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शापित राजकुमारी

कार्तिक- मेरे सभी साथियों हमे एक शैतान को राज्य से बाहर करना है। उसकी शैतानी ताकत का सामना करना है। चाहे कुछ भी हो हमे कदम पीछे नही लेने है। हमारे पालनहार को उसने बंदी बना रखा है। जो सैनिक राजकुमार के साथ बाहर रहेंगे आपको सबसे ज्यादा होशियार रहने की जरूरत है। यदि आपने जरा भी सुस्ती दिखाई तो अंदर राजकुमारी के साथ बाकी सैनिक भी मुसीबत में पड़ जाएंगे।

राजकुमार- कार्तिक हमे बाहर से क्या करना होगा?

कार्तिक- आपको बाहर रहकर कुछ समय तक यह विशेष ध्यान रखना होगा कि कहीं वीरप्पा की कोई बाहर से मदद ना कर दे। हम अंदर 3/4 घण्टे तक उनसे लड़ सकते है। हमारे अनुमान के अनुसार अंदर की सेना हमसे ज्यादा बड़ी नही है। जैसे ही हमे अंदर कोई परेशानी हो या हमारे सैनिकों से ज्यादा यदि अंदर सैनिक हो तो हम आपको सूचित कर देंगे, आप अपनी सेना के साथ हमला कर देना। लेकिन पहले यह भी देखना होगा कि जब हम महल के अंदर जाकर वीरप्पा और उसकी सेना पर हमला करें तो बाहर से कोई अंदर ना आये। चाहे कोई सेना भी आये आपको उसे बाहर ही रोकना होगा।

राजकुमार- हां कार्तिक, आप निश्चिन्त रहें हम अपने प्राण गंवा देंगे लेकिन महल में बाहर से किसी परिन्दे को भी नही आने देंगे।

कार्तिक- ठीक है। और जब हम आपको सूचित करें तो अतिशीघ्र अंदर आना होगा।

राजकुमार- अवश्य,,, हम हर हाल मैं तैयार रहेंगे।

कार्तिक- मेरे साथियों हम ही अब इस राज्य के यौद्धा है, हमे किसी भी कीमत पर हमारा राज्य वापिस चाहिए और हमारे महाराज और महारानी को भी आजाद करवाना है।

सभी यौद्धा एक स्वर में जयघोष कर्तव्य है,,, हम वादा करते है कि अपनी गर्दन कटवाकर अपने प्राणों की आहुति देकर भी हम पीछे नही हटेंगे,, हम हर हाल में उस दुष्ट का सर्वनाश करेंगे और अपना राज्य वापिस हाशिल करेंगे।

राजकुमार, राजकुमारी और कार्तिक घोड़े पर सवार होतें है और बाकी सैनिक पैदल उनके पीछे। राज्य के अंदर जब यह दृश्य लोगों ने देखा और सबने राजकुमारी को पहचान तो अब तक जिन लोगों को पता नही था वो भी उनकी सेना में शामिल होते गए। कुछ ही पलों में आसपास मैं खबर फैल गई कि हमारी राजकुमारी सकुशल है और वीरप्पा से युद्ध करने जा रही है तो हर तरफ से लोग आकर उनकी सेना में शामिल होते गए। यह नजारा देख कर घोड़े पर सवार तीनो बहुत प्रशन्न हो गए। जितनी सेना की सोची भी नही थी अब उनके पास उतनी सेना हो गई थी। हथियारों की जगह कुदाल दरांती और घरेलू औजार भी लोग साथ मे लाने लगे।

अब पीछे एक विशाल कारवां बन गया था। इतने बड़ी तादाद में लोगों को देखकर राजकुमारी अब बस वीरप्पा की मौत के बारे में सोचने लगी। हालांकि यह आसान नही था। सेना तो वीरप्पा के पास भी है और शैतानी शक्ति भी। लेकिन राजकुमारी का हौसला अब सातवे आसमान से भी उप्पर जा चुका था। अपने दांत पीस रही थी और मन मे गुस्सा लिए बस वीरप्पा की दुर्गति के बारे में सोच रही थी।

उधर राजकुमार इससे अलग अपने माता पिता के बारे में सोच रहा था। कहाँ तो उसने शिक्षा पूरी होने के बाद सोचा था कि राज्य मैं जाऊंगा तो शानदार स्वागत होगा और अब राज्य ही उसका ना रहा। वो बस महाराज और महारानी के बारे में सोच रहा था कि इतने समय के बाद मिलूंगा और वो भी इस हालत में।

दूसरी तरफ कार्तिक भी अपने पिता के बारे में सोच रहा था। जो इंसान राज्य के राजदरबार में ताउम्र इज्जत पाता रहा आज वो उसी दराबर में एक शैतान की वजह से बंदी है। वर्षों बाद पिता से मिलने की खुशी और वो भी इस तरह तो दुःख भी कार्तिक के मन मे था। लेकिन शिक्षाविद होने के नाते कार्तिक ने सोचा कि अगर मैं इस गम में रहा तो हमारी योजना कैसे कामयाब होगी। यह सोचकर कार्तिक ने वापिस उन विचारों को भूला दिया।

कार्तिक ने देखा कि राजकुमार भी कहीं खोया से लग रहा है तो कार्तिक ने उसकी तन्द्रा तोड़ी,,

कार्तिक- राजकुमार कहाँ खो गए आप?

राजकुमार- कहीं नही, भाई, बस यों ही सोच रहा था।

कार्तिक- मुझे पता है, लेकिन इस वक्त यदि हम इस तरह से भावनाओ में बह जाएंगे तो कैसे चलेगा।

राजकुमार- सही है मित्र, तुम ठीक कह रहे हो। पहले अपनेआप को मजबूत करके हमे इस शैतान को खतम करना है।

कार्तिक- हाँ,,, अब बस हमे सिर्फ लक्ष्य के बारे मे ही सोचना है।

राजकुमार और कार्तिक की बाते सुनकर राजकुमार ने कहा,,

मुझे तो बस मेरा लक्ष्य ही दिख रहा है भैया,,, मैं जब तक उस दुष्ट वीरप्पा को खतम ना कर दूंगी तब तक मुझे कुछ और दिखाई ही नही देगा।। बस मैं तो उस नीच का सर कलम करके ही दम लुंगी।

कार्तिक- हमारी बहन एक महान यौद्धा है। सदियों तक आपको और आपकी वीरता को याद रखा जाएगा।
 
