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शापित राजकुमारी

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शापित राजकुमारी

लेखक

विनोद महर्षि "अप्रिय"

प्राचीन चन्द्रपुरी राज्य में एक अनुशाषित एवं प्रजावत्सल राजा वैभवराज हुए। वैभवराज का राज्य हर तरह से खुशहाल राज्य था। वैभवराज के दरबारी विद्वानों में एक विद्वान विशम्भर थे। जो अत्यंत प्रचंड विद्वान थे। राज दरबार मे उनका कद राजा के बाद सबसे बड़ा होता था। राजा का सेनापती चक्रधर थे जो युद्धकला में प्रखर थे एवं कुशल रणनीतिज्ञ थे।

शाही परिवार में रानी तारामती थी। जो राजा की हर सम्भव राज काज में सहायता करती थी। प्रतिदिन राज दरबार मे राजा प्रजा की समस्याओं का निपटारा करते थे और तारामती हर सम्भव अपने विचारों से राजा की सहायता करती। हर प्रकार से वैभवराज का राज्य सम्पन्न था। इस कमी थी तो वैभवराज के कोई संतान नही थी। विवाह के कई वर्ष बीत जाने पर भी जब राजा के कोई संतान नही हुई तो राज परिवार के साथ साथ प्रजा को भी चिंता होने लगी।

राजगद्दी का अगला उत्तराधिकारी कौन होगा? यह प्रसन्न अक्सर राजा और रानी को चिंतित करता था। लेकिन रानी तारामती हमेशा राजा को यह कहकर ढांढस बंधाती की जब तक हम है प्रजा को कोई समस्या नही होने देंगे। और फिर भगवान हमारे साथ इतना गलत नही करेगा। आप बस सब्र रखिये सब्र का फल मीठा होता है।

रानी की बात वैभवराज मान लेता था मगर फिर भी प्रजा की चिंता में वो हमेशा उदास रहता कि मेरे बाद प्रजा को कौन संभालेगा। पड़ोसी राजा जो कि एक क्रूर शासक था वो हमेशा ही चन्द्रपुरी पर राज करने का सपना देखता रहता था। लेकिन चक्रधर की रणनीति और सेना के पराक्रम के सामने उसकी हिम्मत नही होती थी। चन्द्रपुरी की सेना के बहादुरी के किस्से कोने कोने में फैले थे।

एक तरफ़ चक्रधर और सेना का शौर्य था तो दूरी तरफ विशम्भर का ज्ञान जो राजा को हर समस्या से निपटने में बहुत सहायक थे। चक्रधर के एक पुत्र था जिसको वो हमेशा सेना के शिविर में ले जाते और बहादुर सैनिकों के किस्से सुनाते तथा शस्त्र विधा सिखाते। चक्रधर का पुत्र कार्तिक जल्द ही शस्त्र विधा में पारंगत होता जा रहा था। अपने पिता के गुण वो बखूबी अपना रहा था।

दरबारी विद्वान के भी एक पुत्र था, मार्तण्ड। मार्तण्ड भी अपने पिता की तरह बहुत बुद्धिमान था। विशम्भर ने अपने पुत्र को शास्त्र विद्या का अध्धयन करने काशी भेज हुआ था।

सन्तान ना होने के कारण राजा अकेले में अक्सर सोचता कि काश चक्रधर और विशम्भर की तरह मेरा भी एक पुत्र होता जिसको में हर तरह से हर विद्या में पारंगत करता और राज्य की कुशहाली के लिए उसे राजगद्दी पर बैठाता। राजा की यह उदासी सिर्फ तारामती ही दूर कर सकती थी जो हमेशा करती भी थी।

एक दिन विशम्भर ने राजा को बताया कि विराटनगर में एक देवी है जो सबकी मनोकामना पूरी करती है। आप वहां के राजा से अनुमति लेकर देवी के दर्शन कीजिये और प्रार्थना कीजिये।

विशम्भर की हर बात सच होती थी तो राजा को उन पर पूरा भरोसा था। विराटनगर के राजा से अनुमति लेकर वैभवराज देवी की पूजा अर्चना करता है और मन्नत मांगता है। एक वर्ष बाद राजा के जुड़वां सन्तान होती है। एक लड़का एयर एक लड़की।।।

शाही परिवार और समस्त राज्य उल्लास से नाचने गाने लगे। आखिर राजा को सन्तान सुख जो मिल गया। राज्य में उत्सव सा मनाने लगे। शाही परिवार ने प्रजा के लिए शाही भोज का आयोजन किया।

रानी तारामती और वैभवराज बहुत खुश थे। समय अब हंसी खुशी में व्यतीत होने लगा। राजकुमार विजयराज और राजकुमारी चन्द्रावती समय के साथ साथ बढ़ने लगे। और दोनो ही भाई बहन बहुत ही मेधावी निकले। बचपन मे ही राजकुमार का शास्त्र से प्रति लगाव था तो राजा ने विजयराज को आश्रम में अध्ययन के लिए भेजने का निर्णय किया। लेकिन रानी का मन बेटे से दूर होने की बात नही मान रहा था।

राजा ने समझाया और विजयराज को आश्रम में अध्ययन के लिए भेजा। जहां विशम्भर का पुत्र भी वहाँ पहले से ही शास्त्र अध्ययन कर रहा था। 7 वर्ष की उम्र में विजयराज काशी चला गया।

राजकुमारी बचपन से ही सस्तरों की शौकीन थी। जहां भी कटार तलवार या धनुष देखती उसे लेने के लिए रोने लगती, उनके साथ खेलती रहती। राजा ने सोचा कि राजकुमारी को यौद्धा बनाया जाये। विजयराज जब अध्ययन करके वापिस आएगा तो अपनी बहन से जरूरी शस्त्र विद्या भी सीख लेगा। जिस वय में बच्चे मिट्टी से खेलते है उस वय में राजकुमारी तलवार भाले, धनुष से खेलने लगी।

वक्त बीत रहा था, उधर आश्रम में बिना एक दूसरे की पहचान के विशम्भर का पुत्र और राजकुमार अच्छे दोस्त बन गए। आश्रम में सबकी पहचान गुप्त रखी जाती थी। ताकि किसी को एक दूसरे से कोई वैरभाव ना हो। इधर राजकुमारी धीरे धीरे अपने खेल को निपुणता में तब्दील करती गई।

समय की रफ्तार से शाही परिवार की खुशियां बढ़ने लगी। राजकुमारी अब तलवारबाजी और धनुर्विद्या का अध्ययन कर रही थी।भाई शास्त्र में तो बहन, शस्त्र में निपुण होते जा रहे थे। कुछ अलग था लेकिन वैभवराज खुश थे। वो चाहते थे कि राजकुमारी एक कुशल यौद्धा बने।

राज्य में हर वर्ष एक प्रतियोगिता होती थी। जिसमे निशानेबाजी और घुड़दौड़ होती थी। जो भी व्यक्ति 3 साल लगातार उसमें सफल होता था उसे सेनापति बना दिया जाता था। पहले वाले सेनापति को या तो कोई दूसरा पड़ मिलता या फिर उसको सेवानिवृत कर दिया जाता।

चक्रधर पिछले 10 वर्षों से सेनापति था। और वीरप्पा पिछले 2 सालों से उस प्रतियोगिता को जीत रहा था। वीरप्पा चक्रधर से ईर्ष्या रखता था। वीरप्पा सेनानायक था और एक कुशल यौद्धा भी था। वीरप्पा को सेनापति पड़ चाहिए था। उधर चक्रधर अपनी देखरेख में राजकुमारी को निशानेबाजी और घुड़सवारी के गुर सीखा रहा था। चक्रधर ने राजकुमारी में साहस को कूट कूट कर भर दिया था।
 
चक्रधर चाहता था की इस बार राजकुमारी इस प्रतियोगिता में भाग ले। हालांकि उम्र में बहुत कम थी अन्य यौद्धाओ के सामने वो कुछ नही थी। लेकिन चक्रधर को अपनी क्षमता और राजकुमारी के कौशल पर पूरा भरोसा था। साथ ही वो राजकुमारी के साहस को भी परखना चाहता था। पहले तो रानी इस बात पर नही मानी लेकिन फिर राजा और चक्रधर के कहने पर वो मान गई।

राजकुमारी तो पहले से ही तैयार थी। वो उत्सुक थी अपनी योग्यता को दिखाने के लिए।

तय समय पर नगाड़े की नाँद से मुनादी करवा दी और राज्य के यौद्धा और कई प्रतियोगी शामिल हुए। प्रतियोगिता की शर्त थी कि राज्य का कोई भी नागरिक उसमे शामिल हो सकता था। और जो व्यक्ति दोनो प्रतियोगिताओं में विजय होगा वो ही विजेता माना जाता था। लगातार 3 वर्ष तक विजय प्राप्त करने वाले को सेनापति का पद मिलता था। बाकी एक प्रतियोगिता के विजेता को स्वर्ण मुहर भी मिलती थी।

राज्य के विशाल मैदान में शामियाना सजा दिया गया। नगाड़े बजने लगे और विशाल प्रतियोगिता का आयोजन भव्य तरीके से होने वाला था। ऊंचे सिंहाशन पर राज और रानी बैठे थे। सामने यौद्धाओ की पंक्ति के अंत मे सुकुमारी राजकुमारी चन्द्रावती धनुष लिए खड़ी थी। ,

सभी यौद्धाओं ने प्रत्यंचा चढ़ा रखी थी। वीरप्पा ने सबसे पहले निशाना साधा जो कि ठीक लक्ष्य पर लगा। जैसे की सभी को उम्मीद थी। एक एक करके सभी यौद्धाओं ने निशाने लगाए, लेकिन वीरप्पा के अलावा कोई भी लक्ष्य को भेदने में सफल नही हुआ। सबसे अंत मे राजकुमारी चन्द्रावती की बारी थी।

रानी तारामती बहुत चिंतित थी। लेकिन वैभवराज बहुत खुश थे। रानी के चेहरे पर चिंता की लकीर देख कर वैभवराज ने रानी से पूछा,,

राजा- प्रिये! आपके चेहरे पर चिंता की लकीर क्यों है? बल्कि आपको तो खुश होना चाहिए।

रानी- खुश कैसे, महाराज

राजा- आज हमारी बेटी इतनी कम उम्र में भी इन महान यौद्धाओ के साथ इतनी कठीन परिक्षा देने जा रही है।

रानी- महाराज यही तो मेरी चिंता का कारण है।

राजा- क्यों! इसमें आप चिंतित क्यों हो।

रानी- महाराज राजकुमारी तो नादान है। अभी तो वो सस्त्र विद्या सीख रही है। उसे इतना ज्ञान भी नही है। कहीं हार गई तो।

