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Hindi Xkahani - प्यार का सबूत

अध्याय - 99
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मैंने भाभी और काकी की नज़र बचा कर अनुराधा की तरफ देखा। जैसे ही हम दोनों की नज़रें मिलीं तो वो एकदम से शर्मा गई और अपनी नज़रें झुका ली। मैं उसकी यूं छुईमुई हो गई दशा को देख कर मुस्कुरा उठा और फिर ये सोच कर भाभी के पीछे चल पड़ा कि किसी दिन अकेले में तसल्ली से अपनी अनुराधा से मुलाक़ात करूंगा। कुछ ही देर में मैं भाभी को जीप में बैठाए वापस अपने गांव की तरफ चल पड़ा था।


अब आगे....



"ये क्या कह रहे हैं आप?" कमरे में पलंग पर दादा ठाकुर के सामने बैठी सुगंधा देवी हैरत से बोल पड़ीं____"हमारा बेटा एक ऐसे मामूली से किसान की बेटी से प्रेम करता है जिसकी कुछ महीने पहले उसके ही भाई ने हत्या कर दी थी?"

"हमारे आदमियों के द्वारा हमें उसकी ख़बर मिलती रहती थी।" दादा ठाकुर ने कहा____"किंतु हमने ख़्वाब में भी ये कल्पना नहीं की थी कि वो मुरारी की लड़की से प्रेम भी करने लगेगा। आज गौरी शंकर से ही हमें ये सब बातें पता चली हैं।"

"अगर ये वाकई में सच है तो फिर ये काफी गंभीर बात हो गई है हमारे लिए।" सुगंधा देवी ने कहा____"हमें तो यकीन ही नहीं होता कि हमारा बेटा किसी लड़की से प्रेम कर सकता है। उसके बारे में तो अब तक हमने यही सुना था कि वो भी अपने दादा की तरह अय्याशियां करता है। ख़ैर, तो अब इस बारे में क्या सोचा है आपने और गौरी शंकर ने क्या कहा इस बारे में?"

दादा ठाकुर ने संक्षेप में सारी बातें बता दी जिसे सुन कर सुगंधा देवी ने कहा____"ठीक ही तो कह रहा था वो। भला कौन ऐसा बाप अथवा चाचा होगा जो ये जानते हुए भी अपनी बेटी का ब्याह हमारे बेटे से करने का सोचेगा कि वो किसी दूसरी लड़की से प्रेम करता है? उसका वो सब कहना पूरी तरह जायज़ है।"

"हां, और हम भी यही मानते हैं।" दादा ठाकुर ने कहा____"किंतु हमने उसे वचन दिया है कि अगले साल हम उसकी भतीजी को अपनी बहू बना कर हवेली ले आएंगे। उस लड़की ने अपने प्रेम के चलते क्या कुछ नहीं किया है वैभव के लिए। हमें उसके त्याग और बलिदान का बखूबी एहसास है इस लिए हम ये हर्गिज़ नहीं चाहेंगे कि उस मासूम और नेकदिल लड़की के साथ किसी भी तरह का कोई अन्याय हो।"

"तो फिर क्या करेंगे आप?" सुगंधा देवी की धड़कनें सहसा एक अंजाने भय की वजह से तेज़ हो गईं थी, बोलीं____"देखिए कोई ऐसा क़दम मत उठाइएगा जिसके चलते हालात बेहद नाज़ुक हो जाएं। बड़ी मुश्किल से हम सब उस सदमे से उबरे हैं इस लिए ऐसा कुछ भी मत कीजिएगा, हम आपके सामने हाथ जोड़ते हैं।"

सुगंधा देवी की बातें सुन कर दादा ठाकुर कुछ बोले नहीं किंतु किसी सोच में डूबे हुए ज़रूर नज़र आए। ये देख सुगंधा देवी की धड़कनें और भी तेज़ हो गईं। उनके अंदर एकदम से घबराहट भर गई थी।

"क...क्या सोच रहे हैं आप?" फिर उन्होंने दादा ठाकुर को देखते हुए बेचैन भाव से पूछा____"कोई कठोर क़दम उठाने के बारे में तो नहीं सोच रहे हैं ना आप? देखिए हम आपसे हाथ जोड़ कर प्रार्थना करते हैं कि ऐसा.....।"

"हम ऐसा कुछ भी नहीं सोच रहे हैं सुगंधा।" दादा ठाकुर ने उनकी बात को काट कर कहा____"बल्कि हम तो कुछ और ही सोचने लगे हैं।"

"क्या सोचने लगे हैं आप?" सुगंधा देवी ने मन ही मन राहत की सांस ली किंतु उत्सुकता के चलते पूछा_____"हमें भी तो बताइए कि आख़िर क्या चल रहा है आपके दिमाग़ में?"

"आपको याद है कुछ दिनों पहले हम कुल गुरु से मिलने गए थे?" दादा ठाकुर ने सुगंधा देवी की तरफ देखा।

"हां हां हमें अच्छी तरह याद है।" सुगंधा देवी ने झट से सिर हिलाते हुए कहा____"किंतु आपने हमारे पूछने पर भी हमें कुछ नहीं बताया था। आख़िर बात क्या है? अचानक से कुल गुरु से मिलने वाली बात का ज़िक्र क्यों करने लगे आप?"

"हम सबके साथ जो कुछ भी हुआ है उसके चलते हम सबकी दशा बेहद ही ख़राब हो गई थी।" दादा ठाकुर ने गहरी सांस ले कर कहा____"सच कहें तो अपने छोटे भाई और बेटे की मौत के बाद हमें कुछ समझ ही नहीं आ रहा था कि कैसे खुद को सम्हालें और अपने साथ साथ बाकी सबको भी। रातों को नींद नहीं आती थी। ऐसे ही एक रात हमें कुल गुरु का ख़याल आया। हमें एहसास हुआ कि ऐसी परिस्थिति में कुल गुरु ही हमें कोई रास्ता दिखा सकते हैं। उसके बाद हम अगली सुबह उनसे मिलने चले गए। गुरु जी के आश्रम में जब हम उनसे मिले और उन्हें सब कुछ बताया तो उन्हें भी बहुत तकलीफ़ हुई। जब वो अपने सभी शिष्यों से फारिग हुए तो वो हमें अपने निजी कक्ष में ले गए। वहां पर उन्होंने हमें बताया कि हमारे खानदान में ऐसा होना पहले से ही निर्धारित था।"

"ये क्या कह रहे हैं आप?" सुगंधा देवी खुद को बोलने से रोक न सकीं।

"हमने भी उनसे यही कहा था।" दादा ठाकुर ने कहा____"हमारे पूछने पर उन्होंने बताया कि शुरू में हमारे बड़े बेटे पर संकट था किंतु उसे बचाया जाना भी निर्धारित था, ये अलग बात है कि उस समय ऐसे हालात थे कि वो चाह कर भी कुछ न बता सके थे। बाद में जब उन्हें पता चला था कि हमने अपने बेटे को बचा लिया है तो उन्हें इस बात से खुशी हुई थी।"

"अगर उन्हें इतना ही कुछ पता था तो उन्होंने जगताप और हमारे बेटे की हत्या होने से रोकने के बारे में क्यों नहीं बताया था?" सुगंधा देवी ने सहसा नाराज़गी वाले भाव से कहा____"क्या इसके लिए भी वो कुछ करने में असमर्थ थे?"

"असमर्थ नहीं थे लेकिन उस समय वो अपने आश्रम में थे ही नहीं।" दादा ठाकुर ने कहा____"नियति के खेल बड़े ही अजीब होते हैं सुगंधा। होनी को कोई नहीं टाल सकता, खुद विधि का विधान बनाने वाला विधाता भी नहीं। उस समय कुल गुरु अपने कुछ शिष्यों के साथ अपने गुरु भाई से मिलने चले गए थे। उनके गुरु भाई अपना पार्थिव शरीर त्याग कर समाधि लेने वाले थे। अतः उनकी अंतिम घड़ी में वो उनसे मिलने गए थे। यही वजह थी कि वो यहां के हालातों से पूरी तरह बेख़बर थे। नियति का खेल ऐसे ही चलता है। होनी जब होती है तो वो सबसे पहले ऐसा चक्रव्यूह रच देती है कि कोई भी इंसान उसके चक्रव्यूह को भेद कर उसके मार्ग में अवरोध पैदा नहीं कर सकता। यही हमारे साथ हुआ है।"

"तो आप कुल गुरु से यही सब जानने गए थे?" सुगंधा देवी ने पूछा____"या कोई और भी वजह थी उनसे मिलने की?"

"जैसा कि हमने आपको बताया कि जिस तरह के हालातों में हम सब थे।" दादा ठाकुर ने कहा____"उससे निकलने का हमें कुल गुरु ही कोई रास्ता दिखा सकते थे। अतः जब हम उनसे अपनी हालत के बारे में बताया तो उन्होंने हमें तरह तरह की दार्शनिक बातों के द्वारा समझाया जिसके चलते यकीनन हमें बड़ी राहत महसूस हुई। उसके बाद जब हमने उनसे ये पूछा कि क्या अब आगे भी ऐसा कोई संकट हम सबके जीवन में आएगा तो उन्होंने हमें कुछ ऐसी बातें बताई जिन्हें सुन कर हम अवाक् रह गए थे।"

"ऐसा क्या बताया था उन्होंने आपसे?" सुगंधा देवी के माथे पर शिकन उभर आई।

"उन्होंने बताया कि इस तरह का संकट तो फिलहाल अब नहीं आएगा लेकिन आगे चल कर एक ऐसा समय भी आएगा जिसके चलते हम काफी विचलित हो सकते हैं।" दादा ठाकुर ने गंभीरता से कहा____"और अगर हमने विचलित हो कर कोई कठोर क़दम उठाया तो उसके नतीजे हम में से किसी के लिए भी ठीक नहीं होंगे।"

"आप क्या कह रहे हैं हमें कुछ समझ नहीं आ रहा।" सुगंधा देवी ने उलझन पूर्ण भाव से कहा____"कृपया साफ साफ बताइए कि आख़िर कुल गुरु ने किस बारे में आपसे ये सब कहा था?"

"हमारे बेटे वैभव के बारे में।" दादा ठाकुर ने स्पष्ट भाव से कहा_____"गुरु जी ने स्पष्ट रूप से हमें बताया था कि हमारे बेटे वैभव के जीवन में दो ऐसी औरतों का योग है जो आने वाले समय में उसकी पत्नियां बनेंगी।"

"हे भगवान! ये क्या कह रहे हैं आप?" सुगंधा देवी आश्चर्य से आंखें फैला कर बोलीं____"ऐसा कैसे हो सकता है भला?"

"ऐसा कैसे हो सकता है नहीं बल्कि ऐसा होने लगा है सुगंधा।" दादा ठाकुर ने कहा____"वर्तमान में ऐसा ही तो हो रहा है। जहां एक तरफ हमने अपने बेटे का ब्याह हरि शंकर की बेटी रूपा से तय किया है तो वहीं दूसरी तरफ हमें पता चलता है कि हमारा बेटा किसी दूसरी लड़की से प्रेम भी करता है। ज़ाहिर है कि जब वो उस लड़की से प्रेम करता है तो उसने उसको अपनी जीवन संगिनी बनाने के बारे में भी सोच रखा होगा। अब अगर हमने उसके प्रेम संबंध को मंजूरी दे कर उस लड़की से उसका ब्याह न किया तो यकीनन हमारा बेटा हमारे इस कार्य से नाखुश हो जाएगा और संभव है कि वो कोई ऐसा रास्ता अख़्तियार कर ले जिसके बारे में हम अभी सोच भी नहीं सकते।"

"ये तो सच में बड़ी गंभीर बात हो गई है।" सुगंधा देवी ने चकित भाव से कहा____"यानि कुल गुरु का कहना सच हो रहा है।"

"अगर गौरी शंकर की बातें सच हैं।" दादा ठाकुर ने कहा____"और हमारा बेटा वाकई में मुरारी की लड़की से प्रेम करता है तो यकीनन गुरु जी का कहना सच हो रहा है।"

"तो फिर अब आप क्या करेंगे?" सुगंधा देवी ने संदिग्ध भाव से दादा ठाकुर को देखते हुए पूछा____"क्या आप हमारे बेटे के प्रेम को मंजूरी दे कर गुरु जी की बात मानेंगे या फिर कोई कठोर क़दम उठाएंगे?"

"आपके क्या विचार हैं इस बारे में?" दादा ठाकुर ने जवाब देने की जगह उल्टा सवाल करते हुए पूछा____"क्या आपको अपने बेटे के जीवन में उसकी दो दो पत्नियां होने पर कोई एतराज़ है या फिर आप ऐसा खुशी खुशी मंज़ूर कर लेंगी?"

"अगर आप वाकई में हमारे विचारों के आधार पर ही फ़ैसला लेना चाहते हैं।" सुगंधा देवी ने संतुलित लहजे से कहा____"तो हमारे विचार यही हैं कि हमारा बेटा जो करना चाहता है उसे आप करने दें। अगर उसके भाग्य में दो दो पत्नियां ही लिखी हैं तो यही सही। हम तो बस यही चाहते हैं कि इस हवेली में रहने वालों के जीवन में अब कभी कोई दुख या संकट न आए बल्कि हर कोई खुशी से जिए। आपने हरि शंकर की बेटी से वैभव का रिश्ता तय कर दिया है तो बेशक उसका ब्याह उससे कीजिए लेकिन अगर हमारा बेटा मुरारी की बेटी से भी ब्याह करना चाहेगा तो आप उसकी भी खुशी खुशी मंजूरी दे दीजिएगा।"

"अगर आप भी यही चाहती हैं तो ठीक है फिर।" दादा ठाकुर ने गहरी सांस ली____"सच कहें तो हम भी सबको खुश ही देखना चाहते हैं। मुरारी की बेटी से हमारे बेटे की ब्याह के बारे में लोग क्या सोचेंगे इससे हमें कोई फ़र्क नहीं पड़ेगा। हम सिर्फ ये चाहते हैं कि उस लड़की के प्रेम में पड़ कर हमारा बेटा रूपा के साथ किसी तरह का अन्याय अथवा पक्षपात न करे। हमें अक्सर वो रात याद आती है जब वो लड़की अपनी भाभी के साथ हमसे मिलने आई थी और हमें ये बताया था कि हमारे बेटे को कुछ लोग अगली सुबह जान से मारने के लिए चंदनपुर जाने वाले हैं। उस समय हमें उसकी वो बातें सुन कर थोड़ा अजीब तो ज़रूर लगा था लेकिन ये नहीं समझ पाए थे कि आख़िर उस लड़की को रात के वक्त हवेली आ कर हमें वो सब बताने की क्या ज़रूरत थी? आज जबकि हम सब कुछ जानते हैं तो यही सोचते हैं कि ऐसा उसने सिर्फ अपने प्रेम के चलते ही किया था। प्रेम करने वाला भला ये कैसे चाह सकता है कि कोई उसके चाहने वाले को किसी भी तरह का नुकसान पहुंचा दे?"

"सही कह रहे हैं आप?" सुगंधा देवी ने कहा____"सच में वो लड़की हमारे बेटे से बहुत प्रेम करती है। हमें आश्चर्य होता है कि इतना प्रेम करने वाली लड़की से हमारे बेटे को प्रेम कैसे न हुआ और हुआ भी तो ऐसी लड़की से जो एक मामूली से किसान की बेटी है। आख़िर उस लड़की में उसने ऐसा क्या देखा होगा जिसके चलते वो उसे प्रेम करने लगा?"

"इस बारे में हमें क्योंकि कोई जानकारी नहीं है सुगंधा।" दादा ठाकुर ने कहा____"इस लिए हम यही कह सकते कि उसने उसमें ऐसा क्या देखा होगा? जबकि गहराई से सोचें तो हमें एहसास होगा कि उस लड़की में कोई तो ऐसी बात यकीनन रही होगी जिसके चलते वैभव जैसे लड़के को उससे प्रेम हो गया? उसके जैसे चरित्र वाला लड़का अगर किसी लड़की से प्रेम कर बैठा है तो ये कोई मामूली बात नहीं है ठकुराईन। हमें पूरा यकीन है कि उस लड़की में कोई तो ख़ास बात ज़रूर होगी।"

"ख़ैर ये तो आने वाला समय ही बताएगा कि उसमें कौन सी ख़ास बात है।" सुगंधा देवी ने जैसे पहलू बदला_____"किंतु अब ये सोचने का विषय है कि गौरी शंकर इस सबके बाद क्या चाहता है?"

"इस संसार में किसी के चाहने से कहां कुछ होता है सुगंधा।" दादा ठाकुर ने कहा_____"हर इंसान को समझौता ही करना पड़ता है और फिर उस समझौते के साथ जीवन जीना पड़ता है। गौरी शंकर को अपनी भतीजी के प्रेम के साथ साथ हमारे बेटे के प्रेम को भी गहराई से समझना होगा। उसे समझना होगा कि पत्नी के रूप में उसकी भतीजी हमारे बेटे के साथ तभी खुश रह पाएगी जब उसकी तरह हमारे बेटे को भी उसका प्रेम मिल जाए। बाकी ऊपर वाले ने किसी के लिए क्या सोच रखा है ये तो वही जानता है।"

"ये सब तो ठीक है लेकिन सबकी खुशियों के बीच आप एक शख़्स की खुशियों को भूल रहे हैं।" सुगंधा देवी ने कहा____"आप हमारी बहू को भूल रहे हैं ठाकुर साहब। उस अभागन की खुशियों को भूल रहे हैं जिसका ईश्वर ने जीवन भर दुख में डूबे रहने का ही नसीब बना दिया है। क्या उसे देख कर आपके कलेजे में शूल नहीं चुभते?"

"चुभते हैं सुगंधा और बहुत ज़ोरों से चुभते हैं।" दादा ठाकुर ने संजीदा भाव से कहा____"जब भी उसे विधवा के लिबास में किसी मुरझाए हुए फूल की तरह देखते हैं तो बड़ी तकलीफ़ होती है हमें। हमारा बस चले तो पलक झपकते ही दुनिया भर की खुशियां उसके दामन में भर दें लेकिन क्या करें? कुछ भी तो हमारे हाथ में नहीं है।"

"ऐसा क्यों कह रहे हैं आप?" सुगंधा देवी ने कहा____"क्या कुल गुरु से आपने हमारी बहू के बारे में कुछ नहीं पूछा?"

"क्या आप ऐसा सोच सकती हैं कि हम उनसे अपनी बहू के बारे में पूछना भूल सकते थे?" दादा ठाकुर ने कहा____"नहीं सुगंधा, वो हमारी बहू ही नहीं बल्कि हमारी बेटी भी है। हमारी शान है, हमारा गुरूर है वो। कुल गुरु से हमने उसके बारे में भी पूछा था। जवाब में उन्होंने जो कुछ हमसे कहा उससे हम स्तब्ध रह गए थे।"

"क्या मतलब है आपका?" सुगंधा देवी ने एकाएक व्याकुल भाव भाव से पूछा____"ऐसा क्या कहा था गुरु जी ने आपसे?"

"पहले तो उन्होंने हमसे बहुत ही सरल शब्दों में पूछा था कि क्या हम चाहते हैं कि हमारी बहू हमेशा खुश रहे और हमेशा हमारे साथ ही रहे?" दादा ठाकुर ने कहा_____"जवाब में जब हमने हां कहा तो उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि हम उसका ब्याह अपने बेटे वैभव से कर दें।"

"क...क्या????" सुगंधा देवी उछल ही पड़ीं। फिर किसी तरह खुद को सम्हाल कर बोलीं____"य..ये क्या कह रहे हैं आप?"

"आपकी तरह हम भी उनकी बात सुन कर उछल पड़े थे।" दादा ठाकुर ने कहा____"हमने भी उनसे यही कहा था कि ये क्या कह रहे हैं वो? जवाब में उन्होंने कहा कि हमारी बहू सुहागन के रूप में तभी तो हमेशा हमारे साथ रह सकती है जब हम उसका ब्याह अपने बेटे वैभव से कर दें। अन्यथा अगर हम उसे फिर से सुहागन बनाने का सोच कर किसी दूसरे से उसका ब्याह करेंगे तो ऐसे में वो भला कैसे हमारे साथ हमारी बहू के रूप में रह सकती है?"

"हां ये तो सच कहा था उन्होंने।" सुगंधा देवी ने गहरी सांस छोड़ते हुए सिर हिलाया____"वाकई में सुहागन के रूप में हमारी बहू हमारे पास तभी तो रह सकती है जब उसका ब्याह हमारे ही बेटे से हो। बड़ी अजीब बात है, ऐसा तो हमने सोचा ही नहीं था।"

"हमने भी कहां सोचा था सुगंधा।" दादा ठाकुर ने कहा____"गुरु जी की बातों से ही हमारे अकल के पर्दे छंटे थे। काफी देर तक हम उनके सामने किंकर्तव्यविमूढ़ सी हालत में बैठे रह गए थे। फिर जब किसी तरह हमारी हालत सामान्य हुई तो हमने गुरु जी से पूछा कि क्या ऐसा संभव है तो उन्होंने कहा बिल्कुल संभव है लेकिन इसके लिए हमें बहुत ही समझदारी से काम लेना होगा।"

"हमारा तो ये सब सुन के सिर ही चकराने लगा है ठाकुर साहब।" सुगंधा देवी ने अपना माथा सहलाते हुए कहा____"तो क्या इसी लिए गुरु जी ने कहा था कि हमारे बेटे के जीवन में दो औरतें उसकी पत्नी के रूप में आएंगी?"

"हां शायद इसी लिए।" दादा ठाकुर ने सिर हिलाया____"उस दिन से हम अक्सर इस बारे में सोचते हैं और समझने की कोशिश करते हैं कि क्या वास्तव में हमें ऐसा करना चाहिए या नहीं?"

"क्या मतलब है आपका?" सुगंधा देवी ने हैरत से देखते हुए कहा____"क्या आप भाग्य बदल देने का सोच रहे हैं?"

"सीधी सी बात है ठकुराईन कि अगर हम अपनी बहू को एक सुहागन के रूप में हमेशा खुश देखना चाहते हैं तो हमें उसके लिए कुछ तो करना ही पड़ेगा।" दादा ठाकुर ने कहा____"रागिनी जैसी बहू अथवा बेटी हमें शायद ही कहीं मिले इस लिए अगर हम चाहते हैं कि ऐसी बहू हमेशा इस हवेली की शान ही बनी रहे तो हमें किसी तरह से उसका ब्याह वैभव से करवाना ही होगा।"

"लेकिन क्या ऐसा संभव है?" सुगंधा देवी ने बेयकीनी से देखा____"हमारा मतलब है कि क्या हमारी बहू अपने देवर से ब्याह करने के लिए राज़ी होगी? वो तो वैभव को अपना देवर ही नहीं बल्कि अपना छोटा भाई भी मानती है और हमारा बेटा भी तो उसकी बहुत इज्ज़त करता है। माना कि वो बुरे चरित्र का लड़का रहा है लेकिन हमें पूरा यकीन है कि उसने भूल कर भी अपनी भाभी के बारे में कभी ग़लत ख़याल अपने मन में नहीं लाया होगा। दूसरी बात, आप ही ने बताया कि वो मुरारी की लड़की से प्रेम करता है तो ऐसे में वो कैसे अपनी भाभी से ब्याह करने वाली बात को मंजूरी देगा? नहीं नहीं, हमें नहीं लगता कि ऐसा संभव होगा? एक पल के लिए मान लेते हैं कि हमारा बेटा इसके लिए राज़ी भी हो जाएगा लेकिन रागिनी...?? नहीं, वो कभी ऐसा करने के लिए राज़ी नहीं होगी। वैसे भी, गुरु जी ने दो ही औरतों को पत्नी के रूप में उसके जीवन में आने की बात कही थी तो वो दो औरतें वही हैं, यानि रूपा और मुरारी की वो लड़की।"

"आपने तो बिना कोशिश किए ही फ़ैसला कर लिया कि वो राज़ी नहीं होगी।" दादा ठाकुर ने कहा____"जबकि आपको बहाने से ही सही लेकिन उसके मन की टोह लेनी चाहिए और रही गुरु जी की कही ये बात कि दो ही औरतें उसकी पत्नी के रूप में आएंगी तो ये ज़रूरी नहीं है। हमारा मतलब है कि रागिनी बहू का ब्याह वैभव से कर देने के बात भी तो उन्होंने कुछ सोच कर ही कही होगी।"

"ये सब तो ठीक है लेकिन बहू के मन की टोह लेने की बात क्यों कह रहे हैं आप? क्या आपको उसके चरित्र पर संदेह है?" सुगंधा देवी ने बेयकीनी से कहा____"जबकि हमें तो अपनी बहू के चरित्र पर हद से ज़्यादा भरोसा है। हम अच्छी तरह जानते हैं कि हमारी बहू उत्तम चरित्र वाली महिला है।"

"आप भी हद करती हैं ठकुराईन।" दादा ठाकुर ने गहरी सांस ली____"आपने ये कैसे सोच लिया कि हमें अपनी बहू के चरित्र पर संदेह है? एक बात आप जान लीजिए कि अगर कोई गर्म तवे पर बैठ कर भी कहेगा कि हमारी बहू का चरित्र निम्न दर्जे का है तो हम उस पर यकीन नहीं करेंगे। बल्कि ऐसा कहने वाले को फ़ौरन ही मौत के घाट उतार देंगे। टोह लेने से हमारा मतलब सिर्फ यही था कि उसके मन में अपने देवर के प्रति अगर छोटे भाई वाली ही भावना है तो वो कितनी प्रबल है? हालाकि एक सच ये भी है कि किसी को छोटा भाई मान लेने से वो सचमुच का छोटा भाई नहीं बन जाता। वैभव सबसे पहले उसका देवर है और देवर से भाभी का ब्याह हो जाना कोई ऐसी बात नहीं है जो न्यायोचित अथवा तर्कसंगत न हो।"

"हम मान लेते हैं कि आपकी बातें अपनी जगह सही हैं।" सुगंधा देवी ने कहा____"लेकिन ये तो आप भी समझते ही होंगे कि हमारे बेटे वैभव से रागिनी बहू का ब्याह होना अथवा करवाना लगभग नामुमकिन बात है। एक तो रागिनी खुद इसके लिए राज़ी नहीं होगी दूसरे उसके अपने माता पिता भी इस रिश्ते के लिए मंजूरी नहीं दे सकते हैं।"

"हां, हम समझते हैं कि ऐसा होना आसान नहीं है।" दादा ठाकुर ने गहरी सांस ले कर सिर हिलाया____"लेकिन हम ये भी समझते हैं कि अगर हमें अपनी बहू का जीवन खुशियों से भरा हुआ देखना है तो उसके लिए ऐसा करना ही बेहतर होगा। ऐसा होना नामुमकिन ज़रूर है लेकिन हमें किसी भी तरह से अब इसे मुमकिन बनाना होगा। वैभव के जीवन में दो की जगह अगर तीन तीन पत्नियां हो जाएंगी तो कोई पहाड़ नहीं टूट जाएगा।"

"हमारे मन में एक और विचार उभर रहा है ठाकुर साहब।" सुगंधा देवी ने सहसा कुछ सोचते हुए कहा____"हम ये जो कुछ अपनी बहू के लिए करना चाहते हैं उसमें यकीनन हमें उसकी खुशियों का ही ख़याल है किंतु ये भी सच है कि इसमें हमारा भी तो अपना स्वार्थ है।"

"य...ये क्या कह रही हैं आप?" दादा ठाकुर के चेहरे पर हैरानी के भाव उभरे____"इसमें भला हमारा क्या स्वार्थ है?"

"इतना तो आप भी समझते हैं न कि रागिनी बहू हम सबकी नज़र में एक बहुत ही गुणवान स्त्री है जिसके चलते हम उसे इस हवेली की शान समझते हैं।" सुगंधा देवी ने जैसे भूमिका बनाते हुए कहा____"अब क्योंकि वो विधवा हो चुकी है इस लिए हम उसकी खुशियों के लिए फिर से उसका ब्याह कर देना चाहते हैं।"

"आख़िर आपके कहने का मतलब क्या है ठकुराईन?" दादा ठाकुर न चाहते हुए भी बीच में बोल पड़े____"हम उसे खुश देखना चाहते हैं तभी तो फिर से उसका ब्याह का करवा देना चाहते हैं।"

"बिल्कुल, लेकिन उसका ब्याह अपने बेटे से ही क्यों करवा देना चाहते हैं हम?" सुगंधा देवी ने जैसे तर्क़ किया____"क्या इसका एक मतलब ये नहीं है कि ऐसा हम अपने स्वार्थ के चलते ही करना चाहते हैं? ऐसा भी तो हो सकता है कि जब वो दुबारा अपने ब्याह होने की बात सुने तो उसके मन में कहीं और किसी दूसरे व्यक्ति से ब्याह करने की चाहत पैदा हो जाए। क्या ज़रूरी है कि वो फिर से उसी घर में बहू बन कर रहने की बात सोचे जिस घर में उसके पहले पति की ढेर सारी यादें मौजूद हों और इतना ही नहीं जिसे भरी जवानी में विधवा हो जाने का दुख सहन करना पड़ गया हो?"

सुगंधा देवी की ऐसी बातें सुन कर दादा ठाकुर फ़ौरन कुछ बोल ना सके। स्तब्ध से वो अपनी धर्म पत्नी के चेहरे की तरफ देखते रह गए। चेहरे पर सोचो के भाव उभर आए थे।

"क्या हुआ? क्या सोचने लगे आप?" दादा ठाकुर को ख़ामोश देख सुगंधा देवी ने कहा____"क्या हमने कुछ ग़लत कहा आपसे?"

"नहीं, ऐसी तो कोई बात नहीं है।" दादा ठाकुर ने जल्दी ही खुद को सम्हाला____"आपके जो कुछ भी कहा है वो बिल्कुल सच कहा है और आपकी बातें तर्कसंगत भी हैं। हमने तो इस तरीके से सोचा ही नहीं था। हमें खुशी के साथ साथ हैरानी भी हो रही है कि आपने इस तरीके से सोचा और हमारे सामने अपनी बात रखी। वाकई में ये भी सोचने वाली बात है कि अगर हमारी बहू को इस बारे में पता चला तो उसके मन में कहीं दूसरी जगह किसी दूसरे व्यक्ति से भी विवाह करने का ख़याल आ सकता है।"

"और अगर ऐसा हुआ।" सुगंधा देवी ने कहा____"तो सबसे बड़ा सवाल है कि क्या आप ऐसा होने देंगे?"

"क्यों नहीं होने देंगे हम?" दादा ठाकुर ने झट से कहा____"हम अपनी बहू को खुश देखना चाहते हैं इस लिए अगर उसे दूसरी जगह किसी दूसरे व्यक्ति से विवाह करने से ही खुशी प्राप्त होगी तो हम यकीनन उसकी खुशी के लिए उसे ऐसा करने देंगे। हां, इस बात का हमें दुख ज़रूर होगा कि हमने अपनी इतनी संस्कारवान सुशील और अच्छे चरित्र वाली बहू को खो दिया। वैसे हमें पूरा यकीन है कि हमारी बहू हमसे रिश्ता तोड़ कर कहीं नहीं जाएगी। वो भी तो समझती ही होगी कि हम सब उसे कितना स्नेह करते हैं और हम उसे इस हवेली की शान समझते हैं। क्या इतना जल्दी वो हमारा प्यार और स्नेह भुला कर हमें छोड़ कर चली जाएगी?"

"सही कह रहे हैं आप।" सुगंधा देवी ने गहरी सांस ली____"हमें भी इस बात का भरोसा है कि हमारी बहू हमारे प्रेम और स्नेह को ठुकरा कर कहीं नहीं जाएगी। ख़ैर छोड़िए इन बातों को। सब कुछ समय पर छोड़ दीजिए और ऊपर वाले से दुआ कीजिए कि सब कुछ अच्छा ही हो।"

सुगंधा देवी की इस बात पर दादा ठाकुर ने सिर हिलाया और फिर उन्होंने पलंग पर पूरी तरह लेट कर अपनी आंखें बंद कर लीं। कुछ पलों तक उनके चेहरे की तरफ देखते रहने के बाद सुगंधा देवी भी पलंग के एक छोर पर लेट गईं। दोनों ने ही अपनी अपनी आंखें बंद कर ली थीं किंतु ज़हन में विचारों का मंथन चालू था।​
 
अध्याय - 100
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मैं और भाभी जीप में बैठे आगे बढ़े चले जा रहे थे। मैं धीमी गति से ही जीप चला रहा था। जब से भाभी जीप में बैठीं थी तब से वो ख़ामोश थीं और ख़यालों में खोई हुई थीं। मैं बार बार उनकी तरफ देख रहा था। वो कभी हौले से मुस्कुरा देती थीं तो कभी फिर कुछ सोचने लगती थीं। इधर मेरी बेचैनी बढ़ती जा रही थी। मैं उनसे जानना चाहता था कि आख़िर उन्होंने अनुराधा से क्या बातें की थीं?

"आख़िर कुछ तो बताइए भाभी।" जब मुझसे बिल्कुल ही न रहा गया तो मजबूर हो कर मैंने उनसे पूछा____"मैं काफी देर से देख रहा हूं कि आप जाने क्या सोच सोच कर बस मुस्कुराए जा रही हैं। मुझे भी तो कुछ बताइए। मैं जानना चाहता हूं कि आपने अनुराधा से क्या बातें की अकेले में?"

"आय हाय! देखो तो सबर ही नहीं हो रहा जनाब से।" भाभी ने एकदम से मुस्कुराते हुए मुझे छेड़ा____"वैसे क्या जानना चाहते हो तुम?"

"वही जो आपने अकेले में उससे बातें की हैं।" मैं उनके छेड़ने पर पहले तो झेंप गया था फिर मुस्कुराते हुए पूछा____"आख़िर कुछ तो बताइए। अकेले में ऐसी क्या बातें की हैं आपने?"

"अगर मैं ये कहूं कि वो सब बातें तुम्हें बताने लायक नहीं हैं तो?" भाभी ने मुस्कुराते हुए तिरछी नज़र से मुझे देखा____"तुम्हें तो पता ही होगा कि हम औरतों के बीच भी बहुत सी ऐसी बातें होती हैं जिन्हें मर्दों को नहीं बताई जा सकतीं।"

"ये बहुत ग़लत बात है भाभी।" मैंने बुरा सा मुंह बनाते हुए कहा____"आपको मुझे छेड़ना ही है तो बाद में छेड़ लीजिएगा लेकिन अभी बताइए ना कि आपने उससे क्या बातें की हैं? आपको अंदाज़ा भी नहीं है कि उतनी देर से सोच सोच कर मेरी क्या हालत हुई जा रही है?"

मेरी ये बात सुनते ही भाभी एकदम से खिलखिला कर हंसने लगीं। हंसने से उनके सच्चे मोतियों जैसे दांत चमकने लगे और उनकी मधुर आवाज़ फिज़ा में मीठा संगीत सा बजाने लगी। उन्हें हंसता देख मुझे बहुत अच्छा लगा। यही तो चाहता था मैं कि वो अपने सारे दुख दर्द भूल कर बस हंसती मुस्कुराती रहें।

"अच्छा एक काम करो।" फिर उन्होंने अपनी हंसी को रोकते हुए किंतु मुस्कुराते हुए ही कहा____"तुम अपनी अनुराधा से ही पूछ लेना कि हमारी आपस में क्या बातें हुईं थी?"

"बहुत ज़ालिम हैं आप, सच में।" मैंने फिर से बुरा सा मुंह बना कर कहा____"आज तक किसी लड़की अथवा औरत में इतनी हिम्मत नहीं हुई थी कि वो मुझे आपके जैसे इस तरह सताने का सोचे भी।"

"तुम ये भूल रहे हो वैभव कि मैं कौन हूं?" भाभी ने कहा____"आज तक तुम्हारे जीवन में जो भी लड़कियां अथवा औरतें आईं थी वो सब ग़ैर थीं और निम्न दर्जे की सोच रखने वाली थीं जबकि मैं तुम्हारी भाभी हूं। दादा ठाकुर की बहू हूं मैं। क्या तुम मेरी तुलना उन ग़ैर लड़कियों से कर रहे हो?"

"नहीं नहीं भाभी।" मैंने हड़बड़ा कर झट से कहा____"मैं आपकी तुलना किसी से भी करने के बारे में सोच तक नहीं सकता। मैंने तो ऐसा सिर्फ मज़ाक में कहा था वरना आप भी जानती हैं कि आपके प्रति मेरे मन में कितनी इज्ज़त है।"

"हां जानती हूं मैं।" भाभी ने सहसा गंभीर हो कर कहा____"और मुझे खुशी है कि तुम मेरे प्रति ऐसे भाव रखते हो। मुझे पता है कि तुम मेरे होठों पर मुस्कुराहट लाने के लिए नए नए तरीके अपनाते हो। सच कहूं तो मुझे तुम्हारा ऐसा करना अच्छा भी लगता है। मुझे गर्व महसूस होता है कि तुम्हारे जैसा लड़का मेरा देवर ही नहीं बल्कि मेरा छोटा भाई भी है। मेरे लिए सबसे ज़्यादा खुशी की बात ये है कि तुम खुद को बदल कर एक अच्छा इंसान बनने की राह पर चल रहे हो। तुम हमेशा एक अच्छे इंसान बने रहो यही मेरी तमन्ना है और इसी से मुझे खुशी महसूस होगी।"

"फ़िक्र मत कीजिए भाभी।" मैंने कहा____"मैं हमेशा आपकी उम्मीदों पर खरा उतरूंगा और आपकी खुशी का ख़याल रखूंगा।"

"और अनुराधा तथा रूपा की खुशी का ख़याल कौन रखेगा?" भाभी ने मुस्कुराते हुए मुझे फिर से छेड़ा_____"मत भूलो कि अगले साल दो दो बीवियों के बीच फंस जाने वाले हो तुम। फिर मैं भी देखूंगी कि दोनों की खुशियों का कितना ख़याल रख पाते हो तुम।"

"अरे! इसमें कौन सी बड़ी बात है भाभी।" मैंने बड़े गर्व से कहा____"इस मामले में तो मुझे बहुत लंबा तज़ुर्बा है। दोनों को एक साथ खुश रखने की क्षमता है मुझमें।"

"ज़्यादा उड़ो मत।" भाभी ने मुझे घूरते हुए कहा____"जिस दिन बीवियों के बीच हमेशा के लिए फंस जाओगे न तब समझ आएगा कि बाहर की औरतों को और अपनी बीवियों को खुश रखने में कितना फ़र्क होता है।"

"आप तो बेवजह ही डरा रही हैं मुझे।" मैंने मुस्कुराते हुए कहा____"ये मत भूलिए कि आपके सामने ठाकुर वैभव सिंह बैठे हैं।"

"अच्छा जी ऐसा है क्या?" भाभी ने आंखें फैला कर मेरी तरफ देखा____"फिर तो अनुराधा से ब्याह करने के लिए तुम्हें अपनी इस भाभी की मदद की कोई ज़रूरत ही नहीं हो सकती, है ना?"

