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Fantasy मोहिनी

मोहिनी बड़ी देर तक मुझे समझाती रही और डॉली की वकालत करती रही परन्तु मैं अपनी हठ पर अड़ा रहा। शायद इसलिए कि मैं मोहिनी के अलावा और किसी के सम्बंध में सोचना भी नहीं चाह रहा था और उसका कारण भी उचित था। त्रिवेणी के जाप को पूरा होने में अब केवल तीन-चार दिन ही शेष रह गए थे।

जब मैंने डॉली की ओर कोई ध्यान नहीं दिया तो मोहिनी यह कहकर मेरे सिर से उतर गयी कि वह डॉली के सिर पर जा रही है ताकि हालात के संबंध में उसे समझा सके और उसके मस्तिष्क में मेरी जड़े मजबूत कर सके।

मैंने मोहिनी की इस बात का कोई उत्तर नहीं दिया। जब वह मेरे सिर से उतर गयी तो मैंने कुछ देर तक हालात के उलझे हुए ताने-बाने को सुलझाने के लिये अपने मस्तिष्क में विभिन्न योजनाएँ बनानी आरम्भ कर दी। फिर न जाने कब मेरी आँख लग गयी।

सुबह मैं हमेशा की तरह जाने को तैयार हुआ तो डॉली ने मेरा रास्ता रोक लिया। अपनी रात की बात की शर्मिंदगी जाहिर करके उसने मोहिनी की सलामती के सम्बन्ध में हमदर्दी प्रकट की तो मेरे दिल का बोझ हल्का हो गया। मैंने उसे अपने सीने से लगा लिया और जल्दी वापिस आने का वायदा करके घर से निकल गया।

मोहिनी दोबारा मेरे सिर पर आ चुकी थी लेकिन उसकी आँखों में नजर आने वाली उलझन कुछ अधिक ही दिखाई दे रही थी। मैं दिन भर मारा-मारा फिरता शाम को मरघट पर जाकर खड़ा हो गया। एक नजर त्रिवेणी पर पड़ी जो अभी तक बड़े आराम से अपने जाप में मग्न था। खून का घूँट पीता हुआ वापिस घर आ गया।

डॉली कल की अपेक्षा अधिक मेहरबान नजर आ रही थी। काफी रात तक वह मोहिनी के सम्बंध में बातें करती रही। सात दिन बाद मेरी बेचैनी व दहशत में जो बढ़ोतरी हुई उसे कह पाना मेरे बस की बात नहीं। बहरहाल उस दिन मेरे ऊपर एक अजीब बेचैनी, एक अजीब दीवानगी छाई रही। मोहिनी तो एक उदासी की सूरत बन गयी थी। दिन भर मैं उसे दिलासा देता रहा और बड़ी बेचैनी से रात की प्रतीक्षा करता रहा। किसी तरह रात आई और ग्यारह बजे तो मैं पंडित भगवान प्रसाद के घर की ओर चल पड़ा।

मैं लम्बे-लम्बे कदम उठाता पंडितों की बस्ती में दाखिल हुआ तो मोहिनी ने ठंडी आह भरकर कहा– “राज, आज की रात मुझ पर बहुत भारी है! मेरा दिल गवाही दे रहा है कि कुछ न कुछ होकर रहेगा।”

“धीरज से काम लो! भगवान ने चाहा तो त्रिवेणी अपने उद्देश्य में कभी भी सफल नहीं हो सकेगा।”

मोहिनी की बेचैन निगाहों ने मुझे देखा। फिर मेरे सिर पर चिपटकर पूर्णमासी के चाँद को घूरने लगी। मैं कदम बढ़ाता हुआ भगवान प्रसाद की हवेली में दाखिल हुआ। वह मेरी ही प्रतीक्षा कर रहा था। मुझे देखकर बोला।

“आओ राज! मैं तुम्हारी ही राह देख रहा था। तुम ठीक समय पर पहुँचे हो।”

“महाराज, क्या आपने मेरी वस्तु की व्यवस्था कर ली ?”

“हाँ! मेरे साथ आओ।”

मैं भगवान प्रसाद के आदेश पर उठकर उसके साथ हो लिया। वह मुझे साथ लेकर एक दूसरे कमरे में दाखिल हुआ जहाँ न जाने क्या-क्या उल्लम-गल्लम भरा हुआ था। उस कमरे में दाखिल होते ही मुझे ऐसा आभास हुआ जैसे मैं असंख्य भूत-प्रेत आत्माओं के बीच आ गया हूँ। प्रकाश में वहाँ कोई ऐसी वस्तु नजर आ रही थी जिससे मैं भयभीत होता, परन्तु कुछ न कुछ ऐसा जरूर था जिसने मेरे बदन के सारे रोगों को लाकर खड़ा कर दिया था।

भगवान प्रसाद ने कमरे में दाखिल होकर कोरी मिट्टी की एक हांडी बीच में रखी हुई मेज उठाई। फिर मेरे निकट आ गया। मैंने हांडी पर उचटती नजर डाली। उसका मुँह मिट्टी के कोरे ढकने से बंद था और चारो ओर से सूखे हुए आटे से बंद था।
 
भगवान प्रसाद ने वह हांडी मेरी ओर बढ़ाते हुए कहा– “लो राज, इसे संभालो! और जो कुछ कहता हूँ उसे गौर से सुनो। इस हांडी को लेकर सीधे मरघट की ओर जाओ। रास्ते में किसी से भी बात मत करना। जब तुम त्रिवेणी के मण्डप के निकट पहुँच जाओ तो त्रिवेणी को इस प्रकार संबोधित करना कि उसकी दृष्टि हांडी पर पड़ जाये। उसके बाद तुम महाकाली का शुभ नाम लेकर इसको त्रिवेणी की ओर मण्डप के अंदर फेंक देना। ईश्वर ने चाहा तो त्रिवेणी अपना जन्तर-मन्तर भूलकर मण्डप से निकल पड़ेगा। आगे तुम जानो और तुम्हारा काम। पर मुझसे किया वचन याद रखना।”

“इस मिट्टी की हांडी में क्या है महाराज ?” मैंने हांडी को अपने इकलौते हाथ पर सँभालते हुए पूछा।

“इसमें एक ऐसी शक्ति बंद है जो त्रिवेणी को जलाकर भस्म कर सकती है। परन्तु इसका ध्यान रखना कि जब तक त्रिवेणी की नजर हांडी पर नहीं पड़े, तुम इसे हाथ से नहीं छोड़ोगे।”

“महाराज, क्या आपको विश्वास है कि त्रिवेणी अपना जाप पूरा किये बिना मण्डप से बाहर आ जायेगा ?”

“काली माई की आज्ञा से ऐसा ही होगा राज।”

भगवान प्रसाद ने विश्वास से कहा- “अब सिधारो बेटा, यदि समय अधिक बीत गया तो खेल बिगड़ जायेगा।”

मैंने भगवान प्रसाद को धन्यवाद अदा किया और मरघट की ओर चल दिया। रास्ते में एक दो बार दिल चाहा कि मोहिनी से पूछे इस हांडी में क्या है ? परन्तु भगवान प्रसाद ने चूँकि मरघट तक पहुँचने तक जुबान बंद रखने का आदेश दिया इसलिए मैंने मोहिनी से भी बात नहीं की। अलबत्ता मैं यह महसूस कर रहा था कि जैसे-जैसे मरघट निकट आता जा रहा था मोहिनी के चेहरे की पीलाहट बढ़ती जा रही थी। यदि कोई दूसरा अवसर होता तो कदाचित मेरे फ़रिश्ते भी इतनी रात में मरघट तक जाने की हिम्मत न करते। परन्तु यह मोहिनी थी। उसके लिये मैं मौत से भी टकरा जाने का निर्णय कर चुका था।

पूर्णमासी के चाँद की रौशनी इतनी पर्याप्त थी कि मुझे हर वस्तु सरलतापूर्वक दिख रही थी और किसी प्रकार के भय का एहसास नहीं हो रहा था।

मरघट पहुँच कर मैंने त्रिवेणी को देखा जो मण्डप के बीच आलथी-पालथी मारे बैठा बड़ी शांति से जाप में मग्न था। उसकी तपस्या देखकर मेरे तन-बदन में जैसे आग लग गयी। दूसरे ही पल मैंने अपने इकलौते हाथ की हांडी को उठाकर सीने से आगे की ओर ऊँचा करते हुए उस मरदूद पण्डित को ललकारा।

“ओ पण्डित, आँखें खोल और देख कि तेरी मौत इस समय तेरे सिर पर मंडरा रही है!”