राजा- रानी साहिब यही तो फक्र की बात है कि इतने कुशल धनुर्धारियों में अपनी छोटी सी पुत्री का साहस तो देखिए आप।

रानी- लेकिन महाराज, यदि राजकुमारी का निशाना ठीक नही लगा तो।।।

राजा- रानी साहिबा आप नकारात्मक भाव मत लाइये। और रही बात निशाने की तो, मुझे भी पता है कि उसका निशाना अभी उतना सटीक नही है। लेकिन इसमें चिंतित होने जैसा कुछ नही है।

रानी- महाराज आप समझ नही रहे है। मेरे कहने का मतलब है कि यदि राजकुमारी का निशाना चूक गया तो शाही परिवार की तौहीन हो जाएगी।

राजा- इसमें कैसी तोहीन! यह तो शाही परिवार के लिए गर्व का वक्त है। इतनी कम उम्र में राजकुमारी इतने कुशल यौद्धाओं में बीच चुनोती के लिए तत्पर है। मेरा तो सीना गर्व से फूला जा रहा है और आप चिंता जता रही हो।

रानी- महाराज लेकिन मेरा तो ह्रदय धड़क रहा है।

राजा- आप तनिक भी चिंता ना करें, राजकुमारी के साहस से ही मैं खुश हूं। यही मेरा इनाम है। आज मुझे तो फक्र है कि हमारी बेटी में इतना साहस है, सोचो आगे चलकर उसका यह साहस कितना बढ़ेगा। यदि आप इस तरह चिंतित होओगी तो राजकुमारी का साहस टूट सकता है। तो आप व्यर्थ की चिंता छोड़ दीजिए।

रानी- जी महाराज, आप सत्य कह रहे है। लेकिन फिर भी एक मां के भाव है उनको में कैसे रोकू।

राजा- आप अपनी आंख बंद कर लीजिए।

फिर आदेशानुसार राजकुमारी की बारी आई। चन्द्रावती ने अपने इष्ट को याद किया और धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाई। हवा की रफ्तार से तीर कमान से निकला और सीधा लक्ष्य को भेद गया।

मैदान में उपस्थित सभी लोगों ने करतल ध्वनि से राजकुमारी की विजय का नाँद किया। सेनापति चक्रधर खड़े होकर तालियां बजाने लगे। मैदान में अब तक गर्व से सीना ताने खड़े वीरप्पा के पैरों तले से जमीन खिसक गई। उसको अपनी आँखो पर यकीन नही था कि इस वय में कोई नौसीखिया कैसे इस लक्ष्य को भेद सकता है। अब तक तो इस राज्य में कोई ऐसा नही था जो कि वीरप्पा से आगे निकल सके। लेकिन आज राजकुमारी ने वो कर दिखाया जिसका तो वीरप्पा ने सपने में भी नही सोचा था।

सेनापति बनने का सपना टूटता हुआ देख वीरप्पा बहूत क्रोधित हुआ, लेकिन कुछ बोल नही सका । राजा ने रानी की तर्ज देखा तो रानी भी मुस्कुरा रही थी। सम्पूर्ण राज्य में पहली बार किसी औरत ने इस प्रतियोगिता में हिस्सा लिया और विजेता भी बन गई। और राजकुमारी यह निशाना साधने वाली सबसे कम उम्र की भी थी तो मन्त्रिवर का फैसला भी राजकुमारी को विजेता मानने का था।

अब वीरप्पा और भी क्रोधित हो गया। वो राजकुमारी को ईर्ष्या की दृष्टि से देखने लगा। लेकिन अभी घुड़सवारी बाकी थी। वीरप्पा को विस्वास था कि घोड़े को सम्भलना तो राजकुमारी के बस की बात नही है। वीरप्पा सोच रहा था कि घुड़सवारी में जीत कर मैं अपनी इज्जत तो बचा ही लूंगा। लेकिन पड़ ना मिलने के आसार देख कर वीरप्पा को राजकुमारी से जलन होने लगी।

चक्रधर के आदेश से यह कहलवाया गया कि दोपहर के खाने के पश्चात घुड़सवारी होगी। अतः सभी भोजन ग्रहण करके कुछ समु आराम कर सकते हो। लेकिन वीरप्पा को कहां अब भूख थी। वो कुछ अलग ही सोच रहा था। उधर राजकुमारी भी अपने घोड़े को सहला रही थी।

क्रमशः-
 
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चक्रधर के आदेश से यह कहलवाया गया कि दोपहर के खाने के पश्चात घुड़सवारी होगी। अतः सभी भोजन ग्रहण करके कुछ समु आराम कर सकते हो। लेकिन वीरप्पा को कहां अब भूख थी। वो कुछ अलग ही सोच रहा था। उधर राजकुमारी भी अपने घोड़े को सहला रही थी।

दोपहर के समय जब सभी भोजन ले रहे थे। और राजा भी अपने महल में चले गए थे। मैदान में सजे शामियाने में सिर्फ अब घुड़सवारी में भाग लेने वाले घुड़सवार ही मौजुद थे। तब दो इंसान ऐसे थे जिनको चैन नही आ रहा था। एक तो राजकुमारी जो आज इतिहास रचना चाहती थी। इतनी कम वय में वो कर दिखाना चाहती थी जो शायद राज्य के किसी भी व्यक्ति ने नही सोचा था। निशानेबाजी में बाजी मारने के बाद अब राजकुमारी के हौसले और ऊंची उड़ान भरने लगे।

दूसरी तरफ वीरप्पा। वीरप्पा को चैन इसलिए नही आ रहा था कि उसकी पड़ पाने की दौड़ में अब राजकुमारी एक बड़ा कांटा बन गई थी। हालांकि वीरप्पा ने निशाना सटीक लगाया था मगर राजकुमारी ने विजय का ताज पहन लिया था। अब वीरप्पा के पास एक ही रास्ता था वो था घुड़सवारी में विजय प्राप्त करना। और यदि ऐसा नही होता है तो वीरप्पा के पूरे राज्य में किरकिरी हो जाएगी।

लेकिन वीरप्पा किसी भी सूरत में हार मानने वाला नही था। किसी भी तरीके से वीरप्पा को घुड़दौड़ जितनी थी। बस । वीरप्पा सोच रहा था कि चाहे कुछ भी करना पड़े , लेकिन राजकुमारी जीत ना सके। लालसा ने वीरप्पा को बागी बना दिया। अपने ही राज्य की राजकुमारी जो शायद भविष्य में राज्य का सुनहरा भविष्य हो, लेकिन वीरप्पा की आंखों में चुभने वाला कांटा बन गई। और वीरप्पा को किसी भी तरीके से वो कांटा निकालना था।

वीरप्पा ने अपने चार पांच विस्वासी सैनिकों को बुलाया और उन्हें अपनी योजना बनाई। एक कुत्सित दिमाग मे कुकृत्य ही जन्म लिया करते है। वीरप्पा ने राजकुमारी के घोड़े को दौड़ में गिराने की सोची । किसी भी तरीके से राजकुमारी या घोड़ा गिर जाए तो वीरप्पा आगे निकल जायेगा। लेकिन भरे मैदान में यह सब होगा कैसे? योजना को किस तरह से सफल किया जाए। वीरप्पा और उसके साथी सैनिक सोचने लगे। समय उनके पास बहूत कम था।

उधर इस कुत्सित मानसिकता से बेखबर राजकुमारी अपने घोड़े को सहला रही थी। राजकुमारी की बस एक ही चाहत थी को पिताजी की आंखों में उसके प्रति सदैव स्नेह और गर्व भरा रहे और इसके लिए राजकुमारी को कुशल यौद्धा बनना था। एक कुशल यौद्धा को हथियार चलाने के साथ साथ घुड़सवारी भी आनी जरूरी है। हालांकि राजकुमारी को अच्छी घुड़सवारी आती थी। लेकिन शायद वीरप्पा के अनुभव के आगे वह कमजोर थी। लेकिन इन सब बातों से बेखबर राजकुमारी बस अपनेआप से खुश थी और निश्चिन्त होकर घुड़दौड़ का इंतजार कर रही थी।

आखिर वीरप्पा ने अपने एक सैनिक जिसको घुड़सवारी आती थी उसकक समझाया कि तुम अपने घोड़े के साथ मैदान में उतर जाना। और राजकुमारी के ठीक पास ही अपना घोड़ा रखना। जब दौड़ शुरू हो तो तुम्हे अपना घोड़े से राजकुमारी के घोड़े को टक्कर मारनी है। ध्यान रहे राजकुमारी तुमसे आगे ना निकल पाए। और किसी भी तरीके से राजकुमारी के घोड़े को गिराना है। सैनिक ने कहा हुजूर जैसा अपने कहा ठीक वैसा ही होगा। आप निश्चिन्त रहिये , दौड़ आप ही जीतेंगे। राजकुमारी का घोड़ा बीच मैदान, में गिर जाएगा।

तय योजना के अनुरूप मैदान में शाम के समय घोड़े और सवार सज कर दौड़ के लिए तैयार थे। वीरप्पा का सैनिक राजकुमारी के ठीक पास ही था। उसकी विजय तो बस राजकुमारी को गिराने में थी। राजा के आदेशानुसार दौड़ शुरू हुई। अभी कोई 20 योजन ही घोड़े दौड़े थे कि अचानक उस सैनिक ने अपनी योजना कामयाब कर दी।

दौड़ते हुए घोड़े को राजकुमारी के घोड़े से टक्कर मारी और घोड़े के साथ राजकुमारी भी धड़ाम से मुहं के बल मैदान में गिर गई। सारे घुड़सवार आगे निकल गए और सबसे आगे वीरप्पा था। किसी को शक ना हो इसके लिए वो सैनिक भी वही गिर गया और चोट लगने जैसा बहाना बनाने लगा। इस तरह रोने लगा जैसे कि उसको सचमुच दर्द हो रहा हो। उधर राजकुमारी को गिरता देख रानी खड़ी गई। लेकिन राजा के इसारे पर वही रुकी रही।

चक्रधर सैनिकों की सहायता से राजकुमारी को शिविर में लाये और देखा कि कहीं चोट तो नही लगी। लेकिन राजकुमारी को तो गहरी चोट पहुंची थी। उसका कोई इलाज नही था। वैधजी आये और देखा तो कहीं ज्यादा चोट नही थी।

राजकुमारी को तो हृदय पर चोट पहुंची थी।

चक्रधर- उस सैनिक को पेश करो।

(सैनिक को लाया गया। जो दर्द का झूठा बहाना कर रहा था।)

चक्रधर- यह क्या किया तुमने?

