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Fantasy मोहिनी

मैं अशर्फी बेगम के बाला खाने की तरफ बढ़ रहा था। लोगों की भीड़ से गुजरता हुआ मैं अशर्फी बेगम के बाला खाने तक पहुँच गया। ऊपर से किसी के गाने की आवाज आ रही थी। मैंने सीढ़ियों की तरफ कदम बढ़ा दिए। ऊपर पहुँचा तो महफ़िल गर्म थी। अशर्फी बेगम साजिन्दों के करीब बड़े ठसके से बैठी थी और उस नई बिजली को देख रही थी जिसके गले में सोज था। निःसंदेह वह एक खूबसूरत लड़की थी। कमरे में आठ-दस अमीरजादे गावतकियों से लगे बैठे थे और सुन्दरी को वासना भरी नजरों से देख रहे थे। मैं चूंकि दरवाजे की ओट में था इसलिए अशर्फी बेगम और साजिन्दों की नज़रें मुझ पर नहीं पड़ीं। चंद एक तमाशबीनों ने देखा, परन्तु वह सुन्दरी के लबरेज हुस्न की चांदनी में इतने गुम थे कि मुझ पर उचटती नज़र डालकर फिर उधर ही आकर्षित हो गए।

मोहिनी ने मुझे इस नई सुन्दरी के बारे में बताना शुरू किया ।

“राज! अशर्फी बेगम ने अपनी दुकान सजाने के लिये बड़े अनमोल मोती का चयन किया है। यही दिलनशीं है। तीन-चार दिन पहले इस कूचे में जयपुर से आयी है। कश्मीरी है। जयपुर में नृत्य और संगीत की शिक्षा प्राप्त कर रही थी। अशर्फी बेगम ने एक मोटी रकम देकर खरीदा है। यह सौदा फिर भी सस्ता था। अब इसका नीलाम होगा और लखनऊ के अमीरों में खलबली मच जाएगी। लखनऊ के अमीरों में अभी दिलनशीं के चर्चे नहीं पहुँचे हैं। अशर्फी बेगम ने इसके हुस्न के चर्चे आम करने के लिये चन्द दलाल छोड़ रखे है। लेकिन यह काम अब मेरे और तुम्हारे जिम्मे होगा। हम इसकी कीमत बढ़ायेंगे। यहाँ अगले चन्द दिनों में तिल धरने की जगह नहीं होगी। लाखों रुपये अशर्फी बेगम इसकी नथ के वसूल कर सकती है।”

मैंने दिलनशीं को गौर से देखा। उसमें लोगों को दीवाना बनाने की तमाम अदायें मौजूद थी। दिलनशीं तो कोई कयामत थी। मैं दरवाजे की ओट से निकलकर सामने आया। फिर अंदर जाकर बेधड़क एक गावतकिए से टिक गया। अशर्फी बेगम की दृष्टि मुझ पर पड़ी तो उसकी हालत पतली हो गयी। गुस्से से उसका चेहरा लाल हो गया। साजिन्दों ने मुझे देखा तो उनके चेहरों के रंग फीके पड़ गए। मैंने जेबों को खोलना शुरू कर दिया। रुपये न्यौछावर कर दिए। जब मैंने पहला नोट निकाला तो महफिल के अदब के अनुसार दिलनशीं उठकर मेरे पास आ गयी और मेरे सामने बैठकर मिसरा दोहराने लगी। मैंने नोट उसके कदमों पर न्यौछावर कर दिया। फिर दूसरा नोट उठाकर उसकी तरफ बढ़ाया। दिलनशीं ने दिल नवाज मुस्कराहट के साथ मेरा शुक्रिया अदा किया। उसकी यह अदा दिल को बहुत भाई।

नोट थामकर वह जाने के इरादे से उठी तो मैंने दूसरा नोट निकाल लिया। फिर सिलसिला जारी रखा ताकि दिलनशीं मेरे सामने बैठी रहे और किसी के सामने न जा सके। अशर्फी बेगम काँटों पर लोट रही थी। मैं दिलनशीं से फरमाइश करता रहा और रुपये निकालता रहा। महफिल में मौजूद लोगों के चेहरे लटके हुए थे। उन्होंने यह रंग देखा तो बुरा मानकर उठने लगे। मैं एक घंटे में हजारों रुपये लुटा चुका था और अब वहाँ मेरे सिवाय कोई तमाशबीन नहीं रह गया था।

मैं अशर्फी बेगम को कनखियों से देख रहा था। वह उस समय टक-टक दीम दम न कशीदम का मुहावरा बनी हुई थी। लेकिन कब तक ? जब दिलनशीं ने गजल खत्म की और दूसरी गजल शुरू करने से पहले मेरी आँखों में आँख डालकर गुनगुनाना शुरू किया तो अशर्फी बेगम चुप न रह सकी।

जहाँ बैठी थी वहीं से बोली– “बस करो, दिलनशीं! तुम्हारी तबीयत पहले ही नासाज है। अब ख्वाबगाह में जाकर आराम करो। खुर्शीद तुम्हारी कमी पूरी करने की कोशिश करेगी। दिलनशीं ने आश्चर्य से अशर्फी बेगम की ओर देखा। आँखों ही आँखों में इशारे हुए। फिर वह बड़े अदब से अपना हिनाई हाथ माथे तक ले जाकर मुझे ‘तस्लीम’ कहती हुई उठने लगी।

मैंने उसका हाथ थाम लिया।

“अगर आपके मिजाज नासाज हैं तो मैं नगमासराई की जहमत नहीं दूँगा। आपसे गुफ्तगू भी तो सुरों से कम नहीं। आप तो खुद एक गजल हैं।”

“आपकी जर्रानवाजी है। कनीज हुक्म की तामील करेगी।” दिलनशीं तीखे अन्दाज में कह कर फिर मेरे करीब होकर बैठ गयी।

अशर्फी बेगम हाथ मल रही थी। साजिन्दे खामोश बैठे भयभीत नजरों से मुझे घूर रहे थे। उनके लिये मैं नया नहीं था। मेरे खेल तरन्नुम के मामले में उन्होंने देखे थे। मैंने उन सबको नज़रअन्दाज कर दिया और दिलनशीं का हाथ थाम कर बोला-

“आप शायद इस कूचा ए इशरत में नई आयी हैं ?”

“जी हाँ, कनीज का यह तीसरा दिन है!” दिलनशीं ने शरमाते हुए कहा।

“जहे नसीब! हम भी उन खुशनसीबों में शामिल हो गये जिन्होंने आगाज शबाब में आपका दीदार कर लिया।”

दिलनशीं का चेहरा शर्म से गुलनार हो गया।

मैंने कहा- “यकीन कीजिए जो अर्ज किया गया है, वह दिल की आवाज है।”

दिलनशीं ने एक नज़र मुझे फिर देखा, फिर लजाकर बोली- “कदर अफजाई का शुक्रिया।”

अशर्फी बेगम जो अब तक दूर ही बैठी थी तेजी से अपना भारी गरारा संभालती हुई मेरे करीब आ गयी और दिलनशीं से बोली- “दिलनशीं जानेमन! तुम्हें आराम की जरूरत है, ख्वाबगाह तुम्हारी मुंतजर है।”

दिलनशीं ने सहम कर अशर्फी बेगम के चेहरे पर निगाह डाली। फिर कनखियों से मेरी तरफ देखकर माफी माँगी। तस्लीम करती हुई उठी और अन्दर चली गयी। अशर्फी बेगम खड़ी-खड़ी ताव खा रही थी। मैंने मुस्काते हुए कहा- “तशरीफ रखिए, अशर्फी बेगम! आपका पुराना नियाजगद बारगाह हुस्न में हाजिर है। क्या आपने मुझे पहचाना नहीं ?”

“कुँवर साहब।” अशर्फी बेगम शब्द चबाकर बोली। “मैं एक बार पहले भी आपसे अर्ज कर चुकी हूँ कि खुदा के लिये मुझसे कोई वास्ता न रखिए। अजराह करम, आप यहाँ आने से गुरेज किया करें। मेरा कारोबार यही है। आप क्यों हम लोगों को परेशान करने आ जाते हैं ?”

“बहुत खूब!” मैंने अशर्फी बेगम की झल्लाहट का आनंद उठाते हुए कहा। “गोया आपको अब मेरा यहाँ आना भी गँवारा नहीं है। मैं यहाँ आता हूँ तो खाली हाथ नहीं आता। यह दरवाजा तो सबके लिये खुला होता है। वैसे अर्ज करूँ कि मैं पहले भी आपको परेशान करने नहीं आया था। मेरे ख्याल से आपको अपने मेहमानों के साथ ऐसा सलूक नहीं करना चाहिए कि वह गुस्ताखी पर उतर आएँ।”

“देखिये कुँवर साहब! अब बहुत हो चुका। तरन्नुम का अब तक पता नहीं है। कैदखाना, गोलियाँ, क़त्ल हम इन झगड़ों में नहीं। आप जब भी आते है तो कोई न कोई कयामत आती है। खुदा के लिये हमें माफ कीजिए।”

“अर... र... रे! आप तो बहुत खौफजदा हैं। मैं तो हुस्न का पुजारी हूँ। सुना था आपके यहाँ एक नायाब चीज मौजूद है। सौदा करने चला आया।”

“अगर आपका इरादा दिलनशीं की तरफ है तो मैं माजरत चाहूँगी। तरन्नुम के बाद लखनऊ के उमरा के लिये बड़ी मुश्किल से यह लड़की तलाश की है।”

“सच, आप हुस्न की जौहरी हैं! आपके कयामत का मैं दिल से कायल हूँ। सारा शहर आपकी मुठ्ठी में है। बहरहाल मैं दिलनशीं की तारीफ सुनकर चला आया था। इस कली की सुपुर्दगी के लिये आपने क्या नजराना तय किया है ?”

“नजराना आदमी देखकर तय किया जाता है।”

“आप फिर मेरी तौहीन कर रही है।” मैंने व्यंग्य किया।

“नहीं, ऐसी बात नहीं है!” अशर्फी बेगम संभलकर बोली। “कुँवर साहब! आप इसकी नीलामी में बोली लगा सकते हैं। लेकिन मेरा ख्याल है आपको मायूसी होगी। आपसे डर लगता है।” अशर्फी बेगम ने अचानक कहा।

“मैं इतना बदसूरत तो नहीं हूँ।”

“आप कोई जिन्न, देव हैं कुँवर साहब। आपके बारे में बहुत कुछ सुना है। आपने पूरे शहर में हंगामा खड़ा कर दिया। मेहता ने हैरतअंगेज तौर पर खुदकुशी कर ली। तरन्नुम पुर असरार तरीके से गायब हो गयी। यह सब काम आदमी के बस का नहीं है।” अशर्फी बेगम का स्वर भयपूर्ण था।

“मैं एक सीधा-सादा आदमी हूँ लेकिन हुस्न का पुजारी हूँ। आपने शुरू से ही मुझे गलत समझा और तकलीफ उठायी। लेकिन मैं पुरानी बातें याद दिलाने नहीं आया हूँ। अब आप मुझे हुक्म दीजिए, कितना नजराना पेश किया जाए ?”

