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Fantasy मोहिनी

“राज, हरि आनन्द एक कमीना और जालिम इंसान है। उसके पास जो शक्तियाँ हैं उससे निपटना आसान काम नहीं। परंतु तुम हिम्मत मत हारो। इंसान पर मुसीबतें तो आती ही रहती हैं।”

“फिर भी मुझे कुछ तो करना होगा।”

“मैं तुम्हें एक उपाय बताती हूँ। तुम्हें कुलवन्त याद है ?”

“कुलवन्त!”

कुलवन्त का नाम सुनते ही मुझे एक झटका सा लगा। आख़िर मैं किस तरह उसे भूला बैठा। पूना के क्लबों की शान। अमीरों की महफ़िल की शमां कुलवन्त। जिसने मुझे बेपनाह मोहब्बत की थी। जिसने मेरे लिये घर-बार छोड़ा और फिर वही कुलवन्त...।

आह! कुलवन्त का चेहरा मेरी आँखों के सामने घूमने लगा। कुलवन्त ने संसार की मोह-माया से छुटकारा प्राप्त पर लिया था। वह जोगन बन गयी थी। उसने बाबा प्रेमलाल का स्थान प्राप्त कर लिया था और माला जैसी सुन्दर लड़की को मेरी झोली में डाल दिया था।

“ओह माला! मैं इस पूरे समय में उसे भूल ही गया था।”

“यह इंसान की एक फितरत है। इसमें तुम्हारा कोई दोष नहीं।”

“लेकिन तुम कुलवन्त के बारे में क्या कहना चाहती हो ?”

“कुलवन्त मैसूर की पहाड़ियों में तप कर रही है और उसे बाबा का स्थान प्राप्त है। देवी-देवताओं का आशीर्वाद उसके साथ है। कुलवन्त इन शैतानी शक्तियों से आपको छुटकारा दिला सकती है। आप एक बार उससे मिलिए।”

माला का बताया उपाय मेरे मस्तिष्क में जम कर रह गया और मैंने तय किया कि मैं कुलवन्त की तलाश में एक बार फिर मैसूर की उन्हीं पहाड़ियों तक जाऊँगा।

आठ रोज़ तक मैंने साधु जगदेव का मण्डल से निकलने का इन्तजार किया। परंतु जगदेव मण्डल से न निकला तो आवश्यक तैयारियाँ करके मैं मैसूर के लिये रवाना हो गया। एक बार फिर आँसुओं से माला के साथ मेरी जुदाई के लिये अलविदा कहा। फिर मैं मैसूर की पहाड़ियों के लिये चल पड़ा। मेरे लिये वह रास्ते जाने-पहचाने थे। मैं आठ रोज़ तक उन पहाड़ियों में भटकता, अनगिनत मुसीबतें सहन करता आख़िर बाबा प्रेमलाल के स्थान तक पहुँच ही गया।

झरने के पास मुझे किसी के गुनगुनाने की आवाज़ सुनाई दी। मेरी आशा बँधी और मैं झरने की तरफ़ बढ़ता चला गया। परंतु जब मैं उस लड़की के निकट पहुँचा तो मुझे देखकर हैरत हुई । वह लड़की तरन्नुम थी। अपनी आप बीती सुनाते वक्त मुझे बहुत सी बात छोड़नी पड़ी। क्योंकि मेरी आप बीती संघर्ष और मुसीबतों का एक लम्बा सिलसिला है। जब तरन्नुम को देखा तो बीती बातों का ख़्याल आया। लखनऊ में यह लड़की मुझे मिली थी। मुसीबतों में घिरी, भोली-भाली मासूम लड़की। अशर्फी बेगम याद आयी। जिसके बाला खाने पर तरन्नुम के हुस्न की चकाचौंध थी और लखनऊ के उमरा नवाबेन उसकी नथ उतराई के लिये बोलियाँ लगा रहे थे। मोहिनी ने मुझे बताया की तरन्नुम कौन थी। मेरे स्वर्गीय पिता के एक जिगरी दोस्त थे दौलत अली ख़ान। मुझे उनकी धुँधली सी याद आती थी और अहसास होता था कि तरन्नुम के साथ मैं बचपन में खेला करता था। तरन्नुम दौलत अली ख़ान की इकलौती लड़की थी। बचपन में वह मुझे राखी बाँधा करती थी। यह वही तरन्नुम थी जिसकी बोलियाँ एक कोठे पर लग रही थी।

तरन्नुम अशर्फी बेगम के कोठे तक कैसे पहुँची, यह एक लम्बी कहानी थी। सारांश यह था कि दौलत अली ख़ान अपनी ढलती उम्र में अशर्फी बेगम के इश्क़ में गिरफ़्तार हो गए थे। उनकी पत्नी का इंतकाल हो गया था। फिर अशर्फी बेगम ने दौलत अली ख़ान को ज़हर देकर मार डाला और तरन्नुम को हथिया लिया। हालाँकि तरन्नुम को अशर्फी बेगम ने अपनी लड़की की तरह पाला था। परंतु यह सब उसने तरन्नुम की जवानी से लाखों रुपया लूटने के लिये किया था। मोहिनी ने इतनी बातें मुझे बताई थी और फिर मेरे जमीर ने अपनी इस धर्म बहन को शैतानों के चंगुल से निकालने के लिये ललकारा। मैंने तरन्नुम को नहीं बताया कि मैं कौन हूँ। उस समय जब मैंने यह फ़ैसला किया तो नवाब बब्बन अली तरन्नुम की नथ उतराई की क़ीमत देकर अपनी हवेली में ले जा चुका था। बस मैंने नवाब को छाप डाला। मेरे लिये यह कोई मुश्किल काम नहीं था। मोहिनी मेरे साथ थी। तरन्नुम को मैंने हवेली से निकाल लिया। इस पर नवाब बब्बन अली मेरा जानी दुश्मन बन बैठा। अशर्फी बेगम भी मेरी दुश्मन बन गयी और उन्होंने तरन्नुम को फिर से पाने के लिये जेहाद छेड़ दिया। मुझ पर कातिलाना हमले हुए। परंतु जिसके पास मोहिनी हो भला उसका कौन क्या बिगाड़ सकता है। और फिर एक दिन तरन्नुम अचानक लखनऊ से ग़ायब हो गयी।

वही तरन्नुम अब मेरे सामने थी। वह ठगी-ठगी सी मुझे देख रही थी।

“आप, कुँवर साहब यहाँ ?”

“यह पहाड़ियाँ मेरे लिये नई नहीं है तरन्नुम। मगर तुम यहाँ क्या कर रही हो ? लखनऊ से अचानक तुम कहाँ ग़ायब हो गयी थी ?”
 
“मैं यहाँ एक देवी की पनाह में हूँ। उसके क़दमों की धूल बनकर अपनी ज़िंदगी बिता रही हूँ। यह देवी मेरे ख्वाबों में आया करती थी। तब जब आपने मुझपर रहम खाकर उन शैतानों के चंगुल से निकाला था। वह मेरे गमों की साथी बन गयी। मुझे रास्ता दिखाया करती। फिर मेरी चाह हुई कि इस देवी के पास चली जाऊँ जहाँ मुझे सुकून मिलेगा और एक दिन जब मेरी आँख खुली तो मैंने अपने-आप को यहाँ पाया और तब से यहीं हूँ। अब यहाँ से वापस लौटने का दिल नहीं चाहता। दुनिया के हर खूबसूरत रंग बेकार, बेमानी लगते हैं।”

“क्या तुम मुझे अपनी उस देवी के दर्शन करवाओगी ?”

“हाँ, आइए! वह यहीं एक कुटी में रहती हैं।”

उसके बाद तरन्नुम मुझे जिस देवी के दर्शन कराने ले गयी वह कुलवन्त ही थी। जोगन कुलवन्त जिसका चेहरा अब कुन्दन की तरह तप गया था। जिसकी आँखों से एक बेताबी सी थी। मुझे देखकर कुलवन्त मुस्कुराई।

“आइए कुँवर साहब! बड़े दिनों में रास्ता भूले।”

मैं बहुत शर्मिंदा था। तरन्नुम को यह देखकर बड़ी हैरत हुई कि मैं उस देवी को जानता हूँ। हमें इस तरह बातें करते देख वह पूछ बैठी।

“कुँवर साहब! क्या आप इन्हें जानते हैं ?”

“शायद तुम भूल गयी तरन्नुम। मैंने तुमसे कहा था कि मैं यहाँ पहली बार नहीं आया हूँ।”

तरन्नुम ने फिर कुछ नहीं पूछा। मैं कुलवन्त से क्षमा-याचना करने लगा। हम दोनों एक-दूसरे के सामने आलथी-पालथी मारे बैठे बातें करने लगे। पुरानी बातें, नई बातें। जबकि तरन्नुम अपनी देवी की आज्ञा पाकर मेरे लिये खाने-पीने की व्यवस्था में लग गयी। कुलवन्त की कुटी में मेरा स्वागत एक विशिष्ट मेहमान की तरह हुआ। मैं बेहद थका-हारा था। फिर भी कुलवन्त को पाकर मेरी सारी थकान दूर हो गयी थी और गयी रात तक मैं उससे बातें करता रहा। फिर कुटी में दिन बीतने लगे।

एक दिन मैंने कुलवन्त को अपने आगमन का कारण बताया। मैंने अभी बात शुरू भी न की थी कि वह बोली।

“तुम्हें कुछ बताने की ज़रूरत नहीं राज। मैं सब जानती हूँ। तुम भले ही मुझे भूल गए हो। परंतु मेरी आँख बराबर तुम्हें और माला को देखती थी। तुम यहाँ न आते तो भी तुम्हारी रक्षा करना मेरा कर्तव्य बन जाता। लेकिन अब अधिक चिंतित होने की आवश्यकता नहीं। हरि आनन्द का समय आ गया है।”

अब कुलवन्त को कुछ बताना बेकार था। कुलवन्त को देख-देखकर एक जोश सा मेरे मन में उठता था। मेरे हवास पर एक तूफ़ान सा डोलने लगता था। वह पहले से भी अधिक सुन्दर हो चुकी थी और मेरी बाहें उसे अपनी आगोश में लेने के लिये मचल उठतीं। परंतु तरन्नुम की उपस्थिति मेरे हवास को फिर से क़ाबू में ले आती। उस समय तरन्नुम वहाँ न थी। उसकी अनुपस्थिति में ही हम यह बातें कर सकते थे।

“कुलवन्त, शायद तुम यह महसूस न करो। परंतु सच तो यह है कि जब से मोहिनी गयी मैं मानसिक रूप से बीमार हो गया हूँ। मोहिनी मेरी ज़रूरत बन गयी थी। अब मैं स्वयं को बेबस महसूस करता हूँ। क्या तुम मेरे लिये एक काम नहीं कर सकती ? मोहिनी को वापस ला दो। अगर तुम कोई ऐसा जाप शुरू करो तो चालीस दिन के अंदर-अंदर मोहिनी को प्राप्त कर सकती हो और तुम्हारे लिये यह कोई कठिन कार्य नहीं।”

