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दरबार मे स्थान पाकर अब वीरप्पा के मष्तिष्क में कुटिलता दिनों दिन बढ़ने लगी। धीरे धीरे वीरप्पा ने अपने पुराने साथी सैनिकों से वापिस जान पहचान की उनको अपनी ताकत से परिचित करवाया। कुछ सैनिक वफादारी से तो कुछ डर से वीरप्पा का साथ देने के लिए तैयार हो गए।
उधर राजकुमार विजयराज की शिक्षा अब पूरी हो चुकी थी। अपने दोस्त पंडित के साथ वो अपने राज्य के लिए निकल गया। रास्ते मे दोनो दोस्तो ने अपनी अपनी विद्या के बारे में एक दूसरे को परिचय करवाया। पंडित पुत्र तंत्र विद्या में पारंगत था। तो विजयराज ने अपनी शास्त्र विद्या का ज्ञान भी पंडित पुत्र को दिया। दोनो में परिचय, होने के पश्चात पता चला कि दोनों के राज्य एक ही रास्ते मे आते है। खुशी खुशी एक साथ चले अपनी राह पर।
उधर राज्य में वीरप्पा अपनी योजना ने अनुरूप सैनिकों को अपनी तरफ करने में कामयाब हो रहा था। राजकुमारी के रूप वो शाही परिवार के प्रत्येक सदस्य को छल रहा था।
एक रोज राजकुमारी के रूप में वीरप्पा चक्रधर के साथ धुनष विद्या का अभ्यास कर रहा था। अचानक राजकुमारी बने वीरप्पा ने चक्रधर से कहा कि महोदय आप मेरे साथ आज तलवारबाजी का अभ्यास करो। चक्रधर अपनी शिष्या को सिखाने के लिए हमेशा तैयार रहता था तो उस दिन भी सहर्ष राजी हो गया। विरप्पा ने तो कुछ और ही सोच रखा था। अभ्यास करते करते राजकुमारी के वेश में वीरप्पा ने चक्रधर की भुजा पर जोर से तलवार का वार कर दिया जिससे चक्रधर की भुजा कटकर गिर पड़ी। साथ मे खड़े सैनिकों और दासियों में अफरातफरी मच गई। जानबूझकर प्रहार करने के पश्चात वीरप्पा ने सहानुभूति के आँशु भी टपकाये और रोने लगा। चूंकि राजकुंमारी के वेश में था तो किसी ने शक नही किया कि यह जनबूझकर किया गया है।
आनन फानन में चक्रधर को राजमहल में पहुंचाया गया। वैधजी को बुलाया गया और उपचार किया गया लेकिन चक्रधर का एक हाथ काट गया। वीरप्पा अपनी योजना में कामयाब हो गया। लेकिन दरबार तो लगना था। जांच होनी थी कि यह सब कैसे हुआ? दरबार लगा, वैभवराज के साथ रानी तारामती और मंत्रिमंडल के सदस्य भी विराजमान हुए।
मंत्री- महाराज की जय हो। आज दराबर में एक अनोखा मामला है, आपकी आज्ञा हो तो सुनवाई आरम्भ की जाए।
वैभवराज- मन्त्रिवर सुनवाई आरम्भ हो।
मंत्री- महाराज कल तलवारबाजी के अभ्यास के दौरान सेनापति चक्रधर का हाथ कट गया जो कि हमारे राज्य की अपूरणीय क्षति है।
वैभवराज- यह बहुत दुखद क्षण है। चक्रधर के प्रति सम्पूर्ण राज्य की सहानुभूति है।
मंत्री- लेकिन महाराज एक समस्या है।
वैभवराज- क्या समस्या मन्त्रिवर?
