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अधूरी ख़्वाहिश

रवीश के माता पिता जी के जाने के बाद रिया की क्लास लग गई।

"क्यों पैर छुए तुमने?किसने कहा था?"

"पापा मैंने तो सोचा आपको अच्छा लगेगा।संस्कारीत लगूंगी।"

"लेकिन जब मैंने नही कहा तो क्या जरूरत थी?"

"पर हुआ क्या पापा?आप ही रिश्ता लाएं हैं न?मैं थोड़े न अपनी पसंद का लड़का लेकर आ गई हूँ क्या हुआ आपको अचानक?"

"अभी तुम्हारे ताऊ जी से बात करनी होगी इस बारे में।तिवारी में शादी की जा सकती है कि नहीं?"

"क्या पापा आप भी।राधिका दीदी की शादी भी तो त्रिवेदी में हुई है।फिर ये तिवारी में क्या दिक्कत होगी?" रिया का तर्क बिल्कुल सही था।राधिका दीदी ताऊ जी की ही बेटी हैं।

"लेकिन एक बार पूछना तो होगा ही।बात करते हैं हम। तुम पढ़ाई करो अभी।"

"पापा अब कोई फ़ोटो नही देखूंगी मैं।शादी करानी है तो रवीश से करवा दीजियेगा। अब कोई नया रिश्ता नहीं।"

"बड़ो से बात होने दो। मुझे भी पसन्द है रवीश।"

"ठीक है।चल निशी आज पेस्ट्री पापा की तरफ से।"

"ये..sss तू चेंज कर ले।ऐसे ही जाएगी क्या?"

"क्यों साड़ी में अच्छी नही लग रही क्या?"

"हम्म लग तो लल्लनटॉप रही हो पर कोई पीछे पड़ गया तो?"

"चल न यार।"

अंकल ताऊ जी को फोन लगा कर बात कर रहे थे और हम दोनों आजाद बेकरी आ गए मेरी फेवरेट कोकोनट चॉकलेट पेस्ट्री खाने।

पेस्ट्री खाने के बाद।मैंने रिया को जनरेशन स्टूडियो दिखाया।

"चल जब तैयार है ही तो एक फोटो भी खिंचवा ले।क्या पता कल को रवीश से शादी नही हुई तो अंकल को फ़ोटो दे देना।इसे दिखाओ मुझे नहीं।"

"आईडिया सही है बे तेरा। चल।"

हम दोनों जनरेशन स्टूडियो में पहुच गए।बहुत पोज़ देने के बाद दो चार फोटोज अच्छी दिखीं।क्योंकि रिया मैडम का मुंह बंद हो जाये और वो शांति से फ़ोटो खिंचवा ले पॉसिबल नहीं।

लेकिन मेरा फोन आया और मैं जब बाहर आ गई तब उसकी पिक्स अच्छी क्लिक हुईं।

"हेलो।"

"निशी।अब भी नाराज हो?"

"पंकज?ये कौन सा नम्बर है?"

"मुझे लगा मेरे नम्बर से फोन नही उठाओगी तो..इसलिए।"

"देखो पंकज।मैं बाद में बात करूँगी तुमसे।अभी बिजी हूँ।"

"निशी, तुमने मेरे गिफ्ट खोल कर देखा?"

ओह गिफ्ट्स तो खोले ही नही अब तक मैंने।सच कहूं तो मुझे गिफ्ट्स से हमेशा से परहेज था तो कभी भी गिफ्ट्स खोलने की उत्सुकता नही होती।इसलिए देखा ही नहीं।

"पंकज बिजी थी। कल भी नही देख पाई थी आज देखकर बताती हूँ।"

"तुम्हें पसन्द आएगा।मुझे पता है।"

"बाय पंकज।"

मैं अंदर आ गई और रिया की जिद पर एक दो सिंगल पोज़ मैने भी दे ही दिए।

एक बार फिर फोन बजा पर इस बार मेरा नही रिया का।

"जी पापा बस आ ही रहे हैं।"

हम दोनों स्टूडियो से निकल आये।

"रिया तू जा घर मैं निकल रही हूं।फिर.."

"हाँ-हाँ फिर अपने अभ्युदय जी के पास भी तो जाना है।"

"हाँ जाना तो है पर पहले वो पंकज का गिफ्ट देखना है।"

"ओहो। पंकज के गिफ्ट में बड़ा इंटरेस्ट आ रहा है तुझे?"

"नही यार।तुझे पता उसने क्या किया?"

"क्या किया?"

"मुझे बोल रहा है कि मुझे पसन्द करता है।"

"कुछ नया है इसमें?मैंने तो पहले ही बता दिया था।"

"अरे.. पर, मुझे लगा था तेरा और उसका कोई सीन होगा।इसलिए मैंने पूछ लिया और वो सीधे बोल गया रिया नही तुम पंसद हो।"

"हा हा हा हा निशी तू पागल है।"

"अब मैं पागल हूँ। हाँ मैं पागल ही हूँ। सब मुझे पागल बोलो। कल से अभ्युदय जी भी लगे हुए हैं पागल हो।अब तुम भी शुरू हो जाओ।"

"बस कर। कितना हाइपर रियेक्ट कर रही है। शान्त हो जा।तुझे क्यों लगा कि पंकज मुझे पसंद करता है?"

"देख मुझे लगा तेरी और उसकी बनती है,तो हो सकता है न कि बोल नही पा रहा हो।"

"बोल दिया ना?"

"हाँ बोल दिया। चल मैं जा रही हूँ।कल मिलते हैं कॉलेज में।"

"ओके बाय।"

"कल जल्दी आना बताना है कि शादी का भी प्रपोसल मिला था।"

रिया के कान खड़े हो गए।

"रुक। निशी क्या कहा तूने?"

"कल बताऊंगी।बाय।"

मैं आगे बढ़ गई रिया की गाड़ी के पास से।लेकिन अब रिया को चैन कैसे मिलता।पीछे-पीछे आई गाड़ी से।

"बैठ जा चुप-चाप।"

"लेकिन पापा का फोन?"

रिया ने गाड़ी लगा कर साइड में अंकल को फोन किया।

"पापा निशी को ऑटो नही मिल रहा है।इसे घर छोड़ कर आ रही हूँ 20 मिनट में।"

फोन रखकर गाड़ी स्टार्ट की और बिना कुछ बोले कछपुरा ब्रिज पर आकर गाड़ी रोक ली।

"क्या हुआ?गाड़ी क्यों रोकी?"

"क्योंकि अब आप बताएंगी।कौन सी शादी?किसकी शादी? कैसा प्रपोसल?"

"अच्छा।चल पहले भुट्टा खिला।"

"तू बहुत चीज़े छिपाने लगी है न मुझसे?"

"पागल है क्या रिया? नही बताना होता तो इतना भी क्यों कहती?"

"चल आजा भुट्टा खाना है न?"

"नही खाना रहने दे।मूड ऑफ कर दिया तूने।"

"चल ना वरना तेरे पेट मे जो भुट्टे खाने वाले चूहे हैं वो तुझे अभी कभी काट-काट के परेशान कर देंगे।"

"बकवास न कर।चल।"

भुट्टे वाले को दो मीठे भुट्टे भुनने का बोलकर हम दोनों ब्रिज के किनारे आकर खड़े हो गए।

"अब बताएगी? या उसका कोई मुहूर्त निकलेगा?"

"कल तिलवारा पर।"

"हम्म.."

"अभ्युदय जी ने कहा.. शादी कर लो।"

"तूने क्या कहा?"

"मैंने कुछ भी नहीं।उन्होंने ही फिर मना कर दिया।"

"निशी। सच-सच बताना आज।प्यार करती है न उनसे?"

"रिया कैसे इसे प्यार कहूँ? तू खुद बता क्या मेरे माँ पापा मानेंगे इस रिश्ते के लिए? प्यार का मतलब क्या होता है? मैं बहुत परवाह करती हूं उनकी पर"

"पर क्या निशी? बोल न क्या?"

"पर मैंने कभी ऐसा नही सोचा कि अपने माँ पा के खिलाफ जा पाऊंगी मैं।"

"निशी फिर उनको सपने मत दिखा।उनकी आंखे साफ जाहिर करती हैं प्यार तेरे लिए।"

"प्यार न? मेरी आँखों मे क्या दिखता है तुझे उनके लिए?"

"कभी गौर नही किया मैंने।"

"तो अब करना।प्यार और वासना में एक महीन सी रेखा होगी।तुझे प्यार ही मिलेगा हम दोनों की आंखों में।वासना नहीं।"

"समझ नही पा रही हूँ।"

"प्यार समझ तू। मैं और अभ्युदय जी,हमें एक दूसरे का साथ ही प्यारा है।वो चाहे शादी करने के बाद हो या अभी।एक दूसरे को देख कर जो खुशी मिल जाती है वो प्यार है। उनको मुस्कुराता देखना प्यार है।उन्हें अपने दिल की बातें सुनते देखना प्यार है।अनजाने में ही सही पर उन पर गुस्सा करना भी प्यार है।"

"निशी तू पागल हो गई है।"

"अगर अभ्युदय जी के बारे में बात करना और अपने प्यार का इजहार करना पागलपन है तो रिया मैं पागल हूँ।"

मैं जोर से चिल्लाई

"हाँ मैं पागल हूँ।"

पीछे से भुट्टे वाले भैया ने आवाज दी।

"दीदी पैसे हैं न आपके पास?"

रिया और मैं जोर से हंस पड़े।
 
रिया और मैं भुट्टा खाते हुए आगे की जिंदगी के बारे में बात करते रहे।

"अभ्युदय जी का फोन आया?"

"नही रिया कल रात से बात नही हुई।"

मैंने कहा ही था कि फोन बजा।

"लंबी उम्र होगी इनकी देखो जरा।"

मैंने फोन रिया को दिखाया

"हेलो अभ्युदय जी।अभी-अभी आपको ही याद किया जा रहा था।"

"निशी अभी मजाक नही।दादा जी की तबियत खराब है तुम आ सकती हो?मेडिकल में ही हैं।आकर कॉल करो।"

"आप घबराइए नही।मैं जल्दी आती हूँ।"

"निशी.."