“कुँवर साहब! मैं फिलहाल इसका सौदा करने के लिये तैयार नहीं हूँ। मुझे इसकी कीमत का अन्दाजा नहीं है।”
 
“वह भी कर लीजिए और मेरी भी सुन लीजिए! मैं एक लाख रुपये अदा करने के लिये तैयार हूँ।”

अशर्फी बेगम ने हैरत से मुझे देखा लेकिन फिर तुरन्त ही संभल गयी।

“एक लाख रुपए ? कुँवर साहब, आपको हीरे की पहचान है फिर भी ऐसी बाते कर रहे हैं। यह नगीना जब नवाब अवध के आगोश में जगमगाएगा, तब आपको इसकी सही कीमत का अन्दाजा होगा।”

“मैं रकम बढ़ा सकता हूँ। सौदेबाजी मुझे अच्छी नहीं लगती, दो लाख रुपये।”

“मुझे सोचने का मौका दीजिए।”

“मैं यहाँ आता रहूँगा। आप सोच लीजिए और कोई अच्छी सी गजल सुनवा दीजिए। आप खुद भी तो अच्छा गाती होंगी ? अब भी आपके तेवरों में अनगिनत हसीनाओं का तीखापन है, काट है।” मैंने तफरीह के मूड में आकर कहा।

“कुँवर साहब! मैं अब कहाँ रही ? तरन्नुम के जाने के बाद तो मेरी कमर टूट गयी। आप मेरा मजाक न उड़ाएँ।”

“तौबा कीजिए लेकिन आप मुझे अच्छी लगती हैं।

“खुदा करे ऐसा ही रहे।”

अशर्फी बेगम फौरन उठकर चली गयी। दुबले-पतले नयन नक्श की एक लड़की खुर्शीद वहाँ आयी और उसने गाना शुरू कर दिया। मैं कुछ देर वहाँ रहा और अपने पहले दिन का काम निपटाकर चला गया।

दूसरे दिन सुबह मैं दलालों के उस होटल में गया जहाँ अधिकतर उनकी भीड़ रहती थी। मैंने उनके कानों में यह बात डाल दी कि मैं दिलनशीं की कीमत दो लाख लगाता हूँ। मुझे मालूम था कि रात तक यह खबर तमाम उमरां तक पहुँच जाएगी और फिर रात को अशर्फी बेगम के यहाँ बहुत हुजूम होगा और यही हुआ। दूसरी रात जब मैं वहाँ पहुँचा तो शहर के उमरां वहाँ अधिसंख्यक थे। अशर्फी बेगम ख़ुशी से फूली न समाती थी। मैंने उस दिन भी खूब रुपये लुटाए लेकिन सावधानी के साथ।

रात गए तक शहर के उमरां अशर्फी बेगम से दिलनशीं के बारे में बातें करते रहे। मोहिनी फुदक-फुदक कर उनके सिरों पर जाती रही, टोह लेती रही और उनका उत्साह बढ़ाती रही। मुम्बई के एक मनचले सेठ दाऊ भाई ने उसी दिन तीन लाख रुपये दिलनशीं के लिये तय कर लिये लेकिन वह मुस्कराकर टाल गयी। उसने मेरी तरह उससे भी कुछ सोचने का वक्त माँगा। मुझे मालूम था कि नवाबेन एक-दूसरे को नीचा दिखाने के लिये और शहर के उमरां पर अपना सिक्का बिठाने के लिये किस कदर बढ़-चढ़कर बोलियाँ लगाएँगे और वह कमबख्त बब्बन अली।

बस, अब तमाशा शुरू होना था। एक कश्मीरी लड़की शहर के तमाम उमरां और मैं। दौलत की यहाँ कोई अहमियत नहीं थी। जिन लोगों के पास बैठे-बिठाए बेहिसाब दौलत आती है उन्हें भला दौलत की क्या परवाह। और रंडी के कोठे पर आने वाला हर शख्स अपनी नाक ऊँची देखना पसंद करता है। दिलनशीं को मैं नाक का सवाल बनाना चाहता था लेकिन बब्बन अली अभी इस खेल में शामिल नहीं हुआ था। वह तो जैसे आँखों पर पट्टी बाँधे सो रहा था। परन्तु यह कैसे संभव था कि उसके गुर्गे अशर्फी बेगम के यहाँ लगने वाली बोलियों की खबर न पहुँचाते हों और वह फिरदोशों का बेताज बादशाह इस कश्मीरी लड़की के गुदाज जिस्म से महरूम हो जाए। यह किस तरह मुमकिन था।

मुझे इसी का इन्तजार था। रोज रात मैं अशर्फी बेगम के कोठे पर जाता। वहाँ दिलनशीं का नशीला नाच-गाना होता। इस बारे में बेशुमार बातों का बयान करना जरा मुश्किल है कि वहाँ क्या-क्या होता है। हालाँकि जी यही चाहता है कि हर उस रात की चर्चा आम की जाए जो मैंने अशर्फी बेगम के बाला खाने पर गुजारी थी। फिर भी कुछ बातें तो सुनानी ही होगी।
 
अशर्फी बेगम के बाला खाने पर हुस्न का इम्तहान था। एक से एक सुन्दरियाँ वहाँ आ गयी थीं। एक हफ्ते बाद सूरत यह हुई कि दिलनशीं की कीमत तेजी से बढ़ती जा रही थी। मेरे लिये यह सब दिलचस्प और अनोखा मंजर था। मोहिनी भी खुश नजर आ रही थी। एक दिन यह सुना कि बब्बन अली ने अपना एक ख़ास दूत अशर्फी बेगम के पास उपहारों सहित भेजा और कदाचित दिलनशीं की कीमत बढ़ाने के लिये अशर्फी बेगम को नवाब बब्बन अली का ही इन्तजार था। कोई दस मिनट बाद एक रात वह कमीना नवाब सज-धज कर अपने चमचों के साथ अशर्फी बेगम के बालाखाने पर हाजिर हुआ। दूसरे उमरा ने भी अशर्फी बेगम के साथ दिल खोलकर उसका स्वागत किया। बब्बन अली ने अपने गले की माला उतार कर दी। फिर मैंने अशर्फी बेगम को बुलाकर पूछा–

“अब क्या इरादे हैं अशर्फी बेगम ?”

“देखिए न कुँवर साहब। बात चंद दिनों में लाखों रुपयों तक जा पहुँची।”

“मुझे मालूम है। बहरहाल आप कब तक तड़पाती रहेंगी। इन लोगों से मुझे रकावह महसूस होती है।”

अशर्फी बेगम ने व्यापारिक हँसी हँसते हुए कहा– “मुझे कुछ कमा लेने दीजिए। आपने देखा, बोली दस लाख को पार कर गयी है।”

“लेकिन मेरी पेशकश पहली थी। फिर भी मैं इससे अधिक देने को तैयार हूँ।”

“आप मुझे मोहलत दीजिए।” अशर्फी बेगम ने दरख्वास्त की।

बब्बन अली ने मुझे अशर्फी बेगम से राजदाराना अंदाज में बातें करते देखा तो मुँह फेर लिया। अशर्फी बेगम मेरे पास से उठकर उसके पास चली गयी। मोहिनी भी बब्बन अली के सिर पर पहुँच गयी। उस दौरान दिलनशीं के सौदे की बात हुई और बब्बन अली ने उससे अधिक रकम लगा दी। फिर यही सिलसिला चलता रहा और एक महीने में इस नाटक ने ऐसा जोर पकड़ा कि कई छोटे-मोटे नवाबों ने उधर जाने की तौबा कर ली। बब्बन अली रोज आता और रुपये लुटाकर चला जाता। इस अरसे में उसे अपने चंद गाँव बेचने पड़े। मैं खामोश तमाशाई बना यह दिलचस्प तमाशा देखता रहा। यह दुनिया का सबसे सनसनीखेज नीलाम था। अशर्फी बेगम लाखों में खेल रही थी। गाते-गाते दिलनशीं का गला बैठ जाता था। वह नवाबेन, जो अपने नाम की खातिर अपनी मूँछ ऊँची रखने के लिये अपना सब कुछ लुटाने और अपने आपको दाँव पर लगाने में भी नहीं हिचकते, वह एक खूबसूरत नर्तकी के लिये एक दूसरे का मुकाबला कर रहे थे। अगर कोई बोली लगाने में हिचकता था तो मैं मोहिनी को उसके सिर पर भेज देता। इस मैदान में जीत उसी व्यक्ति की होनी थी जो पैसे के लिहाज से सबसे ताकतवर हो।

मुझे दिलनशीं में कोई दिलचस्पी नहीं थी। मेरा उद्देश्य तो कुछ और ही था। मैं दिन भर मोहिनी के जरिए रुपये इकट्ठा करता और रात को अशर्फी बेगम के बालाखाने पर बरसा देता। अब अशर्फी बेगम के तेवर बदल गए थे। वह मेरी इज्जत करने लगी थी। उसके यहाँ की दूसरी लड़कियाँ मेरे सामने बिछी-बिछी जाती थीं। अशर्फी बेगम की हवस रोज ही बढ़ती जा रही थी और वह जानबूझकर सौदे को लम्बा कर रही थी। मुझे दो मौसम गुजारने थे ताकि हरि आनन्द काली की रक्षा से बाहर आ सके। वक्त आहिस्ता-आहिस्ता गुजरने लगा और दो माह गुजर गए। मुझे याद नहीं कि मैंने कितनी दौलत उस बालाखाने पर कुर्बान कर दी लेकिन बब्बन अली को मैंने दीवाना बना दिया था। अब उसके पास नकदी और जेवरात लगभग समाप्त हो चुके थे। पैसा तेजी से बह रहा था। कभी वह खुद लुटाता। कभी मोहिनी उसके सिर पर जाकर दौलत लुटवाती। इस तरह वह दूसरे उमरा के सामने मूँछें ऊँची करता और दूसरे दिन उसके गुर्गे बढ़-चढ़ कर उसके नाम की चर्चा करते।

शहर में बब्बन अली की धूम मची हुई थी। दिलनशीं अभी तक अशर्फी बेगम के पास थी। नौबत यहाँ तक पहुँची कि बब्बन अली सब कुछ लुटा बैठा। अब ले देकर एक हवेली रह गयी थी। वह हवेली जिस पर मेरी नजर थी। आखिर एक दिन मैं नाटक के पर्दे से हट गया और दूसरे लोग भी धीरे-धीरे रुखसत हो गये। बब्बन अली को दिलनशीं की नथ बड़ी महँगी पड़ी। पर वह जिद का पक्का था और अशर्फी बेगम ने उसकी हवेली से दिलनशीं को तोल दिया। इसके सिवा बब्बन अली के पास कुछ न रहा।

