• Hello Friends You can Register on the Forum and by posting you can earn money too.

वक्त की धूल

S

StoryPublisher

Guest
वक्त की धूल

महीना भी सावन का था और दिन भी बरसात के थे । कभी धीमी....कभी तेज...कभी मूसलाधार वर्षा और कभी बादलों से ढकी रातें...यही सावन की एक और पहचान होती है, जिसे शब्दों में वर्णित नहीं किया जा सकता...बल्कि जिसे जवान दिल ही महसूस कर सकते हैं । अगर सावन के महीने में पहला-पहला प्यार हो जाये तो उसकी कसक सारी जिंदगी याद बनकर रह जाती है ।

महानगर दिल्ली का सबसे व्यस्ततम और खूबसूरत मार्केट कनॉट प्लेस भी इस समय धीमी-धीमी फुहार में नहा रहा था । चूंकि शाम ढल चुकी थी और रात का प्रथम प्रहर चल रहा था, इसलिए लोगों को घर लौटने की भागमभाग मची हुई थी । बसों, स्कूटरों और टैक्सियों की हलचल थी जो यहाँ का रोजमर्रा का जीवन है....परन्तु बरसात के कारण यह हलचल अन्य दिनों की अपेक्षा कुछ कम थी ।

समर जब होटल गेलार्ड से बाहर निकला तो दस बज रहे थे । उसके पांव लड़खड़ा रहे थे किन्तु वह इतना नशे में भी नहीं था कि अपने होश खो बैठे । चंद कदम चलने के बाद उसकी चाल में भी कुछ संतुलन आ गया था ।

वह धीरे-धीरे रीगल पार्किंग लाट की तरफ बढ़ रहा था, जहाँ उसकी नई फिएट खड़ी थी । बरसात की फुहार समर के दिल में तपी उमंगें जगा रही थी....और उसकी निगाहों में एक भूख सी जाग रही थी ।

रीगल पार्किंग से कार निकालने के बाद वह प्लाजा की तरफ बढ़ गया ।

बारिश के कारण अब फुटपाथों पर वीरानी सी फैलती जा रही थी और इस कारण समर को अपना शिकार तलाश करने में थोड़ी मुश्किल पेश आ रही थी । वह कार बेहद धीमी रफ्तार से चला रहा था । परन्तु अभी तक किसी ने उससे लिफ्ट नहीं मांगी थी ।

समर को कनाट प्लेस के उन सभी ठिकानों की जानकारी थी जहाँ से वह अपने मतलब की चीज हासिल कर सकता था । यह उसके लिए कोई नई बात नहीं थी । बार-रेस्टोरेंट सूने पड़ते जा रहे थे ।

सूनसान फुटपाथ पर बस स्टॉप से दूर खड़ी हुई हसीन तितलियाँ स्पष्टतः किसी सवारी की तलाश में निगाहें दौड़ाती हुई नजर आ सकती हैं । इन्हीं में वह भी होती है जो वास्तव में अपना शिकार तलाश करती हैं और अपनी अदाओं से अपनी जवानी की अधिक से अधिक कीमत वसूलने का हुनर जानती हैं । वह जरूरतमंदों की जरूरत पूरी करके अपना रोजगार चलाती हैं ।

लेकिन यूँ लगता था जैसे उस जैसे जरूरतमंद सड़कों पर झाड़ू फेर गए थे । फुटपाथों से सारा कुछ समेटकर ले गए थे । एक घण्टे से अधिक बीत गया था । उसने उन सारी सड़कों के चक्कर लगा डाले थे, जहाँ से उसकी आवश्यकता पूरी हो सकती थी – लेकिन अभी तक काम नहीं बना था । अब उसके दिल में मायूसी घर करने लगी थी ।

वह ऐसे कई अड्डों के बारे में जानता था, जहाँ से उसकी जरूरत पूरी हो सकती थी, लेकिन बुरा हो विक्रांत का । वह बेहद सावधान रहने वाला आदमी था और उसके साथियों में से कोई ऐसे अड्डों पर जाने की जुर्रत नहीं कर सकता था । विक्रांत की तरफ से उन पर यह पाबन्दी थी और वह सब विक्रांत की पाबन्दी निभाते थे । उनमें से कोई बगावत की जुर्रत नहीं कर सकता था । विक्रांत ऐसा ही जालिम इंसान था कि वह उसकी अनुपस्थिति में उसकी कल्पना से भी कांपते थे । उन्हें यूँ लगता था जैसे विक्रांत की आँखें उनके अस्तित्व में पेवस्त हों । वह हर समय उन्हें देखता रहता हो और यह सच्चाई भी थी ।

समर एक पढ़ा-लिखा युवक था । परन्तु आज की दुनिया में डिग्री ही सबकुछ नहीं होती । अन्य बेरोजगारों की तरह वह भी घूमा करता था । वह जवानी की उस सीढ़ी पर पहुँच चुका था, जहाँ पहुँचने के बाद हर बेरोजगार को ताने सुनने पड़ते हैं – ‘सांड का सांड हो गया और घर में निठल्ला पड़ा है ।‘ लोगों के तानो की तो शायद वह परवाह भी न करता... परन्तु घर की हालत और बूढ़े माँ-बाप की गरीबी उससे देखी न गई और वह अपना गांव छोड़कर इस महानगर में चला आया – रोजगार तलाश करने । रोजगार चाहें कैसे भी क्यों न हो, उसे करना था ।

उसने शिक्षा के साथ-साथ खेतों में रहकर मशक्कत की थी । अतः उसका बदन स्वस्थ और हष्ट-पुष्ट था । कलाइयों में जान थी, लिहाज मजदूरी भी करता तो भी अन्य मजदूरों से अधिक कमा लेता । परन्तु मजदूरी से तो वह बस महानगर में जी भर सकता था । उन्हीं दिनों समर विक्रांत के एक आदमी मेहता के संपर्क में आया और तब से अब तक वह सिर्फ विक्रांत का आदमी था ।

आठ पेशेवर मुजरिमों का यह छोटा-सा गिरोह किराये पर काम करता था । काम विक्रांत जुटाता था और हर काम का उचित पारिश्रमिक मिलता । विक्रांत सिर्फ अपना कमीशन रखता था – इसके बावजूद वह सब विक्रांत के अधीन थे ।

जुर्म की दुनिया में आने के बाद समर ने खूब पैसा कमाया था । बॉस अब चौधरी कहलाता था । कच्चा घर पक्का मकान बन गया था और हर सुख-सुविधा उपलब्ध थी ।

समर अब महानगर की एक पास वाली कॉलोनी में रहता था । एक इमारत में उसका फ्लैट था, जो विक्रांत ने दिलवाया था । नई फिएट कार उसके पास थी और जिंदगी ऐशो-इशरत से कट रही थी ।

फुटपाथ से लगकर धीरे-धीरे कार चलाते-चलाते अचानक समर को फुटपाथ पर एक अँधेरे से कोने में किसी लड़की का साया नजर आया और उसने कार थोड़ा आगे बढ़ाकर ब्रेक लगा दिये ।

उस लड़की को देखते ही वह अतीत और वर्तमान की तमाम खयाली दुनिया से लौटकर यथार्थ की साक्षात् जमीन पर उतर आया था और इस जमीन पर उसे एक लड़की दिखाई दी । उसकी बांछें खिल गईं । उसे यह रात उदासी और तनहाई के आलम में नहीं काटनी पड़ेगी । लड़की चाहें जैसी भी हो....जवान होनी चाहिए । फिर सब चलेगा । यह सोचकर उसने हॉर्न दिया ।

फिर खिड़की से सिर बाहर निकालकर लड़की से संबोधित हुआ – कहाँ जाइयेगा ?

“जहाँ तक़दीर ले जायेगी ।” लड़की की आवाज साफ-सुरीली न थी, बल्कि उसमें एक अजीब सी खनक थी ।

उसका यह जवाब सुनकर समर होंठों ही होंठों में बड़बड़ाया, “जियो मेरी जान ।”

“तो फिर मेरी कार में आ जाओ....मैं तुम्हें तक़दीर के दरवाजे तक पहुँचा सकता हूँ ।”

लड़की इत्मीनान से अंदर बैठ गई ।

श्रेष्ठ कोटि के परफ्यूम की सुगन्ध समर के नथुनों में घुसने लगी और उसने सोचा लड़की की शक्ल सूरत जैसी भी हो, पर खुशदिल जरूर है । कार में अँधेरा था जिस कारण लड़की की सूरत पर भीना सा पर्दा पड़ा था ।

चंद क्षणों तक समर स्वयं पर काबू पाने की चेष्टा करता रहा, फिर भारी आवाज में बोला – “आपकी तलाश में बड़ी दिक्कतें उठानी पड़ी हैं । बारिश की वजह से बड़ी मुश्किल पेश आई ।”

लड़की ने कोई जवाब नहीं दिया । खामोश बैठी रही ।

“क्या नाम है आपका ?” समर ने पूछा ।

“रानी... ।”

समर को उसकी आवाज पसन्द नहीं आई । आवाज खुरदुरी और खनकी लिए हुए थी । वह गर्दन घुमाकर उसका चेहरा देखने की कोशिश करने लगा । अँधेरा होने के कारण कुछ साफ तो नजर नहीं आया, फिर भी जितना नजर आया था...वह आशाजनक ही था । उसने गहरी साँस ली और कार की रफ्तार बढ़ा दी ।

थोड़ी देर बाद कार उसके फ्लैट के पास पहुँच गई । पार्किंग लाट में कार पार्क करने के बाद उसने लड़की को उतरने का संकेत किया । लड़की सुकून के साथ उतर गई । दरवाजे लॉक करने के बाद समर उसके साथ आगे बढ़ गया । उसका फ्लैट तीसरी मंजिल पर था ।

सीढ़ियां चढ़ते हुए उसने कहा – “जरा खामोशी से । यह सभ्य लोगों का इलाका है और इन सभ्य लोगों को दूसरों की बहुत खोज रहती है ।

लड़की ने उसकी बात का कोई उत्तर नहीं दिया । वह खामोशी से समर के साथ सीढ़ियां चढ़ती हुई ऊपर आ गई । समर फ्लैट का दरवाजा खोलकर अंदर प्रविष्ट हो गया और फिर उसने दरवाजा अंदर से बन्द कर दिया । अंदर रोशनी करके उसने सबसे पहले लड़की का जायजा लिया । उसके होंठों पर शीघ्र ही मुस्कुराहट फैल गई ।

“बहुत खूबसूरत हो....कहाँ रहती हो ?”