सैनिक- क्षमा करें सेनापति महोदय, मैं लक्ष्य की तरफ तेजी से बढ़ने के चक्कर मे राजकुमारी से टक्कर गया।

चक्रधर- तुम्हे पता भी है कितना बड़ा अन्याय किया है तुमने।

सैनिक - हुजूर, सजा का हकदार हु। लेकिन मैंने जानबूझकर ऐसा नही किया।

राजा- कोई बात नही सेनापति जी, आप इतने क्रोधित ना हो, अक्सर ऐसी दुर्घटना घटित हो जाती है। इसमें इस सैनिक का कोई कसुर नही है।

सैनिक- महाराज की जय हो।। मेने कुछ भी जनबुझकर नही किया था हुजूर।

राजा- जाओ , कोई बात नही।

चक्रधर- लेकिन महाराज राजकुमारी तो निराश हो गई ना। अपने उसे बिना सजा के ही छोड़ दिया।

राजा- सेनापति जी, इसमें उसका कोई दोष नही है। ऐसा हो जाता है कभी कभी। और वैसे भी हमे राजकुमारी पर आज फक्र है। आज ऐसा प्रतीत हो रहा है कि तो के राज्य का भविष्य उत्तम होगा।

राजकुमारी आपको कुछ हुआ तो नहीं।

चन्द्रावती- जी पिताजी , नही। बस एक मलाल रह गया।

राजा- क्या?

चन्द्रावती- भले ही हार जाती लेकिन दौड़ तो पूरी करती में, जिससे मेरा आत्मविस्वास बढ़ता। बीच मे ही गिरना मेरे आत्मबल को झटका है।

राजा- ऐसे विचारो को दूर करो पुत्री, अभी यह आपका पहला मौका है। आगे और भी बहुत समय है आपके पास। आप बस और अच्छे से प्रयास करते रहो।

तभी नगाड़ा बजा और घोषणा हुई कि वीरप्पा ने सबसे पहले विजय रेखा को पार किया। चक्रधर को बहुत गुस्सा आ रहा था। लेकिन राजा के चहरे पर गर्व के ही भाव थे। राजा ने जाकर वीरप्पा को बधाई दी।

वीरप्पा की जीत से वैभवराज खुस थे। उन्होंने दूसरे दिन राजदरबार में वीरप्पा को सम्मानित किया गया।

(राज दरबार का दृश्य, सामने ऊंचे सिहांशन पर राज और रानी विराजमान है। दरबारी पंडित विशम्भर और सेनापति चक्रधर भी पास के सिंहशनो पर विराजमान है। दासियां चँवर ढुला रही है। कुछ देर मंत्रिमंडल में मन्त्रणा हुई। वैभवराज और चक्रधर के बीच काफी चर्चा हुई। निर्णय करना था कि वीरप्पा को किस तरह सम्मानित किया जाए।)

राजा- मन्त्रिवर,, प्रतियोगता का परिणाम दराबर को बताओ।

चक्रधर- राजन , हर वर्ष की भांति हमारे राज्य के वीर बहादुरों के बीच एक रोमांचित प्रतियोगिता का इस बार भी सफल आयोजन हुआ। राजकुमारी जी के साथ हुई घटना से मैं बहुत आहत हु। और सेनापति होने के नाते एक सैनिक को गलती की माफी में राजकुमारी जी मांगता हूं।

जैसा कि आपको विदित है कि राजादेसानुसार प्रतियोगिता के विजेता को सम्मानित किया जाता है। जो यौद्धा 3 बार लगातार विजयी होता है उसे राज्य में तृतीय स्थान पर विराजमान होने का सौभाग्य मिलता है। अर्थात सेनापति का पद दिया जाता है। और हमारे सेनानायक वीर बहादुर यौद्धा श्रीमंत वीरप्पा लगातार 3 बार इस प्रतियोगिता के विजेता है।

(तभी एक मंत्री बोलता है ।)

मंत्री- क्षमा करें महाराज, लेकिन आपका न्याय तर्कसंगत नही लग रहा मुझे। राज्य की सुरक्षा का जिमा एक कुशल हाथो में होना आवश्यक है। वीरप्पा एक बहादुर यौद्धा है इसमें शक की कोई गुंजाइश नही है। लेकिन सेनापति महोदय, राजकुमारी जी ने निशानेबाजी में वीरप्पा की बराबरी की है। क्या आपको नही लगता कि राजकुमारी जी भी इसमें बराबर की हकदार है।

चक्रधर- महोदय आपके विचारों का ईद दरबार मे स्वागत है। लेकिन महाराज के आदेशानुसार ही मैं यह घोषणा कर रहा हु। मैं भी मानता हूं कि राजकुमारी जी भी बराबर की हकदार है।

(मंत्री की इस बात पर वीरप्पा मन ही मन गुस्सा होता है। सोचता है की चुप रह वरना तेरी गर्दन धड़ से अलग कर दूंगा। लेकिन भरे दरबार मे मन मे गुस्सा करने के सिवाय कोई चारा न था। तभी वैभवराज बोल पड़ते है।)

राजा- मंत्री महोदय आपकी बात सही है लेकिन न्याय तो करना ही है। आखिर वीरप्पा विजेता है तो उनको सम्मान मिलना चाहिए।

मंत्री- राजन! आपकी बातों से सहमत हूँ। वीरप्पा की बहादुरी पर भी मुझे कोई संदेह नही है। लेकिन आप सोचिये की यदि राजकुमारी ना गिरती तो क्या परिणाम अलग नही हो सकता था।

राजा- जी महोदय, जो भविष्य के गर्भ में राह गया उसकी चिंता क्यों करें। जो वर्तमान हमारे सामने है हमे उसका स्वागत सही तरीके से करना है।
 
(राजा की बात से वीरप्पा खुश होता है, लेकिन मन ही मन चक्रधर और मन्त्रि पर गुस्सा करता है। तभी दरबार मे राजकुमारी चन्द्रावती का प्रवेश होता है।सभी खड़े होकर राजकुमारी का स्वागत करते है।)

राजकुमारी- दरबार मे उपस्थित सभी बडों को मेरा प्रणाम। कहो मन्त्रिवर किस बात पर बहस चल रही है आज।

चक्रधर- राजकुमारी जी, कल की प्रतियोगिता के विजेता को सम्मान दिया जा रहा है लेकिन मंत्री महोदय कुछ अलग फरमा रहे है।

राजकुमारी- कहो मंत्री जी आपकी शंका क्या है? शायद मैं समाधान कर सकू।

मन्त्रि- जी राजकुमारी की, मेरा कहना है कि वीरप्पा को सेनापति का पद देना अभी उचित नही है। नियमानुसार आप के भी निशाना सटीक लगाया था। और यदि दौड़ के बीच मे आपके साथ वो घटना ना घटी होती तो, शायद परिणाम कुछ और होता।

राजकुमारी- जी मंत्री महोदय, पहली बात तो यह है कि इस दराबर मे विराजमान सभी मेरे लिए आदरणीय है। मैं बहुत छोटी हूं। पिताश्री के सामने दरबार मे बोलना भी उचित नही है। लेकिन यदि किसी बहस में मेरा नाम शामिल है तो मैं बोलना उचित समझती हूं। सेनानायक वीरप्पा महोदय, मेरे बड़े भाई के सम्मान है। उनकी बहादुरी पर किसी को कोई संदेह नही होना चाहिए। उन्होंने प्रतियोगिता में विजय हासिल करके अपनी बहादुरी और कुशलता का अनुपम परिचय दिया है। वो सम्मान के हकदार है।

(राजदरबार तालियों से गूंज उठा। वीरप्पा भी खुस हो गया।लेकिन तभी मंत्री जी फिर बोल पड़े)

मंत्री- लेकिन मेरे कहने का अर्थ सिर्फ यह है कि यदि राजकुमारी और वीरप्पा के मध्य फिर से दौड़ करवाओ जाए, और उसके बाद विजेता को सम्मानित किया जावे तो बेहतर होगा।

मंत्री जी की इस बात पर समस्त दरबार मे कानाफूसी होने लगी और राजा समेत सभी मंत्री और सेनापति भी चौंक गए।लेकिन दरबारी पंडित विशंभर जो अब तक चुप थे, वो बोल पड़े।

विशम्भर- मैं मंत्री महोदय की बात का समर्थन करता हूँ। वीरप्पा जी की बहादुरी की नही लेकिन राजकुमारी के कौशल को देखने के लिए एक बार फिर मैदान में सिर्फ दो ही यौद्धा हो, और फिर जो विजेता हो उसको सम्मानित किया जाए।

चक्रधर- मैं मंत्री जी और पंडित जी की बात से सहमत हूं।

(दरबार मे एक के बाद एक हाथ खड़े होने लगे और मंत्री जी की बात को पूर्ण समर्थन मिला गया। इस बार राजा भी थोड़े डर गए कि वीरप्पा के साथ फिर से घुड़दौड़ में राजकुमारी को उतरना शायद बेवकूफी है। लेकिन दराबर में इन सभी लोगों की बात को नकारना भी गलत है। तभी राजा ने चन्द्रावती की और मुखातिब होकर पूछा)

राजा- राजकुमारी चन्द्रावती, आपको कुछ कहना है।

राजकुमारी- जी राजन, मैं एक बात कहना चाहती हु की इस समय पहले वीरप्पा का सम्मान हो, उन्हें सेनापति बनाया जाए। ततपश्चात यह प्रतियोगिता आप चाहे तो पुनः करवा सकते है।

वीरप्पा- क्षमा करें राजन, मैं अपनी बात दराबर में रखना चाहता हूं।

राजा- जी सेनानायक अवश्य, बेझिझक रखिये।

वीरप्पा- आदरणीय राजकुमारी जी एयर सभी मंत्रीगण,एवं सेनापति महोदय, यदि इस प्रतियोगिता में जो हार गया उसको और जो जीतेगा उसको किस तरह का इनाम दिया जाएगा। क्या मैं बता सकता हूं?

