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Guest
शाम के छह बजे सब उठे और शाज़िया अपनी हालत ठीक कर के बाहर आई और सब के लिए चाई बनायीं और फिर खाने की तैयारी में जुट गयी ...
कुछ ही देर में अनीस ऑफिस से वापिस आया और घर पे दादा को देख कर चौक गया की अचानक ये कहा से.....
अनीस - अरे दादू आप यहाँ अचानक क्या बात है अच्छा लगा आपको यहाँ देख कर....
वसीम - हां बेटा वो वहा काफी अकेला महुसू हो रहा था तुमलोगो के बिना इसलिए यहाँ रहने चला आया और जब पेंशन की तारीख आएगी तो मै जा कर ले आया करूँगा......
अनीस - अच्छी बात है दादू आपको अब खाने पिने की कोई दिक्कत नहीं होगी आराम से यहाँ रहिये .....
वसीम - हा बेटा अब तो आराम ही आराम है और किचन में काम कर रही शाज़िया को दख कर मुस्कुरा देता है .....
शाज़िया की तरफ देख कर मुस्कुराते हुए देख कर अनीस को अटपटा सा लगा जिसे जीशान देख कर मुस्कुरा दिया और उसने अनीस को सारी की सारी वारदात एक ही साँस में बता डाली अनीस ने सोचा भी नहीं था की एक ही दिन में उसकी माँ के साथ क्या क्या हो गया खैर उसने उन् दोनों से आगे कोई भी बात नहीं की वो उठा कर सीधा किचन में चला गया शाज़िया से पूछने की आखिर उसकी चोट अब कैसी है .....
शाज़िया - अरे बेटा तुम कब आये ...
अनीस - वो सब छोड़ो माँ ये बताओ की तुम्हारी पाव की चोट अब कैसी है....
शाज़िया बोली की पहले से बेहतर है वो बेटा सब इतनी जल्दी जल्दी हुआ की कुछ समझने से पहले मुझे चोट लग गयी और फिर तेरे दादाजी का कोई गलत मंसूबा भी नहीं है मुझे ले कर ....मगर अनीस जानता था की दादा ने काफी दूर की सोची है....
मगर वो इस बात के लिए अभी से ही तैयार था की कभी भी दादा के नीचे मेरी माँ नहीं जाएगी वो सिर्फ हमदोनो भाइयो की ही है और हमारी ही रहेगी .....
अनीस को ऐसे सोचते देख कर शाज़िया बोली की मै जानती हु अनीस की तू क्या सोच रहा है मगर बेटा दादा जी को मैंने पहले ही इस बात के लिए तैयार कर लिया है और उन्होंने भी हमारे इस रिश्ते पे कोई आपत्ति नहीं जताई है उलटे उन्होने मेरी हालत को समझा है इसलिए उनको ले कर तू अपने मन में कोई गुबार मत रखना ठीक है चलो अब ज़्यादा मत सोचो और मुह हाथ धो कर खाने के लिए बैठो मैं खाना लगा रही हु और अनीस उसके गले लग कर कहता है की माँ तुम हमारी ही हो किसिऔर का साया भी नहीं पड़ने देंगे तुम पर हम याद है न वादा किया था हम दोनों भाइयो ने ...
शाज़िया - नहा बाबा याद है और उस वादे पे पूरा भरोसा भी है ...चलो अब जाओ ...
खाने की मेज पे आज कई दिनों के बाद शाज़िया पुरे कपड़ो में थी आज ....सब ने मिल कर खाना खाया और उसके बाद अब हॉल में बैठे टीवी देखने के लिए हमेशा की तरह शाज़िया अपने दोनों शेरो के बीच बैठी थी और वसीम बगल के सोफे पे बेचारा मन ही मन सोच रहा था की एक दिन उसके गोद में ये शाज़िया नंगी बैठ कर उसे खाना खिलाएगी .....
इधर अनीस का मन थोडा उदास था दादा के आने से की कहा अभी वो अपनी माँ को बड़े ही प्यार से उसके बदन से खेल रहा होता और इनके आ जाने से सारा कार्यक्रम बिगड़ गया है ....उसका मन बहुत ही उत्तेजित था अन्दर से मगर बाहर से बिलकुल शांत प्रतीत हो रहा था....जीशान ने अनीस की हालत को भाप लिया और वो उठा और हॉल की बत्ती बुझा दी मगर किचन की रौशनी और टीवी की रौशनी से सोफे को अच्छी तरह से देखा जा सकता था जीशान की इस हरकत से शाज़िया समझ गयी थी की क्या होने वाला है मगर अनीस का ध्यान इस ओर बिलकुल भी नहीं गया था....