"जी अभ्युदय जी.."

"आई नीड यू।जल्दी आ जाओ प्लीज।" बातों में दर्द था।बहुत ज्यादा दर्द।समझ सकती हूं, दादा जी को कुछ होना मतलब अभ्युदय जी का विश्वास भगवान पर से पूरी तरह उठ जाना ही है।

"आप परेशान मत होइए।मैं हूँ न।"

फोन रखते ही रिया को कहा जल्दी चलने और 7 मिनट में हम मेडिकल पर पहुच चुके थे।

"मैं घर निकलती हूँ।वैसे भी ऐसे साड़ी पहन कर कॉलेज में किसी ने देख लिया तो बात का बतंगड़ ही बनेगा।तू जा फोन करना।"

"बाय।" मैं फोन पर अभ्युदय जी काल करते हुए हॉस्पिटल की तरफ बढ़ गई।

"कंहा हैं आप?"

"आई सी यू आ जाओ।"

मैं लिफ्ट से कम ही चलती हूँ और वैसे भी हम स्टूडेंट्स को लिफ्ट से जाना आना अलाउड नही है।लेकिन आज जल्द ही मैं आई सी यू पहुच गई।

मैं अंदर गई तो सिस्टर जी ने रोका।

"मैं वो डॉ सिंह के साथ हूँ।" बोलकर मैं वंहा पहुच गई जंहा मुझे राजू भाई खड़े दिखे।

अंदर देखा तो दादा जी बेड पर थे आंखें बंद थीं।आंटी नही आ पाई थीं उनके प्लास्टर की वजह से।सिंह सर आंटी से ही बात करते हुए, बाहर निकल गए।

मैं अभ्युदय जी के पास आ गई।उन्होंने मेरा हाथ पकड़ लिया।आंखों से आंसू बह रहे थे उनकी।

"कुछ नही होगा।मैं हूँ न?"

अभ्युदय जी कुछ बोल नही रहे थे बस आँसू।मुझे डर लग रहा था। मैंने अपना एक हाथ दादा जी के हाथ पर रखा।

शायद महसूस करना चाहती थी उनकी मौजूदगी।जैसे ही मैंने दादा जी को हाथ लगाया उनकी आंखों ने मुझे देखा।

"अभ्युदय जी।देखिये दादा जी जाग रहे हैं।"

"निशी, दादा जी जा चुके हैं।"

"लेकिन अभी,सच में अभी उन्होंने आंखे खोल कर देखा मुझे।"

सिंह सर के साथ कुछ और डॉक्टर्स भी आ चुके थे।नर्सिंग स्टाफ के ब्रदर्स ने दादा जी के शरीर से मेडिकल टेप हटा कर वेन कैथ भी हटा दिया।ऑक्सीजन मास्क,वेंटिलेटर सब हटा कर दादा जी को ऊपर तक सफेद चादर से ढाँक दिया।

मैं जोर से चिल्लाना चाहती थी,पर मेरी आवाज कंही खो गई थी।अभी-अभी दादा जी ने मेरी तरफ ही नज़र की थीं।ये सच था या मैं सपना देख रही हूँ।अभ्युदय जी अब भी मेरा हाथ पकड़ कर रो रहे हैं।मतलब ये सपना नही है।फिर दादा जी?

नहीं ऐसा नही हो सकता।दिमाग की उथल-पुथल में मैं न जाने कब गिर कर बेहोश हो गई।
 
"निशी।"

"दादा जी आप ठीक हैं न?मैं सपना ही देख रही थी न? जानती हूँ आप कभी अभ्युदय जी को छोड़कर जाने का सोच भी नही सकते।"

"बेटा।मेरा समय पूरा हो गया है।सब ऊपर बैठे ईश्वर की मर्जी से ही तो चलता है न?"

"आप कैसी बातें कर रहे हैं? दादा जी आप जानते हैं कि अभ्युदय जी को जरूरत है आपकीं फिर?"

"ईश्वर ने तुम्हारा सहारा भेज दिया है अभ्यु के लिए।तभी तो मैं जा पा रहा हूँ।पर सुनो ध्यान रखना अभ्यु का।"

"दादा जी मैं कैसे रख पाऊंगी?"

"तुम्हे ही चुना है ईश्वर ने।तुम ही उसे विश्वास दिला सकती हो कि जो हुआ वो जरूरी था।"

"लेकिन दादा जी।रुक जाइये न।मेरी बात सुनेगा भगवान।मेरी उम्र कम कर ले वो,पर आपको नही।अभ्युदय जी टूट जाएंगे।"

"निशी।मेरा एक काम करोगी?"

"नही दादा जी।"

"तुम्हें ही करना होगा, अभ्यु और उसके पापा की बात करवा दो।दोनों आपस मे बात नही करते।

जानता हूँ वजह मैं ही हूँ।"

"लेकिन दादा जी।म मैं कैसे?"

"निशी अपनी इन्ही आशाओं से भरी आंखों से तुम हर किसी का दिल जीत लेती हो।दोनो को मिला देना बेटा।वरना मेरी आत्मा तड़पती रह जायेगी।"

"दादा जी आप मत जाइए न।"

"समय नही है अब।अपना अभ्यु का ख्याल रखना।"

एक चमकदार रोशनी हुई और दादा जी नही थे।

मैं जैसे चेतना में वापिस आई।वो चमकदार रोशनी मेरी आँखों मे थी।शायद कोई डॉ मेरी आँखों पर टोर्च जला रहा है।मैं जगी तो आई सी यू के ही एक बेड में लेटी हुई हूँ।

"तुम ठीक हो अब?" सामने खड़े सर ने कहा।

"जी।"

अभ्युदय जी अब भी मेरा हाथ पकड़े बैठे थे।आंसुओ की झड़ी अब भी लगी थी।पीछे ही सिंह सर खड़े थे पर शायद अभ्युदय जी के कंधे पर हाथ रख नही पा रहे थे।

मुझे ग्लूकोस लगाया हुआ था।सर ने राजू भैया से कहा।

"अब घर चलें?सभी को बताना है और कल की सारी तैयारी भी करनी है।जाओ भैया के लिए व्हीलचेयर ले आओ।"

"मैं चल कर भी जा सकता हूँ।निशी को ऐसे छोड़कर नही जाऊंगा।"

मैंने आज पहली बार दोनों को बात करते नहीं बल्कि ऐसे लड़ते देखा था।

"मैं ठीक हूँ अभ्युदय जी।आप घर जाइए, मैं अभी बस आती हूँ।"

"निशी।मैं तुम्हारे साथ ही चलूंगा।सब तो छोड़ जाते हैं मुझे।दादू भी चले गए।मैं नही जाऊंगा।"

"अभ्युदय जी सुनिए न।"

"मुझे कुछ नही सुनना।" आवाज़ की तेजी देख कर मैने कुछ भी नही कहा।

सिंह सर बाहर चले गए।मैंने अभ्युदय जी को कहा।

"मेरी आँखों मे देखिए।"

"नहीं निशी, मुझे कुछ नही देखना।"

"अभ्युदय जी आपको मेरी कसम।अभी घर जाइये आप।मैं भी चलती हूँ।"

"निशी तुम भी चली जाओगी न?मुझे छोड़कर?"

"अभ्युदय जी।मैं कभी नही जुआंगी।कंही भी नहीं जाऊंगी।पक्का वाला प्रोमिस।"

"और अगर तुम गईं तो?"

"तो खुद से अच्छी फिजियो छोड़ कर जाऊंगी आपके पास जो फ्री में इलाज करेगी आपका।"

"मज़ाक कर रही हो?या तुम भी छोड़कर जाने का प्लान कर रही हो?"

"अभ्युदय जी अभी घर जाइये।आंटी को भी आपकीं जरूरत हैं।"

"हम्म मैं जा रहा हूँ।राजू यंही है और गाड़ी भी भेज रहा हूँ थोड़ी देर में।तुम घर आ जाना।"

"जी। आप जाइये और सुनिए एक बात।मैं कंही नही जा रही।"

"जल्दी आ जाना।"

"पहले प्रोमिस कीजिये एक बात का?"

"क्या प्रोमिस?"

"मेरी एक बात मानेंगे आप?जब भी जो भी मैं कहूँगी।"

"हाँ प्रोमिस।जल्दी आ जाना।जा रहा हूँ।"

मैं अभ्युदय जी को जाते हुए देखती रही और सोचती रही क्या भगवान को दया नही आती ऐसे व्यक्ति पर जो पहले से ही दुःखी है उसे कष्ट पे कष्ट देना जरूरी होता है क्या?

मुझे दे दो कष्ट जितने भी लिखे हैं अभ्युदय जी के नसीब में।लेकिन अब उन्हें कोई भी तकलीफ मत दो भगवान। माँ आप तो सारी बात मानती हो नजे मेरी।त्रिपुरी माँ प्लीज अभ्युदय जी को शक्ति दो इन सभी दुखो से उबरने की।

या देवी सर्वभूतेषु शक्ति रूपेण संस्थिता

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः

मंत्र का जाप करते-करते कब मेरी आँख लग गई नहीं जानती।

जब आंख खुली तो सिस्टर्स आस-पास थीं। शायद ड्रिप खत्म हो गई थी और बैक फ्लो हो गया ब्लड का। मेरे सारे कपड़ों पर खून लग गया था। कमजोरी भी महसूस हो रही थी और डॉक्टर खड़े होकर सिस्टर्स को डांट रहे थे।

मैं शायद फिर बेहोश हो चुकी थी।
 
मुझे दूसरे बेड पर शिफ्ट कर दिया गया।जब होश में आई तो वापिस सामने अभ्युदय जी और रिया थे।

"आप दोनों? क्या हुआ मुझे?"

"कुछ नहीं।तुम ठीक हो।"अभ्युदय जी ने कहा।

"आप?आप क्यों आये वापिस?आंटी को आपकीं जरूरत है न?जाइये आप।रिया है न यंहा अब।पर मुझे हुआ क्या?"

मेरा एक हाथ रिया ने दूसरा अभ्युदय जी पकड़ रखा था। पर्दे के पास कोई और भी था शायद।

"पंकज अंदर आ जाओ।"रिया ने आवाज़ दी और पंकज भी आ गया।

"इन icu वालो को तेरा खून ज्यादा ही पसन्द आ गया है।इसलिए ही लिए जा रहे हैं।"

"मतलब?"