त्रिवेणी पहले के समान अपने जाप में मग्न रहा। या तो उसने अपने ध्यान में मग्न होने के कारण मेरी आवाज नहीं सुनी या फिर जानबूझकर आँखें बंद किये हुए था।

मैंने झल्लाकर उसे दूसरी बार ललकारा लेकिन इस बार भी त्रिवेणी पर कोई प्रभाव न पड़ा। परन्तु तीसरी बार जब मैंने हलक फाड़कर चीखा तो मुझे अपने इरादे में असफलता नहीं हुई। त्रिवेणी ने इस बार आँखें खोल दीं। मुझे उसी पल की प्रतीक्षा थी। इसलिये जैसे ही त्रिवेणी ने आँखे खोली और उसकी नजर हांडी पर पड़ी। मैंने भगवान प्रसाद के कथानुसार दिल में जय काली का नाम लिया और हांडी को मण्डप के भीतर त्रिवेणी की ओर उछाल दिया।

हांडी मेरे हाथ से निकल तीर के समान त्रिवेणी की ओर लपकी। परन्तु त्रिवेणी के निकट पहुँचकर उससे टकराने की बजाय वायुमण्डल में अटक कर रह गयी। दूसरे ही पल चारों ओर से भयानक शोरगुल की ऐसी आवाजें उभरने लगीं जैसे बहुत सारी शैतानी शक्तियाँ गुस्से में बिफर कर आपस में टकरा गयी हो।

उन आवाजों को सुनकर मुझ पर ऐसा भय सवार हुआ कि मैं भयभीत होकर कई कदम पीछे हट गया। परन्तु मेरी फटी-फटी निगाहें लगातार हांडी पर जमी हुई थी।

ठीक उसी समय मोहिनी ने मुझे संबोधित करते हुए भयभीत स्वर में कहा– “राज, खेल बिगड़ गया! जादू की हांडी अब जरूर वापिस होगी।”
 
मोहिनी की बात सुनकर मेरा तन-बदन काँप उठा। मेरे होश ओ हवास जाते रहे। मैंने पलटकर भागने की कोशिश की परन्तु मेरे पाँव जैसे जमीन पर जकड़ कर रह गए थे। मेरा सारा शरीर भय के मारे थर-थर काँप रहा था और माथे पर बहने वाला पसीना पैरों तक पहुँच गया था। मेरी शक्ति ने मेरे पाँवों में बेड़ियाँ डाल दी थी।

भयानक आवाजों का शोर हर पल बढ़ता ही जा रहा था। फिर अचानक मेरे कानों में एक जानी-पहचानी आवाज टकराई। मैंने पलटकर देखा कि उसका चेहरा धुँआ-धुँआ हो रहा था। आँखों में दहशत बरस रही थी। मुझे देखे बिना भागता हुआ मण्डप के निकट पहुँच गया। फिर चिल्लाकर बोला– “दया काली माई, दया! मैं वचन देता हूँ कि फिर कभी सेवक तेरे रास्ते में रुकावट नहीं बनेगा इस बार मुझे क्षमा कर दो।”

भगवान प्रसाद पर अजीब सी दीवानगी की हालत छाई हुई थी। कभी वह काली माई को संबोधित करके गिड़गिड़ाने लगता और कभी जमीन पर गिरकर अपना माथा रगड़ने लगता। मिट्टी की हांडी अभी तक त्रिवेणी के सिर पर वायुमण्डल में स्थिर थी। शैतानी शक्तियों के शोरगुल की आवाज आनी बंद हो गयी थी। उसके साथ ही एक मिनमिनाती हुई सी आवाज उभरी जिसे मैं बिल्कुल न समझ सका।

अलबत्ता उसके जवाब में भगवान प्रसाद ने गिड़गिड़ा कर कहा– “मुझे स्वीकार है कि मैंने तेरे दास को कष्ट देना चाहा। मुझे पता था कि वह किसी शक्ति को प्राप्त करने के लिये जाप कर रहा है। मेरे मन में खोट था। देवी, मैंने तेरे शत्रु के साथ मिलाप करके तुझे धोखा दिया! मुझे क्षमा कर दे! तेरा सेवक तेरे आगे हाथ बाँधकर तुझसे दया की भीख माँगता है।” भगवान प्रसाद रो रहा था और काँप रहा था।

स्त्री की भयानक आवाज दोबारा उभरी। फिर अचानक मेरी निगाह कोरी हांडी पर पड़ी जो त्रिवेणी की ओर से वापस आ रही थी। मण्डप के भीतर उसकी गति धीमी थी। परन्तु मण्डप के बाहर आते ही वह बिजली बनकर भगवान प्रसाद पर गिरी। हांडी टूटने की आवाज के साथ ही भगवान प्रसाद ऐसे भयानक स्वर में चीखा कि मेरे बदन के रोंगटे खड़े हो गए। फिर मैंने जो कुछ देखा वह सब कुछ बड़ा भयानक था।
 
भगवान प्रसाद जमीन पर पड़ा चिल्ला रहा था और उसके जिस्म से बेशुमार छोटे-छोटे नाग लिपटे हुए थे। मेरे जिस्म की हालत उस पौधे के समान थी जो जमीन से फूटते ही तूफान के थपेड़ों में आ गया हो। मेरी नजरों के सामने अँधेरा छा रहा था। मैंने भागने की कोशिश की लेकिन चकरा कर जमीन पर गिर पड़ा।

जब मेरी आँख खुली तो मैंने स्वयं को अपने बेडरूम में पाया। डॉली उदास और दुखी सी मेरे सिरहाने बैठी मेरा माथा सहला रही थी।

“मैं यहाँ किस प्रकार आ गया ?” मैंने अपने हवास दुरुस्त करते हुए पूछा।

“जिस समय आप घर से रवाना हुए थे, मैंने सावधानी वश अपने एक नौकर को आपके पीछे कर दिया था ताकि यदि आप पर कोई आफत पड़े तो वह आपके काम आ सके।” डॉली ने मुझे बताया– “वही आपको मरघट के निकट से बेहोशी की हालत में उठाकर लाया है।”

मैंने डॉली की बात का उत्तर देने की बजाय दोबारा आँखे बंद कर ली। मेरे मनो-मस्तिष्क में अभी तक हल्की सी बेहोशी छाई हुई थी। अपनी असफलता का दुःख सहन करना मेरे वश से बाहर हो रहा था। यह एहसास मुझे मारे डाल रहा था कि अब मोहिनी मुझसे सदा के लिये जुदा हो जायेगी। त्रिवेणी का जाप पूरा होने में मेरी जानकारी के अनुसार केवल एक दिन शेष रह गया था। फिर मैं क्या करूँगा ? मोहिनी को बचाने की खातिर मैं क्या करूँ ?

मेरा मस्तिष्क सोचता रहा... सोचता रहा...सोचता रहा... फिर मेरे ज़हन में एक धुँध सी छा गयी। मैं एक बार फिर बेहोश हो गया। दूसरी बार होश आया तो दिन खासा चढ़ आया था। डॉली लगातार मेरे सिरहाने बैठी थी। उसके चेहरे पर उलझन और परेशानी के मिले-जुले भाव थे। मुझे होश में आता देखकर उसने जल्दी से एक दिल लुभाने वाली मुस्कुराहट अपने सूखे होंठों पर बिखेरते हुए कोमल स्वर में कहा– “राज, आप परेशान न हो! डॉक्टर का विचार है कि आप एक-दो दिन में पूरी तरह ठीक हो जायेंगे।”

“डॉली...!” मैंने कमजोर स्वर में कहा, “क्या तुमने मेरी बेहोशी का कारण अपने माता-पिता को तो नहीं बताया ?”

