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Adultery मस्त पड़ोसन (पड़ोसन को दुल्हन बनाया )

मेरे बूब्स तो सेठी साहब ने देखे और चूसे हुए ही थे। देखते ही देखते सेठी साहब ने मेरे ब्लाउज और ब्रा निकाल फेंके। मैंने सेठी साहब से लाइट बुझाने को कहा तो सेठी साहब बोले, “यहां तो कोई आने वाला नहीं है। अब तो लाज शर्म छोडो। मुझे तुम्हारे रूप के अच्छी तरह दर्शन तो करने दो ज्योति ?”

मैं उनके सवाल के सामने लाजावाब थी। सेठी साहब मुझे ऊपर से नंगी कर पीछे हट कर मुझे अच्छी तरह निहारने लगे। मेरे अल्लड़ स्तनोँ की निप्पलेँ उनकी लोलुप नज़रों से एकटक देखने कारण एकदम सख्त हो कर भरे हुए स्तन मंडल पर मगरूर सी खड़ी हो गयीं।

शर्म के मारे मैं आधी नंगी उनकी नज़रों से नजरें मिला नहीं पा रहीं थीं। कुछ देर मेरे स्तनोँ को निहारने के बाद उन्होंने मेरे दोनों स्तनोँ को अपनी हथेलियों में भर लिया और उन्हें प्यार से सहलाने और मसलने लगे।

मैं देख रही थी की उनकी जाँघों के बीच उनका लण्ड उनके पाजामे में सख्त हो कर तन कर खड़ा हो चुका था। वह उस सिमित मर्यादा में रुक नहीं पा रहा था। मेरे स्तनोँ को मसलते हुए धीरे धीरे वह काफी जोरों से उन्हें दबाने लगे।

कुछ देर में उनकी माँसल बाँहों ने मेरे स्तनोँ को इतनी ताकत से मसलना शुरू किया की मुझे दर्द होने लगा। वह दर्द दुखद नहीं सुखद था पर दर्द तो था ही! मेरे मुंह से सिसकारी निकल गयी।

मैंने कहा, “सेठी साहब, थोड़ा धीरे से! मैं कहीं नहीं जाने वाली।”

सेठी साहब ने कहा, “सॉरी ज्योति । मेरा यह लण्ड जब खड़ा हो जाता है तो मेरा अपने आप पर नियंत्रण नहीं रहता। मैं एकदम उसके सामने बेबस हो जाता हूँ। इसी वजह से कई बार मेरी डॉली से भिड़ंत हो जाती है। वह गुस्सा कर बैठती है। कई बार तो मेरी हरकतों से तंग आकर मुझे जंगली कह देती है वह। पिछले कुछ दिनों से तो डॉली मेरे साथ में सोती भी नहीं है।”

बापरे! एक तो वैसे ही सेठी साहब की चुदाई तगड़ी होती है, और ऊपर से कुछ दिनों से अगर उन्हें डॉली जी को चोदने का मौक़ा नहीं मिला तो मेरी तो उस रात शामत ही आने वाली थी। यह सोच कर मेरी हालत खराब हो रही थी। पर चाहे जो कुछ भी हो, मुझे किसी भी हाल में सेठी साहब पर कोई नियंत्रण करना नहीं था। यह मैंने पक्का तय किया था।

मैंने सेठी साहब के बालों में उंगलियां फिराते हुए कहा, “कोई बात नहीं सेठी साहब। मुझे पता है। डॉली जी ने भी मुझे इशारों इशारों में यह बात कही थी। मैं समझ सकती हूँ। आप मेरी सिसकारियां और चीखों की परवाह मत करो। यह दर्द मेरे लिए दुःखद नहीं सुख के अतिरेक के कारण होगा।

सेठी साहब, आपने अपने सच्चे प्यार, लगन और निस्वार्थ भाव से मुझे बिन मोल खरीद लिया है। आज रात से मैं पूरी तरह से आप की बन जाना चाहती हूँ। मैं चाहती हूँ की आप मुझे थोड़ी सी भी परायी ना समझें। मेरा यह बदन आपके भोग और आनंद के लिए पूरी तरह समर्पित है। आज की रात मैं आपसे खूब तगड़ी तरह रगड़वाना चाहती हूँ। आप चाहे जैसे मुझे रगड़ो। मुझे चिल्लाने दो, कराहने दो, पर प्लीज आप सॉरी मत कहो। प्यार में सॉरी और थैंक यू नहीं होते।”

फिर कुछ डरते हुए मैंने कहा, “पर फिर भी सेठी साहब, अब तो मैं आपकी हो चुकी हूँ और हमेशा रहूंगी। तो मेरी सेहत का भी ख़याल जरूर रखना।”

सेठी साहब ने मेरी बात को सूना अनसुना करते हुए अपने होँठ मेरे स्तनोँ के ऊपर चिपका दिए और मेरी निप्पलोँ को वह बेतहाशा जोर से चूसने लगे। उनका मुंह एक स्तन को चूसता तो उनका हाथ मेरे दूसरे स्तन को मसल ने में लगा हुआ रहता।

कई बार वह इतनी ताकत और जोर से चूमते की मुझे लगा की कहीं मेरी छाती से निकल कर मेरे स्तन उनके मुंह में ही ना चले जाएँ। अगर मेरे स्तनोँ में उस समय थोड़ा सा भी दूध होता तो उनके चूसने से फव्वारा बनकर फुट कर निकल पड़ता।

सेठी साहब के मेरे स्तनोँ को इतनी ताकत से चूसने के कारण सेठी साहब के दाँतों के निशान मेरे स्तनोँ पर अच्छी तरह से अंकित हो गए होंगे, उसमें मुझे कोई शक नहीं था। पर सेठी साहब से इस तरह मेरे स्तनोँ को चूसने से मेरे पुरे बदन में जैसे एक झनझनाहट सी होने लगी।

मेरी जाँघों के बीच में से मेरा स्त्री रस चुने लगा, मैं झड़ ने कगार पर पहुंच गयी। मेरा तन बदन मेरे नियत्रण में नहीं रह पा रहा था। मैंने बड़ी मुश्किल से अपने आपको रोका।

यह दर्द मेरे लिए असह्य था। असह्य इस लिए नहीं की मैं उस दर्द को सहन नहीं कर सकती थी, पर असह्य इस लिए था की उस दर्द के कारण मेरी चूत में से पानी का फव्वारा सा छूटने लगा था।

मैं सेठी साहब का वह प्यार पाना चाहती थी जो डॉली जी को खूब मिल रहा था पर शायद वह उसे बर्दाश्त नहीं कर पा रही थी। मैं सेठी साहब का जीवन आनंद से भर देना चाहती थी। मैं चाहती थी की मुझे मेरे पति से जो प्यार नहीं मिल पा रहा था वह सेठी साहब से मिले और मेरा जीवन सम्पूर्ण हो।

मैंने सेठी साहब के पाजामे का नाडा खिंच कर इशारा किया की अब वह हमारे बीचमें से कपड़ों का आवरण हटा दे। मैं मेरे सेठी साहब को पूरा पाना चाहती थी।

सेठी साहब ने थोड़ा सा हट कर मेरे घाघरे का नाडा खोल दिया। साडी तो वह पहले से ही निकाल चुके थे। मैंने भी मेरे पाँव ऊपर नीचे कर मेरा घाघरा निकाल दिया। सेठी साहब ने बिस्तर से नीचे उतर कर अपना कुर्ता, पजामा और कच्छा निकाल फेंका। सेठी साहब का बलिष्ठ माँसल नंगा बदन पूरी तरह मेरे सामने प्रस्तुत हो गया।

सेठी साहब का लण्ड उनके बदन की मर्यादा को ना मानते हुए उद्दंड सा लोहे की छड़ की तरह उनकी जाँघों के बीच में खड़ा था। उसे सिर्फ लण्ड कहना शायद बेमानी होगी।

लण्ड मैंने मेरे पति का देखा था। हालांकि मेरे पति का लण्ड भी काफी तगड़ा था, पर सेठी साहब का लंड? किसी भी सेक्स की शौक़ीन औरत के सपनों का बादशाह कह सकते हैं उसे। गोरा, चिकनाहट से भरा, चमकता हुआ, पूरी गोलाई पर नीली नसों के बिछे हुए जाल से आच्छादित ऐसा लगता था जैसे चमड़े का लम्बा, मोटा, चिकना और सख्त रस्सा जिसके एक छोर पर लण्ड का चिकना टोपा था और जिसका दुसरा छोर सेठी साहब की जाँघों के बीच में चिपका दिया गया हो।

हालांकि मैंने सेठी साहब का लण्ड आते हुए कार में अँधेरे में महसूस किया था। पर साक्षात जब उसे खड़ा हुआ देखा तो मुझे कोई ताज्जुब नहीं हुआ की सेठी साहब की पतली कमर, ऊपर का कसरती माँसल पेट, चौड़ी छाती और बाजू के सख्त स्नायु के साथ उस लण्ड इस लण्ड से कई अच्छी सोसाइटियों की खूबसूरत शादीशुदा या कँवारी लडकियां या औरतें सेठी साहब चुदवा चुकीं थीं या चुदवाने के लिए बेताब रहतीं थीं।

ऐसे पुरुष से भला कोई भी स्त्री अपने कौमार्य को भंग करवाने के लिए मजबूर कैसे ना हो? मेरा सेठी साहब से तगड़ी तरह से चुदने का निश्चय सेठी साहब के नंगे बदन और ख़ास कर उनका वह विशाल काय लण्ड को देख और दृढ हो गया। हालांकि मुझे उससे चुदवाने से होने वाले दर्द का भली भांति अंदाज था।
 
मैंने सेठी साहब का लण्ड मेरी उँगलियाँ में प्यार से सहलाया और झुक कर उसे बार बार चूमा। चूमते हुए सेठी साहब के वीर्य रस का स्वाद मुझे अच्छा लगा। मैं लण्ड चूसना तो दूर, चूमना भी पसंद नहीं करती थी। पर उस रात मुझे सेठी साहब पर इतना प्यार आ रहा था की मैं अपने आपको सेठी साहब का लण्ड चूसने से रोक नहीं पायी।

मैंने सेठी साहब के लण्ड को चूमते हुए धीरे धीरे से पहले उसका टोपा और उसके बाद जितना भी उस महाकाय लण्ड का हिस्सा अपने मुंह में ले सकती थी, उतना लेकर मैं सेठी साहब के लण्ड को चाटने और चूसने लग गयी। मैं तब पहली बार समझ पायी की अपने प्यारे मर्द का तगड़ा लण्ड चाटने और चूसने में कई औरतें कितना ज्यादा एन्जॉय क्यों करतीं हैं।

उस समय मुझे सेठी साहब का लण्ड चूसने में इतना सच्चा आनंद आ रहा था जो कहना मुश्किल है। पर मेरे लण्ड चूसने से सेठी साहब के पुरे बदन का बुरा हाल हो रहा था। उनका पूरा माँसल बदन मेरे उनका लण्ड चूसने से एकदम सख्त हो गया था। उनके मुंह से बारबार “आह… ओह…. हूँ….” की सिकारियाँ निकल रहें थीं।

जितना एक औरत को अपने प्यारे मर्द का लण्ड चूसने में आनंद आता है ऐसा ही आनंद एक मर्द को भी जब अपनी प्यारी औरत उसका लण्ड चुस्ती है तो आता है। उस समय वह औरत का मन अपने प्यारे मर्द का लण्ड उस की चूत के गहराईयों में घुस कर उन गहराइयों को कैसे अपना बनादेगा इसी सोच में खो जाता है।