महल के मुख्य द्वार पर देखा कि सेना की एक टुकड़ी है। तीनो वीर और उनकी सेना ने पलभर में ही सभी को ढेर कर दिया। सबसे ज्यादा जोश तो प्रजा में था। जिस भी सैनिक को देखते उस पर टूट पड़ते। एक एक सैनिक पर 10 -10 लोग इस तरह टूटते की जैसे वर्षों से भूखे लोग खाने पर टूटते है। बस उनको भूख थी तो अपने राज्य की आजादी की।

मुख्य द्वार के सभी सैनिकों को मारने के बाद सभी ने मुख्य द्वार को तोड़ा,,, लेकिन जैसे ही दरवाजा टुटा, तो सामने का दृश्य देखकर सभी आश्चर्यचकित हो गए।

अंदर एक विशाल सेना के साथ वीरप्पा खड़ा था। घोड़े पर सवार जिरहबख्तर से ढका हुआ और पीछे विशाल सेना,,,, एक अट्टहास करता हुआ,,,,, राजकुमार, राजकुमारी और कार्तिक एक दूसरे की तरफ देखने लगे।।

दरवाजे के खुलते ही सामने सुसज्जित सेना के साथ खड़े वीरप्पा को देखकर राजकुमार और कार्तिक एक दूसरे की तरफ देखने लगते है। लेकिन राजकुमारी क्रोधित नजर से बस वीरप्पा को घूर रही थी। कार्तिक अपनी योजना के विफल होने से थोड़ा भयभीत हो गया लेकिन राजकुमारी के ताव को देखकर दोनो विचलित नही हुए।

विरप्पा- आओ, महारथियों,, आज तुम तीनो का एक साथ अंत होना निश्चित है। तुम लोगो मे क्या सोचा? मैं राज्य की गतिविधियों पर ध्यान नही रखता। तुम लोगो ने छल से सेना बनाई है और छल से ही आक्रमण किया है। अब मैं किसी को भी नही छोडूंगा।

राजकुमारी- वीरप्पा छल तो तुमने किया , पहले मेरे साथ और अब सम्पूर्ण राज्य के साथ। अंत तो अब तेरा होना है।तू अपनी अंतिम सांसे गिन।

वीरप्पा- यह चन्द्रपुरी मेरा राज्य है। मैं यहां ल एकमात्र उत्तराधिकारी जो अब राजा बन गया हूँ। तू तो मेरी पहली सीढ़ी थी। अब मैंने इस महल की हर सीढ़ी पार कर ली है। अब तुम में से किसी की हिम्मत नही जो मुझे जरा भी नुकसान पहुंचा सके।

राजकुमारी- सम्भल वीरप्पा,,,,,,(कहकर एक भाला वीरप्पा की तरफ फेंकती है लेकिन एक चमगादड़ तीव्र गति से आकर वो भला स्वयं पर ले लेता है ओर वीरप्पा को बचा लेता है। राजकुमारी की आँखे क्रोध में लाल हो रही थी। राजकुमारी के जोश को देखकर अब राजकुमार और कार्तिक में भी जोश बढ़ गया।

राजकुमार- सैनिकों आक्रमण,,,,,,,

राजकुमार के इतना बोलते ही त्रस्त लोग जो राजकुमार की सेना में थे वीरप्पा की सेना पर टूट पड़ते है। इधर राजकुमारी तब तक तलवार निकालकर वीरप्पा से जा टकराई। वीरप्पा और राजकुमारी में भयंकर युद्ध होने लगा। तलवार की टंकार सुनाई देने लगी। राजकुमार और कार्तिक अब अपनी सेना के साथ वीरप्पा के सैनिकों को कुचलते हुए आगे बढ़ रहे थे। लेकिन वीरप्पा की योजना से अनभिज्ञ राजकुमार लड़ते हुए आगे निकल गए और महल के ऐसे कोने में पंहुच गए जिसके आगे कोई रास्ता नही था।

अचानक मुंडेर से एक के बाद एक सैनिक राजकुमार पर गिरने लगे और राजकुमार को बंदी बना लिया। राजकुमार को बंदी बनाकर सैनिक उसको एक तहखाने में ले गए।

ईधर कार्तिक अपनी तंत्र विद्या से शैतानी सैनिकों को एक के बाद एक ढेर करता हुआ आगे बढ़ रहा था।

राजकुमारी और वीरप्पा दोनों एक दूसरे से तलवार लेकर युद्ध कर रहे थे। दोनो बराबर के यौद्धा, हार कोई नही मान सकता और राजकुमारी अब तक सहन किये हुए कष्टों का बदला लेना चाहती थी तो दुगुने जोश से वीरप्पा से लड़ रही थी।

कुछ समय पश्चात कार्तिक को आभास हुआ कि आस पास कहीं राजकुमार विजयराज दिखाई नही दे रहा है। चिंतित कार्तिक अब चारो तरफ राजकुमार को देखने लगा।

महल के अंदर छिड़े इस युद्ध का शोर कैदखाने में सुनाई देने लगा। कैदखाने में राजा वैभवराज, रानी, चक्रधर और विशंभर एक साथ खड़े हो जाते है।

राजा- चक्रधर , क्या जो मुझे आभास हो रहा है वो तुम्हे भी हो रहा है?

चक्रधर-महाराज, ऐसा प्रतीत होता है कि महल में युद्ध छीड़ा हुआ है। शायद कोई हमारी मदद करने आया है।

रानी- शायद राजकुमारी है,, है मातारानी मेरी बेटी की रक्षा करना और उसे शक्ति देना की वो उस पापी का अंत कर सके।

विशम्भर- महाराज, बाहर वीरप्पा ले सामने तीन यौद्धा है। मुझे प्रतीत हो रहा है कि आज वीरप्पा का अंत हो सकता है।लेकिन उनमें से एक यौद्धा मुसीबत में फंस गया है।

राजा-क्या! आपके कहने का क्या मतलब! हमारा कोई सहयोगी मुसीबत में है। हमे कुछ करना चाहिए फिर तो,,

विशम्भर- महाराज मुझे ऐसा प्रतीत हो रहा है।

चक्रधर-राजन आप चिंता ना करें, देवी मां ने अगर किसी को हमारी सहायता के लिए भेजा है तो जरूर देवी माँ ही मदद करेगी।

राजा-लेकिन चक्रधर कहीं राजकुमारी चन्द्रावती हुई तो।

रानी- नही ऐसा मत सोचिये। अगर राजकुमारी आ गई है तो जरूर पापी वीरप्पा का अंत करके ही दम लेगी।
 