“जी नहीं! आप इस विषय में बिल्कुल भी चिंता न करें।”

मैंने डॉली के मायूस चेहरे पर नजर डाली, फिर कुछ कहने का इरादा कर ही रहा था कि मेरे सिर पर मोहिनी के नोकीले पाँव की चुभन तेज हो गयी। मैं अपनी बेहोशी के कारण उसे बिल्कुल भूल बैठा था। मैंने ख्यालों की दुनिया में सिर पर नजर डाली तो मोहिनी को बहुत बेचैन पाया। वह परेशान-परेशान सी खड़ी अपने होंठ चबा रही थी। मुझे अपनी ओर संबोधित देखा तो भर्रायी आवाज में बोली– “राज, अब मुझे आज्ञा दो! मैं अब तुमसे जुदा हो रही हूँ। हमारा साथ अब छूटने वाला है। मैं अब त्रिवेणी की गुलाम बनने वाली हूँ।”

“नहीं, नहीं!” मैं चीख पड़ा, “ऐसा नहीं हो सकता मोहिनी! मैं तुम्हें बचाने के लिये अपनी जान की बाजी लगा दूँगा।”

“अब सब बेकार है राज। तुम कुछ नहीं कर सकते। सब बिगड़ चुका है। अब खेल खत्म हुआ। बस मैं किसी भी क्षण तुमसे जुदा होने वाली हूँ। मैं मजबूर हूँ राज। तुम मुझे सदा याद रहोगे। कभी भी न भूल सकूँगी राज। तुम हमेशा याद आओगे... मैं जा रही हूँ...मुझे मुस्कुराते हुए विदा करो।”

मैंने मोहिनी के स्वर में दर्द और बेबसी की झलक महसूस की तो मेरा दिल धक् से रह गया।

और वह घड़ी आ पहुँची। वह भर्राये हुए स्वर में मुझसे कह रही थी कि मैं उसे मुस्कुराते हुए विदा करूँ। मोहिनी की यह प्रार्थना मेरे लिये मौत के पैगाम से अधिक भयानक थी। मैं आश्चर्यचकित गुम कल्पना की दुनिया में मोहिनी के नन्हें और हसीन अस्तित्व को देख रहा था जो ग्रहण खाये हुए चाँद के समान उदास-उदास और दुखी नजर आ रही थी। मैं सोच रहा था कि काश मोहिनी की जुदाई से पहले मुझे मौत आ जाये। मोहिनी की जुदाई मेरे लिये असहनीय थी। मैं आश्चर्य की मूर्ति बनी मोहिनी की आँखों में झलकते आँसुओ को देख रहा था और मेरा दिल डूब रहा था। मैंने उसकी बात का कोई जवाब न दिया तो वह बोली- “राज, आज यदि तुमने मुझे मुस्कुराते हुए विदा न किया तो मैं सदा उदास रहूँगी!”

“किस दिल से तुम्हें विदा करूँ, मेरी जिंदगी... ?” मैं तड़प कर बोला, “तुम्हारे बिना शायद मैं एक पल भी जिन्दा न रह सकूँ।”

“मज़बूरी है राज। बताओ मैं क्या करूँ ? सब कुछ तो करके देख लिया।” मोहिनी ने अपने होंठ चबाते हुए रुँधी हुई आवाज में कहा, “मैं त्रिवेणी की गुलाम बन जाने को मजबूर हूँ। उसका जाप पूरा हो चुका है। अब कोई शक्ति मुझे नहीं रोक सकती।”

“मोहिनी, मगर मेरा क्या होगा ? तुम मेरी आवश्यकता बन चुकी थी। क्या मैं अब दोबारा कभी तुम्हें नहीं पा सकूँगा ?”

“हालात पर निर्भर करता है राज।” मोहिनी विरुरते भाव में बोली, “कल जो कुछ होने वाला है मैं जानती हूँ लेकिन अब मैं तुम्हें कुछ भी नहीं बता सकती। कुछ भी नहीं।”

“क्या ?” मैंने आश्चर्यचकित होकर पूछा, “यह तुम क्या कह रही हो मोहिनी ? क्या इतनी जल्दी बदल गयी।”

“यह बात नहीं है राज, परन्तु अब मैं केवल त्रिवेणी के हुक्म की गुलाम हूँ। उसकी आज्ञा के बिना एक कदम भी नहीं उठा सकती। मेरी मजबूरियों का ख्याल करना राज।” मोहिनी ने हसरत भरी नजरों से देखते हुए मुझे जवाब दिया, “तुम क्या जानो कि मेरे दिल पर इस समय क्या गुजर रही है। मुझे मुस्कुराते हुए विदा करो राज। क्या तुम अपनी मोहिनी की इस छोटी सी प्रार्थना को कबूल नहीं करोगे ?”

मोहिनी के स्वर में बेबसी मुझे खून के आँसू रुला रही थी लेकिन जिस अंदाज में उसने मुझसे प्रार्थना की थी उस मज़बूरी में मैंने मुस्कुराने की नाकाम कोशिश करते हुए कहा– “मोहिनी, मैं तुम्हें एक बार फिर प्राप्त करने की कोशिश करूँगा। चाहे मुझे अपनी जान ही क्यों न गँवानी पड़े।”

“मैं इस विषय में कुछ भी नहीं कह सकती। अच्छा राज अब मेरा समय आ गया। अब मैं चलती हूँ।”

ठहरो मोहिनी, ठहरो...!” मैंने तेजी से कहा, “क्या यह नहीं हो सकता कि कभी-कभार कुछ देर के लिये मुझसे मिलने चली आया करो।”
 
“मैं मजबूर हूँ राज। ऐसा सम्भव नहीं। मैं अब त्रिवेणी की बंदी हूँ जिसने मुझे जाप करके प्राप्त किया है।” मोहिनी ने मायूसी से कहा फिर डॉली की तरफ देखा जो मेरे पास बैठी मुझे दुखी निगाहों से घूर रही थी। मोहिनी ने डॉली पर एक नजर डाली फिर बोली– “राज अब तुम डॉली का पूरा-पूरा ध्यान रखना। इसे किसी प्रकार का कष्ट न होने देना और... और कोशिश करना कि तुम इसके दिल में पैदा होने वाली बदगुमानियों को दूर कर सको और सुनो राज, सम्भव है मेरे बाद तुम अपने जीवन के बहुत बुरे हालात से गुजरो। ऐसे समय में तुम धीरज से काम लेना। अच्छा मेरे प्यारे, मेरे दोस्त मैं चली। मुझे क्षमा कर देना।”

मोहिनी के अंतिम शब्दों में ऐसा दर्द था कि मैं तड़प उठा। कितनी गमगीन थी वह उस समय। यूँ जैसे सुहागरात ही कोई सुहागिन विधवा हो गयी हो। मैं अंदर ही अंदर रो पड़ा। मैंने मोहिनी को विदा करने के लिये अपने दिल पर पत्थर रख कर अपने काँपते होंठो पर जबरदस्ती मुस्कुराह लाने की कोशिश की। मैं मोहिनी को अंतिम बार संबोधित करना चाहता था परन्तु शब्द मेरे हलक में ही अटक गए।

मोहिनी ने एक बार भरी आँखों से मेरी तरफ देखा फिर आहिस्ता से उसका भारी रूप सिकुड़ने लगा। धीरे-धीरे उसका खूबसूरत जिस्म एक बिनावरी छिपकली के रूप में परिवर्तित होता चला गया और वह फिर मेरे सिर से रेंग कर उतर गयी।

“मोहिनी... मोहिनी... मोहिनी...! ईश्वर के लिये मुझे छोड़कर न जाओ। वापस आ जाओ...वापस आ जाओ, मेरे लिये... बात सुनो मोहिनी।”

लेकिन मोहिनी चली गयी और मोहिनी के सिर से उतरते ही मेरी सहनशक्ति के सारे बंधन टूट कर बिखर गए। मैं इतनी जोर से चीखा कि मुझे खाँसी का दौरा पड़ गया। मेरी हालत बिन पानी मछली की थी। मैं बिस्तर पर तड़प-तड़प कर मोहिनी को वापिस बुलाने के लिये चीख रहा था। मुझे डॉली का बिल्कुल ध्यान न था।

एक-दो बार जब बेचारी ने मुझे समझाने और कुछ पूछने की चेष्टा की तो मैंने उसे झटक दिया। अब मुझे कोई बात भी अच्छी मालूम नहीं हो रही थी। मोहिनी चली गयी तो अब क्या रह गया था। मोहिनी के चले जाने के बाद पता चला कि मोहिनी क्या थी। मुझे उससे कितना प्यार था। मोहिनी के जाने के बाद मुझे अंदाजा हुआ कि डॉली और मोहिनी में कौन मुझे अधिक प्यारा था।

मैं अपनी हालत क्या बताऊँ। सात-आठ दिन तक मुझ पर कुछ ऐसी दहशत और दीवानगी की हालत छाई रही जिसका उल्लेख करना मेरे बस की बात नहीं है। सारांश में इतना ही बता दूँ कि उन सात-आठ दिन तक मैं कतई अपने होशो-हवाश में नहीं था। उसके बाद जब मेरी हालत कुछ सम्भली तो सबसे पहले मैंने डॉली से वापिस चलने को कहा।

मोहिनी के बाद अब मेरी आमदनी का रास्ता केवल वही कारोबार था, जिसे मैं मुम्बई में छोड़कर आया था। डॉली ने मेरी बात का जवाब न दिया तो मैं झल्लाकर बोला– “क्या अभी तक तुम्हारा दिल मम्मी-डैडी से नहीं भरा जो मेरे साथ चलने में संशय में पड़ी हो।”

“यह बात नहीं है राज।” डॉली ने बड़ी कोमलता से कहा, “आपकी तबियत अभी ठीक नहीं है इसलिए मैं चाहती हूँ कि आप यहाँ कुछ दिनों तक आराम कर लें तो बेहतर है।”

“नहीं, अब मेरा दिल यहाँ उचाड़ हो गया है! मैं अब यहाँ बिल्कुल नहीं रहूँगा। अब मेरे लिये यहाँ कुछ भी नहीं है।”

डॉली मेरे स्वर में कड़वाहट अवश्य महसूस कर रही थी। एक पल तक वह मुझे गौर से तकती रही। फिर बहुत धीमे स्वर में बोली– “राज, क्या आपको मोहिनी की जुदाई का बहुत दुःख है ?”

