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वक्त की धूल
महीना भी सावन का था और दिन भी बरसात के थे । कभी धीमी....कभी तेज...कभी मूसलाधार वर्षा और कभी बादलों से ढकी रातें...यही सावन की एक और पहचान होती है, जिसे शब्दों में वर्णित नहीं किया जा सकता...बल्कि जिसे जवान दिल ही महसूस कर सकते हैं । अगर सावन के महीने में पहला-पहला प्यार हो जाये तो उसकी कसक सारी जिंदगी याद बनकर रह जाती है ।
महानगर दिल्ली का सबसे व्यस्ततम और खूबसूरत मार्केट कनॉट प्लेस भी इस समय धीमी-धीमी फुहार में नहा रहा था । चूंकि शाम ढल चुकी थी और रात का प्रथम प्रहर चल रहा था, इसलिए लोगों को घर लौटने की भागमभाग मची हुई थी । बसों, स्कूटरों और टैक्सियों की हलचल थी जो यहाँ का रोजमर्रा का जीवन है....परन्तु बरसात के कारण यह हलचल अन्य दिनों की अपेक्षा कुछ कम थी ।
समर जब होटल गेलार्ड से बाहर निकला तो दस बज रहे थे । उसके पांव लड़खड़ा रहे थे किन्तु वह इतना नशे में भी नहीं था कि अपने होश खो बैठे । चंद कदम चलने के बाद उसकी चाल में भी कुछ संतुलन आ गया था ।
वह धीरे-धीरे रीगल पार्किंग लाट की तरफ बढ़ रहा था, जहाँ उसकी नई फिएट खड़ी थी । बरसात की फुहार समर के दिल में तपी उमंगें जगा रही थी....और उसकी निगाहों में एक भूख सी जाग रही थी ।
रीगल पार्किंग से कार निकालने के बाद वह प्लाजा की तरफ बढ़ गया ।
बारिश के कारण अब फुटपाथों पर वीरानी सी फैलती जा रही थी और इस कारण समर को अपना शिकार तलाश करने में थोड़ी मुश्किल पेश आ रही थी । वह कार बेहद धीमी रफ्तार से चला रहा था । परन्तु अभी तक किसी ने उससे लिफ्ट नहीं मांगी थी ।
समर को कनाट प्लेस के उन सभी ठिकानों की जानकारी थी जहाँ से वह अपने मतलब की चीज हासिल कर सकता था । यह उसके लिए कोई नई बात नहीं थी । बार-रेस्टोरेंट सूने पड़ते जा रहे थे ।
सूनसान फुटपाथ पर बस स्टॉप से दूर खड़ी हुई हसीन तितलियाँ स्पष्टतः किसी सवारी की तलाश में निगाहें दौड़ाती हुई नजर आ सकती हैं । इन्हीं में वह भी होती है जो वास्तव में अपना शिकार तलाश करती हैं और अपनी अदाओं से अपनी जवानी की अधिक से अधिक कीमत वसूलने का हुनर जानती हैं । वह जरूरतमंदों की जरूरत पूरी करके अपना रोजगार चलाती हैं ।
लेकिन यूँ लगता था जैसे उस जैसे जरूरतमंद सड़कों पर झाड़ू फेर गए थे । फुटपाथों से सारा कुछ समेटकर ले गए थे । एक घण्टे से अधिक बीत गया था । उसने उन सारी सड़कों के चक्कर लगा डाले थे, जहाँ से उसकी आवश्यकता पूरी हो सकती थी – लेकिन अभी तक काम नहीं बना था । अब उसके दिल में मायूसी घर करने लगी थी ।
