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Adultery मस्त पड़ोसन (पड़ोसन को दुल्हन बनाया )

सेठी साहब डिनर के बाद टहलते हुए आये और मेरे दरवाजे में से अंदर झाँक कर उन्होंने मेरा हाल पूछा। फिर वह अपने कमरे में चले गए। मैं फिर नहाने चली गयी। करीब दस बजे से पहले ही भाभी सब को खाना खिला कर, बच्चों को उनके कमरे में सुलाकर, रसोई, डाइनिंग टेबल बगैरह साफसूफ कर ऊपर आने की सीढ़ी के दरवाजे पर ताला लगा कर एक थैली में कुछ कपडे और एक बक्सा ले कर मेरे पास आयी। मैं तब तक तैयार नहीं हुई थी।

भाभी मेरे पास आ कर बोली, “ननदसा, एक बात कहूं? आप मुझे सेठी साहब के पास मत ले जाओ। मुझे बहुत बुरा लग रहा है। मैं वाकई में कबाब में हड्डी नहीं बनना चाहती। बल्कि मैं आप को अभी सेठी साहब के लिए ऐसा सजाऊंगी की आपकी सुंदरता में और भी चार चाँद लग जाएंगे।”

मैंने भाभी का हाथ पकड़ कर पूरी आत्मीयता से कहा, “भाभी ऐसा मत कहो। आप कबाब में हड्डी नहीं कबाब में मसाला बन कर आओगी। अब ज्यादा बात मत करो। हम जल्दी तैयार हो जाते हैं। ज्यादा देर ना हो जाए। मियाँ इंतजार कर रहे होंगे। ज्यादा देर हो गयी तो कहीं नाराज ना हो जाएँ।”

भाभी मेरे करीब आयी और मुझे लिपट कर बोली, “ननदसा, मुझे माफ़ कर दो। आप बहुत अच्छी हो। देखिये आज और कल आप दोनों की रंग रैलियां मनाने की रातें हैं। हालांकि मैं जानती हूँ सुंदरता में मेरा आपसे कोई मुकाबला नहीं, पर मैं आउंगी तो हो सकता है सेठी साहब का ध्यान थोड़ा सा बँट जाए और यह आपके ऊपर अन्याय होगा।”

मैंने भाभी को आलिंगन करते हुए कहा, “भाभी आप क्या उलटिपुलटि बातें करती हो। आप सुंदरता में कोई कम नहीं। सेठी साहब खुद आपकी तारीफ़ कर रहे थे।” फिर मैं भाभी के और करीब गयी और उनके कानों में बोली, “भाभी एक गुप्त बात कहूं? आप आओगी उसमें मुझे फायदा है।”

मेर्री बात सुन कर भाभी के कान तेज हो गए। मैंने कहा, “भाभी, सेठी साहब के प्यार की मार मैं अकेली झेल नहीं पाती। मुझे आपके सहारे की जरुरत है। यह जो मेरा हाल हुआ है ना वह एक ही रात का फल है। आप साथ में होंगे तो हम दोनों मिल कर सेठी साहब को झेल लेंगे। प्लीज अब और तर्कवितर्क मत करो।”

भाभी मेरी बात सुन कर मुझसे लिपट पड़ी। भाभी की आँखें भर आयी थीं। वह कुछ भावुक सी हो गयी। मुझसे बोली, “ननदसा, मैंने कुछ नादानियत में आपका मजा किरकिरा कर दिया। सेठी साहब से मैं कुछ आकर्षित हुई थी और स्त्री सुलभ इर्षा में मैंने सब गड़बड़ कर दिया।”

मैंने भाभी की आँखों में से आंसूं पोंछते हुए कहा, “भाभीजी एक स्त्री ही दूसरी स्त्री के भाव समझ सकती है। आपने कुछ भी गड़बड़ नहीं किया। आपने सब ठीक ही किया है। चलो मुझे आप तैयार करने वाली थी ना? तो शुरू हो जाओ।”

भाभी अपना सजावट का बक्सा ले कर आयी थी। अपना बक्सा खोलते हुए भाभी बोली, “पहले मैं आपके बालों को सजाऊंगी फिर आपकी भौंहें, चेहरा और फिर जाँघों और पाँवोँ का सुंदरीकरण करुँगी। आपके स्तन मंडल और आपकी चूत को भी मैं सजाऊंगी। आज आपके प्रियतम आप को बीती कल से कहीं ज्यादा भोगनिय पाएंगे।”

मेरी भाभी ने शहनाज़ हुसैन इंस्टिट्यूट से सुंदरीकरण का अभ्यास किया था और बादमें एक ब्यूटीपार्लर भी कुछ सालों तक चलाया था।

यह कह कर भाभी ने मुझे पकड़ कर आयने के सामने खड़ा कर बोली, “आज मैं आपको आपके प्रियतम के लिए तैयार करना चाहती हूँ। मैं आपके लिए एक ख़ास ड्रेस भी लायी हूँ।”

यह कह कर भाभी ने मेरे लिए लायी ड्रेस निकाली। भाभी की लायी हुई ड्रेस देख कर मैं स्तब्ध रह गयी। वह जाली वाली स्कर्ट जैसी ड्रेस थी। भाभी ने मुझे एक स्टूल पर बैठा दिया और शुरू हो गयी। मैं भाभी की सजावट करने की क्षमता के बारे में भलीभाँति परिचित था।

मुझे तैयार करने में भाभी ने आधे घंटे से ज्यादा नहीं लगाया। उन्होंने मेरे बाल को इतना खूबसूरत तरीके से सजाया की जब मैंने देखा तो मैं खुद आश्चर्यचकित हो गयी। फिर मेरे पुरे बदन पर भाभी ने चन्दन का उबटन लगाया और देखते ही देखते भाभी ने मेरा काया कल्प कर दिया। जब भाभी ने मेरे अल्लड़ स्तनोँ को देखा तो उनकी आँखें चौंधियाँ सी गयीं।

वह उन्हें अपने हाथों में पकड़ कर सहलाते हुए बोली, “ननदसा, क्या बात है! इसी लिए मेरे जीजाजी और सेठी साहब आपके दीवाने हैं। भला ऐसी चूँचियाँ देख कर कौन मर्द पागल नहीं होगा?”

कई बार मुझे नंगी कर मेरे बदन को सजाते हुए भाभी मेरे अंगों को देख कर रुक जाती और बेतहाशा वहाँ चूमने लगती। मैंने भाभी से मजाक में कहा, “भाभी कहीं आप ही मुझे यहीं पर चोदना शुरू मत कर देना।”

भाभी ने मेरी और देख कर कहा, “ननदसा, काश मैं मर्द होती तो आपको छोड़ती नहीं।”

मेरे बदन को सजाने के बाद भाभी ने फटाफट मेरी साडी ब्लाउज, ब्रा निकाल दिए। मैं सिर्फ पैंटी में भाभी के सामने खड़ी हो गयी। मैंने जब भाभी की लायी हुई स्कर्ट पहनी तो शर्म के मारे मैं पानी पानी हो रही थी। भाभी ने मुझे उस ड्रेस के नीच कुछ भी पहनने से मना कर दिया।

हालांकि जाली में सुराख बारीक से थे पर मेरी त्वचा का सारा गोरापन, मेरे बदन का हरेक घुमाव, उभार, खांचा, छिद्र, दरार और सारी बारकियों का अच्छा खासा आभास उस ड्रेस में से हो रहा था। स्कर्ट घुटने से थोड़ा सा ऊपर था जिसे ऊपर उठाने से मेरी गोरी गुलाबी चूत दिख जाती थी।

स्कर्ट का कपड़ा अति महिम जैसे ढाका की मलमल हो। उसमें बीच बीच में छोटे से जगह जगह पर छिद्र। मैंने आयने के सामने जा कर देखा तो मैं खुद अपनी छाया देख कर मोहित हो गयी। सामने ऐसी सेक्सी और अत्यंत खूबसूरत औरत कपडे पहने हुए पर लगभग नंगी खड़ी हो, की सब अंगों की झाँखी हो पर वास्तव में कुछ भी साफ़ ना दिखता हो।

भाभी ने मुझे अश्लील नहीं पर अत्यंत प्रलोभनीय रति समान कामेश्वरी बना दिया था। भाभी ने मेरे बालों की संरचना इतनी बखूबी से की थी की मेरे घने काले बालों को मेरे सर का मुकुट बना दिया था। इसकी तुलना में मेरी भाभी ने कोई ख़ास मेकअप नहीं किया था। मैंने बिलकुल समय ना गँवाते हुए भाभी के सारे पहने हुए कपडे निकाल दिए और भाभी को ब्रा और पैंटी में खड़ी कर दिया।

फिर मैंने भाभी की ब्रा भी निकाल दी और भाभी की चूँचियों को पहली बार देखा। एक बच्चा होने के बावजूद भी भाभी की चूँचियाँ ढीली नहीं पड़ी थीं। मेरे मुकाबले भाभी की चूँचियाँ थोड़ी छोटी थीं। पर भाभी की निप्पलेँ काफी गहरी और लम्बी फूली हुई थीं। भाभी की पैंटी मैंने झुक कर नीचे खिसका दी और उनके बदन पर मेरी एक पतली सी साडी लपेट दी।

रात के करीब ग्यारह बजे भाभी मेरा हाथ पकड़ कर मुझे सेठी साहब के कमरे में ले गयी। किसी देखने वाले को वह सिन देख कर ऐसा ही लगता जैसे किसी नयी नवेली दुल्हन को उसकी भाभी सुहागरात के पलंग पर ले जा रही हो। सेठी साहब उस समय पलंग पर सफ़ेद कुर्ता पाजामें में कामदेव जैसे सुन्दर दिख रहे थे। जैसे ही उन्होंने मुझे देखा तो उनकी शक्ल देख कर मुझे लगा जैसे वह बेहोश होने जा रहे थे। उनके चेहरे से हवाइयां उड़ रहीं थीं। वह कुछ बोलने वाले थे पर उनका मुंह खुला का खुला ही रह गया था।

भाभी ने मुझे सेठी साहब के बाजू में पलंग पर बिठा कर सेठी साहब की और देख कर कहा, “आपकी प्रियतमा को मैंने आपके लिए तैयार किया है उसे स्वीकारिये।” ऐसा कह कर भाभी कमरे से बाहर निकल ने लगी तो मैंने उनका हाथ पकड़ा और कहा, “आप कहाँ जा रही हो भाभी? आपने मुझे भले ही आज की सुहागरात के लिए तैयार किया हो, पर बिना तैयार हुए ही आप मुझसे भी ज्यादा सुन्दर लग रही हो।”

भाभी कुछ आशंका भरी नज़रों से सेठी साहब की और देखने लगी। मैंने भाभी को खिंच कर सेठी साहब के दूसरी तरफ बिठा दिया और कहा, “भाभीसाहेब, सुनो पहली बात, मैं और सेठी साहब हम दोनों आपको पसंद करते हैं। मैं चाहती हूँ की आप भी आज रात हमारी मस्ती में हमारे साथ शामिल हों। इससे हमारा आनंद आधा नहीं दुगुना हो जाएगा। और दूसरी बात आज रात आप देखेंगे की सेठी साहब एक साथ हम दोनों को खुश करने की क्षमता रखते हैं। सिर्फ मेरे रहने से सेठी साहब को पूरा मजा नहीं आता। आप शामिल होगी तो सेठी साहब भी सेटिस्फाई होंगे और हम को भी सैटिस्फाई करेंगे।”

भाभी ने सेठी साहब की और शायद उनकी रजा मंदी के लिए देखा। सेठी साहब ने मुझे अपनी बाँहों में भरकर बोला, “भाभी साहब, ज्योति जो कहती है डंके की चोट पर कहती है। मैं तो तुम्हारी ननदसा का ग़ुलाम हूँ। वह बड़ी मीठी मीठी बातें करती है। पर उसकी इच्छा मेरे लिए आज्ञा है।

मैं एक ही बात कहूंगा, मुझे ज्योति की पसंद पसंद है।” यह कह कर सेठी साहब ने अपनी दूसरी बाँह लम्बी कर भाभी को भी अपने सीने से लगा लिया। सेठी साहब की चौड़ी छाती पर लगभग उनकी गोद में बैठे हुए मेरी और भाभी की नाक एक दूसरे से टकराये इतनी करीब हो गयी। मैंने भाभी के चेहरे को प्यार से सहलाते हुए उसे अपनी हथेलियों में भरते हुए कहा, “भाभी, आप के लिए और मेरे लिए भी आज का अनुभव एक अद्भुत अनुभव है। हमने कभी अपने प्यार को बाँटा नहीं। पर कहते हैं ना की बाँटने से सूख बढ़ता है और दुःख कम होता है। तो चलो आज हम अपना सुख बाँटते हैं।”

भाभी मेरी बात सुन कर कुछ तनाव मुक्त होती हुई बोली, “सच कहूं? सेठी साहब को देखते ही पता नहीं कैसे उन्होंने मेरे अंदर कुछ अजीब सा घमासान मचा दिया था?”

मैंने भाभी की टाँग खींचते हुए कहा, “अंदर माने कहाँ? दिलमें, या जाँघों के बीच में?”

