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Fantasy मोहिनी

मुझे कोठी तक पहुँचने में अधिक से अधिक दस या पंद्रह मिनट लगे। उस समय मेरे मस्तिष्क पर एक जुनून सा सवार था। मैंने गाड़ी को पोर्टिकों में रोका और नीचे उतरकर तेज-तेज कदमों से कोठी में प्रविष्ट हो गया।

त्रिवेणी के शयनागार में पहुँचने के लिये भी मैंने बड़ी चुस्ती से काम लिया। शयनागार के दरवाज़े पर ठहर कर मैंने चाबी वाले सुराख से अंदर झाँक कर देखा लेकिन अंधकार के कारण कुछ न देख सका। कदाचित त्रिवेणी सोने के लिये लेट चुका था। दूसरे ही क्षण यह सोचकर मैंने दरवाज़ा पीटना शुरू कर दिया। मुझे अपनी योजना में असफलता नहीं मिली।

चंद क्षणों बाद अंदर से त्रिवेणी की आवाज़ सुनाई दी।

“कौन है ?”

“मैं हूँ सरकार, राज।” मैं ऊँची आवाज़ में बोला, “जल्दी दरवाज़ा खोलिए, पुलिस ने ड्राइवर को गिरफ़्तार कर लिया है।”

चाबी वाले सुराख से रोशनी फुटी तो मैं समझ गया कि तीर ठीक निशाने पर लगा है। मेरे दिल की धड़कनें और तेज हो गयी। मैं दरवाज़े के निकट एक कदम पीछे हटकर खड़ा हो गया। अंदर से आहट उभरकर दरवाज़े के निकट आई। बोल्ट खुलने की आवाज़ उभरी और फिर त्रिवेणी ड्रेसिंग गाउन में सिमटा मेरे सामने खड़ा था।

“क्या बात है, पुलिस ने ड्राइवर को क्यों गिरफ़्तार किया ?” त्रिवेणी ने लापरवाही से पूछा।

“मुझे नहीं मालूम सरकार।” मैंने बड़ी कठिनाई से अपने दिल की धड़कनों पर क़ाबू पाते हुए उत्तर दिया, “शकुंतला को ठिकाने लगाने के बाद जब वापस आया तो पुलिस वाले ड्राइवर से पूछताछ कर रहे थे। मैं वहाँ रुकने की बजाय भागकर आपको सूचित करने आ गया।”

“शकुंतला को तुमने गाड़ी से कितनी दूर ले जाकर ठिकाने लगाया था ?”

“मैं उसे काफ़ी दूर ले गया था सरकार। लेकिन हो सकता है ड्राइवर ने पुलिस के आतंक से जुबान खोल दी हो।”

त्रिवेणी की आँखों में बेचैन परछाइयाँ एक पल के लिये उभरकर ग़ायब हो गयी। वह मेरी परेशान हालत पर एक नज़र डालते हुए बोला- “तुम यहीं रुको, मैं अभी फ़ोन के जरिए मालूम करता हूँ।”

मैं आज्ञाकारी सेवक की तरह सिर को जुम्बिश दी लेकिन मैं पूरी तरह अपनी सोची-समझी योजना पर अमल करने के लिये तैयार था। अतः जैसे ही त्रिवेणी वापस जाने के लिये घूमा, मैंने एक चतुर और फुर्तीले चीते की तरह छलांग लगाई और त्रिवेणी के सिर पर पहुँच गया। फिर बड़ी फुर्ती से अपना एक हाथ त्रिवेणी की गरदन में इस तरह फँसाया जैसा कुछ देर पहले ड्राइवर की गर्दन पर फँसाया था।

त्रिवेणी अपना संतुलन बरकरार न रख सका। जब वह पीछे की तरफ़ लड़खड़ाया तो उसकी गर्दन पर मेरी पकड़ कमज़ोर पड़ गयी। मगर मैंने जल्दी ही दूसरा पैंतरा बदलकर उसे क़ाबू में कर लिया।

“कमीने!” त्रिवेणी किसी जख्मी शेर की तरह दहाड़ा– “मैं तुझे नर्क में फेंक दूँगा।”

मैंने त्रिवेणी की बात उत्तन देने की बजाय अपना काम और तेज कर दिया। मुझ पर खून सवार था। मुझे नहीं मालूम कि उस वक्त मेरे अंदर इतनी शक्ति कहाँ से आ गयी थी। मैं किसी कदर तिरछा हुआ और फिर जब मैंने उसे झटका देकर घसीटा तो वह इस तरह आ गया कि उसकी कमर मेरी कमर पर थी और उसके दोनों पैर हवा में थे। अपने दोनों हाथों में वह मेरा हाथ थामे हुए स्वयं को बचाने के लिये वह हाथ-पाँव मार रहा था।

दूसरी तरफ़ से मेरी सारी शक्ति उसकी गर्दन पर एकत्रित हो गयी थी। मैं अपना शिकंजा तंग करता जा रहा था। और तंग, और तंग। मुझे पूरा विश्वास था कि अब त्रिवेणी कुछ देर का मेहमान है और उसकी मौत से मैं इस गजबनाक ज़िंदगी से छुटकारा पा लूँगा और मोहिनी को दोबारा प्राप्त कर लूँगा। मोहिनी जिसके बिना मेरी ज़िंदगी अधूरी है।

उसी वजह से मेरी वीरान ज़िंदगी में बहार आई थी और उसी की जुदाई ने मुझे सड़कों पर भीख माँगने के लिये छोड़ दिया था। त्रिवेणी ने उसे मुझसे छीन लिया था मगर त्रिवेणी का खात्मा और ज़िंदगी का सुंदर सपना अब निकट ही था। मेरी मोहिनी मेरे पास आने वाली थी। त्रिवेणी का खौफनाक अंजाम मेरे सामने था।

मेरा मस्तिष्क मोहिनी की कल्पना में मस्त था। उस विचार से मेरे अंदर बला की शक्ति आ गयी थी। मेरा हाथ बराबर त्रिवेणी की गर्दन पर अपना फंदा तंग करता जा रहा था। त्रिवेणी के कंठ से उखड़ी-उखड़ी, घुटी-घुटी आवाज़ें निकल रही थीं। वह बिन जल मछली की तरह हाथ-पाँव मार रहा था।

फिर अचानक उसने उखड़ी-उखड़ी आवाज़ में कहा।

“मो... हि... नी... मो... हिनी... मुझे बचा ले।”

“मोहिनी को भूल जा, भूल जा त्रिवेणी दास।” मैंने ठंडे स्वर में कहा, “वह इस समय शकुंतला के लहू से अपने अस्तित्व को नहला रही होगी और जबतक वह तुम्हारी सहायता को आएगी, तुम मर चुके होगे। तुमने मुझे बहुत सताया है त्रिवेणी। बहुत जुल्म किया है।”

“मोहिनी, मोहिनी!” त्रिवेणी ने घुटे-घुटे स्वर में चिल्लाने की चेष्टा की।

मुझे त्रिवेणी की बेबसी पर रहम करने की बजाय ख़ुशी हो रही थी। उसकी तड़प देखकर मुझे शांति मिल रही थी।

फिर अचानक मुझे ऐसा आभास हुआ मानो मेरे हाथ का फंदा तंग होने की बजाय ढीला पड़ रहा हो। जैसे कोई न दिखने वाली शक्ति मेरे हाथ त्रिवेणी की गर्दन से अलग कर रही हो।

मैं उस अचानक बदल जाने वाली स्थिति पर तिलमिला उठा। मैंने बौखला कर दोबारा अपनी पकड़ मज़बूत करनी चाही तो मुझे यूँ महसूस हुआ जैसे किसी ने मेरे बाज़ू पर खंजर उतार दिया था।

अभी मैं बाज़ू में होने वाले असहनीय कष्ट तथा जलन पर विचार भी न कर पाया था कि मुझे सिर पर नन्हे-नन्हे तीर चुभते हुए महसूस हुए।

“मोहिनी!” मेरे मस्तिष्क में मोहिनी का नाम उभरा तो मुझे झुरझुरी आ गयी। मेरा हाथ मशीनी अंदाज़ में त्रिवेणी की गर्दन से अलग हुआ तो वह किसी कटे हुए वृक्ष के समान कालीन पर ढेर हो गया।
 
मैंने कल्पना में अपने सिर पर नज़र डाली तो भय के कारण मेरा पूरा अस्तित्व काँप उठा। मेरा अनुमान ग़लत साबित नहीं हुआ। मेरे सिर पर मोहिनी का रहस्यमय अस्तित्व मौजूद था। मोहिनी उस समय बड़ी भयानक नज़र आ रही थी। उसका पूरा शरीर लहू में डूबा हुआ था। उसकी आँखें जो कभी मुझे ज़िंदगी की हसीन-तरीन ख़ुशियों का पैगाम दिया करती थीं, उस समय बड़ी खौफनाक नज़र आ रही थीं।

उसके चेहरे पर कठोरता के लक्षण मौजूद थे। उसके बाल पूरी तरह बिखरे हुए थे। उसकी रक्तमय भयानक आँखें मेरे चेहरे पर चुभती जा रही थीं। कुछ क्षणों तक वह मुझे घूरती रही। फिर हिकारत भरे स्वर में संबोधित करती हुई बोली-