सेठी साहब ने झुक कर मेरी छोटी सी पैंटी को भी निकलवा दिया और मैं उनके सामने पूरी नंगी हो गयी। सेठी साहब मुझे पूरी तरह निर्वस्त्र कर मेरे नंगे बदन को ऐसे घूरने लगे जैसे उन्होंने कोई स्त्री को नंगी देखा ही ना हो। कुछ देर तक स्तब्ध से देखते रहने के बाद वह बोले, “ज्योति , भगवान ने तुम्हें बना कर शायद वह ढांचा ही तोड़ दिया। तुम लाजवाब हो।”

मैंने सेठी साहब की बात पर कुछ शर्माते हुए मुस्कुरा कर कहा, “सेठी साहब अब मुझे और परेशान मत करो। अब तो हद ही हो गयी। मुझे पता है, मैं कितनी सुन्दर हूँ। कई बार मैं डॉली जी को देखती हूँ तो इर्षा से जल उठती हूँ। उपरवाले ने कितना सुन्दर बनाया है उनको। मैं तो उनके मुकाबले कुछ भी नहीं। खैर, चलो अगर मैं सुन्दर हूँ तो अब यह सुंदरता पूरी तरह से आपकी है। मुझे अब आप पूरी तरह से एन्जॉय करो। मैं आपके प्यार के लिए कबसे तरस रही हूँ।”

सेठी साहब ने झुक कर मुझे प्यार से कपाल पर चुम्बन किया फिर मेरी टांगों को चौड़ी कर टांगों के बीच में अपना सर डालकर जीभ से मेरी चूत में से रिसते हुए रस को चाटने लगे। सेठी साहब की जीभ मेरी चूत में गजब कई हलचल मचा रही थी। मेरे पुरे बदन में सेठी साहब के मेरी चूत चाटने के कारण उन्माद की लहर दौड़ रही थी।

मेरी टाँगों के बीच पता नहीं जैसे मेरे स्त्री रस की धारा सी बह रही थी, जिसे सेठी साहेब बड़े चाव से चाटे जा रहे थे। मेरी चूत का हरेक स्नायु छटपटा रहा था। सेठी साहब की जीभ कहाँ कितना कुरेदना उसमें माहिर लग रही थी। मेरी छटपटाहट की परवाह किये बिना सेठी साहब मेरी चूत की हर पंखुड़ी और पंखुड़ियों के बीच की सतह को बड़े प्यार से चाटे और चूसते बाज़ नहीं आ रहे थे। मेरी कामाग्नि की ज्वाला सेठी साहब की जीभ के कुरेदने से बढ़ती ही जा रही थी।

कुछ ही देर के बाद सेठी साहब कुछ पीछे हट गए। पीछे हट कर अपनी जीभ की जगह उन्होंने अपनी दो उंगलियां मेरी चूत में घुसेड़दीं। उँगलियाँ का मेरी चूत में घुसते ही पता नहीं मेरे दिमाग में कैसा झटका लगा की मैं उन्माद और रोमांचित उत्तेजना से कराहने लगी। मेरा झड़ना अब रुका नहीं जा रहा था। मेरा पूरा बदन बिस्तर पर मचल रहा था जिसे सेठी साहब देख कर हैरान लग रहे थे।

मैंने सेठी साहब का हाथ पकड़ कर जोर से दबाते हुए कहा, “सेठी साहब, आह……. ओह…… मुझे चोदो। मैं झड़ रही हूँ। प्लीज अपना तगड़ा लण्ड मेरी चूत में पेलो, अब मुझसे रहा नहीं जा रहा।” ऐसा कहते कहते मैं झड़ पड़ी। मेरे दिमाग में ही नहीं मेरे पुरे बदन में जैसे एक बिजली की तीखा झटका दौड़ रहा था।

मैं जानती थी की जैसे ही सेठी साहब का मोटा लण्ड मेरी चूत में घुसने की कोशिश करेगा तो मेरे पर कहर ढाएगा। पर आखिर मुझे उसे तो लेना ही था तो फिर जब ओखल में सिर रख दिया है तो मुसल से क्या डरना?

मैंने सेठी साहब का सर पकड़ कर उठाया और कहा, “वैसे तो मुझे यह बहुत अच्छा लग रहा है, पर सेठी साहब आज अब मैं आपकी मर्दानगी को पूरा अपने बदन में अंदर लेकर जो सुख एक औरत को अपने प्रेमी से प्यार करके मिलता है, वह मैं महसूस करना चाहती हूँ। इस पल का मैं महीनों से इंतजार करती रही हूँ। अब मुझसे रहा नहीं जाता। अब प्लीज आइये और मुझे खूब प्यार कीजिये और मुझे अपना बना लीजिये। आज की रात मैं मैं ना रहूं और आप आप ना रहो। हम एक दूसरे में खो जाएं। मुझे खूब तगड़ा चोदिये प्लीज।“

सेठी साहब ने मेरी मुंडी पकड़ कर उसे हिलाते हुए कहा, “ज्योति , मुझे बहुत अच्छा लगा की तुम खुल्लम खुल्ला देसी भाषा में मुझे कह रही हो की तुम मुझ से चुदवाना चाहती हो।”

मैंने सेठी साहब के लण्ड को अपने एक हाथ में पकड़ कर उसे हिलाते हुए कहा, “सेठी साहब, मुझे मजबूर मत करिये। मुझे शर्म आती है। वैसे तो मैं अपने पति से खुल्लमखुल्ला सब बोलती हूँ, पर पता नहीं आपके साथ मुझे आपको मेरा सरगना बनाकर, अपना स्वामी बना कर बहुत अच्छा लगता है।

मेरी नजर में आपका लेवल कहीं ऊंचा है। मैं उसे नीचे नहीं लाना चाहती। मैं आपकी औरत बन कर आपके नीचे रहना चाहती हूँ। आप कह रहे हैं तो मैं कुबूल करती हूँ की आपकी कसम, आज मैं आपके इस तगड़े लण्ड से खूब चुदना चाहती हूँ। जिस दिन मेरे पतिने आपका यह लण्ड देखा तब से उन्होंने आप के इस लण्ड के बारे में बता बता कर मुझे पागल कर दिया है।

मैं दिन रात इसी के बारे में सोच कर परेशान हो जाती थी की अगर वाकई में आपका यह लण्ड ऐसा तगड़ा है तो उसको मैं अंदर लेकर अंदर में डलवा कर कैसा महसूस करुँगी। जब आपने उस दिन स्कूल में मेरे पति के हक़ की अपेक्षा ना रहते हुए, मेरे पति की जिम्मेदारियां निभाने की इच्छा जाहिर की थी तो मैंने तय किया की मैं आपसे जरूर अपने आप को समर्पण कर मतलब चुदवा कर आपको मेरे प्रेमी और पति होने का पूरा एहसास कराउंगी और अपनी जिम्मेवारी भी निभाऊंगी।
 
उस दिन से ही मैं आपके लण्ड से चुदने के लिए बेबस हो रही थी। आजकी रात मुझे मौक़ा मिला है। अब अगली तीन रातें आप बिलकुल सोओगे नहीं और यहीं मेरे साथ ही गुजारोगे, और मुझे खूब चोदोगे।”

मेरी बात सुनते ही सेठी साहब ने झुक कर मुझे होंठों पर चूमा और मुस्कुरा कर बोले, “ज्योति , मैंने कभी सोचा नहीं था की मेरे सपनों की खूब सूरत रानी तुम मुझ पर इतनी जल्दी मेहरबान हो जाओगी। मैं हमेशा तुम्हें अपनी बनाकर मेरे लण्ड से तुम्हें चोदना जरूर चाहता था, पर मैं यह सिर्फ तुम्हारी मर्जी नहीं, बल्कि तुम्हारी सक्रीय इच्छा से ही करना चाहता था। मैंने तय किया था की मैं तुम्हें तब तक नहीं चोदुंगा जब तक तुम मुझे सामने चल कर चोदने के लिए नहीं कहोगी। आज तुमने मेरी यह इच्छा पूरी कर दी।”

यह कह कर सेठी साहब उठ खड़े हुए। उनका तगड़ा लण्ड अल्लड़ सा बेखोफ उद्दंड सा खड़ा हुआ मेरी और ऐसे देख रहा था जैसे मुझे चुनौती दे रहा हो। मैं आश्चर्य से उनको देखती ही रही जब सेठी साहब खिसक कर एक स्टूल पर रखी अपनी सूट केस की पॉकेट टटोलने लगे।

मैं समझ गयी की वह शायद कंडोम ढूंढ रहे थे। यह देख कर मेरे ह्रदय में सेठी साहब के लिए सम्मान बढ़ गया। एक जिम्मेवार प्रेमी की भूमिका सेठी साहब निभा रहे थे। पर मुझे सेठी साहब के तगड़े लण्ड का मेरी चूत में पूरा पूरा मजा लेना था। यह मैंने पहले से ही तय किया था।

मैंने बैठ कर उनका हाथ पकड़ा और कहा, “अगर आप कंडोम ढूंढ रहें हैं तो मत ढूंढिए। वैसे तो इस वक्त मेरा फर्टिलिटी पीरियड हैं नहीं, पर अगर मुझे आपसे गर्भ रह गया तो मैं आपके बच्चे को जरूर जनम देना चाहूंगी। मैं ना सिर्फ आपकी बीबी बनना चाहती हूँ, मैं आपके बच्चे की माँ भी बनना चाहती हूँ।आज मैं आपके और मेरे बीच में कोई भी आवरण रखना नहीं चाहती चाहे वह गर्भ निरोधक कंडोम का पतला सा आवरण ही क्यों ना हो।“

सेठी साहब कुछ देर तक मेरी और आश्चर्य से एकटक देखते रह गए। वह उस समय उनकी अपने बच्चे की समस्या के बारे में शायद सोच रहे थे। मैंने उनका सर दोनों हाथों में पकड़ कर कहा, “सेठी साहब, अगर हमारे मिलन से कोई बच्चा रह गया, तो मैं उसे जरूर जनम दूंगी और मैं आपसे वादा करती हूँ की मेरे उस बच्चे को अगर आप और डॉली जी चाहो तो गोद ले सकते हो। हो सकता है वह हमारा बच्चा आपकी और डॉली जी की जन्दगी फिर से राह पर ला दे।

अगर आप और डॉली जी चाहोगे तो वह बच्चा आपका होगा और ना मैं और ना ही मेरे पति उस बच्चे पर माँ बाप होने का दावा करेंगे। मैं चाहती हूँ की हमदोनों का यह मिलन ना सिर्फ मेरे और आपके लिए बल्कि आपके और डॉली जी के लिए भी एक अद्भुत आनंद और वरदान का कारण बने और आप दोनों की जिंदगी में फिर से वही बहार लौट आये।”

सेठी साहब के चेहरे पर मेरी बात सुनकर जो आनद के भाव मैंने देखे उसको मैं कभी नहीं भूल सकती। शायद मेरे और सेठी साहब के मिलन की वह सबसे बड़ी विशिष्टता थी।

मैं ना सिर्फ सेठी साहब को मेरे बदन को सम्भोग और आनंद के लिए अर्पण कर रही थी पर साथ साथ में शायद उनकी वैवाहिक जीवन में फँसी हुई गाँठ को भी सुलझा ने की कोशिश कर रही थी। सेठी साहब के चमक उठे चेहरे से उनकी अपनी मनोदशा का अंदाज मुझे लग सकता था।

सेठी साहब ने झुक कर मेरे होंठों से अपने होंठ मिलाये और मुझे चूमते हुए बोले, “ज्योति , मेरा तुम पर कोई क़र्ज़ नहीं। बल्की अब मैं तुम्हारा कर्ज़दार बन गया हूँ। मैं तुम्हें अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार करता हूँ, बशर्ते की डॉली भी राजी हो। और मैं जानता हूँ की डॉली ना सिर्फ राजी होगी, बल्कि यह बात सुनकर झूम उठेगी।“