भाभी ने कुछ शर्माते हुए कहा, “ननदसा, अब मेरा मजाक मत उड़ाओ। आपको तो पता है की औरतों को कहाँ कहाँ घमासान मचता है जब वह कोई तगड़े मन पसंद आदमी को उन निगाहों से देखती है। सारी जगह घमासान मचा दिया था तुम्हारे सेठी साहब ने।”

मैंने भाभी की ठुड्डी पकड़ कर उसे हिलाते हुए कहा “ओयहोय! क्या बात है? बदन में सब जगह ही घमासान मचा दिया क्या हमारे सेठी साहब ने? देखो सेठी साहब अब सिर्फ मेरे नहीं, तुम्हारे भी हैं। अब वह हमारे सेठी साहब हैं।

फिर मैंने सेठी साहब का कुर्ता निकालने का प्रयास करते हुए कहा, “सेठी साहब का सीना काफी चौड़ा है। उस पर हम दोनों के लिये काफी जगह है।” सेठी साहब ने अपने हाथ ऊपर उठाते हुए मुझे अपना कुर्ता निकालने दिया।

मैंने सेठी साहब के सीने को सहलाते हुए भाभी का हाथ पकड़ कर मैंने सेठी साहब की निप्पलों पर रखते हुए कहा, “देखो यह होता है मर्द का सीना। एक दिन सेठी साहब बाहर पार्क में अपना कुर्ता निकाल कर कसरत कर रहे थे। इसी सीने को देख कर ही मैं पानी पानी हो गयी थी।”

मैं खड़ी थी तो सेठी साहब मुझे देख कर बोले, “ज्योति मैंने तुझे बगैर कपड़ों में देखा है, पर इस भेष में तो तुम और उससे भी ज्यादा सेक्सी लग रही हो। मैंने भाभी की और इशारा कर के कहा, “यह सब भाभी का कमाल है। यह ड्रेस भी भाभी का है और मुझे आपके लिए तैयार भी भाभी ने किया है।”

सेठी साहब ने भाभी की और मूड कर कहा, “मुझसे ज्योति ने आपके बारे में बात की थी। मैंने आपको जब पहली बार देखा तब ही से मैं आपसे काफी प्रभावित हूँ। पर शामको जब ज्योति ने कहा की आप भी हमारे साथ हमारी मस्ती में ज्वाइन करोगी तब मेरी ख़ुशी का ठिकाना ना रहा। मैं मानता हूँ की ख़ुशी बाँट ने से बढ़ती है।”

भाभी ने सेठी साहब की छाती पर सर रख कर कहा, “भाभी बड़ा ही आग्रह कर मुझे ले आयी।” अचानक भाभी ने सोचा की उनकी बात का मतलब यह भी निकाला जा सकता है की वह मजबूरी में वहाँ आयी थी तो भाभी ने अपनी बात को समझाते हुए कहा, “नहीं सेठी साहब मेरे कहने का मतलब है की यहां आयी तो मैं अपनी मर्जी से ही हूँ।”

मेरी भाभी मुझसे उम्र में दो साल छोटी थी। भाभी का नाक नक्श काफी सुकोमल था। मुझसे थोड़ी ऊंचाई कम थी पर बदन में पूरी तरह से भरी हुई थी। घरमें काफी काम करते रहने के कारण भाभी ने अपना वजन बढ़ने नहीं दिया। एक बच्चा होने के बावजूद भी वह बहुत सेक्सी लगती थी।

भाभी की पतली कमर बड़े कूल्हे और सख्त भरी हुई चूँचियाँ भाभी के रूप में चारचाँद लगा देती थी। भाभी अपनी साडी की गाँठ कमर से नजर ललचाने वाली निचाई पर बांधती थी। मेरी भाभी की सास और मेरी माँ ने कई बार उसे टोका भी था। पर मेरे पापा यांनी भाभी के ससुर को कोई शिकायत नहीं थी। वह सास को कहते, “अरे छोड़, यह नए जमाने की बहु है। इसे पहनने दे जैसे पहनना चाहे। अब वह पुराना ज़माना चला गया।” मुझे लगता था की मेरे पापा भी मेरी भाभी की खूबसूरती के कायल थे।

मेरे प्रोत्साहन से भाभी कुछ कुछ तनाव मुक्त लग रही थी। सेठी साहब की निप्पलों को अपनी उँगलियों में पिचकाती हुई भाभी बोली, “वाकई सेठी साहब का बदन मजबूत, सख्त और तना हुआ है, इसमें कोई दो राय नहीं।”

सेठी साहब ने भाभी के बालों में उंगलियां फिराते हुए कहा, “मैं तो तुम्हें अंजू ही कहूंगा। तुम्हारा नाम इतना प्यारा है। तुम भी मुझे आप कहना बंद करो। मुझे अच्छा नहीं लगता। ऐसा लगता है जैसे मैं तुम्हारा स्कूल टीचर हूँ। तुमने जिस तरह से मेरी आवभगत की और पहली नजर में जिस तरह से तुमने मुझे देखा, मैंने तुम्हारी आँखों में एक अजीब सा भाव देखा। तब से मुझे तुम्हारी और एक आकर्षण का आभास हुआ था। जब तुम्हारी ननदसा ने मुझे पूछा की क्या वह तुम्हें भी रात को बुलाले, तब मैं सच में खुश हुआ था।”

मैंने देखा की मेरी भाभी कुछ करने से हिचकिचा रही थी, तब मैंने भाभी को उठाया और उनके होंठ सेठी साहब के होंठों के एकदम करीब ला कर कहा, “मैं इतना ही कर सकती हूँ। चूमना तो आप दोनों ने है।”

मेरी बात सुनते ही सेठी साहब ने भाभी का सर अपनी हथेलियों में पकड़ लिया और वह अंजू को बेतहाशा चुम्बन करने लगे। मैं दोनों को चुमते हुए देख कर बड़े ही संतोष का अनुभव कर रही थी। उन दोनोंका चुम्बन काफी लंबा चला। उस दरम्यान सेठी साहब जैसे अंजू भाभी की साड़ी लार अआप ही पिने लगे थे। काफी देर तक सेठी साहब की बाँहों में रहने के बाद भाभी जब फारिग हुई तो मुड़कर गहरी सांस लेते हुए मुझे जैसे उन्होंने कोई गुनाह किया हो ऐसे देखने लगी।

मुझे देखती हुई बोली, “सेठी साहब ने मेरे होंठ पर अपने होंठ ऐसे भींच दिए थे की मुझे लगा की अब मेरी साँसे उनकी साँसों के साथ ही चल रही हैं। बापरे सेठी साहब ऐसा जबरदस्त चुम्मा तो मेरे पति ने भी मुझे आजतक नहीं किया।”

मैंने झुक कर भाभी को अपने करीब खींचा और उनके ब्लाउज के बटन खोलने शुरू किये। मैंने कहा, भाभीजी अब हमें अपने रूप के दर्शन कराओ जी।”

भाभी ने भी मेरी मदद करते हुए खुदके ब्लाउज के बटन पहले खोले और फिर अपनी ब्रा को भी खोल कर दोनों को कमरे के कोने में निकाल फेंका।
 
भाभी के ब्लाउज और ब्रा के खुलते ही भाभी के मस्त स्तन ब्रा के बंधन से छूट कर आझाद हो कर भाभी की छाती पर फूली हुई निप्पलों और एरोला के आसपास बिना झुके सख्ती से खड़े हुए नजर आये। भाभी के स्तन मेरे स्तनोँ से कुछ छोटे जरूर थे पर वैसे ही सख्त और गोल थे।

सेठी साहब ने भाभी के स्तन खुलते ही उन्हें अपनी हथेलियों में ले कर उन्हें मसलने लगे। भाभी के स्तनोँ में एक खासियत थी। वह बिना झुके अपनी गोलाई बनाये हुए थे। मैंने भाभी का एक स्तन अपनी हथेली में लिया और मैं उसे सहलाने लगी। भाभी के स्तन इतने सपाट, चिकने और कोमल थे की उनको एक बार पकड़ लया तो छोड़ने का मन ही ना करे। मैं और सेठी साहब भाभी का एक एक स्तन अपनी हथेली में लिए उसे सेहलाने लगे।

भाभी भी समझ गयी थी की अब शर्माने से कोई फायदा नहीं। उन्होंने अपना एक हाथ सेठी साहब की जाँघों के बीच में डाल दिया और सेठी साहब का लण्ड पाजामे के ऊपर से ही सहलाने लगी।

यह सेठी साहब को एक इशारा था की वह अपना लण्ड पाजामे से निकाल कर प्रदर्शित करे। सेठी साहब का एक हाथ अंजू भाभी की गाँड़ को कपड़ों के ऊपर से सेहला रहा था। मैं जानती थी की अंजू भाभी सेठी साहब का लण्ड देखने के लिए व्याकुल थी। मैंने पहले ही सेठी साहब के लण्ड के बारे में भाभी को वाकिफ कर दिया था।

सेठी साहब के उसकी गाँड़ सहलाने से अंजू भाभी फुदक रही थी। पलंग पर वह धीमी सी सिसकारियां निकाले इधर उधर मचल रही थी। शायद सेठी साहब कपड़ों के ऊपर से ही अंजू भाभी की गाँड़ की दरार में अपनी उंगलियां डालने की कोशिश कर रहे थे।

भाभी की गोल सुआकार मांसल गाँड़ किसी मर्द को आसांनी से आकर्षित करने वाली थी।

मैंने भाभी की नाइटी उठा कर ऊपर की और खिसका दी। भाभी ने अपने हाथ ऊपर कर उसको भी कोने में फेंक दिया। अब भाभी सिर्फ पैंटी में ही थी। सेठी साहब के लिए भाभी की गाँड़ सहलाना अब और भी आसान हो गया था। अब तो सेठी साहब को अंजू भाभी की पैंटी के अंदर हाथ डालकर अंजू की माँसल गाँड़ को सहलाने, पिचकाने और गाँड़ की दरार में उंगली डालने का और भी आसान अवसर मिल गया था।

भाभी ऊपर से पूरी नंगी हो चुकी थी। सिर्फ पैंटी में ही थी। और उस हाल में वह बहुत ही प्यारी खूबसूरत लग रही थी। भाभी की पतली कमर और नाभि के नीचे का स्त्री सहज हल्का सा पेट का उभार बड़ा ही कामुक लग रहा था। पैंटी में से जैसे भाभी की कमल की डंडी जैसी जाँघें अद्भुत थीं।

सेठी साहब ने भाभी की गाँड़ के माँसल गालों और बीच वाली दरार से खलते हुए पैंटी को नीचे की और खिसकाया। नीचे की और खसकते ही भाभी की चूत दिखने लगी।

भाभी की चूत मुझे कुछ अलग सी लगी। भाभी की चूत ज्यादा लम्बी नहीं थी। चूत का छिद्र भी शायद छोटा ही होगा। मुझे एक ख़याल आया की शायद मेरा भाई भाभी को चोदने में कोताही करता होगा। भाभी की चूत इतनी फ्रेश लग रही थी। मैं जानता था की काफी चोदी हुई चूत अक्सर काली और चौड़ी हो जाती है।

मैंने सेठी साहब के पाजामे का नाडा खोल दिया। सेठी साहब ने अंदर एक कच्छा (निक्कर) पहना था। मैंने सेठी साहब की निक्कर हटाने की कोशिश की। सेठी साहब ने खुद पाजामे और निक्कर को पलंग से पाँव नीचा कर दोनों निकाल दिए। सेठी साहब का तगड़ा लण्ड जैसे एक साँप अपनी गुफा में कुंडली में दुबक कर छिपा होता है वैसे ही ढीला लण्ड भी अपने आपको घुमा कर सेठी साहब की निक्कर में दुबक के बैठा हुआ था। शायद वह हम महिलाओं के हाथों और होठोँ के स्पर्श का इंतजार कर रहा था।

सेठी साहब के लण्ड के बाहर निकलते ही बाँवरी मेरी भाभी ने उसे फुर्ती से अपने हाथों में पकड़ने की कोशिश की। सेठी साहब का लण्ड बाहर निकलते हुए सीधा हो कर अपनी साधारण लम्बाई धारण कर रहा था।

शायद मेरी भाभी को सेठी साहब के लण्ड की लम्बाई और चौड़ाई का अंदाज नहीं था। पर अपनी एक हथेली में उसे उठाने की कोशिश की तो लण्ड हथेली से कहीं बड़ा होने के कारण उनकी हथेली से फिसल गया और नीचे की और लटक गया। फिर अंजू भाभी ने सेठी साहब के लण्ड को जब ध्यान से देखा तो उनकी सिट्टीपिट्टी गुम हो गयी। शायद ही उन्होंने अश्लील वीडियो को छोड़ उतना बड़ा लण्ड कभी देखा होगा और उस समय तो वह ढीला शिथिल सा था।

अंजू भाभी ने इस बार दोनों हथेलियों का इस्तेमाल करके सेठी साहब का लण्ड अपने हाथों में लिया। मैंने अंजू भाभी को पहले से ही सेठी साहब के लण्ड के बारे में सांकेतिक भाषा में थोड़ा सा घुमाफिरा कर बताया था की सेठी साहब का लिंग तगड़ा है। कोई साधारण सी घरेलु स्त्री को पहली बार सेठी साहब से चुदवा ने में काफी कष्ट हो सकता है।

मैं इसके अलावा सांकेतिक भाषा में क्या बता सकती थी?

अंजू भाभी ने इस बार दोनों हथेलियों का इस्तेमाल करके सेठी साहब का लण्ड अपने हाथों में लिया। अब भाभी को सेठी साहब का लण्ड प्रत्यक्ष देख कर मेरी बात की सटीकता का अहसास हो रहा होगा।

सेठी साहब का लण्ड देख कर अनायास ही मुझे उसे चूसने का मन करता था। शायद यह उसकी खूबसूरती कहो या विशाल कद कहो इसके कारण होता होगा। हर अनुभवी स्त्री जानती है की लण्ड भी खूब सूरत और बदसूरत हो सकता है। यह बात अनुभव से ही समझी जा सकती है। शायद हर स्त्री का सेठी साहब का लण्ड देख कर उसे चूसने का मन करता होगा।

भाभी से भी अपने आपको रोका नहीं गया। जैसे ही उन्होंने सेठी साहब का लण्ड अपबने हाथों में लिया की वह मेरी और देखने लगी जैसे मेरी इजाजत चाहती थी की वह उसे अपने मुंह में ले।

मैंने अपनी पलकें और सर हिलाकर उसे इजाजत देदी। वैसे इस हाल में उसे अब किसी भी काम के लिए मेरी इजाजत लेने की आवश्यकता नहीं थी। भाभी ने सेठी साहब को लेट जाने का इशारा किया ताकि वह सेठी साहब का लण्ड मुंह में ले सके।

सेठी साहब मुस्कुराते हुए लेट गए। भाभी ने कुछ हिचकिचाहट दिखाते हुए अपना मुंह सेठी साहब के लण्ड पर झुकाया और पहले उसके टोपे को मुंह में लेकर जीभ से अच्छी तरह से चाट कर जैसे उसे साफ़ कर दिया।

सेठी साहब के लण्ड का टोपा भाभी की लार से चमक रहा था। सेठी साहब के लण्ड से रिस रहा पूर्व रस भी भाभी ने चाट लिया होगा। धीरे धीरे भाभी ने अपना मुंह पूरा खोल कर सेठी साहब के लण्ड को जितना अंदर ले सकती थी उतना लिया और अपना मुंह ऊपर नीचे कर सेठी साहब को मुंह चुदवाने का अनुभव देना शुरू किया। लगता था भाभी वाकई में इसमें कुछ अनुभवी लग रही थी क्यूंकि भाभी ने सिर्फ अपनी लार ही नहीं अपनी लार की चिकनाहट वाला द्रव्य सेठी साहब के लण्ड पर काफी मात्रा में लपेटा।

शायद भाभी यह सोचती होगी की सेठी साहब से चुदवाने में पहले उनका नंबर भी आ सकता है तो यह चिकनाहट लण्ड को चूत की सुरंग में घुसने में उनकी काफी मदद करेगी। जब भाभी सेठी साहब का लण्ड चूस रही थी तब सेठी साहब मेरे होंठ चूस रहे थे और जैसे वह मेरे मुंह का सारा द्रव्य ही अपने मुंह में ले जाना चाहते हों इस तरह मेरे होंठों को, मेरी जीभ को और मेरे मुंह में से सारी लार को बड़ी सख्ती से चूस रहे थे।