“कुँवर राज, मैंने तुम्हें मना किया था कि मेरे आका की ओर कभी ग़लत नज़रों से मत देखना, मगर तुम नहीं माने।”

“मोहिनी, यह सब मैंने तुम्हारे लिये किया!” मैंने बेचैन होकर कहा, “मैं तुम्हारे बिना नहीं रह सकता मोहिनी। मैं तुम्हें दोबारा प्राप्त करना चाहता हूँ।”

“तुम मूर्ख हो। मुझे बताओ, तुमने मेरे आका पर आक्रमण करने की जुर्रत कैसे की ?” मोहिनी ने अपने होंठो पर जमे हुए लहू को जुबान से चाटते हुए पूछा।

“मैं मजबूर था मोहिनी। अब केवल यही एक तरीक़ा रह गया था।” मैंने भावुकता भरे स्वर में कहा– “अब और जिल्लत मुझे मंज़ूर नहीं। या तो अब मैं तुम्हें प्राप्त कर लूँगा या तुम्हारी खातिर जान की बाज़ी लगा दूँगा।”

“तुम बहुत तुच्छ, साधारण से आदमी हो राज।” मोहिनी त्यौरी चढ़ाकर बोली, “तुमने इस समय मुझे छेड़कर अच्छा नहीं किया। तुम्हें बता था कि मैं इस समय शकुंतला के खून से अपने अस्तित्व को नहला रही थी। तुमने मुझे मेरे शिकार से अलग करके बहुत बुरा किया है। तुमने मेरे आका पर कातिलाना हमला करते समय शायद यह सोचा था कि खून की लालच में मुँह मोड़कर मैं यहाँ नहीं आऊँगी। परंतु तुम यह भूल गए थे कि त्रिवेणी मेरा आका है और मैं उसकी दासी हूँ। उसने मुझे प्राप्त करने के लिये कठिन जाप किया। उसके ऊपर जब भी कोई विपदा आएगी, मैं आ जाऊँगी। यदि उसकी पुकार सुनकर मैं न आती तो देवता मुझसे नाराज़ हो जाते और स्वयं मेरा अस्तित्व ख़तरे में पड़ जाता।

“क्या मैंने तुमसे नहीं कहा था कि यदि तुमने मेरे आका की ओर ग़लत नज़रों से देखा तो मैं तुम्हारा अंजाम भयानक बना दूँगी। तुम्हें सब कुछ बता दिया गया था राज।”

मोहिनी की बेवफ़ाई और उसकी बेरुखी देखकर मेरा दिल खून के आँसू रोने लगा। फिर भी मैंने उसके सामने हाथ बाँधकर गिड़गिड़ाते हुए कहा, “मोहिनी, तुम्हारे रहस्यमय अस्तित्व में इंसानी भावनाओं को महसूस करने की कोई शक्ति नहीं है ? यदि तुमको मेरी हालत पर रहम नहीं आता तो मुझे अपने हाथों से मार डालो। मैं उफ भी न करूँगा। तुम्हारे हाथों से जो मौत मुझे नसीब होगी, वह भी मुझे प्यारी होगी।”

“मुझसे किसी भी प्रकार की सहानुभूति की आशा मत करो राज।” मोहिनी का स्वर घृणात्मक था, “तुमने मेरे आका को धोखा दिया है। तुम्हारी सजा मौत भी हो सकती है। परंतु मैं तुम्हें केवल एक ऐसी सजा दूँगी जिसे तुम सदा याद रखोगे। और फिर कभी मोहिनी के आका को किसी भी प्रकार की हानि देने का साहस नहीं कर सकोगे।”

मैं गुम सा खड़ा मोहिनी को आश्चर्य की मूरत बना देखता रहा। उस समय मोहिनी की आँखों में मेरे लिये सहानुभूति का कोई भाव न था। वह गैजो ग़ज़ब की आलम में मेरे सिर पर खड़ी मुझे खूँखार नज़रों से देखे जा रही थी। उसके पंजों की चुभन मेरे सिर की त्वचा में तीव्र होती जा रही थी।

कुछ क्षणों तक वह उसी अंदाज़ में मुझे तकती रही, फिर गुर्राते स्वर में बोली- “कुँवर राज, तुम अपना एक हाथ पहले ही खो चुके हो! अब मैं तुम्हें तुम्हारी एक आँख से वंचित कर दूँगी। समझे ? मैं तुम्हारी एक आँख की रोशनी छीन लूँगी। यह कम से कम सजा है जो तुम्हें दी सकती है।”

“नहीं मोहिनी, नहीं...इ...न्का!” मैं गिड़गिड़ाने लगा, “मेरी ओर गौर से देखो मोहिनी। यह मैं हूँ। मेरा नाम राज है। मैंने तुम्हारी ख़ातिर न जाने कितने बेगुनाहों का खून बहाया है। क्या तुम्हें मेरे ऊपर तनिक भी दया नहीं आती ? मैं तुम्हारे लिये सब कुछ लुटा चुका हूँ।”

मैंने बहुत कुछ कहा। बीते हुए दिनों को याद दिलाया। मैंने विनती की, परंतु मोहिनी नफ़रत से बोली-

“राज बीते दिनों को भूल जाओ! मैं एक दासी हूँ और दासियाँ केवल आका की होती है और किसी को प्रेम भरी दृष्टि से देखना पाप समझती हैं। मैं तुम्हें यह दंड देकर भविष्य के लिये सावधान कर देना चाहती हूँ कि तुम मेरे आका से सदा वफ़ादार रहो। वरना...!”

“मोहिनी, तुम मुझे एक बार में जान से मार क्यों नहीं डालती ?” मैंने मोहिनी की बात बीच में उचकते हुए कहा तो वह मुँह बनाकर बोली-

“वे बहादुर होते हैं राज, जो केवल एक बार मरते हैं। तुम कायर, मूर्ख हो। ऐसे लोग तो हर दिन जीते-मरते हैं।”

मैं हाथ जोड़कर मोहिनी के सामने प्रार्थना करता रहा। परंतु उस पर मेरी किसी बात का कोई प्रभाव नहीं हुआ। उसके घृणात्मक स्वर में और तेजी आ गयी। वह सिर से रेंगकर किसी छिपकली की तरह मेरे कंधे पर आ गयी और जैसे छिपकली खड़ी होती है उसी तरह अपनी दुम पर खड़ी हो गयी। मुझ में इतनी शक्ति नहीं थी कि मैं उसे अपने कंधे से झटक देता। उसकी भयानक नज़रों में प्रतिशोध की ज्वाला भड़क रही थी। फिर उसने अपना नाज़ुक हाथ उठाया। उसकी उँगलियों के नाखून नुक़िले खंजर की तरह थे। उसका हाथ धीरे-धीरे मेरी सीधी आँख के निकट आता रहा। मैं उस रहस्यमय तथा आश्चर्यजनक दृश्य को किसी ख़ामोश दर्शक की तरह देखता रहा।
 
उसकी उँगलियाँ और नाखून धीरे-धीरे बड़े होते गए। मुझे अपना खून जमता हुआ सा महसूस हो रहा था। परंतु मैं कुछ भी करने में असमर्थ था।

न जाने कौन सी अनदेखी शक्ति थी जिसने मेरे मनोमस्तिष्क को जकड़कर सुन्न कर दिया था। फिर उस समय अपनी मर्मान्तक चीख को सहन न कर सका जब मैंने अपने सिर पर कोई चट्टान सी गिरते हुए महसूस किया। यह मोहिनी के बढ़े हुए हाथ का प्रहार था। मुझे अत्यंत तीव्र वेदना के साथ ऐसा लगा जैसे मेरी आँख उबल पड़ी हो। उसके बाद मेरे मस्तिष्क ने मेरा साथ छोड़ दिया। मुझे बस इतना याद है कि मैं लुढ़कता हुआ नीचे की ओर झुकता चला गया।

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मुझे याद नहीं कि कितने दिनों तक मैं बेहोश रहा। बहरहाल मुझे इतना याद है कि जब मेरा मस्तिष्क जागा तो मैं अस्पताल के एक बेड पर पड़ा हुआ था। एक आँख पर पट्टी बँधी हुई थी। जब मेरी आँख खुली तो मेरे सामने धुँधले से दृश्य नज़र आए। मैंने घबराकर अपनी आँख पर हाथ रखा। क्या वास्तव में मेरी एक आँख जाती रही ?