मंत्री- महाराज यह हादसा राजकुंमारी के हाथों से हुआ है।
वैभवराज- तो इसमें समस्या क्या है मन्त्रिवर! अपराध यदि शाही परिवार का कोई सदस्य करे तो क्या वह अपराध नही होता है! अपराध तो अपराध है। और फिर इतना बड़ा अपराध है सजा तो हमारे दण्ड विधान में सबके लिए एक सम्मान है।
मंत्री- महाराज आपकी बात सही है लेकिन यह राजकुंमारी ने जानबूझकर नही किया । साथ गए सैनिकों और राजकुमारी की सहेलियों जो कि प्रत्यक्षदर्शी है, उनसे हमने पूछताछ की है। पता चला है कि अभ्यास के दौरान राजकुमारी के हाथ से तलवार फिसल गई और सेनापति महोदय की बाजू कट गई।
वैभवराज- प्रत्यक्षदर्शियों को दरबार मे पेश किया जाय।
मंत्री- जी महाराज।
फिर अभ्यास के दौरान वहां उपस्थित सभी सैनिकों और राजकुमारी को सहेलियों को दरबार मे पेश किया जाता है। राजा प्रत्येक से सवाल करता है और उनका जवाब सुनता है। सभी लोगो से सवाल हो जाने के बाद राजा चक्रधर को दरबार मे बुलाता है। दो सैनिको का सहारा लेकर दर्द के साथ सेनापति चक्रधर राजदरबार में हाजिर होता है।
वैभवराज- सेनापति महोदय, आपके साथ हुई इस दुखद घटना का पता चला, हृदय को गहरा आघात पहुंचा है। आप हमारे राज्य के एक अभिन्न अंग हो और हमारे सुभचिंतक भी। अपराध किसी के भी द्वारा किया जाए उसकी सजा इस दरबार द्वारा अवश्य तय की जाती है।
चक्रधर- महाराज, यह कोई अपराध नही है। मानता हूं कि मेरी वजह से आपकी सेना को तनिक नुकसान हुआ है लेकिन मैं यह नही मान सकता कि यह एक अपराध है।
वैभवराज- सेनापति महोदय इसमें आपकी तो कोई गलती ही नही है। आप व्यर्थ में स्वयं को मानसिक कष्ट ना दे। मेने सभी प्रत्येक्षदर्शी से बातचीत की है। पता चला है कि यह अपराध राजकुमारी के हाथों हुआ है।
चक्रधर- लेकिन महाराज राजकुमारी ने यह जानबूझकर नही किया है। यह एक हादसा है जो अभ्यास के दौरान हो गया। मैं इसे राजकुमारी का अपराध नही मानता हूं।
वैभवराज- सेनापति महोदय यह आपकी वफादारी है शाही परिवार के लिए, लेकिन इससे जनता में अनुचित संदेश जाएगा। राजकुमारी को सजा तो मिलनी ही चाहिए। बिना हाथ आप अपने परिवार का भी पालन पोषण नही कर सकते है। आपके जीवन की अपूरणीय क्षति है।
राजकुमारी को दरबार मे पेश किया जाए।
राजकुमारी के वेश में वीरप्पा दरबार मे पेश होता है। हृदय में असीम खुशी और चेहरे पर बनावटी दर्द लिए। गर्दन झुकाए हुए ही वीरप्पा कहता है,,,
राजकुमारी(वीरप्पा)- महाराज सबसे पहले तो में सेनापति महोदय से क्षमायाचना करती हूं, दरबार मे सभी को प्रणाम और मैं मेरे इस अपराध को बिना किसी सुनवाई के स्वीकार करती हूं।
वैभवराज- राजकुमारी आपके अपराध की सुनवाई हो चुकी है, सभी पहलुओं पर गौर किया जा चुका है। बस हम आपसे अंतिम सवाल करना चाहते है।
राजकुमारी- महाराज, मैं अपना अपराध स्वीकार करती हूं, फिर भी आपको कुछ पूछना है तो आप पूछ सकते है।
वैभवराज- क्या अपने किसी वैरभावना या प्रतिशोध के चलते सेनापति से तलवारबाजी की थी?
राजकुमारी- नही महाराज, ऐसा कदापि मेरे जेहन में नही है कि आदरणीय सेनापति महोदय, जो कि मेरे सस्त्र गुरु भी है उनसे कभी मेरा कोई वैर हो सकता है या फिर कभी मैं उनसे किसी तरह का प्रतिशोध लेना चाहती हूं। महाराज हम सिर्फ अभ्यास कर रहे थे और इसी दौरान यह हादसा हो गया। लेकिन मैं समझती हूं कि इसमें मेरी गलती है। अतः मेरा इस दरबार से निवेदन है कि मुझे शाही परिवार की सदस्य समझकर दण्ड विधान का अपमान ना करे। यह दरबार जो भी सजा का मेरे लिए निर्णय करेगा वो मैं सहर्ष स्वीकार करूंगी।