“मोहिनी से बहुत प्यार है तुम्हें। मगर मोहिनी तो बड़ी हरजाई है। एक ख्याली तस्वीर। कभी छिपकली तो कभी सुन्दर शोख चंचल लड़की। नन्हीं-मुन्नी, हसीन-ओ-जमिल। बस उसकी यह कमज़ोरी है कि जो उसे प्राप्त कर लेता है उसकी ग़ुलाम हो जाती है। मगर राज, मैं मोहिनी का जाप नहीं कर सकती! इसलिए कि मेरी दृष्टि अगर एक बिंदु पर स्थिर हो जाए तो बड़ा अनिष्ट हो सकता है।” कुलवन्त ने उलझे स्वर में कहा।

“तुम्हारी बात मेरी समझ में नहीं आ रही है। मेरा विचार है कि तुम आज ही उसे प्राप्त करने का जाप शुरू कर सकती हो और इस तरह हरि आनन्द का घमंड तोड़ सकती हो।”

“इस समय यह संभव नहीं है कि मोहिनी तुम्हें मिल जाए। मैं तुमसे निवेदन करती हूँ कि समय से पहले किसी की ज़िद न करो।”

मैं कुलवन्त के स्वर से सहम सा गया और ख़ामोश हो गया। फिर कुछ देर बाद मैंने स्वयं सन्नाटा तोड़ा।

“मोहिनी की उपस्थिति से ढाँढस बँधी रहती थी। अब मैं स्वयं को खाली-खाली महसूस करता हूँ। यह मोहिनी की ही कृपा थी कि उसने मुझे तुमसे मिलवाया था। याद है तुम्हें ?”

“मुझे सब कुछ याद है राज। ऐसी बातें भूल कौन सकता है ?” कुलवन्त भावनात्मक स्वर में बोली। “मगर यह बातें एक खूबसूरत सपने के सिवा कुछ नहीं थीं। तुम भी वह बातें भूल जाओ। मैंने अपनी एक और दुनिया बना ली है। दुनिया से मेरा रिश्ता सिर्फ़ इतना है कि तुम इस दुनिया में रहते हो, तुमने माला रानी को जीवन संगिनी बनाया, बस।”

बीती बातों का ज़िक्र चल निकला। वातावरण बोझिल सा हो गया। कुलवन्त शायद अतीत में खो गयी थी। किंतु तुरंत ही उसने स्वयं पर क़ाबू पा लिया और कहने लगी।

“मोहिनी किसी न किसी रूप में तुम्हारे पास आ जाएगी।” कुलवन्त ने मुझे विश्वास दिलाया था। इसका मतलब यह था कि वह इस सिलसिले में कोई न कोई ठोस कदम उठाएगी। फिर मैंने कल्पना का ज़िक्र छेड़ दिया तो कुलवन्त बोली।

“तुम उसे अपनी मोहिनी का दूसरा रूप समझो।”

“महान शक्तियों ने उसे तुम्हारी सहायता के लिये दिया है। जब तुम्हारे दुख के दिन मिट जाएँगे, तो कल्पना का काम भी समाप्त हो जाएगा।”

“परंतु कुलवन्त, यह समय कब आएगा जब मुझे हरि आनन्द के कोप से मुक्ति मिलेगी। अब मैं थक चुका हूँ।” मैं किसी न किसी प्रकार हरि आनन्द का ज़िक्र बार-बार बीच में ले आता।

“राज, काली की भक्ति ने उसे घमंडी बना दिया है। परंतु एक न एक दिन उसे पछताना पड़ेगा। हालात अवश्य बदलेंगे। तुम समझते हो कि इतनी जल्दी पलक झपकते ही यह तमाशा खत्म हो सकता है। अगर ऐसा संभव होता तो क्या कुलवन्त तुम्हारी सहायता से इनकार करती ?”

“आजकल वह कहाँ है ?” मैंने जानकारी चाही। “कल्पना से आमना-सामना होने के बाद वह मुझे नज़र नहीं आया।”

“वह हर समय कल्पना का रहस्य जानने के लिये व्याकुल है। इसलिए उसने मोहिनी को तुम्हारे सिर पर भेजा था। परंतु उसे मायूसी हुई।”

“तो इसका मतलब यह हुआ कि हरि आनन्द कल्पना की शक्तियों के सामने कोई हैसियत नहीं रखता ?”

“नहीं, तुम ग़लत समझ रहे हो। रहस्यमय शक्तियाँ एक-दूसरे के साथ उलझने से परहेज करती हैं। जब तक कि उन्हें देवताओं की आज्ञा प्राप्त न हो। कल्पना ने अपने संबंध में इतनी सावधानी कर ली थी कि उसकी हैसियत हरि आनन्द के नज़रों से अदृश्य रहे। इसलिए हरि आनन्द और मोहिनी दोनों ही उससे अनभिज्ञ हैं।”

“कहीं कल्पना और जगदेव महाराज एक ही शरीर के दो रूप तो नहीं हैं ?” मैंने संदेह मिटाना चाहा।

कुलवन्त ने टालते हुए कहा। “मैं इतनी सारी बातें तुम्हें नहीं बता सकती। समय आने दो।”

“सिर्फ़ एक बात और। क्या कल्पना मुझे दोबारा मिल सकेगी ?”

“हाँ, अगर भगवान न चाहे तुम पर कोई विपत्ति आन पड़ी तो वह ज़रूर तुम्हारी सहायता करेगी।”

“कुलवन्त, क्या यह संभव नहीं कि मैं स्वयं भी किसी तपस्या के बिना कल्पना से मिल लिया करूँ ?”

“क्यों ?” कुलवन्त ने तेजी से पूछा।

“यूं ही!” मैंने शरारत से कहा। “वह बहुत सुन्दर है। उसे देखने और बातें करने को दिल चाहता है।”

“तुम्हारा मन अभी तक सुन्दर नारियों से नहीं भरा।”

मैंने एक ऐसी बात कह दी थी कि कुलवन्त अपने तमाम जोग तपस्या और त्याग के बावजूद हँस पड़ी।

“कभी-कभी अच्छी चीज़ें देखने और अच्छी औरतों से मिलने को जी चाहता है।”
 
मैंने एक ऐसी बात कह दी थी कि कुलवन्त अपने तमाम जोग तपस्या और त्याग के बावजूद हँस पड़ी।

“कभी-कभी अच्छी चीज़ें देखने और अच्छी औरतों से मिलने को जी चाहता है।”

“अब इन शरारतों से बाज आ जाओ।” कुलवन्त ने मुझे प्यार से घूरते हुए कहा। “माला रानी जैसी सुंदर पत्नी के होते दूसरी औरतों के बारे में नहीं सोचना चाहिए।”

“यह तुम कह रही हो। क्या तुम्हें याद नहीं कि तुमने डॉली के होते हुए भी मेरी दासी बनने की इच्छा प्रकट की थी।”

मैंने कुलवन्त को और निकट लाने के लिये पिछली बातों को उखाड़ना शुरू कर दिया। कुलवन्त के परी पैकेट को देखकर मेरे हवास जवाब देने लगे थे।

“उस समय मुझे इतनी सूझ-बूझ कहाँ थी।” कुलवन्त ने शर्माकर कहा।

शर्म की सुर्खी ने उसका चेहरा अंगार कर दिया था। मेरी महबूबा कुलवन्त मेरे साथ रहती थी और मैं उसके क़रीब दूसरे कमरे में सोता था। मुझे वह दिन याद आ जाते जब कुलवन्त मेरे साथ रहा करती थी। यहाँ आकर शुरू-शुरू में तो मैं इस कुटिया और यहाँ के वातावरण से सहमा-सहमा सा रहा। किंतु जब कुलवन्त से बहुत सी बातें हुई और उसने मेरी आवो-भगत में कोई कसर उठा न रखी तो मेरी झिझक खत्म हो गयी। उस अरसे से मेरे बाज़ू अनेक बार कुलवन्त को अपने बंधन में लेने के लिये तरसे और उस समय जब बात शर्म-ओ-हया की लाली तक जा पहुँची तो फिर मैं उठा और बिना किसी बात की परवाह किए कुलवन्त को बढ़कर सीने से लगा लिया।

“यह पाप है राज।” वह कसमसाने लगी। “दूर हटो!”

“नहीं कुलवन्त, यह पाप नहीं है! प्रेम है। पाप नहीं है। पाप और प्रेम में सदियों का फासला होता है।”

मैंने उसके कसमसाने और तड़पने के बावजूद उसके लबरेज होंठों पर अपने होंठों की मुहर लगा दी। कुलवन्त किसी जख्मी हिरनी की तरह तड़पी। तड़पती रही; और मैं अपने अनाधिकार शब्दों, सदियों से ईजाद प्रेम भरे संवादों, फुसफुसाहटों और शर्म की दीवारों को तोड़ती, झनझनाती हरकतों से अपने प्रेम को प्रकट करता रहा। कुलवन्त तड़पटी रही। उसमे जोग भरा था। परंतु वह जोगन थी। उसके अंदर सबसे पहले एक औरत थी। रेशम से बनी, फूलों से लदी। लचकती डाली सी औरत। गोश्त-पोश्त की औरत। मैंने उसके अंदर छिपी उसी औरत को आवाज़ दी। उसके सीने में छिपी दिल को मोहब्बत की दस्तक से ठकठका दिया तो उसके जज्बात में हलचल मच गयी। भीतर छिपी औरत में हलचल हुई और अपने महबूब के लम्स की गरमी में पिघलने लगी। वह मना करती रही, पर मैंने उसे बोलने का अवसर ही कब दिया।

मैंने उसके होंठों पर पहरे बिठा दिए थे। मैंने उसके मचलते बाजुओं को अपने मज़बूत बाजुओं से शिकस्त दे दी थी और जब वह पूरी तरह से मेरे सीने से लग गयी और मुझे उसका साँस उखाड़ता हुआ मालूम हुआ तो मैंने नरमी से उसके बालों पर हाथ फेरे। कुलवन्त फिर मेरे सीने से नहीं हटी। शायद उसे अंदाज़ा हो गया था कि मैं क्या चाहता हूँ। उसके भीतर की औरत बाहर आ गयी थी जिसने मर्द के मर्दानगी के सामने हथियार डाल दिए थे। उसके लबों की चाशनी मेरे जिस्म में घुली तो मुझे अपने पैरों पर खड़ा होना दुभर हो गया। कुलवन्त के भीतर जो ज्वालामुखी दफ़न था वह मेरी हरारत पाकर फटने के लिये बेचैन था। उसने बेखुदी के आलम में मेरे बाल पकड़ लिये। अब उसने मेरे अंदर के असली मर्द को आवाज़ दी तो मैंने उसे बुरी तरह अपने आगोश में लेकर शोलों को हवा दे दी। फिर न जाने क्या हुआ। वह अचानक तड़प कर बिजली की तरह मेरे सीने से हट गयी। उसकी आँखें शोले उगलने लगीं। वह अपना निचला होंठ बेचैनी से चबाने लगी। उसके चेहरे पर ग़म और ग़ुस्से के आसार थे। मैं एक क्षण के लिये सहम गया। उसके अंदाज़ में ऐसी दहशत थी कि मुझे यूँ लगा जैसे कुलवन्त मेरी हरकतों से सख्त नाराज़ हो गयी है। मुझे अपनी ग़लती का अहसास हो गया।