राजा- अवश्य,, बताइये

वीरप्पा- राजकुमारी जी, मैं चाहता हूं कि इस प्रतियोगिता में जितने वाले को सेनापति और हारने वाले को एक वर्ष का अज्ञातवास दिया जाए। यदि यह दरबार मेरी शर्त माने तो मैं पुनः इस प्रतियोगिता के लिए तैयार हूं।

चक्रधर- (चौंककर) क्या कह रहे हो वीरप्पा! यह सम्भव नही है।

राजकुमारी- मुझे मंजूर है।

(राजकुमारी के इस जवाब पर पूरा दरबार आश्चर्यचकित हो गया। रानी तारामती तो डर गई और राजा की तरफ देखने लगी। सभी मंत्री एक दूसरे का मुंह ताकने लगे। तभी राजकुमारी फिर बोली)

राजकुमारी- लेकिन वीरप्पा जी मेरी एक शर्त आपको भी माननी पड़ेगी।

वीरप्पा- कैसी शर्त राजकुमारी जी

राजकुमारी- पहले आपको सेनापति पद लेना होगा। इसके बाद यह प्रतियोगिता होगी।

वीरप्पा- जी राजकुमारी जी, मुझे आपकी यह शर्त मंजूर है।

राजकुमारी- तो तय हो गए कि आगे क्या होना है। लेकिन अभी वीर यौद्धा वीरप्पा का सेनापति पद के लिए तिलक किया जाय।

सारा दरबार मूक बनकर देख रहा था। किसी के मुहं से कुछ भी नही निकल रहा था। जैसे सभी का रक्त जम गया हो। राजा भी अब डर गया कि कहीं राजकुमारी हार गई तो 1 वर्ष का अज्ञातवास देना पड़ेगा। लेकिन, राजकुमारी स्वयं भरे दरबार मे जब इस तरह स्वीकार कर लेती है तो बाकी कोई बजी उसकी बात कैसे कटे।

ससम्मान वीरप्पा का तिलक किया गया और सेनापति पद पर विराजमान किया गया। दरबार मे सभी आश्चर्यचकित थे। लेकिन राजकुमारी के चेहरे पर एक भी शिकन नही थी। रानी तारामती तो जड़ हो गई थी और चक्रधर भी शोक में थे। अगले दिन फिर मैदान में दो घोड़े सजाए गए और निशानेबाजी के लिए भी राजधवज को मैदान के दूर छोर पर लगाया गया। मुनादी करवाई गई। मैदान के चारों तरफ प्रजा भी उत्साहित होकर इस अनोखी स्पर्धा को देखने लगे। चक्रधर समेत सभी मंत्रयीयों के पसीने छूट रहे थे। राजा के मन मे असंख्य सवाल उठ रहे थे।
 
आखिर वो वक्त आया जब एक अहम फैसला मैदान के बीच मे होना था। एक अनुभवी और पारंगत यौद्धा और एक नादान 15 वर्षीय बाला जिसको अभी शास्त्र और सस्त्र में फर्क ही नही पता था। रथ पर सवार महाराज और रानी आये। मंत्रीगण और विद्वान आये। प्रातःकाल का समय था। सूर्य अपनी किरणे प्रखर कर रहा था। पंछियों का कलरव गूंज रहा था। प्रजा ने करतल ध्वनि से महाराज का स्वतग किया। सभी मैदान के पास तय स्थान पर विराजमान हुए।

उधर मैदान में एक तरफ कुशल यौद्धा वीरप्पा और दूसरी तरफ नव अंकुरित नादान पुष्प सी चन्द्रावती। दोनो जिरहबख्तर पहने धनुष तीर लेकर अपने लक्ष्य को पाने के लिए ततपर थे। उधर आज वैभवराज का हृदय जोरो से धड़क रहा था। रानी साहिबा तो जैसे कोई सपना देख रही हो। बार बार महाराज का हाथ पकड़ कर कहती , अब क्या होगा? सभी मंत्रियों के पसीने छूट रहे थे और सबसे ज्यादा बेहाल तो चक्रधर था। दांव पर सेनापति का पद, और उससे भी बड़ी चिंता की चन्द्रावती ने अब तक चक्रधर से ही सब कुछ सीखा था।

सेनापति के पद पर अब वीरप्पा थे। लेकिन इस प्रतियोगिता के पूरा होने तक औपचारिक भर चक्रधर के पास ही था। इसलिए इस स्पर्धा की सारी जिम्मेदारी भी चक्रधर की थी। चक्रधर ने मैदान के चारो तरफ विस्वासी सैनिको का जाल से बिछा दिया। ताकि वीरप्पा कोई चालाकी ना कर सके। इस तरह का बंदोबस्त देखकर वीरप्पा भी आश्चर्यचकित था। वीरप्पा था तो कुशल यौद्धा लेकिन वो कपटी भी था। घमंडी था और लालच भरा हुआ था। पद को पाने की होड़ में उंसने एक राजकुमारी को साख को भी दांव पर लगा दिया।

राणी तारामती ने वैभवराज का हाथ पकड़ कर धीरे से कहा, सुनिए,,

तारामती- सुनिए, आप राजकुमारी को समझाइए।

वो आपकी बात मानेगी।

राजा- क्या समझाऊं रानी साहिबा

तारामती- वो नादान है उसमें जोश है, जोश में होश खोकर उंसने यह फैसला लिया है। यह कतई हमारे लिय उचित नही है।

राजा- रानी साहिबा में आपको पहले ही समझा चुका हूं कि राजकुमारी मेरा गौरव है। मेरा स्वाभिमान है।

रानी- महाराज मुझे पता है, लेकिन वीरप्पा एक कुशल यौद्धा है। आप समझते क्यों नही।

राजा- मैं समझ रहा हु, लेकिन अब मैं क्या कर सकता हु। राजकुमारी ने पूरे दरबार के सामने यह चुनोती स्वीकार की है। और हम क्षत्रिय कभी अपने वचन से पीछे नही हटते है। अब जो भी हो देखा जाएगा।

रानी- लेकिन यदि राजकुमारी हार गई तो 1 वर्ष तक हम कैसे रहेंगे।

राजा- महारानी, आप तनिक सोचना बंद करे। मुझे आपसे ज्यादा चिंता है। लेकिन मुझे यकीन है कि राजकुमारी चन्द्रावती कभी भी हमे या राज्य पर कोई आंच नही आने देगी। हम सौभाग्यशाली है कि ऐसी पुत्री जन्मी है। जो इस वय में भी मौदान में कमर कसकर खड़ी है।

वैभवराज के स्वाभिमान के आगे तारामती की नही चली। और राजकुमारी भी तो पीछे हटना नही चाहती थी।

मैदान में बिगुल बजने से पहले चंद्रावती वीरप्पा के पास आई और बोली,,

राजकुमारी- महोदय, आप मेरे लिए और राज्य के लिए अब तक गौरव थे। लेकिन दो दिन पहले स्पर्धा के दौरान आपकी नीच हरकत ने इस राज्य के स्वाभिमान को ठेस पहुंचाई है। आपको छल कपट का सहारा नही लेना चाहिए था। आपमे हिम्मत है तो खुले मैदान में चुनोती दीजिये। हार और जीत मायने नही रखती है। मुझे कोई फर्क नही पड़ेगा यदि मैं आपसे हार जाऊं तो। लेकिन मैं मेरा काम पूरी ईमानदारी से करूँगी।

वीरप्पा- (चौंककर) जी,,, जी,,, राज,,,,राजकुमारी जी, आप यह क्या कह रही हो। मेने कब छल किया।

राजकुमारी- (वीरप्पा के कान के पास जाकर) अपने जिस सैनिक को हमारा घोड़ा गिराने का काम दिया था, वो अब मेरी कैद में है। आप क्या समझते है। मैं बच्ची हु। इतना तो मुझे भी आता है महोदय।

वीरप्पा के पैरों के नीचे से जमीन खिशक गई, सर से आसमान की छत गायब हो गई। हृदय गति अत्यंत तीव्र हो गई। खुली हवा में भी वीरप्पा पसीने पसीने हो गया। पूरा शरीर कांपने लगा।

वीरप्पा- राजकुमारी जी, शायद आपको कोई गलतफहमी हुई है, या वो सैनिक झूठ बोल रहा होगा, आपसे इनाम पाने के लालच में, मैं कभी इस राज्य का अहित नही कर सकता है।

राजकुमारी- वीरप्पा जी अब आप सफाई देने बन्द करें, आपके कांपते शरीर और, माथे से टपकते पशीने ने बिना कहे ही सब कुछ बयान कर दिया है। अब आप अपने लक्ष्य पर ध्यान केंद्रित करें।

वीरप्पा के जबान तालू से चिपक गई थी। कुछ बोलने के लिए था ही नहीं। दरअसल राजकुमारी को उसी दिन शक हो गया था जब वो मैदान में गिरी थी। राजकुमारी ने उस सैनिक को अकेले में बुलाया और पूछा। डर के मारे सैनिक ने सब कुछ सच बता दिया। तब राजकुमारी ने यह योजना बनाई और जानबूझकर इस स्पर्धा को दुबारा करवाया , ताकि वीरप्पा को उचित सबक दे सके। और वो भी बिना किसी को हकीकत बताये।

वीरप्पा अब लक्ष से विचलित हो गया था। यही राजकुमारी की योजना थी। छल की पोल बीच मैदान में खुलने से वीरप्पा भयभीत हो गया था। अब वो अपने लक्ष्य के बारे में नही सोच रहा था। बल्कि यह सोच रहा था को आगे क्या होगा। बिगुल बजा और दोनो यौद्धाओ ने प्रत्यंचा चढ़ाई।

सामने राजध्वज था। राजकुमारी का ध्यान लक्ष्य पर था। लेकिन वीरप्पा के मष्तिष्क में कभी वो सैनिक था तो कभी राजकुमारी और कभी राज्य का दंडविधान, । विचार से विचलित और भयभीत वीरप्पा ने जैसे ही प्रत्यंचा छोड़ी तीर अपने लक्ष्य से 4 योजन दूर मिट्टी में जाकर इस तरह गिरा जैसे हाथी के ऊपर सवारी कर रहा वीरप्पा धड़ाम से गिर गया हो और हड्डी की जगह अब वीरप्पा का भविष्य टूट गया।

