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Hindi Sex Kahani - तीन सगी बेटियां

जगदीश राय: ओके
.बेटी.। तुम क्या निचोड़ेगी.पहले से तेरे दीदी ने निचोड लिया है इसे.।

आशा: पापा.बहुत रस बचा है इसमे.अभी दिखाती हु.

और आशा तेज़ी से लंड चूसने लगी। पूरे गले तक लेने लगी। जगदीश राय आँखे बंद किये अपने लंड के दर्द को बर्दाष्त कर रहा था। और देखेते ही देखते जगदीश राय का लंड , १० मिनट के भयंकर चूसाई के बाद ,बिलकुल रॉड की तरह खड़ा हो गया।

टट्टो में बहोत दर्द हो रहा था, पर न जाने क्यू, इस दर्द से लंड पर और प्रभाव पड़ रहा था और लंड और कड़क हो चला था। इसके बीच आशा ने गांड में से पूँछ को "फोक" की आवाज से बाहर खीच लिया।

आशा बिना चेतावनी दिए, घूम गयी और सीधे अपनी गांड के छेद में लंड घुसेड दिया। बिना तेल लगाये हुआ गाँड का छेद,में जगदीश राय का दर्दनाक लंड चीरता हुआ घूस गया।

जगदीश राय के आखों से आसूँ निकल गया, पर उसने अपनी चीख़ को रोका।

आशा को भी दर्द हुआ, पर आशा को दर्द से मजा आ रहा था।

आशा : अब दिखाती हु आपके इस लंड को.बहुत चोद रहा था दीदी की चूत को.अब इसका सामना मेरे गांड से है.

जगदीश राय: आह.धीरे बेटी धीरे.

यह कहना मुश्किल हो गया था की कौन मरद और कौन औरत।

आशा एक हाथ से अपने चूत को सहला रही थी और अपनी सूखी गांड लंड पर पटक रही थी। क़रीब चुदाई डेढ़ घन्टे तक चली। आशा 3 बार झड चुकी थी,

जगदीश राय का लंड पूरा लाल हो चूका था। और जो जगदीश राय को डर था वह होने वाला था। उसका लंड झडने के कगार पर था। और झडते वक़्त टट्टो का दर्द वह सह नहीं सकता था।

जगदीश राय: बेटी.रुक.जा.में झडने वाला हु.।मुझे.।दरद.होगा.रुक रुक.।आह.नहीं.आह.ओह।

झगीश राय , इतना ज़ोरो से चीख़ पड़ा के टट्टो-से दर्द का जैसा बम फटा हो। वह पागलो की तरह कापने लगा।। और लंड आशा की गांड के अंदर पिचकारी मारता गया। हर पिचकरी का दर्द एक चीख़ ले आता।

आशा, अपने पापा के ऊपर हंसती जा रही थी। उसे अपने पापा के इस दुर्दशा पर मजा आ रहा था।

जगदीश राय , अभी झड़ना , ख़तम कर ही रहा था की अचानक से दरवाज़ा खूल गया।

दोनो चौक पडे। झडते हुए पापा के ऑंखों के सामने रूम के उजाले में , पतली मैक्सी पहने निशा खड़ी थी।

निशा गुस्से से जगदीश राय और आशा को घूरे जा रही थी।
 
निशा बिना कुछ कहें १० सेकेंड तक दोनों को घूरकर, बिना कुछ कहे अपने कमरे में चली गयी।

जगदीश राय तुरंत लंड बाहर खीच लिया, लंड अभी भी वीर्य उगल रहा था।

जगदीश राय: हे भगवन.निशा सब देख चुकी है.अब खुश हो गयी.मैंने कहाँ था.निकल जा यहाँ से.

आशा , पहले डरी हुई थी पर अब वह मुस्कुरा दी।

आशा: अच्छा हुआ.दीदी ने.सब देख लिया.अब तो मैं यहाँ पूरी रात गुज़ार सकती हुँ।।क्यूं.?

जगदीश राय (धीमे आवाज में, समझाते हुए) : चुप कर.अपने कमरे में चली जा।।

आशा: अच्छा बाबा जाती हूँ.

