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Hindi Xkahani - प्यार का सबूत

अध्याय - 79
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सरोज कटोरी से निकाल कर शहद हल्दी और चूने के मिश्रण को अनुराधा के पैर में लगाने लगी। उधर अनुराधा को ये सोच कर रोना आने लगा कि उसे अपनी मां से झूठ बोलना पड़ा जिसके चलते उसकी मां उसके लिए कितना चिंतित हो गई है। उसका जी चाहा कि अपनी मां से लिपट कर खूब रोए मगर फिर उसने सख़्ती से अपने जज़्बातों को अंदर ही दबा लिया।


अब आगे....


क़रीब डेढ़ घंटा लगातार बारिश हुई। हर जगह पानी ही पानी नज़र आने लगा था। बारिश रुक तो गई थी लेकिन मौसम का मिज़ाज ये आभास करा रहा था कि उसका अभी मन भरा नहीं है। बिजली अभी भी चमक रही थी और बादल अभी भी गरज उठते थे। कुछ ही देर में भुवन मोटर साईकिल से आता नज़र आया।

"अरे! छोटे कुंवर आप यहां?" मुझे बरामदे में बैठा देख भुवन हैरानी से बोल पड़ा____"कोई काम था तो मुझे बुलवा लिया होता।"

"नहीं, ऐसी कोई खास बात नहीं थी।" मैंने कहा____"बस यूं ही मन बहलाने के लिए इस तरफ आ गया था। हवेली में अजीब सी घुटन होती है। तुम्हें तो पता ही है कि हम सब किस दौर से गुज़रे हैं।"

"हां जानता हूं।" भुवन ने संजीदगी से कहा____"जो भी हुआ है बिल्कुल भी ठीक नहीं हुआ है छोटे कुंवर।"

"सब कुछ हमारे बस में कहां होता है भुवन।" मैंने गंभीरता से कहा____"अगर होता तो आज मेरे चाचा और मेरे भइया दोनों ही ज़िंदा होते और ज़ाहिर है उनके साथ साथ साहूकार लोग भी। पर शायद ऊपर वाला भी यही चाहता था और आगे न जाने अभी और क्या चाहता होगा वो?"

"फिर से कुछ हुआ है क्या?" भुवन ने फिक्रमंद हो कर पूछा____"इस बार मैं हर पल आपके साथ ही रहूंगा। मेरे रहते आपका कोई कुछ नहीं बिगाड़ पाएगा।"

"तुम्हारी इस वफ़ादारी पर मुझे नाज़ है भुवन।" मैंने उसके कंधे पर हाथ रख कर कहा___"मैं अक्सर सोचता हूं कि मैंने तुम्हारे ऐसा तो कुछ किया ही नहीं है इसके बावजूद तुम मेरे लिए अपनी जान तक का जोख़िम उठाने से नहीं चूक रहे। एक बात कहूं, अपनों के खोने का दर्द बहुत असहनीय होता है। मैं ये हर्गिज़ नहीं चाहता कि मेरी वजह से तुम्हें कुछ हो जाए और तुम्हारे परिवार के लोग अनाथ हो जाएं।"

"मैं ये सब नहीं जानता छोटे कुंवर।" भुवन ने कहा____"मैं तो बस इतना जानता हूं कि मुझे हर हाल में आपकी सुरक्षा करनी है। मुझे अपने परिवार के लोगों की बिल्कुल भी फ़िक्र नहीं है क्योंकि मुझे पता है कि उनके सिर पर दादा ठाकुर का हाथ है।"

"बेशक है भुवन।" मैंने कहा____"मगर फिर भी यही कहूंगा कि कभी किसी भ्रम में मत रहो। इतना कुछ होने के बाद मुझे ये समझ आया है कि जब ऊपर वाला अपनी करने पर आता है तो उसे कोई नहीं रोक सकता। उसके सामने हर कोई बेबस और लाचार हो जाता है।"

"हां मैं समझता हूं छोटे कुंवर।" भुवन ने सिर हिलाते हुए कहा____"लेकिन अगर ऐसी ही बात है तो फिर मैं भी यही सोच लूंगा कि जो कुछ भी मेरे या मेरे परिवार के साथ होगा वो सब ऊपर वाले की मर्ज़ी से ही होगा। मैं आपका साथ कभी नहीं छोडूंगा चाहे कुछ भी हो जाए।"

अजीब आदमी था भुवन। मेरे इतना समझाने पर भी मेरी सुरक्षा के लिए अड़ा हुआ था। अंदर से फक्र तो हो रहा था मुझे मगर मैं ऐसे नेक इंसान को किसी मुसीबत में नहीं डालना चाहता था। एक अंजाना भय सा मेरे अंदर समा गया था।

"ख़ैर छोड़ो इस बात को।" फिर मैंने विषय को बदलते हुए कहा____"मैं यहां इस लिए भी आया था कि ताकि तुमसे ये कह सकूं कि तुम यहां पर काम कर रहे सभी लोगों का हिसाब किताब एक कागज़ में बना कर मुझे दे देना। काफी दिन हो गए ये सब बेचारे जी तोड़ मेहनत कर के इस मकान को बनाने में लगे हुए हैं। मैं चाहता हूं कि सबका उचित हिसाब किताब बना कर तुम मुझे दो ताकि मैं इन सबको इनकी मेहनत का फल दे सकूं।"

"फ़िक्र मत कीजिए छोटे कुंवर।" भुवन ने कहा____"कल दोपहर तक मैं इन सभी का हिसाब किताब बना कर हवेली में आपको देने आ जाऊंगा।"

"मैंने किसी और ही मकसद से इस जगह पर ये मकान बनवाया था।" मैंने गहरी सांस लेते हुए कहा____"मगर ये सब होने के बाद अब हर चीज़ से मोह भंग सा हो गया है। ख़ैर जगताप चाचा के न रहने पर अब मुझे ही उनके सारे काम सम्हालने हैं इस लिए मैं चाहता हूं कि इसके बाद उन कामों में भी तुम मेरे साथ रहो।"

"मैं तो वैसे भी आपके साथ ही रहूंगा छोटे कुंवर।" भुवन ने कहा____"आपको ये कहने की ज़रूरत ही नहीं है। आप बस हुकुम कीजिए कि मुझे क्या क्या करना है?"

"मुझे खेती बाड़ी का ज़्यादा ज्ञान नहीं है।" मैंने उसकी तरफ देखते हुए कहा____"इसके पहले मैंने कभी इन सब चीज़ों पर ध्यान ही नहीं दिया था। इस लिए मैं चाहता हूं कि इस काम में तुम मेरी मदद करो या फिर ऐसे लोगों को खोजो जो इन सब कामों में माहिर भी हों और ईमानदार भी।"

"वैसे तो ज़्यादातर गांव के लोग आपकी ही ज़मीनों पर काम करते हैं।" भुवन ने कहा____"मझले ठाकुर सब कुछ उन्हीं से करवाते थे। मेरा ख़याल है कि एक बार उन सभी लोगों से आपको मिल लेना चाहिए और अपने तरीके से सारे कामों के बारे में जांच पड़ताल भी कर लेनी चाहिए।"

"हम्म्म्म सही कहा तुमने।" मैंने सिर हिलाते हुए कहा____"यहां इन लोगों का हिसाब किताब करने के बाद किसी दिन मिलते हैं उन सबसे।"

"बिल्कुल।" भुवन ने कहा____"आज बारिश भी अच्छी खासी हो गई है। मौसम का मिज़ाज देख कर लगता है कि अभी और भी बारिश होगी। इस बारिश के चलते ज़मीन में नमी भी आ जाएगी जिससे ज़मीनों की जुताई का काम जल्द ही शुरू करवाना होगा।"

"ठीक है फिर।" मैंने स्टूल से उठते हुए कहा____"अब मैं चलता हूं।"
"बारिश की वजह से रास्ते काफी ख़राब हो गए हैं।" भुवन ने कहा____"इस लिए सम्हल कर जाइएगा।"

मैं बरामदे से निकल कर बाहर आया तो भुवन भी मेरे पीछे आ गया। सहसा मुझे अनुराधा का ख़याल आया तो मैंने पलट कर उससे कहा____"मुरारी काका के घर किसी वैद्य को ले कर चले जाना।"

"य...ये आप क्या कह रहे हैं छोटे कुंवर?" भुवन एकदम से हैरान हो कर बोल पड़ा____"काका के यहां वैद्य को ले कर जाना है? सब ठीक तो है न वहां? आप गए थे क्या काका के घर?"

"नहीं मैं वहां गया नहीं था।" मैंने अपनी मोटर साइकिल में बैठते हुए कहा____"असल में मुरारी काका की बेटी आई थी बारिश में भीगते हुए। शायद तुमसे कोई काम था उसे।"

मेरी बात सुन कर भुवन एकाएक फिक्रमंद नज़र आने लगा। फिर सहसा उसके होठों पर फीकी सी मुस्कान उभर आई।

"पूरी तरह पागल है वो।" फिर उसने मेरी तरफ देखते हुए उसी फीकी मुस्कान से कहा____"पिछले कुछ समय से लगभग वो रोज़ ही यहां आती है। कुछ देर तो वो मुझसे इधर उधर की बातें करेगी और फिर झिझकते हुए आपके बारे में पूछ बैठेगी। हालाकि वो ये समझती है कि मुझे उसके अंदर का कुछ पता ही नहीं है मगर उस नादान और नासमझ को कौन समझाए कि उसकी हर नादानियां उसकी अलग ही कहानी बयां करती हैं।"

मैंने भुवन की बातों पर कुछ कहा नहीं। ये अलग बात है कि मेरे अंदर एकदम से ही हलचल मच गई थी। तभी भुवन ने कहा____"उसे मुझसे कोई काम नहीं होता है छोटे कुंवर। वो तो सिर्फ आपको देखने की आस में यहां आती है। उसे लगता है कि आप यहां किसी रोज़ तो आएंगे ही इस लिए वो पिछले कुछ दिनों से लगभग रोज़ ही यहां आती है और जब उसकी आंखें आपको नहीं देख पातीं तो वो निराश हो जाती है।"

"अच्छा चलता हूं मैं।" मैंने मोटर साइकिल को स्टार्ट करते हुए कहा____"तुम एक बार हो आना मुरारी काका के घर।"

"मुझे पूछना तो नहीं चाहिए छोटे कुंवर।" भुवन ने झिझकते हुए कहा____"मगर फिर भी पूछने की हिमाकत कर रहा हूं। क्या मैं जान सकता हूं कि आप दोनों के बीच में क्या चल रहा है? क्या आप उसे किसी भ्रम में रखे हुए हैं? कहीं आप उस मासूम की भावनाओं से खेल तो नहीं रहे छोटे कुंवर?"

"इतना सब मत सोचो भुवन।" मैंने उसकी व्याकुलता को शांत करने की गरज से कहा____"बस इतना समझ लो कि अगर मेरे द्वारा उसको कोई तकलीफ़ होगी तो उससे कहीं ज़्यादा मुझे भी होगी।"

कहने के साथ ही मैंने उसकी कोई बात सुने बिना ही मोटर साईकिल को आगे बढ़ा दिया। मेरा ख़याल था कि भुवन इतना तो समझदार था ही कि मेरी इतनी सी बात की गहराई को समझ जाए। ख़ैर बारिश के चलते सच में कच्चा रास्ता बहुत ख़राब हो गया था इस लिए मैं बहुत ही सम्हल कर चलते हुए काफी देर में हवेली पहुंचा। मोटर साइकिल के पहियों पर ढेर सारा कीचड़ और मिट्टी लग गई थी इस लिए मैंने एक मुलाजिम को बुला कर मोटर साईकिल को अच्छी तरह धो कर खड़ी कर देने के लिए कह दिया।

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दादा ठाकुर की बग्घी जैसे ही साहूकारों के घर के बाहर खुले मैदान में रुकी तो घोड़ों की हिनहिनाहट को सुन कर जल्दी ही घर का दरवाज़ा खुला और रूपचंद्र नज़र आया। उसकी नज़र जब दादा ठाकुर पर पड़ी तो वो बड़ा हैरान हुआ। इधर दादा ठाकुर बग्घी से उतर कर दरवाज़े की तरफ बढ़े। दादा ठाकुर के साथ में शेरा भी था।

"कैसे हो रूप बेटा?" दादा ठाकुर ने बहुत ही आत्मीयता से रूपचंद्र की तरफ देखते हुए कहा____"हम गौरी शंकर से मिलने आए हैं। अगर वो अंदर हों तो उनसे कहो कि हम आए हैं।"

रूपचंद्र भौचक्का सा खड़ा देखता रह गया था। फिर अचानक ही जैसे उसे होश आया तो उसने हड़बड़ा कर दादा ठाकुर की तरफ देखा। पंचायत का फ़ैसला होने के बाद ये पहला अवसर था जब दादा ठाकुर को उसने देखा था और साथ ही ये भी कि काफी सालों बाद दादा ठाकुर के क़दम साहूकारों के घर की ज़मीन पर पड़े थे। रूपचंद्र फ़ौरन ही अंदर गया और फिर कुछ ही पलों में आ भी गया। उसके पीछे उसका चाचा गौरी शंकर भी आ गया। एक पैर से लंगड़ा रहा था वो।

"ठाकुर साहब आप यहां?" गौरी शंकर ने चकित भाव से पूछा____"आख़िर अब किस लिए आए हैं यहां? क्या हमारा समूल विनाश कर के अभी आपका मन नहीं भरा?"

"हम मानते हैं कि हमने तुम्हारे साथ बहुत बड़ा अपराध किया है गौरी शंकर।" दादा ठाकुर ने गंभीरता से कहा____"और यकीन मानो इतना भयंकर अपराध करने के बाद हम जीवन में कभी भी चैन से जी नहीं पाएंगे। हम ये भी जानते हैं कि हमारा अपराध माफ़ी के काबिल नहीं है फिर भी हो सके तो हमें माफ कर देना।"

"ऐसी ही मीठी मीठी बातों के द्वारा आपने लोगों के अंदर अपने बारे में एक अच्छे इंसान के रूप में प्रतिष्ठित किया हुआ है न?" गौरी शंकर ने तीखे भाव से कहा____"वाकई कमाल की बात है ये। हम लोग तो बेकार में ही बदनाम थे जबकि इस बदनामी के असली हक़दार तो आप हैं। ख़ैर छोड़िए, ये बताइए यहां किस लिए आए हैं आप?"

"क्या अंदर आने के लिए नहीं कहोगे हमें?" दादा ठाकुर ने संजीदगी से उसकी तरफ देखा तो गौरी शंकर कुछ पलों तक जाने क्या सोचता रहा फिर एक तरफ हट गया।

कुछ ही पलों में दादा ठाकुर और गौरी शंकर अपने भतीजे रूपचंद्र के साथ बैठक में रखी कुर्सियों पर बैठे नज़र आए। गौरी शंकर को समझ नहीं आ रहा था कि दादा ठाकुर उसके घर किस लिए आए हैं? वो इस बात पर भी हैरान था कि उसने दादा ठाकुर को इतने कटु शब्द कहे फिर भी दादा ठाकुर ने उस पर गुस्सा नहीं किया।

गौरी शंकर ने अंदर आवाज़ दे कर लोटा ग्लास में पानी लाने को कहा तो दादा ठाकुर ने इसके लिए मना कर दिया।

"तुम्हें हमारे लिए कोई तकल्लुफ करने की ज़रूरत नहीं है गौरी शंकर।" दादा ठाकुर ने कहा____"असल में हम यहां पर एक विशेष प्रयोजन से आए हैं। हालाकि यहां आने की हम में हिम्मत तो नहीं थी फिर भी ये सोच कर आए हैं कि न आने से वो कैसे होगा जो हम करना चाहते हैं?"

"क...क्या मतलब?" गौरी शंकर और रूपचंद्र दोनों ही चौंके। किसी अनिष्ट की आशंका से दोनों की ही धड़कनें एकाएक ही तेज़ हो गईं।

"हम चाहते हैं कि तुम हमारी भाभी श्री के साथ साथ बाकी लोगों को भी यहीं बुला लो।" दादा ठाकुर ने कहा____"हम सबके सामने कुछ ज़रूरी बातें कहना चाहते हैं।"

गौरी शंकर और रूपचंद्र दोनों किसी दुविधा में फंसे नज़र आए। ये देख दादा ठाकुर ने उन्हें आश्वस्त किया कि उन लोगों को उनसे किसी बात के लिए घबराने अथवा चिंता करने की ज़रूरत नहीं है। आश्वस्त होने के बाद गौरी शंकर ने रूपचंद्र को ये कह कर अंदर भेजा कि वो सबको बुला कर लाए। आख़िर थोड़ी ही देर में अंदर से सभी औरतें और बहू बेटियां बाहर आ गईं। गौरी शंकर के पिता चल फिर नहीं सकते थे इस लिए वो अंदर ही थे।

बाहर बैठक में दादा ठाकुर को बैठे देख सभी औरतें और बहू बेटियां हैरान थीं। उनमें से किसी को भी उम्मीद नहीं थी कि इतना कुछ होने के बाद दादा ठाकुर इस तरह उनके घर आ सकते हैं। बहरहाल, उन सबको आ गया देख दादा ठाकुर कुर्सी से उठे और मणि शंकर की पत्नी फूलवती के पास पहुंचे। ये देख सबकी सांसें थम सी गईं।

"प्रणाम भाभी श्री।" अपने दोनों हाथ जोड़ कर दादा ठाकुर ने फूलवती से कहा____"इस घर में आप हमसे बड़ी हैं। हमें उम्मीद है कि आपका हृदय इतना विशाल है कि आप हमें आशीर्वाद ज़रूर देंगी।"

दादा ठाकुर के मुख से ऐसी बातें सुन जहां बाकी सब आश्चर्य से दादा ठाकुर को देखने लगे थे वहीं फूलवती के चेहरे पर सहसा गुस्से के भाव उभर आए। कुछ पलों तक वो गुस्से से ही दादा ठाकुर को देखती रहीं फिर जाने उन्हें क्या हुआ कि उनके चेहरे पर नज़र आ रहा गुस्सा गायब होने लगा।

"किसी औरत की कमज़ोरी से आप शायद भली भांति परिचित हैं ठाकुर साहब।" फूलवती ने भाव हीन लहजे से कहा____"खुद को हमसे छोटा बना कर हमारा स्नेह पा लेना चाहते हैं आप।"

"छोटों को अपने से बड़ों से इसके अलावा और भला क्या चाहिए भाभी श्री?" दादा ठाकुर ने कहा____"हमारे द्वारा इतना कुछ सह लेने के बाद भी अगर आप हमें आशीर्वाद और स्नेह प्रदान करेंगी तो ये हमारे लिए किसी ईश्वर के वरदान से कम नहीं होगा।"

"क्या आपको लगता है कि ऐसे किसी वरदान के योग्य हैं आप?" फूलवती ने कहा।
"बिल्कुल भी नहीं।" दादा ठाकुर ने कहा____"किंतु फिर भी हमें यकीन है कि सब कुछ भुला कर आप हमें ये वरदान ज़रूर देंगी।"

"इस जन्म में तो ये संभव नहीं है ठाकुर साहब।" फूलवती ने तीखे भाव से कहा____"आप सिर्फ ये बताइए कि यहां किस लिए आए हैं?"

फूलवती की बात सुन कर दादा ठाकुर कुछ पलों तक उसे देखते रहे फिर बाकी सबकी तरफ देखने के बाद वापस आ कर कुर्सी पर बैठ गए। वहां मौजूद हर कोई ये जानने के लिए उत्सुक था कि आख़िर दादा ठाकुर किस लिए आए हैं यहां?

"हमने तो उस दिन भी पंचायत में कहा था कि अगर हमें मौत की सज़ा भी दे दी जाए तो हमें कोई अफ़सोस अथवा तकलीफ़ नहीं होगी।" दादा ठाकुर ने गंभीर भाव से कहा____"क्योंकि हमने जो किया है उसकी सिर्फ और सिर्फ वही एक सज़ा होनी चाहिए थी मगर पंच परमेश्वर ने हमें ऐसी सज़ा ही नहीं दी। हमें आप सबकी तकलीफ़ों का भली भांति एहसास है। अगर आप सबका दुख हमारी मौत हो जाने से ही दूर हो सकता है तो इसी वक्त आप लोग हमारी जान ले लीजिए। हमने बाहर खड़े अपने मुलाजिम को पहले ही बोल दिया है कि अगर यहां पर हमारी मौत हो जाए तो वो हमारी मौत के लिए किसी को भी ज़िम्मेदार न माने और ना ही इसके लिए किसी को कोई सज़ा दिलाने का सोचे। तो अब देर मत कीजिए, हमें इसी वक्त जान से मार कर आप सब अपना दुख दूर कर लीजिए।"

दादा ठाकुर की ये बात सुन कर सब के सब भौचक्के से देखते रह गए उन्हें। रूपचंद्र और गौरी शंकर हैरत से आंखें फाड़े दादा ठाकुर को देखे जा रहे थे। काफी देर तक जब किसी ने कुछ नहीं किया और ना ही कुछ कहा तो दादा ठाकुर ने सबको निराशा की दृष्टि से देखा।

"क्या हुआ आप सब चुप क्यों हैं?" दादा ठाकुर ने सबकी तरफ देखते हुए कहा____"अगर हमें जान से मार देने पर ही आप सबका दुख दूर हो सकता है तो मार दीजिए हमें। इतने बड़े अपराध बोझ के साथ तो हम खुद भी जीना नहीं चाहते।" कहने के साथ ही दादा ठाकुर एकाएक गौरी शंकर से मुखातिब हुए____"गौरी शंकर, क्या हुआ? आख़िर अब क्या सोच रहे हो तुम? हमें जान से मार क्यों नहीं देते तुम?"

"ठ...ठाकुर साहब, ये...ये क्या कह रहे हैं आप?" गौरी शंकर बुरी तरह चकरा गया था। हैरत से आंखें फाड़े बोला____"आपका दिमाग़ तो सही है ना?"

"हम पूरी तरह होश में हैं गौरी शंकर।" दादा ठाकुर ने कहा____"हमें अच्छी तरह पता है कि हम तुम सबसे क्या कह रहे हैं। हमारा यकीन करो, हम यहां इसी लिए तो आए हैं ताकि तुम सब हमारी जान ले कर अपने दुख संताप को दूर कर लो। हमें भी अपने भाई और अपने बेटे की हत्या हो जाने के दुख से मुक्ति मिल जाएगी।"

"ये...ये कैसी बातें कर रहे हैं आप?" गौरी शंकर मानो अभी भी चकराया हुआ था____"नहीं नहीं, हम में से कोई भी आपके साथ ऐसा नहीं कर सकता। कृपया सम्हालिए खुद को।"

"तुम्हें पता है गौरी शंकर।" दादा ठाकुर ने गंभीरता से कहा____"जब हम दोनों परिवारों के रिश्ते सुधर गए थे तो हमें बेहद खुशी हुई थी। हमें लगा था कि वर्षों पहले दादा ठाकुर बनने के बाद जो हमने तुम्हारे पिता जी से माफ़ी मांगी थी उसको कबूल कर लिया है उन्होंने। मुद्दत बाद ही सही किंतु दो संपन्न परिवारों के बीच के रिश्ते फिर से बेहतर हो गए। हमने जाने क्या क्या सोच लिया था हमारे बेहतर भविष्य के लिए मगर हमें क्या पता था कि हमारी ये खुशियां महज चंद दिनों की ही मेहमान थीं। हम जानते हैं कि हमारे पिता यानि बड़े दादा ठाकुर ने अपने ज़माने में जाने कितनों के साथ बुरा किया था इस लिए उनके बाद जब हम उनकी जगह पर आए तो हमने सबसे पहली क़सम इसी बात की खाई थी कि न तो हम कभी किसी के साथ बुरा करेंगे और ना ही हमारे बच्चे। हां हम ये मानते हैं कि वैभव पर हम कभी पाबंदी नहीं लगा सके, जबकि उसको सुधारने के लिए हमने हमेशा ही उसको सख़्त से सख़्त सज़ा दी है। ख़ैर हम सिर्फ ये कहना चाहते हैं कि इस सबके बाद अगर हमें जीने का मौका मिला है तो क्यों इस मौके को बर्बाद करें? हमारा मतलब है कि आपस का बैर भाव त्याग कर क्यों ना हम सब साथ मिल कर बचे हुए को संवारने की कोशिश करें।"

"क्या आपको लगता है कि हमारे बीच इतना कुछ होने के बाद अब ये सब होना संभव हो सकेगा?" गौरी शंकर ने कहा____"नहीं ठाकुर साहब। ऐसा कभी संभव नहीं हो सकता।"

"हां ऐसा तभी संभव नहीं हो सकता जब हम खुद ऐसा न करना चाहें।" दादा ठाकुर ने कहा____"अगर हम ये सोच कर चलेंगे कि थाली में रखा हुआ भोजन हमारे हाथ और मुंह का उपयोग किए बिना ही हमारे पेट में पहुंच जाए तो यकीनन वो नहीं पहुंचेगा। वो तो तभी पहुंचेगा जब हम उसे पेट में पहुंचाने के लिए अपने हाथ और मुंह दोनों चलाएंगे।"

"हमारे बीच का मामला थाली में रखे हुए भोजन जैसा नहीं है ठाकुर साहब।" गौरी शंकर ने कहा____"और फिर एक पल के लिए हम मान भी लें तो ऐसा क्या करेंगे जिससे हमारे बीच के रिश्ते पहले जैसे हो जाएं? क्या आप हमारे अंदर का दुख दूर कर पाएंगे? क्या आप उन लोगों को वापस ला पाएंगे जिन्हें आपने मार डाला? नहीं ठाकुर साहब, ये काम न आप कर सकते हैं और ना ही हम।"

"हम मानते हैं कि हम दोनों न तो गुज़र गए लोगों को वापस ला सकते हैं और ना ही एक दूसरे का दुख दूर कर सकते हैं।" दादा ठाकुर ने कहा____"किंतु क्या ये सोचने का विषय नहीं है कि क्या हम दोनों इसी सब को लिए बैठे रहेंगे जीवन भर? आख़िर इस दुख तकलीफ़ को तो हम दोनों को ही भुलाने की कोशिश करनी होगी और उन लोगों के बारे में सोचने होगा जो हमारे ही सहारे पर बैठे हैं।"

"क्या मतलब है आपका?" गौर शंकर ने संदेहपूर्ण भाव से पूछा।

"तुम इस बारे में क्या सोचते हो और क्या फ़ैसला करते हो ये तुम्हारी सोच और समझ पर निर्भर करता है।" दादा ठाकुर ने कहा____"किंतु हमने सोच लिया है कि हम वो सब करेंगे जिससे कि सब कुछ बेहतर हो सके।"

"क...क्या करना चाहते हैं आप?" रूपचंद्र ने पहली बार हस्तक्षेप करते हुए पूछा।

"इसे हमारा कर्तव्य समझो या फिर हमारा प्रायश्चित।" दादा ठाकुर ने गंभीरता से कहा____"लेकिन सच ये है कि हमने इस परिवार के लिए बहुत कुछ सोच लिया है। इस परिवार की सभी लड़कियों को हम अपनी ही बेटियां समझते हैं इस लिए हमने सोचा है कि उन सबका ब्याह हम करवाएंगे लेकिन वहीं जहां आप लोग चाहेंगे।"

"इसकी कोई ज़रूरत नहीं है ठाकुर साहब।" सहसा फूलवती बोल पड़ी____"हमारी बेटियां हमारे लिए कोई बोझ नहीं हैं और हम इतने असमर्थ भी नहीं हैं कि हम उनका ब्याह नहीं कर सकते।"

"हमारा ये मतलब भी नहीं है भाभी श्री कि आपकी बेटियां आपके लिए बोझ हैं या फिर आप उनका ब्याह करने में असमर्थ हैं।" दादा ठाकुर ने कहा____"हमें बखूबी इस बात का इल्म है कि आप पूरी तरह सभी कामों के लिए समर्थ हैं किंतु....।"

"किंतु क्या ठाकुर साहब?" फूलवती ने दादा ठाकुर की तरफ देखा।

"यही कि अगर ऐसा पुण्य काम करने का सौभाग्य आप हमें देंगी तो हमें बेहद अच्छा लगेगा।" दादा ठाकुर ने कहा____"हमारी अपनी तो कोई बेटी है नहीं। हमारे छोटे भाई की बेटी है जिसका कन्यादान उसे खुद ही करना था। हम पहले भी इस बारे में बहुत सोचते थे और हमेशा हमारे ज़हन में इस घर की बेटियों का ही ख़याल आता था। जब हमारे रिश्ते बेहतर हो गए थे तो हमें यकीन हो गया था कि जल्द ही हमारी ये ख़्वाहिश पूरी हो जाएगी। हमने तो ख़्वाब में भी नहीं सोचा था कि ये सब हो जाएगा। ख़ैर जो हुआ उसे लौटाया तो नहीं जा सकता लेकिन फिर से एक नई और बेहतर शुरुआत के लिए अगर हम सब मिल कर ये सब करें तो कदाचित हम दोनों ही परिवार वालों को एक अलग ही सुखद एहसास हो।"

"ठीक है फिर।" फूलवती ने कहा____"अगर आप वाकई में सब कुछ बेहतर करने का सोचते हैं तो हमें भी ये सब मंजूर है लेकिन....।"

"ल...लेकिन क्या भाभी श्री।" दादा ठाकुर ने उत्सुकता से पूछा। उन्हें फूलवती द्वारा सब कुछ मंज़ूर कर लेने से बेहद खुशी का आभास हुआ था।

"यही कि अगर आप सच में चाहते हैं कि हमारे दोनों ही परिवारों के बीच बेहतर रिश्ते के साथ एक नई शुरुआत हो।" फूलवती ने एक एक शब्द पर ज़ोर देते हुए कहा____"तो हमारा भी आपके लिए एक सुझाव है और हम उम्मीद करते हैं कि आपको हमारा सुझाव पसंद ही नहीं आएगा बल्कि मंज़ूर भी होगा।"

"बिल्कुल भाभी श्री।" दादा ठाकुर ने खुशी ज़ाहिर करते हुए कहा____"आप बताइए क्या सुझाव है आपका?"

"अगर आप अपनी बेटी कुसुम का ब्याह हमारे बेटे रूपचंद्र से कर दें।" फूलवती ने कहा___"तो हमें पूरा यकीन है कि दोनों ही परिवारों के बीच के रिश्ते हमेशा के लिए बेहतर हो जाएंगे और इसके साथ ही एक नई शुरुआत भी हो जाएगी।"

फूलवती की बात सुन कर दादा ठाकुर एकदम से ख़ामोश रह गए। उन्हें सपने में भी उम्मीद नहीं थी कि फूलवती उनसे ऐसा भी बोल सकती है। सहसा उन्हें पंचायत में मुंशी चंद्रकांत द्वारा बताई गई बातों का ध्यान आया जब उसने बताया था कि साहूकार लोग उनकी बेटी कुसुम से रूपचंद्र का ब्याह करना चाहते थे।

"क्या हुआ ठाकुर साहब?" फूलवती के होठों पर एकाएक गहरी मुस्कान उभर आई____"आप एकदम से ख़ामोश क्यों हो गए? ऐसा लगता है कि आपको हमारा सुझाव अच्छा नहीं लगा। अगर यही बात है तो फिर यही समझा जाएगा कि आप यहां बेहतर संबंध बनाने और एक नई शुरुआत करने की जो बातें हम सबसे कर रहे हैं वो सब महज दिखावा हैं। यानि आप हम सबके सामने अच्छा बनने का दिखावा कर रहे हैं।"

"नहीं भाभी श्री।" दादा ठाकुर ने कहा____"आप ग़लत समझ रही हैं। ऐसी कोई बात नहीं है।"

"तो फिर बताइए ठाकुर साहब।" फूलवती ने कुटिलता से मुस्कुराते हुए कहा____"क्या आपको हमारा सुझाव पसंद आया? क्या आप दोनों परिवारों के बीच गहरे संबंधों के साथ एक नई शुरुआत के लिए अपनी बेटी का ब्याह हमारे बेटे रूपचंद्र से करने को तैयार हैं?"

"हमें इस रिश्ते से कोई समस्या नहीं है भाभी श्री।" दादा ठाकुर ने कहा____"बल्कि अगर ऐसा हो जाए तो ये बहुत ही अच्छी बात होगी।"

दादा ठाकुर की ये बात सुन कर सभी हैरत से उन्हें देखने लगे। किसी को भी यकीन नहीं हो रहा था कि दादा ठाकुर ऐसा भी बोल सकते हैं। उधर रूपचंद्र का चेहरा अचानक ही खुशी से चमकने लगा था। उसे भी यकीन नहीं हो रहा था कि दादा ठाकुर खुद उसके साथ कुसुम का ब्याह करने को राज़ी हो सकते हैं।
 
अध्याय - 80
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"हमें इस रिश्ते से कोई समस्या नहीं है भाभी श्री।" दादा ठाकुर ने कहा____"बल्कि अगर ऐसा हो जाए तो ये बहुत ही अच्छी बात होगी।"

दादा ठाकुर की ये बात सुन कर सभी हैरत से उन्हें देखने लगे। किसी को भी यकीन नहीं हो रहा था कि दादा ठाकुर ऐसा भी बोल सकते हैं। उधर रूपचंद्र का चेहरा अचानक ही खुशी से चमकने लगा था। उसे भी यकीन नहीं हो रहा था कि दादा ठाकुर खुद उसके साथ कुसुम का ब्याह करने को राज़ी हो सकते हैं।


अब आगे....


मुंशी चंद्रकांत का बेटा रघुवीर भागता हुआ अपने घर के अंदर आया और बरामदे में बैठे अपने पिता से बोला____"बापू, मैंने अभी अभी साहूकारों के घर में दादा ठाकुर को जाते देखा है।"

"क...क्या???" चंद्रकांत बुरी तरह चौंका____"ये क्या कह रहे हो तुम?"

"मैं सच कह रहा हूं बापू।" रघुवीर ने कहा____"दादा ठाकुर अपनी बग्घी से आया है। मैंने देखा कि रूपचंद्र ने दरवाज़ा खोला और फिर कुछ देर बाद गौरी शंकर भी आया। दादा ठाकुर ने उससे कुछ कहा और फिर वो लोग अंदर चले गए।"

"बड़े हैरत की बात है ये।" चंद्रकांत चकित भाव से सोचते हुए बोला____"इतना कुछ हो जाने के बाद दादा ठाकुर आख़िर किस लिए आया होगा साहूकारों के यहां?"

"कोई तो बात ज़रूर होगी बापू।" रघुवीर ने कहा____"मैंने देखा था कि गौरी शंकर ने उसे अंदर बुलाया तो वो चला गया। अभी भी वो लोग अंदर ही हैं।"

"हो सकता है दादा ठाकुर अपने किए की माफ़ी मांगने आया होगा उन लोगों से।" चंद्रकांत ने कहा____"पर मुझे पूरा यकीन है कि गौरी शंकर उसे कभी माफ़ नहीं करेगा।"

"क्यों नहीं करेगा भला?" रघुवीर ने मानों तर्क़ देते हुए कहा____"इसके अलावा उनके पास कोई दूसरा चारा भी तो नहीं है। मर्द के नाम पर सिर्फ दो लोग ही बचे हैं उनके घर में। ऐसे में अगर वो दादा ठाकुर से अब भी किसी तरह का बैर भाव रखेंगे तो नुकसान उन्हीं का होगा। मुझे तो पूरा भरोसा है बापू कि अगर दादा ठाकुर खुद चल कर माफ़ी मांगने ही आया है तो वो लोग ज़रूर माफ़ कर देंगे उसे। आख़िर उन्हें इसी गांव में रहना है तो भला कैसे वो दादा ठाकुर जैसे ताकतवर आदमी के खिलाफ़ जा सकेंगे?"

"शायद तुम सही कह रहे हो।" चंद्रकांत को एकदम से ही मानों वास्तविकता का एहसास हुआ____"अब वो किसी भी हाल में दादा ठाकुर के खिलाफ़ जाने का नहीं सोच सकते। उन्हें भी पता है कि मर्द के नाम पर अब सिर्फ वो ही दो लोग हैं। ऐसे में अगर उन्हें कुछ हो गया तो उनके घर की औरतों और बहू बेटियों का क्या होगा?"