मैंने पागलों की सी दशा में दूसरी आँख की पट्टियों को नोचना शुरू कर दिया। मेरे इस पागलपन को देखकर सफ़ेद लिबास पहले एक खूबसूरत नर्स मेरे सिरहाने आई और मेरे हाथ को कोमलता से रोकते हुए मीठे स्वर में बोली-

“नहीं, नहीं, मिस्टर राज! ऐसा मत कीजिए। भगवान का शुक्र है कि आप होश में आ गए। डॉक्टरों ने आपके जीवन के लिये जी-जान से कोशिश की है। निस्संदेह आपको दूसरा जीवन मिला है। अब हम आपसे मिठाई खाएँगे। वास्तव में बड़ी ख़तरनाक दुर्घटना थी।

मैंने नर्स की बात का उत्तर देने की बजाय अपना होंठ दाँतों तले भींच लिया। मैं अपना दिल मारकर रह गया। मेरी एक आँख जाती रही। नर्स मुझे नये जीवन की खुशखबरी देती रही। काश, वह मेरे मरने की घोषणा करती। मोहिनी ने मेरे एक आँख की रोशनी छीन ली। मोहिनी ने मेरा हाथ मुझसे छीन लिया। सब कुछ मेरे पास से चला गया। अब यह नर्स मुझे ज़िंदगी के ताने दे रही है। मेरा परिहास उड़ा रही है। मुझसे यह सहन न हो सका। मेरी आँखों में खून के आँसू आ गए। रहम दिल नर्स को कदाचित मुझ पर तरस आ गया। वह अपने रुमाल से मेरा मुँह पोंछने लगी।

“मिस्टर राज, दिल छोटा न कीजिए! मुझे दुख है। आप एक आँख से मरहूम हो गए। मगर आपकी दूसरी आँख तो बच गयी। यही बहुत है। आपका जीवन बच गया। भगवान का शुक्र अदा कीजिए। एक आँख ही सही, आप इससे कुछ देख तो सकेंगे।”

“नर्स!” मेरे मुँह से कठिनाई से निकला। उसके प्रेम भरे स्वर से मुझे डॉली याद आ गयी। काश, वह इस समय मेरे पास होती। मेरा तो कोई भी न रहा। नर्स के उस अंदाज़ पर मेरे सहन की सीमा टूट गयी। मैं बहुत देर तक हिचकियों में रोता रहा।

नर्स मेरी आवाज़ से बहुत प्रभावित हुई। वह एक मासूम और दुखी सी लड़की थी। शायद उस पर भी कुछ ग़म टूटे थे।

जब मैं अपने दिल का गुबार निकाल चुका तो मैंने उससे दबी जुबान में पूछा- “मुझे यहाँ कौन लाया था ?”

“त्रिवेणी जी!” नर्स ने न जाने क्यों लजीले स्वर में दृष्टि झुकाते हुए कहा– “बड़े अच्छे आदमी हैं। आपके इलाज पर उन्होंने पानी की तरह पैसा बहाया है। उन्हें आपसे बहुत स्नेह है।”

मैंने त्रिवेणी का नाम सुना तो घृणा से अपना मुँह दूसरी ओर मोड़ लिया। नर्स मुझे सांत्वना देती हुई चली गयी तो मैं त्रिवेणी के विषय में सोचने लगा। एक बार वह मुझे पुलिस के चंगुल से भी मुक्त करा चुका था और अब वह मुझे फिर से जीवित रखने की चेष्टा कर रहा है। आख़िर क्यों ?

वह मुझसे क्या काम लेना चाहता है ? क्या उसे यह पता नहीं कि मुझे जब भी अवसर मिला, मैं उसे जान से मार डालूँगा। वह मुझपर तरस क्यों खा रहा है। क्या मोहिनी ने उससे मेरी सिफ़ारिश की होगी। मगर क्यों ?

मेरा मस्तिष्क उन गुत्थियों को सुलझाने की असफल चेष्टा करता रहा। मैं किसी अंतिम निर्णय तक न पहुँच सका। फिर भी मैंने अपने तौर पर यह तय कर लिया था कि मैं त्रिवेणी को मौत की घाट उतारने की कोशिश में लगा रहूँगा। या स्वयं अपने हाथों से अपनी ज़िंदगी खत्म कर दूँगा।

मेरे लिये अब इस दुनिया में क्या कोशिश बाकी रह गयी थी। और फिर जिस व्यक्ति ने मरने की ठान ली हो उसके आगे खतरों का क्या महत्व है।

होश में आने के बाद एक सप्ताह तक मैं अस्पताल में रहा। उस बीच ड्यूटी पर तैनात नर्स और दूसरे डॉक्टर मुझसे बड़े स्नेहपूर्वक तथा प्रेम से पेश आते थे। परंतु अभी तक मैंने त्रिवेणी को एक बार भी नहीं देखा था।

संभव है वह उस समय आता हो जब मैं सो रहा होता हूँ। मैंने नर्स से भी उसके बारे में पूछना उचित नहीं समझा। यदि वह कभी स्वयं त्रिवेणी का ज़िक्र करती तो मैं बड़ी चतुराई से बात बना देता।

चौथे दिन शाम की चाय पीने के बाद नर्स की दी हुई पत्रिका का पृष्ठ पलट रहा था कि दरवाज़े पर किसी के क़दमों की आहट सुनाई दी। मैंने यह सोचकर की नर्स दवा पिलाने आई होगी उस ओर कोई ध्यान नहीं दिया। परंतु दूसरे ही पल जब त्रिवेणी की आवाज़ मेरे कानों से टकराई तो मैं चौंके बिना न रह सका।

वह मेरे निकट खड़ा पूछ रहा था- “अब तुम्हारा हाल-चाल कैसा है राज ? मेरा विचार है कि अब तुम्हारा स्वास्थ्य ठीक है।”

मैंने त्रिवेणी पर नज़र डाली और उसे अपनी ओर कड़ी दृष्टि से घूरते हुए देख मुझे बिस्तर पर लेटना भारी हो गया। काश, मेरे वश में होता तो उसी समय उठकर त्रिवेणी दास को सदा के लिये समाप्त कर देता।

मैंने त्रिवेणी के प्रश्न का उत्तर नहीं दिया तो वह दोबारा जहरीले स्वर में बोला- “कुँवर साहब, आपको अस्पताल में कोई कष्ट इत्यादि तो नहीं हुआ ?”

मैं इस बार भी त्रिवेणी की बात को खून के घूँट पीकर खाली छोड़ दिया।

“क्या बात है कुँवर साहब, आप बड़े ख़ामोश है ? जवाब दीजिए न! ऐसी भी क्या नाराजगी।”

त्रिवेणी के इस व्यंग्य को मैं सहन न कर सका। मैंने उसकी आँखों से आँखें चार करते हुए खूँखार स्वर में पूछा- “त्रिवेणी, आख़िर तुम मुझसे चाहते क्या हो ?”

“इस समय तो मैं आपकी कुशलता और भगवान से नेक चाहता हूँ।”
 
त्रिवेणी मुझ पर शब्दों के खंजर चलाते हुए आगे बोला- “परमेश्वर की बड़ी कृपा है जो आपकी एक आँख बच गयी।”

“त्रिवेणी!” मैंने पागल होते हुए कहा, “तुम राजष्य के वेश में राक्षस हो।”

“मिस्टर राज, सहने की भी एक सीमा होती है!” अचानक त्रिवेणी के चेहरे के तेवर कठोर हो गए। वह मुझे नफ़रत से घूरकर बोला, “हाथ और आँख चला गया है। अब अपनी एक टाँग भी कटाना चाहते हो ? सोच लो, अब इसका नम्बर है।”

“परिस्थितियों ने मुझे बेबस ज़रूर कर दिया है त्रिवेणी दास, लेकिन इतना याद रखो कि मेरे भीतर थोड़ी सी गैरत ज़रूर है। मैं तुम्हारा सबसे बड़ा दुश्मन हूँ। और जब भी मुझे अवसर मिलेगा मैं तुम्हारे अस्तित्व को मिट्टी में मिला दूँगा। तुम्हारे साथ मोहिनी है त्रिवेणी। यह मत भूलो, तुम साथ कितनी शक्ति से काम लो परंतु मुझे कभी अपना ग़ुलाम नहीं बना सकते। मैं कफन में लिपटी हुई तुम्हारी लाश देखना चाहता हूँ। समझे ?”

मैंने निर्णयात्मक स्वर में कड़ा उत्तर दिया तो त्रिवेणी मुझे यूँ घूरने लगा जैसे उसे मेरी मानसिक स्थिति पर संदेह हो रहा हो। कुछ देर उसकी यही स्थिति रही फिर बोला- “राज, जरा धीरज रखो, शांति से काम लो! इस बात को मन से निकाल फेंको कि तुम मुझसे मुक्ति पा सकोगे। अब तो हमारा साथ जन्म-जन्म का है। जब तक मैं न चाहूँगा, तुम मर भी नहीं सकते। आने वाला समय बताएगा कि मैं कितनी महान शक्ति का स्वामी हो।”

“मोहिनी को बीच से हटा दो। फिर मैं तुम्हें बता सकता हूँ कि कौन कितना महान है।” मैंने भी बिगड़े हुए स्वर में उत्तर दिया, “मोहिनी की शक्ति के साथ मेरा सामना करते हो, फिर भी यह ध्यान रखो कि जब इंसान को ज़िंदगी से कोई लगाव न रहे तो फिर उसे मौत की भी कोई चिंता नहीं रहती। मुझे मोहिनी की भी परवाह नहीं है।”

“यह हॉस्पिटल है ठाकुर साहब! मैं तुमसे अपनी कोठी पर बात करूँगा।” त्रिवेणी ने घृणा से कहा।

“मैं अब तुम्हारी कोठी पर थूकना भी पसंद नहीं करूँगा।”

त्रिवेणी के चेहरे पर खून की लाली फैलकर गहरी होती चली गयी। उसके भाव बता रहे थे कि वह उस समय अत्यंत क्रोध की स्थिति में है। कुछ समय तक वह इसी हालत में फँसा रहा फिर दाँत भींचकर बोला- “मैं देखूँगा तुम्हें कि तुम कितने मर्द हो।”

फिर इससे पहले कि मैं उसकी बात का कोई उत्तर देता, वह मुझपर घृणा भरी दृष्टि डालकर कमरे से बाहर चला गया।

उसके जाने के बाद मैं भी काफ़ी देर तक उसके बारे में सोचता रहा। फिर मैंने अपने मस्तिष्क को झटककर पत्रिका को दोबारा उठायी और उसके पृष्ठ पलटने लगा।

आठ बजे के बाद दूसरी ड्यूटी वाली नर्स आ गयी तो मैंने उससे पता किया कि मुझे कब तक अस्पताल से मुक्ति मिलेगी। नर्स पता करने चली गयी। कुछ देर बाद उसने मुझे वापस आकर बताया कि मेरी छुट्टी प्रातः काल कर दी जाएगी। मैंने नर्स का उत्तर सुनकर ठंडी आह भरी तो उसने आश्चर्य से पूछा- “क्यों, क्या आपको यहाँ से जाने की ख़ुशी नहीं है ?”