दूसरी तरफ चन्द्रावती का तीर सटीक निशाने पर लगा और प्रजा ने करतल ध्वनि की। उधर राजा और रानी भी खड़े होकर करतल ध्वनि कर रहे थे। चक्रधर और विशंभर तो जैसे नाचने ही लगे थे। अपनी हार से ज्यादा सजा से भयभीत वीरप्पा बिना स्पर्धा पूरी किये ही, मैदान से भागने लगा। लेकिन अनुभवी चक्रधर के सैनिक जाल को भेद नही सका और पकड़ा गया। बिना बताए ही अब समस्त प्रजा और राजदरबार के सभी लोग समझ गए थे कि आखिर उस दिन स्पर्धा में राजकुमारी के साथ क्या हुआ था।अगले दिन राज दरबार लगा। जैसा की सभी को विदित ही था कि वीरप्पा को आज सजा मिलनी है, राज्य का ढंडविधान बहुत सख्त था। वीरप्पा भी पूरी रात भर कैदखाने में सो नही पाया। कहाँ राज्य का सेनापति बना था और कहां अब यह नौबत आ गई थी की पता नही अगले ही पल मौत की सजा सुना दी जाए। लेकिन राजकुमारी के मष्तिष्क में कुछ और ही था। राजकुमारी चाहती तो बिना स्पर्धा के भी वीरप्पा को सजा दिलवा सकती थी, लेकिन उनकी सोच किसी को दंडित करना नही बल्कि कुत्सित मानसिकता को दूर करने की थी। इसीलिए राजकुमारी अपनी योजना के अनुसार वीरप्पा को हराना ही चाहती थी। लेकिन भयभीत वीरप्पा के विचार अवरुद्ध हो गए और मैदान छोड़कर भाग गया। जिससे अब चक्रधर को भान हो गया कि जरूर वीरप्पा ने उस दिन छल किया था।

दरबार लगा, सिंहाशन पर विराजमान राजा, रानी एयर अन्य मंत्री, एक तरफ चक्रधर फैसले का इंतजार कर रहा था। लेकिन सब राजकुमारी की प्रतीक्षा कर रहे थे। राजकुमारी दरबार मे परेश करती है तो सब खड़े हो गए, क्योंकि शर्त के अनुरूप अब राजकुमारी मुख्य सेनापति थी। राजकुमारी ने इसारे से सबको बैठाया।

दरबान ने आवाज लगाई ,,, कार्यवाही शुरू की जाए।।।

दो सैनिकों ने हथकड़ी लगाए हुए वीरप्पा को दराबर में पेश किया। उसे देखकर चक्रधर की आंखों में गुस्सा चढ़ गया। लेकिन राजकुमारी शांत होकर मुस्कुरा रही थी।

राजा- कहो मन्त्रिवर वीरप्पा का दोष और सजा दरबार को बताओ।

मंत्री- महाराज स्पर्धा की शर्त के अनुसार हारने वाले को एक वर्ष का अज्ञातवास दिया जाए। और वीरप्पा राजकुमारी से मैदान में हारने से पहले ही भाग खड़ा हुआ था। स्पर्धा का नियम तोड़ने के लिए वीरप्पा को एक वर्ष का कठोर कारावास भी दिया जाए।

चक्रधर- लेकिन महाराज,, इस बात का भी तो पता चले कि आखिर वीरप्पा जैसा यौद्धा मैदान छोड़कर क्यों भागा। यकीनन मुझे तो कुछ और ही कारण नजर आ रहा है।

राजकुमारी- आपकी शंका उचित है महोदय, लेकिन मुझे कोई अन्य कारण नजर नही आता है। मुझे लगता है कि वीरप्पा अपनी हार से डर गया और डर से उन्होंने मैदान छोड़ा। क्यों ! वीरप्पा,, आप कुछ कहोगे इस बारे में।

वीरप्पा- सही है राजकुमारी जी, मैदान में आपके तेवर से और राज्य की प्रजा जिस तरह आपका समर्थन कर रही थी, तो मैं भयभीत हो गया था।हालांकि मुझे पता है कि एक सेनापति का मैदान छोड़कर भागना राज्य का सबसे बड़ा जुर्म होता है। जिसकी सजा का मैं हकदार हु। बाकी आपकी रजा।

वीरप्पा के जवाब से राजकुमारी मन ही मन मुस्कुराई, लेकिन चक्रधर संतुष्ट नही हुए।

चक्रधर- लेकिन यह बात नही हो सकती, महाराज मुझे नही लगता कि वीरप्पा भयभीत हो सकता है। मुझे कतई शंका नही है उनके शौर्य पर। बात कुछ और है।

राजकुमारी- महोदया व्यर्थ की शंका ना करे। वीरप्पा सही कह रहे है। इतने बड़े जन समूह के सामने हार किसी मौत से कम नही होती है।

राजकुमारी के इस तरह बोलने से आगे कोई और नही बोला, अब सजा की बारी थी तो वो पहले से तय थी।

राजा- ठीक है। लेकिन अब, वीरप्पा की सजा क्या है राजकुमारी,, यह भी आप ही तय करें।

राजकुमारी- जी पिताश्री,,, वीरप्पा को स्पर्धा हारने की शर्त के अनुसार एक वर्ष का अज्ञातवास दिया जाता है। इसी वक्त वीरप्पा की आंखों पर पट्टी बांध दी जाए।
 
आज्ञानुसार वीरप्पा की आंखों पर पट्टी बांध दी जाती है। लेकिन चक्रधर राजकुमारी के इस फैसले से खुश नही था। चक्रधर को शंका थी कि जरूर राजकुमारी कुछ छुपा रही है।अब शर्त के अनुसार सजा उन्हें ही देनी है तो बोल भी नही सकता। अगले शर्त के अनुसार सेनापति का पद अब राजकुमारी को मिलना था।

मंत्री- महाराज अब सेनापति के पद पर राजकुमारी का तिलक किया जाय।

राजकुमारी- नहीं , मन्त्रिवर! मैं इस पद के अभी योग्य नही हु।

राजकुमारी के इस फैसले से सभी हैरान हो गए। इतना बड़ा पद राजकुमारी यूँ ही छोड़ रही है।

चक्रधर- किंतु राजकुमारी जी, स्पर्धा की शर्त के अनुसार यह पद अब आपको ही सम्भलना होगा।

राजकुमारी- महोदय, मुझे अभी बहुत सी विद्या का अभ्यास करना है। अभी मैं उस लायक नही हूँ कि उस जिमेदारी को संभाल सकू। मैं दराबर से अनुरोध करती हूं कि किसी योग्य व्यक्ति को इस पद की जिम्मेदारी दी जाए। और मैं इस पद के लिए श्रीमान चक्रधर को उचित व्यक्तित्व मानती हूं। बाकी दरबार के विद्वानों की सहमति से जिसे उचित समझो उसे चुना जाए।

दरबार के सभी लोगों ने चक्रधर के समर्थन में हाथ खड़े कर दिए, एक पुनः चक्रधर के सर पर सेनापति का ताज पहनाया गया। लेकिन चक्रधर को राजकुमारी की योजना समझ नही आ रही थी।

राजकुमारी में भी अजीब फैसला लिया था। लेकिन उसके पीछे उनकी सुध सोच थी कि किसी को सजा ज्यादा देने से नही बल्कि गलती का अहसास कराके भी सही मार्ग पर लाया जा सकता है।

आदेसानुर वीरप्पा को दूर एक जंगल मे छोड़ दिया गया। जिसका रास्ता वीरप्पा को नही पता था। और जंगल के मुख्य रास्तो पर पहरा लगा दिया गया ताकि एक वर्ष तक विरप्प इस जंगल से बाहर ना आ सके।

राज्य में अब सब सामान्य हो गया था। लेकिन विरप्पा घने अनजान जंगल में घूम रहा था। दूर दूर तक सिर्फ वनस्पतियाँ ही थी। ना सूरज के दर्शन होते ना कोई प्राणी नजर आता। बस जंगली जानवरों की डरावनी आवाजें ही सुनाई देती थी। शाम तक घूमते घूमते वीरप्पा को पानी तक नही मिला कहीं। कभी बड़े बड़े सर्प मिलते तो कभी कोई जंगली डरावना पशु। ऊपर से पेड़ों से आच्छादित और नीचे से जमीन भी वनस्पति से ढकी हुई। एक पैर भी नीचे नजर किये बिना रखता तो खतरे से खाली नही था और ऊपर ना देखे तो किसी भी पेड़ की कोई टहनी से टकरा सकता था। लेकिन विरप्प ने हिम्मत नही छोड़ी , चलता रहा। कई बार चोट भी लगी तो पैर में कांटे भी चुभे।लेकिन एक ठौर भी तो ढूंढना था ना। आखिर इस भयावह जंगल में कहां रहेगा। विरप्प को पता था कि जंगल के चारो तरफ सैनिक भी मौजूद है , बाहर जाना तो वैसे भी मौत को मासी कहना है।

राजकुमारी ने तो विरप्पा को ज्यादा दण्डित नही किया था। लेकिन फिर वीरप्पा के कुत्सित मष्तिष्क में कलुषित विचार ही पनप रहे थे। वीरप्पा सोच रहा था कि एक वर्ष कैसे भी बिताऊंगा और वापिस राज्य में जाकर राजकुमारी का सर्वनाश करूँगा।

शाम हो गई थी। अंधेरा होने लगा था। कोई ठौर नही मिला। अचानक एक गुफा दिखी जिसमे कुछ रोशनी सी दिखाई दी। वीरप्पा की आंखों में अब चमक आ गई। अचानक ही पैरों की रफ्तार बढ़ गई। और गुफा तक पहुंच गया।

गुफा के पास पहुंचकर विरप्पा चौंक गया। पहरेदार की तरह एक सिंह बैठा था। इससे पहले की वीरप्पा सचेत हो, सिंह ने उस पर हमला बोल दिया। अपने नुकीले पंजे से सिंह ने एक जोरदार खरोंच वीरप्पा के मुहं पर मारी। चेहरा लहूलुहान हो गया। लेकिन वीरप्पा था तो एक कुशल यौद्धा और अब अपमानित भी था तो घायल नर भी सिंह से कम नही होता ।

वीरप्पा ने जवाबी हमला कर दिया। सिंह के अगले दोनो पैर पकड़ कर उल्टा पटक दिया। अब सिंह ने आवेश में आकर एक जोर से दहाड मारी। एकबारगी पूरा जंगल सिहर उठा। पक्षि भय से शोर करने लगे। छोटे जानवर सभी अपने घरों से बाहर निकल गए। लेकिन वीरप्पा तनिक भी नही डरा। अब वो सम्भल चुका था। चेहरे से लहू टपक रहा था लेकिन फिर भी दुगुने जोस से फिर भिड़ गए सिंह से। अबकी बार वीरप्पा ने सिंह के जबड़े पकड़े और एक जोरदार घुस्सा सिंह के दांतों पर मारा। एक खिशियाई आवाज के साथ सिंह निढाल हो गया।

वीरप्पा अब गुफा के अंदर जाने लगा। तभी सिंह खड़ा हुआ और वीरप्पा के फिर सामने आ गया। वीरप्पा बोला,,,, अरे अभी तेरा पेट भरा नही क्या मार खाकर जो वापिस आ गया है। देख तेरे दांत टूट गए, मेरा भी चेहरा तूने खराब कर दिया। अब और लड़ना चाहता है क्या?