"य...ये आप क्या कह रही हैं भाभी?" मैं बुरी तरह हड़बड़ा गया, बोला____"आपकी मदद के बिना तो मेरी नैया पार ही नहीं हो सकती। कृपया ऐसी बातें न करें जिससे मेरी धड़कनें ही रुक जाएं।"

मेरी बात सुन कर भाभी एक बार फिर से खिलखिला कर हंस पड़ीं। इधर मैं अपना मुंह लटकाए रह गया। मेरी सारी अकड़ छू मंतर हो गई थी। उन्होंने मेरी कमज़ोर नस पर वार जो कर दिया था। ख़ैर मैं विषय को बदलने की गरज से उनसे फिर ये पूछने लगा कि उनकी अनुराधा से क्या बातें हुईं हैं लेकिन भाभी ने कुछ नहीं बताया मुझे। बस यही कहा कि मैं अगर इतना ही जानने के लिए उत्सुक हूं तो अनुराधा से ही पूछूं। भाभी मेरी हालत का पूरा लुत्फ़ उठा रहीं थी और ये बात मैं बखूबी समझता था। ख़ैर मुझे उनके न बताने से ज़्यादा फ़र्क नहीं पड़ रहा था, अलबत्ता इस बात की खुशी थी कि इस सफ़र में भाभी खुश थीं। ऐसी ही नोक झोंक भरी बातें करते हुए हम हवेली पहुंच गए।

✮✮✮✮

रूपचंद्र को अपने कमरे में दाखिल होता देख रूपा पहले तो चौंकी फिर सम्हल कर बैठ गई। आज काफी समय बाद उसके बड़े भाई ने उसके कमरे में क़दम रखा था। दोनों की उमर में सिर्फ डेढ़ साल का अंतर था। हालाकि दोनों को देखने से यही लगता था जैसे दोनों ही जुड़वा हों। एक वक्त था जब दोनों भाई बहन का आपस में बड़ा ही प्रेम और लगाव था।

बचपन से ही दोनों एक साथ खेल कूद कर बड़े हुए थे। बढ़ती उम्र के साथ जैसे जैसे दोनों में समझदारी आती गई वैसे वैसे दोनों एक दूसरे का छोटा बड़ा होने के नाते आदर और सम्मान करने लगे थे। रूपा वैसे भी एक लड़की थी इस लिए उसे अपनी मर्यादा में ही रहने की नसीहतें मिलती रहती थीं किंतु रूपचंद्र के मन में हमेशा से ही अपनी छोटी बहन रूपा के लिए विशेष लगाव और स्नेह था। फिर जब रूपचंद्र को अपनी बहन रूपा का वैभव के साथ बने संबंध का पता चला तो वो रूपा से बहुत नाराज़ हुआ। एक झटके में अपनी बहन से उसका बचपन का लगाव और स्नेह जाने कहां गायब हो गया और उसकी जगह नाराज़गी के साथ साथ गुस्सा भी भरता चला गया। उसे लगता था कि उसकी बहन ने वैभव के साथ ऐसा संबंध बना कर बहुत ही नीच और गिरा हुआ कार्य किया है और साथ ही खानदान की इज्ज़त को दाग़दार किया है। उसने ये समझने की कभी कोशिश ही नहीं की थी कि उसकी बहन ने अगर ऐसा किया था तो सिर्फ अपने प्रेम को साबित करने के चलते किया था।

आज मुद्दतों बाद रूपचंद्र को अपने कमरे में दाखिल होते देख रूपा चौंकी तो थी ही किंतु एक अपराध बोझ के चलते उसने अपना सिर भी झुका लिया था। ये अलग बात है कि अपने भाई के प्रति उसके मन में भी नाराज़गी और गुस्सा विद्यमान था। उधर रूपचंद्र कमरे में दाखिल हुआ और फिर अपनी बहन की तरफ ध्यान से देखने लगा। उसने देखा रूपा उसकी तरफ देखने से कतरा रही थी। ये देख उसके दिल में एक हूक सी उठी जिसके चलते कुछ पल के लिए उसके चेहरे पर वेदना के चिन्ह उभरते नज़र आए। उसने ख़ामोशी से पलट कर दरवाज़े को अंदर से कुंडी लगा कर बंद किया और फिर उसी ख़ामोशी के साथ पलंग के एक कोने में सिमटी बैठी रूपा की तरफ बढ़ चला। जल्दी ही वो उसके क़रीब पहुंच गया। कुछ पलों तक वो रूपा को निहारता रहा और फिर आहिस्ता से पलंग के किनारे बैठ गया।

"मैं जानता हूं कि तू अपने इस भाई से बहुत नाराज़ है।" फिर उसने अधीरता से उसकी तरफ देखते हुए कहा____"और नाराज़ होना भी चाहिए। मैंने कभी भी तुझे समझने की कोशिश नहीं की बल्कि ये कहूं तो ज़्यादा बेहतर होगा कि मैंने तुझे समझने के बारे में सोचा तक नहीं। तुझे कहने की ज़रूरत नहीं है क्योंकि आज मुद्दतों बाद मुझे खुद ही ये एहसास हो रहा है कि मैंने अपनी उस बहन को कभी नहीं समझा जिसे कभी मैं बहुत प्रेम करता था और जो कभी मेरी धड़कन हुआ करती थी। मैंने हमेशा वैभव के साथ तेरे संबंध को ग़लत नज़रिए से सोचा और तेरे बारे में तरह तरह की ग़लत धारणाएं बनाता रहा। शायद यही वजह थी कि मेरे अंदर तेरे लिए नाराज़गी और गुस्सा हमेशा ही कायम रहा। जबकि मुझे समझना चाहिए था और सबसे बड़ी बात तुझ पर भरोसा करना चाहिए था। मुझे समझना चाहिए था कि जब किसी इंसान को किसी से प्रेम हो जाता है तो वो उसके लिए पूरी तरह समर्पित हो जाता है। वो अपना सब कुछ अपने प्रेम में न्यौछावर कर देता है, क्योंकि उसकी नज़र में उसका अपने आप पर कोई अधिकार ही नहीं रह जाता है। काश! इतनी सी बात मैं पहले ही समझ गया होता तो मैं तेरे बारे में कभी ग़लत न सोचता और ना ही तुझसे नाराज़ रहता। मुझे माफ़ कर दे मेरी बहन। मैं तेरा गुनहगार हूं। कई दिनों से तेरे पास आ कर तुझसे माफ़ी मांगना चाहता था मगर शर्मिंदगी के चलते हिम्मत ही नहीं होती थी। आज बहुत हिम्मत जुटा कर तेरे पास आया हूं। मैं जानता हूं कि मेरी मासूम बहन का दिल बहुत बड़ा है और वो अपने इस नासमझ भाई को झट से माफ़ कर देगी।"

"भ...भैया!!" रूपचंद्र की बात ख़त्म हुई ही थी कि रूपा एकदम से रोते हुए किसी बिजली की तरह आई और रूपचंद्र के गले से लिपट गई। उसकी आंखों से मोटे मोटे आंसुओं की धारा बहने लगी थी। रूपचंद्र खुद भी अपनी आंखें छलक पड़ने से रोक न सका। उसने रूपा को अपने सीने से इस तरह छुपका लिया जैसे कोई मां अपने छोटे से बच्चे को अपने सीने से छुपका लेती है।

"आह! आज मुद्दतों बाद तुझे अपने सीने से लगा कर तेरे इस भाई को बड़ा ही सुकून मिल रहा है रूपा।" रूपचंद्र ने रुंधे गले से कहा____"इतने समय से मेरा जलता हुआ हृदय एकदम से ठंडा पड़ गया सा महसूस हो रहा है।"

"मैं भी ऐसा ही महसूस कर रही हूं भैया।" रूपा ने सिसकते हुए कहा____"आप नहीं समझ सकते कि आज आपके इस तरह मुझे अपने सीने से लगा लेने से मेरी आत्मा पर से कितना बड़ा बोझ हट गया है। ऐसा लगता है जैसे मेरे अस्तित्व का फिर से एक नया जन्म हो गया है।"

"कुछ मत कह पगली।" रूपचंद्र ने बड़े स्नेह से उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा____"देर से ही सही मगर अब मैं तेरी भावनाओं को बखूबी समझ रहा हूं। मुझे एहसास हो गया है कि तूने अब तक किस अजीयत के साथ अपने दिन रात गुज़ारे हैं लेकिन अब से ऐसा नहीं होगा। तेरा ये भाई तुझे वचन देता है कि अब से तुझे कोई दुख नहीं सहना पड़ेगा। तेरे रास्ते की हर रुकावट को मैं दूर करूंगा और हर पल तेरे लिए दुआ करूंगा कि तू हमेशा खुश रहे। तुझे वो मिले जिसकी तूने ख़्वाईश की है।"

"ओह! भैया।" रूपा अपने भाई की बातें सुन कर और भी ज़्यादा ज़ोरों से उससे छुपक गई। उसकी आंखें फिर से मोटे मोटे आंसू बहाने लगीं।

रूपचंद्र ने उसे खुद से अलग किया और अपने हाथों से उसके आंसू पोंछने लगा। रोने की वजह से रूपा का खूबसूरत चेहरा बुरी तरह मलिन पड़ गया था। रूपचंद्र की आंखें भी भींगी हुईं थी जिन्हें उसने साफ करने की ज़रूरत नहीं समझी बल्कि जब रूपा ने देखा तो उसने ही अपने हाथों से उसकी भींगी आंखों को पोंछा। बंद कमरे में भाई बहन के इस अनोखे प्यार और स्नेह का एक अलग ही मंज़र नज़र आ रहा था इस वक्त।

"मुझसे वादा कर कि अब से तू आंसू नहीं बहाएगी।" रूपचंद्र ने रूपा की तरफ देखते हुए कहा____"तुझे जिस किसी भी चीज़ की ज़रूरत हो तू मुझसे कहेगी। यूं समझ ले कि अब से तेरा ये भाई तेरी खुशी के लिए कुछ भी कर जाएगा।"

"आपने इतना कह दिया मेरे लिए यही बहुत है भैया।" रूपा ने अधीरता से कहा____"मुझे अपने सबसे ज़्यादा प्यार करने वाले भैया वापस मिल गए। मेरे लिए यही सबसे बड़ी खुशी की बात है।"

"तूने मुझे माफ़ तो कर दिया है ना?" रूपचंद्र ने उसकी आंखों में देखा।

"आपने ऐसा कुछ किया ही नहीं है जिसके लिए आपको मुझसे माफ़ी मांगनी पड़े।" रूपा ने बड़ी मासूमियत से कहा____"मेरा ख़याल है कि आपने वही किया है जो हर भाई उन हालातों में करता या सोचता।"

"नहीं रूपा।" रूपचंद्र ने सहसा खेद भरे भाव से कहा____"कम से कम तेरे बारे में मुझे ऐसा नहीं सोचना चाहिए था। मैं तुझे बचपन से जानता था। हम दोनों एक साथ खेल कूद कर बड़े हुए थे। मुझे अच्छी तरह पता है कि मेरी बहन के मन में भूल से भी कभी कोई ग़लत ख़याल नहीं आ सकता था। खोट तो मेरे मन में था मेरी बहना। मन तो मेरा ही मैला हो गया था जिसकी वजह से मैंने अपनी सबसे चहेती बहन के बारे में ग़लत सोचा और इतना ही नहीं जब तुझे सबसे ज़्यादा मेरी ज़रूरत थी तब मैं तेरे साथ न हो कर तेरे खिलाफ़ हो गया था।"

"भूल जाइए भैया।" रूपा ने बड़े स्नेह से रूपचंद्र का दायां गाल सहला कर कहा____"इस दुनिया में सबसे ग़लतियां होती हैं। अगर आपसे हुई हैं तो मुझसे भी तो हुई हैं। मैंने भी तो अपने खानदान और अपने परिवार की मान मर्यादा का ख़याल नहीं रखा था।"

"छोड़ ये सब बातें।" रूपचंद्र ने कहा____"मैं सब कुछ भूल जाना चाहता हूं। तू भी उस बुरे वक्त को भूल जा। अब तो बस खुशियां मनाने की बारी है। अरे! तेरी सबसे बड़ी ख़्वाईश पूरी होने वाली है। अगले साल हमेशा के लिए तुझे वो शख़्स मिल जाएगा जिसे तूने बेहद प्रेम किया है। चल अब इसी बात पर मुस्कुरा के तो दिखा दे मुझे।"

रूपचंद्र की ये शरारत भरी बात सुन कर रूपा एकदम से शर्मा गई और उसके गुलाब की पंखुड़ियों जैसे होठों पर मुस्कान उभर आई। लेकिन अगले ही पल उसकी वो मुस्कान गायब हो गई और उसके चेहरे पर उदासी के बादल मंडराते नज़र आए। रूपचंद्र ने भी इस बात पर गौर किया।

"क्या हुआ?" फिर उसने फिक्रमंद हो कर उससे पूछा____"अचानक तेरे चेहरे पर ये उदासी क्यों छा गई है? बता मुझे, आख़िर तेरी इस उदासी की वजह क्या है?"

"कुछ नहीं भैया।" रूपा ने बात को टालने की गरज से कहा____"कोई ख़ास बात नहीं है।"

"तुझे बचपन से जानता हूं मैं।" रूपचंद्र ने कहा____"तेरी हर आदत से परिचित हूं मैं। इस लिए यकीन के साथ कह सकता हूं कि तेरी इस उदासी की वजह कोई मामूली बात नहीं है। तू मुझे बता सकती है रूपा। अपने इस भाई पर भरोसा रख, मैं तेरी हर परेशानी को दूर करने के लिए अपनी जान तक लगा दूंगा।"

"नहीं नहीं भैया।" रूपा ने घबरा कर झट से अपनी हथेली रूपचंद्र के मुख पर रख दी____"ऐसा कभी दुबारा मत कहिएगा। इस परिवार में अब सिर्फ आप ही तो बचे हैं, अगर आपको भी कुछ हो गया तो हम सब जीते जी मर जाएंगे। रही बात मेरी उदासी की तो आप चिंता मत कीजिए और यकीन कीजिए ये बस मामूली बात ही है। वक्त के साथ सब ठीक हो जाएगा।"

"अगर तू कहती है तो मान लेता हूं।" रूपचंद्र ने गहरी सांस ली, फिर सहसा मुस्कुराते हुए बोला____"अच्छा ये बता मेरे होने वाले जीजा श्री से मिलने का मन तो नहीं कर रहा न तेरा? देख अगर ऐसा है तो तू मुझे बेझिझक बता सकती है। मेरे रहते जीजा जी की तरफ जाने वाले तेरे रास्ते पर कोई रुकावट नहीं आएगी।"

"धत्त।" रूपा बुरी तरह शर्म से सिमट गई। उसे अपने भाई से ऐसी बात की ज़रा भी उम्मीद नहीं थी, बोली____"ये कैसी बातें कर रहे हैं आप?"

"अरे! इसमें ग़लत बात क्या है भला?" रूपचंद्र ने अपने कंधे उचकाते हुए कहा____"मैं तो अपनी प्यारी बहन की खुशी वाली बात ही कर रहा हूं। एक भाई होने के नाते ये मेरा फर्ज़ है कि मैं अपनी बहन की हर खुशी का ख़याल भी रखूं और उसे खुश भी रखूं। अब क्योंकि मुझे पता है कि आज के समय में अगर मेरी बहन की मुलाक़ात उसके होने वाले पतिदेव से हो जाए तो उसे कितनी बड़ी खुशी मिल जाएगी इसी लिए तो तुझसे वैसा कहा मैंने।"

"बहुत ख़राब हैं आप।" रूपा बुरी तरह शर्मा तो रही ही थी किंतु वो बौखला भी गई थी। उसे समझ नहीं आ रहा था कि अपने भाई की बातों का वो क्या जवाब दे। हालाकि एक सच ये भी था कि अपने भाई से अपने होने वाले पतिदेव से मिलने की बात सुन कर उसके दिल की धड़कनें तेज़ हो गईं थी और साथ ही उसके मन का मयूर नाचने लगा था।

"हद है भई।" रूपचंद्र ने गहरी सांस लेते हुए कहा____"भलाई का तो ज़माना ही नहीं रहा अब। ठीक है फिर, अगर तू यही चाहती है तो यही सही। वैसे आज मैंने अपने होने वाले जीजा श्री से भी मिलने का सोचा हुआ था। सोचा था अपनी बहन की खुशी का ख़याल करते हुए उनसे तेरे मिलने का कोई बढ़िया सा जुगाड़ भी कर दूंगा मगर अब जब तेरी ही इच्छा नहीं है तो मैं उन्हें मना कर दूंगा।"

"न...न...नहीं तो।" रूपा बुरी तरह हड़बड़ा गई। बुरी तरह हकलाते हुए बोल पड़ी____"म..मेरा मतलब है कि......नहीं...आप....जाइए मुझे आपसे कोई बात ही नहीं करना।"

रूपा लाज के चलते खुल कर जब कुछ बोल ना पाई तो अंत में बुरा सा मुंह बना कर रूपचंद्र से रूठ गई। ये देख रूपचंद्र ठहाका लगा कर हंसने लगा। पूरे कमरे में उसकी हंसी गूंजने लगी। इधर उसे यूं हंसता देख रूपा ने और भी ज़्यादा मुंह बना लिया।

"अरे! अब क्या हुआ तुझे?" रूपचंद्र ने फौरन ही अपनी हंसी रोकते हुए उससे पूछा____"इस तरह मुंह क्यों बना लिया तूने?"

"मुझे आपसे कोई बात ही नहीं करना।" रूपा ने पूर्व की भांति ही रूठे हुए लहजे से कहा____"आप बहुत ख़राब हैं।"

"अरे! भला मैंने ऐसा क्या कर दिया?" रूपचंद्र ने मुस्कुराते हुए कहा____"मैं तो तेरी भलाई की बात ही कर रहा था। अब जब तुझे ही मंज़ूर नहीं है तो मैं क्या करूं भला?"

"सब कुछ जानते समझते हुए भी आप मुझसे ऐसी बात कर रहे हैं।" रूपा ने अपनी आंखें बंद कर के मानों एक ही सांस में कहा____"वैसे तो बड़ा कहते हैं कि आपको हर चीज़ का बखूबी एहसास है, फिर ये क्या है?"

"अरे! तो इसमें शर्माने वाली कौन सी बात है?" रूपचंद्र ने उसी मुस्कान के साथ कहा____"तुझे अगर जीजा श्री से मिलना ही है तो साफ साफ कह दे ना। मैं ख़ुद तुझे उन महापुरुष के पास ले जाऊंगा।"

"सच में बहुत ख़राब हैं आप।" रूपा का चेहरा लाजवश फिर से लाल सुर्ख पड़ गया, नज़रें झुकाए बोली____"आप ये क्यों नहीं समझते कि एक बहन अपने बड़े भाई से इस तरह की कोई बात नहीं कह सकती।"

"हां जानता हूं पागल।" रूपचंद्र ने कहा___"मैं तो बस तुझे छेड़ रहा था। तुझे इन सब बातों के लिए मुझसे शर्माने की कोई ज़रूरत नहीं है। तू मुझसे बेझिझक हो कर कुछ भी कह सकती है। मैं तो बस ये चाहता हूं कि मेरी बहन हर तरह से खुश रहे। और हां, मैं जानता हूं कि तू वैभव से मिलना चाहती है। उससे ढेर सारी बातें करना चाहती है। इसी लिए तो तुझसे कहा था मैंने कि मैं तेरी मुलाक़ात करवा दूंगा उससे।"

रूपचंद्र की बातें सुन कर रूपा बोली तो कुछ नहीं लेकिन खुशी के मारे उसके गले ज़रूर लग गई। रूपचंद्र ने मुस्कुराते हुए उसकी पीठ सहलाई और फिर उसे खुद से अलग कर के कहा____"फ़िक्र मत कर, जल्दी ही मैं तेरी ये इच्छा पूरी करूंगा। अब चल मुस्कुरा दे....।"

रूपा के चेहरे पर खुशी की चमक उभर आई और साथ ही उसके होठों पर मुस्कान भी उभर आई। ये देख रूपचंद्र ने उसके सिर पर प्यार से हाथ फेरा और फिर पलंग से नीचे उतर कर दरवाज़े की तरफ बढ़ गया। जैसे ही वो दरवाज़ा खोल कर बाहर गया तो रूपा झट से पलंग पर से उतर कर दरवाज़े के पास पहुंची। दरवाजे को उसने फ़ौरन ही बंद किया और फिर तेज़ी से पलंग पर आ कर पीठ के बल लेट गई। छत के कुंडे पर झूलते पंखे पर निगाहें जमाए वो जाने क्या क्या सोचते हुए मुस्कुराने लगी।​
 
अध्याय - 101
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रूपा के चेहरे पर खुशी की चमक उभर आई और साथ ही उसके होठों पर मुस्कान भी उभर आई। ये देख रूपचंद्र ने उसके सिर पर प्यार से हाथ फेरा और फिर पलंग से नीचे उतर कर दरवाज़े की तरफ बढ़ गया। जैसे ही वो दरवाज़ा खोल कर बाहर गया तो रूपा झट से पलंग पर से उतर कर दरवाज़े के पास पहुंची। दरवाजे को उसने फ़ौरन ही बंद किया और फिर तेज़ी से पलंग पर आ कर पीठ के बल लेट गई। छत के कुंडे पर झूलते पंखे पर निगाहें जमाए वो जाने क्या क्या सोचते हुए मुस्कुराने लगी।

अब आगे....


हवेली पहुंचे तो पता चला पिता जी अपने नए मुंशी के साथ कहीं गए हुए हैं। इधर मां भाभी से पूछने लगीं कि उन्हें खेतों में घूमने पर कैसा लगा? जवाब में भाभी ने बड़ी ही सफाई से झूठ बोल कर जो कुछ उन्हें बताया उसे सुन कर मैं खुद भी मन ही मन चकित रह गया। अगर मां मुझसे पूछतीं तो यकीनन मुझसे जवाब देते ना बनता क्योंकि मैं भाभी को ले कर खेत गया ही नहीं था। ख़ैर मां के साथ साथ बाकी सब भी भाभी का खिला हुआ चेहरा देख कर खुश हो गए थे। मां ने भाभी को अपने कमरे में जा कर आराम करने को कहा तो वो चली गईं। मैं भी उनके पीछे चल पड़ा क्योंकि मुझे भी अपने कमरे में आराम करना था।

दूसरी तरफ आ कर जब मैं भाभी के पीछे पीछे सीढियां चढ़ने लगा तो भाभी ने सहसा पलट कर मुझसे कहा____"आज तुम्हारी वजह से मुझे मां जी से झूठ बोलना पड़ा। इस बात से मुझे बहुत बुरा महसूस हो रहा है।"

"आपको मां से झूठ बोलने की ज़रूरत ही नहीं थी।" मैंने अधीरता से कहा____"आप मां से सब कुछ सच सच बता देतीं। मां को तो वैसे भी एक दिन इस सच्चाई का पता चलना ही है कि मैं एक मामूली से किसान की बेटी से प्रेम करता हूं।"

"वो तो ठीक है लेकिन सच का पता सही वक्त पर चले तभी बेहतर परिणाम निकलते हैं।" भाभी ने कहा____"यही सोच कर मैंने मां जी से इस बारे में कुछ नहीं बताया। ख़ैर छोड़ो, जाओ तुम भी आराम करो अब।"

भाभी कहने के साथ ही वापस सीढियां चढ़ने लगीं। जल्दी ही हम दोनों ऊपर आ कर अपने अपने कमरे की तरफ बढ़ गए। सच कहूं तो आज मैं बड़ा खुश था। सिर्फ इस लिए ही नहीं कि मैंने भाभी को अनुराधा से मिलवाया था बल्कि इस लिए भी कि उन्हें अनुराधा का और मेरा रिश्ता मंज़ूर था और वो इस रिश्ते को अंजाम तक पहुंचाने में मेरा साथ देने को बोल चुकीं थी।

अपने कमरे में आ कर मैंने अपने कपड़े उतारे और फिर लुंगी लपेट कर पलंग पर लेट गया। ऊपर मैंने बनियान पहन रखा था। पलंग पर लेट कर मैं आंखें बंद किए आज घटित हुई बातों के बारे में सोच ही रहा था कि तभी मुझे ऐसा प्रतीत हुआ जैसे मेरे बेहद ही नज़दीक कोई खड़ा है। मैंने फ़ौरन ही अपनी आंखें खोल दी। नज़र पलंग के दाईं तरफ बिल्कुल मेरे चेहरे के क़रीब खड़ी नए मुंशी की बेटी कजरी पर पड़ी। वो मेरे चेहरे को बड़े ही गौर से देखने में लगी हुई थी और फिर जैसे ही उसने मुझे पट्ट से आंखें खोलते देखा तो बुरी तरह हड़बड़ा गई और साथ ही दो क़दम पीछे हट गई। उसके चेहरे पर कुछ पलों के लिए घबराहट के भाव उभरे थे किंतु जल्दी ही उसने खुद को सम्हाल कर अपने होठों पर मुस्कान सजा ली थी।

"ये क्या हरकत है?" मैं क्योंकि उसकी हरकतों और आदतों से आजिज़ आ गया था इस लिए फ़ौरन ही उठ कर थोड़ा सख़्त भाव से बोल पड़ा____"चोरी छुपे मेरे कमरे में आने का क्या मतलब है?"

"ज...जी?? ह...हमारा मतलब है कि ये आप क्या कह रहे हैं कुंवर जी?" कजरी हड़बड़ाते हुए बोली____"हम तो आपको ये कहने के लिए आपके कमरे में आए थे कि खाना खा लीजिए। नीचे सब आपका इंतज़ार कर रहे हैं।"

"उसके लिए तुम मुझे दरवाज़े से ही आवाज़ दे कर उठा सकती थी।" मैंने पहले की तरह ही सख़्त भाव से उसकी तरफ देखते हुए कहा____"चोरी छुपे इस तरह मेरे बिस्तर के इतने क़रीब आ कर क्यों खड़ी थी तुम?"

"अ...आप सो रहे थे न।" कजरी ने अपनी हालत को सम्हालते हुए कहा____"इस लिए हम सोच में पड़ गए थे कि आपको आवाज़ दे कर उठाएं या ना उठाएं? हमने सुना है कि सोते में अगर आपको कोई उठा देता है तो आप नाराज़ हो जाते हैं।"

मैं अच्छी तरह जानता था कि कजरी बहाने बना रही थी। वो खुद को निर्दोष साबित करने पर लगी हुई थी किंतु उसे सबक सिखाने का ये सही वक्त नहीं था इस लिए मैंने भी ज़्यादा उससे बात करना ठीक नहीं समझा। उसे जाने का बोल कर मैं वापस लेट गया। कजरी के जाने के बाद मैं कुछ देर तक उसके बारे में सोचता रहा और फिर उठ कर अपने कपड़े पहनने लगा। कुछ ही देर में मैं नीचे आ कर सबके साथ खाना खाने लगा। कजरी की वजह से मेरा मूड थोड़ा ख़राब हो गया था। मैं अच्छी तरह समझ गया था कि वो मुझसे क्या चाहती थी किंतु उसे इस बात का इल्म ही नहीं था कि वो किस आग से खेलने की तमन्ना कर बैठी थी।

गुज़रे हुए वक्त में मैं यकीनन एक बुरा इंसान था और लोग मुझे अय्याशियों के लिए जानते थे लेकिन आज के वक्त में मैं एक अच्छा इंसान बनने की राह पर था। मैंने अनुराधा को ही नहीं बल्कि अपनी भाभी को भी वचन दिया था कि अब से मैं एक अच्छा इंसान ही बनूंगा। कजरी की हरकतें उसके निम्न दर्जे के चरित्र का प्रमाण दे रहीं थी और ये मेरे लिए सहन करना ज़रा भी मुमकिन नहीं था। मैंने मन ही मन फ़ैसला किया कि उसके बारे में जल्द से जल्द कुछ करना ही होगा। बहरहाल खाना खाने के बाद मैंने अपने कमरे में लगभग एक घंटा आराम किया और फिर मोटर साइकिल ले कर खेतों की तरफ चला गया।

शाम तक मैं खेतों पर ही रहा। भुवन से मैं अक्सर राय परामर्श लेता रहता था और साथ ही पुराने मजदूरों से भी जिसके चलते मैं काफी कुछ सीख गया था और काफी कुछ समझने भी लगा था। इतने समय में मुझे ये समझ आया कि खेती बाड़ी के अलावा भी ज़मीनों पर कोई ऐसी चीज़ उगाई जाए जिससे कम समय में फसल तैयार हो और उसके द्वारा अच्छी खासी आय भी प्राप्त हो सके। ऐसा करने से मजदूरों को भी खाली नहीं बैठना पड़ेगा, क्योंकि खाली बैठने से उनका भी नुकसान होता था। आख़िर उन्हें तो उतनी ही आय प्राप्त होती थी जितने दिन वो मेहनत करते थे। यही सोच कर मैंने ये सब करने का सोचा था। भुवन के साथ साथ कुछ मजदूर लोग भी मेरी इस सोच से सहमत थे और खुश भी हुए थे। अतः मैंने ऐसा ही करने का सोच लिया और अगले ही दिन से कुछ मजदूरों को हमारी कुछ खाली पड़ी ज़मीन को अच्छे से तैयार करने का हुकुम दे दिया। मजदूर लोग दोगुने जोश के साथ काम करने के लिए तैयार हो गए थे। शाम को मैं वापस हवेली आ गया। आज काफी थक गया था अतः खाना खा कर और फिर अपने कमरे में जा कर पलंग पर लेट गया।

✮✮✮✮

उस वक्त रात के लगभग बारह बज रहे थे। आज आसमान साफ तो था किन्तु क्षितिज पर से चांद नदारद था। अनगिनत तारे ही अपनी टिमटिमाहट से धरती को रोशन करने की नाकाम कोशिशों में लगे थे। पूरा गांव सन्नाटे के आधीन था। घरों के अंदर लोग गहरी नींद में सोए हुए थे। बिजली हमेशा की तरह गुल थी इस लिए घरों की किसी भी खिड़की में रोशनी नज़र नहीं आ रही थी। पूरे गांव में गहन तो नहीं किंतु नीम अंधेरा ज़रूर विद्यमान था।

इसी नीम अंधेरे में सहसा चंद्रकांत के घर का दरवाज़ा खुला। अंदर छाए गहन अंधेरे से निकल कर बाहर नीम अंधेरे में किसी साए की तरह जो व्यक्ति नज़र आया वो चंद्रकांत था। नीम अंधेरे में उसके जिस्म पर मौजूद सफ़ेद कमीज धुंधली सी नज़र आई, अलबत्ता नीचे शायद उसने लुंगी लपेट रखी थी।

दरवाज़े से बाहर आ कर वो एकदम से ठिठक कर इधर उधर देखने लगा और फिर घर के बाएं तरफ चल पड़ा। कुछ ही पलों में वो उस जगह पहुंचा जहां पर कुछ दिन पहले उसने अपने बेटे रघुवीर की खून से लथपथ लाश पड़ी देखी थी। घर के तीन तरफ लकड़ी की बल्लियों द्वारा उसने क़रीब चार फुट ऊंची बाउंड्री बनवा रखी थी। बाएं तरफ उसी लकड़ी की बाउंड्री के क़रीब पहुंच कर वो रुक गया। कुछ पलों तक उसने नीम अंधेरे में इधर उधर देखा और फिर दोनों हाथों से अपनी लुंगी को जांघों तक उठा कर वो उसी जगह पर बैठता चला गया। कुछ ही पलों में ख़ामोश वातावरण में उसके पेशाब करने की मध्यम आवाज़ गूंजने लगी।

चंद्रकांत पेशाब करने के बाद उठा और अपनी लुंगी को जांघों से नीचे गिरा कर अपनी नंगी टांगों को ढंक लिया। चंद्रकांत को इस जगह पर आते ही अपने बेटे की याद आ जाती थी जिसके चलते वो बेहद दुखी हो जाया करता था। इस वक्त भी उसे अपने बेटे की याद आई तो वो दुखी हो गया। कुछ पलों तक दुखी अवस्था में जाने क्या सोचते हुए वो खड़ा रहा और फिर गहरी सांस ले कर वापस घर के दरवाज़े की तरफ भारी क़दमों से चल पड़ा।

अभी वो कुछ ही क़दम चला था कि सहसा गहन सन्नाटे में उसे किसी आहट का आभास हुआ जिसके चलते वो एकदम से अपनी जगह पर रुक गया। उसकी पहले से ही बढ़ी हुई धड़कनें अंजाने भय की वजह से एकदम से रुक गईं सी प्रतीत हुईं। हालाकि जल्दी ही उसने खुद को सम्हाल कर होश में ले आया। उसके कान किसी हिरण के जैसे किसी भी आहट को सुनने के लिए मानों खड़े हो गए थे। उसने महसूस किया कि अगले कुछ ही पलों में उसकी धड़कनें किसी हथौड़े की तरह उसकी पसलियों पर चोंट करने लगीं हैं।

जब कुछ देर तक उसे किसी आहट का आभास न हुआ तो वो इसे अपना वहम समझ कर हौले से आगे बढ़ चला। हालाकि उसके दोनों कान अब भी किसी भी प्रकार की आहट को सुनने के लिए मानों पूरी तरह तैयार थे। अभी वो अपने घर के दरवाज़े के बस थोड़ा ही क़रीब पहुंचा था कि सहसा फिर से आहट हुई और इस बार उसने आहट को साफ सुना। आहट उसके पीछे से आई थी। पलक झपकते ही इस एहसास के चलते उसके तिरपन कांप गए कि इस गहन सन्नाटे और अंधेरे में उसके क़रीब ही कहीं कोई मौजूद है।

बिजली की तरह ज़हन में उसे अपने बेटे के हत्यारे का ख़याल कौंध गया जिसके चलते उसके पूरे जिस्म में मौत की सिहरन सी दौड़ गई। कुछ पलों तक तो उसे समझ में ही न आया कि क्या करे किंतु तभी इस एहसास ने उसके जबड़े सख़्त कर दिए कि उसके बेटे का हत्यारा उसके आस पास ही मौजूद है। ये उसके लिए बहुत ही अच्छा मौका है अपने बेटे के हत्यारे से बदला लेने का। वो भी उस हरामजादे को वैसी ही मौत देगा जैसे उसने उसके बेटे को दी थी, बल्कि उससे भी ज़्यादा बद्तर मौत देगा वो उसे।

अगले कुछ ही पलों में बदले की भावना के चलते चंद्रकांत के अंदर आक्रोश, गुस्सा और नफ़रत ने अपना प्रबल रूप धारण कर लिया। अगले ही पल वो एक झटके से पलटा और उस दिशा की तरफ मुट्ठियां भींचे देखने लगा जिस तरफ से उसे आहट सुनाई दी थी। उससे कुछ ही क़दम की दूरी पर लकड़ी की बाउंड्री थी जो उसे धुंधली सी नज़र आ रही थी। चंद्रकांत बेख़ौफ हो कर तेज़ी से आगे बढ़ चला। बाउंड्री के क़रीब पहुंच कर वो रुका और आंखें फाड़ फाड़ कर देखने लगा किंतु एक तो उमर का तकाज़ा दूसरे नीम अंधेरा जिसके चलते उसे कोई नज़र न आया। चंद्रकांत सख़्त भाव लिए और मुट्ठियां भींचे चारो तरफ देखने लगा। सहसा तभी एक जगह पर उसकी निगाह ठहर गई। बाउंड्री के बीच लकड़ी के दरवाज़े के बगल में उसे कोई आकृति खड़ी हुई नज़र आई। उसने आंखें सिकोड़ कर उस आकृति को पहचानने की कोशिश की किंतु पहचान न सका।

चंद्रकांत बेख़ौफ हो कर एक झटके में उस आकृति की तरफ बढ़ चला। बदले की प्रबल भावना में डूबे चंद्रकांत को ये तक ख़याल नहीं रहा था कि इस वक्त वो निहत्था है और अगर सच में यहां पर उसके बेटे का हत्यारा मौजूद है तो वो निहत्था कैसे उसका सामना कर सकेगा? ख़ैर जल्दी ही वो उस आकृति के क़रीब पहुंच गया। क़रीब पहुंचने पर उसे नीम अंधेरे में साफ दिखा कि वो आकृति असल में किसी इंसानी साए की थी।

एक ऐसे साए की जिसके जिस्म का कोई भी अंग नज़र नहीं आ रहा था बल्कि उसके समूचे जिस्म पर सफ़ेद लिबास था। सिर से ले कर पांव तक वो सफ़ेद लिबास में खुद को छुपाए हुए था। उसके दोनों हाथ चंद्रकांत को नज़र ना आए। शायद उसने उन्हें अपने पीछे छुपा रखा था। उस सफ़ेद लिबास में छुपे साए को देख चंद्रकांत पलक झपकते ही बुत बन गया। समूचे जिस्म में डर की वजह से मौत की सिहरन दौड़ गई।

सहसा उसके ज़हन में एक ज़ोरदार धमाका सा हुआ। बिजली की तरह उसके ज़हन में पंचायत के दिन दादा ठाकुर द्वारा पूछी गई बात गूंज उठी। दादा ठाकुर ने उससे ही नहीं बल्कि गौरी शंकर से भी पूछा था कि क्या वो किसी सफ़ेदपोश को जानते हैं अथवा क्या उनका संबंध सफ़ेदपोश से है? उस दिन दादा ठाकुर के इन सवालों का जवाब ना गौरी शंकर के पास था और ना ही खुद उसके पास। दोनों ने सफ़ेदपोश के बारे में अपनी अनभिज्ञता ही ज़ाहिर की थी।

'तो क्या यही है वो सफ़ेदपोश?' गहन सोचों में डूब गए चंद्रकांत के ज़हन में ये सवाल उभरा____'क्या यही वो सफ़ेदपोश है जिसने दादा ठाकुर के अनुसार उनके बेटे वैभव को कई बार जान से मारने की कोशिश की थी?'