और मैंने दबी-दबी आवाज़ में कहा–

“कुलवन्त, तुम्हें देखकर खुद पर क़ाबू नहीं रहा। मैं अतीत में गुम हो गया।”

कुलवन्त ने मेरी बात का कोई उत्तर नहीं दिया। उसकी आँखों के गोले फटने लगे थे। वह निढाल सी होकर गिर पड़ी और उसने अपना सिर पकड़ लिया।

“मैं वादा करता हूँ कुलवन्त, भविष्य में ऐसी ग़लती नहीं होगी।”

“राज, अब इन बातों का क्या लाभ!” कुलवन्त ने रुँधी हुई आवाज़ में उत्तर दिया। फिर हाथों में अपना चेहरा छिपाकर सिसकने लगी।

“कुलवन्त! कुलवन्त!” मैंने तड़प कर कहा। “तुम्हें देवी-देवताओं का वास्ता। मुझे माफ़ कर दो। मेरी नीयत बुरी नहीं थी। अपने आँसू पोंछ डालो। यह मेरे दिल में नश्तर की तरह चुभ रहे हैं।”

मेरी विनती के उत्तर में कुलवन्त की सिसकियाँ और तेज हो गयी। मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि अचानक उस पर यह किस क़िस्म का दौरा पड़ गया है। आख़िर बात क्या है ? मैंने बुझी हुई आवाज़ में कहा-

“कुलवन्त आँसू रोक लो। मैंने तुम्हारा पवित्र शरीर छूकर भूल की है। तुम जो चाहो सजा दे लो लेकिन मुझसे रूठो नहीं। मुझे माफ़ कर दो। तुम्हें माला रानी की सौगंध।”

मेरा यह वाक्य असर कर गया। कुलवन्त ने माला का नाम सुनकर शीघ्रता से आँसू पोंछ डाले लेकिन उसके चेहरे पर कोई परिवर्तन नहीं आया। चेहरा अब भी गजबनाक बना हुआ था। चंद क्षणों तक वह स्वयं में उलझी रही और मुझे घूरती रही। अभी मैं उससे कुछ कहने का इरादा कर ही रहा था कि उसने अपने होंठ काटते हुए कहा।

“हरि आनन्द की बर्बादी का समय आ गया है राज! मैं तुम्हें बताऊँगी उसका अंजाम कितना भयानक होगा। मैं उसे ऐसा श्राप दूँगी कि उसकी आत्मा प्रलय के दिन तक व्याकुल रहेगी।”

कुलवन्त के मुँह से उस समय हरि आनन्द का नाम सुनकर मेरा माथा ठनका। कोई आंतरिक भय मेरे दिल को कचोटने लगा।

मैंने कुलवन्त से पूछा। “तुम्हें इस समय वह मनहूस पंडित कैसे याद आ गया ?”

“राज, सिर्फ़ चंद क्षणों की चूक हो गयी। मुझे जीवन भर इसका दुख रहेगा। मुझ जोगिन की पवित्र आत्मा को अपवित्र करने की अच्छी सजा मिली।” कुलवन्त ने कहर भरे स्वर में कहा। “वह हमारी भूल से लाभ उठा गया। हमने अवसर दे दिया कि वह अपना वार कर सके। तुम्हारी बाँहों में सिमटकर मैं अतीत में चली गयी थी। बस, उस एक पल की बात थी। वह पापी उसी पल वार कर गया। उसके गंदे वीर माला रानी के ताक में बैठे थे। मेरी दृष्टि ओझल हुई तो उन्होंने अपना काम कर दिया।”

“क्या... ? नहीं कुलवन्त!”

मैं चीख पड़ा। कुलवन्त के अंतिम वाक्य का अर्थ समझकर मुझे ऐसा लगा जैसे ज़मीन मेरे पैरों तले से निकल गयी हो। मेरा सारा अस्तित्व काँपने लगा। मस्तिष्क में भूचाल सा आ गया। आँखों के सामने अंधेरे लपक उठे। मैंने कुलवन्त को एक हाथ से झिझोड़ते हुए कहा।

“तुम क्या कह रही हो कुलवन्त ? क्या उस मनहूस ने माला को मुझसे छीन लिया ?”

“हाँ राज!”

“माला।!” मैंने एक आकाशभेदी चीख मारी और पागलों की तरह उठकर बाहर की तरफ़ भागा।

मुझे कुछ होश नहीं था कि मैं किस दिशा में जा रहा हूँ। उस असहनीय समाचार ने मेरे दिमाग़ को जकड़ कर रख दिया था। मैं अपने आपे में नहीं था। मेरी दुनिया लुट चुकी थी। मैं पागलों की तरह भागता हुआ नीचे उतर रहा था कि अचानक मुझे ठोकर लगी और मैं पत्थरों पर उलट गया। न जाने वह किसी चोट का असर था या मेरे सब्र ही जवाब दे गए थे कि मेरी चेतना लुप्त हो गयी थी।

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जब मुझे होश आया तो मैं अपने घर पर था। मैं अपने घरवालों से घिरा हुआ था। होश में आते ही मैंने माला का नाम लेकर चीखना शुरू किया। फिर मुझ पर दौरा सा पड़ गया और मैं फिर बेहोश हो गया। एक हफ़्ते तक मेरी यही हालत रही। घरवाले मेरी हालत से परेशान थे। तरह-तरह की सांत्वनाएँ दे रहे थे। डॉक्टरों को दिखा रहे थे। जब भी मुझे होश आता, चाचा मेरे पास होते। मुझे दिलासा देते तो मैं फिर माला की याद में चीखने लगता। कोई दस-बारह रोज़ बाद मेरी हालत सुधरी। मुझे कुछ भी याद नहीं था कि मैं मैसूर की पहाड़ियों से वहाँ तक किस तरह पहुँचा था। दिमाग़ काबू में आया तो मैं सर्वप्रथम कुलवन्त के पास जाना चाहता था। ताकि हरि आनन्द को कुत्ते की मौत मारने का जतन कर सकूँ।

लखनऊ से मेरा दिल उचाट हो चुका था। मैंने मैसूर वापस जाने की ठानी। अब यही इरादा था कि हरि आनन्द को खत्म करके कुलवन्त के साथ मैसूर की पहाड़ियों में दिन गुजारूँ। चाचाजी ने मुझे रोकने-समझाने की बहुत कोशिशें की। परंतु अंत में उन्हें मेरी ज़िद के सामने हथियार डालने पड़े। आख़िर मुझे उनसे वायदा करना पड़ा कि मैं शीघ्र ही लौट आऊँगा। घर से निकलकर मैं सीधा स्टेशन की ओर चल पड़ा। स्टेशन पर जिस समय मैं तांगे से उतर रहा था तो उसी समय किसी मे मुझे आवाज़ दी। आवाज़ जानी-पहचानी थी। मैंने पलटकर देखा तो साधु जगदेव मेरी पुश्त पर मौजूद था। उसके चेहरे के भाव देखकर मैंने अंदाज़ा लगा लिया कि उसे हालात का इल्म हो चुका है। मेरा अनुमान ग़लत नहीं था।

जगदेव ने मेरे निकट आकर कहा।

“बालक! तेरे ऊपर जो बीती है। उसका मुझे अफ़सोस है। मैं मण्डल में बैठा हुआ था इसलिए बाहर नहीं आ सकता था। माला रानी मेरे मित्र प्रेमलाल की निशानी थी। उसका दुख मुझे कम नहीं हुआ। परंतु सब भाग्य का खेल है। तुम्हें अब सब्र और हिम्मत से काम लेना होगा।”

“महाराज! उसका क़ातिल तो मैं हूँ। आप मण्डल में बैठे हुए थे और दूसरी ओर मैंने कुलवन्त का ध्यान बँटा दिया था। अब मेरे अंदर सब्र की हिम्मत कहाँ। उसका पैमाना तो छलक चुका है। मुझे हरि आनन्द का खून चाहिए। उस कमीने ने पहले डॉली को निशाना बनाया और अब माला को मार डाला। महाराज, अब तो मेरी सहायता करो।”

“बालक! तेरे मन में ज्वालामुखी सुलग रहा है। उसे देख रहा हूँ। हरि आनन्द ने मुझे भी ललकारा है। मैं तेरी सहायता करने को तैयार हूँ। परंतु तुझे अभी इंतज़ार करना होगा।” जगदेव ने दुख भरे स्वर में कहा। “हरि आनन्द ने काली मंदिर से बाहर आते समय दो मौसमों की रक्षा दान माँगी थी। जिसे देवी ने हरि आनन्द के जाप से ख़ुश होकर मंजूर कर लिया था। जब तक यह समय पूरा न हो ले हम उसे कष्ट नहीं दे सकते।”

जगदेव की यह बात सुनकर मेरा चेहरा लटक गया। कुलवन्त ने भी कदाचित यही बात कहनी चाही थी। चंद क्षणों तक मैं मन ही मन बल खाता रहा। फिर कुछ सोचकर बोला।

“महाराज! अगर वह देवी के दान किए हुए समय से पहले ही मठ में जा छिपा तो ?”