और वह , फर्श पर से स्कर्ट उठाकर.गांड मटका के चल दी।

जगदीश राय , मन में, निशा को कल किस मुँह से देखे। इस विचार में टेंशन के साथ सोने की कोशिश करने लगा।

अगले दिन सुबह जगदीश राय, बिना किसी से कुछ कहें , जल्द ऑफिस चला गया। वह निशा को फेस नहीं करना चाहता था।

हालांकी वह जानता था की रात को उसे निशा से मुलाकात करनी पडेगी।

अगले तीन दिन तक घर पर सन्नाटा बना रहा। जो भी बात होती वह बस सशा ही करती। निशा अपने पापा से मुह तक नहीं मिला रही थी।

आशा का बरताव ऐसा था जैसे कुछ हुआ ही न हो। पर निशा और आशा भी नहीं बोल रहे थे।

चौथे दिन, जगदीश राय ने फैसला किया की जो भी हो उसे इस उलझन हो सुलझाना पडेगा, नहीं तो उसका परिवार बिखर भी सकता है।

वह सुबह जाने से पहले आशा से कहा।

जगदीश राय: आशा आज स्कूल से सीधे घर आना.एक्स्ट्रा क्लास में मत बैठना।

आशा: क्यों.।आज क्या है.

जगदीश राय (ग़ुस्से से): जो बोला है वह करो.।और ज़बान को लगाम दो.गॉट इट।

आशा, पापा के इस रूप से थोड़ी डर गयी और हामी में सर हिला दी।
 
शाम को जगदीश राय 3 बजे घर पहुँच गया। दरवाज़ा निशा ने खोल दिया। निशा बिना कुछ कहे अंदर को जाने लगी।

जगदीश राय: आशा आ गयी.?

निशा : हाँ आ गई।

जगदीश राय: उसे भी बुलाओ और तुम भी आओ। मुझे कुछ बात करनी है.

निशा: पापा.।इसकी.कोई.

जगदीश राय (भारी आवाज़ में) : जो बोलै है .वह करो.

थोड़ी देर बाद आशा और निशा दोनों ड्राइंग रूम में पापा के सामने खड़े थे।

जगदीश राय: बैठो.पिछले कई दिनों.इस घर में.जो कुछ भी चल रहा था . वह क्यों हुआ .कैसे हुआ.मैं नहीं जानता.

जगदीश राय: और जो भी हुआ है.इसमें सब गलती मेरी है.तुम्हारी कुछ नहीं.

जगदीश राय: इस लिए.आज के बाद.सब कुछ बंद.।तुम दोनों बहने हो.और तुम्हे ज़िन्दगी भर हर वक़्त प्यार से रहना है.

निशा: पर पापा.

जगदीश राय: बीच में मत टोको.।।आज से.जैसे हम थे.।।तुम्हारी मम्मी के वक़्त वैसे ही रहेंगे.समझी.।अब तुम दोनों गले मिलो और यह सब भूल जाओ।

आशा और निशा दोनों अपने पापा के तरफ घूरते रहे और फिर दोनों मुस्कुरा दी।

निशा: पापा.हमने तो कब की सूलह कर दी.और गले भी मिल लिए.और क्या आप के कहने से क्या सब कुछ पहले जैसा हो जायेगा.

जगदीश राय: कोशिश तो कर सकती है।

निशा: नहीं पापा.जो भी हुआ है.सही या गलत मैं नहीं जानती.लेकिन.हालात के अनुसार हुआ है.आप और मैं या आप और आशा दोनों हालात के चँगुल मैं फस गये। अब इससे पीछे जाना मुमकिन नही।

जगदीश राय: तुम बोलना क्या चाहती हो।

निशा: यहि की गलती मेरी है.मुझे आप दोनों के प्यार और खेल को देखकर ग़ुस्सा नहीं करना चाहिए था। आशा का भी आप पर उतना ही हक़ है जितना मेरा। और वैसे भी मैं तो सिर्फ आपको खुश देखना चाहती थी। और वही ख़ुशी आपको आशा दे उसमे कोई बुराई नही।

जगदीश राय का मुह खुला ही रह गया।

जगदीश राय:क्या.तुम.

निशा: हाँ पापा.आजसे आप की मर्ज़ी.माँ की कमी पूरी करने के लिए आपकी दोनों बेटियां तैयार है।।क्योंकि आप हमारे प्यारे पापा है.

