायद आंखों में देखते ही निशी मैं भी तुमसे प्यार करता हूँ कह देते इसलिए। या कुछ और? मेरा दिमाग घूमता रहा इसी बात पर। हम त्रिपुर सुंदरी मंदिर से निकल कर आ गए।बगलामुखी माँ के दर्शन मैं अकेले ही करके आई।क्योंकि सीढ़िया चढ़ने का मन नही था अभ्युदय जी का।

घर लौटने का मन नही था अभी।कैसे बहाने से इन्हें और देर अपने साथ रोका जा सकता है?सोच निशी सोच।

दिमाग में खुद से ही बातें करते हुए प्लान बनाने में व्यस्त थी कि अभ्युदय जी बोले

"खाना खाने चलोगी?"

"हम्म..नहीं मुझे दीप दान करने हैं।"

"अभी?इस वक्त?"

"हाँ।आपको नही जाना तो मत जाइए मैं तो जाऊंगी।" मैं खुश थी कि अब साथ देर तक रहने मिलेगा।

"चलेंगे पर अभी अंधेरा तो होने दो निशी।"

"आज हम नाव में भी बैठेंगे।अभी चलिए।"

"क्या चल रहा है मैडम जी दिमाग मे?"

"यही के किस तरह आपके साथ ज्यादा देर रहा जाए।"

"क्या कहा?"

"म..मैंने कुछ नहीं।सॉरी।"

मैं भी बहुत मूर्ख हूँ ऐसे ही बिना बोले सब कह गई।क्या सोच रहे होंगे अभ्युदय जी।

अभ्युदय जी ने ड्राइवर को पैसे देकर दो भुट्टे लाने को कहा और फिर तिरछे होकर पीछे की तरफ मुड़ कर बोले।

"निशी।"

"हम्म" मेरी आँखें नीचे झुकी थीं।खुद पर गुस्सा भी था और अजीब सी शर्म भी।

"तुम्हें मेरे साथ समय बिताने के लिए कुछ सोचने की जरूरत नही है। तुम कह सकती हो कि अभी तुम्हें और देर साथ रहना है।"

"वो मेरा मतलब ये नही था।"

"अब भी झूठ?"

"नहीं। मतलब।"

"फिर मतलब?गलती करती हो पर मानना नही है,क्यों?"

मैंने आंखे ऊपर करके अभ्युदय जी की आंखों में आंखे डालकर कहा।

"आपसे दूर जाती हूँ तो बेचैनी सी होती है।दूर जाने का मन नही करता।ऐसा लगता है आप बस मेरे सामने ही रहें।"

"तब तो शादी कर लो मुझसे।"

"क्या?"

अभ्युदय जी ऐसे प्रपोस करेंगे कभी सोचा नही था। ना प्यार न मोहब्बत सीधा शादी कर लो।हद है मतलब।

"हाँ 24 घंटे साथ रहोगी।कंही दूर नही जाना पड़ेगा।"

"मतलब? ये सब आप मेरे लिए कर रहे हैं?"

"नहीं अपने लिए भी।तुम मेरी बीवी बन गईं तो तुम्हें फ़ीस नही देनी पड़ेगी।फ्री की डॉक्टर घर मे ही मिल जाएगी।"

"हाऊ मीन।हुह।"

"लो अब तुम्हारे मतलब की बात करो तो भी नाराज अपने मतलब की तब भी गुस्सा।"

"मतलबी हो आप।हुह।" ड्राइवर भैया आ गए दो भुट्टे लेकर।
 
मुझे अपने किए पर बहुत हंसी आ रही थी।ऐसे कैसे कुछ भी बोल गई मैं? लेकिन क्या सच में शादी करना चाहते हैं अभ्युदय जी मुझसे?या सिर्फ फ़ीस और फ्री की डॉक्टर के लिए? ये बात तो जाननी होगी अब।

हम तिलवारा के छोटे पुल के पास आ चुके थे।

"चलिए।"

"नहीं मैं नही जाता पानी के पास।"

"आपको डर लगता है?"

"हाँ, तुम यही समझ लो।

"चलिए ना अभ्युदय जी।यंहा आकर भी नहीं जाएंगे तो क्या मजा?"

"निशी जिद मत करो।"

"जन्मदिन है न मेरा?"

"कल था।आज 8 जुलाई है याद करो।"

"आप नहीं चलेंगे?"

"नही।"

"मैं हाथ पकड़कर लेकर चलूंगी।आप क्यों डर रहे है? इतनी भी ढलान नही है कि आप को गिर जाने दूंगी मैं।" मैं हर सम्भव कोशिश कर रही थी। अभ्युदय जी को मनाने की पर वो नहीं तैयार थे।शायद वो डर रहे थे नाव पर कैसे चढ़ेंगे या उतरेंगे।

उनका डर बिल्कुल जायज था पर मैं भी डॉ हूँ।मेरे रहते कैसा डर?

