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Fantasy मोहिनी

मेहता ने अपनी तरफ़ से कोई कसर नहीं छोड़ी। उसने मुझे रिमांड में ले रखा था। परंतु कल के मुकदमे में सबूतों का अभाव रहा। फिर भी मुझे दो माह की सजा हो ही गयी। कुलवन्त को गायब करने के जुर्म में। मेरे लिये यह बड़ी हैरत की बात थी कि मैंने जो जुर्म नहीं किया था उसकी सजा पा रहा था।

जेल में मुझे जो यातनाएँ दी गईं उसे बयान करते हुए तो मेरी रूह काँप जाती है। मोहिनी बेबसी से मेरा तमाशा देखती रहती; और मैं यातनाओं से गुजरता रहता। खुद मेहता जेल में आकर अपने हाथों से मेरा स्वागत करता था। मोहिनी का उसपर कोई बस नहीं चलता था। एक रात जब मैं जेल के नंगे फ़र्श पर अतीत के बारे में सोच रहा था तो मोहिनी ने बड़ी उदासी से कहा।

“कुछ ख्याल है राज, कितने दिन बीत गए ?”

“हाँ मोहिनी! दिन गिनना ही तो रह गया है। तुम यही कहना चाहती हो न कि कल तक हरि आनन्द का जाप पूरा हो जाएगा।” मैंने बुझे हुए स्वर में कहा।

“यही नज़र आता है राज। मगर तुमसे बिछड़ने में मुझे भारी सदमा पहुँचेगा।” मोहिनी ने बिसुरते हुए कहा। “अगर मेरे बस में होता तो आत्महत्या कर लेती लेकिन तुम्हारी जुदाई गँवारा न करती।”

“वक्त का खेल है मोहिनी। हम सब बेबस हैं। भाग्य में यही लिखा हुआ था। पूरा हुआ।”

“राज तुम भाग्यशाली हो। माला रानी तुम्हें मिल जाएगी। जेल से रिहा होने के बाद तुम फिर अपना जहाँ आबाद कर लोगे। पर मैं किससे बात करूँगी। मेरी ज़िंदगी तो केवल उसके लिये है जो मेरा मालिक है। मुझे स्वयं पर कोई अधिकार नहीं। मैं एक कैदी हूँ राज। ऐसी कैदी जो दूसरों के लिये सब कुछ कर सकती है पर अपनी आजादी का सामान नहीं जुटा सकती।”

“मोहिनी, मेरी जान! क्या तुम मेरा एक आखिरी काम कर सकती हो ?” मैंने भावनात्मक स्वर में कहा।

“कहो राज। काश, मैं तुम पर अपना अस्तित्व न्योछावर कर सकती। अगर तुम्हारी मोहिनी के बस में हुआ तो ज़रूर पूरा होगा।”

“मुझे मार डालो मोहिनी। अपने पंजे इतनी जोर से मेरे सिर पर चुभाओ कि हर चीज़ मेरे लिये फताह हो जाए। यह ज़िंदगी तुम्हारे बिना बेकार है।”

“मैं यह नहीं कर सकती। तुम मायूस क्यों होते हो।”

मोहिनी तड़पकर बोली। “तुमने तो बड़ी-बड़ी कठिनाइयों का सामना किया। समय की प्रतिक्षा करो। मुझे विश्वास है तुम अवश्य सफल हो जाओगे।”

वह बातें, वह जुदाई का क्षण। मोहिनी मुझे बच्चों की तरह दिलासा दिलाती रही। मेरी आँखों के पीछे छिपा आँसुओं का सैलाब फुट पड़ा। मेरी मोहिनी जा रही थी। इन दर्दनाक क्षणों का कोई अन्दाजा नहीं लगा सकता था। वह क्षण आ गया जब मोहिनी ने मुझसे आज्ञा माँगी। मुझे अलविदा कहा और फिर मेरे सुरक्षित भविष्य की कामनाएँ करती हुई मेरे सिर से उतर गयी। वह छिपकली, खून की प्यासी, वह मोहिनी, वह आफ़त की पुतली, वह जहरीली चली गयी। एक बार फिर मेरे जीवन में अंधकार फैलाकर चली गयी। और मुझे यूँ लगा जैसे मेरे शरीर से प्राण ही चले गए हों।

मोहिनी की जुदाई का गम मुझसे बर्दाश्त नहीं हुआ। मैंने दिवानों की तरह अपना सिर दिवारों से टकराना शुरू कर दिया। अगर इस जुनून की हालत में जेल का पहरेदार मुझे न पकड़ लेते या उन्हें कुछ देर हो जाती तो यह अंधेरी कोठरी मुझे ऐसे अंधेरे में समेट लेती कि फिर कभी मैं रोशनी में न आ सकता।

जेल के अस्पताल में मुझे होश आया तो मोहिनी की याद ने फिर मुझे पागल बना दिया। मजबूरन डॉक्टरों को मुझे बेहोशी का इंजेक्शन लगाना पड़ा। अस्पताल में मेरी हालत संभलते-संभलते पंद्रह दिन लग गए। इस बीच डॉक्टरों ने कई बार मुझसे मेरे रिश्तेदार के बारे में पूछताछ की। लेकिन मैं हर बार एक सर्द आह भरकर चुप हो जाता। अब किसी से मिलने या किसी को देखने को जी नहीं चाहता था। मैंने उनसे कह दिया कि मैं अकेला हूँ। एक माह बाद मुझे अस्पताल से कोठरी में भेज दिया गया। परन्तु इस बार डॉक्टरों की सिफारिश पर मुझसे अधिक परिश्रम का काम नहीं लिया गया।
 
मैं दिन-रात अपने अंजाम के बारे में सोचता रहता। मुझे यकीन था कि हरि आनन्द अब मुझसे गिन-गिन कर बदले लेगा। अब हर ओर अंधेरा था। मेरी रिहाई में पाँच रोज रह गए। मुझे अपनी बर्बादी साफ नजर आने लगी। आजादी मेरी बर्बादी होगी। वीरानियों, मायूसियों की आँधियाँ दिल में चल रही थी। चार रोज बाकी थे। मैं एक वृक्ष के छाव में बैठा था कि एक सिपाही ने मुझे सूचना दी कि जेलर साहब मुझे बुला रहे हैं। जेलर के कमरे में पहुँचा तो माला को वहाँ देखकर मेरे कदम काँपने लगे और माला का आगमन अच्छा न लगा। मैंने निगाहें फेर ली। जेलर की उपस्थिति में माला से कोई बातचीत करना उचित नहीं था। अलबत्ता उसे देखकर प्रेमलाल और जगदेव का एक सिलसिला याद आ गया। उन लोगों से मुझे अब भारी नफरत हो गयी थी। मैं कुछ देर चुप पड़ा रहा। जेलर ने उठते हुए कहा।

“तुम अपनी बीवी से इसी कमरे में बात कर सकते हो। मैं तुम्हें दस मिनट की छूट देता हूँ।”

जेलर उठकर दूसरे कमरे में चला गया तो माला उठकर बड़ी तेजी से मेरे निकट आयी और गमगीन आवाज़ में बोली।

“आपकी यह क्या हालत तो गयी है। हम लोगों को खबर तक न दी।”

“अब क्यों आयी हो ? जाओ, चली जाओ। मुझे मेरे हाल पर छोड़ दो। तुम्हारे उस बाबा और जगदेव ने जब मेरी कोई मदद न की तो क्या उन्होंने तुम्हें खबर तक नहीं दी।” मैंने सपाट स्वर में कहा।

“भगवान की सौगन्ध, मुझे आपके बारे में आज ही खबर मिली है। बड़ी मुश्किल से जेलर से विनती करके आपसे मुलाकात हो सकी।”

वह आँसुओं को ढलकाती बोली।

“और कौन आया है तुम्हारे साथ ?” मैंने बेरुखी से पूछा।

“मैं अकेली आयी हूँ। अभी तक अंकल को कोई खबर नहीं मिली।” माला ने रुँधे हुए स्वर में कहा। “जेलर कह रहा था कि आप चार रोज में रिहा होने वाले हैं।”

“अब रिहाई में क्या रखा है। मोहिनी हरि आनन्द के कब्जे में जा चुकी है। तुम्हारे बाबा की आत्मा ने भी मेरी कोई सहायता नहीं की। जो कुछ मुझपर गुजरी है, वह मैं ही जानता हूँ। तुमने रवानगी के समय गलत आत्माओं का ध्यान-ज्ञान लगाया था। तुमने उनसे प्रार्थना की थी कि वे मेरी सहायता करें। और देखो उन्होंने मेरी कैसी सहायता की है। अब क्या लेने आयी हो। मैं बर्बाद हो जाऊँगा। मैं बर्बाद हो गया हूँ। तुम्हें मेरे पास नहीं आना चाहिए था। जाओ, घर जाकर मेरी बर्बादी का शोक मनाओ। समझ लो मैं मर चुका हूँ।

“आप क्या कह रहे हैं। मैं कुछ नहीं समझ रही हूँ।” माला ने आश्चर्य से पूछा। मुझे क्रोध आ गया। वह बोली। “आप क्या समझ रहे हैं ? भगवान की सौगन्ध मैं आपके लिये जान दे सकती हूँ।”

“मोहिनी की जुदाई से मेरा दिमाग खराब हो गया है। तुम मेरे पास से चली जाओ। मेरा किसी से कोई संबंध नहीं। घर जाओ। अब जो भी मुझसे अपनत्व की बात करता है मुझे उससे घृणा होने लगती है। तुम इस समय यहाँ न ठहरो, वरना मेरे मुँह से कुछ निकल जाएगा।”

माला की हिचकियाँ बँध गयी। मगर मैं खुद से ही निराश था। मुझे अपने अस्तित्व से भी घिन आ रही थी। हर व्यक्ति धोखेबाज़ नज़र आ रहा था। जेलर जब कमरे में प्रविष्ट हुआ तो रोती माला मुझे हसरत से देखती हुई विदा हो गयी। माला के आने से मेरे ज़ख़्म दोबारा हरे हो गए थे। किसी तरह यह चार रोज़ भी गुज़र गए। जब जेलर ने मेरी रिहाई का फ़ैसला सुनाया तो मेरी आँखें जलने लगीं। बाहर निकलते हुए जेलर ने मुझे सम्बोधित करते हुए कहा।

“मुझे विश्वास है कि अब तुम अपनी औकात पहचान चुके हो। तुम्हारे लिये यही उचित होगा कि लखनऊ से बाहर चले जाओ। मेहता यहाँ का एस०पी० बन गया है।”