उनके हाथ मेरे स्कर्ट को उठा कर मेरे स्तनोँ को मसल रहे थे। भाभी ने मुझे पहने हुए कपडे सेठी साहब का लण्ड चूसते हुए ही निकाल ने को इंगित किया। मैंने निकाल दिए। जब चुदवाना हो तो कैसे भी सुन्दर कपडे पहनो, क्या फायदा? भाभी का एक हाथ मेरी चूत पर पहुँच गया था और वह अपनी उँगलियों से मेरी चूत की सतह को प्यार से सेहला ने लगी।

मैं भाभी के मस्त स्तनोँ को सेहला औरऔर मसल रही थी। भाभी के स्तनोँ की निप्पलेँ इतनी रोमांचक थी और ऐसी सख्त हो कर फूल जातीं थीं की उनको उँगलियों में पिचकते हुए छोड़ना नामुमकिन था। भाभी के स्तनोँ के एरोला गोरे और फुंसियों से भरे हुए थे जो उनकी उत्तेजना की चुगली खा रही थी। उनको मसल कर मैं उनकी उत्तेजना और बढ़ा रही थी।

भाभी के स्तन ऐसे ही खड़े हुए बिना झुके हुए थे जैसे किसी कँवारी लड़की के होते हैं। हम स्त्रियां तो स्तनोँ को सहलाने से और मसलने से उत्तेजित हो ही जाती हैं पर मुझे तब तक पता नहीं था की मर्द लोग हम स्त्रियों के स्तनोँ को सहलाने और मसलने में इतना आनंद क्यों पाते हैं।

भाभी के स्तनोँ को मसल कर मुझे समझ में आया की स्त्रियों के स्तनोँ में क्या मस्ती और उत्तेजकता का आलम है। इन्हें मसलते ही स्त्रियां फुदक ने लगतीं हैं। मर्द लोग यही चाहते हैं की वह जब अपनी पार्टनर को चोदे तो उनका पार्टनर भी उस चुदाई को खूब एन्जॉय करे। जब स्तनोँ को हम मसलते हैं तो चूत में कुछ अजीब सी झनझनाहट होने लगती है।

सेठी साहब के लण्ड को चूसते हुए भाभी इतनी खो गयी की मुझे लगा की उनका जबड़ा दुखने लगा होगा पर वह दिखा नहीं रही थी। जब भाभी ने अपना मुंह लण्ड से हटाया तब मैं धीरे से मेरा मुंह सेठी साहब के लण्ड के पास ले आयी और भाभी को इशारा किया की वह कुछ देर आराम ले।

उस समय सेठी साहब अपने लण्ड को ऊपर नीचे कर भाभी के मुंह की तगड़ी चुदाई कर रहे थे। लगता था सेठी साहब खूब मजे ले रहे थे। मैं सेठी साहब के ऊपर लेट गयी। मेरी चूत सेठी साहब के मुंह के ऊपर और सेठी साहब का लण्ड मेरे मुंह में। इस तरह हम डबल ब्लो जॉब की प्रैक्टिस करने लगे। भाभी यह देख कर हैरान रह गयी। भाभी भी मेरे साथ लेटी हुई थी।

भाभी के बदन पर हाथ फिराते मैंने भाभी के पेट से नीचे की और ढलाव पर स्थित भाभी की दोनों करारी जाँघों के मिलन स्थान को सहलाना शुरू किया तो भाभी मचलने लगी। भाभी ने मेरा हाथ थामा पर मैं नहीं रुकी और मैंने भाभी की जाँघों को अलग कर उनकी चूत में अपनी उंगलियां डालीं।

मेरे चूत की पंखुड़ियों को छूते ही भाभी की चूत में से उनके स्त्री रस की धार रिसने लगी। भाभी ने कभी किसी औरत के हाथ उनकी चूत को छुएंगे यह अपेक्षा नहीं की होगी। भाभी ने यह तो कभी नहीं सोचा होगा की उनकी ननद यह काम करेगी।

मैंने भाभी के रस में अपनी उंगलियां डुबोईं और फिर भाभी को दिखाते हुए उन्हें मुंह में डालकर चाट लिया। भाभी देख कर हैरान रह गयी पर मुस्कुरायी। उन्हें मेरी यह प्यार जताने की रीती पसंद आयी। उधर सेठी साहब तो मेरी चूत को ऐसे चाटने लगे थे जैसे उसमें से कोई मीठा सा सिरप बह रहा हो।

सेठी साहब के जीभ के मेरी चूत की पंखुड़ियों को खरोंचने से मुझे मेरी चूत में अजोबोग़रीब झनझनाहट हो रही थी। मेरे पुरे बदन में रोमांच फ़ैल रहा था। सेठी साहब मेरे कूल्हे मसल रहे थे और मेरे कूल्हे के गाल को चींटी भर रहे थे और बीच बीच में चपेट भी लगाते रहते थे। भाभी सेठी साहब जो मेरी चूत चाट रहे थे उनके कान चाट रही थी। भाभी के स्तन सेठी साहब की बाजुओं से घिस रहे थे।

कुछ देर तक सेठी साहब का लण्ड चूसने के बाद मैं सेठी साहब से नीचे उतरी और सेठी साहब की दूसरी और लेट गयी। सेठी साहब की एक तरफ भाभी थी और दूसरी तरफ मैं। मेरे नीचे उतरते ही भाभी सेठी साहब की और घूम गयी। सेठी साहब ने भाभी को अपनी बाँहों में ले लिया। सेठी साहब का तगड़ा लण्ड भाभी की चूत को छू रहा था।

भाभी उस महाकाय लण्ड से कुछ घबराई हुई जरूर थी पर भाभी ने मन ही मन तय कर लिया था की मौक़ा मिलेगा तो सेठी साहब के उस महाकाय लण्ड से जरूर चुदवायेगी।
 
भाभी भी सेठी साहब से ऐसे चिपक गयी जैसे एक बेल पेड़ को चिपक जाती है। सेठी साहब ने भाभी के सर को पकड़ कर उनके होंठों को चूमना शुरू किया। सेठी साहब और भाभी का चुम्मा इस बार काफी आक्रामक था। सेठी साहब भाभी के होंठों को और जीभ को इतनी तेजी से में चूस कर खिंच रहे थे की भाभी की चीख निकल गयी। सेठी साहब भाभी के होँठों को काटते तो कभी गालों को इतनी शिद्दत से चूसते की भाभी के गोरे गोरे गालों पर सेठी साहब के होँठों का निशान होजाना तय था।

कुछ देर भाभी और सेठी साहब की चुम्माचाटी होनेके बाद मैंने सोचा की समय आगया है की भाभी को सेठी साहब के तगड़े लण्ड से चुदवाया जाये। एक बार भाभी को सेठी साहब ने चोद दिया फिर भाभी हमारी पक्की राज़दार बन जायेगी। फिर ना हमन उनसे ना उन्हें हमसे कोई भय या आशंका रहेगी।

मैंने बाजू में लेटे हुए ही सेठी साहब का लण्ड पकड़ा और भाभी की चूत पर रगड़ने लगी। जैसे ही मैंने यह किया तो भाभी और सेठी साहब दोनों रुक कर मुझे देखने लगे।

मैंने कहा, “अब भाभी की बारी है, सेठी साहब आपने मुझे कल खूब रगड़ा था, अब भाभी को रगड़ो। भाभी ने मेरा बड़ा मजाक उड़ाया है।”

भाभी ने मेरी और देखा और कुछ आतंक और कुछ शरारत से बोली, “ननदसा, बदला लेना चाहती हो क्या?”

मैंने भाभी को ढाढस देते हुए भाभी के कूल्हे को सहलाते हुए कहा, “नहीं भाभी, मैं सेठी साहब के लण्ड का मजा ले चुकी हूँ। अब आप को भी लेना है। अब तो हम दोनों ही उसके भागिदार होंगे। अब दर्द की मत सोचो। एन्जॉय करो।”

मैंने सेठी साहब का लण्ड भाभी की चूत की पंखुड़ियों को थोड़ा खोल कर भाभी की चूत की पंखुड़ियों के बीच सेट कर दिया और फिर सेठी साहब को इशारा किया की वह अब उसे अंदर घुसाएँ।

मैं भाभी की चूत का छिद्र देख चुकी थी। भाभी की चूत का छिद्र काफी छोटा था। शायद मेरे भाई का लण्ड बड़ा नहीं होगा तो भाभी की चूत को खुलने की जरुरत ही नहीं पड़ी। पर अब बात और थी। सेठी साहब के लण्ड को लण्ड कहने के बजाय उसे कोई रबर का बड़ा होज़ पाइप कहना ही ठीक होगा। वह तो आसानी से घुसने वाला नहीं था भाभी की संकड़ी चूत में। भाभी के चेहरे पर तो आतंक के निशान थे ही पर मैं भी कुछ परेशान हो रही थी।

मैंने सेठी साहब को भाभी को चोदना शुरू करने से रोका। मेरे पास इसी काम के लिए इस्तेमाल हो ऐसे तेल की एक बोतल थी। मैं उसे बड़ी चुप्पी से याद रख कर अपने साथ मायके ले आयी थी, क्यूंकि मुझे डर था की कहीं सेठी साहब का मन करे मेरी गाँड़ मारने का तो मैं उन्हें मना कर नहीं पाउंगी और तब यह आयल बड़ा काम आएगा।

ज्यादातर तो वह तेल जब गाँड़ मारते हैं तब इस्तेमाल करते हैं। मैंने उसमें उंगली डालकर काफी तेल निकाल कर सेठी साहब के लण्ड पर लपेटा और भाभी की चूत में भी जाने दिया। वह तेल सुरक्षित था ऐसे इस्तेमाल के लिए। जब सेठी साहब का लण्ड बहुत बढ़िया तरीके से चिकना हो गया तब मैंने सेठी साहब को इशारा किया की वह भाभी की चूत में लण्ड पेलना शुरू कर सकते हैं।

मैं सेठी साहब का विशालकाय लण्ड भाभी की छोटी सी चूत में दाखिल होते हुए देखना चाहती थी। मैं जानती थी यह काफी कठिन होगा। पर चुदाई तो होनी ही थी, उस लण्ड को उस चूत में घुसना ही था।

सेठी साहब धक्का मारा। सेठी साहब का लण्ड चिकनाहट के कारण थोड़ा घुसा। करीब इंच घुसा ही होगा की मुझे भाभी की चीख सुनाई दी। खैर यह तो अपेक्षित था। पर इतनी जल्दी नहीं। मैं भी जानती थी की भाभी काफी चिल्लायेगी। हो सकता है वह दर्द के मारे सेठी साहब को चोदने के लिए मना भी कर दे।

पर ऐसा कुछ हुआ नहीं। सेठी साहब का लण्ड भाभी की चूत में घुसने लगा। भाभी चूत के त्वचा इतनी खिंच गयी की मुझे लगा की कहीं फट ना जाए। पर वाह रे स्त्री की चूत का लचीलापन! सेठी साहब का इतना तगड़ा लण्ड सेठी साहब के पेलने से ही अंदर घुसता गया। उस समय का भाभी की चूत देखने का दृश्य अद्भुत था।

सेठी साहब का लण्ड काफी मुश्किल से अपनी जगह बना पा रहा था। शायद भाभी की चूत की त्वचा को पूरा ही खींचना पड़ रहा था। पर फिर भी चूत की त्वचा इतनी खिंच भी सकती है यह मैंने पहली बार देखा। दबी आवाज में दर्द से भाभी चीखती रही।

वास्तव में तो भाभी ने अपनी चीखों को कामुक सिसकारीयों में बदल दिया था। इससे यह समझना मुश्किल था की भाभी ज्यादा दर्द के मारे परेशान थी या सेठी साहब के चुदाई से ज्यादा उत्तेजित। जैसे इंसान तीखा खाने के समय सिसकारियां मारता रहता है वैसे ही भाभी ने सेठी साहब के लण्ड का उनकी चूत में प्रवेश झेला।

मैं हैरान सी सेठी साहब की भाभी की चूत की चुदाई की प्रक्रिया को इतनी करीबी से चौड़ी आँखों से देखती ही रही। अगर किसी इंसान ने चुदाई की वह प्रक्रिया जिसमें एक तगड़ा लण्ड एक सख्त चूत में बार बार अंदर बाहर जाता आता रहता है, उस चूत को अपनी ताकत से पेलता रहता है, उसे ना देखा हो तो कम से एक बार देखनी चाहिए।

कुदरत की यह अनूठी प्रक्रिया कितनी सुरम्य है, आँखों को कितना सुकून देती है वह तो देखने से ही पता चालता है। शायद इसी लिए जिनको असभ्य भाषा में “ककोल्ड” कहा जाता है वह ऐसे ही लोग हैं जो यह प्रक्रिया को अपनी पत्नी के ऊपर किसी गैर मर्द के लण्ड के द्वारा होती हुई देखना चाहते हैं, और जिनका यह प्रक्रिया को देखते हुए कभी मन नहीं भरता।

सेठी साहब भाभी को शुरू शुरू में बड़े ही प्यार से धीरे से चोद रहे थे। भाभी की चूत की सुरंग भी सेठी साहब के तगड़े लण्ड से धीरे धीरे सामंजस्य में आ रही थी, धीरे धीरे अनुकूल हो रही थी।

शायद भाभी के चूत की आसपास की त्वचा भाभी की चूत की सुरंग में सेठी साहब का इतना मोटा लण्ड एडजस्ट करने में सहायता दे रही थी। हालांकि सेठी साहब का लण्ड भाभी की चूत में सारा का सारा अंदर जा नहीं पा रहा था, भाभी सेठी साहब के लण्ड की मार झेलने में धीरे धीरे सक्षम हो रही थी।

धीरे धीरे भाभी की सिसकारियों में दर्द कम और कामुकता की मात्रा बढ़ रही थी। सेठी साहब भी कई स्त्रियों के चोदने के अनुभव के आधार पर भाभी की यह प्रक्रिया को समझ रहे थे और भाभी को यह मौक़ा दे रहे थे की जैसे जैसे समय बीतता रहे वैसे वैसे भाभी सेठी साहब के लण्ड की आक्रामकता को झेलने में ज्यादा ज्यादा सक्षम होती जाए।

मैं हैरानगी भरी आँखों से सेठी साहब के लण्ड को भाभी की सुन्दर चूत में अंदर बाहर जाते हुए देख कर उसका आनंद ले रही थी। मुझे भाभी के चेहरे पर पलटते हुए भावावेश को देख कर अजीब सी उत्तेजना का अनुभव हो रहा था। भाभी के चेहरे पर कभी सेठी साहब के लण्ड के सख्त घर्षण के कारण उत्पन्न अनोखी उत्तेजक कामुकता का भाव तो कभी सेठी साहब जैसे तगड़े मर्द को अपने वश में कर लेने के अनोखे आत्म संतोष का भाव तो कभी सेठी साहब के तगड़े लण्ड से होते हुए दर्द का अनुभव के मारे एक तरह के आतंक का भाव का अजीबोगरीब मिश्रण भाभी के चेहरे पर चुदाई के समय मुझे देखने को मिला।