हालांकि सेठी साहब ने मेरे मना करने पर कंडोम नहीं निकाला पर अपनी सूटकेस में से एक छोटी सी बोतल जरूर निकाली जिसमें शायद कोई जेल या ऐसा ही स्निग्ध पदार्थ होगा। क्यूंकि उन्होंने वह जेल या ऑइंटमेंट या कुछ हद तक तेल जैसा चिकना पदार्थ अपने लण्ड के चारों और अच्छी तरह से लगा कर उस बोतल में अपनी दो उंगलियां डुबो कर निकाल कर उन्होंने मेरी चूत को भी अंदर से काफी अच्छी तरह से चिकनाहट से लथपथ किया। उस अनुभव को याद करते समय आज भी मैं रोमांचित हो जाती हूँ की उनका ऐसा करने से उन्होंने मेरी कितनी यातनाएँ कम कीं।

मेरे बिस्तरे पर नग्न लेटे हुए सेठी साहब ने वह सब कार्यक्रम किया और फिर सेठी साहब आगे बढे और मेरे लेटे हुए बदन को अपनी टाँगों के बीच में रख कर मुझ पर सवार हुए। मैंने अपनी टाँगें ऊपर कर सेठी साहब के कंधे पर रख कर उन्हें अपने लण्ड को मेरी चूत के केंद्र पर रखने के लिए इशारा किया।

सेठी साहब का लण्ड जैसे ही मेरी चूत की सतह को छुआ तो मेरे पुरे बदन में एक सिहरन सी दौड़ पड़ी। मेरे रोंगटे सेठी साहब के लण्ड के मेरी चूत को छूने से खड़े हो उठे। मैंने मेरे एक हाथ की उँगलियों में सेठी साहब का वह विशाल लगता हुआ लण्ड पकड़ा।

यह लण्ड मेरी चूत में कैसे और कितना घुसेगा यह सोच कर ही मैं कांपने लगी। सेठी साहब के लण्ड को देखते हुए मुझे ऐसा लगता था की मेरी पूरी चूत की नाली को पूरी तरह से अंदर तक भर जाने के बाद भी वह शायद आधा बाहर ही रह पायेगा। पूरा मेरी चूत में जा नहीं पायेगा। मुझे मेरे पति ने ऐसे वीडियो दिखाए थे जिसमें मर्द का लण्ड इतना लंबा होता था की औरत की चूत भर जाने के बाद भी आधा बाहर रह जाता था।

उस समय मुझे सेठी साहब के सामने नंगे अपनी दोनों टांगें सेठी साहब के कंधे पर रखी हुई चुदवाने के लिए तैयार होते हुए भी कोई शर्म का एहसास नहीं हो रहा था। क्यों की मैं अपने मन कर्म और वचन से सेठी साहब को अपना सर्वस्व मान चुकी थी और उन्हें अपना सर्वस्व अर्पण करने के लिए बेताब थी।

मैंने सेठी साहब के मोटे लण्ड को अपनी उँगलियों में मेरी चूत के केंद्र बिंदु पर सेट किया और सेठी साहब ने भी मेरी उँगलियों के पीछे ही अपने लण्ड को अपनी उँगलियों में पकडे हुए थोड़ा सा मेरी चूत की पंखुड़ियों की सतह पर चिकनाहट बढ़ाने के लिए रगड़ते हुए धीरे से अंदर घुसेड़ा।

मैं भली भाँती जानती थी की यह मेरे लिए बड़ी ही नाजुक संकट की घडी थी। सेठी साहब के उस तगड़े लण्ड के दाखिल होने से मेरी चूत की त्वचा के पूरी तरह खींचने और चौड़ा होने की क्रिया में मुझे असह्य दर्द का सामना करना पडेगा। शायद मेरी चूतमें से खून का भी कुछ स्राव हो। पर हर औरत को पहली बार चुदवाते हुए यह दर्द झेलना ही पड़ता है। मैं भी इतने बड़े तगड़े लण्ड से पहली बार ही चुदवा रही थी तो मेरे लिए भी यह दर्द झेलना अनिवार्य था।
 
सेठी साहब ने अपने लण्ड को मेरी चूत में दाखिल कराने के लिए दिया वह पहला धक्का मैं जिंदगी भर कभी नहीं भूल पाउंगी। वह धक्के के चलते हुए सेठी साहब के उस विशालकाय लण्ड के मेरी चूत में दाखिल होने के कारण मेरी चूत की नाली की त्वचा शायद कहीं ना कहीं से थोड़ी जरूर फट गयी होगी। क्यूंकि लण्ड के मेरी चूत में दाखिल होते ही मेरे पुरे बदन में इतने जबरदस्त दर्द की एक लहर दौड़ उठी की ना चाहते हुए भी मेरे मुंह से तीखी चीख निकल गयी।

मेरी चीख इतनी तेज थी की पास वाले दूसरे कमरे में लेटा हुआ मेरा बच्चा कुछ पल के लिए जाग उठा और रोने लगा। नीचे सोये हुए सब लोग मेरी चीख सुन कर भाग कर ऊपर ना आ पहुंचे इस डर से मेरी जान निकल रही थी। मेरी चूत से शायद थोड़ा सा खून रिस रहा होगा, क्यूंकि सेठी साहब ने अपना लण्ड मेरी चूत में ही रखते हुए टेबल पर रखे हुए टिश्यू बॉक्स से एक टिश्यू निकाल कर मेरी चूत की पंखुड़ियों को पोंछा।

अगर सेठी साहब ने कुछ समय पहले जो क्रीम की बोतल में से वह जो चिकनाहट देने वाला पदार्थ अपने लण्ड की सतह पर और मेरी चूत की अंदरूनी दीवारों पर अच्छी तरह से ना लगाया होता तो मैं उस समय जब सेठी साहब का लण्ड मेरी चूत में पहली बार घुसा तो चीख तो निकल ही जाती पर उस भयानक दर्द से शायद मैं बेहोश भी हो जाती।

शायद मेरी चीख हमारे कमरे के बंद दरवाजे के बाहर नहीं गयी। बच्चे का ध्यान रखने के लिए मैंने हमारे दो कमरों के बीच का दरवाजा खुला रखा था इसी लिए बच्चा कुछ पलों के लिए जाग उठा पर गहरी नींद में सोये होने कारण वापस फ़ौरन सो भी गया।

सेठी साहब का तगड़ा लण्ड मेरी चूत में दाखिल हो चुका था। मैं उसे भली भाँती मेरी चूत की नाली में महसूस कर रही थी। वह दर्द और उस तगड़े लण्ड की चमड़ी का मेरी चूत में इतनी तगड़ी तरहसे जकड़े होने का अद्भुत मज़े का अनुभव अकल्पनीय और ना भूलने वाला था।

मैंने सेठी साहब को उसी पोजीशन में अपना लण्ड मेरी चूत में जकड़े हुए रखने के लिए कुछ देर के लिए आगे चुदाई करने से रोक दिया। मैं उस पल का पूरी तरह आस्वादन करना चाहती थी। मैं जानती थी की आगे चल कर सेठी साहब मुझे महीनों तक चोदेंगे और मुझे सेठी साहब से कई बार चुदना है। पर यह पहली बार का उस तगड़े लण्ड का मेरी छोटी सी चूतमें जकड़े रहने के एहसास का अवर्णनीय मजे का वह पल मैं पूरा अनुभव करना चाहती थी।

शायद सेठी साहब भी उस आनंद का आस्वादन करना चाह रहे थे या फिर मेरी उस इच्छा का सम्मान करते हुए आगे मुझे चोदने से अपने आपको कुछ समय के लिए रोके हुए थे।

मैंने कुछ समय उस लण्ड की सख्ताई को मेरी चूत में महसूस करने के बाद सेठी साहब को आगे चुदाई जारी रखने का इशारा किया। सेठी साहब से मेरी पहली बार की चुदाई बड़ी दर्दनाक होते हुए भी गजब की आनंद दायक थी। उस मोटे तगड़े लण्ड का मेरी चूत की नाली में रगड़ रगड़ कर अंदर बाहर जाने के मुकाबले में मेरी आजतक मेरे पति के द्वारा हुई चुदाई कुछ भी नहीं थी।

मुझे पहली बार मेरे पति की बारबार कही हुई बात याद आयी की एक शादीशुदा औरत के लिए गैर मर्द के तगड़े लण्ड से चुदाई करवाने का आनंद अद्भुत होता है। मैं मेरे पति की उस बात का उस वक्त कोई तबज्जोह नहीं दे रही थी। पर सेठी साहब से चुदवा कर मुझे मेरे पति की बात का तथ्य समझमें आया।

और यहां तो कोई ऐरागैरा गैर मर्द नहीं, मैं अपने चहिते मर्द सेठी साहब से चुदवा रही थी जो खुद भी गजब के इंसान थे और उनका लण्ड तो कमाल का था ही। तो उस चुदाई का आनंद तो गजब होना ही था।

सेठी साहब की इस पहली चुदाई और मेरे पति के चोदने के तरीके में एक बहुत बड़ा अंतर था। मेरे पति जब शुरू हो जाते थे तो एक तेज दौड़ती हुई रेलवे के स्टीम इंजन के पिस्टन की तरह चोदते ही रहते थे जब तक की वह फारिग नहीं हो जाते।

पर सेठी साहब मुझे भी चुदाई का पूरा मजा दिलाना चाहते थे और खुद भी पूरा लुत्फ़ उठाना चाहते थे। इस लिए पहलीबार लण्ड घुसेड़ कर वह रुके, फिर उन्होंने लण्ड थोड़ा और घुसेड़ा और फिर धीरे धीरे धक्के मार कर अपने लण्ड को जैसे रेलवे का स्टीम इंजन स्टेशन से गाडी छूटने के समय धीरे धीरे अंदर बाहर अंदर बाहर होता है वैसे ही मेरी चूत में अंदर बाहर करते रहे और उसके साथ होते हुए घर्षण का पूरा आनंद वह खुद भी उठा रहे थे और मुझे भी दे रहे थे।

क्या यह उनका मेरे लिए स्पेशल उपहार था मुझे नहीं मालुम, पर चुदाई करते हुए वह कभी सर झुका कर मेरे मम्मों को चूमते तो कभी मुझे मेरी रानी, तुम कितनी टाइट हो, तो कभी मेरे होँठों पर अपने होँठ चिपका कर जैसे वह होँठों को चूस कर मुझे पूरा निगल ही जाएंगे उस आक्रामकता के साथ प्यार किया करते।

इस कार्यकलाप में सेठी साहब का अजगर जैसा लंबा लण्ड मेरी चूत में पूरा का पूरा कब घुस गया मुझे पता ही नहीं चला नाही कोई ख़ास दर्द महसूस हुआ। मुझे बड़ा ताज्जुब हुआ जब सेठी साहब ने मुझे दिखाया की उनका पूरा लण्ड मेरी चूत में घुसा हुआ है और मुझे महसूस हुआ की वह मेरी बच्चे दानी को ठोकर मार रहा था।

मेरे प्यारे प्रेमी का लण्ड पूरा अंदर ले कर मुझे भी बड़े ही गर्व का अनुभव हुआ। मुझे उस वक्त पता चला की स्त्री के चूत की सुरंग कितनी लचीली हो सकती है की पहली बार तो लण्ड घुसाते हुए काफी दर्द होता है पर धीरे धीरे धीरे जैसे जरुरत पड़ती है, आने आप को फैला कर बड़े से बड़ा लण्ड भी ले लेती है। बल्कि जब बच्चा पैदा होता है तो उसे भी जन्म दे पाती है।