मैंने कोई उत्तर न दिया। बड़े फाटक से बाहर निकलकर कोई भी क़ैदी रिहाई के बाद खुली हवा पाकर नई ताजगी महसूस करता है, परंतु मुझे उसमें घुटन हो रही थी। बाहर की दुनिया मुझे अजनबी लग रही थी। एक जरा सी उम्मीद थी कि माला मुझे लेने आएगी; लेकिन ऐसा नहीं हुआ। माला की अनुपस्थिति में दिल को और चोट लगी। मैं किधर जाऊँ। मेरी कोई भी मंज़िल नहीं थी। खामोशी से एक तरफ़ कदम बढ़ाने लगा। अभी मैं कुछ ही कदम चला था कि मुझे यूँ लगा जैसे कोई मेरे पीछे खड़ा हो मेरा उपहास उड़ा रहा हो। मैंने मुड़कर देखा तो साधु जगदेव को अपने सामने खड़ा पाया। मेरे दिमाग़ की हालत उस वक्त क्या थी। मुझे यह सब साधु-संत एक सिरे से ढोंगी और फरेबी नज़र आते थे। वह शायद मेरी दयनीय हालत का उपहास उड़ाने आया था। कभी उसने मुझमें हिम्मत और जोश की लहरें दौड़ाई थीं। परंतु अब यूँ लगा जैसे वे सब इसलिए था चूँकि वे लोग माला के रक्षक थे; और मैं माला का सुहाग। वे सिर्फ़ मुझे ज़िंदा रखना चाहते थे; और उन्हें मुसीबतों से कोई दिलचस्पी नहीं थी। मेरे मन से जगदेव के प्रति नफ़रत की आग धधक उठी।

“अब क्यों आए हो जगदेव। कौन सा भाषण सुनाने आए हो। चले जाओ मेरी नज़रों के सामने से। वरना अनर्थ हो जाएगा।”

जगदेव की भृकुटी एकदम तन गयी।

“बालक! तू निराशा के समुद्र में घिरा है। आशा के दीप जला और किसी साधु का अपमान मत कर।”

“तुमने कौन सा मेरा मान रखा; जो मैं तुम्हें गले लगाऊँ। लेकिन अब मेरी ज़िंदगी में कुछ नहीं रखा है। मैं एक लाश हूँ। कुँवर राज मर चुका है और वह तुम जैसे पाखण्डियों के लिये कोई सम्मान नहीं रखता। तुम मेरा मज़ाक उड़ाने आए हो।”

“मूरख, ख़बरदार जो आगे जुबान चलायी! अगर प्रेमलाल का ख़्याल न होता और माला की दीवार न होती तो तुझे अभी भस्म कर देता।”

“भस्म कर देता। परंतु इससे पहले कि तू मुझे भस्म करे, मैं तुझे अभी ठिकाने लगा दूँगा। मेरे पास तुझ जैसे पाखण्डी से निपटने के लिये अब भी ताक़त है। मेरी अपनी ताक़त।” मैंने नफ़रत भरे स्वर में कहा। “और अगर तू मुझे भस्म कर देगा तो मैं तो पहले ही मर चुका हूँ। एक मरे हुए आदमी को कौन मार सकता है ?”

“आगे कदम मत बढ़ा। वहीं रुक जा।” जगदेव की आँखों में शोले चमकने लगे।

मैंने जुनून की सी हालत में कदम आगे बढ़ाए; परंतु सहसा मेरे कदम ज़मीन पर ही ठहर गए। जैसे मुझे किसी शिकंजे ने जकड़ लिया हो। मेरा इकलौता हाथ साधु जगदेव की गरदन तक नहीं पहुँच सका।
 
“मैं तुझे कुछ बताने आया हूँ मूरख; लेकिन तूने मेरा अपमान किया है। तू घमंडी है। तुझे अभी और सबक़ मिलना चाहिए। जब तक तेरे मन की आँखें नहीं खुलेगी, तू मुसीबतों से घिरा रहेगा।”

इतना कहकर साधु जगदेव अदृश्य हो गया। उसके अदृश्य होते ही मेरे पाँव भी मुक्त हो गए; और मुझे यूँ लगा जैसे वह मेरा इंतकामी ख्वाब था जो मैंने जागती आँखों से देखा था। साधु जगदेव वहाँ नहीं था; और मैं थके-हारे जुआरी की तरह अपने कदम आगे बढ़ाने लगा था। और जाने कितने ही दिन मैं यूँ ही लखनऊ के सड़कों पर भटकता रहा। कई बार मेरे मन में आया कि मैं घर की तरफ़ रुख़ करूँ; परंतु हर बार कदम रुक जाते। मैं बर्बाद था। मेरे पास था भी क्या। मैं अपनी मुसीबतों में दूसरों को क्या जोड़ता। यह लखनऊ की जमी। यह सड़कें, यह गलियाँ। यह सब मेरे लिये कितनी खूबसूरत थीं। मैं इन सड़कों का बेताज बादशाह था। बड़े-बड़े लोग मेरे सम्मान में सिर झुकाते थे। जिस क्लब में मैं जाता उसकी शान बढ़ जाया करती थी। परंतु अब क्या था। सब कुछ मेरे लिये वीरान था। मैं यहाँ के लिये अजनबी था। मेरी दाढ़ी और सिर के बाल बढ़ गए थे; और मैं सड़कों पर भीख माँगता फिर रहा था। जो कुछ भी दिन भर की भीख में मिल जाता उससे अपने पेट का नरक भर के मैं कहीं भी सो जाता। कुत्ते मेरी गंध सूँघते फिरते। मेरे कपड़े चीथड़ों में तब्दील हो गए थे; और मैं सोचता, जो लोग दैवी ताकतों के बलबुते पर जीते हैं, ऐश करते हैं, दौलत से खेलते हैं, वे इसी तरह पलक झपकते ही खाक हो जाते हैं। उनकी दौलत इसी तरह ग़ायब हो जाती है। उनकी शान यूँ ही मिट जाती है कि कोई नाम लेवा नहीं होता। मोहिनी क्या थी ? एक आफत की परकाया थी, एक आफत की पुतली। उसने मुझे क्या दिया था। वह एक आनी-जानी चीज़ थी। उसके साथ भाग्य भी आना-जाना हो गया था। इस तरह की ज़िंदगी बिताने वाले का यही अंजाम होता है। वह गुमनामी की मौत, कुत्ते की मौत मर जाते हैं।

यही सोचता सड़कों पर भटकता रहा। एक दिन दिल में ख्याल आया कि लखनऊ छोड़ दूँ। गाड़ी में बैठ जाऊँ; और जहाँ गाड़ी ले जाए वहाँ चला जाऊँ। यह सोचकर मैं स्टेशन की तरफ़ चल पड़ा।

मेरी शक्ल अब इतनी घिनौनी हो चुकी थी कि शायद ही कोई मुझे पहचान पाता। चलते-चलते जब मैं थककर चूर हो गया तो एक सायबान के नीचे बैठ गया; और मुझे नींद आ गयी। मैं सो रहा था क्योंकि मेरी किस्मत सो रही थी। उठा उस वक्त जब किसी ने मेरे पाँव पर ज़ोरदार ठोकर मारी। मैंने आँखें खोलकर देखा, कोई व्यक्ति मेरे निकट खड़ा था। धुँध के अंधेरे के कारण मैं चेहरा न देख सका; परंतु उसके शरीर पर एक धोती देखकर ख़्याल आया, शायद वह भी मेरी तरह कोई भाग्यहीन होगा जो सायबान के नीचे यहाँ सोने आता होगा। संभव है मैंने उसकी जगह पर कब्जा जमा लिया हो। इस ख़्याल से मैं धीरे से उठा और सायबान के बाहर चला गया। लेकिन अभी मैं कुछ दूर चला था कि रुक गया। पलटकर देखा तो वही व्यक्ति मेरे पीछे चला आ रहा था। मुझे आश्चर्य था कि आख़िर वह मेरा पीछा क्यों कर रहा है। जब वह मुझसे दो कदम के फासले पर रुका तो मुझे क्रोध आ गया।

“कौन हो तुम और क्यों मेरे पीछे लगे हो ?”

“तुम्हें पहचानने में जरा देर लगेगी। मैं तुम्हारा पुराना दोस्त हूँ कुँवर राज साहब, बहुत पुराना।” पीछा करने वाले ने गंभीरता से उत्तर दिया।

उसकी आवाज़ कुछ जान-पहचानी अवश्य थी लेकिन उस समय चूँकि मैं नींद से जागा था इसलिए उसे पहचानने में असमर्थ था। यूं भी मैं इस हालत में अपनी पहचान कराने पर तैयार नहीं था। इसलिए टालने वाले भाव में कहा।

“तुम्हें ग़लतफहमी हुई है भाई, मैं कुँवर राज नहीं हूँ।”

“अच्छा, तो फिर क्या नाम है तुम्हारा ?” उसने बड़ी ढिठाई से पूछा।

मुझे बेचैनी महसूस हुई। मैंने बिगड़कर कहा। “महाशय, क्यों ग़रीब को तंग कर रहे हो ?”

“कुँवर साहब! अपने पुराने मित्र को भी नहीं पहचानते। बहुत दिनों बाद तुम्हारे दर्शन हुए हैं। मगर तुम बहुत व्याकुल नज़र आते हो। कहो तो कुछ सहायता करूँ।” उसका स्वर व्यंग्यात्मक था।

“मैं कहता हूँ। मैं तुम्हें नहीं जानता।” मैंने झल्लाकर कहा। “मेरा कोई दोस्त नहीं। मुझे किसी की मदद नहीं चाहिए। जाओ, दफ़ा हो जाओ और मुझे मेरे हाल पर छोड़ दो।”

“क्या कहते हो कुँवर साहब ? तुम्हारे हाल पर छोड़ दूँ ? भला यह कैसे हो सकता है ? बहुत दिनों बाद तो यह दिन आया है कुँवर साहब।” इस बार अजनबी ने कड़वाहट से कहा। “तुमने भी तो मुझे मेरे हाल पर नहीं छोड़ा था। तुमने कौन सी कसर छोड़ दी थी ?”