उसके प्रश्न के जवाब में लड़की मुस्कराकर रह गई ।

“इतनी खामोश क्यों हो...कुछ तो बातें करो...मेरा नाम समर है ।”

“होगा, हमें क्या.... ।” उसने एक भौंडी अदा के साथ कहा ।

“गोया, तुम्हारी निगाह में मेरी कोई अहमियत नहीं है ।”

“हमारी निगाह कमजोर है ।” उसने दांतो में उँगली दबाकर कहा और समर ने दिल ही दिल में गाली बकी – “साली बड़ी पहुँची हुई मालूम होती है । हरकतें तो ऐसी ही हैं ।”

फिर वह उसे अंदर ले आया ।

“मैं वस्त्र बदल लूँ । तुम्हारे कपड़े भी भीगे हुए हैं । यूँ करो इन्हें उतारकर खुश्क होने के लिए डाल दो ।”

“हाय ! मैं मर जाऊँ.... देखो जी हमसे बेशर्मी की बातें मत करो । वह शरमाकर दोहरी हो गई ।

तुम्हारी मर्जी ! वैसे यह तो करना ही होगा । उसने कहा और दूसरे कमरे में वस्त्र बदलने चला गया ।
 
लड़की की शक्लो-सूरत अच्छी ही थी, लेकिन उसकी आवाज में नारी आकर्षण नहीं था और अदाओं में सख्त भौड़ापन था । खैर ! उसने गहरी साँस लेकर सोचा – बारिश की इस सावनी रात में जो कुछ मिल गया वही गनीमत है ।

वस्त्र बदलकर वह वापस उसके पास आ गया । लड़की एक सोफे पर बैठी उँगलियाँ मरोड़ रही थी । समर को देखकर उसने गर्दन झुका ली ।

हाँ तो जानेमन ! क्या सेवा की जाये आपकी ? समर ने पूछा ।

“हम भूखे हैं ।” उसने कहा ।

“प्यार की.... ?” समर ने सवाल किया ।

“नहीं जी – प्यार भी कोई खाने की चीज होती है । तुम्हारे किचन में कुछ तो होगा ।”

“हाँ है...जाओ फ्रिज से निकालकर खा लो, जल्दी करो ।” समर ने किसी कदर बोर होकर कहा ।

और लड़की शर्माती हुई कमरे से बाहर निकल गई । समर की विचित्र सी हालत हो गई थी । वह सोफे पर अधलेटा होकर रानी के लौटने की प्रतीक्षा करने लगा । थोड़ी देर बाद वह वापिस आ गई ।

“खा लिया ?”

“हाँ, मगर तुम्हारे फ्रिज में शराब की बोतल रखी हुई है ।”

“पियोगी ?” समर ने पूछा ।

“हाय दैया....जहर होती है शराब तो.... ।शर्म नहीं आती कहते हुए ।”

“क्या बेकार की बातें करती हो...बारिश के इस मौसम में नशा अमृत होता है, पीती तो जरूर होगी ।”

“तुम...तुम मुझे अच्छे आदमी मालूम नहीं होते । कुंआरी लड़कियों से ऐसी गंदी गंदी बातें कह रहे हो...कुछ तो शर्म करो ।”

“लड़की, मैं तुम्हारी इन व्यर्थ की बातों से बहुत बोर हो रहा हूँ ।”

“मुझे मेरे घर पहुँचा दो ।” वह अचानक बोली ।

“दिमाग खराब हुआ है तुम्हारा... ?” समर आँखें निकालकर बोला ।

“अरे मेरी माँ....डांट रहे हो... ।” वह भयभीत स्वर में बोली ।

“कैसे घटिया वाक्य बोलती हो...इससे तो बेहतर है तुम खामोश रहो । आओ बेडरूम में चलें ।”

“क्यों...वहाँ जाकर क्या करेंगे ?” वह मासूमियत से बोली और समर होंठ भींचकर उसे घूरने लगा ।

“लड़की... मैं शरीफ आदमी नहीं हूँ...यह बात तुम भी अच्छी तरह समझ गई होगी । बस व्यर्थ की बकवास मत करो, आज भाग्य ही खराब था ।” उसने कहा ।

“मैं घर जाऊँगी ।” उसने भयभीत स्वर में कहा और समर को सचमुच क्रोध आ गया ।

“तुम फ्रॉड लड़की हो...मुझसे फ्रॉड करने आई थी ।”

“घर जाऊंगी...हे भगवान....मैं घर जाऊंगी । हाय मुझे जाने दो ।” उसने नथुने फुलाए और समर उछलकर खड़ा हो गया ।

“जिन्दा नहीं जाओगी...समझी...तुम मुझे जानती हो....चलो बेडरूम में चलो... ।”

“अरी मेरी मैया...बचाओ... ।” लड़की ने डरे-डरे स्वर में कहा और दूसरे ही पल वह उछलकर दरवाजे की तरफ भागी तथा छपाक से दरवाजा खोलकर बाहर निकल गई ।

समर को इस अनोखी घटना का गुमान भी नहीं था । बारिश की एक अँधेरी रात में वह अकेली फुटपाथ पर खड़ी थी और समर के सवाल के जवाब में उसने ऐसी बात कही थी जो आमतौर से प्रोफेशनल लड़कियां कहती हैं । फिर यह सब कुछ क्यों... ? इससे पूर्व उसने खाना बनाया था । समर को ऐसी फ्रॉड लड़कियों की कहानियाँ भी याद थीं जो इस तरह लोगों को मूर्ख बनाती है । यह भी शायद ऐसी ही लड़कियों में से है ।

लेकिन उसे भी चढ़ी हुई थी इसलिए वह उसके पीछे लपका । लड़की जोर-जोर से चीखने लगी ।

“अरे शरीफ लोगों....बचाओ...हाय दैया मैं मरी बचाओ रे कोई.... ।”

रास्ते में समर ने ठोकर खाई और गिरते गिरते बचा ।

बस इस दौरान लड़की ने दरवाजा खोल लिया था । समर ने उसे पकड़ने की कोशिश की और लड़की की कमीज की आस्तीन उसके हाथ में आ गई ।

“हाये...हाये...मर गई...बचाओ...बचाओ... !” वह मुँह फाड़ फाड़कर चीखने लगी ।

“सुअर की बच्ची...आवाज बन्द कर ! मैं तेरी गर्दन दबा दूँगा ।”

“हाये गर्दन दबायेगा... । अरे सब मर गए क्या... ? मुझे बचाओ.... ।” वह दरवाजे के सामने जमीन पर बैठ गई ।

निकटवर्ती फ्लैटों की रोशनियाँ जलने लगी थीं । समर ने मुड़कर उसे उठाने की कोशिश की और पहली बार बौखलाहट का शिकार हो गया । लड़की को वह उसकी जगह से हिला भी न पाया था ।

इसी चीख पुकार के परिणामस्वरूप सामने के फ्लैट से दो आदमी निकल आये । ऊपर के फ्लैटों की सीढ़ियों पर भी दौड़ते हुए कदमों की आवाजें सुनाई दे रही थीं ।

समर बुरी तरह बौखला गया था । वह अब भी लड़की की बगलों में हाथ डालकर उठाने की कोशिश कर रहा था और वह जोर-जोर से चीख रही थी । लेकिन समर अपनी तमाम शक्ति लगाने के बावजूद भी उसे हिला नहीं सका था ।

“क्या हो रहा है यह ?” एक साहब दहाड़े ।

“जुल्म हो रहा है...अन्याय हो रहा है...एक मजबूर और बेबस लड़की की आबरू लुट रही है । देखते रहो नेकदिल इंसानों । बस यूँ ही खड़े-खड़े तमाशा देखते रहो ।” लड़की आँसू बहाती हुई बोली ।

“छोड़ दो...मैं कहता हूँ...छोड़ दो इसे....वरना अच्छा न होगा ।” चंद लोग आगे बढ़ गए ।

“तुम लोग अपने घरों में दफा हो जाओ ।” समर गुर्राया ।

“अरे तेरी ऐसी की तैसी....क्या समझता है खुद को ।” एक बुजुर्ग को जोश आ गया । उन्होंने आगे बढ़कर समर का गिरेबान पकड़ लिया और समर को एकदम होश आ गया । उसने खुद को सम्भाल लिया । यह लोग उसकी हैसियत से वाकिफ नहीं थे और विक्रांत यह बात कभी पसन्द नहीं करेगा कि लोग उसके साथियों की हैसियत से वाकिफ हो जाएँ ।

वह बौखलाए अंदाज में सीधा हो गया ।

“कौन है यह लड़की ?”

“सताई हुई हूँ...दुखिया हूँ...सड़क से उठाई गई हूँ ।”

“झूठ-झूठ बोल रही है यह ।” समर फूले हुए साँस के साथ बोला ।

“फिर कौन है यह ? तुम्हारी बहन है ?” एक नौजवान बोला ।

“बकवास मत करो ।” समर की आँखों में खून उतर आया ।

“हाय भैया ! बचाओ....मेरी आबरू बचाओ...मैं तुम्हारी बहन हूँ ।” लड़की हिचकियाँ ले लेकर रो रही थी ।

“पुलिस को बुलाओ जी....यह शरीफों का मोहल्ला है...हम अपने मोहल्ले में ऐसे गंदे तत्वों को नहीं रहने दे सकते । पुलिस को बुलाओ ।”

“हाँ खन्ना साहब...मैं तो पहले ही कहता था कि यह संदिग्ध आदमी है ।”

“यह इस फ्लैट में नहीं रहेगा ।”

“फैसला होकर रहेगा ।” आवाजें उभरीं । इन आवाजों में लड़की के रोने की आवाज भी शामिल थी ।

समर की बुरी हालत हो गई थी । इन लोगों की तो उसे कोई परवाह भी नहीं थी । अभी चाकू निकाल लाता तो सब घर में घुस जाते....लेकिन इन हालात के बाद विक्रांत जो हाल करेगा, उससे उसकी जान निकल रही थी । अतः उसके तमाम कस-बल निकल गए ।

“आप लोग मेरी बात तो सुनें...यह लड़की आवारा है । सड़क पर खड़ी थी । मुझे इशारे से रोका । मैंने यह समझकर कार रोक ली कि बारिश हो रही है, सम्भव है इसे कहीं जाना हो । कहने लगी, मुझे एक रात के लिए शरण दे दो...मैं दुखिया हूँ, सुबह को चली जाऊँगी और अब यहाँ आकर यह शोर मचा रही है – आप ऐसी लड़कियों के बारे में नहीं जानते, यह.... ।”