जगदीश राय को यकीन नहीं हो रहा था की क्या सुन रहा है।

निशा: तो ठीक है.क्या अब मैं आपके लिए चाय बना लाऊँ.की किसी को और कुछ बातें करनी है।

आशा जो अब तक चुप थी, बोल पडी।

आशा (शरारती ढंग से): क्या चाय से पहले.मैं और पापा एक राउंड खेल खेलकर आये.?

निशा: चुपकर.बेशरम.

आशा: नही दीदी।.।तीन दिन हो चुके अब.।अब सहा नहीं जाता।।।

निशा: मारूंगी अभी मैं तुझे.जा ऊपर होमवर्क कम्पलीट कर.।पापा इससे तो आप पूरा हफ्ता अपने कमरे से बाहर रखना.

आशा: पापा.आप दीदी की बात मत सुनना।

जगदीश राय को कुछ समझ नहीं आ रहा था की वह क्या बोले।

जगदीश राय: तुम दोनों मेरी प्यारी बेटी हो।

आशा ने निशा को ठेंगा दिखाकर , ऊपर कमरे की तरफ भाग गयी। निशा भी हँस दी।

और 3 दिनों के बाद आज जगदीश राय बेहद खुश था। वह सोफ़े पर बैठा और पेपर उठा कर पढने लगा।

पर दिमाग पर यह सवाल था की आज किसकी बारी होनी चाहिये।
 
जगदीश राय कुछ देर ऐसे ही खामोश रहता हैं फिर गहरे विचार के बाद वो निशा के बिल्कुल करीब आता हैं. वैसे जगदीश राय मंझा हुआ खिलाड़ी था. इसकी दो वजह थी एक तो उसका हथियार काफ़ी दमदार था और दूसरा वो बहुत सैयम से काम लेता था. किसी भी परिस्थिति में वो विचलित नही होता था.

और पिछलों कुछ दिनों में आशा की कुँवारी गांड मारकर उसका मनोबल और भी बढ़ चूका था।
इस लिए उसे पूरा विश्वास था कि वो हर हाल में बाज़ी ज़रूर जीत जाएगा. हालाकी निशा की रगों में भी उसका ही खून था मगर निशा इन सब मामलों में एक्सपर्ट नहीं थी. उसने तो अपनी ज़िंदगी में बस अपने पापा के साथ सेक्स किया था. इस वजह से उसे सेक्स के बारे में ज़्यादा पता नहीं था.

जगदीश राय एक दम धीरे से निशा के पीछे आता हैं और और उसके कंधे पर अपने लब रखकर एक प्यारा सा किस करता हैं और अपने दोनो हाथों को धीरे से बढ़ाकर निशा के दोनो बूब्स को धीरे धीरे मसलना शुरू कर देता हैं. निशा मदहोशी में अपनी आँखें बंद कर लेती हैं और उसके मूह से सिसकारी निकल जाती हैं.

जगदीश राय फिर अपना होंठ निशा के पीठ पर रखकर फिर से उसी अंदाज़ में हौले हौले चाटना शुरू करता हैं. निशा की पैंटी पूरी भीग चुकी थी. वो तो बड़े मुश्किल से अपने आप को संभालने की नाकाम कोशिश कर रही थी.

निशा- पापा बस भी करो मुझे कुछ हो रहा हैं.

जगदीश राय-क्या हो रहा हैं बता ना. क्या तेरी चूत गीली हो गयी हैं. हां शायद यही वजह हैं और इतना कहकर जगदीश राय एक पल में अपना हाथ नीचे लेजा कर निशा की चूत को अपनी मुट्ठी में थाम लेता हैं.निशा के मूह से एक तेज़ सिसकारी निकल पड़ती है. फिर धीरे धीरे वो अपना हाथ निशा की पैंटी के अंदर सरका देता हैं और उसके क्लिट को अपनी उंगली से मसल्ने लगता हैं. निशा एक दम से बेचैन हो जाती हैं और जवाब में वो अपना लिप्स को अपने पापा के लिप्स पर रखकर उसे चूसने लगती हैं.