सिंह बोल तो नही सकता था लेकिन स्वीकारात्मक गर्दन हिला कर बैठ गया। और एक इसारा विरप्पा को करके आगे चलने लगा। अब वीरप्पा समझ गया था कि वो क्या कहना चाह रहा है। वीरप्पा सिंह के पीछे पीछे चलने लगा। जैसे जैसे आगे बढ़ रहे थे, गुफा और गहरी होती जा रही थी। गुफा में असंख्य सिंह से, लेकिन अब किसी भी सिंह ने वीरप्पा पर हमला नही किया था। वीरप्पा आश्चर्य चकित था। लेकिन बिना बोले चुपचाप पीछे पीछे चल रहा था। कोई एक मील गुफा में चलने के बाद वीरप्पा ने देखा कि एक बड़ा सा अग्नि कुंड है। कमंडल लिए और अर्धनग्न अवस्था मे लंबी दाड़ी वाला एक इंसान बैठा है। ध्यानमग्न अवस्था मे।

आसपास का दृश्य और भी भयानक था। ऊपर देखा तो उल्टे लटके चमगादड़ और बाल बिखेरे हुए कई चुड़ैल भी थी। वीरप्पा को समझ नही आया कि यह क्या हो रहा है। लेकिन सिंह से जंग जितने के बाद वो अब भयभीत नही था। सिंह अग्निकुंड के पास जाकर बैठ गया। तभी एक चमगादड़ तीव्र गति से वीरप्पा की तरफ आया वीरप्पा सचेत था, उंसने एक घुस्सा मारा और चमगादड़ ढेर हो गया। वीरप्पा उस चमगादड़ को देख रहा था तभी एक भयानक हंसी के साथ एक चुड़ैल ने वीरप्पा पर हमला कर दिया। अपने लंबे बालों को वीरप्पा की गर्दन के चारों तरफ लपेट लिया। वीरप्पा की सांस उखड़ने लगी। लेकिन वीरप्पा ने हार नही मानी और गले मे लपेटे हुए बालो को उखाड़ दिया। एक चीख के साथ चुड़ैल गिर पड़ी। अब वीरप्पा पूर्ण सचेत हो गया। नजर तीव्र गति से चारों तरफ चल रही थी।

तभी एक गम्भीर आवाज गूंजी,,,,, शांत हो जाओ दरबारियों।

वीरप्पा ने देखा कि जो महाशय ध्यान में बैठे थे अब खड़े हो गए हैं। और गंभीर आवाज में बोले,,

कौन है यह वीर,, मेरे तीन तीन सेनापतियों को हराने वाला?

वीरप्पा- मेरा नाम वीरप्पा है। मुझे अज्ञातवास मिला हुआ है।लेकिन आप कौन है?

मैं शैतानी शक्तियों वाला चांडाल हुँ।

वीरप्पा- ओह! आपका दराबर भी बहुत शैतान है।

,,, तुमने मुझे खुश कर दिया। तुम्हारी वीरता से मैं प्रशन्न हु, तुम जो चाहो में तुम्हारे लिए कर सकता हु।

वीरप्पा- मुझे एक वर्ष बिताना है, बिना किसी बाधा के।

,,, अवशय,, तुम निश्चिन्त यहां राह सकते हो। लेकिन एक शर्त है।

वीरप्पा- कैसी शर्त!!

,,, यहां तुम्हे चुड़ैलों के साथ रहना होगा। सिंह और चमगादड़ मेरे सिपहसालार है, सभी को अपनाकर ही तुम यहां राह सकते हो।

वीरप्पा- लेकिन कभी सोते वक्त इन सबने मुझ पर हमला कर दिया तो।

,,, नही, तुमने मेरी तीनो सेनाओं को हरा दिया है। अब मेरे दरबार के तुम मुख्य सेनापति हो। वादा है , मेरे सैनिक तुम्हे कोई कष्ट नही पहुँचाएँगे।

वीरप्पा- जी। आपका धन्यवाद।
 
चांडाल की सेना का सेनापति बनकर वीरप्पा उनसे शैतानी ताकतों के बारे में सीखने लगा। उधर राजकुमारी के आदेशानुसार सैनिक जंगल के चारो तरफ फैले हुए थे। लेकिन विरप्पा को गूफ़ा से बाहर आने का कोई कार्य भ8 नही था। वो तो अब बस ऐसी जगह डूब गया जहां बस शैतानों का राज था।

चुड़ैलें उसे अलग अलग शरीर धारण करने के बारे में सीखा रही थी तो चमगादड़ उसको अचानक हमला करना और रात के समय भी सब कुछ स्पष्ट देखने जैसी शैतानी शक्तियों से परिपूर्ण कर रहे थे। सिंहों के बीच वीरप्पा अब निर्भय हो गया था। शैतानी शक्तियों के बीच दिन रात रहने से अब उसके अंदर की मानव आत्मा मर चुकी थी। उसके भीतर अब शैतानी आत्माओं का वास हो चुका था। शैतानों का राजा चांडाल उसे तंत्र-मंत्र में पारंगत होना सीखा रहा था।

एक रोज जब शाम के समय वीरप्पा चांडाल के पास बैठा था तो चांडाल ने पूछा ,,,

चांडाल- वीरप्पा तुमने इतनी सारी शैतानी कला सीखी है। तुमने तो कहा था कि तुम्हे सिर्फ एक वर्ष बिताना है।

वीरप्पा- शैतानराज,, मुझे सिर्फ एक वर्ष ही बिताना है, लेकिन मैं यह कला इसलिए सिख रहा हु की मुझे बाहर जाकर सबसे शक्तिशाली बनना है।

चांडाल- यह तुम्हारा भरम है वीरप्पा, ।

वीरप्पा- कैसे?

चांडाल- यहाँ इतना समय बिताने के बाद मेरी सेना तुम्हे बाहर जाने ही नही देगी।

वीरप्पा- (आश्चर्य से) ऐसा क्यों ?

चांडाल- ऐसा इसलिए कि मेरी गुफा में जो आ जाता है वो वापिस बाहर नही जाता है। यहाँ चुड़ैल या चमगादड़ बनकर ही रहता है।

वीरप्पा आश्चर्यचकित हो जाता है। अब तक शोक से शैतानी शक्तियों को ग्रहण करने वाला अचानक पसीने पसीने हो जाता है। अब तक विरप्पा जो कुछ भी कर रहा था वो सिर्फ अपना अज्ञातवास बिताने के लिए कर रहा था। साथ ही वो ताकतवर भी होना चाहता था। लेकिन अब उसका रक्त जम गया था जब उसने यह जाना कि इस गुफा में आने वाला इंसान कभी वापिस इंसान रूप में नही राह सकता। वीरप्पा को रात भर नींद नही आई। उंसने सोचा कि गुफा से निकल जाऊं। चार माह बीत चुके थे तो अब बाकी का समय भी जंगल मे रह कर गुजार लूंगा। यह सोचकर विरपा अब गुफा से निकलना चाहता था।

रात का दूसरा प्रहर बीत रहा था और वीरप्पा को आंखों से नींद कोशों दूर थी। वीरप्पा साहस करके खड़ा हुआ और बाहर की तरफ चला। उंसने सोचा कि इतनी शैतानी शक्तियों को अब वो जानता है तो इन चुड़ैलों को और चमगादड़ो को हरा सकता है। वीरप्पा जैसे ही अग्नि कुंड पार करके आगे बढ़ा तभी चुड़ैलों के एक समूह ने उस पर हमला बोल दिया।

भयानक रूप और डरावनी आवाज के साथ चुड़ैलें वीरप्पा पर टूट पड़ी। वीरप्पा एक क्षण के लिए रुका और बोला,,,

वीरप्पा - अरे क्या क्या कर रही है आप? मैं आपका सेनापति हु और आप सब मुझ पर हमला क्यो कर रही हो।

चुड़ैल- आप सेनापति थे, लेकिन आज आपके मन मे इस साम्राज्य के प्रति प्रेम टूट गया है। हम जानते है कि आप इस गुफा से बाहर जाना चाहते है। और हमारे रहते यह सम्भव नही है।

ऐसा कहकर एक चुड़ैल ने भयानक आवाज निकाली और अगले ही पल एक चमगादड़ो का समूह विरपा पर हमला बोल देता है। वीरप्पा ने अपनी सारी सक्तियाँ लगा दी और सभी चमगादड़ो को बेहोश कर दिया। तभी एक भयावह चुड़ैल आई और वीरप्पा पर बेरहमी से टूट पड़ी। उंसने वीरप्पा को घायल कर दिया। लेकिन साहसी वीरप्पा फिर भी लड़ रहा था। अचानक एक सिंह ने वीरप्पा ले मुहं पर जोरदार पंजे का प्रहार किया और विरपा जमीन पर दीवार की भांति धड़ाम से गिर पड़ा। चुड़ैलों ने उसे घसीट कर उसके कक्ष में लेटा दिया।

सुबह वीरप्पा की आंख खुली तो पूरा शरीर लहूलुहान था। बदन के हर अंग में दर्द हो रहा था। वीरप्पा को रात का भयानक युद्ध याद आया। अब वीरप्पा को अहसास हुआ कि उसने बहुत बाद गलती की है। लेकिन अब उसके हाथ मे कुछ नही था। करे भी तो क्या?

तभी चांडाल आया और बोला,,,

चांडाल- कहो सेनानायक कल रात का समय कैसा कटा आपका?

विरपा-( आश्चर्य से) , मतलब!

चांडाल- मतलब आप बाहर जाना चाहते थे ना,, मेने आपको पहले ही कहा था कि अब बाहर जाना आपके बस की बात नही है। जब आने मेरी सेना को हराया था तब आप इंसान थे और मेरी सेना के साथ मेरी शक्तियां नही थी। अब आप शैतान बन चुके हो और मेरी सेना के साथ मेरी शक्तियां भी है। अब कोई भी इस गुफा से बाहर नही जा सकता।

वीरप्पा- शैतानराज मुझे कैसे भी करके बाहर जाना है। मुझे पता चल गया कि मैं अपनी मर्जी से नही जा सकता लेकिन आपके आदेश से जा सकता हूँ। कृपया करके आप मुझे बहत जाने दे।

वीरप्पा चांडाल के पैरों में पड़कर गिड़गिड़ाने लगा। तब चांडाल ने कहा,,,

चांडाल- वीरप्पा मेरे साम्राज्य का नियम है कि कोई बजी इंसान यहां जिस रूप में आता है वो उसी रूप में बाहर नही जा सकता है। यदि तुमको बाहर जाना है तो अपने इस रूप को छोड़कर दूसरा रूप धारण करना होंगा।

वीरप्पा - लेकिन दूसरा रूप लेकर मैं करूँगा क्या? मेरे अपने मुझे कैसे पहचानेंगे। मैं किसी से बदला भी लेना चाहता हु वो कैसे लूंगा। उसी के लिए तो मैने आपसे शैतानी शक्तियां सीखी थी।

चांडाल- तुमको एक काम करना होगा।

वीरप्पा - कैसा काम?