“झूठा है...अरे झूठा है । मुझे शराब पिला रहा था । मुँह सूंघ कर देख लो...यह शराब पिए हुए हैं ।”
 
“हम जानते हैं बेबी, मगर तुम इसके हाथ कैसे लग गई ?” एक बुजुर्ग ने पूछा ।

“घर जा रही थी – डैडी बीमार हैं....कोई सवारी नहीं मिल रही थी । यह कहने लगा – आओ मैं छोड़ दूँ और ज्यूँ ही मैं कार में बैठी...मेरी नाक पर रुमाल रखकर इसने मुझे जाने कैसे बेहोश कर दिया । होश आया तो....हाय मेरे भगवान...यह...यह ।” लड़की शर्म की वजह से वाक्य पूरा न कर सकी ।

“अब बोलो ।” वही बुजुर्ग बोले, जिन्होंने समर के गिरेबान पकड़ा था ।

“जो मुझे कहना था, कह दिया – अब आप लोग जाएँ ।”

“अरे तुम खड़े-खड़े क्या मुँह ताक रहे हो सुभाष ! जाओ, जाकर कोई टैक्सी ले आओ...या कोई ऑटो-रिक्शा मिल जाये तो उसे ही ले आना । जो मांगे दे देना । यह बच्ची अपने घर जाये और इस बदमाश से तो हम अच्छी तरह निपट लेंगे । ऐसे लोगों को इस इमारत में नहीं रहने दिया जायेगा ।”

सुभाष सवारी लेने चला गया ।

“बस खन्ना साहब । कल छुट्टी कर लो दफ्तर से...यह फ्लैट खाली होगा और नहीं होगा तो हम पुलिस स्टेशन चलेंगे ।

समर झुंझलाए हुए अंदाज में फ्लैट के अंदर चला गया और बाहर चेमोगोइयां होती रहीं । उसने दरवाजा बन्द कर दिया ।

इस हादसे ने उसके होश उड़ा दिए । जो कुछ हुआ, उसकी तो वह कल्पना भी नहीं कर सकता था । अब उसके बदन में सनसनी हो रही थी । विक्रांत को जवाबदेही मुश्किल हो जायेगी...और सुबह, सचमुच पुलिस आ गई तो... ?

उसके शरीर से पसीना छूटने लगा । उसके बाद तो विक्रांत जिन्दा नहीं छोड़ेगा । उसका कठोरता से निर्देश था कि पुलिस के साये से भी बचो । अगर कोई व्यक्ति किसी तरह पुलिस की दृष्टि में आ जाये तो फिर वह विक्रांत के काम का नहीं रहता ।

क्या किया जाये ? वह दरवाजे के पास खड़ा हो गया ।

बाहर की आवाजें धीरे-धीरे बन्द होती जा रही थीं । लड़की को भिजवा दिया गया था । समर न जाने कितनी देर वहाँ खड़ा रहा और फिर जब बिल्कुल खामोशी छा गई तो वह वहाँ से हट आया । सारा सरूर समाप्त हो गया । सावन की इस रात की मादकता काफूर बनकर उड़ गई ।

मोहल्ले वाले जरूर गड़बड़ करेंगे । यह बात अब दब नहीं सकती । जरा सी गलती से कैसे बात बिगड़ गई । अब क्या होगा ? वह परेशानी से बैठा सोचता रहा । अगर बात पुलिस तक पहुँच गई तो न जाने क्या होगा ? सम्भव है उसका मस्तिष्क भी फिर जाये और कोई उसके हाथों मारा जाये । इस तरह सारा खेल बिगड़ जायेगा ।

और फिर इस सारी मुसीबत से बचने की एक तरकीब समझ में आई । वह अपनी जगह से उठा । ऐसी सभी चीजें जो पुलिस को उसके सम्बन्ध में संदिग्ध कर सकती थीं...समेटकर एक बैग में रखीं – इसके अलावा अपने चंद जोड़ी कपड़े लिए – शराब की बोतलें भी बैग में रखीं और कैश भी – उसके बाद वह फ्लैट के दरवाजे के पास आ गया । चंद क्षण बाहर की आहटें सुनता रहा और फिर धीरे से दरवाजा खोलकर बाहर आ गया ।

सीढ़ियां उतरते हुए भी उसने अत्यधिक सावधानी से काम लिया । न जाने किस तरह कार तक आया और दरवाजा खोलकर अंदर बैठ गया । दूसरे ही क्षण उसने कार स्टार्ट करके आगे बढ़ा दी ।

सर्द बारिश भरी रात के इस असमय में उसने दिलीप के फ्लैट की कॉलबेल पर उँगली रखी और उस समय तक उसे दबाये रखा, जब तक अंदर से दिलीप की गुर्राहट नहीं सुनाई दी ।

“कौन मूर्ख है...दिमाग खराब हो गया है क्या... ?” इसके साथ ही दरवाजा खुल गया ।

दिलीप के चेहरे पर अत्यधिक क्रोध के भाव थे । वह गहरी नींद से जागकर आया था ।

“सॉरी दिलीप ! मुझे एहसास है ।” उसने कहा ।

“तुम...खैरियत तो है ?”

“कोई खतरे की बात नहीं...मगर खैरियत भी नहीं ।” वह अंदर प्रविष्ट हो गया । फिर शीघ्रता से बोला – “कोई अंदर तो नहीं है ?”

“नहीं, क्या बजा है ?” दिलीप ने जम्हाई लेकर कहा ।

“पता नहीं यार ! मुझे अंदाजा नहीं है । जरूरत ही ऐसी आ पड़ी थी, वरना तुम्हें इस समय कष्ट न देता ।”

“सोते से जागा हूँ – कोई ऐसी वैसी बात मुँह से निकल गई हो तो बुरा मत मानना । मैं जानता हूँ कि तुम अकारण नहीं आये होगे । चलो, अंदर बैठो । चाय बनाकर लाता हूँ ।” दिलीप ने कहा और समर अंदर चला गया ।

दिलीप के शयनकक्ष में जाकर उसने जूते उतारे और सोफे पर लम्बा हो गया । अब भी उसके चेहरे पर उलझन के भाव थे । दिलीप शायद बाथरूम में मुँह हाथ धो रहा था ।

गिरोह के सभी सदस्यों की आर्थिक स्थिति अच्छी थी । वह उच्च कोटि के होटलों में जा सकते थे । जिंदगी के सभी ऐश्वर्यों में भाग ले सकते थे...लेकिन इसके साथ चंद पाबन्दियाँ भी थीं....जैसे वह घरों में कोई नौकर नहीं रख सकते थे । अपने किसी प्रियजन को घर में साथ नहीं रख सकते थे और उन्हें निर्देश था कि जिस जगह उनका निवास स्थान हो, वहाँ कोई असभ्यता न की जाये । पड़ोसियों से कोई संपर्क न रखा जाये ।

यह समस्या ही ऐसी थी जिसने समर को परेशान कर दिया था ।

“प्रश्न यह है कि अब क्या किया जाये ? क्या इस फ्लैट में मेरा निवास अब सम्भव होगा... ?” समर ने चाय की चुस्कियां लेते हुए सारी बात बताई ।

“खतरा है । पड़ोस के लोग अब तुम्हें वहाँ नहीं रहने देंगे, और अगर बात पुलिस तक पहुँच गई तो.... ।” दिलीप बोला ।

“यही तो मैं भी सोच रहा हूँ ।” समर चिंतित स्वर में बोला ।

“इन सालों से तो निपट लिया जाता मगर विक्रांत.... ।”

“यही तो रोना है....विक्रांत को क्या जवाब दिया जायेगा ? अगर उसे वस्तु स्थिति का पता चल गया तो वह सजा देने से बाज न आएगा ।” समर ने कहा और दिलीप गर्दन हिलाकर रह गया ।

“विक्रांत चाहें जो सजा दे...लेकिन अगर पुलिस तुम तक पहुँच गई और किसी तरह तुम लॉक-अप में चले गए तो फिर विक्रांत किसी कीमत पर भी क्षमा नहीं करेगा ।”

“मेरे मस्तिष्क में तो सिर्फ एक ही बात आती है ।” अंततः समर ने गहरी साँस लेते हुए कहा – “मैं विक्रांत को सारी परिस्थिति से अवगत करा दूँ और वह जो भी सजा दे स्वीकार कर लेता हूँ । हम किसी तौर पर उसे धोखे में नहीं रख सकते ।”

“जैसा तुम उचित समझो.... ।” दिलीप बोला ।

“इसी समय फोन करूँ ?”

“भूलकर भी मत करना । अगर वह भी सोते से जागा तो बात बिगड़ जायेगी । कल सुबह उसे सूचित कर देना ।” दिलीप ने सुझाव दिया और समर सहमति में सिर हिलाने लगा ।

☐☐☐

नीले रंग की स्पोर्ट्स ऊँचे-नीचे गड्ढों में उछलती हुई धीमी रफ्तार से आगे बढ़ रही थी और फिर कार उस कच्ची सड़क से होती हुई सायदार वृक्ष के साये में जाकर रुक गई ।

कामिनी ने डॉली को घूरकर देखा...और फिर सायदार वृक्षों के बीच बुलन्द होते टीले को देखकर चेहरे पर हैरत के भाव जाहिर किये ।

“यह कौन सा पिकनिक स्पॉट है जानेमन ?”