चक्रधर- महाराज मेरा इस दरबार से निवेदन है कि अभ्यास के दौरान हुए इस हादसे को अपराध ना माना जाए और निरपराध राजकुमारी को कोई सजा ना दी जाए।
मन्त्रिवर आपस मे सलाह मशविरा करके महाराज के सामने सुझाव रखते है। रानी तारामती भी इस सलाह में शामिल थी। अंत मे निर्णय हुआ कि सेनापति के पद पर राजकुमारी को रहना होगा और वेतन के रूप में स्वर्णमुद्रा चक्रधर के परिवार को दी जाए साथ हि राजकुमारी स्वयं चक्रधर के परिवार की देखभाल करेगी। इसके साथ कम से कम राजकुंमारी को 1 माह की कैद की सजा दी जाएगी। चक्रधर के मना करने के बाद भी दरबार ने राजकुमारी को कैदखाने भेज दिया।
कैद में पहुंचकर वीरप्पा बहुत प्रशन्न हुआ। वो जो चाहता था उसमें सफल हुआ और अब कैद में वीरप्पा की योजना की अगली सीढ़ी बननी थी। जो अब वीरप्पा के लिए आसान थी।
उधर राजकुमार विजयराज की शिक्षा अब पूरी हो चुकी थी। अपने दोस्त पंडित के साथ वो अपने राज्य के लिए निकल गया। रास्ते मे दोनो दोस्तो ने अपनी अपनी विद्या के बारे में एक दूसरे को परिचय करवाया। पंडित पुत्र तंत्र विद्या में पारंगत था। तो विजयराज ने अपनी शास्त्र विद्या का ज्ञान भी पंडित पुत्र को दिया। दोनो में परिचय, होने के पश्चात पता चला कि दोनों के राज्य एक ही रास्ते मे आते है। खुशी खुशी एक साथ चले अपनी राह पर।
उधर राज्य में वीरप्पा अपनी योजना ने अनुरूप सैनिकों को अपनी तरफ करने में कामयाब हो रहा था। राजकुमारी के रूप वो शाही परिवार के प्रत्येक सदस्य को छल रहा था।
एक रोज राजकुमारी के रूप में वीरप्पा चक्रधर के साथ धुनष विद्या का अभ्यास कर रहा था। अचानक राजकुमारी बने वीरप्पा ने चक्रधर से कहा कि महोदय आप मेरे साथ आज तलवारबाजी का अभ्यास करो। चक्रधर अपनी शिष्या को सिखाने के लिए हमेशा तैयार रहता था तो उस दिन भी सहर्ष राजी हो गया। विरप्पा ने तो कुछ और ही सोच रखा था। अभ्यास करते करते राजकुमारी के वेश में वीरप्पा ने चक्रधर की भुजा पर जोर से तलवार का वार कर दिया जिससे चक्रधर की भुजा कटकर गिर पड़ी। साथ मे खड़े सैनिकों और दासियों में अफरातफरी मच गई। जानबूझकर प्रहार करने के पश्चात वीरप्पा ने सहानुभूति के आँशु भी टपकाये और रोने लगा। चूंकि राजकुंमारी के वेश में था तो किसी ने शक नही किया कि यह जनबूझकर किया गया है।
आनन फानन में चक्रधर को राजमहल में पहुंचाया गया। वैधजी को बुलाया गया और उपचार किया गया लेकिन चक्रधर का एक हाथ काट गया। वीरप्पा अपनी योजना में कामयाब हो गया। लेकिन दरबार तो लगना था। जांच होनी थी कि यह सब कैसे हुआ? दरबार लगा, वैभवराज के साथ रानी तारामती और मंत्रिमंडल के सदस्य भी विराजमान हुए।
मंत्री- महाराज की जय हो। आज दराबर में एक अनोखा मामला है, आपकी आज्ञा हो तो सुनवाई आरम्भ की जाए।
वैभवराज- मन्त्रिवर सुनवाई आरम्भ हो।
मंत्री- महाराज कल तलवारबाजी के अभ्यास के दौरान सेनापति चक्रधर का हाथ कट गया जो कि हमारे राज्य की अपूरणीय क्षति है।
वैभवराज- यह बहुत दुखद क्षण है। चक्रधर के प्रति सम्पूर्ण राज्य की सहानुभूति है।
मंत्री- लेकिन महाराज एक समस्या है।
वैभवराज- क्या समस्या मन्त्रिवर?