“तुम इन बातों को न समझ सकोगी सिस्टर। प्लीज मुझे अकेला छोड़ दो।”

नर्स चली गयी तो मेरी बेचैनी और बढ़ गयी। मैं सोचने लगा कि अस्पताल से रुखसत होकर मैं कहाँ जाऊँगा। मेरे पास सिर छिपाने का कोई ठिकाना नहीं था। त्रिवेणी के पास जाने से पहले तो मेरे गुजारे का रास्ता भीख थी। मैं अब भी भीख माँगकर जीवन व्यतीत करने की शक्ति रखता था। परंतु मेरी पहली इच्छा यह थी कि मैं पूना से तुरंत कहीं और चला जाऊँ और कुछ दिन बाहर रहकर अपने-आप को सुधारने की कोशिश करूँ और उसके बाद फिर त्रिवेणी की टक्कर में आ जाऊँ। मेरे विचारों के चक्र हर पल बदलते रहे। कभी मैं सोचता कि क्यों न मोहिनी की कल्पना को सदा के लिये मस्तिष्क से निकाल फेंकूँ। कभी मेरा दिल मुझे सुझाव देता कि मैं अस्पताल से थोड़ा सा ज़हर चुराकर पी लूँ और मीठी नींद सो जाऊँ।

मेरी आत्मा मुझे धिक्कारती तथा यह विश्वास दिलाने की चेष्टा करती कि मैं औरत नहीं, मर्द हूँ- मर्द। जो पत्थर की चट्टानों से भी टकरा जाने की शक्ति रखता है। कभी मेरा मस्तिष्क मुझे सुझाव देता- ‘राज, बुद्धि और चतुराई से काम लिये बिना तुम कुछ न कर सकोगे! यदि कुछ करना चाहते हो तो तीन बातों का ध्यान रखो- तुम्हारी नज़र बाज़ जैसी होनी चाहिए ताकि तुम ज़मीन की गहराइयों का सीना भी चाक कर सको। तुम्हारा उत्साह किसी शेर की तरह ऊँचा होना चाहिए और सोचने का अंदाज़ लोमड़ियों की तरह तेज होना आवश्यक है। इन बातों के बिना तुम सफल न हो सकोगे।’
 
मैंने मस्तिष्क के उस सुझाव को स्वीकार कर लिया। मेरे लिये यह आवश्यक था कि मैं अब एक-एक कदम फूँक-फूँक कर उठाऊँ। परंतु एक बात मुझे अभी भी परेशान किए दे रही थी कि मैं अस्पताल से निकलकर कहाँ जाऊँ। मैं बहुत देर तक इसी बात पर गौर करता रहा। परंतु कोई सही निर्णय नहीं कर सका। थके हुए मस्तिष्क को धोखा देने की ख़ातिर मैंने सिरहाने रखी पत्रिका को उठाकर उसे यूँ ही उलटना-पलटना शुरू कर दिया। मेरा दिल पत्रिका में नहीं लग रहा था। अपनी कहानी मुझे याद आ रही थी। मेरा सम्पूर्ण अतीत मेरे सामने था। मेरे सामने मेरे ऊपर गुजरी हुई घटनाओं की एक भयानक श्रृंखला थी। मैंने अतीत में झाँककर देखा तो मुझे झुरझुरी आ गयी। मैं किन अजीब-ओ-ग़रीब घटनाओं से होता हुआ यहाँ तक आया था। कुछ देर पहले मैं अपनी नज़र को बाज़ की नज़र, अपने उत्साह का शेर के उत्साह और अपने दिमाग़ को लोमड़ी के दिमाग़ का उदाहरण देकर ज़िंदा रहने का कारण पैदा कर रहा था। परंतु मुझे पता था कि असाधारण शक्तियों के सामने मेरा यह कदम बेकार है। मैं अपने आप को धोखा दे रहा हूँ। मोहिनी मेरे पास आने से रही। मैं मर क्यों न जाऊँ। हाँ, अब यही उचित है कि मैं मर जाऊँ।

मगर मरना कितना कठिन है, इसका अनुमान मुझे पहली बार हुआ। जब अस्पताल में रोशनियाँ कम हो गयी और नर्स मुझे गुड नाइट कहकर चली गयी तो मैंने स्वयं को मौत के लिये अमादा करना चाहा। मैंने अपने कमरे की खिड़की से बाहर झाँककर देखा। बाहर कारीडोर में दूर तक सन्नाटा था। मैंने अपने ऊपर चादर डाली और धीरे से दरवाज़ा खोलकर चोरों के समान उसे बंद करता हुआ बाहर आ गया। मुझे मालूम हुआ था कि दवाओं का कमरा कौन सा है। परंतु अस्पताल में उसे तलाश करना कोई कठिन काम नहीं था। मैंने तीन-चार कमरे धीरे से पार कर लिये परंतु छठे या सातवें कमरे के दरवाज़े पर अचानक जैसे मेरे कदम मन-मन भर के हो गए। मैं ठिठककर रुक गया।

“कौन है ?” एक डॉक्टर ने मुझे आवाज़ दी, “कहाँ जा रहे हो ?”

“म... मैं एक मरीज! कमरे नम्बर एक का मरीज। श्रीमान जी राज।” मैंने घिघियाते हुए उत्तर दिया जैसे मुझे चोरी करते हुए पकड़ लिया गया हो।

“कुँवर राज ठाकुर!” डॉक्टर ने मुस्कराते हुए कहा, “क्या बात है ठाकुर साहब ? कुछ कष्ट है ?”

“जी, जी...! डाक्टर साहब, मेरे पेट में अचानक दर्द उठा। नर्स सामने नहीं थी इसलिए मैं कमरे से बाहर चला आया। डॉक्टर साहब, कृपा करके मुझे कोई दवाई दे दें। दर्द के कारण मैं मरा जा रहा हूँ।” मैं स्वयं को संभालते हुए कहा।

“यह सिस्टर कहाँ गयी। ओफ़्फ, यह लोग सो जाती है!” डॉक्टर बड़बड़ाते हुए बोला, “मेरे साथ आओ। क्या कष्ट अधिक है ? ओह, खैर इधर आओ!”

उसका नाम डॉक्टर कुलकर्णी था। मुझे पता था कि वह एक नेक आदमी है।

डॉक्टर ने सामने के कमरे की ओर संकेत किया। मैं उसके साथ कमरे में प्रविष्ट हो गया। मैंने भयभीत दृष्टि से कमरे का निरीक्षण किया। भाग्यवश मेरी मनचाही दवा वहाँ मौजूद थी। वह दिख गयी। अब केवल इतनी सी बात रह जाती है कि मैं डॉक्टर की नज़रें बचाकर किसी प्रकार उसे प्राप्त कर लूँ।

डॉक्टर ने एक बड़ी मेज़ पर लिटाकर मेरी हालत को देखा वह मुझसे दर्द के विषय में पूछताछ करता रहा और मैं इधर-उधर का जवाब देता रहा। मैं उसे उत्तर तो दे रहा था परंतु मेरी दृष्टि दवाइयों के आलमारी की ओर थी। अंत में डॉक्टर ने मर्ज़ के कारण को समझते हुए मुझे एक मिक्चर बनाकर पिला दिया। मैंने बिना हिचक के उसे पी लिया। मैं तो उससे अधिक ख़तरनाक चीज़ पीने वाला था फिर यह क्या चीज़ थी।

जब डॉक्टर कुलकर्णी हाथ धोने वॉश बेसिन की ओर मुड़ा तो मैंने उसकी आलमारी से ज़हर की शीशी अत्यंत तीव्रता और कुशलता से उठाई और उसे चादर में छिपाकर डॉक्टर को शुभरात्रि कहा और वहाँ से बाहर आ गया।

मुझे खूब याद है कि अपने कमरे में आकर मुझे ऐसा महसूस हो रहा था मानो मैंने एक पूरी फ़ौज़ को पराजित कर दिया हो। मैंने चैन के साथ दवा की शीशी निकाली और खिड़की को बंद किया।