“इसकी चिंता मत करो बालक! इसका उपाय भी हो जाएगा। हरि आनन्द अब काली की शरण में नहीं छिप सकेगा और मैं तुम्हें विश्वास दिलाता हूँ कि इस अरसे में वह तुम्हें कोई हानि नहीं पहुँचा सकेगा।”

मैं जगदेव की यह बात सुनकर ख़ामोश हो गया। मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि अब मुझे क्या करना चाहिए। मुझे रह-रहकर अपनी उस नादानी का ख़्याल आ रहा था जो मैंने कुलवन्त के साथ की थी।

“जो कुछ हो चुका है उसे भूल जाओ बालक! मनुष्य बनो और अपने अंदर साहस रखो।” जगदेव ने प्रेम भरे स्वर में कहा। “मेरी मानो तो समुद्र पार किसी जगह चले जाओ। वहाँ तुम्हारा ग़म भी ग़लत हो जाएगा और टूटे हुए हाथ का इलाज भी हो जाएगा।”

“अब टूटे हुए हाथ का इलाज करा के क्या करूँगा महाराज ?” मैंने मुँह बिसूरते हुए कहा।

“जीवन से निराश होना पाप है मेरे बच्चे! कौन जाने आज के अंधेरे कल फिर रोशनी में बदल जाए। तुमने पहले ही मेरी बात मानी होती तो आज यह हालत न होते।”

जगदेव देर तक मुझे समझाता रहा और मैं रोता रहा। फिर उसका सुझाव मानकर मैं उसकी आज्ञा मानने के लिये तैयार हो गया। यूँ भी मेरे लिये हर जगह एक सी थी क्योंकि जब आदमी का दिल टूट चुका हो तो जगहों और मौसमों की तब्दीली क्या हैसियत रखती है।

“सुखी रहो बालक! तुमने मेरी बात मानकर मेरा मान बढ़ाया है। मैं इसी समय तुम्हें कुछ दान करना चाहता हूँ।” जगदेव ने मुझे आशीर्वाद देते हुए कहा।

जगदेव के चेहरे पर पल भर के लिये मुस्कराहट फैल गयी। पर दूसरे ही क्षण वह किसी गहरे झील के मानिंद शांत था।

“बालक! तुमने यह नहीं पूछा कि जब तुम कल्पना की तलाश में उस कुटिया तक गए थे तो मैं वहाँ किस जाप में मग्न था। मैंने हरि आनन्द से मोहिनी को छीन लिया है। मैं तुम्हारी मोहिनी रानी को प्राप्त करने के लिये जाप कर रहा था। देवी-देवताओं की इच्छा थी कि मैं ऐसा करूँ।

“महाराज!” मैं एकदम आश्चर्य से उछल पड़ा। मोहिनी का नाम सुनकर मेरी हालत ही कुछ ऐसी हो गयी थी। मैंने साधु जगदेव से कुछ पूछना चाहा कि मोहिनी अब कहाँ है ? लेकिन इससे पहले कि मैं अपने दिल की बात जुबान पर लाता मेरे सिर पर कोई चीज़ कुलबुलायी। मैं चौंक पड़ा।

मैंने कल्पना के झरोखे से सिर पर देखा तो छिपकली रेंग रही थी। उसके नन्हे-नन्हे पंजों की चुभन जानी-पहचानी थी। वह मोहिनी थी। सचमुच मोहिनी मेरे सिर पर वापस आ गयी थी। पलक झपकते ही वह नारी के रूप में थी।

“मैंने हरि आनन्द से मोहिनी को छीन लिया मेरे बच्चे।” जगदेव की आवाज मेरे कानों में गूँजी। “अब यह खिलौना संभाल कर रखना। यह माला रानी का गम किसी सीमा तक दूर कर देगी।”

मेरी समझ में नहीं आता था कि मैं किस जुबान से साधु जगदेव का शुक्रिया अदा करूँ। उसने तो हद ही कर दी थी। उसने मोहिनी जैसी महान शक्ति को मेरी झोली में डाल दिया था जैसे वह बच्चों के दिल बहलाने का खिलौना भर हो। किन्तु उसने मुझे शुक्रिया अदा करने का अवसर ही नहीं दिया। वह तुरंत ही मेरी दृष्टि से ओझल हो गया और मैं उसे चारों दिशाओं में आवाज देता रहा।

“वह जा चुका है।” मोहिनी ने मुझसे कहा।

मैंने कल्पना की दुनिया में अपने सिर की तरफ देखा, वहाँ मोहिनी बैठी हुई थी। साधु जगदेव मेरी नजरों से ओझल हो चुका था। मुझे आश्चर्य था कि उसने चालीस दिन का कठिन जाप करके मोहिनी को प्राप्त किया। फिर क्यों मेरी झोली में दान कर दिया, जैसे वह उसके लिये कोई साधारण सी चीज हो। जमाने भर के सितम सहने के बाद मेरी मोहिनी फिर मेरे पास थी। उससे बातें करते हुए मुझे कुछ झिझक सी महसूस हो रही थी। शिकवे-शिकायतों का एक दफ्तर था, पर यह पुरानी बात हो गयी थी। मोहिनी के चेहरे पर गम्भीरता विराजमान थी। मैंने दृष्टि उठाकर ऊपर देखा तो उसने नजरें झुका लीं। शर्मिंदगी का अहसास उसके चेहरे पर था। कुछ देर यूँ ही खामोशी रही, फिर मैंने धड़कते दिल से सुकून तोड़ा।

“मोहिनी कैसी हो ?”

वह कसमसाकर बोली। “ठीक हूँ।”

“इस कदर खामोश क्यों हो ? क्या तुम्हें दोबारा मेरे पास आने की ख़ुशी नहीं हुई ?”

“राज!” मोहिनी ने नजरें उठायी। उसकी खूबसूरत पलकों के किनारे नम थे। उसके नर्म व नाजुक होंठ कुछ कहने के लिये कंपकंपा रहे थे। उसकी आवाज में बड़ा दर्द था।

मैंने उसकी मजबूरियाँ समझते हुए कहा– “नहीं! मुझे अहसास है कि तुम कितनी मजबूर थी। तुम तो परिस्थिति की गुलाम हो लेकिन तुम्हारी जुदाई ने मुझ पर क्या सितम तोड़े, क्या जुल्म ढाए, यह दास्तान बहुत लम्बी और दर्दनाक है।”

“मुझे मालूम है राज! मुझे मत बताओ।” मोहिनी ने ठंडी आह भरते हुए कहा। “काश, मेरे वश में कुछ होता।”

“कितने बड़े इन्कलाब आए हैं पूरी जिंदगी में। माला की मौत ने तो मेरी कमर ही तोड़ दी है। उसका खून मेरी गर्दन पर है। आखिर यह हरि आनन्द मेरे घर के पीछे क्यों पड़ गया ?” मैंने तड़पकर पूछा।

“हरि आनन्द ने डॉली को इसलिए ख़त्म किया था कि तुमने वचन के अनुसार मुझे उसके हवाले करने से इनकार कर दिया था और माला रानी को इस वजह से ख़त्म किया है कि वह समझता था कि तुम प्रेमलाल की शक्ति की शरण में तब तक रह सकते हो, जब तक माला जिन्दा है। प्रेमलाल की शक्ति का उपहास उड़ाने और उसे भयभीत करने का इससे बेहतरीन और कौन सा अवसर मिल सकता था। मगर राज! मेरा वचन है कि तुम हरि आनन्द का अन्जाम अपनी आँखों से देखोगे। उसका अन्जाम तुम्हारे कष्टों से कहीं अधिक भयानक होगा। बस, कुछ दिन की बात और है।”
 
मोहिनी की हमदर्दी ने दिल का गुब्बार किसी सीमा तक दूर कर दिया। मैंने उससे अपने दिल का हाल एक बच्चे की तरह बयान किया और मोहिनी मुझे तसल्ली देती रही। मैं स्टेशन के निकट खड़ा देर तक मोहिनी से बाते करता रहा। हम दोनों इस तरह मिले जैसे बरसों के बिछुड़े प्रेमी हों। बातें न जाने कहाँ से कहाँ तक हुईं। जब मैं सब कुछ कह सुन चुका तो मोहिनी ने कहा।

“अब तुम्हारा क्या इरादा है ? इस समय कहाँ जा रहे हो ?”

“कहाँ जाऊँ ? लखनऊ से दूर चला जाना चाहता हूँ।” इस शहर ने बड़े दुःख दर्द दिए हैं। जगदेव महाराज ने मुझे सुझाव दिया है कि इस शहर से दूर चला जाऊँ। इस मुल्क से दूर समुन्दर पार।

“तुम्हारे दिल पर जो गुजरी है उसका मुझे अहसास है। मगर मैं तुम्हारे पास आ चुकी हूँ। तुम्हारी कनीज मोहिनी, तुम्हारी गुलाम मोहिनी, तुम्हारी महबूबा मोहिनी! मेरी जान अपने दिल का सन्नाटा दूर करो। मेरी तरफ देखो।” मोहिनी ने भावनात्मक स्वर में कहा। “तुम्हें अभी लखनऊ नहीं छोड़ना चाहिए। न मालूम कि फिर कभी यहाँ आना हो या न आना हो। इस समय तुम अपने घर अपने प्रियजनों के बीच रहोगे तो खुश रहोगे। घर से अधिक सुकून तुम्हें कहीं नहीं मिल सकेगा।”

“मगर वहाँ हर समय माला की याद आती है।” मैंने बेताबी से कहा।

“माला...! राज, माला अब ऐसी जगह जा चुकी है जहाँ से कोई वापिस नहीं आता। तुम्हें उसे भूलना होगा। उसकी आयु इतनी ही थी। भाग्य का लिखा हुआ पूरा होता है। तुम उसे याद करके उसकी आत्मा को दुःख पहुँचाओगे। चलो, घर चलो।”

“घर ? किसका घर मोहिनी ? अब वहाँ दहशत बरसती है। मैं जितने दिनों वहाँ रहा काँटों पर लोटता रहा।” मैंने बेदिली से कहा।

“तुम नहीं मानते हो तो न मानो लेकिन राज, इस शहर को इस तरह छोड़कर न जाओ। तुम अपने वादे भी भूल गए। तुम अपने अगले-पिछले हिसाब बराबर करके यहाँ से रवाना होगे तो तुम कहीं भी सुकून से रह सकोगे।” जब तुम्हें यहाँ के लोग और इनके सितम याद आयेंगे तो तुम्हारा क्या हाल होगा ? यहाँ के जख्म तुम्हारे साथ रहे तो तुम फिर बेचैनी महसूस करोगे।”

मैं मोहिनी के चेहरे पर छायी गम्भीरता का निरीक्षण कर रहा था। उसकी सुर्ख आँखें इस बात की गवाह थीं। मैं इतना मुरझाया हुआ था कि उसकी बातों का मतलब न समझ सका।

“इरादे क्या हैं तुम्हारे ? खुलकर बात करो।” मैंने मोहिनी से कहा।

“राज! मेरे इरादे तुम्हारे इरादों से अलग नहीं हो सकते। लेकिन मैं देख रही हूँ कि इस बार तुम बिल्कुल टूट चुके हो। माला की अचानक मौत ने तुम्हारे दिलो-दिमाग पर गहरा असर डाला है। मैं चाहती हूँ कि तुम उदास न रहो। लखनऊ की महफ़िलें तुम्हें पुकार रही हैं। अशर्फी बेगम याद है तुम्हें ? उस बदकार औरत को किस पर छोड़े जा रहे हो ? तुम नवाब बब्बन अली को किस तरह भूल गए। बब्बन अली की दिनचर्या आज भी वही है। एक तरन्नुम की बर्बादी की कहानी ही उसके साथ नहीं जुड़ी है। उसकी हवेली में आज भी सुन्दरियों का बाजार गर्म है। तुमने उसकी सुन्दरियों को छीना। उससे आजादी दिलायी थी और तुम तो यह भी न जानते होगे कि यह नवाब बब्बन ही था जिसकी वजह से तुम्हें जेल की हवा खानी पड़ी। उसके साथ तुम्हारा दूसरा दुश्मन मेहता भी मिल गया था। वह भी इसी शहर में है। अगर तुम यूँ हार खाकर यहाँ से चले गए तो ये सब शैतान मिलकर तुम्हारे घर को कुचल डालेंगे। तुम्हारी बहनें हैं, एक भाई है। भले ही वे तुम्हारे चाचा की संतानें हैं परन्तु उन्हें किस भरोसे छोड़े जा रहे हो ? ये लोग फिर उन महफ़िलों के बादशाह होंगे। जहाँ तुमने उनकी बादशाहत छीन ली थी। यहाँ से जाना ही है तो दिल ठंडा करके जाओ। बब्बन अली का सुर्ख व सफ़ेद चेहरा देखकर मेरे मुँह में पानी भर आता है।” मोहिनी ने अपनी जुबान से चटखारे लेते हुए कहा।