"मतलब,सारे टेस्ट होने हैं तुम्हारे।क्यों तुम बार-बार बेहोश हो जाती हो?" अभ्युदय जी बोले।

"अरे ये क्या बात हुई?मुझे कुछ नही हुआ, है,गलती ये सिस्टर की है।मैं सो गई और इन्होंने ध्यान नही दिया।बिना मतलब ही टेस्ट होने हैं।हुह।मुझे कुछ भी नही होगा समझे आप?"

"नहीं ही होगा तो अच्छा है न निशी।" पंकज मैदान में कूदा।

मैंने बदले में उसकी तरफ देखकर बस मुस्कुरा दिया। मन में अब भी अभ्युदय जी के घर मे क्या कैसे हो रहा होगा चल रहा था।लेकिन अभ्युदय जी तो यंहा।

"आप घर जाइये अभी।"

"हाँ जा ही रहा हूँ।तुम ध्यान रखो अपना।"

रिया से कुछ बोलकर अभ्युदय जी निकल गए।अभ्युदय जी के निकलते ही पंकज ने आकर मेरा हाथ पकड़ लिया।

"मैं कब से सोच रहा था कि हमारे तीन हाथ क्यों नही होते।"

"व्हाट रबिश।"

"तुम अब भी नाराज़ हो न?"

"देखो पंकज हाथ छोड़ो।ड्रिप लगे होने की वजह से मैं हाथ को हिलाना नही चाहती थी।

"निशी।मेरी आँखों मे देखो।"

"क्या?हिप्नोटाइज़ करोगे?"

"देखो न एक बार प्लीज।"

"नहीं।"मैंने अपना चेहरा दूसरी तरफ घुमा लिया।

"अजीब पागल है हुह।"

"तुमने पागल बना दिया है।मैं ऐसा नही था,बिल्कुल भी नही।किसी से भी पूछ लो, मैं कैसा हूँ क्या हूँ? किससे पूछना चाहती हो बताओ?"

"तुम्हारी मम्मी से।" मैंने तो ऐसे ही बोल दिया ताकि पंकज का मुंह बंद हो जाये। पर उसने मेरा हाथ अपने हाथ से अलग किया जेब से फोन निकाला और फोन लगाया।

"माँ, निशी को आपसे बात करनी है।"

अब ये क्या बकवास है?हद है ये लड़का।ऐसे कौन करता है?पंकज ने फोन मेरी तरफ दिया।मैंने सिर न में हिलाया।

"लो न। पूछ लो जो पूछना है।"

"हद हो तुम।फोन रखो।"

"माँ थोड़ी देर में फोन लगाता हूँ।" पंकज ने फोन रख दिया।

"पागल हो?या सिर्फ दौरे पड़ते हैं कभी-कभी?"

"तुमने कहा न कि माँ से पूछना है।बात क्यों नही की?"

"अब तो करनी पड़ेगी। पूछना पड़ेगा कि क्या खा कर पैदा किया है इन महान आत्मा को?"

"निशी, तुम मुझे पसन्द हो।मैंने पहली नजर वाला प्यार सुना था पर जब तुम्हें देखा तब से जानता हूँ कि वो मुझे तुमसे हो गया है।"

"पंकज बस।"

"मैं जानता हूँ कि तुम अभ्युदय जी को पसन्द करती हो।तुम्हारी आँखों में दिखता है।लेकिन मैं अपने दिल की फीलिंग्स नही छिपा कर रख सकता।ये धोका होगा तुम्हारे साथ।"

"पंकज तुम्हें पता है कि मैं अभ्युदय जी को पसन्द करती हूं और फिर भी तुम ऐसी बातें?"

"निशी मैं दोस्त बनाकर तुम्हें उस नजर से देखूं।गलत नजर नही पर प्यार वाली नजर से।सही नही है।इसलिए बता देना जरूरी था।"

"लेकिन.."

"सुनो,मेरी माँ को भी तुम पसन्द हो।मैं हमेशा इंतजार करूँगा तुम्हारा।कभी भी मेरी जरूरत हो याद कर लेना।तुम मेरी सिर्फ दोस्त नही हो।"

"थैंक्यू पंकज इतना कंफर्ट देने के लिए।"

पीछे खड़ी रिया ने सब सुना और ताली बजाती अंदर आई।

"क्या प्यार है वाह।आज ही बोलना जरूरी है सब?एक दो दिन रुक नही सकते?"

"अब तुझे क्या हुआ रिया?" पंकज बहुत दुविधा में पड़ गया।

"पंकज अभी जा।बाद में मिलते हैं।"

पंकज उठा और एक बार पलट कर बाय बोलकर चला गया।

"सॉरी निशी।"

"कोई न।तू क्यों सॉरी बोल रही है?"

"क्योंकि ये नमूना मेरी वजह से तेरी जिंदगी में आया।"

"छोड़ न।ये बता हम कब जा सकते हैं?"

"बात की मैंने अभी बस ये ड्रिप के हटते ही।तू अभी ठीक फील कर रही है?"

"हाँ मैं ठीक हूँ।"

"अभ्युदय जी बोलकर गए हैं अभी घर नही आने को।"

"क्यों? नही रिया हमें जाना होगा।पहले रूम पर चलते हैं कुछ बना कर ले चलेंगे।पता नही वो लोग क्या खाएंगे आज रात।"

"उन्होंने मना किया है पर।"

"करने दे मना।मुझे नही फर्क पड़ता हम जाएंगे।"

"ठीक है।"

एक घंटे बाद हम हॉस्पिटल से निकल आये।कुछ तो था जो डयूटी डॉक्टर अभी भी रुकने की और रेस्ट करने की जिद कर रहा था। पर हम दोनों के रहते वो जीत नही पाया।

ब्रेड का पैकेट और दूध लेकर हम रूम पर आ गए।सैंडविच और पोहा बना कर एक टिफ़िन में भर लिया।चाय के लिए आंटी से थरमस लिया और चाय भर ली।

भर अंधेरा हो ही गया था और बारिश भी होने को थी।

मैंने हल्के हरे रंग की कुर्ती डाल ली थी।कपड़े खराब हो जाने से बदलना भी जरूरी था।

"रिया चल वरना बारिश होने लगेगी।"

"हम्म बहुत अजीब लग रहा है निशी।मैंने कभी कोई डेथ बॉडी नही देखी।"

"अच्छा डिसेक्शन क्लास भूल गई क्या?"

"नही। पर उनकी जिन्हें पहले हंसते बात करते देखा हो।डर लग रहा है।"

"डर मत।हम दादा जी को जानते थे,इसलिए तुझे ऐसा लग रहा है।"

"कितना कष्टदाई होगा न सभी के लिए।एक बेटे के पिता,एक पोते के चहिते दादू,एक बहु के पिता समान ससुर।व्यक्ति एक पर कितने रिश्ते और कितना प्यार।"

"मत रुला न और प्लीज।" मैं जाकर रिया के गले लग गई और पांच मिनट तक हैम दोनो लगातार रोते रहे।

क्रमशः-42

जानती हूँ दुखी कर दिया। पर अंत बाकी है4
 
अगले 10 मिनट में हम दोनों अभ्युदय जी के घर के सामने थे।गाड़ियों का तांता लगा हुआ था।कॉलेज के डीन से लेकर हर डिपार्टमेंट के डॉक्टर्स की गाड़ियां थीं।

"तो इसलिए मना किया होगा अभ्युदय जी ने।"

"मैंने तो समझाया था तुझे पर तु जब सुने तब न?" रिया को बाहर रुकने का कह कर मैं पीछे के आंगन वाले गेट से अंदर गई।शर्मिला वंही थी।

"मैडम आप?वो दादा जी अब.."

"ये सैंडविच हैं,चाय और पोहा भी।सबको खिला देना। मैं अभी जा रही हूँ कल आउंगी।अभ्युदय जी ठीक है न?"

"आप एक बार मिल लीजिये न मैडम।बहुत रो रहे हैं भैया।आंटी भी नहीं संभाल पा रही हैं।"

जब शर्मिला से अभ्युदय जी के रोने की बात सुनी तो रोक नही पाई खुद को।

जिसे जो सोचना है सोचे,ऐसा सोचकर मैं अंदर पहुच चुकी थी।जितना सोचा था उससे भी ज्यादा भीड़ थी।आंटी अभ्युदय जी को बार-बार चुप कराने की कोशिश कर रही थीं पर उनके आंसू नही रुक रहे थे।

सिंह सर सबके साथ होकर भी सबसे अकेले लग रहे थे।दादा जी ने कहा था कि उनकी वजह से दोनों बात नही करते।क्या हुआ होगा?जानना जरूरी है पर अभी नहीं।

दादा जी को जमीन पर लेटाया हुआ था।वो अब भी सफेद चादर में ही थे बस चेहरा दिख रहा था उनका।कितना चमकता हुआ चेहरा दिख रहा है।जैसे दादा जी सो रहे हों।

मैं भीड़ को काटते हुए आंटी के पास आई।उन्होंने कुछ भी नही कहा।मेरी आंखों के आंसू पोछकर अभ्युदय जी की तरफ इशारा कर के बोलीं।

"संभालो इसे।"

मैंने बहुत धीरे लफ़्ज़ों में कहा

"अभ्युदय जी।रोना बन्द कीजिये दादा जी को पसंद नही कि उनका शेर बेटा रोए।"

"तो गए क्यों छोड़कर निशी?"

माहौल बहुत गमगीन हो गया।सभी की आंखे नम हो गईं।मैं तो यंहा अभ्युदय जी का सहारा बनने आई थी पर यंहा तो सब और दुखी हो गए।

मैंने उठकर पानी का ग्लास उठाया और अभ्युदय जी को पानी पिलाया।

अब कुछ शांति थी।मैं आंटी को कहकर घर आने के लिए निकलने लगी।पीछे के दरवाजे के पास सिंह सर एक कुर्सी पर बैठे थे।मैंने अब तक उनकी आंखों में आंसू नही देखे थे।

पता नहीं मुझे क्या हुआ मैं उनके पास चली गई।

"सर आप ठीक हैं?"

