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मेरे बूब्स तो सेठी साहब ने देखे और चूसे हुए ही थे। देखते ही देखते सेठी साहब ने मेरे ब्लाउज और ब्रा निकाल फेंके। मैंने सेठी साहब से लाइट बुझाने को कहा तो सेठी साहब बोले, “यहां तो कोई आने वाला नहीं है। अब तो लाज शर्म छोडो। मुझे तुम्हारे रूप के अच्छी तरह दर्शन तो करने दो ज्योति ?”
मैं उनके सवाल के सामने लाजावाब थी। सेठी साहब मुझे ऊपर से नंगी कर पीछे हट कर मुझे अच्छी तरह निहारने लगे। मेरे अल्लड़ स्तनोँ की निप्पलेँ उनकी लोलुप नज़रों से एकटक देखने कारण एकदम सख्त हो कर भरे हुए स्तन मंडल पर मगरूर सी खड़ी हो गयीं।
शर्म के मारे मैं आधी नंगी उनकी नज़रों से नजरें मिला नहीं पा रहीं थीं। कुछ देर मेरे स्तनोँ को निहारने के बाद उन्होंने मेरे दोनों स्तनोँ को अपनी हथेलियों में भर लिया और उन्हें प्यार से सहलाने और मसलने लगे।
मैं देख रही थी की उनकी जाँघों के बीच उनका लण्ड उनके पाजामे में सख्त हो कर तन कर खड़ा हो चुका था। वह उस सिमित मर्यादा में रुक नहीं पा रहा था। मेरे स्तनोँ को मसलते हुए धीरे धीरे वह काफी जोरों से उन्हें दबाने लगे।
कुछ देर में उनकी माँसल बाँहों ने मेरे स्तनोँ को इतनी ताकत से मसलना शुरू किया की मुझे दर्द होने लगा। वह दर्द दुखद नहीं सुखद था पर दर्द तो था ही! मेरे मुंह से सिसकारी निकल गयी।
मैंने कहा, “सेठी साहब, थोड़ा धीरे से! मैं कहीं नहीं जाने वाली।”
सेठी साहब ने कहा, “सॉरी ज्योति । मेरा यह लण्ड जब खड़ा हो जाता है तो मेरा अपने आप पर नियंत्रण नहीं रहता। मैं एकदम उसके सामने बेबस हो जाता हूँ। इसी वजह से कई बार मेरी डॉली से भिड़ंत हो जाती है। वह गुस्सा कर बैठती है। कई बार तो मेरी हरकतों से तंग आकर मुझे जंगली कह देती है वह। पिछले कुछ दिनों से तो डॉली मेरे साथ में सोती भी नहीं है।”
बापरे! एक तो वैसे ही सेठी साहब की चुदाई तगड़ी होती है, और ऊपर से कुछ दिनों से अगर उन्हें डॉली जी को चोदने का मौक़ा नहीं मिला तो मेरी तो उस रात शामत ही आने वाली थी। यह सोच कर मेरी हालत खराब हो रही थी। पर चाहे जो कुछ भी हो, मुझे किसी भी हाल में सेठी साहब पर कोई नियंत्रण करना नहीं था। यह मैंने पक्का तय किया था।
मैंने सेठी साहब के बालों में उंगलियां फिराते हुए कहा, “कोई बात नहीं सेठी साहब। मुझे पता है। डॉली जी ने भी मुझे इशारों इशारों में यह बात कही थी। मैं समझ सकती हूँ। आप मेरी सिसकारियां और चीखों की परवाह मत करो। यह दर्द मेरे लिए दुःखद नहीं सुख के अतिरेक के कारण होगा।
सेठी साहब, आपने अपने सच्चे प्यार, लगन और निस्वार्थ भाव से मुझे बिन मोल खरीद लिया है। आज रात से मैं पूरी तरह से आप की बन जाना चाहती हूँ। मैं चाहती हूँ की आप मुझे थोड़ी सी भी परायी ना समझें। मेरा यह बदन आपके भोग और आनंद के लिए पूरी तरह समर्पित है। आज की रात मैं आपसे खूब तगड़ी तरह रगड़वाना चाहती हूँ। आप चाहे जैसे मुझे रगड़ो। मुझे चिल्लाने दो, कराहने दो, पर प्लीज आप सॉरी मत कहो। प्यार में सॉरी और थैंक यू नहीं होते।”
फिर कुछ डरते हुए मैंने कहा, “पर फिर भी सेठी साहब, अब तो मैं आपकी हो चुकी हूँ और हमेशा रहूंगी। तो मेरी सेहत का भी ख़याल जरूर रखना।”
