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अधूरी ख़्वाहिश

घर पर पहुच कर गाड़ी रुकी तो अभ्युदय जी बोले।

"निशी आज अच्छा सपना देखना।"

"आप जो बोलते हैं,वही मेरे सपने में आ जाता है।तो आप शुभ-शुभ और अच्छा ही बोला कीजिये।"

"बाय पुच्चू।"

"फिर? बाय।"

मैं आ गई रुम पर।आज सामने गेट पर ही आंटी मिल गईं।

"आज बहुत लेट हो गई निशी।"

"जी आंटी वो तिलवारा चले गए थे।"

"खाना नही आया आज तुम्हारा?"

"अरे क्यों?" मैंने देखा टिफिन नही आया है।मैं बाहर रहती हूँ तो खाना टिफिन से ही आता है।जब कभी टिफिन नही आता तब बाहर से कुछ या खुद ही बना लेती हूं।

मैंने टिफिन वाले भैया को फोन किया तो पता चला आज मैस में आग लग गई थी तो सब बन्द है।

मैंने आंटी को बताया तो बोलीं तुम जाओ मैं देती हूं खाना।

आंटी ने एक प्लेट में 4 रोटियां और सब्जी अचार भेज दिया छोटू के हाथ।

मुँह हाथ धोकर,कपड़े बदल कर जब खाने बैठी तो देखा सब्जी परवल की।

यक,ये नही हो सकता।पता होता तो मना कर देती की खाकर आई हूं।मैंने अचार और जैम के साथ दो रोटी खाकर काम चलाया।साथ ही कुछ नमकीन बिस्किट भी ले ली। चाय पीने के मन को कैसे , बहलाऊँ ये नही समंझ आ रहा था।अभी रिया होती तो सब सेट कर देती।बात तो करू के अंकल आ गए या नहीं।

"हेलो"

"हाँ निशी बोल।"

"आ गए अंकल?"

"हाँ आ गए।कल सुबह जा आ भी रहे हैं।"

"क्यों क्या हुआ?"

"वही फिर एक लड़के की फ़ोटो, अब इससे मिलो।ये भी ज्यादा पैसे वाला निकल आया तो?"

"रिया शांत हो जा।"

"मैंने सोचा लिया है शादी होगी तो रवीश से ही होगी।"

"लेकिन घर वाले सब?"

"तू है न मेरी साइड?"

"हाँ मैं तो हूँ हमेशा पर?"

"पर-वर कुछ नही फिर।अब बस।बहुत तमाशे हो गए इन बड़ों के।"

"ऐसे नही बोलते।"

"क्यों नही बोलते?पैदा करने के टाइम नही पूछा गया ताऊ जी से अब ब्याहने के टाइम वो जो बोलेंगे वही होगा।"

"रिया सुन ना।"

"अब बोलने दे निशी.. बहुत भारी बैठी हूँ।"

"आज मैंने अभ्युदय जी को किस किया?"

"क्या? तूने?"

"मतलब हमने।"

"हाँ किस मतलब दो लोग ही करेंगे ना? कंहा किया किस?"

"पहले घर पर फिर तिलवारा।"

"मेरा मतलब था कंहा किया किस? किस मतलब।गाल पर,हाथ पर या??"

"तू नाटक मत मार समझी।दोनो गाल पर और.."

"और.."

"समझ जा ना।"

"निशी.. तू सच बोल रही है?"

"हम्म"

"या बस मुझे शांत करवाने के लिए बोली ये सब?"

"बहुत अलग सी फीलिंग है पता।अजीब सी गुदगुदी पेट में।सच मे जैसे तितलियां उड़ती हों जैसे पेट मे।प्यार से अच्छा कोई एहसास नही रिया।"

"तूने सच्ची में??"

"तुझे अभी भी झूठ लग रहा?"

"हाँ मतलब मैं तुझसे पीछे रह गई इस बात पर अफसोस हो रहा।"

"तुम नही सुधरोगी।कल आएगी न?"

"लेट आउंगी।पापा के जाने के बाद।लेकिन सुन कल आकर सब सुनुगी क्या कैसे कब?"

"हाँ मैडम जी।सब बताएंगे डिटेल में।कहो तो अभ्युदय जी को भी बुला लेंगे सामने डेमो देकर।"

"चुप हो जा बेशर्म।"

"क्यों बेशर्म? तू ही तो कहती है प्यार से अच्छी-सच्ची कोई चीज़ नही।फिर??"

"तू जा न,सो जा।"

"बाय।अब लड़ना मत अंकल, से।"

"बाय।"

फोन रखकर आज फिर डायरी उठा ली मैंने।आज तो वैसे भी नींद नही आनी थी।
 
मेरी प्यारी डायरी

वैसे तो तुमसे कुछ छिपता नही है,पर आजकल समय नही दे पाती हूँ तुम्हें।आज जो लिखने बैठी हूँ नही जानती उन एहसासों को,उन पलों को कैसे तुमसे सांझा कर पाऊंगी।

आज जो मैंने महसूस किया काश उन्हें मैं शब्द दे पाऊं।जानती हो आज मैंने, मेरे अभ्युदय जी को। हां-हां मेरे अभ्युदय को बहुत करीब से छुआ।हमारी आत्मा ने एक दूसरे को छुआ।

हमारे हाथ तो रोज ही मिलते हैं।लेकिन आज जो हमारे अधर मिले तो जीवन पूरा सा लग रहा है।तुम सोच भी नही सकती कि क्या एहसास है वो। वो छुअन अब भी सिहरन दे जा रही है। देखो-देखो न मेरे हाथों पर खड़े ये रौंगटे सबूत हैं उस बात का।

मैं महसूस कर रही हु अब भी वो स्पर्श, वो गर्माहट वो सांसे, वो खुशबू। मुझे क्या हो गया है?

मैं पागल न हो जाऊं? क्या पहले प्यार का पहला किस ऐसा होता है?

नहीं अब शिकायत

किसी भी शख्स से मुझे।

मैंने उसे देखकर,उसे एक बार चूमकर

जीना सीख लिया है।

लव यू अभ्युदय जी।

लव यू

आपकीं

पागल नही लिखूंगी आज।

आपकीं

पुच्चू।

फोन बजा।देखा तो अभ्युदय जी ही थे।

"क्या कर रही हो?"

"कुछ नही।"

"सच बताओ?"

"खुद को देख रही थी।आईना हाथ में है।"

"क्यों?"

"देख रही हूँ कुछ।"

"बताओ न क्या कुछ?"

"अपने.."

"हम्म.. अपने क्या?"

"कुछ नही।आप क्या कर रहे हैं?"

"मैं.. मैं तो तुम्हे याद कर रहा था तो फोन कर लिया।"

"हम्म..और बताइये?"

"तुम पूछो?"

"क्या?"

"जो तुम्हारा मन हो पुच्चू।"

"ये पुच्चू नाम क्यों अचानक से?"

"जिसे बार-बार पुच्ची लेने का मन करे,पुचकारने का मन करे वो पुच्चू।"

"वाह क्या व्यख्यान दिया।हम तो मतलब घायल।"

"हा हा मजाक बना रही हो?"

"हम्म.. बताइये न पुच्चू नाम कैसे क्यों?"

"सच बताऊ?"

"हाँ बता दीजिए वरना फिर आंटी के पास आना पड़ेगा सच जानने।"

"अच्छा बेटा जी।"

"और क्या?"

"मेरी एक दोस्त है वेदिका।उसकी बेटी मुझे पुच्चू कहती है।"

"वेदिका।कभी बताया नही आपने?"

"हम्म.. कभी बात नही हुई।अभी अमेरिका से आई है तो फोन आया था। उसकी बेटी है न वीनस उसने याद दिला दिया पुच्चू।"

"आप मिले उससे?" मुझे नाम या उसके बारे में सुनकर अच्छा नही लग रहा था। शायद कभी अभ्युदय जी के मुँह से कभी किसी लड़की का नाम सुना ही नही था। आज अचानक ये वेदिका सुनकर अच्छा नही लग रहा।

"नहीं।अभी नही मिला।घर आएगी एक दो दिन में।तुम्हें भी मिलवा देंगे।"

"मैं क्यों मिलूं?मुझे नही मिलना।"

"उसे हमारी पसन्द तो दिखानी होगी न।जानती हो कॉलेज में पीछे पड़ी थी शादी कर लो।"

"तो क्यों नहीं की?"

"तुमसे जो मिलना था?"

"पर मेरी शादी तो पंकज से करवा रहे हो आप।फिर?"

"निशी.."

"हम्म.."

"नाराज़ हो?"

"किस बात से?"

"किसी बात से नही चलो सो जाओ।बहुत देर हो गई।"

"गुड नाईट।" बोलकर मैंने फोन कट कर दिया।

एक सोच सामने उभरी,मैं अभ्युदय जी के बारे में क्या जानती हूँ? कल को अगर मुझे अपने घर पर कहना हो कि इस लड़के से शादी करनी है तो क्या पता है मुझे अभ्युदय जी के बारे में? क्या करते हैं?पढ़ाई क्या की? कंहा से की?अभी जीने के लिए सिंह सर पर निर्भर हैं या कुछ करते हैं? हां वो टोल,तिलवारा टोल अभ्युदय जी के ही ठेके पर चलता है।पर बाकी सब?

