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Incest विधवा माँ के अनौखे लाल

शाम के छह बजे सब उठे और शाज़िया अपनी हालत ठीक कर के बाहर आई और सब के लिए चाई बनायीं और फिर खाने की तैयारी में जुट गयी ...

कुछ ही देर में अनीस ऑफिस से वापिस आया और घर पे दादा को देख कर चौक गया की अचानक ये कहा से.....

अनीस - अरे दादू आप यहाँ अचानक क्या बात है अच्छा लगा आपको यहाँ देख कर....

वसीम - हां बेटा वो वहा काफी अकेला महुसू हो रहा था तुमलोगो के बिना इसलिए यहाँ रहने चला आया और जब पेंशन की तारीख आएगी तो मै जा कर ले आया करूँगा......

अनीस - अच्छी बात है दादू आपको अब खाने पिने की कोई दिक्कत नहीं होगी आराम से यहाँ रहिये .....

वसीम - हा बेटा अब तो आराम ही आराम है और किचन में काम कर रही शाज़िया को दख कर मुस्कुरा देता है .....

शाज़िया की तरफ देख कर मुस्कुराते हुए देख कर अनीस को अटपटा सा लगा जिसे जीशान देख कर मुस्कुरा दिया और उसने अनीस को सारी की सारी वारदात एक ही साँस में बता डाली अनीस ने सोचा भी नहीं था की एक ही दिन में उसकी माँ के साथ क्या क्या हो गया खैर उसने उन् दोनों से आगे कोई भी बात नहीं की वो उठा कर सीधा किचन में चला गया शाज़िया से पूछने की आखिर उसकी चोट अब कैसी है .....

शाज़िया - अरे बेटा तुम कब आये ...

अनीस - वो सब छोड़ो माँ ये बताओ की तुम्हारी पाव की चोट अब कैसी है....

शाज़िया बोली की पहले से बेहतर है वो बेटा सब इतनी जल्दी जल्दी हुआ की कुछ समझने से पहले मुझे चोट लग गयी और फिर तेरे दादाजी का कोई गलत मंसूबा भी नहीं है मुझे ले कर ....मगर अनीस जानता था की दादा ने काफी दूर की सोची है....

मगर वो इस बात के लिए अभी से ही तैयार था की कभी भी दादा के नीचे मेरी माँ नहीं जाएगी वो सिर्फ हमदोनो भाइयो की ही है और हमारी ही रहेगी .....

अनीस को ऐसे सोचते देख कर शाज़िया बोली की मै जानती हु अनीस की तू क्या सोच रहा है मगर बेटा दादा जी को मैंने पहले ही इस बात के लिए तैयार कर लिया है और उन्होंने भी हमारे इस रिश्ते पे कोई आपत्ति नहीं जताई है उलटे उन्होने मेरी हालत को समझा है इसलिए उनको ले कर तू अपने मन में कोई गुबार मत रखना ठीक है चलो अब ज़्यादा मत सोचो और मुह हाथ धो कर खाने के लिए बैठो मैं खाना लगा रही हु और अनीस उसके गले लग कर कहता है की माँ तुम हमारी ही हो किसिऔर का साया भी नहीं पड़ने देंगे तुम पर हम याद है न वादा किया था हम दोनों भाइयो ने ...

शाज़िया - नहा बाबा याद है और उस वादे पे पूरा भरोसा भी है ...चलो अब जाओ ...

खाने की मेज पे आज कई दिनों के बाद शाज़िया पुरे कपड़ो में थी आज ....सब ने मिल कर खाना खाया और उसके बाद अब हॉल में बैठे टीवी देखने के लिए हमेशा की तरह शाज़िया अपने दोनों शेरो के बीच बैठी थी और वसीम बगल के सोफे पे बेचारा मन ही मन सोच रहा था की एक दिन उसके गोद में ये शाज़िया नंगी बैठ कर उसे खाना खिलाएगी .....

इधर अनीस का मन थोडा उदास था दादा के आने से की कहा अभी वो अपनी माँ को बड़े ही प्यार से उसके बदन से खेल रहा होता और इनके आ जाने से सारा कार्यक्रम बिगड़ गया है ....उसका मन बहुत ही उत्तेजित था अन्दर से मगर बाहर से बिलकुल शांत प्रतीत हो रहा था....जीशान ने अनीस की हालत को भाप लिया और वो उठा और हॉल की बत्ती बुझा दी मगर किचन की रौशनी और टीवी की रौशनी से सोफे को अच्छी तरह से देखा जा सकता था जीशान की इस हरकत से शाज़िया समझ गयी थी की क्या होने वाला है मगर अनीस का ध्यान इस ओर बिलकुल भी नहीं गया था....
 
इधर जीशान ने शाज़िया की साडी का पल्लू गिरा दिया और शाज़िया के स्तनों को ब्लाउज के ऊपर से ही दबाने लगा

और अथ ही साथ उसकी चूत को साडी के ऊपर से मसलने लगा और गर्दन पे होठ रगड़ने लगा जिससे शाज़िया को बैठना अब मुकिल हो रहा था ...कुछ ही देर में शाज़िया भी हवस के खेल में बहने लगी और शाज़िया ने जीशान का पूरा साथ दिया और उसने अपने ब्लाउज के दो बटन खोल दिए और अपनी टाँगे भी हलकी खोल दी जीशान ने एक एक कर क पूरा ब्लाउज खोल दिया अब ब्लाउज केवल शाज़िया के कंधो पर अटका हुआ था .....

इस बात से अनीस और वसीम दोनों बेखबर थे ...

तभी शाज़िया की एक चूची को जीशान ने कस कर मरोड़ दिया जिसे शाज़िया की हलकी चीख निकल गयी और साथ ही साथ शाज़िया ने टाँगे उत्तेजना में थोड़ी और फैला दी जिसे वसीम और अनीस दोनो ने देख लिया ...

अब हॉल में शाज़िया ऊपर से नंगी अपनी चूची अपने छोटे बेटे से मसलवा रही थी जीशान को इस खेल में मजा आ रहा था ...अनीस ने जब शाज़िया की खुली चुचिया देखि तो उससे रहा नहीं गया और झट से उसने अपने होठ शाज़िया की एक चूची पे जमा दिए इधर वसीम की हालत ख़राब हो गयी थी ऐसे दृश्य को देख कर ....अब सोफे पे ही जीशान ने शाज़िया का ब्लाउज उसके बदन से अलग कर दिया और अनीस ने फटाफट उसकी साडी को निकाल फेका अब शाज़िया केवल पेटीकोट में हॉल में अपने ससुर और दोनों बेटो के सामने बैठी थी......

अब अनीस पे उसकी उत्तेजना पूरी तरह हावी हो चुकी थी उसने पेटीकोट के ऊपर से शाज़िया की चूत को इतनी जोर से रगड की पेटीकोट का कपर उसकी चूत में घुस गया और उसकी चूत की दरार कपडे के ऊपर से साफ़ साफ़ दिखने लगी वसीम की भी हालत अब काफी ख़राब हो चली थी थी उसने भी विवश हो कर अपने मुसल को धोती के ऊपर से सहलाना शुरू कर दिया था किसिस का भी ध्यान अब टीवी की तरफ नहीं था.....

जीशान उठा और शाज़िया को उठाया और अनीस ने उसकी पेटीकोट का नाडा खोल दिया पेटीकोट सरसराता हुआ शाज़िया के पैरो में आ गिरा शाज़िया ने उसके अपने पैरो की गिरफ्त से अलग कर दिया और पूरी नंगी हो जाती है .....

जीशान और अनीस भी बिना देर किये नंगे हो जाते है उन्हें इस बात जरा भी ध्यान नहीं रहा की उनके दादू वही पे है ....

मगर वसीम अपने जज्बातों के गिरफ्त से बाहर आ गया था और वो भी नंगा हो कर अपने लंड को मसल रहा था जिसने पूरा नाग का रूप धारण कर लिया था......

इधर शाज़िया को जीशान सोफे पे ही लिटा कर उसकी चूत को चाटने लगता है जिससे शाज़िया की तेज तेज आवाजे आने लगती है और अनीस उसकी चुचिओ को मसलने चूसने लगता है कुछ मिनट की कहाई के बाद जीशान उठ खड़ा होता है और अपना फनफनाया हुआ लंड शाज़िया की चूत में एक ही झटके में पेल देता है शाज़िया की चीख निकल जाती है और जीशान बिना रुके धराधर पेलने लगता है .....