“त... तुम।” शब्द मेरे कंठ में फँसकर रह गए। मुझे वह आवाज़ हरि आनन्द की लगी। हरि आनन्द, जो मेरा सबसे बड़ा दुश्मन था। जिसने मुझे इस हाल में पहुँचा दिया था। वह एक अरसे बाद विजेता के रूप में मेरे सामने खड़ा था।

मैंने आश्चर्य से सिर उठाकर देखा, फिर भयभीत स्वर में अपने संदेह की पुष्टि के लिये पूछा। “क्या तुम पंडित हरि आनन्द हो ?”

“बड़ी कृपा है तुम्हारी कुँवर साहब, जो तुमने मुझ अभागे को पहचान लिया।” हरि आनन्द ने चुभते स्वर में कहा। “मेरा ख़्याल था कि मुझे स्वयं को पहचानने के लिये कुछ पुरानी कहानी दोहरानी पड़ेगी।”

हरि आनन्द का उत्तर सुनकर एक क्षण के लिये मुझ पर दहशत का दौरा पड़ गया। अपने तमाम हिसाब चुकाने के लिये आख़िर वह मेरे पास आ गया था। मेरा दुश्मन मेरे सामने खड़ा था लेकिन मैं उस पर आक्रमण करने का साहस न जुटा सकता था। मोहिनी उसके कब्जे में थी; और मेरी हैसियत उसके सामने एक कीड़े की तरह थी।

अब मुझे अपनी मौत का यक़ीन हो चला था। इस यक़ीन से मुझे कुछ सुकून सा महसूस हुआ। अब सिर्फ़ यह शेष था कि वह मुझे एक संकेत में समाप्त करता है या यातनाएँ देकर मारना चाहता है। हरि आनन्द से किसी दया की आशा बेकार थी।

मैं आने वाले क्षणों के बारे तेजी से सोच रहा था कि अचानक हरि आनन्द ने कहा। “किस विचार में तुम गुम हो कुँवर साहब ? कुछ बोलो, कुछ चहको। ख़ामोश क्यों हो गए ?”

“मेरे पास कहने-सुनने को कुछ बाकी न रहा हरि आनन्द! किस्मत का पासा अब तुम्हारे हक़ में पलटा है। आज अपने दिल के हौसले निकाल लो। मैं तुम्हारे सामने मौजूद हूँ। मुझे मालूम है कि तुम मेरे साथ क्या सुलूक करोगे। देर न करो, अपने अरमान पूरे कर लो।”

“च्च... च्च... च्च!” हरि आनन्द ने मुझ पर तरस खाने के अंदाज़ में कहा। “बहुत निराश हो गए हो कुँवर साहब। टूट से गए हो। वह तुम्हारी तेजी, वह सीना तानकर चलने वाली अदा कहाँ गयी ? तुमने काली मंदिर के तहखाने में घुसकर मुझे मारने की कोशिश की। तुम्हें यह भी याद होगा कि क्यों ?”

हरि आनन्द जो नश्तर चला रहा था। उन्हें सुनकर खून के घूँट पी जाने के सिवा चारा भी क्या था। मैंने ख़ामोश रहकर उसे दिल की भड़ास निकालने का खूब अवसर दिया। वह मुझे बराबर जलील करता रहा। पुरानी बातें याद दिलाता रहा और मैं उनका ज़हर खामोशी से अपने कानों में उड़ेलता रहा।

“तुमने बहुत महान शक्ति प्राप्त की थी कुँवर राज ठाकुर। माला रानी जैसी सुन्दरी तुम्हारे पास थी। और हाँ, वह मोहिनी भी तो थी। याद है तुम्हें ? तुमने मुझे वचन दिया था कि अगर मैं विनती करूँगा तो मोहिनी की शक्ति कुछ दिन के लिये तुम मेरे हवाले करोगे। परंतु तुम अपने वचन से डिग गए।” हरि आनन्द ने एक-एक करके पुरानी बातें दोहरानी शुरू कर दी। “तुम्हारी मोहिनी देवी आजकल कहाँ है ? जिसपर तुम्हें बड़ा नाज था।”

“मोहिनी के बारे में पूछकर क्यों मज़ाक उड़ाते हो हरि आनन्द।” मैंने बुझी आवाज़ में कहा।

“निराश मत हो बालक। मोहिनी का क्या है। वह आज यहाँ तो कल वहाँ। कहो तो मैं अभी कुछ देर के लिये उसे तुम्हारे सिर पर भेज दूँ।” हरि आनन्द ने जहरीले स्वर में कहा। “मुझे तुम्हारी हालत पर दुख हो रहा है।”

हरि आनन्द ने शायद तय कर लिया था कि वह सारा पुराना हिसाब आज ही चुकायेगा। काफ़ी देर तक तो मैं उसकी जहरीली बातें सुनता रहा। फिर न जाने क्यों मरने से पहले मैंने यह सोच लिया कि थोड़ा हिम्मत और हौसले से काम लेना चाहिए।

“हरि आनन्द! तुम मोहिनी की शक्ति प्राप्त करके और भी शक्तिशाली बन गए हो; लेकिन तुम में शक्तिशाली लोगों का चाल-चलन नहीं आया। कमीने लोगों को जब थोड़ी-बहुत शक्ति मिल जाती है तो वह अपने आपे में नहीं रहते। यह लौंडियापने की बातें बंद करो। तुम भूल रहे हो कि तुम इस समय कुँवर राज ठाकुर से बातें कर रहे हो। जिसकी ज़िंदगी में बड़े जलजले आए हैं। मैं इन बातों का आदी हो चुका हूँ। सब कुछ चला गया तो क्या हुआ, गैरत तो अभी बाकी है। इस जनानेपन से बाज आओ। जो करना है करो, बेकार वक्त जाया न करो।”

“अरे महाराज! नाराज़ हो गए। क्षमा कर दो। मैं भूल गया था कि तुम एक बेवक़ूफ़ आदमी भी हो।” हरि आनन्द ने हँस कर कहा।

“कमीने पंडित! अपनी जुबान पर लगाम दे। नहीं तो मैं तेरी चुटिया पकड़कर तेरा सिर ज़मीन पर रगड़ दूँगा।” मैंने गजबनाक लहजे में कहा। “जिसकी ज़िंदगी का चिराग टिमटिमा रहा हो वह ऐसी ही बातें करता है।”
 
हरि आनन्द मेरा उत्तर सुनकर हक्का-बक्का रह गया। उसकी आँखें एक क्षण को पटपटाई फिर उनमें क्रोध की चिंगारी भड़क उठी। उसने नफ़रत से मुझे देखा और ठंडे स्वर में बोला।

“कुँवर राज ठाकुर! मैं तुझे इतनी आसानी से नहीं मारूँगा। मैं तुम्हें तड़पा-तड़पा कर कुत्ते की मौत मारूँगा। अभी तुम्हारा एक हाथ टूटा है। मैं दूसरा भी तोड़ डालूँगा। फिर तुम लंगड़े होगे। उसके बाद तुम्हारे आँखों की रोशनी भी अंधियारों में बदल दूँगा। तुम दर-दर की खाक छानते फिरोगे। गंदी नालियों में लोट लगाते नज़र आओगे। देवी-देवताओं की यही इच्छा है।”

“मैं तेरे देवी-देवताओं से नहीं डरता।” मैं उसकी तरफ़ किसी पागल कुत्ते की तरह लपका और जितनी गालियाँ मैं उसे दे सकता था, दे डाली। मैंने जुनून की हालत में उसके गले में पड़ी हुई एक माला खींच कर दाने-दाने कर दी; लेकिन मेरा हाथ अचानक रुक गया। इससे पहले कि मैं हरि आनन्द के जिस्म पर चढ़ बैठता, मेरे सिर पर अचानक चुभन महसूस हुई। वही जानी-पहचानी चुभन। मेरे कदम ज़मीन पर गड़ कर रह गए और ऐसा मालूम हुआ जैसे किसी ने मेरा रक्त प्रवाह रोक दिया हो। मैंने हाथ-पाँव ढीले छोड़ दिए और मेरे ज़हन में आँधियाँ सी चलने लगीं। मैंने कल्पना के झरोखों में नज़र डाली। वहाँ मोहिनी मौजूद थी। मोहिनी इस तरह खड़ी थी जैसे मैं उसके लिये बिल्कुल अजनबी हूँ। इस समय वह मुझे बड़ी ख़तरनाक दृष्टि से घूर रही थी। उसकी नज़रों में नफ़रत और इन्तकाम के शोले भड़क रहे थे। मैंने जो मोहिनी को देखा तो उससे दया की भीख माँगनी चाही।

दिल ही दिल में कहा। “मोहिनी तुम ?”

मोहिनी ने नफ़रत से मुँह फेर लिया।

“मोहिनी मुझे इस कमीने से बचाओ।” मैंने उससे प्रार्थना की।

वह कहर भरे स्वर में बोली। “तूने मेरे आका हरि आनन्द का अपमान किया है। मैं तेरा खून पी जाऊँगी। अगर मुक्ति चाहता है तो हाथ बाँधकर क्षमा की भीख माँग ले।”

“मोहिनी, यह तुम क्या कह रही हो ?” मैंने आश्चर्य से पूछा।

“आगे बढ़ और मेरे आका को दण्डवत कर।”

मोहिनी का स्वर इतना खौफनाक था कि मैं उसे देखता ही रह गया। मुझे अहसास हुआ कि अब मोहिनी से कोई उम्मीद रखना बेकार है। एक बार पहले भी वह गयी थी। तब उसे समय भी मुझे मोहिनी का व्यवहार बहुत बुरा लगा था। उसी क्षण मोहिनी ने पहले से भी ज़ोर से अपने शब्द दोहराये और मैंने हरि आनन्द के सामने हाथ फैला दिया। हरि आनन्द के चेहरे पर विजेताओं की सी मुस्कराहट उभरी।

फिर वह घृणा से बोला। “अभी तो खेल शुरू हुआ है कुँवर राज, परंतु तुम्हारी बुद्धि में शीघ्र बात आ गयी। तुमने अपन-आप को पहचान लिया कि तुम कितने तुच्छ हो।”

उसके बाद हरि आनन्द के चेहरे के भाव और भी ख़तरनाक हो गए। उसने मेरे सिर की ओर देखकर होंठ हिलाए। उसकी आवाज़ ऊँची नहीं हुई, परंतु मैं समझ गया कि वह मोहिनी को मेरे संबंध में निर्देश दे रहा है। मेरा अनुमान ठीक निकला। इधर हरि आनन्द के होंठ हिलने बंद हुए उधर मोहिनी के नुकीले पंजों की चुभन पहले से भी कहीं अधिक तेज हो गयी। फिर मोहिनी का जहरीला स्वर मेरे कानों में पिघले हुए शीशे की मानिन्द उतरता चला गया।

“कुँवर राज! मेरे आका की इच्छा है कि तुम इस समय पुराने कब्रिस्तान की ओर चलो।”

मेरे कदम अपने आप ही पुराने कब्रिस्तान की ओर उठने लगे। मेरे इरादे का उसमें कोई दख़ल नहीं था। मोहिनी की रहस्यमय शक्ति मुझे कदम उठाने पर मजबूर कर रही थी। हरि आनन्द मेरे साथ सीना ताने चल रहा था। डेढ़ घंटे बाद मैं पुराने कब्रिस्तान के वीरान और सुनसान क्षेत्र में था। मोहिनी के पंजों की चुभन कम हुई तो मैं रुक गया। उस अंधेरी रात में कब्रिस्तान का मंजर एक साधारण इंसान के दिल की हरकत बंद कर देने के लिये काफ़ी था।

“कुँवर राज! क्या तुम जानते हो कि मैं तुम्हें यहाँ क्यों लाया हूँ ?” हरि आनन्द ने घृणा भरे स्वर में पूछा।

“मुझे कुछ नहीं मालूम। तुम जाने क्या चाहते हो। कृपा करके मेरा काम शीघ्र से शीघ्र तमाम कर दो।” मैंने टूटते स्वर में उत्तर दिया।

“क्या तुम जानते हो कि यहाँ एक पुराना कुआँ है जो जीवनधारी के नाम से प्रसिद्ध है ?”

