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“ऐसी तो बात नहीं। जिस तरह मैं डॉली की दोस्त हूँ और उसके लिये दिन-रात परेशान रहती हूँ। उस तरह आपका भी कोई न कोई ज़रूर होगा।”
और उस समय अचानक मुझे रामदयाल की याद आ गयी। एक लम्बे अर्से के बाद उस पुराने दोस्त की याद आई जो इसी शहर में रहता था और जिसके घर से मोहिनी की कहानी शुरू हुई थी लेकिन बहुत अर्से से मैं रामदयाल से नहीं मिला था। न जाने वह किस हाल में होगा। अब घर में होगा भी या नहीं।
बहरहाल मुझे रामदयाल पर पूरा भरोसा था। मैंने नीलू को उसका पता दे दिया।
नीलू चली गयी तो मैंने सोचा कि अगले दिन मैं रामदयाल से मिलकर आऊँगा। कलकत्ता में वह मेरा अकेला दोस्त था और कहने की बात नहीं कि हम दोनों जिगरी दोस्त थे। एक-दूसरे के भले-बुरे वक्त पर काम आते रहते थे।
अगले दिन मैं रामदयाल से मिलने की तैयारी कर ही रहा था कि एक लड़का मुझसे होटल में मिलने आया और एक खत थमाकर चलता बना। उसने बताया कि उसे नीलू ने भेजा है। मैंने खत खोलकर पढ़ा। मुझे नीलू ने बुलाया था। पत्र में लिखा था कि डॉली आज एक जगह आएगी जहाँ मैं उससे मिल सकता था। पत्र में उसने बंग्ले का पता भी दिया था।
मैंने सोचा उस तरफ़ से होकर रामदयाल के यहाँ निकल जाऊँगा। इन दिनों मैं शिवचरण की राख अपने साथ ही रखता था। जिसे मैंने एक रबड़ ट्यूब में भर ली थी और कमर पर उसे बाँधे रहता था।
होटल से निकलकर मैंने टैक्सी ली और उस पते की ओर चल पड़ा।
जब मैं उस बंग्ले के फाटक पर पहुँचा तो मैंने टैक्सी छोड़ दी। मेरा अनुमान था कि वह नीलू का घर होगा जहाँ डॉली उससे मिलने आई होगी।
बंगला सुनसान पड़ा हुआ था। बंगले का फाटक खुला था और कोई दरबान या नौकर कहीं नज़र नहीं आ रहा था। मैं थोड़ी हिचकिचाहट के बाद फाटक पार करता हुआ आगे बढ़ गया। जब मैं कोठी के बरामदे में पहुँचा और मैंने कॉल बेल दबाई तो चंद सेकेंड बाद ही दरवाज़ा खुला और एक मोटा तंदुरुस्त नौकर सामने खड़ा नज़र आया। उसकी वेशभूषा से पता चलता था कि वह नौकर है परंतु उसका चेहरा नौकरों वाला न लगता था। वह कोई छटा हुआ बदमाश मालूम पड़ता था। परंतु मैं यहाँ तक आने के बाद डॉली से मिले बिना वापस नहीं लौट सकता था।
मैंने उससे कुछ झिझकते हुए डॉली के बारे में पूछा।
“आइए, वह आपका ही इंतज़ार कर रही है।” नौकर बोला और उसने मेरे लिये रास्ता छोड़ दिया।
मेरे भीतर दाख़िल होने के बाद उसने दरवाज़ा भीतर से बंद कर लिया। मैंने इस बार कोई विशेष ध्यान नहीं दिया। फिर वह मुझे दो-एक कमरों से गुजरता हुआ, एक कमरे के दरवाज़े पर छोड़ता हुआ बोला-
“अंदर चले जाइए, इसी कमरे में।”
और वह एक तरफ़ चला गया।
मुझे थोड़ी सी झिझक महसूस हुई परंतु फिर कुछ साहस बढ़ाया और कमरे का दरवाज़ा खोलकर अंदर दाख़िल हो गया। यह कमरा कुछ इस तरह का था कि एकदम उजाले से अंधेरे में पहुँचकर कुछ पल के लिये मुझे कुछ नज़र नहीं आया। परंतु फिर जब मैंने अपने पीछे दरवाज़ा बंद होने की आवाज़ सुनी तो चौंक पड़ा।
और फिर एकदम से मेरे पाँव तले की ज़मीन खिसक गयी।
मेरे सामने डॉली नहीं, डॉली का बाप खड़ा था और उसकी आँखों से शोले दहक रहे थे। उसके होंठों पर जहरीली मुस्कराहट खेल रही थी। फिर मैंने घबड़ाकर दायें-बायें देखा। कमरे में चार हट्टे-कट्टे मुस्टंडे नज़र आए जो हाथ बाँधे खड़े थे।
“यह... यह... मेरे साथ... धोखा।” मैं हकलाया।