अनीस जीशान को रुकने बोलता है और ...जीशान शाज़िया को लिए ही सोफे पे लेट जाता है...जिससे शाज़िया की गांड अनीस की तरफ हो जाती है और शाज़िया खुद अपने हाथो से अपनी गांड फैला कर अनीस को छेद दिखाती है ....

वसीम ये देख कर काफी उत्तेजित हो जाता है की शाज़िया खुद डबल चुदाई चाहती है उफ़......

अनीस भी नीचे झुक कर शाज़िया की गांड को अपने थूक से हल्का गिला करता है और अगले ही पल वो शाज़िया के गांड में अपना लंड उतार देता है ...और फिर दोनों लग जाते है अपनी चहेती माँ की कुटाई में .....

.इधर वसीम ऐसे दृश्य से खुद को रोक नहीं पाता और वही पे झड जाता है

....इधर शाज़िया दोनों के लंड ले ले कर दो बार झड चुकी थी और अब दोनों शेरो की बारी थी कुछ देर में वो भी झड जाते है शाज़िया की चूत और गांड उन दोनों के वीर्य से भर जाती है शाज़िया जीशान के ऊपर बेहाल सी पड़ी अपनी सासों को काबू करने लगी होती है यही हाल बाकी तीनो मर्दों का भी था वसीम वही सोफे पे नंगा बैठा था और ऊपर की तरफ देख रहा था जबकि अनीस शाज़िया और जीशान के बगल में जमीं पे बैठा हुआ था और उसका मुह शाज़िया की जांघ पे था.....

कुछ देर के बाद शाज़िया को ख्याल आता है की वे लोग वसीम के सामने ही चुदाई कर रहे थे और वो जल्दी से उठती है और इसी जल्दी में उसके मुह से बाबूजी निकल जाता है......उसकी इस आवाज से सब की निद्रा टूटती है और सभी अपने होश में वापिस आते है .....

अनीस अपने दादा की हालत देख कर हस्ते हुए कहता है की दादा आपको भी इतनी तारक चढ़ी की यही हमारे सामने ही मुठ मार दिया हां .....
 
कुछ देर के बाद शाज़िया को ख्याल आता है की वे लोग वसीम के सामने ही चुदाई कर रहे थे और वो जल्दी से उठती है और इसी जल्दी में उसके मुह से बाबूजी निकल जाता है......उसकी इस आवाज से सब की निद्रा टूटती है और सभी अपने होश में वापिस आते है .....

अनीस अपने दादा की हालत देख कर हँसते हुए कहता है की दादा आपको भी इतनी तारक चढ़ी की यही हमारे सामने ही मुठ मार दिया हां .....

शाज़िया बेचारी शर्म के मारे वही सोफे पे सिकुड़ कर बैठ जाती है हालाकि उसने अपने बदन पे कोई भी कपडा नहीं लिया था वो अभी भी नंगी ही थी

.....जीशान उठ कर हॉल की बत्ती जला देता है और पूरा हॉल रौशनी में जगमगा जाता है ....और वसीम की निगाहें शाज़िया की एक लटकती हुयी चूची पे जम जाती है ....और उसके लंड में फिर से कसाव आना शुरू हो जाता है और शाज़िया की गांड की दरार जो आधी नजर आ रही थी ऊपर से शाज़िया की नंगी पीठ और उसपे खुले काले बिखरे बाल उफ्फ्फ्फ़ वसीम के लंड पुरे तनाव में आ गया ....

शाज़िया - जीशान बत्ती क्यों जला दी तुमने बंद करो उसे मुझे शर्म आ रही है ......बेटा क्या करता है तू भी .....

जीशान हँसता है और कहता है माँ जरा घूम कर दादा की हालत देखो बेचारे मरे जा रहे है तुम्हे देख देख कर .....

अनीस - जीशान पागल मत बन तुझे शायद याद नहीं हमने माँ से एक वादा किया था की माँ केवल हमदोनो भाइयो की ही रहेगी उसके ऊपर कभी किसी की नजर नहीं पड़ेगी ना ही कोई आंच आने देंगे ......और वो थोड़ा गुस्से में आ जाता है ....जीशान की इस हरकत पे मगर जीशान कहता है ....

जीशान - भईया मुझे अच्छे से याद है उस वादे के बारे में और वो वादा कभी नहीं टूटेगा मगर भाई आप दादा की हालत देखो जरा उनको हमारी ऐसी धुआदार चुदाई देख कर क्या हालत हो गयी है बिचारे नंगे खड़े है ऊपर से उनके हथियार को तो देखो जरा कितने गुस्से में माँ को निहार रहा है ...और हस देता है ....

अनीस भी घूम कर देखता है और सोचता है की बात तो सही है दादू की हालत काफी ख़राब थी ...

इधर वसीम अपनी हो रही इस जयजयकार को देख कर मासूम कुत्ते के जैसी शकल बनाता है ....

जीशान - माँ थोडा दादू जान के बारे में भी सोचो न और वो शाज़िया को जोर से हिला देता है जिससे शाज़िया सोफे पे सिकुड़ी बैठी थी वो अपनी एक टांग फर्श पर टिका देती है जिससे उसकी एक पूरी टांग मरकरी की रौशनी में चमक उठती है वो इस झटके से संतुलन बिगड़ने लगता है इसलिए वो झुन्झुला कर उठ खड़ी होती है और वसीम की तरफ घूम जाती है .....

शाज़िया - मै इसमें बाबूजी की क्या मदद कर सकती हु मै पहले ही बोल चुकी हु की मेरे तरफ से किसी भी तरह की उम्मीद मत रखियेगा..और इन्होने हामी भी भरी थी और अब मै ऐसा कुछ नहीं करने वाली.....मै सिर्फ तुमदोनो की ही हु और तुम्हारी ही रहूंगी ...और अपने पैर पटकते हुए नंगी ही वहां से कमरे में चली जाती है और तीनो मर्द उसके थिरकते चूतड़ देखते रहते है जो को अभी कुछ ही देर पहले बज रही थी .....

आगे क्या होने वाला था ये आने वाला वक़्त ही बताएगा.....

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शाज़िया कमरे में जा कर नंगी बैठी होती है सर को पकड़ कर क्योकि उसे इस बात की बिलकुल भी उम्मीद नहीं थी की जीशान ऐसे पलटवार करेगा अपनी माँ को ही रंडी बनने पे मजबूर करेगा वो भी अपने ही दादा के लिए ...जबकि वो सारी की सारी बात से अवगत है फिर भी....हे भगवान् अब मै क्या करू ....

जीशान वही हॉल में में बैठ कर अनीस को समझा रहा होता है की आखिर दादा भी एक इन्सान ही है वही वसीम अपनी धोती को कमर पे लपेट कर वहा से चला जाता है अपने कमरे में क्योकि उसने अपनी पहल शुरू कर दी थी अब बस जो होना था वो हो कर ही रहेगा या तो आर या पार .....

अनीस जीशान की बात सुनने के बाद ....

अनीस - मै समझता हु दादू भी एक इंसान ही है मगर हमारी माँ केवल हमारी ही रहेगी और इस बात को जितनी जल्दी तू समझ लेगा उतना ही बेहतर होगा समझा न .....

और उठ कर कमरे में चला जाता है .....

जीशान सोचता है की भईया दादा को ऐसे छोड़ना कही से भी इन्साफ नहीं होगा उनके लिए चुदाई न सही थोड़ी थोड़ी सी चुहलबाजी ही कम से कम उनके लंड को ऐसे खड़े खड़े तो नहीं रहना पडेगा और वैसे भी मेरी माँ चीज ही ऐसी है की किसी का भी खड़ा कर दे और तो और दादा के सामने तो उनके दोनों छेदों को बजा चुके है ....

खैर उसने अभी इस वक़्त ज़्यादा बहस करना सही नहीं सोचा और वैसे भी अभी शाज़िया को एक बार और बजाना था वो भी झटपट कमरे की ओर बढ़ गया ....कमरे में पंहुचा तो देखा की शाज़िया नंगी बिस्तर पे बैठी है और अनीस उसे कुछ समझा रहा था कमरे में जीशान के आते ही शाज़िया उठ कर जीशान के करीब आती है और उसके छाती पे मुक्के बरसाने शुरू कर देती है की उसने कैसे ये सोच लिया की वो वसीम को भी अपने बदन सौप देगी और सुबुकते हुए जीशान को मारने लगती है

जीशान उसका हाथ पकड़ कर रोकता है और सीधे उस्के होठो पे होठ जमा देता है शाज़िया उसे धकेलती है मगर कुछ ही सेकंड्स के बाद शाज़िया अपनी दोनों टाँगे फैला कर उचक कर जीशान के कमर पे चढ जाती है जीशान भी उसके दोनों गांड की फाको को फैला कर उसके छेद को अनीस की तरफ करते हुए उसको थाम लेता है ....और उसकी दोनों चुचिया जीशान के सीने में धस जाती है....इधर अनीस भी उन दोनों को ऐसे करता देख कर पीछे से आ कर शाज़िया की खुली हुयी चूत और गांड के छेद में ऊँगली घुसा कर चूसने लगता है जिससे शाज़िया और उत्तेजित हो कर भयंकर तरीके से जीशान के होठ चूसने लगती है वे तीनो फिर से हवस की नदी में गोते लगाने लगे थे जबकि अभी तुरंत वे चुदाई से फारिग हुए थे .....