“हाँ!” मेरे मुँह से निकला।

“तुम मेरी आज्ञा पर एक अच्छे सेवक की तरह कुएँ में छलांग लगा दो।” हरि आनन्द के स्वर में नफ़रत कूट-कूट कर भरी थी।

“मैंने अपना इरादा बदल लिया है। तुम्हारे गन्दे शरीर का बोझ इस पवित्र धरती पर कुछ अच्छा नहीं लगता। इस कुएँ से तुम बाहर नहीं आ सकोगे और शीघ्र मर भी नहीं सकोगे। इस कुएँ में तुम्हें बलाएँ श्राप देकर ऐसा व्याकुल करेगी कि तुम तड़प-तड़प कर मरोगे।”

हरि आनन्द ने जो कुछ कहा मुझ पर उसका अधिक प्रभाव नहीं पड़ा। कदाचित मोहिनी की रहस्यमय शक्ति ने मेरे सोचने-समझने की शक्ति खत्म कर दी थी। मेरे किसी भी हरकत या जुम्बिश में मेरे इरादे का कोई दख़ल नहीं था। मैं गूँगा सा खड़ा हरि आनन्द को देख रहा था कि मेरे सिर पर एक बार मोहिनी के पंजों की चुभन बढ़ने लगी। मैंने फुरफुरी लेकर सिर पर एक नज़र डाली। मोहिनी खून उगलती नजरों से मेरी तरफ़ देख रही थी। हमारी नज़रें चार हुई तो मोहिनी ने सर्द आवाज़ में कहा।

“बाईं ओर घूमकर आगे बढ़ो। जीवनधारी कुआँ तुम्हारी ज़िंदगी का किस्सा खत्म करने की प्रतीक्षा कर रहा है।”

मैंने किसी दास की तरह अपना रुख़ बायीं तरफ़ किया और आगे कदम बढ़ा दिए। अभी मुश्किल से सौ गज दूर गया था कि उस कुएँ के नज़दीक पहुँच गया जिसके बारे में हरि आनन्द ने हुक्म दिया था। मैंने इस कुएँ के बारे में पहले भी सुन रखा था। अगर मैं दूसरी स्थिति में यहाँ आता तो इस कुएँ का रहस्य जानने की कोशिश ज़रूर करता। किंतु इस समय तो मैं खुद रहस्यमय चक्र में गिरफ़्तार था।

“अचानक मोहिनी ने मुझे आदेश दिया। “कुँवर राज, आगे बढ़ो और इस कुएँ में छलांग लगा दो।”

मैं मोहिनी के आदेश से खामोशी के साथ आगे बढ़ा और कुएँ के निकट पहुँचकर उसके मुंडेर पर चढ़ गया। कुएँ में इतना अंधकार था कि अंदर कुछ नज़र नहीं आता था। यूँ भी बाहर हर तरफ़ अंधेरा था। मैंने कुएँ के घुप्प अंधेरे में अपनी मौत की परछाइयाँ देखी और मोहिनी के हुक्म पर अपना जिस्म आगे की ओर झुकाना चाहा। बस एक क्षण की देर थी कि अचानक किसी अदृश्य शक्ति ने मेरे कंधे पकड़ लिये। मुँडेर पर इस तरह से पकड़ने पर मेरा बैलेन्स बिगड़ गया, किन्तु मैं शीघ्र ही संभल गया। एक मद्धिम नारी का स्वर मेरे कानों में गुनगुनाया। “राज क्या करते हो ? आगे मौत है रुक जाओ।”
 
इस आवाज़ में मालूम नहीं क्या जादू था कि मैं सहसा होश में आ गया। वह किसकी आवाज़ थी मुझे कुछ मालूम न हो सका, परंतु मेरे मस्तिष्क पर मोहिनी और हरि आनन्द का जो सम्मोहन था, वह अवश्य टूट गया। मैं कूदकर कुएँ के मुंडेर से नीचे आ गया। उसी समय मोहिनी ने मुझे खुरदरी आवाज़ में हुक्म दिया।

“राज! मेरे आका की आज्ञा का पालन करना तुम्हारे लिये ज़रूरी है। अगर तुमने आज्ञा न मानी तो मैं तुम्हारा सारा खून पी जाऊँगी।”

मैं मोहिनी की आवाज़ अवश्य सुन रहा था परंतु उस पर अमल करना, न करना मेरी इच्छा पर निर्भर करता था। इस बार मुझे मोहिनी की आवाज़ से भय नहीं महसूस हुआ। मुझे विश्वास हो चला था कि कोई असाधारण शक्ति मेरी सहायता कर रही है। हरि आनन्द मुझे कुएँ के मुंडेर से उतरता देखकर बुरी तरह बौखला गया। उसने मेरे सिर की ओर देखा फिर चीखकर बोला।

“मोहिनी, क्या तेरे मन में अभी भी अपने पुराने आका का प्रेम शेष है ?”

“नहीं महाराज, नहीं!” मोहिनी ने सहमी हुई आवाज़ में उत्तर दिया।

“फिर यह टूण्टा मुंडेर से नीचे कैसे आ गया ?” हरि आनन्द गुर्राया। “क्या इसके लिये मुझे कोई और उपाय करना होगा ?”

मोहिनी कुछ उत्तर देने की बजाय मुझे नफ़रत से घूरती हुई मेरे सिर से रेंग गयी। मैंने उसके चेहरे के भाव से अनुमान लगा लिया था कि वह किसी कारण से विवश हो गयी है। मोहिनी के मेरे सिर से उतरने पर हरि आनन्द बुरी तरह झल्ला गया था। उसके होंठ बार-बार हिलने लगे। वह मोहिनी से सम्बोधित था परंतु मैं उसकी आवाज़ सुनने में असमर्थ था। कुछ देर क्रोध में खड़ा ताव खाता रहा। फिर उसने अपनी शैतानी नज़र मुझपर जमा दी। मैं अपनी जगह ख़ामोश खड़ा उसकी प्रत्येक हरकत और पागलपन का जायजा लेता रहा। कदाचित वह मेरे लिये कोई जाप कर रहा था। कुछ देर तक यही आलम रहा। फिर उसने हाथ उठाकर ज़ोर से ताली बजाई। अंधेरे वायु-मण्डल में औंगे-बौंगे इन्साननुमा जानवर मेरे सामने उछल-कूद मचाने लगे। उनकी आँखें चमक रही थी किंतु अभी वे प्रकट ही हुए थे कि वायु-मण्डल में रोशनी का एक तेज धमाका हुआ। मानो उन सभी जीवों पर कड़कड़ा कर बिजली सी टूट पड़ी हो।

वातावरण में उनकी दिल दहला देने वाली चीखे गूँजी; और फिर वह उसी तरह विलुप्त होते चले गए जैसे कि प्रकट हुए थे। हरि आनन्द का मुँह खुला का खुला ही रह गया। मैंने उसे पहली दफ़ा इस कदर चकराया हुआ, इतना आश्चर्यचकित देखा था। अब मुझे भी इस बात में कोई संदेह नहीं रह गया था कि निश्चित रूप से कोई अदृश्य ताक़त मेरी रक्षा कर रही थी। इस विचार ने मेरे हौसले और बुलंद कर दिए। अब मोहिनी का भी कोई खौफ मेरे दिमाग़ में नहीं रहा। मेरी आँखों में खून उतर आया। उस लम्हें सिर्फ़ एक ही बात मेरे मस्तिष्क में चकराई कि मुझे जितनी भी जल्दी हो सके हरि आनन्द का खून कर देना चाहिए।

मैं उसकी तरफ़ झपटा। हरि आनन्द मेरा इरादा भाँप कर तनिक बौखला सा गया। लेकिन इससे पहले कि मैं अपने इरादे में आंशिक रूप से भी सफल हो पाता मोहिनी अपना काम कर गयी। मेरे दिमाग़ में चुभन सी महसूस हुई। इस बार यह चुभन इतनी तीखी थी कि मेरी आँखों के सामने अंधेरा छा गया। एक कराह के साथ मैं लड़खड़ाया और मेरे घुटने मुड़ते चले गए। फिर मैं अपने होशो-हवाश पर क़ाबू नहीं रख सका। इस बार रहस्यमय शक्ति मेरी कोई मदद नहीं कर सकती थी। लेकिन पूरी तरह चेतना खोने से सिर्फ़ एक क्षण पहले मैंने महसूस किया कि मुझे दो हाथों ने उठाया और उस कुएँ में फेंक दिया। छपाक की आवाज़ से मेरा जिस्म पानी से टकराया। फिर मुझे कुछ भी याद नहीं रह गया। शायद मैं मर रहा था।

मुझे होश आया। यह कम आश्चर्य की बात नहीं थी कि मुझे होश आ रहा था। साथ ही मेरे कानों से एक धीमा स्वर टकराया। “क्या तुम होश में हो ?”

मैंने आँखें खोलीं।

मेरे ऊपर एक अत्यंत सुन्दर लड़की झुकी हुई थी। चेहरा मेरे लिये बिल्कुल अजनबी था। मैंने चौंककर पूछा। “तुम कौन हो ?”

