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मेहता ने अपनी तरफ़ से कोई कसर नहीं छोड़ी। उसने मुझे रिमांड में ले रखा था। परंतु कल के मुकदमे में सबूतों का अभाव रहा। फिर भी मुझे दो माह की सजा हो ही गयी। कुलवन्त को गायब करने के जुर्म में। मेरे लिये यह बड़ी हैरत की बात थी कि मैंने जो जुर्म नहीं किया था उसकी सजा पा रहा था।
जेल में मुझे जो यातनाएँ दी गईं उसे बयान करते हुए तो मेरी रूह काँप जाती है। मोहिनी बेबसी से मेरा तमाशा देखती रहती; और मैं यातनाओं से गुजरता रहता। खुद मेहता जेल में आकर अपने हाथों से मेरा स्वागत करता था। मोहिनी का उसपर कोई बस नहीं चलता था। एक रात जब मैं जेल के नंगे फ़र्श पर अतीत के बारे में सोच रहा था तो मोहिनी ने बड़ी उदासी से कहा।
“कुछ ख्याल है राज, कितने दिन बीत गए ?”
“हाँ मोहिनी! दिन गिनना ही तो रह गया है। तुम यही कहना चाहती हो न कि कल तक हरि आनन्द का जाप पूरा हो जाएगा।” मैंने बुझे हुए स्वर में कहा।
“यही नज़र आता है राज। मगर तुमसे बिछड़ने में मुझे भारी सदमा पहुँचेगा।” मोहिनी ने बिसुरते हुए कहा। “अगर मेरे बस में होता तो आत्महत्या कर लेती लेकिन तुम्हारी जुदाई गँवारा न करती।”
“वक्त का खेल है मोहिनी। हम सब बेबस हैं। भाग्य में यही लिखा हुआ था। पूरा हुआ।”
“राज तुम भाग्यशाली हो। माला रानी तुम्हें मिल जाएगी। जेल से रिहा होने के बाद तुम फिर अपना जहाँ आबाद कर लोगे। पर मैं किससे बात करूँगी। मेरी ज़िंदगी तो केवल उसके लिये है जो मेरा मालिक है। मुझे स्वयं पर कोई अधिकार नहीं। मैं एक कैदी हूँ राज। ऐसी कैदी जो दूसरों के लिये सब कुछ कर सकती है पर अपनी आजादी का सामान नहीं जुटा सकती।”
“मोहिनी, मेरी जान! क्या तुम मेरा एक आखिरी काम कर सकती हो ?” मैंने भावनात्मक स्वर में कहा।
“कहो राज। काश, मैं तुम पर अपना अस्तित्व न्योछावर कर सकती। अगर तुम्हारी मोहिनी के बस में हुआ तो ज़रूर पूरा होगा।”
“मुझे मार डालो मोहिनी। अपने पंजे इतनी जोर से मेरे सिर पर चुभाओ कि हर चीज़ मेरे लिये फताह हो जाए। यह ज़िंदगी तुम्हारे बिना बेकार है।”
“मैं यह नहीं कर सकती। तुम मायूस क्यों होते हो।”
मोहिनी तड़पकर बोली। “तुमने तो बड़ी-बड़ी कठिनाइयों का सामना किया। समय की प्रतिक्षा करो। मुझे विश्वास है तुम अवश्य सफल हो जाओगे।”
वह बातें, वह जुदाई का क्षण। मोहिनी मुझे बच्चों की तरह दिलासा दिलाती रही। मेरी आँखों के पीछे छिपा आँसुओं का सैलाब फुट पड़ा। मेरी मोहिनी जा रही थी। इन दर्दनाक क्षणों का कोई अन्दाजा नहीं लगा सकता था। वह क्षण आ गया जब मोहिनी ने मुझसे आज्ञा माँगी। मुझे अलविदा कहा और फिर मेरे सुरक्षित भविष्य की कामनाएँ करती हुई मेरे सिर से उतर गयी। वह छिपकली, खून की प्यासी, वह मोहिनी, वह आफ़त की पुतली, वह जहरीली चली गयी। एक बार फिर मेरे जीवन में अंधकार फैलाकर चली गयी। और मुझे यूँ लगा जैसे मेरे शरीर से प्राण ही चले गए हों।
मोहिनी की जुदाई का गम मुझसे बर्दाश्त नहीं हुआ। मैंने दिवानों की तरह अपना सिर दिवारों से टकराना शुरू कर दिया। अगर इस जुनून की हालत में जेल का पहरेदार मुझे न पकड़ लेते या उन्हें कुछ देर हो जाती तो यह अंधेरी कोठरी मुझे ऐसे अंधेरे में समेट लेती कि फिर कभी मैं रोशनी में न आ सकता।
जेल के अस्पताल में मुझे होश आया तो मोहिनी की याद ने फिर मुझे पागल बना दिया। मजबूरन डॉक्टरों को मुझे बेहोशी का इंजेक्शन लगाना पड़ा। अस्पताल में मेरी हालत संभलते-संभलते पंद्रह दिन लग गए। इस बीच डॉक्टरों ने कई बार मुझसे मेरे रिश्तेदार के बारे में पूछताछ की। लेकिन मैं हर बार एक सर्द आह भरकर चुप हो जाता। अब किसी से मिलने या किसी को देखने को जी नहीं चाहता था। मैंने उनसे कह दिया कि मैं अकेला हूँ। एक माह बाद मुझे अस्पताल से कोठरी में भेज दिया गया। परन्तु इस बार डॉक्टरों की सिफारिश पर मुझसे अधिक परिश्रम का काम नहीं लिया गया।
जेल में मुझे जो यातनाएँ दी गईं उसे बयान करते हुए तो मेरी रूह काँप जाती है। मोहिनी बेबसी से मेरा तमाशा देखती रहती; और मैं यातनाओं से गुजरता रहता। खुद मेहता जेल में आकर अपने हाथों से मेरा स्वागत करता था। मोहिनी का उसपर कोई बस नहीं चलता था। एक रात जब मैं जेल के नंगे फ़र्श पर अतीत के बारे में सोच रहा था तो मोहिनी ने बड़ी उदासी से कहा।
“कुछ ख्याल है राज, कितने दिन बीत गए ?”