अब जानना होगा निशी।वरना सच में कल को तेरी शादी कंही न न बिल्कुल भी नहीं।
 
सुबह दो वार्ड निपटा कर आज डिपार्टमेंट में बैठ गई थी।आखिरी दिन ऑर्थो का।अब मेडिसिन/सर्जरी और बर्न डिपार्टमेंट की बारी थी।

डिपार्टमेंट में एक लड़की आई।हाई हील्स ब्लैक कलर की।वाइट शर्ट और ब्लैक पॉइंटेड सिगरेट पेंट में एक दम मॉडल लग रही थी। बालों में गोल्डन कलर चमक रहा था।गोरी चिट्टी, एक दाग नही चेहरे पर।होंटो पर गुलाबी लिपस्टिक और कश्मीरी सेब से चमकते गाल।कुल मिलाकर लड़को की आंखे आज अच्छी तरह से सिक रही थीं।

"फिजियो डिपार्टमेंट?" वही लड़की बोली।

"जी।"

"निशी सिंह चौहान से मिलना है।"

अपना नाम उसके मुँह से सुनकर मैं चौकी।ये कौन है जिसे मैं नही जानती, पर ये मुझे पूछ रही है। मैं उसके सामने आई।

"मैं हूँ निशी,कहिए।"

"हेलो।मैं वेदी।"

"वेदी.." मैंने भी हाथ आगे बढ़ा दिया पर वेदी नाम पर भी जोर दिया, क्योंकि वेदी नाम से मैं किसी को जानती नहीं।

"मैं अभ्यु की फ्रेंड हूँ।"

ओह तो ये वही वेदिका है।

"अभ्युदय जी की? वेदिका?"

"हाँ, उसने बताया नहीं तुम्हें?"

"जी,बताया था।कल ही बताया था।"

"मुझे तो बहुत पहले बताया था उसने।"

"क्या बताया?"

"हम कैंटीन चल कर बैठ सकते हैं क्या?"

"मुझे थोड़ा टाइम लगेगा।आप वेट करेंगी?"

"हाँ मैं कैंटीन में ही हूँ।तुम चाय लोगी न?"

"जी।आपको कैसे?"

"आओ तो,मुझे सब पता है तुम्हारे बारे में।"

वेदिका चली गई।इतनी सुंदर है ये।क्यों अभ्युदय जी ने इससे शादी नही की?मैं वापिस आ गई आज की फॉर्मेलिटी पूरी कर के सर को बोल कर मैं कैंटीन, आ गई।वेदिका को अब भी मेडिकल के जितने भी लड़के वंहा मौजूद थे ताक रहे थे।वो आराम से बैठी कॉफ़ी पी रही थी। उसका ध्यान फोन में था।

देख कर लगता ही नही की ये एक बच्चे की माँ भी है।मैं जाकर क्या कहूँगी?क्या कहा होगा अभ्युदय जी ने मेरे बारे में वेदिका को।चलते हैं देखा जाएगा सोच कर मैं आगे आकर वेदिका के पास बैठ गई।

"हेलो अगेन वेदिका जी।"

"हे प्लीज निशी, ये जी क्या है?प्लीज काल मी वेदी।"

"ओके वेदी।आपके यंहा आने का कारण जान सकती हूँ?"

"फिर आप?तुम मुझे तुम कह सकती हो।"

"ओके ध्यान रखूंगी वेदी।"

"मैं यंहा तुम्हे देखने और तुमसे मिलने आए हूँ।कॉलेज में मैं अभ्यु की दीवानी थी। आज वो जिसका दीवाना बना बैठा है उसको मिलने का मन किया तो बस आ गई।"

"मतलब?"

"हा हा ये भी बताया था उसने।"

"क्या?"

"यही तुम्हारा बात-बात पर मतलब बोलना।"

"और क्या बताया है अभ्युदय जी ने आपको?"

"मैं नही बताऊंगी।"

"क्यों?"

"क्योंकि तुम्हारी सुई आप पर अटकी हुई है।तुम पर लाओ अपनी सुई फिर बताऊं?"

"पक्का अब बस तुम ही बोलूंगी।अब तो बताओ।"

"पक्का न?"

"हम्म.."

"अभ्यु बता रहा था निशी ऐसी है,निशी वैसी है।मिलोगी तो इश्क हो जाएगा उससे भी।मैंने सोचा अभ्यु से पहले तुमसे ही मिल लूं।"

"ओह कल ही बताया अभ्युदय जी ने आ.. नहीं तुम्हारे बारे में।"

"ये हुई न बात निशी।"

"सारा सच वो कभी किसी का किसी को नहीं बताता।"

"मतलब?"

"मतलब तुम बहुत क्यूट हो निशी।तुम्हें पता है मैं पागल थी कॉलेज में अभ्युदय के लिए।"

"हम्म ये बताया उन्होंने मुझे।आपने शादी क्यों नही की अभ्युदय जी से?"

"शादी।काश अभ्युदय को शादी के लिए मना लिया होता मैंने।कोशिश तो की थी पर माना ही नही वो।लम्बी कहानी है निशी।"

"मैं फ्री हूँ वेदी।"

"तुम सुनना चाहती हो?"

"हाँ।सब कुछ।"

"पहले एक बात बताओ? अभ्युदय से कितना प्यार करती हो?"

"शायद नहीं बता पाऊंगी।अभी नापने जैसी नौबत नही आई।लेकिन खुद से ज्यादा प्यार करती हूं, उनसे ये जरूर कह सकती हूँ।"

"लव यू मेरी जान।तभी तो मरता है वो भी तुम पर।"

"उन्होंने कहा आपको?"

"हाँ सारे शहर को पता होगा पर तुमसे खुद कह देगा तो नाक नीची हो जाएगी उस अकड़ू की।"

"ऐसे मत कहो।"

"निशी जरा मेरी तरफ देखो।"

"क्यों क्या हुआ?"

"ओहहो क्या यही मुझे अभ्यु की आंखों में भी देखने मिलेगा?"

"क्या वेदी?"

"इतनी मुहब्बत,इतना प्यार, ये अभ्यु की केयर।सदके झांवा।नज़र न लगे किसी की तुम्हारे इस प्यार को।"

"नही लगेगी वेदी।तुम कहानी सुनाओ न।" न जाने क्यों मेरे मन मे वेदी औऱ अभ्युदय जी की कहानी जानने की जल्दी थी।क्या वेदी अब भी प्यार करती है अभ्युदय जी को?वो क्यों आई है?बहुत अजीब से खयालात थे मन में।एक सोच भी कि क्या मुझे पंकज से बात करता देख या मिलता देख अभ्युदय जी भी यही महसूस करते होंगे?

"ठीक है शार्ट में बताती हूँ।अभ्यु अब भी स्मार्ट है न,कॉलेज में तो लड़कियों की लाइन लगी थी इसके लिए।पर ये किसी को घांस क्या एक तिनका भी नही डालता था।एक नम्बर का खडूस।"

"प्लीज नही हैं अभ्युदय जी खड़ूस।"

मैं खुद भी उन्हें खड़ूस ही कहती हूँ पर न जाने क्यों वेदी के कहने पर अच्छा नही लग रहा।

"तुम्हें सुनना है? या नहीं?"

"सुन ना तो है।"

"फिर चुप कर के सुनो।"

"ठीक है।"

"तो हुआ यूं कि,एक बार कॉलेज में हड्डी टूट गई हमारी तो अभ्यु ही हमें लेकर अपने पापा के पास भागा।एक्स रे करा कर प्लास्टर करवाया।बस उसी दिन से हम तो दीवाने घायल हो गए।"

"और अभ्युदय जी?"

"पोसएससिव??हम्म।"

"नहीं बस ऐसे ही पूछ।"

"नहीं तुम्हारे अभ्युदय जी पर कोई जादू न चला हमारा।पर हाँ शायद तब से एक रिश्ता बन गया था दोस्ती का।हम दोस्त बन गए थे।मैंने तो सबको पटा लिया था पर दादू और अभ्यु नही माने।वरना तुम मेरे पति की फिजियोथेरेपी कर रही होतीं।"

"आप दोनों कब और किस कॉलेज में साथ थे?"

"निशी तुम्हारी उम्र क्या है?"

"मैं अभी 24 साल।"

"तुमसे 7 साल बड़े हैं हम।"

"तभी तो आपको आप और वेदिका जी कह रहे थे पर आप हैं कि।"

"ओ हेलो अभी भी गुस्सा हो जाऊंगी।वेदी में दी आ गया न? "

"हम्म।"

"बस फिर।ये आप तुम अपने अभ्युदय जी को ही कहो।"

"ठीक है वेदी।"

"अभ्युदय को हमेशा खुश रखना।बहुत अच्छा लड़का है।तुम्हारे लिए किसी को भी मार सकता है और तो और सच कहूं तो मर भी सकता है।"

मैं बस मुस्कुरा दी।अभ्युदय जी की तारीफ पर।

"निशी, तुम चलोगी अभी?अगर फ्री हो तो?"

"जी ठीक है।आपकी बेटी नही आई?"

"नहीं आज नानी-नानू के साथ मूवी गई है।"

"आप नहीं गए?"

"मैं और अभ्यु दोनों को मूवी देखना नही पसन्द।"

"ओह।"

"चलो फिर।" हम दोनों रास्ते मे भी अभ्युदय और वेदिका के किस्से सुनते घर आ, गए।
 
घर पहुँचने तक वेदी के ढेरों किस्सों से वाकिफ थी मैं।

"जानती हो निशी, इस खड़ूस अभ्यु के लिए मैंने जहर भी खाया और अपने हाथ की नस भी काटी पर इस लड़के ने कभी मुझे नहीं कहा जो मैं सुनना चाहती थी।"

"आप क्या सुनना चाहती थीं वेदी?"

"छोड़ो यार।"

हम घर पहुँच चुके थे।गाड़ी लगा कर अंदर आ गए।वेदी ने ऑन्टी के पैर छुए और प्यार से गले मिली।

"वेदी बहुत सुंदर हो गई हो।पहले से भी ज्यादा।"

"क्या माँ, आप भी।आपको तो मैं हमेशा से सुंदर ही लगती हूँ।"

"सच पहले से बहुत ज्यादा।कैसी हो?वो शैतान कहा है आज?"

"आई नही वो।मूवी देखने गई है।अपना खड़ूस कंहा है?"

"इस वक्त कंहा होता है?"

"अब भी डायरी लिखता है वो?"

"हम्म..कुछ आदतें कभी नही बदलती वेदी।"

"जैसा मेरा उसे चा..उन्हहः कुछ नही।"

मुझे बहुत जलन हो रही है।आग लगी है अंदर।मुझे तो कभी नही कहा आंटी ने सुंदर।कभी इतने प्यार से बात भी नही की।अब देखो जरा वेदी से कितने प्यार से।

और ये डायरी क्या है?मुझे तो कभी नही बताया अभ्युदय जी ने।गुस्सा सातवें आसमान पर बढ़ रहा था कि आवाज़ आई।

"आ गईं तुम?"