सेठी साहब ने मेरी बात को सूना अनसुना करते हुए अपने होँठ मेरे स्तनोँ के ऊपर चिपका दिए और मेरी निप्पलोँ को वह बेतहाशा जोर से चूसने लगे। उनका मुंह एक स्तन को चूसता तो उनका हाथ मेरे दूसरे स्तन को मसल ने में लगा हुआ रहता।
कई बार वह इतनी ताकत और जोर से चूमते की मुझे लगा की कहीं मेरी छाती से निकल कर मेरे स्तन उनके मुंह में ही ना चले जाएँ। अगर मेरे स्तनोँ में उस समय थोड़ा सा भी दूध होता तो उनके चूसने से फव्वारा बनकर फुट कर निकल पड़ता।
सेठी साहब के मेरे स्तनोँ को इतनी ताकत से चूसने के कारण सेठी साहब के दाँतों के निशान मेरे स्तनोँ पर अच्छी तरह से अंकित हो गए होंगे, उसमें मुझे कोई शक नहीं था। पर सेठी साहब से इस तरह मेरे स्तनोँ को चूसने से मेरे पुरे बदन में जैसे एक झनझनाहट सी होने लगी।
मेरी जाँघों के बीच में से मेरा स्त्री रस चुने लगा, मैं झड़ ने कगार पर पहुंच गयी। मेरा तन बदन मेरे नियत्रण में नहीं रह पा रहा था। मैंने बड़ी मुश्किल से अपने आपको रोका।
यह दर्द मेरे लिए असह्य था। असह्य इस लिए नहीं की मैं उस दर्द को सहन नहीं कर सकती थी, पर असह्य इस लिए था की उस दर्द के कारण मेरी चूत में से पानी का फव्वारा सा छूटने लगा था।
मैं सेठी साहब का वह प्यार पाना चाहती थी जो डॉली जी को खूब मिल रहा था पर शायद वह उसे बर्दाश्त नहीं कर पा रही थी। मैं सेठी साहब का जीवन आनंद से भर देना चाहती थी। मैं चाहती थी की मुझे मेरे पति से जो प्यार नहीं मिल पा रहा था वह सेठी साहब से मिले और मेरा जीवन सम्पूर्ण हो।
मैंने सेठी साहब के पाजामे का नाडा खिंच कर इशारा किया की अब वह हमारे बीचमें से कपड़ों का आवरण हटा दे। मैं मेरे सेठी साहब को पूरा पाना चाहती थी।
सेठी साहब ने थोड़ा सा हट कर मेरे घाघरे का नाडा खोल दिया। साडी तो वह पहले से ही निकाल चुके थे। मैंने भी मेरे पाँव ऊपर नीचे कर मेरा घाघरा निकाल दिया। सेठी साहब ने बिस्तर से नीचे उतर कर अपना कुर्ता, पजामा और कच्छा निकाल फेंका। सेठी साहब का बलिष्ठ माँसल नंगा बदन पूरी तरह मेरे सामने प्रस्तुत हो गया।
सेठी साहब का लण्ड उनके बदन की मर्यादा को ना मानते हुए उद्दंड सा लोहे की छड़ की तरह उनकी जाँघों के बीच में खड़ा था। उसे सिर्फ लण्ड कहना शायद बेमानी होगी।
लण्ड मैंने मेरे पति का देखा था। हालांकि मेरे पति का लण्ड भी काफी तगड़ा था, पर सेठी साहब का लंड? किसी भी सेक्स की शौक़ीन औरत के सपनों का बादशाह कह सकते हैं उसे। गोरा, चिकनाहट से भरा, चमकता हुआ, पूरी गोलाई पर नीली नसों के बिछे हुए जाल से आच्छादित ऐसा लगता था जैसे चमड़े का लम्बा, मोटा, चिकना और सख्त रस्सा जिसके एक छोर पर लण्ड का चिकना टोपा था और जिसका दुसरा छोर सेठी साहब की जाँघों के बीच में चिपका दिया गया हो।
हालांकि मैंने सेठी साहब का लण्ड आते हुए कार में अँधेरे में महसूस किया था। पर साक्षात जब उसे खड़ा हुआ देखा तो मुझे कोई ताज्जुब नहीं हुआ की सेठी साहब की पतली कमर, ऊपर का कसरती माँसल पेट, चौड़ी छाती और बाजू के सख्त स्नायु के साथ उस लण्ड इस लण्ड से कई अच्छी सोसाइटियों की खूबसूरत शादीशुदा या कँवारी लडकियां या औरतें सेठी साहब चुदवा चुकीं थीं या चुदवाने के लिए बेताब रहतीं थीं।
