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मुझे कोठी तक पहुँचने में अधिक से अधिक दस या पंद्रह मिनट लगे। उस समय मेरे मस्तिष्क पर एक जुनून सा सवार था। मैंने गाड़ी को पोर्टिकों में रोका और नीचे उतरकर तेज-तेज कदमों से कोठी में प्रविष्ट हो गया।
त्रिवेणी के शयनागार में पहुँचने के लिये भी मैंने बड़ी चुस्ती से काम लिया। शयनागार के दरवाज़े पर ठहर कर मैंने चाबी वाले सुराख से अंदर झाँक कर देखा लेकिन अंधकार के कारण कुछ न देख सका। कदाचित त्रिवेणी सोने के लिये लेट चुका था। दूसरे ही क्षण यह सोचकर मैंने दरवाज़ा पीटना शुरू कर दिया। मुझे अपनी योजना में असफलता नहीं मिली।
चंद क्षणों बाद अंदर से त्रिवेणी की आवाज़ सुनाई दी।
“कौन है ?”
“मैं हूँ सरकार, राज।” मैं ऊँची आवाज़ में बोला, “जल्दी दरवाज़ा खोलिए, पुलिस ने ड्राइवर को गिरफ़्तार कर लिया है।”
चाबी वाले सुराख से रोशनी फुटी तो मैं समझ गया कि तीर ठीक निशाने पर लगा है। मेरे दिल की धड़कनें और तेज हो गयी। मैं दरवाज़े के निकट एक कदम पीछे हटकर खड़ा हो गया। अंदर से आहट उभरकर दरवाज़े के निकट आई। बोल्ट खुलने की आवाज़ उभरी और फिर त्रिवेणी ड्रेसिंग गाउन में सिमटा मेरे सामने खड़ा था।
“क्या बात है, पुलिस ने ड्राइवर को क्यों गिरफ़्तार किया ?” त्रिवेणी ने लापरवाही से पूछा।
“मुझे नहीं मालूम सरकार।” मैंने बड़ी कठिनाई से अपने दिल की धड़कनों पर क़ाबू पाते हुए उत्तर दिया, “शकुंतला को ठिकाने लगाने के बाद जब वापस आया तो पुलिस वाले ड्राइवर से पूछताछ कर रहे थे। मैं वहाँ रुकने की बजाय भागकर आपको सूचित करने आ गया।”
“शकुंतला को तुमने गाड़ी से कितनी दूर ले जाकर ठिकाने लगाया था ?”
“मैं उसे काफ़ी दूर ले गया था सरकार। लेकिन हो सकता है ड्राइवर ने पुलिस के आतंक से जुबान खोल दी हो।”
त्रिवेणी की आँखों में बेचैन परछाइयाँ एक पल के लिये उभरकर ग़ायब हो गयी। वह मेरी परेशान हालत पर एक नज़र डालते हुए बोला- “तुम यहीं रुको, मैं अभी फ़ोन के जरिए मालूम करता हूँ।”
मैं आज्ञाकारी सेवक की तरह सिर को जुम्बिश दी लेकिन मैं पूरी तरह अपनी सोची-समझी योजना पर अमल करने के लिये तैयार था। अतः जैसे ही त्रिवेणी वापस जाने के लिये घूमा, मैंने एक चतुर और फुर्तीले चीते की तरह छलांग लगाई और त्रिवेणी के सिर पर पहुँच गया। फिर बड़ी फुर्ती से अपना एक हाथ त्रिवेणी की गरदन में इस तरह फँसाया जैसा कुछ देर पहले ड्राइवर की गर्दन पर फँसाया था।
त्रिवेणी अपना संतुलन बरकरार न रख सका। जब वह पीछे की तरफ़ लड़खड़ाया तो उसकी गर्दन पर मेरी पकड़ कमज़ोर पड़ गयी। मगर मैंने जल्दी ही दूसरा पैंतरा बदलकर उसे क़ाबू में कर लिया।
“कमीने!” त्रिवेणी किसी जख्मी शेर की तरह दहाड़ा– “मैं तुझे नर्क में फेंक दूँगा।”
मैंने त्रिवेणी की बात उत्तन देने की बजाय अपना काम और तेज कर दिया। मुझ पर खून सवार था। मुझे नहीं मालूम कि उस वक्त मेरे अंदर इतनी शक्ति कहाँ से आ गयी थी। मैं किसी कदर तिरछा हुआ और फिर जब मैंने उसे झटका देकर घसीटा तो वह इस तरह आ गया कि उसकी कमर मेरी कमर पर थी और उसके दोनों पैर हवा में थे। अपने दोनों हाथों में वह मेरा हाथ थामे हुए स्वयं को बचाने के लिये वह हाथ-पाँव मार रहा था।