अभ्युदय जी सीढ़ियों से नीचे उतरते हुए बोले।मैं उनके पास उनका हाथ थामने खुद ब खुद ही पहुच गई।हाथ थाम कर उतरते वक्त कौन वेदी?कौन आंटी? अभी तो सिर्फ अभ्युदय जी और मैं हूँ साथ।

"आ गई अभ्यु,पर ये क्या हाल बना रखा है अपना?"

"वेदी,बकवास तो रहने दे तेरी।अब भी उतना ही हैंडसम और जवान हूँ।"

मैंने न जाने क्यों अभ्युदय जी का हाथ तेज से दबा दिया।

"निशी।"अभ्युदय जी ने धीरे से मेरी तरफ देखते हुए कहा।

"हम्म।"

"ओनली लव यू।" थोड़ा सा पास आकर कान में धीरे से कहना ओनली लव यू ऐसा संतुष्ट कर गया कि अब मुझे डर या गुस्सा कुछ भी नही लग रहा था।

विश्वास हो चला थ खुद पर,अपने प्यार पर।अपने अभ्युदय जी पर।

"तुम कैसे हो?" वेदी की आंखे कुछ नम हो गई थीं।ये प्रेम था या बहुत सालों बाद मिलने की खुशी?

वेदी दौड़ कर आई और अभ्युदय जी के गले लग गई।अभ्युदय जीने अब भी मेरा हाथ नही छोड़ा था।

वेदी गले लगी हुई थी औऱ अभ्युदय जी मुझे देख मेरे चेहरे पर आते भावों को पढ़ने की कोशिश कर रहे थे।

"मैं ठीक हूँ, वेंसु कंहा है?वो क्यों नही आई?"

"आज नही आना था उसे।बोली है अकेले जाऊंगी अपने पुच्चू से मिलने।आज माँ पा के साथ गई है।"

"अच्छा है वरना कंजूस माँ है। अमेरिका में तो उस बेचारी को घर पर tv देखने नही देती होगी।"

"तेरी और उसकी दोस्ती प्यार कुछ नही समझ आता मुझे।"

"समझ भी मत।रही सही अक्ल जो बाकी है न खर्चा हो जाएगी।"

"ऑन्टी sss देखिये न अभी भी।"

हम चारों हंस पड़े।सभी सोफे पर आकर बैठ गए थे।मैं अभ्युदय जी के बगल में ही बैठी।वेदी एकदम सामने,लेकिन दूर थी तो उसने चेयर पास ही खिसका ली।

वेदी ने अभ्युदय जी का हाथ पकड़ लिया और बोली

"तूने मुझे काल क्यों नही किया अभ्यु?"

"तू अपनी लाइफ में बिजी थी वेदी।मैं अपनी वजह से तुझे नही डिस्टर्ब करना चाहता था।"

"पर जब मुझे तेरी जरूरत थी तो मैं तो हक से खड़ी थी न?"

"मुझे कभी कोई चीज़ मांग कर मिले तो क्या फायदा?"

"डायलोग मत मार न अभ्यु।तुझे कभी मेरी याद नही आई न?"

"आई बहुत बार आई।पर फिर याद आया तू मुझसे भी ज्यादा परेशान है।"

"कहा था तुझे शादी कर ले,पर नहीं।तुझे पता नही किसका इंतजार था।"

मुझसे अब ये सब बातें सहन नही हो रही थीं।अजीब सा तनाव महसूस हो रहा था।अगर प्यार था,अपनापन था तो क्यों नही की शादी।अब बैठकर मेरे सामने ये सब करने का क्या मतलब है?

"मुझे इनका इंतजार था।"

अभ्युदय जी ने मेरी तरह इशारा किया।वेदी के चेहरे के बदलते भाव को मैं पढ़ सकती थी।उसे ये बात नही पसन्द आई थी।उसने अभ्युदय जी का हाथ छोड़ दिया और जाकर कुर्सी पर बैठ गई।

अभ्युदय जी भी समझ गए शायद मेरे और वेदी के अंदर चलते तूफानों को।अब तूफान को थमने या रोकने का एक ही रामबाण था और वो थीं आंटी।

"माँ चाय मिलेगी आज?"

ऑन्टी उठकर वेदी के पास आईं और उसे गले लगाकर कहा।

"बेटा यदि कुछ हमारी मर्जी से नही हुआ तो वो ईश्वर की मर्जी से हुआ है।दुःखी नही होते,सब ठीक हो जाएगा।"

मुझे समंझ में ये नही आ रहा था कि वेदी के जीवन मे दुख क्या है?अभ्युदय जी से शादी न होना इतना बड़ा दुख कैसे हो सकता है जब उसकी एक बेटी है और खुद अमेरिका में रहती है।आंटी चाय लाने का कहकर चली गईं।

"तो,तुम दोनों मिल लिए?"

"आपको कैसे पता अभ्युदय जी?"

"साथ आये हैं हम निशी।इससे कुछ छिपता नही है।"

आपस मे बातचीत का दौर चलता रहा।कभी लड़ाई,कभी मस्ती कभी प्यार सभी किस्से चलते रहे पर दुःख क्या है,क्यों है, अब तक समझ नहीँ आया।

मेरा फोन बजा, देखा तो रिया का फोन था।मैं अभ्युदय जी को फोन दिखा कर बाहर आ गई।
 
"हाँ बोल?"

"तू किधर है यार?कितनी देर कॉलेज में ढूंढा।तेरा फोन भी नही लग रहा था।"

"क्या हुआ रिया?मैं अभ्युदय जी के.."

"हाँ वंही बैठी रह बस।किसी और से क्या मतलब तुझे।बस सुबह शाम अभ्युदय-अभ्युदय।"

"रिया,रिया शांत हो जा।क्या हुआ?क्यों परेशान है आज मेरा दिमाग? इतना परेशान?क्या हुआ?"

"तू अभी मिल मुझे।मैं तेरे रूम पर पहुच रही हूँ।"

"आती हूँ।" मैं जल्दी अंदर आई और अभ्युदय जी से कहा कि "अभ्युदय जी,ड्राइवर भैया हैं क्या?"

"क्या हुआ निशी।"

"मुझे जल्दी जाना होगा।रिया कुछ परेशान है।"

"ड्राइवर तो अभी नही है।"

"मैं ऑटो से निकल जाऊंगी।बाए वेदी।बाद में मिलती हूँ।"

"निशी मैं छोड़ देती हूँ, चलो।" वेदी ने कहा।

"नही वेदी मैं चली जाऊंगी, तुम बैठो। बहुत टाइम बाद मिले हो आप दोनों।"

"निशी।सुनो।"

"जी अभ्युदय जी।"

"वो उधर ड्रावर खोलो।उसमे एक चाबी है निकालो।"

"ये?"

"हाँ।बाहर एक्टिवा रखी है लेकर जाओ।"

"मतलब?"

मेरे मतलब पर अभ्युदय जी और वेदी जम कर हंस पड़े।

"रिया के पास जाना है।निकलो अब।"

"हाँ जान ले लेगी वो मेरी। बाय।"

मैं चाबी लेकर बाहर लॉबी में आई।नई एक्टिवा जिसपर नम्बर भी नही है, लेकर निकल गई। रूम पर पहुच कर बैग रखा ही था कि फिर बड़-बड़ करती रिया अंदर आई।

"ये हैं मैडम।कोई होश ठिकाना नही है इनका।एक पेशेंट मिल गया इनको जन्नत मिल गई।सारी यारी दोस्ती गई भाड़ में।"

"रिया चुप कर जा।"

मैंने रिया को कसकर गले लगा लिया।मुन्नाभाई कम से कम 10 से 15 बार देखी है।जादू की झप्पी कम्माल की चीज़ है बाय गॉड।

रिया सुबक-सुबक कर रोने लगी।रिया को रोते देखना मतलब बहुत ही ज्यादा कुछ खतरनाक हुआ है।रिया रोने वालो में से है ही नहीं।कट्टर है कभी नही रोती चाहे कुछ भी हो जाये।

प्रोफेसर की डांट हो या पापा की वो डट कर खड़ी रहती है।कभी मैंने रिया को घबराते या रोते तो देखा ही नही।पर फिर आज क्या हुआ?

"ओए, मेरा सूट खराब करेगी? देख नाक भी बह रही है।बन्द कर रोना।"

"रो लेने दे निशी, बहुत थक गई हूँ।"

मैं उसे गले लगाए रोते रहने दिया।

दरवाजे पर दस्तक हुई।पलट कर देखा तो पंकज था।

मैंने रिया को पलंग पर बैठा कर दरवाजा खोला।पंकज अंदर आ गया।

एक और लड़का? मेरा दिमाग थोड़ा खड़का की अब ये ऑन्टी तमाशा करेंगी।पर पता नही रिया ने क्या घुट्टी पिला दी है कि वो एक बार झांकने नही आईं।

"रिया चुप भी हो जा यार।"

पंकज ने रिया को देखते हुए कहा।

"कोई बताएगा कि हुआ क्या?"

"डोंट टेल मि निशी के तुम्हे नही पता?"

"सच मे नही पता मुझे पंकज।"

"क्यों नही पता?तुम्हारी बात नही हुई रिया से?"

"हाँ नही हुई।"

"ओह तभी और ज्यादा परेशान थी तुम? बताते नही बनता क्या? बड़ी पक्की सहेलियां, बेस्ट फ्रेंड बने फिरते हो तुम दोनों।"

पंकज का ये गुस्सा शायद जायज़ होगा पर अब भी सब समंझ से दूर था।

"पंकज तू चुप कर अब। रिया बोलेगी कुछ या अभी भी रोना ही है?"

"पापा ने मेरी शादी किसी नेवी वाले से फिक्स कर दी।"

"क्या?"

"अगले 3 दिन में घर बुलाया है और ओली,वरीक्षा हो जाएगी।"

"क्या बोल रही है?"