“मोहिनी! मैं इन सबका खून पीने के लिये तड़पता हूँ लेकिन फिर सोचता हूँ कि इन बातों से क्या हासिल होगा ? मेरा सबसे बड़ा दुश्मन तो हरि आनन्द है और वह जिन्दा है। अब मैं थक चुका हूँ और मुझे सुकून चाहिए।”

“यह बात मैं तुम्हारे सुकून के लिये ही कह रही हूँ। सबका हिसाब साफ़ करते जाओ। यह क़र्ज़ उतार दोगे तो दिल का बोझ हल्का हो जाएगा। अपने-आपको हंगामों के आदी बनाओ। जिन्दगी इस तरह नहीं गुजरती जिस तरह तुम सोच रहे हो। मेरी मानो तो घर चलो। वहाँ बहुत से लोग तुम्हारी प्रतीक्षा में हैं।”

मोहिनी ने मेरी गैरत को इस तरह झिंझोड़ा कि मुझे महसूस हुआ जैसे मैं गहरी नींद से जाग गया हूँ। अतीत के जख्मों पर मोहिनी की बातों का नश्तर कुछ इस तरह चला कि सारे जख्म हरे हो गए। रगों का लहू गर्म हो गया। मोहिनी ने इन्तकाम के शोलों को हवा दे दी थी। मेरे सीने में जलन सी होने लगी। वह मुझे पुरानी बातों की याद दिला रही थी। मैं इन छोटे-मोटे दुश्मनों की कभी परवाह भी नहीं करता था और न इनके बारे में कुछ बयान करने की आवश्यकता समझता था। ये लखनऊ के अमीरजादे थे और मैंने इनकी बादशाहत छीनी थी। मोहिनी उन दिनों भी मेरे साथ थी। मुझे याद आया मेहता ने किस तरह मुझे यातनाएँ दी थी। मेहता जैसे पुलिस ऑफिसर की हिम्मत ही क्या थी जो मुझ पर हाथ डालता। वह किसी की शह पाकर ऐसा कर गुजरा था और यह शह उन अमीरजादों ने दी थी।

मेरे कदम वापिस घर की तरफ उठ गए। जिन्दगी का क्या भरोसा। आज है तो कल नहीं, और कल किसने देखा ? मेरे जैसे आदमी के लिये अब जिन्दगी के क्या मायने थे। जब मरना ही था तो इस तरह क्यों मरूँ ?

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बस कुछ दिन की बात थी। फिर मैं जगदेव महाराज की इच्छा का पालन करने के लिये कूच कर जाता। मैंने मोहिनी को यह बात भी बता दी थी। जब मैं घर पहुँचा तो भाई-बहनों और चाचा ने मुझे हाथों-हाथ लिया। घर की रौनक लौट आयी थी। रहने के लिये मैंने वही कमरा चुना जहाँ माला के साथ जिन्दगी के हसीन लम्हे गुजारे थे। परन्तु रात के समय वह मुझे काट खाने को दौड़ता। उसके दरो-दीवार में माला की सिसकियाँ मचलती थीं। मेरी हालत देखकर मोहिनी ने मुझे समझाया।

“इस तरह तुम उस पवित्र आत्मा को क्यों दुःख पहुँचा रहे हो राज। जाने वाले आँसुओं से लौटकर नहीं आते। उन्हें दुःख ही होता है। जरा सोचो तो राज, मेरे अलावा जगदेव का आशीर्वाद भी तुम्हारे साथ है। जहाँ-जहाँ तुम्हारे कदम पड़ेंगे, वहाँ की ज़मीन भय और आतंक से थर्रा जाएगी।”

“मोहिनी, मैं जगदेव महाराज का अहसान कभी नहीं भूल सकता। हाँ, इस बात से जी डरता है कि कहीं तुम भी मुझसे रूठकर...।”

मैंने आँसू पोंछ लिये और बिस्तर पर आ लेटा।

“अब ऐसा नहीं हो सकता मेरे आका।” मोहिनी ने मेरा वाक्य को काटते हुए कहा। “जगदेव की शक्ति का क्या ठिकाना। उसने जाप करके मुझे पण्डित हरि आनन्द से प्राप्त किया और फिर तुम्हें दान कर दिया। एक बात याद रखो कि मेरा हर मतवाला पुजारी जाप करने से पहले यह इत्मीनान अवश्य हासिल कर लेता है कि मैं किस शक्ति के पास हूँ। अगर वह शक्ति उससे बढ़कर है, तो वह ऐसी मूर्खता नहीं करता। त्रिवेणी कोई बड़ा पुजारी नहीं था। उसने जब मुझे तुम्हारे पास देखा तो आसानी से जाप शुरू कर दिया और मुझे प्राप्त कर लिया। हरि आनन्द ने भी यही किया। हरि आनन्द, साधु जगदेव या उसके बराबर की शक्ति ही मुझे प्राप्त कर सकती थी। अब साधु जगदेव ने मुझे प्राप्त कर लिया तो यह बात इतनी आसान नहीं रही। उससे बड़ी या कम से कम उसके बराबर की शक्ति ही मेरे बारे में सोच सकती है और ऐसी किसी शक्ति को भला मेरी क्या ज़रूरत पड़ी है। इसलिए कि उसके पास खुद क्या अपनी शक्ति कम होती है। समझे।”

“समझा।” मैंने इत्मीनान का साँस लिया। “लेकिन मोहिनी, अब आराम से गुजर बसर हो जाए तो ठीक है। भाग्य की इन ठोकरों का सिलसिला समाप्त हो जाना चाहिए। किसी जगह जाकर तो हमें ठहरना ही पड़ेगा। यह सिलसिला कब तक चलता रहेगा ?”

“इत्मीनान रखो, मैं अब तुम्हारे साथ हूँ। तुम्हारे लिये यह अहसास ही काफी है। हम दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। न तुम्हें मेरे बिना चैन आता है, न मुझे तुम्हारे बगैर।”

कुछ सोचकर मैंने पूछा– “मुझे यह बताओ मोहिनी, क्या तुमने भी माला की मौत में हिस्सा लिया था ?”

कुछ पल मोहिनी खामोश रही, फिर बोली।

“उस समय मैं मजबूर थी मेरे आका! हरि आनन्द किसी चालाक चीते की तरह माला रानी की घात लगाए बैठा था। उसने अपनी शक्ति के जोर से यह मालूम कर लिया था कि कुछ रहस्यमय शक्तियों ने माला के इर्द-गिर्द सुरक्षा का किला बना रखा है जिसे तोड़ना उसके बस की बात नहीं थी। इसके बावज़ूद भी वह एक क्षण के लिये भी अनभिज्ञ न था। जिस रोज माला जुल्म का निशाना बनी। उस रोज वह सुबह से ही बेचैन था। वह बार-बार मंत्र पढ़ता और रहस्यमय शक्तियों को पुकारता। फिर उसके वीरों ने उसे एक क्षण के लिये यह सूचना दी कि माला के इर्द-गिर्द का वह किला टूट गया है। उसने तुरन्त अपनी शक्तियों की सहायता से ऐसा भरपूर वार किया कि तुम्हारी खुशियों का चिराग पल भर में बुझ गया।”

मोहिनी की जुबानी यह वर्णन सुन मैं तड़प उठा। एक बार फिर सावन-भादो की झड़ी लग गयी। मैं फूट-फूट कर रोने लगा। इस आलम में मैंने मोहिनी को संबोधित किया।

“मोहिनी! मैं जानता हूँ, तुम्हारी हालत क्या थी। किन्तु माला को जुल्म का निशाना बनाते समय तुम्हें धक्का नहीं लगा ?”

“राज!” मोहिनी भर्राई हुई आवाज में बोली। “वह कमीना पंडित बड़ा चालाक और अय्याश है। माला रानी के सिलसिले में उस कमीने ने मेरी बजाय अपने वीरों की शक्ति से काम लिया था। उसे खतरा था शायद मैं उसके हुक्म की तामील न कर सकूँ। हालाँकि यह उसका वहम था। वह मुझे जो भी आदेश देता, मेरे लिये उसके इनकार का सवाल ही पैदा न होता था।”

“यानी तुम माला को मार डालती।” मैंने हैरत से पूछा।

“हाँ! मुझे ऐसा करना पड़ता।” मोहिनी ने धीमे स्वर में उत्तर दिया।

“उफ़्फ़...! तुम अपने महबूब की अमानत ख़त्म कर देती ?” मैंने रूँधी आवाज में कहा।

“मैं और क्या करती। मगर अब इन बातों से क्या हासिल राज ? मेरी खातिर सब्र करो।” मोहिनी ने डूबते हुए स्वर में कहा।

सम्भव है मेरी आपबीती के प्रसंग लोगों के लिये ख्याली बातें हों। किंतु जिन लोगों ने मुसीबतें झेली है और दुःख-दर्द उठाए हैं। उन्हें मेरे दर्द का अहसास होगा। मेरा दर्द, मेरी जात का दर्द। मेरी गर्दिश। मेरे पाप और मेरे पुण्य ऐसे नहीं हैं कि साधारण इन्सान उनकी कल्पना कर सके। एक के बाद एक घटनाएँ। परीक्षाओं के बाद फिर परीक्षाएँ और अजीबोगरीब परिस्थितियाँ। मोहिनी के सुझाव पर मैं घर तो आ गया परन्तु वहाँ आकर एक पल भी सुकून से न गुजार सका। मोहिनी ने मुझे बहुत समझाया कि मैं घर से बाहर निकलूँ। अपने लिये ऐश के साधन जुटाऊँ परन्तु माला की तेरहवीं तक मैं घर की दीवारों में ही कैद रहा।