दूसरी तरफ़ से मेरी सारी शक्ति उसकी गर्दन पर एकत्रित हो गयी थी। मैं अपना शिकंजा तंग करता जा रहा था। और तंग, और तंग। मुझे पूरा विश्वास था कि अब त्रिवेणी कुछ देर का मेहमान है और उसकी मौत से मैं इस गजबनाक ज़िंदगी से छुटकारा पा लूँगा और मोहिनी को दोबारा प्राप्त कर लूँगा। मोहिनी जिसके बिना मेरी ज़िंदगी अधूरी है।
उसी वजह से मेरी वीरान ज़िंदगी में बहार आई थी और उसी की जुदाई ने मुझे सड़कों पर भीख माँगने के लिये छोड़ दिया था। त्रिवेणी ने उसे मुझसे छीन लिया था मगर त्रिवेणी का खात्मा और ज़िंदगी का सुंदर सपना अब निकट ही था। मेरी मोहिनी मेरे पास आने वाली थी। त्रिवेणी का खौफनाक अंजाम मेरे सामने था।
मेरा मस्तिष्क मोहिनी की कल्पना में मस्त था। उस विचार से मेरे अंदर बला की शक्ति आ गयी थी। मेरा हाथ बराबर त्रिवेणी की गर्दन पर अपना फंदा तंग करता जा रहा था। त्रिवेणी के कंठ से उखड़ी-उखड़ी, घुटी-घुटी आवाज़ें निकल रही थीं। वह बिन जल मछली की तरह हाथ-पाँव मार रहा था।
फिर अचानक उसने उखड़ी-उखड़ी आवाज़ में कहा।
“मो... हि... नी... मो... हिनी... मुझे बचा ले।”
“मोहिनी को भूल जा, भूल जा त्रिवेणी दास।” मैंने ठंडे स्वर में कहा, “वह इस समय शकुंतला के लहू से अपने अस्तित्व को नहला रही होगी और जबतक वह तुम्हारी सहायता को आएगी, तुम मर चुके होगे। तुमने मुझे बहुत सताया है त्रिवेणी। बहुत जुल्म किया है।”
“मोहिनी, मोहिनी!” त्रिवेणी ने घुटे-घुटे स्वर में चिल्लाने की चेष्टा की।
मुझे त्रिवेणी की बेबसी पर रहम करने की बजाय ख़ुशी हो रही थी। उसकी तड़प देखकर मुझे शांति मिल रही थी।
फिर अचानक मुझे ऐसा आभास हुआ मानो मेरे हाथ का फंदा तंग होने की बजाय ढीला पड़ रहा हो। जैसे कोई न दिखने वाली शक्ति मेरे हाथ त्रिवेणी की गर्दन से अलग कर रही हो।
मैं उस अचानक बदल जाने वाली स्थिति पर तिलमिला उठा। मैंने बौखला कर दोबारा अपनी पकड़ मज़बूत करनी चाही तो मुझे यूँ महसूस हुआ जैसे किसी ने मेरे बाज़ू पर खंजर उतार दिया था।
अभी मैं बाज़ू में होने वाले असहनीय कष्ट तथा जलन पर विचार भी न कर पाया था कि मुझे सिर पर नन्हे-नन्हे तीर चुभते हुए महसूस हुए।
“मोहिनी!” मेरे मस्तिष्क में मोहिनी का नाम उभरा तो मुझे झुरझुरी आ गयी। मेरा हाथ मशीनी अंदाज़ में त्रिवेणी की गर्दन से अलग हुआ तो वह किसी कटे हुए वृक्ष के समान कालीन पर ढेर हो गया।
त्रिवेणी के शयनागार में पहुँचने के लिये भी मैंने बड़ी चुस्ती से काम लिया। शयनागार के दरवाज़े पर ठहर कर मैंने चाबी वाले सुराख से अंदर झाँक कर देखा लेकिन अंधकार के कारण कुछ न देख सका। कदाचित त्रिवेणी सोने के लिये लेट चुका था। दूसरे ही क्षण यह सोचकर मैंने दरवाज़ा पीटना शुरू कर दिया। मुझे अपनी योजना में असफलता नहीं मिली।
चंद क्षणों बाद अंदर से त्रिवेणी की आवाज़ सुनाई दी।
“कौन है ?”