“अभी पता चल जायेगा ।” डॉली ने कार के इग्नीशन से चाबी निकालते हुए कहा– “चल उतर ।”

कामिनी आश्चर्यचकित सी नीचे उतर गई । डॉली ने कार के दरवाजे लॉक किये और अपना पर्स झुलाती हुई आगे नजर आने वाली पगडंडी पर बढ़ गई । कामिनी को भी मजबूरन उसका अनुसरण करना पड़ा ।

दोनों सहेलियाँ सायदार वृक्षों का टीला पार करने के बाद जब ढलान पर उतरी तो सामने ही एक पुरानी सी कब्र नजर आई । कब्र पर कई चादर पड़ी थी । कुछ फूल बिखरे थे और धूप बत्तियां जल रही थीं ।

“अरे...क्या यह अनारकली की कब्र है डार्लिंग ?” कामिनी ने चंचल मुस्कुराहट के साथ कहा ।

“बेवकूफ ! अनारकली की कब्र लाहौर में है ।” डॉली ने जैसे अपनी विस्तृत जानकारी का प्रदर्शन किया – “यार पीर चिश्ती शाह की मजार है । लोग यहाँ मन्नत बोलने आते हैं और पीर चिश्ती शाह उनकी हर मुराद पूरी करते हैं ।”

“अच्छा ! कामिनी ने आश्चर्य प्रकट किया – “मुझे तो आज ही पता चला कि पीर साहब इतने चमत्कारी हैं । फिर तो हमारे देश में व्यर्थ ही गरीबी दूर करने की पंचवर्षीय योजनाएं बनती रहती हैं । इसके लिए तो पीर साहब का एक सूत्री कार्यक्रम ही काफी है । यहाँ आओ, मन्नत मांगो और बन जाओ अमीर ।”

“पीर साहब का मजाक मत उड़ा कामिनी । उनकी आत्मा सबकुछ देखती है...सबकुछ सुनती है । देख, वह जो झोपड़ा है न, वहाँ पीर साहब की आत्मा का वास है । उनके बेटे भी पीर हैं । और उन पर पीर चिश्ती शाह का साया हर समय रहता है ।”

“होगा....लेकिन मेरी बन्नो, तू यहाँ क्या करने आई है ? मुझसे तो कहा था कि पिकनिक पर चल रहे हैं ।”

“मैंने सोचा, चलो तुम्हारा साथ हो जायेगा ।” डॉली ने कहा – “अगर मैं तुमसे यह कहती कि पीर साहब के पास जा रही हूँ तो शायद ना-नुकुर करती और मुझे भी रोकने की कोशिश करती ।”

“भगवान रहम करे तुम पर...मैं तुमसे इस पागलपन की आशा तो नहीं करती थी । तुम जैसी बुद्धिमान....ओह.... ।”

“पीर साहब के खिलाफ कुछ मत कहना कामिनी....वरना बहुत बुरा होगा ।”

कामिनी गहरी साँस लेकर रह गई ।
 
चूने की पुती हुई कच्ची झोपड़ी के सामने पहुँचकर दोनों रुक गईं । कच्ची दीवार का अहाता था, जिसके मध्य नीम का वृक्ष खड़ा था । अहाते के बाद एक कच्चा कमरा बना हुआ था ।

अहाते की दीवार में एक दरवाजा था, जिसके दूसरी तरफ नीम के वृक्ष के नीचे सरकंडों के मूढ़े पर चंद व्यक्ति बैठे हुए थे ।

डॉली उन लोगों की परवाह किये बिना दनदनाती हुई झोपड़े के एक मात्र कमरे में प्रविष्ट हो गई । कामिनी भी उसके साथ-साथ थी ।

अंदरूनी कमरे में लोबान, अगरबत्तियों, धूप बत्तियों की महक फैली हुई थी और हरा चोंगा ओढ़े एक व्यक्ति वहाँ मौजूद था । उसका मुँह दीवार की तरफ था ।

डॉली और कामिनी उसके पीछे जाकर खड़ी हो गई ।

“आ गई तुम दोनों ?” पीर साहब ने उसी मुद्रा में बैठे-बैठे बिना मुड़े कहा – “डॉली और कामिनी, तुम दोनों बैठ जाओ और डॉली, तुम अपनी सहेली को सुकून से रहने के लिए कहो –- मैं तुम्हारे सिलसिले में इबादत कर रहा हूँ ।”

डॉली ने कामिनी की तरफ देखा, जैसे कह रही हो – “देखा पीर साहब का चमत्कार....आखिर उन्हें तुम्हारा नाम कैसे मालूम हुआ ?”

दोनों खामोशी के साथ बैठ गईं ।

कुछ देर बाद ही पीर साहब उनकी तरफ संबोधित हुए – “लाई हो सामान ?” पीर साहब ने पूछा ।

“जी हाँ....लाई हूँ ।” डॉली ने पर्स से एक सुर्ख डिबिया निकालते हुए कहा – “लीजिये ।”

“नहीं...उसे दूर ही रखो....हम इस सुनहरी अजाब को नहीं छूते....यह तावीज इसमें बन्द कर दो ।” पीर साहब ने लिबास से एक तावीज निकालकर डॉली को दे दिया ।

डॉली ने उठकर बड़ा सम्मान करते हुए तावीज लिया, फिर सुर्ख डिबिया से एक सुनहरा चौकोर टुकड़ा निकाला और तावीज उसमें बन्द कर दिया ।

“बन्द कर दिया तावीज इसमें अब क्या करूँ ?”

“इसे किसी ऐसे बहते पानी में डालना है, जिसमें रोज कोई साधु-संत स्नान करता हो और उसमें दूसरे किस्म की गंदगियां न बहती हों, तब तक तावीज कोई न छुएगा । इस पर धागा बांध देना ।

“लेकिन मैंने तो इसे छू लिया है ।”

“तुम्हारा स्पर्श तो जरूरी था बेटी । तभी तो तुम्हारा काम बनेगा...लेकिन तुम इसे पानी में नहीं बहाओगी – कोई ऐसा आदमी है तुम्हारे पास...जो शुद्ध विचार रखता हो और विश्वास के योग्य हो.... ?”

“रग्घू है ।”

“रग्घू कौन ?”

“हमारा नौकर...लेकिन ऐसी बहती जलधारा, जहाँ कोई साधु रोज स्नान करता हो, कहाँ मिलेगा ?”

“ठहरो, ऐसा न हो तुमसे कोई भूल हो जाये । मैं यह इंतजाम कर देता हूँ.... । गफुरे.... ।” पीर साहब ने आवाज दी ।

तुरन्त एक आदमी अंदर प्रविष्ट हुआ । “जा एक तागा ला और फिर तुझे एक खास काम करना है ।” पीर साहब ने कहा और गफूरा चला गया ।

फिर वह धागा लेकर आया । पीर साहब के कहने पर डॉली ने वह धागा तावीज से बांध दिया । गफूरा धागा पकड़कर तावीज स्पर्श किये बिना पीर साहब की हिदायत पर उसे बहते पानी में डालने निकल पड़ा ।

कामिनी खामोशी से ये कार्रवाई देख रही थी । उस समय तो वह कुछ न बोली, फिर पीर साहब ने डॉली को अगले मंगल अकेले आने की हिदायत दी तो कामिनी बड़बड़ा उठी – “ठग...ढोंगी... ।”

उसके बाद दोनों झोपड़ी से बाहर आ गईं ।

कार में बैठते ही कामिनी ने अपनी खामोशी तोड़ी – “यह क्या चक्कर है डॉली...सोने का तावीज किसलिए दान दिया ?”

“तूने पीर साहब का चमत्कार देखा – किस तरह बिना देखे जान लिया कि मैं और तुम हैं । हमारा नाम तक बता दिया । इसी से समझ ले कामिनी कि वह बहुत पहुँचे हुए पीर हैं ।”

“सो तो मैंने देख लिया...मगर तेरे को कौन सा कांटा फंस गया जो सोने का तावीज दिए बिना नहीं निकल पा रहा है ?” कामिनी ने पूछा ।

“वह अमर है न...अरे वही खूबसूरत जवान जिसने मेरे सपनों पर डाका डाला है...आह क्या खूबसूरती है...क्या शरीर है....क्या चाल है...क्या बात है उसमें.... ।” डॉली ने गहरी साँस लेते हुए कहा – “मैं उसे पाने के लिए सब कुछ खो सकती हूँ कामिनी....सब कुछ...लेकिन वह है कि किसी तौर पर काबू ही में नहीं आता ।”

“ओह तो ये बात है...उस अमीर बाप के अमीर बेटे की चाहत ने तुझे इस हद तक पागल बना दिया है कि तू इन ढोंगियों में आ फंसी...यह तावीज कितने का तैयार हुआ ?”

“ज्यादा नहीं, कुल डेढ़ हजार का ।”

“और कितने तावीज दिए हैं ?”

“और सात तावीज में मेरा काम बन जायेगा ।”

“और तुम्हें पक्का यकीन है कि काम बन जायेगा ।” कामिनी ने अविश्वास प्रकट किया ।

“ओहो...यकीन क्यों नहीं है । जानती हो रग्घू के साथ क्या हुआ । शादी के बारह साल बाद भी जब बच्चा न हुआ तो वह पीर साहब के पास पहुँचा । उसने पीर साहब को अपनी व्यथा सुनाई । पीर साहब ने हँसकर कहा – “बस तू एक बच्चे के लिए परेशान है । जा एक नहीं दो दिए । उसके बाद रग्घू की पत्नी ने सचमुच जुड़वां बच्चों को जन्म दिया ।” डॉली ने उत्साहजनक स्वर में कहा – और रग्घू ने ही मुझे बताया कि पीर साहब कितने करामाती हैं ।”

“इसका मतलब तुम रग्घू की सलाह से यहाँ पहुँची हो ।” कामिनी ने हँसते हुए कहा – “एक बार पहले भी तुम प्रिंस चार्ल्स की दीवानी हो गई थी और फिर एक फिल्म अभिनेता तुम्हारे सपनों का राजकुमार बना था । याद है तुम्हें ?”

“तब मैं बालिग नहीं हुई थी । वह मेरा बचपन था...लेकिन अमर मेरे बचपन का सपना नहीं है । उसे मैं अपना जीवन साथी बनाना चाहती हूँ कामिनी । तू नहीं जानती कि मैं उसे कितना प्यार करती हूँ । वह खुद धनवान है, इसलिए मेरा पैसा भी कोई काम नहीं करता । वह मुझे चाहें जितना अनदेखा करे...लेकिन मैं उसे हर कीमत पर हासिल कर लूँगी...इसके लिए मैं सात तो क्या सात सौ तावीज भी पानी में बहा सकती हूँ ।” डॉली ने स्पोर्ट्स कार को टॉप गेयर में डालकर रफ्तार बढ़ाते हुए कहा ।

“अब मेरी एक बात सुनो डॉली...तुम एक पढ़ी-लिखी सभ्य लड़की हो । एक इज्जतदार अमीर घराने की इज्जत हो...यह सब बकवास है...यह ढोंग है.... । मेरा फर्ज है कि तुम्हें ऐसी मूर्खताओं से रोकूँ । अब तुम यहाँ नहीं आओगी ।”

“मैं यह मूर्खताएं जारी रखना चाहती हूँ ।” डॉली ने कहा ।

“तब मुझे मजबूरन अंकल को इस सम्बंध में सूचना देनी होगी ।” कामिनी ने कहा और डॉली ने पांव कार के ब्रेक पर रख दिया ।

“क्या तुम गंभीर हो कामिनी ?” डॉली ने कहा ।

“हाँ....समाचार पत्रों में असंख्य समाचार छपते रहते हैं इस तरह के लोगों के सम्बन्ध में । मूर्ख लड़कियां और औरतें इनके हाथों अपना भविष्य नष्ट कर बैठती हैं ।”

“मुझे किसी शिक्षा की आवश्यकता नहीं है ।”