“बहस मत करो डॉली।” मैं तिलमिला कर बोला, “मुझे केवल इतना बता दो कि तुम्हें मेरे साथ चलना है या नहीं ?”

“यदि यह आपका हुक्म है तो मैं हर समय तैयार हूँ।”

“ठीक है, तुम आज ही नौकरों के साथ सामान इत्यादि बाँध लो। मैं कल के लिये बर्थ रिजर्व करा लेता हूँ।”

डॉली मेरे चेहरे को देखकर खामोश हो गयी। वह नौकरों को बुलाकर सामान बाँधने की हिदायत देने गयी तो मैंने कपड़े बदले और बर्थ रिजर्व कराने के लिये बाहर चला गया।

शाम को जब मैं दिन भर का थका-हारा वापिस लौटा तो भीतर ड्राइंगरूम में बैठी डॉली और उसके माता-पिता में मेरी अचानक वापसी के सम्बन्ध में बातें हो रही थी। मुझे देखकर डॉली के पिता ने बैठने का संकेत किया। फिर बोले– “मैंने सुना है कि तुम कल वापिस जा रहे हो ?”

“जी हाँ!”

“इतनी जल्दी क्या है ?” कुछ दिनों और आराम कर लेते तो बेहतर था। तुम्हारा स्वास्थ्य भी अभी ठीक नहीं है।”

“बम्बई में भी इलाज हो सकता है।” मैं गंभीरता से बोला, “कारोबार की देखभाल भी जरूरी है।”

“यदि केवल कारोबार का ही मामला है तो मैं अपना कोई विश्वासपात्र आदमी वहाँ भेज देता हूँ।”

“जी नहीं!” मैंने इस बार किसी हद तक खुश्क स्वर में कहा, “अब तो आप आज्ञा ही दे दें।”

डॉली के माता-पिता मुझे काफी देर तक समझाते रहे, परन्तु मैंने कतई तौर पर फैसला कर लिया था कि वहाँ बिल्कुल न रुकूँगा इसलिए वे चुप हो गए। मैं कुछ देर तक उनके पास बैठा बातें करता रहा फिर उठकर अपने कमरे में आ गया। डॉली भी मेरे साथ थी लेकिन वह कुछ बुझी-बुझी सी नजर आ रही थी। न जाने क्यों मुझे उसकी वह उदासी बुरी लगी।

मैंने कमरे में पहुँचकर उससे कहा- “यदि तुम मेरे साथ नहीं जाना चाहती तो मैं जबरदस्ती नहीं करूँगा।”

“यह आप कैसी बातें सोच रहे हैं।” डॉली बड़े ही लगाव से बोली, “भला मैं आपके आदेश से इंकार कैसे कर सकती हूँ। आपकी हर ख़ुशी मेरी अपनी ख़ुशी है।”

“फिर यह तुम्हारा मुँह क्यों फूला हुआ है ?” मैंने झल्लाए स्वर में उसे घूर कर कहा फिर कपड़े बदलने के लिये दूसरे कमरे में चला गया।

डॉली के दिल पर मेरे जवाब से क्या गुजरी मुझे अब इससे कोई सरोकार नहीं था जबकि मोहिनी की जुदाई ने मेरे सोचने-समझने की सारी शक्तियों को बेकार कर रखा था। मुझे तो हर समय बस यही धुन सवार रहती थी कि कोई ऐसा तरीका अख्तियार करूँ जिससे मेरी मोहिनी मुझे वापिस मिल जाये परन्तु कोई सूरत समझ में नहीं आई थी।

मुझे वह जाप भी नहीं मालूम था जिससे मैं मोहिनी को प्राप्त करने की कोशिश कर सकता। भगवान प्रसाद भी मर-खप चुका था। बस एक ही तरीका रह जाता था कि मैं किसी भी तरह त्रिवेणी की खोज करूँ और उसे किसी प्रकार मौत के घाट उतार दूँ। फिर निःसंदेह मोहिनी को उसकी गुलामी से छुटकारा मिल सकता था। फिर मोहिनी दोबारा मेरी हो जाती।

इस उद्देश्य के परिणाम पर गौर किये बिना मैंने सात-आठ दिन के भीतर पूरे शहर को छनवा डाला लेकिन त्रिवेणी मुझे कहीं न मिल सका था। बम्बई की वापसी का निर्णय भी इसी कारण किया था। पहली बात तो यह थी कि मैं वहाँ जाकर धंधा सँभालूँ और फिर उसके बाद इत्मिनान से त्रिवेणी की तलाश में निकलूँ।

यहाँ मैं आपको इतना भी बता देना चाहता हूँ कि मोहिनी की जुदाई के बाद डॉली ने एक बार मुझसे वास्तविक हाल पूछने की चेष्टा की थी। परन्तु मैंने उसे सख्ती से मना कर दिया कि वह भविष्य में मोहिनी के सम्बम्ध में कोई पूछताछ न करे। डॉली को मेरी बात से बहुत दुःख हुआ था। परन्तु उसके बाद से उसने मोहिनी के सम्बन्ध में ख़ामोशी साध ली थी।
 
मैं कपड़े बदलकर वापिस आया तो डॉली किसी काम से बाहर जा चुकी थी। आठ बजे तक मैं बेखबर सोता रहा फिर उठकर मैंने स्नान किया। स्नान से अवकाश पाकर मैं बाहर आया ही था कि तब तक नौकर ने आकर मुझसे कहा कि मेरे ससुर साहब मुझे बाहर ड्राइंगरूम में बुला रहे हैं।

नौकर के स्वर में घबराहट छिपी थी जिसे महसूस करके मैंने पूछा– “क्या जरूरी काम है ?”

“पता नहीं साहब! वैसे बड़े साहब के पास इस समय एक देवी जी भी आई हुई हैं।”

“देवी जी ?” मैंने आश्चर्य से कहा, “किसी महिला को मुझसे क्या काम हो सकता है।”

“मैं क्या बता सकता हूँ साहब!”

“अच्छा तुम चलो, मैं कपड़े बदलकर आता हूँ।”

नौकर के जाने के बाद मैंने जल्दी-जल्दी कपड़े बदले और बाहर कारीडोर में आ गया। यह बात मेरे फरिश्तों के ज़हन में भी नहीं थी कि किसी महिला को अचानक मुझसे क्या काम पेश आ सकता है। लेकिन जैसे ही मैंने ड्राइंगरूम में कदम रखा सबसे पहले मेरी नजर जिस औरत पर पड़ी वह रजनी थी। उसके तेवर इस समय बड़े खतरनाक नजर आ रहे थे। कमरे में रजनी के अतिरिक्त डॉली और उसके पिता भी मौजूद थे।

मैंने सबके चेहरे पर छाई हुई गंभीरता को देखा तो मेरा माथा ठनका कि यकीनन कोई गड़बड़ जरूर है। फिर भी मैं दिल कड़ा करके भीतर प्रविष्ट हुआ और डॉली के बराबर सोफे पर बैठकर मैंने सीधे अपने ससुर से पूछा-

“आपने मुझे याद किया था ?”