"वही जो हो रहा।"

"लेकिन अचानक? क्यों? मैं बात करूं अंकल से?"

"ताऊ जी ने कहा दिया है इस रिश्ते के लिए।क्योंकि घर मे 6 भाई-बहन हैं।ये लड़का सबसे बड़ा है।ज्यादा पैसा जायदाद नही है और ताऊ जी की पहचान है।"

"लेकिन?"

"लेकिन क्या?क्या लेकिन? तुम लड़की हो।चुप रहो।पढ़ा दिया न?डॉ बन गई हो न?अब जो बोलेंगे वो करो।"

"ऐसा अंकल ने कहा?"

पंकज एक दम चुप होकर हम दोनों की बातें सुन रहा था।

"नहीं।कल मम्मी से कहलवाया है।"

"क्या बोला माँ ने?"

"बोला कि रो रहे हैं पापा कि इतना अच्छा घर-खानदान मिला पर जब दादा ही नही समझने तैयार तो कैसे कराऊँ अपनी बेटी का ब्याह?"

"ये क्या बात है?"

"बात? बकवास है। अपनी बेटी की जिंदगी दाव पर लगा सकते हो पर उसकी शादी अपनी मर्जी से नही करा सकते क्योंकि तुम्हारे भाई ने मना कर दिया है।"

"व्हाट रबिश।रिया तू टेंशन मत ले हम हैं न।" पंकज ने रिया को पडककर कहा।

"हम कुछ सोचते हैं रुक।ओए, मतलब अंकल को रवीश पसन्द है?"

"हाँ।पापा को पंसद हैं पर उनके भाई को नहीं।मुझे भी पापा के भाई नही पसन्द पर मेरी बात सुनता कौन है?पढ़ा दिया अब बातें मत करो।बस जाओ ब्याह जाओ ऐसे लड़के से जिसे न जानो न पहचानो।"

रिया कहते-कहते फिर रोने लगी।

"रिया रोना तो बन्द कर यार।हम कुछ सोचते हैं।" मैंने रिया को चुप कराने के लिए कहा।

पंकज फिर बीच में कूदा और बोला-

"तू भाग कर रवीश से शादी कर ले।प्रॉब्लम सॉल्व।"

"ये आये हैं पागल।प्रॉब्लम सॉल्व करनी है बढ़ानी नही है।" मैंने गुस्से से पंकज को देखा।

"तुम दोनों कान खोल कर अच्छे से सुनो।रवीश को रिया से शादी करनी है?रिया को रवीश से।अंकल को रवीश पसन्द है और रिया भी उसके घरवालों को पसन्द है।अब दिक्कत हैं बस ताऊ जी।तो ताऊ जी कप जब पता लगेगा कि रिया ने भाग कर शादी कर ली तब क्या करेंगे?"

"फांसी लगवा देंगे।"

"तू पागल है बकवास मत कर,पंकज सही कह रहा है।"

"सच कह रही हु, निशी मेरे ताऊ जी मेरे पापा को फांसी लगवा देंगे।"

"जी नहीं।तुम्हारे ताऊ जी से तुम्हारा पीछा छूट जाएगा जीवन भर के लिए।" पंकज की कही बातों पर मुझे और रिया दोनो को ही भरोसा नही हुआ।

हम दोनों एक साथ चिल्लाए "कैसे?"

"अगर अंकल को घर खानदान सब पसन्द है तो वो इस बार लड़ जाएंगे ताऊ से।क्योंकि बिटिया ने तो शादी कर ली है।"

"प्लान तो अच्छा है रिया पर एक्ससिक्यूट कैसे होगा देखना पड़ेगा?"

"मैं बताता हूँ।रवीश कंहा है अभी?"

"दिल्ली।"

"वो शादी करेगा न तुझसे?भाग तो नही जाएगा न?"

"तू मार खायेगा पंकज मुझसे।"

"तो सुन उसे फोन कर और मुझसे बात करवा।"

"तू क्या बात करेगा?"

"तुझे शादी करनी है रवीश से या वो नेवी वाले से?"

"रवीश से करनी है।"

"फोन लगा फिर।"

रिया ने रवीश को फोन लगा कर पंकज के बारे में बताया और फोन लाकर पंकज को दे दिया।पंकज फोन लेकर बाहर निकल गया।शायद छत पर जाकर बात की उसने।

मैं और रिया चाय बनाते हुए पंकज के प्लान को समझने की कोशिश कर रहे थे।क्या होगा?कैसे होगा?कब होगा?सब सही होगा?रवीश टाइम पर पहुँचेगा? मना तो नही कर देगा? बहुत सारे प्रश्नों के साथ हमारी चाय पक कर तैयार थी और पंकज भी नीचे आ गया था।
 
"चाय।" पंकज को रिया ने चाय दी।

ऑन्टी कितनी देर शांत रहती तो वो अब आ ही गईं।खुशकिस्मती से उस वक्त मैं और रिया पलंग पर बैठे थे और पंकज खड़ा था।

"निशी, रिया कैसे हो?"

"नमस्ते भाभी जी।"पंकज बोला ऑन्टी से।ये भी भाभी।रिया ने पहले ही इसे भी टिप्स दे दी होंगी।

"नमस्ते।ये कौन हैं निशी?"

"ये मेरा फ्रेंड है भाभी,पंकज नाम है इसका।" रिया बोली।

"अच्छा।क्या हुआ आज चेहरा क्यों उतरा हुआ है रिया?"

"नही भाभी कुछ भी नहीं।"

"सच बताओ? कोई दिक्कत है क्या?"

"नही भाभी बस वो थोड़ा अब पी जी(पोस्ट ग्रेजुएशन) के लिए टेंशन हो रही है।"

"अच्छा।पंकज तुम क्या करते हो?मेडिकल में ही हो?"

"नही भाभी जी। मैं ज्ञान-गंगा में हूँ।"

"अच्छा।"

दौड़ कर छोटू आया और किसी बहाने अपनी माँ को ले गया।हम सभी वपपीस अपने प्लान की तरफ बढ़े।

"पंकज क्या बात हुई रवीश से?"

"निशी सुनो।मैंने बात की उससे वो यंहा नही आ सकता पर उसे शादी रिया से ही करनी है।"

"तो अपनी फोटो भेज दे हम उससे शादी करवा देंगे रिया की।आ नही सकता।ये क्या बात है?"

"देखो पहले तो ओवर रियेक्ट करना बंद करो।हर समय ये ओवर लड़कियों वाली हरकतें ठीक नही लगती।पूरी बात सुनो पहले फिर कुछ कहना।बिना बात बीच में कोई टिका-टिप्पणी नहीं।ओके?"

"सॉरी।हम्मओके।"

"तो सुनो।हमारे पास 3 दिन ही हैं।लेकिन अभी सबसे पहले इसको 10 दिन का टाइम बनाना होगा।रवीश के एग्जाम 3 दिन में खत्म हो जाएंगे।रिया सबसे पहले अपने पापा को काल कर और बोल की उन्होंने जो भी डेट रखी है फंक्शन की उसे 10 दिन आगे बढ़ा दें क्योंकि क्योंकि तुम लोगो का कॉलेज का कोई कैम्प लग रहा है।"

"ठीक है।करती हूं फोन तू आगे बता।"

"पहले फोन।बात बन गई तब ये प्लान होगा न?वरना प्लान बी।"

"ठीक है।"

रिया ने फोन लगाया अपने पापा को और कैम्प की बात कही। अंकल का मन शायद ठीक नही था तो उन्होंने साफ लफ्ज़ो में कह दिया कि नही जरूरत कैम्प में रुकने की। चली आओ बस।

रिया रुआंसी सी फिर बैठ गई।लेकिन 2 मिनट के अंदर ही मेरा फोन बजा।अंकल का ही फोन था।

"नमस्ते अंकल।" मैंने पंकज और रिया को चुप रहने का इशारा किया।

"बेटा निशी, कोई कैम्प लगना है?"

"अंकल ये कॉलेज वाले ना।हाथी निकल गया अब बस पूंछ बाकी है तब इनको नए-नए तमाशे कराने हैं।कह दिया है कि NOC नही देंगे,अगर ये कैम्प नही अटेंड किया।मंडला भी जाना पड़ सकता है शायद।"

"अच्छा।आया था रिया का फोन।हमें लगया शादी के चक्कर में बहाना बना रही है।"

"बहाना?नही अंकल।शादी तो करनी है उसे भी रवीश से।बहुत अच्छा लड़का है।मम्मी पापा भी अच्छे हैं।वो क्यों बहाना करेगी?"

"हाँ बेटा रखते हैं फोन।"

"आंटी को भी नमस्ते कहिएगा अंकल।नमस्ते।"

"खुश रहो।"

हमारा कुछ हद तक प्लान कामयाब था, 10 दिन क्या 20 दिन मिलेंगे अब तो।रिया के पास फिर फोन आया और इसबार कह दिया गया कि तुम अटेंड कर लो कैम्प।

हम तीनों खुश हो गए।प्लान के पहले पड़ाव पर जीत पाकर।

"लेकिन प्लान क्या है?" मैं और रिया एक साथ बोले।

"बताता हूँ।पर पहले भूख लगी है।कुछ खाने चलें?"

"भूखड्ड बाद में खाना।मेरी जिंदगी का सवाल है और तुझे खाने की पड़ी है।रुक तू।"

रिया हाथ उठाये पंकज को मारने दौड़ी, पंकज भी बेड के किनारे से भागा और धड़ाम गिरा। न न कोई अकेले गिर जाए तो गिरने का मजा नही आता न।

पंकज ने मुझे साइड किया और खुद स्लिप होकर मुझे भी साथ गिरा लिया।रिया भी आई और हम तीनों एक ही जगह नीचे बैठकर हंसने लगे और पंकज पर थप्पड़ों की बारिश हो पड़ी।

थोड़ी ही देर में हम तीनों बड़कुल पर पहुच चुके थे।बड़कुल में बना हुआ समोसा(चटनी के साथ समोसा चाट) खाया और खोए की जलेबी भी।खाकर चाय ली और तीनों ने एक दूसरे को देखकर अजीब सा चेहरा बनाया।

"चाय अच्छी नही है न?" पंकज में पूछा?