चंद्रकांत आश्चर्यजनक रूप से ख़ामोश हो गया था और जाने क्या क्या सोचे जा रहा था। उसे ये तक ख़याल नहीं रह गया था कि कुछ देर पहले वो किस तरह की भावना में डूबा हुआ उस आकृति की तरफ बढ़ा था। अचानक चंद्रकांत के मन में ख़याल उभरा कि क्या इस सफ़ेदपोश ने मेरे बेटे की हत्या की होगी? अगर हां तो क्यों? अगले ही पल उसने सोचा____'किन्तु इससे तो मेरी अथवा मेरे बेटे की कोई दुश्मनी ही नहीं थी। फिर भला ये क्यों मेरे बेटे की हत्या करेगा? बल्कि इसकी दुश्मनी तो दादा ठाकुर के बेटे वैभव से है। यकीनन वैभव ने इसकी भी बहन बेटी अथवा बीवी के साथ बलात्कार कर के इसके ऊपर अत्याचार किया होगा। तभी तो इसने कई बार वैभव को जान से मार देना चाहा था। वो तो उस हरामजादे की किस्मत ही अच्छी थी जो वो हर बार इससे बच गया था मगर कब तक बचेगा आख़िर?'

"लगता है मुझे अपने इतने क़रीब देख कर तू किसी और ही दुनिया में पहुंच गया है।" तभी सहसा सन्नाटे में सामने मौजूद सफ़ेदपोश की अजीब सी किन्तु धीमी आवाज़ गूंजी जिससे चंद्रकांत पलक झपकते ही सोचों के भंवर से बाहर आ गया। उसने हड़बड़ा कर सफ़ेदपोश की तरफ देखा।

"क...क...कौन हो तुम???" चंद्रकांत उसको पहचानते हुए भी मारे हड़बड़ाहट के पूछ बैठा____"और यहां किस लिए आए हो?"

"इस गांव की बड़ी बड़ी हस्तियां मुझे सफ़ेदपोश के नाम से जानती हैं।" सफ़ेदपोश ने अपनी अजीब सी आवाज़ में कहा____"और हां तू भी जानता है मुझे। मेरे सामने अंजान बनने की तेरी ये कोशिश बेकार है चंद्रकांत। रही बात मेरे यहां आने की तो ये समझ ले कि मौत नाम की बला कभी भी कहीं भी आ जा सकती है।"

सफ़ेदपोश की आवाज़ में और उसकी बातों में जाने ऐसा क्या था कि सुन कर चंद्रकांत के समूचे जिस्म में सर्द लहर दौड़ गई। उसने अपनी टांगें कांपती हुई महसूस की। चेहरा पलक झपकते ही पसीना छोड़ने लगा। उसके हलक से कोई आवाज़ न निकल सकी। सूख गए गले को उसने ज़बरदस्ती तर करने की कोशिश की और फिर पलक झपकते ही ख़राब हो गई अपनी हालत को काबू करने की कोशिश में लग गया।

"ल...लेकिन यहां क्यों आए हो तुम?" फिर उसने बड़ी मुश्किल से सफ़ेदपोश से पूछा। उसे समझ नहीं आ रहा था कि सफ़ेदपोश उसके घर के बाहर क्यों आ गया था और अगर उससे ही मिलने आया था तो आख़िर वो क्या चाहता था उससे?

"लगता है अपने बेटे की मौत का ग़म बड़ा जल्दी भूल गया है तू।" सफ़ेदपोश ने ठंडे स्वर में कहा____"क्या तेरी रगों में दौड़ता हुआ लहू सच में पानी हो गया है चंद्रकांत?"

"न...नहीं तो।" चंद्रकांत अजीब भाव से बोल पड़ा____"कुछ भी नहीं भूला हूं मैं। अपने बेटे के हत्यारे को पाताल से भी खोज निकालूंगा और अपने बेटे की हत्या करने की उसे अपने हाथों से सज़ा दूंगा।"

"बहुत खूब।" सफ़ेदपोश अपनी अजीब सी आवाज़ में कह उठा____"बदला लेने के लिए सीने में कुछ ऐसी ही आग होनी चाहिए। वैसे क्या लगता है तुझे, तू या कोई भी तेरे बेटे के हत्यारे का पता लगा सकेगा?"

"क...क्या मतलब??" चंद्रकांत बुरी तरह चकरा गया, फिर जल्दी ही सम्हल कर बोला____"ऐसा क्यों कह रहे हो तुम?"

"वो इस लिए क्योंकि मैं अच्छी तरह जानता हूं कि तू क्या किसी के बाप के फ़रिश्ते भी उस शख़्स का पता नहीं लगा सकते जिसने तेरे बेटे की हत्या की है।" सफ़ेदपोश ने बड़े अजीब भाव से किंतु अपनी अजीब सी आवाज़ में कहा____"लेकिन मैं....मैं अच्छी तरह जानता हूं उसे। इसी वक्त तुझे बता सकता हूं कि तेरे बेटे का हत्यारा कौन है?"

"क....क्या????" चंद्रकांत बुरी तरह उछल पड़ा____"म...मेरा मतलब है कि क्या तुम सच कह रहे हो? क्या सच में तुम इसी वक्त मेरे बेटे के हत्यारे के बारे में बता सकते हो?"

"बेशक।" सफ़ेदपोश ने कहा____"मैं सब कुछ बता सकता हूं क्योंकि मैं फरिश्तों से भी ऊपर की चीज़ हूं। जो कोई नहीं कर सकता वो मैं कर सकता हूं।"

चंद्रकांत किसी बेजान पुतले की तरह आश्चर्य से आंखें फाड़े सफ़ेदपोश की धुंधली सी आकृति को देखता रह गया। सहसा उसके ज़हन में विस्फोट सा हुआ तो जैसे उसे होश आया। उसने अपने ज़हन को झटक कर सफ़ेदपोश की तरफ देखा। लकड़ी की बाउंड्री के उस पार वो सफ़ेद किंतु धुंधली सी आकृति के रूप ने नज़र आ रहा था। चंद्रकांत को ऐसा प्रतीत हुआ जैसे वो सचमुच फ़रिश्तों से ऊपर की ही चीज़ है।

"म...मुझे बताओ।" चंद्रकांत एकदम से व्याकुल और पगलाए हुए अंदाज़ में बोल पड़ा____"मुझे जल्दी से बताओ कि वो हत्यारा कौन है जिसने मेरे इकलौते बेटे की हत्या कर के मेरे वंश का नाश कर दिया है? भगवान के लिए जल्दी से उस हत्यारे का नाम बता दो मुझे। मैं तुम्हारे पांव पड़ता हूं। बस एक बार उसका नाम बता दो, बदले में तुम मुझसे जो मांगोगे मैं बिना सोचे समझे तुम्हें दे दूंगा।"

"बदले में क्या कर सकता है तू मेरे लिए?" सामने खड़े सफ़ेदपोश ने कुछ पलों तक सोचने के बाद सर्द लहजे में उससे पूछा।

"जो भी तुम कहोगे...मैं करूंगा।" चंद्रकांत ने झट से कहा____"बस तुम मुझे मेरे बेटे के हत्यारे का नाम बता दो।"

"जिस तरह तू अपने बेटे के हत्यारे का नाम जानने के लिए मरा जा रहा है, सोच रहा हूं पहले तुझे उस हत्यारे का नाम ही बता दूं।" सफ़ेदपोश ने अजीब भाव से कहा____"लेकिन ये भी सोचता हूं कि अगर मैंने तुझे उसका नाम बता दिया और बाद में तू मेरे लिए कुछ भी करने से मुकर गया तो...??"

"नहीं नहीं, ऐसा कभी नहीं होगा।" चंद्रकांत ने हड़बड़ाते हुए झट से कहा____"मैं अपने मरे हुए बेटे की क़सम खा कर कहता हूं कि बाद में मैं किसी भी बात से नहीं मुकरूंगा। बल्कि वही करूंगा जो करने को तुम कहोगे।"

"ऐसा पहली बार ही हो रहा है कि मैं किसी से अपना काम करवाने से पहले सामने वाले पर भरोसा कर के खुद उसका भला करने जा रहा हूं।" सफ़ेदपोश ने अपनी अजीब आवाज़ में कहा____"मैं अभी इसी वक्त तुझे तेरे बेटे के हत्यारे का नाम बताए देता हूं किंतु एक बात तू अच्छी तरह समझ ले। अगर बाद में तू अपने वादे से मुकर कर मेरा कोई काम नहीं किया तो ये तेरे और तेरे परिवार के लिए बिल्कुल भी अच्छा नहीं होगा।"

"म...मेरा यकीन करो।" चंद्रकांत ने पूरी दृढ़ता से कहा____"मैं सच में वही करूंगा जो तुम कहोगे। अपने मरे हुए बेटे की क़सम खा चुका हूं मैं। क्या इतने पर भी तुम्हें मुझ पर यकीन नहीं है?"

"यकीन हो गया है तुझ पर तभी तो तुझसे अपना काम करवाने से पहले मैंने तेरा भला करने का सोच लिया है।" सफ़ेदपोश ने कहा____"लेकिन तुझे आगाह इस लिए किया है कि अगर तू बाद में अपने वादे से मुकर गया तो फिर अपने और अपने परिवार के बुरे अंजाम का ज़िम्मेदार तू ख़ुद ही होगा।"

कहने के साथ ही सफ़ेदपोश ने चंद्रकांत को अपना कान उसके क़रीब लाने को कहा तो चंद्रकांत पहले तो चौंका, फिर अपनी बढ़ी हुई धड़कनों के साथ आगे बढ़ा। उसने अपना एक कान सफ़ेदपोश की तरफ बढ़ाया तो सफ़ेदपोश आगे बढ़ कर उसके कान में काफी देर तक जाने क्या कहता रहा।

"उम्मीद है कि अब तू उस हत्यारे से अपने बेटे की हत्या का बदला ले कर अपने दिल की आग को ठंडा कर लेगा।" सफ़ेदपोश ने उसके कान से सफ़ेद नक़ाब में छुपा अपना मुंह हटा कर कहा____"और हां, तेरे पास समय बिल्कुल ही कम है। मैं कल रात किसी भी वक्त यहां पर आ सकता हूं और फिर तुझे अपना काम करने का हुकुम दे सकता हूं। अपना वादा तोड़ कर मेरा काम न करने की सूरत में क्या होगा इस बात को भूलना मत।"

कहने के साथ ही सफ़ेदपोश ने इधर उधर अपनी निगाह घुमाई और फिर पलट कर हवा के झोंके की तरह कुछ ही पलों में अंधेरे में ग़ायब हो गया। उसके ग़ायब होते ही चंद्रकांत को जैसे होश आया। अगले कुछ ही पलों में उसके अंदर एक ऐसी आग सुलग उठी जिससे उसके जबड़े कस गए और मुट्ठियां भिंच गईं। दिलो दिमाग़ में मचल उठी आंधी को लिए वो पलटा और घर के दरवाज़े की तरफ बढ़ता चला गया।

✮✮✮✮

सफ़ेदपोश अंधेरे में भी तेज़ी से एक तरफ को बढ़ता चला जा रहा था। कुछ ही दूरी पर आसमान से थोड़ा नीचे धुंधली सी आकृति के रूप में उसे पेड़ पौधे दिखने लगे थे। उसकी रफ़्तार और भी तेज़ हो गई। ज़ाहिर है वो अपनी मंजिल पर पहुंचने में देर नहीं करना चाहता था। ज़मीन पर तेज़ तेज़ पड़ते उसके क़दमों से ख़ामोश वातावरण में अजीब सी आवाज़ें पैदा हो रहीं थी। कुछ ही देर में उसे धुंधले नज़र आने वाले पेड़ पौधे थोड़ा स्पष्ट से नज़र आने लगे। तेज़ चलने की वजह से उसकी सांसें भारी हो गईं थी।

अभी वो उन पेड़ पौधों से थोड़ा इधर ही था कि तभी वो चौंका और साथ ही ठिठक भी गया। अपनी एड़ी पर फिरकिनी की मानिंद घूम कर उसने एक तरफ निगाह डाली तो नीम अंधेरे में उसे हिलते डुलते कुछ साए नज़र आए। ये देख वो फ़ौरन ही वापस घूमा और लगभग दौड़ते हुए उन पेड़ पौधों की तरफ भाग चला। उसने भागते हुए ही पलट कर देखा कि हिलते डुलते नज़र आने वाले वो साए भी बड़ी तेज़ी से उसकी तरफ दौड़ लगा चुके थे। सफ़ेदपोश जल्द ही पेड़ पौधों के पास पहुंच गया। यहां कई सारे पेड़ पौधे थे। ऐसा लगता था जैसे ये कोई बगीचा था। सफ़ेदपोश तेज़ी से ढेर सारे पेड़ पौधों के बीच घुसता चला गया। यहां की ज़मीन पर शायद पेड़ों के सूखे पत्ते मौजूद थे जिसकी वजह से सफ़ेदपोश द्वारा तेज़ तेज़ चलने से फर्र फर्र की आवाज़ें पैदा होने लगीं थी जो फिज़ा में छाए सन्नाटे में अजीब सा भय पैदा करने लगीं थी।

सफ़ेदपोश बगीचे के अंदर अभी कुछ ही दूर चला था कि तभी एक तरफ से कोई ज़ोर से चिल्लाया। कदाचित सूखे पत्तों से पैदा होने वाली आवाज़ों को सुन कर ही कोई चिल्लाया था और बोला था____"कौन है उधर?"

इस आवाज़ को सुन कर सफ़ेदपोश बुरी तरह हड़बड़ा गया। यकीनन वो घबरा भी गया होगा किंतु वो रुका नहीं बल्कि और भी तेज़ी से आगे की तरफ भागने लगा। तभी फिर से कोई ज़ोर से चिल्लाते हुए पुकारा। सफ़ेदपोश ने महसूस किया कि पुकारने वाला उसके पीछे ही भागता हुआ आने लगा है तो वो झटके से रुक गया। अपने एक हाथ को उसने सफ़ेद लबादे में कहीं घुसाया। कुछ ही पलों में उसका वो हाथ उसके लबादे से बाहर आ गया। अपनी जगह पर खड़े खड़े ही वो आहिस्ता से पलटा और अपने उस हाथ को हवा में उठा दिया। अगले ही पल ख़ामोश वातावरण में धांय की बड़ी तेज़ आवाज़ गूंज उठी। ऐसा लगा जैसे सन्नाटे में कोई धमाका हो गया हो। सफ़ेदपोश के हाथ में शायद रिवॉल्वर था जिससे उसने गोली चलाई थी। गोली चलते ही किसी की ज़ोरदार चीख़ फिज़ा में गूंज उठी और साथ ही सूखे पत्तों पर किसी के भरभरा कर गिरने की आवाज़ भी हुई।

सफ़ेदपोश ने झट से रिवॉल्वर को अपने सफ़ेद लबादे में ठूंसा और फिर वो वापस पलटा ही था कि तभी उसे ऐसा महसूस हुआ जैसे कई सारे लोग बगीचे में दाखिल हो गए हैं क्योंकि ज़मीन पर पड़े सूखे पत्तों पर ढेर सारी आवाज़ें आने लगीं थी। ये महसूस करते ही सफ़ेदपोश तेज़ी से आगे की तरफ भागता चला गया और फिर अचानक ही अंधेरे में इस तरह ग़ायब हो गया जैसे उसका यहां कहीं कोई वजूद ही न हो।​
 
अध्याय - 102
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सफ़ेदपोश ने झट से रिवॉल्वर को अपने सफ़ेद लबादे में ठूंसा और फिर वो वापस पलटा ही था कि तभी उसे ऐसा महसूस हुआ जैसे कई सारे लोग बगीचे में दाखिल हो गए हैं क्योंकि ज़मीन पर पड़े सूखे पत्तों पर ढेर सारी आवाज़ें आने लगीं थी। ये महसूस करते ही सफ़ेदपोश तेज़ी से आगे की तरफ भागता चला गया और फिर अचानक ही अंधेरे में इस तरह ग़ायब हो गया जैसे उसका यहां कहीं कोई वजूद ही न हो।

अब आगे....


अगली सुबह मेरे कमरे का दरवाज़ा किसी ने ज़ोर ज़ोर से बजाया तो मेरी आंख झट से खुल गई और मैं एकदम से उछल कर उठ बैठा। दरवाज़ा बजने के साथ ही कोई आवाज़ भी दे रहा था मुझे। जैसे ही मेरा ज़हन सक्रिय हुआ तो मैं आवाज़ देने वाले को पहचान गया। वो कुसुम की आवाज़ थी। सुबह सुबह उसके द्वारा इस तरह दरवाज़ा बजाए जाने से और पुकारने से मैं एकदम से हड़बड़ा गया और साथ ही किसी अनिष्ट की आशंका से घबरा भी गया। मैं बिजली की सी तेज़ी से पलंग से नीचे कूदा। लुंगी मेरे बदन से अलग हो गई थी इस लिए फ़ौरन ही उसे पलंग से उठा कर लपेटा और फिर तेज़ी से दरवाज़े के पास पहुंच कर दरवाज़ा खोला।

"क्या हुआ?" बाहर कुसुम के साथ कजरी को खड़े देख मैंने अपनी बहन से पूछा____"इतनी ज़ोर ज़ोर से दरवाज़ा क्यों पीट रही थी तू?"

"गज़ब हो गया भैया।" कुसुम ने बौखलाए हुए अंदाज़ में कहा____"पूरे गांव में हंगामा मचा हुआ है। ताऊ जी हमारे न‌ए मुंशी जी के साथ वहीं गए हुए हैं।"

"ये क्या कह रही है तू?" मैं उसके मुख से हंगामे की बात सुन कर चौंक पड़ा____"आख़िर कैसा हंगामा मचा हुआ है गांव में?"

"अभी कुछ देर पहले ताऊ जी को हवेली के एक दरबान ने बताया कि हमारे पहले वाले मुंशी ने अपनी बहू को जान से मार डाला है।" कुसुम मानो एक ही सांस में बताती चली गई____"सुबह जब उसकी बीवी और बेटी को इस बात का पता चला तो उन दोनों की चीखें निकल गईं। उसके बाद उनकी चीखें रोने धोने में बदल गईं। आवाज़ें घर से बाहर निकलीं तो धीरे धीरे गांव के लोग चंद्रकांत के घर की तरफ दौड़ पड़े।"

कुसुम जाने क्या क्या बोले जा रही थी और इधर मेरा ज़हन जैसे एकदम कुंद सा पड़ गया था। कुसुम ने मुझे हिलाया तो मैं चौंका। मेरे लिए ये बड़े ही आश्चर्य की बात थी कि चंद्रकांत ने अपनी ही बहू की जान ले ली...मगर क्यों?

मैंने कुसुम को जाने को कहा और वापस कमरे में आ कर अपने कपड़े पहनने लगा। जल्दी ही तैयार हो कर मैं नीचे की तरफ भागा। मुझे अभी भी यकीन नहीं हो रहा था कि चंद्रकांत ने इतना बड़ा कांड कर दिया है। नीचे आया तो देखा मां, चाची, भाभी, निर्मला काकी आदि सब एक जगह बैठी बातें कर रहीं थी। मुझ पर नज़र पड़ते ही सब चुप हो गईं। मैं सबसे पहले गुसलखाने में गया और हाथ मुंह धो कर तथा मोटर साइकिल की चाभी ले कर बाहर निकल गया। कुछ ही देर में मैं अपनी मोटर साइकिल से चंद्रकांत के घर के पास पहुंच गया।

चंद्रकांत के घर के बाहर गांव के लोगों का हुजूम लगा था। वातावरण में औरतों के रोने धोने और चिल्लाने की आवाज़ें गूंज रहीं थी। भीड़ को चीरते हुए मैं जल्द ही चंद्रकांत के घर की चौगान में पहुंच गया जहां पर अपने नए मुंशी के साथ पिता जी और उधर गौरी शंकर अपने भतीजे रूपचंद्र के साथ खड़े दिखे। मैंने देखा घर के बाहर चंद्रकांत की बीवी और उसकी बेटी गला फाड़ फाड़ कर रोए जा रही थी और चंद्रकांत को जाने क्या क्या बोले जा रहीं थी। दोनों मां बेटी के कपड़े अस्त व्यस्त नज़र आ रहे थे। गांव की कुछ औरतें उन्हें सम्हालने में लगी हुईं थी। चंद्रकांत एक कोने में अपने हाथ में एक पुरानी सी तलवार लिए बैठा था। तलवार पूरी तरह खून से नहाई हुई थी। उसके चेहरे पर बड़ी ही सख़्ती के भाव मौजूद थे।

तभी चीख पुकार से गूंजते वातावरण में किसी वाहन की मध्यम आवाज़ आई तो भीड़ में खड़े लोग एक तरफ हटते चले गए। हम सबने पलट कर देखा। सड़क पर दो जीपें आ कर खड़ी हो गईं थी। आगे की जीप से ठाकुर महेंद्र सिंह उतरे, उनके साथ उनका छोटा भाई ज्ञानेंद्र और बाकी अन्य लोग। महेंद्र सिंह अपने छोटे भाई के साथ आगे बढ़ते हुए जल्द ही पिता जी के पास पहुंच गए।

"ये सब क्या है ठाकुर साहब?" इधर उधर निगाह घुमाते हुए महेंद्र सिंह ने पिता जी से पूछा____"कैसे हुआ ये सब?"

"हम भी अभी कुछ देर पहले ही यहां पहुंचे हैं मित्र।" पिता जी ने गंभीर भाव से कहा___"यहां का दृश्य देख कर हमने चंद्रकांत से इस सबके बारे में पूछा तो इसने बड़े ही अजीब तरीके से गला फाड़ कर बताया कि अपने हाथों से इसने अपने बेटे के हत्यारे को जान से मार डाला है।"

"य...ये क्या कह रहे हैं आप?" महेंद्र सिंह बुरी तरह चौंके____"चंद्रकांत ने अपने बेटे के हत्यारे को जान से मार डाला है? कौन था इसके बेटे का हत्यारा?"

"इसकी ख़ुद की बहू रजनी।" पिता जी ने कहा____"हमारे पूछने कर तो इसने यही बताया है, बाकी सारी बातें आप खुद ही पूछ लीजिए इससे। हमें तो यकीन ही नहीं हो रहा कि इसकी बहू अपने ही पति की हत्यारिन हो सकती है और इसने उसको अपने हाथों से जान से मार डाला।"

पिता जी की बातें सुन कर महेंद्र सिंह फ़ौरन कुछ बोल ना सके। उनके चेहरे पर ऐसे भाव थे जैसे इस सबको वो हजम करने की नाकाम कोशिश कर रहे हैं। हैरत के भाव लिए वो चंद्रकांत की तरफ बढ़े। चंद्रकांत पहले की ही भांति अपने हाथ में खून से सनी तलवार लिए बैठा था।

"ये सब क्या है चंद्रकांत?" महेंद्र सिंह ने उसके क़रीब पहुंचते ही सख़्त भाव से उससे पूछा____"तुमने अपने हाथों से अपनी ही बहू को जान से मार डाला?"

"हां ठाकुर साहब मैंने मार डाला उसे।" चंद्रकांत ने अजीब भाव से कहा____"उसने मेरे बेटे की हत्या की थी इस लिए रात को मैंने उसे अपनी इसी तलवार से काट कर मार डाला।"

"क...क्या???" महेंद्र सिंह आश्चर्य से चीख़ ही पड़े____"तुम्हें ये कैसे पता चला कि तुम्हारी बहू ने ही तुम्हारे बेटे की हत्या की है? आख़िर इतना बड़ा क़दम उठाने का साहस कैसे किया तुमने?"

"साहस.... हा हा हा...।" चंद्रकांत पागलों की तरह हंसा फिर अजीब भाव से बोला____"आप साहस की बात करते हैं ठाकुर साहब....अरे! जिस इंसान को पता चल जाए कि उसके इकलौते बेटे की हत्या करने वाली उसकी अपनी ही बहू है तो साहस के साथ साथ खून भी खौल उठता है। दिलो दिमाग़ में नफ़रत और गुस्से का भयंकर सैलाब आ जाता है। उस वक्त इंसान सारी दुनिया को आग लगा देने का साहस कर सकता है ठाकुर साहब। ये तो कुछ भी नहीं था मेरे लिए।"

"होश में रह कर बात करो चंद्रकांत।" महेंद्र सिंह गुस्से से गुर्राए____"तुम ये कैसे कह सकते हो कि तुम्हारे बेटे की हत्या तुम्हारी अपनी ही बहू ने की थी? आख़िर तुम्हें इस बात का पता कैसे चला?"

"आपने मेरे बेटे के हत्यारे का पता लगाने का मुझे आश्वासन दिया था ठाकुर साहब।" चंद्रकांत ने कहा____"मगर इतने दिन गुज़र जाने के बाद भी आप मेरे बेटे के हत्यारे का पता नहीं लगा सके और मैं हर रोज़ हर पल अपने बेटे की मौत के ग़म में झुलसता रहा। शायद मेरा ये दुख ऊपर वाले से देखा नहीं गया। तभी तो उसने एक ऐसे फ़रिश्ते को मेरे पास भेज दिया जिसने एक पल में मुझे मेरे बेटे के हत्यारे का पता ही नहीं बल्कि उसका नाम ही बता दिया।"

"क...क्या मतलब??" चंद्रकांत की इस बात को सुन कर महेंद्र सिंह के साथ साथ पिता जी और हम सब भी बुरी तरह चकरा गए। उधर महेंद्र सिंह ने पूछा____"किस फ़रिश्ते की बात कर रहे हो तुम और क्या बताया उसने तुम्हें?"

"नहीं....हर्गिज़ नहीं।" चंद्रकांत ने सख़्ती से अपने जबड़े भींच लिए, बोला____"मैं किसी को भी उस नेक फ़रिश्ते के बारे में नहीं बताऊंगा। उसने मुझ पर बहुत बड़ा उपकार किया है। उसने मेरे बेटे के हत्यारे के बारे में बता कर मुझे अपने अंदर की आग को ठंडा करने का अनोखा मौका दिया है।"

महेंद्र सिंह ही नहीं बल्कि वहां मौजूद लगभग हर कोई चंद्रकांत की बातें सुन कर आश्चर्यचकित रह गया था। ज़हन में बस एक ही ख़्याल उभरा कि शायद चंद्रकांत पागल हो गया है। जाने कैसी अजीब बातें कर रहा था वो। दूसरी तरफ उसकी बीवी और बेटी सिर पटक पटक कर रोए जा रहीं थी। वातावरण में एक अजीब सी सनसनी फैली हुई थी।

"हमारा ख़याल है कि इस वक्त चंद्रकांत की मानसिक अवस्था बिल्कुल भी ठीक नहीं है मित्र।" पिता जी ने महेंद्र सिंह के क़रीब आ कर गंभीरता से कहा____"इस लिए इस वक्त इससे कुछ भी पूछने का कोई फ़ायदा नहीं है। जब इसका दिमाग़ थोड़ा शांत हो जाएगा तभी इससे इस सबके बारे में पूछताछ करना उचित होगा।"

"शायद आप ठीक कह रहे हैं।" महेंद्र सिंह ने गहरी सांस ली____"इस वक्त ये सचमुच बहुत ही अजीब बातें कर रहा है और इसका बर्ताव भी कुछ ठीक नहीं लग रहा है। ख़ैर, आपका क्या विचार है अब? हमारा मतलब है कि चंद्रकांत ने अपनी बहू की हत्या कर दी है और ये बहुत बड़ा अपराध है। अतः इस अपराध के लिए क्या आप इसे सज़ा देने का सुझाव देना चाहेंगे?"

"जब तक इस मामले के बारे में ठीक से कुछ पता नहीं चलता।" पिता जी ने कहा____"तब तक इस बारे में किसी भी तरह का फ़ैसला लेना सही नहीं होगा। हमारा सुझाव यही है कि कुछ समय के लिए चंद्रकांत को उसके इस अपराध के लिए सज़ा देने का ख़याल सोचना ही नहीं चाहिए। किन्तु हां, तब तक हमें ये जानने और समझने का प्रयास ज़रूर करना चाहिए कि चंद्रकांत को आख़िर ये किसने बताया कि उसके बेटे का हत्यारा खुद उसकी ही बहू है?"

"बड़ी हैरत की बात है कि चंद्रकांत ने इतना बड़ा और संगीन क़दम उठा लिया।" महेंद्र सिंह ने कहा____"उसे देख कर यही लगता है कि जैसे उस पर पागलपन सवार है। इतना ही नहीं ऐसा भी प्रतीत होता है जैसे उसे इस बात की बेहद खुशी है कि उसने अपने बेटे के हत्यारे को जान से मार कर अपने बेटे की हत्या का बदला ले लिया है।"

"उसके इकलौते बेटे की हत्या हुई थी मित्र।" पिता जी ने कहा____"उसके बेटे को भी अभी कोई औलाद नहीं हुई थी। ज़ाहिर है रघुवीर की मौत के बाद चंद्रकांत की वंशबेल भी आगे नहीं बढ़ सकती है। ये ऐसी बातें हैं जिन्हें सोच सोच कर कोई भी इंसान चंद्रकांत जैसी मानसिकता में पहुंच सकता है। ख़ैर, चंद्रकांत के अनुसार उसे किसी फ़रिश्ते ने उसके बेटे के हत्यारे के बारे में बताया कि हत्यारा खुद उसकी ही बहू है। अब सवाल ये उठता है कि अगर ये सच है तो फिर चंद्रकांत की बहू ने अपने ही पति की हत्या किस वजह से की होगी? हालाकि हमें तो कहीं से भी ये नहीं लगता कि रजनी ने ऐसा किया होगा लेकिन मौजूदा परिस्थिति में उसकी मौत के बाद इस सवाल का उठना जायज़ ही है। चंद्रकांत ने भी तो अपनी बहू की जान लेने से पहले उससे ये पूछा होगा कि उसने अपने पति की हत्या क्यों की थी?"

"ये ऐसा मामला है ठाकुर साहब जिसने हमें एकदम से अवाक सा कर दिया है।" महेंद्र सिंह ने गहरी सांस ली____"हमें लगता है कि किसी ने भी ऐसा होने की कल्पना नहीं की रही होगी। ख़ैर ऊपर वाले की लीला वही जाने किंतु इस मामले में एक दो नहीं बल्कि ढेर सारे सवाल खड़े हो गए हैं। हम लोग चंद्रकांत की ऐसी मानसिकता के लिए उसे समय देने का सुझाव दे रहे थे जबकि ऐसा प्रतीत होता है कि ख़ुद हम लोगों को भी समय चाहिए। कमबख़्त ज़हन ने काम ही करना बंद कर दिया है।"

"सबका यही हाल है मित्र।" पिता जी ने कहा____"हमें लगता है कि इस बारे में ठंडे दिमाग़ से ही कुछ सोचा जा सकेगा। फिलहाल हमें ये सोचना है कि इस वक्त क्या करना चाहिए?"

"अभी तो चंद्रकांत की बहू के मृत शरीर को शमशान में ले जा कर उसका अंतिम संस्कार किया जाना चाहिए।" महेंद्र सिंह ने कहा____"ज़ाहिर है उसका अंतिम संस्कार अब चंद्रकांत ही करेगा। लाश जब तक यहां रहेगी तब तक घर की औरतों का रोना धोना लगा ही रहेगा। इस लिए बेहतर यही है कि लाश को यहां से शमशान भेजने की व्यवस्था की जाए।"

पिता जी भी महेंद्र सिंह की इस बात से सहमत थे इस लिए भीड़ में खड़े गांव वालों को बताया गया कि अभी फिलहाल अंतिम संस्कार की क्रिया की जाएगी, उसके बाद ही इस मामले में कोई फ़ैसला किया जाएगा। पिता जी के कहने पर गांव के कुछ लोग और कुछ औरतें चंद्रकांत के घर के अंदर गए। कुछ ही देर में लकड़ी की खाट पर रजनी की लाश को लिए कुछ लोग बाहर आ गए। महेंद्र सिंह के साथ पिता जी ने भी आगे बढ़ कर रजनी की लाश का मुआयना किया। उनके पीछे गौरी शंकर भी था। इधर मैं और रूपचन्द्र भी रजनी की लाश को देखने की उत्सुकता से आगे बढ़ चले थे।

रजनी की खून से लथपथ पड़ी लाश को देख कर एकदम से रूह थर्रा ग‌ई। बड़ी ही वीभत्स नज़र आ रही थी वो। चंद्रकांत ने वाकई में उसकी बड़ी बेरहमी से हत्या की थी। रजनी के पेट और सीने में बड़े गहरे ज़ख्म थे जहां से खून बहा था। उसके हाथों पर भी तलवार के गहरे चीरे लगे हुए थे और फिर सबसे भयानक था उसके गले का दृश्य। आधे से ज़्यादा गला कटा हुआ था। दूर से ही उसकी गर्दन एक तरफ को लुढ़की हुई नज़र आ रही थी। चेहरे पर दर्द और दहशत के भाव थे।

रजनी की भयानक लाश देख कर उबकाई सी आने लगी थी। रूपचंद्र जल्दी ही पीछे हट गया था। इधर गांव के लोग लाश को देखने के लिए मानों पागल हुए जा रहे थे किंतु हमारे आदमियों की वजह से कोई चंद्रकांत की चौगान के अंदर नहीं आ पा रहा था। कुछ देर बाद पिता जी और महेंद्र सिंह लाश से दूर हो गए। महेंद्र सिंह ने उन लोगों को इशारे से लाश को शमशान ले जाने को कह दिया।

क़रीब एक घंटे बाद शमशान में चंद्रकांत अपनी बहू की चिता को आग दे रहा था। पहले तो वो इसके लिए मान ही नहीं रहा था किंतु जब महेंद्र सिंह ने सख़्त भाव से समझाया तो उसे ये सब करना ही पड़ा। रजनी के मायके वाले भी आ ग‌ए थे जो रजनी की इस तरह हुई मौत से दहाड़ें मार कर रोए थे।

इधर चंद्रकान्त के चेहरे पर आश्चर्यजनक रूप से कोई दुख के भाव नहीं थे, बल्कि उसका चेहरा पत्थर की तरह सख़्त ही नज़र आ रहा था। सारा गांव चंद्रकांत के खेतों पर मौजूद था। चंद्रकांत की बीवी प्रभा और बेटी कोमल ढेर सारी औरतों से घिरी बैठी थीं। दोनों के चेहरे दुख और संताप से डूबे हुए थे।

रजनी का दाह संस्कार कर दिया गया। लोग धीरे धीरे वहां से जाने लगे। बाकी की क्रियाओं के लिए चंद्रकांत के कुछ चाहने वाले उसके साथ थे। महेंद्र सिंह के कहने पर पिता जी ने अपने कुछ आदमियों को गुप्त रूप से चंद्रकांत और उसके घर पर नज़र रखने के लिए लगा दिया था।

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पिता जी के आग्रह पर महेंद्र सिंह अपने छोटे भाई और बाकी लोगों के साथ हवेली आ गए थे। रूपचंद्र तो अपने घर चला गया था किंतु गौरी शंकर पिता जी के पीछे पीछे हमारी हवेली ही आ गया था। रजनी के अंतिम संस्कार के बाद जब हम सब हवेली पहुंचे थे तो लगभग दोपहर हो गई थी। अतः पिता जी के आदेश पर सबके लिए भोजन की जल्द ही व्यवस्था की गई। भोजन बनने के बाद सब लोगों ने साथ में ही भोजन किया और फिर सब बैठक में आ गए।

"क्या लगता है ठाकुर साहब आपको?" बैठक में एक कुर्सी पर बैठे महेंद्र सिंह ने पिता जी से मुखातिब हो कर कहा____"चंद्रकांत जिसे फ़रिश्ता बता रहा था वो कौन हो सकता है? इतना ही नहीं उसे कैसे पता था कि चंद्रकांत के बेटे का हत्यारा कोई और नहीं बल्कि उसकी बहू ही है?"

"इस बारे में तो बेहतर तरीके से चंद्रकांत ही बता सकता है मित्र।" पिता जी ने कहा____"मगर हम तो यही कहेंगे कि इस मामले में कोई न कोई भारी लोचा ज़रूर है।"

"कैसा लोचा?" महेंद्र सिंह के साथ साथ सभी के चेहरों पर चौंकने के भाव उभर आए, जबकि महेंद्र सिंह ने आगे कहा____"बात कुछ समझ नहीं आई आपकी?"

"पक्के तौर पर तो हम भी कुछ कह नहीं सकते मित्र।" पिता जी ने कहा____"किंतु जाने क्यों हमें ऐसा आभास हो रहा है कि चंद्रकांत ने कदाचित बहुत बड़ी ग़लतफहमी के चलते अपनी बहू को मार डाला है।"

"यानि आप ये कहना चाहते हैं कि चंद्रकांत जिसे अपना फ़रिश्ता बता रहा था उसने उसको ग़लत जानकारी दी?" महेंद्र सिंह ने हैरत से देखते हुए कहा____"और चंद्रकांत क्योंकि अपने बेटे के हत्यारे का पता लगाने के लिए पगलाया हुआ था इस लिए उसने उसके द्वारा पता चलते ही बिना कुछ सोचे समझे अपनी बहू को मार डाला?"

"बिल्कुल, हमें यही आभास हो रहा है।" पिता जी ने मजबूती से सिर हिलाते हुए कहा____"और अगर ये सच है तो यकीन मानिए किसी अज्ञात व्यक्ति ने बहुत ही ज़बरदस्त तरीके से चंद्रकांत के हाथों उसकी अपनी ही बहू की हत्या करवा दी है। आश्चर्य की बात ये भी कि चंद्रकांत को इस बात का लेश मात्र भी एहसास नहीं हो सका।"

"आख़िर किसने ऐसा गज़बनाक कांड चंद्रकांत के हाथों करवाया हो सकता है?" गौरी शंकर सवाल करने से खुद को रोक न सका____"और भला चंद्रकांत के अंदर ये कैसा पागलपन सवार था कि उसने एक अज्ञात व्यक्ति के कहने पर ये मान लिया कि उसकी बहू ने अपने ही पति की हत्या की है?"