“हाँ!” ससुर साहब ने बड़े ही गंभीर स्वर में उत्तर दिया। फिर रजनी की ओर संकेत करते हुए खुश्क स्वर में बोले, “इन देवी जी को तुमसे कुछ आवश्यक बातें करनी हैं।”

“मुझसे... ?” मैं सिटपिटा गया। फिर मैंने रजनी की तरफ देखा।

वह एकदम से गुस्से में बिफरकर बोली– “हाँ, आपसे कुँवर राज जी! आपसे नहीं करूँगी तो फिर मैं किससे करूँगी ? मैं कहती हूँ आपने मुझे जिस प्रकार की औरत समझ रखा है उस विचार को अपने दिल से निकाल दीजिये। मुझे धन दौलत से अधिक आपकी आवश्यकता है। भगवान के लिये उन वायदों का मर्म लीजिये जो आपने मुझसे किये थे।”

“आयं! क्या मतलब ?” मैंने चौंककर पूछा तो रजनी बड़ी ढिठाई से बोली-

“मुझे बर्बाद करके आप मतलब पूछ रहे हैं ? बहुत अच्छे...” रजनी ने बड़ी दिलेरी के साथ अपनी बात जारी रखते हुए कहा, “आप ही के कहने पर मैंने गैर क़ानूनी धंधा, जलील पेशे को अपनाया था। आपके ही प्रेम के कारण मैंने भरी अदालत में सारा जुर्म अपने सिर पर ले लिया। मैं जिन कठिनाइयों से जमानत पर रिहा हुई यह मेरा दिल जानता है। मैंने सब कुछ आपकी खातिर किया है मिस्टर राज और अब आप मुझे नहीं पहचानते। किस कदर शर्म की बात है कि आप मुझे इन मुसीबत में फँसाकर खुद यहाँ से भागने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन मैं भी औरत हूँ। मैं आपको इतनी सफलतापूर्वक भागने नहीं दूँगी।”

“तुम बकवास कर रही हो...” मैंने रजनी के सफ़ेद झूठ पर आपे से बाहर होते हुए कहा– “तुम मेरे ऊपर सरासर झुठा आरोप लगा रही हो। तुम मुझे खामखा किसी के कहने पर बदनाम करने की कोशिश कर रही हो। आखिर इन बातों से तुम क्या मकसद प्राप्त करना चाहती हो।”

राज, क्या मैंने इसी दिन के लिये अपना सब कुछ तुम्हारे हवाले कर दिया था कि जब मुझ पर कोई वक्त पड़े तो तुम यूँ अपनी दौलत और इज्जत की आड़ को लेकर नजर बदल दो।” रजनी रोने लगी।

“शटअप!” मैं गुस्से से काँपता हुआ उठ खड़ा हुआ। फिर कनखियों से अपने ससुर साहब की ओर देखकर बोला, “मुझे सब पता है कि तुम किसके उकसाने पर मुझ पर यह झूठे आरोप लगा रही हो। वरना तुम्हारे पास इन बातों का क्या प्रमाण है ?”

“प्रमाण चाहिए तुम्हें।” रजनी ने बिफर कर कहा, “क्या तुम यह घटना भूल गए जब तुमने किसी निजी जलन के कारण मुझे यहाँ बुलवा कर साबिर अली मजिस्ट्रेट की इज्जत पर अकारण कीचड़ उछलवाए।”

“तुम बकवास कर रही हो...” मैं हलक फाड़कर चिल्लाया, “दफा हो जाओ यहाँ से कमीनी औरत!”

डॉली और उसके माता-पिता खामोश बैठे मेरी और रजनी की बातें सुन रहे थे। रजनी ने मुझे क्रोध में काँपते देखा तो वह भी झटके से उठ खड़ी हुई। मुझे खूंखार नजरों से घूरकर बोली-

“तुमने मुझे कमीनी औरत कहकर अच्छा नहीं किया। मैं यदि चाहूँ तो तुम्हारी सराफत का भ्रम इसी समय खाक में मिला सकती हूँ। मैंने जो कुछ भी कहा है उसका प्रमाण भी मेरे पास मौजूद है लेकिन मैं तुम्हें एक अवसर और देती हूँ। अपनी रवानगी से पहले मुझे फोन जरूर कर लेना। हो सकता है इस बीच में तुम्हारा दिमाग सही रास्ते पर आ जाये। वरना मजबूर होकर मुझे वह दस्तावेजी प्रमाण तुम्हारे ससुर और तुम्हारी पत्नी को दिखाने होंगे, जो मेरे पास बड़ी हिफाजत से सुरक्षित हैं...”
 
रजनी ने अपनी बात पूरी की फिर तेजी से घूमी और लम्बे-लम्बे डग भरती ड्राइंगरूम से बाहर चली गयी। मैं अपने स्थान पर खड़ा क्रोध से काँपता रहा। डॉली के चेहरे पर एक रंग आता और एक जाता था। उसकी माँ मुँह लटकाये बैठी थी और मेरे ससुर साहब अत्यंत घृणापूर्ण भाव में होंठ चबाने में मग्न थे। स्वयं मैं भी रजनी के अचानक आगमन तथा उसके झूठे आरोप से बौखला गया था।

समझ में नहीं आ रहा था कि रजनी ने अचानक ऐसा क्यों किया। किसके संकेत पर उसने मुझे अपना निशाना बनाया ? केवल एक बार मैं रजनी से मिला था और मैंने असलियत का पूरा मूल्य चुकता किया था। ग़ैर कानूनी धँधे तथा दूसरे आरोपों से मेरा कोई सम्बन्ध नहीं था।

ड्राइंगरूम में कुछ देर तक ख़ामोशी छाई रही फिर डॉली उठी और बाहर चली गयी। कदाचित ससुर साहब के संकेत पर उसने वहाँ से जाने की आवश्यकता महसूस की थी। इसलिए डॉली के जाते ही ससुर साहब ने मुझे संबोधित करते हुए बड़े सर्द स्वर में पूछा।

“क्या रजनी ने जो कुछ कहा है वह गलत है ?”

“न केवल गलत बल्कि बकवास है।” मैंने झल्लाए स्वर में कहा।

“और यदि उस औरत ने ऐसा कोई प्रमाण पेश कर दिया तो... ?”

“आपका मतलब क्या है ?”

“मेरा सुझाव है कि तुम फ़िलहाल अपने जाने का कार्यक्रम रद्द कर दो।” ससुर साहब ने मुझे घूरते हुए निर्णयात्मक स्वर में कहा।

“वह क्यों ?”

“देखो राज, जब तक तुम्हारी पोजीशन साफ नहीं हो, मुझे डॉली को तुम्हारे साथ भेजने का फैसला नहीं करना चाहिए।”

उत्तर में मेरा मन चाहा कि ससुर साहब को खरी-खरा सुना दूँ। उनके और रजनी के संबंधों का जिनका पता मुझे मोहिनी के माध्यम से हो चुका था। भांडा फोड़ दूँ परन्तु मेरे पास कोई ठोस प्रमाण नहीं था। इसलिए मैं खून का घूँट पीकर रह गया और उन्हें खूंखार नजरों से घूरता हुआ अपने कमरे में आ गया।

डॉली ने रजनी के सिलसिले में कोई पूछताछ नहीं की लेकिन फिर भी वह चुपचाप सी थी। मैंने भी उससे कोई बात नहीं की। रात को तो उसने बहुत उदास अंदाज में खाना खाने को कहा तो मैंने सख्त स्वर में इंकार कर दिया।

मैंने निर्णय कर लिया था कि डॉली चाहे जाये या न जाये मैं कल जरूर बम्बई के लिये रवाना हो जाऊँगा।

काफी रात तक मैं परिस्थितियों के बारे में गौर करता रहा लेकिन उसका कारण मेरी समझ में नहीं आ सका। फिर कब मेरी आँख लग गयी और कब मैं नींद की गोद में पहुँच कर दुनिया से बहुत दूर हो गया, मुझे कुछ नहीं पता। लेकिन मेरी आँख उस समय खुली जब मैंने रजनी की बहकी हुई मद्धिम आवाज सुनी।

“राज, मेरे निकट आओ। दूर-दूर क्यों हो ?”