बाहर तलवार की आवाजें आ रही थी। राजकुमारी और कार्तिक की सेना वीरप्पा की सेना पर भारी पड़ रही थी। शैतानी सैनिको को कार्तिक और अन्य सैनिकों को राजकुमारी को सेना मार रही थी।

स्वयं राजकुमारी अब वीरप्पा पर भारी पड़ने लगी। लेकिन इधर कार्तिक को राजकुमार नजर नही आ रहा था। कार्तिक में राजकुमारी को तो नही बताया लेकिम स्वयं चिंतित हो गया। हालांकि राजकुमारी को दिखाने के लिए कार्तिक अपनी सेना ले साथ आगे बढ़ रहा था लेकिन उसकी आंखें सिर्फ राजकुमार को तलाश रही थी।

कार्तिक सोच रहा था कि यदि राजकुमार ले लापता होने का पता राजकुमारी को चला तो उसका जोश कम हो जाएगा। जबकि राजकुमारी वीरप्पा पर भारी थी। तो कार्तिक अब लड़ता हुआ आगे बढ़ा और पहुंच गया उसी कोने में।

लेकिन अब वहां कोई नही था। इधर उधर नजर दौड़ाई तो एक संकरा रास्ता नजर आया। दौड़कर कार्तिक इस रास्ते मे घुस गया।

राजकुमारी का ध्यान बस सामने खड़े दुश्मन पर ही था। एक कुशल यौद्धा की तरह राजकुमारी वीरप्पा के वार ल भी जवाब देती और इधर उधर से आ रहे सैनिकों को भी मौत ले घाट उतारती। राजकुमारी का जोश और तलवार को फुर्ती देख अब वीरप्पा भी भयभीत होने लगा।

संकरे रास्ते से जाते जाते कार्तिक कैदखाने तक पहुंच गया। सामने कैदखाने में खड़े लोगो को देखा तो कार्तिक में अपने पिता एयर राजा रानी को पहचान लिया। कार्तिक खुस हुआ और उनको छुड़ाने के लिए शीघ्रता से आगे बढ़ता है तभी उप्पर से सैनिकों छलांग लगाते है। सैनिकों का एक पूरा समूह अब कार्तिक को बंदी बना लेता है।

यह देख विशम्भर बोलता है।

विशम्भर- बेटा डर मत अब तू आ गया है इम पापियों का सर्वनाश करने के लिए। अरे दुष्टों एक बालक को इतने लोगो ने एक साथ जकड़ लिया है। हिम्मत है तो सामने से युद्ध करो।

विशम्भर को यह बात सुनकर राजा और चक्रधर को आश्चर्य हुआ,,

राजा- विशम्भर आपका पुत्र,,!

विशम्भर- हां राजन,, यह मेरा पुत्र कार्तिक है। यह अध्ययन ले लिए गया हुआ था। अब हमारी मदद करने आया है।

लेकिन कार्तिक को सैनिक पकड़ कर उसी तहखाने में ले जाते है जहां राजकुमार पहले से ही बन्द है। कार्तिक को देख कर राजकुमार और अधिक चिंतित हो जाता है। दोंनो मित्र एक दूसरे को तरफ देखते है। राजकुमार बस इतना ही बोल पता है ,,,,, कार्तिक,,, राजकुमारी,,,,,,

इसके बाद राजकुमार की आंखों से आँशु बहने लगते और गला रूंध जाता है।

कार्तिक राजकुमार के गले लग जाता है और दोनो मित्र रोने लग जाते है।

राजकुमार- कार्तिक,, बहन चन्द्रावती कहाँ है?

कार्तिक- राजकुमार मैं आपकी तलाश में इधर आया और इन सैनिकों के चंगुल में फंस गया। लेकिन उस वक्त राजकुमारी वीरप्पा पर भारी थी। दोनों में युद्ध चल रहा था।

राजकुमार- परन्तु मित्र कब तक राजकुमारी अकेली उस दुष्ट की सेना का सामना कर सकेगी।

कार्तिक- इतनी चिंता मत करो राजकुमार,, मुझे राजकुमारी पर पूरा भरोसा है। उसकी आँखों से निकलती क्रोध की ज्वाला और चेहरे का तेज बता रहा था कि वीरप्पा का अंत निश्चित है।

राजकुमार- परन्तु मित्र,, हमे उसका साथ देना था और हम यहां फंस गए है। कैसे राजकुमारी अकेली युद्ध करेगी।

कार्तिक- हाँ मित्र, कैसे भी करके हमे यहां से तो निकलना ही होगा। कोई उपाय सोचो।

राजकुमार- तुम अपनी तन्त्र शक्ति का प्रयोग क्यों नही करते। अपनी शक्ति के प्रयोग करके हम यहां से निकल सकते है।

कार्तिक- जरूर मित्र,, लेकिन एक समस्या है।

राजकुमार-क्या! क्या समस्या है?

कार्तिक- जब सैनिकों ने मुझे पकड़ा तो मेरा कमंडल वहीं गिर गया। आप जानते हो कि कमंडल के बिना मेरी कोई शक्ति का प्रयोग मैं नही कर सकता ।

राजकुमार-फिर क्या करेंगे?

कार्तिक- सोचते है।
 
उधर राजकुमारी ने बहादुरी से वीरप्पा की सेना को तहस नहस कर दिया और प्रजा के जो लोग राजकुमारी की सेना के रूप में साथ आये थे, बिना प्राणों की परवाह के बहादुरी से मुकाबला कर रहे थे। राजकुमारी ने वीरप्पा का एक हाथ काट दिया।

राजकुमारी-दुष्ट,, नीच,, पापी ले अब तुझे ऐसी मौत मारूंगी की तू अगले जन्म में किसी भी रूप में पृथ्वी पर आने की ख्वाहिस नही रखेगा।

वीरप्पा- राजकुमारी, तेरे पूरे राजपरिवार ने मेरे साथ न्याय नही किया और मैं इतनी जल्दी हार मानने वाला नही हूँ।

राजकुमारी-(हंसते हुए) हहहह,,, तू अब क्या करेगा। चल उठ। मैं निहत्थे पर वार नही करती। आ आना अब,,, दुष्ट,,,,

वीरप्पा- राजकुमारी ध्यान से देख तेरे आसपास ।।

राजकुमारी- क्या देखूं? मैं जब तक तेरा सर्वनाश नही करूंगी तब तक मुझे और कुछ दिखाई नही देगा।

वीरप्पा- पागल लड़की तेरे माता पिता मेरी कैद में है। अगर तूने मुझे मार दिया तो उनका पता कैसे चलेगा।