“मेरे बारे में मत पूछो। देवताओं की यही इच्छा थी कि तुम अभी ज़िंदा रहो।” वह मधुर आवाज़ में बोली।

मैंने आसपास का निरीक्षण किया। उस समय मैं पुराने कब्रिस्तान के पास ही एक गैर आज़ाद हिस्से में पड़ा था। वहाँ एक खस्ताहाल झोंपड़ी मौजूद थी। उसके अलावा निकट या दूर कोई इमारत नहीं थी। मैंने लड़की के बारे में सोचा। आश्चर्य है, मैं उस रहस्यमय अंधेरे कुएँ से कैसे निकल आया। मेरे शरीर पर एक साधारण सी खरोंच भी न थी, न ही मेरे कपड़े भीगे हुए थे। यह लड़की कौन है जो इस वीराने से धरना दिए बैठी है। देखने में वह भोली-भाली मासूम लड़की नज़र आ रही थी।

“वह तुम्हारी जान के पीछे पड़ गया था। वह कौन था ?” लड़की ने भोलेपन से पूछा।

“मुझे मालूम नहीं कि वह कौन था। पर वह मेरा शत्रु था।” मैंने कुछ सोचते हुए उत्तर दिया। “क्या तुम इसी झोंपड़ी में रहती हो ?”

“हाँ!” उसने मुस्कुराकर कहा।

“और कौन रहता है तुम्हारे साथ ?”

“मेरे साथ!” लड़की ने चौंककर देखा, फिर मुस्कुराई। “मैं अकेली रहती हूँ बाबू।”

“क्या तुमने अकेले ही मुझे कुएँ से निकाला था ?”

“नहीं बाबू! भला मैं अकेली तुम्हें कैसे निकाल सकती थी।” उसने सादगी से उत्तर दिया। “तुम्हारी किस्मत अच्छी कि थी एक यात्री इधर आ निकला। मैंने उससे विनती की थी। वही तुम्हें कुएँ से निकालकर मेरी झोंपड़ी तक पहुँचा गया था।”

“यानी तुम अकेली झोंपड़ी में रहती हो ?” मैंने अपना प्रश्न दोहराया। मुझे वह लड़की रहस्यमय लग रही थी। एक हसीन और जवान लड़की का किसी वीराने में तन्हा रहना बड़ी आश्चर्य की बात थी।

“हाँ बाबू!” लड़की ने अपनी खूबसूरत आँखें चमकाते हुए कहा। “तुम्हें अचंभा क्यों हो रहा है ?”

“यूं ही!” मैंने कहा और शून्य में घूरने लगा। बीती हुई रात के डरावने दृश्य मानस पटल पर घुमड़ने लगे।”

मेरी खामोशी पर लड़की भी ख़ामोश रही। फिर उसने सन्नाटा तोड़ा।

“बाबू, तुम्हारा नाम क्या है ?”

“राज!”

“सुन्दर नाम है।”

वह उठकर झोंपड़ी के अंदर गयी और खाने के लिये कुछ ताजे फल ले आयी। मैं कई दिन से भूखा-प्यासा था। सो बिना कुछ पूछे खाने पर टूट पड़ा। जब मेरे पेट की आग कुछ शांत हो गयी तो मेरे दिमाग़ ने भी कुछ काम करना शुरू किया।

“तुम्हारा नाम क्या है ?” सबसे पहले मैंने उस लड़की से उसका नाम पूछा।

“मेरा नाम कल्पना है।” लड़की ने सरमा कर उत्तर दिया।
 
वह उठकर झोंपड़ी के अंदर गयी और खाने के लिये कुछ ताजे फल ले आयी। मैं कई दिन से भूखा-प्यासा था। सो बिना कुछ पूछे खाने पर टूट पड़ा। जब मेरे पेट की आग कुछ शांत हो गयी तो मेरे दिमाग़ ने भी कुछ काम करना शुरू किया।

“तुम्हारा नाम क्या है ?” सबसे पहले मैंने उस लड़की से उसका नाम पूछा।

“मेरा नाम कल्पना है।” लड़की ने सरमा कर उत्तर दिया।

मैं मौत के मुँह से बचकर आया था लेकिन मुझे यह भी मालूम था कि यह सुकून की स्थिति अस्थाई थी। हरि आनन्द को मोहिनी की शक्ति से कभी भी यह मालूम हो सकता था कि मैं कहा हूँ और किस हाल में हूँ। उस सूरत में जब उसे मालूम हो जाएगा कि मैं ज़िंदा हूँ तो वह मुझपर जुल्म ढालने के लिये फिर से तैयार हो जाएगा। मुझे रह-रह कर वे चेहरे याद आए जो मेरे क़रीब हो कर भी दूर हो गए थे। माला याद आयी, जगदेव याद आया और मोहिनी का ख़्याल आया। मोहिनी ने गयी रात जिस बेवफ़ाई का परिचय दिया था, उससे टीसें उधरीं। कलेजा काँपने लगा। फिर उस सुरीली आवाज़ का ध्यान आया जो मेरी ज़िंदगी के अंधेरों में किरण बनकर फूटी थी और जिसने मुझे उस मुसीबत से छुटकारा दिलाया था।

वह आवाज़ किसकी थी ? उसी क्षण एक विचार मस्तिष्क में कौंधा। कहीं कल्पना ही तो नहीं थी। मैंने घबराकर उसकी तरफ़ देखा। वह मेरे चेहरे के बदलते रंगों को देख रही थी।

“क्या सोच रहे हो बाबू ? बहुत दुखी मालूम होते हो। क्या विपदा आन पड़ी है ?”

“हाँ कल्पना!” मैंने एक गहरी साँस लेकर कहा। “एक विपदा हो तो कहूँ। यहाँ तो सारा जीवन ही विपदाओं का खण्डहर है, जिसमें निराशाओं के झाड़-झंकाड़ों के सिवा कुछ भी नहीं।”

“जिस भगवान ने तुम्हें जीवित रखा है, तुम्हारे कष्टों को भी वही दूर करेगा।” कल्पना ने अपनेपन से उत्तर दिया फिर मुझे सहारा देकर कुटी के अंदर ले गयी। वहाँ चंद बर्तनों और चटाई के सिवा कुछ नहीं था। मैं कुछ देर तक कल्पना से बातें करता रहा। फिर मुझे नींद आ गयी।

कहीं शाम को जाकर मेरी आँख खुली। कुटी में एक चिराग टिमटिमा रहा था। मैंने उठकर इधर-उधर देखा। कल्पना कुटी से नदारद थी। मैंने सोचा वह किसी काम से बाहर गयी होगी। मैं उठकर बाहर आ गया। किंतु ठिठककर रुक गया। साधु जगदेव वहाँ मौजूद था। मैं साधु जगदेव को देखकर चकित होकर रह गया।

“महाराज, आप ?” मैंने कुछ उखड़े हुए अंदाज़ में कहा। “अब भी क्या कुछ बाकी रह गया है ?”

“बालक!” जगदेव की भृकुटी तन गईं। “मालूम पड़ता है तेरे मन में हमेशा अंधकार छाया रहेगा। हमें तुझसे बहुत आशाएँ थीं लेकिन तू बड़ा हठधर्मी है। तू अभी से व्याकुल हो रहा है मूरख। अभी तो तेरा कुछ भी नहीं बिगड़ा है। तूने मुझपर ही संदेह किया। मैं तेरे पास दोबारा न आता, परंतु मुझे माला रानी ने लाचार कर दिया। प्रेमलाल ने विवश किया कि तुझे एक बार फिर सही मार्ग पर लाने का प्रयास करूँ।”

“महाराज, मैं समझता हूँ! दुनिया में मेरा कोई नहीं है। सब मेरे दुश्मन हैं। मुझे क्षमा कर दो महाराज।” न जाने किस भावना के अंतर्गत मैं आगे बढ़कर उसके सीने से लग गया और ज़ोर-ज़ोर से रोने लगा।

मैंने हिचकियों के मध्य कहा। “मेरा सब कुछ छीन चुका है महाराज। माला रानी भी मुझसे जुदा हो गयी। मैं घर से बेघर हो गया और दर-बदर की खाक छान रहा हूँ। मेरा दुश्मन हरि आनन्द मेरा पीछा कर रहा है। मैं एक सादा ज़िंदगी गुजारना चाहता हूँ लेकिन मुझे चैन नहीं मिलता। तुम मेरी सहायता करो महाराज या फिर मेरा गला घोंट दो।”

साधु महाराज ने गहरी साँस लेकर कहा। “तूने सारा खेल खुद अपने हाथों बिगाड़ा है। अगर तूने पहले मेरा कहा मान लिया होता तो मैं तेरी सहायता करता। मैं तुझे कोलकाता जाने से रोकना चाहता था। तुझे बार-बार यह बात समझायी गयी कि जब तक हरि आनन्द मठ के काली मंदिर से बाहर नहीं आता, तू उस तरफ़ का मुँह नहीं करेगा। पागल क्या तुझे यह नहीं मालूम था कि जब तक हरि आनन्द काली के मंदिर में बैठा है कोई शक्ति उसका बाल बांका भी नहीं कर सकती। तेरी इच्छा यही थी कि तू हरि आनन्द का क्रिया-क्रम करे। इसके लिये ज़रूरी था कि वह मंदिर से बाहर आए। माला रानी ने मुझसे यही विनती की थी मूरख। इसी कारण मेरी शक्तियों ने तुझे कोलकाता जाने से रोका। मैं चाहता था कि मोहिनी की शक्ति तेरे सिर से चली जाए। क्योंकि मुझे विश्वास था हरि आनन्द मोहिनी की शक्ति प्राप्त करके घमंड में काली के मंदिर से बाहर आ जाएगा। उसके बाद तू उसे मार सकता था। परंतु तू अंधा हो रहा था। मोहिनी की शक्ति और उसकी जुदाई के आगे तुझे सब कुछ अर्थहीन लगता था। अब तेरी सहायता एक ही शक्ति कर सकती है।”

“मुझे रास्ता दिखाओ महाराज!” मैंने तड़पकर कहा। “मुझसे भूल हो गयी थी। मेरा ज़हन पलट गया था। मुझे क्षमा करो, मैं जानता हूँ कि तुम महान शक्ति के स्वामी हो।”