"अभ्युदय जी हम नाव पर नही बैठेंगे ओके?"

"अब ठीक बात कही तुमने।चलो।"

, मैंने अभ्युदय जी का हाथ पकड़ा और उतर कर हम दोनों साथ ही तिलवारा पर बहती नर्मदा के पास आकर बैठ गए।

घाट पर बहुत से तख्त रखे थे जिस पर लोग अपनी छोटी दुकान लगाया करते हैं। एक खाली तखत पर हम दोनों बैठ गए और बहती नर्मदा के पानी को देखने लगे।

बहुत देर शांत बैठने के बाद मैंने ही चुप्पी तोड़ते हुए पूछा।

"आप सच में मुझसे शादी करना चाहते हैं?"

"तुम पागल हो न निशी?"

"क्यों?मैं क्यों पागल हूँ?"

"देखो मैं अभी बीमार हूँ और तुम्हारे हिसाब से कभी पूरी तरह ठीक नहीं हो पाऊंगा।तो ऐसे में मैं क्यों चाहूंगा कि तुम मुझसे शादी करो।"

इतनी प्रैक्टिकल बात।लेकिन सबका ये कहना कि प्यार?वो क्या था फिर?अभी झूठ कह रहे हैं अभ्युदय जी या लोगों को कुछ अलग नजर आ रहा है।

"अभ्युदय जी.. आप सच में नही करना चाहते शादी मुझसे?"

"तुम करना चाहती हो क्या? नही ना? मेरे चाहने से कुछ नही होता निशी।जोड़ियां वंहा बनती हैं।"

"आप मानते हैं क्या ऐसा?"

"भगवान को नहीं मानता।पर भगवान की बनाई इस दुनिया में ही रहता हूँ।सच कहूं तो भगवान से नाराज़ हूँ।"

"मतलब आप भगवान को मानते तो हैं पर अभी नाराज हैं? और पूछ सकती हूँ क्यों नाराज हैं?"

"मेरे अभिदा को छीन लिया उन्होंने।क्यों?"

अभ्युदय जी के चेहरे पर दर्द था,बहुत गहरा दर्द।शायद यही उदासी थी या गहरा पन उनकी आंखों में जो मैंने स्पाइनल इंज्यूरी सेंटर में देखा था।

"अभ्युदय जी, जो भगवान की मर्जी होती है वो तो होकर ही रहता है न?"

"नही निशी।अगर पापा ने कोई गलती की थी या अभिदा की माँ ने तो सज़ा उन्हें मिलनी चाहिए थी।अभिदा को नहीं।"

"लेकिन सज़ा तो उन्हें भी मिली है न अभ्युदय जी।आप को ऐसे देखना और अभिदा का चले जाना किसी सजा से कम है क्या?"

"मैं नही जानता।लेकिन मुझे क्यों इतना दर्द दिया भगवान ने?मुझे पूरी तरह अपाहिज भी कर देता लेकिन मेरे अभिदा को मेरे पास तो रहने देता।"

अभ्युदय जी की आंखों से आंसू बह रहे थे। आज पहली बार था जब वो अपने दिल की बातें मुझसे कर रहे थे।मैंने जोर से उनका हाथ थाम लिया।

"जानती हो आज जब तुम मंदिर में रो रही थीं तब मुझे लगा कि भगवान की सेवा करने वाले उन पंडित जी को क्या मिला? एक बार भी उनका बेटा नही आया मिलने उनसे।उन्होंने क्या पाप किये होंगे जो वो भी ऐसे तड़प कर चले गए? क्या सबको ही ऐसे मरना होता है दुखी रहकर?"

"नही अभ्युदय जी।ऐसा नही है। उनकी उम्र भी तो हो चुकी थी।"

"लेकिन दर्द?दुख?जो सह कर गए वो? वो भगवान कम नही कर सकता था ना? भगवान है ही नही।वो तो हम इंसानों ने ही पत्थर को टिका पूजा कर के भगवान मान लिया है।"

"आप चुप हो रहे हैं या नही?"

"नहीं।अभी दिल नही भरा, थोड़ा और रोना चाहता हूँ।जानती हो,अभिदा के जाने के बाद आज रोया हूँ।मैं माँ को दुखी नही कर सकता बस इसलिए।"

"आप जब चाहे तब मेरे सामने रो सकते हैं। मैं हमेशा हूँ आपके पास।"

"ओ मैं हूँ ना की शाहरुख़।इतना भी रोतणु नहीं हूँ।"

"चलिए थोड़ा तो मुस्कुराए आप।ये रिया की ट्रिक्स होती कमाल की हैं।"

"ये रिया की ट्रिक्स क्या हैं?"