"ये सब छोड़ो बापू।" रघुवीर ने कुछ सोचते हुए कहा____"अब ये सोचो कि हमारा क्या होगा? मेरा मतलब है कि अगर दादा ठाकुर ने किसी तरह साहूकारों को मना कर अपने से जोड़ लिया तो हमारे लिए समस्या हो जाएगी। हमने तो उस दिन पंचायत में भी ये कह दिया था कि हमें अपने किए का कोई अफ़सोस नहीं है इस लिए मुमकिन है कि इस बात के चलते दादा ठाकुर किसी दिन हमारे साथ कुछ बुरा कर दे।"

"तुम बेवजह ही दादा ठाकुर से इतना ख़ौफ खा रहे हो बेटा।" चंद्रकांत ने कहा____"मैं दादा ठाकुर को उसके बचपन से जानता हूं। वो कभी पंचायत के निर्णय के ख़िलाफ़ जा कर कोई क़दम नहीं उठाएगा। इस लिए तुम इस सबके लिए भयभीत मत हो।"

"और उसके उस बेटे का क्या जिसका नाम वैभव सिंह है?" रघुवीर ने सहसा चिंतित भाव से कहा____"क्या उसके बारे में भी तुम यही कह सकते हो कि वो भी अपने पिता की तरह पंचायत के फ़ैसले के खिलाफ़ जा कर कोई ग़लत क़दम नहीं उठाएगा?"

रघुवीर की बात सुन कर चंद्रकांत फ़ौरन कुछ बोल ना सका। कदाचित उसे भी एहसास था कि वैभव के बारे में उसके बेटे का ऐसा कहना ग़लत नहीं है। वो वैभव की नस नस से परिचित था इस लिए उसे वैभव पर भरोसा नहीं था। वैभव में हमेशा ही उसे बड़े दादा ठाकुर का अक्श नज़र आता था। कहने को तो वो अभी बीस साल का था लेकिन उसके तेवर और उसके काम करने का हर तरीका बड़े दादा ठाकुर जैसा ही था।

"तुम्हारी ख़ामोशी बता रही है बापू कि वैभव पर तुम्हें भी भरोसा नहीं है।" चंद्रकांत को चुप देख रघुवीर ने कहा____"यानि तुम भी समझते हो कि वैभव के लिए पंचायत का कोई भी फ़ैसला मायने नहीं रखता, है ना?"

"लगता तो मुझे भी यही है बेटा।" चंद्रकांत ने गहरी सांस लेते हुए कहा____"मगर मुझे इस बात का भी यकीन है कि वो अपने पिता के खिलाफ़ भी नहीं जा सकता। ये सब होने के बाद यकीनन उसके पिता ने उसे अच्छे से समझाया होगा कि अब उसे अपना हर तरीका या तो बदलना होगा या फिर छोड़ना होगा। वैभव भी अब पहले जैसा नहीं रहा जो किसी बात की परवाह किए बिना पल में वही कर जाए जो सिर्फ वो चाहता था। मुझे यकीन है कि वो भी अब कुछ भी उल्टा सीधा करने का नहीं सोचेगा।"

"मान लेता हूं कि नहीं सोचेगा।" रघुवीर ने कहा____"मगर कब तक बापू? वैभव जैसा लड़का भला कब तक अपनी फितरत के ख़िलाफ रहेगा? किसी दिन तो वो अपने पहले वाले रंग में आएगा ही, तब क्या होगा?"

"तो क्या चाहते हो तुम?" चंद्रकांत ने जैसे एकाएक परेशान हो कर कहा।

"इससे पहले कि पंचायत के खिलाफ़ जा कर वो हमारे साथ कुछ उल्टा सीधा करे।" रघुवीर ने एकदम से मुट्ठियां कसते हुए कहा___"हम खुद ही कुछ ऐसा कर डालें जिससे वैभव नाम का ख़तरा हमेशा हमेशा के लिए हमारे सिर से हट जाए।"

"नहीं।" चंद्रकांत अपने बेटे के मंसूबे को सुन कर अंदर ही अंदर कांप गया, बोला____"तुम ऐसा कुछ भी नहीं करोगे। ऐसा सोचना भी मत बेटे वरना अनर्थ हो जाएगा। मत भूलो कि अब हमारे साथ साहूकारों की फ़ौज नहीं है बल्कि इस समय हम अकेले ही हैं। इसके पहले तो किसी को हमसे ये उम्मीद ही नहीं थी कि हम ऐसा कर सकते हैं किंतु अब सबको हमारे बारे में पता चल चुका है। पंचायत के फ़ैसले के बाद अगर हमने कुछ भी उल्टा सीधा करने का सोचा तो यकीन मानो हमारे साथ ठीक नहीं होगा।"

"तुम तो बेवजह ही इतना घबरा रहे हो बापू।" रघुवीर ने कहा____"जबकि तुम्हें तो ये सोचना चाहिए कि जिस लड़के ने हमारे घर की औरतों के साथ हवस का खेल खेला है उसे कुछ भी कर के ख़त्म कर देना चाहिए। वैसे भी हम कौन सा ढिंढोरा पीट कर उसके साथ कुछ करेंगे?"

"मेरे अंदर की आग ठंडी नहीं हुई है बेटे।" चंद्रकांत ने सख़्त भाव से कहा____"उस हरामजादे के लिए मेरे अंदर अभी भी वैसी ही नफ़रत और गुस्सा मौजूद है। मैं भी उसे ख़त्म करना चाहता हूं लेकिन अभी ऐसा नहीं कर सकता। मामले को थोड़ा ठंडा पड़ने दो। लोगों के मन में इस बात का यकीन हो जाने दो कि अब हम कुछ नहीं कर सकते। उसके बाद ही हम उसे ख़त्म करने का सोचेंगे।"

"अगर ऐसी बात है तो फिर ठीक है।" रघुवीर ने कहा____"मैं मामले के ठंडा होने का इंतज़ार करूंगा।"

"यही अच्छा होगा बेटा।" चंद्रकांत ने कहा____"वैसे भी दादा ठाकुर ने हमारी निगरानी में अपने आदमी भी लगा रखे होंगे। ज़ाहिर है हम कुछ भी करेंगे तो उसका पता दादा ठाकुर को फ़ौरन चल जाएगा। इस लिए हमें तब तक शांत ही रहना होगा जब तक कि ये मामला ठंडा नहीं हो जाता अथवा हमें ये न लगने लगे कि अब हम पर निगरानी नहीं रखी जा रही है।"

रघुवीर को सारी बात समझ में आ गई इस लिए उसने ख़ामोशी से सिर हिलाया और फिर उठ कर अंदर चला गया। उसके जाने के बाद चंद्रकांत गहरी सोच में डूब गया। दादा ठाकुर की साहूकारों के घर में मौजूदगी उसके लिए मानों चिंता का सबब बन गई थी।

✮✮✮✮

"अगर आप वाकई में अपनी बेटी का ब्याह हमारे बेटे के साथ करने को तैयार हैं।" फूलवती ने कहा____"तो हमें भी ये मंजूर है कि आप हमारे घर की बेटियों का ब्याह अपने हिसाब से करें। ख़ैर अभी तो साल भर हमारे घरों में ब्याह जैसे शुभ काम नहीं हो सकते इस लिए अगले साल आपकी बेटी के ब्याह के साथ ही हमारे नए संबंधों का तथा नई शुरुआत का शुभारंभ हो जाएगा।"

"बिल्कुल।" दादा ठाकुर ने सहसा कुछ सोचते हुए कहा____"हमें इस रिश्ते से कोई आपत्ति नहीं है लेकिन एक बार हमें इस रिश्ते के बारे में अपने छोटे भाई जगताप की धर्म पत्नी से भी पूछना पड़ेगा।"

"उनसे पूछने की भला क्या ज़रूरत है ठाकुर साहब?" फूलवती ने कहा____"हवेली के मुखिया आप हैं। भला कोई आपके फ़ैसले के खिलाफ़ कैसे जा सकता है? हमें यकीन है कि मझली ठकुराईन को भी इस रिश्ते से कोई आपत्ति नहीं होगी।"

"अगर हमारा भाई जीवित होता तो बात अलग थी भाभी श्री।" दादा ठाकुर ने सहसा संजीदा हो कर कहा____"क्योंकि तब हमारा अपने भाई पर ज़्यादा हक़ और ज़्यादा ज़ोर होता किंतु अब वो नहीं रहा। इस लिए उसके बीवी बच्चों के ऊपर हम कोई भी फ़ैसला ज़बरदस्ती नहीं थोप सकते। हम ये हर्गिज़ नहीं चाहते कि उन्हें अपने लिए हमारे द्वारा किए गए किसी फ़ैसले से तनिक भी ठेस पहुंचे अथवा वो उनके मन के मुताबिक न हो। इसी लिए कह रहे हैं कि हमें एक बार उससे इस बारे में पूछना पड़ेगा।"

"चलिए ठीक है।" फूलवती ने कहा____"लेकिन मान लीजिए कि यदि मझली ठकुराईन ने इस रिश्ते के लिए मना कर दिया तब आप क्या करेंगे?"

"ज़ाहिर है तब ये रिश्ता हो पाना संभव ही नहीं हो सकेगा।" दादा ठाकुर ने जैसे स्पष्ट भाव से कहा____"जैसा कि हम बता ही चुके हैं कि पहले में और अब में बहुत फ़र्क हो गया है। हम अपने और अपने बच्चों के लिए हज़ारों दुख सह सकते हैं या उनके लिए कोई भी निर्णय ले सकते हैं मगर अपने दिवंगत भाई के बीवी बच्चों के लिए किसी भी तरह का निर्णय नहीं ले सकते और ना ही उन पर किसी तरह की आंच आने दे सकते हैं।"

"अगर मझली ठकुराईन ने इस रिश्ते को करने से इंकार कर दिया।" फूलवती ने दो टूक लहजे में कहा____"तो फिर बहुत मुश्किल होगा ठाकुर साहब हमारे और आपके बीच नई शुरुआत होना।"

"रिश्तों में किसी शर्त का होना अच्छी बात नहीं है भाभी श्री।" दादा ठाकुर ने कहा____"वैसे भी शादी ब्याह जैसे पवित्र रिश्ते तो ऊपर वाले की कृपा और आशीर्वाद से ही बनते हैं। ख़ैर हम इस बारे में बात करेंगे किंतु अगर कुसुम की मां ने इस रिश्ते के लिए इंकार किया तो हम उस पर ज़ोर भी नहीं डालेंगे। रिश्ते तो वही बेहतर होते हैं जिनमें दोनों पक्षों की सहमति और खुशी शामिल हो। ज़बरदस्ती बनाए गए रिश्ते कभी खुशियां नहीं देते।"

रूपचंद्र जो अब तक खुशी से फूला नहीं समा रहा था दादा ठाकुर की ऐसी बातें सुनने से उसकी वो खुशी पलक झपकते ही छू मंतर हो गई। फूलवती ने कुछ कहना तो चाहा लेकिन फिर जाने क्या सोच कर वो कुछ न बोली। दादा ठाकुर उठे और फिर बाहर की तरफ चल दिए। उनके पीछे गौरी शंकर और रूपचंद्र भी चल पड़े। बाहर आ कर दादा ठाकुर ने गौरी शंकर से इतना ही कहा कि उन सबके लिए हवेली के दरवाज़े खुले हैं। वो लोग जब चाहे आ सकते हैं। उसके बाद दादा ठाकुर बग्घी में आ कर बैठे ग‌ए। शेरा ने घोड़ों की लगाम को झटका दिया तो वो बग्घी को लिए चल पड़े।

"आपने तो कमाल ही कर दिया भौजी।" दादा ठाकुर के जाने के बाद गौरी शंकर अंदर आते ही फूलवती से बोल पड़ा____"दादा ठाकुर से शादी जैसे रिश्ते की बात कहने की तो मुझमें भी हिम्मत नहीं थी लेकिन आपने तो बड़ी सहजता से उनसे ये बात कह दी।"

"आप सही कह रहे हैं काका।" रूपचंद्र ने मुस्कुराते हुए कहा____"बड़ी मां को दादा ठाकुर से ऐसी बात कहते हुए ज़रा भी डर नहीं लगा।"

"दादा ठाकुर भी इंसान ही है बेटा।" फूलवती ने सपाट लहजे में कहा____"और इंसान से भला क्या डरना? वैसे भी उसने जो किया है उसकी वजह से वो हमारे सामने सिर उठाने की हिम्मत नहीं कर पा रहा है। फिर जब उसने रिश्ते सुधार कर फिर से नई शुरुआत करने की बात कही तो मैंने भी यही देखने के लिए उससे ऐसा कह दिया ताकि देख सकूं कि वो इस बारे में क्या कहता है?"

"उसने आपकी बात मान तो ली ना भौजी।" गौरी शंकर ने कहा____"उसने तो इस रिश्ते से इंकार ही नहीं किया जबकि मैं तो यही सोच के डर रहा था जाने वो आपकी इन बातों पर क्या कहने लगे?"

"ये उसकी मजबूरी थी जो उसने इस रिश्ते के लिए हां कहा।" फूलवती ने कहा____"क्योंकि वो अपराध बोझ से दबा हुआ है और हर हाल में चाहता है कि हमारे साथ उसके रिश्ते बेहतर हो जाएं। ख़ैर उसने इस रिश्ते के लिए मजबूरी में हां तो कहा लेकिन फिर एक तरह से इंकार भी कर दिया।"

"वो कैसे बड़ी मां?" रूपचंद्र को जैसे समझ न आया।

"अपने छोटे भाई की पत्नी से इस रिश्ते के बारे में पूछने की बात कह कर।" फूलवती ने कहा____"हालाकि एक तरह से उसका ये सोचना जायज़ भी है किन्तु उसे भी पता है कि उसके भाई की पत्नी अपनी बेटी का ब्याह हमारे घर में कभी नहीं करेगी। ज़ाहिर है ये एक तरह से इंकार ही हुआ।"

"हां हो सकता है।" गौरी शंकर ने कहा____"फिर भी देखते हैं क्या होता है? अगर वो सच में हमारे रूपचंद्र से अपने छोटे भाई की बेटी का ब्याह कर के नया रिश्ता बनाना चाहता है तो यकीनन वो हवेली में बात करेगा।"

"अब यही तो देखना है कि आने वाले समय में उसकी तरफ से हमें क्या जवाब मिलता है?" फूलवती ने कहा।

"और अगर सच में ये रिश्ता न हुआ तो?" गौरी शंकर ने कहा____"तब क्या आप उसे यही कहेंगी कि हम उससे अपने रिश्ते नहीं सुधारेंगे?"

"जिस व्यक्ति ने हमारे घर के लोगों की हत्या कर के हमारा सब कुछ बर्बाद कर दिया हो।" फूलवती ने सहसा तीखे भाव से कहा____"ऐसे व्यक्ति से हम कैसे भला कोई ताल्लुक रख सकते हैं? कहीं तुम उससे रिश्ते सुधार लेने का तो नहीं सोच रहे?"

"बड़े भैया के बाद आप ही हमारे परिवार की मालकिन अथवा मुखिया हैं भौजी।" गौरी शंकर ने गंभीरता से कहा____"हम भला कैसे आपके खिलाफ़ कुछ करने का सोच सकते हैं?"

"वाह! बहुत खूब।" फूलवती के पीछे खड़ी उसकी बीवी सुनैना एकदम से बोल पड़ी____"क्या कहने हैं आपके। इसके पहले भी आप सबने इनसे पूछ कर ही हर काम किया था और अब आगे भी करेंगे, है ना?"

गौरी शंकर अपनी बीवी की ताने के रूप में कही गई ये बात सुन कर चुप रह गया। उससे कुछ कहते ना बना था। कहता भी क्या? सच ही तो कहा था उसकी बीवी ने। फूलवती ने सुनैना और बाकी सबको अंदर जाने को कहा तो वो सब चली गईं।

✮✮✮✮

कपड़े बदल कर मैं अपने कमरे में आराम ही कर रहा था कि तभी दरवाजे पर दस्तक हुई। मैंने जा कर दरवाज़ा खोला तो देखा बाहर भाभी अपने हाथ में चाय का प्याला लिए खड़ीं थी। विधवा के लिबास में उन्हें देखते ही मेरे अंदर एक टीस सी उभरी।

"मां जी ने बताया कि तुम भींग गए थे।" भाभी ने कमरे में दाखिल होते हुए कहा____"इस लिए तुम्हारे लिए अदरक वाली गरमा गरम चाय बना कर लाई हूं।"

"आपको ये तकल्लुफ करने की क्या ज़रूरत थी भाभी?" मैंने उनके पीछे आते हुए कहा____"हवेली में इतनी सारी नौकरानियां हैं। किसी को भी बोल देतीं आप।"

"शायद तुम भूल गए हो कि हवेली की किसी भी नौकरानी को तुम्हारे कमरे में आने की इजाज़त नहीं है।" मैं जैसे ही पलंग पर बैठा तो भाभी ने मेरी तरफ चाय का प्याला बढ़ाते हुए कहा____"ऐसे में भला कोई नौकरानी तुम्हें चाय देने कैसे आ सकती थी? मां जी को सीढियां चढ़ने में परेशानी होती है इस लिए मुझे ही आना पड़ा।"

"और आपकी चाय कहां है?" मैंने विषय बदलते हुए कहा____"क्या आप नहीं पियेंगी?"
"अब जाऊंगी तो मां जी के साथ बैठ कर पियूंगी।" भाभी ने कहा____"वैसे कहां गए थे जो बारिश में भीग कर आए थे?"

"मन बहलाने के लिए बाहर गया था।" मैंने चाय का एक घूंट लेने के बाद कहा____"और कुछ ज़रूरी काम भी था। पिता जी ने कहा है कि अब से मुझे वो सारे काम करने होंगे जो इसके पहले जगताप चाचा करते थे। मतलब कि खेती बाड़ी के सारे काम।"

"अच्छा ऐसी बात है क्या?" भाभी ने हैरानी से मेरी तरफ देखा____"मतलब कि अब ठाकुर वैभव सिंह खेती बाड़ी के काम करेंगे?"

"क्या आप मेरी टांग खींच रही हैं?" मैंने भाभी की तरफ ध्यान से देखा____"क्या आपको यकीन नहीं है कि मैं ये काम भी कर सकता हूं?"

"अरे! मैं कहां तुम्हारी टांग खींच रही हूं?" भाभी ने कहा____"मुझे तो बस हैरानी हुई है तुम्हारे मुख से ये सुन कर। रही बात तुम्हारे द्वारा ये काम कर लेने की तो मुझे पूरा यकीन है कि मेरे देवर के लिए कोई भी काम कर लेना मुश्किल नहीं है।"

जाने क्यों मुझे अभी भी लग रहा था जैसे वो मेरी टांग ही खींच रही हैं किंतु उनके चेहरे पर ऐसे कोई भाव नहीं थे इस लिए मैं थोड़ा दुविधा में पड़ गया था। मुझे समझ ही न आया कि मैं उनसे क्या कहूं।

"चाची और कुसुम लोगों के जाने के बाद आपको अकेलापन तो नहीं महसूस हो रहा भाभी?" मैंने फिर से विषय बदलते हुए पूछा।

"मेरा अकेलापन तो अब कभी भी दूर नहीं हो सकता वैभव।" भाभी ने सहसा गंभीर हो कर कहा____"इस दुनिया में एक औरत के लिए उसका पति ही सब कुछ होता है। जब तक वो उसके पास होता है तब तक वो हर हाल में खुशी से रह लेती है किंतु जब वही पति उसे छोड़ कर चला जाता है तो फिर उस औरत का अकेलापन कोई भी दूर नहीं कर सकता।"

"हां मैं समझता हूं भाभी।" मैंने सिर हिलाते हुए कहा____"सच कहूं तो आपको इस लिबास में देख कर मुझे बहुत तकलीफ़ होती है। काश! मेरे बस में होता तो मैं भैया को वापस ला कर फिर से आपको पहले की तरह सुहागन बना देता और आप फिर से हमेशा की तरह खुश हो जातीं।"

"छोड़ो इस बात को।" भाभी ने मुझसे चाय का खाली कप लेते हुए कहा____"अब तुम आराम करो। मैं भी जाती हूं, मां जी अकेली होंगी।"

"अच्छा एक बात कहूं आपसे?" मैंने कुछ सोचते हुए उनसे पूछा।
"हां कहो।" उन्होंने मेरी तरफ देखा।

"मेनका चाची की तरह क्या आपका भी मन है अपनी मां के पास जाने का?" मैंने उनके चेहरे की तरफ देखते हुए पूछा____"अगर मन है तो आप बेझिझक मुझे बता दीजिए। मैं आपको चंदनपुर ले चलूंगा।"

"मैं मां जी को यहां अकेला छोड़ कर कहीं नहीं जाना चाहती।" भाभी ने कहा____"वैसे भी वो भी तो मेरी मां ही हैं। उन्होंने सगी मां की ही तरह प्यार और स्नेह दिया है मुझे।"

"फिर भी मन तो करता ही होगा आपका।" मैंने कहा____"अच्छा एक काम करता हूं। जब मेनका चाची यहां वापस आ जाएंगी तब मैं आपको ले चलूंगा। तब तो आप जाना चाहेंगी न?"

"हां तब तो जा सकती हूं।" भाभी ने कुछ सोचते हुए कहा____"मगर सोचती हूं कि अगर इस हाल में जाऊंगी तो मां मुझे देख कर कैसे खुद को सम्हाल पाएगी?"

"हां ये भी है।" मैंने गंभीरता से सिर हिलाया____"आपके भैया को भी इतने सालों बाद पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई थी। इस खुशी में वो बेचारे बड़ा भारी उत्सव भी मनाने जा रहे थे किंतु विधाता ने सब कुछ तबाह कर दिया।"

भाभी मेरी बात सुन कर एकदम से सिसक उठीं। उनकी आंखों से आंसू छलक पड़े। ये देख एकदम से मुझे अपनी ग़लती का एहसास हुआ। कहां मैं उन्हें खुश करने के लिए कोई न कोई कोशिश कर रहा था और कहां मेरी इस बात से उन्हें तकलीफ़ हो गई।

मैं जल्दी से उठ कर उनके पास गया और उनके दोनों कन्धों को पकड़ कर बोला____"मुझे माफ़ कर दीजिए भाभी। मेरा इरादा आपको इस तरह रुला देने का हर्गिज़ नहीं था। कृपया मत रोइए। आपके आंसू देख कर मुझे भी बहुत तकलीफ़ होने लगती है।"

मेरी बात सुन कर भाभी ने खुद को सम्हाला और अपने आंसू पोंछ कर बिना कुछ कहे ही कमरे से बाहर निकल गईं। इधर मुझे अपने आप पर बेहद गुस्सा आ रहा था कि मैंने उनसे ऐसी बात ही क्यों कही जिसके चलते उन्हें रोना आ गया? ख़ैर अब क्या हो सकता था। मैं वापस पलंग पर जा कर लेट गया और मन ही मन सोचने लगा कि अब से मैं सिर्फ वही काम करूंगा जिससे भाभी को न तो तकलीफ़ हो और ना ही उनकी आंखों से आंसू निकलें।
 
अध्याय - 81
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मेरी बात सुन कर भाभी ने खुद को सम्हाला और अपने आंसू पोंछ कर बिना कुछ कहे ही कमरे से बाहर निकल गईं। इधर मुझे अपने आप पर बेहद गुस्सा आ रहा था कि मैंने उनसे ऐसी बात ही क्यों कही जिसके चलते उन्हें रोना आ गया? ख़ैर अब क्या हो सकता था। मैं वापस पलंग पर जा कर लेट गया और मन ही मन सोचने लगा कि अब से मैं सिर्फ वही काम करूंगा जिससे भाभी को न तो तकलीफ़ हो और ना ही उनकी आंखों से आंसू निकलें।


अब आगे....


"ये क्या कह रहे हैं आप?" पिता जी की बातें सुनते ही मां ने चकित हो कर उनकी तरफ देखा____"मणि शंकर भाई साहब की पत्नी ऐसा बोल सकती हैं? हमें यकीन नहीं हो रहा लेकिन आप कह रहे हैं तो सच ही होगा। वैसे आपको उनके घर जाना ही नहीं चाहिए था।"

"ऐसा क्यों कह रही हैं आप?" पिता जी ने कहा____"क्या आप नहीं चाहतीं कि सब कुछ भुला कर हम उनसे अपने रिश्ते बेहतर बना लें?"

"हम ये मानते हैं कि जीवन में कभी भी किसी से बैर भाव नहीं रखना चाहिए।" मां ने गंभीरता से कहा____"लेकिन हम ये भी समझते हैं कि ऐसे व्यक्ति से रिश्ता बनाना भी बेकार है जो किसी शर्त के आधार पर रिश्ता बनाने की बात करे। हमारे साथ तो अपराध करना उन्होंने ही शुरू किया था जिसका बदला अगर हमने इस तरह से ले लिया तो कौन सा गुनाह कर दिया हमने? फिर भी मान लेते हैं कि आपने उनके साथ अपराध किया है तो इसका मतलब ये नहीं कि वो आपको नीचा दिखाने के लिए आपसे कुछ भी कहने लगें।"

"क्या आपको सच में ऐसा लगता है कि वो हमसे ऐसा कह कर हमें नीचा दिखाने की कोशिश कर रहीं थी?" पिता जी ने कहा।

"और नहीं तो क्या।" मां ने दृढ़ता से कहा____"उनके ऐसा कहने का यही मतलब है। वो आपकी नर्मी को आपकी दुर्बलता समझ रही हैं और इसी लिए उन्होंने आपसे बेहतर रिश्ते बनाने के लिए ऐसी शर्त रखी। हमें तो हैरानी हो रही है कि उनकी हिम्मत कैसे हुई हमारी फूल जैसी बेटी के साथ अपने बेटे के रिश्ते की बात कहने की?"

"वैसे अगर ये रिश्ता हो भी जाता है तो इसमें कोई बुराई तो नहीं है।" पिता जी ने मां की तरफ देखते हुए कहा____"हमें लगता है कि इस तरह से दोनों परिवारों के बीच काफी गहरा और मजबूत रिश्ता बन जाएगा।"

"इसका मतलब आप भी चाहते हैं कि हमारी फूल जैसी बेटी का ब्याह उनके बेटे से हो जाए?" मां ने आश्चर्य से पिता जी को देखा____"हमें बड़ा आश्चर्य हो रहा है कि आप ऐसा चाहते हैं।"

"क्या आप नहीं चाहतीं?" पिता जी ने पूछा।

"नहीं, बिल्कुल भी नहीं।" मां ने पूरी मजबूती से इंकार में सिर हिलाते हुए कहा____"हम अपनी बेटी का ब्याह उस घर में कदापि नहीं करेंगी जिस घर के लोगों की मानसिकता इतनी गिरी हुई हो। आप एक बात अच्छी तरह समझ लीजिए कि हमारे संबंध उनसे बेहतर हों या ना हों लेकिन हमारी बेटी का ब्याह उस घर में किसी भी कीमत पर नहीं होगा।"

मां का एकदम से ही तमतमा गया चेहरा देख पिता जी ख़ामोश रह गए। उन्हें बिल्कुल भी अंदेशा नहीं था कि उनकी धर्म पत्नी ऐसे रिश्ते की बात सुन कर इस तरह से गुस्सा हो जाएंगी।

"एक बार आप इस बारे में मेनका से भी पूछ लीजिएगा।" पिता जी ने धड़कते हुए दिल से मां से कहा____"हो सकता है कि उसे इस रिश्ते से कोई आपत्ति न हो।"

"आपको क्या हो गया है आज?" मां ने हैरानी से पिता जी को देखा____"आप क्यों उनसे हमारी बेटी का रिश्ता करवाना चाहते हैं? क्या आपको अपनी बेटी से प्यार नहीं है? क्या आपको उसके सुखों का ख़याल नहीं है?"

"बिल्कुल है सुगंधा।" पिता जी ने गहरी सांस लेते हुए कहा____"आप ऐसा कैसे कह सकती हैं कि हमे हमारी बेटी से प्यार नहीं है अथवा हमें उसके सुखों का ख़याल नहीं है? वो इस हवेली की इकलौती बेटी है। हम सबकी जान बसती है उसमें। फिर भला हम कैसे उसके लिए कोई ग़लत फ़ैसला कर सकते हैं अथवा उसके भविष्य को बिगाड़ सकते हैं?"

"साहूकारों के घर में अपनी बेटी का ब्याह करना मतलब उसके भविष्य को बिगाड़ देना ही है ठाकुर साहब।" मां ने कहा____"क्या आपको इतना सब कुछ हो जाने के बाद भी एहसास नहीं हुआ है कि वो किस तरह की सोच और मानसिकता वाले लोग हैं? इतना कुछ हो जाने के बाद भी उन्हें अपनी ग़लतियों का एहसास नहीं है, बल्कि वो तो यही समझते हैं कि सिर्फ हमने ही उनके साथ बहुत बड़ा अन्याय किया है। ख़ैर अगर वो सच में दोनों परिवारों के बीच बेहतर संबंध बना लेने का सोचते तो इसके लिए वो ऐसी शर्त नहीं रखते और ना ही आपको नीचा दिखाने की कोशिश करते।"

"हां हम समझते हैं सुगंधा।" पिता जी ने गंभीरता से कहा____"किंतु किसी को तो झुकना ही पड़ेगा ना। वो भले ही खुद को दोषी अथवा अपराधी न समझते हों किंतु हम तो समझते हैं न कि हम उनके अपराधी हैं इस लिए उनके सामने हमें ही झुकना होगा।"

"बेशक आप झुकिए ठाकुर साहब।" मां ने स्पष्ट रूप से कहा____"लेकिन अपने साथ किसी और को इस तरह से मत झुकाइए। अगर आप समझते हैं कि आप उनके अपराधी हैं और उनके साथ किए गए अपराध के लिए आप प्रायश्चित के रूप में उनके लिए कुछ करना चाहते हैं तो सिर्फ वो कीजिए जिसमें सिर्फ आपका ही हक़ हो। कुसुम आपके छोटे भाई की बेटी है। भले ही हम उसे उसके मां बाप से भी ज़्यादा प्यार करते हैं मगर उसके लिए कोई फ़ैसला करने का हक़ हमें नहीं है। एक और बात, अपने बेटे को भी मत भूलिए। अगर उसे पता चला कि आपने उसकी लाडली बहन का ब्याह साहूकारों के यहां करने का मन बनाया है तो जाने वो क्या कर डालेगा?"

पिता जी कुछ न बोले। बस गहरी सोच में डूबे नज़र आने लगे। इतना तो वो भी समझते थे कि कुसुम का रिश्ता साहूकारों के यहां करना उचित नहीं है किंतु वो ये भी चाहते थे कि सब कुछ बेहतर हो जाए। एकाएक ही उनके चेहरे पर गहन चिंता के भाव उभरते नज़र आने लगे।

✮✮✮✮

सरोज ने जब दरवाज़ा खोला तो बाहर भुवन पर उसकी नज़र पड़ी और साथ ही उसके पीछे खड़े वैद्य जी पर। भुवन तो ख़ैर रोज़ ही आता था उसके घर लेकिन इस वक्त उसके साथ वैद्य को देख कर उसे बड़ी हैरानी हुई।

"भुवन बेटा तुम्हारे साथ वैद्य जी क्यों आए हैं? सब ठीक तो है न?" फिर उसने उत्सुकतावश पूछा।

"फ़िक्र मत करो काकी।" भुवन ने हल्के से मुस्कुराते हुए कहा____"अंदर चलो सब बताता हूं तुम्हें।"

सरोज एक तरफ हुई तो भुवन दरवाज़े के अंदर आ गया और उसके पीछे वैद्य जी भी अपना थैला लटकाए आ गए। सरोज दरवाज़े को यूं ही आपस में भिड़ा कर उनके पीछे आंगन में आ गई। इस बीच भुवन ने खुद ही बरामदे से चारपाई निकाल कर आंगन में बिछा दिया था। बारिश होने की वजह से आंगन में कीचड़ हो गया था।

भुवन ने वैद्य जी को चारपाई पर बैठाया और सरोज से उनके लिए पानी लाने को कहा। सरोज अपने मन में तरह तरह की बातें सोचते हुए जल्दी ही लोटा ग्लास में पानी ले आई और वैद्य जी को पकड़ा दिया। आंगन में लोगों की आवाज़ें सुन कर अनुराधा भी अपने कमरे से निकल कर बाहर बरामदे में आ गई। भुवन के साथ वैद्य जी को देख उसे कुछ समझ न आया।

"काकी बात असल में ये है कि अनुराधा जब मेरे पास गई थी तो वो बारिश में बहुत ज़्यादा भीग गई थी।" भुवन ने एक नज़र अनुराधा पर डालने के बाद सरोज से कहा____"और फिर मेरे मना करने के बाद भी बारिश में भींगते हुए ये घर चली आई। कह रही थी कि तुम गुस्सा करोगी इस पर। उस समय मेरे पास छोटे कुंवर भी थे, जब ये मेरे मना करने पर भी चली आई तो वो बोले कि कहीं ये भींगने की वजह से बीमार न पड़ जाए इस लिए मैं वैद्य जी को ले कर यहां आ जाऊं।"

"हाय राम! ये लड़की भी न।" सारी बातें सुन कर सरोज एकदम से बोल पड़ी____"किसी की भी नहीं सुनती है आज कल। अभी कुछ देर पहले जब ये भीगते हुए यहां आई थी तो मैं भी इसे डांट रही थी कि बारिश में भीगने से बीमार पड़ जाएगी तो कैसे इलाज़ करवाऊंगी? वो तो शुक्र है छोटे कुंवर का जो उन्होंने वैद्य जी को तुम्हारे साथ भेज दिया। जब से अनू के बापू गुज़रे हैं तब से हमारा हर तरह से ख़याल रख रहे हैं वो।"

सरोज एकदम से भावुक हो गई। उधर अनुराधा ये सोचे जा रही थी कि भुवन ने कितनी सफाई से बातों को बदल कर सच को छुपा लिया था। उसे इस बात से काफी शर्मिंदगी हुई किंतु ये सोच कर उसे रोना भी आने लगा कि वैभव ने उसकी सेहत का ख़याल कर के भुवन के साथ वैद्य जी को यहां भेज दिया है। एक बार फिर से उसकी आंखों के सामने वो दृश्य उजागर हो गया जब वैभव छाता लिए उसके पास खड़ा था और उससे बातें कर रहा था। अनुराधा के कानों में एकाएक ही उसकी बातें गूंजने लगीं जिससे उसके दिल में एकदम से दर्द सा होने लगा।

"मेरी बहन बारिश में भींगने से बीमार तो नहीं हुई है ना?" भुवन ने अनुराधा की तरफ देखते हुए कहा____"इधर आओ ज़रा और वैद्य जी को दिखाओ खुद को।"

मजबूरन अनुराधा को बरामदे से निकल कर आंगन में वैद्य जी के पास आना ही पड़ा। वैद्य जी ने पहले उसके माथे को छुआ और फिर उसकी नाड़ी देखने लगे।

"घबराने की कोई बात नहीं है।" कुछ पलों बाद वैद्य जी ने अनुराधा की नाड़ी को छोड़ कर कहा____"बस हल्का सा ताप है इसे जोकि भींगने की वजह से ही है। हम दवा दे देते हैं जल्दी ही आराम मिल जाएगा।"

वैद्य जी ने अपने थैले से दवा निकाल कर उसे एक पुड़िया बना कर सरोज को पकड़ा दिया।

"वैद्य जी बारिश का मौसम शुरू हो गया है तो सर्दी जुखाम और बुखार की दवा थोड़ी ज़्यादा मात्रा में दे दीजिए।" भुवन ने कहा____"आपको भी बार बार यहां आने की तकलीफ़ नहीं उठानी पड़ेगी।"

वैद्य जी ने अपने थैले से एक एक कर के दवा निकाल कर तथा उनकी पुड़िया बना कर सरोज को पकड़ा दिया। ये भी बता दिया कि कौन सी पुड़िया में किस मर्ज़ की दवा है। भुवन ने सरोज से सभी का हाल चाल पूछा और फिर वो वैद्य को ले कर चला गया।

"अब तुझे क्या हुआ?" अनुराधा को अजीब भाव से कहीं खोए हुए देख सरोज ने पूछा____"और तेरे पांव में तो मोच आई थी ना तो तू यहां क्यों खड़ी है? जा जा के आराम कर।"

अनुराधा तो मोच के बारे में भूल ही गई थी। मां के मुख से मोच का सुन कर वो एकदम से घबरा गई। उसने जल्दी से हां में सिर हिलाया और फिर लंगड़ाने का नाटक करते हुए अपने कमरे की तरफ बढ़ चली।

"अच्छा ये तो बता कि आज कल तू किसी की बात क्यों नहीं मानती है?" अनुराधा को जाता देख सरोज ने पीछे से कहा____"भुवन तुझे अपनी छोटी बहन मानता है और तेरे लिए इतनी फ़िक्र करता है फिर भी तूने उसकी बात नहीं मानी और बारिश में भींगते हुए यहां चली आई। वहां उसके पास वैभव भी था, तेरी ये हरकत देख कर क्या सोचा होगा उसने कि कैसी बेसहूर लड़की है तू।"

अनुराधा अपनी मां की बात सुन कर ठिठक गई किंतु उसने कोई जवाब नहीं दिया। असल में वो कोई जवाब देने की हालत में ही नहीं थी। उसे तो अब जी भर के रोना आ रहा था। वैभव की बातें अभी भी उसके कानों में गूंज रहीं थी।

"वैसे काफी समय से वैभव हमारे घर नहीं आया।" सरोज ने जैसे खुद से ही कहा____"पहले तो दो तीन दिन में आ जाता था हमारा हाल चाल पूछने के लिए। माना कि उसके परिवार में बहुत दुखद घटना घट गई थी लेकिन फिर भी वो यहां ज़रूर आता। भुवन ने बताया कि वो उसके पास ही उसके नए बन रहे मकान में था। फिर वो यहां क्यों नहीं आया?"