एक हाथ से जगदीश राय निशा के बूब्स को मसल रहा था और दूसरे हाथों से वो निशा की चूत को सहला रहा था. और निशा उसके लिप्स को चूस रही थी. माहौल पूरा आग लगा देने वाला था. थोड़ी देर में जगदीश राय का हाथ पूरा गीला हो जाता हैं.

निशा- पापा.............. अब बस भी करो मुझसे अब बर्दास्त नही हो रहा. आप शर्त जीत गये.
 
जगदीश राय- अरे मेरी जान तूने इतनी जल्दी कैसे हार मान ली. अभी तो शुरूवात हैं. देखना आगे आगे मैं क्या करता हूँ. इतना बोलकर जगदीश राय अपने दोनो हाथ निशा की पीठ पर रखकर उसकी ब्रा का स्ट्रिप्स को खोल देता हैं और अगले पल निशा झट से अपने गिरते हुए ब्रा को दोनो हाथों से थाम लेती हैं.

जगदीश राय अगले पल निशा के ब्रा को पकड़कर उसके बदन से अलग कर देता हैं और निशा भी कोई विरोध नहीं कर पाती. बस अपनी नज़रें नीची करके अपनी गर्देन झुका लेती हैं. जगदीश राय भी झट से निशा के सामने आता हैं और वो निशा के बूब्स को देखने लगता हैं. फिर वो अपना लिप्स को निशा के निपल्स पर रखकर उसे एक दम हौले हौले चूसने लगता हैं. ना चाहते हुए भी निशा अपने पापा की हरकतों को इनकार नही कर पाती और वो अपना एक हाथ अपने पापा के बालों पर फिराने लगती हैं.

जगदीश राय- निशा तुम्हारे ये दूध कितने मस्त हैं. जी तो करता हैं इन्हें ऐसे ही चूस्ता रहूं.निप्पलो को काट लूँ।

निशा- तो चूसो ना मैने कब मना किया हैं. जब तक आपका मन नहीं भरता आप ऐसे ही इन्हें चूस्ते रहो काटते रहो।

फिर जगदीश राय एक हाथ से उसके निपल को अपनी उंगली में मसल्ने लगता हैं और दूसरी तरफ वो अपना मूह लगाकर निशा के बूब्स पीने लगता हैं. निशा को तो लगता हैं कि अब उसकी जान निकल जाएगी. जगदीश राय सब कुछ एक दम आराम से कर रहा था. उसे किसी भी चीज़ की जल्दी नहीं थी. और वो जानता भी था कि ऐसे कुछ देर में निशा का भी संयम जवाब दे देगा और वो सब कुछ करेगी जो वो चाहता हैं.

करीब 10 मिनिट के बाद आख़िर निशा का सब्र टूट जाता हैं और वो तुरंत अपना हाथ आगे बढ़ाकर जगदीश राय का लंड थाम लेती हैं और उसे अपने नाज़ुक हाथों से मसल्ने लगती हैं. जगदीश राय ये देखकर मुस्कुरा देता हैं और अपना अंडरवेर उतारने लगता हैं और कुछ पल में वो एक दम नंगा उसके सामने हो जाता हैं.

निशा एक टक अपने पापा के लंड को देखने लगती है. निशा को ऐसे देखता पाकर जगदीश राय भी अपना लंड उसके सामने कर देता हैं.
 
जगदीश राय- ऐसे क्या देख रही हैं बेटी ।सिर्फ देखती रहोगी क्या.
राधिका अपना थूक निगलते हुए- पापा आज तो ये और बड़ा हो गया है।

फिर जगदीश राय निशा को बिस्तर पर सीधा लेटा देता हैं और उसकी पैंटी भी सरकाकर उसे पूरा नंगा कर देता हैं. अब निशा की चूत अपने पापा के सामने बे-परदा थी।

फिर जगदीश राय उसकी गर्देन पर अच्छे से अपनी जीभ फिराता हैं और फिर एक हाथ से उसके बूब्स को कस कर मसल्ने लगता हैं और और दूसरी उंगली उसकी चूत पर फिराने लगता हैं. और अपना जीभ से उसके दूसरे निपल्स को चूसने लगता हैं.फिर धीरे धीरे निचे आते हुए अपनी जीभ से निशा की चूत को चूसने लगता है। अब निशा का सब्र जवाब दे देता हैं और वो ना चाहते हुए भी चीख पड़ती हैं.