वैसे तो मैं मेरे पति से पचासों बार चुदी गयी हूँ। पर सेठी साहब के साथ का वह पहला अनुभव कुछ अजीब ही था। मैं बिस्तर पर निष्क्रिय लेटी हुई आँखें मूँद कर सेठी साहब के उस महाकाय लण्ड को मेरी चूत की सुरंगों में अंदर बाहर होते हुए जो उन्माद महसूस कर रही थी, कोई भी मर्द उसकी कल्पना तक नहीं कर सकता। अपने प्यारे प्रियतम से चुदवाते हुए और ख़ास कर जब वह अपना अति प्यारा कोई गैर मर्द (पति ना हो कर कोई अतिरिक्त व्यक्ति) हो, तो एक स्त्री कैसा अनुभव कर सकती है वह मैंने उस समय अनुभव किया।

मैं शादीशुदा स्त्रियों से यह जरूर आग्रह करुँगी की अगर कोई स्त्री मेरे जैसी सदभागी हो जिसे सेठी साहब जैसे प्यारे प्रियतम से चुदवाने का मौक़ा मिले तो कम से कम एक बार तो उससे जरूर चुदवाये। यह मौक़ा गंवाने पर हम स्त्रियों को शायद यह ग़म रह जाए की जब मौक़ा मिला था तब चौका नहीं मारा, और सारी जिंदगी मन मसोस कर रहना पड़े। अगर वह प्रियतम कहीं सेठी साहब के जैसा तगड़े लण्ड वाला और तगड़ा चोदने वाला हो तो बात ही क्या।
 
सेठी साहब से चुदवाते हुए आँखें मूंदे हुए भी भी चोरी से पलकोँ के एक कोने से जब सेठी साहब मेरे अंदर अपना वह जबरदस्त लण्ड पेल रहे थे तब मैं सेठी साहब के चेहरे के भाव भाँपने की कोशिश कर रही थी। मुझे सेठी साहब के नीचे लेटे हुए भी जब सेठी साहब अपना लण्ड सम्हाल कर घुसेड़ना निकालना यह कर रहे थे उनके चेहरे पर एक अजीब से उन्माद की छाया नजर आ रही थी।

मेरे लिए उनके जहन में जो प्यार था वह उनके चेहरे के भाव से स्पष्ट दिख रहा था। पुरुष और स्त्री के बीच की यह चुदाई की प्रक्रिया भी भगवान ने अजीब पैदा की है। जब तक चुदाई ना हो तब तक पुरुष और स्त्री एक दूसरे को मिलने के लिए तिलमिलाते रहते हैं। जब चुदाई शुरू हो जाती है तो फिर चुदाई के अलावा कुछ भी नहीं दिखता।

मैंने पहली बार किसी गैर मर्द से चुदवाया था। गैर मर्द से चुदाई के बारे में ज्यादा अनुभवी ना होने के कारण मैं यह तो नहीं कह सकती की सेठी साहब की वह चुदाई दूसरे मर्दों के मुकाबले कैसी थी, पर जो कुछ भी मैंने महसूस किया मैं इतना जरूर कह सकती हूँ की शायद ही कोई मर्द मुझे इतना आत्मसंतोष दे पाता जितना सेठी साहब ने मुझे उस पहली चुदाई में और उसके बाद हुई अनेकानेक चुदाईयों में दिया।

सेठी साहब के लण्ड घुसाने के फ़ौरन बाद जब मैं उस शुरू के तीखे मीठे दर्द से उभरी, तो मैंने महसूस किया की मैं झड़ चुकी थी। उस चुदाई के दरम्यान मैं सेठी साहब के लण्ड को थोड़ा सा भी महसूस करती और मेरा छूट जाता। उस रात सेठी साहब ने पहले राउंड में मुझे बिना रुके शायद आधे घंटे तक चोदा होगा। उस बीच मैं कम से कम चार बार झड़ चुकी थी।

पर सेठी साहब थे की थमने का नाम ही नहीं ले रहे थे। मुझे सेठी साहब का यह टेम्पो बहुत ही भाया। मेरे पति तो एक बार शुरू करते तो फिर उन्हें खतम होने में समय नहीं लगता था। हर बार जब जब मैं झड़ती तो सेठी साहब रुक कर झुक कर अपना लण्ड मेरी चूत में से ना निकालते हुए मुझे खूब सारा लाड और प्यार करते। मुझे सेठी साहब से चुदवाने में जो गर्व और स्त्री होने का अभिमान महसूस हुआ मैं उसके लिए सेठी साहब की सदा सर्वदा ऋणी रहूंगी।

आधे घंटे के बाद भी सेठी साहब ने अपना वीर्य जस के तस ही रखा हुआ था। मेरी नजर अनायास ही कमरे में दिवार पर टंगी घडी पर जा पहुंची। रात के बारह बज रहे थे।

सेठी साहब ने मुझे घडी की और देखते हुए पकड़ लिया। उन्होंने ने मेरे चेहरे से देखा की मैं कुछ थक चुकी हूँ। सेठी साहब की पूरी चुदाई के दरम्यान जो एक बात हमेशा मौजूद थी वह थी उनकी आँखों में मेरे लिए अद्भुत प्यार के भाव।

अक्सर जब औरत एक मर्द से चुदवाती है तो मर्द और औरत, दोनों का ध्यान अपने लिंगों पर होता है। दोनों अंगों के बीच में चमड़ी के घर्षण से पैदा होता हुआ उन्माद का अधिक से अधिक आनंद वह दोनों उठाना चाहते हैं। ऐसा होना भी चाहिए। हम दोनों के दरम्यान भी ऐसा ही था।

पर सेठी साहब की प्यार भरी आँखें पूरी चुदाई के दरम्यान मेरी आँखों को बड़े प्यार से और अपनेपन से ताकती रहतीं थीं। उनकी आँखें मुझे पूरी चुदाई के दरम्यान शायद यह एहसास दिलाना चाहतीं थीं की वह सिर्फ मेरे बदन को नहीं पर मेरी पूरी हस्ती को बेतहाशा प्यार करते हैं।

मुझे थकी हुई महसूस कर वह बोले, “चलो थोड़ी देर आराम कर लो। चाय पीते हैं।”

मैंने यह दिखाने की कोशिश भी नहीं की की मैं थकी नहीं हूँ। मैंने कुछ बहादुरी का स्वांग करते हुए कहा, “सेठी साहब आज रात मुझे पूरी रात ही आपके साथ गुजारनी है। मैं एकदम तैयार हूँ। पर चलिए अगर आपकी चाय पिने की इच्छा है तो यह ही सही।”

मुझे बिना बताये मेरी भाभी ने पहले से ही सेठी साहब के कमरे के कोने में एक छोटे से प्लेटफार्म पर गैस स्टोव पर चाय का सारा सामान और कुछ बिस्कुट रखे हुए थे। मेरी भाभी बड़ी ही समझदार थी। पता नहीं पर शायद उसने ताड़ लिया होगा की सेठी साहब के साथ मेरी क्या सेटिंग थी।

जब हम सब रात का खाना खा कर फारिग हुए तब भाभी ने मुझे बाजू में बुला कर मेरे कानों में कहा, “ननदजी, तुम्हारे सेठी साहब कुछ उखड़े उखड़े से लगते हैं। तुम ऊपर जाओ और उन्हें मनाओ, वरना सुबह उठते ही कहीं वह भागने का ड्रामा शुरू ना कर दें। मैंने सेठी साहब के कमरे में चाय नाश्ते का भी इंतजाम कर रखा है। क्या पता शायद रातमें तुम्हें उन्हें मनाते हुए चाय बनाकर पिलानी ही पड़ जाए।”

भाभी की यह बात सुन कर मुझे बड़ा ही झटका सा लगा। मैं डर गयी की कहीं मेरी भाभी को मेरे और सेठी साहब के सम्बन्ध के बारे में पता ना चल जाए।

पर भाभी ने मेरे कन्धों पर हाथ रखते हुए मेरे कानों में कहा, “ननदजी, फ़िक्र ना करो। घर में किसी को कुछ भी पता नहीं है और ना ही पता चलेगा। मैं जो तुम्हारे साथ हूँ। अरे यही मौक़ा होता है हम वफादार बीबियों को मौके पे चौका लगानेका। वरना तो रोज वही मर्द, वही बिस्तर, दो धक्के मारे और सो गए। वही सब कुछ। समझ गयी ना? अभी आपको मौक़ा है, पूरी तीन रात। जाओ लगाओ मौके पे चौका। मैं जानती हूँ सब, तुम बिलकुल फ़िक्र ना करो। मैं भी तुम्हारी जात की ही हूँ। जब मौक़ा मिले तो चौका मारने से कतराती नहीं हूँ। अभी तुम्हारा मौका है, जाओ।”

मेरी भाभी की बात सुन कर मैं ठिठुर कर रह गयी। उस समय मुझे पता नहीं था की भाभी के कहने का क्या मतलब था। पर हाँ, मुझे यह यकीन तो हो गया की सब कुछ जानते हुए भी भाभी मेरे और सेठी साहब के बारे में कुछ नहीं बोलेगी। कहीं ना कहीं वह उलटा मुझे इशारा कर रही थी की मुझे क्या करना चाहिए। जब मैं चुप रही तो मुझे ऊपर भेजते हुए धक्का मारते हुए बोली, “हायरे! कितने हैंडसम हैं सेठी साहब! भाभी, आप कमालकी नजर रखती हो। मानना पडेगा! क्या हाथ मारा है!”

फिर भी मैं जब ना हिली तो कुछ तंग सी आकर भाभी झुंझलाहट में बोली, “आप जाती हो या आपकी जगह मैं चली जाऊं? आप के भाई को मैं समझा दूंगी। जरुरत पड़ी तो आजकी रात तुम्हारे भैया अकेले सो जाएंगे। फिर यह मत कहना की मैंने तुम्हारे मुंह से निवाला छीन लिया।” फिर मेरी और मुस्कुराती हुई नजर कर बोली, “अब ज्यादा ड्रामा मत करो, जाओ और फ़तेह करो। जाकर देखो कहीं मियाँ गुस्से में लाल पिले ना हो रहे हों की अब तक क्यों नहीं आयी?”