“तब उचित है कि तुम मुझे यहीं उतार दो । मैं किसी तौर पर तुम्हारी मूर्खता में सम्मिलित नहीं होना चाहती ।” कामिनी ने कहा ।

“ठीक है...उतर जाओ, लेकिन कान खोलकर सुन लो – डैडी के कानों तक अगर यह बात पहुँची तो हमारी यह मिसाली दोस्ती दुश्मनी में बदल जायेगी... ।” डॉली ने होंठ भींचकर कहा ।

“देखा जायेगा ।” कामिनी ने कहा और दरवाजा खोलकर नीचे उतर गई ।

डॉली ने एक झटके से कार आगे बढ़ा दी ।

☐☐☐

बड़ी मुश्किल में डाल दिया है तुमने – डॉली की मुराद पूरी करने के लिए मैंने बड़े जतन किये हैं । अब तुमने एक नई उलझन में डाल दिया हमें । पीर साहब ने शून्य में निहारते हुए कहा ।

“कुछ भी कीजिये पीर साहब ! अब तो आप ही इस दुखिया का सहारा हैं । डॉली तो एक अमीर बाप की बिगड़ी हुई रईसजादी है । हर तीसरे महीने उसका प्रेमी बदल जाता है । वह तो उसका पुराना शौक है – लेकिन उसके इस शौक से मेरा जीवन नष्ट हो जायेगा ।” कामिनी ने हाथ जोड़कर गिड़गिड़ाते हुए कहा ।

“तुम्हारे पिता क्या कारोबार करते हैं ?” पीर साहब ने पूछा ।

“स्टोव का कारखाना है उनका ।”

“देखो लड़की, मैं इस एक वजह से तुम्हारे लिए कुछ कर सकता हूँ कि डॉली अमर से प्यार नहीं धोखा कर रही है और ऐसी लड़कियों की तो हमें कोई मदद भी नहीं करनी चाहिए थी । मगर हम उसकी बातों में आकर धोखा खा गए । अब जबकि सात तावीज सोने के बनाकर मंतर पूरा हो चुका है तो सबसे पहले मुझे उसकी काट करनी होगी और यह काट कोई आसान काम नहीं ।” पीर साहब ने अब सीधा कामिनी की तरफ देखते हुए कहा – “इसके लिए चौदह सोने के तावीज बनवाने होंगे, और उन्हें ठीक उसी जगह पानी में बहाना होगा जहाँ डॉली के तावीज बहाये गए हैं तभी उस मंतर की काट हो सकती है ।”

“चौदह क्या, मैं अट्ठाईस तावीज बनवा दूँगी, लेकिन मेरा काम होना चाहिए ।”

“काम क्यों नहीं होगा... ? जरूर होगा, और फिर सच्चे इंसानों की फरियाद तो खुदा के दरबार में सीधी पहुँचती है । खुदा जरूर तुम्हारी मदद करेगा ।” पीर साहब ने दोनों हाथों की हथेली उठाकर आकाश की तरफ करते हुए कहा ।

“तो फिर मैं यह तावीज लेकर कब आऊँ ?”

“जुम्मे के रोज आना । तुम्हारा काम हो जायेगा ।”
 
कामिनी झोपड़ी से बाहर निकली और बड़ी फुर्ती से नीम के नीचे बैठे लोगों की दृष्टि बचाकर झोपड़ी के पीछे चली गई । वहाँ पहुँचकर कामिनी कमरे की पिछली दीवार से सटकर खड़ी हो गई । हर तरफ सन्नाटा था और दूर-दूर तक झाड़ियाँ ही झाड़ियाँ फैली नजर आ रही थीं ।

दीवार पर हवा और रोशनी के लिए एक सुराख बना हुआ था । कामिनी ने उस पर अपनी आँख लगा दी और अंदर का दृश्य देखने लगी – लोबान और अगरबत्तियों के धुएं में दृश्य कुछ धुंधला नजर आ रहा था, लेकिन वह इतना धुंधला भी नहीं था कि कामिनी पीर साहब को न देख सके ।

वह पीर साहब की एक-एक हरकत देखती रही । कुछ ही देर हुई होगी कि पीर साहब ने अपनी गद्दी के नीचे से हाथ डालकर टेलीफोन का रिसीवर खींच लिया और बात करने लगे ।

“हाँ – हाँ भेज देना....अरे भई कह तो दिया...यह सब तुम मुझ पर छोड़ दो...वक्त दो बजे रखना...ठीक है...ठीक....अरे यह भी कोई कहने की बात है...तुम्हारा कमीशन पक्का है...और फिर पीर साहब ने हँसते हुए फोन गद्दी के नीचे ही रख दिया ।

कामिनी ने धीरे से गर्दन हिलाई । उसका संदेह पुख्ता हो गया । इस तरह के लोगों के एजेंट फैले होते हैं – वही लोग ग्राहक जुटाते हैं और कमीशन प्राप्त करते हैं । डॉली को इस जाल से बचाना अब बहुत जरूरी था । निश्चय ने रग्घू ने उसे इस जाल में फंसाया था और पीर साहब ने काफी मोटी रकम का दांव खेला था ।

कामिनी ने वापिस लौटकर अपनी योजना पर गौर किया और सबसे पहले रग्घू को बुलाया । रग्घू उसके बुलावे पर तुरन्त चला आया । इससे पहले भी वह कामिनी के पास डॉली के काम से आया जाया करता था ।

“रग्घू तुझे मैंने एक खास काम से बुलाया है ।”

“एक नहीं, हजार काम बताइये बीबी जी ।” रग्घू ने हाथ जोड़कर कहा ।

“रग्घू, तुम जानते हो डॉली कितने अमीर बाप की बेटी है और डॉली के डैडी कितने सख्त हैं ।”

“सो तो है बीबीजी...मगर बात क्या है ?”

“मुझे मालूम है रग्घू कि तुम उन पीर साहब के एजेंट हो, जिनके द्वारा तुम डॉली का काम कर रहे हो । मुझे यह भी ज्ञात है कि डॉली ने सोने के सात तावीज तुम्हारे संकेत पर पीर साहब के हवाले कर दिए हैं । अगर यह सारी बातें डॉली के डैडी के सामने पहुँच जाये तो न सिर्फ यह होगा कि तुम्हें नौकरी से निकाल दिया जायेगा बल्कि यह भी होगा कि तुम्हें पीर साहब से मिलकर जालसाजी के आरोप में पुलिस के हवाले कर दिया जायेगा ।” कामिनी ने कठोर स्वर में कहा और रग्घू की आँखें भय से फैल गई ।”

वह बौखलाए अंदाज में कामिनी की तरफ देखने लगा ।

“बात यह है रग्घू कि डॉली जिसे चाहती है, उसे मैं भी चाहती हूँ । डॉली की बात अभी नई-नई है – मैं बहुत अरसे से उसे प्यार करती हूँ । अतः उसे मेरा होना चाहिए और इस सम्बंध में पीर साहब मेरी मदद का वादा कर चुके हैं ।”

“ओह बीबी....बीबी...राम कसम मैं दिल से आपके साथ हूँ । अगर आप मुझे माफ कर दें और मेरी यह बात किसी को न बताएं तो आप जो मुझे हुकुम देंगी वह मैं पीर साहब से करा लूँगा ।” रग्घू ने घिघियाते हुए कहा ।

“मैं तुम्हें बता चुकी हूँ रग्घू कि मैं पीर साहब से मिल चुकी हूँ । पीर साहब ने मुझसे कहा था कि वह सोने के चौदह तावीज पानी में डलवाएंगे । मैं यह तावीज तैयार करा चुकी हूँ और इन्हें पीर साहब के हवाले करने वाली हूँ – लेकिन तुम मेरे साथ चलोगे और पीर साहब से मेरी मदद करने की सिफारिश करोगे ।”

“मैं दिल से तैयार हूँ बीबीजी ।”

“इस सम्बंध में मैं तुम्हें बहुत बड़ा इनाम भी दूँगी रग्घू ।” कामिनी ने कहा ।

“मुझे इनाम की जरूरत नहीं है बीबीजी । बस आप मेरे लिए अपनी जुबान बन्द रखें – यही मेरा इनाम होगा ।” रग्घू ने बेबसी से कहा ।

कामिनी ने उसे पूरी तरह अपने शिकंजे में कस लिया । इस सिलसिले में उसके पास पूरा प्रोग्राम मौजूद था । अतः उसने अपनी कार्रवाई को प्रारम्भ कर दिया ।

इन दिनों डॉली ने उससे मिलना तो छोड़ दिया था । लेकिन एक और सहेली द्वारा कामिनी ने डॉली से संपर्क स्थापित कर रखा था । कामिनी को मालूम था कि डॉली उस सहेली के साथ पीर साहब के पास जाती है । अतः उसने अपनी सहेली से संपर्क स्थापित करके ऐसा दिन निश्चित कर लिया जिस दिन डॉली को पीर साहब के पास जाना था । सहेली द्वारा डॉली इस बात पर भी तैयार हो गई कि इस सम्बंध में पीर साहब के पास जाने की सूचना किसी को नहीं मिलनी चाहिए ।

कामिनी ने अपनी सहेली को सारा विवरण बता दिया था और वह सहेली भी कामिनी की मदद करने को तैयार हो गई थी ।

अतः ठीक समय पर कामिनी पीर साहब के पास पहुँच गई । पीर साहब ने कामिनी को अपने कमरे में प्रविष्ट होते देखा तो बोले – “आज तो तुम्हें नहीं बुलाया था मैंने ?”

“लेकिन मुझे कल किसी जरूरी काम से बाहर जाना पड़ रहा है पीर साहब । और मैं जुम्मे को नहीं आ पाऊँगी ।”

“खैर । कोई बात नहीं – वह चीज लाई हो ?



“जी पीर साहब ।” कामिनी ने कहा और चमकते हुए चौदह तावीज पीर साहब के हवाले कर दिए ।

बीस-पच्चीस हजार की लागत के यह तावीज देखकर पीर साहब की आँखें खुशी से चमक उठीं ।

“अब तेरा काम जरूर हो जायेगा ।” पीर साहब ने कहा ।

“पीर साहब । क्या इस बीच डॉली आपके पास आई थी ?” कामिनी ने पूछा ।

“आती ही रहती है ।”

“आपने उससे क्या कहा ?”

“कुछ नहीं – हम यह काम खामोशी से करना चाहते थे । डॉली अब अमर को कभी न पा सकेगी । वह तेरा हो जायेगा । वह तेरी मोहब्बत कबूल करेगा और तू हमारे इन तावीजों का असर बड़ी जल्दी देख लेगी, लेकिन इसके साथ-साथ तुझे कुछ और भी करना होगा ।”

“वह क्या पीर साहब ?”