सरोज की ये बातें अनुराधा के कानों में भी पहुंच रहीं थी। जो सवाल उसकी मां के मुख से निकले थे उनके जवाब भले ही सरोज के पास न थे किंतु अनुराधा के पास तो यकीनन थे। उसे तो पता ही था कि वैभव उसके घर क्यों नहीं आता है। एकाएक ही ये सब सोच कर उसके अंदर हूक सी उठी। इससे पहले कि उसे खुद को सम्हाल पाना मुश्किल हो जाता वो जल्दी से अपने कमरे में दाखिल हो गई। दरवाज़ा बंद कर के वो तेज़ी से चारपाई पर आ कर औंधे मुंह गिर पड़ी और तकिए में मुंह छुपा कर फूट फूट कर रोने लगी।

"तुम्हारी आंखों में आसूं अच्छे नहीं लगते।" अचानक ही उसके कानों में वैभव द्वारा कही गई बातें गूंज उठी____"इन आंसुओं को तो मेरा मुकद्दर बनना चाहिए। यकीन मानो ऐसे मुकद्दर से कोई शिकवा नहीं होगा मुझे।"

"न...नहीं....रुक जाइए। भगवान के लिए रुक जाइए।"
"किस लिए?"
"म...मुझे आपसे ढेर सारी बातें करनी हैं और...और मुझे आपसे कुछ सुनना भी है।"

"मतलब?? मुझसे भला क्या सुनना है तुम्हें?"
"ठ...ठकुराइन।" उसने नज़रें झुका कर भारी झिझक के साथ कहा था____"हां मुझे आपसे यही सुनना है। एक बार बोल दीजिए न।"

"क्यों?"
"ब...बस सुनना है मुझे।"

"पर मैं ऐसा कुछ भी नहीं बोल सकता।" उसके कानों में वैभव की आवाज़ गूंज उठी____"अब दिल में चाहत जैसी चीज़ को फिर से नहीं पालना चाहता। तुम्हारी यादें बहुत हैं मेरे लिए।"

अनुराधा बुरी तरह तड़प कर पलटी और सीधा लेट गई। उसका चेहरा आंसुओं से तर था। उसके आंसू रुकने का नाम ही नहीं ले रहे थे। सीधा लेट जाने की वजह से उसके आंसू उसकी आंखों के किनारे से बह कर जल्दी ही उसके कानों तक पहुंच गए।

"ऐसा क्यों कर रहे हैं आप मेरे साथ?" फिर वो दुखी भाव से रोते हुए धीमी आवाज़ में बोल पड़ी____"मेरी ग़लती की और कितनी सज़ा देंगे मुझे? क्यों मुझे आपकी इतनी याद आती है? क्यों आपकी बातें मेरे कानों में गूंज उठती हैं और फिर मुझे बहुत ज़्यादा दुख होता है? भगवान के लिए एक बार माफ़ कर दीजिए मुझे। पहले की तरह फिर से मुझे ठकुराईन कहिए न।"

अनुराधा इतना सब कहने के बाद फिर से पलट गई और तकिए में चेहरा छुपा कर सिसकने लगी। उसे ये तो एहसास हो चुका था कि उसकी उस दिन की बातों का वैभव को बुरा लग गया था किंतु उसे इस बात का ज्ञान नहीं हो रहा था कि उसको वैभव की इतनी याद क्यों आ रही थी और इतना ही नहीं वो उसको देखने के लिए क्यों इतना तड़पती थी? आखिर इसका क्या मतलब था? भोली भाली, मासूम और नादान अनुराधा को पता ही नहीं था कि इसी को प्रेम कहते हैं।

✮✮✮✮

शाम का धुंधलका छा गया था। चंद्रकांत की बहू रजनी दिशा मैदान करने के लिए अकेली ही घर से निकल कर खेतों की तरफ जा रही थी। उसकी सास की तबीयत ख़राब थी इस लिए उसे अकेले ही जाना पड़ गया था। उसकी ननद कोमल रात के लिए खाना बनाने की तैयारी कर रही थी। रघुवीर कहीं गया हुआ था इस लिए उसे अकेले घर से निकलने में समस्या नहीं हुई थी। हालाकि उसका ससुर चंद्रकांत बाहर बैठक में ज़रूर बैठा था मगर उसने उसे अकेले जाने से रोका नहीं था। ऐसा शायद इस लिए क्योंकि अब उसे ये यकीन हो गया था कि उसकी बहू कोई ग़लत काम नहीं करेगी।

रजनी हल्के अंधेरे में धीरे धीरे क़दम बढ़ाते हुए जा रही थी। बारिश की वजह से हर जगह कीचड़ और पानी भर गया था इस लिए उसे बड़े ही एहतियात से चलना पड़ रहा था। जब उसने देखा कि इस तरफ कोई नहीं आएगा और ये ठीक जगह है तो उसने ज़मीन पर लोटा रखने के बाद अपनी साड़ी को ऊपर कमर तक उठा लिया और फिर हगने के लिए बैठ गई।

कुछ समय बाद जब वो वापस आने लगी तो सहसा रास्ते में उसे एक जगह अंधेरे में एक साया नज़र आया। साए को देख उसके अंदर भय व्याप्त हो गया और उसकी धड़कनें तेज़ हो गईं। अब क्योंकि रास्ता सिर्फ वही था इस लिए उसे उसी रास्ते से जाना था। इस लिए वो ये सोच कर डरते डरते आगे बढ़ी कि शायद कोई आदमी होगा जो उसकी ही तरह दिशा मैदान के लिए आया होगा। जल्दी ही वो उस साए के पास पहुंच गई और तब उसे उस साए की आकृति स्पष्ट रूप से नज़र आई। उसे पहचानते ही रजनी पहले तो चौंकी फिर एकदम से उसके अंदर थोड़ी घबराहट पैदा हो गई।

"बड़ी देर लगा दी तूने आने में।" साए के रूप में नज़र आने वाला व्यक्ति जोकि रूपचंद्र था वो उसे देख बोल पड़ा____"मैं काफी देर से तेरे लौटने का इंतज़ार कर रहा था।"

"क...क्यों इंतज़ार कर रहे थे भला?" रजनी ने खुद की घबराहट पर काबू पाते हुए कहा____"देखो अगर तुम किसी ग़लत इरादे से मेरा इंतज़ार कर रहे थे तो समझ लो अब ऐसा कुछ नहीं हो सकता।"

"क्यों भला?" रूपचंद्र धीमें से बोला____"देख ज़्यादा नाटक मत कर। तेरे साथ मज़ा किए हुए काफी समय हो गया है। इस लिए आज मुझे मना मत करना वरना तेरे लिए ठीक नहीं होगा।"

"रस्सी जल गई मगर बल नहीं गया।" रजनी ने थोड़ा सख़्त भाव अख़्तियार करते हुए कहा____"तुम लोगों का दादा ठाकुर ने समूल नाश कर दिया फिर भी इतना अकड़ रहे हो? और हां, अगर इतनी ही तुम्हारे अंदर आग लगी हुई है ना तो जा कर अपनी बहन के साथ बुझा लो।"

"मादरचोद तेरी हिम्मत कैसे हुई ऐसा बोलने की?" रूपचंद्र बुरी तरह तिलमिला कर गुस्से से बोल पड़ा____"रुक अभी बताता हूं तुझे।"

"ख़बरदार।" रजनी ने एकदम से गुर्राते हुए कहा____"अगर तुमने मुझे हाथ भी लगाया तो तुम्हारे लिए ठीक नहीं होगा। अभी तक तो मैंने किसी को तुम्हारे बारे में बताया नहीं था लेकिन अगर तुमने मुझे हाथ लगाया तो चीख चीख कर सारे गांव को बताऊंगी कि तुमने ज़बरदस्ती मेरी इज्ज़त लूटने की कोशिश की है। मुझे अपनी इज्ज़त की कोई परवाह नहीं है लेकिन तुम अपने बारे में सोचो। पंचायत के फ़ैसले के बाद जब लोग तुम्हारे इस कांड के बारे में जानेंगे तो क्या होगा तुम्हारे साथ?"

रजनी की बातें सुन कर रूपचंद्र का गुस्सा पलक झपकते ही ठंडा पड़ गया। उसे बिल्कुल भी अंदाज़ा नहीं था कि रजनी उसे इस तरह की धमकी दे सकती है। आंखें फाड़े वो देखता रह गया था उसे।

"जिसने तुम्हारी बहन के साथ मज़ा किया उसका तो तुम कुछ भी नहीं बिगाड़ पाए।" रजनी ने जैसे उसके ज़ख़्मों को कुरेदा____"और बेशर्मों की तरह यहां मुझे अपनी मर्दानगी दिखाने आए हो? मैंने पहले भी कहा था कि तुम उसके सामने कुछ भी नहीं हो और अब भी कहती हूं कि तुम आगे भी कभी उसके सामने कुछ नहीं रहोगे। असली मर्द तो वही है। एक बात कहूं, भले ही इतना सब कुछ हो गया है मगर सीना ठोक के कहती हूं कि अगर वो तुम्हारी जगह होता तो इसी वक्त उसके सामने अपनी टांगें फैला कर लेट जाती।"

"साली रण्डी।" रूपचंद्र गुस्से से तिलमिलाते हुए बोला और फिर पैर पटकते हुए वहां से जा कर जल्दी ही अंधेरे में गुम हो गया।

उसे यूं चला गया देख रजनी के होठों पर गहरी मुस्कान उभर आई। उसने आंखें बंद कर के वैभव की मोहिनी सूरत का दीदार किया और फिर ठंडी आहें भरते हुए अपने घर की तरफ बढ़ चली।
 
अध्याय - 82
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"साली रण्डी।" रूपचंद्र गुस्से से तिलमिलाते हुए बोला और फिर पैर पटकते हुए वहां से जा कर जल्दी ही अंधेरे में गुम हो गया।

उसे यूं चला गया देख रजनी के होठों पर गहरी मुस्कान उभर आई। उसने आंखें बंद कर के वैभव की मोहिनी सूरत का दीदार किया और फिर ठंडी आहें भरते हुए अपने घर की तरफ बढ़ चली।


अब आगे....


रात में जब सब खा पी कर सोने चले गए तो सुगंधा देवी भी अपने कमरे में आ गईं। पूरी हवेली में सन्नाटा सा छाया हुआ था। कमरे में जैसे ही वो आईं तो उनकी नज़र पलंग पर अधलेटी अवस्था में लेटे दादा ठाकुर पर पड़ी। वो किसी गहरी सोच में डूबे नज़र आए उन्हें।

"किस सोच में डूबे हुए हैं आप?" सुगंधा देवी ने दरवाज़ा बंद करने के बाद उनकी तरफ पलट कर पूछा____"क्या भाई और बेटे को याद कर रहे हैं? वैसे तो दिन भर आप हम सबको समझाते रहते हैं और खुद अकेले में उन्हें याद कर के खुद को दुखी करते रहते हैं।"

"हमें अब भी यकीन नहीं हो रहा कि हमारे जिगर के टुकड़े हमें यूं अकेला छोड़ कर चले गए हैं।" दादा ठाकुर ने गहन गंभीरता से कहा____"आख़िर क्यों उन निर्दोषों को इस तरह से मार दिया गया? किसी का क्या बिगाड़ा था उन्होंने?"

"आप ही कहा करते हैं न कि औलाद के कर्मों का फल अक्सर माता पिता को भोगना पड़ता है।" सुगंधा देवी ने कहा____"तो समझ लीजिए कि इसी तरह माता पिता के कर्मों का फल औलाद को भी भोगना पड़ता है। आपके पिता जी ने जो कुकर्म किए थे उनकी सज़ा आपके छोटे भाई और हमारे बेटे ने अपनी जान गंवा कर पाई है।"

"उन दोनों के इस तरह गुज़र जाने से अब कुछ भी अच्छा नहीं लगता सुगंधा।" दादा ठाकुर ने भावुक हो कर कहा____"हम दिन भर खुद को किसी तरह बहलाने की कोशिश करते हैं मगर सच तो ये है कि एक पल के लिए भी हमारे ज़हन से उनका ख़याल नहीं जाता।"

"सबका यही हाल है ठाकुर साहब।" सुगंधा देवी ने संजीदगी से कहा____"हमारे भी कलेजे में हर पल बर्छियाँ चुभती रहती हैं। जब भी रागिनी बहू को देखते हैं तो यकीन मानिए हमारा कलेजा फट जाता है। हम ये सोच कर खुद को तसल्ली दे देते हैं कि हमारे पास अभी आप हैं और हमारा बेटा है लेकिन उसका क्या? उस बेचारी का तो संसार ही उजड़ गया है। एक औरत के लिए उसका पति ही सब कुछ होता है और जब वही न रहे तो सोचिए उस औरत पर क्या गुज़रेगी? उसको कोई औलाद होती तो जीने के लिए एक सहारा और बहाना भी होता मगर उस अभागन को तो ऊपर वाले ने हर तरह से बेसहारा और लाचार बना दिया है।"

"सही कह रही हैं आप।" दादा ठाकुर ने गहरी सांस लेते हुए कहा____"सच में उसके साथ बहुत ही ज़्यादा अन्याय किया है ईश्वर ने। हमें तो ये सोच कर बड़ा आश्चर्य होता है कि हमारी रागिनी बहू जो इतनी सभ्य सुशील संस्कारी और हमेशा ईश्वर में आस्था रखने वाली है उसके साथ ऊपर वाले ने ऐसा कैसे कर दिया?"

"ऊपर वाला ही जाने कि वो इतना निर्दई क्यों हो गया?" सुगंधा देवी ने कहा____"भरी जवानी में उसका सब कुछ नष्ट कर के जाने क्या मिल गया होगा उस विधाता को।"

"कुछ दिनों से एक ख़याल हमारे मन में आ रहा है।" दादा ठाकुर ने सोचने वाले अंदाज़ से कहा____"हमने उस ख़्याल के बारे में बहुत सोचा है। हम चाहते हैं कि आप भी सुनें और फिर उस पर विचार करें।"

"किस बात पर?" सुगंधा देवी ने पूछा।

"यही कि क्या हमारी बहू का सारा जीवन यूं ही दुख और संताप को सहते हुए गुज़रेगा?" दादा ठाकुर ने कहा____"क्या हमें उसके बारे में कुछ भी नहीं सोचना चाहिए? आख़िर हर किसी की तरह उसे भी तो खुश रहने का अधिकार है।"

"आप कहना क्या चाहते हैं?" सुगंधा देवी के माथे पर सहसा शिकन उभर आई____"विधाता ने उसे जिस हाल में डाल दिया है उससे भला वो कैसे कभी खुश रह सकेगी?"

"इंसान खुश तो तभी होता है न, जब उसके लिए कोई खुशी वाली बात होती है अथवा खुश रहने का उसके पास कोई जरिया होता है।" दादा ठाकुर ने कहा____"अगर हमारी बहू के पास भी खुश रहने का कोई जरिया हो जाए तो क्या वो खुश नहीं रहेगी?"

"हां मगर।" सुगंधा देवी ने दुविधा पूर्ण भाव से दादा ठाकुर की तरफ देखा____"ऐसा कैसे हो सकता है भला?"

"होने को तो कुछ भी हो सकता है सुगंधा।" दादा ठाकुर ने कहा____"पर तभी जब हम लोग ऐसा चाहें। बात दरअसल ये है कि कुछ दिनों से हमारे मन में ये ख़याल आता है कि अगर हमारी बहू फिर से सुहागन बन जाए तो यकीनन उसका जीवन संवर भी जाएगा और वो खुश भी रहने लगेगी।"

"य...ये क्या कह रहे हैं आप?" सुगंधा देवी ने आश्चर्य से दादा ठाकुर को देखा____"ऐसा भला कैसे हो सकता है?"

"क्यों नहीं हो सकता सुगंधा?" दादा ठाकुर ने ज़ोर दे कर कहा____"आख़िर अभी उसकी उमर ही क्या है? अगर हम सच में चाहते हैं कि वो हमेशा खुश रहे तो हमें उसके लिए ऐसा सोचना ही होगा। हम ये हर्गिज़ नहीं चाहते कि हमारी इतनी सभ्य सुशील संस्कारी और ईश्वर में आस्था रखने वाली बहू का जीवन हमेशा हमेशा के लिए बर्बाद और तकलीफ़ों से भरा हुआ बन जाए।"

"मतलब आप उसका फिर से ब्याह कर देना चाहते हैं?" सुगंधा देवी ने कहा।

"बिल्कुल।" दादा ठाकुर ने कहा____"आप खुद सोचिए कि इतना बड़ा जीवन वो अकेले कैसे बिताएगी? जीवन भर उसे ये दुख सताता रहेगा कि ऊपर वाले ने उसके साथ ऐसा अन्याय क्यों किया? हर किसी की तरह उसे भी खुश क्यों नहीं रहने दिया? यही सब बातें सोच कर हमने ये फ़ैसला लिया है कि हम अपनी बहू का जीवन बर्बाद नहीं होने देंगे और ना ही उसे जीवन भर असहनीय पीड़ा में घुटने देंगे।"

"हमें बहुत अच्छा लगा कि आप अपनी बहू के लिए इतना कुछ सोच बैठे हैं।" सुगंधा देवी ने गहरी सांस ले कर कहा____"सच कहें तो हम भी यही चाहते हैं कि हमारी बहू हमेशा खुश रहे मगर....!"

"मगर??"
"मगर आप भी जानते हैं कि कहने में और करने में बहुत फ़र्क होता है।" सुगंधा देवी ने गंभीरता से कहा____"अपनी बहू के लिए हम यकीनन अच्छा ही सोच रहे हैं और ऐसा करना भी चाहते हैं लेकिन क्या ऐसा होना इतना आसान होगा? हमारा मतलब है कि क्या आपके समधी साहब ऐसा करना चाहेंगे और क्या खुद हमारी बहू ऐसा करना चाहेगी?"

"हमें पता है कि थोड़ी मुश्किल ज़रूर हैं।" दादा ठाकुर ने कहा____"लेकिन हमें ये भी यकीन है कि हमारी बहू हमारे अनुरोध को नहीं टालेगी। हम उसे समझाएंगे कि बेटा जीवन कभी भी दूसरों के भरोसे अथवा दूसरों के सहारे नहीं चलता बल्कि अपने किसी ख़ास के ही सहारे बेहतर तरीके से गुज़रता है। हमें यकीन है कि अंततः उसे हमारी बात समझ में आ ही जाएगी और वो हमारी बात भी मान लेगी। रहा सवाल समधी साहब का तो हम उनसे भी इस बारे में बात कर लेंगे।"

"क्या आपको लगता है कि वो इसके लिए राज़ी हो जाएंगे?" सुगंधा देवी ने संदेह की दृष्टि से उन्हें देखा।

"क्यों नहीं होंगे भला?" दादा ठाकुर ने दृढ़ता से कहा____"अगर वो अपनी बेटी को हमेशा खुश देखने की हसरत रखते हैं तो यकीनन वो इसके लिए राज़ी होंगे।"

"चलिए मान लेते हैं कि समधी साहब इसके लिए राज़ी हो जाते हैं।" सुगंधा देवी ने कहा____"फिर आगे क्या करेंगे आप? हमारा मतलब है कि क्या आपने हमारी बहू के लिए कोई लड़का देखा है?"

"लड़का भी देख लेंगे कहीं।" दादा ठाकुर ने कहा____"लेकिन उससे पहले ज़रूरी ये है कि हम इस बारे में सबसे पहले समधी साहब से चर्चा करें। उनका राज़ी होना अति आवश्यक है।"

"तो समधी साहब से इस बारे में कब चर्चा करेंगे आप?" सुगंधा देवी ने उत्सुकतावश पूछा।

"अभी तो ये संभव ही नहीं है और ना ही इस समय ऐसी बातें करना उचित होगा।" दादा ठाकुर ने गहरी सांस ली____"क्योंकि हमने अपने जिगर के टुकड़ों को खोया है। ऐसे वक्त में हम खुद नहीं चाहते कि हम किसी और से इस बारे में कोई चर्चा करें। थोड़ा समय गुज़र जाने दीजिए, उसके बाद ही ये सब बातें हो सकती हैं।"

उसके बाद किसी ने कुछ नहीं कहा। सुगंधा देवी भी पलंग पर दादा ठाकुर के बगल से लेट गईं। दोनों के ही मन मस्तिष्क में इस संबंध में तरह तरह की बातें चल रहीं थी किंतु दोनों ने ही सोने का प्रयास करने के लिए अपनी अपनी आंखें बंद कर लीं।

✮✮✮✮

अपने कमरे में पलंग पर लेटा मैं गहरे ख़यालों में गुम था। एक तरफ चाचा और भैया के ख़याल तो दूसरी तरफ मेनका चाची और भाभी के ख़याल। वहीं एक तरफ अनुराधा का ख़याल तो दूसरी तरफ सफ़ेदपोश जैसे रहस्यमय शख़्स का ख़याल। आंखों में नींद का नामो निशान नहीं था। बस तरह तरह की बातें ज़हन में गूंज रहीं थी। पूरी हवेली में सन्नाटा छाया हुआ था। कमरे में बिजली का बल्ब अपनी मध्यम सी रोशनी करते हुए जैसे कलप रहा था।

जब किसी तरह से भी ज़हन से इतने सारे ख़याल न हटे तो मैं उठ बैठा। खिड़की की तरफ देखा तो बाहर गहन अंधेरा था। शायद आसमान में काले बादल छाए हुए थे। खिड़की से ठंडी ठंडी हवा आ रही थी। ज़ाहिर है देर सवेर रात में बारिश होना तय था।

पलंग से उतर कर मैं दरवाज़े के पास पहुंचा और फिर दरवाज़ा खोल कर बाहर आ गया। आज बिजली गुल नहीं थी इस लिए हवेली में हर तरफ हल्की रोशनी फैली हुई थी। एकाएक मुझे फिर से भाभी का ख़याल आया तो मैं उनके कमरे की तरफ बढ़ चला। रात के इस वक्त मुझे उनके कमरे में जाना तो नहीं चाहिए था किंतु मैं जानता था कि उनकी आंखों में भी नींद का नामो निशान नहीं होगा और वो तरह तरह की बातें सोचते हुए खुद को दुखी किए होंगी।

जल्दी ही मैं उनके कमरे के दरवाज़े के पास पहुंच गया। धड़कते दिल से मैंने उनके दरवाज़े पर दाएं हाथ से दस्तक दी तो कुछ ही पलों में दरवाज़ा खुल गया। मेरे सामने भाभी खड़ी थीं। कमरे में बल्ब का मध्यम प्रकाश था इस लिए मैंने देखा उनकी आंखों में आसूं थे। चेहरे पर दुख और उदासी छाई हुई थी। हालाकि मुझे देखते ही उन्होंने जल्दी से खुद को सम्हालते का प्रयास किया किंतु तब तक तो मुझे उनकी हालत का पता चल ही गया था।

"वैभव तुम? इस वक्त यहां?" फिर उन्होंने हैरानी ज़ाहिर करते हुए पूछा____"कुछ काम था क्या?"

"जी नहीं काम तो कोई नहीं था भाभी।" मैंने कहा____"नींद नहीं आ रही थी इस लिए यहां चला आया। मुझे पता था कि आप भी जाग रही होंगी। वैसे आपको मेरे यहां आने से कोई समस्या तो नहीं हुई है ना?"

"न..नहीं तो।" भाभी ने दरवाज़े से हटते हुए कहा____"अंदर आ जाओ। वैसे मैं भी ये सोच रही थी कि नींद नहीं आ रही है तो कुछ देर के लिए तुम्हारे पास चली जाऊं। फिर सोचा इस वक्त तुम्हें तकलीफ़ देना उचित नहीं होगा।"

"आप बेकार में ही ऐसा सोच रहीं थी।" मैंने कमरे के अंदर दाखिल हो कर कहा___"आप अच्छी तरह जानती हैं कि आपकी वजह से मुझे कभी कोई तकलीफ़ नहीं हो सकती। आप कभी भी मेरे कमरे में आ सकती हैं।"

"बैठो।" भाभी ने अपने पलंग के पास ही मेरे लिए एक कुर्सी रखते हुए कहा और फिर वो पलंग पर बैठ गईं। इधर मैं भी उनकी रखी कुर्सी पर बैठ गया।

"सुबह मां से कहूंगा कि जब तक कुसुम नहीं आती तब तक वो खुद ही रात में यहां आ कर आपके साथ सो जाया करें।" मैंने उनकी तरफ देखते हुए कहा____"इतनी बड़ी हवेली में अकेले एक कमरे में सोने से आपको डर भी लगता होगा।"

"मां जी को परेशान मत करना।" भाभी ने कहा____"तुम्हें तो पता ही है कि उन्हें सीढियां चढ़ने में परेशानी होती है। वैसे भी मैं इतनी कमज़ोर नहीं हूं जो अकेले रहने पर डरूंगी। ठाकुर खानदान की बेटी और बहू हूं, इतना कमज़ोर जिगरा नहीं है मेरा।"

"अरे! मैं तो चाहता हूं कि मेरी भाभी का जिगरा शेरनी जैसा हो जाए।" मैंने बड़े स्नेह से उनकी तरफ देखते हुए कहा____"और दुनिया का कोई भी दुख उन्हें तकलीफ़ न दे सके।"

"जब तक इंसान दुख और तकलीफ़ों से नहीं गुज़रता तब तक वो कठोर नहीं बन सकता और ना ही उसमें किसी चीज़ को सहने की क्षमता हो सकती है।" भाभी ने कहा____"मुझे ईश्वर ने बिना मांगे ही ऐसी सौगात दे दी है तो यकीनन धीरे धीरे मैं कठोर भी बन जाऊंगी और हर चीज़ को सहने की क्षमता भी पैदा हो जाएगी मुझमें।"

"आपसे एक गुज़ारिश है।" मैंने कुछ सोचते हुए भाभी से कहा____"क्या आप मानेंगी?"
"क्या गुज़ारिश है?" भाभी ने पूछा____"अगर मेरे बस में होगा तो ज़रूर मानूंगी।"

"बिल्कुल आपके बस में है भाभी।" मैंने कहा____"बात दरअसल ये है कि कुछ ही समय में मैं खेती बाड़ी का सारा काम देखने लगूंगा। संभव है कि तब मेरा ज़्यादातर वक्त मजदूरों के साथ खेतों पर ही गुज़रे। मेरी आपसे गुज़ारिश ये है कि क्या आप कभी कभी मेरे साथ खेतों में चलेंगी? इससे आपका समय भी कट जाया करेगा और आपका मन भी बहलेगा।"

"मेरा समय कटे या ना कटे और मेरा मन बहले या न बहले किंतु तुम्हारे कहने पर मैं ज़रूर तुम्हारे साथ खेतों पर चला करूंगी।" भाभी ने कहा____"मैं भी देखूंगी कि मेरा प्यारा देवर खुद को बदल कर किस तरह से वो सारे काम करता है जिसे उसने सपने में भी कभी नहीं किया होगा।"

"बिल्कुल भाभी।" मैंने दृढ़ता से कहा____"मैं आपको सारे काम कर के दिखाऊंगा। वैसे भी आप साथ रहेंगी तो मुझे एक अलग ही ऊर्जा मिलेगी और साथ ही मेरा मनोबल भी बढ़ेगा।"

"भला ये क्या बात हुई?" भाभी ने ना समझने वाले अंदाज़ से मेरी तरफ देखा____"मेरे साथ रहने से भला तुम्हें कैसे ऊर्जा मिलेगी और किस तरह से तुम्हारा मनोबल बढ़ेगा?"

"आप ही तो बार बार मुझे एक अच्छा इंसान बनने को कहती हैं।" मैंने जैसे उन्हें समझाते हुए कहा____"अब जब आप मेरे साथ अथवा मेरे सामने रहेंगी तो मैं बस इसी सोच के साथ हर काम करूंगा कि मुझे आपकी नज़रों में अच्छा बनना है और आपकी उम्मीदों पर खरा भी उतरना है। अगर इस बीच मैं कहीं भटक जाऊं तो आप मुझे फ़ौरन ही सही रास्ते पर ले आना। ऐसे में निश्चित ही मैं जल्द से जल्द आपको सब कुछ बेहतर तरीके से कर के दिखा सकूंगा।"

"हम्म्म्म बात तो एकदम ठीक है तुम्हारी।" भाभी ने सिर हिलाते हुए कहा___"तो फिर ठीक है। मैं ज़रूर तुम्हारे साथ कभी कभी खेतों पर चला करूंगी।"

"मेरी सबसे अच्छी भाभी।" मैंने कुर्सी से उठ कर खुशी से कहा____"मुझे यकीन है कि जब आप इस हवेली से बाहर निकल कर खेतों पर जाया करेंगी तो यकीनन आपको थोड़ा ही सही लेकिन सुकून ज़रूर मिलेगा। अच्छा अब मैं चलता हूं। आप भी अब कुछ मत सोचिएगा, बल्कि चुपचाप सो जाइएगा।"

मेरी बात सुन कर भाभी के होठों पर बहुत ही बारीक मुस्कान उभरी और फिर वो उठ कर मेरे पीछे दरवाज़े तक आईं। मैं जब बाहर निकल गया तो उन्होंने दरवाज़ा बंद कर लिया। भाभी के होठों पर बारीक सी मुस्कान आई देख मुझे बेहद खुशी महसूस हो रही थी। मैंने मन ही मन सोचा_____'फ़िक्र मत कीजिए भाभी जल्द ही आपको अपने हर दुखों से छुटकारा मिल जाएगा।'

✮✮✮✮

अगली दोपहर भुवन हवेली आया और मुझसे मिला। बैठक में पिता जी भी थे। उनके सामने ही उसने मुझे एक कागज़ पकड़ाया जिसमें मेरे नए बन रहे मकान में काम करने वाले मजदूरों का हिसाब किताब था। मैंने बड़े ध्यान से हिसाब किताब देखा और फिर कागज़ को पिता जी की तरफ बढ़ा दिया।

"हम्म्म्म काफी अच्छा हिसाब किताब तैयार किया है तुमने।" पिता जी ने भुवन की तरफ देखते हुए कहा____"किंतु हम चाहते हैं कि उन सभी मजदूरों को उनकी मेहनत के रूप में इस हिसाब से भी ज़्यादा फल मिले।"

कहने के साथ ही पिता जी ने अपने कुर्ते की जेब से रुपयों की एक गड्डी निकाली और फिर उसे मेरी तरफ बढ़ाते हुए कहा____"हम चाहते हैं कि तुम्हारे हर काम से लोग खुश और संतुष्ट हों इस लिए चार पैसा बढ़ा कर ही सबको उनका मेहनताना देना।"

"जी पिता जी, ऐसा ही करूंगा मैं।" मैंने उनके हाथ से रुपए की गड्डी ले कर कहा____"एक और बात, बारिश का मौसम शुरू हो गया है तो जल्दी ही इस रबी की फसल के लिए खेतों की जुताई का काम शुरू करवा देता हूं।"

"हम्म्म्म बहुत बढ़िया।" पिता जी ने कहा____"हम उम्मीद करते हैं कि ये सारे काम तुम अच्छे से सम्हाल लोगे।"

पिता जी को सिर नवा कर और उनसे मजदूरों के हिसाब किताब वाला कागज़ ले कर मैं और भुवन बैठक से बाहर आ गए। कुछ ही देर में हम दोनों अपनी अपनी मोटर साईकिल में बैठ कर निकल लिए।

दोपहर का समय था किंतु धूप नहीं थी। आसमान में काले बादल छाए हुए थे। रात में भी बारिश हुई थी इस लिए रास्ते में फिर से कीचड़ हो गया था। कुछ ही देर में हम साहूकारों के घरों के सामने पहुंच गए। मैंने एक नज़र उनके घर की तरफ डाली किंतु कोई नज़र ना आया। साहूकारों के बाद मुंशी चंद्रकांत का घर पड़ता था। जब मैं उसके घर के सामने पहुंचा तो देखा रघुवीर अपनी बीवी रजनी के साथ एक भैंस को भूसा डाल रहा था। रजनी के हाथ में एक बाल्टी थी।

मोटर साइकिल की आवाज़ से उन दोनों का ध्यान हमारी तरफ आकर्षित हुआ। मुझे मोटर साइकिल में जाता देख जहां रघुवीर मुझे अजीब भाव से देखने लगा था वहीं उसकी बीवी रजनी मुझे देख कर हल्के से मुस्कुराई थी। रघुवीर उसके पीछे था इस लिए वो ये नहीं देख सका था कि उसकी बीवी मुझे देख कर मुस्कुराई थी। उस रांड को मुस्कुराता देख एकाएक ही मेरे मन में उसके लिए नफ़रत के भाव जाग उठे थे। मैं उससे नज़र हटा कर आगे बढ़ गया। कुछ ही देर में मैं और भुवन नए बन रहे मकान में पहुंच गए।

मेरे कहने पर भुवन ने सभी मजदूरों को बुलाया। थोड़ी औपचारिक बातों के बाद मैंने सभी को एक एक कर के हिसाब किताब बता कर उनका मेहनताना दे दिया। पिता जी के कहे अनुसार मैंने सबको चार पैसा बढ़ा कर ही दिया था जिससे सभी लोग काफी खुश हो गए थे। कुछ तो मेरे गांव के ही मजदूर थे किंतु कुछ मुरारी काका के गांव के थे। मकान अब पूरी तरह से बन कर तैयार हो चुका था। दीवारों पर रंग भी चढ़ गया था तो अब वो बड़ा ही आकर्षक नज़र आ रहा था। मुझे थोड़ी मायूसी सी हुई किंतु अब क्या हो सकता था? जो सोचा था वो हुआ ही नहीं था बल्कि कुछ और ही हो गया था। ख़ैर मैंने सभी मजदूरों को ये कह कर विदा किया कि अगर वो लोग इसी तरह से मेहनताना पाना चाहते हैं तो वो हमारे खेतों पर काम कर सकते हैं। मेरी बात सुन कर सब खुशी से तैयार हो गए।

मजदूरों के जाने के बाद मैं और भुवन आपस में ही खेतों पर फसल उगाने के बारे में चर्चा करने लगे। काफी देर तक हम दोनों इस बारे में कई तरह के विचार विमर्श करते रहे। तभी सहसा मेरी नज़र थोड़ी दूरी पर नज़र आ रही सरोज काकी पर पड़ी। उसके साथ उसकी बेटी अनुराधा और बेटा अनूप भी था। अनुराधा को देखते ही मुझे पिछले दिन की घटना याद आ गई और मेरे अंदर हलचल सी होने लगी।

"काकी आप यहां?" सरोज जब हमारे पास ही आ गई तो मैंने उसे देखते हुए कहा____"सब ठीक तो है न?"

"तुम्हारी दया से सब ठीक ही है बेटा।" सरोज काकी ने कहा____"अनू के बापू जब से गुज़रे हैं तब से तुमने हम पर कोई संकट आने ही कहां दिया है?"