"बात में काफी दम है।" महेंद्र सिंह ने सिर हिलाते हुए कहा____"यकीनन ये हैरतअंगेज बात है। जिसने भी चंद्रकांत के हाथों ये सब करवाया है वो कोई मामूली इंसान नहीं हो सकता।"

"बात तो ठीक है आपकी।" पिता जी ने कहा____"लेकिन हमें ये नहीं भूलना चाहिए कि इस वक्त हम सब इस मामले में सिर्फ अपने अपने कयास ही लगा रहे हैं। सच का पता तो चंद्रकांत से पूछताछ करने पर ही चलेगा। हो सकता है कि जिस बात को हम सब हजम नहीं कर पा रहे हैं वास्तव में वही सच हों।"

"क्या आप ये कहना चाहते हैं कि चंद्रकांत के बेटे की हत्या उसकी बहू ने ही की रही होगी?" महेंद्र सिंह ने हैरानी से देखते हुए कहा____"और जब चंद्रकांत को किसी अज्ञात व्यक्ति के द्वारा इसका पता चला तो उसने गुस्से में आ बबूला हो कर अपनी बहू को मार डाला?"

"बेशक ऐसा भी हो सकता है।" पिता जी ने कहा____"हमारे मामले के बाद आपको भी इस बात का पता हो ही गया है कि चंद्रकांत की बीवी और उसकी बहू का चरित्र कैसा था। बेशक उनके साथ हमारे बेटे का नाम जुड़ा था लेकिन सोचने वाली बात है कि ऐसी चरित्र की औरतों का संबंध क्या सिर्फ एक दो ही मर्दों तक सीमित रहा होगा?"

"आख़िर आप कहना क्या चाहते हैं ठाकुर साहब?" महेंद्र सिंह ने पूछा।

"हम सिर्फ चरित्र के आधार पर किसी चीज़ की संभावना पर प्रकाश डालने का प्रयास कर रहे हैं।" पिता जी ने संतुलित भाव से कहा____"हो सकता है कि रघुवीर की बीवी का कोई ऐसा राज़ रहा हो जिसका रघुवीर के सामने फ़ाश हो जाने का रजनी को डर रहा हो। या फिर ऐसा हो सकता है कि किसी ऐसे व्यक्ति ने रजनी को अपने ही पति की हत्या करने के लिए मजबूर कर दिया जो रघुवीर का दुश्मन था। उस व्यक्ति को रजनी के नाजायज़ संबंधों का पता रहा होगा जिसके आधार पर उसने रजनी को अपने ही पति की हत्या कर देने पर मजबूर कर दिया होगा।"

"पता नहीं क्या सही है और क्या झूठ।" महेंद्र सिंह ने गहरी सांस ली____"पिछले कुछ महीनों में हमने इस गांव में जो कुछ देखा और सुना है उससे हम वाकई में चकित रह गए हैं। इससे पहले हमने सपने में भी नहीं सोचा था कि आपके इस गांव में तथा आपके राज में ये सब देखने सुनने को मिलेगा। उस मामले से अभी पूरी तरह निपट भी नहीं पाए थे कि अब ये कांड हो गया यहां। समझ में नहीं आ रहा कि आख़िर ये सब कब बंद होगा?"

"इस धरती में जब तक लोग रहेंगे तब तक कुछ न कुछ होता ही रहेगा मित्र।" पिता जी ने कहा____"ख़ैर, हमारा ख़याल है कि अब हमें चंद्रकांत के यहां चलना चाहिए। ये जानना बहुत ही ज़रूरी है कि चंद्रकांत जिसे अपना फ़रिश्ता कह रहा था वो कौन है और उसने चंद्रकांत से ये क्यों कहा कि उसके बेटे की हत्या करने वाला कोई और नहीं बल्कि उसकी ही बहू है? एक बात और, हमें पूरा यकीन है कि इतनी बड़ी बात को चंद्रकांत ने इतनी आसानी से स्वीकार नहीं कर लिया होगा। यकीनन अज्ञात व्यक्ति ने उसे कुछ ऐसा बताया रहा होगा जिसके चलते चंद्रकांत ने ये मान लिया होगा कि हां उसकी बहू ने ही उसके बेटे की हत्या की है।"

"सही कह रहे हैं आप?" महेंद्र सिंह ने सिर हिलाते हुए कहा____"अब हमें भी आभास होने लगा है कि ये मामला उतना सीधा नहीं है जितना नज़र आ रहा है। यकीनन कोई बड़ी बात है। ख़ैर चलिए चंद्रकांत के घर चलते हैं।"

कहने के साथ ही महेंद्र सिंह कुर्सी से उठ कर खड़े हो गए। उनके उठते ही बाकी सब भी उठ गए। कुछ ही देर में एक एक कर के सब बैठक से निकल कर हवेली से बाहर की तरह बढ़ गए। सबके पीछे पीछे मैं भी चल पड़ा। मुझे भी ये जानने की बड़ी उत्सुकता थी कि आख़िर ये सब हुआ कैसे और वो कौन है जिसे चंद्रकांत ने अपना फ़रिश्ता कहा था?​
 
अध्याय - 103
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"सही कह रहे हैं आप?" महेंद्र सिंह ने सिर हिलाते हुए कहा____"अब हमें भी आभास होने लगा है कि ये मामला उतना सीधा नहीं है जितना नज़र आ रहा है। यकीनन कोई बड़ी बात है। ख़ैर चलिए चंद्रकांत के घर चलते हैं।"

कहने के साथ ही महेंद्र सिंह कुर्सी से उठ कर खड़े हो गए। उनके उठते ही बाकी सब भी उठ गए। कुछ ही देर में एक एक कर के सब बैठक से निकल कर हवेली से बाहर की तरह बढ़ गए। सबके पीछे पीछे मैं भी चल पड़ा। मुझे भी ये जानने की बड़ी उत्सुकता थी कि आख़िर ये सब हुआ कैसे और वो कौन है जिसे चंद्रकांत ने अपना फ़रिश्ता कहा था?

अब आगे....


चंद्रकांत और उसके बेटे के ससुराल वाले पहले ही आ गए थे जिसके चलते काफी रोना धोना हुआ था उसके घर में। रघुवीर की ससुराल वाले तो आपे से बाहर भी हो ग‌ए थे जिसके चलते हंगामा होने वाला था मगर गांव वालों ने फ़ौरन ही सब सम्भाल लिया था।

हम सब जब वहां पहुंचे तो देखा कि गांव के कुछ बड़े बुजुर्ग लोग पहले से ही चंद्रकांत के घर में मौजूद थे। रघुवीर का साला और उसका ससुर बाहर ही एक तरफ गुमसुम से बैठे थे जबकि उनके साथ आई औरतें और लड़कियां घर के अंदर थीं। बहरहाल, पिता जी के साथ जब महेंद्र सिंह आदि लोगों का काफ़िला पहुंचा तो घर के बाहर ही सबके बैठने की व्यवस्था कर दी गई। आसमान में घने बादल छाए हुए थे जिसके चलते धूप नहीं थी और ठंडी हवाएं चल रहीं थी।

सब लोग बैठे हुए थे जबकि चंद्रकांत चेहरे पर अजीब सी सख़्ती धारण किए घर के बाहर दोनों तरफ बनी चबूतरेनुमा पट्टी पर बैठा था। वातावरण में अजीब सी ख़ामोशी छाई हुई थी। आगे की कार्यवाही अथवा पूछताछ के लिए महेंद्र सिंह ने औपचारिक रूप से सभी लोगों के सामने वार्तालाप शुरू किया और फिर मुद्दे की बात के लिए चंद्रकांत को अपने थोड़ा पास बुला लिया।

"हम उम्मीद करते हैं कि अब तुम्हारा दिलो दिमाग़ पहले से थोड़ा शांत और बेहतर हो गया होगा।" महेंद्र सिंह ने चंद्रकांत की तरफ देखते हुए कहा____"अतः अब हम ये उम्मीद करते हैं कि हम जो कुछ भी तुमसे पूछेंगे उसका तुम सही सही जवाब दोगे।"

कुछ घंटे लोगों के बीच रहने के चलते कदाचित चंद्रकांत की मनोदसा में थोड़ा परिवर्तन आ गया था। इस लिए महेंद्र सिंह की बात सुन कर उसने ख़ामोशी से ही हां में सिर हिला दिया था।

"बहुत बढ़िया।" महेंद्र सिंह ने कहा___"हमारा सबसे पहला सवाल ये है कि वो कौन था जिसने तुम्हें ये बताया कि तुम्हारे बेटे की हत्या किसी और ने नहीं बल्कि तुम्हारी अपनी ही बहू ने की थी?"

"कल रात की बात है।" चंद्रकांत ने सपाट लहजे से कहा____"शायद उस वक्त रात के बारह बजे रहे होंगे। मैं पेशाब करने के लिए घर से बाहर निकला था। पेशाब कर के वापस घर के अंदर जाने ही लगा था कि तभी अजीब सी आहट हुई जिसके चलते मैं रुक गया। पहले मुझे लगा कि शायद ये मेरा वहम है इस लिए ध्यान न दे कर मैंने फिर से अपने क़दम आगे बढ़ाए मगर तभी आहट फिर से हुई। इस बार की आहट से मैं समझ गया कि इसके पहले मुझे कोई वहम नहीं हुआ था। ख़ैर मैं ये देखने के लिए इधर उधर निगाह डालने लगा कि रात के इस वक्त आख़िर किस चीज़ से आहट हो रही है? मुझे याद आया कि ऐसी ही एक रात मेरे बेटे की किसी ने हत्या कर दी थी। मुझे एकदम से लगा जैसे उस वक्त भी वो हत्यारा मेरे आस पास मौजूद है। अंधेरा था इस लिए स्पष्ट कुछ दिख नहीं रहा था लेकिन जल्दी ही मेरी निगाह नीम अंधेरे में एक जगह खड़े एक साए पर पड़ गई।"

"साए पर??" महेंद्र सिंह पूछे बगैर न रह सके थे____"किसका साया था वो?"

"एक ऐसे रहस्यमय व्यक्ति का जिसके बारे में इसके पहले दादा ठाकुर ज़िक्र कर चुके थे।" चंद्रकांत ने पिता जी की तरफ देखते हुए कहा____"हां ठाकुर साहब, वो कोई और नहीं बल्कि वही सफ़ेदपोश व्यक्ति था जिसके बारे में आपने मुझसे और गौरी शंकर जी से पूछा था।"

चंद्रकांत की ये बात सुन कर पिता जी के साथ साथ बाकी सब लोग भी बुरी तरह चौंक पड़े थे। हैरत में डूबा चेहरा लिए सब एक दूसरे की तरफ देखने लगे थे। इधर मेरा भी वही हाल था। मैं भी सोच में पड़ गया था कि साला अब ये क्या चक्कर है? इतने समय से सफ़ेदपोश का कहीं कोई अता पता नहीं था और अब इस तरह से उसका पता चल रहा था। मैं सोचने पर मजबूर हो गया कि चंद्रकांत के इस मामले में सफ़ेदपोश कहां से और कैसे आ गया?

"ये तुम क्या कह रहे हो चंद्रकांत?" पिता जी पूछने से खुद को रोक न सके____"पिछली रात तुमने जिस साए को देखा क्या वो सच में सफ़ेदपोश था? कहीं तुम्हें कोई वहम तो नहीं हुआ था?"

"वहम का सवाल ही नहीं उठता ठाकुर साहब।" चंद्रकांत ने पूरी मजबूती से कहा____"क्योंकि मैंने उसे बहुत क़रीब से और अपनी आंखों से देखा था। इतना ही नहीं काफी देर तक मेरी उससे बातें भी हुईं थी। वो वही था जिसके समूचे बदन पर सफ़ेद लिबास था।"

"बड़े आश्चर्य की बात है ये।" पिता जी बरबस ही कह उठे____"इतने समय से हम उस सफ़ेदपोश को तलाश कर रहे हैं किंतु उसका कहीं कोई सुराग़ नहीं मिल सका और तुम कह रहे हो कि तुमने उसे देखा है? उससे बातें भी की हैं?"

"यही सच है ठाकुर साहब।" चंद्रकांत ने दृढ़ता से कहा____"उसी ने मुझे बताया कि मेरे बेटे का हत्यारा मेरी अपनी ही बहू थी।"

"और उसके कहने से तुमने मान लिया?" महेंद्र सिंह ने हैरत से उसे देखा____"बड़े आश्चर्य की बात है कि तुमने एक ऐसे व्यक्ति की बात मान ली जो जाने कब से खुद को सबसे छुपाए फिर रहा है। इतना ही नहीं जो ठाकुर साहब के बेटे वैभव की जान का दुश्मन भी बना हुआ है। हमें बिल्कुल भी इस बात का यकीन नहीं हो रहा कि तुमने ऐसे व्यक्ति के कहने पर अपनी बहू को अपने बेटे की हत्यारिन मान लिया और फिर बदले की भावना के चलते उसे मार भी डाला।"

"बिल्कुल, हमारा भी यही कहना है।" पिता जी ने कहा____"लेकिन हम ये भी समझते हैं कि तुमने उस सफ़ेदपोश के कहने बस से ही अपनी बहू को हत्यारिन नहीं मान लिया होगा। यकीनन उसने तुम्हें कोई ऐसी वजह भी बताई होगी जिसके बाद तुम्हें अपनी बहू के हत्यारिन होने पर यकीन आ गया होगा। हम सब भी ये जानना चाहते हैं कि सफ़ेदपोश ने तुम्हें ऐसा क्या बताया था?"

"मैं हर बात किसी को बताना ज़रूरी नहीं समझता।" चंद्रकांत ने सख़्ती से जबड़े भींच कर कहा____"ये मेरा पारिवारिक और बेहद निजी मामला है।"

"जब किसी औरत को बेरहमी से मार डाला जाए तो मामला पारिवारिक अथवा निजी नहीं रह जाता चंद्रकांत।" महेंद्र सिंह ने कठोर भाव से कहा____"तुमने अपनी बहू को बेरहमी से मार डाला है, इस लिए अब तुम्हें बताना ही होगा कि इसके पीछे की असल वजह क्या है? परिवार का मामला चाहे जैसा भी हो लेकिन किसी की हत्या कर देने का हक़ किसी को भी नहीं है। तुमने अपनी बहू की हत्या की है और इस अपराध के लिए तुम्हें सज़ा भी मिलेगी।"

"हां तो दे दीजिए मुझे सज़ा।" चंद्रकांत पागलों की तरह चीख पड़ा____"चढ़ा दीजिए मुझे सूली पर। मेरे मर जाने से कम से कम दादा ठाकुर के कलेजे को शांति तो मिल जाएगी।"

"मादरचोद, क्या बोला तूने?" चंद्रकांत की बात से मुझे इतना गुस्सा आया कि मैं गुस्से में आग बबूला हो कर पलक झपकते ही उसके क़रीब पहुंच गया।

इससे पहले कि कोई कुछ कर पाता मैंने उसका गिरेबान पकड़ कर उठा लिया और फिर गुर्राते हुए कहा____"तू कौन सा दूध का धुला है जो हर बात में तू मेरे बाप पर उंगली कर के तंज़ कसने लगता है? तेरी सच्चाई ये है कि तू एक नामर्द है और तेरा बेटा तुझसे भी बड़ा नामर्द था। तेरे घर की औरतें तेरे सामने दूसरे मर्दों के साथ अपनी हवस मिटाती थीं और तुम दोनों बाप बेटे अपने उबलते खून को पानी से ठंडा करते थे।"

"ये क्या हिमाकत है??" पिता जी गुस्से से दहाड़ उठे।

उनके साथ साथ बाकी सब भी उछल कर खड़े हो गए थे। महेंद्र सिंह का छोटा भाई ज्ञानेंद्र सिंह लपक कर मेरे पास आया और मुझे पकड़ कर अपनी तरफ खींचने लगा मगर मैंने झटक दिया उसे। इस वक्त बड़ा तेज़ गुस्सा आया हुआ था मुझे। मेरे झटक देने पर ज्ञानेंद्र झोंक में पीछे जा कर गिरते गिरते बचा। इधर चंद्रकांत चेहरे पर दहशत के भाव लिए चिल्लाने लगा था। ज्ञानेंद्र सम्हल कर फिर से मुझे छुड़ाने के लिए मेरे क़रीब आया और इस बार वो मुझे पूरी ताक़त से खींच कर चंद्रकांत से दूर ले गया।

"तुम दोनो बाप बेटे जैसा हिजड़ा इस पूरी दुनिया में कहीं नहीं होगा।" मैं गुस्से चीखते हुए बोला____"साले नामर्द, अपनी औरतों को तो बस में कर नहीं सका और मर्द बनता है बेटीचोद।"

"तुम्हें इस हिमाकत की सख़्त से सख़्त सज़ा दी जाएगी।" पिता जी ने मेरी तरफ देखते हुए बेहद गुस्से में कहा____"इसी वक्त चले जाओ यहां से वरना हमसे बुरा कोई नहीं होगा।"

"बेशक सज़ा दे दीजिएगा पिता जी।" मैंने गुस्से से भभकते हुए खुद को एक झटके में ज्ञानेंद्र से छुड़ाया, फिर बोला____"लेकिन इस मादरचोद ने अगर दुबारा फिर से किसी बात पर आपकी तरफ उंगली उठाई तो इसकी ज़ुबान हलक से निकाल कर इसके हाथ में दे दूंगा।"

शोर शराबा सुन कर घर के अंदर से औरतें भाग कर बाहर आ गईं थी। बाहर मौजूद लोग भी तितर बितर हो कर दूर हट गए थे। सभी के चेहरों पर ख़ौफ के भाव उभर आए थे। उधर चंद्रकांत सहम कर घर के बाहर दोनों तरफ बनी पट्टी पर बैठ गया था। जूड़ी के मरीज़ की तरह थर थर कांपे जा रहा था वो।

"हमने कहा चले जाओ यहां से।" पिता जी इस बार गुस्से में दहाड़ ही उठे। पिता जी का गुस्सा देख महेंद्र सिंह ने अपने भाई को इशारा किया तो वो मुझे ले कर अपनी जीप की तरफ बढ़ चला।

"मुझे तुमसे ऐसी बेहूदा हरकत की बिल्कुल भी उम्मीद नहीं थी वैभव।" रास्ते में ज्ञानेंद्र सिंह ने गंभीरता से मेरी तरफ देखते हुए कहा____"सबके सामने तुम्हें ऐसे गंदे शब्दों का प्रयोग नहीं करना चाहिए था और ना ही उसे गालियां देनी चाहिए थी।"

"और उसे सबके सामने मेरे पिता पर तंज कसना चाहिए था, है ना?" मैंने तीखे भाव से ज्ञानेंद्र की तरफ देखा।

"तुम उस व्यक्ति के स्वभाव से अच्छी तरह परिचित हो।" ज्ञानेंद्र ने कहा____"पिछले कुछ समय में यहां जो कुछ हुआ है उससे हम सब भी इतना समझ चुके हैं कि कौन कैसा है। एक बात हमेशा याद रखो कि कीचड़ में अगर पत्थर मारोगे तो वो कीचड़ उल्टा तुम्हें ही गंदा करेगा, जबकि उसका कुछ नहीं बिगड़ेगा। चंद्रकांत की दशा कीचड़ जैसी ही है।"

"मैं काफी समय से उसको बर्दास्त करता आ रहा था चाचू।" मैंने खीझते हुए कहा____"लेकिन आज सबके सामने जब उसने फिर से पिता जी पर तंज कसा तो मैं बर्दास्त नहीं कर सका। एक तो मादरचोद ने खुद अपनी ही बहू को मार डाला और ऊपर से अभी भी खुद को साधू महात्मा दर्शाने की कोशिश कर रहा है।"

"मूर्ख लोग ऐसे ही होते हैं वैभव।" ज्ञानेंद्र सिंह ने कहा____"समझदार लोग मूर्खों की बातों पर ध्यान नहीं देते। जैसे तुम्हारे पिता जी उसकी बातों को सुन कर धैर्य धारण किए रहते हैं वैसे ही तुम्हें भी करना चाहिए था।"

अब तक मेरा गुस्सा काफी हद तक ठंडा हो गया था इस लिए ज्ञानेंद्र सिंह की बातें अब मेरे ज़हन में आसानी से घुस रहीं थी। मुझे एहसास होने लगा था कि वाकई में मुझसे ग़लती हो गई है। मुझे सबके सामने इस तरह का तमाशा नहीं करना चाहिए था।

"मैंने सुना है कि तुम पहले से अब काफी बदल गए हो।" ज्ञानेंद्र सिंह ने मुझे ख़ामोश देखा तो इस बार बड़ी शालीनता से कहा____"और एक अच्छे इंसान की तरह अपनी हर ज़िम्मेदारियां निभा रहे हो। एक वक्त था जब हम लोग दादा ठाकुर के सामने तुम्हारा ज़िक्र करते थे तो अक्सर उनका चेहरा मायूस हो जाया करता था किंतु पिछले कुछ समय से हमने यही देखा है कि तुम्हारा ज़िक्र होने पर उनके चेहरे पर खुशी और गर्व के भाव आ जाते हैं। अगर एक पिता अपने बेटे के लिए खुशी और गर्व महसूस करने लगे तो इसका मतलब ये होता है कि उन्हें दुनिया की हर खुशी मिल चुकी है। यानि अब उन्हें किसी चीज़ की हसरत नहीं है। ख़ैर, मैं रिश्ते में तुम्हारा चाचू हूं लेकिन तुम मुझे अपना दोस्त भी मान सकते हो। एक दोस्त के नाते मैं तुमसे यही कहूंगा कि इतना कुछ होने के बाद अब तुम ही दादा ठाकुर की एक मात्र उम्मीद हो। तुम भले ही उनके बेटे हो लेकिन तुमसे कहीं ज़्यादा उनके बारे में हम जानते हैं। हमने बचपन से दादा ठाकुर को लोगों की खुशी के लिए संघर्ष करते देखा है। मेरे भैया हमेशा मुझसे कहा करते हैं कि मैं दादा ठाकुर की तरह बनूं और हमेशा उनके नक्शे क़दम पर चलूं। ज़ाहिर है मेरे भैया भी समझते हैं कि दादा ठाकुर कितने महान इंसान हैं। हम सब उनके नक्शे क़दम पर चलने की कोशिश भले ही करते हैं लेकिन उनके जैसा बनना बिल्कुल भी आसान नहीं है। फिर भी इतना तो कर ही सकते हैं कि हमारे आचरण से किसी का अहित न हो बल्कि सबका भला ही हो।"

"मैं समझ गया चाचू कि आप क्या कहना चाहते हैं।" मैंने अधीरता से कहा____"यकीन कीजिए मैं भी अब ऐसा ही इंसान बनने की कोशिश कर रहा हूं। मुझे एहसास है कि मैंने इसके पहले बहुत ग़लत कर्म किए थे जिसके चलते मेरे खानदान का नाम ख़राब हुआ और पिता जी को हमेशा मेरी वजह से शर्मिंदगी उठानी पड़ी थी। अब सब कुछ भुला कर यही कोशिश कर रहा हूं कि मुझसे ग़लती से भी कोई ग़लत काम न हो।"

"बहुत बढ़िया।" ज्ञानेंद्र सिंह ने हल्के से मुस्कुराते हुए कहा____"और हां अपने गुस्से पर भी लगाम लगाए रखा करो। तुम्हारा गुस्सा दूर दूर तक मशहूर है। लोग तुम्हारे गुस्से से बहुत डरते हैं। इस लिए इस पर लगाम लगा के रखो।"

"कोशिश कर रहा हूं चाचू।" मैंने झेंपते हुए कहा____"मैंने काफी समय से किसी पर गुस्सा नहीं किया और ना ही किसी को बुरा भला कहा है। आज भी मैं गुस्सा ना होता अगर चंद्रकांत मेरे पिता जी पर तंज न कसता।"

"ख़ैर छोड़ो इस बात को।" ज्ञानेंद्र सिंह ने कहा____"देखो, हम हवेली पहुंच गए हैं। तुम जाओ आराम करो, मैं अब वापस जाऊंगा।"

हवेली के हाथी दरवाज़े के पास जीप रुकी तो मैं उतर गया। ज्ञानेंद्र सिंह ने जीप को वापस मोड़ा और फिर मेरी तरफ देखते हुए कहा____"मुझे पता है कि तुम हर जगह मशहूर हो लेकिन फिर भी एक नई पहचान के लिए लोगों से मिलना मिलाना बेहद ज़रूरी होता है। कभी समय निकाल कर आओ हमारे यहां।"

"बिल्कुल चाचू।" मैंने मुस्कुराते हुए कहा___"मैं ज़रूर आऊंगा। आख़िर अब आप मेरे चाचू के साथ साथ दोस्त भी तो बन गए हैं।"

मेरी बात सुन कर ज्ञानेंद्र सिंह हल्के से हंसा और फिर जीप को आगे बढ़ा कर चला गया। उसके जाने के बाद मैं भी हवेली की तरफ पैदल चल पड़ा। ज्ञानेंद्र सिंह मुझे एक अच्छा इंसान प्रतीत हुआ था। वो विवाहित था किन्तु उम्र ज़्यादा नहीं हुई थी उसकी। शरीर काफी फिट था जिसके चलते उसकी उमर का पता नहीं चलता था। ख़ैर उसके बारे में सोचते हुए मैं कुछ ही देर में हवेली के अंदर दाखिल हो गया।

✮✮✮✮

मेरी वजह से जो हंगामा हुआ था उसे जल्द ही सम्हाल लिया गया था और अब सब कुछ ठीक था। पिता जी के चेहरे पर अभी भी नाराज़गी दिख रही थी। ज़ाहिर है मेरी वजह से उन्हें एक बार फिर से शर्मिंदगी हुई थी। किसी को भी मुझसे ऐसी हरकत की उम्मीद नहीं थी। ख़ैर जो होना था वो हो चुका था। महेंद्र सिंह ने चंद्रकांत को फिर से अपने सामने बुला लिया था। इस वक्त वो अजीब सा चेहरा लिए खड़ा था।

"ठाकुर साहब को बचपन से जानते हुए भी तुम इनके बारे में ऐसे ख़याल रखते हो जोकि हैरत की बात है।" महेंद्र सिंह ने उसकी तरफ देखते हुए कहा____"तुम्हारा जो भी मामला था उसे तुम दूसरे तरीके से भी बहुत अच्छी तरह सुलझा सकते थे। दूसरी बात ये भी है कि ग़लती सिर्फ ठाकुर साहब के बेटे की ही बस नहीं थी बल्कि तुम्हारे घर की औरतों की भी थी। तुमने अपने घर की औरतों को कुछ नहीं कहा और ना ही उनके ग़लत कर्मों के लिए उन्हें धिक्कारा। इसके बदले तुमने वो किया जो किसी भी हालत में नहीं करना चाहिए था। अगर तुम्हें पता चल ही गया था कि तुम्हारे घर के मामले में वैभव भी शामिल है तो तुम्हें सीधा ठाकुर साहब से इस बारे में बात करनी चाहिए थी। इसके बाद भी अगर कोई हल न निकलता तो तुम्हारा ऐसा क़दम उठाना जायज़ कहलाता लेकिन नहीं, तुमने वो किया जिसके चलते ना जाने कितने लोगों की जानें चली गईं।"

चंद्रकांत अपराध बोझ से सिर झुकाए खड़ा रहा। उससे कुछ बोला नहीं जा रहा था। चौगान में बैठे लोग सांसें रोके महेंद्र सिंह की बातें सुन रहे थे और साथ ही समझने की कोशिश कर रहे थे कि किसकी कहां ग़लती रही है?

"ख़ैर जो हो गया उसे तो अब लौटाया नहीं जा सकता।" महेंद्र सिंह ने गहरी सांस ली____"लेकिन ये जो तुमने किया है उसके लिए तुम्हें कोई माफ़ी नहीं मिल सकती। किंतु उससे पहले हम तुमसे ये जानना चाहते हैं कि सफ़ेदपोश ने तुम्हारी बहू के बारे में ऐसा क्या बताया था जिससे तुमने ये मान लिया कि तुम्हारी बहू ने ही रघुवीर की हत्या की है?"

"उसने मुझे बताया था कि मेरी बहू रजनी ने हाल ही में एक नए व्यक्ति से संबंध बना लिया था।" चंद्रकांत ने जबड़े भींच कर कहा____"वो व्यक्ति रजनी को हमेशा के लिए अपनी बना कर ले जाना चाहता था। रजनी भी इसके लिए तैयार थी। उस रात रजनी अपने उस नए आशिक़ के साथ भाग ही रही थी। उसने जब देखा कि मेरा बेटा गहरी नींद में सोया हुआ है तो वो चुपके से अपना ज़रूरी समान ले कर घर से बाहर निकल आई थी। घर के बाहर उसका आशिक़ पहले से ही उसका इंतज़ार कर रहा था। रजनी को बिल्कुल भी अंदेशा नहीं था कि ऐन वक्त पर मेरा बेटा उसके पीछे पीछे आ जाएगा। असल में मेरे बेटे को रात में पेशाब करने के लिए दो तीन बार बाहर जाना पड़ता था। उस रात भी वो पेशाब करने के लिए ही बाहर निकला था। कमरे में रजनी को न देख कर वो चौंका ज़रूर था किंतु उसने यही सोचा था कि शायद रजनी भी उसकी तरह बाहर लघुशंका करने गई होगी। ख़ैर जब मेरा बेटा बाहर आया तो उसने देखा कि उसकी बीवी अंधेरे में किसी के पास खड़ी थी और धीमी आवाज़ में बातें कर रही थी। रघुवीर फ़ौरन ही उसके क़रीब पहुंचा तो वो दोनों मेरे बेटे को देख कर बुरी तरह डर गए। इधर मेरा बेटा भी अपनी बीवी को रात के उस वक्त किसी गैर मर्द के साथ देख कर उछल पड़ा था। उसे समझने में देर न लगी कि रजनी अंधेरे में अपने आशिक़ के साथ क्या कर रही थी। मेरे बेटे को इतना गुस्सा आया कि उसने पहले तो रजनी को ज़ोर का धक्का दे कर दूर धकेला और फिर उसके आशिक़ को मारने लगा। रजनी इस सबसे बहुत ज़्यादा घबरा गई। उसे लगा कहीं बात ज़्यादा न बढ़ जाए और लोगों को पता न चल जाए। उधर मेरा बेटा उसके आशिक़ की धुनाई करने में लगा हुआ था। रजनी को कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करे? तभी उसकी नज़र वहीं कुछ ही दूरी पर पड़ी कुल्हाड़ी पर पड़ी। उसने झट से उस कुल्हाड़ी को उठा लिया और रघुवीर के क़रीब आ कर उसे धमकाया कि वो उसके आशिक़ को छोड़ दे वरना वो उस कुल्हाड़ी से उसका खून कर देगी। रघुवीर को लगा था कि रजनी सिर्फ उसे धमका रही है इस लिए उसने उसे गंदी गाली दे कर फिर से धक्का दे दिया और उसके आशिक़ को मारने लगा। अब तक इस सबके चलते थोड़ा शोर होने लगा था जिससे रजनी और भी ज़्यादा घबरा उठी थी। वो क्योंकि अपने आशिक़ के साथ नई दुनिया बसा लेना चाहती थी इस लिए उसने समय न ख़राब करते हुए आगे बढ़ कर मेरे बेटे पर उस कुल्हाड़ी से वार कर दिया। कुल्हाड़ी का वार सीधा रघुवीर की गर्दन पर लग गया। ऐसा इत्तेफ़ाक से ही हुआ था। रजनी को भी ऐसी उम्मीद नहीं थी। रघुवीर लहरा कर वहीं ज़मीन पर गिर गया और दर्द से तड़पने लगा। कुछ ही देर में उसका जिस्म एकदम से शांत पड़ गया। मेरा बेटा मर चुका था। जब रजनी और उसके आशिक़ को इस बात का आभास हुआ तो दोनों ही सन्न रह गए। रजनी का आशिक़ मेरे बेटे के इस तरह मर जाने से इतना डर गया कि वो वहां से फ़ौरन ही भाग गया। इधर रजनी की भी हालत ख़राब हो गई थी। उसने अपने जाते हुए आशिक़ को पुकारना चाहा मगर किसी के सुन लेने के डर से वो उसे पुकार ना सकी किंतु इतना उसे ज़रूर समझ आ गया था कि उसके आशिक़ ने उसे ऐसे वक्त पर धोखा दे दिया है। रजनी से वो हो गया था जिसे उसने ख़्वाब में भी नहीं सोचा था। काफी देर तक वो मेरे बेटे की लाश के पास बैठी रोती रही। फिर जैसे ही उसे हालात की गंभीरता का एहसास हुआ तो वो सोचने लगी कि अब वो क्या करे? वो जानती थी कि उससे बहुत बड़ा कांड हो गया है और जब इस बात का पता घर वालों को चलेगा तो वो कोई जवाब नहीं दे पाएगी। उसने आनन फानन में खून से सनी उस कुल्हाड़ी को फेंका और फिर अपना हुलिया ठीक कर के घर के अंदर आ गई। अपने कमरे में आ कर वो सोचने लगी कि इस गंभीर मुसीबत से बचने के लिए वो क्या करे? सारी रात उसने सोचा लेकिन उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था। उसे अपने धोखेबाज आशिक़ पर भी बहुत गुस्सा आ रहा था। उसी की वजह से उसने इतना बड़ा क़दम उठाया था। तभी उसे रूपचंद्र का ख़याल आया। रूपचंद्र ने उसे पिछली शाम रास्ते में रोका था और उसके साथ ज़ोर ज़बरदस्ती की थी जिसके जवाब में रजनी ने उसे खरी खोटी सुनाई थी। रजनी ने जब इस बारे में सोचा तो उसे अपने बचाव के लिए तरीका सूझ गया। सुबह जब हम सबको इस बात का पता चला तो हम सब रोने धोने लगे। रजनी भी हमारी तरह रोने धोने लगी थी। कुछ देर बाद उसने रोते हुए वही सब कहना शुरू कर दिया जो रात में उसने सोचा था। उसकी बात सुन कर मैं भी उसके फेर में आ गया था और फिर आगे क्या हुआ ये सब आप जानते ही हैं।"

इतना सब कुछ बताने के बाद चंद्रकांत चुप हुआ तो वातावरण में सन्नाटा सा छा गया। पिता जी के साथ साथ महेंद्र सिंह और बाकी सब भी चकित भाव से उसकी तरफ देखे जा रहे थे।

"तो उस सफ़ेदपोश ने तुम्हें ये सब बताया था जिसके बाद तुम्हें भी यकीन हो गया कि तुम्हारे बेटे की हत्या तुम्हारी बहू ने ही की है?" महेंद्र सिंह ने कहा____"अगर वाकई में ये सच है तो ये बड़े ही आश्चर्य की बात है कि अब तक हम में से किसी को इस बारे में पता तक नहीं चल सका। वैसे तुमने उस सफ़ेदपोश से पूछा नहीं कि उसे ये सब बातें कैसे पता थीं? आख़िर इतनी गहरी राज़ की बातें उसे कैसे पता चलीं? तुम्हारी बातें सुन कर तो ऐसा प्रतीत हुआ जैसे सफ़ेदपोश ने अपनी आंखों देखा हाल ही बताया था तुम्हें। अगर यही सच है तो सवाल उठता है कि उसने इस सबको रोका क्यों नहीं? क्यों अपनी आंखों के सामने तुम्हारे बेटे की हत्या हो जाने दी?"

चंद्रकांत, महेंद्र सिंह की ये बात सुन कर बड़े अजीब भाव से देखने लगा उन्हें। चेहरे पर कई तरह के भाव उभरते हुए नज़र आने लगे थे। ऐसा प्रतीत हुआ जैसे वो बड़ी तेज़ी से कुछ सोचने समझने की कोशिश कर रहा हो।

"उस सफ़ेदपोश से और क्या बातें हुईं थी तुम्हारी?" दादा ठाकुर ने कुछ सोचते हुए चंद्रकांत से पूछा____"हमारा मतलब है कि उस सफ़ेदपोश ने तुम्हारे बेटे के हत्यारे के बारे में तुम्हें बताया तो बदले में क्या उसने तुमसे कुछ नहीं चाहा?"

"चाहा है।" चंद्रकांत बड़ी अजीब दुविधा लिए बोला____"कल रात उसने कहा था कि बदले में मुझे भी वही करना होगा जो वो करने को कहेगा मुझसे।"

"अच्छा।" महेंद्र सिंह ने कहा____"और क्या कहा था उसने?"

"यही कि आज रात वो किसी भी वक्त मुझसे मिलने आ सकता है।" चंद्रकांत ने कहा____"शायद अब वो मुझे कोई काम सौंपेगा जिसे मुझे करना होगा। उसने मुझे धमकी भी दी थी कि अगर मैं अपने वादे से मुकर गया तो ये मेरे और मेरे परिवार के लिए अच्छा नहीं होगा।"

"बहुत खूब।" महेंद्र सिंह बोल पड़े____"फिर तो तुम्हें उसके लिए तैयार रहना चाहिए, है ना?"

चंद्रकांत अजीब सा मुंह बनाए खड़ा रह गया। उसके चेहरे से ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे वो किसी द्वंद से जूझ रहा है।

"ठाकुर साहब क्या लगता है आपको?" महेंद्र सिंह सहसा दादा ठाकुर से मुखातिब हुए____"क्या आप भी वही सोच रहे हैं जो हम सोच रहे हैं?"