राजकुमारी-पापी तू बस यह छल कर सकता है। हिम्मत है तो तलवार उठा और सामना कर मेरा। कायर,,, नीच।,,

ऐसा सुनते ही कटे हाथ के साथ भी वीरप्पा राजकुमारी से वापिस तलवार टकरा देता है। फिर से युद्ध शुरू हो जाता है।उधर दोनो सेना आपस मे पुरजोर तरीके से लड़ रही थी। राजकुमारी के सैनिक भी वीरगति को प्राप्त हो रहे थे। लेकिन इन सबको नजरअंदाज करके राजकुमारी बस वीरप्पा से युद्ध कर रही थी। हाथ कटने के बावजूद भी वीरप्पा एक कुशल यौदा की तरह फिर से राजकुमारी से लड़ने लगा।

उधर तहखाने में राजकुमार और कार्तिक दोनों बाहर निकलने का उपाय सोच रहे थे परंतु कोई राह नजर नही आ रही थी। तहखाने के बाहर खड़े सैनिकों में एक वृद्ध सैनिक था जो बार बार राजकुमार की तरफ देख रहा था। राजकुमार भी समझ गया कि यह मुझे देख रहा है।

राजकुमार- क्या देख रहे हो काका,,,,, इतना गौर से,,

सैनिक- तुम कौन हो बेटा,, शायद मैं तुम्हे जानता हूँ।

कार्तिक- राजकुमार यह वीरप्पा की सेना के सैनिक है, हमारे किसी काम के नही।

कहकर कार्तिक दूसरी तरफ मुहं फेरकर खड़ा हो जाता है।

राजकुमार- आप कौन है काका। आपकी उम्र देखकर लगता है की वर्षों से आप इस महल में रह रहे है।

सैनिक- (धीरे से) कहीं तुम महाराज वैभवराज के पुत्र तो नहीं हो

राजकुमार- हां काका आपने सही पहचाना।

वृद्ध सैनिक इतना सुनकर वहां से चला जाता है और राजकुमार फिर से निराश हो जाता है। राजकुमार सोचता है कि कहीं यह बताकर उसने गलती तो नही कर दी। तभी वो सैनिक एक बड़ा सा भाला लेकर आता है और तहखाने के सामने खड़े रक्षकों को एक एक करके मार देता है। राजकुमार और कार्तिक यह दृश्य देखकर चौंक जाते है।

खून से सने भाले को हाथ मे लिए वृद्ध सैनिक हांफता हुआ राजकुमार को देखने लगा।

उधर कैदखाने में राजा और रानी विलाप कर रहे थे और विशम्भर भी अपने पुत्रमोह के कारण उदास बैठे थे। चक्रधर ने सबको समझाने का बहुत प्रयत्न किया।

चक्रधर- है राजन! आप इस राज्य की धुरी हो । अब तक मैंने कभी आपको इस तरह दुखी नही देखा , फिर अब आप इतने दुखी क्यों हो?

राजा- चक्रधर तुम जानते हो इस तरह के भयानक सपने को भी कोई सहन नही कर सकता, फिर इस वास्तविकता को मैं कैसे सहन करूँ।

चक्रधर- लेकिन राजन अब तो हमारे राजकुमार और सेना आ चुकी है। महल में भयानक युद्ध चल रहा है। कुछ ही समय के उपरांत हमे अच्छी सूचना मिल जाएगी।

राजा- क्या आपने नही देखा कि विशम्भर जी के पुत्र को किस तरह वो लोग बंदी बनाकर ले गए है।

चक्रधर- लेकिन राजन आप निश्चिन्त रहें। मुझे राजकुमारी पर पूरा भरोसा है। वो हम सबको छुड़ा लेगी और उस दुष्ट का सर्वनाश भी कर देगी।

राजा- विश्वास तो मुझे भी है। परंतु शंका का समाधान रो इस समस्या के सुलझने के बाद ही होगा।

इस वार्तालाप के इतर विशम्भर मूक और उदास बैठे थे। दूसरी तरफ रानी तारामती भी अश्रुधारा बहा रही थी।

उधर तहखाने में वृद्ध सैनिक ने राजकुमार और कार्तिक की मदद की।

सैनिक- राजकुमार ,, जब आपके पिता आपकी तरह एक राजकुमार थे तब से आज 50 साल बीत गए है मैं इसी तहखाने का रक्षक हुँ। मैं इस राजपरिवार के प्रति पूर्ण रूप से वफादार हुँ। कुछ समय पहले जब अजीब से सैनिक यहां आने लगे तो मुझे शंका जरूर हूई लेकिन मैंने किसी से कुछ पूछा नही। मैंने सोचा कि महाराज ने नए सैनिकों को रखा होगा। परन्तु आज आपको बंदी देखकर मैं सब समझ गया कि महल में जरूर कोई अनहोनी घटना घट गई है।

राजकुमार- हां काका आपने सही सोचा। अब आप शीघ्रता से हमे यहां से बाहर निकाले।

सैनिक- अवश्य, राजकुमार।

सैनिक राजकुमार और कार्तिक को मुक्त कर देता है और तीनों वहां से बाहर निकलते है। चूंकि वृद्ध सैनिक तहखाने के सारे रास्ते जानता था तो वो राजकुमार और कार्तिक को सुरक्षित स्थान पर ले आया।
 
सैनिक- राजकुमार अब आप सुरक्षित है। अब आप आगे की अपनी योजना बना सकते है।

कार्तिक- आपका बहुत बहुत धन्यवाद, आपने एक फरिस्ते की तरह आकर हमारी जान बचाई है। हमारी जान ही नही बल्कि पूरे राज्य को बचाया है।

राजकुमार- लेकिन काका हमे महल के मुख्य प्रांगण में जाना है। जहां राजकुमारी अकेली ही दुष्ट वीरप्पा से युद्ध केर रही है।

सैनिक- निश्चिन्त रहिये। मैं आपको वहाँ ले चलता हूं। आप मेरे पीछे आइये।

राजकुमार और कार्तिक अब प्रशन्न हो गए और वृद्ध सैनिक के पीछे चलने लगे।।।

वृद्ध सैनिक के पीछे पीछे अंधेरे गलियारे से होते हुए राजकुमार और कार्तिक चलने लगे। सैनिक आगे आगे और दोनों मित्र पीछे चल रहे थे। अचानक एक भयानक शोर होता है और एक डरावने रूप में चुड़ैल उस गलियारे में सामने आती है। चुड़ैल जोर से अट्टहास करती है।

सैनिक के हाथ मे कोई हथियार भी नही था, ना ही राजकुमार और कार्तिक के पास। अब करे तो भी क्या करे।

चुड़ैल- हाहाहाहा,,, क्यों बूढ़े कहाँ चला तूं मेरे इन दुश्मनों को लेकर?