निशा- बस........ पापा........आज .. मेरी ....जान लोगे.......क्या. मैं....मर .जाउन्गि............आह... और इतना कहते कहते उसकी चूत से उसका पानी निकलना शुरू हो जाता हैं और निशा का ऑर्गॅनिसम हो जाता हैं वो वही एक लाश की तरह अपने पापा की बाहों में पड़ी रहती हैं. उसकी धड़कनें बहुत ज़ोर ज़ोर से चल रही थी. और साँसें भी कंट्रोल के बाहर थी. बड़ी मुश्किल से वो अपनी साँसों को कंट्रोल करती हैं और अपनी आँखें बंद करके अपने पापा के लबों को चूम लेती हैं....

जगदीश राय- बेटी अब तेरी बारी हैं. चल अब तू मेरी प्यास को शांत कर. और इतना बोलकर जगदीश राय अपना लंड निशा के मूह के एकदम करीब रख देता हैं. निशा बड़े गौर से जगदीश राय के लंड को देखने लगती हैं. फिर अपनी जीभ निकालकर धीरे से उसके लंड का सूपड़ा को नीचे से लेकर उपर तक चाटने लगती हैं.जगदीश राय के मूह से सिसकारी निकल पड़ती हैं.

फिर वो निशा के सिर के बालो को खोल देता हैं और अपना हाथ निशा के सिर पर फिराने लगता हैं.निशा धीरे धीरे जगदीश राय के लंड पर अपना जीभ फिराती हैं. अचानक जगदीश राय को ना जाने क्या सुझता हैं वो तुरंत निशा के मूह से अपना लंड बाहर निकाल लेता हैं. निशा हैरत भरी नज़रों से अपने पापा को देखने लगती हैं. जगदीश राय उठकर किचन में चला जाता हैं और थोड़ी देर के बाद वो एक शहद की शीशी लेकर वापस आता हैं.

शहद की शीशी को देखकर निशा के चेहरे पर मुस्कान तैर जाती हैं. वो भी अपने पापा का मतलब समझ जाती हैं. जगदीश राय फिर शहद की शीशी को खोलता हैं और और उसे अपने लंड पर अच्छे से लगा देता हैं. जगदीश राय का लंड बिल्कुल लाल कलर में दिखाई देने लगता हैं.फिर वो निशा के तरफ बड़े प्यार से देखने लगता हैं. निशा मुस्कुरा कर आगे बढ़ती हैं और अपना मूह खोलकर शहद से लिपटा अपने पापा के लंड को धीरे धीरे चूसना शुरू करती हैं. एक तरफ नमकीन का स्वाद और एक तरफ शहद का स्वाद दोनो का टेस्ट कुल मिलकर बड़ा अद्भुत था. थोड़ी देर के बाद निशा अपने पापा के लंड पर का पूरा शहद चाट कर सॉफ कर देती हैं.
 
जगदीश राय- बेटी एक बार मेरा लंड को पूरा अपने मूह में लेकर चूसो ना. तुझे भी बहुत मज़ा आएगा.

निशा- पापा आपका दिमाग़ तो नहीं खराब हो गया. भला इतना बड़ा लंड पूरा मेरे मूह में कैसे जाएगा. नहीं मैं इसे पूरा अपने मूह में नहीं ले सकती.

जगदीश राय- क्या तू मेरे लिए इतना भी नहीं कर सकती. मैं जानता हूँ बोलने और करने में बहुत फरक होता हैं. ठीक हैं मैं तुझसे ज़बरदस्ती नहीं करूँगा. आगे तेरी मर्ज़ी. और जगदीश राय के चेहरे पर मायूसी छा जाती हैं.

अपने पापा को ऐसे मायूस देखकर निशा तुरंत अपना इरादा बदल लेती हैं.

निशा- क्यों नाराज़ होते हो पापा. मेरा कहने का ये मतलब नहीं था. मैं तो बस......................अच्छा फिर ठीक हैं अगर आपकी खुशी इसी में हैं तो मैं अब आपको किसी भी बात के लिए मना नहीं करूँगी. कर लो जो आपका दिल करता हैं.आज मैं साबित कर दूँगी कि निशा जो बोलती हैं वो करती भी हैं.