सेठी साहब की चुदाई से हो रहे परिश्रम के परिणाम भाभी के कपाल पर पसीने की कई बिंदुएं बड़ी ही सुन्दर लग रहीं थीं। इसे देख कर मुझे कई पतियों की यह इच्छा की उनकी पत्नी किसी गैर मर्द से चुदे समझ में आ रही थी।

सेठी साहब ने जब देखा की भाभी उनकी चुदाई की मार सहन कर पा रही है और भाभी का दर्द पहले की मात्रा में काफी कम हो चुका है तब सेठी साहब ने भाभी की चूत में अपना लण्ड पेलने की फुर्ती थोड़ी तेज कर दी।

मैं भाभी की चूत के अंदर बाहर होते हुए सेठी साहब के चिकनाहट से भरे लण्ड को देख रही थी और साथ साथ में भाभी की चूत जैसे सेठी साहब के मोटे लण्ड को अंदर की और चूस कर निगल रही हो ऐसे होते हुए अनूठे दृश्य को देख मेरे जहन में भी अजीब सी उत्तेजना हो रही थी। मैं मेरे पति का धन्यवाद करना चाहती थी जिनके कहने से मैंने भाभी को हमारी चुदाई में शामिल किया जिसके कारण मुझे यह अनूठा दृश्य देखने को मिला।

जैसे जैसे सेठी साहब ने चोदने की फुर्ती बढ़ाई तो शायद भाभी के दर्द की मात्रा फिर से बढ़ने लगी होगी। भाभी की कराहट में उसकी झलक मुझे दिखाई दी। पर सेठी साहब पर अब चुदाई का जूनून और उनके लण्ड का जोश सवार था।

पहले की तरह अब सेठी साहब ने भाभी के कराहने पर ध्यान ना देते हुए चुदाई की फुर्ती जारी रखी। यह भी कहना सही नहीं होगा की भाभी सिर्फ दर्द के मारे ही कराह रही थी। भाभी को भी सेठी साहब के फुर्ती से चोदने से ज्यादा ही उत्तेजक भाव का अनुभव हो रहा था। भाभी ने जब आँखें खोलीं और मेरी भाभी से आँख मिली तो मैंने भाभी को मेरे होँठ पर उंगली की पट्टी बांधते हुए इशारा किया की वह कराहना बंद करे और चुदाई को ज्यादा से ज्यादा एन्जॉय करे।
 
भाभी मेरे इशारे को फ़ौरन समझ गयी और मैंने सूना की भाभी कराहटें दर्द में से कामुकता के सुर में बदल गयीं। भाभी ने अपने बदन को काममें लेते हुए उसके मचलने से सेठी साहब को यह सन्देश देना शुरू किया की वह सेठी साहब की चुदाई एन्जॉय कर रही थी। जो मर्द चुदाई करता है उसे चुदाई और उत्तेजना और आनंद का एहसास तब होता है जब उसकी महिला साथीदार उसे यह सन्देश दे की वह उसकी चुदाई में बड़े आनंद का अनुभव कर रही है।

मैं भी उस समय भगवान का एक कमाल और उसकी स्त्री शरीर और स्त्री के मन की अद्भुत रचना देख और महसूस कर रही थी। मैं जानती थी की भाभी को सेठी साहब की जोश भरी चुदाई से बड़ा ही दर्द का अनुभव हो रहा था पर अपने प्रियतम को खुश करने के लिए वह अपनी कराहटों में कामुकता का सुर सूना कर अपने प्रियतम को आनंद दे रही थी।

मैंने भाभी के हाथ को कर उन्हें कुछ मानसिक सहायता देने का प्रयास किया। भाभी ने तब मेरा हाथ थामा और उसे दबाने लगी जिससे मैंने अनुभव किया की भाभी काफी दर्द झेल रही थी। पर जैसे जैसे समय गुजरता गया, भाभी के हाथ की पकड़ की सख्ती कम होती गयी और उसकी जगह भाभी की उंगलियां मेरे हाथ को सहलाने लगीं। इसका मतलब यह था की भाभी अब सेठी साहब की चुदाई एन्जॉय करने लगी थी। भाभी के मन के उन्माद का कयास उनकी उँगलियों के खेलने के ऊपर से मैं लगा रही थी।

मैं यह भी देख पा रही थी की भाभी का तन सेठी साहब के लण्ड को जवाब देते हुए सही लय में ऊपर की और उछल कर सेठी साहब की चुदाई को एक सही जोड़ीदार की तरह मैच कर रहा था। सेठी साहब ने एक एक बार मेरी नज़रों से नजरें मिला कर ऐसा इशारा किया जैसे वह भाभी जी को चुदवा ने के लिए लाने के लिए मेरा शुक्रिया कर रहे हों।

मैंने भाभी की इस चुदाई के दरम्यान एक अजीब बात महसूस की। हालांकि मैं जानती थी की भाभी को सेठी साहब की चुदाई के कारण असह्य दर्द महसूस हो रहा था, पर आश्चर्य इस बात का था की उसी चुदाई के दरम्यान भाभी बार बार झड़ती रहती थी। मैंने भाभी को सेठी साहब की चुदाई की शुरुआत में कम से कम तीन बार झड़ते हुए महसूस किया। जब सेठी साहब ने चुदाई की फुर्ती बढ़ाई और जब भाभी भी चुदाई का आनंद लेने लगी तब तो भाभी पता नहीं कितनी बार झड़ गयी।

औरत का मन बड़ी ही अजीबो गरीब विषमताओं से भरा हुआ होता है। मैं भी तो एक औरत ही थी ना। जब मैंने देखा की सेठी साहब और भाभी एक दूसरे से चुदाई में इस तरह खो गए थे की वह मुझे भी भूल गए थे तब मेरे मन में उदारता की जगह इर्षा ने ले ली।

अरे भाभी अकेली सेठी साहब की चुदाई के मजे कैसे ले सकती है? सेठी साहब की चुदाई की पहली हकदार तो मैं ही थी ना? यह तो मेरी उदारता का नतीजा था की मैंने भाभी साहेब को सेठी साहब से पहले चुदवाया। पर क्या किया जाए?

सेठी साहब और भाभी इस तरह चुदाई में तल्लीन थे की उनको इस हालात में छेड़ना और उनकी इस तरह उन्नत चुदाई में बाधा डालना कोई पाप से कम नहीं। जब कोई मर्द और औरत चुदाई में मग्न हों तो उनकी चुदाई में विघ्न डालने जैसा कोई बड़ा पाप नहीं है यह मैं जानती थी।

भाभी को सेठी साहब की चुदाई में इतना मजे लेते हुए देख मेरा मन जल उठा। पर क्या करती? मैं चुपचाप उन दोनों की चुदाई देखती रही। जब मुझसे न रहा गया, तब मौक़ा पा कर मैंने सेठी साहब की गाँड़ पर एक जोरदार चूँटी भरी। भा

भी की चुदाई जारी रखते हुए सेठी साहब ने एक आँख खोल कर देखा तो मेरी क्रोधित नजर को देखा। मेरी आँखों का भाव पढ़ कर ही वह समझ गए की मेरी इर्षा मेरे सद्भाव पर हावी हो रही थी। मैं चाह रही थी की सेठी साहब भाभी को छोड़ मुझे चोदे। सेठी साहब ने मुझे आँख मार कर इशारा किया की वह जल्द ही मेरी इच्छा पूरी करेंगे।

तब सेठी साहब ने मेरी भाभी के बदन पर कुछ झुक कर उनके होंठों से अपने होंठ मिलाये। भाभी भी सेठी साहब की चुदाई से कुछ थकी हुई लग रही थी। सेठी साहब की चुदाई को झेलना कोई आसान बात नहीं थी। भाभी ने पहली ही इन्निंग्स में बड़ा अच्छा परफॉरमेंस दिखाया यह मुझे मानना पडेगा। सेठी साहब और भाभी प्रगाढ़ चुम्बन में लग गए। मैं बड़ी ही बेचैनी से उनके अलग होने की प्रतीक्षा करती रही।

कुछ समय बाद सेठी साहब ने बड़े प्यार से भाभी के कानों में कहा, “तुम थक गयी हो। चाय पी जाए।”

भाभी ने कहा, “आपका तो अभी छूटा नहीं। आपको भी तो अपना माल छोड़ना है।”

सेठी साहब ने बड़े प्यार से भाभी को समझाते हुए कहा, “अभी तो पूरी रात बाकी है। पर भाभीजी आप कमाल हैं। क्या आपको अच्छा लगा?”

भाभी ने भी सेठी साहब से शर्माते हुए कहा, “मैं ननदसा का जितना शुक्रिया करूँ कम है। आज के जैसा अनुभव मुझे पहले कभी नहीं हुआ। आप बहुत अच्छा करते हैं।”

सेठी साहब ने इस बार भाभी का सर चूमते हुए अपना लण्ड भाभी की चूत में से निकालते हुए कहा, “भाभी जी अब हम से शर्माना छोड़िये। जो कहना है साफ़ साफ़ शब्दों में कहिये। बोलिये की अच्छी चुदाई हुई। बोलिये भाभीजी।”

भाभी ने शर्माते हुए कहा, “सेठी साहब शर्म आती है, ऊपर से ननदसा भी यहां है।”

मैंने भाभी के कूल्हे पर एक हलकी सी चपेट मार कर मुस्कुराते हुए कहा, “भाभीजी, चुदवाते हुए शर्म नहीं आयी तो बोलने में क्या शर्म? बोलो जो बौलना है।”

भाभी जी ने आँखें नीचे गाड़ते हुए कहा, “सेठी साहब बहुत अच्छा चोदते हैं। मुझे तुम्हारे भाई ने इतने सालों में ऐसा कभी नहीं चोदा।”

मेरे मुंह से निकल गया, “भाभीजी अभी देखती जाओ। अभी तो सेठी साहब का एक बार भी छूटा नहीं है। अभी तो पूरी रात बाकी है।”

सेठी साहब ने हम दोनों की चूँचियों को अपने एक हाथ से मसलते हुए कहा, “हे महिलाओं, अगर आपकी मेहरबानी हो तो हम चाय का एक प्याला पियें।”

भाभी ने कुछ शर्माते हुए और कुछ हिम्मत दिखाते हुए सेठी साहब को चूँचियों को दबाते हुए की और इशारा करते हुए कहा, “सेठी साहब, रुको, दूध रखा हुआ है। इनमें से दूध निकालने की जरुरत नहीं है। वैसे भी इन में अब दूध नहीं बचा है।”

मैंने भाभी से कहा, “भाभी सा, देखते जाओ। सेठी साहब का कोई भरोसा नहीं। कहीं सेठी साहब ने ठान ली तो देखना कहीं इन्हें चूसते हुए इन में से भी दूध निकाल ना लें।”

भाभी ने फटाफट आगे बढ़ कर सेठी साहब का हाथ लगा कर आननफानन में एक साडी अपने ऊपर लपेट ली और चाय बनाने में लग गयी।

तब सेठी साहब ने उसे रोका और बोले, “इतने सुंदर बदन को छिपा क्यों रही हो? यह सिर्फ चुदाई के लिए नहीं, दर्शन के लिए भी है।” सेठी साहब ने भाभी की लपेटी हुई साडी छीन कर भाभी को नंगी कर दिया।
 
मैं तो पहले से ही जानती थी की सेठी साहब मुझे कपडे पहनने नहीं देंगे। इस लिए मैं वैसी ही नंगी बिस्तरे पर बैठी थी। भाभी ने मजबूरी में कुछ शर्माते हुए सबसे नजरें चुराते हुए चाय बनायी और हमें दी। मुझे यह मानना पड़ेगा की भाभी नंगी चलती हुई इतनी खूबसूरत लग रही थी की मुझे भी खुद पर हीनभावना हो रही थी।

भाभी की कमर की लचक, उनके कूल्हे का घुमाव और जाँघों की खूबसूरती देखते ही बनती थी। मर्दों की आँख गड जाए ऐसे भाभी के भरे हुए कूल्हे थे। उन्हें देखते ही हर मर्द उनको सहलाना चाहेगा, कूल्हों के बीच की गाँड़ की दरार में उंगलिया डालकर उँगलियों से गाँड़ मारना चाहेंगे।

वैसे भी वह साडी पहन कर भी चलती थी तो उनके कूल्हे की मटक से मर्द लोग अपनी नजर वहाँ से हटा नहीं पाते थे तो जब कपड़ों का आवरण ना हो तो भला औरत की खूबसूरती का क्या कहना? मेरी आँखें भी भाभी की नंगी मूरत देख कर चकाचौंध हो रही थी तो सेठी साहब की तो बात ही क्या? सेठी साहब भी भाभी की नंगी सुंदरता को देख कर अपनी आँखें हरी करने में लगे हुए थे।

चलते फिरते भाभी अपनी जाँघों को चिपका रख कर अपनी खूब सूरत गोरी चूत को हमारी कुरेदती हुई आँखों से दूर रखना चाहती थी। पर ऐसे चला कैसे जाए? भाभी की अजीब ढंग की चाल देख कर मैंने भाभी से कहा, “भाभी सा, अब यह नाटक बंद ही करो और सब से अपनी चूत नाहीं छिपाओ।

यह जवानी यह खूबसूरती चंद दिनों की है, फिर हम सब बदसूरत, बेढंग हो जाएंगे। पुराने जमाने की खूबसूरत हिरोईनों की शकल और बदन आज कौन देखना पसंद करता है? तो चंद दिनों के लिए इसे मत छिपाओ। आपकी चूत इतनी खूबसूरत है तो देखने दो हमें।”

मेरी बात सुन कर भाभी ने मेरी और देखा और हल्कासा मुस्कुरा कर उन्होंने अपनी चूत को छिपाने की कोशिश बंद कर खुल कर चलने लगी।

मैंने भाभी को मेरे पास बुलाया और उनसे लिपट कर बोली, “भाभीजी, मैं आपका शुक्रिया कैसे अदा करूँ? मुझे पता ही नहीं था की आप भी हमारे साथ शामिल हो सकते हो। इसी लिए सारी बात आप से छिपाई। आज आप के हमारे साथ शामिल होने से हम बहुत ज्यादा मस्ती कर पा रहे हैं।

आपसे मुझे पहले इतना अपनापन नहीं लगता था। पर अब मुझे आप सिर्फ मेरी भाभी नहीं मेरी एक ऐसी दोस्त जिसके साथ मैं सब कुछ बात कर सकती हूँ। मैं जिसके साथ चुदाई, लण्ड, चूत कुछ भी बिंदास बोल सकती हूँ। रिश्तेदारी में ऐसे रिश्ते कहाँ मिलते हैं।”