मैंने उसकी इस बात का जवाब देने की जगह उसे बरामदे में ही बैठ जाने को कहा तो वो अंदर आ कर बैठ गई। उसके पीछे अनुराधा और अनूप भी आ कर बैठ गया। अनुराधा बार बार मुझे ही देखने लगती थी। उसके चेहरे पर ज़माने भर की मासूमियत थी किंतु इस वक्त वो बेहद उदास नज़र आ रही थी। इधर उसकी मौजूदगी से मैं भी थोड़ा असहज हो गया था। ये अलग बात है कि उसे देखते ही दिल को सुकून सा मिल रहा था।

"काकी सब ठीक तो है न?" भुवन ने सरोज की तरफ देखते हुए पूछा____"और अनुराधा की अब तबीयत कैसी है?"
"अब बेहतर है बेटा।" सरोज काकी ने कहा____"वैद्य जी जो दवा दे गए थे उसे इसने खाया था तो अब ठीक है ये।"

"अच्छा काकी जगन काका के बीवी बच्चे कैसे हैं?" मैंने एक नज़र अनुराधा की तरफ देखने के बाद काकी से पूछा____"क्या वो लोग आते जाते हैं आपके यहां?"

"उसकी बीवी पहले नहीं आती थी।" सरोज काकी ने गहरी सांस लेते हुए कहा____"लेकिन तीन दिन पहले वो अपनी एक बेटी के साथ आई थी। जगन ने जो किया था उसकी माफ़ी मांग रही थी मुझसे। मैं जानती थी कि इस सबमें उसका या उसके बच्चों का कोई दोष नहीं था। अपने भाई की जान का दुश्मन तो उसका पति ही बन गया था इस लिए अब जब वो भी नहीं रहा तो उस बेचारी से क्या नाराज़गी रखना? बेचारी बहुत रो रही थी। कह रही थी कि अब उसका और उसके बच्चों का क्या होगा? कुछ सालों में एक एक कर के उसकी दोनों बेटियां ब्याह करने लायक हो जाएंगी तब वो क्या करेगी? कैसे अपनी बेटियों का ब्याह कर सकेगी?"

"अगर जगन काका ये सब सोचते तो आज उनके बीवी बच्चे ऐसी हालत में न पहुंचते।" मैंने गंभीरता से कहा____"अपने ही सगे भाई की ज़मीन का लालच किया उन्होंने और उस लालच में अंधे हो कर उन्होंने अपने ही भाई की जान ले ली। ऊपर वाला ऐसे में कैसे भला उनके साथ भला करता? ख़ैर पिता जी ने इसके बावजूद जगन काका के परिवार के लिए थोड़ा बहुत आर्थिक मदद करने का आश्वासन दिया है तो उन्हें ज़्यादा फ़िक्र नहीं करना चाहिए।"

"घर में एक मर्द का होना बहुत आवश्यक होता है वैभव बेटा।" सरोज काकी ने कहा____"जगन जैसा भी था किंतु उसके रहते उसकी बीवी को इन सब बातों की इतनी चिंता नहीं थी मगर अब, अब तो हर चीज़ के लिए उसे दूसरों पर ही निर्भर रहना है।"

"इंसान का जीवन इसी लिए तो संघर्षों से भरा होता है काकी।" मैंने कहा____"कोई कितना ही बड़ा आदमी क्यों न हो किंतु जीवन जीना उसके लिए भी आसान नहीं होता। ख़ैर छोड़िए, अब तो बारिश का मौसम भी आ गया है तो आपको भी अपने खेतों पर बीज बोने होंगे न?"

"हां उसके बिना गुज़ारा भी तो नहीं होगा बेटा।" काकी ने कहा____"सोच रही हूं कि एक दो बार और बारिश हो जाए जिससे ज़मीन के अंदर तक नमी पहुंच जाए। उसके बाद ही जुताई करवाने के बारे में सोचूंगी।"

"फ़िक्र मत कीजिए।" मैंने कहा____"मैं दो लोगों को इस काम पर लगवा दूंगा। आप बस बीज दे देना उन्हें बोने के लिए। बाकी निदाई गोड़ाई तो आप खुद ही कर लेंगी न?"

"हां बेटा।" काकी ने कहा____"इतना तो कर ही लूंगी। वैसे भी थोड़ा बहुत काम तो मैं खुद भी करना चाहती हूं क्योंकि काम करने से ही इंसान का शरीर स्वस्थ्य रहता है। खाली बैठी रहूंगी तो तरह तरह की बातों से मन भी दुखी होता रहेगा।"

"वैसे किस लिए आईं थी आप यहां पर?" मैंने वो सवाल किया जो मुझे सबसे पहले करना चाहिए था।

"वो मैं भुवन के पास आई थी।" सरोज काकी ने कहा____"असल में बारिश होने के चलते मेरे घर में कई जगह से पानी टपक रहा था। पिछले साल अनू के बापू ने ढंग से घर को छा दिया था जिससे पानी का टपकना बंद हो गया था मगर अब फिर से टपकने लगा है। अब अनू के बापू तो हैं नहीं और मैं खुद छा नहीं सकती इसी लिए भुवन से ये कहने आई थी कि किसी के द्वारा मेरे घर को छवा दे। वैसे अच्छा हुआ कि मैं यहां आ गई और यहां तुम मिल गए मुझे। तुम तो अब मेरे घर आते ही नहीं हो।"

"पहले की तरह अब समय ही नहीं रहता काकी।" मैंने बहाना बनाते हुए कहा____"आपको तो सब पता ही है कि हमारे साथ क्या क्या हो चुका है।"

"हां जानती हूं बेटा।" सरोज काकी ने संजीदा हो कर कहा____"तुम्हारे परिवार के साथ जो हुआ है वो तो सच में बहुत बुरा हुआ है लेकिन क्या कह सकते हैं। ऊपर वाले पर भला किसका बस चलता है?"

"जिन लोगों ने ये सब किया था उनके साथ भी तो वैसा ही किया गया है।" मैंने सहसा सख़्त भाव से कहा____"अब वो लोग ख़्वाब में भी किसी के साथ ऐसा करने का नहीं सोचेंगे।"

थोड़ी देर इसी संबंध में कुछ बातें हुईं उसके बाद मैं भुवन से ये कह कर वहां से चला आया कि अगले दिन सभी मजदूरों से मिलना है जिसके लिए सारा इंतजाम कर दे। असल में अनुराधा की मौजूदगी से मैं कुछ ज़्यादा ही असहज हो रहा था। उसके चेहरे पर छाई उदासी मुझे अंदर ही अंदर कचोटने लगी थी। यही वजह थी कि मैं वहां से चल पड़ा था।
 
अध्याय - 83
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"जिन लोगों ने ये सब किया था उनके साथ भी तो वैसा ही किया गया है।" मैंने सहसा सख़्त भाव से कहा____"अब वो लोग ख़्वाब में भी किसी के साथ ऐसा करने का नहीं सोचेंगे।"

थोड़ी देर इसी संबंध में कुछ बातें हुईं उसके बाद मैं भुवन से ये कह कर वहां से चला आया कि अगले दिन सभी मजदूरों से मिलना है जिसके लिए सारा इंतजाम कर दे। असल में अनुराधा की मौजूदगी से मैं कुछ ज़्यादा ही असहज हो रहा था। उसके चेहरे पर छाई उदासी मुझे अंदर ही अंदर कचोटने लगी थी। यही वजह थी कि मैं वहां से चल पड़ा था।


अब आगे....


अगले दो चार दिनों तक मैं काफी ब्यस्त रहा।
इस बीच मैंने खेतों पर काम करने वाले सभी मजदूरों से मिला और उनसे हर चीज़ के बारे में जानकारी लेने के साथ साथ उन्हें बताया भी कि अब से सब कुछ किस तरीके से करना है। मैं सभी से बहुत ही तरीके से बातें कर रहा था इस लिए सभी मजदूर मुझसे काफी खुश हो गए थे। मुझे इस बात का बखूबी एहसास था कि ग़रीब मजदूर अगर खुश रहेगा तो वो हमारे लिए कुछ भी कर सकता है और इसी लिए मैंने सबको खुश रखने का सोच लिया था।

पिता जी से मैंने एक दो नए ट्रेक्टर लेने को बोल दिया था ताकि खेती बाड़ी के काम में किसी भी तरह की परेशानी अथवा रुकावट न हो सके। पिता जी को मेरा सुझाव उचित लगा इस लिए उन्होंने दो ट्रैक्टर लेने की मंजूरी दे दी। अगले ही दिन मैं भुवन को ले कर शहर से दो ट्रैक्टर ले आया और साथ में उसका सारा समान भी। हमारे पास पहले से ही दो ट्रैक्टर थे किंतु वो थोड़ा पुराने हो चुके थे। हमारे पास बहुत सारी ज़मीनें थीं। ज़मीनों की जुताई करने में काफी समय लग जाता था, ऐसा मुझे मजदूरों से ही पता चला था।

आसमान में काले बादलों ने डेरा तो डाल रखा था किंतु दो दिनों तक बारिश नहीं हुई। तीसरे दिन थोड़ा थोड़ा कर के सारा दिन बारिश हुई जिससे ज़मीनों में पानी ही पानी नज़र आने लगा था। दूसरी तरफ मुरारी काका के घर को भी मैंने दो मजदूर लगवा कर छवा दिया था और उन्हीं मजदूरों को मैंने उसके खेतों की जुताई के लिए लगवा दिया। सरोज काकी मेरे इस उपकार से बड़ा खुश थी तो वहीं अनुराधा अब एकदम ख़ामोश और गुमसुम सी रहने लगी थी। उसे इस हालत में देख सरोज काकी को उसकी फ़िक्र होने लगी थी। उसे समझ नहीं आ रहा था कि आख़िर उसकी बेटी को हुआ क्या है?

मैं पिता जी के कहे अनुसार अब पूरी ईमानदारी से अपनी ज़िम्मेदारी निभाने लगा था। मुझे इस तरह काम करता देख जहां मेरे माता पिता राहत भरी नज़रों से मुझे देखने लगे थे वहीं भाभी भी काम के प्रति मेरे इस समर्पण भाव से खुश थीं। आज कल मेरा ज़्यादातर समय हवेली से बाहर ही गुज़र रहा था जिसके चलते मैं भाभी को ज़्यादा समय नहीं दे पा रहा था।

एक दिन सुबह सुबह ही मैं हवेली से मोटर साईकिल ले कर खेतों की तरफ निकला तो रास्ते में मुझे साहूकार हरि शंकर की बेटी रूपा नज़र आ गई। उसके साथ में गौरी शंकर की बेटी राधा भी थी। मुझ पर नज़र पड़ते ही रूपा ने पहले इधर उधर देखा और फिर मुझे रुकने का इशारा किया। उसके इस तरह इशारा करने पर जहां मैं थोड़ा हैरान हुआ वहीं उसके पास ही खड़ी राधा भी उसे हैरत से देखने लगी थी। उसने उससे कुछ कहा जिस पर रूपा ने भी कुछ कहा। बहरहाल मैं कुछ ही पलों में उन दोनों के क़रीब पहुंच गया।

मैंने देखा रूपा पहले से काफी कमज़ोर दिख रही थी। उसके चेहरे पर पहले की तरह नूर नहीं था। आंखों के नीचे काले धब्बे से नज़र आ रहे थे। मुझे अपने पास ही मोटर साईकिल पर बैठा देख वो बड़े ही उदास भाव से मुझे देखने लगी। वहीं राधा थोड़ी घबराई हुई नज़र आ रही थी। इधर मुझे समझ न आया कि उसने मुझे क्यों रुकने का इशारा किया है और खुद मैं उससे क्या कहूं?

"क्या बात है?" फिर मैंने आस पास नज़र डालने के बाद आख़िर उससे पूछा____"मुझे किस लिए रुकने का इशारा किया है तुमने? क्या तुम्हें भय नहीं है कि अगर किसी ने तुम्हें मेरे पास यूं खड़े देख लिया तो क्या सोचेगा?"

"हमने किसी के सोचने की परवाह करना छोड़ दिया है वैभव।" रूपा ने अजीब भाव से कहा____"अब इससे ज़्यादा क्या बुरा हो सकता है कि हम सब ख़ाक में ही मिला दिए गए।"

"ख़ाक में मिलाने की शुरुआत तो तुम्हारे ही अपनों ने की थी।" मैंने सपाट लहजे में कहा____"हमने तो कभी तुम लोगों से बैर भाव नहीं रखा था। तुम लोगों ने रिश्ते भी सुधारे तो सिर्फ इस लिए कि उसकी आड़ में धोखे से हम पर वार कर सको। सच कहूं तो तुम्हारे अपनों के साथ जो कुछ हुआ है उसके ज़िम्मेदार वो खुद थे। अपने हंसते खेलते और खुश हाल परिवार को अपने ही हाथों एक झटके में तबाह कर लिया उन्होंने। इसके लिए तुम हमें ज़िम्मेदार नहीं ठहरा सकती क्योंकि जब ऐसे वाक्यात होते हैं तो उसका अंजाम अच्छा तो हो ही नहीं सकता। फिर चाहे वो किसी के लिए भी हो।"

"हां जानती हूं।" रूपा ने संजीदगी से कहा____"ख़ैर छोड़ो, तुम कैसे हो? हमें तो भुला ही दिया तुमने।"

"तुम्हारी इनायत से ठीक हूं।" मैंने कहा____"और मैं उस शक्स को कैसे भूल सकता हूं जिसने मेरी हिफाज़त के लिए अपने ही लोगों की जान के ख़तरे को ताक पर रख दिया था।"

"ये क्या कह रहे हो तुम?" रूपा सकपकाते हुए बोली।

"वो तुम ही थी ना जिसने मेरे पिता जी को इस बात की सूचना दी थी कि कुछ लोग चंदनपुर में मुझे जान से मारने के इरादे से जाने वाले हैं?" मैंने उसकी आंखों में देखते हुए कहा____"वैसे शुक्रिया इस इनायत के लिए। तुम्हारा ये उपकार मैं ज़िंदगी भर नहीं भूलूंगा लेकिन मुझे ये नहीं पता है कि तुम्हारे साथ दूसरी औरत कौन थी?"

"मेरी भाभी कुमुद।" रूपा ने नज़रें झुका कर कहा तो मैंने उसे हैरानी से देखते हुए कहा____"कमाल है, वैसे मेरे लिए इतना कुछ करने की क्या ज़रूरत थी वो भी अपने ही लोगों की जान को ख़तरे में डाल कर?"

"क्या तुमने मुझे इतना बेगाना समझ लिया है?" रूपा की आंखें एकदम से नम होती नज़र आईं, बोली____"क्या सच में तुम्हें ये एहसास नहीं है कि मेरे दिल में तुम्हारे लिए क्या है?"

"ओह! तो तुम अभी भी उसी बात को ले के बैठी हुई हो?" मैंने हैरान होते हुए कहा____"क्या तुम्हें लगता है कि इतना कुछ होने के बाद भी तुम्हारी ख़्वाइश अथवा तुम्हारी चाहत पूरी होगी? अरे! जब पहले ऐसा संभव नहीं था तो अब भला कैसे संभव होगा?"

"होने को तो कुछ भी हो सकता है दुनिया में।" रूपा ने कहा____"दरकार सिर्फ इस बात की होती है कि हमारे अंदर ऐसा करने की चाह हो। अगर तुम ही नहीं चाहोगे तो सच में ऐसा संभव नहीं हो सकता।"

"दीदी चलिए यहां से।" मेरे कुछ बोलने से पहले ही राधा बोल पड़ी____"देखिए उधर से कोई आ रहा है।"

"मेरे प्रेम को यूं मत ठुकराओ वैभव।" रूपा की आंखें छलक पड़ीं____"तुम अच्छी तरह जानते हो कि मैं तुम्हारे बिना जीने की कल्पना भी नहीं कर सकती। मैंने पहले ही तुम्हें अपना सब कुछ मान लिया था और अपना सब कुछ तुम्हें....।"

"तुम्हें ये सब कहने की ज़रूरत नहीं है।" मैंने उसकी बात बीच में काट कर कहा____"मुझे पता है कि तुम्हारे दिल में मेरे लिए बहुत कुछ है और इसका सबूत तुम पहले ही दे चुकी हो। दूसरी बात मैं तुम्हारे प्रेम को ठुकरा नहीं रहा बल्कि ये कह रहा हूं कि हमारा हमेशा के लिए एक होना संभव ही नहीं है। पहले थोड़ी बहुत संभावना भी थी किंतु अब तो कहीं रत्ती भर भी संभावना नहीं है। मुझे पूरा यकीन है कि ये सब होने के बाद तुम्हारे घर वाले किसी भी कीमत पर ये नहीं चाहेंगे कि उनके घर की बेटी हवेली में बहू बन कर जाए।"

"मुझे किसी की परवाह नहीं है।" रूपा ने दृढ़ता से कहा____"परवाह सिर्फ इस बात की है कि तुम क्या चाहते हो? अगर तुम ही मुझे अपनाना नहीं चाहोगे तो मैं भला क्या कर लूंगी?"

"क्या मतलब है तुम्हारा?" मैंने संदेह पूर्ण भाव से उसे देखा।
"क्या तुम मुझसे ब्याह करोगे?" रूपा ने स्पष्ट भाव से पूछा।

"ये कैसा सवाल है?" मेरे माथे पर शिकन उभरी।
"बड़ा सीधा सा सवाल है वैभव।" रूपा ने कहा____"अगर तुम मुझसे ब्याह करने के लिए राज़ी हो तो फिर हमें एक होने से कोई नहीं रोक सकेगा। मैं अपने परिवार से लड़ जाऊंगी तुम्हारी बनने के लिए।"

रूपा की बातें सुन कर मैं भौचक्का सा देखता रह गया उसे। यही हाल उसके बगल से खड़ी राधा का भी था। मैं ये तो जानता था कि रूपा मुझसे प्रेम करती है और मुझसे ब्याह भी करना चाहती है लेकिन इसके लिए वो इस हद तक जाने का बोल देगी इसकी कल्पना नहीं की थी मैंने।

"दीदी ये आप कैसी बातें कर रही हैं इनसे?" राधा से जब न रहा गया तो वो बोल ही पड़ी____"आप ऐसा कैसे कह सकती हैं? पिता जी और रूप भैया को पता चला तो वो आपकी जान ले लेंगे।"

"मेरी जान तो वैभव है छोटी।" रूपा ने मेरी तरफ देखते हुए गंभीरता से कहा____"मैं तो सिर्फ एक बेजान जिस्म हूं। इसका भला कोई क्या करेगा?"

"अच्छा चलता हूं मैं।" मैंने रास्ते में एक आदमी को आते देखा तो बोला और फिर बिना किसी की कोई बात सुने ही मोटर साईकिल को स्टार्ट कर आगे बढ़ चला।

मेरे दिलो दिमाग़ में आंधियां सी चल पड़ीं थी। मैंने इसके पहले रूपा को इतना आहत सा नहीं देखा था। मुझे एहसास था कि वो क्या चाहती है लेकिन मुझे ये भी पता था कि वो जो चाहती है वो उसे मिलना आसान नहीं है। मेरे दिल में उसके लिए इज्ज़त की भावना पहले भी थी और जब से मैंने ये जाना है कि उसी ने मेरी जान भी बचाने का काम किया है तब से उसके लिए और भी इज्ज़त बढ़ गई थी। मुझे उससे पहले भी प्रेम नहीं था और आज भी उसके लिए मेरे दिल में प्रेम जैसी भावना नहीं थी। मगर आज जिस तरह से उसने ये सब कहा था उससे मैं काफी विचलित हो गया था। मैं हैरान भी था कि वो मेरे राज़ी हो जाने की सूरत में अपने ही लोगों से लड़ जाएगी। ज़ाहिर है ये या तो उसके प्रेम की चरम सीमा थी या फिर उसका पागलपन।

दोपहर तक मैं खेतों में ही रहा और खेतों की जुताई करवाता रहा। बार बार ज़हन में रूपा की बातें उभर आती थीं जिसके चलते मुझे बड़ा अजीब सा महसूस होने लगता था। मैं एक ऐसे मरहले में आ गया था जहां एक तरफ रूपा थी तो दूसरी तरफ अनुराधा। दोनों ही अपनी अपनी जगह मेरे लिए ख़ास थीं। एक मुझसे बेपनाह प्रेम करती थी तो दूसरी को मैं प्रेम करने लगा था। अगर दोनों की तुलना की जाए तो रूपा की सुंदरता के सामने अनुराधा कहीं नहीं ठहरती थी किंतु यहां सवाल सिर्फ सुंदरता का नहीं था बल्कि प्रेम का था। बात जब प्रेम की हो तो इंसान को सिर्फ वही व्यक्ति सबसे सुंदर और ख़ास नज़र आता है जिससे वो प्रेम करता है, बाकी सब तो फीके ही लगते हैं। बहरहाल आज रूपा की बातों से मैं काफी विचलित था। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि मैं उसके लिए क्या फ़ैसला करूं?

✮✮✮✮

दोपहर को खाना खाने के लिए मैं हवेली आया तो मां से पता चला कि पिता जी कुल गुरु से मिलने गए हुए हैं। हालाकि पिता जी के साथ शेरा तथा कुछ और भी मुलाजिम गए हुए थे किंतु फिर भी मैं पिता जी के लिए फिक्रमंद हो उठा था। ख़ैर खा पी कर मैं आराम करने के लिए अपने कमरे में चला आया। पलंग पर लेट कर मैं आंखें बंद किए जाने किन किन विचारों में खोने लगा था।

मेरे दिलो दिमाग़ से रूपा की बातें जा ही नहीं रहीं थी। पंचायत के दिन के बाद आज ही देखा था उसे। उसे इतने क़रीब से देखने पर ही मुझे नज़र आया था कि क्या हालत हो गई थी उसकी। मैं ये खुले दिल से स्वीकार करता था कि उसने अपने प्रेम को साबित करने के लिए बहुत कुछ किया था। एक लड़की के लिए उसकी आबरू सबसे अनमोल चीज़ होती है जिसे खुशी खुशी उसने सौंप दिया था मुझे। उसके बाद उसने मेरी जान बचाने का हैरतंगेज कारनामा भी कर दिया था। ये जानते हुए भी कि उसके ऐसा करने से उसके परिवार पर भयानक संकट आ सकता है। ये उसका प्रेम ही तो था जिसके चलते वो इतना कुछ कर गई थी। मैं सोचने लगा कि उसके इतना कुछ करने के बाद भी अगर मैं उसके प्रेम को न क़बूल करूं तो मुझसे बड़ा स्वार्थी अथवा बेईमान शायद ही कोई होगा।

प्रेम क्या होता है और उसकी तड़प क्या होती है ये अब जा कर मुझे समझ आने लगा था। मेरे अंदर इस तरह के एहसास पहले कभी नहीं पैदा हुए थे या फिर ये कह सकते हैं कि मैंने कभी ऐसे एहसासों को अपने अंदर पैदा ही नहीं होने दिया था। मुझे तो सिर्फ खूबसूरत लड़कियों और औरतों को भोगने से ही मतलब होता था। इसके पहले कभी मैंने अपने अंदर किसी के लिए भावनाएं नहीं पनपने दी थी। पिता जी ने गांव से निष्कासित किया तो अचानक ही मेरा सामना अनुराधा जैसी एक साधारण सी लड़की से हो गया। जाने क्या बात थी उसमें कि उसे अपने जाल में बाकी लड़कियों की तरह फांसने का मन ही नहीं किया। उसकी सादगी, उसकी मासूमियत, उसका मेरे सामने छुई मुई सा नज़र आना और उसकी नादानी भरी बातें कब मेरे अंदर घर कर गईं मुझे पता तक नहीं चला। जब पता चला तो जैसे मेरा कायाकल्प ही हो गया।

मुझे मुकम्मल रूप से बदल देने में अनुराधा का सबसे बड़ा योगदान था। उसका ख़याल आते ही दिलो दिमाग़ में हलचल होने लगती है। मीठा मीठा सा दर्द होने लगता है और फिर उसे देखने की तड़प जाग उठती है। कदाचित यही प्रेम था जिसे अब मैं समझ चुका था। आज जब रूपा को देखा और उसकी बातें सुनी तो मुझे बड़ी शिद्दत से एहसास हुआ कि वो किस क़दर मेरे प्रेम में तड़प रही होगी। मेरे ज़हन में सवाल उभरा कि क्या मुझे उसके प्रेम को इस तरह नज़रअंदाज़ करना चाहिए? कदाचित नहीं, क्योंकि ये उसके साथ नाइंसाफी होगी, एक सच्चा प्रेम करने वाली के साथ अन्याय होगा। मैंने मन ही मन फ़ैसला कर लिया कि मैं रूपा के प्रेम को ज़रूर स्वीकार करूंगा। रही बात उससे ब्याह करने की तो समय आने पर उसके बारे में भी सोच लिया जाएगा।

अभी मैं ये सब सोच ही रहा था कि तभी दरवाज़े पर दस्तक हुई। मैं सोचो के गहरे समुद्र से बाहर आया और जा कर दरवाज़ा खोला। बाहर भाभी खड़ी थीं।

"भाभी आप?" उन्हें देखते ही मैंने पूछा।

"माफ़ करना, तुम्हारे आराम पर खलल डाल दिया मैने।" भाभी ने खेद पूर्ण भाव से कहा।
"नहीं ऐसी कोई बात नहीं है भाभी।" मैंने एक तरफ हट का उन्हें अंदर आने का रास्ता दिया____"आइए, अंदर आ जाइए।"

"और कैसा चल रहा है तुम्हारा काम धाम?" एक कुर्सी पर बैठते ही भाभी ने मेरी तरफ देखते हुए पूछा____"काफी मेहनत हो रही है ना आज कल?"

"खेती बाड़ी के काम में मेहनत तो होती ही है भाभी।" मैंने कहा____"वैसे भी मेरे लिए ये मेरा पहला अनुभव है इस लिए शुरुआत में तो मुझे यही आभास होगा जैसे इस काम में बहुत मेहनत लगती है।"

"हां ये तो है।" भाभी ने कहा____"चार ही दिन में तुम्हारे चेहरे का रंग बदल गया है। काफी थके थके से नज़र आ रहे हो किंतु उससे ज़्यादा मुझे तुम कुछ परेशान और चिंतित भी दिख रहे हो। सब ठीक तो है न?"

"हां सब ठीक ही है भाभी।" मैंने खुद को सम्हालते हुए कहा____"असल में एकदम से ही इतनी बड़ी ज़िम्मेदारी मेरे कंधे पर आ गई है इस लिए उसी के प्रति ये सोच कर थोड़ा चिंतित हूं कि मैं सब कुछ अच्छे से सम्हाल लूंगा कि नहीं?"

"बिल्कुल सम्हाल लोगे वैभव।" भाभी ने जैसे मुझे प्रोत्साहित करते हुए कहा____"मानती हूं कि शुरुआत में हर चीज़ को समझने में और उसे सम्हालने में थोड़ी परेशानी होती है किंतु मुझे यकीन है कि तुम ये सब बेहतर तरीके से कर लोगे।"

"आपने इतना कह दिया तो मुझे सच में एक नई ऊर्जा सी मिल गई है।" मैंने खुश होते हुए कहा____"क्या आप कल सुबह मेरे साथ चलेंगी खेतों पर?"

"म...मैं??" भाभी ने हैरानी से देखा____"मैं भला कैसे वहां जा सकती हूं?"

"क्यों नहीं जा सकती आप?" मैंने कहा____"आपने मुझसे वादा किया था कि आप मेरे साथ चला करेंगी और अब आप ऐसा बोल रही हैं?"

"कहने में और करने में बहुत फ़र्क होता है वैभव।" भाभी ने सहसा बेचैन हो कर कहा____"तुम तो जानते हो कि इसके पहले मैं कभी भी इस हवेली से बाहर नहीं गई हूं।"

"हां तो क्या हुआ?" मैंने लापरवाही से कंधे उचकाए____"ज़रूरी थोड़ी ना है कि आप अगर पहले कभी नहीं गईं हैं तो आगे भी कभी नहीं जाएंगी। इंसान को अपने काम से बाहर तो जाना ही होता है, उसमें क्या है?"

"तुम समझ नहीं रहे हो वैभव।" भाभी ने मेरी तरफ चिंतित भाव से देखा____"पहले में और अब में बहुत अंतर हो चुका है। पहले मैं एक सुहागन थी, जबकि अब एक विधवा हूं। इतना सब कुछ होने के बाद अगर मैं तुम्हारे साथ कहीं बाहर जाऊंगी तो लोग मुझे देख कर जाने क्या क्या सोचने लगेंगे।"

"लोग तो सबके बारे में कुछ न कुछ सोचते ही रहते हैं भाभी।" मैंने कहा____"अगर इंसान ये सोचने लगे कि लोग उसके बारे में क्या सोचेंगे तो फिर वो जीवन में कभी सहजता से जी ही नहीं सकेगा। आप इस हवेली की बहू हैं और सब जानते हैं कि आप कितनी अच्छी हैं। दूसरी बात, मुझे किसी के सोचने से कोई फ़र्क नहीं पड़ता। मुझे सिर्फ इस बात की परवाह है कि मेरी भाभी हमेशा खुश रहें। इस लिए आप कल सुबह मेरे साथ खेतों पर चलेंगी।"

"मां जी को हवेली में अकेला छोड़ कर कैसे जाउंगी मैं?" भाभी ने जैसे फ़ौरन ही बहाना ढूंढ लिया____"नहीं वैभव ये ठीक नहीं है। मुझसे ये नहीं होगा।"

"आप कुछ ज़्यादा ही सोच रही हैं भाभी।" मैंने कहा____"अच्छा ठीक है, मैं इस बारे में मां से बात करूंगा। मां की इजाज़त मिलने पर तो आप चलेंगी न मेरे साथ?"

"बहुत ज़िद्दी हो तुम?" भाभी ने बड़ी मासूमियत से देखा____"क्या कोई इस तरह अपनी भाभी को परेशान करता है?"

"किसी और का तो नहीं पता।" मैंने सहसा मुस्कुरा कर कहा____"पर मैं तो अपनी प्यारी सी भाभी को परेशान करूंगा और ये मेरा हक़ है।"

"अच्छा जी?" भाभी ने आंखें फैला कर मुझे देखा____"मुझे परेशान करोगे तो मार भी खाओगे, समझे?"

"मंज़ूर है।" मैं फिर मुस्कुराया____"आपकी खुशी के लिए तो सूली पर चढ़ जाना भी मंज़ूर है मुझे।"

"सूली पर चढ़ें तुम्हारे दुश्मन।" भाभी ने कहा____"मेरे देवर की तरफ कोई आंख उठा कर देखेगा तो आंखें निकाल लूंगी उसकी।"

"फिर तो मुझे अपने लिए किसी अंगरक्षक को रखने की ज़रूरत ही नहीं है।" मैंने मुस्कुराते हुए कहा____"मेरी बहादुर भाभी ही काफी हैं मेरे दुश्मनों से मेरी हिफाज़त करने के लिए।"

"क्यों तंग कर रहा है तू मेरी फूल सी बच्ची को?" कमरे में सहसा मां की आवाज़ सुन कर हम दोनों ही उछल पड़े।

मां को कमरे में आया देख भाभी जल्दी ही कुर्सी से उठ कर खड़ी हो गईं। मैं और भाभी दोनों ही उन्हें हैरानी से देखे जा रहे थे। आज वो काफी समय बाद ऊपर आईं थी वरना वो सीढियां नहीं चढ़ती थीं। बहरहाल मां आ कर मेरे पास ही पलंग पर बैठ गईं।

"मां जी आप यहां?" भाभी ने मां से कहा____"कोई काम था तो किसी नौकरानी से संदेश भेजवा देतीं आप?"

"अरे! ऐसी कोई बात नहीं है बेटी।" मां ने बड़े स्नेह से कहा____"आज ठाकुर साहब भी नहीं हैं इस लिए मैंने सोचा कि तेरे पास ही कमरे में आ जाती हूं। सीढियां चढ़े भी काफी समय हो गया था तो सोचा इसी बहाने ये भी देख लेती हूं कि मुझमें सीढियां चढ़ने की क्षमता है कि नहीं।"

"वैसे मां, पिता जी किस काम से गए हैं कुल गुरु से मिलने?" मैंने मां से पूछा।

"पता नहीं आज कल क्या चलता रहता है उनके जहन में?" मां ने गहरी सांस लेते हुए कहा____"मुझे भी कुछ नहीं बताया उन्होंने। सिर्फ इतना ही कहा कि शाम तक वापस आ जाएंगे। अब तो उनके आने पर ही उनसे पता चलेगा कि वो किस काम से गुरु जी मिलने गए थे?" कहने के साथ ही मां ने भाभी की तरफ देखा फिर उनसे कहा____"अरे! बेटी तू खड़ी क्यों है? बैठ जा कुर्सी पर और ये तुझे तंग कर रहा था क्या?"

"नहीं मां जी।" भाभी ने कुर्सी में बैठे हुए कहा____"वैभव तो मेरा मन बहलाने की कोशिश कर रहे थे।"

"फिर तो ठीक है।" मां ने मेरी तरफ देखा____"मेरी बेटी को अगर तूने किसी बात पर तंग किया तो सोच लेना। ये मत समझना कि तू बड़ा हो गया है तो मैं तुझे पीटूंगी नहीं।"

"अरे! मां ये आप कैसी बात कर रही हैं?" मैंने मुस्कुराते हुए कहा____"आप बेशक मुझे पीट सकती हैं मेरी ग़लती पर। वैसे आपने ये कैसे सोच लिया कि मैं अपनी जान से भी ज़्यादा प्यारी भाभी को तंग कर सकता हूं?"

"तो फिर क्या बोल रहा था तू अभी इसे?" मां ने आंखें दिखाते हुए मुझसे पूछा।

"अरे! वो तो मैं ये कह रहा था कि भाभी को मेरे साथ खेतों पर चलना चाहिए।" मैंने कहा____"इससे इनका मन भी बहलेगा और हवेली के अंदर चौबीसों घंटे रहने से जो घुटन होती रहती है वो भी दूर होगी।"

"हां ये तो तू सही कह रहा है।" मां ने सिर हिलाते हुए कहा____"मुझे खुशी हुई कि तुझे अपनी भाभी की फ़िक्र है।" कहने के साथ ही मां भाभी से मुखातिब हुईं____"तुम्हारा देवर सही कह रहा है बेटी। मेरे ज़हन में तो ये बात आई ही नहीं कि तुम कैसा महसूस करती होगी इन चार दीवारियों के अंदर। तुम्हारे दुख का एहसास है मुझे। ये मैं ही जानती हूं कि तुम्हें इस सफ़ेद लिबास में देख कर मेरे कलेजे में कैसे बर्छियां चलती हैं। मेरा मन करता है कि दुनिया के कोने कोने से खुशियां ला कर अपनी फूल सी बेटी की झोली में भर दूं।"

"चिंता मत कीजिए मां जी।" भाभी ने अधीरता से कहा____"ईश्वर ने ये दुख दिया है तो किसी तरह इसे सहने की ताक़त भी देगा। वैसे भी जिसके पास आप जैसी प्यार करने वाली मां और इतना स्नेह देने वाला देवर हो वो भला कब तक दुखी रह सकेगी?"

"मैं तेरा जीवन खुशियों से भरा हुआ देखना चाहती हूं बेटी।" मां की आंखों से आंसू छलक पड़े____"मैं तुझे इस रूप में नहीं देख सकती। मैं तेरी ज़िंदगी में खुशियों के रंग ज़रूर भरूंगी, फिर भले ही चाहे मुझे कुछ भी क्यों न करना पड़े।"

"ये आप क्या कह रही हैं मां जी?" भाभी ने हैरत से मां की तरफ देखा। मैं भी मां की बातें सुन कर हैरत में पड़ गया था।

"तू फ़िक्र मत मेरी बच्ची।" मां पलंग से उठ कर भाभी के पास आ कर बोलीं____"विधाता ने तेरा जीवन बिगाड़ा है तो अब मैं उसे संवारूंगी। बस कुछ समय की बात है।"

"आप क्या कह रही हैं मां जी मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा?" भाभी का दिमाग़ जैसे चकरघिन्नी बन गया था। यही हाल मेरा भी था।

"तुझे इस हवेली में क़ैद रहने की ज़रूरत नहीं है मेरी बच्ची।" मां ने भाभी के मुरझाए चेहरे को अपनी हथेलियों के बीच ले कर कहा____"और ना ही घुट घुट कर जीने की ज़रूरत है। मैंने हमेशा तुझे बहू से ज़्यादा अपनी बेटी माना है और हमेशा तेरी खुशियों की कामना की है। मैं वैभव की बात से सहमत हूं। तेरा जब भी दिल करे तू इसके साथ खेतों में चली जाया करना। इससे तेरा मन भी बहलेगा और तुझे अच्छा भी महसूस होगा।"

"मैं भी यही कह रहा था मां।" मैंने कहा____"पर भाभी मना कर रहीं थी। कहने लगीं कि अगर ये मेरे साथ बाहर कहीं घूमने जाएंगी तो लोग क्या सोचेंगे?"