उधर वसीम इस बात से अनजान अपने नींद की आगोश में जा चूका था.....

जीशान अब चुम्बन तोड़ता है और शाज़िया अपनी चूत और गांड पे हो रहे हमले से उत्तेजना पे चीख पड़ती है ......

शाज़िया - ऊओह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह् बेटा आआअह्ह्ह्ह्ह्ह्ह् आऔऊउर्र्र च्च्छ्हूस्स्स हाआआआआअह् आआआह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्.....

जीशान अनीस को उठने कहता है और शाज़िया को ले कर बिस्तर पे गिरा देता है और कहता है माफ़ करना मै तुम्हे रुलाना नहीं चाहता था वो तो मै दादा की हालत देख कर थोडा जज्बाती हो गया था ........

शाज़िया - मुझे उस बारे में अभी कोई बात नहीं करनी आओ जल्दी से इधर तुमदोनो ....

उस रात कमरे में चुदाई का दौर दो राउंड और चलता है और फिर आने वाली सुबह जीशान ने अपने दादा के लिए कुछ सोच रखा था क्योकि कल उसको कही नहीं जाना था और अनीस की गैर मोजूदगी में वो शाज़िया को पटा सकता था ......

सुबह सुबह सब अपने अपने समय पर जाग गए......जीशान और अनीस आज कई दिनों बाद जॉगिंग पर गये थे .....इधर शाज़िया बिलकुल नंगी थी उसने आज कुछ भी पहनने की जेहमत नहीं उठाई कल रात के बाद से उसने सोच लिया था की अब बाबूजी से कोई पर्दा करना बेफिजूल है इसलिए आज से मेरा जब मन होगा तब ही कुछ पहनूंगी या कही बाहर जाने वक़्त .......इस वक़्त वो किचन में नंगी खड़ी हो कर रात के झूठे बर्तन धो रही थी ...

वसीम अपने कमरे से बाहर निकला और बाथरूम जाते वक़्त अपनी आखो के सामने ऐसे नज़ारे की उम्मीद नहीं की थी और अभी शाज़िया को नंगी देख कर उसके लंड में जैसे तूफ़ान आ गया और वो .....बहू......कहते हुए अपने लंड को वही पे मुठीयाने लगता है शाज़िया अपने ससुर की आवाज सुन कर घूम कर देखती है और वो उस दृश्य को देख कर लजा जाती है....

खैर वो अगले ही पल किचन का काम छोड़ कर किचन के दरवाजे पे आ कर खड़ी हो कर कहती है .....

शाज़िया - बाबूजी ये आप क्या कर रहे है ...जाइये बाथरूम में और नहा धो कर बाहर आईये फिर नास्ता करियेगा....जाइये ....

शाज़िया की इस बेशर्मी पर वसीम ने भी बेबाकी से जवाब दिया बहु सुबह सुबह ऐसे नज़ारे की उम्मीद नहीं थी अभी जब तक अपने इस उस्ताद को शांत न कर दू तब तक हमसे कोई दूसरा काम नहीं होगा ...और वो अपने धोती को पूरी तरह से खोल कर वही गिरा कर बिना किसी संशय के शाज़िया को देखते हुए लंड हिलाने लगता है ...

शाज़िया कुछ देर वही मुह बनाये खड़ी रहती है और फिर हल्का सा मुस्कुराते हुए घूम जाती है ...और अब शाज़िया की गांड वसीम की तरफ थी और शाज़िया कहती है ...जल्दी निपटायिये अपने उस्ताद को और नहा धो कर तैयार हो जाइये ...मुझे और भी काम है .....दरसल शाज़िया को वसीम की उत्तेजना को जल्द से जल्द चरम पे लाना था इसलिए उसने अपने नंगे बदन की नुमाईश वसीम के सामने की थी ...और हुआ भी ऐसा ही वसीम कुछ ही पलो में अपने चरम पे आ गया और वही पे झड गया और झरते वक़्त शाज़िया का नाम पुकारा था.....

शाज़िया ये दृश्य देख कर हस दी और ..अंदर ही अंदर उसे अपने बदन पे नाज हो रहा था की मै अभी भी मर्दों को पागल कर सकती हु..........

थोड़ी देर बाद जीशान और अनीस जॉगिंग से लौट आते है और दरवाजे पर दस्तक देते है...शाज़िया धड़क नंगी ही दरवाजा खोलने पहुचती है और तभी वसीम भी बाथरूम से नंगा ही निकलता है और उसकी नजर दरवाजे की ओर जा रही नंगी शाज़िया पे पडती है ...वो मन ही मन बोलता है ये औरत तो खड़े खड़े ही लौड़े में आग लगा देगी उफ्फ्फ और तभी शाज़िया पूछती है कौन ....

उधर से अनीस और जीशान कहते है हम है माँ तुम्हारे लाल .......

शाज़िया नंगी दरवाजा खोलते हुए दरवाजे की ओट में आ जाती है और वो दोनों अन्दर आ जाते है और आते के साथ जीशान शाज़िया की बाह पकड़ कर उसको खीच कर अपने बदन से चिपका लेता है और दरवाजे पे ही उसके होठ चूसने लगता है और अनीस भी उसकी चुचियो को मसलने लगता है.......

उधर वसीम इस माहोल को देख कर अपने कमरे में सरक लेता है उधर थोड़ी सी गरमाहट लेने के बाद वो शाज़िया से अलग हो कर कहते है ....वाह माँ सुबह से ही नंगी हो कर घूम रही हो ....दादू जान कहा है .....वो कहती है की वो नहा कर शायद अपने कमरे में गये है .....

जीशान - तो इसका मतलब दादा को सुबह सुबह दर्शन दे दिए वाह....वैसे माँ कुछ बात बढा भी दी क्या हमारी गैर मौजूदगी में ...

.शाज़िया अपनी आखे गोल करते हुए उसके कान पकड़ कर कहती है ऐसा कुछ भी नहीं किया है मैंने बस उन्होंने मुझे देख कर मेरे सामने ही अपने उस्ताद मिया को शांत करवाया...और मुस्कुरा देती है ....
 
अनीस - वाह भाई वाह अब मुझे किसी से कोई शिकायत नहीं है मै तो अब जिंदगी को ऐसे ही जिना चाहता हु ...और मैं अब ऑफिस निकलने की तयारी करने जा रहा हु माँ मेरा नाश्ता निकाल दो जल्दी .....और तू जीशान अब कोई चापलूसी नहीं करना वरना देर हो जाएगी ....

जीशान - जी भाई आप जाइये वैसे भी माँ के साथ मै यही रहने वाला हु दिन भर ...मेरे तो मजे ही मजे है ...और वो शाज़िया की चूची को भीच देता है ...

शाज़िया - अआह्ह्ह बेटा धीरे दर्द होता है न ...उफ़ और वो किचन में जाने लगती है तभी जीशान उसके चुतड़ों पे एक जोरदार थप्पड़ लगाता है शाज़िया उछल जाती है और अपने हाथ से चुतड़ों को सहलाने लगती है कहती है की क्या करता ही कमीने अपनी माँ को मारता है ...

जीशान - क्या करू माँ तुम्हारे ये चूतड़ आपस में लडाई कर रहे थे ....और हस देता है .....नाश्ते के टेबल पे कुछ खास नहीं होता शाज़िया वैसे ही नंगी रहती है जिसे देख देख कर तीनो मर्दों को खाने में काफी मशक्कत करनी पड़ती है.......

कुछ देर बाद अनीस ऑफिस चला जाता है और अब घर में वसीम और जीशान ही थे और अब शाज़िया नहाने जाने वाली थी.....तभी जीशान के दिमाग में एक खुराफात सूझती है.....

शाज़िया नंगी ही नहाने के लिए बाथरूम की और जा रही थी तभी जीशान शाज़िया को कहता है माँ....रुको तुम्हारी आज तेल मालिश कर देता हु .....