जगदीश राय भी मुस्कुरा देता हैं और निशा के बूब्स को पूरी ताक़त से मसल देता हैं. निशा के मूह से एक तेज़ सिसकारी निकल जाती हैं.

जगदीश राय- मैं तो यही चाहता हूँ कि तू खुशी खुशी मेरा लंड पूरा अपने मूह में लेकर चूसे. मैं यकीन से कहता हूँ कि तुझे भी बहुत मज़ा आएगा. हां शुरू में थोड़ी तकलीफ़ होगी फिर तू भी आसानी से इसे पूरा अपने मूह में ले लेगी.

निशा- जैसा आपका हुकुम सरकार.. मगर मुझे तकलीफ़ होगी तो क्या आपको अच्छा लगेगा. बोलो......................

जगदीश राय-अगर चुदाई में तकलीफ़ ना हो तो मज़ा कैसा. पहले दर्द तो होता ही हैं फिर मज़ा भी बहुत आता हैं. बस तू मेरा पूरा साथ दो। फिर देखना ये सारा दर्द मज़ा में बदल जाएगा.

जगदीश राय फिर शहद अपनी उंगली में लेता हैं और अपने टिट्स पर मलने लगता हैं और फिर अपने लंड के आखरी छोर पर भी पूरा शहद लगा देता हैं.

जगदीश राय निशा को बेड पर लेटा देता हैं और उसकी गर्देन को बिस्तेर के नीचे झुका देता हैं. निशा को जब समझ आता हैं तो उसके रोंगटे खड़े हो जाते हैं. वो तो सोच रही थी कि वो अपनी मर्ज़ी से पूरा लंड धीरे धीरे अपने मूह में ले लेगी मगर यहाँ तो उसकी मर्ज़ी नहीं बल्कि वो तो खुद अपने पापा के रहमो करम पर थी. मगर वो अपने पापा की ख़ुशी के लिए उसे सब मंजूर था.
 
जगदीश राय भी निशा के मूह के पास अपना लंड रख देता हैं और फिर निशा की ओर देखने लगता हैं. निशा भी अपनी आँखों से उसे लंड अंदर डालने का इशारा करती हैं. जगदीश राय निशा के सिर को पकड़कर धीरे धीरे अपने लंड पर प्रेशर डालने लगता हैं और निशा भी अपना मूह पूरा खोल देती हैं. धीरे धीरे उसका लंड निशा के मूह के अंदर जाने लगता हैं.जगदीश राय करीब 5 इंच तक निशा के मूह में लंड पेल देता हैं और फिर उसके मूह में अपना लंड आगे पीछे करके चोदने लगता हैं.

निशा की गरम साँसें उसको पल पल पागल कर रही थी. वो धीरे धीरे अपनी रफ़्तार बढ़ाने लगता हैं और साथ साथ अपना लंड भी अंदर पेलने लगता हैं. निशा की हालत धीरे धीरे खराब होनी शुरू हो जाती हैं. वैसे ये निशा का फर्स्ट एक्सपीरियेन्स था. वो अपने पापा का लंड कई बार चूसी थी पर कभी अपने मूह में पूरा नही ली थी. इसलिए तकलीफ़ होना लाजमी था. जगदीश राय करीब 7 इंच तक निशा के मूह में लंड डाल देता हैं और निशा की साँसें उखाड़ने लगती हैं.

जगदीश राय एक टक निशा को देखता हैं और फिर अपना लंड पूरा बाहर निकाल कर एक झटके में पूरा अंदर पेल देता हैं. लंड करीब 8 इंच से भी ज़्यादा निशा के मूह में चला जाता हैं. निशा को तो ऐसा लगता हैं कि अभी उसका गला फट जाएगा. उसकी आँखों से भी आँसू निकल पड़ते हैं और आँखें भी बाहर की ओर आ जाती हैं.तकलीफ़ तो उसे बहुत हो रही थी मगर वो अपने पापा की खुशी के लिए सारी तकलीफो को घुट घुट कर पी रही थी. निशा को कुछ राहत मिलती हैं मगर जगदीश राय कहाँ रुकने वाला था वो फिर एक झटके से अपना लंड बाहर निकालकर फिर से उतनी ही स्पीड से वो निशा के मूह में पूरा लंड पेल देता हैं.