"हमें तो लगता है कि वो सफ़ेदपोश चंद्रकांत के साथ बड़ा ही हौलनाक खेल खेल गया है।" दादा ठाकुर ने कहा____"उसने चंद्रकांत को ऐसी कहानी सुनाई जिसे सच मान कर चंद्रकांत ने अपने हाथों अपनी ही बहू को बेटे की हत्यारिन मान कर मार डाला।"

"बिल्कुल सही कह रहे हैं आप।" महेंद्र सिंह ने कहा____"हमें भी यही लगता है। सफ़ेदपोश को चंद्रकांत की मनोदशा का भली भांति एहसास था जिसका उसने फ़ायदा उठाया और फिर उसने वो किया जो कोई सोच भी नहीं सकता था।"

"सोचने वाली बात है कि रघुवीर की हत्या हुए इतने दिन गुज़र गए हैं।" दादा ठाकुर ने कहा____"और अभी तक उस सफ़ेदपोश का कहीं अता पता नहीं था। अगर उसे चंद्रकांत से इतनी ही हमदर्दी थी तो उसने पहले ही चंद्रकांत के पास आ कर उसे ये क्यों नहीं बताया था कि उसके बेटे का हत्यारा कौन है? इतने दिनों तक किस बात का इंतज़ार कर रहा था वो? ख़ैर ये तो थी एक बात, दूसरी सोचने वाली बात ये है कि ये सब बताने के पीछे सफ़ेदपोश का मकसद क्या था? क्या ये कि अपने बेटे के हत्यारे के बारे में जान कर चंद्रकांत उसकी जान ही ले ले? अगर यही सच है तो फिर उसे चंद्रकांत का हमदर्द नहीं कहा जा सकता क्योंकि अपनी बहू की हत्या करने के बाद चंद्रकांत को कोई पुरस्कार तो नहीं मिलने वाला बल्कि सख़्त से सख़्त सज़ा ही मिलेगी।"

"सही कह रहे हैं आप।" महेंद्र सिंह ने सिर हिलाते हुए कहा____"चंद्रकांत ने जो किया है उसके लिए तो इसे यकीनन सज़ा ही मिलेगी लेकिन अभी ये भी देखना है कि आगे क्या होता है? हमारा मतलब है कि सफ़ेदपोश ने आज रात चंद्रकांत से मिलने को कहा है तो देखते हैं ऐसा होता है कि नहीं।"

चंद्रकांत सारी बातें सुन रहा था और अब उसके चेहरे पर ऐसे भाव थे जैसे अभी रो देगा। बड़ी मुश्किल से खुद को रोके हुए था वो। चौगान में बैठे बाकी लोग सतब्ध से बैठे बातें सुन रहे थे।

"अगर आज रात वो सफ़ेदपोश सचमुच चंद्रकांत से मिलने आएगा तो यही समझा जाएगा कि उसकी बातों में अथवा ये कहें कि उसकी कहानी में कहीं न कहीं सच्चाई थी।" महेंद्र सिंह ने गहरी सांस लेते हुए कहा____"और अगर वो नहीं आया तो स्पष्ट हो जाएगा कि वो चंद्रकांत के साथ बड़ा ही हैरतंगेज खेल खेल गया है।"

कहने के साथ ही महेंद्र सिंह चंद्रकांत से मुखातिब हुए____"आगे की कार्यवाही कल की जाएगी चंद्रकांत। आज रात हम भी ये देखना चाहते हैं कि तुम्हारा वो हमदर्द सफ़ेदपोश अपनी कसौटी पर कितना खरा उतरता है।"

"मुझे माफ़ कर दीजिए ठाकुर साहब।" महेंद्र सिंह कुर्सी से उठ कर अभी खड़े ही हुए थे कि तभी चंद्रकांत आर्तनाद सा करता हुआ उनके पैरों में लोट गया। ये देख उनके साथ साथ बाकी उपस्थित लोग भी चौंक पड़े। उधर चंद्रकांत रोते बिलखते हुए कहता चला गया____"मुझे माफ़ कर दीजिए। मुझे बड़ी शिद्दत से एहसास हो रहा है कि मुझसे बहुत बड़ा गुनाह हो गया है।"

"नहीं चंद्रकांत।" महेंद्र सिंह ने पीछे हटते हुए कहा____"तुमने जो किया है वो किसी भी सूरत में माफ़ी के लायक नहीं है। ख़ैर आज की कार्यवाही तो फिलहाल यहीं पर स्थगित कर दी गई है किंतु कल यहीं पर पंचायत लगेगी और इस मामले का फ़ैसला होगा। तब तक तुम भी देखो और हम भी देखते हैं कि तुम्हारा हमदर्द आज रात तुम्हारे लिए क्या सौगात ले कर आता है।"​
 
अध्याय - 104
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"नहीं चंद्रकांत।" महेंद्र सिंह ने पीछे हटते हुए कहा____"तुमने जो किया है वो किसी भी सूरत में माफ़ी के लायक नहीं है। ख़ैर आज की कार्यवाही तो फिलहाल यहीं पर स्थगित कर दी गई है किंतु कल यहीं पर पंचायत लगेगी और इस मामले का फ़ैसला होगा। तब तक तुम भी देखो और हम भी देखते हैं कि तुम्हारा हमदर्द आज रात तुम्हारे लिए क्या सौगात ले कर आता है।"


अब आगे....


हवेली के अंदर आया तो देखा मां और भाभी निर्मला काकी के पास बैठी बातें कर रहीं थी। उनकी बातों का मुद्दा वही था जो आज चंद्रकांत के यहां घटित हुआ था। मेनका चाची नहीं थीं वहां पर। मेरे मन में ख़याल उभरा कि चलो कुछ देर चाची के पास बैठा जाए। वैसे भी उनके दोनों बेटे इस हवेली से ही नहीं बल्कि इस देश से ही बाहर थे। मैं ये सब सोच कर जैसे ही चाची के कमरे की तरफ बढ़ा तो मेरी नज़र रसोई से बाहर निकलती कुसुम पर पड़ गई। उसके हाथ में ट्रे था जिसमें चाय के कप रखे हुए थे।

"अरे! भैया आप आ गए?" मुझे देखते ही कुसुम ने मुस्कुराते हुए कहा____"बिल्कुल सही समय पर आए हैं आप? लीजिए आप भी चाय पी लीजिए।"

"वाह! क्या बात है।" मैंने खुशी से मुस्कुराते हुए कहा____"बहन हो तो मेरी लाडली कुसुम जैसी जिसे हर वक्त अपने इस भाई का ही ख़याल रहता है। ला दे, मुझे सच में इस वक्त चाय की ही ज़रूरत थी।"

मेरी बात सुन कर कुसुम मुस्कुराते हुए मेरे पास आई और ट्रे लिए हाथों को मेरी तरफ बढ़ा दिया जिससे मैंने एक कप उठा लिया। मां, भाभी और निर्मला काकी भी हमारी बातें सुन कर मुस्कुरा उठीं थी। मुझे चाय देने के बाद कुसुम ने उन्हें भी दिया और फिर वो ट्रे ले कर अपनी मां के कमरे की तरफ जाने लगी तो मैंने उसे रोक लिया।

"अरे! तू बैठ कर चाय पी।" मैंने उसकी तरफ बढ़ते हुए कहा____"और ये ट्रे मुझे दे। मैं अपनी प्यारी चाची से मिलने ही जा रहा हूं। आज अपने हाथों से उन्हें चाय भी से दूंगा।"

मेरी बात सुन कर कुसुम ने पहले तो हैरानी से मेरी तरफ देखा और फिर खुशी से ट्रे मुझे पकड़ा दिया। मैं जानता था कि मेरे इस कार्य से बाकी सब भी हैरान हुए थे क्योंकि आज से पहले ऐसे काम मैंने कभी नहीं किए थे। जब मैं अपना कप उस ट्रे में रख कर ट्रे को ले कर जाने लगा तो मां ने पीछे से कहा____"कुसुम ज़रा आंगन में जा कर देख, सूरज कौन सी दिशा में डूबने वाला है आज?"

मां की ये बात सुन कर सब हंसने लगे। इधर मैं भी मुस्कुरा उठा था। ख़ैर कुछ ही देर में मैं ट्रे लिए चाची के कमरे के दरवाज़े के पास पहुंच गया। दरवाज़ा हल्का खुला हुआ था लेकिन मैंने रुक कर बाहर से ही उन्हें आवाज़ लगाई तो अगले ही पल उनकी आवाज़ आई कि आ जाओ। मैं कमरे में दाखिल हुआ तो देखा चाची पलंग पर बैठने के बाद अपनी साड़ी सम्हालने में लगीं थी। मैंने जब उनके क़रीब पहुंच कर ट्रे को उनकी तरफ बढ़ाया तो वो हैरानी से मेरी तरफ देखने लगीं।

"क्या चाची आप भी मुझे ऐसे देखने लगीं?" मैंने मुस्कुराते हुए कहा____"मैं जानता हूं कि ऐसा काम मैंने कभी नहीं किया है लेकिन इसका मतलब ये थोड़ी ना है कि आगे भी कभी नहीं कर सकता।"

"अरे! मैं तो चाहती हूं कि मेरा बेटा हर रोज़ ऐसे ऐसे काम करे जिससे इस खानदान का नाम रोशन हो।" मेनका चाची ने ट्रे से अपना कप उठाते हुए किंतु मुस्कुरा कर कहा____"लेकिन जाने क्यों मुझे कुछ और ही समझ आ रहा है।"

"मैं कुछ समझा नहीं चाची।" मैं पलंग पर ही उनके बगल से बैठते हुए बोला____"आपको क्या समझ आ रहा है?"

"यही कि अभी से ऐसे काम करने का अभ्यास करने का सोच लिया है तुमने।" चाची ने अर्थपूर्ण भाव से मुस्कुराते हुए मेरी तरफ देखा____"अब तो सबको पता है कि अगले साल तुम्हारा ब्याह होगा और इस हवेली में मेरी एक नई बहू आ जाएगी। सुना है आज कल के पति लोग अपनी बीवी की सेवा करने लगे हैं।"

"ये आप क्या कह रही हैं चाची?" मैं उनकी बातों का मतलब समझते ही झेंप गया___"आप मेरे बारे में ऐसा सोचती हैं? आप तो जानती हैं कि आपका ये बेटा जोरू का गुलाम बनने वालों में से नहीं है।"

"अब ये तो अगले साल ही पता चलेगा वैभव बेटा।" चाची ने चाय का एक घूंघ पीने के बाद कहा____"प्रेम संबंध वाले ब्याह में ऐसा ही तो होता है। काश! हमारे ज़माने में भी ऐसा होता।"

"क्या बात करती हैं चाची।" मैंने इस बार चाची को छेड़ते हुए कहा____"चाचा जी के साथ आपका संबंध किसी प्रेमी प्रेमिका से कम थोड़े ना था। मैंने भी देखा था कि चाचा जी आपकी कितनी जी हुजूरी करते थे।"

"तो क्या उन्हें नहीं करना चाहिए था?" चाची ने हल्के से मुस्कुरा कहा____"हालाकि ज़्यादा कहां सुनते थे मेरी।"

"अरे! बिल्कुल करनी चाहिए थी उन्हें।" मैंने हाथ झटकते हुए कहा____"मेरी इतनी प्यारी और सुंदर चाची की जी हुजूरी करने से उनकी शान ही बढ़नी थी।"

"बस बस इतनी बातें मत बनाओ अब।" चाची ने झूठी नाराज़गी दिखाते हुए कहा____"और ये बताओ कि आज इतने दिनों बाद अपनी चाची से मिलने का ख़याल कैसे आया तुम्हें?"

"काम के चलते आज कल मुझे किसी से भी मिलने का समय नहीं मिल पाता।" मैंने खाली हो गए कप को ट्रे में रखते हुए कहा____"वरना मैं तो हर पल अपनी प्यारी सी चाची के पास ही बैठा रहूं। वैसे, आप इस वक्त लेटी क्यों थीं? आपकी तबीयत तो ठीक है ना चाची?"

"मेरी तबीयत ठीक है बेटा।" चाची ने कहा____"बस थोड़ा सिर दर्द कर रहा था इस लिए दीदी के पास से उठ कर यहां चली आई थी।"

"तो आपने सिर दर्द की कोई दवा ली या नहीं?" मैंने फिक्रमंदी से पूछा____"अगर ज़्यादा ही सिर दर्द हो रहा हो तो मुझे बताइए मैं वैद्य जी को ले आता हूं।"

"नहीं बेटा इसकी कोई ज़रूरत नहीं है।" चाची ने कहा____"असल में कल मैंने सिर के बाल धोए थे तो शायद उसी की वजह से शरद गरम हो गया है मुझे। दीदी ने दवा दी थी मुझे। उससे काफी राहत मिली है मुझे।"

"अगर ऐसा है तो फिर ठीक है।" मैंने राहत की सांस लेते हुए कहा____"अच्छा अब आप आराम कीजिए। मुझे भी अब खेतों की तरफ जाना है।"

"ठीक है बेटा।" चाची ने कहा____"सम्हल कर जाना और बच बचा के काम करना। जब से तुम अपनी ज़िम्मेदारियां निभाने लगे हो तब से हम सब बहुत खुश हैं। ईश्वर करे अब से हमेशा ऐसा ही हो और तुम अपने कार्य से सबको खुश रखो।"

"कोशिश तो यही है चाची।" मैंने कहा____"और जब तक आप सबका आशीर्वाद मेरे साथ है तब तक सब अच्छा ही होगा। अच्छा अब आप आराम कीजिए। मैं निकलता हूं....।"

कहने के साथ ही मैं ट्रे ले कर चाची के कमरे से बाहर आ गया। ट्रे कुसुम को पकड़ा कर मैं हवेली से बाहर निकल गया। कुछ ही देर में मैं अपनी मोटर साइकिल से खेतों की तरफ बढ़ा चला जा रहा था। चंद्रकांत के घर के पास पहुंचा तो देखा अभी भी वहां पर काफी लोग मौजूद थे किंतु मैं रुका नहीं बल्कि सीधा निकल गया। चंद्रकांत का अपनी ही बहू को अपने बेटे की हत्यारिन मान कर उसकी हत्या करना मेरे लिए जैसे पहेली सा बन गया था। वहीं दूसरी तरफ मैं ये भी सोच रहा था कि वो कौन होगा जिसे चंद्रकांत ने अपना फ़रिश्ता कहा था? मेरे मन में ख़याल उभरा कि अगर मैंने वो हरकत न की होती तो सबके साथ साथ मुझे भी इस मामले की सच्चाई पता चल गई होती। ख़ैर अभी भले ही मुझे पता नहीं है लेकिन बाद में तो मैं पता कर ही लूंगा। यही सोच कर मैंने मोटर साईकिल की रफ़्तार तेज़ कर दी।

✮✮✮✮

शाम को वापस जब हवेली पहुंचा तो मैं ये सोच कर थोड़ा डरा हुआ था कि कहीं पिता जी आज मुझ पर गुस्सा न करें। चंद्रकांत के घर में आज मैंने सबके सामने उसका गिरेबान पकड़ कर उसको उल्टा सीधा बोला था जिसके चलते पिता जी बेहद नाराज़ हुए थे मुझसे। उस समय तो उन्होंने मुझे ज़्यादा कुछ नहीं कहा था किंतु मैं जानता था कि हवेली में उनसे सामना होने पर निश्चित ही मुझे उनकी तगड़ी डांट सुनने को मिलेगी। ख़ैर इसी संदर्भ में कई तरह की बातें सोचते हुए मैं हवेली के अंदर पहुंच गया। बैठक में नए मुंशी के साथ पिता जी बैठे चाय पी रहे थे। मैं चुपचाप अंदर की तरफ निकल गया। हालाकि मैंने ये सोचा था कि पिता जी की जैसे ही मुझ पर नज़र पड़ेगी तो वो मुझे आवाज़ दे कर बुला लेंगे लेकिन ऐसा नहीं हुआ। बहरहाल, मैं जानता था कि ये कुछ देर के लिए ही राहत वाली बात थी।

गुसलखाने में हाथ मुंह धो कर तथा अपने कमरे में दूसरे साफ़ कपड़े पहन कर मैं नीचे आ कर मां के पास बैठ गया। मैंने देखा मां और चाची के पास इस वक्त निर्मला काकी नहीं थी। भाभी, कुसुम और निर्मला की बेटी कजरी भी नहीं दिख रही थी। इधर जैसे ही मैं मां और चाची के पास आ के बैठा तो चाची ने कुसुम को ये कहते हुए आवाज़ दीं कि अपने प्यारे भैया के लिए चाय ले आ। जल्दी ही रसोई से कुसुम की आवाज़ आई।

"आज दोपहर में तू ऐसा क्या कर के आया था चंद्रकांत के घर से?" कुसुम जब मुझे चाय दे कर चली गई तो सहसा मां ने मेरी तरफ देखते हुए पूछा____"जिसके चलते हंगामा मच गया था वहां?"

"अरे! ऐसी कोई बात नहीं हुई थी मां।" मैं पहले तो मन ही मन चौंका फिर लापरवाही से बोला____"पर आपको ये किसने बताया?"

"तेरे पिता जी ने।" मां ने मुझे सख़्त नज़रों से घूरते हुए कहा____"बोल रहे थे समझा देना उसे। मुझे तो इस बारे में कुछ पता ही नहीं था। मेरे पूछने पर ही उन्होंने तेरी सारी करतूतें बताई थी। आख़िर क्यों ऐसे ऊटपटांग काम करता है तू?"

"मैं मानता हूं मां कि मुझे चंद्रकांत से उस लहजे में बात नहीं करनी चाहिए थी और ना ही उसको गाली देना चाहिए था।" मैंने कहा____"लेकिन उसे भी तो सोचना चाहिए था कि सबके सामने मेरे पिता जी पर उंगली नहीं करना चाहिए था उसे। आपको पता है, उस आदमी को आज भी अपनी ग़लतियों का एहसास नहीं है और हर बात पर हर बार पिता जी पर तंज कसता है। काफी दिनों से बर्दास्त कर रहा था मैं उसे। जब उसने अति ही कर दी तो मेरा भी सब्र टूट गया।"

"हां ठीक है लेकिन तू उसको साधारण तरीके से भी तो समझा सकता था।" मां ने कहा____"इस तरह सरे आम उसको गाली दे कर जलील करने की क्या ज़रूरत थी तुझे?"

"लातों वाले भूत साधारण भाषा में कही गई बातें नहीं समझते मां।" मैंने कहा____"उनको ऐसी ही भाषा समझ आती है और वो भी फ़ौरन। बाकी एक बात आप भी जान लीजिए कि अगर कोई भी मेरे माता पिता अथवा इस हवेली के किसी भी सदस्य के बारे में इस तरह का तंज कसेगा तो उसके साथ मैं इससे भी ज़्यादा बुरा सुलूक करूंगा। हां, जहां मैं ग़लत हूं तो उसके लिए खुशी से सज़ा भुगतने को भी तैयार हूं।"

"वैभव ने बिल्कुल ठीक किया है दीदी।" मेनका चाची ने मां से कहा____"उस नीच और नमकहराम इंसान के साथ यही सुलूक करना चाहिए था। अपने घर की औरतों पर तो बस न चला उसका और दूसरों पर खीचड़ उछालता फिरता है। उसने हमारे घर के लोगों की हत्या कर के हमें दुख दिया है तो उसके दुष्कर्मों की सज़ा उसे भी मिल गई। ऊपर वाले के घर देर है अंधेर नहीं। एक ही बेटा था ना उसके? देख लीजिए उसकी ही बीवी ने मार डाला अपने मरद को और चंद्रकांत का वंश ही नाश कर दिया। इसी को कहते हैं जैसी करनी वैसी भरनी।"

"ये आप क्या कह रही हैं चाची?" मैं हैरत से आंखें फाड़ कर एकदम से बोल पड़ा____"चंद्रकांत के बेटे की रजनी ने हत्या की थी?"

"मुझे भी दीदी से ही पता चला है वैभव।" चाची ने कहा____"और दीदी को जेठ जी से।"

"बड़े आश्चर्य की बात है ये।" मैं एकदम से स्तब्ध रह गया था, फिर बोला____"लेकिन रजनी ने ऐसा क्यों किया होगा? अपने ही पति की हत्या कैसे कर दी होगी उसने?"

"तेरे पिता जी बता रहे थे कि रजनी का किसी गैर मर्द से संबंध था।" मां ने कहा____"और वो उस गैर मर्द के साथ भाग जाना चाहती थी लेकिन दुर्भाग्य से उसके पति ने पकड़ लिया। रघुवीर और उस दूसरे व्यक्ति के बीच हाथा पाई होने लगी थी। रजनी इस सबसे डर गई थी। उसे लगा कहीं इस सबके चलते लोगों को पता न चल जाए और वो बदनाम न हो जाए। जब उसे कुछ न सूझा तो उसने कुल्हाड़ी से अपने पति को मार डाला। उसे लगा था कि ऐसा कर के वो यहां से भाग कर अपने आशिक के साथ हमेशा के लिए चली जाएगी मगर ऐसा नहीं हुआ। उसके आशिक ने जब देखा कि रजनी ने अपने ही पति को मार डाला है तो वो डर के मारे भाग गया। अपने आशिक को इस तरह भाग जाते देख रजनी को मानो लकवा ही मार गया था। जिसके भरोसे उसने अपने ही पति को मार डाला उसी ने उसे धोखा दे दिया। रजनी ने सोचा अब ऐसे में क्या करे वो? फिर उसके दिमाग में रूपचंद्र का ख़याल आया। उसके एक दिन पहले शाम को रूपचंद्र ने उसका रास्ता रोका था ना इस लिए रजनी ने रघुवीर की हत्या में उसे ही फंसा देने का सोच लिया। उसके बाद दूसरे दिन ऐसा ही हुआ।"

"ये तो गज़ब ही हो गया।" मैं आश्चर्यचकित हो कर बोल पड़ा____"मैं सोच भी नहीं सकता था कि रजनी ऐसा भी कर सकती है लेकिन ये कैसे पता चला कि रजनी ने ही रघुवीर की हत्या की थी? क्या चंद्रकांत ने खुद इस बात का पता लगा लिया था?"

"नहीं, ये सब बातें चंद्रकांत को किसी ने बताई थी।" मां ने कहा।
"क...किसने?" मैंने चकित भाव से पूछा____"इतनी बड़ी बात भला किसने बताई चंद्रकांत को?"

"सफ़ेदपोश ने।" मां ने ये कहा तो मैं बुरी तरह उछल पड़ा, मेरे हलक से अटकते हुए अल्फाज़ निकले____"स...स..फे..द...पोश ने????"

"हां।" मां ने बड़े आराम से कहा____"पंचायत में सबके सामने चंद्रकांत ने सबको यही बताया।"

सच तो ये था कि मैं चाय पीना भूल गया था। हलाकि कप में बस थोड़ी सी ही चाय रह गई थी लेकिन मां ने बातें ही ऐसी बताई थीं कि उसके बाद बाकी की चाय पीने का ख़याल ही नहीं आया था मुझे। मेरे ज़हन में सफ़ेदपोश ही उछल कूद मचाने लगा था। अगर मां की बातें सच थीं तो ये वाकई में बड़ी ही हैरतंगेज बात थी लेकिन जाने क्यों मुझे ऐसा भी महसूस हो रहा था कि इसमें अभी बहुत कुछ बाकी है। मैं समझ गया कि सारी वास्तविकता पिता जी से ही पता चलेगी। ये सोच कर मैंने फ़ौरन ही कप को एक तरफ रखा और एक झटके से उठ कर बाहर बैठक की तरफ बढ़ गया।

✮✮✮✮

"यकीन नहीं होता कि ऐसा भी हो सकता है।" बैठक में पिता जी की सारी बातें सुनने के बाद मैंने बेयकीनी से कहा____"मुझे तो ऐसा लगता है कि चंद्रकांत कोई बहुत गहरा षडयंत्र रच रहा है। हम सबसे बदला लेने के लिए वो इस हद तक गिर गया कि अपनी ही बहू को मार डाला।"

"नहीं तुम ग़लत समझ रहे हो।" पिता जी ने फ़ौरन ही इंकार में सिर हिलाते हुए कहा____"माना कि चंद्रकांत के अंदर हम सबके प्रति नफ़रत है और वो हमारा बहुत कुछ अहित चाहता है लेकिन इसके लिए वो अपने ही बेटे अथवा बहू की हत्या नहीं कर सकता। वो कोई छोटा सा अबोध बालक नहीं है जिसे इतना भी ज्ञान नहीं है कि ऐसे में उसका खुद का कितना बड़ा नुकसान हो जाएगा। हमारा ख़याल है कि उसकी बातों में कहीं न कहीं सच्चाई ज़रूर है।"

"किस बात की सच्चाई?" मैंने न समझने वाले भाव से पूछा____"क्या आप उसकी बातों पर यकीन कर के ये मान रहे हैं कि सफ़ेदपोश ने ही उसे सब कुछ बताया और उसी के चलते उसने अपनी बहू को मार डाला?"

"बिल्कुल।" पिता जी ने मजबूत लहजे में कहा____"अपने बेटे की हत्या हो जाने से वो ऐसी मानसिकता में पहुंच गया था कि वो हर वक्त अपने बेटे के हत्यारे के बारे में ही सोचता रहा होगा और जब सफ़ेदपोश ने उसे हत्यारे का नाम व हत्या करने का कारण बताया तो उसने अपने बेटे की हत्या का बदला ले लिया। सफ़ेदपोश ने उसको रजनी की हत्यारिन होने की जो कहानी बताई उस पर उसने इस लिए भी विश्वास कर लिया क्योंकि वो खुद अपनी बहू के चरित्र के बारे में पहले से अच्छी तरह जानता था। उसे पता था कि उसकी बहू ही नहीं बल्कि उसकी खुद ही पत्नी भी चरित्रहीन थीं। कहने का मतलब ये कि सफ़ेदपोश की बातों पर यकीन न करने की उसके पास कोई भी वजह नहीं थी और इसी लिए उसने अपनी बहू की हत्या करने में वक्त बर्बाद नहीं किया।"

"हो सकता है कि ऐसा ही हो पिता जी।" मैंने कुछ सोचते हुए कहा____"लेकिन इसके बावजूद इस मामले में मुझे कुछ और भी ऐसा महसूस हो रहा है जो फिलहाल अभी समझ में नहीं आ रहा। वैसे सोचने वाली बात है कि इतने समय से सफ़ेदपोश का कहीं कोई अता पता नहीं था और जब उसका पता चला तो ऐसे मामले के चलते। मुझे समझ नहीं आ रहा कि सफ़ेदपोश ने चंद्रकांत को उसके बेटे के हत्यारे का नाम बता कर किस मकसद से उपकार किया है? जबकि आप भी जानते हैं कि वो सिर्फ मेरी जान लेने पर आमादा था। एक बात और, उस समय पंचायत में आप चंद्रकांत और गौरी शंकर दोनों से ही ये पूछ रहे थे कि सफ़ेदपोश से उन दोनों का कोई संबंध है या नहीं अथवा वो सफ़ेदपोश को जानते हैं या नहीं....उस समय दोनों ने ही सफ़ेदपोश के बारे में अपनी अनभिज्ञता ही ज़ाहिर की थी। इस मामले के बाद हम ये भी नहीं कह सकते कि चंद्रकांत पहले से ही सफ़ेदपोश के बारे में जानता रहा होगा अथवा वो उससे मिला हुआ रहा होगा। क्योंकि अगर वो मिला हुआ होता तो ना तो उसके बेटे की हत्या हुई होती और ना ही उसे अपनी बहू की हत्या करनी पड़ती। ऐसे में सवाल उठता है कि चंद्रकांत के बेटे की हत्या के बाद सफ़ेदपोश का इस तरह से सामने आना आख़िर क्या साबित करता है?"

"तुम्हारी तरह हमारे भी ज़हन में इस तरह के विचार उभर चुके हैं।" पिता जी ने सहसा गहरी सांस लेते हुए कहा____"लेकिन इस बारे में हम अपनी पुख़्ता राय कल ही बनाएंगे। ऐसा इस लिए क्योंकि सफ़ेदपोश ने आज रात चंद्रकांत से मिलने को कहा था और अपने वादे के अनुसार चंद्रकांत को उसके कहे अनुसार कोई काम करना है। अब देखना ये है कि आज रात सफ़ेदपोश चंद्रकांत से मिलने आता है या नहीं। उसके आने अथवा न आने से ही हम किसी ठोस नतीजे पर पहुंचेंगे।"

"किस तरह के नतीजे की बात कर रहे हैं आप?" मैंने पिता जी की तरफ देखते हुए पूछा।

"तुम्हारे इस सवाल का जवाब अभी नहीं कल देंगे हम।" पिता जी ने निर्णायक भाव से कहा____"फिलहाल तुम जा सकते हो...और हां, आज जो तुमने चंद्रकांत के घर में उसके साथ हरकत की थी वैसी हरकत तुम्हारे द्वारा अब दुबारा न हो। अब तुम बच्चे नहीं रहे, बड़े हो गए हो इस लिए विवेक के साथ साथ सहनशीलता भी रखना सीखो।"

पिता जी की बात सुन कर मैंने ख़ामोशी से सिर हिलाया और फिर उठ कर बैठक से बाहर आ गया। रात का भोजन करने में अभी काफी समय था इस लिए मैं अपने कमरे में आराम करने का सोचा।

सीढ़ियों से ऊपर आया तो देखा रागिनी भाभी अपने कमरे का दरवाज़ा बंद कर के मेरी तरफ ही आ रहीं थी। बिजली नहीं थी किंतु लालटेन का धीमा प्रकाश था जिसमें उनका चेहरा साफ नज़र आया मुझे।

"क्या बात है।" मुझ पर नज़र पड़ते ही भाभी ने मुझे छेड़ा____"आज कल बड़ी तेज़ रफ़्तार में रहते हो देवर जी। आख़िर किस बात की इतनी जल्दी है? वैसे अगला साल आने में तो अभी बहुत समय बाकी है।"

"क्या भाभी आप तो जब देखो तभी मुझे छेड़ने लग जाती हैं।" मैंने हौले से झेंप कर कहा।

"अब तुमने मुझे छेड़ने की खुली छूट दे दी है तो उसका फ़ायदा तो उठाऊंगी ही मैं।" भाभी ने मुस्कुराते हुए कहा____"तुम्हें अगर कोई एतराज़ है तो बोल दो, नहीं छेडूंगी मैं।"

"मुझे कोई एतराज़ नहीं है।" मैंने कहा____"बल्कि मुझे भी अच्छा लगता है कि इसी बहाने आपको खुशी तो मिलती है।"

"हम्म्म।" भाभी ने कहा____"अच्छा तुम अपनी अनुराधा से मिले या नहीं?"

"कहां मिला भाभी।" मैंने एकदम से ठंडी आह भरते हुए कहा____"आप तो जानती हैं मुझ किसान आदमी के पास समय ही नहीं है किसी से मिलने मिलाने का।"

"अच्छा, किसान आदमी?" भाभी ने एकदम से आंखें फैला कर कहा____"तभी एक किसान की लड़की से प्रेम कर बैठे हो। वाह! क्या जोड़ी बनाई है तुमने...मानना पड़ेगा।"

साला, ये तो उल्टा हो गया। अपनी समझ में मैंने भाभी को छेड़ा था लेकिन उल्टा उन्होंने ऐसी बात कह दी कि मैं पलक झपकते ही निरुत्तर हो गया और गड़बड़ा भी गया। फ़ौरन कुछ कहते ना बना मुझसे। उधर भाभी मेरी हालत देख खिलखिला कर हंसने लगीं।

"माना कि तुम हर जगह मशहूर होगे।" भाभी ने सहसा बड़े गर्व से मुस्कुराते हुए कहा____"मगर ये मत भूलो कि मैं भी कम नहीं हूं। तुम्हारी भाभी हूं मैं और इस हवेली की बहू हूं।"

"बिल्कुल हैं भाभी।" मैंने सिर हिलाते हुए कहा____"आपको ये बताने की ज़रूरत नहीं है। दूसरी बात, मेरी नज़र में भी आपकी अहमियत बहुत ख़ास है और आपका मुकाम बहुत ऊंचा है।"

मेरी ये बात सुन कर भाभी इस बार कुछ बोलीं नहीं बल्कि एकटक मेरी तरफ देखने लगीं। उनकी आंखों में मेरे लिए स्नेह दिखा। सहसा वो आगे बढ़ीं और उसी स्नेह के साथ मेरे दाएं गाल को मुस्कुराते हुए हल्के से सहलाया।

"तुम्हारा मुकाम भी मेरी नज़र में बहुत ऊंचा है वैभव।" फिर उन्होंने थोड़ा गंभीर हो कर कहा____"और मेरी ख़्वाहिश है कि मेरा देवर एक अच्छे इंसान के रूप में हर किसी के दिल पर राज करे।"

"आपके आशीर्वाद से ऐसा ज़रूर होगा भाभी।" मैंने कहा____"मुझे यकीन है कि आपके रहते मैं कभी दुबारा ग़लत रास्ते पर नहीं जा सकूंगा।"

"ऐसा तो तुम मेरा दिल रखने के लिए कह रहे हो।" भाभी ने सहसा शरारत से मुस्कुराते हुए कहा____"वरना क्या मैं जानती नहीं हूं कि सही रास्ते पर चलने की प्रेरणा तुम्हें किसके द्वारा मिली है, हां?"

"बेशक उसने मेरे चरित्र को बदला भाभी और मुझे शिद्दत से एहसास हुआ कि अब तक मैने जो भी किया था वो ग़लत था।" मैंने कहा____"लेकिन सही रास्ते पर चलने के लिए अगर आपने शुरुआत से ही बार बार मुझे ज़ोर नहीं दिया होता तो यकीन मानिए आज मैं इस तरह इस सफ़र पर नहीं चल रहा होता। ये सब आपके ही ज़ोर देने और मार्गदर्शन से हो सका है। तभी तो मैं ये कहता हूं कि आपका मुकाम बहुत ऊंचा है।"

"चलो अब ये बातें मत बनाओ तुम।" भाभी ने मुझे घूरते हुए कहा____"मेरी होने वाली देवरानी के उपकारों को नज़रंदाज़ करोगे तो मार खाओगे मुझसे। अच्छा अब जाओ आराम करो। कुछ देर में खाना बन जाएगा तो खा पी लेना और हां कल अपनी अनुराधा से भी मिल लेना। बेचारी अपने दिल की बातें तुमसे कहने के लिए तड़प रही है।"

"अच्छा ऐसा है क्या?" मैं एकदम से मुस्कुरा उठा, बोला____"अगर आप इतना ही ज़ोर दे रहीं हैं तो मिल लूंगा उससे।"

"अच्छा, जैसे अभी मैं न कहती तो तुम उससे मिलते ही नहीं, बड़े आए मिल लूंगा उससे कहने वाले।" भाभी ने पुनः घूरते हुए कहा____"एक और बात, थोड़ा सभ्य इंसानों जैसा व्यवहार करना उससे। अभी बहुत नादान और नासमझ है वो। ज़्यादा सताना नहीं उसे वरना तुम्हारे लिए ठीक नहीं होगा, सोच लेना।"

"अब ये क्या बात हुई?" मैंने हैरानी से उनकी तरफ देखते हुए कहा____"आप मेरी तरफ हैं या उसकी तरफ?"

"फिलहाल तो मैं तुम दोनों की ही तरफ हूं।" भाभी ने कहा____"क्योंकि तुम्हें भी पता है कि मेरे बिना तुम दोनों की नैया पार नहीं लगेगी। इस लिए ज़्यादा उड़ने की कोशिश मत करना। अब जाओ तुम, मैं भी नीचे जा रही हूं।"

कहने के साथ ही भाभी मेरी कोई बात सुने बिना ही सीढ़ियों पर उतरती चली गईं। उनके जाने के बाद मैं भी उनकी बातों के बारे में सोचते हुए और मुस्कुराते हुए अपने कमरे की तरफ चला गया।​
 
अध्याय - 105
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"फिलहाल तो मैं तुम दोनों की ही तरफ हूं।" भाभी ने कहा____"क्योंकि तुम्हें भी पता है कि मेरे बिना तुम दोनों की नैया पार नहीं लगेगी। इस लिए ज़्यादा उड़ने की कोशिश मत करना। अब जाओ तुम, मैं भी नीचे जा रही हूं।"

कहने के साथ ही भाभी मेरी कोई बात सुने बिना ही सीढ़ियों पर उतरती चली गईं। उनके जाने के बाद मैं भी उनकी बातों के बारे में सोचते हुए और मुस्कुराते हुए अपने कमरे की तरफ चला गया।



अब आगे....


अगली सुबह।
पिता जी और मैं चाय पीने के बाद चंद्रकांत के घर जाने के लिए बाहर निकले ही थे कि तभी सामने से आते शेरा पर हमारी नज़र पड़ी। शेरा के चेहरे पर अजीब से भाव थे जिसे देख पिता जी के चेहरे पर सोचने वाले भाव उभर आए।

"प्रणाम मालिक।" क़रीब आते ही शेरा ने झुक कर पिता जी के पैरों को छू कर कहा।

"क्या बात है?" वो जैसे ही खड़ा हुआ तो पिता जी ने उसकी तरफ देखते हुए पूछा____"तुम्हारे चेहरे पर मौजूद ये भाव कैसे हैं? कुछ हुआ है क्या?"

"जी मालिक।" शेरा ने नज़रें झुकाए हुए कहा____"परसों रात मैंने सफ़ेदपोश को देखा था...लेकिन।"

"लेकिन??" पिता जी के साथ साथ मैं भी चौंक पड़ा था।

"लेकिन मैं अपनी लाख कोशिश के बाद भी उसे पकड़ नहीं सका।" शेरा ने अपराध भाव से सिर झुकाए हुए कहा।

"पूरी बात बताओ।" पिता जी ने सपाट लहजे से कहा।

शेरा ने पूरी बात बता दी कि कैसे उसने परसों की रात चंद्रकांत और सफ़ेदपोश को आपस में बातें करते सुना और फिर सफ़ेदपोश के जाते ही उसने उसका पीछा किया। पीछा करते हुए वो आमों के बाग तक गया था जहां पर सफ़ेदपोश ने हमारे एक आदमी को गोली मार दी थी।

"हैरानी की बात है कि सफ़ेदपोश तुम्हारी बेवकूफी की वजह से हाथ से निकल गया।" पिता जी ने नाराज़गी जताते हुए कहा____"जब तुमने उसे चंद्रकांत से बात करते हुए देख ही लिया था तो तुम्हें उसी समय उसे दबोच लेना चाहिए था।"

"माफ़ कर दीजिए मालिक।" शेरा ने खेद भरे भाव से कहा____"मुझे बिल्कुल भी उम्मीद नहीं थी कि वो चंद्रकांत के यहां दिख जाएगा। आपके आदेश पर मैं उसे खोज ही रहा था कि अचानक वो मुझे चंद्रकांत के घर के बाहर दिख गया। पहले तो मुझे कुछ समझ ही नहीं आया था कि अंधेरे में वहां पर कोई है भी या नहीं। वो तो रात के सन्नाटे में मुझे हल्की आवाज़ें सुनाई दी थीं। आवाज़ों को सुन कर मैं चौंक गया था कि इतनी रात को कौन हो सकता है? अपनी उत्सुकता को मिटाने के लिए जब मैं आवाज़ की दिशा में गया तो अंधेरे में मुझे दो साए खड़े नज़र आए। ये तो मैं जान चुका था कि वो घर चंद्रकांत का ही है लेकिन मैं ये सोचने पर मजबूर हो गया था कि चंद्रकांत के घर के बाहर उस वक्त कौन हो सकता है। यही देखने के लिए मैं बहुत ही सावधानी से उनके क़रीब बढ़ गया था। जल्दी ही मुझे समझ आ गया कि वो कौन हैं। एक तो चंद्रकांत ही था जोकि उसकी आवाज़ से ही मैं पहचान गया था लेकिन दूसरा कौन था ये मैं थोड़ी ही देर में उसकी पोशाक से पहचान पाया। उसकी आवाज़ भी वैसी ही अजीब सी थी जैसी मैंने तब सुनी थी जब एक बार दरोगा धनंजय के यहां मैंने सफ़ेदपोश के मुख से सुनी थी। मैं ये जान कर चकित रह गया था कि सफ़ेदपोश इतनी रात को चंद्रकांत के पास कैसे है? दोनों की बातें सुनने के लिए मैं चुपचाप अपनी जगह पर खड़ा रहा। मैं जानना चाहता था कि सफ़ेदपोश का चंद्रकांत से यूं रात के उस वक्त मिलने का क्या मतलब था और साथ ही दोनों के बीच क्या संबंध है?"