ऐसे पुरुष से भला कोई भी स्त्री अपने कौमार्य को भंग करवाने के लिए मजबूर कैसे ना हो? मेरा सेठी साहब से तगड़ी तरह से चुदने का निश्चय सेठी साहब के नंगे बदन और ख़ास कर उनका वह विशाल काय लण्ड को देख और दृढ हो गया। हालांकि मुझे उससे चुदवाने से होने वाले दर्द का भली भांति अंदाज था।
मैं उनके सवाल के सामने लाजावाब थी। सेठी साहब मुझे ऊपर से नंगी कर पीछे हट कर मुझे अच्छी तरह निहारने लगे। मेरे अल्लड़ स्तनोँ की निप्पलेँ उनकी लोलुप नज़रों से एकटक देखने कारण एकदम सख्त हो कर भरे हुए स्तन मंडल पर मगरूर सी खड़ी हो गयीं।
शर्म के मारे मैं आधी नंगी उनकी नज़रों से नजरें मिला नहीं पा रहीं थीं। कुछ देर मेरे स्तनोँ को निहारने के बाद उन्होंने मेरे दोनों स्तनोँ को अपनी हथेलियों में भर लिया और उन्हें प्यार से सहलाने और मसलने लगे।
मैं देख रही थी की उनकी जाँघों के बीच उनका लण्ड उनके पाजामे में सख्त हो कर तन कर खड़ा हो चुका था। वह उस सिमित मर्यादा में रुक नहीं पा रहा था। मेरे स्तनोँ को मसलते हुए धीरे धीरे वह काफी जोरों से उन्हें दबाने लगे।
कुछ देर में उनकी माँसल बाँहों ने मेरे स्तनोँ को इतनी ताकत से मसलना शुरू किया की मुझे दर्द होने लगा। वह दर्द दुखद नहीं सुखद था पर दर्द तो था ही! मेरे मुंह से सिसकारी निकल गयी।
मैंने कहा, “सेठी साहब, थोड़ा धीरे से! मैं कहीं नहीं जाने वाली।”
सेठी साहब ने कहा, “सॉरी ज्योति । मेरा यह लण्ड जब खड़ा हो जाता है तो मेरा अपने आप पर नियंत्रण नहीं रहता। मैं एकदम उसके सामने बेबस हो जाता हूँ। इसी वजह से कई बार मेरी डॉली से भिड़ंत हो जाती है। वह गुस्सा कर बैठती है। कई बार तो मेरी हरकतों से तंग आकर मुझे जंगली कह देती है वह। पिछले कुछ दिनों से तो डॉली मेरे साथ में सोती भी नहीं है।”
बापरे! एक तो वैसे ही सेठी साहब की चुदाई तगड़ी होती है, और ऊपर से कुछ दिनों से अगर उन्हें डॉली जी को चोदने का मौक़ा नहीं मिला तो मेरी तो उस रात शामत ही आने वाली थी। यह सोच कर मेरी हालत खराब हो रही थी। पर चाहे जो कुछ भी हो, मुझे किसी भी हाल में सेठी साहब पर कोई नियंत्रण करना नहीं था। यह मैंने पक्का तय किया था।
मैंने सेठी साहब के बालों में उंगलियां फिराते हुए कहा, “कोई बात नहीं सेठी साहब। मुझे पता है। डॉली जी ने भी मुझे इशारों इशारों में यह बात कही थी। मैं समझ सकती हूँ। आप मेरी सिसकारियां और चीखों की परवाह मत करो। यह दर्द मेरे लिए दुःखद नहीं सुख के अतिरेक के कारण होगा।
सेठी साहब, आपने अपने सच्चे प्यार, लगन और निस्वार्थ भाव से मुझे बिन मोल खरीद लिया है। आज रात से मैं पूरी तरह से आप की बन जाना चाहती हूँ। मैं चाहती हूँ की आप मुझे थोड़ी सी भी परायी ना समझें। मेरा यह बदन आपके भोग और आनंद के लिए पूरी तरह समर्पित है। आज की रात मैं आपसे खूब तगड़ी तरह रगड़वाना चाहती हूँ। आप चाहे जैसे मुझे रगड़ो। मुझे चिल्लाने दो, कराहने दो, पर प्लीज आप सॉरी मत कहो। प्यार में सॉरी और थैंक यू नहीं होते।”
फिर कुछ डरते हुए मैंने कहा, “पर फिर भी सेठी साहब, अब तो मैं आपकी हो चुकी हूँ और हमेशा रहूंगी। तो मेरी सेहत का भी ख़याल जरूर रखना।”
सेठी साहब ने मेरी बात को सूना अनसुना करते हुए अपने होँठ मेरे स्तनोँ के ऊपर चिपका दिए और मेरी निप्पलोँ को वह बेतहाशा जोर से चूसने लगे। उनका मुंह एक स्तन को चूसता तो उनका हाथ मेरे दूसरे स्तन को मसल ने में लगा हुआ रहता।