बड़े बल्ब को ऑफ़ कर दिया। एक पल के लिये मुझे बहुत सी चीज़ें याद आईं। मेरा बचपन, मेरी ग़रीब माँ, डॉली, मोहिनी, त्रिवेणी तथा मेरा पूरा जीवन कुछ क्षणों में मेरे सामने से गुज़र गया।

मैंने अपने पलंग के नीचे रखी हुई आलमारी से दर्पण निकाला। अपनी सूरत देखी। मेरे चेहरे पर बहुत दुख था। मैं स्वयं ही दर्पण में मुस्कुरा दिया- ‘कुँवर राज!’ मैंने दर्पण में स्वयं को संबोधित किया, ‘लो, लो! अब तुम्हारा अंत निकट है। बहुत दुनिया देख ली। मौत तुम्हें एक दिन ज़रूर आनी थी। चलो कुछ दिन पहले सही। अब हँसकर मौत का जाम पियो।’

अपने प्रतिबिंब से बात करके मैंने एक हल्का सा कहकहा लगाया। कभी मेरा चेहरा प्रसन्नता से खिल उठता तो कभी मैं उदास हो जाता। कभी मैंने घृणा से खिड़की के दरवाज़ों को देखा। फिर मुझे अचानक मेरी चिता की अग्नि का भय छा गया। उसमें उठने वाले शोलों की याद आ गयी। मैंने ज़हर की शीशी से स्वयं को दूर किया।
 
मगर यह शोले, यह चिता की अग्नि, यह सब तो व्यक्ति का भाग्य है। उसमें क्यों घबराना। उससे कैसा भय ? नहीं, नहीं, मेरे लिये मौत, सिर्फ़ मौत ही ठीक है।

मैंने अंतिम बार अपनी सूरत दर्पण में देखी। कुँवर राज का भयनुमा चेहरा मेरे सामने था। फिर मैंने शीशी का ढक्कन खोल दिया।

मेरी मौत के बाद क्या होगा। अस्पताल वालों से पूछताछ, त्रिवेणी से पूछताछ। वाह, क्या मज़ा आएगा! त्रिवेणी से पूछताछ होगी जब मैं न हुँगा। मैं तो मर जाऊँगा, ठीक है। मुझे मर ही जाना चाहिए।

मगर मैं एक प्रकार से त्रिवेणी को फँसा सकता हूँ। अचानक एक विचार मेरे मस्तिष्क में आँधी की तरह आया। मेरे पास समय नहीं था। बाहर जाकर मैंने डॉक्टर कुलकर्णी से पेन प्राप्त किया और लिखने बैठ गया।

त्रिवेणी के काले कारनामे। मोहिनी के अस्तित्व के संबंध में पूरा विवरण और अपनी आत्महत्या का कारण। रात के दो बजे तक मुझे जो याद आया, उदाहरण के साथ लिखता रहा। ताकि पुलिस पूरी तरह त्रिवेणी को अपने कब्जे में ले ले। मैं लिखता रहा, मोहिनी के रहस्यमय अस्तित्व की आश्चर्यजनक घटनाएँ और वह सब कुछ जो मैं उस छोटे से समय में लिख सकता था। जब मैं एक विस्तारपूर्वक लिखा पत्र संपूर्ण कर लिया तो उस पर एक नज़र डालकर संतोष भरी साँस खींची। उसे अपने सिरहाने रखा और ज़हर की शीशी अपने होंठो से लगा ली।

परंतु ठीक उस समय जब मैं ज़हर की शीशी अपने कंठ में उड़ेलकर इस संसार से संबंध तोड़ना चाहता था। मेरे सिर पर एक धमाका हुआ। मोहिनी के जाने-पहचाने पंजों की चुभन तेज हो गयी। शीशी मेरे हाथ से गिरकर फर्श पर फैल गयी। मैंने चीखना चाहा, परंतु मेरी आवाज़ मेरे कंठ में दब कर रह गयी।

मैंने अत्यंत कठिनाइयों के बाद कहा- “मोहिनी, मुझे मरने दो! मैं मौत चाहता हूँ।”

उत्तर में मोहिनी ने मेरे सिर को अपने पंजों से इतनी तेजी से नोचा कि मैं अपने हवाश खो बैठा। अंतिम शब्द जो मैं सुन सका, वह यह थे-

मोहिनी कह रही थी- “कुँवर राज ठाकुर, तुम आका की इच्छा के विरुद्ध मर भी नहीं सकते!”

दूसरी सुबह मेरी आँख खुली तो सबसे पहले मेरी नज़र जिस चेहरे पर पड़ी वह त्रिवेणी दास था। त्रिवेणी को देखते ही मैंने यह सोचा कि कदाचित वह अस्पताल से मुझे अपने घर ले जाने आया है।

बड़ी सफ़ाई से मैंने ठंडे स्वर में कहा- “त्रिवेणी जी, तुमने यहाँ लाकर बेकार कष्ट किया। मैं कल ही तुमसे कह चुका था कि अब तुम्हारे साथ नहीं रहूँगा।”

“और मैंने भी कहा था कि मैं देखूँगा कि तुम कितने मर्द हो।” त्रिवेणी ने क्रोध भरे स्वर में उत्तर दिया। फिर घृणा से कहा, “तुम मेरे एक साधारण से दास की हैसियत से दोबारा मेरे क़दमों में पड़े हो। तुमने स्वयं अस्पताल के स्टाफ में यह प्रार्थना की थी कि तुम्हें मेरे आलीशान कोठी तक पहुँचा दिया जाए।”

“मोहिनी!” मेरे मस्तिष्क में एक बार फिर मोहिनी का भयानक अस्तित्व उभर आया। मोहिनी जो रहस्यमय तथा आश्चर्यजनक शक्तियों की स्वामी है। जिसके लिये किसी भी असंभव को संभव बना देना बहुत साफ बात है। निस्संदेह मोहिनी ने ही मेरे सिर पर सवार होकर मुझे वह बात कहने पर उकसाया होगा।

मेरी स्थिति उस समय किसी शिकारी से जुदा न थी जिसने शिकार को फाँसने के लिये कोई जाल बिछाया हो और अंधेरे में स्वयं ही उसमें फँस गया हो। मैं दृष्टि घूमाकर कमरे का निरीक्षण किया तो त्रिवेणी की बात की पुष्टि हो गयी। मैं उस समय उसी की कोठी के सर्वेंट क्वार्टर में पड़ा हुआ था। उस समय अपनी बेबसी का आभास मुझे इतना अधिक हुआ कि अकस्मातिक तौर पर मेरी आँखें नम हो गईं।

“क्या सोच रहे हो कुँवर साहब ? क्या फिर मुझे मारने का कोई ख़तरनाक षड़यंत्र बना रहे हो ?”

त्रिवेणी ने मेरा परिहास उड़ाते हुए कहाँ जिसके उत्तर में मैं कुछ न कह सका।

“त्रिवेणी, क्या यह संभव नहीं है कि हम दोनों सदा के लिये एक-दूसरे के रास्ते से अलग हो जाए ?”

“यह ध्यान तुम्हें बहुत देर से आया कुँवर साहब। वैसे अब मुझे विश्वास है कि अब तुम ऐसी स्थिति में पहुँच चुके हो जहाँ लोग तुम्हें भिक्षा देने से मुँह नहीं मोड़ेंगे। कैसा रहे यदि तुम लंगड़े भी हो जाओ ? हर व्यक्ति तुम पर दया करने के लिये तैयार हो जाएगा।”

“त्रिवेणी तुम...”

“त्रिवेणी नहीं, आका या मालिक कहो टुन्टे, काने!” त्रिवेणी गरजकर बोला– “अब अगर तुमने फिर गुस्ताख़ी की तो जुबान खींच लूँगा।”
 
“यह ध्यान तुम्हें बहुत देर से आया कुँवर साहब। वैसे अब मुझे विश्वास है कि अब तुम ऐसी स्थिति में पहुँच चुके हो जहाँ लोग तुम्हें भिक्षा देने से मुँह नहीं मोड़ेंगे। कैसा रहे यदि तुम लंगड़े भी हो जाओ ? हर व्यक्ति तुम पर दया करने के लिये तैयार हो जाएगा।”

“त्रिवेणी तुम...”