सैनिक- यह तेरे दुश्मन नही तुम इनके दुश्मन हो, यह तो इस महल के असली हकदार है। मेरे जीते जी तो मैं इनको कुछ नही होने दूँगा।

चुड़ैल- हाहाहाहा, हाहाहाहा,,, तो तुम मुझसे जीत जाओगे।

सैनिक- मैं जीत हार की बात नही कर रहा हूँ, बल्कि यह कह रहा हूँ कि जब तक मेरे शरीर मे प्राण है मैं इनकी रक्षा करूँगा।

चुड़ैल- हहहहह हाहाहाहा,,, तो ले पहले तेरे ही प्राण हरति हूँ।

चुड़ैल ने अपने नाखूनों से सैनिक का मुहं बेरहमी से नोच दिया। सैनिक लहू से लथपथ हो गया और वहीं गिरकर ढेर हो गया। इस दृश्य को देखकर राजकुमार और कार्तिक भी भयभीत हो गए। दोनों के पास ना तो कोई हथियार थे और इस तरह के मार्ग में अटके की महल के किसी भी अन्य रास्ते को जानते नही थे। कार्तिक का कमंडल भी तो उसके पास नही था।

राजकुमार और ज्यादा भयभीत हो गया। अगर बहादुरी दिखाने की कोशिश करते तो जान से हाथ धोते तो अब करें भी तो क्या! कार्तिक ने कुछ सोचा और राजकुमार का हाथ पकड़कर वापिस पीछे की तरफ दौड़े। चुड़ैल मदभरी हंसी हंसने लगी और जोर जोर से अट्टहास करने लगी।

इधर राजा और अन्य बंदी कैदखाने में चिंतित होकर बेसुध हो गए। और दूसरी तरफ राजकुमारी बहादुरी के साथ वीरप्पा का मुकाबला कर रही थी। राजपरिवार और उनके वीर यौद्धाओ में से सिर्फ राजकुमारी ही थी जिस पर अभी तक वीरप्पा की कोई चाल नही चली। बाकी अन्य सभी अपनी योजना और राह से भटक गए या फिर वीरप्पा की चाल में फंस गए।

राजकुमारी का जोश देखकर राजकुमारी के साथ लड़ रहे प्रजाजनों में भी जोश भरता गया और दुगुने जोस् से लड़ते हुए वो वीरप्पा के सैनिकों का कत्लेआम कर रहे थे। महल के मुख्य प्रांगण जहां कभी इसी प्रजा की समस्या का निपटारा शाही दरबार लगाकर होता था। आज उसी प्रांगण में अपने राज्य की दांव पर लगी शाख को बचाने वही प्रजा सेना से रूप के तांडव कर रही थी। राजकुमारी और उसके पीछे लड़ रहे सैनिकों के जोश को देखकर वीरप्पा पसीने पसीने होने लगा।

उधर गुप्त मार्ग में भागते हुए राजकुमार और कार्तिक की नजर एक छोटे से दरवाजे पर पड़ी।

कार्तिक- मित्र वहां देखो! कोई गुप्त मार्ग नजर आता है।

राजकुमार- नही मित्र हो सकता है यह वीरप्पा का कोई गुप्त दरवाजा हो, हम जाए तो वहां कुछ अच्छा सोचकर और यदि ज्यादा मुसीबत में पड़ गए तो!!

कार्तिक- मित्र हमारे पास कोई रास्ता नही और हम इस तरह भागते रहे तो क्या हल निकलेगा। सोचो अगर हम कोई उपाय नही सोचेंगे तो राजकुमारी अकेली कब तक इस भयानक सेना का सामना करेगी।

राजकुमार- तो करे क्या मित्र? वहां जाना भी किसी खतरे से कम नही है।

कार्तिक- मित्र अब महल को और राजपरिवार की इज्जत को बचाने के लिए हम दोनों को कोई खतरा तो उठाना ही पड़ेगा।

राजकुमार- ठीक है मित्र जैसा आपको उचित लगे।

दोनो मित्र उस अंधेरे दरवाजे के पास जाते है। इतना छोटा दरवाजा था कि किसी भी व्यक्ति को बैठकर जी अंदर घुसना पड़ता। पहले कार्तिक अंदर घुसा और फिर राजकुमार। अंदर का दृश्य देखकर दोनो आश्चर्यचकित हो गए।

वो एक तहखाना था और उसमे हथियार थे। यह बात शायद वीरप्पा को भी पता नही थी। कार्तिक का चेहरा खिल गया।

कार्तिक- देखा मित्र मिली ना हमको मदद।

राजकुमार-कार्तिक इन हथियारों से हमे कैसे सहायता मिली।

कार्तिक- बाहर हमारी सेना लड़ रही है उनके पास सिर्फ तलवार है और यहां देखो हर तरह के हथियार है। यदि यह हथियार अपनी सेना के पास हम पहुंचा दें तो उनकी ताकत दुगुनी हो जाएगी। बताओ होगी या नही।

राजकुमार- हा बात तो आपकी सही है लेकिन हम यह हथियार उन तक कैसे ले जाएंगे।

कार्तिक- सबसे पहले तो जितनी जल्दी हो सके उतनी जल्दी तेज और कारगर हथियारों के दो बंडल बनाएंगे और उनको अपनी सेना तक पहुँचाएँगे।

राजकुमार- कार्तिक ,, हमे रास्ते का ही पता नही है फिर हम कैसे इन हथियारों को सेना के पास ले जा सकेंगे।
 
अब कार्तिक के चेहरे पर चिंता उभर आई। राजकुमार की बात सत्य हैं। हथियार मिल गए और इन हथियारों से उनकी सेना भी अधिक ताकतवर हो जाएगी लेकिन बाहर निकलने का रास्ता कहाँ है? बाहर उनके पीछे एक भयानक चुड़ैल भी तो है। दोनों मित्र तहखाने को चारों तरफ से गौर से देखते है। अचानक राजकुमार की नजर एक कोने में पड़ती है जहां एक बड़ा सा पहिया था। राजकुमार दौड़कर उस पहिये के पास जाता है और उसको हिलाने की कोशिश करता है। लेकिन पहिया हिलता नही है। कार्तिक यह देखकर राजकुमार के पास जाता है और देखता है कि पहिये के आसपास और कुछ नही है । कार्तिक समझ जाता है।