चांडाल- तुम अपने बदले किसी इंसान को यहाँ छोड़कर जा सकते है।

विरपा -इंसान! इस भयावह जंगल मे इंसान कहाँ से लाऊँ।

चांडाल- वो तुम्हारी समस्या है। मुझे नही पता। इस नियम को तोड़ना मेरे भी हाथ मे नही है।

वीरप्पा अब असमंझस में पड़ गया। ताकतवर बनने के लिए उंसने शैतानी शक्तियों का सहारा लिया लेकिन परिणाम को भूल गया। हालांकि हार मानने वाला तो नही था। अब भी वो सोच रहा था कि बाहर जाना है। चांडाल उसे साफ साफ कह चुका था कि कोई नियम तोड़ने से पहले तीन तीन सेनाओं को परास्त करना है जो वीरप्पा के सामने एक सबसे बड़ी समस्या थी।

लेकिन वीरप्पा ने जो शैतानी विद्या सीखी थी अब वो उसके सहारे इस समस्या का समाधान करना चाह रहा था। लेकिन उसके लिए उसे कम से कम गुफा से बाहर तो आना ही था। वीरप्पा चांडाल के पास जाता है और कहता है कि उसे इंसान लाने के लिए गुफा से बाहर जाने की अनुमति चाहिय। बिना बाहर गए तो कैसे यह सम्भव है। चांडाल भी उसकी बात से सहमत था। लेकिन बिना सेना की इजाजत के चांडाल भी कोई फैसला नही ले सकता था। बाहर जाने के लिए उसे चुड़ैलों और चमगादड़ो से अनुमति लेनी पड़ती थी। सिंह सेना सिर्फ अंदर आने वाले को रोकती थी। तब चांडाल ने अपना दरबार लगाया।
 
दरबार मे चांडाल ने वीरप्पा की बात अपनी शैतानी सेना के सामने रखी। एक भयावह चुड़ैल ने अचानक वीरप्पा पर हमला कर दिया। अचानक हुए हमले से वीरप्पा सम्भल नही सका और जमीन पर गिर पड़ा। तभी चांडाल ने उसे रोक दिया।

चांडाल- रुको कुलशी, तुम किसी को बिना वजह यूँ चोटिल नही कर सकती।

कुलशी- लेकिन इसने हमारे दरबार के नियम तोड़ने की कोशिश की है।

चांडाल- हां ,लेकिन हम किसी को ऐसे प्रताड़ित भी नही कर सकते। आखिर हम भी तो इस जैसे इंसान ही है। हमने सिर्फ शैतानी शक्ति से रूप बदला है। बाहर के राज से दुखी होकर हमने कुछ अलग किया है जो हमे स्वयं को सुरक्षित रख सकता है। लेकिन हमारी तरह वीरप्पा भी तो राजतंत्र का शिकार हुआ है।

कुलशी- लेकिन हम किसी को बाहर जाने की इजाजत तो नही दे सकते।

चांडाल- देनी होगी , हमे भी तो बदलना होगा। आखिर वीरप्पा की गलती यही है ना कि इसने अपना नाम, करने के लिए थोड़ा सा छल किया था। अब इसे बाहर नही भेजेंगे तो यह बदला कैसे लेगा। हमने प्रतिशोध नही लिया लेकिन वीरप्पा चाहता है तो इसे मौका दिया जाना चाहिए।

एक चमगादड़ इंसान रूप में आकर बोलता है,,,

चमगादड़- हां सही है। हमने यह नियम बनाकर स्वयं को यहां कैद कर लिया है। हमने कभी प्रतिशोध का नही सोचा, लेकिन जरा सोचो कि बिना बाहर निकले हमारी शक्तियां हमारे किस काम की।

वीरप्पा- यही मैं आपसे कहना चाहता हूं। आप भी मेरा साथ दीजिये। यदि आप लोगों की ताकत मेरे साथ होगी तो फिर बाहर भी हमारा ही राज होगा।

चांडाल-नही हम सब यह नही कर सकते। हमने कहीं ना कहीं गलतियां की थी। हम सब ने मिलकर हमारा एक अनोखा दरबार बनाया है। अब इस दरबार को बंद नही करना है। यदि आप सब इजाजत दो तो सिर्फ वीरप्पा को कुछ समय के लिए बाहर जाने दो। जिससे यह अपना इंतकाम पूरा कर सके।

कुलशी- लेकिन यह भी तो हमारे दरबार के नियम विरुद्ध है।

चांडाल- नहीं , यह सही है।

कुलशी- कैसे?

चांडाल- नियम के अनुसार वीरप्पा ने अभी तक रूप नही बदला है। अभी भी वो मानव रूप में है। तो हम इसे यह इजाजत दे सकते है।

कुलशी- ठीक है, किंतु मैं इसके साथ रहूंगी। जब तक यह आने स्थान पर किसी इंसानी शरीर को इस गुफा में ना लाये तब तक।

चांडाल- ठीक है आप लोगों में से जिसको वीरप्पा पर नजर रखने के लिए साथ जाना है वो जा सकता है। मगर ध्यान रहे यदि अपने मुझे याद किये बिना अपनी शक्तियो का गलत फायदा उठाने की कोशिश की तो आप लोग जीवन भर इसी रूप में बिना किसी शक्ति के रहोगे।

कुलसी- आप निश्चिन्त रहें, हमे पता है कि शैतान की अनुमति के बिना शक्ति का प्रयोग करने का परिणाम क्या होता है।

चांडाल- ठीक है। आप सबको 30 दिन का समय है। इन 30 दिनों में आप वीरप्पा की सहायता कर सकते हो।

वीरप्पा- जय हो शैतानराज कि।

दरबार बर्खास्त हो जाता है। जबकि सहमति से कुलशी और 3 चमगादड़ वीरप्पा पर नजर रखने के लिए बाहर जाते है। गुफा से बाहर निकल कर वीरप्पा सोचता है कि अब क्या किया जाए। शैतान के 4 सिपहसालार उसके साथ थे। जिनसे पार पाना वीरप्पा के लिए नामुमकिन था। हालांकि रणनीति तो वीरप्पा जानता था लेकिन इंसानों की, शैतानों की रणनीति के बारे में वो अभी ज्यादा नही जान पाया था। उंसने रूप बदलने की विद्या सीखी थी। इतने कम समय मे कुलशी जैसा ताकतवर वो नही बन पाया था।

वीरप्पा बाहर आकर एक पेड़ की ठंडी छांव में लेट गया। कुलसी और चमगादड़ जो कि अदृश्य थे, पेड़ पर बैठकर वीरप्पा पर नजर रख रहे थे। वीरप्पा को बहुत दिनों बाद सुकून वाली नींद आई। जब नींद से जागा तो उसका मष्तिष्क कुछ सामान्य हुआ। वीरप्पा के सामने अब प्रश्न यह था कि इन शैतानी ताकतों से छुटकारा पाने के लिए क्या करूँ।
 
वीरप्पा को राजकुमारी से ज्यादा तो कुलशी से परेशानी थी। वैसे सही भी है जिसके हृदय में वैर भावना होती है उसको फिर परेशानी का सामना भी तो करना ही पड़ेगा। क्योंकि राजकुमारी किसी भी प्रकार से गलत नही थी। गलती भी तो वीरप्पा की थी। अब भुगतना भी उसे ही है।

वीरप्पा के कलुषित मष्तिष्क में अब भी सही सोच नही पनप रही थी। अब भी वो राजकुमारी के प्रति दूषित मष्तिष्क लिए बैठा था। वीरप्पा सोचने लगा कि कैसे भी करके राजकुमारी को जंगल मे लाया जाए और फिर उसे कुलशी के हवाले कर दिया जाए तो सारे जीवनभर ही राजकुमारी से पिछा छूट जाए। लेकिन समस्या तो यह भी थी कि राजकुमारी को जंगल मे कैसे लाया जाए । जंगल से बाहर निकल कर जाना भी खतरे से खाली नही था। वीरप्पा के पास ज्यादा समय भी नही था। 30 दिन में ही उसे सब कुछ करना था। और यदी वो सफल नही हुआ तो फिर जीवनभर गुफा में ही रहना पड़ेगा।

वीरप्पा सोचते सोचते राजकुमारी पर आकर अटक गया। वीरप्पा ने सोचा कि अब जीवन मे शैतानी ताकत तो है ही फिर क्यों ना उसका प्रयोग करके राजकुमारी को सबक सिखाया जाय। कुलसी अदृश्य रूप में कहीं भी जा सकती थी तो वीरप्पा ने उसको मनाया और स्वयं ने एक नवयौवना सुंदरी का रूप धारण किया। पहले दोनो ने चमगादड़ से मिलकर जंगल में एक मायावी धूनी रमाई। एक चमगादड़ सफेद ढाढी और केशरी वस्त्र पहने सज्जन सन्त के रूप में धूनी पर बैठ गया। उधर सजी हुई युवती के रूप में वीरप्पा जंगल से बाहर निकलता है। आशा के अनुरूप राज्य के सैनिक मिलते है।

सैनिक- है सुंदरी तुम कौन हो?

सुंदरी- मैं द्रुम ऋषि की कन्या हु, वो आजकल इस जंगल मे कठिन तप कर रहे है। मैं पानी की तलाश में आई हूं। महाशय क्या यहां पीने योग्य पानी मिलेगा?

सैनिक- जी अवश्य मिलेगा। लेकिन अभी राजकुमारी के आने का वक्त है, इस समय कोई इस रास्ते मे नही जा सकता है। आपको थोड़ा इंतजार करना होगा।

सुंदरी- ऋषिराज नाराज हो जाएंगे। आपकी राजकुमारी महोदय कब तक आएंगी।

सैनिक- बस कुछ ही क्षणों में आ रही है। कृपया तनिक इंतजार कीजिये।

कुछ ही पलों में शाही सवारी में राजकुंमारी का आगमन होता है। रथ पर सवार राजकुंमारी को देखते ही सुंदरी के रूप में वीरप्पा की भौंहे तन जाती है लेकिन अगले ही पल वो शांत हो जाता है, योजना के अनुसार उसे राजकुंमारी को जंगल मे ले जाना था। रथ आकर रुकता है। सैनिक के पास एक यौवन से भरपूर सुंदर कन्या को देख कर राजकुंमारी सैनिक से प्रशन्न करती है।

राजकुंमारी- सैनिक , यह आपके साथ लड़की कौन है?