"चुप कर पगले।चाय का अपमान नही करते कभी भी।जैसी भी है चुप-चाप पी लेते हैं।" रिया और मेरे खयालात चाय पर एक से ही हैं। हम चाय कैसी भी पी सकते हैं।वो चालू चाय हो या दूध की गाढ़ी वाली चाय।

"चलो आज तुम्हें ऐसी चाय पिलवाता हूँ कि तुम्हें अच्छी चाय और बुरी चाय का फर्क समंझ आ जायेगा।"

"कोशिश बेकार जाएगी पंकज।हम चाय से खुश हैं।ये अच्छी और बुरी चाय सा कुछ नही होता।"

अंत मे मेरा और रिया का पेटेंट डायलोग आया-

"सब मोह माया है।"

"तुम दोनों को कुछ समझाना भी मुश्किल है।धन्य हो देवियों।" पंकज ने अपने हाथ जोड़ लिए।

बड़कुल से निकल कर पंकज के कुछ दोस्त मिल गए।

"ओ पंकज।"

"अरे! तुम सब यंहा कैसे?"

"ये डॉ.निशी और ये डॉ रिया।इनको चाय पिलाने लेकर जा रहा।"

हम दोनों ने एक साथ ही हाथ हिला कर सबको हेलो कह दिया।

"आज विष्णु ढाबे की तरफ मत निकलना।कुछ पंगा हुआ है वंहा।"

"क्या हुआ? चलो अच्छा है बता दिया वरना आज फिर पंगा हो जाता।"

"चलो फिर नंदीश्वर पर ही बैठते हैं।" मैंने रिया और पंकज को कहा।पंकज को वापिस घर लेकर जाना मतलब आंटी की आंखों में आना होगा।

हम तीनों पंकज के दोस्तों को बाय कहकर पिसनहारी मढ़िया के अंदर चल दिये।

"आगे का प्लान बताओगे?"

"अंदर चलो तो पहले।बैठ कर बताऊंगा।"

हम तीनों अंदर आ गए।नदीश्वर में दर्शन करके।सामने बनी सीमेंट की सीढ़ियों पर बैठ गए।

"अब बताओगे?या रिया को बोलकर मुहूर्त निकलवाना पड़ेगा?"

"रिया से बोलकर क्यों निशी?"

"पंडित हूँ न मैं,इसलिए कह रही है वो बुद्धू।"

"ओह।नही या सॉरी। नहीं निशी ।हम तीनों को दो दिन बाद दिल्ली निकलना है।मैं कल टिकट करवा लूंगा।तुम लोग तब तक शॉपिंग कर लो।"

"शॉपिंग?"

, मैं और रिया एक दूसरे के चेहरे को देख रहे थे।

"क्या मैं सच मे भाग के शादी कर रही हूं?" रिया ने बड़ी आंखे कर के पंकज को देखा और देखती रही,जब तक पंकज ने कहा नही दिया।

"हाँ।"
 
"तू पागल हो गया है? रिया तू ये इन लफड़ों में नही पड़ेगी।अंकल से बात मैं करुँगी।"

"निशी सोच मैं अपने बच्चों को सुनाऊँगी कि लोग लड़कियां भगाते हैं,यंहा उनकी माँ भाग कर गई थी शादी करने।सो एडवेंनचरस न?"

"तुम दोनों का हो गया?सिर्फ बकवास ही करती हो।कोई और अक्ल वाली बात ही नहीं।एक मैं अकेला क्या-क्या संभालूंगा?"

पंकज की इस बात पर मैं और रिया एक साथ पंकज को घूरने लगे।वो फिर बोला।

"हाँ मतलब मैं और रवीश।"

हम दोनों का घूरना अब भी जारी था।

"देखो ऐसा है कि तुम दोनों के घूरने से कुछ नही बदलने वाला।तुम दोनों कर ही रही हो बकवास।मैं क्या करूँ?"

"मुँह बन्द कर ले पंकज वरना अब दो लड़कियों से भरे मन्दिर में पिट जाएगा।" रिया ने कहते हुए मेरे हाथ पर ताली मारी।

"अच्छा बन्द कर लिया मुँह अब आगे सुनो, पैसे कितने हैं तुम दोनों के पास?"

"5000 होंगे।" रिया बोली।

"मेरे पास कुछ 45 हज़ार।" मेरे बोलने पर रिया और पंकज ने आश्चर्य भरी नजरो से मुझे देखा।

"क्या हुआ?"

"निशी,45 हजार कैसे?"

"अब पिछले दो महीनों से कमा रही हूँ, घर से भी पैसे आते ही हैं।जो कमा रही हूँ वो सब बचा के रख रही हूँ।"

"बहुत सही।रिया सुन।तुझे अभी निशी से पैसे लेकर एक मंगलसूत्र,पैर की उंगलियों में कुछ पहनते हैं शादी के बाद वो.."

"बिछिया बोलते हैं उसे पंकज।"

"हाँ-हाँ, वही। समंझ गई ना? दो साड़ी।कुछ कपड़े और जो भी कुछ तुम्हें समंझ आए,शादी के हिसाब से।"

"लेकिन मैं निशी से पैसे नही ले सकती न?"

"क्यों?क्यों नही ले सकती?नखरे मत मार।उधार दे रही हूँ।सूत समेत वसूल लूंगी रवीश जीजू से।"

"जीजू? सुन रवीश बस।नो जीजू।"

"क्यो?क्यों जीजू नहीं? मैं तो बोलूंगी। जूते भी चुराउंगी।"

"तुम दोनों फिर शुरू हो गईं न? रिया मेरी बहन अभी पैसे निशी से ले ले।बाद में रवीश सब दे देगा।मेरी सब बात हो गई है।"

"तू इतना होशियार दिखता तो नही जितना बन रहा है।" रिया ने पंकज की खिल्ली उड़ाते कहा।

"बेटा हम वो चीज हैं जो तुम्हारे दिमाग को छूकर निकल जाएंगे और दिल मे भी नही आएंगे।"

"ये क्या था?" मैंने पंकज के इस सड़े डायलॉग पर बहुत गंदा मुँह बना कर कहा।

"तुम नही समझोगी जाना।प्यार तूने क्या किया?"

"तू पागल हो गया है पूरा।"

"आपके प्यार ने हमें क्या-क्या नही बना दिया।"

"तुम दोनों अपना-अपना प्यार और रोना बन्द करोगे?"रिया हमारी नोकझोक से झुंझला गई।

मेरा फोन बजा और मैं उठ कर सीढ़ियों के नीचे आ गई।

"निशी, कंहा हो? बहुत देर हो गई और तुम एक्सरसाइज के लिए भी नही आईं?"

"अभ्युदय जी वो रिया की शादी करानी है ना तो.."

"रिया की शादी? कब? कैसे? करानी है मतलब?"

"अभ्युदय जी मैं अभी आधे घंटे में आपके पास पहुच रही हूँ।फिर सब बताती हूँ।आप एक्सरसाइज कीजिए तब तक।"

"ठीक है।कुछ करने के पहले बता जरूर देना।मैं अच्छी सलाह ही दूंगा।"

"जी अभ्युदय जी।"

"निशी, सुनो।"

"जी,सुन रही हूँ कहिए।"

"वेदी ने हमेशा मुझसे प्यार किया।आज भी करती है पर.."

"पर क्या अभ्युदय जी?"

"पर मैं सिर्फ अपनी पुच्चू को प्यार करता हूँ।"

"ये पुच्चू।उफ्फ मुझे नही पसन्द ये नाम।आप कब कहेंगे जो मैं सुनना चाहती हूँ?"

"जाओ पंकज से शादी करो तुम।बाय।जल्दी आ जाना6 पुच्चू।"

"ओके बाय,जा रही हूँ।रिया के साथ खुद भी कर लूंगी अब पंकज से शादी।"

"लव यू पुच्चू।" मैंने फोन काट दिया और वापिस आ गई दोनो के पास।

पंकज और रिया की लिस्ट और एस्टिमटेड खर्चा कितना होगा सब तैयार था।लिस्ट में मेरे और पंकज के लिए भी नए कपड़ो के लिए नाम था।

अब हमारे पास ज़्यादा दिन नही थे और काम बहुत था।हम तीनों कल मिलने का प्लान करके निकलने लगे।रिया अपनी गाड़ी उठाकर जाने को हुई तो मुझे एक्टिवा की याद आई।वो भी तो वापिस करनी है।घर के पास रिया छोड़कर चली गई।

मैंने रुम पर जाकर एक बार चेहरा धोया और काजल लगाकर वालेट उठाकर बाहर निकली।ताला लगा ही रही थी कि आंटी आ गई।

"कंही जा रही हो?अभी तो आई हो न?"

"ऑन्टी वो पेशेंट देखने।आज थोड़ा लेट हो गई।"

"नई गाड़ी ले ली है निशी?"

"नही आंटी वो पेशेंट की ही है।अभी वापिस करनी है।"

"अच्छा जाओ जल्दी,जल्दी आना।देर हो रही है और मत करो।"

"जी आंटी बाए।"

मैंने ईयर पीस पर गाने चलाये और गाड़ी पर निकल गई।

बारिश की रिमझिम बूंदे पड़ने लगीं।मैं मस्ती में चली जा रही थी।धन्वन्तरि पर पहुचते ही लाइट कट ऑफ हो गया।एक दम से अंधेरा होते ही मेरी गाड़ी लड़खड़ा गई और मैं गिर गई।

हाथ से खून,माथे पर चोट उससे खून और पैर पर पड़ी एक्टिवा।समंझ नही आया क्या करूँ और बेहोश।

जब होश में आई तो हाथ में चार टांके लग चुके थे।पैर में प्लास्टर और माथे पर पट्टी।सामने खड़ा था पंकज।

"मैं।मेरा फोन?पंकज वो गाड़ी?"