रजनी की आवाज के साथ ही मुझे उसके कोमल और गर्म जिस्म का भी एहसास हुआ। मैंने धीरे से करवट बदली और फिर... फिर मेरी और रजनी की बहकी-बहकी साँसे एक-दूसरे से टकराने लगी। मुझे यूँ महसूस हो रहा था जैसे मैं कोई बहुत ही सुहाना सपना देख हूँ परन्तु अचानक बिजली की कौंध हुई तो मैंने हड़बड़ाकर आँखे खोल दी और फिर जो दृश्य मैंने देखा उसे देखकर मैं खुद भी चकरा गया।

अब तक जिन बातों को मैं सपना समझ रहा था, वह सपना नहीं बल्कि एक कड़वी और घिनौनी वास्तविकता थी। रजनी उस समय मेरे बिस्तर पर मेरे आगोश में निर्वस्त्र हालत में मौजूद थी। मेरी अपनी हालत भी उससे जुदा न थी और मेरी नजरों के सामने बेडरूम के दरवाजे पर मेरे ससुर साहब ड्रेसिंग गाउन पहने सीना ताने खड़े मुझे खतरनाक निगाहों से घूर रहे थे।

डॉली अपने बेड पर मौजूद नहीं थी। एक पल के लिये तो जैसे मुझ पर आश्चर्य के पहाड़ टूट पड़े फिर दूसरे ही पल मैंने घबराकर पैरों के निकट पड़ी चादर को अपने जिस्म पर खींच लिया। रजनी दोनों हाथों से अपने जिस्म के उभारों को छुपाती हुई तेजी से उठकर दूसरे कमरे की ओर भागी।

अभी मैं आश्चर्य तथा उलझन की तस्वीर बना हालात के सम्बन्ध में सोच भी नहीं पाया था कि ससुर साहब की कड़कती आवाज मेरे कानों से टकराई।

“बेगैरत, कमीनी! तेरी इतनी मजाल कि तू मेरी ही छत के नीचे बैठकर मेरी लड़की के सुहाग पर डाका मार रही है।”

मैंने अपनी सफाई में कुछ कहने की कोशिश की लेकिन मुझसे कोई बात न की जा सकी।

“कमीने, जलील! इसी समय निकल जा मेरे घर से और यदि फिर तूने कभी इधर का रुख किया अथवा मेरी मासूम बच्ची का नाम जुबान पर लाया तो तुझे शूट कर दूँगा।”

ससुर साहब क्रोध से दाँत पीसते कमरे से बाहर चले गए तो मैंने जल्दी से उठकर कपड़े पहने फिर बाहर जाने के इरादे से बढ़ा ही था कि रजनी लिबास पहनकर दूसरे कमरे से बाहर आई। मैंने रजनी को देखा तो मेरे सिर पर खून सवार हो गया। मैंने उसे खा जाने वाली नजरों से देखा।

“सच बता, तू किसके कहने पर आई थी ? यदि तूने झूठ बोला तो मैं इसी समय तुझे जान से मार डालूँगा।”

“होश में आओ राज! तुम खुद ही मुझे साथ लेकर आये थे और अब...”
 
“कमीनी औरत, मैं समझ रहा हूँ कि तू मेरे साथ कैसा फ्रॉड कर रही है! परन्तु अब मैं तुझे इस योग्य नहीं छोड़ूँगा कि भविष्य में कभी किसी और को अपना बना सके।”

मैंने झपटकर रजनी को इकलौते लोहे के शिकंजे जैसे हाथ में दबोच लिया। यदि मेरे दोनों हाथ ठीक होते तो शायद मुझे उसे काबू करने में अधिक असुविधा न होती। फिर भी मैंने उसे एक हाथ से गिरफ्त में लिया और पाँव से ठोकर मारकर उसे उठाकर नीचे गिरा दिया।

दूसरे ही पल मैं उसकी छाती पर चढ़ बैठा और एक हाथ से उसके गले को दबाने लगा। रजनी का कोमल गुदा व जिस्म मेरे बोझ तले तड़प रहा था। खुद को मुझसे बचाने के लिये वह पूरी तरह संघर्ष कर रही थी। उसकी बड़ी-बड़ी खौफनाक आँखों से मौत की पीड़ा फट रही थी।

मैं चाहता था इससे पहले कि रजनी अपने अंजाम से चीख-पुकार कर किसी को बाखबर करे, मैं उसका काम तमाम कर दूँ लेकिन एक बार जो वह नीचे से तड़पी तो मेरे हाथ की पकड़ ढ़ीली पड़ गयी और उसने पागलों की तरह चिल्लाना शुरू कर दिया।

“ब... ब... बचाओ... बचाओ...”

“मैंने बड़ी फुर्ती से दोबारा उसे बेबस करके उसके गले पर अपनी पकड़ जमाई लेकिन अफ़सोस कि उस जलील औरत को मौत के घाट न उतार सका। उसकी घुटी हुई भयानक चीख की आवाज सुनकर मेरे ससुर साहब अपने दो नौकरों सहित मेरे बेडरूम में घुस आये।

फिर रजनी को उन दोनों नौकरों की सहायता से मुझसे अलग कराया गया।

“इस हरामजादे को जूते से मारकर घर से बाहर फेंक आओ और अगर यह भीतर आने की चेष्टा करे तो इसे इतना मारो कि इसका दम निकल जाये।”

यदि मेरे वश में होता तो शायद मैं डॉली के पिता को भी जान से मार डालता। लेकिन उन दो हट्टे-कट्टे नौकरों ने मुझे बिल्कुल बेबस कर रखा था। ससुर साहब के आदेश पर नौकरों ने उसी समय मुझे धक्का मारकर कोठी से बाहर फेंक दिया। मैंने और अधिक अपमानित होने से बेहतर समझा कि ख़ामोशी से चला जाऊँ। इसलिए मैं उसी समय स्टेशन की ओर चल दिया।

यह एक सुंदर संयोग था कि उस समय मैंने जो कपड़े पहने थे उसमें यह टिकट भी मौजूद थे। जो मैंने रिजर्व करवाये थे। कैश रकम की सूरत में मेरे पास केवल सत्तर रूपये शेष थे। वह रात मैंने स्टेशन पर गुजारी और दूसरे दिन अकेले बम्बई के लिये रवाना हो गया। परन्तु मुझे दुःख था तो केवल इस बात का कि मुझे डॉली से दो बातें करने का अवसर भी न मिल सका। हालात ने जिस तेजी से रूप बदला था... उसने मेरी अक्ल जाम कर दी थी। यह सब एक के बाद एक हुआ था।

मेरे होशोहवास गुम होकर रह गए थे। उस रात रह-रहकर मेरे ज़हन में बस यही विचार उभरता रहा कि यह सब कुछ मेरे ससुर साहब का किया धरा है। सम्भव है रजनी ने उन्हें इस बात से आगाह कर दिया हो कि मैं एक बार उससे अच्छी तरह मिल चुका हूँ और ससुर साहब ने प्रतिशोध भावना के अंतर्गत मुझे रजनी के माध्यम से ही बदनाम करने की ठान ली हो। परन्तु यह बात किसी भी प्रकार मेरी समझ में न आ सकी कि उन्होंने अपने प्रतिशोध के लिये डॉली की जिंदगी बर्बाद करना क्यों गँवारा कर लिया और यदि कोई और बात है तो वह क्या है ?

बम्बई आये मुझे एक हफ्ते से अधिक हो चुका था। मेरा धंधा बखूबी चल रहा था। मैंने सबसे पहला काम यह किया कि ससुर साहब के जो कारिन्दे यहाँ मौजूद थे। उन्हें निकाल बाहर किया और स्वयं काम को अपनी निगरानी में ले लिया। मेरा बिजनेस मैनेजर मेरी वापसी पर बहुत खुश हुआ परन्तु मैं व्यक्तिगत रूप से डॉली के कारण बहुत चिंतित था।

मैं उससे मिलकर यह पूछना चाहता था कि भविष्य के लिये उसने क्या सोचा है। क्या वह मेरे साथ रहना पसन्द करेगी या हालात को देखते हुए वह मुझसे अलग होना चाहेगी। मुझे अभी तक डॉली से बातचीत करने का कोई रास्ता नजर नहीं आया था। पत्र के द्वारा मैंने इन बातों को छेड़ना कुछ उचित नहीं समझा।

बहरहाल मैं डॉली की ओर से बहुत परेशान था। बम्बई जाने के बाद न जाने कितनी बार मुझे उसकी कमी महसूस हुई। अक्सर मुझे उसका प्यार और उसकी निस्वार्थ सेवा याद आई तो मैं बेचैन हो जाता। वह सही अर्थों में एक वफादार और पतिव्रता स्त्री थी परन्तु समय की मार ने हम दोनों को अलग-अलग कर दिया था। न जाने क्यों मुझे इस बात का पूर्ण विश्वास था कि किसी न किसी दिन डॉली अचानक मेरे पास आ जायेगी। परन्तु मेरा विश्वास उस काँच के बर्तन की तरह टूटकर बिखर गया जिस दिन डॉली की ओर से मुझे उसके वकील का नोटिस मिला।
 
उस नोटिस में मेरे ऊपर बेशुमार घिनौने आरोप लगाये गए थे और उन आरोपों को लगाते हुए इस बात पर जोर दिया गया था कि या तो मैं शराफत से उसको तलाकनामा रवाना कर दूँ या फिर अदालत के सामने पेश होने के लिये तैयार हो जाऊँ।

डॉली की ओर से मिलने वाले नोटिस ने मुझे परेशान कर दिया। दूसरे दिन हिम्मत करके मैंने डॉली को फोन किया।

दोपहर का समय था इसलिए मुझे विश्वास था कि फोन डॉली रिसीव करेगी। मेरा विश्वास सच साबित हुआ। दूसरी ओर से कुछ देर बाद डॉली की जानी-पहचानी रस भरी कोमल आवाज सुनाई दी तो मैं तड़प उठा।

हिम्मत करके मैं बोला- “डॉली, मैं राज बोल रहा हूँ!”