"डॉ.निशी।य यस आई एम आल राइट। आर यू गोइंग होम? इस अभ्यु इस फाइन?"

"यस सर ही विल बी सून।बट आर यू ओके?"

"यस आई एम।"

"यू कैन शेयर सर।इफ यू वांट?"

मैं नही जानती कैसे इतनी हिम्मत आ गई मुझमें।

"व्हाट यू वांट टू हीयर?"

"एनीथिंग व्हिच मेक यू क्राई।"

अब ये क्या कह गई।आज मेरी खैर नही।लेकिन न जाने क्यों आज सर ने पहली बार बिना डांटे बैठने को कह दिया।

"प्लीज सिट।"

मैं उनके सामने बैठ गई चुपचाप।अपनी आंखें उनपर ही टिका कर।

सर ने अपनी आंखे बंद कर लीं।

"मैं बहुत छोटा था जब पापा ने मुझे बताया डॉक्टर क्या होते हैं।माँ के जाने के बाद मेरे और पापा के बीच बस दीदी ही थीं।मैंने डॉ बनने के लिए,पापा का सपना पूरा करने के लिए सब किया और जब मैंने अपना सपना बताया तब उन्होंने सुना ही नहीं।"

"सर सारे बड़े एक से ही क्यों होते हैं? पहले दादा जी अब आप?"

सर को शायद मेरी बात का कुछ मतलब तो समझ आ गया था।

"आपके पास तो दीदी थीं अपनी बातें करने को पर अभ्युदय जी के पास?"

"उसकी माँ है।अभी भी था।"

अभी का नाम लेते ही सर की आंखे भर आईं।अब समझ आया,अभिदा की माँ से शादी के लिए दादा जी तैयार नही थे।शायद तब से ही ये दूरियां होंगी।

जब पापा बात नही करते दादू से तो बेटे ने भी पापा से बात करनी बन्द कर दी होगी।

"पापा ने अभी को कभी नहीं अपनाया।मुझे भी पराया कर दिया।"

"सर आप रो सकते हैं।आपको हल्का महसूस होगा।अभ्युदय जी ने तो अभिदा को हमेशा अपनाया है न?"

"नहीं।पापा के कहने पर नहीं बल्कि मधु(आंटी के) कहने पर।"

इतने झोलों में से गुजरी हुई है जिंदगियां।इतनी उलझने,मेरा दिमाग चकराने लगा था फिर बेहोश होकर गिरने से अच्छा था यंहा से निकल जाना।

"सर आपके बेटे को आपकीं जरूरत है,जैसे आपको भी थी कभी अपने पापा की जरूरत।आप अगर हर चीज़ भुला कर,हर पिछली कहानी को भूलकर अपना हाथ उनके कंधे पर रख देंगे तो शायद आपके दिल से बहुत सारे बोझ उतर जाएंगे।छोटा मुँह बड़ी बात होगी सर, पर जिंदगी दुबारा नहीं मिलती वरना आज दादा जी आकर सब सही कर देते।सबापके हाथ में है।उठिए और जाकर गले लगाइए अभ्युदय जी को।आप दोनों जब दिल और मन भरकर रो लेंगे तो सुकून आ जायेगा आप दोनों के जीवन मे।इसी से शायद दादा जी की आत्मा को भी खुशी मिलेगी।"

मैं बिना कुछ सोचे समझे बस बोलती गई।

"उठिए सर प्लीज।चलिए अंदर।उठाइये अभ्युदय जी को और गले लगाइए।" पता नही मैं क्या कह रही हूँ, क्यो कह रही हूँ? बस जो मुँह में आया बोल गई।

सर उठे और अंदर चले गए।मैं पीछे-पीछे आ गई।सर अंदर गए और पहले आंटी के सिर पर हाथ रखा फिर जमीन पर बैठ गए।

बहुत हिम्मत करके सर ने अभ्युदय जी के कंधे पर अपना हाथ रखा।

"दादू।" अभ्युदय जी अचानक बोले।

"दादू नहीं, डैड।"

अभ्युदय जी को शायद इस पल की उम्मीद ही नही थी।सर ने अपने हाथों को कुछ इस तरह किया कि अभ्युदय जी पलट कर सीधे सर के गले लग गए।

बहुत देर तक दोनों गले लग कर रोते रहे। मैं बाहर निकल आई रिया की बच्ची जान ले लेगी पर वो कुछ नही बोली।मैं और रिया रूम पर आ, गए।अपना जरूरी सामान लेकर मैं रिया के साथ उसके घर के लिए निकल गई।
 
अगली सुबह से दोपहर तक का समय बहुत मुश्किल से कटा।मैं चाह कर भी अभ्युदय जी को फोन नही कर पा रही थी।वो बिजी होंगे।घर पर क्या चल रहा होगा सोचकर मन भारी था।

आज हॉस्पिटल में जरूर लोग मुझे जरूरत से ज्यादा ही घूर रहे थे,सूजी आंखों की वजह से या कल अभ्युदय जी के घर यही थी सोचकर।

शाम होने को थी।रिया ने बहुत कहा घर चलने को पर आज मन नही था।रूम पर बैठी कुछ किताबें निकाल कर कि कुछ पढूंगी तो दिमाग यंहा वंहा नही जाएगा।

कुछ ही देर हुई थी पढ़ते कि अभ्युदय जी का फोन आया।

"कैसे हैं आप?आपकीं बहुत चिंता हो रही थी।"

"ठीक हूँ।तुम?"

"मैं भी ठीक हूँ।"

"सब हो गया?"

"हाँ।मैंने और डैड ने मिलकर ही किया सब।"

मैं खुश थी क्योंकि दादा जी भी खुश ही होंगे जंहा होंगे सोचकर।

"कुछ खाया आपने?"

"हम्म.."

"क्या खाया?"

"तुमने डैड को क्या कहा निशी?"

"मैंने?"

"हाँ।कल बताया उन्होंने कि उनकी आंखें खोल दी तुमने।"

"मैंने कुछ भी नही किया अभ्युदय जी।बस दादा जी यही चाहते थे , कि आप औऱ सर आपस मे साथ रहें,हंसते-मुस्कुराते।"

"रिया के साथ हो?"

"नहीं।आज मन नही किया।आप कुछ एक्सरसाइज अगर कर पाएं तो कर लीजियेगा।"

"हम्म कल से करते हैं।कल आओगी न?"

"हाँ।"

"निशी।"

"जी।"

"थैंक्यू।"

"कुछ मत कहिये अभ्युदय जी।"

"सो जाना और अपना ख्याल रखना।"

"जी।गुड नाईट।"

मैंने फोन रख दिया और कोशिश करती रही सोने की पर नींद है कि आने को तैयार ही नहीं।

मैंने उठकर भगवान जी के सामने अगरबत्ती लगाई और तभी मेरी नजर उन गिफ्ट्स पर पड़ी जो अब तक खुले ही नही थे।

मैंने सारे गिफ्ट्स उठा कर बेड पर रख लिए।

कितना अच्छा बीता था वो दिन और शाम।8 जुलाई जिंदगी के ऐसे दिनों में जुड़ गया था जिसे मैं कभी भी नही भूल सकती।

"शादी कर लो।" वो तीन शब्द कितने जादुई थे।आई लव यू से भी ज्यादा जादुई।

चेहरे पर हल्की मुस्कान तैर गई जब मैंने डॉल को अपने हाथों में उठाया।

"कितनी क्यूट हो तुम इवू,बिल्कुल मेरी तरह।" मैंने इवू को अपने तकिए पर ही लेटा लिया।अब मेरे सामने मासी के दिये गिफ्ट्स थे और अनपैक 2 गिफ्ट्स।जिसमे से पहले मैंने सर का गिफ्ट खोला।सिल्क की पैरेट ग्रीन साड़ी और साथ ही एक चांदी का नोट।जिसमें लक्ष्मी-गणेश जी बने थे।

ये इनको क्यों बिना मतलब इतने मेंहगे गिफ्ट्स देने होते हैं।कोई खुश भी न हो ऐसे गिफ्ट देखकर।

साड़ी बहुत सुंदर थी पर शायद इतने बोझ तले दबने की वजह से मुझे बहुत अजीब सी उलझन हो रही थी।

मैंने पंकज का गिफ्ट लिया और खोलकर देखा।

बॉक्स देखने में रिया को वाच सा लगा था पर अंदर ढेर सारी कैंडी और छोटी-छोटी चिट्स डली हुई थीं।

मैंने एक कैंडी खोलकर मुँह में डाल ली। अब बारी थी उन चिट्स को खोलकर देखने की।

एक पेज के 8 टुकड़े करके उनको इतने तरीके से मोड़कर बिल्कुल छोटा कर के भरा गया था।

"वेरी क्रिएटिव।" मेरे मुँह से यही निकला। पहली चिट खोली तो उसपर लिखा था

"मेरी आँखों में बस गई हो

काजल की तरह।

बस जाओ जिंदगी में भी

मेरी सांसों की तरह।" क्या बात है पंकज, मुझे नही पता था कि कोई ऐसा भी कर सकता है या इतना भी क्रिएटिव हो सकता है गिफ्ट्स के मामले में।

कितनी मेहनत की उसने।मैंने दूसरी पर्ची उठाई उस पर लिखा था

"सॉरी ब्यूटीफुल।हमारा जन्मदिन खराब हुआ मेरी वजह से।"

तीसरी पर

"मैंने कभी तुम्हारी जैसी आंखे

पहले कभी नही देखीं- पाक और सच्ची।"

मैं बस एक-एक करके पर्चियां खोलकर पढ़ती जा रही थी।

कितनी पर्चियों में सिर्फ सॉरी लिखा था कल जो भी हुआ उसके लिए।जन्मदिन खराब किया उसके लिए।कल जो हुआ उसमे उसका कोई भी हाथ नही था,सब उसके दोस्तों का किया धरा था इसलिए।

एक पर्ची जिसमें पंकज ने लिखा था-

"Will you be mine?

Just mine4

Valentine?"