"जिसे जो सोचना है सोचे।" मां ने हाथ झटकते हुए कहा____"मुझे किसी के सोचने की कोई परवाह नहीं है। मैं सिर्फ इतना चाहती हूं कि मेरी बेटी हर हाल में ख़ुश रहे।"

मां की बात सुन कर जहां मुझे बड़ा फक्र सा महसूस हुआ वहीं भाभी एकदम से ही मां से लिपट कर रोने लगीं। मां ने उन्हें किसी बच्ची की तरह अपने सीने से छुपका लिया। उनकी आंखें भी छलक पड़ीं थी। ये मंज़र देख मुझे ये सोच कर खुशी हो रही थी कि मेरी मां कितनी अच्छी हैं जो अपनी बहू को बहू नहीं बल्कि अपनी बेटी मान कर उनकी खुशियों की परवाह कर रही हैं।
 
अध्याय - 84
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"जिसे जो सोचना है सोचे।" मां ने हाथ झटकते हुए कहा____"मुझे किसी के सोचने की कोई परवाह नहीं है। मैं सिर्फ इतना चाहती हूं कि मेरी बेटी हर हाल में ख़ुश रहे।"

मां की बात सुन कर जहां मुझे बड़ा फक्र सा महसूस हुआ वहीं भाभी एकदम से ही मां से लिपट कर रोने लगीं। मां ने उन्हें किसी बच्ची की तरह अपने सीने से छुपका लिया। उनकी आंखें भी छलक पड़ीं थी। ये मंज़र देख मुझे ये सोच कर खुशी हो रही थी कि मेरी मां कितनी अच्छी हैं जो अपनी बहू को बहू नहीं बल्कि अपनी बेटी मान कर उनकी खुशियों की परवाह कर रही हैं।


अब आगे....


मुंशी चंद्रकांत साहूकारों के खेत पहुंचा। गौरी शंकर अपने खेत में बने छोटे से मकान के बरामदे में बैठा हुआ था। रूपचंद्र मजदूरों से काम करवा रहा था। चंद्रकांत को आया देख गौरी शंकर एकदम से ही चौंक गया। उसे उम्मीद नहीं थी कि चंद्रकांत अब दुबारा कभी उसके सामने आएगा। उसे देखते ही उसको वो सब कुछ एक झटके में याद आने लगा जो कुछ हो चुका था।

"कैसे हैं गौरी शंकर जी?" चंद्रकांत बरामदे में ही रखी एक लकड़ी की मेज़ पर बैठते हुए बोला____"आप तो हमें भूल ही गए।"

"तुम भूलने वाली चीज़ नहीं हो चंद्रकांत।" गौरी शंकर ने थोड़ा सख़्त भाव से कहा____"बल्कि तुम तो वो चीज़ हो जिसका अगर साया भी किसी पर पड़ जाए तो समझो इंसान बर्बाद हो गया।"

"ये आप कैसी बात कह रहे हैं गौरी शंकर जी?" चंद्रकांत ने हैरानी से उसे देखा____"मैंने भला ऐसा क्या कर दिया है जिसके लिए आप मुझे ऐसा बोल रहे हैं?"

"ये भी मुझे ही बताना पड़ेगा क्या?" गौरी शंकर ने उसे घूरते हुए कहा____"मैं ये मानता हूं कि हम लोग उतने भी होशियार और चालाक नहीं थे जितना कि हम खुद को समझते थे। सच तो ये है कि तुम्हें समझने में हमसे बहुत बड़ी ग़लती हुई।"

"आप ये क्या कह रहे हैं?" चंद्रकांत अंदर ही अंदर घबरा सा गया____"मुझे तो कुछ समझ में ही नहीं आ रहा।"

"अंजान बनने का नाटक मत करो चंद्रकांत।" गौरी शंकर ने कहा____"सच यही है कि हमारे साथ मिल जाने की तुम्हारी पहले से ही योजना थी। अगर मैं ये कहूं तो ग़लत न होगा कि हमारे कंधों पर बंदूक रख तुम दादा ठाकुर से अपनी दुश्मनी निकालना चाहते थे और अपने इस मक़सद में तुम कामयाब भी हो गए। अपने सामने हम सबको रख कर तुमने सारा खेल खेला। ये उसी का परिणाम है कि हम सब तो मिट्टी में मिल गए मगर तुम्हारा बाल भी बांका नहीं हुआ।"

"आप बेवजह मुझ पर आरोप लगा रहे हैं गौरी शंकर जी।" चंद्रकांत अपनी हालत को किसी तरह सम्हालते हुए बोला____"जबकि आप भी जानते हैं कि मैंने और मेरे बेटे ने आपका साथ देने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। आप कहते हैं कि हमारा बाल भी बांका नहीं हुआ तो ये ग़लत है। हमारा भी बहुत नुकसान हुआ है। पहले कोई सोच भी नहीं सकता था कि मैं दादा ठाकुर के साथ ऐसा कर सकता हूं जबकि अब सबको पता चल चुका है। इस सब में अगर आप अकेले रह गए हैं तो मैं भी तो अकेला ही रह गया हूं। हवेली से मेरा हर तरह से ताल्लुक ख़त्म हो गया, जबकि पहले मैं दादा ठाकुर का मुंशी था। लोगों के बीच मेरी एक इज्ज़त थी मगर अब ऐसा कुछ नहीं रहा। हां ये ज़रूर है कि दादा ठाकुर के क़हर का शिकार होने से मैं और मेरा बेटा बच गए। किंतु ये भी ऊपर वाले की मेहरबानी से ही हो सका है।"

"बातें बनानी तुम्हें खूब आती हैं चंद्रकांत।" गौरी शंकर ने कहा_____"जीवन भर मुंशीगीरी किए हो और लोगों को जैसे चाहा चूतिया बनाया है तुमने। मुझे सब पता है कि तुमने इतने सालों में दादा ठाकुर की आंखों में धूल झोंक कर अपने लिए क्या कुछ बना लिया है।"

"इस बात से मैं कहां इंकार कर रहा हूं गौरी शंकर जी?" चंद्रकांत ने कहा____"सबसे पहले अपने बारे में और अपने हितों के बारे में सोचना तो इंसान की फितरत होती है। मैंने भी वही किया है। ख़ैर छोड़िए, मैंने सुना है कि कल आपके घर दादा ठाकुर खुद चल कर आए थे?"

"तुम्हें इससे क्या मतलब है?" गौरी शंकर ने उसकी आंखों में देखते हुए पूछा।

"म...मुझे मतलब क्यों नहीं होगा गौरी शंकर जी?" चंद्रकांत हड़बड़ाते हुए बोला____"आख़िर हम दोनों उसके दुश्मन हैं और जो कुछ भी किया है हमने साथ मिल कर किया है। पंचायत में भले ही चाहे जो फ़ैसला हुआ हो किंतु हम तो अभी भी एक साथ ही हैं न? ऐसे में अगर आपके घर हमारा दुश्मन आएगा तो उसके बारे में हम दोनों को ही तो सोचना पड़ेगा ना?"

"तुम्हें बहुत बड़ी ग़लतफहमी है चंद्रकांत।" गौरी शंकर ने कहा____"इतना कुछ हो जाने के बाद और पंचायत में फ़ैसला हो जाने के बाद दादा ठाकुर से मेरी कोई दुश्मनी नहीं रही। दूसरी बात, हम दोनों के बीच भी अब कोई ताल्लुक़ नहीं रहा।"

"य...ये आप क्या कह रहे हैं गौरी शंकर जी?" चंद्रकांत बुरी तरह हैरान होते हुए बोला____"जिस इंसान ने आपका समूल नाश कर दिया उसे अब आप अपना दुश्मन नहीं मानते? बड़े हैरत की बात है ये।"

"अगर तुम्हारा भी इसी तरह समूल नाश हो गया होता तो तुम्हारी भी मानसिक अवस्था ऐसी ही हो जाती चंद्रकांत।" गौरी शंकर ने कहा____"मुझे अच्छी तरह एहसास हो चुका है कि हमने बेकार में ही इतने वर्षों से हवेली में रहने वालों के प्रति बैर भाव रखा हुआ था। जिसने हमारे साथ ग़लत किया था वो तो वर्षों पहले ही मिट्टी में मिल गया था। उसके पुत्रों ने अथवा उसके पोतों ने तो कभी हमारा कुछ बुरा किया ही नहीं था, फिर क्यों हमने उनसे इतना बड़ा बैर भाव रखा? सच तो यही है चंद्रकांत कि हमारी तबाही में दादा ठाकुर से कहीं ज़्यादा हम खुद ही ज़िम्मेदार हैं। दादा ठाकुर सच में एक नेक व्यक्ति हैं जो इस सबके बावजूद खुद को हमारा अपराधी समझते हैं और खुद चल कर हमारे घर आए। ये उनकी उदारता और नेक नीयती का ही सबूत है कि वो अभी भी हमसे अपने रिश्ते सुधारने का सोचते हैं और हम सबका भला चाहते हैं।"

"कमाल है।" चंद्रकांत हैरत से आंखें फाड़े बोल पड़ा____"आपका तो कायाकल्प ही हो गया है गौरी शंकर जी। मुझे यकीन नहीं हो रहा कि जिस व्यक्ति ने आप सबको मिट्टी में मिला दिया उसके बारे में आप इतने ऊंचे ख़याल रखने लगे हैं। कहीं ऐसा तो नहीं कि इतना कुछ हो जाने के बाद आप दादा ठाकुर से कुछ इस क़दर ख़ौफ खा गए हैं कि अब भूल से भी उनसे बैर नहीं रखना चाहते, दुश्मनी निभाने की तो बात ही दूर है।"

"तुम्हें जो समझना है समझ लो चंद्रकांत।" गौरी शंकर ने कहा____"किंतु तुम्हारे लिए मेरी मुफ़्त की सलाह यही है कि तुम भी अब अपने दिलो दिमाग़ से हवेली में रहने वालों के प्रति दुश्मनी के भाव निकाल दो वरना इसका अंजाम ठीक वैसा ही भुगतोगे जैसा हम भुगत चुके हैं।"

"यानि मेरा सोचना सही है।" चंद्रकांत इस बार मुस्कुराते हुए बोला____"आप सच में दादा ठाकुर से बुरी तरह ख़ौफ खा गए हैं जिसके चलते अब आप उन्हें एक अच्छा इंसान मानने लगे हैं। ख़ैर आप भले ही उनसे डर गए हैं किंतु मैं डरने वाला नहीं हूं। उनके बेटे ने आपके घर की बहू बेटियों की इज्ज़त को नहीं रौंदा है जबकि उस वैभव ने अपने दादा की तरह मेरे घर की इज्ज़त को रौंदा है। इस लिए जब तक उस नामुराद को मार नहीं डालूंगा तब तक मेरे अंदर की आग शांत नहीं हो सकती।"

"तुम उसका कुछ भी नहीं बिगाड़ पाओगे चंद्रकांत।" गौरी शंकर ने फीकी मुस्कान के साथ कहा____"अगर तुम ये मानते हो कि वो अपने दादा की ही तरह है तो तुम्हें ये भी मान लेना चाहिए कि जब तुम उसके दादा का कुछ नहीं बिगाड़ पाए तो उसके पोते का क्या बिगाड़ लोगे? उसे बच्चा समझने की भूल मत करना चंद्रकांत। वो तुम्हारी सोच से कहीं ज़्यादा की चीज़ है।"

"अब तो ये आने वाला वक्त ही बताएगा गौरी शंकर जी कि कौन क्या चीज़ है?" चंद्रकांत ने दृढ़ता से कहा____"आप भी देखेंगे कि उस नामुराद को उसके किए की क्या सज़ा मिलती है?"

चंद्रकांत की बात सुन कर गौरी शंकर बस मुस्कुरा कर रह गया। जबकि चंद्रकांत उठा और चला गया। उसके जाने के कुछ ही देर बाद रूपचंद्र उसके पास आया।

"ये मुंशी किस लिए आया था काका?" रूपचंद्र ने पूछा____"क्या आप दोनों फिर से कुछ करने वाले हैं?"

"नहीं बेटे।" गौरी शंकर ने गहरी सांस ली____"मैं तो अब कुछ भी करने का नहीं सोचने वाला किंतु हां चंद्रकांत ज़रूर बहुत कुछ करने का मंसूबा बनाए हुए है।"

"क्या मतलब?" रूपचंद्र की आंखें फैलीं।

"वो आग से खेलना चाहता है बेटे।" गौरी शंकर ने कहा____"इतना कुछ होने के बाद भी वो दादा ठाकुर को अपना दुश्मन समझता है, खास कर वैभव को। उसका कहना है कि वो वैभव को उसके किए की सज़ा दे कर रहेगा।"

"मरेगा साला।" रूपचंद्र ने कहा____"पर आपके पास किस लिए आया था वो?"

"शायद उसे कहीं से पता चल गया है कि दादा ठाकुर कल हमारे घर आए थे।" गौरी शंकर ने कहा____"इस लिए उन्हीं के बारे में पूछ रहा था कि किस लिए आए थे वो?"

"तो आपने क्या बताया उसे?" रूपचंद्र ने पूछा।

"मैं उसे क्यों कुछ बताऊंगा बेटे?" गौरी शंकर ने रूपचंद्र की तरफ देखा____"उससे अब मेरा कोई ताल्लुक़ नहीं है। तुम भी इन बाप बेटे से कोई ताल्लुक़ मत रखना। पहले ही हम अपनी ग़लतियों की वजह से अपना सब कुछ खो चुके हैं। अब जो शेष बचा है उसे किसी भी कीमत पर नहीं खोना चाहते हम। मैंने उससे साफ कह दिया है कि उससे अब मेरा या मेरे परिवार का कोई ताल्लुक़ नहीं है। दादा ठाकुर से अब हमारी कोई दुश्मनी नहीं है। वो अगर उन्हें अपना दुश्मन समझता है तो समझे और उसे जो करना है करे लेकिन हमसे अब वो कोई मतलब ना रखे।"

"बिल्कुल सही कहा आपने उससे।" रूपचंद्र ने कहा____"वैसे काका, क्या आपको सच में यकीन है कि दादा ठाकुर हमें अपना दुश्मन नहीं समझते हैं और वो हमसे अपने रिश्ते जोड़ कर एक नई शुरुआत करना चाहते हैं?"

"असल में बात ये है बेटे कि जो व्यक्ति जैसा होता है वो दूसरे को भी अपने जैसा ही समझता है।" गौरी शंकर ने जैसे समझाने वाले अंदाज़ में कहा____"जबकि असलियत इससे जुदा होती है। हम दादा ठाकुर पर यकीन करने से इस लिए कतरा रहे हैं कि क्योंकि हम ऐसे ही हैं। जबकि सच तो यही है कि वो सच में हमें अपना ही समझते हैं और हमसे रिश्ता सुधार कर एक नई शुरुआत करना चाहते हैं। पहले भी तो यही हुआ था, ये अलग बात है कि पहले जब हमने रिश्ते सुधारने की पहल की थी तो उसमें हमारी नीयत पूरी तरह से दूषित थी।"

"तो क्या आपको लगता है कि दादा ठाकुर हमसे रिश्ते सुधारने के लिए एक नया रिश्ता जोड़ेंगे?" रूपचंद्र ने झिझकते हुए पूछा____"मेरा मतलब है कि क्या वो अपने छोट भाई की बेटी का ब्याह मेरे साथ करेंगे?"

"अगर वो ऐसा करें तो समझो ये हमारे लिए सौभाग्य की ही बात होगी बेटे।" गौरी शंकर ने कहा____"किंतु मुझे नहीं लगता कि ये रिश्ता हो सकेगा। कुसुम अगर उनकी अपनी बेटी होती तो यकीनन वो उसका ब्याह तुमसे कर देते किंतु वो उनके उस भाई की बेटी है जिसकी हमने हत्या की है। खुद सोचो कि क्या कोई औरत अपनी बेटी का ब्याह उस घर में करेगी जिस घर के लोगों ने उसके पति और उसकी बेटी के बाप की हत्या की हो? उनकी जगह हम होते तो हम भी नहीं करते, इस लिए इस बात को भूल ही जाओ कि ये रिश्ता होगा।"

"पर बड़ी मां ने तो दादा ठाकुर से यही शर्त रखी है ना?" रूपचंद्र ने कहा____"शर्त के अनुसार अगर दादा ठाकुर कुसुम का ब्याह मेरे साथ नहीं करेंगे तो हमारे संबंध भी उनसे नहीं जुड़ेंगे।"

"ऐसा कुछ नहीं है बेटे।" गौरी शंकर ने गहरी सांस ली____"तुम्हारी बड़ी मां ने तो दादा ठाकुर से शर्त के रूप में ये बात सिर्फ इस लिए कही थी क्योंकि वो देखना चाहती थीं कि दादा ठाकुर ऐसे संबंध पर अपनी क्या प्रतिक्रिया देते हैं? ख़ैर छोड़ो इन बातों को, सच तो ये है कि अगर दादा ठाकुर सच में हमसे रिश्ते सुधार कर एक नई शुरुआत करने को कहेंगे तो हम यकीनन ऐसा करेंगे। मर्दों के नाम पर अब सिर्फ हम दोनों ही बचे हैं बेटे और हमें इसी गांव में रहते हुए अपने परिवार की देख भाल करनी है। दादा ठाकुर जैसे ताकतवर इंसान से बैर रखना हमारे लिए कभी भी हितकर नहीं होगा।"

✮✮✮✮

चंद्रकांत गुस्से में अपने घर पहुंचा।
उसका बेटा रघुवीर घर पर ही था। उसने जब अपने पिता को गुस्से में देखा तो उसे किसी अनिष्ट की आशंका हुई जिसके चलते वो अंदर ही अंदर घबरा गया।

"क्या बात है बापू?" फिर उसने अपने पिता से झिझकते हुए पूछा____"तुम इतने गुस्से में क्यों नज़र आ रहे हो? कुछ हुआ है क्या?"

"वो गौरी शंकर साला डरपोक और कायर निकला।" चंद्रकांत ने अपने दांत पीसते हुए कहा____"दादा ठाकुर से इस क़दर डरा हुआ है कि अब वो कुछ करना ही नहीं चाहता।"

"तुम गौरी शंकर के पास गए थे क्या?" रघुवीर ने चौंकते हुए उसे देखा।

"हां।" चंद्रकांत ने सिर हिलाया____"आज जब तुमने मुझे ये बताया था कि दादा ठाकुर उसके घर गया था तो मैंने सोचा गौरी शंकर से मिल कर उससे पूछूं कि आख़िर दादा ठाकुर उसके घर किस मक़सद से आया था?"

"तो फिर क्या बताया उसने?" रघुवीर उत्सुकता से पूछ बैठा।

"बेटीचोद इस बारे में कुछ भी नहीं बताया उसने।" चंद्रकांत गुस्से में सुलगते हुए बोला____"उल्टा मुझ पर ही आरोप लगाने लगा कि उसके और उसके भाईयों को ढाल बना कर सारा खेल मैंने ही खेला है जिसके चलते आज उन सबका नाश हो गया है।"

"कितना दोगला है कमीना।" रघुवीर ने हैरत से कहा____"अपनी बर्बादी का सारा आरोप अब हम पर लगा रहा है जबकि सब कुछ करने की योजनाएं तो वो सारे भाई मिल कर ही बनाते थे। हम तो बस उनके साथ थे।"

"वही तो।" चंद्रकांत ने कहा____"सारा किया धरा तो उसके और उसके भाईयों का ही था इसके बाद भी आज वो हर चीज़ का आरोप मुझ पर लगा रहा था। उसके बाद जब मैंने इस बारे में कुछ करने को कहा तो उल्टा मुझे नसीहत देने लगा कि मैं अब कुछ भी करने का न सोचूं वरना इसका अंजाम मुझे भी उनकी तरह ही भुगतना पड़ेगा।"

"तो इसका मतलब ये हुआ कि अब वो दादा ठाकुर के खिलाफ़ कुछ भी नहीं करने वाला।" रघुवीर ने कहा____"एक तरह से उसने हमसे किनारा ही कर लिया है।"

"हां।" चंद्रकांत ने कहा____"उसने स्पष्ट रूप से मुझसे कह दिया है कि अब से उसका हमसे कोई ताल्लुक़ नहीं है।"

"फ़िक्र मत करो बापू।" रघुवीर अर्थपूर्ण भाव से मुस्कुराया____"मैंने कुछ ऐसा कर दिया है कि उसका मन फिर से बदल जाएगा। बल्कि ये कहूं तो ज़्यादा बेहतर होगा कि वो फिर से दादा ठाकुर को अपना दुश्मन समझ बैठेगा।"

"क्या मतलब?" चंद्रकांत अपने बेटे की इस बात से बुरी तरह चौंका था, बोला____"ऐसा क्या कर दिया तुमने कि गौरी शंकर का मन बदल जाएगा और वो दादा ठाकुर को अपना दुश्मन मानने लगेगा?"

"आज मेरे एक पहचान वाले ने मुझे बहुत ही गज़ब की ख़बर दी थी बापू।" रघुवीर ने मुस्कुराते हुए कहा____"उसने बताया कि आज सुबह दादा ठाकुर का सपूत हरि शंकर की बेटी से मिला था। हरि शंकर की बेटी रूपा के साथ गौरी शंकर की बेटी राधा भी थी उस वक्त। मेरे पहचान के उस खास आदमी ने बताया कि वैभव काफी देर तक उन दोनों के पास खड़ा रहा था। ज़ाहिर है वो उन दोनों को अपनी हवस का शिकार बनाने के लिए ही फांसने की कोशिश करता रहा होगा।"

"उस हरामजादे से इसके अलावा और किस बात की उम्मीद कर सकता है कोई?" चंद्रकांत ने सख़्त भाव से कहा____"ख़ैर फिर क्या हुआ? मेरा मतलब है कि तुम्हारे उस आदमी के ये सब बताने के बाद तुमने क्या किया फिर?"

"मुझे जैसे ही ये बात पता चली तो मैं ये सोच कर मन ही मन खुश हो गया कि दोनों परिवारों के बीच दुश्मनी पैदा करने का इससे बेहतर मौका और क्या हो सकता है?" रघुवीर ने गहरी मुस्कान के साथ कहा____"बस, फिर मैंने भी इस सुनहरे अवसर को गंवाना उचित नहीं समझा और पहुंच गया साहूकारों के घर। गौरी शंकर अथवा रूपचंद्र तो नहीं मिले लेकिन उसके घर की औरतें मिल गईं। मैंने उनसे सारी बातें बता दी। मेरी बातें सुनने के बाद मैंने देखा कि उन सभी औरतों के चेहरे पर गुस्से के भाव उभर आए थे। मैं समझ गया कि अब वो औरतें खुद ही आगे का काम सम्हाल लेंगी, यानि आग लगाने का काम। वो गौरी शंकर और रूपचंद्र को बताएंगी कि कैसे दादा ठाकुर का सपूत उनकी दोनों बेटियों को अपनी हवस का शिकार बनाने के लिए उन्हें रास्ते में रोके हुए था आज? मुझे पूरा यकीन है बापू कि सवाल जब इज्ज़त का आ जाएगा तो गौरी शंकर और रूपचंद्र चुप नहीं बैठेंगे। यानि कोई न कोई बखेड़ा ज़रूर होगा अब।"

"ये तो कमाल ही हो गया बेटे।" चंद्रकांत एकदम से खुश हो कर बोला____"इतने दिनों से मैं यही सोच सोच के कुढ़ सा रहा था कि आख़िर कैसे दादा ठाकुर के खिलाफ़ कुछ बोलने का मौका मिले मगर अब मिल चुका है। शाबाश! बेटा, यकीनन ये बहुत ही गज़ब का मौका हाथ लगा है और तुमने भी बहुत ही समझदारी से काम लिया कि सारी बातें साहूकारों के घर वालों को बता दी। अब निश्चित ही हंगामा होगा। मैं भी देखता हूं कि मुझे नसीहतें देने वाला गौरी शंकर अब कैसे शांत बैठता है?"

"मेरा तो ख़याल ये है बापू कि इसके बाद अब हमें कुछ करने की ज़रूरत ही नहीं पड़ेगी।" रघुवीर ने कहा____"बल्कि गौरी शंकर अब इस बात के आधार पर खुद ही दादा ठाकुर को तबाह करने का समान जुटा लेगा। बात अगर पंचायत तक गई तो देखना इस बार दादा ठाकुर पर कोई रियायत नहीं की जाएगी।"

"मैं तो चाहता ही हूं कि उन लोगों पर कोई किसी भी तरह की रियायत न करे।" चंद्रकांत ने जबड़े भींचते हुए कहा____"अगर ऐसा हुआ तो पंचायत में दादा ठाकुर को या फिर उसके सपूत को इस गांव से निष्कासित करने का ही फ़ैसला होगा। अगर वो हरामजादा सच में इस गांव से निष्कासित कर दिया गया तो फिर उसे हम जिस तरह से चाहेंगे ख़त्म कर सकेंगे।"

"मैं तो उसे तड़पा तड़पा कर मारूंगा बापू।" रघुवीर ने एकाएक आवेश में आ कर कहा____"उसे ऐसी बद्तर मौत दूंगा कि वर्षों तक लोग याद रखेंगे।"

"वो तो ठीक है बेटे।" चंद्रकांत ने कुछ सोचते हुए कहा____"लेकिन इसके अलावा मैंने एक और फ़ैसला कर लिया है जिसके बारे में मैं तुम्हें सही वक्त आने पर बताऊंगा।"
 
अध्याय - 85
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"मैं तो उसे तड़पा तड़पा कर मारूंगा बापू।" रघुवीर ने एकाएक आवेश में आ कर कहा____"उसे ऐसी बद्तर मौत दूंगा कि वर्षों तक लोग याद रखेंगे।"

"वो तो ठीक है बेटे।" चंद्रकांत ने कुछ सोचते हुए कहा____"लेकिन इसके अलावा मैंने एक और फ़ैसला कर लिया है जिसके बारे में मैं तुम्हें सही वक्त आने पर बताऊंगा।"


अब आगे....



साहूकारों के घर में सन्नाटा सा छाया हुआ था। जब से रघुवीर ने रूपा के संबंध में ये बताया था कि वो दादा ठाकुर के बेटे वैभव से खुले आम रास्ते में बातें कर रही थी तब से घर की औरतें गुस्से में थीं। राधा और रूपा के आने पर पहले तो ललिता देवी ने रूपा को खूब खरी खोटी सुनाई थी उसके बाद सबने जैसे अपनी अपनी भड़ास निकाली थी। रूपा को इस सबसे बड़ा दुख हुआ था। वो बस ख़ामोशी से सबकी बातें सुनते हुए आंसू बहाए जा रही थी। वो ख़ामोश इस लिए थी क्योंकि वैभव की तरफ से उसे वैसा जवाब नहीं मिला था जैसा कि वो चाहती थी। अगर वैभव उससे ब्याह करने के लिए हां कह देता तो कदाचित वो अपने घर वालों को खुल कर जवाब भी दे पाती।

गौरी शंकर और रूपचंद्र जैसे ही दोपहर को घर पहुंचे तो खाना खाते समय ही फूलवती ने उन दोनों को सब कुछ बता दिया। रूपचंद्र को तो पहले से ही अपनी बहन के बारे में ये सब पता था किंतु गौरी शंकर इस बात से हैरान रह गया था। इसके पहले उसे किसी ने इस बारे में बताया भी नहीं था कि रूपा को अपने ताऊ चाचा और पिता की सच्चाई पहले से ही पता थी और उसी ने कुमुद के साथ हवेली जा कर दादा ठाकुर को ये बता दिया था कि वो लोग वैभव के साथ क्या करने वाले हैं? असल में सब कुछ इतना जल्दी हो गया था कि दुख और संताप के चलते किसी को ये बात गौरी शंकर से बताने का ख़याल ही नहीं आया था। आज जब रघुवीर ने आ कर रूपा के संबंध में ये सब बताया तो सहसा एक झटके में उन्हें ये याद भी आ गया था और सारे ज़ख्म भी ताज़ा हो गए थे।

"बड़े आश्चर्य की बात है कि हमारे घर की बेटी ने उस लड़के से बात करने का दुस्साहस किया।" गौरी शंकर ने गंभीरता से कहा____"यकीन नहीं हो रहा कि ऐसा मेरे घर की लड़की ने किया। क्या उसे पता नहीं था कि दादा ठाकुर का वो लड़का किस तरह के चरित्र का है?"

"इस बारे में मैं आपसे कुछ कहना चाहता हूं काका।" रूपचंद्र ने कहा____"और वो ये कि मुझे वैभव के साथ रूपा के इस संबंध का बहुत पहले से पता था।"

"क...क्या????" गौरी शंकर तो चौंका ही किंतु उसके साथ साथ घर की बाकी सब औरतें और बहू बेटियां भी चौंक पड़ी थीं। आश्चर्य से आंखें फाड़े वो रूपचंद्र को देखने लगीं थी।

"हां काका।" रूपचंद्र ने सहसा कठोरता से कहा____"और इतना ही नहीं बल्कि मुझे ये भी पता है कि इन दोनों के बीच ये सब बहुत पहले से चल रहा है।"

"हे भगवान!" ललिता देवी ने अपना माथा पीटते हुए कहा____"इस लड़की ने तो हमें कहीं मुंह दिखाने के लायक ही नहीं रखा। काश! पैदा होते ही ये मर जाती तो आज ये सब न सुनने को मिलता।"

"अगर तुम्हें पहले से इस बारे में सब पता था तो तुमने हमें बताया क्यों नहीं?" गौरी शंकर ने सख़्त भाव से रूपचंद्र को देखते हुए कहा।

"सिर्फ इसी लिए कि इससे बात बढ़ जाती और हमारी बदनामी होती।" रूपचंद्र ने कहा____"मुझे शुरू से पता था कि आप लोग दादा ठाकुर को बर्बाद करने के लिए क्या क्या कर रहे हैं। अगर मैं इस बारे में आप लोगों को कुछ बताता तो संभव था कि आप लोग गुस्से में कुछ उल्टा सीधा कर बैठते जिसके चलते आप फ़ौरन ही दादा ठाकुर द्वारा धर लिए जाते।"

"मुझे तुमसे ये उम्मीद बिल्कुल भी नहीं थी बेटा।" गौरी शंकर ने मानों हताश हो कर कहा____"इतनी बड़ी बात तुमने हम सबसे छुपा के रखी। अगर हमें पता होता तो उस दिन मैं इस मामले को पंचायत में सबके सामने रखता और वैभव को इसके लिए सज़ा देने की मांग करता।"

"नहीं काका, आपके ऐसा करने से भी उस वैभव का कोई कुछ नहीं कर पाता।" रूपचंद्र ने कठोरता से कहा____"बल्कि इससे सिर्फ हमारा ही नुकसान होता और हमारी ही बदनामी होती। आपको पता नहीं है काका, सच तो ये है कि इसी वजह से मैं वैभव को ख़ाक में मिला देना चाहता था और इसके लिए मैंने अपने तरीके से कोशिश भी की थी लेकिन इसे मेरा दुर्भाग्य ही कहिए कि हर बार वो कमीना बच निकला।"

"ऐसा क्या किया था तुमने?" गौरी शंकर ने हैरानी से उसे देखा।

"जिस समय वो दादा ठाकुर द्वारा निष्कासित किए जाने पर गांव से बाहर रह रहा था।" रूपचंद्र ने कहा____"उसी समय से मैं उसके पीछे लगा था। मैं उसके हर क्रिया कलाप पर नज़र रख रहा था। मेरे लिए ये सुनहरा अवसर था उसे ख़त्म करने का क्योंकि निष्कासित किए जाने पर वो अकेला ही उस बंज़र ज़मीन पर एक झोपड़ा बना कर रह रहा था। उसे यूं अकेला देख मैंने सोच लिया था कि किसी रोज़ रात में सोते समय ही उसे मार डालूंगा। अपनी इस सोच को असल में बदलने के लिए जब मैंने काम करना शुरू किया तो मुझे जल्द ही पता चल गया कि उस हरामजादे को ख़त्म करना आसान नहीं है। वो भले ही उस जगह पर अकेला रह रहा था मगर इसके बावजूद कोई उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकता था।"

"ऐसा क्यों?" गौरी शंकर पूछे बगैर न रह सका।

"क्योंकि उसकी गुप्त रूप से सुरक्षा की जा रही थी।" रूपचंद्र ने बताया____"और इसके बारे में खुद वैभव को भी नहीं पता था। मैं ये देख कर बड़ा हैरान हुआ था कि ऐसा कैसे हो सकता है? जब मैंने इस बारे में सोचा तो मुझे यही समझ आया कि ये सब यकीनन दादा ठाकुर ने ही किया होगा। उन्होंने उसे भले ही कुछ समय के लिए निष्कासित कर दिया था किंतु था तो वो उनका बेटा ही। सुनसान जगह पर उसे अकेला भगवान के भरोसे कैसे छोड़ सकते थे वो? इस लिए उन्होंने उसकी सुरक्षा का इस तरीके से इंतजाम कर दिया था कि वैभव को इस बात की भनक तक ना लग सके।"

"पर मुझे तो कुछ और ही लग रहा है।" गौरी शंकर ने कुछ सोचते हुए कहा____"अगर तुम्हारी ये बात सच है तो इसका यही मतलब हो सकता है कि दादा ठाकुर ने अपने बेटे की इस तरह से सुरक्षा का इंतजाम सिर्फ इसी वजह से नहीं किया था कि वो उस जगह पर अकेला रहेगा बल्कि इस लिए भी किया हो सकता था कि उसे पहले से ही इस बात का अंदेशा था कि कोई उनके परिवार पर ख़तरा बना हुआ है। मुझे अब समझ आ रहा है कि ये सब दादा ठाकुर की एक चाल थी।"

"ये आप क्या कह रहे हैं काका?" रूपचंद्र ने आश्चर्य से आंखें फाड़ कर देखा। बाकी सब भी हैरान रह गए थे।

"सोचने वाली बात है बेटा कि वैभव ने इतना भी बड़ा अपराध नहीं किया था कि उसे घर से ही नहीं बल्कि गांव से ही निष्कासित कर दिया जाता।" गौरी शंकर ने जैसे समझाते हुए कहा____"लेकिन दादा ठाकुर ने ऐसा किया। उनके इस फ़ैसले से उस समय हर कोई चकित रह गया था, यहां तक कि हम लोग भी। ये अलग बात है कि इससे हमें यही सोच कर खुशी हुई थी कि अब हम भी वैभव को आसानी से ठिकाने लगा सकते हैं। ख़ैर, उस समय हम ये सोच ही नहीं सकते थे कि दादा ठाकुर ने अपने बेटे को निष्कासित कर के एक गहरी चाल चली है।"

"आखिर किस चाल की बात कर रहे हैं आप काका?" रूपचंद्र ने भारी उत्सुकता से पूछा।

"दादा ठाकुर को शायद पहले ही इस बात का शक अथवा अंदेशा हो गया था कि कोई उनके परिवार के लिए ख़तरा बन कर खड़ा हो गया है।" गौरी शंकर ने स्पष्ट रूप से कहा____"ज़ाहिर है ऐसे में उनका ये कर्तव्य था कि वो इस तरह के ख़तरे से अपने परिवार की रक्षा भी करें और उस ख़तरे का नामो निशान भी मिटा दें। परिवार की रक्षा करना तो उनके बस में था किंतु ख़तरे को नष्ट करना नहीं क्योंकि उन्हें उस समय स्पष्ट रूप से ये पता ही नहीं था कि ऐसा वो कौन है जो उनके परिवार के लिए ख़तरा बन गया है? हमारा उनसे हमेशा से ही बैर भाव रहा था और कोई ताल्लुक़ नहीं था। ऐसे में इस तरह के ख़तरे के बारे में उनके ज़हन में सबसे पहले हमारा ही ख़याल आया रहा होगा किंतु ख़याल आने से अथवा शक होने से वो कुछ नहीं कर सकते थे। उन्हें ख़तरा पैदा करने वाले के बारे में जानने के लिए प्रमाण चाहिए था। इधर हम लोग कोई प्रमाण देने वाले ही नहीं थे क्योंकि हम अपना हर काम योजना के अनुसार ही कर रहे थे जिसके चलते हम अपना भेद किसी भी कीमत पर ज़ाहिर नहीं कर सकते थे। बहरहाल जब दादा ठाकुर ने देखा कि हवेली में बैठे रहने से कोई प्रमाण नहीं मिलेगा तो उन्होंने एक चाल चली। उन्होंने अपने ही बेटे को चारा बनाने का सोचा और फिर वैभव के उस मामूली से अपराध पर उसे गांव से निष्कासित कर दिया। कदाचित उनकी सोच यही थी कि उनका दुश्मन जब वैभव को इस तरह अकेला देखेगा तो यकीनन वो वैभव को नुकसान पहुंचाने के उद्देश्य से उसके पास जाएगा और तब वो उस व्यक्ति को पकड़ लेंगे जो उनके परिवार के लिए ख़तरा बन गया था। जैसे तुम्हें नहीं पता था कि वैभव की सुरक्षा गुप्त रूप से की जा रही है वैसे ही हमें भी नहीं पता था। हमने कई बार अपने आदमियों को भेजा था किंतु हर बार वो वापस आ कर यही बताते थे कि वैभव की सुरक्षा गुप्त रूप से की जा रही है। ऐसे में वो उसे कोई नुकसान नहीं पहुंचा सकते। ये तो हमारी सूझ बूझ का ही नतीजा था कि हमने सुरक्षा घेरे को तोड़ कर अंदर जाने का कभी प्रयास ही नहीं किया था वरना यकीनन पकड़े जाते।"

"आश्चर्य की बात है कि इस बारे में दादा ठाकुर ने हमारी सोच से भी आगे का सोच कर ऐसा कर दिया था।" रूपचंद्र ने हैरत से कहा।

"वो दादा ठाकुर हैं बेटे।" गौरी शंकर ने गहरी सांस ले कर कहा____"उन्हें कम आंकने की भूल कभी मत करना। ख़ैर तो तुमने जब देखा कि वैभव की गुप्त रूप से सुरक्षा की जा रही है तो फिर तुमने क्या किया?"