वह ऐसे कई अड्डों के बारे में जानता था, जहाँ से उसकी जरूरत पूरी हो सकती थी, लेकिन बुरा हो विक्रांत का । वह बेहद सावधान रहने वाला आदमी था और उसके साथियों में से कोई ऐसे अड्डों पर जाने की जुर्रत नहीं कर सकता था । विक्रांत की तरफ से उन पर यह पाबन्दी थी और वह सब विक्रांत की पाबन्दी निभाते थे । उनमें से कोई बगावत की जुर्रत नहीं कर सकता था । विक्रांत ऐसा ही जालिम इंसान था कि वह उसकी अनुपस्थिति में उसकी कल्पना से भी कांपते थे । उन्हें यूँ लगता था जैसे विक्रांत की आँखें उनके अस्तित्व में पेवस्त हों । वह हर समय उन्हें देखता रहता हो और यह सच्चाई भी थी ।
समर एक पढ़ा-लिखा युवक था । परन्तु आज की दुनिया में डिग्री ही सबकुछ नहीं होती । अन्य बेरोजगारों की तरह वह भी घूमा करता था । वह जवानी की उस सीढ़ी पर पहुँच चुका था, जहाँ पहुँचने के बाद हर बेरोजगार को ताने सुनने पड़ते हैं – ‘सांड का सांड हो गया और घर में निठल्ला पड़ा है ।‘ लोगों के तानो की तो शायद वह परवाह भी न करता... परन्तु घर की हालत और बूढ़े माँ-बाप की गरीबी उससे देखी न गई और वह अपना गांव छोड़कर इस महानगर में चला आया – रोजगार तलाश करने । रोजगार चाहें कैसे भी क्यों न हो, उसे करना था ।
उसने शिक्षा के साथ-साथ खेतों में रहकर मशक्कत की थी । अतः उसका बदन स्वस्थ और हष्ट-पुष्ट था । कलाइयों में जान थी, लिहाज मजदूरी भी करता तो भी अन्य मजदूरों से अधिक कमा लेता । परन्तु मजदूरी से तो वह बस महानगर में जी भर सकता था । उन्हीं दिनों समर विक्रांत के एक आदमी मेहता के संपर्क में आया और तब से अब तक वह सिर्फ विक्रांत का आदमी था ।
आठ पेशेवर मुजरिमों का यह छोटा-सा गिरोह किराये पर काम करता था । काम विक्रांत जुटाता था और हर काम का उचित पारिश्रमिक मिलता । विक्रांत सिर्फ अपना कमीशन रखता था – इसके बावजूद वह सब विक्रांत के अधीन थे ।
जुर्म की दुनिया में आने के बाद समर ने खूब पैसा कमाया था । बॉस अब चौधरी कहलाता था । कच्चा घर पक्का मकान बन गया था और हर सुख-सुविधा उपलब्ध थी ।
समर अब महानगर की एक पास वाली कॉलोनी में रहता था । एक इमारत में उसका फ्लैट था, जो विक्रांत ने दिलवाया था । नई फिएट कार उसके पास थी और जिंदगी ऐशो-इशरत से कट रही थी ।
फुटपाथ से लगकर धीरे-धीरे कार चलाते-चलाते अचानक समर को फुटपाथ पर एक अँधेरे से कोने में किसी लड़की का साया नजर आया और उसने कार थोड़ा आगे बढ़ाकर ब्रेक लगा दिये ।
उस लड़की को देखते ही वह अतीत और वर्तमान की तमाम खयाली दुनिया से लौटकर यथार्थ की साक्षात् जमीन पर उतर आया था और इस जमीन पर उसे एक लड़की दिखाई दी । उसकी बांछें खिल गईं । उसे यह रात उदासी और तनहाई के आलम में नहीं काटनी पड़ेगी । लड़की चाहें जैसी भी हो....जवान होनी चाहिए । फिर सब चलेगा । यह सोचकर उसने हॉर्न दिया ।
फिर खिड़की से सिर बाहर निकालकर लड़की से संबोधित हुआ – कहाँ जाइयेगा ?