शाज़िया - वाह मेरे लाल तूने तो बिन मांगी मुराद पूरी कर दी मेरी ....चल आ जा कमरे में मै आती हु .....

जीशान - दादू आप क्या कर रहे है इधर आइये न आपकी जरुरत पड़ेगी

वसीम - आता हु बेटा.....तुम बस बोलो क्या काम है ....

शाज़िया - जीशान ये क्या कर रहा है ....बाबूजी को क्यों बुला रहा है .....

और वो थोड़े नाराजगी के साथ जीशान को देखने लगती है .....

जीशान - क्या माँ तुम भी बच्चो के जैसे मुह बनाती हो दादा ही तो है वैसे भी वो तुम्हे नंगी देख तो रहे ही है ....मालिश में हाथ लगा देंगे तो क्या हो जायेगा

....शाज़िया बेमन से कमरे में चली जाती है और वहा वसीम पहले से मौजूद रहता है और उसने अपना बनियान और कुरता धोती सहित उतार रखा था जिसे शाज़िया पूछती है की ये कपडे क्यों उतार दिए बाबूजी आपने .....

वसीम - बहु वो इसलिए की तुम्हारी मालिश के वक़्त कपडे ख़राब न हो जाए और वो शाज़िया को देख कर हस देता है

शाज़िया भी अपनी मुस्कान को बिखेरते हुए नंगी ही बिस्तर पे लेट जाती है....इसी बीच जीशान भी कमरे में आ जाता है वो भी केवल चड्डी में था जिसमे से उसका लंड साफ़ साफ़ देखा जा सकता था ....उधर वही हाल वसीम का भी था .....

जीशान शाज़िया को उलटी होने के लिए कहता है शाज़िया उलटी हो जाती है और जीशान वसीम को इशारा करता है की वो तेल गिराए और मालिश करना शुरू करे वसीम आज दूसरी बार शाज़िया के बदन को छूने जा रहा था

.....जीशान ने शाज़िया के पीठ के बाल हटाने को वसीम को बोला वसीम ने कापते हाथो से बालो को हटाया और जीशान ने उसकी पीठ से होते हुए शाज़िया की गांड तक तेल की एक पतली सी धार गिराई और शाज़िया की गांड की दरार में कुछ देर तक तेल की धार गिराई जिसे शाज़िया बखूबी समझ रही थी की जीशान क्या कर रहा है ....

वसीम बेचारा सूखे हलक से थूक घोट रहा था आगे होने वाले घटनाओं को ले कर वो काफी रोमांचित हो रहा था .....

अब जीशान ने वसीम से कहा की वो अब मालिश करे....वो भी शाज़िया के दूसरी तरफ जा कर बैठ जाता है और अब वो शाज़िया के पैरो को हाथो में ले कर अपने हाथ से मालिश करने लगता है जबकि वसीम शाज़िया की पीठ पे लगे तेल को फैला के मालिश शुरू करता है......

शाज़िया अपने बदन पे चार चार हाथ लगते ही सिहर जाती है और वो अपने गांड को अन्दर की ओर सिकोड़ लेती जिसे वसीम और जीशान दोनों ने देखा .....वो दोनों हल्के से मुस्कुरा देते है.....

अब वसीम शाज़िया की पीठ से होते हुए शाज़िया की गांड की तरफ बढ़ रहा था वही जीशान भी शाज़िया की गांड की तरफ ही आ रहा था जबकि शाज़िया की सासे भारी होती जा रही थी ......

तभी वसीम ने अपने दोनों हाथो की उंगलिया शाज़िया की गांड की दरार में घुसेड़ दिए और जीशान ने अपने दोनों हाथो की उंगलिया शाज़िया की चूत वाले हिस्से पे घुसेड़ दिया और अब वसीम ने तेल में चुपड़े हाथो को तेज तेज शाज़िया की चुतड़ों में घुमाना चालू किया

उधर वही काम जीशान भी अब कर रहा था अब शाज़िया की हलकी हल्की सिसकिया उठनी चालू हो गयी थी ज्यो ज्यो शाज़िया की चूत और गांड में दोनों के हाथो की गति बढती जा रही थी त्यों त्यों शाज़िया की सिसकिया तेज होती जा रही थी

तभी जीशान शाज़िया की टांगो को फैला देता है जिसे शाज़िया तुरत फैला देती है........और अब वसीम शाज़िया के चुतड़ों को फैला देता है और उसके छेद को कुरेदने लगता है और अब वो उसके छेद में अपनी उंगलिया घुसाने लगता है .... और जीशान शाज़िया की चूत के दाने को रगड़ने लगता है

शाज़िया - आह माँ आह बाबूजी आह शुरू आह ओह्ह आह आह उफ्फ्फ ....

ये असर दोनों की मालिश का हो रहा था अब जीशान ने शाज़िया को तड़पाने की नियत से उसके बदन को रगड़ना रोक दिया और वसीम को भी रोक दिया ....वो तो उसके गांड को छोड़ ना ही नहीं चाहता था मगर जीशान के कहे अनुसार चलने में उसकी भलाई थी इसलिए उसने छोड़ दिया..........

.इधर अब जीशान शाज़िया को आवाज दे कर बोला की माँ अब आगे की और घूम जाओ आगे की तरफ भी तेल लगा दू तभी शाज़िया घूमी और सीधे घूम कर अपनी टांगो को फैलाते हुए जीशान को अपने ऊपर एक झटके में खीच कर बोली इतनी जोर से मालिश कर रहे थे अभी ही क्यों रुक गए हां ........

जीशान अपने माँ के इस कदम से थोडा हैरान होता है उधर वही हाल वसीम का भी होता है ........

तभी शाज़िया कहती है की अब मेरी मालिश इससे करो और वो भी जल्दी .........

वो जीशान के लंड को पकरते हुए कहती है और वसीम वहां से जाने लगता है तभी जीशान कहता है की दादू आप कहा जाने लगे अभी यही रुकिये दादू आप कहा चल दिए इधर आइये हमारी मदद करिए मालिश में .........

वसीम के नजदीक आते ही जीशान उसे गिरेबान से पकड़ कर खीच कर कहता है आप माँ की पैरो की उंगलियों को मुह में ले कर चूसिये और मै उनकी मालिश अपने इस हथियार से करता हु और वो अगले ही पल शाज़िया की चूत को दना दन चोदने लगता है और कमरा शाज़िया की कामुक सिसकियो से गुंज उठता है ......
 
वसीम उसके पैरो की उंगलियो को मुह में चूसने लगता है जबकि उसका ध्यान इस बात पे बिलकुल नहीं था की जीशान ने उसके गिरेबान को पकड़ कर खीचा था ........उधर शाज़िया भी इस बात को नहीं पूछी थी की उसने ऐसा क्यों किया अभी वो चुदने की खुमारी में डूबी हुई थी ......वसीम उसके पैरो की उंगलियों को चुसे ही जा रहा था तभी जीशान घूम कर वसीम को खीच कर कहता है की अब उसके पैरो को ही चूसते रहिएगा की कुछ और भी करियेगा ......

वसीम उसकी तरफ कातर निगाहों से देखता है जैसे वो पूछ रहा हो की आगे मै ऐसा क्या करू की शाज़िया की चूत का स्वाद मै भी चख सकू.

तभी जीशान कहता है की आप नीचे झुक कर मेरे आड़ और माँ की चूत को चूसिये जिसे उसे और उत्तेजना आये और मजा आये और उसके झड़ने में मदद मिले इसे आपको भी माँ की चूत दुबारा से चूसने का मौका मिल जायेगा .........

वसीम उसके आड़ चूसने वाली बात से थोडा अजीब महसूस करता है मगर वो अगले ही पल चूसने के लिए नीचे बैठ जाता है और चूसने लगता है वही शाज़िया अपनी कमर उठा उठा कर चुद रही थी ....अब वे दोनों झड़ने के करीब थे और वसीम अभी भी उन् दोनों के टांगो के बीच चुसे ही जा रहा था तभी जीशान झड जाता है साथ ही साथ शाज़िया भी और उन् दोनों के रस की कुछ फुहारे वसीम के चेहरे पे भी पड़ती है जिसे वो उठते हुए चाट लेता है ......

अभी तीनो अपनी जी तोड़ मेहनत के बाद हाफ रहे था उअर अपनी सासों को नियंत्रित करने में लगे थे

कुछ देर बाद वसीम मायूस चेहरा ले कर कमरे से ये बोलते हुए बाहर चला जाता है की बहु अब तुम नहा लो और फिर नाश्ता कर लो ज्यादा देर भूखी रहना सही नहीं है इतना काम करती हो सब का ख्याल रखती हो ...जाओ बेटा जल्दी कर लो ....और कमरे से निकल जाता है.....जीशान अभी भी वही नंगा आपनी नंगी माँ के साथ खड़ा था ......