"तो क्या सुना तुमने?" पिता जी ने पूछा।

पिता जी के पूछने पर शेरा ने वही सब बताया जो परसों की रात चंद्रकांत से सफ़ेदपोश ने बातें की थी। सारी बातें सुनने के बाद पिता जी कुछ पलों तक जाने क्या सोचते रहे फिर बोले_____"उसके बाद क्या हुआ? हमारा मतलब है कि चंद्रकांत से वो सब बातें करने के बाद सफेदपोश कहां गया और तुमने क्या किया?"

"चंद्रकांत को अगली रात मिलने को कह कर जब सफ़ेदपोश वहां से चल दिया तो मैं भी उसके पीछे लग गया।" शेरा ने बताना शुरू किया____"वो अंधेरे में भी बहुत तेज़ी से आगे बढ़ता चला जा रहा था। मैं ये सोच कर हैरान हो उठा था कि वो कच्चे रास्ते और कीचड़ भरी ज़मीन पर भी कैसे इतनी तेज़ी से बढ़ता चला जा रहा था। मुझे लगा कहीं वो मेरी पहुंच से बाहर हो कर अंधेरे में गायब ही न हो जाए इस लिए मैं भी तेज़ी से उसके पीछे चल पड़ा किंतु एक जगह अचानक ही कीचड़ में मेरा पैर फिसल गया और मैं खुद को हज़ार कोशिश के बाद भी सम्हाल न सका। नतीज़ा ये हुआ कि मैं वहीं कीचड़ में गिर गया। किसी तरह जल्दी से उठा और फिर से उसके पीछे दौड़ चला किंतु आगे अंधेरे में वो मुझे नज़र न आया। मुझे याद आया कि पिछली बार वो आमों के बाग की तरफ ही गया था और फिर वो वहीं गायब हो गया था। मैं तेज़ी से आगे की तरफ दौड़ता चला गया। किन्तु शायद उसे शक हो गया था कि उसके पीछे कोई है इस लिए जल्दी ही वो आमों के बाग में दाखिल हो गया। मैंने अपना एक आदमी पहले से ही बाग़ के मकान के पास तैनात कर रखा था। शायद उस आदमी को अंधेरे में सफ़ेदपोश के आने का आभास हो गया था। सन्नाटे में मैंने साफ सुना था कि उसने उस सफ़ेदपोश को आवाज़ दी थी। मैं जानता था कि सफ़ेदपोश ऐसी चीज़ नहीं है जिसे अकेला आदमी अपने काबू में कर सके। अभी मैं बाग के क़रीब पहुंचा ही था कि तभी सन्नाटे में गोली चलने की तेज़ आवाज़ गूंज उठी और साथ ही एक इंसानी चीख भी। मैं समझ गया कि गोली उस सफ़ेदपोश ने ही चलाई थी क्योंकि मेरे आदमी के पास तो बंदूक जैसी कोई चीज़ थी ही नहीं। मैं फ़ौरन ही उस जगह पहुंच गया लेकिन देर हो चुकी थी मुझे। सफ़ेदपोश बाग़ में गायब हो चुका था। अब उसे खोजना व्यर्थ था। मैं फ़ौरन ही दर्द से तड़पते अपने आदमी के पास पहुंचा और उसे ले कर वैद्य जी के पास गया। वैद्य जी ने कहा कि गोली लगी है इस लिए वो इसमें कुछ नहीं कर सकते हैं। तब मैं फ़ौरन ही उसे जीप में लाद कर उसी वक्त शहर चला गया।"

"अब कैसा है वो?" पिता जी ने गहरी सांस लेने के बाद कहा____"समय से उसका उपचार हुआ था कि नहीं?"

"ऊपर वाले की दया से वो बच गया है मालिक।" शेरा ने कहा____"हालाकि खून बहुत बह गया था उसका। लगा नहीं था कि बचेगा किंतु बच गया। अभी थोड़ी देर पहले ही उसको अस्पताल से वापस ला कर उसके घर लाया हूं। सोचा आपको भी इस बारे में ख़बर कर दूं।"

"बड़ी अजीब बात है पिता जी।" मैंने कुछ सोचते हुए कहा____"पहले भी सफ़ेदपोश को हमारे आमों के बाग़ में ही ग़ायब होते देखा गया था और शेरा के अनुसार परसों रात को भी। सोचने वाली बात है कि हमारे आमों के बाग़ में पहुंच कर वो कैसे और कहां गायब हो जाता है? ये तो पक्की बात है कि वो कोई भूत प्रेत नहीं है जो किसी जादू की तरह ग़ायब हो जाता है। अब सवाल ये है कि वो ग़ायब कैसे हो जाता है? वो भी कुछ इस तरह से कि खोजने पर भी किसी को नज़र नहीं आता?"

"सही कहा तुमने।" पिता जी के चेहरे पर गहन सोचो के भाव उभर आए थे____"सफ़ेदपोश अपने काम को अंजाम देने के बाद हमारे आमों के बाग़ की तरफ ही क्यों जाता है और फिर वहां ग़ायब कैसे हो जाता है? आख़िर आमों के उस बाग़ में वो कौन सी जगह है जो एक इंसान को किसी जादू की तरह ग़ायब कर देती है? इस बारे में यकीनन अब पता लगाना पड़ेगा।"

"मेरा भी यही कहना है।" मैंने कहा____"हमारे आमों के बाग़ में कोई तो ख़ास बात ज़रूर है जो हमारे लिए अब रहस्य बन गई है और यकीनन सफ़ेदपोश के लिए एक पनाहगाह। एक ऐसी पनाहगाह जो उसके लिए हर तरह से सुरक्षित प्रतीत होती है। तभी तो वो हर बार वहीं पर जा कर बड़े आराम से हम सबकी नज़रों से ग़ायब हो जाता है। हमें आमों के बाग़ में जा कर वहां की अच्छे तरीके से जांच पड़ताल करनी होगी।"

शेरा को वापस भेजने के बाद मैं और पिता जी जीप में बैठ कर चंद्रकांत के घर की तरफ चल पड़े। सारे रास्ते हम दोनों के बीच ख़ामोशी रही। मेरी तरह शायद पिता जी भी सफ़ेदपोश के ही बारे में सोच रहे थे। ख़ैर कुछ ही देर में हम चंद्रकांत के घर पहुंच गए जहां पर ठाकुर महेंद्र सिंह की जीप पहले से ही खड़ी नज़र आई हमें।

✮✮✮✮

"तो आख़िर वही हुआ जिसका हमें पहले से ही अंदेशा था।" ठाकुर महेंद्र सिंह की सारी बातें सुनने के बाद पिता जी ने कहा____"यानि उस सफ़ेदपोश ने बड़ी ही चालाकी से चंद्रकांत के ही हाथों उसकी बहू की हत्या करवा दी। रजनी के संबंध में उसने चंद्रकांत को जो कुछ बताया था वो सब एक ऐसा झूठ था जिसे पूरी तरह सच मान कर चंद्रकांत ने अपनी ही बहू को जान से मार डाला।"

पिता जी की ये बातें सुन कर इतने लोगों के मौजूद रहते हुए भी सन्नाटा छा गया। ये अलग बात है कि कुछ ही दूरी पर चंद्रकांत दोनों हाथों से अपना सिर पकड़े इस तरह बैठा था जैसे उसका सब कुछ लुट गया हो और वो पूरी तरह से बर्बाद हो गया हो। चेहरे पर अनंत पीड़ा के भाव थे और आंखों में आंसुओं का तैरता हुआ सैलाब। अपनी रुलाई को बड़ी मुश्किल से रोके हुए था वो।

पिता जी के आने से पहले महेंद्र सिंह ने उससे यही पूछा था कि____'क्या कल रात सफ़ेदपोश उससे मिलने आया था?' जवाब में चंद्रकांत ने बड़े ही दुख के साथ इंकार में सिर हिलाया था और फिर लगभग रोते हुए उसने बताया था कि वो सफ़ेदपोश के इंतज़ार में सारी रात घर से बाहर बैठा रहा था किंतु सफ़ेदपोश को तो जैसे न आना था और ना ही वो आया था। उसके न आने का बस यही मतलब था कि पिछले दिन उसके बारे में दादा ठाकुर ने जो कुछ अनुमान के तहत कहा था वो ही सच था।

"कहना तो नहीं चाहिए चंद्रकांत।" महेंद्र सिंह ने सहसा गंभीर हो कर कहा____"लेकिन ये सच है कि तुम्हारे ही दुष्कर्मों की वजह से तुम्हारा बेटा और तुम्हारी बहू आज इस दुनिया में नहीं हैं। तुमने खुद अपने हाथों अपने परिवार का नाश कर डाला। तुमने ये जानते हुए भी कि तुम्हारे घर की औरतों का भी उतना ही कसूर था जितना वैभव का था, उसके लिए अपने घर की औरतों को कुछ न कह के सिर्फ ठाकुर साहब के साथ बुरा करने का क़दम उठाया। चंद्रकांत, अब ये नहीं कहा जा सकता कि उस मामले के चलते तुम बाप बेटों की मनोदशा ठीक नहीं थी क्योंकि अगर ठीक न होती तो तुम दोनों गौरी शंकर के साथ मिल कर ठाकुर साहब के खिलाफ़ ना तो ऐसा करने का षडयंत्र रचते और ना ही वो सब कर पाते। साफ ज़ाहिर होता है कि तुम दोनों बाप बेटों ने अपने पूरे होशो हवास में सब कुछ किया। अपने घर की औरतों को दोष देने की बजाय तुमने ठाकुर साहब के साथ हद से ज़्यादा बुरा कर डालना ज़्यादा बेहतर समझा। शुरू से ही तुम्हारी नीयत और तुम्हारी सोच ग़लत थी। अगर तुम सच में अपने साथ हुए अपमान और अन्याय का इंसाफ़ चाहते तो वैभव वाले मामले को ले कर तुम सीधे ठाकुर साहब के पास जाते और उनसे इंसाफ़ की मांग करते। हम सब जानते हैं कि ठाकुर साहब तुम्हारे साथ इंसाफ़ ज़रूर करते, फिर भले ही चाहे उसके लिए उन्हें अपने बेटे को हमेशा हमेशा के लिए त्याग ही क्यों न देना पड़ता।"

कहने के साथ ही महेंद्र सिंह कुछ पलों के लिए रुके। आस पास ही नहीं बल्कि चौगान के बाहर भी खड़े लोगों की तरफ उन्होंने दृष्टि घुमाई, फिर छा गई ख़ामोशी को चीरते हुए पुनः कहा_____"हमें समझ नहीं आ रहा कि तुम्हारे इस अपराध के लिए हम तुम्हें सज़ा दें अथवा नहीं। इसके पहले भी तुम्हारे अपराधों के लिए तुम दोनों बाप बेटों को ये सोच कर माफ़ कर दिया था कि तुम्हारे बाद तुम्हारे घर की औरतों और तुम्हारी इकलौती बेटी का क्या होगा? किंतु ये जो तुमने किया है उसके लिए क्या फ़ैसला करें हम?"

"मुझे सूली पर चढ़ा दीजिए ठाकुर साहब।" चंद्रकांत असहनीय दुख में आंसू बहाते हुए आर्तनाद सा कर उठा____"अपने हाथों इतना भयंकर अपराध करने के बाद अब मैं खुद भी जीना नहीं चाहता। मुझे शिद्दत से एहसास हो रहा है कि आज के समय में मुझ जैसा अपराधी और मुझ जैसा पापी दुनिया में कोई नहीं होगा। ऊपर वाला भी मुझे कभी माफ़ नहीं करेगा। मुझे फांसी की सज़ा दे दीजिए ठाकुर साहब। मैं अब जीना नहीं चाहता। अरे! जिसका वंश ही नष्ट हो गया हो, जिसने अपने ही हाथों अपनी बहू को जान से मार डाला हो उसे एक पल भी जीने का हक़ कैसे हो सकता है? मुझे सूली पर चढ़ा दीजिए ठाकुर साहब ताकि ऊपर जा कर अपनी बहू के क़दमों में गिर कर अपने इस जघन्य अपराध के लिए उससे माफ़ी मांग सकूं।"

"नहीं चंद्रकांत।" महेंद्र सिंह सहसा अजीब भाव से कह उठे____"तुमने जो गुनाह किया है उसके लिए तुम्हें सूली पर नहीं चढ़ाया जा सकता। तुम्हें तुम्हारे अपराधों के लिए ऐसी सज़ा हर्गिज़ नहीं दी जा सकती जिसमें एक ही झटके में तुम्हारे जीवन का अंत हो जाए। तुम्हारे अपराधों के लिए तो वो सज़ा ज़्यादा मुनासिब होगी जिसमें तुम हर रोज़ तिल तिल कर मरो....तड़प तड़प कर मरो।"

"नहीं....नहीं।" चंद्रकांत आतंकित सा हो कर चीख पड़ा____"ऐसा मत कहिए ठाकुर साहब। मुझे ऐसी भयानक सज़ा मत दीजिए। आप चाहें तो मुझे भी कुल्हाड़ी से काट काट कर मार डालिए लेकिन जीवन भर तड़प तड़प कर मरने की सज़ा मत दीजिए। मैं जल्द से जल्द मर कर अपने बेटे और बहू के पास पहुंच जाना चाहता हूं। अपनी बहू के पैरों से लिपट कर उससे माफ़ी मांगना चाहता हूं और.....और अपने बेटे के पास जा कर उससे पूछना चाहता हूं कि किसने उसकी हत्या कर के मेरे वंश का नाश किया है?"

चंद्रकांत की बातें ही ऐसी थीं कि सुन कर वहां बैठे लोगों की आंखें नम हो गईं। उसके रुदन से अजीब सी सनसनी फ़ैल गई थी। बाकियों का तो मुझे नहीं पता था किंतु मेरे अंदर एक अजीब सी झुरझुरी हुई थी। उधर उसकी बातें सुनने के बाद महेंद्र सिंह कुछ पलों तक उसकी तरफ देखते रहे। यकीनन उनके अंदर का हाल भी बाकियों से जुदा नहीं रहा होगा किंतु इस वक्त वो पंच के पद पर बैठे हुए थे इस लिए उन्हें अपनी भावनाओं की तरफ ध्यान नहीं देना था।

"हमारा ख़याल है कि इतना जल्दी हमें किसी नतीजे पर नहीं पहुंच जाना चाहिए।" पिता जी ने गंभीर भाव से कहा_____"हमारा मतलब है कि इस मामले में हमें दो तीन दिन का समय और लेना चाहिए।"

"आप कहना क्या चाहते हैं ठाकुर साहब?" महेंद्र सिंह ने न समझने वाले अंदाज़ से पिता जी की तरफ देखा।

"यही कि सफ़ेदपोश अगर कल रात चंद्रकांत से मिलने नहीं आया।" पिता जी ने कहा____"तो इसका मतलब हमें फ़ौरन ही ये नहीं सोच लेना चाहिए कि उसने चंद्रकांत को रजनी के संबंध में जो कुछ बताया वो झूठ था अथवा वो चंद्रकांत के हाथों उसकी अपनी ही बहू की हत्या करवा देना चाहता था। संभव है कि कल रात वो किसी दूसरे कारण की वजह से चंद्रकांत से मिलने न आया हो और यहां हम सब ये समझ बैठे हैं कि वो चंद्रकांत को अपने किसी मकसद से वो सब बताया जिसके चलते चंद्रकांत ने अपनी बहू को मार डाला।"

"मैं दादा ठाकुर की बात से सहमत हूं बड़े भैया।" पास ही कुर्सी पर बैठा ज्ञानेंद्र बोल पड़ा____"मेरा भी यही कहना है कि इस मामले में हमें फ़ौरन ही कोई फ़ैसला नहीं लेना चाहिए। दो तीन दिन का वक्त ले कर हमें सफ़ेदपोश को परख लेना चाहिए। संभव है कि वाकई में वो किसी कारणवश कल रात यहां न आ पाया हो।"

"हालाकि हमें अब भी यही लग रहा है कि उसने चंद्रकांत को अपने किसी मकसद के चलते ही ये सब करने के लिए फंसाया है।" पिता जी ने कहा____"किंतु फिर भी दो तीन दिन परख लेने में कुछ बिगड़ नहीं जाएगा बल्कि दूध का दूध और पानी का पानी ही हो जाएगा। अगर वो अगले दो तीन दिनों के भीतर भी चंद्रकांत से मिलने नहीं आता तो फिर पक्के तौर पर ये समझ लिया जाएगा कि उसने अपने किसी खास मकसद के चलते ही ये सब किया है।"

"आप बिल्कुल ठीक कह रहे हैं।" महेंद्र सिंह ने सिर हिलाते हुए कहा____"हमें यकीनन दो तीन दिनों तक उसे परखना चाहिए। हालाकि सफ़ेदपोश अथवा किसी का कुछ भी मकसद रहा हो लेकिन ये तो सच है ना कि चंद्रकांत ने अपनी बहू की हत्या कर के अपराध किया है। इस लिए इसे इसके उस अपराध के लिए सज़ा तो मिलेगी ही और सज़ा यही है कि ये अपने दिल में अपनी बहू की हत्या का बोझ लिए जीवन पर तड़पे।"

"ऐसा मत कहिए ठाकुर साहब।" चंद्रकांत फिर से गुहार सा लगा उठा____"मैं इतने संगीन अपराध का बोझ लिए एक पल भी नहीं जी सकूंगा।"

"तुम्हें जीना होगा चंद्रकांत।" महेंद्र सिंह ने सख़्त भाव से कहा____"और हां, खुदकुशी करने का ख़याल अपने ज़हन में लाने का सोचना भी मत। इस बात का ख़याल भी रहे कि अगर तुमने ऐसा किया तो तुम्हारे बाद तुम्हारी बीवी और बेटी का क्या होगा?"

चंद्रकांत कुछ कहने के लिए मुंह खोला लेकिन फिर अपने होंठ भींच लिए उसने। कदाचित बीवी और बेटी की बात सुन कर उसे एकदम से एहसास हुआ था कि वाकई में उसके बाद उनका क्या होगा.....ख़ास कर उसकी फूल सी बेटी का?

"क्या चंद्रकांत के बेटे के हत्यारे के बारे में कुछ पता चला?" पिता जी ने सामान्य भाव से महेंद्र सिंह से पूछा____"काफी समय हो गया उसकी हत्या हुए। हम भी अक्सर सोचते रहते हैं कि रघुवीर की हत्या आख़िर किसने और क्यों की होगी?"

"सच कहें तो ये बड़ा ही पेंचीदा मामला लगता है ठाकुर साहब।" महेंद्र सिंह ने गहरी सांस लेते हुए कहा____"ये सच है कि इतना समय गुज़र जाने के बाद भी अभी तक हमें इस बारे में कुछ भी पता नहीं चल सका है। हमारे आदमी हर उस जगह जांच पड़ताल कर रहे हैं जहां पर ज़रा सा भी रघुवीर का कोई न कोई संबंध था। हर जगह से फिलहाल एक ही ख़बर मिलती है कि रघुवीर की किसी से भी ऐसी दुश्मनी नहीं थी जिसके चलते कोई उसकी इस तरह से हत्या कर देता। हालाकि हम ये भी समझते हैं कि ऐसे मामलों में कोई भी खुल कर कोई बात स्वीकार नहीं करता है लेकिन ऐसा भी नहीं होता है कि किसी पर संदेह ही न हो सके।"

"अगर हत्या करने की वजह का पता चल जाए तो ये समझना भी बेहद आसान हो जाएगा कि रघुवीर का हत्यारा कौन है?" पिता जी ने कहा____"इस दुनिया में बेवजह कुछ नहीं होता इस लिए सबसे पहले हमें उस वजह का पता लगाना होगा जिसके तहत हत्यारे ने रघुवीर की हत्या की। एक बात और, हत्यारे को ये अच्छी तरह पता था कि मौजूदा समय में चंद्रकांत हमें अपना दुश्मन समझता है इस लिए ऐसे समय में अगर रघुवीर की हत्या होगी तो उसका सीधा शक अथवा इल्ज़ाम हम पर लगेगा, जैसा कि चंद्रकांत ने लगाया भी था। इसका फ़ायदा हत्यारे को मिला और अब वो बड़े शान से कहीं न कहीं घूम रहा होगा या ये भी हो सकता है कि हमारे आस पास ही कहीं मौजूद हो कर हमारी हर गतिविधि को देख रहा होगा।"

"पर सवाल तो अब भी वही है कि वो आख़िर है कौन?" ज्ञानेंद्र सिंह ने कहा____"ये तो निश्चित बात है कि उसे रघुवीर की हत्या करने में ये सोच कर बड़ी आसानी रही थी कि रघुवीर की हत्या का इल्ज़ाम सीधा आप पर लगेगा अथवा लगाया जाएगा किंतु खुद वो कौन है और रघुवीर से उसकी क्या दुश्मनी थी?"

"यही तो समझ में नहीं आ रहा ज्ञानेंद्र।" पिता जी ने कहा____"इतना समय गुज़र गया किंतु अभी तक हमें ये समझ नहीं आया कि रघुवीर से उसकी क्या दुश्मनी रही होगी? दूसरी सोचने वाली बात ये भी है कि सफ़ेदपोश को उस हत्यारे के बारे में कैसे पता चला? क्या सच में रजनी ने ही रघुवीर की हत्या की थी?"

"भगवान ही जाने सच क्या है और ये सब किसने किया होगा?" महेंद्र सिंह ने बेचैनी से पहलू बदला____"लेकिन अगर इन दो तीन दिनों के भीतर वो सफ़ेदपोश चंद्रकांत से मिलने आता है तो कदाचित ये समझ आ जाएगा कि सच क्या है? ख़ैर हमें लगता है कि इस बारे में ज़्यादा माथा पच्ची करने से बेहतर यही है कि दो तीन दिनों तक इंतज़ार किया जाए। अब सफ़ेदपोश के चंद्रकांत से मिलने के बाद ही किसी नतीजे पर पहुंचा जा सकता है।"

उसके बाद पंचायत बर्खास्त कर दी गई। महेंद्र सिंह ने चंद्रकांत को हुकुम दिया कि वो दो तीन दिनों तक हर रात उस सफ़ेदपोश के आने का इंतज़ार करे। चंद्रकांत ने ख़ामोशी से सिर हिला दिया। उसके बाद सबको अपने अपने घर जाने को बोल दिया गया। महेंद्र सिंह भी पिता जी से इजाज़त ले कर अपने भाई और अपने आदमियों के साथ जीप में बैठ कर चले गए।

मैंने पिता जी को हवेली छोड़ा और फिर जीप ले कर खेतों की तरफ चल पड़ा। चंद्रकांत का मामला मेरे ज़हन में बसा हुआ था और साथ ही कई तरह के ख़्यालों के चलते मैं उलझन का शिकार भी होता जा रहा था। समझ में नहीं आ रहा था कि आख़िर सफ़ेदपोश की इस तरह से मौजूदगी का क्या मतलब हो सकता था? कहां तो वो मेरी जान लेने के पीछे पड़ा हुआ था और कहां अब वो चंद्रकांत से मिलता नज़र आने लगा था। अचानक ही मेरे ज़हन में सुबह हवेली में शेरा द्वारा कही गई बातें उभर आईं। सफ़ेदपोश को शेरा ने भी अपनी आंखों से चंद्रकांत से मिलते और बातें करते हुए देखा था। उसके बाद उसने उसका पीछा भी किया था। ये अलग बात है कि वो हमारे आमों के बाग़ में एक बार फिर से ग़ायब हो गया था और शेरा उसको पकड़ न सका था।

मैं सोचने पर मजबूर हो गया कि आख़िर हमारे आमों के बाग़ में ही सफ़ेदपोश हर बार क्यों ग़ायब हो जाता है? आमों के बाग़ में ऐसी वो कौन सी जगह पहुंच जाता है जिसके बाद में वो किसी को नज़र ही नहीं आता। मतलब साफ है, आमों के बाग़ में कोई तो ऐसा रहस्यमय स्थान ज़रूर है जहां पर सफ़ेदपोश हमारी नज़रों से खुद को छुपा कर ग़ायब हो जाता है। जीप चलाते हुए मैंने फ़ैसला कर लिया कि मुझे आमों के बाग़ की अच्छे से छानबीन करनी होगी। आख़िर पता तो चले कि ये चक्कर क्या है?​
 
अध्याय - 106
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दोपहर के अभी दो ही बज रहे थे जिसके चलते अच्छी खासी धूप खिली हुई थी। आसमान में बादल तो थे लेकिन शाम से पहले बारिश होने के आसार नहीं नज़र आ रहे थे। मैंने भुवन को भेज कर चार पांच मजदूरों को बुला लिया था और अब खुद भी उन सबके साथ आमों के बाग़ की जांच पड़ताल का काम शुरू कर दिया था।

हमारे बाग़ में क़रीब दो ढाई सौ के आस पास पेड़ थे। दिन में भी सूर्य की तेज़ रोशनी पूरी तरह ज़मीन पर नहीं पहुंच पाती थी। पेड़ों से छन छन कर ही सूर्य का उजाला ज़मीन पर पड़ता था। ज़मीन पर सूखे पत्तों का ढेर सा लगा रहता था जिसके चलते चलने पर आवाज़ें होती थीं।

मैंने भुवन के साथ साथ उसके साथ आए सभी मजदूरों को स्पष्ट शब्दों में हुकुम दिया कि वो सब बाग़ की ज़मीन का बहुत ही बारीकी से मुआयना करें। कहीं पर अगर किसी को कोई गड्ढा भी नज़र आए तो वो उसे अच्छे से देखें। मेरे हुकुम पर सब के सब आंखें फाड़ फाड़ कर बाग़ की ज़मीन को देखने में लग गए थे। अपने अपने हाथों में ली हुई लाठियों से पत्तों को हटा हटा कर सब बड़ी बारीकी से ज़मीन को खंगालने में लगे हुए थे।

"क्या आपको पक्का यकीन है छोटे कुंवर कि इस बाग़ में ऐसी कोई जगह ज़रूर है जिसका उपयोग सफ़ेदपोश अपने ग़ायब होने के लिए करता है?" एक घंटे की मेहनत के बाद भी जब हमें कहीं पर ऐसा कुछ न मिला तो भुवन ने मुझसे कहा_____"क़रीब एक घंटा हो चुका है हमें यहां की ख़ाक छानते हुए लेकिन ऐसी कोई संदिग्ध जगह अभी तक नहीं मिली हमें।"

"हलकान मत हो भुवन।" मैंने कहा____"छान बीन करते रहो। मुझे पूरा यकीन है कि ऐसी कोई जगह इस बाग़ में ज़रूर है। ये बाग़ बहुत बड़ा है इस लिए हमें पूरे बाग़ में देखना होगा। कहीं न कहीं तो ऐसी जगह ज़रूर मिलेगी हमें जिससे हमें ये पता चल जाएगा कि वो सफ़ेदपोश हर बार कैसे यहां आ कर ग़ायब हो जाता है और हमारी पकड़ से दूर चला जाता है?"

मेरे कहने पर भुवन कुछ न बोला। अपने हाथ में लिए लट्ठ से वो ज़मीन पर पड़े सूखे पत्तों को हटा हटा कर ज़मीन का मुआयना करने में लगा हुआ था। मैं खुद भी पूरी सतर्कता से खोज बीन कर रहा था। जैसे जैसे समय गुज़र रहा था वैसे वैसे मेरे चेहरे पर निराशा और बेचैनी बढ़ती जा रही थी। समझ में नहीं आ रहा था कि अगर बाग़ में सचमुच ऐसी कोई जगह नहीं है तो सफ़ेदपोश कैसे यहां से किसी जादू की तरह ग़ायब हो जाता होगा? यही सब सोचते हुए मैं हैरान होने के साथ साथ अब परेशान भी हो उठा था।

पूरा बाग़ छान मारा हमने लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं मिला जो ये साबित करे कि सफ़ेदपोश ऐसी किसी जगह का स्तेमाल कर के हमारी नज़रों से ग़ायब हो जाता था। थक हार कर हम सब बाग़ से निकल कर मकान के पास आ गए।

"वैसे आप किस तरह के स्थान की उम्मीद किए हुए थे छोटे कुंवर?" बाकी मजदूरों को वापस काम पर भेजने के बाद भुवन ने मुझसे पूछा____"जिसके द्वारा वो सफ़ेदपोश ग़ायब हो जाता होगा?"

"सच कहूं तो मेरा ख़याल यही था कि बाग़ में कहीं कोई गुप्त स्थान हो सकता है।" मैंने गहरी सांस छोड़ते हुए कहा____"जिसका स्तेमाल कर के सफ़ेदपोश हर बार हमारी नज़रों से ग़ायब हो जाता है। ऐसा इस लिए क्योंकि अगर वो ज़मीन पर ही भागता हुआ कहीं जाता तो हमें उसकी मौजूदगी का आभास होता रहता। यानि ज़मीन पर पड़े सूखे पत्ते उसके भागने से आवाज़ पैदा करते और हम आसानी से समझते कि वो फला दिशा की तरफ भागता चला जा रहा है। जबकि असल में ऐसा होता ही नहीं है। वो बाग़ में दाखिल होता है...कुछ दूर तक ज़मीन पर पड़े सूखे पत्तों पर उसके भागने से आवाज़ भी होती है लेकिन फिर कुछ ही देर में उसके भागने की आवाज़ चमत्कारिक रूप से बंद हो जाती है। यही एक बात है जिसके चलते मैं इस नतीजे पर पहुंचा था कि बाग़ में कहीं पर कोई गुप्त स्थान होगा जहां पहुंच कर सफ़ेदपोश छुप जाता होगा। इधर हम क्योंकि उसके भागने से उत्पन्न हुई आवाज़ से उसका पीछा करते हैं और जब आवाज़ ही बंद हो जाती है तो हमारे सामने रास्ते ही बंद हो जाते हैं। उसके बाद उसे खोजना वैसा ही हो जाता है जैसे भूसे के ढेर में सुई खोजना।"

"बात तो आपकी दुरुस्त है छोटे कुंवर।" भुवन ने कहा____"लेकिन लगभग दो घंटे की खोजबीन के बाद भी हमें इस बाग़ में ऐसा कोई गुप्त स्थान नहीं मिला।"

"यही तो सोचने वाली बात है भुवन।" मैंने बाग़ की तरफ नज़र डालते हुए कहा____"यही तो आश्चर्य की बात भी है कि अगर ऐसा कोई गुप्त स्थान है ही नहीं तो कैसे वो सफ़ेदपोश इस बाग़ में आ कर हर बार ग़ायब हो जाता है और हम उसे पकड़ नहीं पाते? क्या वो सच में कोई जादू जानता है जिसके चलते वो अपनी जादुई छड़ी घुमा कर पलक झपकते ही ग़ायब हो जाता है? एक पल के लिए अगर ये मान भी लें कि उसके पास कोई जादुई छड़ी है तो फिर उसे ग़ायब होने के लिए इस बाग़ में आने की क्या ज़रूरत है? अपनी जादुई छड़ी के ज़ोर से तो वो कहीं पर भी खड़े खड़े ग़ायब हो सकता है।"

"सही कह रहे हैं आप।" भुवन ने सोच पूर्ण भाव से कहा____"उसके पास अगर कोई जादू की छड़ी होती तो यकीनन वो कहीं पर भी खड़े खड़े पल में ग़ायब हो सकता है। मगर नहीं, वो इस बाग़ में आता है और फिर कुछ ही लम्हों में ग़ायब हो जाता है। अब ऐसा वो कैसे करता है ये तो वही बता सकता है।"

"नहीं भुवन।" मैंने पुनः गहरी सांस ली____"वो भला क्यों अपना कोई भेद बताएगा हमें? उसका भेद तो हमें खुद ही पता करना होगा। कोई न कोई स्थान तो ज़रूर है जहां से वो बड़ी आसानी से ग़ायब हो कर हमारी पकड़ से दूर चला जाता है।"

"बड़ी अजीब बात है।" भुवन ने झुंझलाते हुए कहा____"आख़िर कैसे वो पल में ग़ायब हो जाता होगा? अगर उसे ज़मीन नहीं खा जाती है तो क्या आसमान निगल जाता है?"

"आ....आसमान????" भुवन की बात सुनते ही मैं एकाएक चौंका____"हां हां आसमान।"

"ये आप क्या कह रहे हैं छोटे कुंवर?" भुवन एकदम से चौंका____"कौन आसमान?"

"अरे! आसमान तो एक ही होता है भुवन।" मैं मारे खुशी के बोल पड़ा____"वही जहां पर सूरज चांद और अनगिनत तारे मौजूद होते हैं। तुमने अंजाने में आसमान का नाम लिया तो पलक झपकते ही मेरे ज़हन में बिजली की तरह ये ख़याल उभर आया कि वो हर बार आसमान से ही ग़ायब हो सकता है।"

"आ...आसमान से???" भुवन की आंखें हैरत से फैल गईं____"ये क्या कह रहे हैं आप?"

"मैं वही कह रहा हूं भुवन जो सच है।" मैं अति उत्साह के चलते एक झटके से खड़ा हो गया, फिर बोला____"अभी तक हम ये सोच रहे थे कि उसके ग़ायब होने का राज़ बाग़ की ज़मीन पर ही कहीं होगा और इसी लिए हमने बाग़ की पूरी ज़मीन को खंगाल डाला। मगर मिला कुछ नहीं लेकिन आसमान की तरफ तो हमने देखा ही नहीं।"

"मुझे तो समझ ही नहीं आ रहा कि आप ये अचानक से क्या बोलते चले जा रहे हैं?" भुवन जैसे बुरी तरह उलझ गया____"हमने आसमान की तरफ देखा ही नहीं से क्या मतलब है आपका?"

"आओ मेरे साथ।" मैं तेज़ क़दमों से बाग़ की तरफ बढ़ते हुए बोला____"कुछ देर में तुम खुद ही समझ जाओगे कि मेरे कहने का क्या मतलब है?"

भुवन हैरान परेशान मेरे पीछे चल पड़ा। जल्दी ही हम दोनों बाग़ में पहुंच गए। बाग़ के अंदर कुछ दूर आने के बाद मैं रुक गया। भुवन बेवकूफों की तरह मेरी तरफ ही देखे जा रहा था।

"अब ऊपर देखो ज़रा।" मैंने भुवन को जैसे नींद से जगाया____"और बताओ क्या नज़र आ रहा है तुम्हें?"

मेरे कहने पर भुवन पहले तो चौंका और फिर जल्दी से ऊपर देखने लगा। ऊपर उसे पेड़ों की फैली हुई शाखाएं ही दिख रहीं थी जिनके बीच से निकल कर सूर्य की किरणें ज़मीन पर पहुंच रहीं थी।

"क्या नज़र आ रहा है तुम्हें?" मैंने भुवन से पूछा तो उसने ऊपर देखते हुए ही कहा____"ऊपर तो पेड़ों की बहुत सारी शाखाएं ही दिख रही हैं छोटे कुंवर।"

"उन शाखाओं को देखने से क्या महसूस होता है तुम्हें?" मैंने उससे पूछा।

"आख़िर आप कहना क्या चाहते हैं?" भुवन ने गर्दन मेरी तरफ घुमा कर पूछा____"शाखाओं को देख कर तो मुझे यही महसूस हो रहा है कि यहां सूरज की धूप नहीं है बल्कि छांव है जिसके चलते अच्छा महसूस हो रहा है। ठंडी ठंडी हवा लग रही है जिससे मन करता है कि यहीं बैठा जाएं।"

"एकदम गधे हो तुम?" मैंने उसे घूरते हुए कहा तो वो एकदम से सकपका गया।

"क्या मैंने कुछ ग़लत कहा छोटे कुंवर?" फिर उसने सिर खुजाते हुए कहा। अंदाज़ ऐसा था जैसे कुछ सोचने लगा हो।

"तुमने अभी जो कहा वो सब एक सामान्य सी बातें हैं जोकि सच हैं।" मैंने कहा____"लेकिन तुम भूल गए हो कि यहां हम सफ़ेदपोश के बारे में पता करने के उद्देश्य से आए हैं। मैंने तुमसे पेड़ों की इतनी सारी शाखाओं को देखने के बाद पूछा कि कैसा महसूस हुआ तो तुम्हें समझ जाना चाहिए था कि शाखाओं में ही वो बात है जिसे तुम्हें समझना था।"

मेरी बात सुनते ही भुवन जल्दी से सिर उठा कर पेड़ों की शाखाओं को ध्यान से देखने लगा। उसकी नज़रें पेड़ों की शाखाओं पर ही जम गईं थी। तभी उसके चेहरे के भाव बदले और वो अपनी निगाहों को एक शाख से दूसरी शाख पर इस तरह धीरे धीरे ले जाने लगा जैसे किसी चीज का पीछा कर रहा हो। अगले कुछ ही पलों में उसके चेहरे पर एक खास किस्म की चमक उभर आई जिसके चलते उसके होठों पर मुस्कान उभर आई।

"मेरा ख़याल है कि अब तुम समझ चुके हो कि मैं तुम्हें क्या महसूस कराना चाहता था?" मैंने हल्के से मुस्कुराते हुए कहा।

"देर से समझा लेकिन समझ गया छोटे कुंवर।" भुवन ने मुस्कुराते हुए कहा____"मैं समझ गया कि आसमान की बात से आपका क्या मतलब था।"

"तो बताओ।" मैंने कहा____"ये सब कुछ देख कर किस नतीजे पर पहुंचे तुम?"