भाभी से बात करने के बाद मेरा इरादा और पक्का हो गया। भाभी ने मेरी हिम्मत बढ़ा दी थी। भाभी ने बातों ही बातों में इशारा कर ही दिया की शायद भाभी की भी कहीं ना कहीं अपनी सेटिंग चल रही थी। तब कहीं जा कर माँ और पापा से बात कर मैं मुन्ने को लेकर जब ऊपर की मंजिल की सीढ़ियाँ चढ़ने लगी तो मैं पूरी तरह से अभिसारिका बन चुकी थी।

मैं अपने पीया से मिलने के लिए बेताब हो रही थी। मैं सेठी साहब से चुदवानेका पहला सोपान पार कर चुकी थी। भाभी की बात सुन कर मुझे लगा की मैं भी मेरी भाभी की टोली में शामिल होने जा रही थी।
 
एक शादीशुदा औरत ही जान सकती है की ऐसा सपोर्ट मिलने पर एक औरत जो किसी और मर्द से चुदवाने के लिए अपना मन बना रही हो उसे कितनी तसल्ली मिलती है। दूसरे दिन सुबह जब मैं अपनी भाभी से मिलूंगी तो वह मुझे चोरीछुप्पी मेरी रात की चुदाई के बारे में जरूर पूछेगी तब मैं उनको क्या कहूँगी, यह सोच कर ही मैं परेशान हो रही थी। आधी रात को चाय बनाते हुए यह सब खयालात मेरे जहन में दौड़ रहे थे।

चाय बनाने के लिए मैं जब उठ खड़ी हुई तो मैंने बिस्तरे के कोने में रखी मेरी साड़ी खिंच ली और आननफानन में अपने नंगे बदन के इर्दगिर्द लपेट ली। सेठी साहब चाहते थे की मैं नंगी ही उनके लिए चाय बनाऊं।

पर आखिर में उन्होंने मुझे साड़ी लपेटने दी। पर चाय बनाना और ऊलजलूल लिपटी हुई साड़ी को सम्हालना दोनों काम एकसाथ करने काफी मुश्किल होते हैं। मेरी साड़ी भी तो फिसलन वाली थी। कई बार मेरा पल्लू खिसक जाता और मेरे स्तन नंगे हो जाते।

सेठी साहब पलंग के एक छोर पर बैठे बैठे मेरी यह जद्दोजहद मुस्कुराते हुए देखते ही रहे। एक बार तो मेरी साड़ी मेरी कमर से खिसक कर पूरी नीचे गिर गयी और मैं नंगी सेठी साहब के सामने खड़ी हो गयी। सेठी साहब ने उठ कर मुझे अपनी बाँहों में जकड़ लिया और फिर से कुछ पलों के लिए प्यार करते रहे। पुरे नंगधंडंग सेठी साहब और उनका हवा में लहराता हुआ वह डरावना लण्ड जिसके ऊपर सेठी साहब ने मुझे अपनी गोद में बिठाया। यह सब मेरे लिए एक सपने के समान था। आज जब मुझे वह पल याद आते हैं तो मेरे रोंगटे रोमांच से खड़े हो जाते हैं।

चाय पिने के बाद सेठी साहब कुछ रोमांटिक मूड में दिखे। मैंने चाय बनाते हुए जो साडी आननफानन में मेरे नंगे बदन पर लपेटी हुई थी उस आधे नंगे बदन के हालात में मुझे अपनी लाज छिपाने की कोशिश करते हुए देख वह काफी उत्तेजित हो उठे।

मुझे पलंग पर खिंच सेठी साहब ने मुझे अपनी गोद में बिठा दिया और मुझसे अठखेलियां करने लगे। मेरी लिपटी हुई साडी के अंदर हाथ डाल कर वह मेरे स्तनोँ को प्यार से सहलाने लगे। स्तनों को सहलाते हुए मेरी आँखों में आँखें डालकर बोले, “ज्योति , मैं सच कह रहा हूँ, मैं तुमसे कभी दूर नहीं रह पाउँगा। डॉली मेरी जान है पर तुम ने मुझे ऐसा प्यार दिया है की मुझे तुमने अपना ग़ुलाम बना दिया है।”

मैंने सेठी साहब के लण्ड को अपने हाथों में सहलाते हुए उनके होठों पर एक हलकी सी चुम्मी देकर कहा, “सेठी साहब, मैं आपकी दूसरी बीबी हूँ। डॉली जी का आप पर पहला हक़ है। मेरे लिए और मेरे पति के लिए भी आप और डॉली जी दोनों हमारी जान हैं। अभी जब हम दोनों यहां एक दूसरे से प्यार कर रहे हैं तो क्या पता डॉली जी और राज भी शायद यही कर रहे हों?”

इधर डॉली जी और राज की कहानी को भी पनपना ही था। चलिए सुनते हैं क्या हुआ डॉली जी और मेरे पति के बीच ।

डॉली और राज की कहानी राज की जुबानी

जब सेठी साहब ज्योति को लेकर कार में निकले थे उस समय मैं ऑफिस में था। शाम को घर लौटते समय कुछ सब्जी फल इत्यादि डॉली जी के लिए ले आया। जब तक ज्योति वापस नहीं लौटती, मेरा खाना अब उन्हीं के वहाँ होना था। पहुँचने के पहले ही मैंने फ़ोन कर बता दिया था तो डॉली जी भी मेरा इंतजार कर रहीं थीं। मेरे पहुँचते ही मैंने पाया की डॉली जी ने टेबल पर चाय नाश्ता तैयार रखा हुआ था।

डॉली जी के बारे में एक बात कहनी पड़ेगी। हालांकि वह सेठी साहब के साथ रह कर बड़ी ही ज़मीनी बातें करतीं थीं, डॉली जी का अंतर्मन बड़ा ही संवेदनशील था। मैंने उनके अंदर छिपा हुआ एक अत्यंत संवेदनशील इंसान, जो एक कलाकार या कला को समझने और सराहने वाला होता है, पाया।

जब भी हम कोई कला या ऐसी ही कोई संवेदनशील बातें करते, डॉली जी अक्सर भावुक हो जातीं। इसी कारण मेरा और डॉली जी का स्वाभाविक तालमेल पहली ही मुलाक़ात से हो गया था। मैं संगीत और कला का दीवाना था। डॉली जी संगीत और कला के संसार में पहले से ही डूबी हुई थीं।

डॉली जी ने मुझे जल्दी फ्रेश होकर आने के लिए कहा। करीब आठ बजे फ्रेश होकर घर का कुछ काम निपटा कर मैं डॉली जी के वहाँ जब पहुंचा तो डॉली जी ने मेरे लिए ड्रिंक और कुछ नमकीन बगैरह रखे हुए थे। उन्हें मालुम था की सेठी साहब के साथ अक्सर मैं ड्रिंक करने का आदि था। डॉली जी कभी एकाद ड्रिंक पी लेती थीं। मेरे आग्रह करने पर उन्होंने मेरा साथ देने के लिए अपना जाम भी थोड़ा सा भरा।

अक्सर डॉली जी दिन में साड़ी या लंबा गाउन पहनी हुई होती थीं पर उस शाम चेक्स वाला स्कर्ट और ऊपर एक हल्कासा टॉप पहने हुए वह जब मेरे सामने बैठीं तो बरबस मेरी नजर बार बार उनकी खुली हुई जाँघों और टॉप में से बड़े ही अच्छी तरह उभरे हुए उनके स्तन मंडल पर जाकर अटक जातीं थीं जिन्हें उन्होंने जरूर देखा। मेरी नजर को देख कर वह शर्मा कर हँस देतीं और अपनी जाँघें कुछ कस कर जोड़ती हुईं फिर से बातों में लग जातीं।

डॉली जी और मेरे बीच में वह बात नहीं थी जो सेठी साहब और ज्योति के बीच में हो सकती है। सेठी साहब की तरह मैं सेक्स में आक्रामक नहीं हूँ। पुरुष और स्त्री के बीच का विजातीय आकर्षण मुझ पर भी हावी होता है पर सेठी साहब की तरह व्हिस्की की किक की तरह एकदम धमाके से नहीं, बल्कि हलकी वाइन की तरह होले होले। शायद मेरी यह बात डॉली जी को काफी अच्छी लगी थी।

मैं यह बात कतई नहीं मना करूंगा की मेरे मन में डॉली जी के हर एक अंग को करीब से देख कर उसे छूने और उन्हें बड़ी शिद्दत से प्यार करने की बड़ी तगड़ी इच्छा थी। बल्कि उनको पहली बार देखते ही उनके बदन की नंगी छबि देखने के लिए मैं दिन रात तडपता रहता था। पर मैंने कभी उस बात को ना ही उजागर किया ना ही मेरे दिमाग पाए हावी होने दिया। सही मौका मिलते ही सब कुछ होगा यह मैं जानता था और सही मौके की तलाश में ही रहता था। जल्द बाजी से मामला बिगड़ सकता है यह मैं भली भाँती समझता था।

डॉली जी भी सेठी साहब की तरह ही एक अच्छी मेजबान थीं। अपने मेहमान को कैसे प्रसन्न करना वह भलीभांति समझती थीं। मुझे बातों में उलझाए वह अपना गिलास वैसे ही भरा हुआ रखे हुए मेरे गिलास में एक के बाद एक ड्रिंक भरती जाती थीं। मैंने एक दो बार यह महसूस भी किया पर डॉली जी की बातें इतनी मधुर और आकर्षक होती थीं की समय और शराब का कोई ख्याल ही नहीं रहा।

मैंने भी बातों बातों में डॉली जी को उनका गिलास खाली करने पर मजबूर किया और एक और ड्रिंक उनके गिलास में भी डाली। शायद डॉली जी मेरे आग्रह का इंतजार कर रहीं थीं। उस गिलास को खाली होने में पहले गिलास जितना समय नहीं लगा।

मैंने महसूस किया की माहौल काफी नाजुक सा हो रहा था पर वह बात नहीं बन पा रही थी जो मैं और शायद डॉली जी भी चाहतीं थीं। कहीं ना कहीं कुछ कमी सी महसूस हो रही थी। अचानक मेरी नजर ड्राइंग रूम में दीवारों पर लगे बड़े शास्त्रीय संगीतकारों की तस्वीरों पर पड़ी। शायद डॉली जी को खोलने की चाभी मुझे मिल गयी थी।

मैंने डॉली जी के करीब जा कर उनका हाथ थाम कर कहा, “डॉली जी, इस मीठे वातावरण को अगर संगीतमय बना दिया जाए तो सोने में सुहागा लग जाए।”

मैंने देखा की मेरी बात सुन कर डॉली जी के मुंह की रौनक बढ़ गयी। उन्होंने फ़ौरन अपना मोबाइल उठाया और मेरी और बड़ी ही प्यार भरी नज़रों से देखते हुए कहा, “अब मैं समझी की ज्योति जैसी कामिनी सुंदरी को तुमने अपने चंगुल में कैसे फसाया। तुम्हें स्त्रियों की नाजुक संवेदनाओं को जगाने में महारथ प्राप्त है। मैं तुम्हारी संगीत में रूचि देख कर कभी से सोच रही थी की एक दिन मैं तुम्हें अपने प्यारे संगीतकारों की कला से ना सिर्फ परिचित कराउंगी बल्कि उनमें से कुछ के घरानों से जो हमारे परिवार के निजी ताल्लुकात थे उसके बारे में बात भी करूंगी।”

यहां मैं मेरे रसिक पाठकगण जो अपनी महबूबाओं को अपनी बनाना चाहते हैं अथवा अपनी प्यारी रूढ़िवादी पत्नियों को खुले सम्भोग की दुनिया में शामिल करवाना चाहते हैं उनसे निवेदन है की वह अपनी पत्नियों खुलने का पूरा अवसर दें। जो अपनी मेहबूबा या पत्नी को पसंद है वह बात करें, जैसा उनको पसंद है वैसा माहौल बनाएं।
 
एक बात पति या प्रेमी हमेशा ध्यान रखें की स्त्रियों में पुरुषों से कई गुना अधिक सेक्स कूट कूट कर भरा हुआ होता है। हम पुरुषों को यह बात नहीं मालुम। हम हमारी मेहबूबा या पत्नियों के सूखे रवैय्ये से यह सोचने लगते हैं की स्त्रियां सेक्स में ज्यादा रूचि नहीं रखतीं।

इसका कारण यह है की अक्सर पत्नियां बस पति के प्रति अपना फर्ज निभाने के लिए जब पति का मन करता है तब अपनी टाँगें खोल कर उन्हें अपने बदन को अर्पण कर पति को सम्भोग करने देतीं हैं। अपना योगदान यातो रखती ही नहीं या फिर पति को खुश करने के लिए एन्जॉय करने का ढोंग करतीं हैं।

पर वास्तविकता अलग है। स्त्रियों में भगवानने जन्मजात ही सम्भोग के मामले में पुरुषों से कहीं ज्यादा रूचि और उग्रता कूट कूट कर भरी है। पर समाज में अपयश के डर और पति पर अविश्वास के कारण पत्नियां उस उग्रता को बड़ी ही बखूबी छिपा कर अपने जहन के किसी अँधेरे कोने में गाड़ कर रख देतीं हैं।