मंत्री- महाराज यह हादसा राजकुंमारी के हाथों से हुआ है।
वैभवराज- तो इसमें समस्या क्या है मन्त्रिवर! अपराध यदि शाही परिवार का कोई सदस्य करे तो क्या वह अपराध नही होता है! अपराध तो अपराध है। और फिर इतना बड़ा अपराध है सजा तो हमारे दण्ड विधान में सबके लिए एक सम्मान है।
मंत्री- महाराज आपकी बात सही है लेकिन यह राजकुंमारी ने जानबूझकर नही किया । साथ गए सैनिकों और राजकुमारी की सहेलियों जो कि प्रत्यक्षदर्शी है, उनसे हमने पूछताछ की है। पता चला है कि अभ्यास के दौरान राजकुमारी के हाथ से तलवार फिसल गई और सेनापति महोदय की बाजू कट गई।
वैभवराज- प्रत्यक्षदर्शियों को दरबार मे पेश किया जाय।
मंत्री- जी महाराज।
फिर अभ्यास के दौरान वहां उपस्थित सभी सैनिकों और राजकुमारी को सहेलियों को दरबार मे पेश किया जाता है। राजा प्रत्येक से सवाल करता है और उनका जवाब सुनता है। सभी लोगो से सवाल हो जाने के बाद राजा चक्रधर को दरबार मे बुलाता है। दो सैनिको का सहारा लेकर दर्द के साथ सेनापति चक्रधर राजदरबार में हाजिर होता है।
वैभवराज- सेनापति महोदय, आपके साथ हुई इस दुखद घटना का पता चला, हृदय को गहरा आघात पहुंचा है। आप हमारे राज्य के एक अभिन्न अंग हो और हमारे सुभचिंतक भी। अपराध किसी के भी द्वारा किया जाए उसकी सजा इस दरबार द्वारा अवश्य तय की जाती है।
चक्रधर- महाराज, यह कोई अपराध नही है। मानता हूं कि मेरी वजह से आपकी सेना को तनिक नुकसान हुआ है लेकिन मैं यह नही मान सकता कि यह एक अपराध है।
वैभवराज- सेनापति महोदय इसमें आपकी तो कोई गलती ही नही है। आप व्यर्थ में स्वयं को मानसिक कष्ट ना दे। मेने सभी प्रत्येक्षदर्शी से बातचीत की है। पता चला है कि यह अपराध राजकुमारी के हाथों हुआ है।
चक्रधर- लेकिन महाराज राजकुमारी ने यह जानबूझकर नही किया है। यह एक हादसा है जो अभ्यास के दौरान हो गया। मैं इसे राजकुमारी का अपराध नही मानता हूं।
वैभवराज- सेनापति महोदय यह आपकी वफादारी है शाही परिवार के लिए, लेकिन इससे जनता में अनुचित संदेश जाएगा। राजकुमारी को सजा तो मिलनी ही चाहिए। बिना हाथ आप अपने परिवार का भी पालन पोषण नही कर सकते है। आपके जीवन की अपूरणीय क्षति है।
राजकुमारी को दरबार मे पेश किया जाए।
राजकुमारी के वेश में वीरप्पा दरबार मे पेश होता है। हृदय में असीम खुशी और चेहरे पर बनावटी दर्द लिए। गर्दन झुकाए हुए ही वीरप्पा कहता है,,,
राजकुमारी(वीरप्पा)- महाराज सबसे पहले तो में सेनापति महोदय से क्षमायाचना करती हूं, दरबार मे सभी को प्रणाम और मैं मेरे इस अपराध को बिना किसी सुनवाई के स्वीकार करती हूं।
वैभवराज- राजकुमारी आपके अपराध की सुनवाई हो चुकी है, सभी पहलुओं पर गौर किया जा चुका है। बस हम आपसे अंतिम सवाल करना चाहते है।
राजकुमारी- महाराज, मैं अपना अपराध स्वीकार करती हूं, फिर भी आपको कुछ पूछना है तो आप पूछ सकते है।
वैभवराज- क्या अपने किसी वैरभावना या प्रतिशोध के चलते सेनापति से तलवारबाजी की थी?
राजकुमारी- नही महाराज, ऐसा कदापि मेरे जेहन में नही है कि आदरणीय सेनापति महोदय, जो कि मेरे सस्त्र गुरु भी है उनसे कभी मेरा कोई वैर हो सकता है या फिर कभी मैं उनसे किसी तरह का प्रतिशोध लेना चाहती हूं। महाराज हम सिर्फ अभ्यास कर रहे थे और इसी दौरान यह हादसा हो गया। लेकिन मैं समझती हूं कि इसमें मेरी गलती है। अतः मेरा इस दरबार से निवेदन है कि मुझे शाही परिवार की सदस्य समझकर दण्ड विधान का अपमान ना करे। यह दरबार जो भी सजा का मेरे लिए निर्णय करेगा वो मैं सहर्ष स्वीकार करूंगी।
चक्रधर- महाराज मेरा इस दरबार से निवेदन है कि अभ्यास के दौरान हुए इस हादसे को अपराध ना माना जाए और निरपराध राजकुमारी को कोई सजा ना दी जाए।
मन्त्रिवर आपस मे सलाह मशविरा करके महाराज के सामने सुझाव रखते है। रानी तारामती भी इस सलाह में शामिल थी। अंत मे निर्णय हुआ कि सेनापति के पद पर राजकुमारी को रहना होगा और वेतन के रूप में स्वर्णमुद्रा चक्रधर के परिवार को दी जाए साथ हि राजकुमारी स्वयं चक्रधर के परिवार की देखभाल करेगी। इसके साथ कम से कम राजकुंमारी को 1 माह की कैद की सजा दी जाएगी। चक्रधर के मना करने के बाद भी दरबार ने राजकुमारी को कैदखाने भेज दिया।
कैद में पहुंचकर वीरप्पा बहुत प्रशन्न हुआ। वो जो चाहता था उसमें सफल हुआ और अब कैद में वीरप्पा की योजना की अगली सीढ़ी बननी थी। जो अब वीरप्पा के लिए आसान थी।