भाभी ने मेरी आँखों में आँखें डाल कर कहा, “ननद सा, मैंने आपकी आँखों में सेठी साहब के लिए वह चुदाई वाला भाव देखा। मैं भाँप गयी की आप के और सेठी साहब के सम्बन्ध काफी करीबी, नाजुक और अंतरंग हैं। मैंने यह भी भाँप लिया की कल रात आप ने सेठी साहब से खूब चुदवाया था।

ननद सा, मैं भी प्यार की भूखी हूँ। मैं सच कह रही हूँ, आप के भाई सा मुझे अच्छा चोदते हैं पर मैं उससे खुश नहीं थी। कॉलेज में मेरा एक ऐसा तगड़ा सॉलिड बॉय फ्रेंड था जो मुझे पागल की तरह चोद कर नानी की याद दिला देता था। मैंने शादी से पहले आपके भाई सा को सब कुछ बता दिया था।

मैंने उन्हें यहां तक भी कह दिया था की अगर उन्हें मौक़ा मिला और अगर वह किसी भी औरत को चोदना चाहें तो चोद सकते हैं और अगर मुझे मौक़ा मिला तो मैं कोई तगड़े मर्द से चुदवाउंगी और आपके भाई सा कोई बुरा नहीं मानेंगे। इस बार सेठी साहब जब आये तो उन्होंने ही मुझे उकसाया था और कहा था की मुझे अगर सेठी साहब से चुदवाने का मौक़ा मिला तो मैं जरूर चुदवाउं।”

भाभी की बात सुन कर मैं चौंक गयी। इसका मतलब था भाई को भी ऐसे चुदाई करने में या करवाने में कोई दिक्क्त नहीं थी। मेरे ही यहां यह सब चल रहा था और मुझे ही कोई खबर नहीं! मैं हैरान सी भाभी का हाथ सेहला रही थी।

भाभी ने मुझे देख कर कहा, “ननद सा, मैं कब से कोई ऐसा मर्द ढूंढ रही थी जो मुझे अपनी मर्दानगी से तगड़ा चोद कर मुझे एक औरत होने का एहसास कराये। मुझे आपकी इर्षा हो रही थी। सेठी साहब जैसे बड़े ही कसरत बाज, हृष्टपुष्ट, हट्टेकट्टे, मांसल एकदम फिट जवान जिन्हें देख कर मैं खुद मोहित हो गयी थी उनसे आपने कल रात ऐसी तगड़ी चुदाई करवाइ यह देख कर मुझसे रहा नहीं गया।

मुझे आपके और सेठी साहब के रिश्ते में कोई भाँज तो नहीं मारनी थी पर आपको यह जरूर एहसास करवाना था की आप लोग मुझे बेवकूफ नहीं बना सकते, मैंने आप लोगों की चोरी पकड़ ली है। पर आपने तो सामने चल कर मुझे सेठी साहब से चुदवाने का मौक़ा देकर मुझे अपने वश में कर लिया। अब हम दोनों एक ही डाल के पंखी हैं।“

दो दिन पहले मैं यह सोच भी नहीं सकती थी की मुझे मेरी मारवाड़ी रूढ़िवादी घराने की भाभी से ऐसे शब्द सुनने को मिल सकते हैं। मैंने भाभी की आँखों में मेरे लिए अनूठा प्रेम देखा और महसूस किया। उस दिन तक मेरे और भाभी के सम्बन्ध ननद और भाभी के ही थे पर उस रात हम एक दूसरे को नंगी कर रहे थे और एक ही मर्द से एक दूसरे के सामने चुदवा रहे थे। खैर भाभी ने मेरे सामने चुदवाया था मैंने नहीं।

भाभी को श्याद इस बात का एहसास हुआ और वह बोल पड़ी, “ननद सा, अब तक आप मेरी चुदाई देखती रही, अब मैं सेठी साहब आपकी चुदाई कैसे करते हैं वह देखना चाहती हूँ। सेठी साहब अब मेरी ननद सा को चोदिये प्लीज।”

मैंने भाभी के गाल में चूँटी भर कर कहा, “आयहाय रे मेरी नटखट भाभी! मेरे ही प्रियतम से चुदवा कर मेरे ही प्रियतम को मुझे चोदने का न्यौता दे रही हो! अरे मैं तो कल सेठी साहब की चुदाई की मार झेल चुकी हूँ। हाँ यह कहो की तुम्हें सेठी साहब मेरी चुदाई कैसे करते हैं यह देखना है। ठीक है तो देखो।”

सेठी साहब मूक दर्शक की तरह चुपचाप बैठे कभी कभी मंद मुस्कुराते हम दो नारियों की प्रेम गोष्ठी सुन रहे थे।

मैंने सेठी साहब की और घूम कर कहा, “सेठी साहब आज आपकी तो चांदी हो गयी। दो खूबसूरत औरतों को एक साथ चोदने का मौक़ा मिल गया। एक को चोद लिया आपने दूसरी चुदवाने के लिए हाजिर है।”

यह कह कर मैं बिस्तर पर लेट गयी और मैंने अपनी बाँहें फैला कर सेठी साहब को आमंत्रित किया। पर सेठी साहब आये उसके पहले मेरी भाभी मेरे ऊपर सवार हो गयी और मेरी आँखों में आँखें डालकर शरारत भरी मुस्कान करती हुई बोली, “ननद सा, अब सिर्फ सेठी साहब नहीं, मैं और सेठी साहब हम दोनों मिलकर आपको चोदेंगे।”

मैं भाभी की बात सुन कर काफी हैरान रह गयी और बोली, “अरे बापरे! एक अकेले सेठी साहब से तो मुश्किल से निपट सकती हूँ, और आप दोनों मिलकर चोदोगे मुझे?” फिर एक गहरी साँस लेकर शरारती अंदाज में कहा, “अरे भाई सेठी साहब तो चलो ठीक है पर आप कैसे चोदोगे मुझे? लण्ड कहाँ से लाओगी?”

भाभी ने मेरी कमर में घूंसा मार कर हँसते हुए कहा, “अरे भाई सेठी साहब का लण्ड तो आप अकेले नहीं हम दोनों के लिए भी ज्यादा ही है। तो फिर लण्ड की जरुरत तो है नहीं। बाकी आपके लिए सेठी साहब के साथ मैं हूँ ना।”

मैंने आँख मटकाते हुए कहा, “भाभी सा, सब सोच रखा है आपने। चलो यह भी ठीक। है अब जब आपके ही घर में चुदाई करवानी है तो यह भी झेलना ही पड़ेगा। मरता क्या ना करता?”

भाभी मेरे स्तनोँ पर अपने होंठ रख कर बोली, “ननद सा, आज मैं और सेठी साहब मिल कर तुम्हारे स्तनोँ में से दूध निकाल कर ही रहेंगे।”

मैंने भाभी के कान पकड़ कर कहा, “भाभी सा, जान लोगे क्या मेरी? अभी कहाँ से दूध आएगा? हाँ अगर तक़दीर ने चाहा और इस बार सेठी साहब से मैं गर्भवती बन गयी, तब जरूर निकलेगा दूध इनमें से। और मैं आप को जरूर वह दूध पिने के लिए बुलाऊंगी।” पर मेरे बोलने के फ़ौरन बाद मुझे पछतावा होने लगा की कैसे मेरे मुंह में से यह शब्द फिसल पड़े? अब भाभी मुझे जरूर पूछेगी बच्चे के बारे में।

मेरी बात सुन कर भाभी थोड़ी पीछे की और हटी। भाभी के चेहरे पर सदमे के से भाव थे। वह हड़बड़ाती हुई बोली, “बच्चा? सेठी साहब से? क्या कह रही हो ननद सा?” तब मेरे लिए बड़ी ही मुश्किल घडी आयी। मैं क्या बताऊँ मेरी भाभी को?

मैं एक बात समझ गयी थी। भाभी बहुत ही तेज औरत थी। वह मेरा झुठ एक सेकंड में भाँप लेगी। मुझे झूठ बोलना आता नहीं। मेरे चेहरे के भाव से कोई भी आसानी से यह भाँप सकता है, और भाभी की नजर तो बड़ी ही कुशाग्र थी। मैंने असहाय हो कर सेठी साहब की और देखा।

सेठी साहब ने फ़ौरन मोर्चा सम्हाला और भाभी को साथ में बिठा कर कहा, “भाभी सा, यह कहानी बड़ी लम्बी है और उसे समझाने में वक्त भी लगेगा और हमारा यह शाम का मजा किरकिरा हो जाएगा। क्या हम फिर बाद में इसके बारे में बात कर सकते हैं?”

भाभी एक समझदार औरत थी और उसे मेरे और सेठी साहब पर काफी भरोसा था। भाभी ने कहा, “ठीक है सेठी साहब, आप और ननद सा कहते हो तो बादमें ही सही, पर मुझे बताना जरूर।”

सेठी साहब ने भाभी के हाथ से हाथ मिला कर बड़ी ही लुभावनी मुस्कान देते हुए कहा, “भाभी यह मेरा पक्का वाला प्रॉमिस रहा की बाद में अथवा ज्योति मौक़ा और समय मिलने पर मैं यह सारी कहानी विस्तार से तुम्हें सुनाएंगे।“

भाभी ने भी उसी लहजे से मुस्कुराते हुए सेठी साहब से कहा, “ठीक है, जब आप मेरी चुदाई करते हुए मुझे रगड़ रहे थे तब ननद सा बाजू में लेटी बड़े मजे ले रही थी। अब मजे लेने की मेरी बारी है।” फिर भाभी मेरी और घूम कर बोली, “ननद सा अब अपनी रगड़ाई के लिए तैयार हो जाओ।”

फिर भाभी ने सेठी साहब का लण्ड अपनी हथेलियों में लिया और उसे थोड़ा सा ढीला देख कर बोली, “सेठी साहब, यह क्या? मेरी ननद सा को चोदना है और आपका लण्ड अभी पूरी तरह सख्त नहीं हुआ? यह कैसे चलेगा? लाइए मैं इसे सख्त तगड़ा टाइट कर देती हूँ।”

यह कह कर भाभी सेठी साहब को पलंग पर लिटा कर खुद अपना मुंह सेठी साहब के लण्ड के टोपे पर लगा कर उसे बड़े प्यार से चाटने लगी। थोड़ा चाट कर जैसे उसे साफ़ कर रही हो ऐसे कर फिर सेठी साहब के लण्ड को दोनों हथेलियों में पकड़ कर उसे सहलाने और उसकी त्वचा को हथेलियों से ऊपर नीचे कर सेठी साहब के लण्ड को अच्छी तरह से पम्पिंग करने लगी।

भाभी कुछ देर लण्ड को सहलाती तो कुछ देर मुंह में डालकर सेठी साहब से अपने मुंह को चुदवाती। सेठी साहब भी अपना पेंडू ऊपर कर के भाभी के मुंह को चोदने की कोशिश करते। भाभी ने तब मुझे पकड़ कर सेठी साहब के अंडकोष को चाटने का इशारा किया।
 
मैं भी भाभी के साथ सेठी साहब के लण्ड को तो कभी उनके अण्डों को बारी बारी से चाटने लगी। हम दोनों महिलाओं को मिल कर सेठी साहब के लण्ड को चूसना मेरे लिए क अजीब सा रोमांचक कार्य था। सेठी साहब भी हम दोनों की मिली भगत से सेठी साहब के लण्ड को इतनी जबरदस्त ट्रीटमेंट देने से काफी उत्तेजित हो चुके थे और उनका लण्ड लोहे के छड़ की तरह सख्त हो चुका था।

सेठी साहब ने हमें रोक कर कहा, “अरे बस भी करो यार! भाभी क्या तुम अब मेरा माल अपने मुंह में ही छुडवाओगे क्या? तुम्हें पता है की मुझे तो ज्योति की चूत में मेरे माल को छोड़ना है।”

सेठी साहब ने तब भाभी से सारी बातें छिपाने का स्वांग ना करना ही ठीक समझा और यह बता ही दिया की वह मुझे चोद कर गर्भवती बनाएंगे। भाभी को सेठी साहब की सच बोलने की बात पसंद आयी।

वह फ़ौरन अपना कान पकड़ कर बोली, “सॉरी बाबा, ना, मैं ऐसा पाप नहीं करुँगी। आप मेरी ननद सा को जरूर माँ बनाइये। मुझे मेरे आप दोनों के प्यार से पैदा हुए छोटे से लाले को गोद में बिठाकर खिलाने की बड़ी ही आशा है। लीजिये मैं कबाब में हड्डी ना बन कर हट जाती हूँ।” मैंने भाभी की आवाज में कुछ आहत होने की झलक महसूस की।

मैंने फ़ौरन भाभी का सर अपनी छाती पर लगा कर मेरा एक स्तन भाभी के मुंह में दिया और बोली, “भाभी सा, यह सच है की मैं सेठी साहब के वीर्य से माँ बनना चाहती हूँ। सेठी साहब की पत्नी डॉली जी को सेठी साहब के वीर्य से बच्चा नहीं हो रहा। डॉली जी को कैसे भी एक बच्चा चाहिए।

या तो वह मैं सेठी साहब के वीर्य से पैदा कर डॉली जी को दूंगी या तो वह डॉली जी खुद पैदा करेंगी मेरे पति राज के वीर्य से। दोनों में से एक तो होगा ही। अगर दो बच्चे होते हैं तो एक बच्चे को मैं रख लुंगी। यही हमारा प्लान है। मैंने सारी बात आपको घड़े में सागर के रूप में संक्षिप्त में बता दी।”

मेरी बात सुन कर भाभी अपने आंसूं रोक नहीं पायी। भाभी आंसू बहाती हुई बोली, “मुझे माफ़ कर देना ननद सा, मैंने आपको गलत समझा। मैंने डॉली जी का भी फ़ोन पर मजाक उड़ाया। हाय राम, यह मेरे से बड़ा पाप हो गया। मैं डॉली जी की पीड़ा को समझ सकती हूँ।

मैंने आपको और आपके इस बहुत बड़े बलिदान को छिछोरे रूप में ले लिया। ननद सा, मैं भी इस राह से गुजर चुकी हूँ। मैं भी यह सब भुगत चुकी हूँ। मेरी जिंदगी में भी ऐसा ही एक समय एक झंझावात के रूप में आया था। हमने भी कुछ ऐसा ही कर उसे पार किया है। आप यह सब नहीं जानते। मुझे माफ़ कर देना।”

मैंने भाभी को मेरे स्तनों को चूसने के लिए इंगित किया और बोली, “भाभी, आप दिल छोटा मत कीजिये। मुझे अब आपकी यह छोटी छोटी शरारतें बड़ी ही प्यारी लगने लगीं हैं। आप जैसी हैं वैसी ही रहिये। यह हंसी मजाक ही जिंदगी का अमृत है। पर बाद में मुझे जरूर बताइयेगा की आपके साथ क्या हुआ था।”

भाभी ने मेरे स्तनोँ को बड़ी शिद्दत से चूसते हुए कहा, “ननद सा जरूर बताउंगी। पर अभी तो आपको सेठी साहब से अच्छी तरह रगड़वाना है और माँ भी बनना है।” यह कहते हुए भाभी ने मेरे स्तनों की निप्पलों को अपने दांत में दबा कर जोर से काटना शुरू किया। मेरे मुंह से दबी हुई चीख निकल पड़ी। मैंने कहा, “भाभी सा, यह काम सेठी साहब के लिए ही छोड़ दीजिये ना?”