“त्रिवेणी नहीं, आका या मालिक कहो टुन्टे, काने!” त्रिवेणी गरजकर बोला– “अब अगर तुमने फिर गुस्ताख़ी की तो जुबान खींच लूँगा।”

त्रिवेणी जी भर कर मुझे बुरा-भला कहता रहा और मै हृदय पर पत्थर रखे सब कुछ सुनता रहा। त्रिवेणी चला गया तो मेरी आँखों के पैमाने छलक गए। मैं उस दिन दहाड़े मार-मार रोया। परंतु किसी को मेरी खबर नहीं थी।

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मुझे त्रिवेणी की कोठी पर आए अट्ठाइस दिन गुज़र चुके थे। इस बीच मेरा स्वास्थ्य भी काफ़ी ठीक हो चुका था। मुझ पर केवल कोठी के बाहर जाने के अलावा और किसी बात की पाबंदी नहीं थी। परंतु मैं सारे दिन अपने कमरे में छिपकर बैठा रहता। शाम को केवल कुछ मिनटों के लिये बाहर निकलकर टहलता फिर अपने कमरे में आकर बंद हो जाता।

एक आँख खंडहर के समान परिवर्तित हो जाने के कारण मेरी सूरत बेहद बुरी तथा भयानक हो गयी थी। दर्पण में अपना प्रतिबिंब देख लेता तो डर जाता। कहने का मतलब यह कि मैंने अपने आपको परिस्थितियों के हवाले कर दिया था। बस किसी न किसी प्रकार जीवन के दिन व्यतीत हो रहे थे।

त्रिवेणी के नौकरों को मेरी हालत पर दुख अवश्य था पर इतना साहस किस में था जो खुलकर उसे प्रकट करता। त्रिवेणी के कठोर व्यवहार का अनुमान सबको ही था।

अक्सर मैं अकेला बैठा अपनी हालत पर गौर करता तो दिल काँपकर रह जाता। अतीत याद आता तो मैं रो पड़ता। विशेष रूप से उन दिनों मुझे डॉली बहुत याद आती थी। एक दिन शाम को मैं अपने कमरे में अकेला बैठा उन्हीं विचारों में गुम था कि पीटर नामक व्यक्ति नौकर भीतर आकर कहा- “तुम्हें मालिक कोठी में बुला रहे हैं।”

मैं पीटर को कोई उत्तर दिए बिना खामोशी से उठा और इस ख़्याल से कि देखे अब किस्मत क्या गुल खिलाती है, कमरे से बाहर आ गया।

लॉन पार करके कोठी के भीतर दाख़िल हुआ। अपने विचारों में खोया हुआ त्रिवेणी के बेडरूम तक पहुँचकर मैंने धीरे से दस्तक दी। मुझे विश्वास था कि कोई हंगामा अवश्य होने वाला है।

“कौन ?” भीतर से त्रिवेणी की आवाज़ उभरी।

“सरकार, मैं हूँ! राज।” मैंने कहा।

“भीतर आ जाओ।”

मैंने काँपते हुए हाथों से दरवाज़े का हैंडिल घुमाया और भीतर प्रविष्ट हो गया। परंतु दूसरे ही क्षण मैं चकराकर रह गया। मुझे कमरे की हर वस्तु घूमती हुई नज़र आ रही थी। मैं फटी-फटी दृष्टि से उस औरत को देख रहा था जो त्रिवेणी की गर्दन में बाहें डाले बैठी थी। सामने ग़ोल मेज़ पर शराब से भरे हुए जाम और बोतलें रखी थी। त्रिवेणी के होंठो पर शैतानी मुस्कराहट खेल रही थी। परंतु मेरी दृष्टि का केंद्र तो वह स्त्री थी जो अर्ध नग्न लिबास में त्रिवेणी से लिपटी बैठी उसके अस्तित्व में घुल जाने की चेष्टा कर रही थी। वह औरत रजनी थी। रजनी जो कभी मेरी चहेती रह चुकी थी और जिसने डॉली को मुझसे छुड़ाया था। उसने मेरे साथ एक घृणात्मक नाटक खेला था। वह इस समय मेरे सबसे बड़े शत्रु के आगोश में पड़ी थी। खैर, यह तो उसका काम था। परंतु उसे न जाने क्यों यहाँ देखकर दुख सा हुआ।

“रजनी, इधर देखो मेरी जान! वह तुम्हारे सामने कौन मौजूद है।” त्रिवेणी ने रजनी से कहा।

रजनी ने पलटकर मेरी ओर देखा तो सहमकर वह त्रिवेणी के कुछ और निकट हो गयी। फिर मुझे गौर से देखते हुए बोली- “मेरा विचार है कि मैं इस बदसूरत व्यक्ति को पहले भी कभी देख चुकी हूँ। क्यों त्रिवेणी डार्लिंग ?”

“इन महाशय का शुभ नाम कुँवर राज सिंह है। कभी वह तुम्हारे ऊपर लट्टू भी रह चुके हैं।” त्रिवेणी ने रजनी से मेरा परिचय कराते हुए विषैले स्वर में कहा। फिर सीधे मुझसे संबोधित होकर बोला, “देखा तुमने रजनी को। हमें बहुत दूर से बुलाया गया है। तुम्हारी पसंद बहुत अच्छी थी।” उसने मस्त आँखों से रजनी की ओर देखकर मुझसे कहा तथा मुझे आदेश दिया, “तुम बाहर ठहरो! मैं अभी तुम्हें एक सेवा का मौका दूँगा। मुझे विश्वास है कि तुम आज उस सेवा को खुशी-खुशी पूरा करोगे।”

मैं समझ चुका था कि त्रिवेणी किस सेवा की ओर संकेत कर रहा है। वह रजनी को रौंदने के बाद मेरे हवाले करने का संकेत कर रहा था। ताकि उसे जान से मारकर उसका खून मोहिनी के अस्तित्व को जीवित रखने के लिये एकत्रित कर सकूँ। त्रिवेणी की बात सुनकर मैं खामोशी से पलटकर बाहर आ गया। जिस समय मैं दरवाज़े से बाहर निकल रहा था, उस समय रजनी की कही हुई एक बात मेरे कानों से टकराई और पिघले हुए शीशे के समान मेरे दिल की गहराइयों में उतरती चली गयी। उसने त्रिवेणी से कहा था- “डार्लिंग, तुमने इस बुरी सूरत वाले को भीतर बुलाकर मेरा मूड ख़राब कर दिया। कैसा मनहूस और भयानक लग रहा था। उफ़्फ़...!”

मैंने बाहर आकर दरवाज़ा बंद कर दिया और कारीडोर में आकर टहलने लगा। मेरा रक्त-प्रवाह और फिर तेज हो रहा था। मैंने तय कर लिया था कि आज मैं रजनी को बड़ी दर्दनाक मौत मारूँगा। मैं बड़ी बेचैनी से उस पल के लिये इच्छुक था जब त्रिवेणी उसे मेरे हवाले करेगा। उसी रजनी के कारण मेरा घर बर्बाद हुआ था। मेरी डॉली मुझसे छूट गयी थी। लगभग दो घंटे बाद त्रिवेणी ने मुझे आवाज़ दी तो मैं लपककर कमरे में प्रविष्ट हो गया। भीतर जो दृश्य मुझे दिखा। वह मेरे जोश के लिये बहुत था। त्रिवेणी सोफ़े पर टेक लगाए हुए बैठा था जबकि रजनी उसके क़दमों के निकट फर्श पर पड़ी उल-जलूल बक रही थी। उसका तार-तार लिबास उसके गुप्तांगों को छिपाने के लिये प्रयाप्त न था।

रजनी की दृष्टि मुझपर पड़ी तो वह भयभीत होने की बजाय पागलों जैसी भाव में बोली- “तुम वही हो न जो कभी मेरे आशिक़ हुआ करते थे। लेकिन आज, आज तुम तुच्छ हो। एकदम तुच्छ और नीच। तुमने एकबार मुझे फँसाया था। अब तुम्हारा अंजाम भयानक है।”

“राज!” त्रिवेणी मुझे संबोधित करके बोला, “क्या आज तुम अपने प्रतिशोध की अग्नि को इसके वक्ष से ठंडा करते हुए ख़ुशी महसूस नहीं करोगे। चलो, उठा ले जाओ इसे।”

रजनी बुरी प्रकार नशे में धुत्त थी परंतु त्रिवेणी की बात सुनकर उसने दृष्टि घुमाकर उसे नफ़रत से घूरा फिर वह लड़खड़ाती हुई उठी। परंतु इससे पहले कि वह त्रिवेणी से कुछ कहती मैंने आगे बढ़कर उसे बालों से पकड़ लिया और उसे घसीटता हुआ बाहर ले आया।

रजनी चीखते हुए से अंदाज़ में मुझे गालियाँ दे रही थी। पर मेरे कान जैसे बहरे हो चुके थे। मैंने उसे बाहर लाकर गाड़ी में ठूँस दिया और ड्राइवर को गाड़ी चलाने को कहा।

इस विचार से कि उसकी आवाज़ गाड़ी के शोर-गुल से बाहर न निकल पाए, मैंने रजनी के मुँह पर अपनी पकड़ मज़बूत कर दी। मेरा ड्राइवर वही था जिसे मैंने एक बार मौत के निकट कर दिया था। अब वह मेरे इशारों का ग़ुलाम था। वह भयभीत व ख़ामोश बैठा था। कदाचित मेरा जल्लादी भाव उस पर हावी हो चुका था।

आधे घंटे बाद गाड़ी एक सुनसान स्थान पर रुकी तो मैंने रजनी को बड़ी बेदर्दी से घसीटकर बाहर निकाला। उसके बाद मैंने जिस जल्लादाना तरीक़े से उसके शरीर पर प्रहार किए, उसकी कल्पना आज भी मेरे शरीर के समस्त रोंगते खड़े कर देती है। उसकी भयानक चीखें आज भी जब मेरे कानों में गूँजती है तो मुझे अपना खून जमता हुआ सा महसूस होने लगता है। वह मेरे सामने जीवन की अंतिम साँसों तक दया की भीख माँगती रही। परंतु मैं उस समय तक उसके शरीर पर खंजर बरसाता रहा जब तक कि उसका शरीर छलनी नहीं हो गया। मेरा अपना तमाम लिबास खून से तर-बतर हो रहा था। मेरी स्थिति पागलों जैसी थी।