शाज़िया - जीशान तूने दादाजी के गिरेबान को क्यों पकड़ कर खीचा था ये क्या बदतमीजी किए हो तुम ......इतने भी अंधे न बनो तुम की बड़े छोटो का लिहाज ही भूल जाओ समझे ना........

जीशान चुप चाप अपनी माँ की बातो को सुन रहा था......क्योकि गलती तो उसने किया था मगर उसकी मंशा कुछ और की थी जिससे अभी शाज़िया अनजान थी .....

शाज़िया - अब बोलो भी चुप क्यों हो और वो उसका हाथ पकडे उसको बाथरूम की तरफ ले कर चल देती है.....

वहां पहुच कर शाज़िया नंगी बाथरूम में नहाने घुस जाती है जबकि जीशान वही दरवाजे पे खड़ा रहता है ....शाज़िया बाल्टी में पानी भरने के लिए नल खोल देती है और चुपचाप खड़े जीशान को झकझोर कर पूछती है की बोलोगे या नहीं .....

जीशान - माँ कैसा रहेगा अगर दादाजी को हमलोग एक गुलाम के रूप में इस्तेमाल करे वैसे भी तुम उसको अपना बदन सौपने वाली नहीं हो तो कम से कम उनसे ऐसे ऐसे काम ले कर ही उन्की भी आत्मा को संतुष्ट कर दिया करेंगे या कहो की उनके लौड़े को आराम मिल जाया करेगा ......

शाज़िया मुह फाड़े जीशान की बातो को सुन रही थी ......

शाज़िया - तू पागल हो गया है क्या क्या बोले जा रहा है समझ भी आ रहा है की क्या बक रहा है तू वो हमारे घर के सबसे बुजुर्ग व्यक्ति है और उनको ऐसे जलील करना चाहता है तू .....

जीशान - माँ मै जलील नहीं करने कह रहा है मै तो बस उनके हित के बारे सोच रहा हु और मेरे नजरिये से तुम देखो इसमें कुछ गलत नहीं है ....अच्छा मेरी बात का जवाब देना अगर दादू जान तुम्हे सामने से आ कर ऐसे ही कुछ करने लगे तो तुम उन्हें हाथ लगाने दोगी....

शाज़िया कुछ सोचते हुए ....नहीं नहीं दूंगी मगर फिर भी बेटा ऐसे कैसे करोगे उनके साथ बताओ ....

जीशान - माँ तुम बस देखती जाओ और जैसे जैसे मै करूँगा मेरा साथ देना तुम बस अब तुम जल्दी से नहा कर बाहर आओ और हां अब कुछ पहन लेना .....

शाज़िया - मगर अनीस का क्या उसको कैसे समझाओगे

जीशान - वो भी मै संभाल लूँगा.....

और वो अपने कमरे में चला जाता है .....

उस दिन कुछ खास नहीं होता है शाम को सब मार्केट जाते है और वसीम सामान की थैली ढोते हुए चलता रहता है अनीस को कुछ समझ नहीं आता है की आखिर जीशान ने मुझे मना क्यों किया सामान की थैली उठाने से और दादा को पकड़ा दिया आखिर ये माजरा क्या है ......घर जा कर उससे पूछता हु ......

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रात के वक़्त शाज़िया को अनीस एक पैकेट पकडाते हुए कहता है खोल कर देखो माँ कैसा है और हमे भी दिखाओ .....वो सब के सब अभी खाना खाने के बाद हॉल में बैठे थे वसीम भी वही पे था .....

शाज़िया पैकेट खोल कर देखती है और वो हैरान हो जाती है उसमे एक बहुत ही कामुक नायटी थी जो की एक बहुत ही झीने से कपडे की बनी हुयी थी.......

शाज़िया उसे पैकेट से बाहर निकालती है और उसे अनीस और बाकी मर्दों को दिखाते हुए कहती है की ये क्या लाया है अनीस तू मैं ऐसे कपडे कब से पहनने लगी.....

अनीस - माँ तुम भी न बुद्धुओ जैसी बाते करती हो ये मैंने खास तुम्हारे लिए लायी है इसको पहनोगी न तुम तो तुम्हे नंगी न होने का एहसास आएगा और हमे तुम पूरी नंगी ही नजर आओगी .....

शाज़िया - अच्छा बेटा वाह क्या जुगाड़ लगाया है अपना तुमने .....

जीशान - वाह भाई वाह दिल खुस कर दित्ता तुस्सी माँ के लिए और कुछ नहीं लाये हो क्या ....

अनीस - फिलहाल तो यही लाया हु अभी अगले महीने की सैलरी मिलने के बाद ही कुछ सोचूंगा .......

वैसे भी मेरा बस चले तो मै तो माँ को दुनिया की सारी खुशिया उसकी झोली ....नहीं नहीं उसकी चोली में डाल दू ....और हस देता है

शाज़िया उसे आखे गोल कर के देखती है इस वक़्त उसने अपने बदन पे साडी लपेट राखी थी केवल और केवल साडी ......

अनीस कहता है माँ जरा दिखाओ भी कैसी दिखती हो तुम इसमें ...अब इन्तेजार नहीं होता है ....

वही वसीम भी बड़ी उत्सुकता से कहता है हां बहु हमे भी दिखाओ जरा .....

जीशान - वाह बुढऊ बड़ी जल्दी है अपनी ही बहु को नंगी देखने में...हा देखो तो कैसे लौड़ा हाथ में लिए बैठे है जैसे की अभी अपनी बहु की चूत में पेल देंगे ....वसीम जीशान के ऐसे व्यवहार से जरा सा दुखी हो जाता है.....

इधर शाज़िया उतने देर में उन् मर्दों के सामने ही नंगी हो जाती है और साडी वही जमीं पे गिरा देती है जिसे सब मर्द अपनी सासे रोके देखते रहते है तभी...

जीशान - अब आ कर मेरी माँ की साड़ी को उठा कर उसे सही से कर के कमरे में रख आइये बैठे बैठे देख क्या रहे है .....माँ कही भागी नहीं जा रही है समझे ना....

वसीम बेचारा बेमन से उठ कर आता है और शाज़िया की साडी को उठा कर समेटने लगता है जबकि शाज़िया नंगी खड़ी हो कर उस नायटी में लगे हुए सील को तोडती है ....उसकी लटकती हुयी चुचिया और भारी भारी जन्घो के बीच की चूत की दरार हलकी हल्की बालो से ढकी हुयी काफी कामुक दृश्य बना रही थी तबाही

जीशान अपना लंड निकाल कर उसके टोपे को रगड़ने लगता है जबकि अनीस आहे भरते हुए कहता है माँ ये रंग तुम्पे बहुत फबेगा कमाल लगोगी तुम ....तभी शाज़िया उस नायटी को अपने गले से होते हुए अपने बदन पे ले आती है जिसे देखते ही जीशान और अनीस दोनों के मुह से एक हि आवाज आती है माशाल्लाह माँ बहुत ही सुन्दर और सेक्सी लग रही हो ......

शाज़िया के गोर बदन पे वो काली रंग की नायटी और उसके चुचियो पे बनी जालीदार डिजाईन जिसमे से उसकी चुचिया की घुन्दिया साफ़ साफ़ नजर आ रही थी और उसकी चुचिया की बीच की गहराई तो अलग ही कहर ढा रही थी और नीचे की ओर उसकी चूत को आधा आधा साफ़ साफ़ देखा जा सकता था....

तभी शाज़िया उन् दोनों के नजरो का पिछा करते हुए घूम कर उनको अपनी गांड दिखाती है जो आधे से भी कम ढकी हुयी थी और उसकी भारी भारी तरबूजे के जैसे चूतड़ नुमयिन्दा हो रखे थे ...इतना देखने के बाद अनीस और जीशान उसके तरफ बढ़ ही रहे थे की तभी वसीम की आवाज आती है बहु ये लो मेरी तरफ से......तीनो की नजरे वसीम की तरफ घूम जाती है ......

वसीम हाथ में एक चान्दी की पायल होती है जो वो शाज़िया की तरफ बढ़ाते हुए कहता है बहु इसे भी पहन लो इस कपडे के साथ काफी जचेगी ...

जीशान - वाह बुढऊ काफी रंगीनिया छाई हुयी हैं दिमाग में वाह .....पहन लो माँ पहन लो ....