"यही कि सफ़ेदपोश के ग़ायब होने का राज़ पता कर लिया है हमने।" भुवन ने खुशी से मुस्कुराते हुए कहा____"यानि अब हमें समझ आ गया है कि वो बाग़ में आने के बाद किस तरीके से एक पल में ग़ायब हो जाता है। इसके पहले हम ये सोच रहे थे कि बाग़ की ज़मीन पर ही कोई गुप्त स्थान उसने बना रखा रहा होगा जहां पहुंच कर वो छुप जाता था और इसी लिए हमने बाग़ की पूरी ज़मीन को खंगाल डाला मगर हमें कुछ न मिला। किंतु अब इन पेड़ों की शाखाओं को देख कर समझ आ गया है कि वो कैसे ग़ायब हो जाता है। यानि वो यहां आता है और फिर किसी न किसी पेड़ पर चढ़ जाता है। पेड़ों की शाखाएं क्योंकि दूसरे पेड़ों की शाखाओं से जुड़ी हुई हैं इस लिए वो शाखाओं के द्वारा यहां से दूर निकल जाता है और हम ये सोचते रह जाते हैं कि वो ग़ायब कैसे हो गया?"

"बिल्कुल सही कहा तुमने।" मैंने कहा____"लेकिन ज़रूरी नहीं कि यही सच हो। ऐसा इस लिए क्योंकि रात के वक्त अंधेरे में शाखाओं के द्वारा इतने बड़े बाग़ से बाहर निकल जाना बिल्कुल भी आसान काम नहीं है। ज़रा सी असावधानी के चलते इंसान शाखाओं से फिसल कर नीचे ज़मीन पर भी गिर सकता है और ज़ाहिर है इससे हाथ पैर मुंह नाक आदि को क्षति पहुंच सकती है। सफ़ेदपोश भी इस बात को भली भांति समझता होगा इस लिए वो रात के अंधेरे में पेड़ों की शाखाओं पर चलते हुए यहां से निकलने का ख़याल अपने ज़हन में नहीं लाएगा।"

"अगर ऐसा है।" भुवन ने कहा____"तो फिर वो यहां से निकलता कैसे होगा?"

"जैसे हर इंसान निकलता है।" मैंने कहा____"बिल्कुल सामान्य तरीके से। मेरे कहने का मतलब है कि वो यहां आते ही किसी पेड़ पर चढ़ जाता होगा और फिर वो पेड़ की किसी शाख पर तब तक बैठा रहता होगा जब तक कि उसे ये यकीन न आ जाए कि उसके पीछे उसका पीछा करने आए लोग हताश हो कर वापस नहीं चले गए हैं। सीधी सी बात है कि अगर हमें ये एहसास हो जाए कि जिसका हम पीछा कर रहे हैं वो किसी जादू की तरह ग़ायब हो चुका है और अब हम उसे किसी भी हालत में पकड़ नही पाएंगे तो यकीनन हताश हो कर कुछ देर में हम वापस लौट जाएंगे। अब तुम समझ ही सकते हो कि इसके बाद सफ़ेदपोश के लिए यहां से निकल जाने का रास्ता कितना आसान हो जाएगा।"

"सही कह रहे हैं आप।" भुवन को जैसे अब पूरी बात समझ में आ गई थी, बोला____"वाकई ऐसे में सचमुच बड़ी आसानी से वो यहां से निकल सकता है। जब उसका पीछा करने वाला यहां कोई रहेगा ही नहीं तो उसके लिए कोई समस्या वाली बात भी नहीं रह जाएगी। यानि वो बड़े आराम से पेड़ से वापस नीचे उतरेगा और फिर बेफिक्र हो कर यहां से चला जाएगा।"

"आओ अब ज़रा ये देख लेते हैं कि वो यहां से किस तरफ जाता होगा?" मैंने आगे क़दम बढ़ाते हुए कहा____"ये तो स्पष्ट है कि पेड़ से उतरने के बाद वो वापस हमारे मकान की तरफ नहीं जाता होगा क्योंकि उसे भी इस बात का अंदेशा रहता होगा कि कोई न कोई रात में भी मकान में मौजूद हो सकता है। इस लिए वो उस तरफ वापस जा कर अपने लिए किसी भी तरह का ख़तरा मोल नहीं लेगा। यानि वो अपनी असल मंजिल पर जाने के लिए कोई दूसरा ही रास्ता चुनेगा। हमें यही देखना है कि यहां से वो किस तरफ जाता होगा?"

भुवन मेरी बात से पूर्णतः सहमत था इस लिए बिना कुछ कहे ही सिर हिला कर मेरे पीछे पीछे चल पड़ा। हम दोनों इधर उधर का जायजा लेते हुए आगे बढ़ने लगे थे। कुछ ही देर में हम घने पेड़ पौधों के बीच से चलते हुए एकाएक बाग़ से बाहर आ गए। सामने क़रीब पांच क़दम की दूरी पर एक बड़ी और मोटी सी मेढ़ थी जोकि सरहद का भी काम करती थी। मेढ़ हमारी ही थी और क़रीब सात आठ फीट ऊंची थी। मेढ़ के उस पार की ज़मीन हमारी नहीं बल्कि साहूकारों की थी। मैं और भुवन उस ऊंची मेढ़ पर चढ़ गए। सामने खेत ही खेत थे जिनमें उगी हुई धान के पौधों की हरियाली बड़ी ही खूबसूरत नज़र आ रही थी। मेरी निगाह चारो तरफ दौड़ते हुए एक तरफ जा कर ठहर गई। दूर साहूकारों के घर नज़र आ रहे थे। उनके घरों के पीछे क़रीब दो सौ मीटर की दूरी पर उनके आमों का बगीचा दिख रहा था। थोड़ी और दूर निगाह डालने पर मुझे गांव के बाकी घर नज़र आए।

"क्या आप भी वही सोच रहे हैं जो मैं सोच रहा हूं?" सहसा भुवन ने हमारे बीच की ख़ामोशी को तोड़ा तो मैंने उसकी तरफ देखा।

"तुम क्या सोच रहे हो?" मैंने सामान्य भाव से पूछा।

"यहां तक आपके ज़मीनों की सरहद है।" भुवन ने जैसे कोई भूमिका बनाते हुए कहा____"इस मेढ़ के बाद गांव के साहूकारों की ज़मीनें शुरू होती हैं और यहां से हमें उनके घर भी नज़र आ रहे हैं। मैं ये सोच रहा हूं कि क्या सफ़ेदपोश का ताल्लुक साहूकारों से हो सकता है? स्पष्ट शब्दों में ये कि क्या साहूकारों के घर का ही कोई सदस्य सफ़ेदपोश हो सकता है?"

"बहुत खूब।" मैं भुवन की दूरदर्शिता से प्रभावित हो कर बोला____"सच कहूं तो मैं भी यही सोच रहा हूं लेकिन....।"

"लेकिन??" भुवन के माथे पर शिकन उभरी।

"सोचने वाली बात है कि अगर ऐसा मान भी लें तो उनके घर का वो कौन सदस्य हो सकता है जिसे हम सफ़ेदपोश कह सकें?" मैंने कहा____"आज के समय में उनके घर में सिर्फ दो ही मर्द बचे हैं____गौरी शंकर और रूपचंद्र। गौरी शंकर को क्योंकि गोली लगी थी जिसके चलते उसका एक पैर सही से काम ही नहीं करता है और वो लंगड़ा कर चलता है। शेरा के अनुसार उस रात सफ़ेदपोश बड़ा तेज़ भागता हुआ हमारे बाग़ की तरफ जा रहा था। ज़ाहिर है अगर वो लंगड़ा होता तो इतना तेज़ नहीं भाग सकता था कि शेरा जैसा तंदुरुस्त व्यक्ति उस तक पहुंच ही ना पाता। मतलब स्पष्ट है वो गौरी शंकर नहीं हो सकता। अब बचा रूपचंद्र, तो मुझे नहीं लगता कि वो सफ़ेदपोश हो सकता है।"

"ऐसा क्यों?" भुवन ने कहा____"भला रूपचंद्र सफ़ेदपोश क्यों नहीं हो सकता? वो भी तो आपकी जान का दुश्मन था।"

"बेशक।" मैंने कहा____"लेकिन ये भी सच है कि वो मुझे अपना दुश्मन सिर्फ इसी लिए समझता था क्योंकि उसके अनुसार मैंने उसकी बहन की इज्ज़त ख़राब करके उसकी ज़िंदगी बर्बाद की थी। अब जबकि उसकी बहन से मेरा ब्याह होना ही तय हो गया है तो वो भला क्यों मेरी जान लेने का सोचेगा? उसे भी पता है कि उसकी बहन मुझे कितना प्रेम करती है। यानि एक तरह से उसकी बहन की खुशी सिर्फ मुझे हासिल कर लेने से ही है। मुझे अच्छी तरह पता है कि वो अपनी बहन की खुशियों का गला नहीं घोंट सकता। तुम्हें शायद पता नहीं है अभी, एक समय था जब रूपचंद्र अपनी बहन रूपा को अपनी जान से भी ज़्यादा चाहता था। उसकी बहन ने ये बातें खुद मुझे बताई थीं।"

"तो आप सिर्फ इसी वजह से उसे सफ़ेदपोश नहीं कह सकते?" भुवन ने कहा____"जबकि आपको ये भी नहीं भूलना चाहिए कि ये वही साहूकार हैं जो कुछ दिनों पहले तक आपको ही नहीं बल्कि आपके पूरे परिवार को ख़त्म कर देने की राह पर चले थे। छोटे ठाकुर और बड़े कुंवर को तो उन्होंने अपनी दुश्मनी के चलते मौत के घाट उतार भी दिया है। क्या आपको लगता है कि वो कभी भरोसे के लायक हो सकते हैं?"

"लगता तो नहीं भुवन लेकिन मैं ये भी जानता हूं कि हर व्यक्ति को एक दिन अपनी ग़लतियों का एहसास होता है।" मैंने कहा____"और जिस दिन व्यक्ति को अपनी ग़लतियों का एहसास हो जाता है समझ लो उसी दिन उसका कायाकल्प हो जाता है। वो सुधर जाता है और फिर कभी ग़लत करने का ख़याल भी अपने ज़हन में नहीं लाता। इसका सबसे बड़ा उदाहरण मैं खुद हूं। तुम मेरे बारे में तो सब कुछ जानते हो। क्या तुम कभी कल्पना कर सकते थे कि मेरे जैसा इंसान एक दिन यूं बदल जाएगा और एक अच्छा इंसान बनने की राह पर चलने लगेगा? जब मेरे जैसा इंसान बदल सकता है तो मैं यही समझता हूं कि दुनिया का हर व्यक्ति बदल सकता है। देर से ही सही लेकिन इंसान बदलता ज़रूर है।"

"चलिए मान लिया मैंने।" भुवन ने कहा____"अब सवाल ये है कि अगर सफ़ेदपोश गौरी शंकर या रूपचंद्र में से कोई नहीं है तो फिर कौन हो सकता है? इतना ही नहीं हर बार वो हमारे ही बाग़ की तरफ आ कर यहां से ग़ायब क्यों होता है?"

"यकीनन, ये सवाल किसी चकरघिन्नी की तरह मेरे अपने मन में भी घूम रहा है।" मैंने सोचने वाले अंदाज़ से कहा____"अगर उसे ग़ायब ही होना होता है तो उसको हमारे बाग़ में आने की क्या ज़रूरत है? वो किसी दूसरी जगह से भी तो ग़ायब हो सकता है? हमारे बाग़ में आने के पीछे उसका मकसद क्या सिर्फ ये हो सकता है कि वो हमें अपने बारे में हमेशा उलझाए रखना चाहता है? यानि वो नहीं चाहता कि हम सही दिशा में चल कर उस तक पहुंच पाएं। हां शायद यही हो सकता है। तभी तो उस रात चंद्रकांत से मिलने के बाद उल्टा वो हमारे बाग़ की तरफ आया। उस वक्त भले ही उसे शेरा द्वारा अपना पीछा किए जाने का आभास न हुआ हो लेकिन बाद में तो हो ही गया था। इसके बावजूद वो हर बार इतना बड़ा ख़तरा मोल लेता है और खुद को ग़ायब करने के साथ साथ हमें इसी तरह उलझाने के लिए हमारे बाग़ की तरफ आता है। क्या तुम सोच सकते हो कि उसके जैसा शातिर व्यक्ति हमें उलझाने के लिए ही नहीं बल्कि अपनी असलियत छुपाने एक लिए भी इतना बड़ा ख़तरा मोल ले सकता है?"

"शातिर तो वो है छोटे कुंवर और इसमें कोई शक वाली बात नहीं है।" भुवन ने कहा____"मगर सबसे बड़ा सवाल यही है कि वो आख़िर है कौन?"

"यहां आने से पहले हम ये सोच भी नहीं सकते थे कि वो ऐसा सिर्फ हमें उलझाने के लिए करता है।" मैंने कहा____"अभी तक हम यही सोच रहे थे कि वो बाग़ में ही कहीं ग़ायब हो जाता है। मैंने तो ये तक सोच लिया था कि उसने बाग़ में ही कहीं कोई सुरंग बना रखी होगी जो अंदर ही अंदर उसे उसके घर तक पहुंचा देती होगी। लेकिन यहां आने के बाद अब ऐसा भी प्रतीत होता है जैसे वो हमें इसके अलावा भी कुछ और संदेश देना चाहता है।"

"क..कैसा संदेश?" भुवन चौंका।

"हो सकता है कि मेरा ऐसा सोचना महज वहम के सिवा कुछ न हो।" मैंने कहा____"लेकिन ये भी हो सकता है कि उसमें सच्चाई भी हो। ख़ैर ये तो अब पक्का हो चुका है कि सफ़ेदपोश हर बार इसी तरीके से और इसी रास्ते से निकल जाता रहा है लेकिन सवाल है कि इसी रास्ते से ही क्यों? क्या वो मेरे दिमाग़ में ये बात बैठाना चाहता है कि मैं ये सोचूं कि सफ़ेदपोश साहूकार के घर का ही कोई है?"

"वो जान बूझ कर भला खुद ही क्यों अपने बारे में ऐसा ज़ाहिर कर देना चाहेगा?" भुवन ने हैरानी से मेरी तरफ देखते हुए कहा____"ये तो वही बात हुई कि आ बैल मुझे मार अथवा अपने ही हाथों अपने पांव में कुल्हाड़ी मार लेना।"

"बिल्कुल सही कहा तुमने।" मैंने खुशी से झूमते हुए कहा____"असल में अपने सवाल के जवाब में तुमसे यही सुनना चाहता था मैं। यकीनन वो ऐसा नहीं कर सकता। मतलब साफ है, वो जान बूझ कर हमारी सोच के दायरे को साहूकारों की तरफ मोड़ देना चाहता था। मकसद स्पष्ट था कि हम उसके ऐसा करने से उलझ तो जाएं ही किंतु साथ ही असल रास्ते से भी भटक जाएं।"

"फिर तो घूम फिर कर हम फिर से वहीं आ गए छोटे कुंवर।" भुवन ने गहरी सांस ली____"इतनी सारी बातें सोच डाली हम दोनों ने लेकिन लगता है इससे और भी ज़्यादा उलझ गए हैं हम जबकि सवाल ये था कि आख़िर कौन हो सकता है वो सफ़ेदपोश?"

सच ही तो कहा था भुवन ने। मैं वाकई इतनी सारी बातें सोच कर और भी ज़्यादा उलझ गया था और उसके बारे में किसी ठोस निष्कर्ष पर नहीं पहुंच पाया था। मैंने फ़ौरन ही अपने ज़हन को झटका और वापस चल पड़ा। कुछ ही देर में हम दोनों अपने मकान के पास पहुंच गए। भुवन को यहां का काम देखने का बोल कर मैं जीप ले कर निकल गया।​
 
अध्याय - 107
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सच ही तो कहा था भुवन ने। मैं वाकई इतनी सारी बातें सोच कर और भी ज़्यादा उलझ गया था और उसके बारे में किसी ठोस निष्कर्ष पर नहीं पहुंच पाया था। मैंने फ़ौरन ही अपने ज़हन को झटका और वापस चल पड़ा। कुछ ही देर में हम दोनों अपने मकान के पास पहुंच गए। भुवन को यहां का काम देखने का बोल कर मैं जीप ले कर निकल गया।

अब आगे....


मेरी जीप मुरारी काका के घर के बाहर जा कर रुकी। पूरे रास्ते मैं यही सोचते हुए आया था कि अनुराधा जब मेरे सामने होगी तो उससे क्या बातें करूंगा और वो खुद मुझसे क्या कहेगी? सवाल तो ये भी था कि क्या वो मुझसे खुल कर बातें कर पाएगी या पहले की ही तरह छुई मुई बनी रहेगी?

शायद जीप के इंजिन की आवाज़ अंदर तक पहुंच गई थी तभी तो जैसे ही मैं जीप से उतर कर दरवाज़े के पास पहुंचा तो झटके से दरवाज़ा खुल गया। अगले ही पल, जिस चेहरे पर मेरी नज़र पड़ी उसे देखते ही मेरा दिल थम सा गया और यकीनन यही हाल उस चेहरे वाली का भी हुआ होगा।

दरवाज़े के बीचो बीच अनुराधा खड़ी थी। हम दोनों की नज़रें जैसे ही चार हुईं तो जैसे हम दोनों ही पलकें झपकाना भूल गए। मैं तो चाहता था कि ये वक्त अब बस यहीं पर रुक जाए किंतु शायद ऊपर वाले को कुछ और ही मंज़ूर था। कुछ ही देर में जैसे उसे होश आ गया तो वो एकदम से हड़बड़ा गई और झट से नज़रें झुका ली उसने। गुलाब की पंखुड़ियों जैसे होठों पर ऐसी मुस्कान थिरक उठी जो उसके लाख चाहने पर भी ग़ायब न हो सकी। उसे इस हालत में देख कर मैं भी मुस्कुरा उठा।

हल्के सुर्ख रंग का घाघरा पहन रखा था उसने। घाघरा जो उसके हल्के सांवले घुटनों तक था और चोली जो उसके सीने को ढंकते हुए पेट तक पहुंच रही थी। उसके पेट का थोड़ा हिस्सा दिख रहा था जिसके बीच में उसकी गहरी और खूबसूरत सी नाभी स्पष्ट नज़र आ रही थी। गले में काले रंग का धागा था जिसमें एक ताबीज़ बंधा हुआ था। उसके नीचे चोली में क़ैद उसके मध्यम आकार के उभार, जो यूं तने हुए थे जैसे छोटे छोटे पर्वत शिखर की नुकीली दो चोटियां हों। सिर के बाल यूं तो चोटी की शक्ल में बंधे हुए थे किंतु बाएं तरफ के कुछ बालों की लट झूलती हुई उसके बाएं गाल को चूमती सी प्रतीत हो रही थी। तभी सहसा वो हड़बड़ाई तो मैं चौंक पड़ा और साथ ही ख़यालों से बाहर आया।

अनुराधा बड़ी तेज़ी से पलटी और फिर भागते हुए अंदर की तरफ चली गई। मुझे समझ न आया कि अचानक से उसे ये क्या हुआ? धड़कते दिल के साथ मैंने दरवाज़े के अंदर क़दम रखा और फिर चलते हुए आंगन में आ गया। निगाह चारो तरफ घुमाई लेकिन कोई नज़र ना आया। मन में सवाल उभरा कि सरोज काकी और उसका बेटा अनूप कहीं दिख क्यों नहीं रहे?

अभी मैं ये सोच ही रहा था कि तभी अंदर कमरे से निकल कर अनुराधा बरामदे में आ कर खड़ी हो गई। मैंने देखा वो दोनों हाथों से अपने दुपट्टे को दुरुस्त कर रही थी। ये देख कर मेरे दिमाग़ में बिजली सी चमकी और एक ही पल में समझ आ गया कि वो क्यों पलट कर तेज़ी से भागते हुए अंदर की तरफ गई थी। कुछ पलों तक उसकी तरफ देखने के बाद मैंने एक बार फिर से चारो तरफ निगाह घुमाई किंतु कोई नज़र ना आया।

"कमाल है।" फिर मैंने बरामदे में चुपचाप खड़ी अनुराधा की तरफ देखते हुए कहा____"घर आए मेहमान को कोई बैठने तक को नहीं कह रहा। मैंने तो यहां आने से पहले जाने क्या क्या उम्मीदें लगा ली थी। ख़ैर लगता है किसी को मेरे यहां आने से ना तो कोई ख़ुशी हुई है और ना ही शायद कोई फ़र्क पड़ा है। अगर वाकई ऐसा है तो मुझे फ़ौरन ही यहां से वापस लौट जाना चाहिए। आख़िर मुझे अपने आत्म सम्मान का भी तो ख़याल रखना चाहिए।"

कहने के साथ ही मैं पलट गया और दरवाज़े की तरफ बढ़ चला। अभी मैं दो ही क़दम आगे बढ़ा था कि तभी पीछे से अनुराधा की घबराई और हड़बड़ाई हुई आवाज़ सुनाई दी____"न..नहीं, रुक जाइए।"

अनुराधा की आवाज़ सुन कर मैं अपनी जगह पर रुक गया लेकिन पलट कर उसकी तरफ देखा नहीं। मैं जानता था कि मेरे सामने वो खुल कर ज़्यादा बोल नहीं पाती है। इस वक्त मेरे इस तरह चल पड़ने से यकीनन उसके होश उड़ गए थे। आख़िर चाहती तो वो भी थी कि मैं कहीं न जाऊं।

"भगवान के लिए रुक जाइए न।" उसने फिर से मुझे पुकारा। उसकी आवाज़ में कम्पन था, बोली____"और मुझे माफ़ कर दीजिए कि मैंने आपको बैठने के लिए नहीं कहा। आपको यहां देख कर मुझे कुछ समझ ही नहीं आ रहा था कि क्या कहूं? आप कहीं मत जाइए न।"

अब मुझसे एक पल भी रुका न गया। उसकी मासूमियत से कही गई ये बातें मुझे अंदर तक झकझोर गईं थी। दिल बुरी तरह मचल उठा था। मैं एक झटके से पलटा और लगभग भागते हुए बरामदे में उसके क़रीब पहुंचा। वो मुझे इस तरह अपनी तरफ आते देख एकदम से घबराई हुई नज़र आई किंतु इससे पहले कि वो कुछ करती या कहती मैंने उसे पकड़ कर अपने सीने से लगा लिया।

आह! कितनी नाज़ुक थी वो। जैसे ही मैंने उसे अपने सीने से लगाया तो मैंने महसूस किया कि उसका समूचा जिस्म एकदम से थरथरा उठा है। कदाचित उसको मुझसे ऐसे कृत्य की सपने में भी उम्मीद नहीं थी। मैंने उसको ज़ोर से कस कर छुपका लिया था और वो बुत सी खड़ी रह गई थी। ऐसा लगा जैसे वक्त अपनी जगह पर ठहर गया था। एकदम ख़ामोशी छा गई थी।

तभी जैसे उसे होश आया तो उसके जिस्म में हलचल हुई। मैंने महसूस किया कि उसके दोनों हाथ ऊपर उठे और कुछ ही पलों में मेरी पीठ पर आहिस्ता से जम गए। मैंने उसे और ज़ोर से कस लिया। अपने सीने से थोड़ा नीचे मुझे उसके सीने के दोनों कोमल उभार चुभते से महसूस हुए।

"अ...अब छोड़ दीजिए न छोटे कुंवर।" कुछ ही देर में उसने जल्दी से अपने हाथ नीचे कर के मुझसे छूटने की कोशिश करते हुए मगर लरजते स्वर में कहा____"म...मां आ जाएगी।"

"आ जाने दो।" मैंने उसे और ज़ोर से भींच लिया____"मुझे अब किसी की परवाह नहीं है। मैंने अपनी होने वाली बीवी को सीने से लगाया हुआ है, किसी ग़ैर को नहीं।"

"हाय राम!" वो एकदम से हड़बड़ाई____"ये क्या कह रहे हैं?"
"सच ही तो कह रहा हूं।" मैंने मुस्कुराते हुए कहा____"तुम मेरी होने वाली बीवी ही तो हो।"

"अच्छा अब छोड़ दीजिए ना।" वो कसमसाते हुए बोली____"मां ने देख लिया तो बहुत डांटेगी मुझे।"

मुझे भी लगा इससे ज़्यादा उसे नहीं सताना चाहिए इस लिए मैंने उसे ख़ुद से अलग कर दिया लेकिन रहा उसके क़रीब ही। मैंने देखा, उसके चेहरे पर लाज की सुर्खी छा गई थी। चेहरे पर मारे घबराहट के ढेर सारा पसीना भी उभर आया था। तेज़ चलती सांसों के चलते उसके सीने के दोनों पर्वत शिखर तेज़ी से ऊपर नीचे हो रहे थे। जैसे ही हम दोनों की नज़रें मिलीं तो उसने झट से अपनी नज़रें झुका ली। कांपते होठों पर बेहद ही गहरी मुस्कान थी जिसे वो छुपाने की नाकाम कोशिश कर रही थी।

"आप बैठिए मैं आपके लिए पानी और गुड़ ले के आती हूं।" फिर उसने सिर उठा कर हड़बड़ाते हुए जल्दी से कहा और फिर पलट कर जैसे ही जाने लगी तो मैंने झट से उसका हाथ पकड़ लिया।

"इसकी कोई ज़रूरत नहीं है।" कहने के साथ ही मैंने उसके हाथ को हल्के से झटका दिया तो वो एकदम से खिंचते हुए मुझसे आ टकराई। उसके दोनों पर्वत शिखर मेरे सीने से टकरा गए तो हम दोनों के ही मुंह से आह निकल गई। उसने घबरा कर मुझे देखा और फिर जल्दी ही मुझसे दूर हो गई।

"य...ये क्या कर रहे हैं आप?" वो बुरी तरह घबराई हुई नज़र आई____"छोड़ दीजिए ना। मां आ जाएगी तो मुझे बहुत डांटेगी। आप बैठिए मैं आपके लिए....।"

"तुम इतना घबरा क्यों रही हो?" मैंने उसका हाथ अभी भी पकड़ रखा था, बोला____"क्या अभी भी तुम्हें ये लगता है कि मैं तुम्हारे साथ कुछ ग़लत करने की नीयत रखता हूं?"

"न...नहीं...नहीं तो।" उसने मुझसे नज़रें चुराते हुए कहा____"ऐसी तो कोई बात नहीं है छोटे कुंवर।"

"तो फिर कैसी बात है ठकुराईन?" मैंने मुस्कुराते हुए उसकी तरफ देखा। मेरे मुख से अपने लिए ठकुराईन सुन कर वो चौंकी और फिर मेरी तरफ अपलक देखने लगी।

उसकी बड़ी बड़ी आंखों में पलक झपकते ही मुझे आंसू के कतरे उभरते नज़र आए। कांपते होठों से वो मुझे दीवानावार सी हो कर देखने लगी। अगले ही पल जाने उसे क्या हुआ कि वो लपक कर मुझसे लिपट गई। मेरी पीठ पर अपने दोनों हाथ कसे और मेरे सीने में खुद को छुपाए वो एकदम से सिसक उठी।

"अरे! क्या हुआ?" मैंने उसकी पीठ को हल्के से सहलाते हुए पूछा____"क्या तुम्हें मेरा ठकुराईन कहना अच्छा नहीं लगा?"

"म...मुझे बहुत अच्छा लगा है छोटे कुंवर।" उसने और ज़ोर से सिसकते हुए कहा____"आपसे यही सुनने के लिए तो इतने समय से तरस रही थी मैं।"

"अच्छा तो फिर रो क्यों रही हो अब?" मैंने हौले से उसे खुद से अलग किया।

उसका चेहरा इन कुछ ही पलों में आंसुओं से तर हो गया था। उसकी ये हालत देख मेरे अंदर एक टीस सी उभरी। मन में ख़याल उभरा कि कितनी मासूम है मेरी जान।

"य...ये तो खुशी से रोना आ गया है मुझे।" उसने झट से अपने आंसू पोछते हुए मेरी तरफ देखा____"आख़िर आपने मुझे फिर से ठकुराईन जो कह दिया।"

"अरे! तुम तो मेरी ठकुराईन ही हो इस लिए पहले भी कहता था।" मैंने मुस्कुराते हुए उसकी गहरी आंखों में झांका____"और अब तो हमेशा ही कहूंगा।"

"अच्छा ऐसा क्यों?" उसने हौले से मेरी तरफ देखते हुए मासूमियत से पूछा।
"क्योंकि अब तुम मेरी धर्म पत्नी जो बनने वाली हो।" मैंने कहा____"और इस ठाकुर वैभव सिंह की ठकुराईन भी।"

अनुराधा बुरी तरह शर्मा गई। उसका सांवला चेहरा शर्म से लाल पड़ता चला गया। गुलाब की पंखुड़ियों जैसे होठों पर फिर से गहरी मुस्कान उभर आई। वो पहले की अपेक्षा मुझसे थोड़ा खुल तो गई थी लेकिन अभी भी काफी झिझक थी उसमें।

"अच्छा अब आप बैठिए।" उसने अपना हाथ मेरे हाथ से छुड़ाते हुए कहा____"मैं आपके लिए पानी और गुड़ लाती हूं।"

"पर मुझे तो गुड़ से भी ज़्यादा मीठी चीज़ चाहिए।" मैंने मंद मंद मुस्कुराते हुए कहा____"तभी पानी पियूंगा वरना नहीं।"

"गु...गुड़ से भी ज़्यादा मीठा?" अनुराधा के माथे पर एकदम से शिकन उभर आई____"क्या गुड़ से भी ज़्यादा कोई मीठी चीज़ होती है?"

"हां, बिल्कुल होती है।" मेरी मुस्कान गहरी हो गई____"बल्कि मेरा मानना तो ये है कि उससे ज़्यादा मीठी चीज़ इस दुनिया में कुछ होती ही नहीं है।"

"हाय राम! क्या सच में?" अनुराधा की आंखें अविश्वास से फैल गईं। फिर बड़ी उत्सुकता के साथ पूछा उसने____"मुझे भी बताइए ना उस चीज़ के बारे में? मैं तो अभी तक यही समझती थी कि गुड़, चिनी और शहद से ज़्यादा मीठा कुछ भी नहीं होता।"

"अरे! होता है ठकुराईन।" मैंने कहा____"जिन मीठी चीज़ों का तुमने नाम लिया है उनसे भी कहीं ज़्यादा मीठी होती है वो चीज़। इसी लिए तो कहा तुमसे कि मुझे वही मीठी चीज़ चाहिए तभी पानी पियूंगा।"

"पर मुझे तो पता ही नहीं है कि वो मीठी चीज़ क्या है तो कैसे दूं आपको?" कहते हुए अनुराधा का चेहरा इस तरह उतर गया जैसे ऐसी मीठी चीज़ का उसके पास न होने का उसे भारी अफसोस और दुख हुआ है। बड़ा ही संजीदा हो कर बोली____"क्या करें, हम ग़रीब लोग हैं छोटे कुंवर। ऐसी मीठी चीज़ खरीदने की औकात ही नहीं है हमारी। आप गुड़ से ही काम चला लीजिए ना।"

"ये तुमसे किसने कहा कि ऐसी मीठी चीज़ खरीदने से मिलती है?" मैंने कहा____"अरे! वो तो सबके पास होती है लेकिन असल में सच ये है कि इंसान को वो चीज़ तभी मीठी लगती है जब उसे कोई ख़ास व्यक्ति चखने को देता है।"

"बड़ी अजीब बातें कर रहे हैं आप।" अनुराधा का सिर जैसे चकरा गया____"मुझे तो कुछ समझ में ही नहीं आ रहा। आप ही बताइए उस मीठी चीज़ के बारे में।"

"ठीक हैं मैं तुम्हें बताए देता हूं।" मैंने मुस्कुराते हुए कहा____"लेकिन मेरी एक शर्त है। अगर तुम्हें शर्त मंजूर हो तो बोलो, तभी बताऊंगा वरना नहीं।"

"अब ये क्या बात हुई भला?" अनुराधा और भी ज़्यादा चकरा गई।

"बात तो बात ही हुई ठकुराईन।" मैंने बड़ी मुश्किल से अपनी हंसी को रोकते हुए कहा____"इतनी बड़ी चीज़ के बारे में तुम्हें बताऊं और फिर बाद में वो तुम मुझे न दो तो मेरे बताने का क्या फ़ायदा? वैसे भी तुम्हारे घर आया हूं तो ये तुम्हारा फर्ज़ है कि घर आए मेहमान का स्वागत करो।"

"हां तो स्वागत करने से कहां मना कर रही हूं मैं?" अनुराधा ने भोलेपन से कहा____"गुड़ और पानी देने ही तो जा रही थी मैं लेकिन आप ही ऐसी कोई मीठी चीज़ मांग रहे हैं जिसके बारे में मैं खुद ही नहीं जानती।"

"अच्छा ठीक है मैं तुम्हें उस मीठी चीज़ के बारे में बताए देता हूं।" मैंने कहा____"लेकिन तुम्हें भी वादा करना होगा कि जानने के बाद तुम मुझे वो मीठी चीज़ दे कर ही पानी पिलाओगी।"

"हां हां मैं आपसे वादा करती हूं।" अनुराधा ने कहा____"आप बताइए तो सही कि वो मीठी चीज़ है क्या। मेरे पास कुछ पैसे रखे हैं तो मैं दुकान से खरीद कर झट से ले आऊंगी।"

"अरे! तुम्हें दुकान जाने की ज़रूरत ही नहीं है ठकुराईन।" मैंने कहा____"क्योंकि वो चीज़ तुम्हारे ही पास है और तुम इसी वक्त दे सकती हो मुझे।"

"हाय राम! क्या सच में?" अनुराधा के चहरे पर हैरानी के साथ साथ खुशी की चमक भी उभर आई, झट से बोली____"मेरे ही पास है वो चीज़ और अभी तक मुझे ही नहीं पता था। ये तो बहुत ही हैरानी की बात है। आप मुझे जल्दी से बताइए क्या है वो चीज़ जो गुड़ चिनी और शहद से भी ज़्यादा मीठी है।"

"तुम्हारे ये गुलाब की पंखुड़ियों जैसे होठ।" मैंने उसकी बड़ी बड़ी आंखों में झांकते हुए किंतु धड़कते दिल से कहा____"हां अनुराधा, तुम्हारे ये होठ ही हैं जो गुड़ चिनी और शहद से भी ज़्यादा मीठे हैं और ये मैं पूरे यकीन के साथ कहता हूं।"

मेरी बात सुनते ही अनुराधा भौचक्की सी रह गई। आश्चर्य से आंखें फट पड़ीं थी उसकी। मुझे इस तरह देखने लगी थी जैसे मेरी खोपड़ी को उसने अचानक ही मेरे धड़ पर घूमते हुए देख रही हो। इधर मेरी धड़कनें भी ये सोच कर धाड़ धाड़ कर के बजने लगीं थी कि कहीं अनुराधा मेरी ऐसी बात से बुरा न मान जाए अथवा वो इस बात को कहीं दूसरे हिसाब से न सोच बैठे।

अभी मैं ये सोच ही रहा था कि तभी जैसे अनुराधा की चेतना वापस आई। वो बुरी तरह हड़बड़ा गई और शर्म से उसका चेहरा लाल सुर्ख हो गया। एक बार फिर से उसके होंठ बुरी तरह थरथरा उठे। होठों के बीच शर्म मिश्रित मुस्कान भी थिरकने लगी।

"ये...ये आप क्या बोल रहे हैं छोटे कुंवर?" फिर उसने नज़रें झुकाए हुए बड़ी मुश्किल से कहा____"भ...भला ऐसा भी कहीं होता है?"

"क्या नहीं होता?" मैंने धड़कते दिल से पूछा।

"व...वो...मतलब कि हो...होंठ।" अनुराधा अटकते हुए बोली____"हां...मतलब कि ये कैसे...म...मीठे हो सकते हैं?"

"अब ये तो तभी पता चलेगा जब इन्हें चखा जाएगा।" मैं मन ही मन हैरान था कि अनुराधा ने बुरा नहीं माना था। मैं इस बात पर भी हैरान था कि उसे इस बारे में कुछ पता ही नहीं है। क्या सच में उसे पता नहीं है? क्या सच में वो इतनी ज़्यादा मासूम और भोली है?

"अगर तुम्हें यकीन नहीं है तो खुद ही चख कर देख लो।" मैंने मुस्कुराते हुए कहा____"मुझे तो यकीन है कि मेरी ठकुराईन के होंठ गुड़ चिनी और शहद से भी ज़्यादा मीठे होंगे।"

अनुराधा एक बार फिर शर्म से लाल हो गई। बड़ी मुश्किल से उसने सिर उठा कर मेरी तरफ देखा। उसके होठ कांप रहे थे। सांसें धौकनी की मानिंद तेज़ तेज़ चलने लगीं थी। चेहरे पर पसीना और साथ ही अजीब सी बेचैनी के भाव थे। इधर मैं, जिसने जाने कितनी ही औरतों और लड़कियों को अपनी हवस के चलते भोगा था वो इस वक्त खुद अनुराधा के सामने कुछ और कहने तथा करने की हिम्मत नहीं कर पा रहा था। हालाकि जितना कुछ मैं बोल चुका था उसके लिए भी मुझे हद से ज़्यादा हिम्मत जुटानी पड़ी थी।

"ठीक है अगर तुम ऐसा नहीं करना चाहती तो कोई बात नहीं।" मैंने ये सोच कर ऐसा कहा कि कहीं सच में अनुराधा को मेरा ऐसा बोलना और मेरा ये बर्ताव अच्छा न लगे____"मैं तो बस मज़ाक में ये सब बोल रहा था तुमसे। तुम मुझे बस पानी ही ले आओ। तब तक मैं चारपाई आंगन में रख कर उसमें बैठ जाता हूं।"

कहने के साथ ही मैं पलटा तो अनुराधा ने झट से मेरा हाथ पकड़ लिया। मैंने चौंकते हुए तथा उलझन पूर्ण भाव से उसकी तरफ देखा तो हैरान रह गया। अनुराधा मेरी तरफ अपना चेहरा किए एवं आंखें बंद कर के खड़ी थी। उसने अभी भी मेरा हाथ पकड़ा हुआ था। मेरी धड़कनें एक बार फिर धाड़ धाड़ कर के बजने लगीं। वो आंखें बंद किए जिस तरह से मेरी तरफ चेहरा किए खड़ी थी उससे मुझे समझते देर न लगी थी कि वो मुझे क्या करने का इशारा कर रही थी?