“जहाँ तक़दीर ले जायेगी ।” लड़की की आवाज साफ-सुरीली न थी, बल्कि उसमें एक अजीब सी खनक थी ।
उसका यह जवाब सुनकर समर होंठों ही होंठों में बड़बड़ाया, “जियो मेरी जान ।”
“तो फिर मेरी कार में आ जाओ....मैं तुम्हें तक़दीर के दरवाजे तक पहुँचा सकता हूँ ।”
लड़की इत्मीनान से अंदर बैठ गई ।
श्रेष्ठ कोटि के परफ्यूम की सुगन्ध समर के नथुनों में घुसने लगी और उसने सोचा लड़की की शक्ल सूरत जैसी भी हो, पर खुशदिल जरूर है । कार में अँधेरा था जिस कारण लड़की की सूरत पर भीना सा पर्दा पड़ा था ।
चंद क्षणों तक समर स्वयं पर काबू पाने की चेष्टा करता रहा, फिर भारी आवाज में बोला – “आपकी तलाश में बड़ी दिक्कतें उठानी पड़ी हैं । बारिश की वजह से बड़ी मुश्किल पेश आई ।”
लड़की ने कोई जवाब नहीं दिया । खामोश बैठी रही ।
“क्या नाम है आपका ?” समर ने पूछा ।
“रानी... ।”
समर को उसकी आवाज पसन्द नहीं आई । आवाज खुरदुरी और खनकी लिए हुए थी । वह गर्दन घुमाकर उसका चेहरा देखने की कोशिश करने लगा । अँधेरा होने के कारण कुछ साफ तो नजर नहीं आया, फिर भी जितना नजर आया था...वह आशाजनक ही था । उसने गहरी साँस ली और कार की रफ्तार बढ़ा दी ।
थोड़ी देर बाद कार उसके फ्लैट के पास पहुँच गई । पार्किंग लाट में कार पार्क करने के बाद उसने लड़की को उतरने का संकेत किया । लड़की सुकून के साथ उतर गई । दरवाजे लॉक करने के बाद समर उसके साथ आगे बढ़ गया । उसका फ्लैट तीसरी मंजिल पर था ।
सीढ़ियां चढ़ते हुए उसने कहा – “जरा खामोशी से । यह सभ्य लोगों का इलाका है और इन सभ्य लोगों को दूसरों की बहुत खोज रहती है ।
लड़की ने उसकी बात का कोई उत्तर नहीं दिया । वह खामोशी से समर के साथ सीढ़ियां चढ़ती हुई ऊपर आ गई । समर फ्लैट का दरवाजा खोलकर अंदर प्रविष्ट हो गया और फिर उसने दरवाजा अंदर से बन्द कर दिया । अंदर रोशनी करके उसने सबसे पहले लड़की का जायजा लिया । उसके होंठों पर शीघ्र ही मुस्कुराहट फैल गई ।
“बहुत खूबसूरत हो....कहाँ रहती हो ?”
उसके प्रश्न के जवाब में लड़की मुस्कराकर रह गई ।
“इतनी खामोश क्यों हो...कुछ तो बातें करो...मेरा नाम समर है ।”
“होगा, हमें क्या.... ।” उसने एक भौंडी अदा के साथ कहा ।
“गोया, तुम्हारी निगाह में मेरी कोई अहमियत नहीं है ।”
“हमारी निगाह कमजोर है ।” उसने दांतो में उँगली दबाकर कहा और समर ने दिल ही दिल में गाली बकी – “साली बड़ी पहुँची हुई मालूम होती है । हरकतें तो ऐसी ही हैं ।”
फिर वह उसे अंदर ले आया ।
“मैं वस्त्र बदल लूँ । तुम्हारे कपड़े भी भीगे हुए हैं । यूँ करो इन्हें उतारकर खुश्क होने के लिए डाल दो ।”
“हाय ! मैं मर जाऊँ.... देखो जी हमसे बेशर्मी की बातें मत करो । वह शरमाकर दोहरी हो गई ।