"ऐसे नहीं बता सकती।वो खुद ही एक नावेल लिखने वाली है,अपनी कलाओं और ट्रिक्स की।तभी पढ़ लीजियेगा आप।"

"तुम दोनों ही पागल हो।"

प्यार से बातें करते बहुत वक्त बीत गया।मेरा फोन बजा तो मैंने अपना हाथ अभ्युदय जी के हाथ से हटाया और फोन देखा।नया नम्बर है।मैंने फोन उठाया।

"हेलो।"

"हेलो ब्यूटीफुल।"

"कौन?"

"पंकज।"

"ओह।हाँ पंकज।ये है तुम्हारा नम्बर सेव कर लूंगी।"

"अभी कंहा हो?हवा की इतनी आवाज़?"

"मैं तिलवारा पर।"

"तिलवारा पर क्यों?"

"दिप दान करने आई थी।"

"अकेले?"

"हम्म हम्म अकेले।क्यों?"

मैं उठकर थोड़ा दूर चली गई।नही चाहती थी कि अभ्युदय जी नाराज हो जाए।

"मैं आ जाता हूँ।अकेले मत आना बहुत अंधेरा हो जाएगा लौटते समय।"

"नहीं मैं बस निकलने ही वाली हूँ।बाद में बात करती हूं।बाय।"

अभ्युदय जी को खुद की तरफ देखता पाकर मैंने फोन रख दिया।फोन में नम्बर सेव किया और पास आकर बैठ गई।

"पंकज?" अभ्युदय जी ने पूछा।

"हम्म।"

"पसन्द करता है तुम्हे।"

"न नहीं।ऐसा क्यों कहा रहे हैं आप?"

"कल झापड़ खाने के बाद भी आ गया।"

"वाह।गलती भी तो की थी।झापड़ तो बनता था।पर आपसे नही मुझसे।"

"अच्छा।कल तो उसकी साइड पर थी तुम।मुझ पर ही बरस पड़ी थीं।"

"माफ़ कर दीजिए न।आपको कुछ महसूस हुआ?"

"बात मत पलटो निशी।"

"अरे नहीं बाबा।सच में पानी की बूंद।फिर से देखिए।" मैंने अपना हाथ आगे करके दिखाया।बारिश शुरू हो गई।

अभ्युदय जी हड़बड़ाने लगे।

"चलो जल्दी।भीग जाएंगे।"

"आप शक्कर के बने हुए हैं या नमक के?"

"क्या?ये क्या कह रही हो?"

"घुल जाएंगे क्या पानी में? बिना मतलब हड़बड़ कर रहे हैं।बैठ जाइए चुप-चाप।"

अभ्युदय जी बिना कुछ बोले बैठ गए।बारिश धीरे-धीरे तेज होने लगी।पर अभ्युदय जी ने एक बार भी जिद नही की वापिस जाने की।बल्कि मैं ही उठ गई।

"चलिए,बहुत तेज हो गई है बारिश।"

"क्यों?अब तुम घुलने से डर रही हो?"

"अरे! मेरी बिल्ली मुझी से म्याऊँ? मैं नहीं मेरा फोन न खराब हो जाए।"

हम धीरे-धीरे गाड़ी के नजदीक आ गए।गाड़ी के पास आकर मैंने अभ्युदय जी को रोका और कहा

"अगर मैं कहूँगी कि मुझसे शादी कर लीजिए तो कर लेंगे?"

"तुम अब तक उसी बात को सोच रही थीं?"

"बताइये न?"

"नहीं निशी।अभी शायद नहीं ही मेरा जवाब है।"

"एक बात कहूँ आपसे?"

"कहो।"

"आप बहुत अच्छे हैं।"

"हाँ ये तो पता है मुझे।कुछ और?"

"मुझे कहना बहुत कुछ है पर हिम्मत नही है।थोड़ी वोदका मिलेगी क्या?"

"थप्पड़ चलेगा?"

"नहीं बिल्कुल भी नही।वो आप पंकज के लिए ही बचा कर रखिए।" हम दोनों हंसते हुए गाड़ी में बैठ गए।

घर आकर मैंने बैग लिया और अभ्युदय जी को घर पहुच कर फोन करने का कह कर अपने रूम पर आ गई।

आकर एक बार फिर नहाई और लोअर टीशर्ट पहन कर बैठ गई।

बारिश में भीगने से सर्दी हो गई लेकिन सुनहरी यादों को संजोने मैंने अपनी डायरी निकाल ली।
 
8 जुलाई

अजीब एहसास होता है

जब तुम करीब होते हो।

कुछ अधूरा सा होता है

जब करीब नही तुम होते हो।

कैसी बैचैनी है ये दिल में

कैसी ये मेरी अब हालत है?

प्यार है तुमसे या नही है

फिर क्यों मेरा दिल यूं पागल है?