हिम्मत देखो लड़के की।जुलाई में वैलेंटाइन। मुझे हंसी आ गई।

"तुम बहुत सुंदर हो।"

"तुम्हारी आवाज़ किसी को भी दीवाना कर सकती है।"

"सुनो एक जोक सुनोगी?

मैं पागल हो गया हूँ।

एक सच सुनोगी?

तुमसे प्यार करने लगा हूँ।"

एक-एक कर जब सारी पर्ची खुल गईं तो पंकज पर जो गुस्सा था वो उड़नछू हो गया।कितना सेंसिटिव और क्रिएटिव है।ऐसे भी भला कोई गिफ्ट पहली बार मे किसी को देता है?

मैंने पंकज को फोन मिलाया।

"हेलो।"

"हेलो पंकज।"

"निशी, तुमने मुझे फोन किया?"

"नही पंकज।तुम्हारे भूत को।"

"मजाक मत करो।मैंने तो सपने में भी नही सोचा था की तुम मुझे काल करोगी।"

"क्यों?"

"छोड़ो न।कैसी हो?तबियत कैसी है?"

"मैं ठीक हूँ, तबियत भी ठीक है।तुम्हारा गिफ्ट देख रही थी।"

"तुम्हें कैंडीज पसन्द हैं?"

"हाँ।"

"और.."

"और क्या पंकज?"

"और जो मैंने वो स्लिप,मेरा मतलब है वो स्लिपस ऑफ फीलिंग्स?"

" तो इन्हें स्लिप्स ऑफ फीलिंग्स कहते हैं?"

"हम्म..तुम्हें कुछ ऐसा देना चाहता था जो तुम्हें हमेशा याद, रहे।"

"बहुत ही अच्छा गिफ्ट है।मुझे पसन्द आया।"

"चलो गिफ्ट तो पसन्द आया,मैं पसंद आऊं न आऊं।"

"पंकज.."

"सॉरी निशी।"

"एक चीज़ बताओ?"

"नही प्लीज।मत पूछो।"

"अरे पर तुम्हे क्या पता मैं क्या पूछने वाली हूँ।"

"मैं जानता हूँ।"

"अच्छा बताओ क्या?"

"निशी छोड़ो न प्लीज।"

"पंकज "

"वो वैलेंटाइन"

इसे कैसे पता?

"तुम्हें कैसे पता?"

"तुम्हे क्या पसंद आएगा ये पता है तो क्या ये नही पता होगा कि तुम्हे कौन सी चीज खली होगी?"

"स्मार्ट हो।"

"ह्म्म्म बचपन से।"

"हाहा अच्छा?"

"हाँ सच्ची, हमारे बालों की कसम।"

"बालों की? हहहहह।ये क्या है?"

"कसम है निशी।"

"ये कैसी कसम हुई?"

"जिसको खोने का दुःख हो उसकी कसम ही तो खाई जाती है न?"

"तोतुम्हें अपने बाल5 हहहहहहह". मैं ज़ोर से हंस पड़ी।

"रखो फोन नींद आ रही है मुझे। बहुत बातें हो गई।" मैंने कहा।

"हाय और एक हम जिसे आज नींद आएगी ही नहीं।सारी रात बस इसी ख्याल में गुजर जाएगी कि तुमने मुझे फोन किया और तुम्हें मेरा दिया गिफ्ट पसन्द आया।"

"बाय पंकज और थैंक्यू इस गिफ्ट के लिए।लेकिन मैं तुम्हारी वैलेंटाइन नही बन सकती।"

"कोई बात नहीं।आई विल मैनेज विथ आउट यू।"

"कितने नौटंकी हो तुम।बाय।"

"अरे सुनो जरा।रिया की शादी फिक्स हो गई क्या?"

"नहीं अभी बात चल ही रही है क्यों?"

"उसका जन्मदिन कब है?शायद वो बन जाये मेरी वैलेंटाइन।"

"तुम बहुत नालायक हो पंकज।बाय।"

"बाय निशी।विल मिस यू।"

"पागल"

फोन तो रख दिया पर एक अलग सी खुशी महसूस हुई।कितना अजीब लड़का है जनता है मेरी फीलिंग्स उसके लिए क्या हैं फिर भी फ़्लर्ट।

मैंने सारी चिट्स को संभाल कर वापिस उसी बॉक्स में रखने के लिए उठाया तो उसमें एक पर्ची और थी जो रह गई थी।

उठा कर उसे भी खोला तो पंकज पर गुस्सा और प्यार आ गया।लिखा था

"मेरी झांसी की रानी गुस्सा जरा कम हुआ करो प्लीज। माफ़ कर दिया हो तो एक बात और

पलटो इसे"

पीछे लिखा था

"आई विल लव यू टिल माय लास्ट ब्रेथ।"
 
मुस्कुराते हुए कब नींद लगी नही जानती।

"सुनो निशी।"

"कहिये न अभ्युदय जी।"

"तुम पंकज से शादी कर लो।"

"ये आप क्या कह रहे हैं? क्यों? क्या मैं आपको पसन्द नहीं?"

"मुझे तो पसन्द हो पर डैड को पसंद नही हो।"

"ऐसा मत कहिये अभ्युदय जी।"

"मैं भी तुम्हें कुछ खास पसन्द नही करता।तुम बहुत इर रीस्पांसिबल हो।डैड भी यही कहते हैं।"

"लेकिन अभ्युदय जी आपने तो कभी भी ऐसा नही कहा मुझे।आज अचानक?"

"मैं प्यार नही करता तुमसे समझ नही आता।"

अचानक मेरा फोन बजा और अलार्म से नींद खुल गई।

सुबह के 6 बज रहे थे, ये क्या था?ऐसा सपना?वो भी सुबह-सुबह?

मैंने बिना कुछ सोचे ही अभ्युदय जी को फोन लगाया।

"हेलो, निशी।" कितनी प्यारी आवाज़ है। सुबह की किरण के साथ अभ्युदय जी की आवाज़ आज का तो दिन बन गया।

"सॉरी।आपको जगा दिया?"

"हम्म.. बहुत अच्छा सपना देख रहा था।इतनी सुबह फोन क्या हुआ?"

"अच्छा सपना नही देखा तो।"

"क्या देखा? मैं तुम्हें कह रहा हूँ पंकज से शादी कर लो?"

"अभ्युदय जी। आपको कैसे पता?"

"अच्छा यही देखा?"

"लेकिन आपको कैसे पता?"

"बस ऐसे ही।सो जाओ ऐसा कुछ नही हो रहा है।मैं कुछ नही कह रहा ऐसा न कहूँगा। सो जाओ।"

"पक्का न?कभी नही कहेंगे?"

"सो जाओ निशी।"

"ठीक है।" बोलकर फोन बिना काटे ही मैंने बेड पर रख दिया।

मैंने गाना गाने लगी।

"जरा-जरा महकता है.. बहकता है

आज तो मेरा तन बदन मैं प्यासी हूँ.. मुझे भर ले अपनी बाहों में..।"

नही जानती फोन कब कटा।शायद जब मेरे फोन का बैलेंस खत्म हो गया तब।तब तक अभ्युदय जी सुनते रहे?या सोते रहे।

जब फोन पर मैसेज देखा जीरो बैलेंस का तो दिमाग का दही हो गया।

ये क्या है अब? मुझे बिना मतलब पैसे खर्च करना भी बिल्कुल नही पसंद।लेकिन फोन में बैलेंस होना ही चाहिए क्योंकि मिस्ड कॉल करने के लिए भी एक रुपया तो होना ही चाहिए।

कॉलेज के लिए निकली पर आज फिर मेरी स्कूटी ने मेरा साथ छोड़ दिया।

बाहर निकलकर पहले एक दुकान पर रिचार्ज करवाया फोन और फिर गुस्से में मैंने माँ को फोन किया।

"माँ, मुझे नई गाड़ी लेनी है।"

"लेकिन बेटा अब तो कितने कम दिन की ट्रेनिंग बची है।"

"लेकिन मैं तो जबलपुर ही रहूंगी न?मास्टर्स भी करना है माँ।"

"इस गाड़ी में क्या हुआ निशु?"

"चलती ही नही माँ।बस किक मारते रहो।"

"मैं बोलूंगी पापा जी को।अभी शिवेन की कोचिंग भी करानी है तो पैसे क्या,कैसे?"

शिवेन मेरा भाई।मुझसे छोटा है इस साल 12थ का एग्जाम देगा।

"माँ कोई बात नही।सॉरी आप पर गुस्सा हो रही थी।मैं चला लुंगी काम।आप ठीक हो न?"

"हाँ निशु।तुम भी ख्याल रख रही हो न? बेटा पैसे हैं?जन्मदिन पर खर्चा हुआ होगा न?"

"हाँ माँ हैं पैसे।बताया था न एक मरीज भी देख रही हूँ।समय भी 2 घंटे के हिसाब से अच्छा कमा रही हूँ।आप चिंता मत, कीजियेगा।पापा जी ठीक हैं?"

"हाँ पापा जी भी ठीक हैं।रिया बिटिया कैसी है?"

"ठीक है माँ उसकी शादी लग रही।"

"भला हुआ।खुश रहे बिटिया बस,अब तुम्हारे भी रिश्ते आ जाये हम तुम्हें भी ब्याह दें।"

"माँ बाय।"

माँ से बात करते कब कॉलेज पहुच गई पता भी नही चला।आज रिया ने बता दिया था कि देर से आएगी।अंकल को जाना है आज।मैं अटेंडेंस लगवाकर अपने वार्डस में चली गई।

आज सुबह कुछ खाया नही और चाय भी न पीने की वजह से बहुत कमजोरी लग रही थी।आजकल बेहोशी सी आने लगती है जब भी थोड़ा भी स्ट्रेस लो तो।

मैं काम छोड़कर कैंटीन आ गई।एक प्लेट इडली और चाय आर्डर कर के बैठ गई।

सामने से सिंह सर निकले।उन्होंने शायद मुझे देख लिया था।अंदर आये और मेरे ही पास बैठ गए।

"हाऊ आर यू डॉ?"

मैं फट से खड़ी हो गई।

"आई एम गुड सर।"

"गुड-गुड।व्हाई यू आर अलोन?"