“यह चौदह तावीज तो उन सात तावीजों का तोड़ हैं जो डॉली पानी में डलवा चुकी है । इसके बाद हमें कुछ और अमल करने के लिए एक बाकायदा कार्रवाई करनी होगी और इसके लिए रकम की जरूरत है ।”

“रकम की आप चिंता न करें पीर साहब । जितनी भी दौलत खर्च हो जायेगी । मैं उसे हासिल करने के लिए सबकुछ करने को तैयार हूँ और एक बात आपसे और कहना चाहूँगी पीर साहब ।”

“हाँ – हाँ कहो ।”

“रग्घू अब मेरे लिए काम कर रहा है ।”

“कौन रग्घू ?”

“वही जिसे लिए डॉली आप तक पहुँची थी ।”

“ओह । हूँ – क्या उस बेवकूफ ने तुझे इस बारे में बताया था ।”

“हाँ पीर साहब । उसने मुझे सारी बात विवरण सहित बता दी । उसने मुझे यह भी बताया कि टेलीफोन पर उसने आपको डॉली के सम्बंध में स्पष्ट विवरण बताया था और उस दिन जब मैं और डॉली यहाँ आई थीं, रग्घू ने टेलीफोन पर आपको सबकुछ बता दिया था । रग्घू ने मुझे यह भी बता दिया है कि आपकी इस गुदड़ी में एक टेलीफोन छिपा हुआ है । और आप इस पर अपने एजेंटों से जानकारी प्राप्त करते रहते हैं । निःसंदेह आपने जो फोन की अंडरग्राउंड लाईन यहाँ तक बिछाई है उसकी दाद देनी होगी ।” कामिनी ने कहा ।

और पीर साहब के होश उड़ गए ।

उन्होंने भयभीत निगाहों से कामिनी को देखा और बोले – “इस नामाकूल ने फिजूल बकवास की है मेरे खिलाफ ।”

“फिजूल तो खैर नहीं पीर साहब । टेलीफोन तो मौजूद है आपकी गुदड़ी में ।” कामिनी ने ढिठाई से कहा ।

“हाँ – हाँ है – हमने अपनी जरूरतों के लिए लगवाया है । हम नहीं चाहते कि लोगों को इसके बारे में मालूम हो, इसलिए हमने इसे छिपा रखा है ।” पीर साहब ने भयभीत अंदाज में कहा ।

कामिनी बे-अख्तियार मुसकुराने लगी । लेकिन उसने अपनी मुस्कुराहट पर शीघ्र ही काबू पा लिया । वह नहीं चाहती थी कि पीर साहब उसके चेहरे पर फैली मुस्कुराहट देख लें ।

कामिनी ने चोर निगाहों से उस रोशनदान की तरफ देखा जहाँ उसके अंदाजे के अनुसार डॉली उपस्थित होगी । उसे कुछ नजर तो नहीं आया नहीं, लेकिन उसकी छठी इंद्री ने यह बता दिया कि वहाँ कोई उपस्थित है और वह डॉली के अलावा कौन हो सकता था ?

पीर साहब अब पूरी तरह शिकंजे में फँस चुके थे । रग्घू के ख्याल से उनका खून खौल रहा था, लेकिन बर्दाश्त किये हुए थे – अलबत्ता उस समय वह बुरी तरह बौखला गए, जब हुजरे का दरवाजा जोरदार आवाज के साथ खुला और डॉली बिफरी हुई अंदर घुस आई । उसका चेहरा आग की तरह दहक रहा था ।

“तो तुम अब कामिनी के लिए काम कर रहे हो – क्यों ?”

“अरे-अरे – क्या बाहर कोई मौजूद नहीं है – हर एक को अंदर आने दिया जाता है ।”

“हरामजादे...ढोंगी...कमीने...जालसाज... ।” डॉली खूंखार बिल्लो की तरह आगे बढ़ी और पीर साहब का गिरेबान पकड़ लिया ।

“बुला अपने बाप को कि तेरी मदद के लिए आये ।” डॉली चीख पड़ी ।

“लाहौल विला कुब्बत – यानी तुम्हारी मौत ने तुम्हें आवाज दी है क्या – लड़की, होश में आओ – मेरा जिन्न जाग उठेगा ।”

पीर साहब का चेहरा धुआं हो गया था ।

“जिन्न.... । मैं तुझे और तेरे जिन्नों को अभी ठीक किये देती हूँ ।” डॉली ने उन्हें जोर से खींचा और पीर साहब का गिरेबान नीचे तक फट गया ।

“पीर साहब ! जिन को टेलीफोन करें – जिन को – यह लें ।”

कामिनी जल्दी से पीर साहब की गुदड़ी से टेलीफोन निकालकर सामने आ गई ।

“टेलीफोन जिन को....ठहरो तो सही ।” डॉली टेलीफोन पर झपटी और उसने कामिनी के हाथ से छीनकर पीर साहब के सिर पर पटक दिया ।

“अरे मर गया – बचाओ... ।” पीर साहब चीखे और फिर बुरी तरह उठकर बाहर की तरफ भागे । कामिनी ने उसकी टांगों में टांग अड़ा दी और वह औंधे मुँह जमीन पर गिर पड़े । इसके साथ ही कामिनी ने अब वहाँ रुकना उचित नहीं समझा और चंद क्षण बाद उसकी कार वापिस पलट रही थी । उसके पेट में असंख्य कहकहे मचल रहे थे ।

☐☐☐

शाम सात बजे कामिनी अपनी कोठी के लॉन में टेनिस खेल रही थी, उसने डॉली को कार को अंदर प्रविष्ट होते देखा और शीघ्रता से रैकेट फेंक दिया । उसके कजिन ने बुरा सा मुँह बनाकर पूछा – “अब तुम गेम छोड़ दोगी ?”

“सॉरी अर्जुन । फिर सही – जाओ तुम अंदर जाओ । मेरी बहुत अच्छी दोस्त आ गई है ।” कामिनी ने कहा और अर्जुन बुरा सा मुँह बनाकर रैकेट घुमाता हुआ अंदर चला गया ।

डॉली अकेली थी । उसका चेहरा उतरा हुआ था और आँखों में नमी थी ।

कामिनी उसे खामोशी से देखती रही ।

“हैलो कामिनी !” डॉली उसके पास पहुँचकर उदास स्वर में बोली ।

“हैलो डार्लिंग । कैसे मिजाज हैं ?”

“मैं तुमसे क्षमा मांगने आई हूँ कामिनी ।”

“किस बात की ?”

“तुम ही ठीक कहती थीं –मुझे इल्म हो गया है कि तुमने मेरी आँखें खोलने के लिए यह सबकुछ किया है । मैं तुम्हारी अहसानमन्द हूँ ।”

“और कोई बात नहीं है यार ! तुम मेरी दोस्त हो – यह मेरा फर्ज था – लेकिन पीर साहब का क्या हुआ ?”

“अच्छी खासी मरम्मत कर दी है मैंने । सबको उसके ढोंग का पता चल गया है । अब वह यहाँ नहीं रहेगा – और हाँ, यह लो तुम्हारे तावीज – मैं उससे छीन लाई हूँ ।”

“मुझे इनकी जरूरत नहीं है । मैं तुम्हारी तरह मूर्ख नहीं हूँ । यह पीतल के हैं और इन पर सोने का पानी फिरा हुआ है ।” कामिनी ने कहा और डॉली गहरी साँस लेकर रह गई ।

“मैं उस सुअर पर काफी पैसा खर्च कर चुकी हूँ ।”

“पुलिस के हवाले कर दो ससुरे को ।”

“नहीं कामिनी । इस तरह मैं बदनाम हो जाऊँगी – स्कैंडल बन जायेगा ।”

“आओ, तुम्हारे लिए चाय मंगवाऊं ।” कामिनी उसे लेकर लॉन में पड़ी कुर्सियों की तरफ बढ़ गई – “हाँ तुम्हारे उस बगलोल के क्या हाल हैं ?”

“उड़ा लो तुम भी मेरी मोहब्बत का मजाक ।” डॉली ने एक आह भरते हुए कहा – “सारे जतन बेकार हो गए – वह जालिम ज्यों का त्यों है ।”

“तुमसे कब मुलाकात हुई ?”

“कल शाम को मिसेज ठाकुर के साथ हाईलाइट क्लब में आया था ।”

“मिसेज ठाकुर ?” कामिनी ने चौंककर पूछा ।

“हाँ । जानती हो न उसे – वह ठाकुर कोरपेट्स की मालिक ।”

“अरे हाँ – अरे कौन नहीं जानता – लेकिन अमर का उससे क्या सम्बंध है ?” कामिनी ने उलझन भरे स्वर में पूछा ।

“मुझे नहीं मालूम – लेकिन मैं कुछ अरसे से अमर को उसके साथ देख रही हूँ ।”

“बेचारा अमर – बचाओ डॉली, अमर को उससे बचाओ ।” कामिनी ने कहा ।

“क्या मतलब ?”

“मिसेज ठाकुर को तुम मुझसे अधिक नहीं जानती – वह मर्दखोर प्रसिद्ध है । पिछले दिनों तुम्हें याद है क्रिकेट का मशहूर खिलाड़ी सोमनाथ उसके साथ लगा रहता था ।”

“हाँ ।”

“और तुम्हें भी याद होगा कि सोमनाथ फर्स्ट क्लास क्रिकेट से रिटायर हो चुका है ।”

“मुझे नहीं मालूम । क्रिकेट से मुझे दिलचस्पी नहीं रही ।”

“मुझे रही है और यह बात मुझे मालूम है कि सोमनाथ को सिर्फ मिसेज ठाकुर की सिफारिश पर फर्स्ट क्लास क्रिकेट में शामिल किया गया था ।”

“मगर इस विवरण का मेरे मामले से क्या सम्बंध है ?”

“सिर्फ इतना कहूँगी कि अमर को उस खतरनाक औरत से बचाओ ।”

“मैं किस तरह बचाऊँ ?” डॉली ने चिंतित स्वर में कहा ।

इसी बीच चाय आ गई और कामिनी ने चाय की दो प्यालियाँ बनाकर उसमें से एक डॉली के हवाले कर दी । चाय के छोटे-छोटे घूंट लेती रही ।
 
फिर कामिनी ने पूछा –- “मिसेज ठाकुर से तुम्हारी जान-पहचान है ?”

“साधारण सी ।”

“फ्लैश खेलना जानती हो ?”