आज की वो बारिश तुम संग

कितनी सुहानी,प्यारी थी।

तुम थे कितने करीब मेरे

सारी दुनिया ही आज हमारी थी।

हाथों का स्पर्श ओ

वो प्यार की छुअन।

लबों की मुस्कुराहट ओ

दोनों के अंदर जलती अगन।

न तुमने कहा कुछ

न मैंने कहा।

प्यार है हमारा

अलग सा अनकहा।

"अभ्युदय जी आपके प्यार में एक अच्छी खासी डॉ लड़की कविता भी लिखने लगी।

मेरी पहली प्रेम कविता आपके लिए।कभी हम एक हुए तो आपको सुनाऊँगी जरूर।"

आपकी पागल

निशी

या

निशिअभ्यः

सोनिल

................................

"रात के 11 बीज गए निशी चल सो जा।" खुद को ही बोलकर मैंने डायरी बन्द कर दी।आंखे खोलकर लेटी थी।आज जो भी कुछ हुआ उसे सोचकर मन में उलझन के साथ एक गुदगुदाहट भी थी।

कैसे अभ्युदय जी ने अचानक ही शादी के लिए कह दिया और मन भी कर दिया।उनकी वो मुस्कान अलग सा एहसास जगा देती है।ये अट्रैक्शन तो नहीं हो सकता।बिल्कुल भी नहीं तो क्या यही प्यार है?

पता नहीं क्या है।अचानक फोन बजा।

जरूर अभ्युदय जी का ही होगा।गुड नाईट कहे बिना नींद कंहा आएगी उन्हें।

फोन देखा तो पंकज।

ये क्यों फोन कर रहा है इतनी रात में?

"हेलो।"

"हेलो निशी।तुमने मुझे फोन नही किया?"

"ओह्ह। सॉरी पंकज वो लेट हो गई थी और भींग भी गई थी। आछिsss.."

"तुम्हें तो सर्दी हो गई है।"

"हम्म.. ठीक हो जाऊंगी कल तक।"

"तुमने मुझे माफ़ नही किया ना?"

"नहीं पंकज ऐसी कोई बात नही है।मैं वो भूल गई थी बस।"

"तुम और अभ्युदय जी रिलेशनशिप में हो?"

"मतलब?"

"बस ऐसे ही पूछा।"

"तुम पर्सनल हो रहे हो पंकज?"

"नही निशी मेरा वो मतलब नही था।बल्कि बात ये है कि.."

"हाँ कहो। सुन रही हूँ।शांत क्यों हो गए।"

"निशी, तुम मुझे.. नहीं रहने दो।"

"पंकज क्या हुआ?कैसी बातें कर रहे हो?ठीक से बताओ,क्या हुआ?"

"नही निशी कभी और।सामने ही कहूँगा जो कहना है।बस इतना कहना है कि तुम बहुत अच्छी हो।"

"गुड नाईट पंकज।"

"गुड नाईट ब्यूटीफुल।"

मैंने फोन रख दिया।

तुम मुझे क्या कहना चाहता होगा पंकज?

तुम मुझे पसन्द हो?पता नही अब दिमाग लगाने का भी समय नही है।बहुत समय हो गया।जैसे ही झपकी लगी फिर फोन बज गया।बिना फोन देखे ही उठाया और बोल पड़ी

"अब क्या है?क्यों इतनी रात में बार-बार फोन करना है?क्या कहना है तुम्हें पंकज?"

"निशी।"

ओह ये तो अभ्युदय जी।मेरी आँखें खुल गई।अब मरी मैं।

"जी।"

"पंकज ने फोन किया?"

"हाँ वो अभी आया था उसका फोन। मुझे लगा उसका ही है औरसॉरी।"

"तुम्हारे घर से फोन होता तो?"

"इतनी रात को मेरे घर से फोन नही आता।"

"लेकिन मैं लो आ जाता तो?क्या सोचती माँ?"

"यही की कोई लड़का है पंकज जो मुझे परेशान कर रहा है।"

"क्या वो कर रहा है?"

"नही। वो तो बहुत प्यार से बात करता।ब्यूटीफुल बोलकर।"

"तुम्हें पसन्द है?"

"क्या?उससे बात करना या वो?"

"सो जाओ मैं बाद में बात करता हूँ।"

फोन काट दिया अभ्युदय जी ने।ये जलन है? या अपने प्यार के मुँह से किसी के बारे में न सुन पाने का सा कुछ।पर कुछ तो है वरना अभ्युदय जी कभी भी फोन खुद नही काटते।

मैंने फोन लगाया।

फोन नही उठा।

फिर लगाया।

फिर नही उठा।

एक बार और कर ही लेती हूं सोचकर जैसे ही फोन उठाया फोन आ गया।बिना कुछ सोचे ही मैंने कहा दिया।

"मुझसे शादी करेंगे?"