यूँ तो चाचा की दुकान खासी चल रही थी। मैंने ही उन का कारोबार खड़ा किया था। फिर भी मैं चाचा के ऊपर भार तो न बनना चाहता था। भला जब मोहिनी मेरे पास थी तो दौलत की क्या कमी थी ? परन्तु मोहिनी कोई सोने की खान नहीं थी। वह दौलत प्राप्त करने का रास्ता बता सकती थी जिसके लिये मेरा घर से निकलना आवश्यक था। धीरे-धीरे स्थिति सामान्य होने पर मैंने सबसे पहले आर्थिक ढाँचे को सुधारने के लिये घर से बाहर कदम रखा। मोहिनी मुझे ऐसे स्थानों पर ले गयी जहाँ दौलत की हेराफेरी होती थी और फिर मैं हर दाँव जीतता चला गया। हर रात जब मैं घर लौटता तो नोटों के बण्डल जेबों में ठूँसा होता। मैंने उन नोटों को गिनने की कभी ज़रूरत ही नहीं समझी। उन्हें यूँ ही अलमारी में ठूँस देता।

दौलत...दौलत और दौलत। जिंदगी बदलने लगी। मैंने वह पुराना घर बेचकर चाचा के लिये धनवान इंसानों के एक क्षेत्र में शानदार बंगला खरीद लिया। नौकर चाकर, माली, ड्राइवर सब कुछ आ गया। नए शानदार फर्नीचर से बंगला सज गया और इस तरह मैं फिर एक अमीर इंसान बन गया। लोगों को अमीर बनने में बरसों लगते होंगे परन्तु मेरी जिन्दगी तो अजीब ही थी। पल भर में मैं अमीर होता और पल भर में फकीर।
 
जब यह सब कुछ हो गया तो मैंने अपने दुश्मनों से निपटने की शुरुआत के लिये कदम उठाया। एक सुबह नाश्ता करके कपड़े बदल कर मैं घर से निकला तो मेरा रुख सीधा मेहता के दफ्तर की तरफ था। जिस समय मैं मेहता के दफ्तर पहुँचा तो वह किसी फाइल के अध्ययन में व्यस्त था। उसके दफ्तर के संतरी ने मुझे रोकने की कोशिश की, लेकिन मोहिनी ने उसे बेबस कर दिया। मैं किसी विरोध के बिना अन्दर चला गया। मेहता सपने में भी यह नहीं सोच सकता था कि मैं इस अन्दाज़ में सीना ताने उसके सामने पहुँच जाऊँगा। अतः आशा के विपरीत मुझे अपने सामने देखकर वह एक क्षण के लिये स्तब्ध रह गया।

मगर दूसरे ही क्षण उसकी आँखों में खून उतर आया। वह मुझे नफरत भरी दृष्टि से घूरता हुआ गुर्राया।

“तुम यहाँ किसलिए आए हो ?”

“मेहता! मुझे ख़ुशी है कि तुमने मुझे तुरन्त पहचान लिया। मुझे अपना परिचय देने की आवश्यकता महसूस नहीं हुई।” मैं जहरीले स्वर में बोला।

मेहता के माथे पर शिकन पड़ गयी।

“तुम्हें मेरे कमरे में आने की जुर्रत कैसे हुई ? दफा हो जाओ। गेट आउट!”

“समय-समय का खेल है मेहता! बुरा वक्त गुजर गया। अब तुम्हारी गर्दिश का वक्त है। मैं तुम्हारे लिये कहर बनकर आया हूँ। मैंने क्षमा करना नहीं सीखा है। तुम्हारे दुर्भाग्य से मेरी याददाश्त बहुत तेज है।” मैंने तेज स्वर में कहा। “तुमने मेरे आने का उद्देश्य पूछा है। सुनो। तुमने अपनी ताकत और पद के नशे में मुझ पर जुल्म तोड़े और इन सबके लिये तुम्हें चंद अमीरजादों, उन लोगों की शह मिली थी, जो मेरे अस्तित्व को ख़ाक में मिला देना चाहते हैं। क्योंकि वे जान चुके होंगे कि उनके लिये मैं मौत बनकर इस धरती पर पैदा हुआ हूँ। काश्मीर वाला मामला इतना अहम नहीं था, क्योंकि कोई भी अदालत मुझ पर जुर्म साबित नहीं कर सकती थी। सुनो मेहता, तुमने मुझे अच्छी तरह नहीं पहचाना। तुम नवाब बब्बन अली को भी जानते होगे। इन लोगों ने न जाने कितनी बहनों की इज्जत लूटी होगी। तरन्नुम भी एक ऐसी ही लड़की थी, जिसे मैंने उनके चंगुल से निकाला था। लखनऊ का एक ख़ास तबका मुझसे नफरत करता है और तुम उसी तबके के चमचे हो। मैं यहाँ से जा रहा था फिर ख्याल आया कि कर्ज तो सिर पर लाद कर जा रहा हूँ।”

मेहता ने मेरे बिगड़े हुए तेवर देखकर खतरे का अन्दाजा लगा लिया। एक पल के लिये उसने मुझे घूरा फिर बड़ी फुर्ती से अपना सर्विस रिवाल्वर निकालकर मेरे सीने का निशाना लेकर बोला।

“तुमने अच्छा किया कि खुद ही मेरे पास चले आए। तुम्हें तलाश करने की जहमत मुझे नहीं उठानी पड़ी। मेरा ख्याल था, तुम्हें जेल की आब ओ हवा रास आ गयी है। यूँ भी तुम जैसे खतरनाक मुजरिमों और सुअर की औलादों को बाहर खुली हवा में अधिक दिन नहीं रहना चाहिए।”

मेरे चेहरे पर मुस्कराहट छा गयी। मोहिनी उसी क्षण रेंगकर तेजी से मेरे सिर से उतर गयी। मैं समझ गया कि मेहता का अब बुरा वक्त आ गया है। मैं मेहता के और करीब गया और जोर-जोर से उसके हाथ पर अपना इकलौता हाथ मारा। रिवाल्वर उछलकर दूर जा गिरा। मेहता को कोने में पड़ा रिवाल्वर उठाने का समय नहीं मिला। मेरे बुलावे पर मोहिनी दूसरे ही क्षण मेरे सिर पर आ गयी। मैंने उसे दिल ही दिल में समझाया कि कुछ देर के लिये स्वयं ही मेहता से जोर आजमाइश करना चाहता हूँ। फिर मैंने आव देखा न ताव एक झन्नाटेदार थप्पड़ मेहता के गाल पर रसीद कर दिया। मेहता को इस अचानक हमले की उम्मीद न थी। वह बौखला गया। उसके हाथ-पाँव चलाने से पहले मैंने एक और जोरदार तमाचा रसीद कर दिया जिस से खून की एक बारीक लकीर उसके होंठों पर फ़ैल गयी।

“कुर्सी पर बैठ जाओ मेहता। अधिक तेजी दिखाने की कोशिश मत करो। तुम्हारा बुरा वक्त आ चुका है।”

मेहता तुरन्त कुर्सी पर बैठ गया और अपना मुँह रूमाल से साफ़ करने लगा। उसके बैठते ही मैं भी उसके सामने वाली कुर्सी पर बैठ गया। मैंने अपने लहजे की काट कायम रखी। “मेहता! एक बार तुमने मुझ पर जुल्म की इन्तहाँ कर दी थी। मुझे सोचने-समझने का मौका नहीं दिया था। मगर मैं इतना जालिम नहीं हूँ। मैं तुम्हें वक्त देता हूँ। अगर तुम अपने प्रियजनों के लिये कोई पैगाम देना चाहते हो तो दे सकते हो। मैं वादा करता हूँ कि तुम्हारा पैगाम सम्बन्धित व्यक्ति तक पहुँचा दिया जाएगा। मगर जल्दी करो। मुझे लखनऊ से जाना है और अभी तुम्हारे कई बापों से निपटना है।”

मेहता जो चन्द क्षण पहले बड़ा खूंखार नजर आ रहा था, अचानक ठण्डा पड़ गया। उसकी आँखों से भय और आतंक के भाव झलक रहे थे। उसके चेहरे की रंगत पल भर में हल्दी की मानिंद पीली पड़ गयी थी।

कंपकंपाती आवाज में बोला। “कुँवर साहब! मैं स्वीकार करता हूँ कि मैंने तुम पर बहुत जुल्म किया है लेकिन ईश्वर साक्षी है उसमें मेरे इरादे का कोई दखल नहीं था। ऊपर से मुझे ऐसे ही आर्डर मिले थे।”

“ऊपर के आर्डर।” मैं हँस पड़ा। “तो फिर इस बारे में ऊपर वाले से ही शिकायत करना। मेरे पास अधिक समय नहीं है। तुम अपनी अंतिम इच्छा बताओ ?”

मैंने नफरत से उत्तर दिया। मेहता का चेहरा धुआँ हो गया। उसके चेहरे पर मौत के साए लरजने लगे। उसने एक नजर रिवाल्वर की तरफ देखा परन्तु उसे उठाने की हिम्मत उसमें न थी। उसने दरवाजे की तरफ दृष्टि डाली तो मैंने हँसकर कहा-

“अब तुम्हारे कोई काम नहीं आ सकता।”

“मुझे क्षमा कर दो कुँवर साहब।” अचानक वह गिड़गिड़ाने लगा। “मैं तुम्हारा अपराधी हूँ। मुझ पर दया करो।”

“दया और आप पर। मेहता साहब, आप जैसे बड़े पदाधिकारी पर।”

मेहता के चेहरे का रंग हर क्षण बदल रहा था। मैं उसकी हालत का लुत्फ उठा रहा था। उस समय मेरे दिल में रहम की कोई गुंजाइश नहीं थी। मैं एक अटल इरादे से उठा और निर्णायक स्वर में बोला। “मैं जा रहा हूँ मेहता। अधिक बातें करने से कुछ लाभ नहीं होगा। मेरा दूसरा आदेश तुम्हें मेरे जाने के बाद मिलेगा। मैं चाहता हूँ कि तुम्हारी आत्महत्या के गवाह सैकड़ों की संख्या में हों।”

इतना कहकर मैं तेजी से निकल गया। मुझे अच्छी प्रकार से विश्वास था कि मोहिनी ने मेरे दिल से उभरने वाले इरादे को समझ लिया होगा। मेरा अनुमान गलत नहीं निकला। मोहिनी मेरे सिर से उतर गयी थी। मैं थाने से निकल कर सड़क के दूसरे किनारे पर पहुँच गया और भीड़ में गुम हो गया। अभी मुझे वहाँ खड़े हुए दस मिनट ही गुजरे थे कि मैंने मेहता को थाने की इमारत से परेशान गिरेबां चाक पागलों की तरह बाहर निकलते देखा। सर्विस रिवाल्वर अभी तक उसके हाथ में था। उसके पीछे दो पुलिस वाले भी थे जो कदाचित उसकी मानसिक हालत समझकर उसके पीछे-पीछे आ गए थे।

सड़क पर पहुँचते ही मेहता ने कंठ फाड़-फाड़कर चीखना-चिल्लाना शुरू कर दिया। वह अपने इर्द-गिर्द खड़े लोगों के सामने अपना कच्चा चिट्ठा खोल रहा था। उन लोगों की काली करतूत सुना रहा था, जो पुलिस को खरीद कर रखते हैं। लखनऊ के नवाबजादों को नंगा कर रहा था।