“मैं इस समय इसी कारण आया हूँ।” जगदेव ने उखड़ी हुई आवाज़ में कहा। “मेरी बात ध्यान से सुन। कल रात तुझे हरि आनन्द के कंठ से भी किसी महान शक्ति ने बचाया था। वही अब तेरी सहायता करेगी। मैं तुझे उस शुभ शक्ति का नाम नहीं बता सकता। परंतु इतना कह सकता हूँ कि अगर अब भी तूने अपनी बुद्धि इस्तेमाल नहीं की तो सारा जीवन रोता रहेगा।”

इतना कहकर वह साधु खड़े-खड़े ग़ायब हो गया। जगदेव चला गया और मुझे अपने दुर्भाग्य पर आँसू बहाने के लिये छोड़ गया। उसके एक-एक शब्द मेरे दिलो-दिमाग पर हथौड़े की चोट की तरह बरस रहे थे। यह भी न सोचा कि प्रेमलाल और जगदेव मेरे शुभ-चिंतक हैं। उन्होंने दुनिया छोड़कर वीरानें में अर्शे तक तपस्या की है। उनके आगे मोहिनी की शक्ति बेबस हो जाती थी।

पिछली रात भी मोहिनी मुझे अपनी ताक़त से नहीं बचा सकी थी। किसी रहस्यमय शक्ति के आगे मोहिनी लाचार हो गयी थी। वह हरि आनन्द को मठ की चारदीवारी से बाहर निकालना चाहता था; और यह तभी संभव था जब मोहिनी मेरे सिर से चली जाए और वह ताक़त के नशे में चूर होकर मठ की चारदीवारी से बाहर निकल आए। उसके बाद बाज़ी मेरे हाथ में होती। यूं तो प्रेमलाल और जगदेव मेरे साथ थे, परंतु अब मैंने अपनी मूर्खता से बना-बनाया खेल बिगाड़ दिया था। उसी क्षण कल्पना की आवाज़ ने मुझे ख्यालों की दुनिया से बाहर खींच लिया।

“क्या सोच रहे हो बाबू ?” वह सामने से मेरी तरफ़ आ रही थी। अब कल्पना मुझे और रहस्यमय लग रही थी। कहीं जगदेव ने उसी की तरफ़ संकेत तो नहीं किया। मुझे बचाने वाली शक्ति कोई औरत ही थी। क्योंकि मैंने उसकी सुरीली गुनगुनाहट भरी आवाज़ सुनी थी।

“कल्पना!” मैंने उसे बड़ी आशाओं के साथ संबोधित किया। “तुमने मेरे साथ बड़ा अच्छा सलूक किया है। अगर रात तुम मुझे अंधेरे कुएँ से न निकालती तो किसी को मेरी मौत पर आँसू बहाने का बहाना भी न मिलता है।”

“नहीं बाबू! मुझे शर्मिंदा न करो। कल्पना ने गंभीरता से कहा। “अगर देवताओं को मंज़ूर न होता तो तुम रात ही मर चुके होते।”

“देवताओं की कृपा अपनी जगह है। तुमने मुझ पर जो दया की है। उसे मैं कभी नहीं भूला सकूँगा।”

“मैं तो तुम्हारी दासी हूँ बाबू।” कल्पना ने दृष्टि झुकाकर उत्तर दिया।
 
न जाने मुझे ऐसा क्यूँ लग रहा है जैसे मैं उसे बरसों से जानता हूँ। इस विचार ने मुझे और परेशान कर दिया। मैंने टोह लेने के इरादे से कहा।

“कल्पना, मेरे कुछ शत्रु मेरा पीछा कर रहे हैं। हो सकता है वे मेरा पीछा करते हुए यहाँ भी आ जाएँ। तो मेरी वजह से तुम्हें भी परेशान होना पड़ेगा।”

“मेरी चिंता न करो राज बाबू। मुझ अभागन को भला कौन परेशान करेगा ?”

“तुम मेरी परिस्थिति से अनभिज्ञ हो जो ऐसी बातें कर रही हो। मेरा यहाँ से चले जाना ही उचित है।” मैंने उसकी तरफ़ देखकर कहा। “यूं भी मुझे तुम पर बोझ बनकर रहना कुछ अच्छा नहीं लगता।”

एक क्षण के लिये कल्पना की आँखों का रंग बदला और वह सादगी से बोली।

“अगर तुम्हारी यही इच्छा है तो मैं इनकार नहीं करूँगी।”

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एक और रात कब्रनाक गुजरी। उस रात किसी ने मुझे नहीं छेड़ा। मैं कुटी के फर्श पर औंधा पड़ा अपने भाग्य को कोसता रहा। दूसरी सुबह जब जागा तो कल्पना ने मेरे आगे फल रख दिए। कल्पना रात को देर तक मेरे पास बैठी रही। रात को वह कुटी से बाहर सोई। मैंने उसे लाख कहा कि अन्दर आ जाओ, मैं कुटी के बाहर सो जाता हूँ। लेकिन वह नहीं मानी। अब वह सुबह ही सुबह एक तरफ़ बैठी मुझे फल खाते देख रही थी। उसका अंदाज़ ही ऐसा था जैसे एक ही दिन में वह मेरे बहुत निकट आ गयी हो। नाश्ते से फुर्सत पाकर मैंने कल्पना से इजाज़त चाही और कुटी से बाहर आया तो वह मेरे साथ थी। मुझे उससे दूर होते हुए ऐसा लग रहा था जैसे कोई निकटतम संबंधी बिछुड़ रहा हो। दिल अंदर ही अंदर बैठा जा रहा था।

मैंने कल्पना को कुरेदने के लिये तरह-तरह की बातें की थी। लेकिन वह मुझे एक हसीन और मासूम लड़की के सिवा कुछ नज़र नहीं आ सकी। मैंने उससे जाने की आज्ञा भी ले ली। अगर साधु जगदेव के कथा अनुसार वह शक्ति कल्पना ही थी तो अवश्य मुझे हानि नहीं पहुँचा सकती। किन्तु जब उसने सादगी से मुझे जाने की आज्ञा दे दी तो मेरा दिल टूट गया। मैं दिल पर पत्थर रखकर कुटी से बाहर निकला। मेरी कोई मंज़िल नहीं थी और उन अंधेरों में कोई बात मेरी समझ में नहीं आती। फिर भी मेरी रफ्तार प्रति क्षण तेज हो जा रही थी।

आबादी के निकट पहुँचकर मैंने सोचा, क्यों न माला रानी के पास जाऊँ और उसके सामने अपनी ग़लतियों को स्वीकार करूँ। ज़िंदगी में फिर से बहार आ जाती। इस ख़्याल से दिल को कुछ चैन मिला। मैंने अपना रुख़ चाचा के घर की ओर मोड़ लिया। किंतु अभी मैं चंद कदम ही आगे गया था कि पीछे से किसी ने आवाज़ देकर पुकारा। मैंने पलटकर देखा तो आश्चर्यचकित रह गया। हरि आनन्द किसी दरिन्दें की तरह खूंखार नज़रों से मुझे देख रहा था।

“इतनी तेज-तेज कहाँ जा रहे हो कुँवर साहब ?” हरि आनन्द ने व्यंग्य से कहा। “क्या माला रानी के ख़्याल ने तुम्हें बेचैन कर दिया है। लेकिन जाने से पहले मेरा हिसाब तो चुकता कर जाओ।”

“तुम क्या चाहते हो ?” मैंने कुछ दृढ़ स्वर में पूछा। जगदेव की बातों ने मेरा कुछ साहस बढ़ाया था। यह कि कोई रहस्यमय शक्ति मेरी सहायता कर रही है। अब मेरा भयभीत होना मूर्खता थी।

“मेरा नाम हरि आनन्द है। शायद तुमने पहचाना नहीं। मैंने तुम जैसे दुष्टों की समाप्ति के लिये काली के मंदिर में बरसों तक जाप किया है। मैंने अपने जीवन का बड़ा हिस्सा इसी काम में गुज़ारा है। मैंने तुम्हारी खूबसूरत छिपकली मोहिनी पर अधिकार प्राप्त कर लिया है। क्या तुम समझते हो इतनी आसानी से मैं तुम्हें छोड़ दूँगा।” हरि आनन्द ने दाँत पीसते हुए कहा।

“तुम अब भी अपना समय नष्ट कर रहे हो पंडित। मैं तुम्हें अच्छी तरह पहचानता हूँ लेकिन तुमने मुझे पहचानने में हमेशा गलती की है।” मैंने तर्क-वितर्क उत्तर दिया। “क्या तुम भूल गए कि रात मैंने तुम्हारे सामने अंधेरे कुएँ में छलांग लगा दी थी। लेकिन वह जीवधारी कुआँ मेरा कुछ न बिगाड़ सका। मैं तुमसे कहता हूँ कि तुम मेरी राह से हट जाओ। नहीं तो यह सारा ज्ञान-ध्यान, यह सारी तपस्या खाक में मिल जाएगी।”

“मैं देख चुका हूँ टुंडे। तू मुझे क्या समझता है ?” हरि आनन्द गरज कर बोला। उस रात मेरे वीरों से चूक हो गयी। लेकिन अब कोई शक्ति तुझे मेरे हाथों से नहीं बचा सकती। याद रख, मैं काली का सेवक हूँ।

“सुनो हरि आनन्द, तुमने डॉली को मारा। मैं खून का घूँट पीता रहा। तुम अपनी कायरता से काली की शरण में जाकर छिप बैठे। तुमने माला रानी पर अपने गंदे वीरों से हमला करवाया। मैं चुप रहा और तुमने मोहिनी को प्राप्त कर लिया। तुमने शुरू से अब तक मुझ पर जुल्म तोड़े। मेरे साथ ज्यादतियाँ कीं, जबकि मैं तुम्हारा कुछ नहीं बिगाड़ सका। लेकिन अब शायद तुम्हें कोई सबक़ देना पड़े। अपनी औकात मत भूलो ओ पंडित। तुम सीमा से बाहर निकल रहे हो।” मैंने अंधेरे में हाथ-पाँव मारते हुए हरि आनन्द पर इस तरह गरजना-बरसना शुरू कर दिया।

“अच्छा!” वह जहरीले स्वर में बोला। “क्या तुम्हारा दिमाग़ ख़राब हो गया है टुंडे ?”
 