अपने जन्म से ही रूढ़िवादी उपदेशों को सुनते रहने के कारण सामाजिक मर्यादाओं का सच्चे मन से पालन करते हुए कई बार पति के लाख मनाने पर भी विवाहिता अपनी सम्भोग की उग्रता वाली सख्सियत को अँधेरे कूप से बाहर निकालने में अपने आपको असमर्थ पातीं हैं।

रूढ़िवादी सामाजिक ग्रंथियों से बाहर निकालने के लिए हम पतियों को बड़े ही धैर्य और संवेदना से काम करना होगा ताकि हमारी पत्नियां हमारी संवेदना को समझ पाएं और संभोगिक प्रक्रिया में हमारा खुल कर साथ दे कर वह स्वयं भी उस अप्रतिम आनंद का आस्वादन कर सकें और हमें भी कराएं।

हरेक पति को अपनी पत्नी की यह मानसिकता और संवेदना की कदर करते हुए बड़ी नाजुकता और प्यार से उन जटिल ग्रंथियों को एक के बाद एक कर खोलना होगा। जब कोई धागा या रस्सि या हमारे पाजामे का नाडा भी उलझ जाता है तो उन गांठों को खोलने के लिए हमें बड़े ही धैर्य और हलके से उन्हें खोलना पड़ता है। उस वक्त जल्दबाजी या समय ज्यादा लगने के कारण होती झुंझलाहट का प्रदर्शन करने से पुरा मामला और ज्यादा उलझ सकता है।

इसी लिए पति को चाहिए की पत्नी की संवेदना का ध्यान रखें और पत्नी से सम्भोग करते समय उसे बार बार सम्भोग के आनंद के बारेमें बात करे और खुले सम्भोग के लिए उकसाता रहे। ऐसा करते हुए वह पत्नी के विरोध या अवहेलना को ज्यादा गंभीरता से ना ले और अपनी पत्नी में छुपी हुई वह सम्भोग की आक्रामकता को उस अँधेरे कूप से बाहर निकालने की कोशिश में बिना थके लगा रहे। साथ साथ में वह पत्नी को मौक़ा दे की वह दूसरे कोई आकर्षक पुरुष के साथ मौक़ा मिलने पर उसे आकर्षित करे या दूसरे पुरुष से आकर्षित हो कर मौक़ा पाकर उससे सम्भोग करे।

डॉली जी के मामले में ऐसी कोई बाधा नहीं थी। ज्योति से डॉली जी के बारे में मेरी बात के बाद मैं डॉली जी की संवेदनाओं से भलीभाँति परिचित था। मैं जानता था की सम्भोग को डॉली जी बहुत अच्छी तरह एन्जॉय करतीं थीं। जरुरत थी को एक सही माहौल की जो बन रहा था और फिर एक चिंगारी की जो उस माहौल को आग में बदल दे।

डॉली जी ने अपने जाने पहचाने एक बड़े संगीतकार का एक कॉन्सर्ट में अपनी सितार पर बजाया हुआ राग ब्लूटूथ के द्वारा अपने साउंड सिस्टम पर बजाना शुरू किया। वातावरण एक रोमांचक और उन्मादक संगीत की ध्वनि से गूंज उठा। संगीत अत्यन्त मधुर और रोमांचक था और मैं डॉली जी को देख रहा था जो संगीत की मादकता में झूम रही थी। मैं भी संगीत की मादकता का आस्वादन करते हुए डॉली जी के साथ संगीत की लहरों में बहने लगा।

फर्श पर बिछाये हुए एक ही गद्दे पर हम दोनों एक दूसरे के करीब बैठ कर कभी आँखें मूंद कर उस मधुर संगीत का आस्वादन कर रहे थे तो कभी एक दूसरे की आँखों में देख एक दूसरे के मन के भाव पढ़ते हुए शायद सही मौके का इंतजार कर रहे थे जब हम दोनों अपने मन की बात को उसके अंजाम तक पहुंचा सकें। कौन पहला कदम आगे बढ़ाएगा शायद वही असमंजस में हम दोनों उलझे हुए थे।

थोड़े समय के बाद डॉली जी ने संगीत का वॉल्यूम कुछ कम किया और मेरी और देख कर बोलीं, “तुम पूछ रहे थे ना की यह कौन है?”

मैंने सकारत्मक अंदाज में जब अपनी मुंडी हिलायी तो उन्होंने उस मशहूर उस्ताद सितार वादक उस्ताद एहसान अली खान का नाम लेकर अपने कानों को छूते हुए कहा, “उस्तादजी मेरे पिताजी के अच्छे खासे दोस्त थे और जब भी कभी उनका कोई बड़ा कॉन्सर्ट होता था तब वह हमें अवश्य बुलाते थे।”

सितार की धुन में मैं भी खो गया था। मैंने देखा की बात करते करते डॉली जी की आँखें नम हो रहीं थीं। सही मौक़ा आ चुका था। मैंने डॉली जी के करीब खिसक कर उन्हें अपनी बाँहों में भर दिया और उनके आंसुओं को हलके से पोंछते हुए बोला, “संगीत जीवन का अमृत है। संगीत की एहमियत का कोई हिसाब नहीं। संगीत प्यारों का प्यार है और भगवान की साधना है।”

डॉली जी ने मेरी और नजर उठा कर देखा, थोड़ा मुस्कुरायी और बोली, “इस रिकॉर्ड से मुझे ज्यादा लगाव इस लिए है क्यूंकि यह गाना मेरे सामने बजाया गया था। उस्ताद एहसान अली खान मेरे पिताजी के समकालीन थे और उन्होंने मुझे भी संगीत शास्त्रीय नृत्य की तालीम दी है। यह गाना जब रिकॉर्ड हुआ तब मैं छोटी थी और उस्तादजी ने मेरे सामने ही इसे बजाया था। उस समय मैं उनके इस गाने पर नाच रही थी।उस समय मैं गुरूजी से शास्त्रीय नृत्य की तालीम ले रही थी।

मुझे इण्टर स्कूल कम्पटीशन में मेरे नृत्य के कई पारितोषिक मिले हुए थे। मुझे अपनी धून पर नाचते देख मेरे गुरूजी इतने भावुक हो गए की यह राग उन्होंने करीब एक घंटे तक बजाया और मैं उनकी धुन पर एक घंटे तक नाचती रही। उस माहौल को मैं आज तक भूल नहीं पायी हूँ। पर पिछले कुछ सालों से सांसारिक झंझट के चलते वह सब छूट गया।”

मैंने खड़े हो कर डॉली जी को खिंच कर खड़े करते हुए कहा, “डॉली जी, आज इतने सालों के बाद मैं आपका वह नृत्य उस्तादजी के संगीत की ले के साथ देखना चाहता हूँ। आशा है आप मुझे निराश नहीं करेंगी।”

डॉली जी ने मेरी बात का यकीन नहीं करते हुए कहा, “यह स्कर्ट पहन कर तुम मुझे नाचने के लिए कह रहे हो? वह ज़माना अलग था। मैं छोटी सी दुबली पतली तरवराहट से भरी एक किशोरी लड़की थी। आज मैं एक शादीशुदा मोटी औरत बन गयी हूँ। अब वह चुलबुलाहट और जोश कहाँ?”

मैंने ज़िद करते हुए कहा, “डॉली जी, आप क्या हैं, कितनी छोटी, बड़ी, पतली, मोटी, खूबसूरत इत्यादि हैं वह देखने वाले की नज़रों पर छोड़ दो। सवाल यह नहीं है की आप बचपन के मुकाबले कैसा नाचोगी। सवाल आपके प्रशंशक, यानीं के मैं आपको वही उस्तादजी के संगीत में वही नृत्य करते हुए देखना चाहता हूँ। सवाल कला और कला के चाहने वालों की फरमाइश का है। एक सच्चा कलाकार कभी अपने चाहने वालों की फरमाइश को नहीं टालेगा।”

डॉली जी ने मेरी आँखों में आँखें मिलाकर यह जानने की कोशिश की कहीं मैं मजाक तो नहीं कर रहा। मेरी आँखों में गंभीरता का भाव देख कर वह बोलीं, “अरे बाबा, सालों बीत गए मेरे नाचे हुए। ऊपर से यह कपडे। मैं कैसे नाचूं? छोडो, जाने दो, बादमें कभी मैं तुम्हें जरूर वह नृत्य करने दिखाउंगी।”

मैंने जब जिद पकड़ी और डॉली जी ने यह देखा की मैं नहीं मानने वाला, तब अपने हथियार डालते हुए उन्होंने कहा, “ठीक है, तुम इतनी ज़िद कर रहे हो तो मैं तुम्हें कुछ स्टेप्स दिखाती हूँ। पर अगर मेरा नृत्य ठीक ना हो तो मेरा मजाक मत करना।”

मैंने डॉली जी की बात का कोई जवाब नहीं दिया और उनके नाचने का इंतजार करने लगा। डॉली जी ने मोबाइल फ़ोन पर उस्तादजी का सितार वादन दुबारा शुरुआत सी शुरू किया और सीधे खड़े हो कर दोनों हाथों को और पॉंवों को सटा कर रखते हुए सरस्वती वन्दना करते हुए उस्तादजी की सितार की धुन के साथ नृत्य करना शुरू किया।
 
हालांकि मैं कोई नृत्य का निष्णात तो नहीं हूँ, पर उस शाम वह नजाकत और संजीदगी से डॉली जी ने जो नृत्य किया शायद उसे देख कर बड़े बड़े उस्ताद भी उनके नृत्य का लोहा मान जाएंगे। जहां तक मेरा सवाल था तो मैं नृत्य के अलावा नाचते हुए डॉली जी की स्कर्ट के ऊपर उठ जाने पर थिरकती हुई नंगी जाँघें और बड़े ही मादक तरीके से झूमते और कूदते हुए स्तन मंडल को देख कर पागल हो रहा था।

शराब के दो गिलास चढाने के बाद और नाच की थकान से कुछ देर बाद डॉली जी के पाँव डगमगाने लगे। मैं देख रहा था की वह पसीने से तरबतर हो रहीं थीं। डॉली जी के पाँव इधर उधर जा रहे थे। अचानक ही जैसे वह लड़खड़ा कर गिरने लगी तो मैंने उन्हें पकड़ तो लिया पर मैं भी लुढ़का और मैं और डॉली जी दोनों बिस्तर पर जा गिरे। डॉली जी नीचे और मैं उनके ऊपर।

उधर साउंड सिस्टम पर संगीत की धुन ख़त्म हो चुकी थी। कमरे में मेरे और डॉली जी की तेज चल रही साँसों के अलावा पूरा सन्नाटा छाया हुआ था। या तो शराब के नशे में या थकान की वजह से डॉली जी गिर कर बेहोश सी मेरे नीचे दबी हुई कुछ देर सोती रहीं। डॉली जी का स्कर्ट उनकी जाँघों के ऊपर चढ़ कर उनकी करारी नंगी उन्मादक जाँघों के दर्शन करा रहा था।

स्कर्ट के अंदर डॉली जी एक छोटी सी पैंटी पहने हुए थीं। मैं अपनी लोलुप नज़रों से उस पैंटी के पीछे छिपी हुई डॉली जी की चूत को अपनी काल्पनिक नज़रों से देख रहा था। दृश्य इतना मादक था की मैं बड़ी मुश्किल से मेरे हाथ डॉली जी की पैंटी में डालकर उनकी प्यारी सी शायद गीली हुई चूत की पंखुड़ियों को सहलाने से रोके हुए था। मेरा एक सिद्धांत था की नशे में धुत बेहोश महिला से कभी कोई हरकत नहीं करनी चाहिए। मेरी नज़रों मैं ऐसा करना उस महिला का बलात्कार करने जैसा होता है।

मैं कुछ देर तक डॉली जी को बाँहों में लिए हुए उनके ऊपर उनको होश में आने का इंतजार करते हुए बिस्तरे पर आँखें मूंद कर लेटा रहा। अचानक मैंने तब अपनी आँखें खोलीं जब मेरे कानों में डॉली जी की मीठी आवाज पड़ी।

उन्होंने कुछ उलाहना देते हुए कटाक्ष भरे स्वर में कहा, “एक मेरे जैसी स्कर्ट और उसके अंदर एक छोटी सी पैंटी पहनी हुई युवती को जिसे तुम कई बार खूबसूरत कह चुके हो, अपनी बाँहों में भर कर अपने नीचे मैथुन करने की मुद्रा में लिटाए हुए हो और काफी समय से कुछ भी नहीं कर रहे हो। यह क्या बात है? कहीं तुम्हारी मर्दानगी पर शक करने की नौबत तो नहीं आ गयी?”