“हाँ ।”

“बस बात बन गई – लेकिन तुम्हें अधिक हानि बर्दाश्त करनी पड़ेगी ।”

“अरे तुम क्या मेरी मोहब्बत किसी शाहजहाँ की मोहब्बत से कम समझती हो ।”

“शाहजहाँ पुरुष था और बादशाह था ।”

“उससे क्या फर्क पड़ता है – मेरे एकाउंट में भी लाखों रुपये बेकार पड़े हैं । मैं अमर के लिए अमर महल तक बनवा सकती हूँ ।”

कामिनी मुस्करा दी ।

“काश । उस बगलोल को तुम्हारी इस चाहत का एहसास होता – खैर फिलहाल मिसेज ठाकुर का कांटा बाहर निकालो – उसी को इस्तेमाल करो – तरकीब मैं बताती हूँ ।”

कामिनी उसे धीरे-धीरे समझाने लगी ।

फिर अंत में बोली – लेकिन मिसेज ठाकुर को इस बात का जरा भी आभास न हो कि तुमसे मेरी कोई जान-पहचान भी है । वह मुझसे बहुत बिदकती है । अगर उसे तनिक भी पता चल गया तो खेल बिगड़ जायेगा ।”

डॉली ने मुस्कराकर सहमति में सिर हिला दिया ।

☐☐☐

खूबसूरत जिस्म का मालिक अमर नीले रंग के सूट में अपनी शानदार छवि बिखेरता उसके सामने आ बैठा था और डॉली को अपने सारे अस्तित्व में ठंडी लहरें उठती महसूस हो रही थीं । अमर का चुम्बकीय व्यक्तित्व एक विचित्र सा सम्मोहन रखता था और यह हालत सिर्फ डॉली की ही नहीं थी कुछ महिलाएं भी उसे हसरत भरी दृष्टि से देख रही थीं ।

नीला रंग उसके गोरे रंग पर खूब खिल रहा था और फिर ऐसे चेहरे कम ही देखने में आते हैं । शारीरिक बनावट भी ऐसी बेमिसाल थी कि बस देखते बनती थी । यूनान के किसी मूर्तिकला विशेषज्ञ की कला का प्रतीक मालूम होता था । गहरे काले बालों के नीचे झुकी हुई स्वजिल आँखों से वह ताश का खेल देख रहा था और डॉली सिर्फ उसे देख रही थी ।

मिसेज ठाकुर ने चाल चली और डॉली को उस तरफ आकर्षित होना पड़ा ।

“चल भई ! तुम बहुत धीमी गति से खेल रही हो ।”

“यह लें ।” उसने चाल चल दी ।

“खूब ! पहले ही हाथ में डबल ?” मिसेज ठाकुर मुस्करा दी ।

“ऐं.... ।” वह चौंकी, फिर सम्भल गई । उसे सिंगल डबल की कोई खबर नहीं थी । बस चाल चल दी थी । उसने यह भी नहीं देखा था कि कितनी रकम हाथ में आई थी – “हाँ डबल ।” वह शीघ्रता से बोली ।

“तो यह लो ।” मिसेज ठाकुर ने भी चाल डबल कर दी ।

और वह रकम लगाती रही । काफी नोट जमा हो गए तो मिसेज ठाकुर ने ही शो कराया । वह फिर जीत गई ।

“आज भाग्य मेरे साथ है ।” उसने नोट समेटते हुए कहा ।

“हाँ मेरी तरफ से मुबारकबाद ।” डॉली बोली ।

“मैं पहले भी तुमसे मिलती रही हूँ ।”

“हाँ – इसी क्लब में ।”

“तुम्हारे साथ खेलने में लुत्फ आ रहा है ।”

“अमर साहब नहीं खेलते ?” डॉली ने अचानक पूछा ।

“नहीं – ये नए खिलाड़ी हैं । खेलते नहीं सिर्फ देखते हैं ।”

मिसेज ठाकुर ने हँसते हुए कहा और अमर के चेहरे पर शर्मीली मुस्कान फैल गई ।

ऐसा अद्भुत, ऐसा शानदार व्यक्तित्व था कि दिल बस लोट-लोट जाये ।

थोड़ी देर बाद डॉली का पर्स खाली हो गया ।

“बस मिसेज ठाकुर ! अब कल ।”

“अवश्य हनी.... । वैसे यकीन करो तुमसे मिलकर बहुत खुशी हुई है । क्यों अमर – मिस डॉली के बारे में क्या विचार है ?”

“जी...मैं क्या कह सकता हूँ ।” अमर उँगलियाँ मरोड़ता हुआ बोला ।

“अमर से इससे पहले मुलाकात नहीं हुई डॉली ?”

“चंद स्थानों पर हो चुकी है – लेकिन अमर साहब बहुत एकाकी रहने के आदी हैं ।” डॉली ने कहा ।

“ओह ! हाँ – अमर वास्तव में शर्मीले स्वभाव का है । यह सिर्फ मुझसे खुला है ।” यह वाक्य कहते हुए मिसेज ठाकुर के स्वर में गर्व की झलक थी ।

अलबत्ता चंद रोज बाद ही उसने यह बात दिल से स्वीकार कर ली कि वास्तव में मिसेज ठाकुर इस मामले में खुशनसीब हैं । अमर उसका बेदाम गुलाम था और मिसेज ठाकुर के बिना वह अब कहीं नजर ही नहीं आता था ।
 
डॉली को दिल की लगी हुई थी – अतः डॉली ने इस कबाब में हड्डी को भी सहन कर लिया – लेकिन यह सहन शक्ति काफी महंगी पड़ रही थी । अब तक वह मिसेज ठाकुर से पच्चीस तीस हजार रुपये हार चुकी थी । वह भी इस अंदाज में कि वह अधिक रकम लेकर घर से नहीं निकलती थी । मिसेज ठाकुर तो बला की खेलने वाली थी । दांव लगाते हुए वह कभी नहीं सोचती थी ।

लेकिन यह उसके हाथों की कलाकारी थी कि अधिकतर उसका प्रतिद्वंदी हारता ही था ।

डॉली के तो जीतने का तो खैर प्रश्न ही नहीं था और यूँ भी वह रकम अमर के लिए हार रही थी – लेकिन इसके बावजूद भी उसे किसी प्रकार की सफलता नहीं मिल रही थी । कामिनी ने जो स्कीम बनाई थी उसके अनुसार अमर को अब तक उसके प्रति आकर्षित हो जाना चाहिए था । मिसेज ठाकुर एक अधेड़ायु की महिला थी – हालाँकि वह अभी इस उम्र में भी जवान ही नजर आती थीं – नयन नक्श अन्य औरतों की अपेक्षा बेहतर थे – परन्तु डॉली की खूबसूरती से उसका कहीं कोई मुकाबला नहीं था – उनके ख्याल में डॉली जब उसके निकट आएगी तो अमर उस अधेड़ का ध्यान छोड़कर डॉली के प्रति आकर्षित होगा, लेकिन ऐसा कुछ नहीं हो रहा था – अगर कुछ हुआ था तो सिर्फ इतना कि अमर से बात करने के लिए उसे अब मिसेज ठाकुर को माध्यम नहीं बनाना पड़ता था ।

जब गाड़ी नहीं खिसकी तो एक बार फिर उसे कामिनी से सलाह-मशविरा करना पड़ा ।

“क्या कहा, पच्चीस तीस हजार रुपया दे दिया उस कलमुही को ।” कामिनी सिर थामकर बैठ गई –- “अरे डॉली की बच्ची – यह तुझे क्या हो गया है... इतनी बड़ी रकम उस कमीनी के मुँह में डाल दो ।”

“उस कमीनी के मुँह में कौन डाल रहा है – मैं तो अमर के नाम पर न्यौछावर कर रही हूँ ।”

“अरी भाग्यवान – इतनी बड़ी रकम के लिए तो नहीं कहा था मैंने ।”

“तुमसे भी हद हो गई कामिनी – खुद ही रोग लगाती हो और खुद ही इलाज बताती हो ।” डॉली ने बुरा सा मुँह बनाया – “तुमने ही तो कहा था...जुए में हारो ।”

कामिनी ने सिर पीट लिया – “अरी – मैंने तो हजार दो हजार का दांव खेलने के लिए कहा था ।

“जब मैं दिल की बाजी हार चुकी तो दौलत मेरे लिए कुछ महत्व नहीं रखती ।” डॉली ने ठंडी आह भरकर कहा – “लेकिन कामिनी वह तो पूरा का पूरा काठ का उल्लू है । कमबख्त मुझसे नजरें तक तो मिलाने में शर्माता है ।”

“मुझे कुछ सोचने दो... ।” कामिनी ने उसे खामोश रहने का इशारा किया और फिर दोनों ही खामोश हो गए ।

“गड़बड़ ! अचानक कामिनी ने कहा – “इसमें कुछ गड़बड़ है । ऐसा तो नहीं यह औरत उस अमर के साथ मिलकर कोई धंधा कर रही हो ।”

“क्या मतलब – अब क्या तुम्हें मिसेज ठाकुर में भी पीर साहब नजर आते हैं ?” डॉली ने भड़ककर कहा ।

“इस दुनिया में पैसा कमाने के नित नए तरीके ईजाद हो रहे हैं डॉली । मिसेज ठाकुर एक घाघ और चालाक औरत हैं । ऐसा कैसे हो सकता है कि एक जवां मर्द के सामने एक खूबसूरत लड़की मौजूद हो और वह उसे अनदेखा करके एक बुढ़िया पर मर मिट रहा हो । इस बात का पता लगाना होगा कि यह चक्कर क्या है ? हो सकता है अमर को साथ रखने से बहुत सी लड़कियाँ और औरतें इस तरह मिसेज ठाकुर से दोस्ती बढ़ाती हों । या यह भी हो सकता है कि अमर एक काल बॉय हो और मिसेज ठाकुर उसके लिए आसामियां तलाश करती हों ।”

“काल बॉय...तुम्हारा मतलब... ?”