शाज़िया उसको अपने हाथ में लेते हुए वही सोफे पे बैठ कर उसे पहनने लगती है जिसके लिए वो अपनी टांग उठाती है जिसके कारण उसकी चूत के लब खुल जाते है और उसका गुलाबी छेद दिखने लगता है सब मर्दों की नजरे वही पे जम जाती है शाज़िया बारी बारी से पायल को पहनती है और फिर उठ खड़ी हो कर सब को अपना बदन दिखाती है वो दोनों फिर उसकी तरफ बढ़ने लगते है और वसीम अपने जगह पे ही जमाँ रहता है

तभी शाज़िया उनको रोकती है और कहती है की अभी कुछ मत सोचना अभी मेरा पूरा बदन दुःख रहा है सुबह से बहुत चुसी गयी हु मै और मुस्कुरा देती है .....और वो अपनी गांड मटकाते पायल छम्छमाते वहा से चली जाती है

.....बाकी तीनो मर्द सोफे पे बैठ जाते है ये सोचने के लिए की आज की रात कैसे कटेगी......

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घर आने के बाद अनीस जीशान से दादा के साथ कर रहे व्यवहार को ले कर बात करता है .......जीशान एक एक कर के सारे अपनी मंशाएं अनीस को बताता है और तब अनीस बोलता है की दादा ऐसा व्यवहार से कुछ बोलेंगे नही.....

जीशान - उन्हें तो अपनी माँ का बदन चाहिए जिसके लिए वो कुछ भी करने को तैयार है और यहां तक कि जब आज दोपहर में मैने उनके साथ ऐसी ही हरकत करी तो उन्होंने बिना कोई पलटजवाब दिए सारा कहना मानते गए.....आखिर करते भी क्यों न माँ के बदन को स्पर्श करने का मौका जो मैं उन्हें दे रहा था.....

ईन सब की ये वार्तालाप वसीम भी खड़े हो कर सुन रहा था....ये सब सुन कर वसीम की आंखों में आँसू आ गए उसने अपने पोतों और बहू के उनके प्रति ऐसी मंशा कभी कल्पना भी नही की थी.....

उसने सोच लिया था कि अगली सुबह ही वो वहा से चला जाएगा.....

कमरे में जा कर उसने सोचा की बहु के लिए मेरा उतावलापन देख कर ये लोग मेरे साथ ऐसा करने की सोच सकते है ....छी ,! आखिर मैंने किया ही क्या है जब ये लोग शाज़िया के साथ ऐसा कर सकते है तो मै क्यों नहीं....और अगर मै चाहता तो इनके इस रिश्ते पे आपत्ति भी जाहिर कर सकता था........तभी वो सोचता है की कल सुबह मै इनसब का व्यवहार देखता हु फिर फैसला करूँगा....

इधर ये तीनो अपनी एक राउंड चुदाई के बाद सो गए.....

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सुबह सब अपने अपने समय पे जागते है ....शाज़िया आज एक सिम्पल नाइटी में थी उसके अंदर उसने कुछ भी नहीं पहना रखा था और सुबह सुबह की हलकी हल्की धुप आँगन में आ रही और उस धुप के कारन शाज़िया की टाँगे और उसके हिलती हुयी चुचिया और उसके चुतड़ों का अक्स साफ़ साफ़ दिखाई पड़ रहा था जिससे वसीम जोकि अखबार पढ़ रहा था उसका तम्बू सर उठाने लगा ...उसका गला सूखने लगा ....

शाज़िया ने आने के बाद ना तो वसीम को चाई के लिए पूछा था नाही कोई और बात करी थी ....वो चुपचाप अपने काम में लगी हुयी थी

इधर जीशान और अनीस आपस में बाते कर रहे होते है की आखिर दादा को ऐसा क्या कहा जाए की वो हमारे लिए झुकने लगे ....मगर कोई भी उपाय नहीं सूझ रहा था ...

इधर वसीम अचानक से कहता है की बहु आज मै वापिस चला जाऊँगा मेरा जो भी फ़ालतू सामान है उसको निकाल के अलग कर दो मै बाँध लूँगा....

शाज़िया - क्यों बाबूजी आपके पेंशन के पैसे आ गए क्या ...

वसीम - उन् पैसो का सम्बन्ध मुझसे है तो उनकी फिकर तुम मत करो बहु ...वसीम उखड़े हुए स्वर में बोला

शाज़िया हक्की बक्की वसीम की इस बेरुखी को देखती है और कहती है

जी बाबूजी

और कमरे में जाती है जहा जीशान और अनीस थे

शाज़िया आती है और उनके चेहरे को देखते हुए कहती है अरे ये सब छोड़ो बाबूजी यहाँ से जाने के बारे में बोल रहे है और कह रहे है की मेरा सामान बाँध दो मै आज चला जाऊंगा

अनीस और जीशान सोच में पड़ जाते है की यहाँ तो उनका ही पासा उल्टा पड़ गया ...अब क्या करे.... कमरे में तीनो में गंभीर स्तिथि को भापते हुए कुछ देर तक बाते होती है फिर सब वसीम के पास जाते है ....वसीम अपने जाने की तैयारी में लगा हुआ था ....

जीशान - क्या हुआ दादा आप अचानक जाने की बात क्यों करने लगे क्या हुआ ....

वसीम सीधे सीधे साफ़ साफ़ कह दिया की कल रात की सारी बाते मैंने सुन ली थी और मे अब ये समझ गया हु की तुमलोगों को केवल मेरे पैसो की कामना है और तो और तुम्हारे विचार मेरे प्रति क्या है वो मैं देख चूका हु ....वो रोने लगता है ...

वसीम - अरे मैंने तो तुम्हारे लिए कभी कोई गलत भावना मन में नहीं लाया जहा तक मैंने तुम्हारे बीच के इस नाजायज रिश्ते को भी कबूला और तुम लोग छि,,..!और वो कहता है ज़्यादा मत परेशान हो मै कुछ ही देर में निकल जाऊंगा यहाँ से और फिर तुम्हारे बीच कभी नहीं आऊंगा वो अपने लिए ट्रेन की टिकट लेने बाहर चला जाता है...

ये लोग बाहर हॉल में आ कर बैठते है और इस मुद्दे पे बात करते है और फैसला ये होता है की शाज़िया को बाबूजी को यहाँ से जाने को रोकना पड़ेगा ...शाज़िया को समझाया गया की उनको केवल तुम्हारे बदन से खेलना है वो तुम्हे भोगना चाहते है ....मगर उनको इसके अलावा किसी और बहाने से मनाना होगा .....

शाज़िया - अगर उन्होंने कोई ऐसी वैसी बात कर दी तो फिर मै क्या करुँगी ...देखो मै साफ़ साफ़ कहे देती हु मुझे उनको भोगने का सुख कभी नहीं मिलेगा मै केवल तुमदोनो की ही हु और रहूंगी समझे न ....

जीशान - माँ ज्यादा जज्बाती मत बनो ..अनीस भाई माँ को समझाओ ...अभी कैसी भी दादू को रोकना ही होगा ...ज़्यादा हुआ तो माँ की चूत गांड न सही उनका मुह ही भोगने दे देंगे कम से कम उनको ये सुख तो मिलेगा की उनको उनकी बहु का कोई एक छेद तो मिला.....

वैसे भी माँ की चूत वो चाट ही चुके है और माँ नंगी भी रहती है उनके सामने तो ऐसे में किसी का भी मन होगा ......

अनीस - अच्छा चलो कोई नहीं पहले उनको आने तो दो फिर देखते है की क्या होता है .....

शाज़िया ने सारा पैक किया हुआ सामान वापिस से कमरे में रख दिया और इस बार उसने वसीम का बिस्तर अपने कमरे में शिफ्ट कर दिया ....

वसीम कुछ देर में वापिस आया और आते के साथ चिल्लाते हुए लगभग कहा की बहु मेरा सामान और कुछ खाने के लिए दे दो बस यही तकलीफ दे रहा हु...दे दो मै निकलने वाला हु कुछ देर में मेरी गाडी आ जाएगी....बहु ओ बहु ...

तभी हॉल में तीनो एक साथ आते है और शाज़िया सीधे जा कर वसीम से लिपट जाती है और कहती है बाबूजी हमे माफ़ कर दीजिए हमने आपके लिए ऐसा सोचा और रोने लगती है ....उधर जीशान और अनीस भी शाज़िया की हां में हां मिलाते है ...वसीम शाज़िया को एकदम से अलग करता हुआ बोला...