“समय अब भी है हरि आनन्द, पलट जाओ। मैंने तुम्हें क्षमा कर दिया। अगर मुझे क्रोध आ गया तो तुम्हें भागने का भी रास्ता नहीं मिलेगा।” मैंने दिल कड़ा करके दबे स्वर में कहा।

हरि आनन्द मुस्कुरा दिया। दूसरे ही क्षण उसके तेवर अचानक ख़तरनाक हो गए। उसकी सुर्ख आँखों से शोले निकलने लगे। उसके लरजते होंठों से पता चलता था जैसे वह किसी मंत्र का जाप कर रहा हो। वह मुझ पर दैवी शक्तियों का हमला करने के लिये तैयार था और अब मुझे अपना बचाव करना था। पर बचाव की कोई सूरत मुझे नज़र नहीं आती थी। अचानक हरि आनन्द ने अपना हाथ बुलंद किया। उस हाथ को वह मेरी तरफ़ छूमंतर करना ही चाहता था कि एकाएक उसका हाथ हवा में जड़ होकर रह गया। उसकी आँखें आश्चर्य से फैलती नज़र आयी और उसकी दृष्टि मेरी पीठ की ओर उठ गयी। एक क्षण में ही किसी छलावे की तरह मेरे और हरि आनन्द के मध्य कल्पना बरामद हुई तो मेरे भी आश्चर्य का ठिकाना न रहा। मेरी हालत तो यह थी कि मेरे पाँव जहाँ थे, वहीं जमकर रह गए।

“लड़की, तू कौन है ?” हरि आनन्द ने गरजकर पूछा। “और क्यों हमारे बीच में आयी है ?”

“महाराज, मेरा नाम कल्पना है! और मैं इसीलिए यहाँ आने के लिये मजबूर हुई क्योंकि मैं चाहती हूँ कि आप कुँवर राज को क्षमा कर दें और अपना ग़ुस्सा थूक दें।

“तो तू इस टुंडे हरामी की तरफ़दारी के लिये आयी है। क्या लगता है तेरा यह टुंडा ? तू इसे कैसे जानती है ? क्या तू जानती है कि मैं कौन हूँ और कितनी बड़ी शक्ति का स्वामी हूँ।”

“जानती हूँ महाराज! किंतु देवी-देवता किसी भी सेवक को अधर्म के लिये शक्तियाँ वरदान नहीं देते और जो कुछ आप करने जा रहे हैं वह अधर्म है, पाप है। पापी को नरक भोगना पड़ता है। आप क्यों अपने लिये नरक का द्वार खोलना चाहते हैं ?”

“लड़की! तू मुझे शिक्षा देती है।”

उस समय वह कल्पना मासूम भोली-भाली कल्पना नजर नहीं आती थी। वह रणचण्डी के रूप में नज़र आती थी। मेरा दिल चाहा कि इसी समय हरि आनन्द को गंदे कीड़े की तरह कुचल डालूँ। परंतु मेरी विवशता थी कि मेरे पाँव जैसे ज़मीन में गड़ गए थे। मैं अपने स्थान से जुम्बिश करने में भी असमर्थ था।

अचानक से मुझे जगदेव के वह शब्द याद आए। कोई अदृश्य शक्ति मेरी पीठ पर है। तो क्या वह शक्ति कल्पना ही है।

“लड़की, हट जा मेरे सामने से! यह मेरा अपराधी है और मैं इसे हरगिज क्षमा नहीं कर सकता। तू अभी इसकी जात नहीं जानती। क्यों अपना जीवन बर्बाद करना चाहती है। तुझसे पहले इसने कई लड़कियों का जीवन बर्बाद किया है।”

“यह चाहे जो भी है, मैं रास्ता नहीं छोड़ सकती क्योंकि प्रेम अंधा होता है। प्रेम जात नहीं देखता। प्रेम की भाषा, प्रेम की आँच के सामने दुनिया की कोई चीज़ महत्व नहीं रखती। तुम इसे चंद दिनों से जानते होगे। परंतु मैं इसे सदियों से जानती हूँ। तुम्हारी तपस्या चंद दिनों, चंद महीनों या चंद बरसों की ही हो सकती है। और मैं प्रेम की आँच में सदियों से जलती रही हूँ।”

हरि आनन्द क्रोध से काँपने लगा।

“तो देख, किसका तप बड़ा है। मैं उसे खाक में मिलाता हूँ। तू अपने प्रेम से कह कि उसे बचा ले।” इतना कहकर हरि आनन्द मेरी तरफ़ बढ़ा।

किंतु चंद कदम चलते ही वह इस प्रकार रुका जैसे उसे कोई अनहोनी बात नज़र आ रही हो। उसका जिस्म काँपने लगा। चेहरे पर भय और आश्चर्य की धूल उड़ने लगी। फिर मैंने उसे पलटते हुए देखा। वह तेज क़दमों से वापस जा रहा था। जब मेरा ध्यान कल्पना की तरफ़ गया तो कल्पना भी अदृश्य हो चुकी थी। कल्पना के ग़ायब हो जाने के बाद यह बात और भी ठोस हो गयी कि मेरी पीठ पर सहायता करने वाली जिस शक्ति के बारे में साधु जगदेव ने बताया था, वह कल्पना ही थी। कल्पना मुझे प्रेम करती थी। उसने कहा था वह सदियों से मेरे प्रेम की तपस्या कर रही है। कल्पना के प्रेम ने मुझे झकझोर कर रख दिया। किस्से-कहानियों की बात और होती है। परंतु यथार्थ में सदियों तक अमर रहने वाला प्रेम आज ही मैंने देखा था। मैं सब कुछ भूलकर वापस कब्रिस्तान की वीरानी कुटी की ओर दौड़ा पड़ा। कुछ ही देर में मैंने अपने-आपको कुटी के सामने पाया।

मैं कल्पना को आवाज़ें देता कुटी में प्रविष्ट हुआ। परंतु वहाँ कल्पना कहाँ थी। वहाँ तो इस तरह की धूल उड़ रही थी जैसे बरसों से इस झोंपड़ी में कोई आया ही न हो। अब मैं कल्पना की कल्पना भर कर सकता था। मेरा दिल सिसकता हुआ और हताश सा कुटी के बाहर निकला। कोई न था, दूर-दूर तक वीरानियाँ थी। वह एक खामोशी, गहरी खामोशी थी। वह सदियों तक प्रेम की आँच में तपने वाली न जाने कहाँ चली गयी थी। उसकी यादें मेरे सीने में एक हौल बन चुकी थी और मैंने तय किया कि मैं वहीं उसका इंतज़ार करूँगा। उसने सदियाँ बितायीं तो अब मैं भी सदियों तक उसका इंतज़ार करूँगा। जब तक कल्पना मुझे नहीं मिलती, मैं कुटी में उसका इंतज़ार करूँगा।

धूप चमक आयी थी और मैं निढाल होकर वहीं पर बैठ गया।

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दोपहर सिर पर आ गयी तो मुझे भूख-प्यास ने सताना शुरू किया। मेरी हालत अब भी भिखारियों जैसी थी। मैं बेताज बादशाह, जिसके पास दौलत ही दौलत हुआ करती थी, जिसने मोहिनी के प्रताप से बड़ों-बड़ों को गुल खिलाए थे। वही कुँवर राज ठाकुर अब यह बयान करके बार-बार शर्मिंदा नहीं होना चाहता था कि किस तरह मैंने अपने पेट का जहन्नुम भरा।

जब मैं निकटतम आबादी से अपने पेट की आग शांत करके वापस लौटा तो कुटी के पास आते ही ठिठककर रुक गया। कब्रिस्तान से कुछ अलग हटकर मैंने एक व्यक्ति को आलथी-पालथी मारे जप करते देखा। निकट पहुँचते ही मैंने उसे पहचान लिया। वह जगदेव था। साधु जगदेव के चारों तरफ़ चूने का सफ़ेद दायरा खींचा हुआ था और वह किसी जाप में लीन था।

साधु जगदेव को इस तरह मण्डल में बैठा देख मैं हैरत में पड़ गया।

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कुछ क्षण बाद अपनी साँसों पर काबू पाते हुए मैंने साधु जगदेव को संबोधित करने की कोशिश की लेकिन मेरी आवाज सन्नाटे की गूँज बनकर रह गयी। जगदेव ने मेरी आवाज का कोई उत्तर नहीं दिया। मैंने उसे गला फाड़-फाड़कर आवाजें दीं, लेकिन कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई। फिर मैंने सोचा निकट जाकर झिंझोड़ू लेकिन मेरे सामने की लकीर एक दीवार बन गयी।

मण्डल, यह ज्ञान-ध्यान, यह रहस्यमय जाप मेरे लिये कोई नयी बात नहीं थी। पहले भी मैं त्रिवेणी और शिवचरण को मण्डल में बैठे देख चुका था। मैं जानता था यदि साधु जगदेव किसी जाप में मग्न है तो मेरा मण्डल में घुसना मौत को दावत देना है। अतः मैंने आगे बढ़ने का विचार त्याग दिया और थक-हारकर मण्डल के बाहर बैठ गया। शायद जगदेव के जाप का समय बहुत कम हो और अपना जाप खत्म करके संभव है शाम तक बाहर आ जाए।

फिर मैं झोंपड़ी के निकट आकर धूप में लेट गया। इन बातों ने मेरी बुद्धि को जकड़कर रख दिया था। कोई बात समझ में नहीं आती थी। आख़िर जगदेव किस क़िस्म के जाप में व्यस्त हो गया। कल्पना कहीं जगदेव का दूसरा रूप तो नहीं है। यह भी संभव है। अब मैं जगदेव के निर्देश के बिना कोई कदम नहीं उठाना चाहता था। वह रात गुज़र गयी। फिर दूसरा दिन गुज़र गया। फिर तीसरा दिन गुज़र गया। मैं कभी झोंपड़ी में पड़ा रहता, कभी मण्डल के क़रीब जगदेव को ताकने लगता। कभी खाने के लिये कब्रिस्तान से बाहर चला जाता। जगदेव का जाप खत्म नहीं हुआ। चौथे रोज़ तंग आकर मैंने एक फ़ैसला किया कि मुझे एक बार तो अपने घर चलना चाहिए। चाचा का घर अपना घर है और अपने घर में यह झिझक कैसी।

अतः जगदेव से मिलने का इरादा छोड़कर मैं उस रास्ते पर चल पड़ा जो मेरे घर को जाता था।

लखनऊ की जानी-पहचानी सड़कों पर मैं किसी अजनबी की तरह चला जा रहा था। मुझे विश्वास था कि कोई मुझे पहचान नहीं पाएगा। जब मोहल्ले की गलियाँ आईं तो मैंने लोगों से कतराकर निकलना चाहा। मैं परिस्थिति के ताने-बाने जिस कदर सुलझाने की कोशिश करता वह उसी कदर उलझ जाते।

मैं जब उस गली में प्रविष्ट हुआ जहाँ चाचा का घर था तो दिल डूबने लगा, कदम लड़खड़ाने लगे। जी चाहा कि वापस लौट जाऊँ। बदन पर मैल की तहें जमी हुई थीं। सिर और दाढ़ी के बाल झाड़-झंकाड़ की तरह उगे हुए थे। शरीर के सारे कपड़े फट रहे थे और काले पड़ गए थे। घर के पास पहुँचकर गुजरी हुई बातें एक-एक करके याद आने लगीं। मैं अभी घर से चंद कदम के फासले पर था कि एकाएक मेरे सिर में चुभन सी महसूस होने लगी। वही जानी-पहचानी सी चुभन जो मोहिनी के आगमन का ऐलान थी। मैंने घर जाने की बजाय अचानक वापस जाने का इरादा किया और तेजी से दूसरी गली में चला आया। फिर मैंने बेचैनी की स्थिति में कल्पना की दुनिया में सिर पर नज़र डाली। मोहिनी छिपकली, वह जहरीली खूबसूरत बला मेरे सिर पर मौजूद थी। मैंने एक सर्द आह भरकर पूछा।

“अब क्या हुक्म देने आयी हो ?”