बब्बन अली की हवेली अशर्फी बेगम के हवाले हो गयी और लोगों ने देखा कि बब्बन अली ने आखिरी रात दिलनशीं के गुदाज जिस्म की छाँव में गुजारी। दिलनशीं की यह कीमत उसे सस्ती पड़ी इसलिए कि लोगों ने बड़ी-बड़ी बोलियाँ लगा दी थी मगर वह सब गायब हो गए थे। अशर्फी बेगम की आँख में पुराने सम्बन्ध की वजह से बहरहाल इतनी मुरव्वत जरूर थी कि उसने दिलनशीं को बब्बन के हवाले कर दिया। वह रात आखिरी रात थी। एक हफ्ते तक बब्बन अली उस नथ उतराई के जश्न में मस्त रहा। फिर अगले हफ्ते अशर्फी बेगम के गुंडों ने उसे हवेली से बाहर निकलने पर मजबूर कर दिया। यह एक नवाब का हैरतअंगेज अंत था। हवेली से सामान निकला जो बाजारों में आया और बब्बन अली ने उसे बेच कर अपने लिये किराये का मकान ले लिया। उसकी दोनों बहनें और दो वफादार नौकर साथ थे। वह लखनऊ के एक मोहल्ले में बस गए।

बब्बन अली की ज़िन्दगी में ही उसकी मौत हो गयी थी। वह पागलों के से अंदाज में अशर्फी बेगम के यहाँ जाता और अशर्फी बेगम मेरे सामने ही उससे नजरें फेर लेती। उसकी बहनें तो कोठे पर नहीं बैठ सकीं लेकिन मैंने ऐसी सूरत पैदा कर दी थी कि खुद बब्बन अली अशर्फी बेगम के यहाँ चिलम भरने लगा। यह बताने की आवश्यकता नहीं कि उसके शुभचिंतक उससे दूर हो गए थे। वह एक बदनाम और बेइज्जत आदमी की तरह हर तरफ मशहूर हो गया था और आखिर इस ड्रामे का ड्रॉपसीन इस तरह हुआ कि बब्बन अली केवल अशर्फी बेगम के बालाखाने का होकर रह गया। वह अपने घर वापिस नहीं आना चाहता था। रुखसाना और शबाना की हिफाजत उसके दोनों वफादार नौकर कर रहे थे। बब्बन अली स्थाई रूप से अशर्फी बेगम की ड्योढ़ी पर टिक गया। उसकी हालत दीवानों की सी थी। उसे अपना होश नहीं रहता था। मुजरे के दौरान वह एक तुच्छ आदमी की तरह अलग-थलग बैठा रहता और एक-एक का मुँह ताकता रहता। रुखसाना और शबाना को देखने को जी चाहता था। एक दिन मैं उनके मकान पर पहुँचा। वह एक साधारण दर्जे का मकान था। मैंने खुद को बब्बन अली का दोस्त जाहिर किया लेकिन मुझे अन्दर जाने की आज्ञा नहीं मिली। दरवाजे पर वही शहजादा नजर आया जो बब्बन अली की हवेली में मिला था। उसने मेरा रास्ता रोक लिया।

“आप यहाँ भी हैं ?” मैंने पूछा।

“हाँ, इन लोगों को हिफाजत की जरूरत थी! हम यहाँ चले आए।” उसने सपाट लहजे में उत्तर दिया।

“मैं रुखसाना और शबाना की मदद करना चाहता हूँ। मुझे अन्दर जाने दीजिये।” मैंने कहा।

“खूब, अब आप उनकी मदद करना चाहते हैं! बाखुदा, अगर हमें रोक न दिया जाता तो हम आप को देख लेते ?” उसने गुस्से में कहा।

“आपका मकसद क्या है ?” मैंने भी तेवर बदले।

“वक्ती तौर पर हम मजबूर हो गए थे लेकिन आप इसे हमेशा की मजबूरी न समझिये।”

मोहिनी ने मुझे फिर वापस लौटने के लिये कहा। मैं बिफर रहा था लेकिन मोहिनी ने जब आगे कुछ कहने-सुनने से इनकार कर दिया तो मुझे वापस लौटना पड़ा। यह बात अवश्य साफ़ हो गयी थी कि वह शहजादा मुझसे सख्त नाराज था। मगर उसे कोई ताकत रोके हुए थी। वह ताकत कौन थी ? मैंने मोहिनी से पूछना चाहा परन्तु मोहिनी ने विषय बदलने की कोशिश की। मेरे दिल में यह बात फाँस बनकर अटक गयी। मैं चला आया। यूँ भी बब्बन अली को इस हालत में देखकर मेरा इंतकाम पूरा हो गया। बल्कि मुझे उस पर तरस आने लगा था। हाँ, रुखसाना और शबाना को देखने की तमन्ना दिल ही दिल में रह गयी।

अब मेरा काम ख़त्म हो गया था। अब मुझे केवल अशर्फी बेगम से निपटना था। उसे मैंने अब तक ढील दे रखी थी। तीन महीने से अधिक समय बीत गया था। इस तरह एक मौसम भी गुजर गया और सर्दियाँ शुरू हो गईं। दिलनशीं से अब मुझे कोई दिलचस्पी नहीं थी। आखिर एक रात अशर्फी बेगम के बालाखाने पर मैं सारा हिसाब-किताब चुकाने के इरादे से पहुँच गया। रंग जमा हुआ था। बब्बन अली एक कोने में भयभीत सा बैठा हुआ था। सब लोग छँट गए, दिलनशीं गा चुकी। खुर्शीद गा चुकी तो फानूस टिमटिमाने लगे। अशर्फी बेगम की जुर्रत नहीं थी कि वह मुझसे इजाजत माँगे।

आखिर मैंने उसे करीब बुलाया और सख्ती से कहा- “अशर्फी बेगम! अब तुम्हें यह पेशा छोड़ देना चाहिए। पिछले दिनों तुमने बहुत कमा लिया। जानती हो, यह सब कुछ किसकी वजह से हुआ ?”

“कुँवर साहब! कमाया क्या ख़ाक। इन लड़कियों को सिखाने पर इतना खर्च हो जाता है कि बचता-बचाता कुछ नहीं है। मगर आप कैसे समझ रहे हैं कि यह सब कुछ आप की वजह से हुआ। मैं अर्ज़ करूँ यह सब दिलनशीं के हुस्न का जलवा था।”

“भूल गयी कि हमने दिलनशीं की औकात से बढ़कर बोली लगाई थी ? क्या हाड़-माँस के इस पंजर की इतनी कीमत लग सकती थी ? लाख रुपये। दो लाख, दस लाख रुपये, लाखों रुपये। अशर्फी बेगम, कभी तुमने सुना है कि नथ की इतनी कीमत होती है ? तुम्हें नहीं मालूम, यह सब मैंने किया था और मैंने एक बड़े मकसद से किया था। अब मैं तुमसे एक चीज माँग रहा हूँ। वह मुझे दे दो। बब्बन अली की हवेली के कागजात।” मेरे स्वर में कठोरता बरस रही थी।
 
मुझे मालूम था कि अशर्फी बेगम अब बहुत घमंडी हो गयी है। उसका मिजाज आसमान पर रहता था। वह मुझसे इस माँग की तो कल्पना भी नहीं कर सकती थी। इस अरसे में मेरे सादे स्वभाव के कारण उसका भय भी दूर हो गया था। उसका हत्थे से उखड़ना बिल्कुल स्वाभाविक था।

चीखकर बोली- “अरे वाह! आप भी कमाल करते हैं कुँवर साहब! आपने अपना हक खूब जमाया! कहीं आप नशे में तो नहीं हैं ?”

“अशर्फी बेगम! मैं जिस हालात में हूँ इसका अंदाजा तुम्हें हो जाएगा। तुम मेरी माँग पूरी कर दो, वरना नुकसान उठाओगी। इससे पहले कि मैं तुमसे कुछ और माँग करूँ। वह तमाम नगदी और जेवर तलब करूँ जो तुमने हासिल किए हैं, बेहतर है कि तुम खुद समझ जाओ।” मैंने धमकी भरे स्वर में कहा।

“आप बहक रहे हैं कुँवर साहब! ऐसे लोगों से बन्ने खां निपटता है। मैं आप से कहती हूँ कि आप अजराह करम, यहाँ से चले जाइए। अशर्फी बेगम का बालाखाना कोई चिड़ियाघर नहीं है। जहाँ तरह-तरह के जानवर अपनी बोलियाँ बोले।” अशर्फी बेगम ने भी सख्ती से जवाब दिया।

“तुम हद से बढ़ रही हो। मैं तुम्हारी मौत बनकर आया हूँ।” मैंने जहरीले स्वर में कहा।

साजिन्दे उठ गए थे। सिर्फ बन्ने खां तबलची मौजूद था। बब्बन अली भी एक कोने में सिमटा बैठा हमारी बातें सुन रहा था। जब बात ज्यादा गरम हुई और तू-तड़ाक तक नौबत पहुँची। अशर्फी बेगम ने सख्ती के साथ मुझे बालाखाने से निकल जाने का हुक्म दिया।

“अशर्फी बेगम! मैं आज के बाद यहाँ नहीं आऊँगा। मगर आज मैं तुम्हें तुम्हारे गुनाहों और कमीनगियों की सजा देने आया हूँ। आज मेरे आने का मकसद वह नहीं, जो रोज होता था।”

“बन्ने खां!” अशर्फी बेगम ने दो कदम पीछे हटते हुए कहा- “कुँवर राज ठाकुर, शायद ज्यादा बहक गए हैं। तुम्हें इन्हें रास्ता दिखाने की जरूरत पड़ेगी।”

बन्ने खां अशर्फी बेगम का पुराना नमकख्वार था। बाजारे हुस्न में उसका दबदबा था। आदमी सूरत से ही खतरनाक लगता था। अशर्फी बेगम का हुक्म पाते ही वह आस्तीनें चढ़ाता उठा। मूँछों पर ताव देता हुआ बोला।

“कुँवर साहब, इज्जत प्यारी है तो चलते-फिरते नज़र आओ! बन्ने खां की दुश्मनी ली तो लखनऊ की जमीन तुम पर तंग हो जाएगी। फिर यहाँ का आसमान भी तुम्हें पनाह न दे सकेगा।”

मेरे सब्र का पैमाना बन्ने खां का वाक्य सुनते ही छलक गया था। मैं तेजी से दरवाजे की तरफ बढ़ा। बन्ने खां के चेहरे पर विजेताओं की सी मुस्कराहट उभर आयी थी। इस अर्से में बब्बन अली कमरे से खिसक गया था। मुझे जाते देखकर अशर्फी बेगम ने खंखार कर थूका। उन दोनों का ख्याल था कि मैं डर कर जा रहा हूँ लेकिन जब मैंने दरवाजा बंद किया और पलटकर उन दोनों पर नजर डाली तो अशर्फी बेगम को झुरझुरी सी आ गयी। अलबत्ता बन्ने खां इस समय भी मुझे बिगड़े हुए तेवरों से घूर रहा था।