“धोखे के बच्चे, हरामजादे, सुअर की औलाद! अपनी माँ के...!” डॉली का बाप दहाड़ा। “मैंने तुझे कहा था कि शहर छोड़कर भाग जा, इसी में तेरी भलाई है। तूने इसके बजाय डॉली को फोन किया। अब देख डॉली नहीं, तेरी मौत तेरे सामने खड़ी है।”
मैं लड़खड़ाकर दरवाज़े की तरफ़ हटा। परंतु दरवाज़ा पहले ही बंद हो चुका था और वे चारों पहलवान हाथ खोल चुके थे। वे धीरे-धीरे मेरी तरफ़ बढ़ रहे थे। मुझे मौत इंच-इंच अपने निकट आती महसूस हो रही थी।
“सेठजी, मुझे क्षमा कर दो! मैं फिर कभी इस तरह नहीं करूँगा।”
“बुजदिल, कायर! बस इतनी मोहब्बत है तुझे डॉली से ? उसके लिये जान भी नहीं दे सकता ? देख यहाँ तू चाहे जितना भी चिल्ला, जितना गिड़गिड़ा, तेरी कोई सुनने वाला न होगा। चाहे तो बहादूरों की तरह इन लोगों से मुकाबला कर। कुछ देर तक तो जान बची रहेगी; और तुझे यह रंज नहीं रहेगा कि तू कुत्ते की मौत मारा गया।”
वह मुझ पर टूट पड़े। मैंने इकलौते हाथ से अपने बचाव का संघर्ष शुरू कर दिया। लातें चलाईं, चीख-पुकार मचाई। परंतु तब तक डॉली का बाप कहकहे लगाता रहा और घूँसे मुझ पर कहकहे बरसाते रहे। उन्होंने मेरे जोड़-जोड़ पर प्रहार किया। एक के पास लोहे की छड़ थी जिससे वह मेरी कमर, मेरी हड्डियाँ तोड़ डाल रहा था। आख़िरकार मैं चेतना शून्य हो गया।
फिर जब मेरी आँख खुली तो मैं कूड़े की ढेर पर पड़ा था। मेरा सारा शरीर पके हुए फोड़े के मानिंद दुख रहा था। चारों तरफ़ रात का अंधकार फैला हुआ था। मैं कुछ देर तक उसी प्रकार बेसुध पड़ा रहा। मैंने उठना चाहा तो मेरे शरीर के दुखते अंगों ने साथ नहीं दिया और फिर होश में आने के बाद मैं बड़ी मुश्किल से कूड़े के ढेर से घिसटता हुआ बाहर आया। कदाचित उन लोगों ने मुझे मरा हुआ समझकर वहाँ फेंक दिया था।
और उस समय अचानक मुझे रामदयाल की याद आ गयी। एक लम्बे अर्से के बाद उस पुराने दोस्त की याद आई जो इसी शहर में रहता था और जिसके घर से मोहिनी की कहानी शुरू हुई थी लेकिन बहुत अर्से से मैं रामदयाल से नहीं मिला था। न जाने वह किस हाल में होगा। अब घर में होगा भी या नहीं।
बहरहाल मुझे रामदयाल पर पूरा भरोसा था। मैंने नीलू को उसका पता दे दिया।
नीलू चली गयी तो मैंने सोचा कि अगले दिन मैं रामदयाल से मिलकर आऊँगा। कलकत्ता में वह मेरा अकेला दोस्त था और कहने की बात नहीं कि हम दोनों जिगरी दोस्त थे। एक-दूसरे के भले-बुरे वक्त पर काम आते रहते थे।
अगले दिन मैं रामदयाल से मिलने की तैयारी कर ही रहा था कि एक लड़का मुझसे होटल में मिलने आया और एक खत थमाकर चलता बना। उसने बताया कि उसे नीलू ने भेजा है। मैंने खत खोलकर पढ़ा। मुझे नीलू ने बुलाया था। पत्र में लिखा था कि डॉली आज एक जगह आएगी जहाँ मैं उससे मिल सकता था। पत्र में उसने बंग्ले का पता भी दिया था।
मैंने सोचा उस तरफ़ से होकर रामदयाल के यहाँ निकल जाऊँगा। इन दिनों मैं शिवचरण की राख अपने साथ ही रखता था। जिसे मैंने एक रबड़ ट्यूब में भर ली थी और कमर पर उसे बाँधे रहता था।
होटल से निकलकर मैंने टैक्सी ली और उस पते की ओर चल पड़ा।
जब मैं उस बंग्ले के फाटक पर पहुँचा तो मैंने टैक्सी छोड़ दी। मेरा अनुमान था कि वह नीलू का घर होगा जहाँ डॉली उससे मिलने आई होगी।