“हाँ मोहिनी! दिन गिनना ही तो रह गया है। तुम यही कहना चाहती हो न कि कल तक हरि आनन्द का जाप पूरा हो जाएगा।” मैंने बुझे हुए स्वर में कहा।
“यही नज़र आता है राज। मगर तुमसे बिछड़ने में मुझे भारी सदमा पहुँचेगा।” मोहिनी ने बिसुरते हुए कहा। “अगर मेरे बस में होता तो आत्महत्या कर लेती लेकिन तुम्हारी जुदाई गँवारा न करती।”
“वक्त का खेल है मोहिनी। हम सब बेबस हैं। भाग्य में यही लिखा हुआ था। पूरा हुआ।”
“राज तुम भाग्यशाली हो। माला रानी तुम्हें मिल जाएगी। जेल से रिहा होने के बाद तुम फिर अपना जहाँ आबाद कर लोगे। पर मैं किससे बात करूँगी। मेरी ज़िंदगी तो केवल उसके लिये है जो मेरा मालिक है। मुझे स्वयं पर कोई अधिकार नहीं। मैं एक कैदी हूँ राज। ऐसी कैदी जो दूसरों के लिये सब कुछ कर सकती है पर अपनी आजादी का सामान नहीं जुटा सकती।”
“मोहिनी, मेरी जान! क्या तुम मेरा एक आखिरी काम कर सकती हो ?” मैंने भावनात्मक स्वर में कहा।
“कहो राज। काश, मैं तुम पर अपना अस्तित्व न्योछावर कर सकती। अगर तुम्हारी मोहिनी के बस में हुआ तो ज़रूर पूरा होगा।”
“मुझे मार डालो मोहिनी। अपने पंजे इतनी जोर से मेरे सिर पर चुभाओ कि हर चीज़ मेरे लिये फताह हो जाए। यह ज़िंदगी तुम्हारे बिना बेकार है।”
“मैं यह नहीं कर सकती। तुम मायूस क्यों होते हो।”
मोहिनी तड़पकर बोली। “तुमने तो बड़ी-बड़ी कठिनाइयों का सामना किया। समय की प्रतिक्षा करो। मुझे विश्वास है तुम अवश्य सफल हो जाओगे।”
वह बातें, वह जुदाई का क्षण। मोहिनी मुझे बच्चों की तरह दिलासा दिलाती रही। मेरी आँखों के पीछे छिपा आँसुओं का सैलाब फुट पड़ा। मेरी मोहिनी जा रही थी। इन दर्दनाक क्षणों का कोई अन्दाजा नहीं लगा सकता था। वह क्षण आ गया जब मोहिनी ने मुझसे आज्ञा माँगी। मुझे अलविदा कहा और फिर मेरे सुरक्षित भविष्य की कामनाएँ करती हुई मेरे सिर से उतर गयी। वह छिपकली, खून की प्यासी, वह मोहिनी, वह आफ़त की पुतली, वह जहरीली चली गयी। एक बार फिर मेरे जीवन में अंधकार फैलाकर चली गयी। और मुझे यूँ लगा जैसे मेरे शरीर से प्राण ही चले गए हों।
मोहिनी की जुदाई का गम मुझसे बर्दाश्त नहीं हुआ। मैंने दिवानों की तरह अपना सिर दिवारों से टकराना शुरू कर दिया। अगर इस जुनून की हालत में जेल का पहरेदार मुझे न पकड़ लेते या उन्हें कुछ देर हो जाती तो यह अंधेरी कोठरी मुझे ऐसे अंधेरे में समेट लेती कि फिर कभी मैं रोशनी में न आ सकता।
जेल के अस्पताल में मुझे होश आया तो मोहिनी की याद ने फिर मुझे पागल बना दिया। मजबूरन डॉक्टरों को मुझे बेहोशी का इंजेक्शन लगाना पड़ा। अस्पताल में मेरी हालत संभलते-संभलते पंद्रह दिन लग गए। इस बीच डॉक्टरों ने कई बार मुझसे मेरे रिश्तेदार के बारे में पूछताछ की। लेकिन मैं हर बार एक सर्द आह भरकर चुप हो जाता। अब किसी से मिलने या किसी को देखने को जी नहीं चाहता था। मैंने उनसे कह दिया कि मैं अकेला हूँ। एक माह बाद मुझे अस्पताल से कोठरी में भेज दिया गया। परन्तु इस बार डॉक्टरों की सिफारिश पर मुझसे अधिक परिश्रम का काम नहीं लिया गया।