"सर वास् फीलिंग हंगरी सो कैम टू हैव सम ब्रेकफास्ट।

"ओके।टेक केअर।"

"थैंक्यू सर।"

"निशी आज से घर आओगी न? अभ्यु नीड्स यू।यू आर गुड एट यौर वर्क"

"यस सर विल कम टुडे।"

मेरी इडली और चाय आ गईं थीं।सर को आफर की और जानती थी कि वो लेंगे नही अब चेले जाएंगे।

"सर प्लीज।" कहकर मैंने इडली की प्लेट आगे की। इंडियन कॉफी हाउस में आपने भी इडली खाई होगी जरूर।वो सफेद चिनीमिट्टी के बाउल में दो सफेद इडली साम्भर में तैरती हुई,राई और मिर्च के तड़के के साथ।

सर ने चम्मच से इडली को काटा और खाई।

"इट्स नाइस।"

मुझे इसकी उम्मीद नही थी।आज सर कुछ अजीब बर्ताव कर रहे थे।मतलब बर्ताव उनका नॉर्मल था जो वो करते नही थे।तो ये अजीब था।उन्हें हमेशा गुस्से में रहने की सजा सी मिली हो ऐसे रहते हैं।लेकिन आज शायद सर का मूड अच्छा है।

"निशी, व्हाट योर फ़ादर डू?"

"सर ही इस सेंट्रल गवर्मेंट एम्प्लॉय।"

"ओके।आस्क हिम टू मीट समडे।"

"यस सर आई विल।"

"ओके निशी बाय।थैंक्स फ़ॉर इडली।"

सर ने एक पूरी इडली खत्म कर दी थी।

आज उनकी मुस्कान पर दिल खुश था।
 
दिन महीने बीत गए।मुझे रिया ने नही बताया कि वो रवीश से बात करती है।समय के साथ अभ्युदय जी भी दादा जी के जाने के गम से उबर गए हैं।महीना बीत गया पर पंकज की सुई अब भी हर बार मिलने पर वैलेंटाइन की बात पर अटक जाती है।

आज सुबह से दिल खुश है क्योंकि अब सिर्फ एक महीना और इंटर्नशिप का बचा है फिर मैं ग्रेजुएट कहलाऊंगी।

उसके बाद मास्टर्स के लिए तैयारी और बाकी सब सोचना है।दिल जितना खुश इंटर्नशिप खत्म होने पर है उससे ज्यादा खुशी अभ्युदय जी के हाथ मे पावर आने की भी है।अब वो अपने हाथ को मोड़ लेते हैं और सीधा भी कर लेते हैं।अभी उंगलियों में काफ़ी काम बाकी है।दादा जी होते तो बहुत खुश होते।

अभी दो मिनट पहले ही रिया का फोन आया।परेशान है और मिलना चाहती है।घर आ रही है जल्दी ही।मैंने चाय के लिए दूध और पोहे की तैयारी कर के रखी है।पता नही कहा रह गई?

मेरा पोहा बन कर रेडी हो गया।बाहर गाड़ी की आवाज आई और धड़-धड़ाती रिया भी अंदर।

"रिया क्या हुआ?"

"पापा ने मना कर दिया"

"मतलब?किस चीज के लिए?"

"रवीश से शादी।"

"लेकिन क्यों?"

"ताऊ जी ने घर जाकर देख लिया है।राधिका दीदी के घर से ज्यादा सम्पन्न है घर परिवार।पैसा भी ज्यादा है इसलिए।"

"ये तो अच्छी बात है न?"

"लेकिन उनके लिए नही है न?"

"मतलब?समझी नहीं मैं?"

"मतलब मैं राधिका दी से ज्यादा अच्छे घर मे कैसे ब्याही ज आ सकती हूं?मुझे तो किसी गरीब के घर जाना चाहिए न?"

"क्या बोल रही है?समझ ही नही आ रहा कुछ।"

"मैं डॉ बन रही हूँ, ये बात भी हजम नही थी उन्हें। अब ज्यादा बड़े घर मे शादी कैसे देख लेंगे।"

"तू शांत हो जा चाय पीते हैं फिर बता की दिक्कत क्या है?"

चाय पोहा खाते वक्त भी रिया चुप नही बैठी।गलियों की लड़ी लगी ही थी अपने ताऊ जी के घर परिवार के लिए।

"सुन।अब बस कर सब तेरे ही परिवार के हैं।बिना मतलब लगी हुई है गालियां देने।"

"तुझे पता नही है निशी।मैं और रवीश अब बिना शादी किये नही रह सकते। हमने तो अपने बच्चों के नाम भी सोच लिए हैं।"

मैं अपना मुंह खोल कर रिया को देखती रह गई।

"क्या बोला?बच्चों के नाम?तू रवीश से बात करती है?"

"तब से ही कर रही हूँ यार।"

मैंने आंखे टेढ़ी की तो बोली

"तूने ही कभी नही पूछा तो मैने भी नही बताया।तू बिजी थी न अपने अभ्युदय जी और पंकज में।"

"बक़क्वास मत कर समझी।तू उन दोनों से इम्पोर्टेन्ट है, थी और हमेशा रहेगी।तूने ऐसा कैसे सोच लिया कि..खैर छोड़।अभी बता क्या हुआ?"

"तू चिल्लाएगी नहीं।पहले प्रोमिस कर।"

"क्या कांड किया पहले वो बता।"

"सुन।पापा ने घर जाकर ताऊ जी को बताया और दोनों घर देखकर आये।रवीश रीवा का है,राधिका दीदी के घर से दूर है घर।एकलौता लड़का है।जायदाद के नाम पर खुद का घर है और खेती भी होती है।रीवा में ही ट्रेवलिंग का बिजनेस भी है।कुलमिला कर मेरी लाइफ सेट है।पर उनके स्टैट्स के आगे राधिका दीदी का स्टेटस कम पड़ रहा है,तो ताऊ जी ने मना कर दिया रवीश से शादी के लिए।"

"लेकिन कोई कारण तो दिया होगा न?बिना वजह क्या कह के रिश्ते को मना किया?"

"वो और बड़ी हिट है।रवीश की नानी अच्छी ब्राम्हण नहीं थीं।जिसकी वजह से मेरी शादी नही हो सकती।"

"अब ये क्या उल-जलूल सी बात है?"

"मैडम ये बात नही बकवास है।पापा ने मना किया तो मैं मान भी गई।बोला कि ठीक है नहीं करनी अभी शादी।अब मास्टर्स के बाद ही बात कीजियेगा शादी की।पहले तो 5 दिन सब सही।अब अचानक से फिर कल आ रहे हैं एक नए लड़के का फोटो लेकर।"

"रिया।अंकल को क्या हुआ?अचानक तेरी शादी का भूत क्यों सवार है उनपर?"

"भगवान ही जाने या पापा खुद जानें।कल रवीश से बात हुई तो कह रहे हैं चलो भाग के शादी कर लेते हैं।"

"पागल है क्या?"

"मैंने भी यही कहा उनको।लेकिन बोले हमारी रेवा और ऋतिक के बारे में तो सोचो।"

"अब ये रेवा और ऋतिक कौन हैं?"

"हमारे होने वाले बच्चे।"

"हे प्रभु।तुझे कैसे पता की एक लड़का, एक लड़की ही होंगे?"

"नाम दो सोच लिए हैं जो होगा नाम रख लेंगे।"

"तेरा कुछ नही हो सकता रिया।"

"शादी हो रही है और तू कह रही कुछ नही हो सकता।"

"रवीश है कंहा अभी?"

"अभी वो एल एल एम कर रहे हैं दिल्ली यूनिवर्सिटी क्रिमिनोलॉजी से।"

"कर रहे हैं..तू तो बड़े लिहाज में बात कर रही है।"

"तो? क्या बोलूं? तू भी तो अभ्युदय जी को जी-जी, आप-आप करती है।"

"बड़े हैं वो।"

"हाँ-हाँ समझ गई।जानती हूँ।तेरा और अभ्युदय जी के बच्चों का नाम क्या होगा?"

"तू बकवास बन्द कर अपनी समझी।"

"निशी-अभ्युदय हम्म निशिअभ्यः? है न निशी? निशिअभ्य अच्छा नाम है न?"

निशिअभ्यः सुन कर दिल मे अजीब सी गुदगुदी हुई।यही तो वो नाम है जो उस ड्रेस में अभ्युदय जी ने लिखवाया था।क्या उन्होंने भी यही सोच कर लिखवाया था?

"तू न अपनी परेशानी पर कंसन्ट्रेट कर।मेरे बच्चों के नाम रखने तू बाद में आ जाना।"

"हाँ यार अभी मेरे बच्चों के बारे में सोचना है।अब पापा आज फिर आ रहे हैं।शायद इस बार कोई नेवी वाले लड़के की फ़ोटो लेकर।"

"उफ्फ.. तू थक जाती होगी न?नई-नई फोटोज, लड़कों के नाम, कंहा के है,क्या करते हैं?"

"सबके नाम याद रखकर क्या करना है?"

"क्यों जिससे शादी होगी उसे बताएगी नही?"

"मेरी शादी रवीश से ही होगी।समझी?"

"ओके मैडम।"

रिया का फोन बजा।अंकल का ही फोन था। वो बस 1 घण्टे में घर पहुचने वाले थे।रिया भी घर निकलने का बोलकर निकल गई और मैं सोचती रही कि क्या बच्चों के नाम रवीश के साथ सोचकर रिया सही कर रही है?क्या उसके पापा अपने बड़े भाई की बात को ताल देंगे रिया के लिए?

शायद नही।

या शायद हाँ।
 
छुट्टी वाले दिन बड़ी मुश्किल से बीतते हैं।अभ्युदय जी को फोन किया मैंने।

"हेलो निशी।"

"आप घर पर हैं क्या?"

"अभी तो नहीं हूँ।बोलो क्या हुआ?"

"आप कंहा हैं?"

"मैं समदड़िया के पास हूँ।"

समदड़िया माल अभी-अभी ही जबलपुर में नया खुला है,सिविक सेंटर में। मैं और रिया होकर आए थे।पी वी आर में मूवी देखने मे वो मजा नही है जो हमारी ज्योति टाकीज में है।वैसे भी ज्योति टाकीज में जो स्टूडेंट डिस्काउंट मिलता है उसके आगे क्या ये pvr या कुछ और।

"मैं वो.. अच्छा जब घर निकलेंगे तो मुझे लेते हुए ही चलिएगा।"

"क्या हुआ?बोलोगी?"