तुम्हारी मर्जी ! वैसे यह तो करना ही होगा । उसने कहा और दूसरे कमरे में वस्त्र बदलने चला गया ।
महीना भी सावन का था और दिन भी बरसात के थे । कभी धीमी....कभी तेज...कभी मूसलाधार वर्षा और कभी बादलों से ढकी रातें...यही सावन की एक और पहचान होती है, जिसे शब्दों में वर्णित नहीं किया जा सकता...बल्कि जिसे जवान दिल ही महसूस कर सकते हैं । अगर सावन के महीने में पहला-पहला प्यार हो जाये तो उसकी कसक सारी जिंदगी याद बनकर रह जाती है ।
महानगर दिल्ली का सबसे व्यस्ततम और खूबसूरत मार्केट कनॉट प्लेस भी इस समय धीमी-धीमी फुहार में नहा रहा था । चूंकि शाम ढल चुकी थी और रात का प्रथम प्रहर चल रहा था, इसलिए लोगों को घर लौटने की भागमभाग मची हुई थी । बसों, स्कूटरों और टैक्सियों की हलचल थी जो यहाँ का रोजमर्रा का जीवन है....परन्तु बरसात के कारण यह हलचल अन्य दिनों की अपेक्षा कुछ कम थी ।
समर जब होटल गेलार्ड से बाहर निकला तो दस बज रहे थे । उसके पांव लड़खड़ा रहे थे किन्तु वह इतना नशे में भी नहीं था कि अपने होश खो बैठे । चंद कदम चलने के बाद उसकी चाल में भी कुछ संतुलन आ गया था ।
वह धीरे-धीरे रीगल पार्किंग लाट की तरफ बढ़ रहा था, जहाँ उसकी नई फिएट खड़ी थी । बरसात की फुहार समर के दिल में तपी उमंगें जगा रही थी....और उसकी निगाहों में एक भूख सी जाग रही थी ।
रीगल पार्किंग से कार निकालने के बाद वह प्लाजा की तरफ बढ़ गया ।
बारिश के कारण अब फुटपाथों पर वीरानी सी फैलती जा रही थी और इस कारण समर को अपना शिकार तलाश करने में थोड़ी मुश्किल पेश आ रही थी । वह कार बेहद धीमी रफ्तार से चला रहा था । परन्तु अभी तक किसी ने उससे लिफ्ट नहीं मांगी थी ।
समर को कनाट प्लेस के उन सभी ठिकानों की जानकारी थी जहाँ से वह अपने मतलब की चीज हासिल कर सकता था । यह उसके लिए कोई नई बात नहीं थी । बार-रेस्टोरेंट सूने पड़ते जा रहे थे ।
सूनसान फुटपाथ पर बस स्टॉप से दूर खड़ी हुई हसीन तितलियाँ स्पष्टतः किसी सवारी की तलाश में निगाहें दौड़ाती हुई नजर आ सकती हैं । इन्हीं में वह भी होती है जो वास्तव में अपना शिकार तलाश करती हैं और अपनी अदाओं से अपनी जवानी की अधिक से अधिक कीमत वसूलने का हुनर जानती हैं । वह जरूरतमंदों की जरूरत पूरी करके अपना रोजगार चलाती हैं ।
लेकिन यूँ लगता था जैसे उस जैसे जरूरतमंद सड़कों पर झाड़ू फेर गए थे । फुटपाथों से सारा कुछ समेटकर ले गए थे । एक घण्टे से अधिक बीत गया था । उसने उन सारी सड़कों के चक्कर लगा डाले थे, जहाँ से उसकी आवश्यकता पूरी हो सकती थी – लेकिन अभी तक काम नहीं बना था । अब उसके दिल में मायूसी घर करने लगी थी ।