"सच कहूं तो मुझे समझ ही नहीं आ रहा था कि अब क्या करूं?" रूपचंद्र ने कहा____"इस लिए सिर्फ उसकी निगरानी ही करता रहा। एक दिन मुझे पता चला कि मुरारी नाम का जो आदमी वैभव की हर तरह से मदद कर रहा था उसकी बीवी को वैभव ने अपनी हवस का शिकार बना लिया है।"

"हाय राम।" फूलवती का मुंह भाड़ की तरह खुल गया। उसके साथ साथ बाकियों का भी। इधर गौरी शंकर को रूपचंद्र की इस बात से कोई हैरानी नहीं हुई क्योंकि उसे पहले से ये बात पता थी।

"फिर एक दिन मैंने सुना कि उसी मुरारी की हत्या हो गई है।" रूपचंद्र ने आगे कहा____"और उसकी हत्या के लिए मुरारी का भाई जगन वैभव को हत्यारा कह रहा है। पहले तो मैं इस सबसे बड़ा हैरान हुआ किंतु फिर जल्दी ही मैं ये सोच कर खुश हो गया कि हत्या जैसे मामले में अगर वैभव को तरीके से फंसाया जाए तो शायद काम बन सकता है। मुझे ये भी पता चला कि वैभव मुरारी की बेटी को भी फंसाने में लगा हुआ है इस लिए एक दिन मैंने मुरारी की बीवी को धर लिया और उसे बता दिया कि मुझे उसके और वैभव के बीच बने नाजायज़ संबंधों के बारे में सब पता है इस लिए अब वो वही करे जो मैं कहूं। मुरारी की बीवी सरोज अपनी बदनामी के डर से मेरा कहा मान गई। मैं चाहता था कि वैभव हर तरफ से फंस जाए और उसकी खूब बदनामी हो।"

"फिर?" रूपचंद्र सांस लेने के लिए रुका तो गौरी शंकर पूछ बैठा।

"इसी बीच मुझसे एक ग़लती हो गई।" रूपचंद्र ने सहसा गहरी सांस ली।
"ग़लती??" गौरी शंकर के माथे पर शिकन उभर आई____"कैसी ग़लती हो गई तुमसे?"

"मैं क्योंकि वैभव से कुछ ज़्यादा ही खार खाया हुआ था।" रूपचंद्र ने कहा____"इस लिए मैंने उसकी उस फ़सल में आग लगा दी जिसे उसने बड़ी मेहनत कर के उगाई थी। उस समय मुझे लगा कि जब वो चार महीने की अपनी मेहनत को आग में जलता देखेगा तो पागल ही हो जाएगा। ख़ैर, पागल तो वो हुआ लेकिन उसके साथ उसे ये सोचने का भी मौका मिल गया कि कोई उसे फंसा रहा है। यही वो ग़लती थी मेरी, जिसके आधार पर उसने जगन और उसके गांव वालों को भी ये समझाया कि उसने ना तो मुरारी की हत्या की है और ना ही उसका किसी मामले में कोई हाथ है। यानि कोई दूसरा ही इस मामले में शामिल है जो उसे हत्या जैसे मामले में फंसाने की जी तोड़ कोशिश कर रहा है। उसका कहना था कि अगर उसी ने ये सब किया होता तो उसे अपनी ही फ़सल को जलाने की क्या ज़रूरत थी? ज़ाहिर है कि कोई और ही है जो उसे हर तरह से फंसा देना चाहता है और उसे आहत करना चाहता है। ख़ैर उसके बाद तो वो वापस हवेली ही आ गया था। हवेली आने के बाद भला कोई उसका क्या ही कर लेता?"

"ये सब तो ठीक है।" गौरी शंकर ने कहा____"लेकिन क्या फिर बाद में वैभव को ये पता चला कि उसकी फ़सल को किसने आग लगाई थी और उसे कौन फंसा रहा है?"

"हां, उसे पता चल गया था।" रूपचंद्र ने सहसा सिर झुका कर धीमें स्वर में कहा____"असल में इसमें भी मेरी ही ग़लती थी।"
"क्या मतलब?" गौरी शंकर चौंका।

"बात ये है कि मुरारी की लड़की मुझे भी भा गई थी।" रूपचंद्र ने सभी औरतों की तरफ एक एक नज़र डालने के बाद दबी आवाज़ में कहा____"जब मुझे पता चला कि वैभव मुरारी की लड़की को कुछ ज़्यादा ही भाव दे रहा है तो मुझे एकाएक ही उससे ईर्ष्या हो गई थी। मुरारी की बीवी क्योंकि मेरी धमकियों की वजह से कोई विरोध नहीं कर सकती थी इस लिए एक दिन मैंने उसके घर जा कर उसकी लड़की को दबोच लिया था। उसे पता नहीं था कि उसकी मां के नाजायज़ संबंध वैभव से हैं अतः मैंने उसे ये बात ये सोच कर बता दी कि इससे वो वैभव से नफ़रत करने लगेगी। उसके बाद मैं उस लड़की के साथ ज़ोर ज़बरदस्ती करने ही लगा था कि तभी वहां वैभव आ गया। मुझे बिल्कुल भी उम्मीद नहीं थी कि वो अचानक से इस तरह आ जाएगा। उसके आने से मैं बहुत ज़्यादा डर गया था। उधर जब उसने देखा कि मैंने मुरारी की लड़की को दबोच रखा है तो वो बेहद गुस्से में आ गया और फिर उसने मुझे बहुत मारा। उसके पूछने पर ही मैंने उसे सब कुछ बता दिया था।"

"ठीक किया था उसने।" रूपचंद्र की मां ललिता देवी गुस्से से बोल पड़ी____"किसी की बहन बेटी को बर्बाद करना तो दादा ठाकुर के लड़के का काम था किंतु मुझे नहीं पता था कि मेरा भी खून उसी के जैसा कुकर्मी होगा। कितनी शर्म की बात है कि तूने ऐसा घटिया काम किया। अच्छा किया वैभव ने जो तुझे मारा था।"

"फिर उसके बाद क्या हुआ?" गौरी शंकर ने उत्सुकतावश पूछा।

"मेरे माफ़ी मांगने पर वैभव ने मुझे ये कह कर छोड़ दिया था कि अब दुबारा कभी मुरारी के घर वालों को इस तरह से परेशान किया तो वो मुझे जान से मार देगा।" रूपचंद्र ने कहा____"उसके बाद मैंने फिर दुबारा ऐसा नहीं किया लेकिन वैभव पर निगरानी रखना नहीं छोड़ा। मुझे लगता है कि वैभव मुरारी की लड़की को पसंद करता है।"

"ये क्या कह रहे हो तुम?" गौरी शंकर हैरत से बोल पड़ा____"एक मामूली से किसान की लड़की को वैभव पसंद करता है? नहीं नहीं, ऐसा नहीं हो सकता। ज़रूर तुम्हें कोई ग़लतफहमी हुई है।"

"नहीं काका, मुझे कोई ग़लतफहमी नहीं हुई है।" रूपचंद्र ने ज़ोर दे कर कहा____"मुझे पूरा यकीन है कि मुरारी की लड़की के प्रति वैभव के मन में वैसा बिल्कुल भी नहीं है जैसा कि बाकी लड़कियों के प्रति हमेशा से उसके मन में रहा है।"

"तुम ये बात इतने यकीन से कैसे कह सकते हो?" गौरी शंकर को जैसे ये बात हजम ही नहीं हो रही थी____"जबकि मैं ये अच्छी तरह जानता हूं कि दादा ठाकुर का वो सपूत कभी किसी के लिए अपने मन में इस तरह के भाव नहीं रख सकता।"

"मैं भी यही समझता था काका।" रूपचंद्र ने दृढ़ता से कहा____"लेकिन फिर जो कुछ मैंने देखा और सुना उससे उसके बारे में मेरी सोच बदल गई। इतना तो आप भी जानते हैं न कि वैभव ने हमेशा ही दूसरों की बहन बेटियों को अपनी हवस का शिकार बनाया है। ये उसी का नतीजा था कि उसने मुरारी की बीवी को भी नहीं बक्शा लेकिन उसकी लड़की को छोड़ दिया। आप खुद सोचिए काका कि ऐसा क्यों किया होगा उसने? जो व्यक्ति मुरारी की औरत को फांस सकता था वो क्या मुरारी की भोली भाली लड़की को नहीं फांस लेता? यकीनन फांस लेता काका लेकिन ऐसा कुछ नहीं किया उसने।"

"हो सकता है कि मुरारी की हत्या हो जाने से उसने ऐसा करना उचित न समझा हो।" गौरी शंकर ने जैसे संभावना ज़ाहिर की____"उसमें इतनी तो समझ है कि वो ऐसे हालात पर मुरारी की लड़की को अपनी हवस का शिकार बनाना हद दर्जे का गिरा हुआ काम समझे।"

"ये आप कैसी बातें कर रहे हैं काका?" रूपचंद्र ने कहा____"जिस व्यक्ति को किसी चीज़ से फ़र्क ही नहीं पड़ता वो भला इतना कुछ कैसे सोच लेगा? मुरारी तो ज़िंदा रहा नहीं था और उसकी बीवी से उसके जिस्मानी संबंध ही बन चुके थे। ऐसे में अगर वो मुरारी की लड़की को भी फांस लेता तो उसका विरोध भला कौंन करता? सरोज भी कोई विरोध नहीं करती क्योंकि विरोध करने के लिए उसके पास मुंह ही नहीं बचा था।"

"तो तुम ये सब सोच कर ही ये मान रहे हो कि वैभव मुरारी की लड़की को पसंद करता है?" गौरी शंकर ने कहा____"बर्खुरदार पसंद करने का मतलब जानते हो क्या होता है? इंसान जब किसी को पसंद करने लगता है तो वो उसके साथ सम्पूर्ण जीवन जीने के सपने देखने लगता है और फिर उस सपने को पूरा भी करने की कोशिश करता है। कहने का मतलब ये हुआ कि अगर सच में वैभव उस लड़की को पसंद करता है तो फिर उसी के साथ जीवन जीने के सपने भी देखता होगा। ये ऐसी बात है जो कहीं से भी हजम करने वाली नहीं है। क्योंकि वैभव से उस लड़की का कोई मेल ही नहीं है, दूसरे अगर वैभव उस लड़की के साथ ब्याह करने का सोचेगा भी तो दादा ठाकुर ऐसा कभी नहीं करेंगे। वो एक मामूली किसान की लड़की से अपने बेटे का ब्याह हर्गिज़ नहीं करेंगे। वो अपनी आन बान और शान पर किसी भी तरह की आंच नहीं आने देंगे।"

"मानता हूं।" रूपचंद्र ने सिर हिलाया____"लेकिन आप भी जानते हैं कि वैभव भी कम नहीं है। उसने अब तक के अपने जीवन में वही किया है जो उसने चाहा है। दादा ठाकुर ने उस पर बहुत सी पाबंदियां लगाई थी मगर उसका कुछ नहीं कर पाए। इसी से ज़ाहिर होता है कि अगर वैभव ने सोच लिया होगा कि वो मुरारी की लड़की से ही ब्याह करेगा तो समझिए वो कर के ही रहेगा। दादा ठाकुर उसका विरोध नहीं कर पाएंगे।"

"चलो ये तो अब आने वाला समय ही बताएगा कि क्या होता है?" गौरी शंकर ने कहा____"वैसे वैभव में बदलाव तो हम सबने देखा था। अगर तुम्हारी बातें सच हैं तो यकीनन उसमें आए इस बदलाव की वजह यकीनन वो लड़की ही होगी। इंसान के अंदर जब किसी के लिए कोमल भावनाएं पैदा हो जाती हैं तो यकीनन उसमें आश्चर्यजनक रूप से बदलाव आ जाता है। ख़ैर छोड़ो इस बात को, थोड़ा आराम कर लो उसके बाद हमें खेतों में भी जाना है।"

उसके बाद सब अपने अपने काम में लग गए। गौरी शंकर और रूपचंद्र अपने अपने कमरे में आराम करने के लिए चले गए। वहीं दूसरी तरफ ये सब बातें सुन कर रूपा के दिल पर मानों बिजली ही गिर गई थी। आंखों में आसूं लिए वो अपने कमरे की तरफ भागते हुए गई थी।

✮✮✮✮

शाम को जब मैं हवेली आया तो देखा पिता जी वापस आ गए थे। बैठक में उनके साथ दूसरे गांव के कुछ ठाकुर लोग बैठे हुए थे जिन्हें मैंने नमस्कार किया और फिर पिता जी के पूछने पर मैंने बताया कि खेतों की जुताई का काम शुरू है। उसके बाद मैं अंदर की तरफ आ गया।

मां और भाभी अंदर बरामदे में ही बैठी हुईं थी। मैं दिन भर का थका हुआ था इस लिए बदन टूट सा रहा था। सबसे पहले मैं गुशलखाने में गया और ठंडे पानी से रगड़ रगड़ कर नहाया तो थोड़ा सुकून मिला। नहा धो कर और कपड़े पहन कर मैं वापस नीचे मां के पास आ कर एक कुर्सी में बैठ गया। भाभी ने मुझे चाय ला कर दी।

"तुझे इस तरह से अपना काम करते देख मुझे बहुत अच्छा लग रहा है।" मां ने मेरी तरफ देखते हुए कहा____"पिछले कुछ दिनों से कुछ ज़्यादा ही मेहनत कर रहा है मेरा बेटा। थक जाता होगा न?"

"ऐसे काम कभी किए नहीं थे मां।" मैंने चाय का एक घूंट पीने के बाद कहा____"इस लिए थोड़ी मुश्किल तो होगी ही। जब हर काम समझ में आ जाएगा तो फिर सब ठीक हो जाएगा। वैसे भी शुरू शुरू में तो हर काम मुश्किल ही लगता है।"

"हां ये तो है।" मां ने कहा____"अच्छा तू चाय पी के अपने कमरे में जा। मैं तेरी मालिश करने के लिए किसी नौकरानी को भेजती हूं। शरीर की बढ़िया से मालिश हो जाएगी तो तेरी थकावट भी दूर हो जाएगी और तुझे आराम भी मिलेगा।"

मां के द्वारा मालिश की बात सुन मैं मन ही मन चौंका। ऐसा इस लिए क्योंकि मेरे कमरे में किसी भी नौकरानी का जाना वर्जित था। इसका कारण यही था कि शुरू शुरू में मैं हवेली की कई नौकरानियों को अपनी हवस का शिकार बना चुका था। ख़ैर मां की इस बात से सहसा मैंने भाभी की तरफ देखा तो उन्हें अपनी तरफ घूरते पाया। ये देख मैं एकदम से असहज हो गया और साथ ही समझ भी गया कि वो मुझे क्यों घूरे जा रहीं थी।

"नहीं मां।" फिर मैंने जल्दी से कहा____"मैं इतना भी थका हुआ नहीं हूं कि मुझे मालिश करवानी पड़े। आप बेफ़िक्र रहें मैं एकदम ठीक हूं।"

कहने के साथ ही मैंने भाभी की तरफ देखा तो वो मेरी बात सुन कर हल्के से मुस्कुरा उठीं। मैंने उनसे नज़र हटा कर मां की तरफ देखा।

"मैं मां हूं तेरी।" मां ने दृढ़ता से कहा____"तुझसे ज़्यादा तुझे जानती हूं मैं। मुझे पता है कि काम कर कर के मेरे बेटे का बदन टूट रहा होगा। इस लिए तुझे मालिश करवानी ही होगी।"

अजीब दुविधा में फंस गया था मैं। मां की बात सुन कर मैंने एक बार फिर से भाभी की तरफ देखा तो इस बार उनकी मुस्कान गहरी हो गई। मुझे समझ न आया कि वो मुस्कुरा क्यों रहीं थी?

"आप सही कह रही हैं मां जी।" फिर भाभी ने मां से कहा____"इतने दिनों से वैभव लगातार मेहनत कर रहे हैं इस लिए ज़रूर थक गए होंगे। अगर मालिश हो जाएगी तो शरीर को भी आराम मिलेगा और मन को भी।"

भाभी की ये बात सुन कर मैंने उन्हें हैरानी से देखा तो वो फिर से मुस्कुरा उठीं। मेरी हालत अजीब सी हो गई। तभी मां ने कहा____"देखा, तुझसे ज़्यादा तो मेरी बेटी को एहसास है तेरी हालत का। अब कोई बहाना नहीं बनाएगा तू। चाय पी कर सीधा अपने कमरे में जा। मैं किसी नौकरानी को भेजती हूं मालिश के लिए। सरसो के तेल में लहसुन डाल कर वो उस तेल को गरम कर लेगी उसके बाद जब वो उस कुनकुने तेल से तेरी मालिश करेगी तो झट से आराम मिल जाएगा तुझे।"

"अ...आप बेकार में ही परेशान हो रहीं हैं मां।" मैंने ये सोच कर मना करने की कोशिश की कि अगर मैंने ऐसा न किया तो कहीं भाभी ये न सोच बैठें कि मैं तो चाहता ही यही हूं। उधर मेरी बात सुन कर मां ने मुझे आंखें दिखाई तो भाभी फिर से मुस्कुरा उठीं।

"मैं तेल गरम कर देती हूं मां जी।" भाभी ने कुर्सी से उठते हुए कहा और फिर वो रसोई की तरफ चली गईं।

इधर मेरी धडकनें अनायास ही बढ़ गईं थी। मां ने खेतों में काम के बारे में कुछ सवाल किए जिन्हें मैंने बताया और फिर मैं चाय ख़त्म कर के अपने कमरे की तरफ चल पड़ा। मैं ये सोच कर भी हैरान था कि जब मां को भी मेरे बारे में सब पता है तो फिर उन्होंने मेरी मालिश के लिए किसी नौकरानी को मेरे कमरे में भेजने की बात क्यों कही? उधर भाभी जो पहले इस बात से मुझे घूर रहीं थी वो भी अब मेरी अजीब सी दशा पर मुस्कुराने लगीं थी। ऊपर से मेरी मालिश के लिए खुद भी मां से बात की और तो और तेल भी गरम करने चली गईं। मेरा दिमाग़ एकदम से ही अंतरिक्ष में परवाज़ करने लगा था।
 
अध्याय - 86
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इधर मेरी धडकनें अनायास ही बढ़ गईं थी। मां ने खेतों में काम के बारे में कुछ सवाल किए जिन्हें मैंने बताया और फिर मैं चाय ख़त्म कर के अपने कमरे की तरफ चल पड़ा। मैं ये सोच कर भी हैरान था कि जब मां को भी मेरे बारे में सब पता है तो फिर उन्होंने मेरी मालिश के लिए किसी नौकरानी को मेरे कमरे में भेजने की बात क्यों कही? उधर भाभी जो पहले इस बात से मुझे घूर रहीं थी वो भी अब मेरी अजीब सी दशा पर मुस्कुराने लगीं थी। ऊपर से मेरी मालिश के लिए खुद भी मां से बात की और तो और तेल भी गरम करने चली गईं। मेरा दिमाग़ एकदम से ही अंतरिक्ष में परवाज़ करने लगा था।


अब आगे....


मैं अपने कमरे में पलंग पर बैठा सोचो में गुम ही था कि तभी कमरे में भाभी ने प्रवेश किया। उन्हें अपने कमरे में आया देख मैं चौंका। असल में मैं ये सोच के चौंका था कि क्या वो खुद मेरी मालिश करने आई हैं? उनके हाथ में तेल की कटोरी देख मुझे मेरी सोच सच होती प्रतीत हुई। उधर वो कटोरी लिए पलंग के पास आईं और फिर उस कटोरी को लकड़ी के एक स्टूल पर रख दिया।

"भ...भाभी आप यहां?" मैं परेशान सा हो कर पूछ ही बैठा____"वो भी कटोरी में तेल ले कर? क्या मां ने मेरी मालिश करने के लिए आपको भेजा है? नहीं नहीं, ऐसा वो कैसे कर सकती हैं? उन्होंने तो कहा था कि वो किसी नौकरानी को भेजेंगी।"

"फ़िक्र मत करो।" भाभी ने हल्के से मुस्कुरा कर कहा____"तुम्हारी मालिश नौकरानी ही करेगी। वो आती ही होगी, मैं तो बस ये तेल गरम कर के लाई हूं। वैसे अगर मैं खुद तुम्हारी मालिश कर दूंगी तो क्या हो जाएगा? मैं भाभी हूं तुम्हारी, इतना तो अपने देवर के लिए कर ही सकती हूं।"

"नहीं नहीं।" मैं झट से बोल पड़ा____"मैं आपसे अपनी मालिश करवाऊं ऐसा तो सपने में भी नहीं सोच सकता मैं।"

"अरे! तो इसमें बुरा ही क्या है?" भाभी ने आंखें फैला कर मेरी तरफ देखा____"क्या एक भाभी अपने देवर की मालिश नहीं कर सकती?"

"दुनिया में कोई भाभी करती होगी पर मैं आपसे अपनी मालिश नहीं करवा सकता।" मैंने स्पष्ट रूप से कहा____"आप मेरी भाभी हैं, मेरी पूज्यनीय हैं। आपके प्रति मेरे मन में बेहद सम्मान की भावना है। आपका स्थान मेरी नज़रों में बहुत ऊंचा है। मैं सपने में भी ये नहीं सोच सकता कि में आपसे मालिश करवाऊं। आप दुबारा ऐसी बात कभी मत कीजिएगा।"

"मेरे प्रति तुम ऐसा सोचते हो ये बहुत अच्छी बात है वैभव।" भाभी ने बड़े स्नेह से कहा____"और सच कहूं तो तुम्हारे मुख से अपने लिए ये सब सुन कर बहुत अच्छा भी लगा है। किंतु मेरे द्वारा मालिश किए जाने से तुम्हें कोई समस्या नहीं होनी चाहिए। मां जी और चाची जी भी तो तुम्हारी मालिश किया करती थीं। वो भी तो तुम्हारी पूज्यनीय थीं? तुम मेरे देवर हो लेकिन उससे भी ज़्यादा तुम मेरे छोटे भाई की तरह हो और एक बहन अपने भाई की मालिश कर सकती है।"

"मैं आपकी बात मानता हूं भाभी।" मैंने बेचैनी से कहा____"लेकिन फिर भी मैं आपसे मालिश नहीं करवा सकता। बात सिर्फ मान सम्मान की ही बस नहीं है बल्कि हालातों की भी है। पहले आप एक सुहागन थीं किंतु अब आप एक विधवा के रूप में हैं। मैं ये हर्गिज़ नहीं चाहता कि किसी को ये पता चले कि हवेली की बहू से नौकरों वाला काम करवाया जाने लगा है। लोग तरह तरह की बातें करने लगेंगे भाभी और मैं तो सपने में भी ये नहीं सोच सकता कि कोई मेरी भाभी के बारे में कुछ भी उल्टा सीधा सोचे। मैं अपने ऊपर हर तरह का दाग़ लगवा सकता हूं मगर आपके दामन पर अपनी वजह से कोई दाग़ नहीं लगने दे सकता। अगर ऐसा हुआ तो समझ लीजिए मैं अपने हाथों से अपनी हस्ती मिटा दूंगा।"

"ख़बरदार वैभव।" भाभी ने एकाएक गुस्से में आ कर कहा____"आइंदा कभी अपनी हस्ती मिटाने की बता मत कहना। अपने पति को खो चुकी हूं मगर अपने उस देवर को नहीं खोना चाहती जो मुझे इतना मान सम्मान देता है और मेरी इज्ज़त की परवाह करता है।"

मैंने देखा भाभी की आंखें छलक पड़ीं थी। मैं फ़ौरन ही पलंग से नीचे उतरा और उनके पास जा कर अपने हाथों से उनके आंसू पोंछे फिर कहा____"आप इस हवेली की सिर्फ इज्ज़त ही नहीं हैं भाभी बल्कि आन बान और शान भी हैं। हम सब बड़े ही खुशनसीब हैं जिन्हें आपके जैसी सभ्य सुशील और संस्कारी बहू मिली है। ईश्वर ने आपके साथ ऐसा कर के बिल्कुल भी अच्छा नहीं किया है। आपको इस हाल में देख कर मेरा कलेजा फटने लगता है भाभी। मेरे बस में ही नहीं है वरना यमराज के पास जा कर भैया को वापस ले आता।"

"तुम खुद को हलकान मत करो वैभव।" भाभी ने जैसे खुद को सम्हाला____"ऊपर वाले ने मुझे दुख ज़रूर दिया है लेकिन उसने मुझे इतना अच्छा परिवार भी तो दिया है। इस परिवार के लोग मुझे अपनी पलकों पर बिठा कर रखते हैं। जिसे इतना प्यार और स्नेह मिलेगा वो भला कैसे दुखी रह सकेगा?"

भाभी की बात पर मैं अभी कुछ बोलने ही वाला था कि तभी दरवाज़े पर हवेली की एक नौकरानी आ कर खड़ी हुई। भाभी ने उसे अंदर बुलाया तो वो अंदर आ गई। वो एक सांवली सी औरत थी जिसकी उम्र यही कोई तीस या पैंतीस के आस पास की थी।

"करुणा, मेरे देवर की अच्छे से मालिश करना तुम।" भाभी ने नौकरानी से कहा____"ताकि इनकी थकान पूरी तरह से दूर हो जाए।"

"आप चिंता मत कीजिए बहू रानी।" करुणा ने कहा____"मैं छोटे कुंवर की बहुत अच्छे से मालिश करूंगी। शिकायत का कोई भी मौका नहीं दूंगी।"

"ठीक है।" भाभी ने एक नज़र मेरी तरफ डालने के बाद उससे कहा____"मैंने तेल को गुनगुना कर के स्टूल में रख दिया है। अब तुम मालिश करना शुरू करो।"

भाभी के कहने पर करुणा ने मेरी तरफ देखा। मैं अभी भी अपने कपड़े पहने खड़ा था। भाभी ने मुझे कपड़े उतारने को कहा तो मैं उनके सामने कपड़े उतारने पर झिझकने लगा। ये देख भाभी हल्के से मुस्कुराई और फिर बोली____"क्या हुआ? कपड़े उतारो ताकि करुणा तुम्हारी मालिश कर सके। जल्दी करो, उसे फिर अपने घर भी वापस जाना है।"

"पर भाभी मैं आपके सामने कैसे अपने कपड़े उतारूं?" मैंने झिझकते हुए कहा____"आप जाइए, मैं करुणा से मालिश करवा लूंगा।"

मेरी बात सुन कर भाभी कुछ पलों तक मुझे देखती रहीं फिर बोली____"ठीक है, मैं जा रही हूं।"

कहने के साथ ही भाभी दरवाज़े की तरफ बढ़ चलीं। जब वो बाहर निकल गईं तो मैंने अपने कपड़े उतारने शुरू कर दिए। दूसरी तरफ करुणा भी अपनी साड़ी के पल्लू को निकाल कर उसे अपनी कमर में बांधने लगी। पल्लू के हटते ही ब्लाउज में कैद उसकी बड़ी बड़ी चूचियां मेरी आंखों के सामने उजागर हो गईं। ये देख मेरे जिस्म में हलचल सी होने लगी। मैंने फ़ौरन ही उस पर से नज़रें हटाई और कपड़े उतार कर पलंग पर पेट के बल लेट गया। मेरे जिस्म में अब सिर्फ कच्छा ही रह गया था।

कुछ ही देर में करुणा कटोरी ले कर पलंग के किनारे पर आ गई। गुनगुना तेल मेरी पीठ में डाल कर उसने दोनों हाथों से मेरी मालिश करनी शुरू कर दी। इसके पहले मेनका चाची ने आख़िरी बार मेरी मालिश की थी। मेरी आंखों के सामने वो दृश्य उजागर हो उठा जब वो मेरी मालिश कर रहीं थी और उनके जिस्म के गुप्तांग को देख कर मेरी हालत ख़राब हो गई थी। ख़ैर तब की बात अलग थी और अब की अलग क्योंकि अब मैंने भाभी से वादा किया था कि अब से कोई ग़लत काम नहीं करूंगा।

मैं ख़ामोशी से लेटा हुआ था और करुणा पूरी ईमानदारी से ज़ोर लगा कर मालिश करने में लगी हुई थी। पीठ के बाद कंधे और फिर पैरों में मालिश की उसने। उसके बाद उसने मुझे सीधा लेटने को कहा तो मैं सीधा हो के लेट गया। इसके पहले मैं पेट के बल लेटा हुआ था इस लिए कोई समस्या नहीं हुई थी किंतु अब सीधा लेटने से मैं असहज महसूस करने लगा। कारण, अब मैं स्पष्ट रूप से करुणा को देख सकता था और मैं जानता था कि जैसे ही मेरी नज़र ब्लाउज से झांकती उसकी चूचियों पर पड़ेगी तो मेरा लिंग सिर उठाने लगेगा। अगर ऐसा हुआ तो करुणा को भी पता चल जाएगा। हालाकि उसका मुझे कोई डर नहीं था किंतु मैं ये भी समझता था कि संभव है कि उसे मां ने अथवा भाभी ने पहले ही ऐसी चीज़ों से सचेत कर दिया हो और ये भी कह दिया हो कि अगर मैं कुछ उल्टा सीधा करने का सोचूं तो वो फ़ौरन ही शोर मचा कर उन्हें ख़बर कर दे। बस यही नहीं चाहता था मैं और इसी बात का डर था मुझे।

अचानक ही मेरे ज़हन में विचार आया कि मैं अपनी आंखें बंद कर लेता हूं। इससे होगा ये कि मैं करुणा की तरफ देखूंगा ही नहीं और जब देखूंगा ही नहीं तो कोई समस्या वाली बात होगी ही नहीं। इस विचार के आते ही मैंने अपनी आंखें बंद कर ली और अपने मन को कहीं और लगाने की कोशिश करने लगा।

आख़िर मैं अपनी कोशिश में कामयाब रहा और करुणा मेरी मालिश कर के मेरे कमरे से चली गई। मैंने राहत की लंबी सांस ली और फिर बेफ़िक्र हो कर उसी अवस्था में लेटा रहा। कुछ ही देर में मेरी आंख लग गई और मैं गहरी नींद में चला गया।

रात में जब खाना खाने का समय हुआ तो भाभी के जगाने पर ही मेरी आंख खुली। मैं हड़बड़ा कर उठा। कमरे में लालटेन जल रही थी जिसके पीले प्रकाश से कमरे में उजाला था। मैंने देखा भाभी पलंग के पास ही खड़ीं थी। अचानक ही मुझे अपनी हालत का एहसास हुआ तो मैंने जल्दी से चादर को अपने ऊपर ओढ़ कर अपनी नग्नता को उनसे छुपाया। मालिश के दौरान मैं सिर्फ कच्छे में था और करुणा के जाने के बाद मैं वैसे ही सो गया था।

"अब कैसा महसूस हो रहा है तुम्हें?" भाभी ने पूछा____"करुणा की मालिश से आराम मिला कि नहीं?"

"हां भाभी, काफी आराम मिला है।" मैंने उनकी तरफ देखते हुए कहा____"उसके जाने के बाद पता ही नहीं चला कब मेरी आंख लग गई और मैं सो गया।"

"चलो ये तो अच्छी बात है।" भाभी ने कहा____"कल फिर से उससे मालिश करवा लेना। इससे तुम्हें और भी आराम मिलेगा।"

"नहीं भाभी।" मैंने कहा____"अब इसकी कोई ज़रूरत नहीं है।"
"ठीक है जैसी तुम्हारी मर्ज़ी।" भाभी ने कहा____"ख़ैर अब जाओ गुसलखाने में नहा लो। खाना बन गया है। पिता जी जल्दी ही खाना खाने के लिए आने वाले हैं।"

भाभी के जाने के बाद मैं पलंग से उतरा और गमछे को लपेट कर नीचे गुशलखाने में चला गया। नहा धो कर और कपड़े पहन कर मैं जल्दी ही नीचे खाना खाने के लिए पहुंच गया। पिता जी अपनी कुर्सी पर पहले से ही बैठे थे, इस लिए मैं भी जा कर एक कुर्सी पर बैठ गया। भाभी ने खाना परोसा तो हम दोनों खाने लगे। खाने के बीच पिता जी ने काम के बारे में थोड़ी बहुत पूछताछ की जिसका जवाब मैंने दिया। मुझे याद आया कि पिता जी कुल गुरु जी से मिलने गए थे। मैं सोचने लगा कि आख़िर वो किस लिए उनसे मिलने गए रहे होंगे? पहले लगा कि उनसे इस बारे में पूछूं फिर अपना इरादा बदल दिया। जल्दी ही हम दोनों खा पी कर फुरसत हो गए और फिर मैं अपने कमरे में चला गया।

✮✮✮✮

अगली सुबह नाश्ता कर के मैं अपनी मोटर साईकिल से खेतों की तरफ जाने के लिए निकल पड़ा। रात में फिर से बारिश हुई थी और अब खेतों में पर्याप्त पानी हो गया था जिससे धान बोने में कोई समस्या नहीं थी। मैं अपनी मोटर साइकिल से जल्दी ही उस जगह पर पहुंचा जहां पिछले दिन मुझे रूपा मिल गई थी। मैंने देखा आज भी वो किसी के साथ चली आ रही थी। उसके साथ में एक औरत थी जिसने सिर पर घूंघट किया हुआ था। मैं समझ गया कि शायद उसकी कोई भाभी होगी। सफ़ेद रंग की साड़ी में यकीनन वो उसकी भाभी ही थी। जैसे ही मैं तिराहे पर पहुंचा तो उसने आवाज़ दे कर मुझे रुकने को कहा तो मुझे मजबूरन रुकना ही पड़ा। उसके आवाज़ देने पर उसके साथ आ रही औरत ने झट से उसकी तरफ गर्दन घुमा कर देखा था। इधर मेरी भी धड़कनें बढ़ गईं थी।

"प्रणाम भाभी।" वो दोनों जैसे ही मेरे पास पहुंचीं तो मैंने रूपा के साथ आई उसकी भाभी को देख कर कहा।

मेरे प्रणाम करने पर उसने मुझसे कुछ न कहा। मैं समझ सकता था कि इस वक्त मेरे प्रति उसके मन में कैसे विचार होंगे। वो रूपा की सगी भाभी थी। यानी रूपचंद्र के बड़े भाई मानिकचंद्र की बीवी नीलम। मानिकचंद्र का अभी डेढ़ साल पहले ही ब्याह हुआ था। कोई औलाद नहीं हुई थी और इतने कम समय में ही वो विधवा हो गई थी। उसे देख मुझे अपनी भाभी का ख़याल आ गया। मेरी भाभी का ब्याह हुए तो कुछ साल हो भी गए थे किंतु नीलम का ब्याह हुए अभी डेढ़ साल ही हुआ था। मानिकचंद्र यूं तो इतना भी बुरा नहीं था किंतु जिन बच्चों को उनके मां बाप ने बचपन से ही ये सिखाया पढ़ाया हो कि हम उनके दुश्मन हैं उनकी फितरत भला अच्छी कैसे हो सकती थी? बहरहाल मर्दों की वजह से घर की औरतों का जीवन बर्बाद हो चुका था।

"रूपा चलो यहां से।" नीलम ने अपनी ननद रूपा से बड़ी कठोरता से कहा____"मां जी ने मना किया था न तुम्हें कि तुम इस लड़के से अब कोई ताल्लुक़ नहीं रखोगी?"