सैनिक बोलता इससे पहले ही सुंदरी बोल पड़ती है।

सुंदरी- राजकुंमारी जी की जय हो। मैं द्रुम ऋषि की पुत्री हूं, वो तपस्या में लीन है। पानी की जरूरत ने मुझे यहां पहुंचा दिया है।

राजकुमारी- पहले तो कभी नही सुना, की इस जगंल में कोई ऋषि रहते है।

सुंदरी- आपके भाग्य से वो यहां आए है, चाहो तो आप उनके दर्शन कर सकते हो। पहले मैं उनके लिए जल ले आऊं।

राजकुमारी की जिज्ञाषा बढ़ी, वो ऋषि से मिलना चाहती थी। राज परिवार वैसे ही सदैव ऋषियों का सम्मान करता आया है। राजकुमारी के आदेश से एक सैनिक ने सुंदरी के हाथ से मटका लिया और पानी का भरकर लाया।

राजकुमारी अपने दो अंगरक्षकों के साथ जंगल मे जाने लगी। तभी एक सैनिक राजकुमारी को टोकता है, लेकिन एक युवती के साथ जाने में कैसा डर यह सफाई देकर राजकुंमारी निर्भय होकर जंगल मे प्रवेश कर गई।

अपनी योजना को सफल होता देख वीरप्पा बहुत खुश हुआ। मायावी धूनी पर पहुंचकर वीरप्पा ने जल का मटका रखा और राजकुमारी को इसारे से ऋषि के सामने बैठने को कहा।

राजकुमारी धुनी के सामने बैठ गई। कुछ दूरी पर दोनो अंगरक्षक खड़े हो गए। सुंदरी के रूप में विरप्पा ने दोनों अंगरक्षकों को नैनो से इसारा करके अपने मोहजाल में फंसा लिया। राजकुमारी अब ध्यान से ऋषि के सामने बैठी थी।उधर वीरप्पा ने दोनों अंगरक्षकों को कहा कि मेरे पांव में छाले पड़ गए है क्या आप ऋषिराज के लिए फल लाकर दे सकते है। दोनो अंगरक्षक सुंदरता से मोहित थे । तुरन्त जंगल मे फल लाने चले गए।

सुंदरी ने कुलसी को इसारा किया और तय योजना के अनुसार ऋषि की आंख खुली, सामने एक रूपवती लड़की को देख कर ऋषि को क्रोध आया और बोले,,

ऋषिराज- दुष्ट कन्या तुम मेरी तपस्या भंग करने आई हो। अपनी सुंदरता से लुभाकर मेरी वर्षो की तपस्या को तोड़ने आई हो। मैं तुम्हे श्राप देता हूं।

राजकुमारी अपनी सफाई में कुछ बोलती उससे पहले ही उसने मायावी जल के छींटे राजकुंमारी पर डाले और पल भर में ही राजकुमारी का रूप चुड़ैल के रूप में परिवर्तित हो गया। वीरप्पा अब अत्यधीक खुश हो गया। अपनी योजना के अनुसार कुलशी राजकुंमारी को लेकर गुफा में चली गई, अंगरक्षकों के वापिस आने से पहले ही वीरप्पा गुफा में चांडाल से आज्ञा लेकर वापिस बाहर आ गया और राजकुमारी का रूप धारण कर लिया।
 
चमगादड़ ऋषि बनकर अब भी धूनी पर बैठा था, अंगरक्षक वापिस आये और राजकुमारी बने वीरप्पा के आदेश से उसके साथ वापिस जंगल से बाहर आ गए। वीरप्पा को अब बस यह जानना था कि इन 6 माहिनो में राज्य में हुआ क्या है।

राजमहल व राज्य के बारे में वो सब जानता था। तो वीरप्पा को किसी बात का डर नही था। राजकुमारी के रूप में अब उसे क्या करना था यह योजना उसके मष्तिष्क में पल रही थी। बस पता यह लगाना था कि वीरप्पा के जाने के बाद राज्य में और राजदरबार में राजकुमारी का कद क्या था।

उधर राजकुमारी चुड़ैल के रूप में चांडाल की गूफ में पहुंच चुकी थी। कुलशी ने उसे चांडाल के दरबार के अनुसार रहना बताया जो राजकुमारी को मंजूर नही था। कुलशी के साथ अन्य चांडाल सैनिक राजकुमारी को प्रताड़ित करना शुरू कर दिया।

वीरप्पा अब राजमहल में पहुंच चुका था। एक अलग भेष में, राजकुमारी के रूप में अब वीरप्पा वो करने की सोचने लगा जो शायद वैभवराज ने कभी सपने में भी नही सोचा था। आखिर सोचे भी क्यों! ना वैभवराज ने कोई ऐसा गलत काम कभी किया था और ना ही राजकुमारी ने। लेकिन कलुषित दिमाग मे अब भयानक विचारो के बवंडर के साथ वीरप्पा मानवता से कोशो दूर चांडाल से भी भयावह चांडाल बन गया जो बेकसूर राजकुंमारी के साथ साथ सम्पूर्ण राज्य को दंडित करना चाह रहा था।

महल में आने के साथ ही राजकुमारी के वेश में वीरप्पा सीधा जनाना ड्योढ़ी में जाकर आराम करने के बहाने आगे की योजना के बारे में सोचने लगा। राजकुमारी की बचपन की सहेली और दासी पुत्री सुरषि हमेशा ही राजकुमारी के साथ रहती थी। वीरप्पा को पता था कि राजकुमारी सुरषि के बेहद करीब है तो पिछले 7 महीने में जो कुछ हुआ है वो उसे सुरषि ही बता सकती है। यदि वो सब पता चल जाये तो फिर वीरप्पा की योजना में कोई बाधा नही आएगी।

रात्रि में सोने के समय वीरप्पा ने सुरषि को बुलाया।

राजकुमारी(वीरप्पा)- सुरषि, आज मेरे सर में थोड़ा दर्द है, सर में तेल डाल दे।

सुरषि- क्या हुआ! वैधजी को बुलाऊँ क्या?

राजकुमारी- अरे नही, इतना भी नही है। बस थोड़ी थकान सी हो रही है। तू बस तेल डाल दे।

सुरषि राजकुमारी के रूप में वीरप्पा के सर में तेल डालति है, धीरे धीरे बालो में हाथ मलती है तो मौका पाकर वीरप्पा बोलता है।

राजकुमारी- सुरषि, मैं आज कुछ भूल गई हूं क्या? मुझे ऐसा लगता है कि कोई काम मैं भूल गई हूं। शायद सर में दर्द की वजह से, तुझे कुछ याद है तो बता। ऐसा ना हो कि पिताश्री गुस्सा करें।

सुरषि- नही राजकुमारी जी, मेरी यादाश्त में बारे में आप जानती हो। जहां तक मुझे याद है आप कुछ नही भूले हो। रोज की तरह प्रातःकाल दरबार मे अपने मंत्रियों के विचार सुने, फिर आप सेनापति महोदय जी के साथ तलवार बाजी सीखी, फिर आपने शाहीभोज किया और शाम के समय आप जंगल मे भी गए। लगता है आपको आज ज्यादा थकान हो गई।

राजकुमारी- क्या रोज मैं इतना ही काम करती हूं?

सुरषि- हां तो और क्या। हां कभी कभी आप घुड़सवारी भी करते हो लेकिन रोज नही।

राजकुमारी- ठीक है। लगता है आज ज्यादा थक गई। तुम जाओ, अब दर्द ठीक है मेरा।

सुरषि- राजकुमारी जी आप कहो तो वैधजी को बुला दु ।

राजकुमारी- अरे नही, अब ठीक है। मुझे सोना है। तुम जा सकती हो।

सुरषि चली जाती है। वीरप्पा आगे की योजना बनाते हुए सो जाता है।उधर जंगल मे एक अनोखा वाकया घटित हुआ। जो चमगादड़ ऋषि बनकर तपस्या में बैठा था, वीरप्पा के निकलते ही वहाँ एक साधु आ गए। धूनी देखी तो रुक गए और परिचय किया और चमगादड़ का झूठ पकड़ लिया। आये हुए सन्त ने अपने कमंडल से जल के छींटे चमगादड़ पर डाले और उसे साधु वेश में ही रहने का श्राप दे दिया।

सन्त- मूर्ख तुमने एक बेकसूर कन्या पर जुल्म किया है वो भी पवित्र अग्नि के सामने और साधु वेश में, तेरी यह सजा है कि तू अब साधु ही बना रह। एक माह के पश्चात तेरा शरीर पत्थर का बन जायेगा।

जूठा साधु(चमगादड़) - लेकिन क्यों मेने तुम्हारा क्या बिगाड़ा है। तुम अपना श्राप वापिस ले लो नही तो मैं तुम्हारा सर्वनाश कर दूंगा। तुम जानते नही मेरी शक्तियों को।

सन्त- भलीभांति जानता हूं और तुम भी यह जान लो कि मैं खुद द्रुम ऋषि हुँ, तुमने मेरे नाम से कन्या को प्रताड़ित किया है। तुम सजा के हकदार हो। और अब तेरी सारी शक्तियां नष्ट हो गई है। एक माह के बाद तेरा शरीर भी पत्थर हो जाएगा।

चमगादड़- नही ऐसा मत करो। मैं मेरा दोष स्वीकार करता हु। लेकिन कृपया करके मुझे पत्थर बनने से बचा लो।

सन्त द्रुम- एक शर्त पर मैं तुम्हे पत्थर बनने से बचा सकता हु।

चमगादड़- बोलिये, मैं आपकी शर्त मान लूंगा। लेकिन मुझे पत्थर नाह बनना है।

सन्त द्रुम- तुमको मुझे बताना होगा कि उस कन्या को कहां ले गए और क्यों ले गए।

चमगादड़- ठीक है, मैं आपको सब सच बताता हूं। लेकिन आप अपना श्राप वापिस ले लो।

सन्त द्रुम- पहले मुझे कन्या से मिलवा दो, वादा है कि मैं तुम्हारे जीवन को सुखी बना दूँगा। बल्कि तुमको इस शैतानी चक्र से बाहर निकाल दूँगा।

चमगादड़ अब सन्त की बात से सहमत हो गया और सन्त को गुफा की तरफ ले चला।
 
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