वह ऐसे कई अड्डों के बारे में जानता था, जहाँ से उसकी जरूरत पूरी हो सकती थी, लेकिन बुरा हो विक्रांत का । वह बेहद सावधान रहने वाला आदमी था और उसके साथियों में से कोई ऐसे अड्डों पर जाने की जुर्रत नहीं कर सकता था । विक्रांत की तरफ से उन पर यह पाबन्दी थी और वह सब विक्रांत की पाबन्दी निभाते थे । उनमें से कोई बगावत की जुर्रत नहीं कर सकता था । विक्रांत ऐसा ही जालिम इंसान था कि वह उसकी अनुपस्थिति में उसकी कल्पना से भी कांपते थे । उन्हें यूँ लगता था जैसे विक्रांत की आँखें उनके अस्तित्व में पेवस्त हों । वह हर समय उन्हें देखता रहता हो और यह सच्चाई भी थी ।
समर एक पढ़ा-लिखा युवक था । परन्तु आज की दुनिया में डिग्री ही सबकुछ नहीं होती । अन्य बेरोजगारों की तरह वह भी घूमा करता था । वह जवानी की उस सीढ़ी पर पहुँच चुका था, जहाँ पहुँचने के बाद हर बेरोजगार को ताने सुनने पड़ते हैं – ‘सांड का सांड हो गया और घर में निठल्ला पड़ा है ।‘ लोगों के तानो की तो शायद वह परवाह भी न करता... परन्तु घर की हालत और बूढ़े माँ-बाप की गरीबी उससे देखी न गई और वह अपना गांव छोड़कर इस महानगर में चला आया – रोजगार तलाश करने । रोजगार चाहें कैसे भी क्यों न हो, उसे करना था ।
उसने शिक्षा के साथ-साथ खेतों में रहकर मशक्कत की थी । अतः उसका बदन स्वस्थ और हष्ट-पुष्ट था । कलाइयों में जान थी, लिहाज मजदूरी भी करता तो भी अन्य मजदूरों से अधिक कमा लेता । परन्तु मजदूरी से तो वह बस महानगर में जी भर सकता था । उन्हीं दिनों समर विक्रांत के एक आदमी मेहता के संपर्क में आया और तब से अब तक वह सिर्फ विक्रांत का आदमी था ।
आठ पेशेवर मुजरिमों का यह छोटा-सा गिरोह किराये पर काम करता था । काम विक्रांत जुटाता था और हर काम का उचित पारिश्रमिक मिलता । विक्रांत सिर्फ अपना कमीशन रखता था – इसके बावजूद वह सब विक्रांत के अधीन थे ।
जुर्म की दुनिया में आने के बाद समर ने खूब पैसा कमाया था । बॉस अब चौधरी कहलाता था । कच्चा घर पक्का मकान बन गया था और हर सुख-सुविधा उपलब्ध थी ।
समर अब महानगर की एक पास वाली कॉलोनी में रहता था । एक इमारत में उसका फ्लैट था, जो विक्रांत ने दिलवाया था । नई फिएट कार उसके पास थी और जिंदगी ऐशो-इशरत से कट रही थी ।
फुटपाथ से लगकर धीरे-धीरे कार चलाते-चलाते अचानक समर को फुटपाथ पर एक अँधेरे से कोने में किसी लड़की का साया नजर आया और उसने कार थोड़ा आगे बढ़ाकर ब्रेक लगा दिये ।
उस लड़की को देखते ही वह अतीत और वर्तमान की तमाम खयाली दुनिया से लौटकर यथार्थ की साक्षात् जमीन पर उतर आया था और इस जमीन पर उसे एक लड़की दिखाई दी । उसकी बांछें खिल गईं । उसे यह रात उदासी और तनहाई के आलम में नहीं काटनी पड़ेगी । लड़की चाहें जैसी भी हो....जवान होनी चाहिए । फिर सब चलेगा । यह सोचकर उसने हॉर्न दिया ।
फिर खिड़की से सिर बाहर निकालकर लड़की से संबोधित हुआ – कहाँ जाइयेगा ?