"बकवास मत करो।"

"मुझे दिख रहा है। आप हंस रहे हैं।"

"अच्छा तो ये जोक है मुझे हंसाने के लिए।"

"ऐसा मत कहिये।अभी आ जाइए शादी कर लेते हैं।"

"पागल हो तुम।"

"आप अब भी मुस्कुरा रहे हैं।"

"पूरी पागल हो।"

"आपको क्या हुआ था? गुस्सा क्यों आया आपको?"

"नहीं।गुस्सा नहीं था निशी।बस खुद को समय दे रहा था।लेकिन झूठ नही कहूँगा सुनकर अच्छा नही लग रहा था बस।इसलिए ही फोन।"

"हम्म.. इसलिए ही फोन काट दिया।है न?"

"सो जाओ।"

"मतलब नहीं करनी न शादी?"

"सो जाओ।"

"सोच लो आप? पंकज से कर लूंगी।"

"बकवास बन्द करके दो जाओ।"

"अभी भी समय है आपके पास।"

"निशी sss.."

"हम्म.. बाय.. लेकिन आप मुस्कुरा रहे हैं न?"

"पागल हो तुम।"

"हाँ हूँ। बाय।"

मैंने फोन रख दिया और सच कहूं मुस्कुराते हुए सो गई।
 
सुबह जाग कर अपनी पूजा पाठ सब निपटा कर कॉलेज के लिए रिया का इंतजार करने लगी।

फोन पर टाइम देखा कि सिर्फ 5 मिनट बचे हैं और ये मैडम अब तक नही आई हैं।

मैंने अपना चेहरा चुनरी से कवर किया रूम लॉक किया और निकल गई पैदल ही।

वो क्या है न मेरी गाड़ी ने अब बिल्कुल ही चलने से मना कर दिया है।

दिखलाने का समय भी नही मिला।आज कॉलेज से आकर पहले अपनी गाड़ी को ही किसी अच्छे अस्पताल में भर्ती कराना है सोच कर मैं निकल गई।रास्ते मे रिया को फोन लगाया।

"हेलो।"

"कंहा है तू?आज कॉलेज नही आना है क्या?"

"कल रात को मैसेज भेजा था पर तुम्हें फुरसत हो तब ना।"

"क्या हुआ?"

"आज पापा आ रहे हैं।"

"फिर से?क्यों?"

"एक और लंगूर का फोटो लेकर।"

"अब हूर को तो लंगूर ही मिलता है।झेल बेटा झेल।"

"कमीनी,चुपचाप आजा।"

"आती हूँ।जरा उन मरीजो को भी तो देख लूं जो दो रोज से तेरी और मेरी जान खाने को बैठे होंगे।नए-नए सवालात उनके मन मे उमड़-घुमड़ रहे होंगे।"

"ओ हीरोइन बकवास बन्द कर, और जल्दी काम निपटा कर आ जाना।वरना"

"वरना क्या करोगी हूर?"

"जान ले लूंगी तेरी।"

"हा हा वो तुम नही कर पाओगी।"

"क्यों?"

"क्योंकि आज तो पापा आ रहे हैं।जान तो आज आपकीं जानी है हूर।"

"बकवास बन्द कर बे।चल फोन रख बाय।"

"बाय।" फोन रखते ही बगल में एक बाइक रुकी।

"हेलो ब्यूटीफुल।"

"पंकज?"

"आओ कॉलेज छोड़ देता हूँ।"

"तुमने मुझे कैसे पहचान लिया? मैंने तो चेहरा भी कवर कर रखा है।"

"मन की आंखे।तुम नही समझोगी निशी।"

"तुम खुद को k2h2 का शाहरुख समझते हो? कुछ कुछ होता है अंजलि तुम नही समझोगी।" डायलॉग मारते हुए पूछा मैंने और हम दोनों ही हंस पड़े।

मैं उसकी बाइक पर बैठ गई।अब तक पंकज ने कोई ऐसी हरकत नही की थी जो बदतमीजी लगे।ब्यूटीफुल बोलता है क्योंकि मैं हूँ सुंदर, अब इस बात पर उसे क्या कहूँ?

"आज हमारी चाणक्य कंहा है?"

"रिया? आज उसका स्वयम्बर होना है।"

"स्वयंवर?"

चौकते हुए पंकज ने कहा।

"अरे डरो नही आज केवल लंगूर दिखाई है।"

"क्या बोल रही हो निशी? स्वयंवर, लंगूर दिखाई?मुझे समझ नही आ रहा।"

"गाड़ी रोको पंकज। यंही उतार दो।समझ जाओगे।समझा देगी हमारी चाणक्य।"

"हम्म ओके।"

"एक बात पूछुं?"

"हाँ पूछो ब्यूटीफुल।"

"तुम्हें रिया पसन्द है न?"

मेरे सवाल पर पंकज चुप हो गया।शायद उसे समझ नही आया कि वो क्या कहे।पर शायद मुझे कुछ गलत समझ आ रहा है तो हड़बड़ा कर बोला।

"निशी मुझे रिया नही तुम पसन्द हो।"

"क्या??क्या मतलब क्या है तुम्हारा?"