कार्तिक और राजकुमार एक दूसरे की तरफ मूक देखते है और फिर दोनो एक साथ पहिये पर जोर लगते है। अब पहिया हिल गया। फिर जोश बढ़ा और फिर घुमाने लगे। पास की दीवार पर लकड़ी का बड़ा सा दरवाजा पहिये के घूमने के साथ ही खुलने लगा। दरवाजा पूरा खुला तो देखा कि सामने खुला मैदान था।बाहर से तलवारों के टकराने की और चीखने चिलाने की आवाजें आ रही थी।

आवाज सुनकर प्रतीत हुआ कि तहखाने के दरवाजा मुख्य प्रांगण के पास ही खुला है। जहां से अब आगे का कार्य उनके लिए आसान हो गया।

कार्तिक ने एक मंत्र बोला तो उसके वश में किये गए सारे सैनिक एक एक करके तहखाने के दरवाजे के सामने आने लगे। इसके बाद अंदर से हथियार देकर कार्तिक ने उनको आदेश दिया कि हथियार अपनी सेना के पास पहुंचा दो।

उधर राजकुमारी से अब तक तलवार बाजी कर रहे वीरप्पा ने यह दृश्य देखा तो चौंक गया। पलभर में ही राजकुमारी की सेना के पास के पास पर्याप्त और मजबूत हथियार आ गए। अब सेना और अधिक जोश से लड़ने लगी।

उधर कार्तिक और राजकुमार भी अब हथियारों से सज्जित होकर राजकुमारी का साथ देने पहुंच गए। राजकुमार को सेना के पास छोड़कर कार्तिक वापिस उसी तरफ चला गया जहां से उसे बंदी बनाया था।

कार्तिक को रास्ते मे जो भी मिला उसको ढेर करता हुआ कार्तिक आगे बढ़ने लगा और उस कोने में पहुंच गया जहां कार्तिक का कमंडल छूटा था। चूंकि वो रास्ता अब कार्तिक जानता था और कमंडल लेकर कैदखाने की तरफ जाने लगा।

शीघ्र ही कार्तिक कैदखाने के सामने आ गया। कैदखाने के सामने आते ही कार्तिक ने एक मंत्र बोलकर जल छिड़का तो सारे मायावी सैनिक ढेर हो गए। यह देखकर अन्य सैनिक कार्तिक की तरफ दौड़े तो यौदा की तरह कार्तिक ने सबको ढेर कर दिया। कुछ ही समय मे सभी सैनिक कार्तिक के शिकार बन गए। अब कैदखाने के सामने सिर्फ कार्तिक ही था।

कार्तिक ने कैदखाने का दरवाजा तोड़ा और अपने पिता के साथ अन्य सभी बंदियों को मुक्त किया। बाहर आते ही विशंभर पंडित कार्तिक से गले लग गए और रोने लगे। आँशु तो कार्तिक की आँखों मे भी भर आये लेकिन कार्तिक ने स्वयं को भाऊक होने से रोका और पिताजी से अलग किया। फिर सभी के पैर छुए और बोला,,

कार्तिक- आप सभी से मैं माफी चाहता हूँ लेकिन यह हमारे राज्य के लिये संकट की घड़ी है और हम सबको सबसे पहले राज्य के बारे में सोचना चाहिए। राजकुमारी और राजकुमार दोनों लड़ रहे है। हमे अब उनका साथ देने जाना है।

महाराज- सही कथन पुत्र,,, चलो हमे अब अपनी जिम्मेदारी निभानी है।

कार्तिक सभी को लेकर जाता है।

उधर अब राजकुमार और राजकुमारी दोनो लड़ रहे थे। वीरप्पा ने एक मंत्र बोला और अचानक सैंकड़ो की संख्या में चमगादड़ो ने आकर दोनो को घेर लिया। दोनों अब उनके चंगुल में फंस, गए।

चमगादड़ और चुड़ैलों से घिरे राजकुमार और राजकुमारी दोनो एक दूसरे को ताकने लगे। वीरप्पा अट्टहास कर रहा था और चुड़ैलें भयावह शोर मचा रही थी। राजकुमारी की तलवार छूट गई थी और राजकुमार भयभीत हो गया था। राजकुमारी सोचने लगी कि काश तलवार हाथ मे होती तो मैं चंद पलो में ही इन सबका खात्मा कर देती।

वीरप्पा- हाहाहाहा ,,,,, राजकुमारी आखिर तू उस मोड़ पर आ ही गई जो मैं चाहता था। सच है समय इंसान को उसी राह पर ले जाता है जहाँ उसका अंजाम होता है। आज तेरी मौत मेरे ही हाथों होगी।

राजकुमारी-दुष्ट हमेशा छल करने वाले, हिम्मत है तो आ मैं अकेली और तू अकेला,,, फिर देख किस राह पर किसका क्या अंजाम होगा। यह शैतानी शक्ति से एक साधारण मनुष्य को घेरकर तू अपनी ताकत दिखा रहा है लानत है तेरे पर।

वीरप्पा- वाह अब भी तेरी जबान चल रही है लेकिन यह तो उस दीपक की तरह है जो बुझने से पहले एक बार फड़फड़ाता है। निकाल ले तू भी अपनी भड़ास, लेकिन जब तूने उस दिन मैदान में मुझे झुकाया था उसी दिन से तेरी मौत की रेखा मेरे हाथ मे आ गई और आज तेरा यह आखरी दिन है। मैं मौका देता हूँ तुझे जितना बोलना है बोल। और कुछ तो कर नही सकती। अब बोलकर निकाल ले जो क्रोध तेरे अंदर भरा हुआ है उसको।

राजकुमारी-मूर्ख किसका अंत समय आया है यह तो अभी पता चलेगा। लेकिन तू मर्द है तो दे मेरे भी हाथ मे तलवार और फिर देख, यदि मेरा एक कदम भी पीछे हटा तो मैं स्वयं आत्मसमर्पण कर दूंगी। है हिम्मत तो आ ।

वीरप्पा- इन धमकियों में आकर मैं पहले गलती कर चुका हूँ अब नही। अब तो बस किसी भी तरह हो चाहे तेरा अंत ही करना है।

राजकुमारी- मूर्ख एक निहत्थे पर वार करना क्षत्रिय को शोभा नही देता।

वीरप्पा- मुझे हर काम शोभा देता है। तेरे साथ तेरे पूरे राजवँश को खत्म करके इस सिहांशन पर मैं बैठूंगा तो इस दरबार और महल की शोभा बहुत बढ़ जाएगी।

राजकुमारी- दुष्ट मेरी यह इच्छा कभी पूरी नही होगी।

वीरप्पा फिर अट्टहास करता है। राजकुमारी विजयराज को इशारा करती है लेकिन युद्ध कौशल से अनजान विजयराज समझ नही पाता है। तभी राजकुमारी के ठीक सामने खड़ी एक भयावह चुड़ैल के सीने पर एक तीर आकर पार हो जाता है और चुड़ैल वहीं ढेर हो जाती है। जरा सी नजर हटी और बिजली की फुर्ती से राजकुमारी ने तलवार उठा ली।

तेरी हर हसरत को यूं ही ढेर कर दूंगा,,,, पीछे से राजा वैभवराज धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाए हुए आते है। उनके साथ रानी विशम्भर और चक्रधर थे।

वीरप्पा- यह क्या!! कौन है गद्दार जिसने इन लोगों को आजाद किया है। कौन है??