बंगला सुनसान पड़ा हुआ था। बंगले का फाटक खुला था और कोई दरबान या नौकर कहीं नज़र नहीं आ रहा था। मैं थोड़ी हिचकिचाहट के बाद फाटक पार करता हुआ आगे बढ़ गया। जब मैं कोठी के बरामदे में पहुँचा और मैंने कॉल बेल दबाई तो चंद सेकेंड बाद ही दरवाज़ा खुला और एक मोटा तंदुरुस्त नौकर सामने खड़ा नज़र आया। उसकी वेशभूषा से पता चलता था कि वह नौकर है परंतु उसका चेहरा नौकरों वाला न लगता था। वह कोई छटा हुआ बदमाश मालूम पड़ता था। परंतु मैं यहाँ तक आने के बाद डॉली से मिले बिना वापस नहीं लौट सकता था।
मैंने उससे कुछ झिझकते हुए डॉली के बारे में पूछा।
“आइए, वह आपका ही इंतज़ार कर रही है।” नौकर बोला और उसने मेरे लिये रास्ता छोड़ दिया।
मेरे भीतर दाख़िल होने के बाद उसने दरवाज़ा भीतर से बंद कर लिया। मैंने इस बार कोई विशेष ध्यान नहीं दिया। फिर वह मुझे दो-एक कमरों से गुजरता हुआ, एक कमरे के दरवाज़े पर छोड़ता हुआ बोला-
“अंदर चले जाइए, इसी कमरे में।”
और वह एक तरफ़ चला गया।
मुझे थोड़ी सी झिझक महसूस हुई परंतु फिर कुछ साहस बढ़ाया और कमरे का दरवाज़ा खोलकर अंदर दाख़िल हो गया। यह कमरा कुछ इस तरह का था कि एकदम उजाले से अंधेरे में पहुँचकर कुछ पल के लिये मुझे कुछ नज़र नहीं आया। परंतु फिर जब मैंने अपने पीछे दरवाज़ा बंद होने की आवाज़ सुनी तो चौंक पड़ा।
और फिर एकदम से मेरे पाँव तले की ज़मीन खिसक गयी।
मेरे सामने डॉली नहीं, डॉली का बाप खड़ा था और उसकी आँखों से शोले दहक रहे थे। उसके होंठों पर जहरीली मुस्कराहट खेल रही थी। फिर मैंने घबड़ाकर दायें-बायें देखा। कमरे में चार हट्टे-कट्टे मुस्टंडे नज़र आए जो हाथ बाँधे खड़े थे।
“यह... यह... मेरे साथ... धोखा।” मैं हकलाया।
“धोखे के बच्चे, हरामजादे, सुअर की औलाद! अपनी माँ के...!” डॉली का बाप दहाड़ा। “मैंने तुझे कहा था कि शहर छोड़कर भाग जा, इसी में तेरी भलाई है। तूने इसके बजाय डॉली को फोन किया। अब देख डॉली नहीं, तेरी मौत तेरे सामने खड़ी है।”
मैं लड़खड़ाकर दरवाज़े की तरफ़ हटा। परंतु दरवाज़ा पहले ही बंद हो चुका था और वे चारों पहलवान हाथ खोल चुके थे। वे धीरे-धीरे मेरी तरफ़ बढ़ रहे थे। मुझे मौत इंच-इंच अपने निकट आती महसूस हो रही थी।
“सेठजी, मुझे क्षमा कर दो! मैं फिर कभी इस तरह नहीं करूँगा।”
“बुजदिल, कायर! बस इतनी मोहब्बत है तुझे डॉली से ? उसके लिये जान भी नहीं दे सकता ? देख यहाँ तू चाहे जितना भी चिल्ला, जितना गिड़गिड़ा, तेरी कोई सुनने वाला न होगा। चाहे तो बहादूरों की तरह इन लोगों से मुकाबला कर। कुछ देर तक तो जान बची रहेगी; और तुझे यह रंज नहीं रहेगा कि तू कुत्ते की मौत मारा गया।”
वह मुझ पर टूट पड़े। मैंने इकलौते हाथ से अपने बचाव का संघर्ष शुरू कर दिया। लातें चलाईं, चीख-पुकार मचाई। परंतु तब तक डॉली का बाप कहकहे लगाता रहा और घूँसे मुझ पर कहकहे बरसाते रहे। उन्होंने मेरे जोड़-जोड़ पर प्रहार किया। एक के पास लोहे की छड़ थी जिससे वह मेरी कमर, मेरी हड्डियाँ तोड़ डाल रहा था। आख़िरकार मैं चेतना शून्य हो गया।
फिर जब मेरी आँख खुली तो मैं कूड़े की ढेर पर पड़ा था। मेरा सारा शरीर पके हुए फोड़े के मानिंद दुख रहा था। चारों तरफ़ रात का अंधकार फैला हुआ था। मैं कुछ देर तक उसी प्रकार बेसुध पड़ा रहा। मैंने उठना चाहा तो मेरे शरीर के दुखते अंगों ने साथ नहीं दिया और फिर होश में आने के बाद मैं बड़ी मुश्किल से कूड़े के ढेर से घिसटता हुआ बाहर आया। कदाचित उन लोगों ने मुझे मरा हुआ समझकर वहाँ फेंक दिया था।