रजनी को मौत की घाट उतारने के बाद मैं उस पर घृणात्मक दृष्टि डालता हुआ वापस आ गया। त्रिवेणी की कोठी में आकर मैंने नहा-धोकर कपड़े बदले। उन कपड़ों को आग के हवाले किया जिन पर रजनी के खून के धब्बे मौजूद थे। फिर अपने पलंग पर बेसुध होकर गिर पड़ा। उस रोज़ मुझे अपना मनोमस्तिष्क बड़ा हल्का-हल्का सा महसूस हो रहा था। यूँ जैसे मेरे सिर से कोई भारी बोझ उतर गया हो।

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समय ने मुझे कुछ इस कदर बेबस कर दिया था कि उसके साथ समझौता करने के अतिरिक्त और कोई रास्ता न था। मैंने स्वयं को उसी सांचे में ढाल दिया जिसमें त्रिवेणी चाहता था। लगातार असफलताओं ने मेरे मस्तिष्क को बिल्कुल बेकार कर दिया था। मोहिनी के रहस्यमय अस्तित्व की उपस्थिति में मेरे फरार होने की सारी कोशिशें बेकार साबित होतीं इसलिए मैं त्रिवेणी का ग़ुलाम बना हुआ था।

जब भी त्रिवेणी मुझे कोई हुक्म देता मैं बिना किसी विरोध के उसका पालन करता। इस प्रकार तीन महीने और गुजर गए। इन तीन महीनों में मुझे नजनी के अतिरिक्त ऐसी तीन और युवतियों को ठिकाने लगाना पड़ा जो पहले त्रिवेणी की हवस का निशाना बनी फिर मुझे मोहिनी के अस्तित्व को बरकरार रखने के लिये उन युवतियों का खून करना पड़ा।

पूना में हर महीने होने वाली घटनाओं ने पुलिस के स्टाफ को भी चिंतित कर दिया था। एक-दो वारदात में पुलिस के स्पेशलिस्ट त्रिवेणी तक भी पहुँचे। परंतु उन्हें असफल लौटना पड़ा। मोहिनी की रहस्यमय शक्ति ने त्रिवेणी को हर अवसर पर आश्चर्यजनक तौर से बचा लिया और पुलिस को मजबूरन काग़ज़ात की खानापूरी के लिये किसी बेगुनाह को अंदर करना पड़ा।

मैं जब भी समाचार पत्रों में इस प्रकार के समाचार पढ़ता, खून के घूँट पीकर रह जाता था। जब तक मोहिनी का अस्तित्व त्रिवेणी के कब्जे में था संसार की कोई शक्ति उसका बाल बांका नहीं कर सकती थी। रहा प्रश्न मेरा, तो मैं अपने दिन गिन-गिनकर पूरे कर रहा था। परंतु समय ने कुछ ऐसी करवट ली कि मैं दोबारा मोहिनी को अपने अधिकार में करने के सपने देखने पर मजबूर हो गया।

कुछ दिनों से मैं महसूस कर रहा था कि त्रिवेणी हर समय किसी सोच में गुम रहता है। वह त्रिवेणी जो कभी मुझसे सीधे मुँह बात नहीं करता था अब मुझसे मिलने के लिये नौकरों के क्वार्टर तक आ जाता है। मैं त्रिवेणी से सदा झुकी दृष्टि से मिलता। वैसे भी मैं महसूस कर रहा था कि वह मुझसे कोई विशेष बात करना चाहता है जिसके कारण वह मेरे पास आता था। लेकिन कोई रुकावट ऐसी अवश्य थी जिसके कारण वह मुझसे कुछ कहे बिना वापस चला जाता था। मैं कभी त्रिवेणी से उसकी बेचैनी का कारण पूछने की चेष्टा नहीं की थी।

उन्हीं दिनों एक बार त्रिवेणी ने शोभा नामक सुंदर लड़की को मेरे हवाले किया। मैं सदा के अनुसार उसे एक नए सुनसान स्थान पर ले गया तथा एक संग दिल जल्लाद की तरह उसे ठिकाने लगा दिया। परंतु जब शोभा को मौत के घाट उतारकर मैं वापसी के इरादे से पलटा तो ऐसा महसूस हुआ जैसे मोहिनी मेरे सिर पर आ गयी हो।

मैंने कल्पना की दुनिया में सिर के ऊपर देखा। मेरा अनुमान ग़लत साबित नहीं हुआ। मोहिनी वास्तव में मेरे सिर पर मौजूद थी। प्रकट में वह उस समय अच्छे मूड में नज़र आ रही थी। लेकिन मैंने जानबूझकर उससे कोई बात नहीं की। गर्दन झुकाकर गाड़ी की ओर कदम उठाया तो मोहिनी की केवल रशीली आवाज़ मेरे मस्तिष्क से टकराई।

“राज! अब तुम वास्तव में रास्ते पर आ गए हो। यदि इसी प्रकार आका के संकेत पर चलते रहे तो तुम्हें कोई कष्ट नहीं होगा।”

“तुम्हारा शिकार तुम्हारा इंतज़ार कर रहा है। मोहिनी क्यों अपना समय बर्बाद कर रही हो ? जाओ और शोभा के खून से अपना अस्तित्व तरो-ताज़ा करो। देखो तुम्हारा आका तुम्हारे मेरे सिर पर आ जाने की खबर सुनकर कहीं नाराज़ न हो जाए।”

“राज! मेरा आका नाराज़ नहीं होगा और समझ लो कि मैं उसकी इच्छा के बिना कोई काम नहीं करती। यूँ मैं तुमसे बहुत ख़ुश हूँ कि तुम मेरे आका की बड़ी सेवा कर रहे हो। साथ ही मेरे लिये खून का प्रबंध करते हो। मेरी मानो तो तुम उदास रहने की बजाय हँसा-बोला करो।ख़ुश रहा करो।”

“मैंने खुद को हालात के ऊपर छोड़ दिया है मोहिनी!” मैंने एक ठंडी आह भरकर जवाब दिया, “अच्छा है कि तुम ख़ुश रहने और हँसने-बोलने का सुझाव अपने आका त्रिवेणी दास को दो जो आज कल उदास-उदास और खोया-खोया रहता है। मुझसे इतनी हमदर्दी क्यो ?”

“बहुत अच्छे!” मोहिनी ने मेरी आँखों से आँखें डालकर कहा, “अच्छा, तो अब तुम्हें त्रिवेणी से हमदर्दी भी होती जा रही है।”

“त्रिवेणी को मुझसे अधिक तुम्हारी हमदर्दी की आवश्यकता है।” इस बार मैंने जलकर कहा, “मेरा विचार है तुम आजकल उसके लिये अधिक जानदार लड़कियाँ नहीं एकत्रित कर रही हो।”

“मैं अपने आका के लिये संसार की हर वस्तु एकत्रित कर सकती हूँ राज।” मोहिनी ने गंभीर होते हुए उत्तर दिया, “आजकल इसी चिंता का कारण सुंदर लड़कियाँ नहीं बल्कि कुछ और है। एक बार तुम ऐसे ही चक्कर में फँस चुके हो।”

“मैं तुम्हारा संकेत नहीं समझा।” मैंने मोहिनी को घूरते हुए पूछा।

“समय आने दो, तुम खुद सब कुछ समझ जाओगे।”

मोहिनी अपनी बात पूरी करके मेरे सिर से उतर गयी। मैं कुछ देर गुमसुम खड़ा उसकी बात का हल निकालने की असफल चेष्टा करता रहा फिर थके-थके अंदाज़ में लम्बे-लम्बे डग भरता गाड़ी तक गया और वापस घर आ गया।

उस रात सोने से पहले मैंने एक बार फिर मोहिनी की बात की तह तक पहुँचने की चेष्टा की। परंतु किसी विशेष नुक्ते तक न पहुँच थक-हारकर सो गया।

तीन-चार दिन तक कोई विशेष बात नहीं हुई। मैं सदा की तरह अपने क्वार्टर में बंद पड़ा रहता। शाम को तबियत उलझने लगती तो थोड़ी देर के लिये बाहर आ जाता।

एक रोज़ शाम को अपने क्वार्टर के सामने टहल रहा था कि सामने त्रिवेणी आ गया। उस रोज़ वह मुझे कुछ अधिक ही चिंतित दिख रहा था। उसने मुझे क्वार्टर में चलने को कहा। मैं उसके साथ भीतर आ गया।

कुछ देर तक हमारे बीच बिल्कुल खामोशी छाई रही फिर त्रिवेणी ने मुझे ध्यानपूर्वक देखते हुए कहा।

“राज! मुझे इस बात का दुख है कि मेरे कारण तुम्हें बहुत सी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा।”

मैंने त्रिवेणी के चेहरे को गौर से देखा। जो कुछ उसने मुझसे कहा मुझे उसपर विश्वास नहीं आ रहा था। कदाचित इसलिए कि मुझे अपने सबसे बड़े शत्रु से इस प्रकार के किसी शब्द की कोई आशा नहीं थी।

त्रिवेणी ने मेरे चेहरे पर आश्चर्य के चिन्ह देखे तो बड़ी गंभीरता से बोला- “मैं तुमसे ग़लत नहीं कह रहा हूँ राज। क्या तुम्हें मेरी बात पर विश्वास नहीं है ? विश्वास भी कैसे होगा ?”