इस बार जगदीश राय अपना पूरा लंड निशा के हलक तक पहुँचने में सफल हो गया था.निशा के आँसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे. उसे तो ऐसा लग रहा था कि उसका दम घुट जाएगा और वो वही मर जाएगी.निशा ऐसे ही करीब 10 सेकेंड्स तक निशा के हलक में अपना लंड फँसाए रखता हैं. निशा के मूह से गु.......गु.......गू............. की लगातार दर्द भरी आवाज़ें निकल रही थी. जब उसकी बर्दास्त की सीमा बाहर हो गयी तो अपना दोनो हाथों से अपने पापा के पैरों पर मारने लगती हैं जगदीश राय को भी तुरंत आभास होता हैं और वो एक झटके से अपना पूरा लंड निशा के हलक से बाहर निकाल देता हैं. निशा वही ज़ोर ज़ोर से खांसने लगती हैं वो वही धम्म से बिस्तर पर पसर जाती हैं.
 
जगदीश राय के लंड से एक थूक की लकीर निशा के मूह तक जुड़ी हुई थी. ऐसा लग रहा था कि उसके लंड से कोई धागा निशा के मूह तक बाँध दिया हो. वो घूर कर एक नज़र अपने पापा को देखती हैं.

निशा- ये क्या पापा भला कोई ऐसे भी सेक्स करता हैं क्या. आज तो लग रहा था कि आप मुझे मार ही डालोगे. मुझे कितनी तकलीफ़ हो रही थी आपको क्या मालूम. देखो ना अभी तक मेरा मूह भी दर्द कर रहा हैं.

जगदीश राय- तू जानती नहीं हैं निशा बेटी मेरा एक सपना था कि मैं किसी भी लड़की के मूह में अपना पूरा लंड पेलने का. मगर आज तूने मेरा सपना पूरा कर दिया. ना जाने मैं कितनी लड़कियों के साथ सेक्स किया हूँ मगर उनमें से किसी ने भी मेरे लंड अपने मूह में पूरा नहीं लिया. आख़िर अपना खून अपना ही होता हैं.

निशा:अब तो आप खुश हो ना।

जगदीश राय: हां बेटी।अच्छा तुम मुझे गिफ्ट देनेवाली थी ना।क्या है वो तेरी स्पेशल गिफ्ट।
निशा:मुस्कुराकर।आप गेस करके बताइए।आपकी इस समय सबसे बड़ी इच्छा क्या है मैं वो पूरी करुँगी।वही आपका स्पेशल गिफ्ट होगा।

जगदीश राय- मेरा तो इस समय सबसे ज़्यादा मन तेरी गाण्ड मारने को कर रहा हैं. अगर तू मुझे इसकी इजाज़त दे तो.................

निशा:चलो पापा आज रात आपको अपनी गांड आपको गिफ्ट में दिया।आप जैसे चाहो मेरी गांड मार लो।

जगदीश राय झट से निशा को अपनी बाहों में ले लेता हैं और उसका लब चूम लेता हैं.
जगदीश राय- तू सच में बहुत बिंदास है बेटी। मैने आज तक तेरे जैसे लड़की नहीं देखी. सच में तेरा पति बहुत किस्मत वाला होगा.

निशा- और आप नहीं हो क्या .निशा धीरे से मुस्कुरा देती हैं.
जगदीश राय- सच में तेरी जैसे बेटी पाकर तो मेरा भी नसीब खुल गया. और इतना कहकर वो निशा की गान्ड को कसकर अपने दोनो हाथों से भीच लेता हैं.

जगदीश राय- बेटी मेरा लंड को पूरा खड़ा कर ना. फिर मैं तेरी गांड मारूँगा.करीब 5 मिनिट तक निशा जगदीश राय के लंड को पूरा थूक लगाकर चूसती और चाटती है तब जगदीश राय का का लंड निशा की कुँवारी गांड को फाड़ने के लिए तैयार हो जाता हैं।
जगदीश राय:बेटी पहले तेरी गदराई गांड से तो जी भर के प्यार कर लूँ।
 