उसने कहा- “तुमने दरवाजा बंद करके खुद अपने लिये रास्ता बंद कर लिया है राज ठाकुर! यह आज तुम पर बहुत भारी पड़ेगा।”

बन्ने खां आगे बढ़ने लगा। वहाँ अब तीन ही इंसान थे। अशर्फी बेगम अपनी जगह खड़ी मुझे घूर रही थी। मेरे लिये परिस्थिति पर अधिकार प्राप्त करना कुछ कठिन नहीं था। अतः मैंने मोहिनी को संकेत किया। वह बन्ने खां के सिर पर पहुँची। जब मोहिनी मेरे सिर से उतर गयी तो मैंने बन्ने खां को संबोधित करते हुए कहा-

“बन्ने खां! मुझे मालूम है कि तुम कौन हो, लेकिन आज तुम्हारा वास्ता किसी और से पड़ा है। बेहतर है जहाँ हो वही रुक जाओ और अपनी औकात न भूलो।”

बन्ने खां, जो इस समय मोहिनी की शक्तियों के अधीन था। मेरा हुक्म पाते ही रुक गया और उसका व्यवहार अचानक बदल गया। अशर्फी बेगम ने उसे रुकते हुए देखा तो चिल्लाकर बोली- “नमक हराम! तू एक टुंडे की गीदड़ भभकी से रुक गया। आगे बढ़ और इसकी अंतड़ियाँ पेट से निकाल दे।”

मुझे इसी क्षण का इन्तजार था। अतः दिल ही दिल में मैंने मोहिनी से संपर्क स्थापित किया और उसे आवश्यक निर्देश दिए। फिर उस तमाशे का इन्तजार करने लगा जो कुछ देर बाद शुरू होने वाला था।

“ज़लील कुत्ते, क्या तूने मेरा हुक्म नहीं सुना ?” अशर्फी बेगम ने झल्लाकर कहा।

बन्ने खां ने पलटकर कहा- “खानम! तुम्हारे हुक्म पर मैं पूरे लखनऊ शहर की अंतड़ियाँ बाहर निकाल सकता हूँ लेकिन इसके लिये तुम्हें मुझे मुँह माँगा इनाम देना होगा।”

“दूँगी हरामजादे, दूँगी! तू एक लाख भी माँगेगा, तो भी दूँगी। लेकिन शर्त यह है कि तू आज इस टुंडे का सफाया कर दे।” अशर्फी बेगम गुस्से से चीखकर बोली।

“अगर तुम जान भी माँगोगी तो बन्ने खां इनकार नहीं करेगा। खानम, मैं मुद्दत से तुम्हारा आरज़ूमंद हूँ। बस, इस ढलती जवानी का शर्बत पिला दो। अपने इस गुलाम से वादा कर लो।”

“कमीने, तेरी यह मजाल!” अशर्फी बेगम आपे से बाहर हो गयी। उसने फर्श पर रखा गुलदान उठाकर बन्ने खां पर मारना चाहा लेकिन इतनी मोहलत नहीं मिली।

बन्ने खां ने ठोकर मारी और गुलदान उछलकर दूर जा पड़ा। अशर्फी बेगम ने संभलने की कोशिश की लेकिन इसका मौका नहीं मिला। बन्ने खां ने थप्पड़ों और लातों से उसका स्वागत करना शुरू कर दिया। बन्ने खां अशर्फी बेगम को फर्श पर गिराकर रगड़ रहा था और अशर्फी बेगम उसे बुरी-बुरी सुना रही थी। लेकिन बन्ने खां जैसे बहरा हो गया था, उसने एक ही झटके से अशर्फी बेगम का जम्पर बीच से चाक कर दिया और अशर्फी बेगम का सीना नंगा करके उस पर दाँत गड़ा दिए। अशर्फी बेगम की तेज चीखें आसपास के बालाखानों से गूँजने वाले संगीत में दबकर रह गयी। बन्ने खां ने जब सिर उठाया तो मुझे फुरफुरी आ गयी। वह बड़ा खूनी और दहशतनाक मंजर था। अशर्फी बेगम का सीना लहूलुहान था। बन्ने खां ने बड़ी बेदर्दी के साथ उसे जगह-जगह से काटा था।

बन्ने खां दरिंदा बन गया था। वह उसे नोंच रहा था, भंभोड़ रहा था। उसके चेहरे पर दरिंदगी का राज था। मैं तेजी से लपककर अन्दर गया। इस ख्याल से कि कहीं कोई अन्दर ना आ जाये। अन्दर के तमाम कमरे देख डाले लेकिन सारे कमरे सुनसान पड़े थे। अचानक मुझे पिछले रास्ते का ख्याल आया। मैं दौड़ता हुआ उस ओर गया तो मेरे संदेह की पुष्टि हो गयी। वह लोग बाहरी कमरे में खेला जाने वाला खूनी ड्रामा देखकर चुपके से फरार हो गए थे। बब्बन अली भी कहीं मौजूद नहीं था। जेवरात की आलमारी खुली पड़ी थी। मैंने जल्दी से पिछला दरवाजा बंद करके चिटकनी चढ़ा दी फिर बाहर आ गया।
 
अशर्फी बेगम एकदम नग्नावस्था में फर्श पर बेदम पड़ी थी। उसके सीने से दोनों तरफ का माँस गायब हो चुका था। पेट बीच से फटा हुआ था। चेहरा लहूलुहान था। आँखों के दोनों हलकों से खून उबल रहा था। गालों पर जगह-जगह खरोंचे मौजूद थीं। बन्ने खां अशर्फी बेगम के बराबर में चित्त पड़ा था और एक खंजर दस्ते तक उसके दिल के मुकाम पर पेवस्त नजर आ रहा था। अभी मैं यह खौफनाक मंजर देख ही रहा था कि मोहिनी मेरे सिर पर आ गयी और परेशानी भरे स्वर में बोली।

“राज घर के तमाम व्यक्ति फरार हो गए हैं। बब्बन अली भी घर के कागजात, जेवरात लेकर फरार हो गया है। अब मेरा उसके सिर पर जाना जरूरी हो गया है। साजिन्दे इस वक्त करीबी पुलिस चौकी पर बयान लिखवा रहे हैं। बब्बन अली अभी दूर नहीं गया होगा। मैं उसे लेकर आती हूँ।”

“बब्बन अली को फौरन पकड़ो। वह पिछले रास्ते से फरार हो गया है।” मैंने मोहिनी से परेशानी में कहा।

“हाँ! मुझे फौरन जाना चाहिए। मैं बब्बन अली को वापस लाती हूँ । अभी सेकेंडों में आ जाऊँगी। तुम्हें इस वक्त किसी तरह निकलना है।” मोहिनी ने दुबारा परेशानी का अहसास दिलाया।

मैंने कहा- “तुम्हें देर नहीं लगनी चाहिए फौरन आना होगा।”

“हालात को समझने की कोशिश करो राज। जो खेल यहाँ शुरू हुआ था, उसकी खबर नीचे पहुँच गयी है। बब्बन अली फिर खतरनाक साबित हो सकता है। मैं जा रही हूँ। तुम यहाँ से निकलने और फरार होने की कोशिश करो।”

मोहिनी फौरन चली गयी। मैंने झिरी से झाँककर बाहर की स्थिति का जायजा लिया। यह देखकर मुझे पसीना आ गया कि बाहर एक हुजूम जमा हो रहा था। लोग दरवाजे पर जमा थे। गोया अभी-अभी पुलिस पहुँचने वाली होगी। बाहर निकलने की कोई सूरत नहीं थी। मुझे गुस्सा आने लगा कि इस वक्त मोहिनी क्यों चली गयी। लेकिन बब्बन अली का पीछा भी जरूरी था। अब मेरे लिये सारे रास्ते बंद हो चुके थे। हरचंद की अशर्फी बेगम का क़त्ल और बन्ने खां की आत्महत्या मुझे फाँसी के तख्ते से दूर रखने के लिये पर्याप्त थी लेकिन लड़कियों और साजिंदों का बयान मुझे फँसा सकता था। बब्बन अली की फरारी भी खतरनाक थी। वह अवसर उचित समझकर अपना काम कर गया था। मैं अजीब उलझन में फँसा था। मेरे इर्द-गिर्द खतरे के दायरे तंग होते जा रहे थे।

मैंने सोचा, फरारी के लिये क्यों न पिछला रास्ता आजमाया जाए। मैं पलटकर पिछले दरवाजे पर पहुँचा तो वहाँ भी नीचे लोगों के समूह की आवाजें आ रही थीं। अशर्फी बेगम का बालाखाना अब मेरे लिये चूहेदान की हैसियत रखता था। मेरे दिल की धड़कनें तेज हो गयी। मैं दोबारा उस कमरे में पहुँचा जहाँ अशर्फी बेगम और बन्ने खां की लाशें एक भयानक मंजर पेश कर रही थीं। उस समय नीचे हजारों लोगों का मजमा मौजूद था। अगर मैं मोहिनी के जरिये निकल भी जाता तो भी कानून और पुलिस की सारी मशीन हरकत में आ जाती। हालात ने बहुत तेजी के साथ संगीन रूप धारण कर लिया। मैं सोच रहा था कि अगर मोहिनी होती तो क्या करता ? क्या इतने बड़े हुजूम में दरवाजा खोलकर निकलना आसान होता। मजमे में से किस तरह मेरा शरीर निकलता ? समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करूँ ?