चक्रधर- तेरे अंत समय ने हमे आजाद किया है पापी,,,

वीरप्पा- ओहो,,, बूढ़े एक हाथ ही क्यों काट मेने उस दिन तेरा,,, तेरे सीने में ही खंजर घोंप देता तो आज यहां नही होता तूँ।।

चक्रधर- यह तेरे समझ से बाहर है नीच,,,, मेरा हाथ कटना तो शायद मेरी किस्मत थी।

वीरप्पा- बूढ़े,, तू ही सब फसाद की जड़ है, आज तेरा भी अंत मेरे ही हाथों होगा।
 
दूसरी तरफ से धनुष पर तीर की प्रत्यंचा चढ़ाए हुए कार्तिक प्रवेश करता है,,

कार्तिक- अंत आज तेरा होना है और जड़ भी नष्ट करके ही दम लूंगा।

वीरप्पा हैरान हो जाता है। चारों तरफ से घिर जाता है। राजकुमारी अब चुड़ैलों पर टूट पड़ी और वैभवराज व कार्तिक तीर से चमगादड़ो को एक के बाद एक को ढेर कर रहे थे। सबको देखकर राजकुमार विजयराज का जोश भी बढ़ गया और तलवार की टँकार अब और तीव्र हो गई।

वीरप्पा मौका पाकर निकलने ही वाला था कि कार्तिक ने पाश फेंका और वीरप्पा को जकड़ लिया। वीरप्पा की सम्पूर्ण सेना ढेर हो गई थी और महल के कुछ सैनिक जो डर के मारे वीरप्पा के साथ थे सबने हथियार डाल दिये और झुक गए।

राजा वैभवराज का इशारा पाकर वो सभी पीछे हट गए। पाश में बंधे वीरप्पा पर राकुमारी टूट पड़ी, क्रोध का आवेग इतना था कि राजकुमारी वीरप्पा की छाती पर चढ़ गई।

राजकुमारी (तलवार तानते हुए) अब बोल पापी अंत समय किसका है।

राजकुमारी तलवार का वार करने ही वाली थी कि कार्तिक ने राजकुमारी का हाथ पकड़ लिया,,,,

राजकुमारी ने जैसे ही तलवार का वार वीरप्पा पर करना चाहा तो कार्तिक ने राजकुमारी का हाथ पकड़ लिया। ये देखकर राजा वैभवराज के साथ साथ अन्य सभी भी चकित रह गए। सब चाहते थे कि वीरप्पा का अंत हो परन्तु कार्तिक ने रोक लिया। कोई समझ नही पाया कि कार्तिक ने राजकुमारी को क्यों रोका। इसके बाद सभी के एक के बाद एक प्रश्नों की झड़ी लग गई।

वैभवराज- कार्तिक आपने ऐसा क्यों किया, मैं समझा नही। इस दुष्ट के कारण इतने दिन से यह राजपरिवार और सम्पूर्ण प्रजा कितने कष्ट सहन कर रही है।

रानी- जिस दुष्ट , नीच ने मेरी पुत्री के जीवन को कष्टमय बनाया, आपने उसको मारने से क्यों रोका। मेरी पुत्री का बचपन कितने कष्टों में गुजरा आपको मालूम नही।

चक्रधर- कार्तिक शायद आप नही जानते कि इस, वीरप्पा को वजह में हम सबने कितनी परेशानियां झेली है। आपकी मंसा क्या है यह तो मुझे नही पता लेकिन इसकी मौत इस राज्य के लिए आवश्यक है।

विशम्भर- हाँ, पुत्र यह सभी सच बोल रहे हैं। वीरप्पा ने बहुत गलत किया है इस सम्पूर्ण राज्य के साथ।

राजकुमार- आप सब शांत हो जाओ। आपके सवाल जायज हैं परन्तु आप शांत होकर कार्तिक की बात भी तो सुनो। वीरप्पा को इस अंजाम तक पहुंचाने में सबसे बड़ा सहयोग अगर किसी का है, तो वो कार्तिक का ही है। मुझे यकीन है कि यदि कार्तिक ने रोका है तो जरूर कोई कारण होगा।

कार्तिक- राजकुमार आपका बहुत धन्यवाद। और आप सभी से मैं क्षमा चाहता हूँ। राजकुमारी जी आप भी शायद भूल गई कि वीरप्पा के बदले शैतान की गुफा में कौन है? और यह भी याद रखो की अभी तक आप श्राप मुक्त नही हो।

वैभवराज- क्या! क्या मतलब है इसका! सच बताओ। बात क्या है?

कार्तिक सबको गुफा की और वीरप्पा को सच्चाई बताता है। और द्रुम ऋषि का त्याग भी। सभी लोग उत्साहित हो जाते है कि ऐसे परोपकारी ऋषि से मिलना भी जरूरी है।

कार्तिक राजकुमार और राजकुमारी वीरप्पा को लेकर गुफा की तरफ जाते है और राजा वैभवराज के आदेश पर प्रजा के लोग अस्त-व्यस्त महल को दुरुस्त करने में सहयोग करते है।

गुफा में पहुंचकर कार्तिक शैतानराज का आव्हान करता है तो कुलसी आ जाती है।

कुलसी- वीर कार्तिक, मैं बहुत प्रश्न हूँ की आपने अपना वादा निभाया और वीरप्पा को जीवित यहां लाये।

कार्तिक- कुलसी आप जरूर शैतानी शक्ति रखती है परन्तु आप हृदय से बहुत अच्छी है। और मुझे भी अपना वादा निभाना आता है। मेने आश्रम में यही शिक्षा ग्रहण की है।

कुलसी - बहुत अच्छा,।

कार्तिक- कुलसी अब आप शैतानराज को बुलाएं और राजकुमारी को श्रापमुक्त करें। साथ ही हमारे पूज्यनीय ऋषिराज द्रुम को भी हमारे साथ जाने की अनुमति दें।

कुलसी- अवश्य।
 
इसके बाद कुलसी शैतानराज को बुलाती है और साथ मे ऋषि द्रुम भी आते हैं। कुलसी ने मंत्र फूंका और राजकुमारी को श्रापमुक्त किया। लेकिन कुलसी ने वीरप्पा को उसी क्षण मार दिया। यह देखकर शैतानराज और सभी लोग चकित हो गए।

शैतानराज- यह क्या! कुलसी तुमने ऐसा क्यों किया?