"अभी घर पर मन नही लग रहा।"

"तो घर चली जाओ।माँ को अच्छा लगेगा।"

"हम्म.. आप बोलना मत आंटी को। मैं देखती हूँ क्या करना है मुझे।"

"बताना मुझे।मैं वैसे 1 घंटे में निकलूंगा ही।"

"काल कर लीजियेगा मुझे।ओके?"

"ठीक है।"

अभ्युदय जी से बात करके फोन रख कर सोचा कि घर जाऊ या नही? आकर अपने पलंग पर लेट गई।नींद लगने को थी ही कि , फोन बजा।

"हेलो।"

नींद में बिना फोन देखे ही फोन उठाया। आज पापा जी का फोन?आवाज सुनते ही चौक कर आंखे खुल गईं।

"जी पापा जी।"

"कैसी हो निशी?"

"ठीक हूँ।"

"पैसे डाल दिये हैं बेटा।किसी और चीज़ की जरूरत तो नहीं?"

"पापा जी वो.."

"हाँ मम्मी ने बताया स्कूटी के बारे में।नई लेना है कह रही थीं।अगले महीने जब तुम्हारा मास्टर्स में सिलेक्शन हो जाएगा तब नई गाड़ी मिल जाएगी तुम्हें।ठीक है?"

"थैंक्यू पापा जी। हम्म.. ठीक है।"

"कोई मरीज भी देख रही हो?"

"जी पापा जी स्ट्रोक के पेशेंट हैं अभ्युदय जी।"

"मरीज का ख्याल रखना और जल्दी ठीक कर देना उसे।"

"जी पापा जी।भैय्यू ठीक है?"

"हाँ शिवेन ठीक है।अभी पढ़ाई में ही ध्यान दे तो अच्छा है।पर पढ़ता कंहा है सारा दिन बस कंप्यूटर में।"

"पढ़ता होगा।उसका दिमाग तेज है।"

"भगवान ही जाने।अच्छा बेटा ध्यान रखो अपना।रखते हैं।"

"जी पापा जी।"

मेरे पापा ने कभी भी मुझमे और मेरे भाई में फर्क नहीं किया था।मेरे घर पर भी हर किसी ने बाहर भेजने पर बवाल किया था।पर याद है मुझे वो रात जब पापा जी आये थे और मुझसे पूछा था क्या करना है? मेरे कोचिंग की बात सुनकर औऱ मुझपर भरोसा करके ही आज जो हूँ उस पर गर्व है पापा जी को।उनकी निशु उनका गर्व है हमेशा कहते सुना है।

क्या होगा गर माँ पापा को अभ्युदय जी नही पसन्द आये तो?

ठाकुर होना ही तो बस काफी नही होगा ना?

बीमार,जिसे सब मरीज कह रहे हैं उनसे शादी के लिए क्या राजी हो जाएंगे?

बहुत से असुलझे प्रश्नो के साथ कब नींद लग गई नहीं जानती।अभ्युदय जी का फोन करीब दो घंटे बाद आया तभी नींद खुली।

"निशी अभी छोटी लाइन क्रोस कर रहा हूँ।तुम तैयार हो जाओ।"

"ठीक है।" कहकर मैंने फोन रख दिया और चेंज कर लिया।

आज मैंने ब्लैक जीन्स पर रेड टॉप पहना था।

टॉप पर लिखा था 'हॉट' और आग की लपट सा कुछ बना था।ये पसन्द रिया की ही थी क्योंकि इसके गले का कॉलर कुछ हटकर था।

मैंने कंघी कर बालों में उल्टी फ्रेंच कर ली और शूज पहन कर बैठ गई।आधे घंटे तैयार बैठे-बैठे पक गई।फोन अभी भी नही आया।

मैंने उठकर अपना परफ्यूम उठाया।

"रिया का बिंदास" जी ये परफ्यूम ही था।रिया के चक्कर मे लिया था।उसके नाम पर जो था।स्ट्रांग है पर बहुत अच्छा।

अब तो पौन घण्टा हो गया।इतना समय थोड़े न लगता है।फोन उठाया तो देखा कि अभ्युदय जी का फोन आ रहा है।पर मेरे फोन पर रिंग क्यों नही बज रही।

"हेलो।"

"फोन क्यों रखती हो जब उठाना नही होता?पिछले आधे घण्टे से फोन कर रहा हूँ।आना है?"

मेरी आँखों से आंसू बहने लगे।ऐसे इतना गुस्सा?मेरा फोन मैंने जब देखा तब तक कोई फोन नही था।फिर यंहा वंहा लग गई तो फोन की तरफ ध्यान ही नही गया।मुझे घड़ी में टाइम देखना ही पसन्द है।रिस्ट वाच पर।

"आ रही हूँ।"रोते हुए ही कहकर फोन काट दिया।देखा तो वाकई 20 मिस्ड काल थे।

कार के सामने पहुच कर अभ्युदय जी की तरफ देखा भी नही और पीछे जाकर बैठ गई।पता नही क्या समझते हैं खुद को सोचकर।

गाड़ी चल दी।मैंने मेडिकल के पास मोबाइल शॉप के सामने ड्राइवर को बोला

"भैया गाड़ी रोकिए न एक मिनट,मेरा फोन खराब हो गया है चेक करवाना है।"

"दीदी अपने घर के पास वाली शॉप पर रोकता हूँ।"

शायद उसी दुकान पर अभ्युदय जी के घर के मोबाइल दिखाए जाते होंगे।

"हम्म ठीक है।"

गाड़ी चलती रही।अभ्युदय जी थोड़े तिरछे होकर पीछे मुडे ओर बोले

"रोकर आई हो?"

"हुह।आपको क्या?आपने तो डांट लिया न?"

"क्या हुआ पुच्चू?"

"अब ये पुच्चू क्या है?"

"पुच्चू वो है जो रोकर बैठा है,जिसे पुचकारने का मन कर रहा है।"

"बात मत कीजिये आप।"

"क्या हुआ फोन को?"

"पता नहीं।रिंग ही नही आ रही।"

"कितने साल का है फोन तुम्हारा?"

"अभी 2 या ढाई साल।"

"क्या बात है पुच्चू।इतना लम्बा साथ? हमारा तो एक साल भी बमुश्किल चलता है।"

तभी गाड़ी रुकी।

"दीजिये फोन दीदी।" मैंने अपना फोन दे दिया।

"अपना हाथ दो।"अभ्युदय जी ने अपना हाथ आगे किया।

मैंने भी अपना हाथ उनके हाथ पर रख दिया।

"सॉरी पुच्चू।"

"प्लीज ये पुच्चू वुच्चउ मत कहिये।"

"तुम्हें नहीं पसन्द तो नही बोलेंगे पुच्चू।"

"अभ्युदय जी.."

"हाँ पुच्चू।"

"प्लीज न.."

"क्या न.."

"आपको मज़ा आ रहा है?छोड़िये हाथ।"

"अच्छा सॉरी.. सॉरी ओके?"

"हम्म..ओक.."

"ठीक है पुच्चू.."

अभ्युदय जी हंस पड़े।खिलखिला कर।मैंने कभी उन्हें इस तरह खुश नही देखा।छोटे बच्चों को शरारत कर हंसते देख रही हूँ जैसे।मैं बस देखते हुए इतना ही कह पाई कि

"आप नही मानेंगे न?"

ड्राइवर भैया आ गए।

"अभी चेक करके दे देंगे आधे घंटे में।तब तक घर चलें न भैया?"

"नहीं।तुम्हारा मन हो तो यंही बैठते हैं।"कहकर अभ्युदय जी फिर हंस पड़े।

"आपने आज भांग पी है क्या?बिना बात के हंस रहे हैं?"

"नशा तो तुम्हारे इस इत्र का है पुच्चू जो तुमने आज लगाया है।"

"वाह-वाह।क्या बात है।"

"सच कह रहा हूँ।बहुत प्यारी खुशबू है।बहुत-बहुत ही प्यारी।कुछ अपनी सी।कुछ याद दिलाती सी।"

"क्या याद आ रहा है आपको?"

"वो पहली छुअन।वो जब तुम आई थीं पास,बहुत पास। चार जुलाई की वो शाम।जब हम थे साथ, तुम थी साड़ी में औऱ वो मेरे जज्बात।"

"अभ्युदय जी आपने पी हुई है?"

"हाँ पुच्चू।मैंने पी है आज।"

, मुझे गुस्सा आने लगा।

"तभी इतनी शायरियां बनाई जा रही हैं?"

हम घर पहुँच गए थे।लेकिन अभ्युदय जी मेरा हाथ छोड़ने तैयार ही नही थे।

ड्राइवर भैया उतर कर बाहर खड़े थे।

"चलिए अभ्युदय जी।"

"नहीं।पहले पुच्चू एक किस्सी देगी।"

"क्या?आपको क्या हो गया है?चलिए न प्लीज।"

"एक किस्सी प्लीज्।प्लीज न पुच्चू।"

एक तो ये कुच्चू-पुच्चू, ऊपर से किस्सी।समझ नही आ रहा क्या करूँ? क्या हो गया है अभ्युदय जी को।ऐसे क्यों कर रहे हैं?

"करो न जल्दी से?"

"अभ्युदय जी?"

"क्या.."

"क्या,क्या?"

"क्या sssss बोलो?"

"क्या,क्या उतरिये अब चलिए जल्दी।"

"किस्सी।"

"नहीं देनी।"

"मत दो।मैं बैठा हूँ।नहीं जा रहा कंही।"

"अरे प्रभु,क्या हुआ है आपको?क्यों कर रहे हैं ऐसा?"

"ऐसा-कैसा?"