“लोगों, मैं खुद को ख़त्म कर रहा हूँ। मेरे पापों की सूची इतनी लंबी है कि मुझे खुद याद नहीं पड़ता। मैं तुम्हारे सामने अपने गुनाह स्वीकार करता हूँ और मैंने अपने लिये खुद सजा चुन ली है। हाँ, मैंने अपने लिये सजा चुन ली है मैं मर रहा हूँ। देखो यारो, मैं मर रहा हूँ। तुम गवाह रहना दोस्तों।”

राहगीरों की अच्छी-खासी भीड़ हक्का-बक्का होकर मेहता को आश्चर्यचकित नजरों से घूर रही थी। दोनों पुलिस वाले भी स्तब्ध खड़े थे। फिर इससे पहले कि कोई कुछ समझ पाता मेहता ने रिवाल्वर की नाल कनपटी पर रखकर लिबलिबी दबा दी। वायुमंडल में एक धमाके की आवाज गूँजी और मेहता खून से लथपथ सड़क पर ढेर हो गया।

थोड़ी देर तक उसकी लाश तड़पती रही। फिर उसकी आत्मा शरीर से मुक्त हो गयी। मुझे उसके मरने का कोई अफ़सोस नहीं हुआ। बल्कि एक सकून सा महसूस हुआ। चन्द क्षणों में मोहिनी मेरे सिर पर आ गयी।

“मुझे ख़ुशी है राज कि तुमने इस दूर अंदेशी से काम लिया।” मोहिनी ने गम्भीरता से कहा। “अगर तुम थाने के अन्दर कोई जज्बाती कदम उठाते तो परिस्थितियाँ भिन्न होतीं। अब मेहता के सिलसिले में तुम्हें कोई आँच नहीं आएगी।”
 
मैंने एक फीकी मुस्कराहट बिखेरकर मोहिनी को देखा और अपनी रफ्तार तेज कर दी। अब मेरा रुख नवाब बब्बन अली की हवेली की ओर था। रास्ते में मैंने मोहिनी से कहा। “मेहता की मौत से कुछ लुत्फ नहीं आया।”

“क्या मतलब ?” मोहिनी ने आँखें फाड़कर कहा। “फिर तुम क्या चाहते हो ?”

“मैं जो चाहता था वही हुआ लेकिन मौत तो इन्तकाम नहीं है। यह तो बहुत आसान और हल्का नुस्खा है। क्षणिक यातना होती है। मौत तो आदमी को उस वक्त आती है जब वह खुद अपनी नजरों से गिर जाए। जब इस समाज में उसके लिये कोई जगह न रहे। वह अपनी जिन्दगी में रुसवाइयों का मजा चखे। मेरा ख्याल है मेहता को हमने सस्ता ही छोड़ दिया।”

“तुम बहुत दिलचस्प बातें कर रहे हो। चलो तुम्हें बोलना तो आया। इसलिए मैं कहती थी कि घर से निकलकर देखो। बहरहाल बब्बन अली के सिलसिले में इस बात का ख्याल रखा जाएगा।”

मोहिनी ने चहक कर कहा। हमने रास्ते में उस समय बब्बन अली से मुठभेड़ करने का इरादा त्याग दिया। दिन दहाड़े बब्बन अली के घर जाना उचित नहीं था। यह काम रात ही में हो सकता था। रात तक का समय गुजरना मुश्किल हो गया। सिर पर खून सवार था। जैसे-तैसे रात आयी मैं बब्बन अली की हवेली की तरफ रवाना हो गया। अशर्फी बेग़म के साथ बब्बन अली ने न जाने कितने घर उजाड़े थे। मैंने उसके चंगुल से तरन्नुम को छीना था। कई महफ़िलों से उसकी बादशाहत छीनी थी और हमारी दुश्मनी कभी खुलकर सामने नहीं आयी थी।

बब्बन अली जैसे लोग समाज में कोढ़ थे। पुलिस भी ऐसे लोगों के इशारों पर नाचती है और अब मैं इस शहर की हवा गरम कर देना चाहता था। बब्बन अली की हवेली में पहुँचना मेरे लिये कोई मुश्किल काम न था। मैं पहले भी वहाँ जा चुका था और हवेली के गुप्त रास्तों का पता मुझे मोहिनी ने बताया था। हवेली रौशन थी और मुझे मोहिनी ने बताया था कि बब्बन अली अंदर मस्ती छान रहा है। इसी तरह हर रोज उसके यहाँ या किसी और नवाब के यहाँ महफ़िलें सजती थीं या फिर नवाब किसी तवायफ के यहाँ अपनी रातें गुजारा करते थे। मैंने पुराना रास्ता अख्तियार किया। बब्बन अली के ख़ास कमरे तक पहुँचने में मुझे किसी प्रकार की कठिनाई पेश नहीं आयी। मैं देर करके इसलिए आया था कि साजिंदों और मेहमानों की उपस्थिति की संभावना न रहे और मैं नवाब से उसके शयनागार में ही मुलाक़ात करूँ।

शयनागार का दरवाजा बंद था। लेकिन वह एक झटके से खुल गया। रास्ते में एक ख़ास नौकर ने मुझे देखकर शोर मचाना शुरू किया, लेकिन मोहिनी ने ठीक समय पर मेरे सिर से उतर कर उसे दूसरी तरफ रवाना कर दिया। मैं जब उस रौशन कमरे में प्रविष्ट हुआ तो बब्बन अली की आगोश में एक बिजली तड़प रही थी। बब्बन अली का भारी भरकम शरीर उस गुलबदन की नजरों से इधर-उधर थिरक रहा था। सामने सुराही रखी थी। वह मदहोश सा था। अर्धनग्न लड़की का आधा बदन बब्बन अली की गोद में समा-समा जाता और निकल-निकल जाता। उन दोनों में दिलचस्प नोक-झोक जारी थी। मैं उसे बयान नहीं कर रहा। बस, वही नोक-झोक जो ऐसे अवसरों पर होती है।

बब्बन अली ने फिर किसी मासूम कली को औरत बनाने के लिये अपनी दौलत और अपने गुंडई हथकंडों का प्रयोग किया था। उस लड़की की हालत से यही मालूम होता था कि वह किसी चकले से नहीं आयी। किसी की बहन-बेटी है।

एक बार मैंने तरन्नुम को भी इसी तरह देखा था। उस मासूम कली की ऐसी ही दर्दनाक कहानी थी। मुझे तरन्नुम की याद आ गयी और मेरा खून खौल गया। मैंने बब्बन को ललकारा तो वह दोनों चौंक कर एक-दूसरे से अलग हो गए। बब्बन अली की नजरें मुझ पर पड़ीं तो वह किसी जहरीले नाग की तरह बल खाकर उठ खड़ा हुआ और खुरदरे स्वर में बोला-

“तुम ? कुँवर राज ठाकुर, तुम अभी तक यहाँ मौजूद हो।”

“तुम्हारा क्या ख्याल है नवाब साहब ? तुम्हारे चमचों ने मुझे दूसरी दुनिया का रास्ता दिखा दिया होगा या जेल में मुझे फाँसी लग गयी होगी। लेकिन जनाब आपका यह खादिम अदब के इस शहर में ठोकरें खा रहा है।”

“बदूबस्त, अब यहाँ क्या लेने आए हो ? अब कौन-सी तुम्हारी बहन को उठा लाए हैं हम!”

“नाराज न हो नवाब साहब। क़िबला आपका इकबाल बुलंद रहे। मैं तो बस सरसरी तौर पर आपसे मुलाक़ात करने आया था। सोचा इस शहर को छोड़ने से पहले आपसे मिलता जाऊँ।”

“लेकिन हम तुम्हारी सूरत भी देखना पसंद नहीं करते। तुमने हमसे हमारी तरन्नुम को छीन कर जाने कहाँ गायब कर दिया। हम तुम्हें कभी माफ नहीं कर सकते। तुम जिस रास्ते से आये हो, उसी से वापस चले जाओ।” नवाब के स्वर में भय का कंपन था। “तुम्हारे लिये बेहतर यही है।”

“वरना फिर नवाब क्या सजा तजवीज करेंगे ?” मैंने मुस्कराकर पूछा।

“फिर हम तो तुम जैसे हरामजादों को कुत्ते के आगे डाल देते हैं।” नवाब ने लड़की की तरफ देखकर कहा, जो सहमी हुई खड़ी थी।

“मैं भी इस वक्त इसी मकसद से आया हूँ।”

“मैं कहता हूँ यहाँ से निकल जाओ।”

“कैसे चला जाऊँ नवाब साहब! आते ही तो आपने लखनऊ का अदब तोड़कर मुझे बहन की गाली दी। अब आपकी बहन को लिये बिना हम भला कैसे यहाँ से रुखसत हो सकते हैं।”

“कमीने, हम तेरा खून पी जाएँगे। अपनी जुबान को लगाम दो वरना हम तुझे इसी वक्त जहन्नुम रसीद कर देंगे।” नवाब बब्बन अली क्रोध से पागल हो गया।

फिर उसके हाथ में जो चीज आयी मुझ पर उठाकर फेंकने लगा। उसके पागलपन का यह तमाशा मेरी दिलचस्पी का सामान था। वह लड़की जिसका नाम नौशाबा था, एक तरफ खड़ी थी।
 
जब नवाब हद से बढ़ने लगा तो नौशाबा ने उसका हाथ रोकना चाहा। लेकिन बब्बन अली ने उसके सिर पर भी एक शमादान दे मारा। नौशाबा वहीं लहरा गयी। फिर बब्बन अली मेरी तरफ बढ़ा और मैंने उस लंबे तड़ंगे आदमी को हाथ बढ़ाकर रोक लिया। “बब्बन अली! मैं तो तुम्हें यह बताने आया था कि मैं यहाँ से जा रहा हूँ। पहले मेरा इरादा तुम्हारे क़दमों से यह ज़मीन पाक करने का था। लेकिन फिर सोचा तुम्हें अपने गुनाहों की सजा यहीं भुगतनी चाहिए। अपनी बहन रुखसाना और शबाना को मेरे हवाले कर दो। फिलहाल मुझे खाली हाथ न लौटाना। नवाब के घर में आकर कोई खाली हाथ वापिस नहीं जाता।”

“कुँवर राज ठाकुर।” बब्बन अली ने दाँत पीसकर कहा और बढ़कर अपनी बंदूक उठा ली। उसने तेजी से निशाना बाँधना चाहा, लेकिन स्पष्ट है कि मोहिनी की उपस्थिति में वह कुँवर राज ठाकुर पर यह वार किस तरह कर सकता था।

मोहिनी मेरे सिर से छलावे की तरह गायब हो गयी और मैंने आगे बढ़कर बब्बन अली के हाथ से बंदूक छीन ली। बब्बन अली आश्चर्य से मेरा यह करिश्मा देख रहा था। फिर मैंने एक भरपूर चोट बंदूक के कुंदे से बब्बन अली के सिर पर मारी और यह कहता हुआ बाहर निकला-

“बब्बन अली! मैं तुम्हारी बहनों के पास जा रहा हूँ और एक दिन तुम उन्हें कोठे पर देखोगे। यही तुम्हारी सजा है।”

उसके सिर से खून बहने लगा था और वह लड़खड़ाकर गिर पड़ा था। मगर मुझे विश्वास था कि वह सख्तजान इतनी आसानी से नहीं मर सकता। उसे बेहोश छोड़कर मैं उसके शयनागार से बाहर आ गया था।

“अपना इरादा बदल दो।” मोहिनी ने ऊँची आवाज में कहा। “मैं समझती हूँ इसमें तुम्हारे लिये कुछ खतरे मौजूद हैं। यूँ भी वे बेचारी निर्दोष हैं।”

“आश्चर्य है, यह बातें तुम कह रही हो। हालाँकि तुम्हीं ने मुझे दुश्मनों से निपटने के लिये उकसाया था। क्या बब्बन अली को इससे बड़ी कोई सजा मिल सकती है ?”