"गाड़ी ठीक है,कुछ स्क्रेच हैं और ज्यादा कुछ नही हुआ है।लेकिन तुम्हारे पैर की हड्डी की तरह उसका भी एक मिरर टूट गया है।"

"मेरी हड्डी?शिट शिट शिट हाऊ कैन आई बी सो इर रिस्पांसिबल।नही..sssss4 प्लीज भगवान जी अभी क्यों?"

मैं अपना दर्द भूल कर रिया की शादी की शॉपिंग और जाने के बारे में सोच रही थी।

रिया और अभ्युदय जी भी वार्ड के रूम में पहुच गए।मेडिकल में पढ़ने का सबसे बढ़िया फायदा यही था आपको स्पेशल रूम मिल जाता था।

"ठीक हो?"

अभ्युदय जी ने पास आकर चेयर पर बैठ कर कहा।

"हम्म ठीक हूँ।"

रिया ने पास आकर झुक कर मुझे गले लगा लिया।

"तू ठीक है न? ऐसे दुबारा डराया न मुझे तो जान ले लूंगी तेरी।"

"मैंने क्या डराया?मैं तो खुद डरी हूँ अभी।बहुत दर्द हो रहा है।"

मैं एक हाथ अभ्युदय जी के हाथ मे रखकर और दूसरा हाथ रिया के हाँथ में देकर कब सो गई पता नही।के हाँथ में देकर कब सो गई पता नही।
 
जब होश आया तब पास ही चेयर में रिया सो रही थी और दूर वाली चेयर में बैठा पंकज मुझे देख रहा था।

"तुम ठीक हो न?"

"हम्म.. ठीक हूँ।तुम दोनों घर नही गए?अभ्युदय जी?"

"अभ्युदय जी तुम्हारी हालत का जिम्मेदार खुद को समझ रहे हैं।कहते हैं कि न गाड़ी ले जाने को कहता, न गिरती, न चोट लगती।"

"पर इसमें उनकी क्या गलती है?"

"उनका बी.पी बढ़ रहा था इसलिए उन्हें भेज दिया है।एक बार बात कर लो उनसे।"

"टाइम क्या हो रहा है?वो सो रहे होंगे।"

"निशी, तुम भी जानती हो वो इस समय,यंहा नही हैं तुम्हारे पास।वो सो नही रहे होंगे।"

कैसा अजीब लड़का है?एकतरफ मुझे प्यार का इजहार करता है दूजी तरफ अभ्युदय जी की मोहब्बत को कितनी अच्छी तरह समझता है।इतना अच्छा कोई होता है क्या?ये सिर्फ दिखावा है।हां दिखावा ही हो सकता है।क्योंकि प्यार में तो जलन होती है।इसे जलन नही होती क्या?

"निशी sss"

मैं भी क्या-क्या सोच रही हूँ।समंझ नही पा रही।

"निशी बात करो।" पंकज ने मुझे फोन पकड़ा दिया।

"निशी, पुच्चू ठीक हो न?"

"अभ्युदय जी,मैं बिल्कुल ठीक हूँ।आप कैसे हैं? बी पी बढ़ा लिया न?"

"तुम्हें कुछ हो गया तो मैं कैसे रहूंगा?"

"मतलब?"

"मतलब,मैं बहुत ज्यादा.."

"कहिए न?"

"कुछ नही निशी।ठीक हो जाओ जल्दी।"

"नही होऊँगी।बिल्कुल भी नही।देखना यंही पर इसी बेड पर मैं मरी मिलूंगी।"

"बकवास मत करना अब दुबारा।"

इतनी तेज से बोलकर अभ्युदय जी ने फोन काट दिया।

"फोन काट दिया?ठीक है,मत करो बात।मेरी कही बात जो सच हो गई न तब देखना,रोते रहना तब सब।"

मेरी बड़-बड़ से रिया जाग गई।

"तुझे सब्र नही था न?मेरी शादी के बाद तोड़ती न टांग।अब लंगड़ी घोड़ी बनकर नाचना।नालायक।"

"तू मेरी लायक।मैं जानकर अपना पैर तुड़वा कर आई हूँ क्या?"

पंकज का फोन फिर बजा।अभ्युदय जी का फोन था तो मैंने उठा लिया।

"कहिए।"

"निशी, दुबारा कभी मत कहना जो आज कहा।"

"आप रो रहे है?अभ्युदय जी?"

"नहीं मैं नही रो रहा।बस कह रहा हूँ तुम्हे,बता रहा हूँ मुझे छोड़कर कभी भी,कंही भी गई तो मैं जान.."

"क्या जान?ले लेंगे?या दे देंगे?"

माहौल को हल्का करने की कोशिश नाकामयाब हुई।

अभ्युदय जी की आवाज में बहुत उदासी और रोना साफ महसूस कर रही थी मैं।

"निशी जल्दी ठीक हो जाओ।"

"जी अभ्युदय जी।"

मैंने फोन रख दिया और अभ्युदय जी के बारे में सोचते ही मेरी आँख कब लग गई नही जानती।

दर्द का एहसास तो था पर शायद दवाइयों का नशा अधिक था।

रात बीत गई।सुबह जब आंख खोली तो रिया पंकज के चेहरे पर चिंता साफ झलक रही थी।

"क्या हुआ तुम दोनों को?"

"तू जाग गई?कैसा लग रहा अब?"

"मैं ठीक हूँ।तुम दोनों को क्या हुआ?बोलोगे कुछ?"

"तू नही जा पाएगी दिल्ली।"रिया के आंखों से आंसू गिरे।

"मैं जाऊंगी।चाहे कुछ भी हो जाए।समझ गई।"

"निशी पर तेरी हालत देख।कैसे चल पायेगी?"

"मैं चल लूंगी।तू फिकर मत कर समझी।"

"यार टिकट में भी दिक्कत आ रही है। सब कुछ गड़बड़ हो रहा।"

अभ्युदय जी ने कमरे में एंट्री ली।

"कैसी हो निशी?"

"ठीक हूँ अभ्युदय जी।" मैं वाकई अभ्युदय जी को देखकर ही अच्छा फील करने लगी थी।

"पंकज रिया तुम दोनों जल्दी घर जाकर फ्रेश होकर आ जाओ। मैं तब तक हूँ।खाना घर से आ जायेगा।"

"मैं रुकती हूँ, पंकज तू जा और सो लेना थोड़ा।आंखे देख जरा बीमार मत हो जाना तू।"

पंकज मुझे ख्याल रखने का कहकर और शाम को आने का कहकर निकल गया।

अभ्युदय जी ने फिर रिया से कहा कि मेरे रूम पर जाकर थोड़ी देर आराम कर के आ जाए।रिया मानने तैयार नही थी तो मैंने ही जोर देकर उसे भेज दिया।

अब उस रूम में मैं और अभ्युदय जी ही थे।

"दर्द कैसा है?"

"आपको देखकर ठीक हो गया।" मैंने बहुत प्यार से मुस्कुराते हुए अभ्युदय जी से कहा।

"तब तो मैं अपना नाम चेंज करके एनाल्जेसिक रख लेता हूँ।"

"हाहा अच्छा रहेगा।"

"घर पर बात की?घर पर बताया?"

"नहीं।मेरा तो फोन ही नही मिला मुझे।"

"लो मेरे फोन से बात करो।अपने माँ पापा को बताओ।"

"माँ को फोन किया तो अब से लेकर तब तक रोयेंगी जब तक मुझे भी नही रुला लेंगी।पापा जी को करती हूँ।" मैंने फोन लगाया।

"पापा जी,निशु बोल रही हूँ।"

"ये किसका नम्बर है बेटा?कल से फोन भी नही लग रहा तुम्हारा।माँ परेशान हो रही थीं।"

"वो कल शाम को एक्सीडेंट हो गया है पापा जी।थोड़ी चोट आई है और एक पैर में हेयर लाइन फ्रैक्चर हो गया है।अभी मेडिकल में ही हूँ, प्लास्टर बंध गया है और हाथ पर टाकेँ भी। डरने की बात नही है कुछ भी।लेकिन फोन टूट गया है और मिला भी नही कंहा गया।"

"गाड़ी अब मत चलाना बेटा।मैं आकर अब नई गाड़ी दिलवा देता हूँ।हम एक घंटे में निकल कर 12 बजे तक पहुच जाएंगे जबलपुर।ये नम्बर किसका है?"

"पापा जी ये नम्बर अभ्युदय जी का है।जिनकी फिजियोथेरेपी करवाती हूँ।आप रिया के नम्बर पर कर लीजियेगा हो सकता है तब तक अभ्युदय घर निकल गए तो।"

"मैं फोन भी ले लेता हूँ नया।माँ को फोन किया क्या?"

"नहीं पापा जी।वो माँ का रोना.."

"हम्म बिल्कुल ठीक किया।चलो हम लोग निकलते हैं,मैं घर निकलता हूँ अभी पहले।"

"जी पापा जी।आराम से।मैं ठीक हूँ।"

"ख्याल रखो अपना।"

"जी पापा जी।"

अभ्युदय जी हमारी बातें सुनते रहे और कुछ भी नही बोले।

मैंने फोन लौटाया और बताया कि पापा मम्मी आ रहे हैं।

"तुम सब कंहा जाने की प्लानिंग कर रहे हो निशी?टिकट कंहा का हो रहा है?"

"वो4 वो कुछ भी..कंही भी तो नही।"

"सच बोलना और कोई झूट नही।"

"रिया की शादी करानी है।दिल्ली जाने का प्लान है।लेकिन..?"

"लेकिन क्या?"

"अब मैं कैसे क्या करूँगी नही जानती।"

"दिल्ली जाकर क्यों?शादी जबलपुर में भी तो हो सकती है न?"

"लेकिन यंहा किसी को पता लग गया और रिया के पापा ने"

"और सब कुछ अच्छे से हो गया तो?"

"हो सकता है क्या?" मैंने आश्चर्य से भरा चेहरा अभ्युदय जी की तरफ किया।

"पंकज को फोन लगाओ।"

"मुझे नम्बर नही याद अभ्युदय जी।"

"क्यों?"