भाभी ने हँसते हुए कहा, “ननद सा, मैंने कहा न था की सेठी साहब और मैं हम दोनों मिलकर आपको चोदेंगे? अब यह डिपार्टमेंट मेरा है।” यह कह कर भाभी ने मेरे एक निप्पल को और जोर से काटा।

फिर भाभी ने मेरी दो टांगें चौड़ी की और खुद बीच में आ कर जो तेल मैंने भाभी की चूत में और सेठी साहब के लण्ड पर लगाया था वही तेल मेरी चूत में अपनी उंगलियां डालकर लगाने लगी। भाभीने बड़ी उदारता से वह तेल मेरी चूत की सुरंगों में लगाया और मेरी पूरी चूत वह तेल से लबालब चिकनी कर दी। मेरी भाभी की इस तरह मजाक करते हुए भी मेरी चिंता करती देख मेरी आँखें नम हो गयी।

मैंने भाभी को मेरे ऊपर खिंच कर मेरे ऊपर सुला दिया। फिर भाभी के होँठों से अपने होँठ चिपका कर मैंने कहा, “भाभी, आप की जबान पर भले ही कटाक्ष हो पर आपका दिल शीशे की तरह साफ़ है। आप दिल की बड़ी भली और अच्छी औरत हो।”

भाभी ने मेरी आँखों में पानी देखा तो वह भी कुछ इमोशनल हो गयी। भाभी की आँखों में भी नमी आयी, उसे छिपाते हुए भाभी बोली, “ननद सा, मैं आपकी मीठी मीठी बातों में फंस कर सेठी साहब को यह नहीं कहने वाली की आपको ज्यादा सख्ती से ना रगड़े।”

मैंने भाभी का एक हाथ पकड़ कर मुस्कुराते हुए कहा, “भाभी सा, सेठी साहब जैसे चोदने वाले हों और आप जैसे देखकर मजे लेने वाले हों तो मैं जिंदगी भर बिना रुके इस लण्ड से रगड़ते हुए चुदवाना पसंद करुँगी।”

भाभी ने मुझे टोकते हुए कहा, “ना रे बाबा, ऐसा मत करना। फिर तो सारी रगड़ाई का मजा आप ही लोगी। अरे दो और औरतें सेठी साहब के इस लण्ड से रगड़ने ले लिए बेताब हैं वह फिर कहाँ जाएंगी? तब मेरा और डॉली जी का क्या होगा?”

सेठी साहब बाजू में बैठे हम दोनों नारियों की एक दूसरे को छेड़खानी के साथ हो रहा वार्तालाप सुन रहे थे। आखिर में वह बोल ही पड़े, “अरे तुम दोनों महिलाओं ने मिलकर तो सारा स्टेज ही हथिया लिया है। अरे भाई आजकी चुदाई का हीरो तो मैं हूँ। मुझे मेरी ज्योति को चोदने तो दो अब?”

भाभी ने मुस्कुरा कर सेठी साहब की और देखा और अपना अंगूठा ऊपर कर इशारा किया की वह अब मुझे चोद सकते हैं। भाभी धीरे से मेरी एक तरफ हो गयी और सेठी साहब की जगह खाली कर दी। सेठी साहब मेरी टाँगों के बीच में पहुँच गए और मेरी टाँगें फिर से अपने कन्धों पर रख मुझे चोदने के लिए तैयार हुए। भाभी ने सेठी साहब का खड़ा तगड़ा लण्ड अपनी दोनों हथेलियों में लिया और जैसे उसका वजन कर रही हो वैसे बोलीं, “यह ढाई किलो के लण्ड को मुझे अच्छी तरह से चिकना करना पडेगा, ताकि मेरी ननद सा को चुदवाने में दिक्कत ना हो।”

यह कह कर भाभी ने सेठी साहब के लण्ड को पहले तो जैसे उसके वजन का अंदाज लगा रही हो वैसे अपनी हथेलियों में ऊपर नीचे किया और फिर हलके बड़े प्यार से मेरी चूत की पंखुड़ियों को अलग कर के उसके केंद्र स्थान पर रखा और फिर उस तेल से सेठी साहब के लण्ड को जैसे अभिषेक कर रही हो ऐसे उस तेल को अच्छी तरह से पूरी लम्बाई और गोलाई पर खूब उदारता पूर्वक लगाया।

इस बार सेठी साहब को अपना लण्ड मेरी चूत में घुसेड़ने में पहले जितनी मशक्क्त नहीं करनी पड़ी। मेरी भाभी बैठ कर बड़े नजदीक से सेठी साहब का तगड़े घोड़े के जैसे लण्ड को मेरी नाजुक चूत में घुसते हुए देख कर छोटी बच्ची किसी नज़ारे को देख कर तालियां बजा कर हंसती है ऐसे तालियां बजा कर हंसती हुई बोलने लगी, “मेरी ननद सा चुद रही है रे, मेरी ननद सा चुद रही है।”

भाभी की इस बचकाना हरकत देख कर मुझसे मेरी हंसी रोकी नहीं गयी। सेठी साहब से चुदवाते हुए, उनके धक्कों को सहन करते हुए भी मेरे मुंह से हंसी खिल कर फुट पड़ी। सेठी साहब की भाभी की हरकत से अपनी मुस्कुराहट को रोक नहीं सके।

सेठी साहब ने भाभी की और मुड़कर देखा और कहा, “भाभी सा, आप यह कतई ना समझें की आपकी ननद सा को चोदते हुए आपको मैं छोड़ दूंगा।”

यह कहते हुए सेठी साहब ने भाभी को अपनीं और खींचा और भाभी की मदमस्त चूँचियों में से एक की निप्पल को अपने मुंहे में लिया और मुझे चोदते हुए वह उस निप्पल को जोर से चूसने लगे। साथ साथ में वह कभी जोश में आ कर उस निप्पल को काट भी रहे थे। सेठी साहब का एक हाथ मेरे एक स्तन को मसल रहा था जब की उनका दुरा हाथ भाभी की पतली कमर के इर्दगिर्द था। सेठी साहब मुझे चोदते हुए एक साथ दो औरतों के साथ मजे करने का आनंद ले रहे थे।

मेरी तो हालत ही खराब थी। जैसे ही मैंने सेठी साहब का लण्ड मेरी चूत में लिया की मेरी चूत में अजीब सी झनझनाहट फिर से चालु हो गयी। सेठी साहब से मैं पहले दिन चुद चुकी थी। पर पता नहीं सेठी साहब के लण्ड का स्पर्श ही कुछ ऐसा था की मेरी चूत क्या मेरे पुरे बदन में एक तेज आंधी के समान उत्तेजना की लहरें दौड़ने लगतीं थीं।

मैं जितनी मेरी पूरी जिंदगी में मेरे पति के साथ नहीं झड़ी होउंगी उससे कहीं ज्यादा सेठी साहब के लण्ड के दो या तीन स्ट्रोक से झड़ जा रही थी। मेरा झड़ना सेठी साहब शायद महसूस कर रहे होंगे, पर मैं इतनी ज्यादा बार झड़ रही थी की शायद सेठी साहब उसे मेरी आतंरिक प्रक्रिया मान कर उसे झड़ना नहीं मान रहे होंगे क्यूंकि वह फिर भी मुझे अपने तगड़े लण्ड से पेलते ही रहेथे।

मेरी हालत मेरी भाभी और खराब कर रही थी। वह सेठी साहब के लण्ड जहां से मेरी चूत में घुस कर गायब हो जाता था वह सतह पर मेरी चूत की पंखुड़ियों को अपनी उंगली के छोर से बार बार सेहला रही थी, मसल रही थी। मेरी चूत की पंखुड़ियों को मसल मसल कर मुझे में और भी तेज उत्तेजना पैदा कर रही थी।
 
औरत जब किसी मर्द से चुद रही होती है तो कई बार अपने आपको झड़ने के लिए लण्ड से चुदवाते हुए वह अपनी चूत की पंखुड़ियों को अपनी उँगलियों से मसलती रहती है। ऐसा करने से उसकी चूत को अतिरिक्त रोमांचक उत्तेजना मिलती है। इस प्रक्रिया में उसकी उंगलियां अक्सर लण्ड को भी छू लेती हैं। उसका लण्ड पर भी असर होता होगा। पर चूत पर तो उसका गजब का असर होता है।

मुझे तो अपनी उँगलियाँ नहीं किसी और की उंगलियां छेड़ रहीं थीं। मेरा बार बार झड़ना भला कैसे रुक सकता था? इसी कारण भी सेठी साहब से चुदवाते हुए पता नहीं मैं कितनी बार झड़ती ही रही।

उधर मेरी भाभी सा मुझे बार बार झड़ने के लिए जो भी हथकंडे अपनाने चाहिए वह अपना रही थी। कभी वह मेरी गाँड़ में उंगलियां डालती तो कभी मेरी नाभि को छेड़ती। कभी वह अपने मुंह की लार अपनी उँगलियों में लपेट कर मेरे मुंह में डालती तो कभी मेरे होँठों से अपने होंठ मिलाकर मेरी जीभ को चूसकर जैसे मेरे मुंह की साड़ी लार चूस जानी हो ऐसे कोशिश करती। कभी वह मेरे कानों या नाक को अपनी जीभा से चाटती तो कभी मेरी गाँड़ की दरार में अपनी जीभ डालकर वहाँ चाटती।

मेरी समझ में नहीं आ रहा था की मेरी भाभी ना सिर्फ अपने मर्द को मजे कराना जानती थी, वह एक औरत को कैसे उत्तेजित करके उसे अपने मर्द से चुदवाने का सबसे ज्यादा मजा कैसे लिया जाए उस कला में निष्णात लगती थी।

इधर सेठी साहब को मेरी टाइट चूत को चोदने में बहुत मजा आ रहा था। वह मेरी और भाभी की छेड़खानी देख रहे थे और उसे देख उनके लण्ड में और भी जोर से उनका वीर्य दौड़ता हो ऐसा लगता था। मेरी चूत को उनका लण्ड अब अच्छी तरह से चोद रहा था। काफी तेल से मेरी चूत भरी हुई होने के कारण सेठी साहब के चोदने से कमरे में “फच्च फच्च” की आवाज गूंज रही थी।

साथ साथ में हमारी जाँघे टकराने से भी “थपाक, थपाक” की आवाज भी साथ दे रही थी। सेठी साहब के अपने लण्ड को मेरी चूत में जोर जोर से पेलने के कारण मेरे सारे संतुलन की ऐसी की तैसी हो जाती थी।

सेठी साहब के पेंडू के तगड़े धक्के के कारण मैं तकिये के ऊपरी छोर पर पहुँच जाती थी। फिर जैसे तैसे मैं वापस तकिये पर सर रखने लगती की दूसरे धक्के में फिर वही बात। मैंने सेठी साहब को चोदने से रोक कर सेठी साहब को अपनी बाँहों में भरने की कोशिश की।

मैं भला सेठी साहब को अपनीं बाँहों में कैसे भर सकती थी? जब सेठी साहब ने यह देखा तो उन्होंने चुदाई रोक कर मुझे अपनी विशाल बाँहों में भर लिया और मेरे पुरे बदन को अपने इतने करीब खींचा की उनका पूरा लण्ड मेरी चूत में घुस जाए। पर यह तो संभव ही नहीं था क्यूंकि शायद उनके लण्ड के लम्बाई के जितनी मेरी चूत के सुरंग की गहराई नहीं थी।

सेठी साहब मेरे बार बार झड़ने से बड़े ही ज्यादा उत्तेजित हो रहे थे क्यूंकि उनके लण्ड पर मेरी चूत इतनी जबरदस्त खिंचाव कर रही थी की उनका लण्ड अब उनके नियंत्रण में नहीं रह रहा था। उनके लण्ड में सुनामी की तरह दौड़ रहा वीर्य का फव्वारा अब बाहर आकर मेरी चूत की पूरी सुरंग भर देने और मेरी बच्चेदानी में जा कर मेरे ही बीज को फलीभूत करने के लिए जैसे व्याकुल हो रहा था। उसके ऊपर से भाभी जी की करामात देख कर सेठी साहब बहुत ज्यादा उत्तेजित हो रहे थे।

तब मैंने सेठी साहब से कहा, “मेरे पति, मेरे प्रियतम, मेरे मालिक, मेरे राजा, मेरे स्वामी, अब मैं तुम्हारे बच्चे की माँ बनने के लिए बड़ी ही बेताब हूँ। मेरी इच्छा पूरी करो। मुझे अपने बच्चे की माँ बनाओ। जो आपने मुझे अब तक इतनी शिद्द्त से चोदा है और मैंने आप से बड़े ही प्यार और धीरज से चुदवाया है उसका फल मुझे दो।”

सेठी साहब ने जैसे इसे सूना तो मारे उत्तेजना के वह अपने वीर्य को रोक नहीं पाए और एक गहरी सांस लेकर बोल पड़े, “ज्योति , मैं अब मेरा माल छोड़ रहा हूँ। इसे अब सम्हालना तुम्हारा काम है। ओह……. आह्हः…….” की आवाजें करते हुए सेठी साहब ने अपने लण्ड में से गरमा गरम वीर्य का फव्वारा मेरी चूत में छोड़ दिया।

मेरी चूत की पूरी सुरंग एकदम गरम हो गयी। कहीं ना कहीं मुझे ऐसा लगा की मेरी बच्चा दानी में सेठी साहब के किसी ना कसी अणु ने मेरे अणु से मिल कर उसे फलीभूत कर ही दिया था। मुझे भरोसा हो गया की सेठी साहब के इस वीर्य से मैं जरूर बच्चे का गर्भ धारण करुँगी।

जब भाभी सा ने देखा की सेठी साहब ने चुदाई रोक दी है और अपना लण्ड मेरी चूत में रखे हुए उन्होंने मुझे कस कर अपने बाहुपाश में ऐसे लिया है की अगर वह मुझे और जोर से दबाएंगे तो मेरी हड्डियों का तो कचुम्बर ही निकल जाएगा और मेरी चूत की सुरंग में अपना गरमागरम वीर्य फव्वारे सा छोड़ कर मेरी चूत को लबालब भर दिया है तब वह बड़ी खुश हुई और तालियां बजा बजा कर गाने लगी,

“लण्ड जकड़ गयो चूत में छोड़के अपणो माल, कहत अबीर लुगाई के होगो तगड़ो बाल।”