"भाभी जी ठीक कह रहीं हैं रूपा।" मैंने कहा____"तुम्हें मुझ जैसे लड़के से कोई ताल्लुक़ नहीं रखना चाहिए। अपने घर वालों का कहना मानो और उनकी मान मर्यादा का ख़याल रखो।"

"और मेरा क्या?" रूपा एकाएक दुखी भाव से बोल पड़ी____"मेरा क्या वैभव? तुम अच्छी तरह जानते हो कि मैंने तुम्हें बहुत पहले ही अपना सब कुछ मान लिया था फिर क्यों मुझे ग़ैर समझ कर ठुकरा देना चाहते हो? क्या तुम्हें ज़रा भी मेरे प्रेम का एहसास नहीं है? क्या तुम्हें ज़रा सा भी नहीं लगता कि जिस लड़की ने अपना सब कुछ तुम्हें सौंप दिया है उसका भी अपना कोई हक़ है?"

"रूपा ये तुम क्या बकवास कर रही हो?" नीलम ने गुस्से से रूपा को देखा____"चुपचाप चलो यहां से वरना ठीक नहीं होगा।"

"मुझे किसी की परवाह नहीं है भाभी।" रूपा की आंखें छलक पड़ीं____"अगर घर वाले मुझे जान से ही मार देना चाहते हैं तो मार दें। मैं तो वैसे भी वैभव के बिना जीने की कल्पना नहीं कर सकती।"

रूपा की बातें सुन कर मैं एक बार फिर से चिंता और परेशानी में घिर गया। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि आख़िर मैं क्या करूं उसके लिए? मैं अच्छी तरह जानता था कि जो वो चाहती है वो उसके घर वाले कभी मंज़ूर नहीं करेंगे और मैं ऐसा कोई काम करना ही नहीं चाहता था जिससे कि कोई नया तमाशा खड़ा हो जाए।

"ऐसा क्या है उस लड़की में जो मुझ में तुम्हें नहीं मिला वैभव?" रूपा की इस बात से मैं चौंका____"तुम एक बार बता दो कि मुझमें वो चीज़ नहीं है जो उस लड़की में है तो यकीन मानो इसी वक्त तुमसे अपने प्रेम की दुहाई देना बंद कर दूंगी।"

"क...किस लड़की की बात कर रही हो तुम?" मैंने धड़कते दिल से उसकी तरफ देखा।

"अंजान बनने का दिखावा मत करो वैभव।" रूपा ने आहत भाव से कहा____"मुझे अच्छी तरह पता है कि तुम्हारे दिल में किस लड़की के लिए प्रेम है। वो दूसरे गांव के किसी मुरारी नाम के आदमी की लड़की है ना? तुम उसी से प्रेम करते हो न?"

रूपा की बातें सुन कर मैं कुछ न बोल सका। आश्चर्य से आंखें फाड़े देखता रह गया उसे। पलक झपकते ही दिलो दिमाग़ में विस्फोट से होने लगे थे। मैं ये सोच कर चकित हो गया था कि उसे अनुराधा के बारे में कैसे पता है?

"तुम्हारी ख़ामोशी बता रही है कि तुम सच में उसी लड़की से प्रेम करते हो।" मुझे कुछ न बोलता देख रूपा ने दुखी भाव से कहा____"ज़रूर उस लड़की में कोई ऐसी बात होगी जो मुझमें नहीं है। तभी तो तुम मेरे प्रेम को स्वीकार नहीं कर रहे। तभी तो तुम मुझे अपनी ज़िंदगी का हिस्सा नहीं बनाना चाहते।"

"ए..ऐसी कोई बात नहीं है।" मैंने कमज़ोर सी आवाज़ में कहते हुए उससे नज़रें चुराई।

"कोई बात नहीं वैभव।" रूपा ने कहा____"मैं ही पागल थी जो ये नहीं समझ पाई थी कि प्रेम कभी मांगने से नहीं मिलता बल्कि वो तो किस्मत से मिला करता है। अब जा के समझी हूं कि प्रेम भी कमबख्त उसी से होता है जो किस्मत में नहीं होते मगर तुम चिंता मत करो। तुम्हें तुम्हारा प्रेम ज़रूर मिलेगा वैभव। तुम्हारे लिए देवी मां से दुआ मागूंगी कि वो तुम्हें तुम्हारे प्रेम से मिला दे। मेरी तरह अपने प्रेम में तड़पने वाला तुम्हारा मुकद्दर न बनाए। जाओ वैभव, हमेशा खुश रहो। ईश्वर करे कि तुम्हारा नाम आसमान से भी ऊंचा हो जाए। बस एक ही विनती है कि जीवन के किसी मोड़ पर अगर मेरा कभी ख़याल आए तो अपने मन में मेरे लिए नफ़रत अथवा घृणा के भाव मत लाना बल्कि थोड़ा सा ही सही लेकिन सम्मान का भाव रख लेना।"

रूपा के आंसू रोके नहीं रुक रहे थे। उसकी भाभी नीलम उसे हैरत से देखे जा रही थी। इधर मैं खुद को बहुत ही छोटा और असहाय सा महसूस करने लगा था। उसका एक एक शब्द जैसे मेरे दिल के पार हुआ जा रहा था। इससे पहले कि मैं कुछ कहता रूपा अपने आंसू पोंछते हुए मेरे बगल से निकल गई। उसके साथ नीलम भी चली गई। मैं ठगा सा दोनों को देखता रह गया। फिर जैसे मुझे होश आया तो मैंने मोटर साइकिल स्टार्ट की और भारी मन से आगे बढ़ चला।

रूपा में कोई ख़राबी नहीं थी। वो जितनी सुंदर थी उतनी ही गुणवान भी थी। साहूकारों के घर की लड़कियां एक से बढ़ कर एक थीं। मैंने आज तक उनमें से किसी के भी बारे में ग़लत अफवाह तक नहीं सुनी थी। ज़ाहिर है ये या तो अच्छे संस्कारों का नतीजा था या फिर वो सब अपने घर के मर्दों से कुछ ज़्यादा ही डरती थीं। रूपा की बात अलग थी। इसे उसकी बदकिस्मती कहें या नियति की कोई साज़िश कि वो मेरे जाल में फंस गई थी। शुरू शुरू में तो ऐसा ही था किंतु बाद में मुझे भी एहसास हुआ कि रूपा उन लड़कियों में से हर्गिज़ नहीं है जिन्हें मैं एक बार स्तेमाल करने के बाद भुला देता था। उसने जब शुरू में मुझे बताया था कि वो मुझसे प्रेम करने लगी है तो मुझे बड़ी हंसी आई थी। उस समय प्रेम जैसी भावनाओं को मैं वाहियात ही समझता था और यही वजह थी कि मुझे उसकी इस बात पर हंसी आई थी। मैंने उसको समझाया था कि वो प्रेम जैसे लफड़े में न पड़े। बहरहाल कुछ समय तक ठीक रहा मगर फिर उसने बार बार इस बात का ज़िक्र करना शुरू कर दिया। मुझे इस बात से गुस्सा आने लगा था। मैंने एक दिन उससे पूछ लिया कि अगर वो सच में मुझसे प्रेम करती है तो मेरे लिए वो क्या कर सकती है? मैंने तो बस मज़ाक में अथवा चिढ़ कर ही ये पूछ लिया था। ख़ैर मेरा ऐसा कहना था कि उसने झट से चाकू द्वारा अपनी कलाई काट कर कहा था____"तुम्हारे लिए बिना सोचे समझे अपनी जान दे सकती हूं।"

उस दिन के बाद से उसके प्रति मेरे जज़्बात बदल गए थे। मुझे उससे प्रेम भले ही नहीं हुआ था लेकिन ये सोच कर उसके लिए एक सम्मान की भावना ज़रूर आ गई थी कि वो मेरे प्रति कितनी संवेदनशील और समर्पित है। उसी समय मैंने उसे यही सब समझाया था कि प्रेम तक तो ठीक है लेकिन अगर वो इससे आगे बढ़ने का सोचेगी तो ये संभव नहीं है क्योंकि ऐसा उसके घर वाले कभी नहीं होने देंगे। वक्त गुज़रा और फिर उसने वो किया जो मेरी कल्पना से भी परे था। वो मेरी जान बचाने के लिए अपने ही परिवार के खिलाफ़ चली गई और भरी पंचायत में मेरी बातों का समर्थन किया। कोई बच्चा भी होगा तो समझ जाएगा कि ये सब उसने अपने प्रेम की वजह से ही किया था।

सच कहूं तो मुझे रूपा के लिए अब काफी सहानुभूति होने लगी थी और दुख भी। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि उसे अनुराधा के बारे में कैसे पता चला होगा लेकिन इस संबंध में उसने जो कुछ कहा था वो मेरे लिए हैरतअगेज था। मैं सोचने पर मजबूर हो गया कि क्या सच में प्रेम ऐसा होता है कि प्रेम करने वाला सिर्फ अपने प्रेमी की ही खुशी के बारे में सोचता है? यहां तक कि अपनी सबसे बड़ी चाहत का भी बलिदान दे देता है?

यही सब सोचते विचारते मैं खेतों पर पहुंच गया। वहां पर भुवन मेरा ही इंतज़ार कर रहा था। उसने बताया कि सारे मजदूर आ चुके हैं और मेरे निर्देशों का इंतज़ार कर रहे हैं। मुझे खेती किसानी का कोई तजुर्बा नहीं था इस लिए मैंने यही कहा कि जैसे अब तक करते आए हो वैसे ही करो। हमारे पास बहुत सी ज़मीनें थीं जिनमें ट्रैक्टर से तो जुताई हो ही रही थी किंतु बैलों को नाथ कर हल से भी जुताई हो रही थी। बहरहाल, मेरे आदेश पर सभी मज़दूर धान की बोआई में लग गए और कुछ रोपा लगाने लगे। खेतों को बढ़िया तरीके से तैयार कर दिया था मजदूरों ने। दोपहर तक मैं उनके साथ ही रहा और उनका हर काम बारीकी से देखता रहा। मैं खुद को बहलाने की कोशिश कर रहा था लेकिन सच तो यही था कि मेरे ज़हन से ना तो रूपा जा रही थी और ना ही अनुराधा।

मेरे अंदर से बार बार आवाज़ आ रही थी कि जिस लड़की ने मेरे लिए इतना कुछ किया है और खुद को पूरी तरह समर्पित कर दिया है उसको मुझे यूं ठुकराना नहीं चाहिए। दोपहर में खाना खाने मैं हवेली आ गया। नहा धो कर मैंने खाना खाया और अपने कमरे में आ कर आराम करने लगा। बार बार आंखों के सामने रूपा का रोता हुआ चेहरा दिखने लगता और कानों में उसकी बातें गूंजने लगतीं। तभी किसी ने दरवाज़े पर दस्तक दी मैं सोचो के भंवर से बाहर आया और फिर जा कर दरवाज़ा खोला।
 
अध्याय - 87
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मेरे अंदर से बार बार आवाज़ आ रही थी कि जिस लड़की ने मेरे लिए इतना कुछ किया है और खुद को पूरी तरह समर्पित कर दिया है उसको मुझे यूं ठुकराना नहीं चाहिए। दोपहर में खाना खाने मैं हवेली आ गया। नहा धो कर मैंने खाना खाया और अपने कमरे में आ कर आराम करने लगा। बार बार आंखों के सामने रूपा का रोता हुआ चेहरा दिखने लगता और कानों में उसकी बातें गूंजने लगतीं। तभी किसी ने दरवाज़े पर दस्तक दी मैं सोचो के भंवर से बाहर आया और फिर जा कर दरवाज़ा खोला।


अब आगे....


दरवाज़े के बाहर भाभी खड़ीं थी। उनके चेहरे पर अजीब से भाव थे। जब वो मुझे अजीब तरह से घूरने लगीं तो मैं मन ही मन चौंका। एकदम से मेरे ज़हन में जाने कैसे कैसे विचार उभरने लगे।

"क्या हुआ भाभी?" मैंने धड़कते दिल से पूछा।

"आख़िर कब बाज आओगे तुम अपनी हरकतों से?" भाभी ने सख़्त भाव से मेरी तरफ देखते हुए कहा____"अगर यही सब करना था तो अच्छा इंसान बनने का मुझसे झूठा वादा क्यों किया था तुमने?"

"य...ये आप क्या कह रही हैं भाभी?" मैं उनकी बात से बुरी तरह चौंका____"मैंने ऐसा क्या कर दिया है जिससे आप मुझे ये सब कह रही हैं?"

"मेरे सामने भोला बनने की कोशिश मत करो वैभव।" भाभी ने गुस्से से कहा____"मुझे लगा था कि जिस तरह से तुम आज कल अपनी ज़िम्मेदारियां निभाने लगे हो और खेतों में मेहनत कर रहे हो उससे यकीनन तुम अब अच्छे इंसान बन गए हो मगर नहीं, मैं ग़लत थी। तुम आज भी वैसे ही हो जैसे हमेशा से थे। तुमने मेरा दिल दुखाया है वैभव और इसके लिए मैं तुम्हें कभी माफ़ नहीं करूंगी।"

मैं भौचक्का सा देखता रह गया भाभी को। सच कहूं तो उनकी बातें सुन कर मेरा सिर ही चकरा गया था। दिमाग़ ने बिल्कुल काम ही करना बंद कर दिया था। मैंने जल्दी से अपने सिर को झटका दिया तो जैसे मेरे होश ठिकाने आए।

"मुझे समझ नहीं आ रहा कि मैंने ऐसा कौन सा गुनाह कर दिया है जिसके लिए आप मुझे ये सब कह रही हैं।" मैंने मजबूती से कहा____"मैं क़सम खा कर कहता हूं भाभी कि मैंने ऐसा कोई भी काम नहीं किया है जो आपकी नज़र में ग़लत हो और ना ही मैंने आपको दिया हुआ अपना वादा तोड़ा है। मेरा यकीन कीजिए भाभी।"

"अगर तुमने सच में ऐसा कुछ भी नहीं किया है।" भाभी ने आहत भाव से कहा____"तो पिता जी के पास गौरी शंकर क्यों आया है तुम्हारी शिकायत करने?"

"क...क्या???" मैं भाभी की बात सुन कर बुरी तरह उछल पड़ा____"ये क्या कह रही हैं आप? गौरी शंकर पिता जी के पास आया है?"

"हां।" भाभी ने कहा____"मुझे नहीं पता कि उसने पिता जी से ऐसा क्या कहा है लेकिन जिस तरह गुस्से में पिता जी ने अंदर आ कर मां जी से तुम्हें बुलाने को कहा है उससे तो यही लगता है कि तुमने ज़रूर गौरी शंकर के साथ अथवा उसकी बहू बेटियों के साथ कुछ ग़लत किया है।"

"ओह! तो ये बात है।" मैं जैसे सब कुछ समझ गया____"मैं सब समझ गया भाभी कि वो पिता जी के पास क्यों आया है। आप फ़िक्र मत कीजिए और हां मेरा यकीन कीजिए मैंने किसी के साथ कोई भी ग़लत काम नहीं किया है। मैंने आपको वचन दिया है तो यकीन मानिए मैं हर कीमत पर आपको दिया हुआ अपना वचन निभाऊंगा।"

मेरी बात सुन कर भाभी के चेहरे पर नज़र आ रहा गुस्सा ठंडा पड़ता नज़र आया। वो अपलक मेरे चेहरे को ही देखे जा रहीं थी। शायद मेरे चेहरे पर मौजूद भावों को समझने की कोशिश कर रहीं थी।

"क्या तुम सच कह रहे हो?" फिर उन्होंने बड़ी मासूमियत से पूछा।
"आपकी क़सम भाभी।" मैंने कहा____"मेरा यकीन कीजिए। मैंने कुछ भी ग़लत नहीं किया है।"

"तो फिर वो गौरी शंकर क्यों आया है पिता जी के पास?" भाभी ने व्याकुलता से पूछा____"और ऐसा क्या कह दिया उसने पिता जी से कि वो इतने गुस्से में तुम्हें बुलाने के लिए मां जी से बोले हैं?"

"अब ये तो उनके पास जा कर ही पता चलेगा भाभी।" मैंने कहा____"हालाकि मुझे थोड़ा बहुत अंदाज़ा हो गया है।"
"कैसा अंदाज़ा?" भाभी के माथे पर शिकन उभर आई।

"पहले पिता जी के पास जाता हूं।" मैंने कहा____"उसके बाद आपको सब कुछ बताऊंगा।"

उसके बाद मैं भाभी के साथ ही कमरे से बाहर आ गया। मेरे मन में तरह तरह की बातें चलने लगीं थी। ख़ैर कुछ ही देर में मैं बैठक में पहुंच गया। मैंने देखा बैठक में पिता जी के अलावा गौरी शंकर और रूपचंद्र अलग अलग कुर्सियों में बैठे हुए थे। मैंने गौरी शंकर को हाथ जोड़ कर प्रणाम किया और फिर पिता जी की तरफ देखा। पिता जी के चेहरे पर बेहद ही सख़्त भाव थे।

"आख़िर कब तुम हमारा कहना मानोगे?" पिता जी ने सख़्त भाव से मुझसे कहा____"हमने तुम्हें समझाया था न कि अब से तुम सिर्फ वही करोगे जो हम कहेंगे, फिर क्यों तुमने ऐसा काम किया जिसके लिए हमें गौरी शंकर के सामने शर्मिंदा होना पड़ा?"

"मैंने अपनी तरफ से ऐसा कुछ भी नहीं किया है पिता जी जिसकी वजह से आपको किसी के सामने शर्मिंदा होना पड़े।" मैंने बेझिझक हो कर कहा____"आपने मुझे जो नसीहतें दी थीं मैं उनका पूरी ईमानदारी से पालन कर रह हूं। मुझे नहीं पता कि गौरी शंकर काका ने आपको मेरे बारे में क्या बताया है जिसके लिए आप ऐसा कह रहे हैं।"

"गौरी शंकर ने हमें बताया है कि तुमने उनकी भतीजी को गांव के बीच रास्ते में रोका और फिर उससे वाहियात बातें की।" पिता जी ने सख़्त नज़रों से मेरी तरफ देखते हुए कहा____"तुमने कल भी इनकी लड़की को रोका था और आज सुबह भी। क्या तुम इस बात से इंकार कर सकते हो?"

"जी बिल्कुल इंकार करता हूं पिता जी।" मैंने गौरी शंकर और रूपचंद्र को बारी बारी से देखते हुए कहा____"मैंने इनकी लड़की को ना तो कल रोका था और ना ही आज। सच तो ये है कि उसने खुद मुझे रोका था।"

"देख रहे हैं ठाकुर साहब।" गौरी शंकर झट से बोल पड़ा____"आपका बेटा मेरी भतीजी के बारे में क्या कह रहा है? क्या आप सोच सकते हैं कि मेरी भतीजी इतनी निर्लज्ज है कि वो गांव के बीच रास्ते में किसी लड़के को रोकेगी?"

"बड़े आश्चर्य की बात है काका कि इतना कुछ हो जाने के बाद भी आपको अपनी ग़लतियों का एहसास नहीं हुआ।" मैंने गौरी शंकर से कहा____"और ना ही इस बात का एहसास है कि सच को किसी भी कीमत पर झुठलाया नहीं जा सकता। ये बात आप भी जानते हैं कि इस संबंध में कौन सच बोल रहा है और कौन झूठ।"

"तुम कहना क्या चाहते हो?" रूपचंद्र बोल पड़ा।

"यही कि आप लोगों ने पिता जी को सच नहीं बताया है।" मैंने स्पष्ट भाव से कहा____"बल्कि खुद को और अपनी भतीजी को पूरी तरह निर्दोष बता कर सिर्फ मुझे ही दोषी ठहराया है। अगर आप लोग यहां पर सच में न्याय मांगने आए हैं तो पहले अपनी भतीजी को भी यहां बुलाइए। उसके बाद ही पता चलेगा कि सच क्या है और न्याय भी तभी हो सकेगा।"

"मतलब अब तुम मेरी भतीजी को बदनाम करना चाहते हो?" गौरी शंकर मुझे घूरते हुए बोला।
"बिल्कुल भी नहीं।" मैंने कहा____"न्याय चार दीवारी के अंदर होगा। बाहर वाले को इस बारे में जब कुछ पता ही नहीं चलेगा तो आपकी भतीजी कैसे बदनाम हो जाएगी भला?"

"ये बहसबाजी छोड़ो।" पिता जी ने सख़्ती से कहा____"और हमें सच सच बताओ कि तुम गौरी शंकर की भतीजी से मिले थे कि नहीं?"

"मैं आपको पूरा किस्सा ही बता देता हूं पिता जी।" मैंने दोनों चाचा भतीजे को बारी बारी से देखने के बाद कहा____"असल में बात ये है कि काका की भतीजी रूपा मुझसे प्रेम करती है और वो चाहती है कि मैं उससे ब्याह करूं। मैं ये नहीं कहता कि रूपा में कोई ख़राबी है या फिर उसमें कोई दोष है। वो यकीनन बहुत अच्छी लड़की है किंतु इस मामले में मैंने उसे पहले ही समझाया था कि उसके घर वाले मेरे जैसे लड़के के साथ उसका ब्याह किसी कीमत पर नहीं करेंगे इस लिए मेरे प्रति प्रेम की भावना को निकाल दे। मेरे लाख समझाने पर भी वो ऐसा नहीं कर सकी। ख़ैर ऐसे ही वक्त गुज़रता रहा। मेरा उससे मिलना भी बंद हो गया था, उसके बाद आपने मुझे गांव से निष्कासित ही कर दिया था। वापस आने के बाद आपको भी पता है कि हम सब किस मामले में फंस गए थे। ऐसे में मैं रूपा से मिला ही नहीं। मुझे नहीं पता था कि आज भी उसके मन में वही सब है या नहीं, जबकि सच यही था कि वो आज भी मेरे प्रति अपने दिल में प्रेम की भावना रखे हुए थी। ये उसी भावना का असर था कि वो अपनी भाभी के साथ उस रात हमारी हवेली में आपसे मिलने आई थी। आप खुद सोचिए पिता जी कि जिस घर का बच्चा बच्चा हमसे नफ़रत या घृणा करता था उस घर की किसी लड़की को हमारे बारे में अच्छा सोचने की क्या ज़रूरत थी? आज जब सारी कहानी का हमें पता चल चुका है तो हमें ये भी समझ आ गया है कि ये सब कैसे हुआ होगा। सवाल उठता है कि रूपा को ये कैसे पता चला था कि कोई मुझे जान से मारने के लिए अगली सुबह चंदनपुर जाने वाला है? अगर गहराई से सोच कर कड़ियों को जोड़ा जाए तो सारी तस्वीर आईने की तरह साफ दिखने लगेगी। मुझे यकीन है कि उस रात रूपा ने अपने घर वालों को कहीं से मुझे जान से मारने की योजना बनाते हुए सुन लिया था, तभी तो वो उसी समय अपनी भाभी के साथ आपसे मिलने यहां हवेली आई थी।"

"हां हमें भी अब ये सारी बातें समझ आ गई हैं।" पिता जी ने सिर हिलाते हुए कहा____"किंतु इस वक्त इन सब बातों का क्या मतलब है अब?"

"इन्हीं सब बातों का ही तो मतलब है पिता जी।" मैंने ज़ोर देते हुए कहा____"इन्हीं सब बातों से तो पता चलता है कि काका की भतीजी ने ऐसा क्यों किया? उसने ऐसा इसी लिए किया क्योंकि वो मुझसे प्रेम करती थी और वो ये कैसे चाह सकती थी कि जिसे वो प्रेम करती है उसकी हत्या हो जाए? उसे उसी रात पता चल गया था कि मुझे जान से मारने की योजना बनाने वाले उसके अपने ही हैं लेकिन मुझे यकीन है कि उसने यहां आ कर आपसे ये नहीं बताया होगा कि वो लोग कौन थे? बताती भी कैसे? इतना आसान नहीं होता अपने ही हाथों अपने ही परिवार को ख़तरे में डाल देना। हां पिता जी, अगर वो उसी समय सब कुछ बता देती तो क्या ये सब हो पाता जो हो चुका है? ख़ैर, इतना कुछ होने के बाद कल जब उसने मुझे देखा तो उसने मुझे आवाज़ दे कर रोका। मैं तो अपनी मोटर साईकिल से खेतों की तरफ जा रहा था मगर उसने जब रोका तो मुझे रुकना ही पड़ा। हालाकि मैं हैरान ज़रूर हुआ था कि इतना कुछ होने के बाद भी वो मुझसे कोई ताल्लुक़ कैसे रख सकती है? बहरहाल मैं इस लिए रुक गया क्योंकि उसी की वजह से आज मैं जीवित हूं। मुझे नई ज़िंदगी दिलाने वाली को मैं कैसे नज़रअंदाज़ कर देता? उसके साथ में उस वक्त इनकी बेटी राधा भी थी। मैं जब रुका तो उसने एक बार फिर से वही सब कहना शुरू कर दिया जो पहले भी कहा करती थी कि मैं उसके प्रेम को स्वीकार कर लूं और उसे अपनी ज़िंदगी का हिस्सा बना लूं। उसकी ये बात सुन कर मैं ये सोच कर हैरान हुआ कि वो इतना कुछ होने के बाद भी मुझसे प्रेम करती है और मेरी बनना चाहती है। उसकी इन बातों पर मैंने एक बार फिर से उसे समझाया कि पहले ऐसा होने की संभावना भी थी किंतु अब तो कोई संभावना ही नहीं है इस लिए उसे इस तरह का पागलपन छोड़ देना चाहिए। यही बात आज सुबह भी हुई। मैं अपनी मोटर साइकिल से खेतों की तरफ जा रहा था और वो नीलम भाभी के साथ कहीं जा रही थी। उसने जब मुझे जाते देखा तो फिर से आवाज़ दे कर मुझे रोक लिया। अब आप ही बताइए कि इसमें मेरी क्या ग़लती है? काका कहते हैं कि मैंने उसे रोका था जबकि सच तो यही है कि उसने ही मुझे रोका था और ये सब कहा था।"

मेरी बातें सुनने के बाद बैठक में सन्नाटा सा छा गया। जहां एक तरफ पिता जी काफी गंभीर नज़र आने लगे थे वहीं दूसरी तरफ गौरी शंकर और रूपचंद्र अजीब से भाव लिए चुप रह गए थे।

"हम ये जानना चाहते हैं कि जिस तरह वो तुमसे प्रेम करती है।" पिता जी ने मेरी तरफ देखा___"तो क्या तुम भी उसी तरह उससे प्रेम करते हो?"

"मैं झूठ नहीं बोलूंगा पिता जी।" मैंने स्पष्ट लहजे में कहा____"सच ये है कि मेरे दिल में उसके प्रति प्रेम जैसी कोई भावना नहीं है लेकिन हां सम्मान और आदर की भावना बहुत ज़्यादा है। उसकी वजह से ही आज मैं जीवित हूं तो उमर भर उसका ऋणी रहूंगा।"

"सिर्फ़ ये कह देने से बात ख़त्म नहीं हो जाती कि तुम जीवन भर उसके ऋणी रहोगे।" पिता जी ने कहा____"अगर तुम सच में समझते हो कि तुम्हारा जीवन उसी का दिया हुआ है और तुम उसके ऋणी हो तो तुम्हें उसके प्रेम को स्वीकार कर के उसे अपनाना होगा। आख़िर वो तुमसे प्रेम करती है। हम उससे मिल चुके हैं और हम जानते हैं कि वो बहुत ही नेक और प्यारी बच्ची है। जिस रात उसने हमें वो ख़बर दी थी तो हम भी उसके एहसानमंद हो गए थे।"

कहने के साथ ही पिता जी ने गौरी शंकर की तरफ देखा और फिर कहा____"गौरी शंकर, हम तुम्हारे पास हमारे संबंधों को फिर से सुधार लेने के उद्देश्य से आए थे। अब जबकि हमें इस बात का भी पता लग गया है तो क्यों न इस रिश्ते को जोड़ कर एक मजबूत संबंधों की शुरुआत कर लें।"

"लेकिन मुझे ये मंज़ूर नहीं है।" गौरी शंकर ने सपाट लहजे में कहा____"मैं ये हर्गिज़ मंजूर नहीं करूंगा कि मेरी भतीजी उस खानदान की बहू बने जिस खानदान के व्यक्ति ने हमारा समूल विनाश कर दिया हो।"

"हमें आश्चर्य हो रहा है कि इस सबके बाद भी तुम सिर्फ हमें ही दोषी मान रहे हो।" पिता जी ने आहत भाव से कहा____"जबकि सच यही है कि शुरुआत तुम लोगों ने ही की थी। हमारी जगह कोई दूसरा होता तो वो भी बदले की भावना में ऐसा ही करता। हां ये हो सकता है कि वो गुस्से में सबकी जान न लेता मगर किसी न किसी की जान तो वो ले ही लेता। गौरी शंकर, हम सब कुछ भुला कर उस दिन भी तुम्हारे पास आए थे और आज भी सब कुछ भुला कर यही कह रहे हैं कि तुम भी सब कुछ भूल जाओ और एक नए सिरे से शुरुआत करो। किसी के जीवन का कोई भरोसा नहीं है कि ऊपर वाला कब किसे अपने पास बुला ले। न तुम्हें दुश्मनी कर के कुछ मिल गया और न ही हमें कुछ मिल गया। बेहतर यही है कि हम दोनों एक नई शुरुआत करें और कुछ इस तरीके से करें कि उसमें दोनों ही परिवार के सदस्यों के बीच सिर्फ प्रेम और सम्मान की ही भावना हो।"

"हमने भी तो आपसे कहा था कि अगर संबंध सुधारना ही है तो अपनी बेटी का ब्याह मेरे भतीजे से कर दीजिए।" गौरी शंकर ने कहा____"मगर मैं जानता हू कि आप ऐसा नहीं करेंगे।"

"अगर कुसुम हमारी बेटी होती तो हम यकीनन उसका ब्याह तुम्हारे भतीजे से कर देते।" पिता जी ने अधीरता से कहा____"किंतु वो हमारे मरहूम भाई की बेटी है। हम भले ही उसे उसके मां बाप से ज़्यादा प्यार और स्नेह करते हैं लेकिन जहां हक़ की बात है तो हमारा पक्ष बेहद ही कमज़ोर है। हां अगर उसकी मां चाहे तो वो कर दे, हमें कोई समस्या नहीं होगी।"

"फिर तो आपका और मेरा एक जैसा ही हाल है ठाकुर साहब।" गौरी शंकर ने कहा____"रूपा भी तो मेरे मरहूम भाई की बेटी है। इस लिए मेरा भी उस पर इस हिसाब से कोई हक़ नहीं है।"

"नहीं गौरी शंकर।" पिता जी ने कहा____"हमारे और तुम्हारे हाल में काफी अंतर है। वो अंतर ये है कि तुम्हारी भतीजी खुद ही चाहती है कि उसका ब्याह वैभव से हो, जबकि हमारी भतीजी के मन में ऐसी कोई बात नहीं है। हमारा ख़याल है कि बेमतलब का हमें तर्क कुतर्क नहीं करना चाहिए। जहां संभावना हो वहां पर रिश्ता जोड़ कर एक नया संबंध बना लेना चाहिए।"

"माफ़ कीजिए ठाकुर साहब लेकिन ये संभव नहीं है।" गौरी शंकर ने कुर्सी से उठते हुए कहा____"अच्छा अब आज्ञा दीजिए।"

"हर माता पिता अपने बच्चों की खुशी ही चाहते हैं गौरी शंकर।" पिता जी ने कहा____"हम तुमसे यही कहेंगे कि अगर तुम्हारी भतीजी की खुशी हमारे बेटे की बन जाने में ही है तो उसे उसकी खुशी दे दो। हमें तो अब ये लगता है कि शायद यही सब सोच कर ऊपर वाले ने उस मासूम बच्ची के दिल में हमारे बेटे के प्रति प्रेम का अंकुर पैदा किया रहा होगा।"

पिता जी की बात का गौरी शंकर ने कोई जवाब नहीं दिया बल्कि पिता जी को प्रणाम करने के बाद वो अपने भतीजे रूपचंद्र के साथ बैठक से बाहर निकल गया। उसके जाने के बाद पिता जी कुछ देर तक जाने क्या सोचते रहे फिर मेरी तरफ देखा।

"हम तुमसे सिर्फ इतना ही चाहते हैं कि तुम बाकी सभी फ़िज़ूल बातों से अपना ध्यान हटा कर सिर्फ अपनी ज़िम्मेदारियों की तरफ ध्यान दो।" पिता जी ने कहा____"अब तुम जा सकते हो।"

पिता जी की बात सुन कर मैंने सिर हिलाया और फिर मैं पलट कर अंदर की तरफ बढ़ चला। अभी मैं कुछ ही क़दम आगे बढ़ा था कि मैंने देखा मां और भाभी दीवार से सट कर खड़ी थीं। मैं समझ गया कि वो दोनों हम सबकी बातें सुन रहीं थी।

मैं अपने कमरे में पहुंचा ही था कि तभी मेरे पीछे भाभी भी आ गईं। उन्हें आया देख मैं थोड़ा असहज हो गया। उधर वो मुझे अजीब तरह से देखे जा रहीं थी।

"तो आपने और मां ने सुन लिया न कि गौरी शंकर क्यों आया था यहां?" मैंने भाभी की तरफ देखते हुए कहा____"और ये भी कि कैसे वो मुझे दोषी ठहरा रहा था?"

"मैं तुमसे सिर्फ एक ही बात जानना चाहती हूं वैभव।" भाभी ने मेरी आंखों में देखते हुए कहा____"क्या तुम रूपा से ब्याह करना चाहते हो?"

"ये कैसा सवाल है भाभी?" मैंने कहा____"आप भी जानती हैं कि उसके घर वाले उसका ब्याह मुझसे किसी भी कीमत पर नहीं करेंगे।"

"वो करेंगे कि नहीं ये बाद की बात है।" भाभी ने कहा____"तुम बताओ कि क्या तुम उससे ब्याह कर सकते हो?"