"जरूरत ही नही पड़ी कभी।माँ पा रिया और आपका नम्बर याद है।"मैं बोलती चली गई और अभ्युदय जी की मुस्कान पर खुद भी मुस्कुरा पड़ी।

"मेरा नम्बर याद है?हम्म"

"क्या हम्म ??? क्या हम्म हाँ याद है।इजी नम्बर है आपका इसलिए याद है। 98261 तो आईडिया की सीरीज ही है उसके बाद आपके बर्थडे का सीक्वल क्यों नही याद होगा?"

"अच्छा जी। रिया को लगाओ फोन।"

रिया को फोन लगा कर मैंने अभ्युदय जी को फोन दे दिया।

"रिया पंकज का नम्बर मेसेज करो।"

"जी अभ्युदय।"

रिया ने नम्बर भेज दिया।अभ्युदय जी ने पंकज को फोन किया।

"ये नम्बर तो है मेरे पास।कल तुमने फोन किया था।"

फोन लगा कर पता नही अभ्युदय जी ने पंकज से क्या बातें की।

अगले एक घण्टे में पंकज वापिस रूम पर था।

"देखो पंकज मैं यंहा आर्य समाज वाले पंडित जी को भी जानता हूँ और कोई भी दिक्कत नही होगी उसकी रिस्पांसिबिलिटी मेरी।तुम बस उसे बुला लो जिससे शादी होनी है।"

"अभ्युदय जी, बात करता हूँ रवीश से।उसका आना ज्यादा आसान होगा।वंहा जाकर सब कराना मुश्किल है।मैं बात करता हूँ उससे।" बोलकर पंकज वार्ड के रूम से बाहर निकल गया।

"मतलब रिया की शादी यंही होगी?वाओ मजा आएगा।"

"तुम तो यंही रह जाओगी।ओर मत दो खुद पर ध्यान।"

"अभ्युदय जी।ऐसे मत कहिये।रिया की शादी होगी और मैं यहीं?"

"देखते हैं अभी क्या होता है।आने तो दो पहले उसे जिससे शादी होनी है।"

"आह।"

पंकज और अभ्युदय जी साथ ही बोल पड़े।

"क्या हुआ?"

"तुम ठीक हो निशी?"अभ्युदय जी बोले।पर मैंने कुछ भी नही कहा।

"अभ्युदय जी कुछ पूछ रहे हैं निशी।तुम ठीक हो?"

"हाँ पंकज ठीक हूँ।"

तभी रिया और माँ पापा साथ ही आ गए,भैय्यू भी आया है साथ।

"कैसे चोट लग गई बेटा?बहुत दर्द हो रहा होगा?बिल्कुल भी नही घबराना हम आ गए हैं।डरना नही बिल्कुल भी।"

"माँ sss मैं ठीक हूँ।आप रोना बन्द कीजिए।बिल्कुल ठीक हूँ, कुछ भी नही हुआ।जरा सा, एक बाल बराबर लाइन जित्ता फ्रैक्चर है।मैं बिल्कुल ठीक हूँ।"

"चेहरे पर सूजन है,पट्टी हर जगह बंधी है फिर भी कह रही है कुछ नही लगा।देख रहे हैं अपनी बहादुर बिटिया को?"

"निशु,दर्द तो नही है बेटा?डॉक्टर ने क्या कहा है?"

"सब ठीक है पापा जी।डॉक्टर भी अभी आते ही होंगे।भैय्यू भी रो रहा है क्या?" मेरे भाई को प्यार से भैय्यू ही कहती हूं।वो दरवाजे पर ही रुककर मुझे देख रहा था और रोने की एक्टिंग थी या आंसू वही जाने।

"दी दर्द हो रहा?"

"नहीं बिल्कुल भी नही।मैं ठीक हूँ।कब से हैं एग्जाम?"

"आप ठीक हो जाओ फिर बताऊंगा सब।"

थोड़ी देर माँ के रोने और बातें खत्म होने के बाद अब पंकज और अभ्युदय जी से इंट्रो की बारी आई।

"ऑन्टी ये हैं अभ्युदय जी।"

"नमस्ते।" अभ्युदय जी ने अपना सिर हिला कर माँ पा दोनों को नमस्ते कहा।पापा जी और अभ्युदय जी की बातें शुरू होने को ही थी कि रिया बोली।

"और ये हैं पंकज जी।एक अभ्युदय सिंह ये दूसरे पंकज सिंह।"

सिंह सुनकर मेरी माँ के कान खड़े हो चुके थे।माँ को कोई भी लड़का ठाकुर मिल जाए बस वो अपनी इस बेटी की शादी के ख्वाब सजाने लग जाती हैं।

पंकज ने बढ़कर माँ पापा के पैर छुए।अब तो माँ की नजरों में पंकज पास हो चुका था।

माँ पंकज के पास पहुचकर उससे ढेरों बातें करने में लगी थीं।पापा जी अभ्युदय जी से पता नही किस गहन विषय पर चर्चा कर रहे थे।रिया पंकज और माँ की बातों के बीच मे थी और मैं सबको निहार रही थी।भैय्यू पास आया,मेरे ही पलंग पर बैठ गया।

"दर्द हो रहा दी?"

"नही।ज्यादा नहीं।"

"ये दोनों कौन हैं?"

"दोस्त है दोनों।अभ्युदय जी की ही फिजियोथेरेपी करवा रही हूँ।"

"ग़जनी का आमिर?"

"हा हा।ऐसा क्यों बोला तुमने?"

"देखने में आमिर खान से नही लग रहे?"

"हम्म हैं तो।"

"ग़जनी का गाना याद करो।कैसे मुझे तुम मिल गईं, किस्मत पे आये न यकीन।उतर आई झील में,जैसे चाँद उतरता है कंही।धीरे-धीरे हौले से।"

हम दोनों चिल्ला-चिल्ला के ये गाना कब गाने लगे हम दोनों भी नही जानते।सभी हमारी तरफ देखने लगे।लेकिन हम दोनों गाने में ही मशगूल रहे।
 
खाना लेकर अभ्युदय जी की मम्मी भी आ गईं थीं।मुझे जरा भी अंदेशा नही था कि वो भी मुझे मिलने आएंगी।

माँ से मिलकर आंटी की ढेर सारी बातें हुईं।आज पता चला कि अभ्युदय जी परिहार हैं।कितनी विडम्बना है ना?

एक पंकज सिंह तोमर

एक अभ्युदय सिंह परिहार

हमेशा ही सिंह सर सुना।आंटी जी शादी के पहले सेंगर थीं।जब आपस मे बहुत से ठाकुर बैठे हों न तो बातें सिर्फ यही होती है।

मैं और भैय्यू अब भी वैसे ही बैठे थे।

"दी शादी पक्की समझो।"

"किस से?"

"आपको कौन पसन्द है?"

"वो।"अभ्युदय जी की तरफ इशारा किया मैंने।

"तब तो उस से होगी देखना।" भैय्यू ने पंकज की तरफ इशारा किया। मुझे गुस्सा आ गया।

"क्यों?ऐसा क्यों होगा भला?"

"क्योंकि माँ की मर्जी चलनी है और वो जो जी हैं आपके,बड़े लग रहे आपके सामने।उनके साथ जोड़ी कमाल की।"

"भैय्यू, मुझे लेकिन अभ्युदय जी से ही शादी करनी है।"

"मुझे क्या किसी से भी हो।मुझे तो अपने जीजा जी से मतलब होना है।कमरा तो मेरा हो ही गया है।अब सारी जमीन जायदाद भी मेरी।"

"शैतान।तुझे बड़ी पड़ी है जैसे ज़मीन जायदाद की।"

"दी दर्द कम हुआ?"

"नहीं बढ़ रहा है पर पैर में नही दिल में।माँ को पंकज से दूर रखना।"

"चिंता मत करो।ऐसा कुछ नही होना है।रिश्ता आया है एक आपके लिए।"

"क्या?कब?बताया तो नही माँ ने।"

"अरे वही जो बचपन से आ रहा है।यू पी वाले अंकल का शाहरुख खान सा छोरा, अपना वो धनेन्द्र।"

"प्लीज अभी भी?उसकी शादी नही हुई अब तक?"

"नहीं उसकी जिद है शादी करेगा तो चौहान अंकल की लड़की से।"

"शक्ल देखी है उसने अपनी?"

"अरे बड़ा स्मार्ट हो गया है दी।कनाडा में है आजकल।"

"मुझे नही करनी उससे शादी।"

"फ़ोटो दिखाऊँ?"

"नहीं।मुझे नही देखना।"

"सच्ची बताओ।"

"मार खायेगा भैय्यू।"

आंटी ने बोला चलो सब खाना खा लो।रिया माँ को घर ले जाने का बोलती रही पर माँ नही गईं।खाना खाकर पापा जी और भैय्यू रूम पर चले गए थोड़ी देर रेस्ट, करने।

माँ और आंटी अब भी बातें कर रही थीं।अभ्युदय जी खड़े-खड़े मुझे घूर रहे थे।पंकज को अचानक न जाने क्या हुआ।

"अभ्युदय जी जल्दी चलिए।"

"कंहा पंकज?"

"कुछ काम है जल्दी चलना होगा।"

"कुछ बताओगे?"

"यंहा नही।समझिए न?"

अभ्युदय जी पंकज के साथ निकल कर बाहर चले गए।

अभ्युदय जी की माँ मेरी तारीफ पर तारीफ कर रही थीं और मेरी माँ हंसती हुई हां जी-हां जी कर रही थीं।

रिया मेरे पास बड़े उदास और चिंता भरे मुँह को लेकर पहुँची।

"क्या हुआ तुझे?"

"मेरी शादी।"क्या कैसे?होगी भी या नही?"

"तू परेशान मत हो सब होगा।"

"कैसे होगा यार?वो रवीश के पेपर में से एक पेपर पोस्टपोंड हो गया है,5 दिन बाद होगा अब।"

"कब?किसने कहा?"