कई बार वह इतनी ताकत और जोर से चूमते की मुझे लगा की कहीं मेरी छाती से निकल कर मेरे स्तन उनके मुंह में ही ना चले जाएँ। अगर मेरे स्तनोँ में उस समय थोड़ा सा भी दूध होता तो उनके चूसने से फव्वारा बनकर फुट कर निकल पड़ता।
सेठी साहब के मेरे स्तनोँ को इतनी ताकत से चूसने के कारण सेठी साहब के दाँतों के निशान मेरे स्तनोँ पर अच्छी तरह से अंकित हो गए होंगे, उसमें मुझे कोई शक नहीं था। पर सेठी साहब से इस तरह मेरे स्तनोँ को चूसने से मेरे पुरे बदन में जैसे एक झनझनाहट सी होने लगी।
मेरी जाँघों के बीच में से मेरा स्त्री रस चुने लगा, मैं झड़ ने कगार पर पहुंच गयी। मेरा तन बदन मेरे नियत्रण में नहीं रह पा रहा था। मैंने बड़ी मुश्किल से अपने आपको रोका।
यह दर्द मेरे लिए असह्य था। असह्य इस लिए नहीं की मैं उस दर्द को सहन नहीं कर सकती थी, पर असह्य इस लिए था की उस दर्द के कारण मेरी चूत में से पानी का फव्वारा सा छूटने लगा था।
मैं सेठी साहब का वह प्यार पाना चाहती थी जो डॉली जी को खूब मिल रहा था पर शायद वह उसे बर्दाश्त नहीं कर पा रही थी। मैं सेठी साहब का जीवन आनंद से भर देना चाहती थी। मैं चाहती थी की मुझे मेरे पति से जो प्यार नहीं मिल पा रहा था वह सेठी साहब से मिले और मेरा जीवन सम्पूर्ण हो।
मैंने सेठी साहब के पाजामे का नाडा खिंच कर इशारा किया की अब वह हमारे बीचमें से कपड़ों का आवरण हटा दे। मैं मेरे सेठी साहब को पूरा पाना चाहती थी।
सेठी साहब ने थोड़ा सा हट कर मेरे घाघरे का नाडा खोल दिया। साडी तो वह पहले से ही निकाल चुके थे। मैंने भी मेरे पाँव ऊपर नीचे कर मेरा घाघरा निकाल दिया। सेठी साहब ने बिस्तर से नीचे उतर कर अपना कुर्ता, पजामा और कच्छा निकाल फेंका। सेठी साहब का बलिष्ठ माँसल नंगा बदन पूरी तरह मेरे सामने प्रस्तुत हो गया।
सेठी साहब का लण्ड उनके बदन की मर्यादा को ना मानते हुए उद्दंड सा लोहे की छड़ की तरह उनकी जाँघों के बीच में खड़ा था। उसे सिर्फ लण्ड कहना शायद बेमानी होगी।
लण्ड मैंने मेरे पति का देखा था। हालांकि मेरे पति का लण्ड भी काफी तगड़ा था, पर सेठी साहब का लंड? किसी भी सेक्स की शौक़ीन औरत के सपनों का बादशाह कह सकते हैं उसे। गोरा, चिकनाहट से भरा, चमकता हुआ, पूरी गोलाई पर नीली नसों के बिछे हुए जाल से आच्छादित ऐसा लगता था जैसे चमड़े का लम्बा, मोटा, चिकना और सख्त रस्सा जिसके एक छोर पर लण्ड का चिकना टोपा था और जिसका दुसरा छोर सेठी साहब की जाँघों के बीच में चिपका दिया गया हो।
हालांकि मैंने सेठी साहब का लण्ड आते हुए कार में अँधेरे में महसूस किया था। पर साक्षात जब उसे खड़ा हुआ देखा तो मुझे कोई ताज्जुब नहीं हुआ की सेठी साहब की पतली कमर, ऊपर का कसरती माँसल पेट, चौड़ी छाती और बाजू के सख्त स्नायु के साथ उस लण्ड इस लण्ड से कई अच्छी सोसाइटियों की खूबसूरत शादीशुदा या कँवारी लडकियां या औरतें सेठी साहब चुदवा चुकीं थीं या चुदवाने के लिए बेताब रहतीं थीं।
ऐसे पुरुष से भला कोई भी स्त्री अपने कौमार्य को भंग करवाने के लिए मजबूर कैसे ना हो? मेरा सेठी साहब से तगड़ी तरह से चुदने का निश्चय सेठी साहब के नंगे बदन और ख़ास कर उनका वह विशाल काय लण्ड को देख और दृढ हो गया। हालांकि मुझे उससे चुदवाने से होने वाले दर्द का भली भांति अंदाज था।