इसका मतलब की जब कोई लण्ड किसी औरत की चूत में एकदम फिट बैठ जाए (जो छूटा ने की कोशिश करने पर भी ना छूटे – जैसे कुत्ता कुतिया चुदाई करते हुए चिपक जाते हैं वैसे) और फिर फिट ही रहते हुए वह अपना माल उस चूत के अंदर छोड़ दे तो समझना की वह औरत एक तगड़े बच्चे को जनम देगी। राजस्थान का यह अश्लील गलियारों में काफी प्रचलित दोहा मेरी परिस्थिति में बिलकुल फिट बैठ रहा था।

मेरी चूत में सेठी साहब ने जब अपना पूरा अंडकोष में भरा हुआ वीर्य खाली कर दिया तब उन्होंने मेरी आँखों से आँख मिलाई और मुस्कुरा कर मेरे होँठों से अपने होँठ मिलाये। कुछ देर प्यार भरा चुम्बन करने के बाद सेठी साहब अपना सिर थोड़ा ऊपर कर बोले, “मुझे लगता है की हमारे बच्चे की आत्मा ने तुम्हारे पेट में प्रवेश कर बालक रूप ले लिया है। अब तुम वाकई में ना सिर्फ मेरी पत्नी बन गयी हो, अब तुम मेरे बच्चे की माँ भी बनोगी।”

मैंने सेठी साहब की नज़रों से कुछ पल नजरें मिलायीं फिर नजरे नीची कर कहा, “मैं यही तो चाहती हूँ।”

सेठी साहब के अपना वीर्य मेरी चूत में पूरी तरह से खाली कर देने के बाद फिर हम ने चाय का अल्पविराम रखा। अब तो भाभी बस मुझे ही सेठी साहब से चुदवाने पर आमादा थी। वह चाहती थी की सेठी साहब मुझे बार बार चोदे और अपना वीर्य बार बार मेरी चूत में उँडेले।

कहीं न कहीं कभी ना कभी तो उनका कोई शुक्राणु मेरे अणु से मिल कर उसे फलीभूत करेगा। उस रात भाभी ने सेठी साहब से तीन बार मेरी चूत में वीर्य स्खलन करवाया। अब मेरी भाभी ऐसे करने लगी जैसे उन्होंने ने मुझे सेठी साहब से गर्भवती बनाने की ठान ही ली हो।
 
उस रात मेरी तीन बजे तक चुदाई हुई। मैं क्या बताऊँ, सेठी साहब का लण्ड तो कहर ढा ही रहा था मेरी चूत पर, पर भाभी भी कुछ कम नहीं थी। भाभी बार बार सेठी साहब को जोश दिलाती, कभी उनके लण्ड के इर्दगिर्द अपनी दोनों हथेलियों की उँगलियों से रिंग बना कर सेठी साहब के अंदर बाहर हो रहे लण्ड को और उत्तेजित करना तो कभी चुदाई के चलते मेरी चूत की पंखुड़ियों को सहलाते रहना।

भाभी ने मुझे दो बार तो घोड़ी बनवाया और सेठी साहब से चुदवाया। जब मुझे घोड़ी बनायी तब खुद ही बोलती की सेठी साहब मेरी गाँड़ नहीं मारेंगे क्यूंकि उनको माल चूत में डालना है, गाँड़ में नहीं। साथ में सेठी साहब को मेरी तरफ से यह भी वचन दे दिया की मैं सेठी साहब से जरूर गाँड़ मरवाउंगी पर एक बार मेरा गर्भ रह जाए। जब मैं घोड़ी बन के सेठी साहब से चुदवा रही थी तो भाभी मेरे आगे लेट कर मुझसे अपनी चूँचियाँ चुसवा रही थी और मेरी चूँचियों को जोर से मसल रही थी।

भाभी ने मुझसे चुदवाते हुए कई बार यह बोलते हुए अपनी चूत चुसवाई की “ननद सा, सेठी साहब से चुदवाने के सारे मजे तो आप ले रहे हो तो मुझे कुछ मजे तो लेने दो।”

उस रात मैंने कई बार कोशिश की की भाभी सेठी साहब से चुदवाये पर भाभी इसी जिद पर अड़ी थी की जैसे ही मैं सेठी साहब से गर्भवती होने का पक्का पुष्टिकरण कर दूंगी फिर भाभी सेठी साहब से इतना चुदवाएगी की मेरा नंबर भी नहीं लगने देगी। भाभी ने सेठी साहब से भी इसके लिए समर्थन पा लिया।

मैंने भी भाभी को सेठी साहब से चुदाई करवाते हुए बहुत प्यार किया। सेठी साहब बेचारे को हम लोगों के स्तनोँ को सहलाने का बहुत कम मौक़ा मिला क्यूंकि या तो मैं भाभी के स्तनों को चूस, सेहला, मसल और काट रही थी या तो भाभी मेरे। भाभी को भले ही सेठी साहब ने उस रात बादमें चोदा ना हो, पर मैंने भाभी की चूत में उंगलियां डालकर उनको कई बार झड़ने का मौक़ा दिया।

मेरी उंगली चोदन से भाभी कई बार झड़ गयी। मैं एक औरत होने के नाते जानती हूँ की जब मैं भाभी की चूत को मेरी उँगलियों से चोद रही थी तब भाभी को सेठी साहब के तगड़े लण्ड से चुदवाने का कितना ज्यादा मन हुआ होगा।

पर उन्होंने गज़ब का संयम रखा और ना सिर्फ एक बार भी मुंह से बोला की वह चुदवाना चाहती है बल्कि जब भी मैंने या सेठी साहब ने इच्छा जताई की भाभी की बारी है सेठी साहब से चुदवाने की तो भाभी एकदम गुस्सा करती हुई उन्होंने उस रात सेठी साहब को मजबूर किया की वह ना सिर्फ मुझे तगड़े से चोदे बल्कि बार बार अपना माल मेरी चूत में उंडेलते रहें। मेरी भाभी का यह एहसान मैं जिंदगी भर भूल नहीं सकती।

तीन बजे सोने के बाद भी भाभी सुबह छे बजे अपना काम करने के लिए तैयार हो कर नीचे पहुँच गयी। मुझे उन्होंने कहा की मैं तभी नीच उतरूं जब वह बुलाये। भाभी पुरे दिन घर के काम में लगी रही और मुझे नीचे नहीं बुलाया। मैं दिन में काफी सोती रही। दो तीन बार मेरे पति राज का फ़ोन आया तो मैंने उन्हें सब बात संक्षिप्त में समझाई।

पता नहीं कैसे पर मुझे पिछली रात यह तसल्ली हो चुकी थी की सेठी साहब ने मुझे गर्भवती बना दिया था। मैंने तय किया था की आखरी रात मैं भाभी को सेठी साहब से खूब चुदवाउंगी और मैं उन दोनों के बीच में नहीं आउंगी।

तीसरी और आखिरी रात में जब भाभी सारा काम निपटा कर ऊपर आयी तब मैंने भाभी की एक ना सुनी और जिद पकड़ी की आज की रात भाभी को ही सेठी साहब से चुदवाना है। इस मामले पर काफी झंझट हुई। काफी कश्मकश और गरमागरम बहस के बाद यह तय हुआ की सेठी साहब पहले भाभी को चोदेंगे और फिर बादमें मुझे चोदेंगे।

सेठी साहब ने यह वचन दिया की वह अपना वीर्य सिर्फ मेरी चूत में ही डालेंगे। उस रात सेठी साहब काफी फॉर्म में थे। उस रात उन्होंने मुझे और भाभी को चार चार बार लम्बे अरसे तक चोदा। मुझे समझ में नहीं आया की सेठी साहब इतने लम्बे अरसे तक बिना वीर्य छोड़े भाभी को करीब एक घंटे तक अलग अलग पोजीशन में कैसे चोदते रहे।

उसके बाद जब उन्होंने मुझे चोदना शुरू किया तो उनका लण्ड पहले की ही तरह तगड़ा, कड़क, सख्त लोहे के छड़ की तरह खड़ा हुआ था। उसके बाद मुझे भी सेठी साहब चोदते रहे। सेठी साहब ने भाभी की तरह मुझे भी ऊपर से, पीछे से, साइड में से और ऊपर चढ़ा कर चोदा। आखिर में जब मैंने सेठी साहब से कहा की मेरी चूत में सूजन हो सकती है, तब कहीं जा कर सेठी साहब ने अपना वीर्य मेरी चूत में छोड़ा।

उस रात सेठी साहब के साथ हमारी चुदाई करीब करीब पूरी रात चली। सुबह के चार बजे तक सेठी साहब हमें बारी बारी चोदते रहे। पर मैं अगर यह कहूं की हम तीनों में से कोई भी एक मिनट के लिए थका या बोर नहीं हुआ।

हालांकि मुझे मेरी चूत में सूजन महसूस हो रही थी और जब सेठी साहब ने कहा की चार बजने वाले हैं और उन्हें काम पर जा कर मीटिंग अटेंड करनी है तब जा कर मैंने सेठी साहब से कहा की मेरी चूतमें भी सूजन महसूस हो रही थी और वह अपना वीर्य मेरी चूत में डालकर उस रात की चुदाई को संपन्न करें, तब सेठी साहब ने अपनी मर्जी से उनका वीर्य मेरी चूत की सुरंगों में छोड़ा।

जब सब काम हो चुका तब भाभी ने मेरे कान पर एक बात आ कर कही जिससे मैं चौक गयी। भाभी ने कहा, “ननद सा, मैं क्या कहुँ, मुझसे एक भारी गलती हुई गयी।”

मैंने भाभी का हाथ थाम कर कहा, “भाभी सा, एक तो क्या, आज के दिन आपकी सौ गलतियां माफ़ हैं, चाहे वह कितनी ही बड़ी क्यों ना हो।”

फिर भाभी ने मेरे कान में जो कहा, उसे सुन कर मैं पूरी की पूरी सुन्न रह गयी। मुझे ऐसा लगा जैसे मेरे पाँव के नीचे से जमीन फट गयी। ऊपर से आसमान टूट पड़ा। मैंने भाभी से कहा, “भाभी सा, आपने यह क्या किया? अरे मुझ से तो पूछ लिया होता।”
 
अब आगे दिल्ली में राज और डॉली जी की कहानी राज की जुबानी…

यहां मैं पाठकगण से यह पूछना चाहता हूँ की क्या उनको यह कहानी पसंद आ रही है, या नहीं? अगर आ रही हो तो अपने कमैंट्स लिखें। कुछ कमैंट्स जरूर लिखे जा रहे हैं पर ज्यादातर जो कमैंट्स जो मैं देखता हूँ वह किसी लड़की की कमैंट्स के पीछे लिखे हुए ही होते हैं। जिसमें दूसरे लड़के लड़की को ललचा ने की, पटाने की और अपनी और आकर्षित करने की कोशिश में ही लगे रहते हैं, उनके होते हैं।

मेरे लिखने के लिए प्रोत्साहन या प्रेरणा आप लोगों के कमैंट्स से ही मिलती है। वरना क्यों मैं अपना समय बर्बाद कर यह सब लिखूं? करने को मेरे पास बहुते काम है जो ज्याद लाभकर हैं।

तो अगर आपको कहानी पसंद आये तो कमैंट्स लिखिए त्या मुझे [email protected] पर मेल कीजिये। मेरा ईमेल आईडी पहले कहानी में देते थे। पर अब इन्होने शायद बंद कर दिया है। यह दुःख की बात है। मेरा इनसे अनुरोध है की उसे दुबारा शुरू करें।

मेरा और डॉली का रिश्ता कुछ अलग ही था। मैं यह कहूं की हम दोनों एक दूसरे की मन की बात बिना कहे समझ जाते थे तो गलत नहीं होगा। डॉली मेरी और मैं डॉली की बातें एक दूसरे के चेहरे के भाव देख कर ही समझने लगे थे। मेरी और डॉली की चुदाई भी सेठी साहब के चुदाई से काफी अलग होती थी।

सेठी साहब के जैसी चुदाई तो बहुत कम ही लोग कर पाते होंगे। जिस तरह डॉली ने ज्योति को बताया था सेठी साहब के लण्ड के जैसा लण्ड बहुत ही कम इंसानों का होगा।

हालांकि सेठी साहब अच्छी अच्छी औरतों को अपने चोदने की क्षमता की वजह से संतुष्ट कर देते थे। पर कहते हैं ना की दिया तले अन्धेरा। उनकी अपनी बीबी ही उनकी चुदाई से संतुष्ट नहीं थी।

ऐसा नहीं की डॉली को तगड़ी चुदाई पसंद नहीं थी। किस औरत को तगड़ी चुदाई पसंद नहीं होगी भला? पर सेठी साहब की चुदाई उससे कहीं ज्यादा तगड़ी हुआ करती थी। कोई भी औरत कभी भी सौतन होना या सौतन उसकी जिंदगी में आना स्वीकार नहीं करेगी। पर कई बार डॉली सोचती थी की काश उनकी कोई सौतन होती।

अगर सौतन होती तो सेठी साहब की चुदाई दो औरतें मिलकर झेलतीं। सेठी साहब का जोश तब डॉली को आधा ही झेलना पड़ता। इस तरह हर चुदाई के बाद उसे अपने पाँव चौड़े कर चलना नहीं पड़ता।

जब भी डॉली को इस तरह चलती हुई लोग देखते तब सब देखने वाले अपने मन ही मन में हँसते की देखो इसकी कितनी तगड़ी चुदाई हुई होगी। डॉली को उनकी नज़रों से ही पता चल जाता।

डॉली मुझे कहती थी की उसे प्यार भरी धीमी चुदाई पसंद थी जब की सेठी साहब जब तैयार हो जाते थे तब उनका अपने लण्ड पर नियत्रण रखना अति कठिन हो जाता था और वह अपनी प्रेमिका पर लगभग टूट ही पड़ते थे। हालांकि इसका यह कतई मतलब नहीं की वह किसी भी औरत के ऊपर जबरदस्ती करते थे।

पर एक बार औरत ने अपनी मर्जी दिखाई और अपने आपको नंग्न किया तो फिर सेठी साहब का लण्ड सेठी साहब पर हावी हो जाता था और सेठी साहब के लिए उसे काबू में रखना लगभग नामुमकिन सा हो जाता था। इसके परिणाम स्वरूप सेठी साहब की चुदाई अक्सर काफी आक्रमक होती थी जिसको ज्यादातर औरतें काफी पसंद करती होंगी। पर डॉली के अनुसार शायद डॉली जी उनमें अपवाद थीं।

पर मैं जानता और समझता था की डॉली कोई अपवाद नहीं थी। शादी से पहले डॉली ने सेठी साहब की चुदाई देख कर ही उन्हें पसंद किया था। पर कहते हैं ना की घरकी मुर्गी दाल बराबर। हर शादीशुदा औरत की तरह शायद डॉली भी चुदाई में कुछ नयापन चाहती थी। डॉली किसी भी चीज़ से जल्दी ऊब जाती थी यह मैंने महसूस किया था।