“मैं हूँ सरकार, राज।” मैं ऊँची आवाज़ में बोला, “जल्दी दरवाज़ा खोलिए, पुलिस ने ड्राइवर को गिरफ़्तार कर लिया है।”
चाबी वाले सुराख से रोशनी फुटी तो मैं समझ गया कि तीर ठीक निशाने पर लगा है। मेरे दिल की धड़कनें और तेज हो गयी। मैं दरवाज़े के निकट एक कदम पीछे हटकर खड़ा हो गया। अंदर से आहट उभरकर दरवाज़े के निकट आई। बोल्ट खुलने की आवाज़ उभरी और फिर त्रिवेणी ड्रेसिंग गाउन में सिमटा मेरे सामने खड़ा था।
“क्या बात है, पुलिस ने ड्राइवर को क्यों गिरफ़्तार किया ?” त्रिवेणी ने लापरवाही से पूछा।
“मुझे नहीं मालूम सरकार।” मैंने बड़ी कठिनाई से अपने दिल की धड़कनों पर क़ाबू पाते हुए उत्तर दिया, “शकुंतला को ठिकाने लगाने के बाद जब वापस आया तो पुलिस वाले ड्राइवर से पूछताछ कर रहे थे। मैं वहाँ रुकने की बजाय भागकर आपको सूचित करने आ गया।”
“शकुंतला को तुमने गाड़ी से कितनी दूर ले जाकर ठिकाने लगाया था ?”
“मैं उसे काफ़ी दूर ले गया था सरकार। लेकिन हो सकता है ड्राइवर ने पुलिस के आतंक से जुबान खोल दी हो।”
त्रिवेणी की आँखों में बेचैन परछाइयाँ एक पल के लिये उभरकर ग़ायब हो गयी। वह मेरी परेशान हालत पर एक नज़र डालते हुए बोला- “तुम यहीं रुको, मैं अभी फ़ोन के जरिए मालूम करता हूँ।”
मैं आज्ञाकारी सेवक की तरह सिर को जुम्बिश दी लेकिन मैं पूरी तरह अपनी सोची-समझी योजना पर अमल करने के लिये तैयार था। अतः जैसे ही त्रिवेणी वापस जाने के लिये घूमा, मैंने एक चतुर और फुर्तीले चीते की तरह छलांग लगाई और त्रिवेणी के सिर पर पहुँच गया। फिर बड़ी फुर्ती से अपना एक हाथ त्रिवेणी की गरदन में इस तरह फँसाया जैसा कुछ देर पहले ड्राइवर की गर्दन पर फँसाया था।
त्रिवेणी अपना संतुलन बरकरार न रख सका। जब वह पीछे की तरफ़ लड़खड़ाया तो उसकी गर्दन पर मेरी पकड़ कमज़ोर पड़ गयी। मगर मैंने जल्दी ही दूसरा पैंतरा बदलकर उसे क़ाबू में कर लिया।
“कमीने!” त्रिवेणी किसी जख्मी शेर की तरह दहाड़ा– “मैं तुझे नर्क में फेंक दूँगा।”
मैंने त्रिवेणी की बात उत्तन देने की बजाय अपना काम और तेज कर दिया। मुझ पर खून सवार था। मुझे नहीं मालूम कि उस वक्त मेरे अंदर इतनी शक्ति कहाँ से आ गयी थी। मैं किसी कदर तिरछा हुआ और फिर जब मैंने उसे झटका देकर घसीटा तो वह इस तरह आ गया कि उसकी कमर मेरी कमर पर थी और उसके दोनों पैर हवा में थे। अपने दोनों हाथों में वह मेरा हाथ थामे हुए स्वयं को बचाने के लिये वह हाथ-पाँव मार रहा था।