अभी मैं किसी आखिरी फैसले पर पहुँचने की कोशिश कर ही रहा था कि सामने के दरवाजे पर भारी क़दमों की आहटें उभरी। फिर किसी ने जोर-जोर से दरवाजा पीटना शुरू कर दिया। मेरे दिल की धड़कने और तेज हो गईं।

“कुँवर राज ठाकुर, दरवाजा खोल दो! वरना हम दरवाजा तोड़ देंगे। पुलिस चारों तरह से तुम्हें घेर चुकी है।” बाहर से किसी की आवाज गूँजी। मैं पलटकर पिछले दरवाजे पर पहुँचा। झिरी से झाँककर देखा तो उस तरफ भी शस्त्रधारी पुलिस का हुजूम मेरी घात में था। नीचे पतली गली में इंसानों के सिर ही सिर नजर आ रहे थे।

“क्या मैं दरवाजा खोल दूँ ?” मैंने अपने आपसे सवाल किया। लेकिन फिर वे लोग मेरी क्या गत बनाएँगे। जेल और सजा का सिलसिला शुरू हो जायेगा।

तो फिर क्या करूँ ? क्या मैं खामोश रहूँ ? हाँ, मुझे खामोश रहना चाहिए! मोहिनी का इन्तजार करना चाहिए। मैं फिर बाहर वाले सामने के कमरे में आ गया। सामने वाले दरवाजे पर फिर एक गर्जना सुनाई दी।

“राज ठाकुर, मैं तुम्हें आखिरी वार्निंग दे रहा हूँ! दरवाजा खोल दो और खुद को हमारे हवाले कर दो। अगर तुमने मुकाबले की कोशिश की तो भूनकर रख दिए जाओगे। मैं तुम्हें पाँच मिनट की मोहलत देता हूँ।”

मैंने मोहिनी को याद किया, कुलवन्त को याद किया फिर जगदेव को याद किया। पुलिस की एक वार्निंग मुझे मिल गयी थी। मोहिनी अभी तक गायब थी और दरवाजे पर टक्करें पड़नी शुरू हो गयी थीं। मैं परेशान था। बहुत परेशान। मैंने मोहिनी को आवाज दी कि जहाँ भी हो फौरन आ जाओ। दरवाजा टूट रहा था। मैं दूसरे कमरे में चला गया और दरवाजा अंदर से बंद कर लिया और जोर से फिर मोहिनी को आवाज दी। पुलिस दरवाजा तोड़कर अंदर आ गयी थी। बाहर एक शोर मचा था। गलियाँ तमाशबीनों से भरी थीं। दोनों दरवाजे बंद थे। और मैं किसी दैवी मदद का इन्तजार कर रहा था। इस इन्तजार में कि शायद मोहिनी आ जाये। मुझे कुछ वक्त लेना था। कुछ मोहलत चाहिए थी। इसलिए मैं दूसरे कमरे में चला आया और झल्लाकर मोहिनी को आवाजें दी। बाहरी कमरे में उभरने वाली बूटों की आवाजें मेरे दिल पर घूँसे बरसा रही थीं। किसी भी क्षण वे दूसरा दरवाजा भी तोड़कर अंदर आ सकते थे और अब सिर्फ मोहिनी ही मुझे बचा सकती थी। परन्तु मोहिनी न जाने कहाँ गायब थी ? मैंने दिल की तमाम गहराइयों से उसे आवाजें दी।

“मोहिनी! मुझे इसी वक्त तुम्हारी जरूरत है। तमाम काम छोड़कर आ जाओ। बब्बन अली को नर्क में झोंको, मेरी मदद करो।”

मगर मेरी आवाज हलक में घुटकर रह गयी। उसी समय बाहर से वही आवाज गूँजी।

“कुँवर राज ठाकुर! अब तुम्हारा बच निकलना असंभव है। कानून की नजरों से बचकर अब तुम कहीं नहीं भाग सकोगे। खैरियत चाहते हो तो दरवाजा खोल दो। वरना हम इसे भी तोड़ देंगे।”

मेरे जी में आया कि उन्हें कोई मुँहतोड़ जवाब दूँ क्योंकि मैं उनके हाथ कहाँ आने वाला था। अगर मैं खुद को अकेला समझता तो अशर्फी बेगम के कोठे पर ये खून-खराबा क्यों होता ? पर जिसके भरोसे पर था वही मुझसे दूर थी। मैंने दरवाजे की झिर्री से बाहर झाँकने की कोशिश की। बाहर अफरा-तफरी मची हुई थी। पुलिस के आदमी उन लोगों को सामने से हटाने की कोशिश कर रहे थे जो अंदर आ गए थे। मैं चारों तरफ से फँस गया था। तिलमिलाने और अपने ऊपर लानत भेजने के सिवा कोई चारा नहीं था। मुझे झुरझुरी आ गयी। मैंने झिर्री से निगाहें हटा लीं। फिर कमरे में अपने छिपने की संभावना पर गौर करने लगा। लेकिन ऐसी कोई जगह मुझे नजर नहीं आ रही थी। वह अब दरवाजा पीटने लगे थे। एकाएक शोर गूँजा। ऐसा लगा जैसे मजमे में से कोई व्यक्ति चीखता-चिल्लाता आगे बढ़ रहा हो। यह आवाज मुझे जानी-पहचानी सी लगी। मैंने एक कुर्सी दरवाजे से निकट करके ऊपर से झाँकने की कोशिश की और मुझ पर आश्चर्य का पहाड़ टूट पड़ा।
 
मैं केवल एक दायरे में देख सका। मगर मुझे वह नजर आ गया। हरि आनंद हजूम को चीरता कमरे में बढ़ा आ रहा था और चीख रहा था– “मुझे रास्ता दो, मुझे रास्ता दो!” वह लोग आश्चर्य से उसकी ओर देखने लगे।

“तुम कौन हो महाराज और यहाँ कैसे ?” पुलिस ऑफिसर ने उसका रास्ता रोकते हुए कहा। “शायद तुम गलत जगह आ गए हो।”

“हटो! मुझे रास्ता दो। मैं ठीक वक़्त और ठीक जगह आया हूँ। वह तुम्हारे काबू में नहीं आएगा। मैं तुम्हारी मदद करने आया हूँ। एक अरसे बाद मुझे इसका अवसर मिला है। मैं इसे तुम्हारे हवाले करूँगा। तुम नहीं जानते कि तुम्हारा वास्ता कितने बड़े शैतान से पड़ा है।” हरि आनंद ने गरजदार आवाज़ में कहा।

“क्या तुम उसे जानते हो ?” पुलिस ऑफिसर ने पूछा।

“मैं किसे नहीं जानता ?” हरि आनंद ने लहराकर कहा। “वक़्त कम है। देर न करो। बाकी बातें बाद में पूछना। वह बड़ी मुश्किल से काबू में आया है। इस वक़्त उसकी परी मोहिनी भी उसके साथ नहीं है। दरवाजा तोड़ दो। अन्दर दाखिल हो जाओ।” हरि आनंद ने जैसे-तैसे आज्ञा दी।

“मगर तुम्हारा उससे क्या सम्बन्ध है ?” पुलिस ऑफिसर ने तफ्तीश से पूछा।

“मेरी उससे पुरानी दोस्ती है। आज मैं दोस्ती का हक निभाने आया हूँ।” हरि आनंद ने व्यंग्य से उत्तर दिया। “ठहरो, दरवाजा तोड़ने की क्या आवश्यकता है! आओ, मैं इसे खोलता हूँ! मैं इसे अभी खोल देता हूँ।” यह कहकर उसने आँखें बंद कर ली और बुदबुदाने लगा।

पुलिस वाले आश्चर्यचकित निगाहों से उसे देख रहे थे। वह इस बात की कशमकश में थे कि हरि आनंद की बातों का विश्वास कर लें या उसे धक्का देकर अन्य लोगों की तरह बाहर निकाल दें। मजमे में सुकून छा गया था। अब मुझे विश्वास था कि दरवाजा क्षणों में खुल जाएगा और वह लोग हरि आनंद से प्रभावित हो जायेंगे। इतनी छोटी सी बात हरि आनंद के लिये क्या महत्व रखती थी। मैंने झिर्री पर पर्दा गिरा दिया और छिपने की नाकाम कोशिश करने लगा। मैं कमरे में इधर-उधर भाग रहा था। मुझे अपना अंजाम साफ नजर आ रहा था। यकीनन हरि आनंद ने मोहिनी के रास्ते अपने किसी जाप से रोक दिए होंगे। वह मेरी ताक में था। मैं अपने पसीने से डूबने लगा।

कुछ क्षणों की बात थी, उसके बाद मैं पुलिस के चंगुल में फँसने वाला था। फिर वही गिरफ्तारियाँ, फिर वही थाना, कचहरी, पुलिस जेलखाना। मोहिनी के आने की कोई सूरत नहीं थी। मुझे मायूसियों ने घेर लिया और मेरी साँस उखड़ने लगी। फिर मैंने दिल को दिलासा दी। ठीक है। वह मुझे गिरफ्तार कर लेंगे। मगर गिरफ्तारी अस्थाई होगी क्योंकि मोहिनी किसी न किसी वक़्त मेरे सिर पर आ जाएगी। उस जगह न सही किसी और जगह सही। लेकिन थोड़ी देर बाद पुलिस के हाथों मेरी जो गत बनने वाली थी, उसने मुझे भयभीत कर दिया था।

मैं सहमे हुए अंदाज में दीवारों में छुपने की कोशिश करने लगा। मेरी दृष्टि दरवाजे पर जमी थी। वह अब चरमराने लगा था। पुश्त की दीवार ने मेरा रास्ता रोका तो मैं चौंका। मैंने पलटकर पिछली तरफ खुलने वाली खिड़की से बाहर झाँका। हजूम देखकर मेरे रहे-सहे होश भी गुम होने लगे। गली में तिल धरने की जगह नहीं थी। अब दरो-दीवार मेरी हालत पर मुस्करा रहे थे। फिर अचानक एक चोट के साथ दरवाजा खुल गया। सबसे पहले एक वर्दीधारी पुलिस इंस्पेक्टर अन्दर दाखिल हुआ। मेरा जिस्म सिमट गया। उसी क्षण एक जानी-पहचानी आवाज ने मेरे कानों में सरगोशी की।

“राज, कोई आवाज न निकालना! जिस तरह खड़े हो वहाँ से जरा भी जुम्बिश न करना। पुलिस तुम्हारा बाल भी बाँका न कर सकेगी।”

कल्पना! यह आवाज कल्पना की थी। दूसरे ही क्षण पुलिस दनदनाती हुई कमरे में दाखिल हो गयी। वह क्षण आज भी मेरी कल्पना में सुरक्षित है जब मैं पुलिस की निगाहों के सामने खड़ा था लेकिन कानून के रक्षक मुझे देख पाने में असमर्थ थे। कमरे में अपने परम्परागत लिबास में खूबसूरत सुन्दरी कल्पना खड़ी थी। एक पुलिस ऑफिसर ने आगे बढ़कर डपटते हुए स्वर में उससे पूछा।

“तुम कौन हो ? वह कहाँ है ?”

“वह कौन ? वह तो कब के चले गए!” कल्पना ने मासूमियत से उत्तर दिया।

“लड़की! वह यहीं मौजूद है। हमें उसका पता बताओ। वह मुजरिम है और अधिक देर तक हमें झाँसा नहीं दे सकता।”

“कौन मुजरिम है ? किसकी बात कर रहे हैं आप ? कुँवर राज ठाकुर तो कब के चले गए।” कल्पना ने उसी सादगी से कहा।

मैं बिलकुल खामोश एक कोने में खड़ा था और आश्चर्यचकित नजरों से कभी कल्पना को तो कभी पुलिस वालों को देख रहा था। पुलिस ऑफिसर झल्लाया हुआ कल्पना के पास पहुँच गया और गुर्राकर पूछा- “वह कब गया ?”