ज्योति और सेठी साहब के जाने के दूसरी शाम मैं जल्दी ही सेठी साहब के घर पहुँच गया था। मुझसे डॉली से दुरी बर्दाश्त नहीं हो रही थी। शाम को छे बजे ही मैं पहुँच गया। मैंने देखा की डॉली भी तैयार हो कर मेरे इंतजार में बैठी थी।

इस बार डॉली जैसे एक नयी नवेली दुल्हन सुहाग रात को सजधज कर अपने पति का इंतजार सुहागरात की शैय्या में करती है ऐसे ही डॉली भी सजधज कर चूड़े, लाल रंग की साड़ी और सोलह श्रृंगार कर मेरे इंतजार अपने ड्राइंग रूम में बैठ कर कर रही थी। मेरे आने का समय हमने सात बजे का तय किया था। पर पता नहीं कैसे वह छे बजे ही तैयार हो गयी थी, जैसे उसे पता हो की मैं भी छे बजे उसके घर पहुँच जाऊंगा।

मैं जब डॉली और सेठी साहब के घर पहुंचा तो दरवाजा खुला था। मेरे दाखिल होते ही मुझे बिना देखे ही डॉली ने अंदर से आवाज दी, “दरवाजा अंदर से बंद कर देना।”

जैसे डॉली को पता हो की मैं ही आया था। मैंने डॉली को नईनवेली वधु के रूप में सजी हुई देखा तो मेर लण्ड में अजीब सी हलचल मच गयी। उस भेष में डॉली इतनी खूबसूरत और कामुक लग रही थी। मैंने डॉली को अपनी बाँहों में भर कर उसके गाल पर चुम्बन किया। और फिर डॉली को अपनी बाँहों में उठा कर मैं उसे बैडरूम में ले गया।

मैंने जैसे डॉली को अपनी बाँहों में उठाया तो डॉली ने शर्म के मारे अपनी आँखें बंद कर दीं। मैंने डॉली की पलकों को चूमा तब डॉली ने आँख खोलीं और मेरी नज़रों से नजरें मिलाकर उसने मुझे एक शर्म भरी मुस्कान दी और फिर अपना सर मेरी छाती पर रख कर उसने आँखें मुंद लीं।

मैंने डॉली को धीरे से पलंग पर लिटाया और उसके होँठों के पास अपने होँठ ले जा कर धीमी आवाज में बोला, “आँखें तो खोलो मेरी जान। आज तुम नयी नवेली दुल्हन के भेष में बड़ी ही खूबसूरत लग रही हो।“

डॉली ने पूछा, “सच में? या कहीं तुम मेरी झूठी तारीफ़ तो नहीं कर रहे?”

मैंने अपना गला पकड़ कर कहा, “मेरी कसम। आज तुम गजब की खूबसूरत और सेक्सी लग रही हो। मन करता है की काश मैं तुम्हें अपनी बना सकता।”

डॉली ने मुझे अपने ऊपर खिंच लिया और मेरी बाँहों में आती हुई बोली, “आज तुम मुझे ऐसा चोदोगे जैसा तुमने कभी किसीको नहीं चोदा। अपनी पत्नी ज्योति को भी नहीं।”

मैंने कुछ खिसियाने से स्वर में कहा, “डॉली , देखो हम दोनों जानते हैं की मैं कोई सेठी साहब नहीं हूँ। तुम्हें सेठी साहब से तगड़े से चुदने की आदत है। भला सेठी साहब से मैं मुकाबला कैसे कर सकता हूँ?”

डॉली ने कुछ रिसाई हुई आवाज में कहा, “यह मैं नहीं जानती। पर आज मैं तुम्हारी रंडी बनकर तगड़े से चुदना चाहती हूँ। यह सच है की मुझे सेठी साहब बड़ा तगड़ा चोदते हैं। पर मैं उस चुदाई से बोर हो गयी हूँ। तुम मुझे अच्छी तरह से चोदते हो। मुझे तुम्हारा चोदना अच्छा लगता है। पर मैं आज चुदाई में कुछ और नयापन चाहती हूँ।”

डॉली ने लेटे हुए अपनी बाँहें फैलायीं। मैं लेटी हुई डॉली के ऊपर सवार हो कर डॉली की करारी बाँहों में समा गया। साडी ब्लाउज सब पहनी हुई डॉली भी इतनी ज्यादा सेक्सी लग रही थी। मैं चिंता में पड़ गया। मैं चुदाई में नयापन कैसे लाऊँ? मैंने पूछा, “कैसा नयापन? तुम्हारे दिल में क्या है?”

डॉली ने कुछ शर्माते हुए कहा, “पता नहीं, मैं कैसे बताऊँ? कुछ नया, जो आज तक नहीं किया। जिसके बारे में सुनते हैं पर किया नहीं।”

मैंने कहा, “ऐसा तो कोई कालिये के बड़े लण्ड से चुदना, या दो मर्दों से माने एम एम ऍफ़, यानी दो मर्द और एक औरत। कहीं तुम यह तो नहीं चाहती की तुम्हें दो मर्द मिलकर चोदे? उधर तुम्हारे पति आज दो औरतों को चोदेंगे और यहां तुम दो मर्दों से चुदना चाहती हो?”

डॉली यह सुन कर एकदम उत्तेजित हो गयी और उसने पूछा, “क्या यह हो सकता है?”

मैंने सबसे पहले डॉली के पाँव का तलवा चाटते हुए कहा, “कहाँ से लाऊँ वह दुसरा मर्द इस टाइम? क्या तुम सेठी साहब और मेरे साथ एम एम ऍफ़ करना चाहती हो? अगर ऐसा है तो वह तो सेठी साहब के आने के बाद ही हो सकता है।”

डॉली ने अपने कान पकड़ कर कहा, “नारे बाबा ना! सेठी साहब अकेले ही तीन मर्दों के बराबर हैं।” फिर डॉली हँस कर बोली, “और अगर तुम जोर लगाओ तो तुम एक मर्द के बराबर तो हो ही सकते हो। तो चार मर्द हुए। हम तो सिर्फ दो मर्दों की बात कर रहे हैं।”
 
मर्दों और औरतों में अपनी अपनी कमजोरियां है। सब से बड़ी कमजोरी यह होती है की औरत की तुलना उससे पतली सी सुन्दर और कम उम्र की लड़की से की जाए और मर्दों की तुलना अगर किसी और तगड़े और तगड़ी चुदाई करने वाले मर्द से की जाए तो उनके स्वाभिमान पर उसका घातक असर पड़ता है।

मैंने फ़ौरन डॉली से कहा, ” डॉली यह गलत बात है। तुम मुझे इस तरह भिगो बिगो के मत मारो। तुम सेठी साहब की पत्नी हो और राजदार हो। किसी भी साधारण मर्द के लिए सेठी साहब की चुदाई की क्षमता से मुकाबला करना नामुमकिन है। यार एक बात बताओ। ऐसी क्या बात है सेठी साहब में की वह बिना झड़े इतने लम्बे समय तक एक औरत की चुदाई कर सकते हैं जब तक औरत ना कहे की बस करो। क्या सेठी साहब कोई स्टेरॉइड्स या ऐसी ड्रग्स लेते हैं जिससे उनके चोदने की क्षमता इतनी बढ़ जाती है?”

डॉली ने कुछ गंभीरता दिखाए हुए कहा, “नहीं सेठी साहब कोई ऐसी दवाई या स्टेरॉइड्स नहीं लेते हैं। राज यह एक लम्बी कहानी है। अगर मैं कहने बैठूंगी तो काफी समय लग जाएगा और फिर तुम शिकायत करोगे की मैंने तुम्हें पूरा वक्त नहीं दिया।”

मैने कहा, “नहीं मैं शिकायत नहीं करूंगा। मैं जानने के लिए बहुत ही ज्यादा अधीर हूँ। तुम मुझे कहो। हमारे पास पूरी रात है।”

मैं यहां पाठकगण से प्रार्थना करता हूँ की अब जो आगे मैं लिखूंगा वह शायद आप में से कुछ लोगों को ना भाये। जो लोग कहानी में सिर्फ चुदाई चुदाई और चुदाई चाहते हैं वह नाराज हों। उनसे आग्रह है की वह अगले कुछ पन्नों को छोड़ दें।

डॉली ने मुझे सेठी साहब की चुदाई करने की क्षमता के बारे में जो कहा उसे सुनकर मेरी सिट्टीपिट्टी गुम हो गयी। डॉली ने जो कहा उसे मैं उन्हीं के शब्दों में नीचे लिख रहा हूँ।

सेठी साहब ने मुझे यह सारी बातें शादी के बाद शुरू शुरू में खूब एन्जॉय करने के बाद जब मैं खुद एक हद से ज्यादा सेठी साहब की चुदाई की क्षमता से परेशान हो रही थी बतायीं थीं।

सेठी साहब कॉलेज में काफी हैंडसम थे। पर पता नहीं क्यों वह हमेशा लड़कियों के साथ कुछ सहमें सहमे से रहते थे। कॉलेज में कई लडकियां उनकी दीवानी थीं। पर सेठी साहब ज्यादातर लड़कियों से दूर ही रहते थे। वैसा नहीं की उनका दिल नहीं कर रहा था। वैसे सेठी साहब का दिल एक लड़की पर आया था और उससे उनको एक तरफ़ा ही प्यार हो गया था।

सेठी साहब उस लड़की से शादी कर घर बसाना चाहते थे। लड़की भी सेठी साहब पर फ़िदा थी। पर सेठी साहब की उससे जब भी मुलाक़ात होती थी तो सेठी साहब की जुबान पर जैसे ताला लग जाता था।

वाक्या उस समय का है जब फाइनल एग्जाम का परिणाम आ चुका था और परीक्षा के परिणाम को सेलिब्रेट करने के लिए कॉलेज के लड़के लड़कियों ने एक पिकनिक का प्रोग्राम बनाया। उस पिकनिक में सेठी साहब को अपनी चहेती लड़की से अकेले मिलने का मौक़ा मिला। बल्कि यूँ कहिये की उस लड़की ने सेठी साहब से अकेले में मिलने का मौका ढूंढ ही लिया।

लड़की बड़ी ही चुदासी थी। उसने सेठी साहब से चुदवाने का मन बना लिया था। सेठी साहब उस समय चुदाई के मामले में बड़े ही अनाड़ी थे। शुरू शुरू की फोरप्ले चली उसके बाद सेठी साहब समझ गए थे की वह लड़की उनसे चुदवाना चाहती थी।

सेठी साहब के मन में भी चुदाई के बड़े सपने थे। पर सेठी साहब की झिझक या हिचकिचाहट के कारण बात आगे नहीं बढ़ सकती थी। जब मौका मिला तो एकांत में लड़की ने सेठी साहब की पतलून के ऊपर से ही सेठी साहब के लण्ड के ऊपर हाथ फिरा कर इशारों इशारों में ही अपनी इच्छा प्रकट की।

सेठी साहब के काफी रोकने पर भी लड़की ने जब सेठी साहब के पतलून की ज़िप खोली और निक्कर में से उनका लण्ड बाहर निकाला तो लड़की उसे देख हैरान रह गयी। सेठी साहब का लण्ड ठीकठाक ही था। पर चोदने के हालात होते हुए भी वह लण्ड एकदम ढीलाढाला मरे हुए साँप की तरह बेजान चोदने के नाकाबिल सा उनकी टांगों के बीच लटक रहा था।

लड़की के चेहरे पर यह देख निराशा छा गयी। अक्सर चुदाई की बात के नाम पर ही लड़कों के लण्ड उनकी निक्कर में फुंफकार ने लगते हैं। पर फिर भी लड़की ने उसे अपने हांथों में ले कर काफी सहलाया, उसे मुंह में लेकर चूसा और उसे सख्त करने के लिए, खड़ा करने के लिए जो कुछ हो सकता है किया। पर सेठी साहब के लण्ड के ऊपर उसका कोई भी असर ही नहीं हुआ।

काफी मशक्क्त के बाद भी जब सेठी साहब का लण्ड खड़ा नहीं हो पाया तब लड़की बड़ी ही हैरान परेशान हो कर उसने सेठी साहब की और देख कर बड़े ही कड़वे शब्दों में कहा, “अरे यार अगर तुम नपुंशक हो, नामर्द हो, अगर तुम्हारा लण्ड खड़ा ही नहीं होता तो तुम लड़कियों के पास ही क्यों जाते हो? शादी करने के सपने क्यों देखते हो?

मेरे पीछे इतने सारे लड़के पड़े हुए थे। मैंने एक तुम्हें ही आज तक लिफ्ट दी थी, और तुम ऐसे नामर्द निकले। तुम्हारी जिंदगी बेकार है। तुम्हारे माँ बाप कितना भी जोर लगाएं तुम शादी मत करना, किसी भोली भाली लड़की की जिंदगी खराब मत करना। हो सके तो चुल्लू भर पानी में डूब मरो। अब आज के बाद ना तो तुम मुझसे बात करना और ना ही किसी और लड़की से। अगर मैंने तुम्हें किसी लड़की के पास भी देखा तो मैं तुम्हारा भाँडा फोड़ कर तुम्हारी जिंदगी बर्बाद कर दूंगी। चले जाओ मेरे सामने से।”

उस युवा अवस्था में किसी सुन्दर चुदासी लड़की द्वारा इस तरह इतने कड़े शब्दों में इस कदर अपमानित होने की वारदात ने सेठी साहब के पुरे अस्तित्व को हिला कर रख दिया। उन्हें अपने आप पर एक तरह से नफरत सी हो गयी। दाम्पत्य जीवन के जो सपने उन्होंने युवावस्था में देखे थे वह उन शब्दों से चकनाचूर हो गए। युवा अपरिपक्वता से प्रेरित उसी समय उन्होंने ठान लिया की उनकी जिंदगी जीने के लायक नहीं है। उनको आत्महत्या कर लेनी चाहिए।

सेठी साहब के माँ बाप और बचपन से सेठी साहब भी देवी माँ में बड़ा विश्वास रखते थे। घर जा कर माँ बाप के पाँव छूकर उनको यह कह कर की वह माँ के मदिर जा रहे हैं सेठी साहब घर के नजदीक ही देवी माँ के मंदिर के पास से रेल गाडी की पटरी गुजरती थी वहाँ आत्महत्या करने पहुंचे।

उसी समय एक मालगाड़ी वहाँ से गुजर रही थी। सेठी साहब जैसे ही पटरी पर कूदने वाले थे की पीछे से मंदिर के पुजारी ने उन्हें देखा तो सेठी साहब के कपड़ों को पकड़ कर एक तगड़ा धक्का मार कर पीछे की और खींचा। दोनों गिर पड़े और माल गाडी गुजर गयी।
 
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