"अगर उसके एहसानों का कर्ज़ उससे ब्याह कर के ही चुकाया जा सकता है तो बेशक मैं उससे ब्याह कर लूंगा।" मैंने कहा____"वैसे भी पिता जी भी तो यही चाहते हैं। इस लिए अब उनकी बात मानने के सिवा मेरे पास कोई दूसरा रास्ता नहीं है।"

"मतलब अगर तुम्हारे पास कोई दूसरा रास्ता होता तो तुम उस लड़की से ब्याह नहीं करते?" भाभी ने आंखें सिकोड़ते हुए पूछा।

"बिल्कुल।" मैंने स्पष्ट भाव से कहा____"जिस लड़की से मैं प्रेम ही नहीं करता उससे ब्याह क्यों करूंगा? हां ये ज़रूर है कि मैं उसका बेहद सम्मान करता हूं और उसके प्रेम की कद्र करता हूं लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि मैं उससे ब्याह ही कर लूं।"

"एक बात हमेशा याद रखो वैभव कि इंसान को उसी से ब्याह करना चाहिए जो व्यक्ति उसे दिलो जान से प्रेम करता हो।" भाभी ने कहा____"तुम्हें किसी से प्रेम है ये उतना मायने नहीं रखता। बैठक में तुम्हारी सारी बातें सुनने के बाद मुझे पता चल गया है कि वो लड़की सच में तुम्हें बहुत चाहती है। तुम खुद मानते हो कि ये उसकी चाहत ही थी जिसके चलते उसने अपने प्रेमी के लिए क्या क्या नहीं कर डाला। ऐसी लड़की को ठुकरा देना सबसे बड़ी मूर्खता होगी। उसके साथ अन्याय करना होगा,।"

"तो आप चाहती हैं कि मैं उस लड़की से ब्याह करूं?" मैंने हैरानी से उनकी तरफ देखा तो भाभी ने मेरे क़रीब आ कर कहा____"बिल्कुल। जिसने अपना सब कुछ अपने प्रेमी को सौंप दिया हो उसका सबसे बड़ा सम्मान यही होगा कि उसे हमेशा के लिए अपना बना लिया जाए। मुझे तो खुशी हो रही है कि कोई लड़की तुम्हें इस हद तक चाहती है कि वो तुम्हारे लिए कुछ भी कर सकती है। उस दिन पंचायत में मैंने देखा था उसे किंतु तब मैं ये नहीं जानती थी कि तुम दोनों के बीच का असल सच क्या है। सच कहूं तो मेरा मन उसे देखने को कर रहा है। क्या तुम मुझे मिलवाओगे उससे?"

"ये आप क्या कह रही हैं भाभी?" मैं हैरान परेशान सा बोल पड़ा____"आप जानती हैं कि उसके घर वाले ऐसा कुछ भी नहीं चाहते हैं। आप बेकार में ही उसके लिए इतना अधीर हो रही हैं।"

"कुछ भी कहो लेकिन मुझे तो मिलना है उससे।" भाभी ने मुस्कुराते हुए कहा____"मैं उस लड़की को देखना चाहती हूं जिसने मेरे देवर की जान बचाने का सबसे महान काम किया है। काश! ऊपर वाला साहूकारों की बुद्धि को ठीक कर दे ताकि वो खुशी खुशी अपनी लड़की का ब्याह तुमसे कर दें। मुझे भी एक प्यारी सी देवरानी मिल जाएगी। वो कहने के लिए मेरी देवरानी होगी मगर मैं उसे अपनी छोटी बहन की तरह प्यार और स्नेह दूंगी।"

"हे भगवान!" मैं चकित भाव से कह उठा____"पता नहीं आप क्या क्या सोचे जा रहीं हैं। अपने आपको सम्हालिये भाभी, ये सब महज ख़्वाब हैं जो पूरे नहीं हो सकते।"

"अरे! ज़रूर पूरे होंगे वैभव।" भाभी ने दृढ़ता से कहा____"पिता जी को भी ये रिश्ता मंज़ूर है और उन्होंने कह भी दिया है इस लिए देखना एक दिन ज़रूर वो लड़की इस हवेली में मेरी देवरानी बन के आएगी।"

"क्या आप ये मानती हैं कि मुझमें पहले की अपेक्षा काफी बदलाव आया है?" मैंने भाभी की तरफ देखते हुए पूछा तो उन्होंने मुस्कुराते हुए झट से कहा____"ज़ाहिर है उसी लड़की की वजह से।"

"नहीं भाभी।" मैंने इंकार में सिर हिला कर कहा____"उसकी वजह से मुझमें रत्ती भर भी बदलाव नहीं आया था कभी।"

"ये क्या कह रहे हो तुम?" भाभी ने हैरत से देखा मुझे____"फिर किसकी वजह से बदलाव आया है तुममें?"

"मैं ये दिल से मानता हूं कि रूपा ने अपने प्रेम के चलते मेरे लिए बहुत बड़ा काम किया है जिसके लिए मैं जीवन भर उसका एहसानमंद रहूंगा।" मैंने कहा____"लेकिन मुझे मुकम्मल रूप से बदल देने वाली कोई और है भाभी।"

"क्या????" भाभी बुरी तरह उछल पड़ीं।

"यही सच है भाभी।" मैंने उन्हें सब कुछ बता देने का इरादा कर लिया था इस लिए बोला____"मेरी नज़र में उसकी रूपा से भी ज़्यादा अहमियत है क्योंकि उसने मेरे चरित्र को बदल कर मुझे एक नया रूप ही दे दिया है। इंसान को चाहे हज़ारों बार नया जीवन मिल जाए लेकिन अगर उसका चरित्र निम्न दर्जे का ही रहे तो कोई मतलब का नहीं रहता उसका जीवन।"

"कौंन है वो लड़की?" भाभी ने अजीब भाव से मेरी तरफ देखा____"जिसने तुम्हारे चरित्र को बदल कर तुम्हारा कायाकल्प कर दिया है?"

"वो एक मामूली से किसान की बेटी है।" मैंने धड़कते दिल से उन्हें बताया____"उसी मामूली से किसान की बेटी जिसकी हत्या कर दी गई थी और उसकी हत्या का इल्ज़ाम मुझ पर लगाया गया था। ये तब की बात है जब मैं इस गांव से निष्कासित किए जाने पर यहां से दूर अपनी बंज़र ज़मीन पर रहता था।"

मेरी बात सुन कर भाभी मुझे आश्चर्य से देखने लगीं। उनके चेहरे पर कई तरह के भाव आते जाते नज़र आए। इधर मेरी धड़कनें ये सोच कर तेज़ हो गईं थी कि जाने भाभी क्या कहेंगी अब?

"उस मामूली से किसान की लड़की ने आख़िर तुम्हारे चरित्र को कैसे बदल दिया?" भाभी को जैसे यकीन नहीं हुआ____"मैं उसके बारे में सब कुछ जानने को उत्सुक हूं। मुझे बताओ कि उसका क्या किस्सा है?"

मैंने भाभी को अनुराधा के बारे में वो सब कुछ बताया जो मेरे और उसके बीच हुआ था और वर्तमान में भी जो कुछ हो रहा है। मैंने उन्हें ये नहीं बताया कि उसके पहले मैंने उसकी मां के साथ नाजायज़ संबंध भी बना लिए थे।

"बड़ी दिलचस्प कहानी है ये तो।" सारी बातें सुनने के बाद भाभी ने गहरी सांस ले कर कहा____"यानि ये कहा जाए तो ग़लत न होगा कि पिता जी के द्वारा निष्कासित किया जाना काफी फ़ायदेमंद रहा। तुम्हारी मुलाक़ात एक ऐसी लड़की से हुई जो दिखने में भले ही एक आम लड़की थी लेकिन इसके बावजूद उसमें कुछ ऐसा था कि तुम उसके साथ ग़लत न कर सके। मैं तो ये सोच सोच के ही हैरान हूं कि तुम उस लड़की की वजह से बदल गए। ख़ैर तो अब उसके बारे में क्या ख़याल है तुम्हारा? क्या तुम उससे ब्याह करना चाहते हो?"

"ब्याह करना तो फिलहाल बाद की बात है भाभी।" मैंने कहा____"अभी तो मैं ये समझने की कोशिश कर रहा हूं कि आज के वक्त में क्या सचमुच उसके दिल में मेरे प्रति प्रेम पैदा हो चुका है?"

"तुम्हारी बातें सुनने के बाद तो मुझे यही लगता है कि वो तुम्हें बहुत ज़्यादा प्रेम करने लगी है।" भाभी ने कहा____"ये प्रेम ही तो है कि वो तुम्हें देखने के लिए हर रोज़ उस मकान तक आती है। ये प्रेम ही तो है कि तेज़ बारिश में भी वो भीगती है और तुमसे वो सब कहती है। अब सवाल ये है कि क्या तुम भी उसी के जैसे उससे प्रेम करते हो या फिर उसके प्रति सिर्फ आकर्षित हो तुम?"

"नहीं भाभी।" मैंने स्पष्ट रूप से कहा____"ये सिर्फ आकर्षण नहीं है। इतने समय में इतना तो मैं भी खुद के बारे में समझ गया हूं कि मैं भी उससे प्रेम करता हूं। उसे तकलीफ़ होती है तो मुझे भी तकलीफ़ होती है। शायद यही प्रेम है।"

"चलो मुझे तो इसी बात की खुशी है कि वैभव जैसे इंसान को प्रेम का एहसास तो हुआ।" भाभी ने जैसे मुझे छेड़ते हुए कहा____"तुम्हें पता तो चल गया कि प्रेम किसे कहते हैं? शुक्र है ऊपर वाले का जो उसने तुम्हें ऐसी लड़की से मिला दिया जिसने तुम्हें बदल भी दिया और प्रेम का पाठ भी सिखा दिया।"

"अभी पूरी तरह कहां सीखा हूं भाभी?" मैंने गहरी सांस ले कर कहा____"अभी तो प्रेम की डगर में खड़ा ही हुआ हूं। डगर में चलना तो अभी बाकी ही है। अभी तो मुझे ये देखना और समझना है कि प्रेम की इस डगर में क्या क्या देखना और सहना पड़ेगा मुझे?"

"ये तो तुमने सही कहा।" भाभी ने कुछ सोचते हुए कहा____"उस लड़की के साथ प्रेम का सफ़र करना तुम्हारे लिए आसान नहीं होगा क्योंकि अगर पिता जी को इसका पता चला तो संभव है कि वो उस लड़की से तुम्हारे इस प्रेम प्रसंग पर नाराज़ हो जाएं और तुम्हें उसको भुला देने के लिए कह दें। कहने का मतलब ये कि सचमुच प्रेम की इस डगर पर तुम्हें बहुत कुछ सहना पड़ सकता है।"

भाभी की इन बातों ने मुझे एकाएक चिंता में डाल दिया। वो मुझे आराम करने का बोल कर चली गईं जबकि मैं पलंग पर लेटने के बाद गहरी सोच में डूब गया।
 
अध्याय - 88
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"ये तो तुमने सही कहा।" भाभी ने कुछ सोचते हुए कहा____"उस लड़की के साथ प्रेम का सफ़र करना तुम्हारे लिए आसान नहीं होगा क्योंकि अगर पिता जी को इसका पता चला तो संभव है कि वो उस लड़की से तुम्हारे इस प्रेम प्रसंग पर नाराज़ हो जाएं और तुम्हें उसको भुला देने के लिए कह दें। कहने का मतलब ये कि सचमुच प्रेम की इस डगर पर तुम्हें बहुत कुछ सहना पड़ सकता है।"

भाभी की इन बातों ने मुझे एकाएक चिंता में डाल दिया। वो मुझे आराम करने का बोल कर चली गईं जबकि मैं पलंग पर लेटने के बाद गहरी सोच में डूब गया।


अब आगे....



"क्या हुआ?" चंद्रकांत अपने बेटे रघुवीर को बाहर से मुस्कुराते हुए आते देखा तो पूछ बैठा____"किस बात से इतना खुश हो जो इतना मुस्कुरा रहे हो तुम?"

"लगता है मेरी लगाई हुई आग भड़कने वाली है बापू।" रघुवीर ने खुशी के आवेश में मुस्कुराते हुए कहा____"ऐसा प्रतीत होता है जैसे जल्द ही दादा ठाकुर और गौरी शंकर के बीच कलह शुरू होने वाली है।"

"ऐसा किस आधार पर कह रहे हो तुम?" चंद्रकांत अपने बेटे की बात से मन ही मन चौंक पड़ा था।

"मेरे एक ख़ास आदमी ने अभी अभी आ कर मुझे बताया है कि गौरी शंकर अपने भतीजे रूपचंद्र के साथ हवेली गया था।" रघुवीर ने कहा____"और वापस आते समय दोनों ही चाचा भतीजे गुस्से में नज़र आ रहे थे। ज़ाहिर है हवेली में दादा ठाकुर से उनकी कोई तो ऐसी बात ज़रूर हुई है जिसके चलते वो दोनों गुस्से में वहां से लौटे हैं।"

"यानि गौरी शंकर दादा ठाकुर के पास वैभव की शिकायत ले कर गया था।" चंद्रकांत ने सोचने वाले अंदाज़ में कहा____"हवेली में यकीनन दादा ठाकुर ने उसकी शिकायत को सिरे से ख़ारिज़ कर दिया होगा तभी तो दोनों चाचा भतीजे गुस्से में आए वहां से। हमारे लिए ये जानना ज़रूरी है कि दादा ठाकुर और गौरी शंकर के बीच इस संबंध में क्या बातें हुईं हैं?"

"मेरा ख़याल है कि तुम्हें एक बार फिर गौरी शंकर से मिलना चाहिए बापू।" रघुवीर ने जैसे राय दी____"और उसी से किसी तरह इस बारे में जान लेना चाहिए। अगर ये लगे कि दोनों पक्षों के बीच मामला तनातनी का बन चुका है तो फ़ौरन ही आग में घी डालने का काम कर देना।"

"सही कह रहे हो तुम।" चंद्रकांत ने सिर हिलाते हुए कहा____"हमें अपने लिए ढाल के रूप में गौरी शंकर का साथ हर कीमत पर चाहिए। भले ही उनका समूल विनाश कर दिया है दादा ठाकुर ने लेकिन अभी भी साहूकार इतने समर्थ हैं कि वो दादा ठाकुर से भिड़ सकते हैं।"

"बात तो तुम्हारी ठीक है बापू।" रघुवीर ने कहा____"लेकिन जाने क्यों मुझे ऐसा लग रहा है कि गौरी शंकर अब हमें अपने साथ नहीं मिलाएगा। हालाकि मैंने उसे दादा ठाकुर के खिलाफ़ भड़काने का समान तो तरीके से जुटा दिया है लेकिन मुझे लगता है कि अपनी ये लड़ाई वो खुद ही अकेले लड़ना चाहेगा।"

"असल में दादा ठाकुर ने जिस तरह से उसके अपनों का नर संघार किया है उससे वो पूरी तरह से ख़ौफ खा गया है।" चंद्रकांत ने कहा____"उसमें अब इतना जल्दी दादा ठाकुर के खिलाफ़ जाने का साहस नहीं हो सकता। ख़ैर, देखते हैं क्या होता है। मैं आज ही उससे मिलूंगा और उससे जानने की कोशिश करूंगा कि उसकी दादा ठाकुर से इस सिलसिले में क्या बातें हुईं हैं? अगर सच में दादा ठाकुर से उसकी तनातनी हुई है तो मेरी कोशिश यही रहेगी कि उसे मैं फिर से अपने साथ मिला लूं।"

"और अगर वो फिर भी हमारे साथ न मिला तो?" रघुवीर ने जैसे संदेह ज़ाहिर किया____"तब हम क्या करेंगे बापू? तब तो हमें अकेले ही दादा ठाकुर के उस सपोले का किस्सा ख़त्म करने के बारे में सोचने पड़ेगा।"

"फ़िक्र मत करो बेटा।" चंद्रकांत ने कठोरता से कहा____"गौरी शंकर अगर साथ में न भी मिला तब भी हम उस नामुराद वैभव का किस्सा ख़त्म करेंगे।"

"वो कैसे बापू?" रघुवीर ने उत्सुकता से पूछा।

"मेरे दिमाग़ में एक ज़बरदस्त योजना ने जन्म लिया है।" चंद्रकांत ने कहा____"वो ऐसी योजना है कि वैभव बच नहीं सकेगा और उसका बाप अपने बेटे को बचा भी नहीं पाएगा। यूं समझो कि वैभव नाम के कुकर्मी का जीवन एक झटके में समाप्त हो जाएगा और फिर वो हमेशा के लिए एक इतिहास बन के रह जाएगा।"

"अगर ऐसी बात है तो फिर हमें गौरी शंकर के साथ की क्या ज़रूरत है बापू?" रघुवीर ने आवेश में आ कर कहा____"हम जल्द से जल्द उस हरामजादे का किस्सा ही ख़त्म कर देते हैं।"

"नहीं बेटे, ये काम ज़ल्दबाज़ी में तो हर्गिज़ नहीं होगा।" चंद्रकांत ने जैसे उसे समझाते हुए कहा____"क्योंकि ज़ल्दबाज़ी में किया गया कोई भी काम अक्सर बिगड़ जाता है और मुसीबत का सबब बन जाता है। ये सच है कि मेरी योजना के अनुसार वैभव का किस्सा ख़त्म हो जाएगा लेकिन उससे पहले मैं ये चाहता हूं कि अगर गौरी शंकर का साथ मिल जाए तो अच्छा हो जाए। ऐसा इस लिए क्योंकि इससे बाद में हम सारा दोष उसके ऊपर ही मढ़ सकते हैं। गौरी शंकर की भतीजी और वैभव का मामला एक तरह से इस बात का सबूत रहेगा कि उसने इसी बात के चलते वैभव को मार डाला। इधर हम निर्दोष हो कर बच जाएंगे।"

"ओह! तो इस लिए तुम गौरी शंकर को अपने साथ मिला लेने पर इतना ज़ोर दे रहे हो?" रघुवीर जैसे सब कुछ समझ गया था____"वाकई में तुम्हारी ये योजना तो ज़बरदस्त है बापू।"

चंद्रकांत अपने बेटे द्वारा की गई इस तारीफ़ से अपनी बुद्धिमानी पर गर्व महसूस किया। उसके मन में कई तरह के विचार आ जा रहे थे।

"हम एक महत्वपूर्ण बात तो भूल ही रहे हैं बापू।" गहरे विचारों में खोया चंद्रकांत अपने बेटे की इस बात को सुन कर चौंका, बोला____"कौन सी बात?"

"उस दिन पंचायत में दादा ठाकुर हम लोगों से किसी सफ़ेदपोश के बारे में पूछ रहा था।" रघुवीर ने अजीब भाव से अपने पिता की तरफ देखते हुए कहा____"और उसने ये भी बताया था कि उस सफ़ेदपोश व्यक्ति ने कई बार वैभव को जान से मारने का प्रयास किया था।"

"हां हां याद आया मुझे।" चंद्रकांत ये सोच कर खुद पर हैरान हुआ कि वो इतनी बड़ी बात कैसे भूल गया था?

"तुम्हें क्या लगता है बापू?" रघुवीर ने कहा____"क्या सच में ऐसा कोई सफ़ेदपोश व्यक्ति है जो दादा ठाकुर के बताए अनुसार वैभव को कई बार जान से मारने की कोशिश की होगी? या फिर ये दादा ठाकुर की कोई चाल है? मेरा मतलब है कि अपने पक्ष को किसी तरह से दीन हीन दिखाने की उसकी ये चाल थी?"

"हो भी सकता है बेटे कि ये सब उसकी चाल ही हो।" चंद्रकांत ने सोचने वाले अंदाज़ से कहा____"लेकिन मुझे नहीं लगता है कि दादा ठाकुर इस तरह की कोई चाल चल के पंचायत में खुद को दीन हीन दर्शाने की कोशिश करेगा।"

"यानि तुम मानते हो कि सफ़ेदपोश की बात सच है?" रघुवीर ने कहा____"और उसने कई बार वैभव को जान से मारने की कोशिश की होगी?"

"इस बात को न मानने का कोई मतलब ही नहीं है बेटे।" चंद्रकांत ने अपने शब्दों पर ज़ोर देते हुए कहा____"वैभव जैसे कुकर्मी लड़के के कई सारे ऐसे दुश्मन हो सकते हैं जो उसकी जान लेना चाहते होंगे।"

"फिर तो हमें वैभव को ख़त्म करने की ज़रूरत ही नहीं है बापू।" रघुवीर ने कहा____"कथित सफ़ेदपोश खुद ही उसे जान से मार देगा। हर बार तो उस हरामजादे की किस्मत अच्छी नहीं हो सकती ना। किसी न किसी दिन तो वो सफ़ेदपोश के हाथ लग ही जाएगा और फिर निश्चय ही वो अपनी जान से जाएगा। इस लिए हमें वैभव को मारने का इरादा त्याग देना चाहिए। इससे हम पर बाद में कोई बात भी नहीं आएगी।"

"नहीं बेटे।" चंद्रकांत ने दृढ़ता से कहा____"उस नामुराद को तो हम अपने हाथों से ही ख़त्म करेंगे। तभी हमारे अंदर की आग ठंडी होगी। तुम चिंता मत करो, मेरी योजना ऐसी है कि हम वैभव का किस्सा भी ख़त्म कर देंगे और उसका कोई इल्ज़ाम भी हम पर नहीं आएगा।"

"ठीक है बापू।" रघुवीर ने कहा____"अगर हम पर कोई इल्ज़ाम ही नहीं आने वाला तो इससे अच्छा कुछ है ही नहीं। मैं भी उसे अपने हाथों से ही मौत देना चाहता हूं।"

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साहूकारों के घर में सबके सामने गहन विचार विमर्श चल रहा था। गौरी शंकर और रूपचंद्र ने सभी को संक्षेप में वो किस्सा सुना दिया था जो हवेली में दादा ठाकुर के बीच हुआ था। सारी बातें सुन कर सभी सोच में पड़ गए थे। तभी शिव शंकर की सबसे छोटी बेटी स्नेहा सबके पास आई और फिर उसने गौरी शंकर से कहा कि दादा जी बुला रहे हैं। स्नेहा की बात सुन कर गौरी शंकर फ़ौरन ही अपने पिता चंद्रमणि के कमरे की तरफ बढ़ गया। उसके पीछे रूपचंद्र और बाकी औरतें भी बढ़ चलीं। कुछ ही देर में गौरी शंकर और रूपचंद्र उस कमरे में पहुंच गए जिस कमरे में चंद्रमणि पलंग पर लेटे हुए थे। वो वृद्ध हो चुके थे और चल फिर नहीं सकते थे।

"आपने मुझे बुलाया पिता जी?" गौरी शंकर अपने पिता के पास ही पलंग के किनारे पर बैठते हुए उनसे बोला।

"आख़िर कब अपनी मनमानियां करना बंद करोगे तुम लोग?" चंद्रमणि ने अपनी कमज़ोर सी आवाज़ में खांसने के बाद कहा____"क्या चाहते हो कि तुम्हारे घर की औरतें और बहू बेटियां सब अनाथ और बेसहारा हो जाएं?"

"ये आप क्या कह रहे हैं पिता जी?" गौरी शंकर ने हैरानी से कहा____"हम भला ऐसा क्यों चाहेंगे?"

"तुम लोगों ने अपनी मनमानी के चलते अपने भाइयों को और अपने बच्चों को खो दिया।" चंद्रमणि ने कहा____"अब मेरा भी गला दबा दो ताकि जल्दी से मर जाऊं। मुझे तुम लोगों ने वैसे ही मरा हुआ समझ रखा है इस लिए गला दबा दो मेरा।"

"पिता जी ये कैसी बातें कर रहे हैं आप?" गौरी शंकर झट से बोला____"आप ये कैसे सोच सकते हैं कि हम सबने आपको मरा हुआ समझ लिया है?"

"तुम लोगों ने जो किया है उससे बहुत तकलीफ़ हुई है मुझे।" चंद्रमणि ने आहत भाव से कहा____"मेरे घर के इतने सारे लोग मर गए और तुम लोगों ने मुझे एक बार उनकी शकल तक नहीं दिखाई। जब से मैंने ये बिस्तर पकड़ा है तबसे मैं तुम लोगों के लिए मरा हुआ ही तो हूं। विधाता ने मुझे इतना बड़ा परिवार दिया था लेकिन सब ख़त्म हो गया। इतना कुछ होने के बाद भी मेरी जान नहीं गई। पता नहीं अभी और क्या क्या देखना सुनना बाकी है मुझे।"

"माफ़ कर दीजिए पिता जी लेकिन हमने आपको उन सबकी शकल इसी लिए नहीं दिखाई थी ताकि आपको उन्हें देख कर तकलीफ़ न हो।" गौरी शंकर ने कहा____"बाकी हमने जो किया वो तो आप भी चाहते थे। हां ये ज़रूर है कि हमने जिस तरह से सब कुछ सोचा था उस तरीके से नहीं हुआ।"

"यही तो विडंबना है गौरी।" चंद्रमणि ने कहा____"इंसान जो सोचता है अथवा जो चाहता है वैसा कुछ भी नहीं हुआ करता। होता तो वही है जो इंसानों के लिए ऊपर वाले ने सोचा होता है। मेरे दिल में हवेली वालों से नफ़रत ज़रूर थी लेकिन मैंने उसी दिन अपने अंदर से उस नफ़रत को निकाल दिया था जिस दिन सूर्य प्रताप का बेटा प्रताप सिंह मेरे पास अपने बाप के किए गए गुनाह की माफ़ी मांगने आया था। गुनाह तो उसके बाप सूर्य प्रताप सिंह ने किया था और उसे ईश्वर ने खुद ही सज़ा दे दी थी। उसके बाद उसके बेटों ने कभी किसी के साथ ग़लत नहीं किया। वर्षों तक जब मैंने ये जाना सुना तो मेरे दिल से बदले की भावना खुद ही चली गई। मैंने मणि शंकर को भी क‌ई बार समझाया था कि अब वो उन लोगों से बदला लेने का ख़याल अपने दिल से निकाल दे मगर उसने ऐसा कभी नहीं किया। तुम लोगों ने हमेशा मनमानी की और ये उसी का नतीजा है कि आज मेरा ये भरा पूरा परिवार अनाथ हो गया है। इस घर की औरतें और बहू बेटियां सब तुम लोगों की करनी की वजह से बेसहारा हो गई हैं। क्या अभी भी तुम्हारे मन में प्रताप सिंह से बदला लेने की ही भावना है? क्या अपने ही हाथों अपने परिवार को मिट्टी में मिलाने से तुम्हारा पेट नहीं भरा?"

"माफ़ कर दीजिए पिता जी।" गौरी शंकर ने गंभीर हो कर कहा____"असल में हवेली वालों के प्रति हमारे दिलो दिमाग़ में घृणा और नफ़रत ही इतनी ज़्यादा भरी हुई थी कि उसकी वजह से हमें दूसरा कुछ दिखता ही नहीं था। कहते हैं न कि इंसान को तभी अकल आती है जब उसे ठोकर लगती है। हमने ठोकर के रूप में बहुत बड़ी कीमत चुकाई पिता जी और तब जा कर हमें एहसास हुआ कि हमने वास्तव में क्या किया है और इसके पहले कितना ग़लत कर रहे थे।"

"तो अगर तुम्हें एहसास हो गया है तो अब ऐसा रास्ता चुनो जिससे इस परिवार का भला हो सके।" चंद्रमणि ने कहा____"और साथ ही इस गांव में इज्ज़त के साथ सब लोग जी सको।"

"इतना कुछ हो जाने के बाद अब ये इतना आसान नहीं है पिता जी।" गौरी शंकर ने गहरी सांस ली____"दूर दूर तक के लोगों को पता चल चुका है कि हमने दादा ठाकुर के साथ क्या किया है और उन्होंने हमारे साथ क्या किया है।"

"मानता हूं इस बात को।" चंद्रमणि ने कहा____"लेकिन ऐसा सोच कर बैठे रहने से कुछ हासिल भी नहीं होगा। इस गांव में अगर इज्ज़त सम्मान के साथ रहना है तो कुछ ऐसा करना होगा तुम्हें जिससे कि लोगों के ज़हन से इस परिवार के बारे में पैदा हुई ग़लत धारणाएं दूर हो जाएं और लोग तुम सब पर भरोसा करने लगें।"

"आप कहना क्या चाहते हैं पिता जी?" गौरी शंकर को जैसे समझ न आया था।

"यही कि दादा ठाकुर से माफ़ी मांग कर उनसे अपने बेहतर संबंध बना लो।" चंद्रमणि ने कहा____"तुम भी ये मानते ही होगे कि उनके साथ ग़लत करने की शुरुआत तुम लोगों ने ही की थी। उसके लिए जो भी अंजाम तुम्हें भुगतना पड़ा उसमें भी तुम लोगों की ही ग़लती है। इस लिए खुद जा कर अपने किए की माफ़ी मांगो और उनसे अपने रिश्ते बेहतर बना लो। वो बड़े लोग हैं गौरी, इतना कुछ हो जाने के बाद भी उनकी आन बान और शान में कोई कमी नहीं आएगी। जबकि तुम अगर अपनी ज़िद पर अड़े रहोगे तो हमेशा हमेशा के लिए अकेले ही रह जाओगे और ये भी यकीन करो कि एक दिन ऐसा भी वक्त आएगा जब लोग इस घर के लोगों की तरफ देखना भी पसंद नहीं करेंगे। इसी लिए कहता हूं कि इससे पहले कि ऐसा कोई दिन आए तुम दादा ठाकुर से अपने रिश्ते बेहतर बना कर उनसे घुल मिल जाओ। उनके साथ का बहुत बड़ा असर पड़ेगा। उनके साथ साथ लोग तुम लोगों की भी इज्ज़त करेंगे।"

अपने पिता की बातें सुन कर गौरी शंकर गहरी सोच में पड़ गया। यही हाल बाकी सबका भी था। कमरे में एकदम से सन्नाटा छा गया था। उधर चंद्रमणि कुछ देर तक गौरी शंकर को देखते रहे फिर उन्होंने एक गहरी सांस ली।

"मुझे मेरी नातिन स्नेहा ने कुछ बातें बताई हैं जो अभी वर्तमान में चल रही हैं।" चंद्रमणि ने सन्नाटे को चीरते हुए कहा____"अगर वो सब बातें वाकई में सच हैं तो उन्हीं के आधार पर तुम उनके साथ अपने रिश्ते बेहतर और मजबूत बना सकते हो।"

"क्या मतलब है आपका?" फूलवती सहसा बोल पड़ी____"कहीं आप ये तो नहीं कह रहे हैं कि हम दादा ठाकुर के बेटे से अपनी बेटी रूपा का ब्याह कर दें और एक मजबूत रिश्ता बना लें उनसे?"

"हां बहू, मैं सच में यही कहना चाहता हूं।" चंद्रमणि ने सिर हिलाते हुए कहा____"मैं जानता हूं कि इस वक्त तुम लोगों के दिलो दिमाग़ में इस संबंध के बारे में कैसे कैसे विचार उत्पन्न होते रहते हैं लेकिन मैं यही कहूंगा कि उन विचारों को अपने दिलो दिमाग़ से निकाल दो। इसी में सबका भला है। एक बात हमेशा याद रखो कि अतीत की बातों को ले कर बैठे रहने से ना तो कभी खुश रह पाओगे और ना ही कभी उन्नति कर पाओगे। जो हो गया उसे भूलने की कोशिश करो और उन लोगों की तरफ देखो जिनका भविष्य तुम लोगों के ही द्वारा अच्छा या बुरा बन सकता है।"

"हमने भी तो कल दादा ठाकुर से ऐसा ही संबंध बनाने की बात की थी पिता जी।" फूलवती ने कहा____"हमने उनसे कहा था कि अगर वो अपने भाई की बेटी का ब्याह हमारे बेटे रूपचंद्र से कर दें तो हमारे बीच बेहतर रिश्ता बन जाएगा।"

"तुम्हें ऐसा दुस्साहस नहीं करना चाहिए था बहू।" चंद्रमणि ने कहा____"वो हमसे बड़े लोग हैं और बड़े लोग कभी अपने से छोटे को सिर पर नहीं बिठाते। शुकर मनाओ कि तुम्हारे इस दुस्साहस पर दादा ठाकुर ने तुम पर गुस्सा नहीं किया वरना अनर्थ हो जाता।"

"आप बेकार में ही इतनी चिंता कर रहे हैं पिता जी।" फूलवती ने कहा___"जबकि सच तो ये है कि दादा ठाकुर जब मेरे सामने आया था तो हाथ जोड़ कर मुझसे माफ़ियां मांग रहा था। फिर जब हमने उससे अपनी बेटी का ब्याह हमारे बेटे से करने को कहा तो वो राज़ी भी हो गया।"

"ये क्या कह रही हो तुम बहू?" चंद्रमणि की कमज़ोर आंखें आश्चर्य से फैल गईं।

फूलवती ने कल का सारा किस्सा उन्हें बता दिया जिसे सुन कर चंद्रमणि हैरत के भाव लिए काफी देर तक कुछ न बोल सका था।

"तो तुम उसकी नर्मी और नेकदिली को उसकी दुर्बलता और अपराध बोझ से दबा हुआ समझ बैठी हो?" फिर चंद्रमणि ने कहा____"हैरत की बात है बहू कि तुम ऐसा समझी हो। ख़ैर ये तो उसके विशाल हृदय की बात है कि उसने खुद को तुम लोगों का दोषी माना और वो सब कहा मगर तुम्हें ऐसा नहीं सोचना चाहिए था। इंसान ग़लतियों से सबक लेता है जबकि ऐसा लगता है कि यहां अभी भी तुम लोगों ने कोई सबक सीखा ही नहीं है। एक बार खुद सोचो कि उसे क्या ज़रूरत है भला तुम लोगों से अपने संबंध बेहतर बनाने की? जबकि उसके संबंध तो बड़े बड़े लोगों से हैं जो उसके लिए कुछ भी कर सकते हैं? वो चाह ले तो एक झटके में तुम सबकी ज़िंदगी को नर्क बना सकता है और तुम लोग कुछ नहीं कर पाओगे लेकिन नहीं, उसने इस सबके बाद भी तुम सबकी बेहतरी के बारे में सोचा और खुद आ कर वो सब कहा। तुम लोगों को उसका शुक्र गुज़ार होना चाहिए था। ये उसके विशाल हृदय की ही बात है। वो नहीं चाहता कि उसके गांव के इतने संपन्न साहूकारों का परिवार किसी गर्त में डूब जाए।"

चंद्रमणि की बातों ने एक बार फिर से कमरे में सन्नाटा खींच दिया। पहली बार फूलवती को अपने परिवार की वस्तुस्थिति का एहसास हुआ और साथ ही अपनी ग़लती का भी जो उसने दादा ठाकुर से ब्याह की बातें कर के की थी।

"तो आप ये चाहते हैं कि हम लोग सब कुछ भुला कर उससे संबंध बना लें?" गौरी शंकर ने गहरी सांस ले कर कहा____"और इसके लिए उसके कहे अनुसार हम अपनी बेटी रूपा का ब्याह दादा ठाकुर के बेटे से करने को तैयार हो जाएं?"

"इसी में तुम सबका भला है गौरी।" चंद्रमणि ने कहा____"इस घर की बेटी जब हवेली में बहू बन कर रहेगी तो उसकी एक शान बन जाएगी और उसके साथ साथ तुम सबके भी उस हवेली से गहरे संबंध बन जाएंगे। वो भी ऐसे संबंध जो हमेशा के लिए एक मजबूत रिश्ते में बंधे रहेंगे। उनके साथ साथ लोग तुम लोगों के बारे में भी अच्छा ही सोचने लगेंगे और तुम लोगों की हर जगह पूछ होने लगेगी। इससे बेहतर भला और क्या चाहिए इस परिवार के लिए? क्या ऐसा किसी दूसरे रास्ते से कभी कर पाओगे तुम लोग? तुम लोगों ने जो किया है उसके चलते कोई तुम्हारी बेटियों से ब्याह भी नहीं करेगा। वो सब यही सोचेंगे कि तुम लोग हत्यारे हो तो तुम्हारी बेटियां भी तुम्हारे जैसी ही सोच और मानसिकता वाली होंगी। ऐसे में कौन भला तुम्हारी बेटियों को अपने घर की बहू बनाना चाहेगा? सच तो ये है गौरी कि इस घर की बेटियां जीवन भर कुंवारी ही बैठी रह जाएंगी। इस लिए अगर तुम लोग चाहते हो कि तुम्हारी बेटियों का कहीं घर बस जाए और वो खुश रहें तो अपने दिलो दिमाग़ से दादा ठाकुर के प्रति बैर भाव निकाल दो और उससे ये रिश्ता बना लो। बाकी जैसी तुम लोगों की मर्ज़ी।"

कहने के साथ ही चंद्रमणि ने एक बार सबकी तरफ देखा और फिर दूसरी तरफ को करवट ले ली। गौरी शंकर समझ गया कि उसके पिता को जो कहना था वो कह चुका है। अपने पिता की तरफ देखते हुए उसने गहरी सांस ली और फिर उठ कर कमरे से बाहर आ गया। उसके पीछे बाकी लोग भी आ गए थे।
 
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