“बहुत देर हो गयी। ना जाने कितनी देर हो गयी।” कल्पना ने बच्चों की तरह कहा।

“और तुम। तुम कौन हो और क्या करती हो ? तुम यहाँ क्या कर रही हो ? तुमने यहाँ क्या-क्या देखा है ?” पुलिस ऑफिसर ने बदहवासी से पूछा।

“म... मैं ? मैं जनाब कल्पना हूँ। एक दासी। मैंने यहाँ कुछ नहीं देखा। मैं तो देर से आयी थी।”

“दासी ?” पुलिस ऑफिसर बड़बड़ाया फिर गरजकर बोला। “लड़की तुम्हारे सामने पुलिस है। हमें साफ़-साफ़ बताओ, तुमने बार-बार पुकारने पर भी दरवाजा क्यों नहीं खोला ? तुमने मुजरिम को जरूर कहीं छुपा दिया है। वह यहाँ से कहीं नहीं जा सकता। खैर, हम तुमसे बाद में निपट लेंगे। तुम इस वक्त खुद को गिरफ्तार समझो।

“महाराज!” उसने घूमकर कहा। “महाराज कहाँ गए ?”

शायद वह हरि आनंद के दरवाजा खोल देने से प्रभावित हो गया था इसलिए बुलाना चाहता था। हरि आनंद उसकी आवाज सुनकर मुस्कराता हुआ अन्दर प्रविष्ट हुआ लेकिन वह दूसरे ही क्षण कल्पना को देखकर ठिठक गया। हरि आनंद और कल्पना के बीच तेज-तेज नजरों का टकराव हुआ और हरि आनंद बेपरवाही से पुलिस ऑफिसर से संबोधित हुआ।

“क्या है ? तुमने मुझे पुकारा महाशय ?”

“महाराज, दरवाजा खोलने पर हमें यह लड़की नजर आयी! कदाचित इसका सम्बन्ध भी अशर्फी बेगम की तवायफों से है। यह कहती है कि मुलजिम राज ठाकुर यहाँ से जा चुका है।” पुलिस ऑफिसर ने हरि आनंद को रिपोर्ट देते हुए कहा।

“जा चुका है ?” हरि आनंद ने आँखें फाड़ते हुए कहा। “क्या तुम सब अंधे हो गए हो ? वह तुम्हारे सामने मौजूद है। देखो, सामने खड़ा है! वह कौन बदमाश दीवार से चिपका भयभीत खड़ा है। इसे पकड़ लो। आज इसका काम तमाम हुआ।”

“कौन महाराज ? आप क्या कह रहे हैं ? यहाँ तो इस लड़की के सिवा कोई नहीं है।” पुलिस ऑफिसर ने विचित्र नजरों से हरि आनंद को देखा।

“क्या कहा ? क्या सचमुच वह तुम्हें नजर नहीं आ रहा है ? वह सामने देखो। अरे, तुम्हारे बिल्कुल सामने! यह टुंडा सैकड़ों जरायम कर चुका है। न जाने कितने इंसानों का खून कर चुका है। खिड़की के निकट सहमा हुआ कौन खड़ा है।”

“महाराज!” पुलिस ऑफिसर ने आँखें मलते हुए उकताकर कहा। “खिड़की के निकट। क्या आप मजाक कर रहे हैं ? आप सपना देख रहे हैं ? क्या आप... पागल हो गए हैं ?”

“ओह्हो!” हरि आनंद जैसे कुछ समझ कर बोला। “ठीक है, ठीक है! यह सब इसकी शरारत है। इस सुन्दर नार की। यह लड़की। तुम इसे गिरफ्तार कर लो। इसने तुम्हारी आँखों पर पर्दा डाल दिया है। तुम्हें कुछ नजर नहीं आएगा।” फिर तिलमिलाकर बोला- “ठहरो! मैं इसका तोड़ करता हूँ।” यह कहकर उसने अपनी रानों पर जोरदार हाथ मारा।
 
उसी समय कल्पना ने अपना हाथ उठाया और हरि आनंद की तरफ झटक दिया। कल्पना अब तक पुलिस और हरि आनंद की बदहवासी को दिलचस्पी और सादगी से देख रही थी लेकिन अब उसका खामोश रहना उचित नहीं था। वह गंभीर स्वर में बोली-

“हरि आनंद, यह चरवे पुराने हैं! तुम्हारी शक्ति ने मोहिनी का रास्ता थोड़ी देर के लिये अवश्य रोक लिया लेकिन तुम कल्पना को भूल गए। जाओ, हमारे रास्ते से हट जाओ। इसी में तुम्हारी मुक्ति है।”

“देवी, आज तुम्हारा कोई जादू नहीं चलेगा! राज ठाकुर ने दो क़त्ल किए हैं। तुम कब तक इसे बचाओगी। वह पाप-जुर्म करता रहेगा तो एक न एक दिन सजा पायेगा। आज वह दिन आ गया है। अब इसे कोई नहीं बचा सकता।” हरि आनंद ने दबे स्वर में कहा।

“हरि आनंद!” कल्पना की आवाज में नरमी थी। “कुँवर राज ठाकुर पर उस समय तक कोई हाथ नहीं डाल सकता जब तक मैं मौजूद हूँ। तुम एक साधारण से पंडित, इतना भी नहीं जानते कि मैं कौन हूँ ?”

कल्पना की यह दिलेरी देखकर पुलिस का सारा दस्ता चौकन्ना हो गया और पुलिस ऑफिसर ने कठोरता से कहा- “लड़की! अधिक बातें न बनाओ। सीधी तरह हमें उसका पता बताओ ?”

“अपने महाराज से उसका पता पूछो।” कल्पना ने व्यंग्य से कहा।

“वह अभी गिरफ्तार हो जाता। मैं कुछ सोच-समझ कर यहाँ आया हूँ देवी। मैं यह अवसर हाथ से न जाने दूँगा।” हरि आनंद ने फिर कहा।

“हरि आनंद, तुम्हारा समय भी निकट आ रहा है। यह दो माह भी समाप्त हो जाएँगे। माला रानी और डॉली का खून तुम्हारी गरदन पर है। मुझे तैश मत दिलाओ। तुम यहाँ से चले जाओ, मैं तुमसे आखिरी बार कहती हूँ।”

“क्यों देवी ? मुझसे डर लगने लगा है ? मुझ पर माला रानी और डॉली का खून है मगर राज ठाकुर, तुम्हारे इस प्रेमी की गर्दन पर अनेक मनुष्यों का खून है।” हरि आनंद ने गुस्से से काँपते हुए कहा।”

यह कहकर उसने छत की तरफ देखकर कुछ पढ़ा और मेरी तरफ उँगली उठा दी। मुमकिन था कि मैं काँप जाता परन्तु तभी मुझे कल्पना की चेतावनी का ध्यान आया। मैं साँस रोके खड़ा रहा। हरि आनंद के अमल के उत्तर में कल्पना ने भी अपनी उँगली के दायरे बनाने शुरू कर दिए और अपना रुख हरि आनंद की ओर कर दिया। दोनों के बीच यह हैरतअंगेज नोक-झोक थोड़ी देर जारी रही।

“देवी! तुम इसे यहाँ से नहीं ले जा सकती। पुलिस को सारी बात मालूम हो गयी हैं। अब राज ठाकुर का बचना मुश्किल है। मेरे आने का उद्देश्य यही था कि मैं असली मुजरिम का पता पुलिस को बताऊँ और मेरा काम किसी सीमा तक पूरा हो गया है।”

“मेरे आने का भी उद्देश्य यही था कि मैं राज ठाकुर की मदद करूँ।” कल्पना ने दो टूक जवाब दिया।

“सुन लिया! सुन लिया, तुमने पुलिस के गुर्गों ?” हरि आनंद ने पुलिस को संबोधित किया। “क्या अब भी तुम्हें यकीन नहीं आया कि यह औरत है जिसने राज को इस कमरे में ही अदृश्य कर रखा है। तुम्हें यकीन आया कि वह दुष्ट अब तक क्यों बचता रहा है ?”

“इन बातों से कोई लाभ नहीं है हरि आनंद।” कल्पना ने जहरीले स्वर में कहा। “तुमने देख लिया कि तुम नाकाम हो चुके हो। अब यहाँ से चले जाओ।”

पुलिस ऑफिसर अब उकताने लगे थे। वह कल्पना और हरि आनंद की रहस्यमय बातें समझने में असमर्थ थे। एक पुलिस ऑफिसर के संकेत पर दो कांस्टेबलों ने पलंग के नीचे आलमारियों, मेजों और आदमकद शीशों के पीछे मुझे तलाश करना शुरू किया। उन्होंने तमाम वस्तुएँ उलट-पलट डालीं। इस बीच दो कांस्टेबल भयभीत दिलनशीं, गजाला, शमीम और खुर्शीद को पकड़ कर अन्दर लाए। उनमें अशर्फी बेगम के नौकर भी सम्मिलित थे। शमीम काँप रही थी और दिलनशीं तस्वीर बनी हुई मुजरिमों की तरह पुलिस के सामने खड़ी थी।

“क्यों, तुम्हें यकीन है कि वह यहाँ मौजूद था ?” पुलिस ऑफिसर ने उनसे पूछा।

“जी हाँ! हम उसे यहीं छोड़कर गए थे।”

“मगर संभव है, वह अंत में फरार हो गया हो।” शमीम ने डरते-डरते जुबान खोली।

“वह कहाँ फरार हो सकता है ? तुम सारा घर दिखाओ।” पुलिस ऑफिसर ने शमीम को हुक्म दिया। दो कांस्टेबल उसे धक्का देते हुए कमरे से बाहर ले गए।

“यह कौन है ?” पुलिस ऑफिसर ने कल्पना की तरफ संकेत करते हुए दिलनशीं से पूछा।

“यह मुझे नहीं मालूम।” दिलनशीं ने काँपते हुए उत्तर दिया।

“महाशय! क्यों समय बर्बाद कर रहे हो ? यह नारियाँ तुम्हें क्या बताएँगी ? जो पूछना है, इस नारी से पूछो।” हरि आनंद ने उनका ध्यान कल्पना की तरफ आकर्षित कराया।

“हरि आनंद!” कल्पना ने उसे घूरकर देखा। “इन्हें क्यों मजबूर करते हो ? क्या तुमने अपनी असफलता स्वीकार कर ली ?”