"मेरे साथ चलो प्लीज।मुझे तुमसे बात करनी है।मना मत करना प्लीज।"

मैं गुस्से में पलट कर चुपचाप कॉलेज की तरफ बढ़ गई।

"सबका दिमाग खराब हो रखा है।कोई चैन से जीने ही नही देता।" खुद में बड़बड़ाती मैं बिना सोचे-समझे और बिना देखे ही चली जा रही थी।बिना ब्रेक की गाड़ी का जो हश्र होता है वही मेरा हुआ। जी भिड़ गई।

अब मजेदार बात ये है कि भिड़ी तो भिड़ी किससे?

सोचिए। जी बिल्कुल सही hod से।

"सॉरी सर।"

"निशी।आर यू आल राइट?"

"यस सर।"

"देन वेर द हेल इस योर माइंड?"

"आई एम सॉरी सर।आई वास् जस्ट थिंकिंग अबाउट द न्यू पेशेंट शिफ्टेड इन वार्ड 7।"

"ओह।हाऊ कम यू नो अबाउट हिम?"

"सर.. सर.."

"नो वन इस शिफ्टेड टू वार्ड 7।"

"सॉरी सर।" ये रिया तो हर बार बच जाती थी यही बोलकर।मैं ही क्यों फस जाती हूँ।

वाह निशी सर वार्ड 7 से ही निकल रहे हैं कुछ तो अक्ल लगाती।लेकिन लगती कैसे मेरा दिमाग तो घर पर बैठा है हूर बनकर।मेरी चाणक्य मेरी बुद्धि तो थी ही नही साथ, तब तो ये होना ही था।

मैंने चुपचाप सारे वार्डस निपटाए और फोन देखा।रिया के 5 मिस्ड काल।

इसे क्या हुआ सोचकर फोन मिलाया।

"हेलो।"

"क्या हुआ? 5 मिस्डकॉल?"

"अभी के अभी घर आ।" रिया ने धीमी आवाज़ में कहा।

"क्या हुआ बताएगी?मुझे टाइम लगेगा ऑटो से आना पड़ेगा।"

"नीचे पंकज है।वो तुझे घर पहुचा देगा अभी के अभी निकल।" फिर वही फुसफुसाहट करते हुए ही रिया बोली।

"क्या हुआ बताएगी?"

"तू निकली या नहीं?"

"निकल गई बाबा।"

"जल्दी पहुच।" बोलकर रिया ने फोन रख दिया।

मैं बाहर निकली तो पंकज अपनी गाड़ी पर बैठकर मेरा ही इंतजार कर रहा था।

क्या मुसीबत है ये।सोचते हुए चुपचाप जाकर गाड़ी में बैठ गई।

"लेबर चौक।"

"पता है निशी।"

लेकिन मुझे कैसे पता होगा कि इसे पता है? रास्ते भर मैंने कुछ नही कहा न पंकज ने।

"अब?"

"तुम्हें तो पता है न?"

"लेबर चौक ही पता है बस।घर नहीं।"

हुह आ गए मियां अपना मुंह लिए।

"चलो आगे आज़ाद बेकरी के सामने से अंदर लेफ्ट की तरफ।"

"तुम नाराज़ हो?"

नहीं मैं क्यों नाराज होने लगी?मैं तो बहुत खुश हूं।दो दिन दो प्रपोजल।एक शादी के लिए, एक पसन्द करता है के लिए।दिमाग की बक-बक बन्द ही नही हो रही थी और मैं चुप थी।

"सॉरी। मैंने ऐसे नही सोचा था।तुम्हें बताने के लिए बहुत कुछ प्लान किया था पर मुझे लगा कि.."

"कि? क्या कि? बोलो अब।"

"कि तुम सोच रही हो मेरा और रिया का कुछ सीन तो नहीं।इसलिए ऐसे कह दिया।"

"गाड़ी रोको पंकज।"

"सॉरी निशी।माफ कर दो न यार।"

"गाड़ी रोको।रिया का घर आ गया है और एक चीज़ मुझे दुबारा कभी यार मत कहना।मुझे ये शब्द पसन्द नही।समझे।"

"हम्म। सॉरी।मैं भी चलूँ?"

"तुम्हे अपनी हड्डियां तुड़वानी हैं?चलो रिया के पापा ने देखा न तो समझ लो काम तमाम।"

"सॉरी न य.. सॉरी बस सॉरी। बाय।"

पंकज चला गया।मैं सीढ़िया चढ़ कर ऊपर आ गई।

रिया को इस रूप में मैंने पहले कभी नही देखा था।

साड़ी में सजी रिया दिख तो सुंदर रही थी पर आज हूर के चेहरे से नूर गायब था।

"क्या हुआ?तू ऐसे?"