डॉली जी की बात सुनकर मुझे एक अजीब सा झटका लगा। मेरी सज्जनता और शालीनता को यह औरत नामर्दगी कह रही थी?

मैं डॉली जी को बेहोशी के हालात में कुछ करना नहीं चाहता था। पर यहां तो उसका कुछ गलत ही मतलब निकाला जा रहा था। मैंने फ़ौरन बिना समय गँवाए, डॉली जी के स्कर्ट के नीचे अपना हाथ डालकर डॉली जी की छोटी सी पैंटी को नीचे की और खिसका कर उनकी चूत की पंखुड़ियों के बीच में अपनी दो उँगलियों को डालकर उनकी चूत को अपनी उँगलियों से चोदना शुरू किया।

मैंने तब महसूस किया की डॉली जी की चूत ना सिर्फ गीली हो चुकी थी बल्कि उनकी चूत में से उस समय जैसे उनके स्त्री रस की बुँदे थमने का नाम नहीं ले रहीं थीं जो डॉली जी की चुदासी हालात को बयाँ कर रही थी। शायद पहले से ही डॉली जी ने तय कर लिया था की वह उस रात मुझसे चुदेगी।

मैंने कहा, “मोहतरमा, किसी मर्द की सज्जनता और भद्रता को नामर्दानगी कहना आप जैसी सभ्य महिला को जंचता नहीं। जब आप नशे में करीब बेहोशी के हालात में थीं तब मैं आपसे कोई ऐसा कर्म नहीं करना चाहता था जिसे गलती से भी बलात्कार या जबरदस्ती की संज्ञा दी जा सके। जहां तक मर्दानगी का सवाल है तो मैं सेठी साहब के मुकाबले कितना सही उतरूंगा यह तो कह नहीं सकता पर इतना तो जरूर कह सकता हूँ की मैं आपकी इस रंगीन शाम को और रंगीन बनाने की पूरी कोशिश करूँगा। मैं कितना सफल होता हूँ वह आप मुझे बताएंगी।”

मैंने कुछ गुस्से और कुछ प्यार भरे लहजे में जब यह कहा तब डॉली जी ने मुस्कुराते हुए अपनी पैंटी, जो उनके घुटनों के ऊपर तक खिसका दी गयी थी उसे पाँव ऊपर नीचे कर निकाल फेंका। फिर मुझे अपने ऊपर खींचतीं हुई बोलीं, “अरे यार अगर मुझे बलात्कार जैसा लगता तो क्या मैं तुम्हारे नीचे इस मुद्रा में इतने काफी समय से लेटी हुई थोड़ी होती?”

मैंने डॉली जी की चूत को अपनी उँगलियों से और फुर्ती से चोदते हुए कहा, “डॉली जी, मैं ही जानता हूँ की इस शाम का कई महीनों से मैं कितनी बेसब्री से इन्तेजार कर रहा था। आपके लिए ना सही पर मैं अपने लिए तो यह कह ही सकता हूँ। अब कहीं आज जा कर मुझे सही मौक़ा मिला है।”

डॉली जी ने कुछ कटाक्ष भरे स्वर में कहा, “पता नहीं। हालांकि तुम मुझे लाइन तो मार रहे थे पर आगे बढ़ने के कोई आसार नजर नहीं आ रहे थे। मुझे आखिर में यह लगने लगा था की शायद तुम्हें मुझमें कोई इंटरेस्ट नहीं है। तुमने मेरे करीब आने के लिए कोई भी ठोस कदम ही नहीं उठाये जब की तुम्हारे दोस्त ने तो तुम्हारी बीबी को सातवें आसमान की सैर भी करा दी”

मैंने डॉली जी को खिंच कर थोड़ा बिठा कर उनके ब्लाउज के बटन को खोलते हुए कहा, “डॉली जी, देर से ही सही पर दुरस्त तो आया हूँ ना?”

डॉली जी ने अपनी उँगलियों को मेरे होँठ पर रख कर कहा, “अब बोलना बंद, काम चालु।”

मुझे कहाँ कोई समय गँवाना था? मैंने डॉली जी के ब्लाउज और ब्रा को हटा कर उनको पहली बार साक्षात नग्न रूप में देखा। कामदेव की रति के समान डॉली जी बिस्तर पर मेरी बाँहों में अपने दोनों स्तनोँ की सीधी सख्ती से खड़ी हुई निप्पलों को मेरे होंठों से लगाते हुए मेरी और देख कर मुस्करायीं।

डॉली जी के स्तनोँ को एक के बाद मुंह में रख कर उनकी निप्पलों को चूसने का आनंद पाने की मेरी कामना कई महीनों की तपस्या के बाद पूरी हो रही थी। मैंने डॉली जी की जाँघों के बीच स्थित उनकी गुलाबी चूत को देखा। मैंने कई स्त्रियों के गुप्तांग देखे थे पर डॉली जी की चूत इतनी गुलाबी और सुकोमल सी दिख रही थी जैसे कोई दक्ष चित्रकार ने अपनी उच्चतम कल्पना से उनका चित्रण किया हो।

डॉली जी की जाँघे ऐसी अद्भुत सुआकार और कमल की कोमल डंडी के समान नीचे से ऊपर की और सुंदरता से सहज सी उभरती हुई थीं की देखने वाला देखता ही रह जाए। उभरती हुई जाँघें जहां जाकर एक दूसरे से मिल जातीं थीं वहाँ आगे और पीछे से तंत्र वाद्य गिटार जैसा बदन का मादक उभार अच्छे अच्छे मर्दों की मर्दानगी के धैर्य को जबरदस्त चुनौती देने वाला था। चूत को छिपाए हुए आगे का अग्रभाग और कूल्हों में परिवर्तित पीछे का उभार ऐसा सुआकार, रोमांचक और कामुक था की अगर उसे कोई नामर्द भी देखले तो उसका लण्ड भी खड़ा हो जाए।

मैंने डॉली जी की नाभि के ऊपर कमर को सहलाते हुए कहा, “डॉली जी आप भगवान की एक अद्भुत कलाकृति समान हो। मैंने आपके नग्न रूप की आजतक मात्र कल्पना ही की थी। आज मुझे यह कहने में कोई झिझक नहीं हो रही की नग्न रूप में आपका बदन मेरी कल्पना से भी कहीं ज्यादा आकर्षक और मादक है।”

डॉली जी ने मेरी आँखों में आँखें मिलाकर मंद मुस्कुराते हुए कहा, “राजजी, मैं आपकी भोग्या प्रियतमा हूँ। मैं नहीं चाहती की आप मुझे डॉली जी कह कर बुलाएं। भगवान ने हर स्त्री में इतनी कामुकता कूट कूट कर भरी है की अगर स्त्रियों पर मान मर्यादा और स्त्री सहज लज्जा का जबरदस्त घना पर्दा ना हो तो स्त्रियां चुदाई में इतनी बेबाक हो जाएँ की उनको सम्हालना भी मुश्किल हो जाए। स्त्रियों के मन में उसके साथ साथ एक और स्त्री सहज कामना होती है की जब स्त्री और पुरुष सम्भोग करते हैं उस समय पुरुष अपनी स्त्री को सम्मान पूर्वक पर साथ ही में आक्रामकता और उग्रता से सम्भोग करे माने चोदे। आपका मुझे डॉली जी कहना मुझे इस समय नहीं जँच रहा। आप मुझे डॉली कह कर ही बुलाएं और मुझे अब बेरहमी से खूब तगड़ा चोदें।“
 
मैं बिना बोले डॉली जी को ताकता ही रहा। डॉली जी उस समय अपने मन की बात को बयाँ कर रही थी और एक कामातुर स्त्री के मन के भाव को दर्शा रही थी।

डॉली जी ने अपने मन की बात को जारी रखते हुए कहा, “आज आप इस समय सारे सम्मान को छोड़ मुझे अपनी रखैल, रंडी या छिनाल समझ कर मुझसे अपना प्यार जतायें। इससे मेरी स्त्री सुलभ कामनाओं की पूर्ति होगी। आपका लण्ड मेरी चूत को अपनी ही मालकियत समझ कर उसी अच्छी तरह रगड़े जिससे मुझे लगे की मैं आपकी निजी संपत्ति हूँ। आप मेरा अपनी मन मर्जी के अनुसार भोग करो और अपनी मन मर्जी के अनुसार मुझे चोदो।“

मैंने झुक कर डॉली की चूत को चूमते हुए कहा, “डॉली तुम्हारी बात बिलकुल सही है। प्यार में सम्मान अन्तर्निहित होता है। सम्मान ख़ास रूप से देने की जरुरत नहीं होती। मुझे तुम्हारी चूत और तुम्हारे स्तन मंडल को खूब चूमना है और प्यार जताना है।”

अनायास ही डॉली का हाथ मेरे पाजामे के नाड़े पर जा पहुंचा। वह चाहती थी की मैं भी अनावश्यक आवरणों को त्याग कर अपने प्राकृतिक अवस्था में प्रस्तुत होऊं। शायद वह मेरे लण्ड को सहलाना चाह रही थी। मैंने फुर्ती से पाजामे का नाडा खोल कर पजामा और अंदर की निक्कर निकाल फेंकी।

मेरे पाजामे और निक्कर के हटते ही बंधन में जकड़ा हुआ मेरा लण्ड सख्ती से खड़ा हो गया। मेरा लण्ड का साइज शायद सेठी साहब के मुकाबले उन्नीस हो सकता है पर डॉली के चेहरे से मुझे ऐसा कुछ लगा नहीं। डॉली ने मेरे लण्ड के आझाद होते ही अपनी हाथों में ले लिया और बड़े ही प्यार से उसे अपने हाथों से सहलाने लगी।

अब माहौल कुछ ज्यादा ही निजी होने लगा था। डॉली शायद मेरे मन के अंदर चल रही गुथम्गुत्थि को समझने की कोशिश कर रही थी। कुछ देर डॉली चुप रहीं और आँखे मुंद कर कुछ सोचती रहीं। कुछ देर बाद मेरी और देख कर बोलीं, “राज तुम्हें पता है, मैंने सेठी साहब और ज्योति को क्यों भेज दिया तुम्हारे ससुराल एक साथ?”

मैंने डॉली जी की और देखा। उन्होंने कहा, “मैं चाहती हूँ की तुम्हारा और हमारा परिवार एक हो। मतलब सेठी साहब और ज्योति के सम्बन्ध, सेठी साहब और मेरे बीच में हैं वैसे ही हों। समझे, मैं क्या कह रही हूँ?”