"उसने ही बताया।"

"अच्छा है ना? हमें शॉपिंग का टाइम मिल गया।" ये अभ्युदय जी और पंकज का ही प्लान था कि रिया को कुछ भी पता न चल पाए।वरना करेगी कुछ नही बस बच्चो को स्टोरी सुनाने के चक्कर में खुद ही भाग कर जाने की जिद करेगी

"छोड़ न।तो तू ये बता लहँगा कैसा चाहिए?"

"जैसा काजोल ने पहना था कुछ-कुछ होता है में।"

"काजोल ने? वो गोल्डन?"

"हाँ।बिल्कुल वैसा ही।"

अब तो गए।वेदी ने न जाने क्या पसंद किया होगा इस झल्ली के लिए।

"लेकिन शादी में लाल रंग ही पहनते।तू ये मूवी का छोड़ हिसाब-किताब समझी।"

"लेकिन मुझे.. तो वही पहनना है।"

"नहीं लाल।मतलब लाल।वैसा तो मैं पहनूँगी।साली आधी घरवाली।"

माँ ने न जाने हमारी क्या बात सुन ली।

"कौन साली?किसकी घरवाली? किसकी शादी है?"

"माँ रिया की।"

"रिया की शादी हो रही है?कब?"

"ये तो रोज ही शादी करती है माँ।सपनों में।वही सुना रही थी।"

"अच्छा।रिया तुम भी घर जाकर आराम कर लो।मैं हूँ निशु के पास।"

"जी आंटी जी।"

अभ्युदय जी और पंकज आ चुके है।अभ्युदय जी की माँ भी रिया के साथ ही नीचे आ गईं।

अभ्युदय जी मेरे पास आकर बोले।

"अपना ख्याल रखना।मैं अपनी एक्सरसाइज कर लूंगा।रात को आता हूँ।"

"नहीं बेटा।आप रेस्ट करना अब।मैं हूँ न।आप सभी ने निशु का इतना ध्यान रखा है उसके लिए बहुत आभारी हूँ।"

"नहीं माँ, इसमे आभार क्या?" अभ्युदय जी के मुंह से अपनी माँ के लिए माँ सुनना बेहद खुशी का पल था।

"एक बात कहूँ माँ?"

"कहिये अभ्यु बेटा।"शायद माँ को भी आंटी की तरह अभ्यु नाम अच्छा लगा।

"निशी बिल्कुल आपकीं ही तरह है।बिल्कुल आपकीं परछाई।स्वभाव भी, नैन नक्श से लेकर,रूप सौंदर्य में भी।"

"सच कह रहे हैं आओ।ये मेरी ही परछाई है।आप जाकर आराम कीजिये और माँ से कहिएगा अब रात के खाने के लिए परेशान न हों वो।हम जाकर बना लाएंगे अभी।"

"नहीं माँ।आपको परेशान नही होना है।घर से बनकर आ जायेगा खाना सब।आप भी चलिए आराम कर लीजिए।"

"नहीं बेटा हम है निशु के पास।"

"ठीक है माँ।पंकज भी यही है।"

अभ्युदय जी चले गए।मैं और माँ गप्पे मारते रहे।पंकज टेबल पर बैठ गेम खेलता रहा।

खाने के बाद खाई दवाइयों से बेहोशी चढ़ने लगी।मैं कब नींद के आगोश में गई खुद भी नही जानती।

2 से 3 घंटे सोने के बाद जब जागी तो देखा माँ और पंकज बातें करके हंस रहे हैं।पता नही क्या बात कर रहा होगा ये?कुछ उल्टा सीधा न बोल दे।मेरी तरफ देखकर पंकज बोला

"जाग गई?"

"हम्म।"

"कैसा लग रहा अब?"

"ठीक हूँ।"

पंकज ने पास आकर सिर पर हाथ रखा।

"बुखार तो नही है।"

"बुखार थर्मामीटर से देखते।"

"तुम अब ज्यादा डाक्टर न बनो।पढ़े नही तो क्या हुआ।हमें भी पता बहुत कुछ।"

"हाँ-हाँ।मेडीकल में ही एडमिशन क्यों नही ले लेते तुम?चौबीस घण्टे रहना तो यंही होता है तुम्हारा।"

"पता होता जो गर

कि तुम मिलोगी यंहा।

खुदा कसम कहते हैं

जान लगा देते पर डॉक्टर ही बनते।"

"हाहाहा"

"मैडम निशी हाहा नही वाह वाह कीजिये।"

"रहने दो जो सुनाया वो हाहा का ही हकदार है।"

माँ हम दोनों को देख मुस्कुराती रही कुछ भी नही कहा।बस मुस्कुराते हुए उसकी आंख से आंसू न निकले।

ये माँ की आंखों में कौन सी टँकी फिट है?भगवान ही जाने।ये कभी खाली नहीं होती।
 
रात का खाना बनाने के लिए माँ को रूम पर जाने की पड़ी थी पर पंकज ने माँ को अपनी बातों में उलझा रखा था।पापा जी और भैय्यू आ गए थे साथ ही चाय,समोसे लेकर।

चाय समोसे खाते अभी देर हुई ही न थी और राउंड पर HOD सर आ गए।

पापा जी सर के एकदम करीब आ गए।

"हाऊ आर यू निशी?"

"एम गुड सर।"

"सर हाऊ मच टाइम शी विल टेक तो रिकवर?"

पापा जी ने सर से पूछ ही लिया।

"निशी, योर फ़ादर?"

"यस सर।"

"सर निशी विल टेल यू आल द डिटेल्स।आफ्टर आल शी इस वेरी गुड इन ऑर्थो।टेक केयर निशी।"

"थैंक्यू सर।"

सर के जाते ही मैंने पापा जी को देखकर कहा।

"डरने सी कोई बात ही नही है पापा जी।फ्रैक्चर अभी 2 हफ़्तों में ही जुड़ जाएगा।"

"ठीक है निशु।मैं आज निकल जाऊंगा रात को।भैय्यू भी जाएगा साथ।माँ को यंही रहने देते हैं थोड़े दिन।"

"नहीं पापा जी।परेशान क्यों होना है?घर पर खाना कौन देखेगा?यंहा सब मैनेज हो जाएगा।"

"अच्छा तो अब नही जरूरत, तुम्हे माँ पा की?"माँ ने गुस्से में कहा।

"नही माँ ऐसी बात नही है।आप ही बताइए भैय्यू के एग्जाम होने हैं।बाहर का खाकर बीमार पड़ गया तो?"

"बात सही बोल रही है निशु।तुम भी न,बस गुस्सा हो जाया करो बच्ची पर।"

पापा जी ने मेरी साइड ली।मेरे दिमाग मे तो बस रिया की शादी चल रही थी।माँ पा के यंहा होने पर तो हो गई शादी।

माँ का फिर भी आज ही जाने का मन नही था।पंकज हमारे फैमिली मेटर में कूद पड़ा और बोला।

"मैं कल स्टेशन जाकर आंटी को ट्रेन में बैठा दूंगा आप वंहा उतार लीजियेगा। आज रात रुक जाने दीजिए अगर मन है उनका तो।"

मेरी माँ ने तो बस मन ही मन इसे ही अपना जमाई मान ही लिया होगा।इतना अपनापन,इतना प्यार ओहो..पंकज ने तो बाजी मारने के कोई चांस नही छोड़े।

पापा जी और भैय्यू निकलने ही वाले थे रूम के लिए और फिर स्टेशन कि सामने से सिंह सर आ गए।सिंह सर ने पापा जी को चौहान साब बोलकर हाथ मिलाया।जब से अभ्युदय जी और सर की बात होने लगी है मुझे कम डांट पड़ती है।वरना तो सर के नाक पर गुस्सा ही रहता था हर वक्त।

"मैं डॉ सिंह,अभ्युदय का पापा।"

"चौहान।आइये सर।"

"कैसी हो निशी?

"फाइन सर।"

"यू आर लुकिंग फाइन।"

सिंह सर ने माँ को भी हाथ जोड़कर नमस्ते किया।

सर के हाथ मे एक पैकेट था।उन्होंने पैकेट मेरे पास रखा और बोले।

"योर फेवरेट इडली डायरेक्ट फ्रॉम कॉफ़ी हाउस।"

"थैंक्यू सर।"

"टेक केयर निशी।यू आर ब्रेव डोंट फॉरगेट।ok"

"यस सर।थैंक्यू।"

थोड़ी देर की बातचीत के बाद पापा जी और सर साथ ही निकल गए।

रिया भी आ गई और अभ्युदय जी भी।अभ्युदय जी खाना साथ लेकर आये थे।आज रात वार्ड के साइड रूम में पार्टी का माहौल था।माँ थकी जरूर थीं पर उन्हें अच्छा लग रहा था सबके साथ बैठकर अपने कुछ पुराने किस्से सुनाना।

रात के 2 बजे नर्सिंग स्टाफ ने आकर शिकायत भरे लहजे में कहा

"नहीं सोना, मत सो।शोरगुल कम करो आप लोग प्लीज।दूसरे मरीज भी परेशान हो रहे हैं।"

अभी तक उसने मुझे देखा ही नही था,लेकिन जब देखा तब बोली।

"डॉ निशी?आपको क्या हुआ?"

मुझे गहरी नींद की झपकी आने लगी।समंझ ही न आया क्या बताऊँ।

पंकज फिर बोला।

"आ रही थीं भाग कर हम से शादी करने बीच मे ही खुद टूट गईं।"

सिस्टर जी ऊपर से नीचे पंकज को देख कर बोलीं।

"हम जानते हैं वो किसके लिए भागेंगी,किसके लिए नहीं।रोज मिलते हैं डॉ.निशी से,जानते हैं उनकी पसन्द ना पसन्द।"

पंकज और नर्स की बहस होती रही थोड़ी देर पर बाहर से आवाज आने पर सिस्टर जी चली गईं।

माँ ने पंकज के पास सिर पर हाथ रखकर पूछा।

"पसन्द है निशी तुम्हें?"

"अरे,नहीं आंटी जी।ये पागल है, आधा नही पूरा।"रिया ने बीच बचाव करते हुए कहा।

मैं पूरी तरह नींद के आगोश में जा चुकी थी।
 
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