"अभ्युदय जी।"

"किस्सी।"

मैं झट से आगे हुई और उनके गाल पर एक किस्सी कर दी।

अभ्युदय जी ने मेरा हाथ छोड़ दिया।चेहरा मेरी तरफ घुमाया और अपनी बड़ी-बड़ी आंखों से मुझे घूरकर बोले।

"गाल पर?मैं तो हाथ, पर किस्सी करने की बात कर रहा था पुच्चू।"

मैं खुद ही शर्मा कर,कार से निकल कर अंदर भाग गई।

, ये क्या किया निशी, अब अभ्युदय जी के सामने कैसे जाएगी?क्या सोचेंगे वो?

गाल पर किस, हे प्रभु।

मैं अपने चेहरे को हाथों में छिपा कर बैठ गई।रूम का दरवाजा खुला अभ्युदय जी अंदर आये।

अभ्युदय जी के चेहरे पर अलग सी चमक थी और वो लगातार मुस्कुराए जा रहे थे।

"मुस्कुराना बन्द कीजिये।"

"क्यों?"

"बस ऐसे ही।"

"अब ये मुस्कुराहट कम नही होगी।अब तो एक किस्सी और चाहिए।"

मैं अपनी हंसी भी नही रोक पाई और हम दोनों बहुत देर हंसते रहे।
 
"तुम चाहती हो मेरा एक गाल छोटा हो जाए?"

"मतलब?"

"मतलब ये की एक गाल पर किस्सी कर दी दूसरा जल-जल के छोटा हो जाएगा।देखो कैसा लगूंगा मैं एक गाल बड़ा एक छोटा।"

मुझसे रहा नही गया और जोर से हँसी आ गई।

"अभ्युदय जी ये अपना ज्ञान आप अपने पास ही रखिए।कुछ भी।"

"मैं झूठ नही बोलता।सच में, माँ से पूछ लो।"

"आंटी से क्या पूछना है?"

"यही के दूसरा गाल छोटा हो जाएगा या नही।"

"एक्सरसाइज करें?"

"हम्म"

एक्सरसाइज शुरू हो गई।लेकिन आज जो भी कुछ भी थोड़ी देर पहले हुआ उससे हम दोनों भी शायद ज्यादा ही एक्साइटेड थे।

अभ्युदय जी को मैट पर लेटाया हुआ था और उनके हाथ में वन के जी का वेट बांध रखा था।अपने हाथों से पकड़ कर और रेसिस्टेंस देते हुए उनका हाथ मोड़ना और सीधा करना करा रही थी।नज़र हाथ पर थी पर दिल की धड़कने बढ़ी हुई थीं,क्योंकि जानती थी अभ्युदय जी की नजर सिर्फ और सिर्फ मुझपर थीं।

"तुम बहुत सुंदर हो निशी।"

"आपका ध्यान कंहा है?"

"तुम पर, तुम्हारे होंटो पर,तुम्हारी आँखों पर,तुम्हारे गाल पर,तुम्हारे बालों पर।"

"सच-सच बताइये आज पीकर आये हैं न?"

मैं अभ्युदय जी के थोड़ा पास हुई ताकि महक के जरिये जान सकूं की अभ्युदय जी ने ड्रिंक की है या नही।

लेकिन तभी अभ्युदय जी भी एक दम से करीब आ गए।इतनी नजदीकी हमारे चेहरों में कभी नही थी।उनकी सांसे मेरी सांसों को छू रही थीं।अजीब सी गुदगुदी थी ये।समझ नही आ रहा था इस पल को कैसे बस यूँही रुके रहने दूँ।

एक पल भी नहीं लगा और अभ्युदय जी ने अपने होंटो से मेरे होंटो को छू लिया।

पहले प्यार का पहला प्यारा किस।कैसे अजब जज्बात थे कि दरवाजे से कोई भी आ सकता है बिना सोचे हम बस डूब गए।लेकिन एक हलचल हुई।

अभ्युदय जी के हाथ में।उन्होंने अपनी उंगलियों से मेरी उंगलियों को जकड़ लिया।

मैं दूर हट गई और बोली

"अभ्युदय जी आपके हाथ को देखिए।अब अपनी उंगलियों को खोलिए।"

अभ्युदय जी ने कोशिश की और धीरे-धीरे उन्होंने उंगलियों को खोल दिया।मैं बहुत खुश हो गई इतनी की अभ्युदय जी के दूसरे गाल पर भी किस कर दिया।

"लीजिये अब छोटा नही रहेगा ये गाल।"

अभ्युदय जी अब भी बस मुझे देखकर मुस्कुरा रहे थे।

"अब तो रोज किस करना पड़ेगा तभी इस हाथ मे जान आएगी।"

"अभ्युदय जी.. " मैंने गुस्से में आंखे बड़ी की।

"सच तो कह रहा हूँ।"

आज एक्सरसाइज के बाद अभ्युदय जी ने कहा।

"मुझे भी कुछ काम है तुम्हें छोड़कर निकल जाऊंगा।"

मैंने नजरें तिरछी कर के अभ्युदय जी की तरफ देखा तो फिर बोले

"क्या ss?? काम है जाना है ज़रा।"

"मैंने कुछ कहा क्या?"

"घूर तो ऐसे रही हो जैसे पता नही मैंने क्या कह दिया या कर दिया?"

"नहीं बिल्कुल भी नही।"

आंटी हमारी नोकझोक पर बीच मे आईं।

"निशी सिंह साहब बता रहे थे कि तुम्हें इडली बहुत पसंद है?"

"जी आंटी,मुझे साउथ इंडियन फ़ूड अच्छा लगता है या सच कहूं तो एक परवल की सब्जी के अलावा और दही बड़े के अलावा सब खा लेती हूँ। हाँ उड़द की दाल और राजमा भी नही पसंद।"

"लो माँ अब नखरे शुरू मैडम के।"

आंटी और अभ्युदय जी हंस पड़े।

"अरे जो नही खाती वो बस तो बता रही हूँ।"

दोनों अब भी हंसते रहे और मैं भी बिना मुस्कुराए नही रह पाई।

घर से निकल कर एक बार फिर कार में बैठे ही थे कि अभ्युदय जो ने अपना हाथ पीछे किया।मैंने भी बिना कुछ कहे ही हाथ पकड़ लिया।

आज जो भी कुछ हुआ उसके बाद हाथ न पकड़ने की कोई वजह नही थी।हाँ प्यार है।हम दोनों को एक दूसरे से और प्यार में वासना न हो ऐसा होता नही।

किस करना वासना ही हुई न? लेकिन वो एहसास कंही और नही गए बस अब भी थे।एक सिहरन थी हम दोनों के बीच।उस सिहरन से ही तो उंगलियां भी चल उठी।कितना अच्छा हो कि अभ्युदय जी बिल्कुल ठीक हो जाएं।

गाड़ी मोबाइल शॉप के सामने रुक गई।

ड्राइवर भैया मोबाइल लेने गए और अभ्युदय जी ने पीछे की तरफ अपना सिर घुमाया।

"निशी।"

"हम्म.."

"एक बात कहूँ?"

"कहिए।"

"अभी मन नही भरा आज थोड़ी देर,बस थोड़ी और देर रुक जाओ मेरे पास।"

"आपको आंखें पढ़ना आता है,या दिल?"

"मतलब?"

"ओह तो आज आप मतलब पूछेंगे?"

अभ्युदय जी खुशी से मुस्कुराए औऱ उन्होंने कस कर मेरी उंगलियों को पकड़ लिया।

ड्राइवर भैया आये तो उन्हें तिलवारा की तरफ चलने को कहा।अंधेरा हो चला था।छोटे पुल के सामने parking पर गाड़ी पहुच कर बन्द हो चुकी थी।

अभ्युदय जी ने 100 रुपये देकर ड्राइवर को कहा दीप दान करके ऊपर से देखना है। जल्दी से जाकर आओ।ड्राइवर भैया चले गए।न जाने क्या सोच रहे होंगे?

अभ्युदय जी ने अपनी सीट पीछे की और पीछे होकर मेरे एकदम करीब आ गए।

"मैंने कहा अभी मन नही भरा।आज रोकना मत।"

मैं खुद भी शायद यही चाहती थी बिना कुछ कहे ही उनके होंटो पर अपने होठों को रख दिया।

हम कितनी देर डूबे रहे एक दूसरे में खोते हुए हम भी नही जानते।मैं ये पल खोना नही चाहती थी लेकिन अभ्युदय जी को मेरी और मेरे लिए लोगों की सोच की फिक्र थी।

वो हटे और बोले

"सांस भी नही लेने दोगी क्या?"

मैं शर्मा गई।

"आप न.. बात मत कीजिये।"

"निशी।"

"हम्म"

उन्होंने एक बार और जल्दी सी होंटो पर किस किया और अपनी सीट आगे कर ली।

"क्या हुआ?अभ्युदय जी?"

तभी गाड़ी का दरवाजा खुल गया और ड्राइवर भैया आकर बैठ गए।गाड़ी बैक होकर बड़े पुल की तरफ बढ़ गई।

हमारे हाथ और जज्बात अब भी वैसे ही थे।

तिलवारा पर उतर कर बहुत देर तक पानी में दियों को देखते रहे पर हाथ अब भी पकड़ रखा था हमने।

"अभ्युदय जी।"

"हम्म.."

"हम शादी कर लें?"

"निशी.. एक बात कहूँ?"

"हाँ।"

"शादी तुम पंकज से करना।मुझे बस किस करो।"

"गंदे।हुह बात ही नही करनी आपसे।जाओ।"

मैं गुस्सा होकर हाथ छोड़कर गाड़ी में बैठ गई।

अभ्युदय जी भी गाड़ी में आकर बैठ गए और धीरे से बोले।

"पुच्चू गुस्सा है?"

"फिर पुच्चू?हुह।"

"अच्छा एक बात बताओ?मैंने पी नही पी वो तो तुम्हे समंझ आ गया होगा।तुम्हें किस बात का नशा था?"

"आपकालेकिन अब उतर गया।शादी तो पंकज से करनी है न?"

"निशी लव यू।"

तभी ड्राइवर भैया आकर बैठे।

"बड़ी खराब टाइमिंग ही तुम्हारी।" अभ्युदय जी बोले।

"जी भैया?"

"कुछ नही चलो अब।"

मैं पीछे बैठी सोचती रही क्या वाकई अभ्युदय जी चाहते हैं मेरी शादी उनसे न हो?
 
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