वसीम - देखो तुमसब को मै कुछ नहीं कह रहा हु और नाही बोलूँगा उस वक़्त जो कुछ भी मैंने कहा उसके लिए माफ़ी चाहता हु गुस्से में मै बोलता चला गया मुझे माफ़ कर दो ...मै अब यहाँ से जा रहा हु अब तुम्हारे लिए कोई तकलीफ नहीं दूंगा और अपने कमरे में चला जाता है जहा अपना सामन ना देख कर वो वापिस से हॉल में आता है और सामने देखता है शाज़िया नंगी खड़ी है और जीशान और अनीस एक साथ कहते है ....

दादू अब हम आपको ऐसी किसी भी बात के लिए नहीं बोलेंगे हमसे गलती हो गयी और अब माँ आपको भी संतुष्ट कर दिया करेगी इसके लिए माँ ने ही अपने कहने पे आपका बिस्तर अपने कमरे में लगवाया है ...देखिये कैसे माँ अभी आपके सामने खड़ी और वो शाज़िया को वसीम की बाहों में जाने बोलते है ...

शाज़िया फटाक से उसके पास चली जाती है और तभी वसीम एक हाथ से उसे रोकते हुए कहता है की देखो मै नहीं जानता की तुमलोगों के दिल में मेरे लिए प्यार है या मेरे पैसो के लिए ...

अनीस वसीम की बात को बीच में काटते हुए कहता है की दादू आप से सब बातो के लिए हमने माफ़ी मांग ली है अब प्लीज़ हमे माफ़ कर दीजिये .....और अपना गुस्सा शांत कर लीजिये प्लीज ..

वसीम नंगी शाज़िया को अपने सामने देख रहा था और शाज़िया ने फटाक से आगे बढ़ कर वसीम की धोती में हाथ घुसा कर उसके लंड को पकड़ लिया और उसे बाहर निकाल कर चूसने लगी

अब वसीम को बर्दास्त करना मुस्किल हो गया और उसने उसके बालो को पकड़ कर घपाघप अपना लंड उसके मुह में पेलना शुरू किया और अनीस और जीशान इस गरम दृश्य को देख कर उत्तेजित हो जाते है ...और वही पे नंगे हो कर शाज़िया की तरफ टूट पड़ते है.......

घुटनों के बल बैठी शाज़िया..... वसीम अपनी आखे बंद किये उसके बालो को मुट्ठी में भरे हुए अपना लंड चुसवा रहा था और इधर अनीस उसकी लटकती चूची पे टूट पड़ता है और जीशान नीचे झुक कर शाज़िया की गांड की छेद और चूत की दरार में जीभ से आक्रमण कर देता है और इस तीन तरफ़ा हमले से शाज़िया काफी उत्तेजित हो गयी और वसीम के लंड को और तेजी से चूसने लगी ....जिसका नतीजा ये हुआ की वसीम आज पहली बार शाज़िया के मुह में झडा और उसका वीर्य आज बर्बाद नहीं गया ...

शाज़िया को हैरानी हुयी कि वसीम ने अनीस और जीशान से भी ज़्यादा माल उडेला था ...

इधर अनीस और जीशान शाज़िया को फर्श पे वही लिटा देते है और जीशान फटाक से शाज़िया की गीली चूत में लंड पेल देता है और जीशान अपना लंड शाज़िया के मुह में वही वसीम अपनी भारी सासों को काबू कर रहा था

....अनीस और जीशान के झड़ने के बाद शाज़िया उठी और वसीम से पूछी ....बाबू जी हमे एक बार फिर से माफ़ कर दीजिए बहुत गलत थे हमलोग ....

वसीम - मै तुमलोगों से गुस्सा कहाँ था मै तो बस तुमलोगों के लिए रुकावट नहीं बनना चाहता था ...और कोई बात नहीं मगर मुझे ख़ुशी है की तुमलोगों ने मेरी परेशानी को समझा ....और हां बहु मै तुम्हारी उस हसरत को जानता हु की तुम केवल इनकी ही हो तुम्हारे दोनों छेद ....उसका इशारा शाज़िया की चूत और गांड की तरफ था ....इनके ही है और मेरा उनपे कोई हक नहीं है मगर मै तुम्हारे इस कदम से ही खुश हु और संतुष्ट भी ....

शाज़िया मन ही मन वसीम पे बहुत प्यार आता है वही जीशान और अनीस ने भी राहत की साँस ली

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अब ठण्ड का मौसम आ गया है इन् सब की जिंदगी जैसे चल रही थी ...घर के अंदर वैसी ही है मगर बाहर की दुनिया में कई बदलाव आ गए है इनके जीवन में ...शाज़िया की भी अब मोहल्ले में कई औरतो से दोस्ती हो गयी है मगर वास्ता वो केवल घर के बाहर तक ही रखती है.....

वसीम भी अब सुबह सुबह सैर पे निकलता है तो उसके भी कई दोस्त बन गए है जो की सब के सब विधुर है (जिनकी पत्नियां इस दुनिया में नहीं है) पार्क में टहलते वक़्त ये लोग केवल अपने आस पास टहल रही लडकियों और औरतो के बदन को ले कर ही चर्चाये करते रहते है...

इतने महीनो में वसीम ने अपनी बहु शाज़िया के बदन को भोग नहीं पाया था वो आज भी केवल शाज़िया की चूस कर ही संतुस्ट हो जाता था और शाज़िया उसका भी ऐसे ही चूस कर संतुस्ट करते आ रही थी ....और वसीम ने अपने इस रिश्ते के बारे में अपने सैर मंडली में किसी को नहीं बतलाया था ...उसके ग्रुप में पांच लोग थे सब के सब अपने जीवन के बचे आखिरी कुछ सालो को जी रहे थे ....

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अनीस भी अब अपने कम्पनी में सीनियर मेनेजर बन गया था तो राजस्व में अब कोई कमी नहीं थी ..उसकी भी जिंदगी में उसकी माँ के अलावा कोई और आ गयी थी जिसकी जानकारी सब को थी ...रजनी.....अनीस के ऑफिस में ही काम करती थी और अनीस की जीवन संगिनी बनने के सपने बुन रही थी ......दोनों में काफी अच्छे सम्बन्ध थे बस जिस्मानी रिश्ते को छोड़ कर .....इनका भी जीवन मजे से कट रहा था ....

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अब बारी आती है अपने असली हीरो जीशान बाबु की ...इन्होने भी अपने पार्ट टाइम जॉब से संन्यास ले कर घर पे ही रहते थे और अब पूरी तरह सरकारी नौकरी की तैयारी शुरू कर दी थी ......कोचिंग क्लास की कई लडकियों की रात और दिन ये भी रंगीन बना चूका था ......फिलहाल ये बस इतने पे ही थे और अभी शादी का कुछ सोचा नहीं है ....

यहाँ से आगे कहानी एक मोड़ लेगी ..

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शाज़िया और उसका परिवार अब एक अपार्टमेंट में रहने लगे थे वो भी सबसे उपरी माले पे ...अनीस की पदौन्नती के बाद से ये सारे बदलाव आ गए थे उनमे और पुराने घर को किराए पे दे दिया था और वसीम ने वाराणसी वाला घर भी किराए पे दे रखा था और उसकी पेंशन बदस्तूर जारी थी शाज़िया के परिवार में चौतरफा पैसे आ रहे थे और इन् कुछ महीनो में ही उनके जीने का तरीका काफी हद्द तक बदल गया था रहने खाने अपने बूढ़े दोस्तों संग काफी वक़्त गुजारने लगा था क्योकि जितने भी उसके साथ के लोग थे सब के सब रिटायर्ड थे कोई डॉक्टर तो कोई बैंक वाला तो कोई पोलीस वाला कोई खानदानी किराने का दूकानदार और एक था उस अपार्टमेंट का सेक्रेटरी.......

इन् सब बुड्ढो ने अपनी सेटिंग भिड़ा रखी थी पार्क में हुयी गरमा गरम बातो को हकीक़त में ये लोग अपनी सेटिंग पर आजमाते थे....

डॉक्टर साहब ने अपने क्लिनिक की एक जवान नर्स को ही फसा रखा था...वही पुलिस बाबु ने अपने पुराने कॉन्टेक्ट्स के बल पर अपने लिए लडकियों का इन्तेजाम कर लिया करते थे ....