कुछ ही देर में अनीस ऑफिस से वापिस आया और घर पे दादा को देख कर चौक गया की अचानक ये कहा से.....
अनीस - अरे दादू आप यहाँ अचानक क्या बात है अच्छा लगा आपको यहाँ देख कर....
वसीम - हां बेटा वो वहा काफी अकेला महुसू हो रहा था तुमलोगो के बिना इसलिए यहाँ रहने चला आया और जब पेंशन की तारीख आएगी तो मै जा कर ले आया करूँगा......
अनीस - अच्छी बात है दादू आपको अब खाने पिने की कोई दिक्कत नहीं होगी आराम से यहाँ रहिये .....
वसीम - हा बेटा अब तो आराम ही आराम है और किचन में काम कर रही शाज़िया को दख कर मुस्कुरा देता है .....
शाज़िया की तरफ देख कर मुस्कुराते हुए देख कर अनीस को अटपटा सा लगा जिसे जीशान देख कर मुस्कुरा दिया और उसने अनीस को सारी की सारी वारदात एक ही साँस में बता डाली अनीस ने सोचा भी नहीं था की एक ही दिन में उसकी माँ के साथ क्या क्या हो गया खैर उसने उन् दोनों से आगे कोई भी बात नहीं की वो उठा कर सीधा किचन में चला गया शाज़िया से पूछने की आखिर उसकी चोट अब कैसी है .....
शाज़िया - अरे बेटा तुम कब आये ...
अनीस - वो सब छोड़ो माँ ये बताओ की तुम्हारी पाव की चोट अब कैसी है....
शाज़िया बोली की पहले से बेहतर है वो बेटा सब इतनी जल्दी जल्दी हुआ की कुछ समझने से पहले मुझे चोट लग गयी और फिर तेरे दादाजी का कोई गलत मंसूबा भी नहीं है मुझे ले कर ....मगर अनीस जानता था की दादा ने काफी दूर की सोची है....
मगर वो इस बात के लिए अभी से ही तैयार था की कभी भी दादा के नीचे मेरी माँ नहीं जाएगी वो सिर्फ हमदोनो भाइयो की ही है और हमारी ही रहेगी .....
अनीस को ऐसे सोचते देख कर शाज़िया बोली की मै जानती हु अनीस की तू क्या सोच रहा है मगर बेटा दादा जी को मैंने पहले ही इस बात के लिए तैयार कर लिया है और उन्होंने भी हमारे इस रिश्ते पे कोई आपत्ति नहीं जताई है उलटे उन्होने मेरी हालत को समझा है इसलिए उनको ले कर तू अपने मन में कोई गुबार मत रखना ठीक है चलो अब ज़्यादा मत सोचो और मुह हाथ धो कर खाने के लिए बैठो मैं खाना लगा रही हु और अनीस उसके गले लग कर कहता है की माँ तुम हमारी ही हो किसिऔर का साया भी नहीं पड़ने देंगे तुम पर हम याद है न वादा किया था हम दोनों भाइयो ने ...
शाज़िया - नहा बाबा याद है और उस वादे पे पूरा भरोसा भी है ...चलो अब जाओ ...
खाने की मेज पे आज कई दिनों के बाद शाज़िया पुरे कपड़ो में थी आज ....सब ने मिल कर खाना खाया और उसके बाद अब हॉल में बैठे टीवी देखने के लिए हमेशा की तरह शाज़िया अपने दोनों शेरो के बीच बैठी थी और वसीम बगल के सोफे पे बेचारा मन ही मन सोच रहा था की एक दिन उसके गोद में ये शाज़िया नंगी बैठ कर उसे खाना खिलाएगी .....
इधर अनीस का मन थोडा उदास था दादा के आने से की कहा अभी वो अपनी माँ को बड़े ही प्यार से उसके बदन से खेल रहा होता और इनके आ जाने से सारा कार्यक्रम बिगड़ गया है ....उसका मन बहुत ही उत्तेजित था अन्दर से मगर बाहर से बिलकुल शांत प्रतीत हो रहा था....जीशान ने अनीस की हालत को भाप लिया और वो उठा और हॉल की बत्ती बुझा दी मगर किचन की रौशनी और टीवी की रौशनी से सोफे को अच्छी तरह से देखा जा सकता था जीशान की इस हरकत से शाज़िया समझ गयी थी की क्या होने वाला है मगर अनीस का ध्यान इस ओर बिलकुल भी नहीं गया था....