रिया ने मुझे किचिन में खींच लिया और बोली

"आज पापा लंगूर और उसके माता-पिता जी को न्योता देकर यही ले आये हैं।"

"क्या?"

"हाँ।और अब मैं तैयार कर के पेश की जानी हूँ।अकेली तो जाती नहीं न?तो तुम्हें बुलाने का फरमान जारी कर दिया।"

"गुड्डे-गुड़िया का खेल है क्या?कुछ भी?"

"हाँ वही समझ ले।सुन देख लेना अच्छे से समझी।मुझे तो शराफत का चोला पहन कर बैठना है।मुँह बन्द करके।"

"तू बैठ पाएगी न?"

"मार खा जाएगी बता रही हूँ।लावा फूट रहा है अंदर।"

"मैं चली तो विस्फोट मत करना। डीप ब्रीथ ले।"

"भग जा तू।"

मैं अंदर कमरे में आ गई। अंकल को नमस्ते करके पास ही बैठ गई।लड़का अच्छा दिख रहा था। सास ससुर भी ठीक ही थे।

"निशी ये रवीश हैं।रवीश तिवारी।"

"नमस्ते।"

आवाज़ भी अच्छी है।मैं किसी भी चीज़ को छोड़ना नही चाहती थी अपनी हूर का लंगूर जो पसन्द करना था।

"ये रवीश जी के माता पिता जी।

ये रिया की सबसे खास सहेली है।"

"ये भी पंडित हैं?" लंगूर के पिता जी का पहला प्रश्न।

"नहीं ये ठाकुर हैं।बताइयेगा आपकीं नजर में हो कोई ठाकुर लड़का तो।"

अंकल को चैन नही है।रिया का स्वयंवर कम था जो बैठे-बैठे मेरा भी करवा रहे हैं।

लेकिन लड़कियों का चुप रहना ही संस्कार है तो मैं चुप ही रही।

मैंने रवीश की तरफ देखने में ही भलाई समझी और एक प्रश्न छोड़ दिया।

"आप क्या करते हैं?"

"मैं एडवोकेट हूँ।"

वकील बाबू मतलब काला कौआ।क्या जोड़ी होगी न हंस और कौवे की।

एक सफेद एप्रन में एक काले कोट में।मुझे सोचते ही हंसी आ गई।

"क्या हुआ निशी?" अंकल की भारी आवाज सुनकर मैं चुप हो गई।

"आप प्रैक्टिस भी करते हैं?"

"जी।" छोटा और सिंपल से जवाब।

"जाओ निशी, रिया को ले आओ।" सारे पापा लोगों की आवाज़ अमरीश पुरी सी क्यों होती है?

मैं रिया के पास आ गई उसे ले जाने।
 
"चल रिया।लड़का ठीक-ठाक है।गोरा-चीट्टा भी है, हेल्थ फिजिक भी ठीक है बस एक कमी है।"

"क्या हुआ?"

"वही।"

"क्या वही?" रिया की आंखे डर से सिकुड़ रही थीं।

"कंही पे निगाहें,कंही पे निशाना।"

"क्या कहा? सच्ची? मुझे नही करनी शादी।"

"क्या हुआ?पहले देख तो ले यार।"

"मुझे करनी ही नही शादी। बोल दे जाकर पापा को।"

रूम से अंकल की आवाज आई

"आ जाओ निशी।"

"जी अंकल" बोलकर मैं रिया को पकड़ कर ले आई।

रिया को ऊपर सिर तो उठाना ही नही था।संस्कारो के खिलाफ हो जाता न?

जाकर नमस्ते कर बैठा दिया शो पीस बना कर।

रवीश बस रिया को घूरे ही जा रहा था।

"इसे भी मेरी वाली बीमारी है,घूरने की।" मैंने धीरे से रिया के कान में कहा।

रिया ने हल्का धक्का देकर मुझे चुप रहने का इशारा किया।

"आपकीं पढ़ाई कितनी बची है अभी बेटा?" रवीश की माँ ने पहली बार कुछ कह था।

मैं वैसे तो शांत ही रहती हूँ पर आज मेरा रिया की तरह बनने का ही मन चल हो उठा था।बिना कुछ सोचे कि वो शायद रिया से जवाब चाहते होंगे मैं बोल पड़ी।

"बस एक महीने की इंटर्न और बची है आंटी जी। फिर मास्टर्स 2 साल का।"

अंकल बीच-बचाव करते कूदे

"अरे नही बहन जी मास्टर्स का कोई अभी पक्का नही है।बस इंटर्न होते ही हाथ पीले करने हैं हमें।"

रिया अब भी चुप ही थी।अजीब है इससे पहले ये ऐसी तो न थी। बदल गई इतनी जल्दी।

"हमें लड़की पसन्द है चतुर्वेदी जी।" रवीश के पिता जी बोले।

"बहुत-बहुत बधाई।" अंकल ने मिठाई उठाकर तिवारी जी की तरफ बढ़ा दी।

"लेकिन अकेले में बात?" न चाह कर भी जोर से कहा मैंने ताकि दोनो को कुछ समय तो मिले। ये बड़े तो ऐसे ही रिश्ता कर दे रहे हैं। अभी हमारी गाय को बैल बनते देखा नही इन्होंने। आवाज़ भी नही सुनी और रिश्ता पक्का?