“वह तो ठीक है राज। परन्तु मुझे इस काम में अच्छे आसार नजर नहीं आते। अगर हम उन्हें क्षमा कर देते हैं तो भी बब्बन अली से इन्तकाम लेने के लिये सैकड़ों उपाय हैं।”

“मगर मैं उन्हें देखना चाहता हूँ कि वह कैसी हैं ?”

“तुम उन्हें देख सकते हो। वह ऊपर की मंजिल पर रहती हैं। लेकिन बब्बन अली को इससे भयानक सजा मिल सकती है। अभी तो शुरुआत हुई है।

“ठीक है! आओ, ऊपर की मंजिल पर चलते हैं। यह अवसर फिर नहीं आएगा। तुम उनमें से एक लड़की के सिर पर चली जाना। हम उसे आसानी से यहाँ से ले जाएँगे।”

“मगर राज..!” मोहिनी ने झिझकते हुए कहा।

“मगर क्या मोहिनी ? मुझे वहाँ ले चलो। मैं उन हसीनाओं को देखना चाहता हूँ।” यह कहकर मैं ऊपरी मंजिल की तरफ जाने लगा। मोहिनी के इनकार पर मेरा जुनून और बढ़ गया था।

अभी मैं चंद सीढ़ियाँ चढ़ा ही था कि मोहिनी के पंजों की चुभन मुझे अपने सिर पर महसूस हुई। वह मुझे रोक रही थी।

“ठहर जाओ राज! आगे रास्ता बंद है।”

“रास्ता कहाँ बंद है मोहिनी ? सामने नजर आ रहा है। क्या तुम्हें कुछ नजर नहीं आ आता ?” मैंने लापरवाही से कहा और एक-दो सीढ़ियाँ और चढ़ गया।

“रुक जाइए।” एक भारी भरकम पुरुष स्वर मुझे सुनाई दिया।

मैंने चौंककर इधर-उधर देखा। वहाँ कोई नहीं था।

“कौन है यह मोहिनी ? यह आवाज किसकी है ?” मैंने ठिठक कर मोहिनी से पूछा।

“चलो राज, वापस चलते हैं।” मोहिनी ने मुझे पुचकारते हुए कहा।

“मगर क्यों ? तुम मुझे कुछ बताती क्यों नहीं ?”

“रास्ता बंद है। रास्ता खुल भी सकता है मगर तुम्हारे लिये उचित न होगा।” मोहिनी ने पहलू बदलकर कहा।

“तुम कैसी पहेलियों में बातें कर रही हो ?” मैंने नाराजगी से कहा।

फिर अचानक ऊपर की सीढ़ियों पर मुझे एक साया नजर आया। एक पुरुष का साया जो एक पल में एक सुंदर जवान पुरुष के रूप में प्रकट हो गया। उसके अंदाज में राजसी तेज था और वह कोई पुरातन काल के वस्त्र पहने हुए था। उसका चेहरा इतना तेजस्वी और खूबसूरत था कि उसे देखकर किसी शहजादे का हुलिया लिखा होता है। उसे देखकर मैं जड़ सा हो गया लेकिन दूसरे ही क्षण मेरे अंदर का जिद्दी आदमी जाग उठा। मैंने ऊपर की एक और सीढ़ी फलांग ली।

“रुक जाइए!” उसने बड़े अदब के साथ कहा।

“मैं ऊपर जाना चाहता हूँ, मेरे रास्ते से हट जाइए।” मैंने कठोरता से कहा।

“हम यहाँ की निगरानी करते हैं। आप मेरी मौजूदगी में अंदर नहीं जा सकते।” उसने कहा।

“आप मुझसे वाकिफ नहीं हैं। मैं एक जलील नवाब को उसके गुनाहों की सजा देने आया हूँ। नीचे बब्बन अली बेहोश पड़ा है, उसका अंजाम देख लीजिये और मेरे रास्ते से हट जाइए।”

“बब्बन अली से आप जो चाहें इन्तकाम ले सकते हैं। मगर उसकी बहनें बेक़सूर हैं और फिर हम उनकी हिफाजत के लिये एक अरसे से यहाँ रहते हैं।”

“आप कौन हैं ?” मैंने उससे प्रभावित होकर पूछा।

“रुखसाना और शबाना पर हमारा साया मौजूद है। हम आपके किसी मामले में दखलअन्दाजी पसंद नहीं करते। लेकिन यहाँ हम आपके रास्ते में आरज होंगे। बेहतर है आप चले जाइए।”

“वरना फिर आप क्या करेंगे ?”

“हमें मालूम है कि आप भी तन्हा नहीं हैं। मगर हम रुकावट बनेंगे। मुमकिन है आपको इससे नुकसान पहुँचे। मुमकिन है हमें अपने फितनों को बुलाना पड़े।” उसने बेझिझक होकर कहा।

“यह कौन है ?” मैंने मोहिनी से पूछा तो वह कुछ पल खामोश रहकर बोली।
 
“राज! यहाँ से चले जाओ। बब्बन अली की हवेली एक पुरानी हवेली है। जनानखाने के उस हिस्से में जहाँ रुखसाना और शबाना रहती हैं, वहाँ इस मुसलमान जिन्न का स्थान है। तुम इसकी मौजूदगी में वहाँ नहीं जा सकते।”

“जिन्न ?” मैंने आश्चर्य से कहा। “क्या वास्तव में यह नौजवान कोई जिन्न है। मगर तुम किस मर्ज की दवा हो। क्या तुम इसे काबू में नहीं कर सकतीं ?”

“तुम्हें चाहिए कि मुझे ऐसे हालात में न डालो। जहाँ खुद मुझे परीक्षा देनी पड़े। दैवी ताकतें आपस में इस तरह के टकराव से बचती हैं। फिर हो सकता है कि इस जिन्न का यहाँ पूरा पड़ाव मौजूद हो। हमें कुछ और करना पड़ेगा। कोई और तरकीब सोचनी पड़ेगी। यह जिन्न पूरे तौर पर अपने क़दमों पर जमा हुआ है। मुझे कुछ सोचने का अवसर दो।”

“आप जानते हैं बब्बन अली कितना जलील इंसान है ?” मैंने उस नौजवान को संबोधित किया जो मुस्कराकर मुझे देख रहा था।

“हमें इससे कोई मतलब नहीं है। हम सिर्फ इतना जानते हैं कि रुखसाना और शबाना बिल्कुल मासूम हैं।”

“क्या आप यह समझ रहे हैं कि मैं साधारण लोगों से भिन्न हूँ।”

“हमें मालूम है इसीलिए हम आपसे दरख्वास्त कर रहे हैं।”

“मगर मैं आपसे एक बात कहूँगा। इस वक्त तो मैं चलता हूँ लेकिन मैं उसे छोड़ूँगा नहीं। उसकी बहनों को भी नहीं छोड़ूँगा।”

“जब तक हम हवेली में हैं बराबर आपके रास्ते में आने के लिये तैयार होंगे।”

“बेहतर है आप रास्ते से हट जाएँ। जो कुछ आप देख रहे हैं, मेरे पास इससे भी अधिक है।”

“बाखुदा, जो कुछ आप देख रहे हैं वह भी कम है। हम आपको सही मशवरा दे रहे हैं।”

“लेकिन यह एक चैलेंज है। यह एक धमकी है। मुझे धमकियाँ पसंद नहीं हैं। मैं दोबारा आऊँगा।”

उसी समय मोहिनी ने मुझे बताया कि बब्बन अली को होश आ गया है और हवेली के लोग जमा होने शुरू हो गए हैं।

“हम आपके इस्तकबाल के लिये मौजूद होंगे।” यह कहकर वह वहाँ से गायब हो गया।

मैंने फिर ऊपर चढ़ना चाहा परन्तु मोहिनी ने बड़ी सख्ती से रोक दिया। बहुत बेबसी की हालत में मुझे नीचे आना पड़ा। यहाँ शोर हो रहा था। शयनागार से बचता बचाता मोहिनी पर ताव खाता हवेली से बाहर आ गया। रास्ते में मोहिनी खामोश रही। मैंने भी उससे बात करना उचित न समझा।

रात खासी गुजर गयी थी।

नवाब बब्बन अली से हार खाना मैं स्वीकार नहीं कर सकता था। घर आकर मैंने इस सिलसिले में नये सिरे से गौर करना शुरू किया। और फिर मुझे अशर्फी बेगम का ख्याल आया जो नवाब साहब के गुनाहों की साझीदार थी। अशर्फी बेगम एक कोठा चलाने वाली जालिम औरत थी जिसके यहाँ अमीरों के लिये अय्याशी का सामान जुटाया जाता था। मोहिनी ने मेरे विचारों की तह तक पहुँचते हुए कहा।

“मैं आज बहुत तरोताजा हूँ राज!”

“तुम्हें खून की ज़रूरत तो महसूस होती होगी ?”

“हाँ, कल मेहता का खून मेरे कंठ में उतर गया था!”

“ओह, तो यह वजह है तुम्हारी ताजगी की ?”

“मगर मेरे लिये तुम्हें कोई इंतज़ाम करना पड़ेगा राज।” मोहिनी इठलाकर बोली।

“जब तक दुनिया में बुरे लोगों की बहुतायत है, उस समय तक तुम्हारी गिजा की भी बहुतायत है। बब्बन अली के संबंध में क्या ख्याल है ?”

“वह।” मोहिनी ने मजे लेकर कहा। “लेकिन उसमें अभी बहुत देर है।”

“मुझे उसकी वह पुरानी हवेली पसंद आ गयी मोहिनी और बब्बन को वह हवेली खाली करनी पड़ेगी।”

“ऐसा ही होगा राज!”
 
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