“कुँवर राज ठाकुर!” मोहिनी ने सर्द लहजे में उत्तर दिया। “तुम मुझे पहचानते हो ? मैं कौन हूँ ?”

“मोहिनी!” मैंने रुँधी हुई आवाज़ में कहा। “दिल पर नश्तर मत चलाओ। साफ़-साफ़ बात करो। क्या कहना है ?”

“तुम मेरी ताक़त से वाकिफ़ हो।”

“मैं तुम्हारे हर रूप से वाकिफ़ हूँ। काश! तुम्हें मरना भी आता। काश! तुम महसूस भी कर सकती।”

“बातें बनाने की बजाय तुम मेरे आका पंडित हरि आनन्द को भी खूब जानते हो। वह महान शक्तियों का स्वामी है। उसकी शक्ति से टकराने वाले का अंजाम बुरा होता है। तुम कभी मेरे आका के कष्ट से बच नहीं सकते।”

“मुझे मालूम है। मगर तुम क्या कहना चाहती हो ?”

“तुम हरि आनन्द के कष्ट से बच सकते हो लेकिन एक शर्त पर।”

“वह क्या है ?” मैंने धड़कते हुए दिल से पूछा।

“तुम्हें मुझे कल्पना की हैसियत बतानी होगी।”

“कल्पना ?” मैंने दोहराया। “मैं नहीं जानता कि वह कौन है ?”

“मुझसे कोई बात छुपाई नहीं जा सकती। यह बात तुम जानते हो।” मोहिनी ने गजबनाक आवाज़ में कहा। “अगर ज़िंदगी प्यारी है तो कल्पना की हैसियत और उसके ठिकाने से आगाह कराओ। वरना मुझे अपने आका को ख़ुश करने के लिये तुम्हारे लहू से अपना अस्तित्व तर करना होगा।”

मैंने खूब संभलकर कहा। “जब तुमसे कोई बात छुपाई नहीं जा सकती तो तुम अपनी शक्ति से क्यों मालूम नहीं कर लेती। मैं तुम्हारी धमकियों में न आ सकूँगा। तुम्हें जो करना है कर लो।”
 
“कुँवर राज ठाकुर!” मोहिनी ने तेज स्वर में कहा। “मुझे बताओ कल्पना कौन है ? अधिक समय नष्ट न करो।”

“मैंने कह दिया कि मुझे नहीं मालूम। लेकिन मोहिनी क्या तुम्हारी रहस्यमय शक्ति कल्पना का रहस्य मालूम करने में असफल हो गयी है ?” मैंने पहली बार मोहिनी से धड़ल्ले से बात की। “मेरी जान मोहिनी। अब तुम्हारी कोई भी धमकी कारगार नहीं होगी। सारी बात मेरी समझ में आ गयी है। मुझे तुम्हारी बेबसी पर पहली बार ख़ुशी हुई। तुम कल्पना को भी नहीं जान सकती। क्योंकि उसे हरि आनन्द से बड़ी शक्ति प्राप्त है।”

अब मेरे कुछ कहने का समय था। मैं समझ गया था कि मोहिनी मायूस होकर मुझसे कल्पना का राज जानने आयी है और मैं बिल्कुल सुरक्षित हूँ। लेकिन मोहिनी ने चलते-चलते अपने पंजों की चुभन से मेरा बुरा हाल कर दिया। स्पष्ट था कि मेरे पास कल्पना का कोई राज न था और उसने बराबर कोशिश की कि वह मुझे बेबस कर दे। परंतु वह अचानक ही चौंककर भयभीत सी हो उठी और एकदम फुदककर मेरे सिर से नीचे उतरकर अदृश्य हो गयी। मोहिनी के इस व्यवहार से मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ। जगदेव की हर बात दुरुस्त साबित हो रही थी। कोई रहस्यमय शक्ति निरन्तर मेरी सहयता कर रही थी। कोई ऐसी महान शक्ति जिसके आगे मोहिनी की शैतानी ताकतें भी पनाह माँग गयी थीं। बहरहाल मुझे यक़ीन हो गया था कि अब कुछ दिनों के लिये हरि आनन्द से भी मुझे छुटकारा मिल जाएगा। वह मेरे सामने आने से कतरा रहा था लेकिन इसका मतलब यह भी हरगिज नहीं था कि उसने मेरे प्रति इंतकाम की भावना ही अपने दिल से निकाल दी हो। यह संभव नहीं था कि वह जलील और जालिम व्यक्ति इतनी आसानी से अपने पुराने दुश्मन को भूल जाता। मोहिनी को उसी ने मेरे सिर पर भेजा था ताकि वह कल्पना का राज हासिल कर सके। उस घटना के कारण मैं अपने मकान की पिछली गली में सहमा खड़ा था और अपने होश-हवाश दुरुस्त कर रहा था। फिर मैं किसी कदर हौसले के साथ मकान की सामने वाली गली में आया और मकान के दरवाज़े पर पहुँचकर दोबारा रुक गया।

मुझे अंदर जाते हुए झिझक हो रही थी। पता नहीं मुझे इस हूलिए में देखकर उनका मेरे साथ क्या बर्ताव होगा। मैं चंद लम्हे दरवाज़े पर उलझा सा खड़ा रहा। फिर मैंने धीरे से दरवाज़े पर दस्तक दी। मेरी बहन आशा ने दरवाज़े की आड़ से मेरा चेहरा देखकर तेजी से दरवाज़ा बंद कर दिया। निश्चय ही वह मुझे नहीं पहचानती थी।

“ठहरो!” अंदर से सहमी हुई आवाज़ आयी।

मेरे भीतर के गैरतमंद इंसान ने कहा। वापस चले जाओ। परंतु अभी मैं इसी कशमकश में था कि एक हाथ दरवाज़े से बाहर निकला जिसमें मेरे लिये भिक्षा थी। रोटी। रोटी, जो इंसान का सबसे बड़ा जहन्नुम है। मैंने रोटी ले ली और वापस होना चाहा लेकिन घर के भीतर की जानी पहचानी आवाज़ें सुनकर कदम थम गए। आशा चली गयी थी। मैंने दोबारा दस्तक दी। इस बार माला ने दरवाज़ा खोला और मुझ पर एक उचटती सी नज़र डाली और फिर बोली।

“अब क्या चाहिए ?”

“माला, क्या तुमने भी नहीं पहचाना ? मैं हूँ राज।”

“आप।!”

दरवाज़ा पूरा खुल गया और माला एकदम सामने आ गयी।

“हाँ मैं! मैं वापस आ गया हूँ।” मैंने टूटे स्वर में कहा।

माला ने आश्चर्यचकित दृष्टि से मुझे देखा। फिर फट से दरवाज़ा खोल दिया और ड्योढ़ी में वह बेतहाशा मेरे सीने से चिपक गयी। आँसुओं की झड़ी लग गयी। मैं उसे संभालता हुआ अंदर ले गया। वहाँ दोनों बहनें थीं। उन्होंने आश्चर्य से देखा कि कौन पागल माला के कंधे पर हाथ रखे घर में घुसा चला आया है। मैंने उनका आश्चर्य दूर करने के लिये सबसे पहले आशा को गले लगाया। उन्हें मुझे पहचाने में देर नहीं लगी और फिर सारे घर में हलचल मच गयी। उन्होंने मुझसे तरह-तरह के प्रश्न करने शुरू कर दिए। मैंने उन्हें बताया कि मैं एक मुसीबत में गिरफ़्तार हो गया था और यह एक लम्बी कहानी है, फिर कभी सुन लेना। मेरे होंठ कंपकंपा रहे थे। शक्तियाँ जवाब दे गयी थीं। सिर्फ़ आँसू बह रहे थे। वह सब मुझसे लिपटे हुए थे और मैं उन्हें दिलासा दे रहा था। अब मैं आ गया हूँ। बुरे दिन गुज़र गए। मेरी परीक्षा का समय बीत चुका।

फिर चाचा भी आ गये। दिन भर मैं उन लोगों से घिरा रहा और उन्हें अपनी दुख भरी कहानी सुनाता रहा। दिन में उन्होंने तरह-तरह के पकवान बनाए। आशा ने कोई दस बार मेरे सामने हाथ जोड़े कि उसने मुझे कोई भिक्षुक समझकर रोटी दिए थे। रात आयी और आख़िर एकांत मिला तो मैंने माला के रूप-रंग का सरापा अपनी आगोश में पूरी शक्ति से समेट लिया। मेरे दिल में उस समय उसके प्रति बेहद प्यार उमड़ आया था और मैंने अपने जेल के बर्ताव की क्षमा माँगी। सारी रात हम दोनों जागते रहे। हम दोनों एक दूसरे से गिले-शिकवे करते रहे।

मैंने अपनी पूरी विपदा सुनाने के बाद उसे हरि आनन्द के सिलसिले में बताया और यह भी कि किस तरह उसने मोहिनी को प्राप्त करके मुझसे इंतकाम लेना चाहा। मैंने साधु जगदेव और कल्पना के संबंध में भी बताया।

“हरि आनन्द अब भी मेरी फिराक में है। माला मेरी ज़िंदगी अब भी ख़तरे से घिरी है और मेरी समझ में नहीं आता कि मैं किस तरह उससे छुटकारा हासिल करूँ।”
 
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