ये रवीश भी अजीब है,वकालत पढ़ चुका लगता ही नहीं।

अंकल को मुझ पर गुस्सा तो बहुत आया होगा पर वो अब औपचारिक होकर बोल ही बैठे।

"रवीश जी आप बात कर सकते हैं।निशी ले जाओ दोनो को" सामने बालकनी की तरफ इशारा करके अंकल ने कहा।

"जी।चलिए।"

मैं रिया को ले कर आगे बढ़ी और मूड़ कर रवीश को अपने पीछे ही आने कहा।

"इधर से रवीश।"

हम तीनों अब बालकनी में थे।

"आप कितने साल के है?शादी क्यों करना चाहते हैं? आपने llm कर लिया है? आपके घर मे और कौन-कौन है?"

मैंने एक साथ बहुत से सवाल पूछ लिए,जिसपर रवीश ने एक ही जवाब दिया।

"निशी, आपकीं सहेली बोलती नही हैं क्या?"

बेड़ा गरक।मैं ही बोलती रहूंगी तो ये दोनों कैसे बात करेंगे?

"मैं जरा पानी लेकर आती हूँ।आप दोनों बात कीजिये।"

भाग लेने में भी भलाई लगी मुझे।

मैं बाहर आ गई अंकल आंटी के पास।यंहा शादी कैसे, कंहा करेंगे पर चर्चा हो रही थी।

मन में तो ये चल रहा था कि न जाने क्या बातें कर रही होगी रिया,रवीश से।

"अंकल तिवारी मतलब जिन्होंने तीन वेद पढ़े हैं?"

"जी बेटा।" रवीश के पिता जी ने कहा।

"चतुर्वेदी, जिन्होंने चार वेद पढ़े है न? फिर आप रिया को चार वेद से तीन में क्यों ला रहे हैं?" मैंने शायद अनजाने ही छोटे मुँह बड़ी बात कर दी थी। तीनों बड़े बैठे हुए लोग शांत हो गए थे।लेकिन रिया के पापा के चेहरे पर शिकन आ गई थी।मेरा इरादा था नहीं ऐसा कुछ पर जैसे धनुष से निकला तीर वापिस नही आ सकता, वैसे ही मुँह से निकली बात भी अब कह दी गई थी।

"निशी, रिया को बुला लो अब।" अंकल अब भी असमंजस में थे।मैं उठ कर जाने लगी तो अंकल ने रवीश के माँ-पापा को कहा।

"तिवारी जी बुरा मत मानिएगा पर बेटी ने बात सही कहि है।मुझे अपने बड़े भाई और भाभी से सलाह लेनी पड़ेगी।माफी चाहूंगा तभी आगे कुछ कह पाऊंगा इस रिश्ते के बारे में।"

मैं मन ही मन खुश थी अपनी होशियारी पर की मैंने तो बचा लिया रिया को अभी शादी से।

लेकिन जब रिया और रवीश के पास पहुँची तो बातें जो सुनाई पड़ी वो शादी के बाद आगे पढ़ाई की चल रही थीं।दोंनो ही संतुष्ट दिख रहे थे।

मैंने क्या कांड कर दिया।खैर खांसते हुए मैंने प्रवेश किया।

"उहू-उहू। आप दोनों का समय खत्म हुआ।अब वापिस बुलाया गया है।"

"ये उहू-उहू तो माधुरी दीक्षित करती थी न?" रवीश ने कहा।

मैं और रिया हंस पड़े और तीनों ही बाहर आ गए।

अंकल के चेहरे की हवाइयां साफ समझ आ गई रिया को।

रवीश के माता-पिता जी का चेहरा भी उतर ही आया था।

रवीश ने देखते ही पूछा।

"क्या बात है मम्मी?"

"कुछ नही बेटा।अब हमें चलना चाहिए।चतुर्वेदी जी हमें रिया बिटिया पसन्द है।क्यों रवीश?"

"जी मम्मी।"

लड़का सुलझा हुआ है।

"आपका जो भी फैसला होगा आप बता दीजियेगा चतुर्वेदी जी।" रवीश के पिता जी इतना बोलकर खड़े हो गए।

रिया ने रवीश के मम्मी-पापा के पैर छुए।जो अंकल को शायद पसंद नही आया। ये एक वेद ज्यादा ने सारा का सारा खेल बिगाड़ दिया था।रिया अब तक अनजानी थी पर मैं जानती हूं जब जानेंगी तो मेरी मौत आनी है।
 
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