कुलसी- क्षमा करें , लेकिन यह अब हमारी दुनिया मे विस्वास के लायक नही था। मैं उस दिन इसको मार रही थी लेकिन आपने रोका था। अब इन अच्छे लोगों को देखने के बाद मैंने सोचा कि यह किसी के भी साथ घात कर सकता है। और इसने पहले भी इसी गुफा में कोशिश की थी। इसलिए इसको मारकर मैंने आपकी इस दुनिया से एक गद्दार को कम किया है।

ऋषिराज- वाह,,, अतिउत्तम, शैतानी दुनिया के नियम भी अच्छे है। हम बाहर से जिन लोगों को देखकर जो अंदाज लगाते है अक्सर वो गलत होते हैं। यहां इतने दिन रहकर मैने यह जान लिया कि आप लोग किसी गलतफहमी के शिकार हैं। लेकिन हृदय से आप लोग आज भी इंसान है।

शैतानराज- ऋषिराज जो भी है, अच्छा है। अब आप प्रस्थान करें। और इस गुफा में आपको हुई किसी भी तकलीफ के लिए हम क्षमाप्रार्थी हैं।

इसके बाद सभी शैतानराज को प्रणाम करते हुए मुस्कुराते हुए गुफा से बाहर आते हैं। और ऋषिराज को मनाकर महल में साथ लाते है। शाम होते होते सभी राज्य में प्रवेश करते हैं। राज्य के हर मार्ग में रौनक थी। प्रजा में खुशी का मौहोल था।महल अब पहले जैसा हो गया था। शाही दरबार वैसा ही सजा हुआ था। प्रजा भी अब खुश थी। महल की प्रत्येक मुंडेर पर घी के दीपक जल रहे थे। मुख्य द्वार पर रानी तारामती और राजा वैभवराज आरती का थाल लेकर खड़े थे।

सबसे पहले ऋषि द्रुम का सत्कार किया गया और सादर महल में ले जाया गया। उसके बाद कार्तिक , राजकुमारी चन्द्रावती और राजकुमार विजयराज का स्वागत किया गया। ढोल नगाड़े बज रहे थे। महिलाएं मंगलगीत गा रही थी और नृत्यांगनाएं नृत्य कर रही थी।

शाही दरबार लगा और राजा वैभवराज सिहांशन पर विराजमान हुए।

राजा- बहुत समय बाद आज महल में और सम्पूर्ण राज्य में फिर से खुशियां आई है। इस खुशी में ऋषिराज के आशीर्वाद और मार्गदर्शन में कार्तिक की सूझबूझ और राजकुमारी एवं राजकुमार की बहादुरी से तथा प्रजा का भी अतुलनीय सहयोग रहा। मैं इस दरबार मे ऋषिराज द्रुम को सर्वप्रथम स्थान देता हूँ और उनसे निवेदन करता हूँ कि आप हमेशां इस राज्य की खुशहाली के लिए अपना आशीर्वाद देते रहिये।

ऋषि द्रुम को सादर उच्च स्थान पर बैठाया जाता है।

ऋषि- महाराज आपके द्वारा दिया गया सम्मान अद्वितीय है। परंतु मैं आपको बता देना चाहता हूँ कि साधु बहता पानी होता है और पानी कभी स्थायी नही रहता। मैं आपके शाही दरबार मे हर रोज सुनवाई के वक्त जरूर आऊंगा और जब भी मेरे विचारों की इस राज्य को जरूरत हो तो बुला लेना मैं उपस्थित हो जाऊंगा। लेकिन मैं जंगल मे रहूंगा, बस आप एक झोंपड़ी बनवा दीजिये।

राजा- जो आज्ञा ऋषिराज। परन्तु आप राज्य के लिए, उपस्थित रहना।

ऋषि- महाराज, जरूर रहूंगा।

राजा , चक्रधर और विशम्भर ऋषि द्रुम के साथ कुछ समय तक मन्त्रणा करते है और ततपश्चात निर्णय लेते है कि अगला राजा कौन होगा।

राजा- हम सबने सोचसमझकर निर्णय लिया है। राजकुमारी की वीरता और बुद्धिमानी से हम सब अत्यंत खुश हैं और राजकुमारी को इस राज्य की कमान दी जाती है। कार्तिक की सलाहकार के पद पर नियुक्त किया जाता है।

राजकुमारी- क्षमा चाहती हूं महाराज, लेकिन मैं इस सिहांशन पर नही बैठ सकती है। इस पर मेरे भाई विजयराज का हक है। मैं जब तक इस राज्य में हूँ सहयोग करती रहूंगी और विजयराज को तब तक मैं युद्धकला सीखा दूँगी।

विजयराज- नही बहन। जब तक आपकी शादी नही होती तब तक इस राजगद्दी को आप सम्भाले। यह मेरी हृदय से इच्छा है।

कार्तिक- राजकुमार सही कह रहा है राजकुमारी। राजकुमार ने शास्त्र विद्या सीखी है तो आप यदि कुछ समय तक इस जिम्मेदारी को सम्भाले तो शायद राजकुमार को बहुत कुछ सीखने को मिलेगा।

सबके इस तरह से कहने के बाद राजकुमारी तैयार हो जाती है। राजकुमार को सेनानायक और कार्तिक को सलाहकार के पद पर बैठाया जाता है।

राजकुमारी का राजा की तरह राजतिलक किया जाता है। सम्पूर्ण राज्य में खुशियां छा जाती है। राजपरिवार और प्रजा राजकुमारी के रूप में एक कुशल यौदा और रणनीतिज्ञ राजा को पाकर अत्यंत खुश होते हैं।

ऋषि द्रुम के हाथों से सभी का तिलक किया जाता है और खुशियाँ बांटी जाती है।

समाप्त
 
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