“कहिये क्या काम है ?” डॉली ने बड़ी रुखाई से पूछा था।

मैंने सब्र से काम लेते हुए कहा– “डॉली मुझे तुमसे कुछ जरूरी बातें करनी हैं।”

“कहिये, मैं सुन रही हूँ ?”

मैंने बड़ी गंभीरता से कहना शुरू किया– “डॉली, आखिर तुम भी बहक गयी! मेरी जान विश्वास करो, रजनी के सम्बन्ध में जो बातें सामने आयी हैं वह मुझ पर सरासर झूठा आरोप है। मेरा इन बातों से कोई सम्बन्ध नहीं।”

“हो सकता है मगर क्या मैं पूछ सकती हूँ कि रजनी को अचानक आपसे कौन सी शत्रुता हो गयी थी जो उसने आपके ऊपर इतने सारे आरोप लगा डाले ?”

“मैं इस सिलसिले में स्वयं भी आश्चर्यचकित हूँ कि यह सब कैसे और क्यों हो गया ?”

“क्या आपने इतनी सी बात कहने के लिये मुझे फोन करने का कष्ट किया है ?”

मैंने डूबती हुई आवाज में कहा– “डॉली, मैं चाहता हूँ कि तुम इन तमाम बातों को भूलकर मेरे पास चली आओ! तुम्हारे बिना मुझे एक पल भी चैन नहीं आता। डॉली, यदि तुम्हारा व्यवहार ऐसा रहा तो फिर मैं बेमौत मारा जाऊँगा।”

“मुझे आपसे हमदर्दी है और फिर ऐसे अवसर पर मोहिनी भी साथ नहीं है वरना वह अवश्य आपका दिल बहलाती रहती और आपको मेरी कमी या जुदाई का एहसास न होता।”

डॉली के स्वर में इतना गहरा व्यंग्य था कि मैं तड़प उठा। उसने मोहिनी के विषय को बीच में लाकर मेरे रिसते हुए जख्मों पर नमक छिड़क दिया था। मैंने कठिनाई के साथ अपने ऊपर काबू पाते हुए कहा– “क्या तुमने मुझसे वास्तव में अलग होने का निर्णय कर लिया है ? क्या तुम वास्तव में मुझ पर विश्वास नहीं करती ? मैं बहुत बुरा सही मगर मैंने तुम्हारे साथ कोई बुराई नहीं की...”

“राज, आप शायद यह भूल रहे हो कि मैं एक स्त्री हूँ, जो पुरूष के तमाम जुल्मों सितम को हँसी-ख़ुशी झेल सकती है, भूखी रह सकती है, संसार के तमाम दुखों को सहन कर सकती है परन्तु यह कभी सहन नहीं कर सकती कि उसका पति उसकी मौजूदगी में किसी अन्य स्त्री से रंग-रलियाँ मनाये।” डॉली क्रोध में भरी कहती रही, “हो सकता है कि मैं रजनी के विषय में आपकी बातों को ठीक मान लेती परन्तु उस रात मैंने स्वयं अपनी पापी निगाहों से रजनी और आपको अपने बेडरूम में खुद खेलते देखा। वह मेरे सहने की चरम सीमा थी। मैंने उसी समय तय कर लिया था कि मुझे आपसे तलाक लेना होगा। यह फैसला मैंने दिल पर पत्थर रखकर लिया है परन्तु मैं समझती हूँ कि यही मेरे लिये बेहतर है। और हाँ, अब भविष्य में मुझे फोन मत कीजियेगा।”

“यदि यह तुम्हारा अंतिम फैसला है तो मैं कल ही अपनी ओर से तुम्हें तलाकनामा रवाना कर दूँगा। परन्तु क्या तुम इन बातों से पहले केवल एक बार मुझसे दो घड़ी के लिये मिलना पसन्द नहीं करोगी। मुझे अपनी सफाई का मौका दो। तुम इतनी निर्दयी कैसे हो गयी ? आखिर तुमने मेरे साथ बहुत अच्छे दिन गुजारे हैं। कभी गंभीरता से तो गौर किया होता। एक तुम ही तो मेरा सहारा थी। क्या तुम मुझसे नहीं मिलोगी ?”

“मुझे दुःख है कि मैं ऐसा नहीं कर सकती। मुझसे और मत कहिये। जो हो चुका है वह बहुत है। बस। अब यह सिलसिला समाप्त कीजिये। मेरे अंदर अधिक हौसला नहीं है।”

“डॉली ?” मैं तड़प उठा, “क्या तुम्हें अब मुझसे जरा भी लगाव बाकी नहीं रह गया ?”

“किसको किससे लगाव था मिस्टर राज, इसका सबूत मिल चुका है। अब और चेष्टा मत कीजिए। हम अलग रहें, इसी में हम दोनों की भलाई है।” डॉली ने कड़वे स्वर में कहा फिर दूसरी ओर से संबंधविच्छेद हो गया।
 
डॉली से बिछड़ने के बाद मेरी ज़िंदगी में एक ऐसी दरार पैदा हो गयी जिसे भरना मुश्किल था। मैंने अपने गम को बहलाने के लिये एक बार फिर शराब और बाजारू औरतों का सहारा लिया। लेकिन मुझे वह चैन न मिल सका जो डॉली की बाहों में मिलता था। मैं अपने ज़हन को बरकरार रखने के लिये हर समय शराब के नशे में चूर रहता। उसके बाद क्या हुआ, मुझ पर मुसीबतें टूटने लगी। लेकिन मैंने चाहा कि मुझपर और तबाही आए। मैं अपनी दास्ताने ग़म छोटी करता हूँ। मैं केवल उन एक के बाद एक घटने वाली घटनाओं का उल्लेख करूँगा जिन्होंने मेरे रहे-सहे होश भी मुझसे छीन लिये।

मेरा कारोबार जो रोज-बरोज तरक्की कर रहा था, अब मेरी लापरवाहियों के कारण गिरने लगा। फिर अचानक एक आफत और आ पड़ी। उस बैंक में आग लग गयी जहाँ मेरा ज़्यादा पैसा जमा था। आग इतनी भयंकर थी कि बैंक की ईंटें तक जलकर खाक बन गईं। अभी मैं उस हादसे से पूरी तरह सँभल भी न पाया कि मेरा कैशियर जो शुरू से मेरे पास था, वह अत्यंत विश्वास पात्र व्यक्ति था। पाँच लाख की रक़म दूसरे बैंक से निकालकर फरार हो गया। मुझे उसका पता तीन दिन बाद चला। इसलिए पुलिस भी मेरी शिकायत पर उसे तुरंत गिरफ़्तार न कर सकी।

मैंने अपने उस नुकसान को पूरा करने के लिये खुद को दाँव पर लगा दिया। मैंने अपना अधिकतर समय रेसकोर्स में बिताया और जो कुछ मेरे पास था वह भी गँवाता चला गया। नौकरों की संख्या कम होती गयी। मुझे चारों से मेरी मुसीबतों ने घेर लिया।

मोहिनी गयी। डॉली गयी। दफ़्तर गया। रुपया चोरी हुआ। बिजनेस गया तो इज़्ज़त भी गयी। केवल एक मकान रह गया था जो मेरी हवस के भेंट चढ़ गया। मैंने उसे रेस के मैदान पर कुर्बान कर दिया।

सब कुछ राख हो गया। वह लड़कियाँ भी रुखसत हुई जो कल तक मेरी मुहब्बत का दम भरती थीं। वे लोग भी जुदा हो गए जो मेरे इशारों पर नाचने को तैयार रहते थे।

अब किसी दुर्घटना का मेरी नज़रों में कोई महत्व नहीं था। मैं बुरी से बुरी खबर सुनने को हर समय तैयार रहता था। मुझे मालूम था कि बर्बादियों ने मुझे पहचान लिया। सब कुछ जल चुका था और मैं अंदर से जल रहा था। मेरे सीने में एक आग लगी हुई थी। काश, मोहिनी न आई होती और आई भी थी तो जाने का नाम न लिया होता। उसने यह चमक-दमक दिखाकर मेरी आँखों की रोशनी छीन ली थी। मैं उसके सहारे से खुद कितना बेसहारा हो गया था।

“मेरी मोहिनी कहाँ है ?”