“तुम इसे काबू में कर लो तो मैं कुँवर राज ठाकुर को अभी तुम्हारे हवाले कर दूँगा।” हरि आनंद ने पुलिस ऑफिसर से कहा। वह स्वयं कल्पना के पास जाने से झिझक रहा था।

फिर हरि आनंद ने मेरी आँखों में आँखें डालकर कहा– “कुँवर राज ठाकुर! मैं अँधा नहीं हूँ। उचित है कि अपनी जगह चलकर खुद आ जाओ। वरना तुम वहीं अग्नि में जल-भुन जाओगे।” यह कहकर वह आगे बढ़ा।

“रुक जाओ हरि आनंद!” कल्पना ने दहाड़कर कहा। उसी समय कांस्टेबल ने उसकी कलायी पकड़ ली। मगर दूसरे क्षण वह चीखकर दूर जा गिरा। उसका यह अंजाम देखकर दूसरा कांस्टेबल आगे बढ़ा। उसने कल्पना को काबू में करना चाहा किन्तु उसका भी वही अंजाम हुआ।
 
परिणामस्वरूप पुलिस ऑफिसर को अपने रिवाल्वर का रुख कल्पना की तरफ करना पड़ा। हरि आनंद आँखें फाड़े धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा था। उसकी रफ्तार बहुत धीमी थी। एकाएक हरि आनंद किसी चीज से टकराकर गिरा। हालाँकि उसके सामने कोई वस्तु नहीं थी। मुड़कर उसने कल्पना की तरफ देखा। कल्पना की आँखें सुर्ख थीं। पंडित हरि आनंद ने तेजी से उठकर जमीन पर बेतहाशा ठोकरें मारनी शुरू कर दी और पागलों की तरह जोर-जोर से कोई जाप पढ़ने लगा।

“यह आदमी गलत मालूम होता है।” एक कांस्टेबल ने इंस्पेक्टर के कान में कहा।

“चुप रहो! क्या तुमने उसे दरवाजा खोलते नहीं देखा था ?”

हरि आनंद जब उठकर खड़ा हुआ तो कल्पना तड़प रही थी और मचल रही थी जैसे कोई शक्ति उसे यातना दे रही हो। हरि आनंद के चेहरे पर मुस्कराहट छा गयी लेकिन कल्पना एक क्षण में संभल गयी और हरि आनंद, जो मेरे निकट आ गया था। उलटे कदमों वापस हट गया।

“यह क्या हो रहा है महाराज ?” पुलिस इंस्पेक्टर ने झुँझलाकर पूछा।

“कुछ नहीं। यह नारी एक महान् पंडित से उलझ रही है। इसे नहीं मालूम कि यह आग से खेल रही है। तुम देखते रहो।” हरि आनंद यह कहकर जमीन पर गिर गया और माथे से जमीन रगड़ने लगा।

इंस्पेक्टर ने कुछ न समझने वाले अंदाज में कल्पना की तरफ देखा। कल्पना का ध्यान हरि आनंद की तरफ था। एकाएक उसकी कल्पना में तनाव पैदा हुआ और वह भी फुर्ती के साथ जमीन पर उकड़ू बैठ गयी। अचानक कमरे में गरज पैदा हो गयी और ऐसा महसूस हुआ जैसे दरो-दीवार काँपने लगे हों। पुलिस दहशत से पीछे हट गयी। हरि आनंद अपने जाप में व्यस्त था जब उसने सिर उठाया तो उसका चेहरा गजबनाक हो रहा था। सारा कमरा चीखों से गूँजने लगा। हरि आनंद के चेहरे पर एक रंग आता और रुक जाता था। उसके माथे पर पसीने के कतरे चमकने लगे। थोड़ी देर में कमरे में चंद पुलिस वाले, मैं, हरि आनंद और कल्पना मौजूद थे। बाकी सब भाग गए थे। मुझे भय था कि कहीं कल्पना नाकाम न हो जाए। आज हरि आनंद हर वार करेगा। अपने कमान का हर तरकश आजमाएगा। नाजुक कल्पना कब तक काली के सेवक का मुकाबला करेगी ?

समय बीत रहा था। कमरे में भयानक किस्म की आवाजें गूँज रही थीं। मेरे कदम काँपने लगे थे और दिल डोल रहा था। मैं अपनी जगह से जुम्बिश भी नहीं कर सकता था। खाँस और खँखार भी नहीं सकता था। कमरे में शोरगुल की आवाजें देर तक गूँजती रहीं।

“हरि आनंद!” कल्पना की आवाज शोर में गूँजी। “मुझे मजबूर न करो कि मैं काली की रक्षा में आए सेवक को नष्ट कर दूँ। यह जाप बंद कर दो। काली देख रही है। वह निश्चय ही मुझे क्षमा कर देगी। वह देख रही है कि तुम गलत कर रहे हो। मैं तुमसे आखिरी बार कह रही हूँ कि इन जापों को बंद करो। मैं यहाँ से किसी भी समय जा सकती हूँ। मैं पहले ही चली जाती लेकिन तुम्हें यह बताना जरूरी था कि अब कुँवर राज का ख्याल तुम्हें छोड़ देना चाहिए। उसके साथ देवी के सेवक मौजूद हैं।”

कल्पना की आवाज में न जाने कहाँ से इतनी शक्ति आ गयी थी कि वह भयानक शोर भी इस आवाज में दब गया था। जब वह खामोश हो गयी तो हरि आनंद ने एक छत उड़ा देने वाला कहकहा लगाया।

“पाँच मर गए हैं। अब सिर्फ तेरह बाकी हैं।”

“वह पाँच मरे नहीं हैं। उन्हें हटा लिया गया है। तेरह पर्याप्त हैं।” कल्पना ने छत की तरफ घूरकर कहा। “क्या मैं उन पाँचों को दुबारा बुलाऊँ ? तुम्हारे पास तो तीस हैं, मगर वह इन पर भारी हैं।”

“मैं और बुला सकता हूँ।”

“तुम्हें शर्मिंदगी होगी।”

“मैं आज फैसला करना चाहता हूँ।”

“फैसले का समय अभी नहीं आया। फैसला भी शीघ्र हो जाएगा। समय कम रह गया है। मैं जा रही हूँ। मेरी यहाँ उपस्थिति आवश्यक नहीं और सुनो। वह भी मेरे साथ है।” कल्पना ने मेरी तरफ संकेत किया।

“मैंने इनकी संख्या बढ़ा दी है। तुम उसे यहाँ से नहीं ले जा सकती। उसके साथ न्याय होगा।”

“क्या तुम गिनती कर सकते हो। लो देखो!” कल्पना की आवाज गूँजी।

हरि आनंद ने आँखें फाड़-फाड़कर चारों तरफ देखा। चीख-पुकार और तेज हो गयी थी। उसी क्षण कमरे में लोबान की सुगंध महकने लगी और लोबान के धुएँ ने सारे कमरे को जकड़ सा लिया। वह धुआँ इतना बढ़ा कि सामने की चीजें नजरों से ओझल होने लगी। हरि आनंद, कल्पना, पुलिस वाले सब के सब धुएँ में अट गए। उसके अलावा कई किस्म की सुगंध भी कमरे में महकने लगी। चारों तरफ कानों के परदे झनझना देने वाला शोर गूँज रहा था। ऐसे समय कल्पना का स्वर मेरे कानों में पड़ा।

“राज अब तुम इस खिड़की के पास से हट जाओ। ख्याल रहे, तुम्हारा शरीर इनमें से किसी के शरीर से न टकराए!”

मैंने उसके निर्देशानुसार और अपने अनुमान के अनुसार कमरे के पश्चिमी कोने की तरफ धीरे-धीरे खिसकना शुरू किया। अभी मैं खिड़की के पास से हटा ही था कि हरि आनंद की आवाज गूँजी।

“दुष्टों! वह जा रहा है। वह उसे ले जा रही है। फिर वह तुम्हारे हाथ नहीं आएगा। तुम उसे फिर खो रहे हो। गोलियाँ चलाओ।”

“तुम्हारा इस शहर में रहना उचित नहीं है राज! अपनी आँखें बंद कर लो।” मैंने कल्पना के इस आदेश का पालन किया और आँखें बंद कर लीं।

कमरे में अंधाधुन फायरिंग हो रही थी। हरि आनंद चीख रहा था – “हर तरफ निशाना बाँधो।”

आँखें मीचे ही मुझे यूँ लगा जैसे मेरे पाँव हवा में उठ गए हों। हवा की सनसनाहट और लोगों की चीख-पुकार मेरी चेतना से टकरा रही थी। धीरे-धीरे वह आवाजें दूर होती गईं और मेरी चेतना भी लुप्त होने लगी। पता नहीं कितनी देर गुजरी, कितने दिन गुजरे ?

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कितनी सदियाँ गुज़र गयी। यह वक्त मेरी ज़िंदगी में शामिल नहीं होगा। जब मुझे अपने ज़िंदा होने का अहसास हुआ था।

दूर-दूर तक आदमी का नामोनिशान न था। वह एक हरी-भरी वादी थी। मैंने चारों तरफ़ दृष्टि घुमाकर देखा। मेरी पीठ की तरफ़ कल्पना मौजूद थी। जैसे चित्रकार की कल्पना, परी पैकर जिस्म, वह सराया हरी साड़ी में खिली जा रही थी। उसका दूधिया बदन मेरी नज़रों में चकाचौंध पैदा कर रहा था। उस समय वह बड़ी मासूम और भोली-भाली नज़र आ रही थी। मैंने उसका मुस्कराता हुआ चेहरा देखा तो ज़िंदगी के सारे ग़म भूल गया। अगर कल्पना थी तो ग़म कोई चीज़ नहीं था। कल्पना के होंठों पर एक अजीब सी मुस्कराहट फैली हुई थी।

“तुम एक बड़ी मुसीबत में फँस गए थे।” आख़िर उसने मौन तोड़ा।

“हाँ, अगर तुम न आती और मेरी मदद न करती तो मैं कहीं का न रहता। मैं तुम्हारा अहसानमंद हूँ।

“मगर कल्पना देवी! तुम तो आश्चर्यजनक शक्तियों की स्वामी हो। तुमने अभी मुझे अपने बारे में नहीं बताया। आख़िर तुम हो कौन और कैसे मेरी मदद को आ जाती हो ?”

“मैं एक दासी हूँ। मुझे आज्ञा मिली थी और मैं उपस्थित हो गयी।”

“कुलवंत ने कहा था। मुझे लगता है तुम कुलवंत का ही कोई रूप हो। कुलवंत ने मुझसे कहा था कि तुम इसी तरह की ख़तरनाक परिस्थितियों में मेरी मदद करोगी।”

वह शरमा सी गयी। “मैं कौन हूँ, यह बात छोड़ दो! बहुत सी बात पूछी नहीं जाती।”

“जी चाहता है तुम हमेशा पास रहो। और तुमने ही तो कहा था कि तुम मुझे सदियों से जानती हो। हमारा प्रेम सदियों पुराना है।”

वह मेरी बातों को मुस्कराकर टालती हुई बोली- “मैं जा रही हूँ, तुम ऐसे गंभीर मामले में न पड़ा करो। तुम्हारे दुश्मन बहुत हैं।”

“तुम कहाँ जा रही हो ? तुम मेरे साथ क्यों नहीं चलती ?”

“मेरा काम समाप्त हो चुका है। मैं तुमसे मिलती रहूँगी। यह मेरा वचन है।”

“मैं तुम्हारे अहसान सारी ज़िंदगी नहीं उतार सकता।”

“इसकी आवश्यकता नहीं है, मैं चाहती हूँ कि तुम सदा सुखी रहो।”

“तुम्हारी बातों से कुलवंत की ख़ुशबू आती है। कहीं तुम कुलवंत ही तो नहीं हो ? मुझे बताओ कि तुम कौन हो ?”