दूसरी तरफ़ से मेरी सारी शक्ति उसकी गर्दन पर एकत्रित हो गयी थी। मैं अपना शिकंजा तंग करता जा रहा था। और तंग, और तंग। मुझे पूरा विश्वास था कि अब त्रिवेणी कुछ देर का मेहमान है और उसकी मौत से मैं इस गजबनाक ज़िंदगी से छुटकारा पा लूँगा और मोहिनी को दोबारा प्राप्त कर लूँगा। मोहिनी जिसके बिना मेरी ज़िंदगी अधूरी है।
उसी वजह से मेरी वीरान ज़िंदगी में बहार आई थी और उसी की जुदाई ने मुझे सड़कों पर भीख माँगने के लिये छोड़ दिया था। त्रिवेणी ने उसे मुझसे छीन लिया था मगर त्रिवेणी का खात्मा और ज़िंदगी का सुंदर सपना अब निकट ही था। मेरी मोहिनी मेरे पास आने वाली थी। त्रिवेणी का खौफनाक अंजाम मेरे सामने था।
मेरा मस्तिष्क मोहिनी की कल्पना में मस्त था। उस विचार से मेरे अंदर बला की शक्ति आ गयी थी। मेरा हाथ बराबर त्रिवेणी की गर्दन पर अपना फंदा तंग करता जा रहा था। त्रिवेणी के कंठ से उखड़ी-उखड़ी, घुटी-घुटी आवाज़ें निकल रही थीं। वह बिन जल मछली की तरह हाथ-पाँव मार रहा था।
फिर अचानक उसने उखड़ी-उखड़ी आवाज़ में कहा।
“मो... हि... नी... मो... हिनी... मुझे बचा ले।”
“मोहिनी को भूल जा, भूल जा त्रिवेणी दास।” मैंने ठंडे स्वर में कहा, “वह इस समय शकुंतला के लहू से अपने अस्तित्व को नहला रही होगी और जबतक वह तुम्हारी सहायता को आएगी, तुम मर चुके होगे। तुमने मुझे बहुत सताया है त्रिवेणी। बहुत जुल्म किया है।”
“मोहिनी, मोहिनी!” त्रिवेणी ने घुटे-घुटे स्वर में चिल्लाने की चेष्टा की।
मुझे त्रिवेणी की बेबसी पर रहम करने की बजाय ख़ुशी हो रही थी। उसकी तड़प देखकर मुझे शांति मिल रही थी।
फिर अचानक मुझे ऐसा आभास हुआ मानो मेरे हाथ का फंदा तंग होने की बजाय ढीला पड़ रहा हो। जैसे कोई न दिखने वाली शक्ति मेरे हाथ त्रिवेणी की गर्दन से अलग कर रही हो।
मैं उस अचानक बदल जाने वाली स्थिति पर तिलमिला उठा। मैंने बौखला कर दोबारा अपनी पकड़ मज़बूत करनी चाही तो मुझे यूँ महसूस हुआ जैसे किसी ने मेरे बाज़ू पर खंजर उतार दिया था।
अभी मैं बाज़ू में होने वाले असहनीय कष्ट तथा जलन पर विचार भी न कर पाया था कि मुझे सिर पर नन्हे-नन्हे तीर चुभते हुए महसूस हुए।
“मोहिनी!” मेरे मस्तिष्क में मोहिनी का नाम उभरा तो मुझे झुरझुरी आ गयी। मेरा हाथ मशीनी अंदाज़ में त्रिवेणी की गर्दन से अलग हुआ तो वह किसी कटे हुए वृक्ष के समान कालीन पर ढेर हो गया।