मैं त्रिवेणी की तलाश में न जाने कितने शहरों-मंदिरों-कब्रिस्तानों और मरघटों में गया और मैंने इस आशा पर कि शायद मोहिनी को मैं दोबारा प्राप्त कर लूँ। जो कुछ भी मेरे पास था, बिना हिचक ख़र्च कर दिया। फिर जब मैं असफल वापस आया तो मेरे पास कुछ न था। न मकान, न धंधा, न बीवी।

मैं एक होटल में ठहरा। मैं स्थाई तौर पर एक भिखारी बनकर रह रहा था। मैं उस होटल में ठहरा हुआ था जहाँ शायद आम हालात में मैं एक प्याली चाय पीना भी गँवारा न करता। मेरे जिस्म पर जो कपड़े थे बस वही मेरी आख़िरी पूँजी थी।

उस रात मैं काफ़ी देर तक मोहिनी और त्रिवेणी के ख़्याल में बेचैन होता रहा। फिर सो गया। पर कुछ ही देर के बाद मैं दोबारा हड़बड़ाकर जाग उठा। कोई मेरे बाज़ू को जोर-ज़ोर से हिलाकर मुझे जगाने की कोशिश कर रहा था।

मैंने आँखें खोलकर देखा तो एक हसीन, एक सुन्दर युवती क़ीमती कपड़ों में मेरे सामने क़यामत बनी खड़ी थी। मैं कुछ क्षणों तक उसे गौर से देखता रहा फिर मैंने उसे पहचान लिया। वह एक स्थानीय डॉक्टर की अय्याश बेटी शकुन्तला थी। मैं उसे कई बार अपना दिल बहलाने के लिये इस्तेमाल कर चुका था। परंतु इस समय इतनी रात में उसे अपने पास देखकर मुझे बेहद आश्चर्य हुआ। इस बात का अहसास भी मुझे सता रहा था कि इस समय मैं एक घटिया किस्म के होटल में रुका हूँ।

कुछ देर शकुन्तला को मैं यूँ ही देखता रहा। फिर बोला- “इतनी रात में तुम यहाँ ? तुम्हें मेरा पता कैसे चला ?”

“डियर, मैं बहुत लकी हूँ। जो तुम इस समय यहाँ दिख गए। वरना मुझे किसी और की हेल्प लेनी पड़ती।” शकुन्तला ने तेजी से कहा। फिर निकट आकर बोली- “डियर, अगर तुम इस टाइम मुझे पूना तक छोड़ आओ तो मैं सारा जीवन तुम्हारा अहसान न भुलूँगी।”

“लेकिन मैं तो ?”

“मुझे सब कुछ पता चल गया है राज!” शकुन्तला ने बीच में ही मेरी बात काटकर कहा, “धन-दौलत जो तुम कहोगे मैं दूँगी। बस तुम मेरी इतनी हेल्प करो कि मुझे पूना तक साथ चलकर छोड़ आओ। इस साधारण काम के बदले मैं तुम्हें दो हज़ार तक देने को तैयार हूँ।”

शकुन्तला के चेहरे पर बौखलाहट के भाव देखकर मैंने इतना अनुमान तो कर लिया था कि वह उस समय किसी विशेष कारणवश बहुत घबराई हुई थी। परंतु यह बात मेरी समझ में न आ सकी कि उस जैसी मॉर्डन लड़की को इस समय पूना जाने के लिये मेरी सहायता की ज़रूरत आन पड़ी है।

इसलिए मैंने पूछा- “बात क्या है ? कोई ख़ास प्रॉब्लम है ?”

“हाँ राज, मेरे डैडी मेरी मैरिज एक ऐसे लड़के से करना चाहते हैं जो मुझे बिल्कुल पसंद नहीं। यूँ भी मैं मैरिज करके अपने-आपको क़ैद नहीं करना चाहती। इसलिए मैं घर से भाग आई हूँ। मेरा इरादा था कि मैं रात इसी होटल में गुजारूँ। फिर कल की गाड़ी से पूना चली जाऊँ। संयोग से तुम मुझे दिख गए। इसलिए मैं चाहती हूँ तुम इस समय मुझे पूना छोड़ आओ।”

“परंतु इस समय तुम पूना कैसे जाओगी ? सुबह से पहले कोई गाड़ी नहीं मिल सकती।”

“हम टैक्सी से चलेंगे। यदि ट्रेन से जाना होता तो फिर मुझे तुम्हारी हेल्प की क्या ज़रूरत होती।” फिर वह मेरी गरदन में अपनी मरमरी बाँहें डालकर बोली, “बोलो राज डियर, क्या तुम तैयार हो ?”

“अकेले जाने में तुम्हें किसी प्रकार का ख़तरा है ?” क्या तुम्हें डर है कि ड्राइवर तुम्हें पूना की बजाय कहीं और ले जाएगा ?”

“हाँ! और यह भी संभव है कि कहीं मेरे भैया या डैडी मुझे देख न लें।”

“और यदि तुम्हारे डैडी ने तुम्हें मेरे साथ देख लिया तो ? क्या वह चुप हो जाएँगे ?”

“तुम समझते क्यों नहीं राज ?” शकुन्तला इठलाकर बोली। फिर उसने ज़मीन से एक पोटली उठाकर उसे खोलते हुए कहा- “यह देखो! यह बुर्का मैं अपनी एक सहेली से माँग कर लायी हूँ। मैं तुम्हारे साथ बुर्के में हूँगी। इसलिए कोई संदेह नहीं कर सकता।”

मैं थोड़ी हिचकिचाहट के बाद शकुन्तला को पूना ले जाने के लिये तैयार हो गया। उसका कारण कुछ शकुन्तला भी थी। दूसरे यह कि मुझे कुछ पैसों की भी आवश्यकता थी। शकुन्तला ने मुझे तैयार पाया तो मुझसे लिपट गयी।

कुछ देर बाद हम दोनों एक टैक्सी में बैठ पूना की ओर जा रहे थे। शकुन्तला पिछली सीट पर बुर्का ओड़े मेरे बराबर में बैठी थी।

मैंने शकुन्तला से पूछा- “पूना में तुम कहाँ रुकोगी ? क्या वहाँ तुम्हारा परिचित मौजूद है ?”

“शो...!” शकुन्तला ने बुर्के का नकाब पलटते हुए मुझे ख़ामोश रहने के लिये कहा। फिर ऊँचे स्वर में बोली– “यदि मेरे बहन की हालत ख़राब न होती तो मैं खुद पूना जाने के लिये ज़िद न करती। आप मुझसे नाराज़ तो नहीं ?”

मैं समझ गया कि वह यह टैक्सी ड्राइवर को सुनाने के लिये कह रही है। इसलिए मैंने गंभीरता से कहा, “ठीक है! मैं तुम्हें छोड़कर वापस आ जाऊँगा। तुम कुछ दिनों बाद चली आना।”

“आप क्या एक-दो दिन वहाँ नहीं रूकेंगे ?”

शकुन्तला मुझसे यूँ बातें कर रही थी जैसे वह मेरी पत्नी हो। टैक्सी ड्राइवर की नज़र सड़क पर जमी हुई थी। कुछ देर तक मैं शकुन्तला की हाँ में हाँ मिलाता रहा। फिर एक बार मैंने घसीटकर अपने आगोश में ले लिया और उसके कान के निकट मुँह ले जाकर पूछा, “तुमने बताया नहीं पूना में तुम्हारा कौन है ? हमें भी नहीं बताओगी ?”

“मैं फिलहाल अपने एक फ़िल्म एक्टर दोस्त के साथ रूकूँगी। उसने मुझे एक बार फ़िल्म में काम करने का ऑफर भी दिया था।”
 
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