मगर मुझे इसका कोई उत्तर नहीं मिला। वह क्षणों में ग़ायब हो गयी। मैं उससे मोहिनी के बारे में भी पूछना चाहता था लेकिन वह किसी छलावे की तरह वायुमंडल में अदृश्य हो गयी।

मैं देर तक गुमसुम बैठा रहा फिर आख़िर थके हुए अंदाज़ में उठा।

मेरे सामने एक पगडंडी थी। मैंने ऊपर निगाह की और घुमावदार रास्ते पर आगे बढ़ने लगा। मुझे अहसास हुआ कि मैं बुढ़ा हो गया हूँ, मैं थक गया हूँ। मैं कहीं भी गिर पड़ूँगा। मैं कब तक ज़िंदा रहूँगा, पता नहीं कब आत्मा का नाज़ुक भार मेरे मिट्टी के जिस्म से जुड़ा रहेगा।

मैं ऊपर चढ़ने लगा।

दुनिया में एक ही जगह मेरे लिए सबसे सुरक्षित जगह थी। ऊपर के रास्तों पर चलते हुए मैं कई बार फिसल पड़ा। बारिश हो चुकी थी परंतु फिसलन बाकी थी। सारा क्षेत्र हरी थाली से ढका हुआ था। मस्तिष्क परेशान था और अशर्फी बेगम वाली घटना बार-बार याद आ जाती थी।

संभलता-संभलता मैं झरने के क़रीब पहुँच गया। झरने की आवाज़ से बेअख्तियार माला याद आने लगी। बहुत जब्त किया लेकिन मगर दिल काबू न रहा। आँखें जलने लगी। एक क्षण रुककर मैंने झरने से पानी लिया और दो चुल्लू अपने मुँह पर डाल लिए। मेरे आँसू पानी में बह गए।

यह वह झरना था जहाँ मैंने सबसे पहले माला को देखा था। फिर मैं उस पहाड़ी पर चढ़ने लगा जहाँ कुलवंत की कुटी थी। यह मैसूर की वही पहाड़ी थी। मेरे लिए एक जानी-पहचानी जगह। एक ऐसी जगह जहाँ मैं सुरक्षित रह सकता था।

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कुलंवत के सामने मैं अपनी ज़िंदगी के दुखड़ों को लेकर बहुत रोया, किसी बेसहारा बच्चे की तरह। मेरे जीवन में कितने दुःख, कितनी आँधियाँ थीं कि मैं जहाँ भी जाता चैन न मिलता।

मोहिनी अब तक मेरे पास लौटकर नहीं आई थी। और कुलवंत के पास दिलासाओं के सिवाय था भी क्या। हरि आनन्द की बात छिड़ती तो मेरे सीने में नश्तर चलने लगते।

वह ज़िंदा था, मैं ज़िंदा था। जबकि होना यह चाहिए था कि हम दोनों में से किसी एक को ज़िंदा रहना चाहिए था।

तरन्नुम कुलवंत के पास ही थी। वह मेरी सेवा करती रहती। मैंने उसे नहीं बताया था कि अशर्फी बेगम अब इस दुनिया में नहीं रही। कुलवंत ने मुझे यह बताने से रोक दिया।

तरन्नुम एक भोली-भाली लड़की थी। वह लखनऊ के लोगों के बारे में पूछती और बच्चों की तरह मेरे सामने मचल-मचल जाती।

इसी तरह कुटी में दिन बीतते जा रहे थे। कुलवंत की इच्छा थी कि मैं कहीं विदेश चला जाऊँ। क्योंकि हिन्दुस्तान के हर शहर में मेरे लिए ख़तरा है। पुलिस चारों तरफ मुझे तलाश कर रही है। अखबारों में मेरे बारे में तरह-तरह की चर्चा हो रही है।

सात दिन बाद जब मैं झरने की पारदर्शी स्वच्छ जल में स्नान कर रहा था तो अचानक मोहिनी मेरे सिर पर आ गयी।उसकी आँखें जल रही थी जैसे वह एक लम्बे समय से न सोयी हो। चेहरे पर आतंक बरस रहा था और वह एकदम मुर्दा सी मालूम होती थी। मुझे उस पर बहुत क्रोध था लेकिन उसकी हालत देखकर मैंने नरमी से पूछा- “तुम इतने दिनों कहाँ रही ?”

“मुझे मालूम हो गया था कि तुम कुशलतापूर्वक कुलवंत के पास पहुँच गए हो तो इसलिए यहाँ रुक गयी।” मोहिनी ने उदासी से कहा।

“याद है उस दिन मैंने कितनी आवाजें दी थीं ? उस दिन तुमने मुझे तबाह करके रख दिया था। उस दिन की कल्पना करके मेरा रोम-रोम सिहर उठता है।”

“मुझे अहसास है राज लेकिन मैं जल्दी में हरी आनन्द को भूल गयी थी। चाहे थोड़े समय के लिए सही पर उसने मेरा रास्ता बंद कर दिया था। यक़ीन करो राज, मैं मजबूर थी। मैं क्या करती ?”

“मुझे सबकुछ मालूम हो चुका है मोहिनी। तुम एक पंडित के जाप में बँध गयी। हर बार तुम्हारे सामने कोई न कोई ऐसी विवशता आ जाती है। मेरी समझ में नहीं आता कि एक साधारण सा पंडित कैसे तुम्हारा रास्ता रोक सकता है। कोई भी तुम्हें प्राप्त कर सकता है। तुम्हारी इन मजबूरियों ने तो मेरा जीना हराम कर रखा है।”

“राज!” मोहिनी का स्वर दर्द में डूबा था। “आश्चर्य की बात है कि तुम मेरे बारे में ऐसी बातें कर रहे हो। मैं तुम्हारे लिए मारी-मारी फिरती रही। अब तुम मेरी मजबूरियों का उपहास उड़ा रहे हो। जबकि तुम्हें मालूम है कि मैं क्या हूँ। तुम्हें क्या मालूम कि उसने क्या जाप किया था।”

“जाप किया था ?” मैंने बिगड़कर कहा। “क्या तुम्हारे पास उसका तोड़ नहीं था ? कल्पना कैसे अंदर प्रविष्ट हो गयी थी ? तुम तो कभी-कभी बहुत मायूस करती हो।”

“कल्पना और मुझमें अंतर है। लेकिन छोड़ो, मैं तुमसे लड़ना नहीं चाहती। तुम मेरी कुशलता के बारे में भी नहीं पूछ रहे हो। मुझ पर क्या गुजरी, यह भी तुमने नहीं पूछा।” मोहिनी ने डूबते स्वर में कहा।

“क्या तुम उसे एक साधारण घटना समझती हो ?”

“इस घटना की संगीनी की वजह से मैं तुमसे इतनी दूर रही। सारा शहर तुम्हारी फ़िक्र में है। तुम्हारे संबंध में अजीबो-ग़रीब अफवाहें उड़ रही हैं। पुलिस ने कई बार तुम्हारे चाचा के घर की तलाशी ली। तुम्हारे अचानक ग़ायब होने से शहर भर में हंगामा मचा हुआ है।

“जब मैं तुमसे दूर होकर बब्बन अली के तलाश में गयी थी तो वह अपने घर पहुँचने में सफल हो चुका था। उसने जेवरात, काग़ज़ात और नकदी अपनी बहनों के हवाले कर दिए थे। मैंने उस घर में दाख़िल होने की कोशिश की थी लेकिन उसी जिन्न ने मेरा रास्ता रोक लिया था जो तुम्हारे आड़े आया था।”

मोहिनी कुछ रुककर बोली।

“बब्बन अली अपने घर में सुरक्षित हो गया था और सारा आरोप तुम पर लगाया जा रहा था। बाला खाने की लड़कियों ने तुम्हारे ख़िलाफ़ बयान दिए थे।

“मैं कभी अशर्फी बेगम के बाला खाने पर जाती थी तो कभी नवाब के घर। मेरे लिए दोनों घर बंद हो चुके थे। फिर जब मुझे यह मालूम हुआ कि तुम कल्पना की सुरक्षा में हो तो मैं बब्बन अली के घर के क़रीब धरना देकर बैठ गयी और मैंने एक पुलिस ऑफ़िसर के सिर पर जाकर बब्बन अली को गिरफ़्तार करा दिया।

“अच्छा, बब्बन अली गिरफ़्तार हो गया ? फिर क्या हुआ ?”

“फिर क्या हुआ ? अब तुम कैसे मचल रहे हो ? तुम बड़े स्वार्थी हो।”

“मेरी जान! नाराज़ हो गयी ? मज़ाक बाद में करना। जल्दी से बताओ फिर क्या हुआ ?” मैंने मोहिनी से प्यार भरे स्वर में कहा।

“ठीक है! तुम्हें तो मेरा कोई ख़्याल ही नहीं। कितने दिन हो गए। मैं भूखी हूँ। तुमने मुझे पूछा तक नहीं।” मोहिनी ने इठलाकर कहा।

“मैं तुम्हारा इंतज़ाम अभी करता हूँ। यह मेरा सिर हाज़िर है। इस जगह तुमने पहले भी मेरा खून पिया था। मगर मुझे तड़काओ नहीं, बताओ आगे क्या हुआ ?”

“आगे क्या होता ? बब्बन अली गिरफ़्तार हो गया। लाशों के निरीक्षण से पता चला कि बब्बन ने कत्ल नहीं किया है। लेकिन उसके भागने और अशर्फ़ी बेगम से उसके रहस्यमय संबंधों ने मामले को पेचीदा बनाने में मदद की।

“अब उन्हें तुम्हारी तलाश है। दिलनशीं ने तुम्हारे ख़िलाफ़ बहुत ज़हर उगला है। पुलिस तुम्हारे नाम से बहुत भयभीत है। हरि आनन्द भी ग़ायब हो गया है। पुलिस उसकी भी तलाश में है।”

“इसका मतलब यह हुआ कि बब्बन अली के बचने की संभावनाएँ अधिक हैं ?”

“न सिर्फ़ बचने की बल्कि काग़ज़ात भी उसकी बहनों के पास है जिन्हें जिनकी शरण प्राप्त है। मैंने घर में घुसने की बहुतेरी कोशिश की लेकिन सफल न हो सकी। उधर चचा के घर पर पुलिस ने मुसीबत खड़ी कर दी थी। इसलिए मेरा वहाँ होना ज़रूरी था। वे सब लोग परेशान ज़रूर हैं लेकिन कुशलता से हैं।”

“तुम बब्बन अली के सिर पर क्यों नहीं गयी ?”

“उससे कोई लाभ नहीं था। मुझे यहाँ आना था। मैं कब तक सिर पर रहती ?”
 
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