जगदीश राय बस देखने लगता है अपनी बेटी के गान्ड की खूबसूरती ...उफफफफ्फ़..क्या नज़ारा था.. भारी भारी गोल गोल उभरे हुए गोरे गोरे चूतड ..जिन्हें अपनी हथेलियों से बड़े ही हल्के से दबाता हुआ अलग करता है ...दरार चौड़ी हो जाती है ..दरार के बीच थोड़ी सी डार्कनेस लिए गान्ड के होल की चारों ओर का गोश्त ... गाँड की सूराख पूरी बंद हुई ... पर चारों ओर का गोश्त एक दम टाइट ..बन्द सूराख इस बात की गवाही दे रहा था कि गान्ड में कोई लंड अंदर नहीं गया है... और पूरी दरार चीकनी और चमकती हुई ... उस ने अपने अंगूठे से गान्ड की दरार को हल्के से दबाया ....अंगूठा उसकी चीकनी गान्ड में फिसलता हुआ उपर की ओर बढ़ता गया।उफ़फ्फ़ इतनी चीकनी और भारी गान्ड जगदीश राय ने आज तक नही देखी....
निशा अपने पापा की हरकतों से मस्त थी..मुस्कुरा रही थी..और अंगूठे के दबाव से सीहर उठी ...उस ने अपनी गान्ड थोड़ी सी उपर उठाते हुए कहा ..
" हां ..हां पापा अच्छे से छू लो , दबा लो देख लो ... तुम्हारे लौडे के लिए सही है ना..? "
" बेटी... बहोत शानदार , जानदार और मालदार है तेरी गान्ड ..उफफफफ्फ़..सही में तुम ने काफ़ी मेहनत की है ....ज़रा चाट लूँ बेटी ? "
यह बात सुन कर निशा और भी मस्ती में आ जाती है ..और अपनी गान्ड और भी उपर उठाते हुए पापा के मुँह पर रखती है ...
" पापा ..पूछते क्यूँ हो....आप की बेटी है ..आप की प्यारी बेटी का गान्ड है..जो जी चाहे करो ना ..चाटो..चूसो खा जाओ ना ....पर लॉडा अंदर ज़रूर पेलना ..."
और अपने पापा के मुँह से गान्ड और भी लगा देती है ..
जगदीश राय उसकी गान्ड नीचे पलंग पर कर देता है , दरार को फिर से अलग करता हुआ अपनी जीभ उसके सूराख पर लगाता है और पूरी दरार की लंबाई चाट जाता है..जीभ को अच्छे से दबाता हुआ .... उफफफफ्फ़ उसकी गान्ड की मदमस्त महक और एक अजीब ही सोंधा सोंधा सा टेस्ट था ...
दो चार बार दरार में जीभ फिराता है ..जीभ के छूने से और जीभ की लार के ठंडे ठंडे टच से निशा सीहर उठ ती है ...और फिर जगदीश राय उसकी गान्ड के गोश्त को अपने होंठों से जाकड़ लेता है और बूरी तरह चूसता है...मानो गान्ड के अंदर का पूरा माल अपने मुँह में लेने को तड़प रहा हो....
निशा मज़े में चीख उठती है " आआआआः....पापा ....उईईई..देखो ना मेरी गान्ड कितनी मस्त है .? अब देर ना करो ..बस पेल दो ना अंदर ..प्लीज्जज्जज्जज्जज्ज ...।

जगदीश राय किचन में जाकर तेल की शीशी लेकर आता हैं.निशा जब अपने पापा के हाथ में तेल की शीशी देखती हैं तो उसकी हालत बिगड़ जाती हैं. उसने तो बोल दिया था कि वो अपने पापा से अपनी गान्ड मरवायेगि मगर इतना मोटा और लंबा लंड को वो अपनी गान्ड में कैसे बर्दास्त कर पाएगी ये उसकी समझ में नहीं आ रहा था. जगदीश राय फिर तेल की शीशी खोलता हैं और थोड़ा सा तेल लेकर निशा की गान्ड के छेद पर गिरा देता हैं और अपनी दोनो उंगली में अच्छे से तेल लगाकर वो उसकी गान्ड में धीरे धीरे ऊँगली पेलना शुरू कर देता हैं. कुछ देर के बाद वो अपनी दोनो उंगली को निशा की गान्ड में डालकर अच्छे से आगे पीछे करने लगता हैं. निशा फिर से गरम होने लगती हैं.
 
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