“जहाँ तक़दीर ले जायेगी ।” लड़की की आवाज साफ-सुरीली न थी, बल्कि उसमें एक अजीब सी खनक थी ।
उसका यह जवाब सुनकर समर होंठों ही होंठों में बड़बड़ाया, “जियो मेरी जान ।”
“तो फिर मेरी कार में आ जाओ....मैं तुम्हें तक़दीर के दरवाजे तक पहुँचा सकता हूँ ।”
लड़की इत्मीनान से अंदर बैठ गई ।
श्रेष्ठ कोटि के परफ्यूम की सुगन्ध समर के नथुनों में घुसने लगी और उसने सोचा लड़की की शक्ल सूरत जैसी भी हो, पर खुशदिल जरूर है । कार में अँधेरा था जिस कारण लड़की की सूरत पर भीना सा पर्दा पड़ा था ।
चंद क्षणों तक समर स्वयं पर काबू पाने की चेष्टा करता रहा, फिर भारी आवाज में बोला – “आपकी तलाश में बड़ी दिक्कतें उठानी पड़ी हैं । बारिश की वजह से बड़ी मुश्किल पेश आई ।”
लड़की ने कोई जवाब नहीं दिया । खामोश बैठी रही ।
“क्या नाम है आपका ?” समर ने पूछा ।
“रानी... ।”
समर को उसकी आवाज पसन्द नहीं आई । आवाज खुरदुरी और खनकी लिए हुए थी । वह गर्दन घुमाकर उसका चेहरा देखने की कोशिश करने लगा । अँधेरा होने के कारण कुछ साफ तो नजर नहीं आया, फिर भी जितना नजर आया था...वह आशाजनक ही था । उसने गहरी साँस ली और कार की रफ्तार बढ़ा दी ।
थोड़ी देर बाद कार उसके फ्लैट के पास पहुँच गई । पार्किंग लाट में कार पार्क करने के बाद उसने लड़की को उतरने का संकेत किया । लड़की सुकून के साथ उतर गई । दरवाजे लॉक करने के बाद समर उसके साथ आगे बढ़ गया । उसका फ्लैट तीसरी मंजिल पर था ।
सीढ़ियां चढ़ते हुए उसने कहा – “जरा खामोशी से । यह सभ्य लोगों का इलाका है और इन सभ्य लोगों को दूसरों की बहुत खोज रहती है ।
लड़की ने उसकी बात का कोई उत्तर नहीं दिया । वह खामोशी से समर के साथ सीढ़ियां चढ़ती हुई ऊपर आ गई । समर फ्लैट का दरवाजा खोलकर अंदर प्रविष्ट हो गया और फिर उसने दरवाजा अंदर से बन्द कर दिया । अंदर रोशनी करके उसने सबसे पहले लड़की का जायजा लिया । उसके होंठों पर शीघ्र ही मुस्कुराहट फैल गई ।
“बहुत खूबसूरत हो....कहाँ रहती हो ?”
उसके प्रश्न के जवाब में लड़की मुस्कराकर रह गई ।
“इतनी खामोश क्यों हो...कुछ तो बातें करो...मेरा नाम समर है ।”
“होगा, हमें क्या.... ।” उसने एक भौंडी अदा के साथ कहा ।
“गोया, तुम्हारी निगाह में मेरी कोई अहमियत नहीं है ।”
“हमारी निगाह कमजोर है ।” उसने दांतो में उँगली दबाकर कहा और समर ने दिल ही दिल में गाली बकी – “साली बड़ी पहुँची हुई मालूम होती है । हरकतें तो ऐसी ही हैं ।”
फिर वह उसे अंदर ले आया ।
“मैं वस्त्र बदल लूँ । तुम्हारे कपड़े भी भीगे हुए हैं । यूँ करो इन्हें उतारकर खुश्क होने के लिए डाल दो ।”
“हाय ! मैं मर जाऊँ.... देखो जी हमसे बेशर्मी की बातें मत करो । वह शरमाकर दोहरी हो गई ।
तुम्हारी मर्जी ! वैसे यह तो करना ही होगा । उसने कहा और दूसरे कमरे में वस्त्र बदलने चला गया ।