"छ...छोटे कुंवर।" फिर उसने आंखें बंद किए ही कांपती आवाज़ में कहा____"अ...अगर सच में आपको म...मेरे ह...होठ गुड़ चिनी और शहद से ज़्यादा मीठे समझ में आते हैं तो च...चख लीजिए।"

"न...नहीं अनुराधा।" मुझे उसकी इस अदा पर और उसके इस समर्पण अंदाज़ पर बेहद प्यार आया और साथ ही ये सोच कर बुरा भी लगा कि मैंने उस मासूम को ये करने के लिए मजबूर किया। अतः अधीरता से बोला____"तुम्हें ऐसा करने की कोई ज़रूरत नहीं है। मैं सच में तुमसे मज़ाक कर रहा था। अब तुम जाओ पानी ले आओ।"

"म...मैं आपको फिर से नाराज़ नहीं करना चाहती छोटे कुंवर।" उसने झट से आंखें खोल कर मुझे देखा। उसकी आंखों में एकाएक आंसू तैरते नज़र आए, बोली____"इसके पहले भी मैंने अपनी बेवकूफी और नासमझी से आपको नाराज़ कर दिया था। उसके बाद ये मैं ही जानती हूं कि आपको देख न पाने से कितना तड़पती रही हूं मैं।"

"पागल हो तुम।" मैं उसकी आंखों में आंसू देखते ही मचल उठा____"तुम्हारा कभी कोई दोष नहीं था अनुराधा। तुमने वही किया था जो उस समय उचित था। तुम्हें मुझ पर भरोसा नहीं हुआ था तो इसका मतलब ये था कि मैं सच में तुम्हारे भरोसे के क़ाबिल नहीं हुआ था उस समय। इसमें सिर्फ और सिर्फ मेरा दोष था। तुम तो हमेशा से दोष रहित रही हो मेरी जान और मैं ऊपर वाले का शुक्र गुज़ार हूं कि उसने मुझ जैसे इंसान के नसीब में तुम्हें लिखा।"

"मैं इतनी बड़ी बड़ी बातों का मतलब नहीं समझती छोटे कुंवर।" अनुराधा ने गंभीरता से कहा____"बस इतना महसूस करती हूं कि मैं आपसे बहुत ज़्यादा प्रेम करती हूं और आपके बिना जी नहीं सकती। भगवान के लिए आप अब कभी मुझसे नाराज़ मत....।"

"कभी नहीं होऊंगा मेरी जान।" मैंने झपट कर उसे अपने सीने से लगा लिया। अनुराधा फिर से सिसक उठी। मैंने बड़े ही प्रेम से उसकी पीठ को सहलाते हुए कहा____"तुमसे नाराज़ होऊंगा तो मैं खुद भी चैन से जी नहीं पाऊंगा। तुम अब मेरी जान और मेरी धड़कन बन चुकी हो अनुराधा। तभी तो तुम्हारी मां से तुम्हारा हाथ मांग लिया है मैंने और उनसे कहा है कि मैं तुमसे ब्याह कर के तुम्हें हवेली ले जाऊंगा।"

मेरी बात सुन कर अनुराधा और ज़ोर से मुझसे छुपक गई। अभी वो कुछ कहने ही वाली थी कि तभी किसी के खंखारने की आवाज़ सुन कर हम दोनों ही बुरी तरह हड़बड़ा गए और एक दूसरे से अलग हो कर दूर हट गए। मैंने देखा सरोज काकी अपने बेटे अनूप के साथ आंगन में खड़ी हमें ही देख रही थी। उधर अनूप भी आंखें फाड़े हमें देखे जा रहा था। हालाकि वो अभी छोटा था लेकिन अपलक इस लिए देखे जा रहा था क्योंकि उसने ऐसा दृश्य शायद पहली बार देखा था। उधर सरोज काकी मंद मंद मुस्कुरा रही थी।

सरोज काकी के यूं आ जाने से और इस हालत में पकड़े जाने से मैं और अनुराधा बुरी तरह हड़बड़ा गए थे। अनुराधा का तो घबराहट के मारे बुरा हाल ही हो गया था। उससे जब अपनी मां का सामना न किया गया तो वो सिर झुकाए भागती हुई अपने कमरे में घुस गई।

"म..माफ़ करना काकी।" मैंने झिझकते हुए कहा____"व...वो हम तो बस....।"

"हा हा हा हा।" सरोज काकी मेरी उम्मीदों के विपरीत ठहाका लगा कर हंस पड़ी, फिर बोली____"देखो तो डर के मारे कैसी शक्ल बना ली है ठाकुर वैभव सिंह ने।"

मैं भौचक्का सा देखता रह गया काकी को। मुझे लगा था काकी हम दोनों पर गुस्सा करेगी। ख़ास कर मुझ पर तो सबसे ज़्यादा मगर यहां तो काकी इस तरह ठहाका लगा कर हंसने लगी थी जैसे उसके लिए ये सब सामान्य सी बात थी।

"अरे! डरो नहीं मेरे बच्चे।" सरोज ने आगे बढ़ते हुए किंतु मुस्कुराते हुए कहा____"मैं जानती हूं कि तुम दोनों अब एक दूसरे के ही हो और ये क्योंकि तुम दोनों का पहला मिलाप था इस लिए अकेले में थोड़ी बहुत बातें कर लेना ग़लत नहीं था।"

"मतलब तुम गुस्सा नहीं हो काकी?" मैंने राहत की सांस लेते हुए कहा।

"गुस्सा क्यों होना वैभव?" सरोज ने मेरे पास आ कर कहा____"अगले साल तुम दोनों पति-पत्नी बन जाओगे तो गुस्सा किस बात के लिए करना? वैसे इतना ज़रूर कहूंगी कि ब्याह से पहले एक दूसरे से इतनी दूरी तो ज़रूर ही बनाए रखना जिससे कि दोनों की ही इज्ज़त और मर्यादा बनी रहे।"

मैं काकी के कहने का मतलब समझ गया था इस लिए हां में सिर हिला दिया। ख़ैर उसके बाद आंगन में चारपाई निकाल कर मैं उसी में बैठ गया और काकी से इधर उधर की बातों में लग गया। इस बीच काकी ने अनुराधा को मेरे लिए चाय बना कर ले आने के लिए कह दिया था। कुछ देर में अनुराधा चाय ले कर आई। वो बहुत ज़्यादा शर्मा रही थी जिस पर सरोज काकी मंद मंद मुस्कुराने लगी थी। मेरा दिल तो अभी भी अनुराधा से बातें करने का कर रहा था लेकिन काकी के रहते अब ये संभव नहीं था। इस लिए मैं चाय पीने के बाद ये कह कर चारपाई से उठ गया कि समय मिला तो फिर किसी दिन आऊंगा।​
 
अध्याय - 108
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मैं, पिता जी और नया मुंशी किशोरी लाल बैठक में बैठे हुए थे। मैंने पिता जी को बता दिया था कि मैंने आज आमों के बाग़ में इस बात की जांच पड़ताल की थी कि सफ़ेदपोश हर बार हमारे आमों के बाग़ में आ कर वहां से कैसे ग़ायब हो जाता था? सारी बातें सुन कर पिता जी के चेहरे पर गहन सोचो के भाव उभर आए थे।

"आपको क्या लगता है पिता जी?" मैंने उन्हें सोचो में गुम देखा तो पूछा____"वो सफ़ेदपोश हर बार हमारे आमों के बाग़ में ही ग़ायब होने के लिए क्यों जाता होगा? क्या वो ऐसा कर के सिर्फ हमें उलझाए रखना चाहता है या उसके ऐसा करने के पीछे कोई दूसरी भी ख़ास वजह हो सकती है?"

"पक्के तौर पर कुछ कहा नहीं जा सकता इस बारे में।" पिता जी ने लंबी सांस ली____"चंद्रकांत के मामले में उसका इस तरह से जुड़े होना ऐसा है जिसने हमें बुरी तरह उलझा दिया है और सोचने पर मजबूर कर दिया है।"

"हां ये तो सही कहा आपने।" मैंने सिर हिलाते हुए कहा____"ये बात बिल्कुल भी हजम नहीं हो रही कि इसके पहले जो सिर्फ मेरी ही जान का दुश्मन बना हुआ था वो अचानक से चंद्रकांत के मामले में क्यों और कैसे जुड़ गया दिखा? आख़िर वास्तव में वो चाहता क्या है अथवा क्या करना चाहता है?"

"यही तो सोचने वाली बात है।" पिता जी ने कहा____"एक समय था जब वो तुम्हारी जान लेने के लिए हर तरह के पैंतरे स्तेमाल कर रहा था। मतलब कि उसने पहले दरोगा धनंजय को लपेटा, फिर मुरारी के भाई जगन को अपना मोहरा बनाया, फिर तुम्हारे दोनों दोस्तों को। जगन को तो वो हमारी हवेली के बंद दरवाज़े से ही निकाल कर ले गया। उसका ये दुस्साहस तो वाकई हैरतअंगेज था। ख़ैर उसके बाद काफी समय तक उसकी मौजूदगी का कहीं आभास ही नहीं हुआ लेकिन इतने दिनों बाद जब वो नज़र आया तो चंद्रकांत के मामले के साथ। चंद्रकांत के अनुसार उसने उसे बताया कि उसके बेटे की हत्या उसकी अपनी बहू रजनी ने ही की थी। हत्या करने के पीछे उसने जो कहानी बताई वो यकीनन ऐसी थी जिससे चंद्रकांत को यकीन कर ही लेना था। आख़िर इतना तो वो भी अच्छी तरह जानता था कि उसकी बहू कैसे चरित्र की औरत थी। अब सवाल ये है कि अगर सच में रघुवीर की हत्या रजनी ने ही की थी तो इसके बारे में सफ़ेदपोश को कैसे पता चला? क्या वो उस समय आस पास ही कहीं मौजूद था जब रघुवीर की हत्या हुई थी? अगर हां तो उसने अगले दिन ही चंद्रकांत को उसके बेटे के हत्यारे के बारे में क्यों नहीं बताया? इतने दिनों बाद क्यों उसने चंद्रकांत से संपर्क किया?"

"ये सब तो सोचने का विषय है ही।" मैंने सोचने वाले अंदाज़ में कहा____"किंतु सोचने वाली एक बात ये भी है कि उसे ये कैसे पता था कि चंद्रकांत रात के उस वक्त पेशाब करने के लिए घर से बाहर निकलेगा?"

"इसका जवाब यही हो सकता है कि उसे चंद्रकांत की इस दिनचर्या अथवा आदत के बारे में पहले से मालूम रहा होगा।" पिता जी ने कहा____"ठीक उसी तरह जैसे रघुवीर के हत्यारे को रघुवीर की आदत के बारे में पता था।"

"बड़े कमाल की बात है ये।" मैंने हैरानी ज़ाहिर की____"एक तरफ रघुवीर का हत्यारा रघुवीर की दिनचर्या के बारे में पता करता है और फिर उसकी हत्या करता है और दूसरी तरफ ये सफ़ेदपोश चंद्रकांत की दिनचर्या का पता कर के उससे एक रात मिलता है और उसे उसके बेटे के हत्यारे के बारे में बताता है। कमाल की समानता है दोनों में, है ना?"

"सही कह रहे हो तुम।" पिता जी के चेहरे पर सहसा अजीब सी चमक उभरी____"कहीं सफ़ेदपोश और रघुवीर का हत्यारा दोनों एक ही तो नहीं हैं, मगर....।"

"मगर क्या पिता जी?" मैं उनकी बात सुन कर चौंक पड़ा था, बोला____"मुझे तो लगता है वो दोनों एक ही हैं। पहले उसने रघुवीर की खुद हत्या की और फिर रजनी को हत्यारिन साबित कर के चंद्रकांत के हाथों रजनी की हत्या करवा दी। ये तो गजब ही कारनामा हो गया, कोई सोच भी नहीं सकता कि ऐसा भी हो सकता है।"

"लेकिन सवाल ये है कि सफ़ेदपोश भला ऐसा क्यों करेगा?" पिता जी ने सोच पूर्ण भाव से मेरी तरफ देखा____"उसकी चंद्रकांत अथवा रघुवीर से क्या दुश्मनी हो सकती है और अगर उनसे उसकी कोई दुश्मनी थी भी तो इसके पहले उसने उनकी हत्या क्यों नहीं की थी? इसके पहले तो वो तुम्हारी जान का दुश्मन बना हुआ था, फिर अचानक से वो उनका दुश्मन कैसे बन गया?"

पिता जी के इन सवालों का मेरे पास कोई जवाब नहीं था। असल में कोई जवाब सूझा ही नहीं मुझे। मैं खुद भी सोच में पड़ गया था कि अगर ऐसा था तो सचमुच सफ़ेदपोश की चंद्रकांत से या उसके बेटे से क्या दुश्मनी रही होगी? ज़ाहिर है इंसान किसी की हत्या तभी करता है जब किसी से वो हद से ज़्यादा नफ़रत करता हो। जबकि यहां पर मुझे दूर दूर तक ऐसा नज़र नहीं आ रहा था और यहीं पर मैं ये सोचने पर मजबूर था कि जब कोई वजह ही नहीं है तो सफ़ेदपोश भला ऐसा क्यों करेगा उनके साथ?

"दुनिया में बेवजह कुछ नहीं होता।" सहसा पिता जी ने कहा____"अगर वाकई में चंद्रकांत से अथवा उसके बेटे से सफ़ेदपोश की कोई दुश्मनी थी तो वो पहले ही उनकी हत्या कर देता। उस जैसे शातिर को जो लोगों की नज़रों से ग़ायब रहता हो उसके लिए पहले ही उनकी हत्या कर देना कोई बड़ी बात नहीं थी। यही एक पेंच वाली बात है जिसके तहत हम ये कहने पर मजबूर हैं कि रघुवीर की हत्या सफ़ेदपोश ने नहीं की हो सकती। हां ये सवाल ज़रूर सोचने वाला है कि रघुवीर की हत्या के इतना समय गुज़र जाने के बाद उसने उसके हत्यारे का नाम चंद्रकांत को क्यों बताया? चंद्रकांत ने बताया था कि बदले में वो उससे कोई काम करवाना चाहता था तो सवाल ये भी है कि बदले में वो चंद्रकांत से क्या करवाना चाहता है? वादे के मुताबिक वो पिछली रात चंद्रकांत से मिलने नहीं आया जिसका मतलब हमने यही निकाला कि या तो उसने चंद्रकांत से बदले में कोई काम करवाने के विषय में झूठ बोला था जोकि संभव है कि इसकी कोई वजह रही होगी या फिर उसके न आने के पीछे ये वजह हो सकती है कि वो अपने किसी काम में व्यस्त होने के चलते चंद्रकांत से मिलने न आया होगा। यही सोच कर हमने महेंद्र सिंह से ये कहा था कि इस बारे में फ़ौरन किसी नतीजे पर पहुंचना उचित नहीं है। यानि हमें दो तीन दिन का समय लेना चाहिए। हो सकता है कि आज रात या फिर कल की रात सफ़ेदपोश चंद्रकांत से मिलने आ ही जाए। अगर वो इन दो तीन दिनों के अंदर भी चंद्रकांत से मिलने नहीं आता तो फिर यही समझा जाएगा कि उसने वाकई में अपने किसी मकसद के तहत ही चंद्रकांत को उसकी बहू के बारे में हत्यारिन बताते हुए वो सब बताया और चंद्रकांत को यकीन दिला कर उसके हाथों उसकी अपनी ही बहू को मरवा डाला।"

"मान लीजिए अगर सच यही हुआ तो?" मैंने तर्क़ देते हुए कहा____"उस सूरत में आप ये कैसे पता लगाएंगे कि चंद्रकांत के द्वारा ये सब करवाने के पीछे उसका असल मकसद क्या था?"

"फिलहाल तो यही कह सकते हैं कि वो किसी बड़े खेल को अंजाम देने की फ़िराक में होगा।" पिता जी ने कहा____"इस वक्त हमें चंद्रकांत से अथवा उसके बेटे रघुवीर से उसकी दुश्मनी की कोई वजह समझ में नहीं आ रही लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि इसके पीछे कोई वजह नहीं होगी। बिना वजह वो महज अपने शौक के लिए तो किसी की हत्या नहीं करेगा और ना ही करवाएगा। तब हमें गहराई से इस बारे में सोचने के साथ साथ ये पता भी करना होगा कि उसने आख़िर ऐसा किया क्यों और आगे अब क्या करने की फ़िराक में है? हमें ये भी नहीं भूलना चाहिए कि वो तुम्हारी जान का भी दुश्मन है। इस वक्त भले ही उसका खेल हमारी समझ में नहीं आ रहा लेकिन इतना आभास हमें ज़रूर हो रहा है कि उसके ये सब करने का संबंध भी कहीं न कहीं तुमसे ही है।"

"वैसे आपके हिसाब से ये सफ़ेदपोश कौन हो सकता है?" मैंने कुछ सोचते हुए पूछा____"और हर बार वो खुद को ग़ायब करने के लिए हमारे ही आमों के बाग़ की तरफ क्यों जाता है? मैंने आज भुवन के साथ पूरे बाग़ का निरीक्षण किया था। उसके ग़ायब होने का राज़ तो पता चल गया लेकिन ये नहीं समझ आया कि वो हमारे बाग़ से निकल कर उस तरफ क्यों जाता है जहां से साहूकार गौरी शंकर के ज़मीनों की सरहद शुरू होती है? क्या वो हमारे दिमाग़ में ये बैठाना चाहता है कि वो साहूकारों के घर का ही कोई सदस्य है?"

"हमें नहीं लगता कि साहूकारों के घर का कोई सदस्य ही सफ़ेदपोश है।" पिता जी ने कहा____"अगर होता तो इसकी जानकारी उन लोगों को भी होती और वो जगताप तथा तुम्हारे बड़े भाई को मारने के लिए यूं खुले आम कत्ल-ए-आम नहीं करते। बल्कि सफ़ेदपोश की तरह खुद को सबसे छुपाए रख कर कभी भी उनकी हत्या कर देते और खुद का बचाव कर लेते। बचाव से हमारा मतलब ये है कि बाद में हमारे द्वारा उनका इस तरह से विनाश नहीं होता। इसी से ज़ाहिर है कि सफ़ेदपोश उनमें से कोई नहीं है। हां ये कहा जा सकता है कि सफ़ेदपोश अगर उनकी ज़मीनों की सरहद की तरफ जाता है तो यकीनन वो हमारे ज़हन में यही बैठाना चाहता है कि हम यही समझ बैठें कि वो साहूकारों के घर का ही कोई सदस्य है।"

"इससे सफ़ेदपोश को भला क्या फ़ायदा हो सकता है?" मैंने सोचने वाले भाव से पूछा।

"यही कि हम उन्हीं पर उलझें रहें।" पिता जी ने कहा____"और उसकी असलियत की तरफ ध्यान देने का हम ख़याल तक न करें।"

"तो अब अगर हम उसकी चाल समझ गए हैं।" मैंने कहा____"तो फिर अब हम कैसे ये पता लगाएं कि सफ़ेदपोश असल में कौन है? वैसे मेरे ज़हन में कुछ और भी ख़याल उभर रहे हैं। मेरा ख़याल है कि हमें उस बारे में भी गहराई से सोचना चाहिए। संभव है कि सफ़ेदपोश के क़रीब पहुंचने का हमें कोई सुराग़ सूझ जाए।"

"हमें खुशी हुई कि इस संबंध में तुम गहराई से सोचते हुए अपने विचार रख रहे हो।" पिता जी ने कहा____"बताओ कैसे ख़याल उभर रहे हैं तुम्हारे ज़हन में?"

"सफ़ेदपोश के बारे में आज तक हम यही सोचते रहे हैं कि वो या तो साहूकारों में से कोई है या फिर चंद्रकांत और उसके बेटे में से कोई अथवा ये कहें कि इन दोनों का ही उससे कोई ताल्लुक होगा।" मैंने अपने शब्दों पर ज़ोर देते हुए कहा____"जबकि इतना सोचने के बाद भी हम अभी तक सफ़ेदपोश के बारे में ना तो कुछ सोच पाए हैं, ना ही कुछ पता कर पाए हैं और ना ही किसी नतीजे पर पहुंच सके हैं।"

"हां इस बात से हम सहमत हैं।" पिता जी ने सिर हिलाते हुए कहा___"किंतु तुम आख़िर कहना क्या चाहते हो?"

"मैं ये कहना चाहता हूं कि हमें सफ़ेदपोश के बारे में सोचने का अपना दायरा या तो थोड़ा बढ़ाना चाहिए या फिर अलग नज़रिए से सोचना चाहिए।" मैंने कहा____"अब तक इतना सोच विचार करने के बाद हम लगभग ये समझ ही चुके हैं कि सफ़ेदपोश ना तो साहूकारों में से कोई है और ना ही चंद्रकांत में से। तो क्या ये नहीं हो सकता कि वो कोई ऐसा व्यक्ति है जो इस गांव का ही नहीं है?"

"क्या मतलब?" पिता जी के साथ साथ मुंशी किशोरी लाल के चेहरे पर भी हैरानी के भाव उभर आए।

"मतलब ये कि शायद वो किसी दूसरे गांव का कोई व्यक्ति है।" मैंने कहा____"जो हमें अपना दुश्मन समझता है, ख़ास कर मुझे। मैं स्वीकार करता हूं कि मुझसे उसकी दुश्मनी के पीछे यकीनन मेरे ग़लत कर्म ही होंगे। या फिर ऐसा हो सकता है कि वो हम सबको ही अपना दुश्मन समझता होगा।"

"पता नहीं तुम ये क्या अनाप शनाप बोले जा रहे हो?" पिता जी ने अजीब भाव से कहा____"सच ये है कि जब से हमने दादा ठाकुर की गद्दी सम्हाली थी और कई गावों के मुखिया बने थे तब से हमने यही प्रयास किया था कि हमारे द्वारा कभी किसी का बुरा न हो। वर्षों से ऐसा होता भी आया है। इस गांव के लोग ही नहीं बल्कि आस पास के गांव के लोग भी हमें देवता की तरह पूजते रहे हैं और आज भी हमें वही सम्मान देते हैं। ऐसे में कोई हमारा दुश्मन कैसे बन सकता है? हां ये ज़रूर मानते हैं कि तुम्हारे ग़लत कर्मों की वजह से कुछ लोग हमसे नाखुश होंगे। हालाकि वो हमसे नहीं बल्कि तुमसे नाखुश हैं।"

"मैं इस बात को मानता हूं पिता जी।" मैंने कहा____"लेकिन मेरे कहने का मतलब कुछ और है। कभी कभी ऐसा भी होता है कि आपकी अच्छाई और आपकी ऊंची शख्सियत को देख कर भी लोग आपको अपना दुश्मन समझ बैठते हैं। वो आपसे खुद को कम नहीं समझना चाहते हैं बल्कि आपसे भी ज़्यादा ऊंचा अपना मुकाम बना हुआ देखना चाहते हैं। इसके लिए वो किसी भी हद तक जा सकते हैं? क्या ऐसा नहीं हो सकता कि ऐसी ही मानसिकता वाला कोई व्यक्ति हमारे जैसी शख्सियत बनने का ख़्वाब देख बैठा हो? वो अच्छी तरह समझता होगा कि हमारे रहते वो अपना मुकाम हमसे ज़्यादा ऊंचा नहीं बना सकता इस लिए पहले उसने हमें मिटाने का सोच लिया होगा। इसके लिए उसने योजनाबद्ध तरीके से अपना काम शुरू कर दिया। सफ़ेदपोश के रूप में उसने जो कुछ भी किया है उससे साफ ज़ाहिर होता है कि हमारी ऊंची प्रतिष्ठा को मिट्टी में मिलाने में उसने कोई कसर नहीं छोड़ी। सबसे पहले उसने मुरारी की हत्या करवाई और उसका इल्ज़ाम मुझ पर लगवाया। मकसद वही, मेरे द्वारा आपकी प्रतिष्ठा को मिट्टी में मिलाना। उसके बाद जगन और मेरे दोस्तों के द्वारा भी इसी मकसद से जाने क्या क्या करवाया। गहराई से सोचा जाए तो उसने शुरू से ही हमारी शख्सियत को और हमारे मान सम्मान को लोगों की नज़र में मिट्टी में मिलाने का ही काम किया है।"

मेरी बातें सुन कर पिता जी एकदम से कुछ बोल ना सके। उनके चेहरे पर गहन सोचो के भाव उभर आए थे। सहसा मेरी नज़र मुंशी किशोरी लाल पर पड़ी। वो मुझे इस तरह देखे जा रहा था जैस मैं कोई अजूबा था। जैसे ही उसे एहसास हुआ कि मैं भी उसे देख रहा हूं तो उसने हड़बड़ा कर जल्दी से नज़रें हटा लीं।

"ठाकुर साहब, छोटे कुंवर की बातों में वाकई वजन है।" फिर उसने पिता जी से मुखातिब हो कर कहा____"हालाकि मुझे इन मामलों का ज़्यादा कुछ पता नहीं है लेकिन आपसे जितना जाना है उस हिसाब से मुझे भी यही लगता है कि छोटे कुंवर जो कह रहे हैं उसमें कहीं न कहीं सच्चाई ज़रूर है।"

"हमें ये देख कर बेहद प्रसन्नता हुई कि तुम इतना दूर तक सोच सकते हो।" पिता जी ने गहरी सांस लेते हुए कहा____"सच कहें तो अब से पहले इतनी दूर का हमने भी नहीं सोचा था। यकीनन तुम्हारी बातों में वजन है और ऐसा हो भी सकता है।"

"तो अब हमें ये सोचना चाहिए कि ऐसी मानसिकता रखने वाला वो व्यक्ति कौन हो सकता है जिसने अपनी योजना के अनुसार खुद को सफ़ेदपोश में तब्दील कर इतना कुछ कर डाला?" मैंने प्रभावशाली लहजे में कहा___"और अब भी अपनी योजना के तहत अपने काम को अंजाम देने में लगा हुआ है?"

"क्या कहें?" पिता जी के चेहरे पर असमंजस के से भाव उभरे____"हमें कुछ समझ ही नहीं आ रहा। ऐसे किसी व्यक्ति के बारे में भला हम किस पर शक करें?"

"वो व्यक्ति आपका जान पहचान वाला और बेहद क़रीबी भी हो सकता है ठाकुर साहब।" किशोरी लाल ने हस्ताक्षेप करते हुए कहा____"दुनिया में ऐसे लोगों की कमी नहीं है जो गहरे दोस्त और विश्वासपात्र तो होते श हैं किन्तु असलियत में पीठ पर छूरा ही घोंपते हैं।"

"मैं भी यही कहना चाहता था।" मैंने पुरज़ोर लहजे से कहा____"और वैसे भी आपके जैसी शख्सियत बनने का ख़्वाब कोई आम व्यक्ति नहीं देख सकता बल्कि वही देखेगा जो आम व्यक्ति से ऊपर होगा। जिसके पास आपके जितनी धन दौलत तो होगी लेकिन आपके रहते उसमें आपके जैसा बनने का साहस न होगा।"

"क्या तुम ये कहना चाहते हो कि ऐसा व्यक्ति हमारा कोई मित्र ही हो सकता है?" पिता जी ने हैरत से मेरी तरफ देखते हुए कहा____"नहीं नहीं, हमारे मित्र ऐसे हर्गिज़ नहीं हैं जो खुद को हमसे ऊपर उठाने के लिए हमारा अहित करने का सोचें।"

"मान लेता हूं कि वो ऐसे नहीं होंगे।" मैंने सिर हिलाते हुए कहा____"लेकिन एक बात पर गौर कीजिए कि क्या अब तक के इतिहास में कभी ऐसा हुआ था कि हम या हमारे पूर्वजों से न्याय करने का पद छिन गया हो? क्या इसके पहले कभी ऐसा हुआ था कि हमारे अलावा किसी और ने लोगों के किसी मामले का मुखिया के रूप में फ़ैसला किया हो? जहां तक मुझे पता है ऐसा कभी नहीं हुआ पिता जी लेकिन आज हालात ये हैं कि आप दूसरे गांव के ही क्या बल्कि अपने ही गांव के लोगों के किसी मामले का फ़ैसला नहीं कर सकते। ऐसा इस लिए क्योंकि अब आप मुखिया नहीं रहे। क्या इससे ये ज़ाहिर नहीं होता कि किसी ने हमारे खिलाफ़ कुछ इस तरीके से षड्यंत्र रचा कि आज आपसे मुखिया का पद छिन गया और हमारी मुकम्मल शख्सियत धूल में मिल गई? साहूकार लोग हमें अपना दुश्मन समझते थे। खाज में फोड़ा ये हुआ कि मेरी वजह से चंद्रकांत भी हमें अपना दुश्मन मान बैठा। दोनों ने मिल कर हमें बर्बाद भी कर दिया। जिस व्यक्ति ने हमसे बड़ा बनने का ख़्वाब देखा होगा उसके लिए तो ये सब ऐसा हो गया जिसे सोने पर सुहागा हो जाना कहते हैं। उसने दूर से हमें बर्बाद होते देखा और खुद सफ़ेदपोश के रूप में छुप कर हमारी इज्ज़त का बेड़ा गर्क करता रहा। मुझे तो अब ये लगता है कि सफ़ेदपोश वास्तव में कभी मुझे जान से मारना ही नहीं चाहता था बल्कि वो हमारे ज़हन में सिर्फ ये बैठाना चाहता था कि वो मेरी जान का दुश्मन है। जबकि ऐसा कुछ था ही नहीं। सोचने वाली बात है कि जब हम मुकम्मल रूप से मिट ही जाएंगे तो किसी को मुझे अथवा आपको जान से मार देने की ज़रूरत ही क्या रह जाएगी? हम तो उनमें से हैं जो ये समझते हैं कि हमारी आन बान और शान ही हमारे ज़िंदा होने का सबसे बड़ा प्रमाण है। यानि अगर हमारी आन बान और शान मिट्टी में मिल जाए तो हम मुर्दे ही बन जाएंगे।"

मेरे चुप होते ही बैठक में सन्नाटा छा गया। पिता जी मेरी बातें सुन कर अवाक से हो गए थे। किशोरी लाल की तरह अब वो भी मुझे चकित भाव से देखने लगे थे। इधर मैं ये सोचने लगा कि कहीं मैंने कुछ ज़्यादा ही तो नहीं बोल दिया? आख़िर छोटा मुंह बड़ी बात जो कर दी थी मैंने।

"क्या मैंने कुछ ग़लत कहा पिता जी?" उन्हें कुछ न बोलता देख मैंने बेचैन हो कर पूछा।

"नहीं, ऐसी बात नहीं है।" पिता जी ने पुनः गहरी सांस ली, बोले____"इस संबंध में तुमने जो कुछ भी कहा है वो एक तरह का कड़वा सच हो सकता है लेकिन हम ये भी मानते हैं कि समय हमेशा एक जैसा नहीं रहता। कहने का मतलब ये कि ज़रूरी नहीं कि जो कभी नहीं हुआ था वो आगे भी भविष्य में कभी हो नहीं सकेगा। ये सच है कि अब से पहले हम और हमारे पुरखे ही लोगों के मामलों का फ़ैसला करते आए हैं लेकिन जैसा कि हमने कहा, समय हमेशा एक जैसा नहीं रहता। सबका समय आता है और यही सृष्टि का नियम है। आज हम इस मुकाम पर हैं तो इसका मतलब सिर्फ यही नहीं है कि किसी के द्वारा ऐसा हुआ है बल्कि इसके पीछे हमारे और हमारे पुरखों के कर्मों का फल भी शामिल है। ख़ैर, अब अगर कोई और लोगों का फ़ैसला करता है तो इसमें कोई ग़लत बात नहीं है बल्कि हम यही सोचते हैं कि ये उनके भाग्य की बात है। लेकिन हां, अगर सच में इसके लिए किसी ने ऐसा कुछ किया है तो ये हद दर्जे का गुनाह है। सफ़ेदपोश को अब किसी भी हाल में पकड़ना हमारी पहली और आख़िरी प्राथमिकता है। हम उससे जानना चाहते हैं कि आख़िर उसने हमारे साथ ऐसा क्यों किया?"

"वो तो ठीक है पिता जी।" मैंने कहा____"लेकिन हमारी प्रतिष्ठा का क्या? उसका क्या जो हमसे छिन गया?"

"क्या मतलब है तुम्हारा?" पिता जी के माथे पर सिलवटें उभरी____"क्या तुम ये चाहते हो कि जो हमसे छिन गया है उसे वापस हासिल करना चाहिए हमें?"

"क्यों नहीं?" मैंने दो टूक भाव से कहा____"मैं मानता हूं कि ऐसा सिर्फ मेरी वजह से हुआ है लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि हम अपना खोया हुआ सम्मान अथवा खोई हुई प्रतिष्ठा को वापस हासिल करने का सोचें ही नहीं।"

"तो कैसे हासिल करोगे तुम?" पिता जी ने ग़ौर से मेरी तरफ देखा____"क्या इसके लिए हर किसी से ज़ोर ज़बरदस्ती करोगे तुम अथवा हमारे पिता की तरह लोगों को बेरहमी से कुचलना शुरू कर दोगे?"

"नहीं, मेरा ये मतलब नहीं है।" मैंने कहा____"और ना ही मैं दादा जी की तरह किसी को सताना चाहता हूं लेकिन हां, अपनी प्रतिष्ठा को वापस हासिल करने के लिए ऐसा रास्ता ज़रूर अपनाना चाहता हूं जिससे किसी को कोई तकलीफ़ ना हो। एक ऐसे तरीके से जिसे देख कर लोग सिर्फ और सिर्फ वाह वाह कर उठें।"

"बहुत खूब।" पिता जी हौले से मुस्कुराए____"ख़याल तो काफी अच्छा है बर्खुरदार लेकिन ऐसा करोगे कैसे?"

"लोगों की सर्व सम्मति से।" मैंने कहा____"किसी ने बुरी मानसिकता के तहत भले ही हमें मिट्टी में मिलाने की कोशिश की हो लेकिन अभी भी ऐसा नहीं है कि लोगों के दिल से आपके प्रति सम्मान की भावना कम हो गई है। मुझे पूरा यकीन है कि लोग अभी भी आपके प्रति पहले की तरह श्रद्धा भाव रखते होंगे और यही चाहते होंगे कि उनकी हर समस्या का फ़ैसला आप ही करें। आख़िर वो ये कैसे भूल सकते हैं कि बड़े दादा ठाकुर के बाद वो आप ही थे जिन्होंने उन्हें आज़ादी से जीने की प्रेरणा दी और उनके दुख दर्द को दूर कर के उन्हें खुशियां प्रदान की थी? मुझे पूरा भरोसा है कि अगर लोगों के कानों में मुखिया के चुनाव की बातें डाल दी जाएं तो वो खुद बड़े ज़ोर शोर के साथ इसके लिए आवाज़ उठाएंगे। बस उसके बाद हमें अपना खोया हुआ सम्मान और पद हासिल होने में कोई समस्या नहीं होगी।"

"तुमने आज हमें चमत्कृत कर दिया।" पिता जी ने भाव विभोर हो कर कहा____"तुम्हारी ये सारी बातें और तुम्हारे ये सोच विचार वाकई काबिले तारीफ़ हैं। हमें यकीन नहीं हो रहा कि महज इतनी सी उमर में तुम इतनी गहराई से इतना कुछ सोच सकते हो। ख़ैर, अच्छा लगा हमें ये सब सुन कर।"

"तो ये शुभ काम करने का श्री गणेश कब किया जाए ठाकुर साहब?" किशोरी लाल मारे खुशी के खुद को बोलने से रोक न सका____"मेरी भी दिली ख़्वाहिश यही है कि पहले की ही तरह आप सबके दाता और सबके स्वामी बन जाएं। इतने दिनों में मैं भी ये महसूस कर चुका हूं कि अंदर ही अंदर आप भी बहुत कुछ सोचते हैं और खुद को दुखी किए रहते हैं।"

"हमें किसी चीज़ की कोई अभिलाषा नहीं है किशोरी लाल जी।" पिता जी ने गंभीर हो कर कहा____"हमारे दुख और तकलीफ़ की असल वजह सिर्फ ये है कि हमने एक झटके में अपने बांह के भाई को तथा अपने बेटे को खो दिया और इतना बड़ा झटका लगने के बाद भी हमारे प्राण नहीं निकले।"

"ऐसा मत कहिए ठाकुर साहब।" किशोरी लाल ने अधीरता से कहा____"इस हवेली में रहने वालों को आपकी सख़्त ज़रूरत है। आप ही इनके सब कुछ हैं। आपके बिना किसी का भी कोई वजूद नहीं है।"

"जाने कितने ही हसीन ख़्वाब सजाए थे हमने।" पिता जी ने संजीदा हो कर कहा___"लेकिन सारे ख़्वाब एक झटके में चूर चूर हो गए। हमने कभी किसी के साथ बुरा नहीं किया, इसके बावजूद हमारे नेक कर्मों की हमें इतनी भयानक और असहनीय सज़ा मिली। कभी कभी ज़हन में ख़याल आता है कि क्या फ़ायदा हुआ अच्छाई करने का? इससे अच्छा तो यही होता कि हम भी अपने पिता की तरह जल्लाद बन जाते। कम से कम किसी में इतनी हिम्मत तो न होती कि वो हम में से किसी के साथ कुछ बुरा करने का सोच भी लेते।"

"ऐसा मत सोचिए ठाकुर साहब।" किशोरी लाल ने कहा____"जो कुछ हुआ उसमें आपका कहीं भी कोई दोष नहीं था। सब नियति का खेल था। आप सब कुछ भुला कर अब इस बात पर ध्यान दीजिए कि सबको इस दुख दर्द से निकाल कर किस तरह से खुशियां दी जाए?"

"हां हम समझते हैं।" पिता जी ने कहने के साथ ही मेरी तरफ देखा___"अब तुम जाओ और आराम करो। तुम्हें फिलहाल इस सबके बारे में कुछ भी नहीं सोचना है। इस समय जो सबसे ज़्यादा ज़रूरी है हमें सिर्फ उसी पर ध्यान देना है।"

मैंने सहमति में सिर हिलाया और फिर बैठक से निकल कर हवेली के अंदर चला आया। मेरे दिलो दिमाग़ में बहुत सारी बातें थी जिन्हें सोचते हुए मैं सीधा ऊपर अपने कमरे की तरफ ही बढ़ता चला गया।​
 
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