हालांकि मुझे काफी अच्छा आइडिया था की डॉली क्या कहने जा रहीं थीं, मैं वह बात उनकी जुबानी ही सुनना चाहता था। शायद डॉली भी यह समझतीं थीं। उन्होंने मेरे कंधे पर हाथ रख कर कहा, “मुझे पता है राज की तुम कई महीनों से मुझे पाने की कोशिश कर रहे थे।

शायद इसी लिए तुमने आगे चल कर ज्योति से सेठी साहब के संबंधों को काफी करीबी बनाने की कोशिश की और उनको साथ में ज्योति के मायके भेजा। शायद तुम भी वही चाहते हो जो मैं चाहती हूँ। मुझे तुम बहुत पसंद हो। तुम्हारी हर बात मुझे पसंद है।

राज आज मैं तुम्हारे सामने हाथ जोड़ कर कुबूल करती हूँ की मैं तुम्हारे बच्चे की माँ बनना चाहती हूँ। राज मुझे एक बच्चा देदो। मैं जिंदगी भर तुम्हारी ऋणी रहूंगी।” यह कहते हुए डॉली ने हाथ जोड़े और मैंने देखा की डॉली की आँखों में आंसूं भर आये। शायद किसी मर्द से चुदवाने के लिए प्रार्थना करने की आदत नहीं थी उनको। शायद वह मुझ से एक बच्चा पाने के लिए बेबस थी।

मैंने डॉली का हाथ अपने हाथों में लिया और बोला, “डॉली , ऐसा मत कहो। मैं भी चाहता हूँ की तुम्हें बच्चा हो और तुम्हारी और सेठी साहब की जिंदगी में फिर से वही रौनक आये। मुझे ज्योति ने आपके और सेठी साहब के दर्द और अंतर्द्वंद के बारे में बताया था।

अब हमारे बीच औपचारिकता की जूठी दिवार या पर्दा नहीं है। हम एक दूसरे से बेझिझक अपने मन की बात कह सकते हैं। अगर मेरे वीर्य से आपका अंकुर फलीभूत हुआ तो यह मेरा सौभाग्य होगा। डॉली मैं सिर्फ आपकी बाँहों में नहीं आपके मन में समा जाना चाहता हूँ।

हालांकि आप सेठी साहब की पत्नी हो, मैंने आपके तन और मन दोनों पाने की उम्मीद सेठी साहब के साथ और उनके विश्वास के कारण ही रखी। मैं आपको यह विश्वास दिलाना चाहता हूँ की आप और सेठी साहब के जीवन में एक दूसरे के लिए हमेशा प्यार बना रहे इस लिए मैं सदासर्वदा प्रयत्नशील रहूँगा। पर तुम हमेशा मेरी तन और मन से पत्नी भी रहोगी। हमारा मिलन सिर्फ बच्चे के लिए नहीं होगा।”

डॉली मेरी बाँहों में से निकलती हुई बोली, “राजजी अब ना तो तुम और ज्योति हमें छोड़ कर कहीं जा सकते हो और ना ही हम कहीं जाना चाहेंगे। अगर जाना भी पड़ा तो भी हमारे सम्बन्ध कम मजबूत नहीं होंगे क्यूंकि हमारी जान मतलब हमारे बच्चे एक दूसरे के पास होंगे।”

मैंने कहा, “डॉली , अब हम एक होने वाले हैं। हमारा यह मिलन यादगार होना चाहिए।”

डॉली ने मेरी बाँहों में मचलते हुए जवाब दिया, “हाँ, मैं चाहती हूँ की हमारा प्यार भरा मिलन प्यार भरे संगीत के वातावरण में ही होना चाहिए। सेठी साहब के साथ मेरा मिलन हमेशा तूफानी अंदाज में ही होता है। उनके साथ सिर्फ बदन की भूख प्यार के साथ मुकाबला करती है। पर आज मैं बदन की भूख को प्यार से संगीतमय माहौल में बुझाना चाहती हूँ।”

यह कह कर डॉली बिस्तरे से उठ खड़ी हुईं और अपने म्यूजिक सिस्टम की और जाने लगी। नंगी डॉली को कमरे में चलते हुए देख मेरा पूरा बदन रोमांच से भर गया। नंगी चलती हुई डॉली के कूल्हों की लचक देखना किसी भी मर्द को पागल करने के लिए काफी था। डॉली की गाँड़ का रंग और उभार इतना ज्यादा मादक था की मैंने डॉली को पास बुलाया और बुला कर डॉली की गुलाबी गोरी गाँड़ पर हाथ फिराते हुए उन्हें कभी बड़े प्यार से सहलाया तो कभी दो तीन चपेट मार कर और भी लाल किया।

चलते चलते डॉली के स्तनोँ का उछलना किसी बिजली के गिरने से कम चमत्कारिक नहीं था। कुछ देर बाद जब मैं डॉली की गाँड़ से फारिग हुआ तो डॉली ने उनके चहिते सितार वादक की एक प्यार भरी धुन अपने म्यूजिक सिस्टम पर बजानी शुरू की और शुरू होते ही वापस लपक कर वह मेरी बाँहों में आ गयी।
 
सोचिये उस समय मेरी हालत कैसी रही होगी। मेरी प्यारी डॉली को मेरी बाँहों में पाकर मेरे लिए अब अपने आप पर नियत्रण रखना बड़ा ही कठिन था। मैंने डॉली की चूत में फिर से दो उंगलियां डाली और मैं बड़े ही प्यार से डॉली की चूत में से उन उँगलियों को अंदर बाहर कर डॉली को तैयार करने की कोशिश में लगा था।

डॉली तो तैयार ही थी। शायद उसे भी महीनों से मेरे लण्ड की उम्मीद थी। एक तरफ म्यूजिक सिस्टम पर सितार वादन की लय और तबले की थाप माहौल को संगीतमय बना रही थी तो दूसरी तरफ मैं डॉली की चूत को मेरी उँगलियों से चोदते हुए उसे चुदवाने के लिए तैयार कर रहा था। संगीत की मधुरता के साथ मेरी उँगलियों की चुदाई से डॉली भी पलंग पर मचल मचल कर चुदाई के लिए तैयार होने के संकेत दे रही थी।

पर संगीतमय चुदाई के साथ साथ जीवन की एक ठोस सच्चाई भी मुझे नजर आ रही थी। शायद डॉली और सेठी साहब ने यह मिलजुल कर फैसला लिया हो की वह दोनों मुझसे और ज्योति से जातीय सम्बन्ध बनाएंगे और उस संभोग से अगर बच्चे हुए तो हम सब आपस में मिलजुल कर उन्हें सांझा कर लेंगे। इस समझौते में मैं और ज्योति भी भागिदार थे यह तो मैं पहले पार्ट में बता ही चुका हूँ। डॉली का बच्चा वह रख लेंगे और ज्योति का बच्चा हम। इस तरह कोई झगड़ा और मनमुटाव नहीं रहेगा।

मुझे इसमें कोई आपत्ति नहीं थी। वैसे भी मैं और ज्योति दुसरा बच्चा प्लान कर ही रहे थे। अगर वह मेरे दोस्त सेठी साहब के वीर्य से भी होगा तो क्या हुआ? होगा तो हमारा ही। अगर दोनों बच्चे हो गए तो वह बच्चे हमारी दोनों फॅमिलियों को जोड़ कर रखेंगे। फिर तो सेठी साहब और डॉली चाहे जहां कहीं भी हों, हमसे अलग नहीं होंगें। मैं चाहता था की ज्योति और सेठी साहब मिल कर बच्ची पैदा करे। हमारा एक बेटा तो था ही अब बेटी होने से हमारी फॅमिली पूरी हो जायेगी।

मेरी उंगली चोदन से डॉली काफी उत्तेजित हो चुकी थी। वह बार बार दबी सी आवाज में, “राज, अब बस भी करो, मुझे अपने लण्ड से चोदो। देर मत करो। मुझे तुम्हारी उंगलियां नहीं, तुम्हारा मोटा तगड़ा लण्ड चाहिए।” कह कर अपनी उत्तेजना प्रदर्शित कर रही थी।

तब फिर मैं रुक गया। डॉली को मैंने बिस्तर पर लिटाया और उसकी मादक टांगें मैंने अपने कंधे पर रखदीं। डॉली की गुलाबी चूत की पंखुड़ियां एकदम गोरी गोरी सी मेरे लण्ड का इंतजार कर रही हों ऐसे फरफरा रहीं थीं। डॉली खुद चुदवाने के लिए इतनी बेबस हो रही थी की बार बार वह अपनी चूत की पंखुड़ियों को अपनी ही उँगलियों से सेहला कर अपनी चुदवाने की इच्छा जाहिर कर रही थी।

अक्सर औरतें अपनी चुदवाने की इच्छा तीन तरीकों से जाहिर करती हैं। पहला वह अपने स्तनोँ को नीचे से पकड़ कर अपनी हथेली में उठा कर अपनी बेबसता का इजहार करेगी, दुसरा वह अपनी चूत की पंखुड़ियों को सेहला कर अपनी इच्छा जाहिर करेगी और तीसरा तरिका है अपनी उंगलियां मुंह में डाल कर उस पर अपनी लार लिपटाती रहेंगी और आपकी और देख कर हल्का हल्का मुस्कुरा कर अपनी आँखों से इशारा करेगी की वह इच्छुक है।

डॉली की चूत में से धीरे धीरे उसके स्त्री रस की बूंदें निकलती दिख रहीं थीं। डॉली शायद मुझसे भी ज्यादा बेबाक थी चुदने के लिए। डॉली ने मेरे लण्ड को पकड़ा और उसे सहलाते हुए बोली, “राज, मेरा बड़ा मन कर रहा है इसे चूसने के लिए। पर सबसे ज्यादा मेरी चूत फड़फड़ा रही है तुम्हारा लण्ड लेने के लिए। सेठी साहब से हमारी कुछ दिनों से अनबन चल रही थी तो कई दिनों से यह बेचारी भूखी है।”

डॉली ने फिर मेरा लण्ड अपनी चूत की सतह पर रगड़ा। डॉली के स्त्री रस और मेरे लण्ड से निकले हुए मेरे पूर्व रस की चिकनाहट के कारण मेरा लण्ड वैसे ही काफी स्निग्ध तो था ही। डॉली ने मेरे लण्ड को पकड़ कर हिलाकर जगह बनाते हुए अपनी चूत की पंखुड़ियों के बीच घुसेड़ा।

मैंने एक हल्का सा धक्का दे कर मेरे लण्ड को डॉली की चूत में घुसेड़ दिया। डॉली के मुंह से एक हलकी सिसकारी निकल गयी। काफी समय से उपयोग में ना आने के कारण शायद डॉली की चूत का छिद्र कुछ सकुचा सा गया होगा। मेरे लण्ड ने घुसने के लिए जब जगह बनानी चाही तो कुछ तो दर्द होना ही था। खैर, डॉली की चूत की सुरंग बड़ी लचीली और रसीली थी। मेरे लण्ड को डॉली की चूत की चमड़ी ने जकड के पकड़ लिया।

मैं डॉली की चुदवाने की तड़प कितनी तगड़ी थी वह डॉली की चूत के अंदर हो रही फड़कन से ही समझ गया था।

मेरे लण्ड के डॉली के चूत की सुरंग में घुसते ही डॉली जैसे थरथर्रा उठी। डॉली के पुरे बदन में रोमांच की लहर दौड़ रही थी जो मैं उसके चेहरे के भाव पढ़ कर बता सकता था। मेरे लण्ड के पुरे अंदर घसते ही डॉली ने मुझे अपनी बाँहों में जकड़ लिया।
 
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