किराना दूकानदार एक एजेंट से लडकियों का इन्तेजाम करवाता था ....अब बचे बेचारे सेक्रेटरी साहब ये बिचारे अभी भी मुठ ही मारते थे क्योकि इनके पास न कोई एजेंट था नाही कोई पुराने कॉन्टेक्ट्स और नाही कोई सेटिंग ....बस अपने अपार्टमेंट की बहु बेटियों और औरतो को देख कर आहे भरते रहते थे और फिर मुठ मार का खुद को शांत करते थे.....दरसल इनके एकलौते बहु और बेटे विदेश में रहते थे ....इंडिया आना कम ही होता था उनका और सेक्रेटरी साहब का खाना पीना अपार्टमेंट के कंपाउंड में ही बने मेस से होता था.....

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.. अब चलते है अपने कहानी के असली किरदारों की तरफ ......शाज़िया में अब काफी बदलाव आ गये थे ....पहले के मुकाबले वो अब ज्यादा चुदवाने लगी थी और कपड़ो में भी काफी बदलाव आ गये थे अब वो ब्रा पहनने लगी थी जबकि पैंटी के मामले में उसका कहना था की इसको पहनने से उसको काफी दबा दबा सा महसूस होता है ......रात को सोते वक़्त काफी सेक्सी सेक्सी नाईटी पहनने लगी थी.....और अब वे चारो एक ही कमरे में सोते थे और ऐसा कोई दिन नहीं जाता था जब शाज़िया के तीनो छेदों में लंड न जाता हो .....

घर के अंदर शाज़िया एक कामुक स्त्री थी जबकि बाहर एक सीधी साधी औरत ....मगर सेक्रेटरी साहब को उसके पहनावे को देख कर उसपे शक जरुर होता था...जबकि शाज़िया को उनकी नजरो से साफ़ पता चलता था की वो उसे चोदने की नजरो से देखते है ........

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आज सन्डे था और सब मर्द घर पे ही थे ...अनीस रजनी से फ़ोन पे बाते कर रहा था जबकि जीशान शाज़िया जो कपडे ठीक कर के रख रही थी को छेड़ रहा था और वसीम दाढ़ी बना रहा था....आज ठण्ड बहुत ज्यादा थी ...और ऊपर से छुट्टी का भी दिन था...इसलिए शाज़िया ने सब के सामने एक प्रस्ताव रखा की आज कही बाहर घुमने चला जाए और रात का खाना बाहर ही खा कर आएँगे ...और साथ साथ कुछ कपडे भी खरीदेंगे.....

जीशान ने भी हां में हां मिलाते हुए कहा की हां भाई चलो चलते है ...तभी अनीस ने कहा की माँ मुझे आज एक जरुरी काम से कही बाहर जाना है तो मै नहीं आ पाउँगा...तुम दादा और जीशान के साथ चली जाओ...अगली बारी पक्का मै भी आऊंगा माँ बहुत जरुरी काम है वरना मना नहीं करता

.....शाज़िया उसे कहती है की आज तो इतवार है आज कौन सा काम है....

अनीस - माँ है न काम तभी तो जा रहा हु ...रात को देर से लौटूंगा ...और वो तैयार होने चला जाता है ....

दरअसल आज अनीस और रजनी एक होटल में मिलने वाले थे और आज उनके प्यार पुरे परवान पे था .....इधर शाज़िया अनीस के जाने से दुखी हो गयी और उसने बाहर जाने से मना कर दिया मगर जीशान ने उससे जिद किया तो वो मान गयी वही वसीम ने भी साथ आने का आग्रह किया तो वो उसे भी ले जाने को तैयार हो गये ...इधर अनीस सभी को आता हु बोलते हुए निकल गया .......

इस वक़्त शाज़िया एक नाईटी में थी जिसमे से उसकी बिना ब्रा की चुचिया आधे से ज्यादा दिख रही थी और उसकी जांघो के नीचे का सारा भाग नंगा था .........

शाज़िया को जीशान ने कहा की माँ चलो फटाफट तैयार हो जाओ हमे निकलना है....और उसने आगे बढ़ कर शाज़िया की नाईटी को खीच कर उसे नंगी कर देता है जिसे देख कर वसीम की सासे अटक जाती है वो तुरत बोल उठता है की जीशान क्या तू भी ऐसी हरकते क्यों करता है जानता है मुझे परेशानी होती है और वो भी उठ कर अपना धोती खोल कर गिरा देता और अपना फनफनाता हुआ लंड शाज़िया और जीशान के सामने कर देता है

.......शाज़िया मन ही मन सोचती है की कैसे उतावले हो जाते है ये अगर मै इन्हें कह दू की मैं आपका लंड अपनी चूत और गांड में लेना चाहती हु तो अभी के अभी ये मुझे चोद दे ...और वो हस देती है...

तभी वसीम आगे बढ़ कर शाज़िया की एक चूची की दबा देता है और साथ ही थी उसकी चूत को सहलाने लगता है जिससे शाज़िया अपना सर ऊपर कर के आह करने लगती है तभी जीशान आगे बढ़ कर वसीम को अलग करता है और कहता है की बस दादू बस अभी हमे बाहर भी जाना है चलिए तैयार हो जाइये ....

शाज़िया फटाक से बोल पड़ी की नहीं अभी आप दोनों मुझे बाथरूम ले चलिए और वह मुझे गरमा गरम पानी से नहलाइए तब जा कर तैयार हो कर निकलेंगे मार्केट ....

जीशान बोला वैसे माँ आपको आज हमारे साथ मार्किट जाने की कैसे सूझी .....

शाज़िया बोली की तुमने ही मेरी आदत बिगाड़ी है मुझे इतने अच्छे अच्छे ब्रा और नायटी ला कर देने की अब आज मुझे कुछ नए लेने का मन किया तो सोचा की तुम्हारे साथ ही चलती हु साइज़ देख कर लुंगी तुम हमेशा तुम मेरी साइज़ से छोटे ही लाते हो जिससे मुझे परेशानी होती है ज्यादातर वक़्त मुझे उन्हें उतार कर ही रखना पड़ता है .....जिससे तुमलोग मुझे निचोड़ते रहते हो....

वो अभी भी नंगी खड़ी थी ...तभी जीशान ने कहा की माँ कोई नहीं आज आप अपने हिसाब से कपडे ले लेना वो भी वही पहन कर चेक कर लेना तुम....इतना कहते हुए वे लोग बाथरूम में आ गये

तभी वसीम बोला की बहु वहां उस दूकान में कैसे कपडे देखेगी वो भी पहन कर ....

शाज़िया भी बोली हां ये कैसे करुँगी मै.....

जीशान बोला की माँ वो दूकान मेरे एक पहचान के अंकल की है तो आपलोग ज्यादा टेंशन मत लो वैसे भी मेरा बस चले तो मै तो तुम्हे यही से नंगी ले जाऊ ....और वो आगे बढ़ कर उसके चुतड़ों को कस कर दबा देता है और एक थप्पड़ भी जमा देता है...जिससे शाज़िया चिहुक जाती है .....

वसीम - मगर वहा उस दूकान में कैसे....

जीशान - दादू उन् अंकल को मैंने बता रखा है की मैंने इनको पटा रखा है तो आप चिंता मत कीजिए और वो खुद हमसे ज़्यादा रंगीन मिजाज के है....समझे आप.......

शाज़िया - मगर फिर भी ...

जीशान - माँ वह उनके दूकान में एक कमरा है वही चलेंगे ना तुम चिंता मत करो .....

वसीम - और मै क्या कहूँगा .....की मै कौन हु..

जीशान - आप भी इनके सेटिंग का एक हिस्सा है बस ...और आज माँ वहां नंगी होंगी देखिएगा और माँ आप कोई ना मत कहना ....चुप चाप जैसा मै करता हु आप करती जाना समझी ना

शाज़िया - उसके गले में बाहे डालते हुए जैसा तुम कहो मेरे बेटे.....

फिर वे लोग नहाते है और गरमा गरम पानी में नहाते वक़्त शाज़िया की चूत और मुह दोनों एक बार फिर से बज जाते है .....बाहर आ कर ये लोग तैयार हो कर मार्किट निकल जाते है रास्ते में इन्होने सोचा की अभी सबसे पहले मॉल जाएँगे वहा वे लोग घर के लिए कुछ छोटी मोटी खरीद दारी करेंगे फिर वहा से वे लोग ढाबे पे जा कर कुछ खायेंगे और फिर शाम को एक मूवी देखने का सोचे मगर यहाँ जाना अभी कन्फर्म नहीं था क्योकि कार्नर सीट्स मिलनी बहुत मुश्किल थी...और शाज़िया को ले कर कार्नर सीट्स में ही जाना सही रहता वो भी तब जब मूवी जूली 2 जैसी हो....उसके बाद अंत में इन्होने सोचा की अंकल के दूकान पे जाएँगे जहा शाज़िया अपनी खरीद दारी करेगी....

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