“मेरे लिये क्या आज्ञा है सरकार ?” मैंने किसी जर-ख़रीद ग़ुलाम की तरह कहा, “मैं आपकी हर सेवा के लिये तैयार हूँ।”
 
त्रिवेणी ने तुरंत ही मेरी बात का उत्तर नहीं दिया। कुछ क्षणों तक वह मेरे चेहरे के भाव पढ़ता रहा। फिर उसने कमरे में टहलना शुरू कर दिया उसके चेहरे पर उलझन और परेशानी के मिले-जुले चिन्ह हर पल गहरे होते जा रहे थे। मैं तिरछी निगाहों से देखता रहा। अचानक वह टहलते-टहलते मेरे निकट रुका और बड़ी उदासी से बोला- “राज, तुम्हें अनुमान है कि मैंने मोहिनी को कितने कठिन जाप के बाद प्राप्त किया था ?”

“मैं इन बातों को भूल जाना चाहता हूँ सरकार। सब भाग्य का खेल है।” मैंने बुझे स्वर में कहा तो त्रिवेणी ने आगे बढ़कर दोनों हाथ मेरे कंधे पर रख दिए फिर बड़े दोस्ताना अंदाज़ में बोला, “राज, आज के बाद हम दोनों मित्र के समान एक-दूसरे के साथी रहेंगे। मुझ पर विश्वास करो।”

एक बार फिर मुझे अपने आप पर संदेह हुआ। त्रिवेणी के व्यवहार के इस अचानक और आश्चर्यजनक बदलाव ने मुझे हतप्रद कर दिया। भला यह कैसे संभव था कि जो व्यक्ति मेरा सबसे बड़ा शत्रु हो, वह मुझे मित्र कहकर संबोधित करे। अभी मैं इन बातों पर गौर कर ही रहा था कि त्रिवेणी दोबारा बोला, “मैं भगवान की सौगंध खाकर कह रहा हूँ राज कि आज के बाद से मैं तुमको मित्र समझूँगा। तुम मेरे भाई के समान मेरे साथ रहोगे लेकिन...”

लेकिन कहकर त्रिवेणी ख़ामोश हो गया तो मैं तुरंत ही समझ गया कि अवश्य कोई विपदा उस पर आन पड़ी है जो वह मेरी ओर दोस्ती का हाथ बढ़ा रहा है वरना इससे पहले भी मैं उसका बर्ताव देख चुका हूँ।

त्रिवेणी ख़ामोश रहा तो मैंने बेताबी से पूछा- “आप कुछ कहते-कहते चुप क्यों हो गए ? क्या कोई ख़ास बात आ पड़ी है ?”

“आप मत कहो राज। अब तुम मेरे मित्र हो।” त्रिवेणी अपना निचला होंठ काटते हुए बोला, “जिस प्रकार मैंने मोहिनी को प्राप्त करने के लिये यक्षा का जाप किया था उसी प्रकार आजकल एक और पंडित जाप कर रहा है। उसे अपना जाप करते हुए पच्चीस दिन से ऊपर बीत चुके हैं। यदि पंद्रह दिन के भीतर मैंने उसका कोई रास्ता नहीं निकाला तो मोहिनी मेरे कब्जे से भी निकल जाएगी।”

“त्रिवेणी की बात सुनकर मेरा रक्त प्रवाह तेज हो गया और मैं अच्छी प्रकार समझ चुका था कि त्रिवेणी ने मेरी ओर दोस्ती का हाथ क्यों बढ़ाया था। कदाचित वह मुझसे उस पंडित से टकराने के लिये तैयार करना चाहता था जो मोहिनी को प्राप्त करने के लिये जाप में व्यस्त था।

मैंने त्रिवेणी की बेचैनी को महसूस किया तो एक लम्बे समय के बाद मुझे ख़ुशी का अहसास हुआ। मैं दिल ही दिल में मुस्कुराता रहा फिर त्रिवेणी को संबोधित करते हुए पूछा।

“क्या आप मुझे बताएँगे कि वह पंडित कौन है तथा कहाँ बैठा हुआ जाप कर रहा है ?”

“उस मनहूस का नाम शिवचरण है।” त्रिवेणी ने तिलमिला कर कहा, “वह विंध्या की पहाड़ी के नीचे नर्मदा नदी के किनारे एक पुराने मंदिर से जाप पूरा करने में मग्न है। मैं चाहता हूँ कि तुम उसे उसका जाप पूरा होने से पहले मार डालो। मैं तुम्हें वचन देता हूँ कि यदि तुम सफल हो गए तो मेरे मित्र, मेरे भाई बनकर रहोगे। सारा जीवन मैं तुम्हारा यह उपकार नहीं भूलूँगा।”

“मैं तैयार हूँ त्रिवेणी दास जी!” मैंने तुरंत स्वीकृति प्रकट करते हुए कहा फिर पूछा, “परंतु क्या आपने मोहिनी से मालूम नहीं किया कि हम अपने इरादे में सफल होंगे या नहीं ?”

“पूछा था परंतु मोहिनी इस विषय में कुछ नहीं बता सकती। जब तक पंडित शिवचरण मण्डल के भीतर है, मोहिनी की शक्ति भी उसे कोई हानि नहीं पहुँचा सकती।”

“ऐसी स्थिति में मैं भला क्या कर सकूँगा ?” मैंने दबे स्वर में कहा तो त्रिवेणी बड़े स्पष्ट शब्दों में बोला।

“सुनो राज, तुम जिस प्रकार जीवन व्यतीत कर रहे हो उससे अच्छा तो मौत है। इस स्थिति में तुम्हारे लिये पंडित शिवचरण से टकराना कोई बड़ी बात नहीं। यदि तुम सफल हो गए तो तुम्हारे सारे दुख, दर्द दूर हो जाएँगे। असफल होने की स्थिति में तुम अपनी सारी कठिनाइयों से सदा के लिये छुटकारा पाओगे। बोलो राज, क्या तुम्हें यह सौदा मंज़ूर है ?”

मैं जानता था कि त्रिवेणी दास की बातों में स्वार्थ और मक्कारी भरी थी इसके बावजूद उसने जो सुझाव मुझे दिया था वह ग़लत न था। मेरा जीवन वास्तव में मुर्दों से बदतर था। मैं कुछ दिनों खुले वातावरण में साँस लेने को भी तरस गया था। ऐसी स्थिति में अपने जीवन त्रिवेणी के बताए हुए दाँव पर लगा देने के लिये ऐसा कठिन काम न था जिसपर मैं न चलता। मैं तुरंत अपनी ओर से स्वीकृति प्रकट कर दी। त्रिवेणी मेरा जवाब सुनकर यूँ खिल उठा जैसे उसकी मनोकामना पूरी हो गयी हो। वह मुझे बड़ी देर तक पंडित शिवचरण के संबंध में बताता रहा फिर यह कहकर चला गया कि मुझे अगले दिन उस ख़तरनाक यात्रा पर रवाना हो जाना है।

त्रिवेणी के जाने के बाद मैं थके हुए अंदाज़ में अपने पलंग पर बैठकर परिस्थिति पर गौर करने लगा। मेरा मस्तिष्क अपना काम नहीं कर रहा था। मुझे ऐसा आभास हो रहा था जैसे अब मेरे जीवन के दिन बहुत जल्दी पूरे होने वाले हैं। मुझे इस बात की कतई आशा न थी कि मण्डल में बैठे पंडित शिवचरण के मुक़ाबले में सफलता प्राप्त कर सकूँगा। मैं त्रिवेणी के सिलसिले में भी अपनी किस्मत आज़मा चुका था जब त्रिवेणी मोहिनी को प्राप्त करने के लिये अपने जाप में मग्न था। मुझे विश्वास था कि पंडित शिवचरण से टकराना मौत से टकराना है। फिर भी मैंने त्रिवेणी की बात मानने से मोहिनीर नहीं किया। इसलिए कि मैं खुले वातावरण में आज़ादी की मौत मरना चाहता था।

मैं सोचता रहा, सोचता रहा। मेरा मस्तिष्क चकराता रहा। मौत की भयानक कल्पना मेरे मनोमस्तिष्क पर बराबर अपना अधिकार जमाती रही। परंतु तभी अचानक अंधेरे में उजाले की एक हल्की सी किरण ऐसी फूटी की मैं तेजी से उठ खड़ा हुआ। मैंने सोचा कि यदि मैं किसी प्रकार ठीक उस समय शिवचरण को मारने में सफल हो जाऊँ जब मोहिनी त्रिवेणी दास के कब्जे से निकलकर शिवचरण दास के कब्जे में जा रही हो तो निस्संदेह मेरी काया पलट सकती है। मैं एक बार फिर मोहिनी को प्राप्त कर सकता हूँ।

उस रोज़ मैं तमाम रात जागता रहा तथा विभिन्न योजनाएँ बनाता रहा और दूसरे दिन त्रिवेणी के आदेश पर सूरत के लिये रवाना हो गया। जहाँ से मुझे पंडित शिवचरण के ठिकाने तक पहुँचना था।

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