“हाँ, मर्द वेश्या...बड़े-बड़े महानगरों में आजकल यह बीमारी भी चल निकली है । पेरिस में तो बताते हैं काल गर्ल्स से अधिक मुनाफे का धंधा काल बॉयज का चल निकला है ।”

“अमर के बारे में तुम्हारी सोच बहुत निम्न स्तर की है...छी...छी...कामिनी...मैं सोच भी नहीं सकती थी कि अमर के सम्बंध में तुम्हारे विचार इस कदर गिर सकते हैं ।”

“मैंने अनुमान ही तो प्रकट किया है डॉली ।” कामिनी ने उसे समझाते हुए कहा – “और मेरा अनुमान गलत भी तो हो सकता है, लेकिन यह भी तो सोचो – उस औरत में आखिर ऐसी क्या खास बात है जो अमर उससे चिपका चिपका घूमता है । खैर अब एक तरकीब और इस्तेमाल करके देखते हैं । तुम यूँ करो मिसेज ठाकुर को अमर के साथ अपने घर दावत पर बुलाओ – इस तरह आना-जाना शुरू होगा । मिसेज ठाकुर भी तुम्हें अपने घर बुलाएंगी और हो सकता है अमर भी तुम्हें अपने घर पर दावत दे ।”

“न बाबा – मैं उन्हें अपने घर पर नहीं बुला सकती ।”

“क्यों ?”

“डैडी को पता चल गया तो... ।”

“एक दिन तो पता चलना ही है – फिर क्यों न बात अभी से आगे बढ़े । तुम्हें यह शुरुआत तो करनी ही होगी । मैं चाहती हूँ मिसेज ठाकुर भी तुम्हारे और करीब आ जाये ।”

डॉली सहमति में गर्दन हिलाने लगी ।

और डॉली को मिसेज ठाकुर की निकटता प्राप्त करने में तुरन्त ही सफलता भी मिल गई । अंततः मिसेज ठाकुर ने दावत के आदान-प्रदान का पहला अवसर स्वयं लिया और डॉली को अपने घर आमन्त्रित कर डाला ।

डॉली उसके घर पहुँच गई ।

लेकिन अमर वहाँ नहीं था । डॉली की निगाहें उसे तलाश कर रही थीं और मिसेज ठाकुर के होंठों पर मुस्कुराहट फैल गई ।

“मैं जानती हूँ तुम किसे तलाश कर रही हो ?” मिसेज ठाकुर ने कहा ।

“ओह मिसेज ठाकुर ! आपका ख्याल ठीक ही है । मैं सोच रही थी कि शायद मिस्टर अमर भी यहाँ उपस्थित हों ।”

“हूं – आओ बैठो । अमर के लिए पागल हो रही हो न ।” मिसेज ठाकुर ने उसकी आँखों में झांकते हुए कहा और डॉली चौंक पड़ी ।

“क......क......क्या मतलब......क्या मतलब ?”

“मूर्ख लड़की । समय बहुत आगे बढ़ चुका है । इस समय कोई ऐसी बात नहीं है जिसे असम्भव कहा जा सके । अपने दिल की बात मुझसे कहोगी तो लाभ में ही रहोगी ।”

“मिसेज ठाकुर......आप.....आप ।”

“हाँ लड़की......मैंने इतनी उम्र यूँ ही नहीं गुजारी, निगाहें समझती हूँ और निगाहों का निशाना समझती हूँ । तुम्हारे बारे में भी अच्छी तरह जानती हूँ– लेकिन अफसोस ! मुझे तुम जैसी लड़कियों पर रहम आता है ।”

“क्या मतलब ?”

“मतलब यह कि आखिर उसमें ऐसी क्या चीज है जिसके लिए तुम पागल हो रही हो ?”

“मिसेज ठाकुर ! आप दिल पर हाथ रखकर यह बात कहें ।”

“क्या मतलब –- क्या मतलब है तुम्हारा ?”

“आप....आप उसे साथ क्यों रखती हैं ?”

“सीधी–सी–बात–है– वह मुझे पसन्द है ।” मिसेज ठाकुर ने कहा ।

“किस हैसियत से ?”

“एक मर्द की हैसियत से ।”

“मिसेज ठाकुर....आप....आप ।”

“हाँ डॉली । अगर हकीकत की दुनिया में हो तो यथार्थ की बातें करो....सपनों की नगरी में रहने से कुछ प्राप्त न होगा । इस दौर में इश्क-ओ-मोहब्बत एक ऐसा उपहासजनक रूप धारण कर चुके हैं कि इंसान इस पर हँस तो सकता है गंभीरता से जीवन में नहीं ले सकता – यह सिर्फ फिल्मी पर्दे पर मनोरंजन की चीज भर रह गए हैं ।”

“मैं नहीं समझी मिसेज ठाकुर ।”

“मैं तुम्हें समझाने की कोशिश करूँगी । पहले यह बताओ कि तुम पियोगी क्या ?”

“कुछ भी मंगवा लें – जो आपका दिल चाहे ।” उसने थके-थके स्वर में कहा ।

मिसेज ठाकुर के होंठों पर एक रहस्यमय मुस्कुराहट फैली हुई थी – फिर उसने नौकर को बुलाकर एक पैग लाने का आदेश दिया और उस समय तक खामोश रही जब तक पैग नहीं आ गया ।

“पियो....” उसने डॉली से कहा और डॉली ने बड़े बड़े घूंट लेकर गिलास खाली कर दिया ।

मिसेज ठाकुर ने जग से दूसरा गिलास भर लिया ।

“मेरा ख्याल गलत तो नहीं है – तुम उसे चाहती हो न ?”

“हाँ ।” डॉली ने फंसी-फंसी आवाज में कहा ।

“उसे प्राप्त करना चाहती हो ?”

“हाँ ।” वह रो देने वाले अंदाज में बोली ।

“उम्र भर के लिए ?”

जवाब में डॉली खुश्क होंठों पर जुबान फेरने लगी ।

“देखो मूर्ख लड़की – पुरानी मान्यताएं इंसानी जीवन में एक आवश्यकता अवश्य होती है परन्तु बदला हुआ वक्त कुछ परिवर्तन चाहता है । प्रेमी और पति अब एक वस्तु नहीं, दो वस्तुओं के नाम हैं । जो प्रेमी हो उसे खत्म करना चाहो तो पति बना लो – सारी जिंदगी रोते गुजरेगी । आज का वातावरण कहता है, एक साड़ी खरीदो – पहनो और उतार दो – बस । समझ रही हो मेरी बात ।”

“हाँ ।” डॉली ने कहा ।

“मैं तुम्हारी सहायता कर सकती हूँ ।”

“क्या मतलब ?”

“मतलब यह कि तुम्हारी सहायता कर सकती हूँ । तुम उसे प्राप्त करना चाहती हो न, तो मेरे साथ पार्टनरशिप कर लो ।”

“मैं समझी नहीं ।”

“अमर एक दिलचस्प केस है – एक मासूम सा – बुजदिल नौजवान । कोई लड़की उसका हाथ पकड़े तो दुम हिलाता चला जायेगा । और अगर सारा जीवन कोशिश करे तब भी वह अपने विचार प्रकट नहीं करेगा ।”’

“ओह !” डॉली को बड़े गुर की बात मालूम हुई थी ।

“मैंने यही किया है । मैंने उसका इंतजार नहीं किया, बल्कि आगे बढ़कर लपक लिया है । और अब वह बोतल का जिन है । अब वह मेरे कब्जे में है । मैं चैलेन्ज करती हूँ कि अब कोई लाख कोशिश करे इस जिन को काबू में नहीं कर सकता ।”

“मिसेज ठाकुर ! मैं....मैं.... ।” डॉली कंपकंपाती आवाज में बोली ।

“सच बताओ डॉली – क्या तुम मेरे साथ जानबूझकर नहीं हारती रही हो ?” मिसेज ठाकुर ने उसकी आँखों में झांकते हुए कहा और डॉली ने आँखें झुका लीं

– “क्या यह सच्चाई नहीं है ?” मिसेज ठाकुर ने दोबारा पूछा ।

“हाँ ।” उसने गहरी साँस ली ।

“सिर्फ तुम ही नहीं, बहुत सी महिलाओं ने मुझे बहुत कुछ दिया है । तुम क्या समझती हो –मुझे इसकी जरूरत है । अगर यह विचार तुम्हारे जेहन में है तो इसे निकाल दो – मेरे पास दौलत की कमी नहीं है ।”

“सॉरी मिसेज ठाकुर ।”

“कोई बात नहीं डार्लिंग । मैं भी इन ऊँचे घराने की महिलाओं का खेल देख रही हूँ और उनसे आनंद उठा रही हूँ । आज तक मैंने तुम्हारी कितनी रकम जीती है ?”

“मुझे याद नहीं ।”

“मुझे याद है – पैंतीस हजार सात सौ अट्ठाईस रुपये – इन्हें मेरे पर्स से निकाल लो ।”

“ओह नहीं – आप यकीन करें – मुझे इनकी जरूरत नहीं है ।”

“तब फिर अपने उद्देश्य की प्राप्ति के लिए सिर्फ मेरे सुझावों पर कार्य करो – पूरी गोपनीयता के साथ ।”

“मैं तैयार हूँ मिसेज ठाकुर । लेकिन.... ।”

“लेकिन-वेकिन कुछ नहीं –- बस फिफ्टी-फिफ्टी – आधा मेरा आधा तुम्हारा ।” मिसेज ठाकुर ने आँख दबाकर कहा और डॉली बुरी तरह शर्मा गई । उसके कानों की लौएं सुर्ख हो गईं थीं ।

☐☐☐
 
ऐसी बातों में कामिनी को राजदार नहीं बनाया जा सकता था – कामिनी कभी इसकी अनुमति नहीं देती । उसने सोचा कि एक बार अमर हाथ तो आये । बस जरा सी कोशिश और फिर अमर उसकी मुट्ठी में होगा – उसके लिए सबकुछ किया जा सकता है । यूँ भी अमर उसका जीवनसाथी तो होगा ही – उसका होने वाला पति – और जिसे उसने जीवन साथी मान लिया है उसके समक्ष एक न एक दिन तो अपना कुंवारापन समर्पित करना ही होगा ।

दिल में बड़ी अजीब सी हलचल थी – आखिर वह इस स्थिति का किस तरह सामना करेगी । ठीक वक्त पर वह धड़कते दिल से मिसेज ठाकुर के घर पहुँची ।

शयनकक्ष में मिसेज ठाकुर के साथ अमर भी उपस्थित था । आकाश पर बादल छाये हुए थे – और किसी भी समय बारिश हो सकती थी । यह भी तो सावन के दिन थे – बारिश कभी थम थमकर आती है तो कभी जम जमकर बरसती है ।

अरमानों की एक आग लिए डॉली बेडरूम में प्रविष्ट हुई । मिसेज ठाकुर की आँखों से मस्ती टपक रही थी – उसने मुस्कराकर डॉली का स्वागत किया – अमर ने भी मुस्कराकर गर्दन झुका दी ।

और फिर मिसेज ठाकुर ने खेल शुरू किया । उसने बाहर जाकर किसी पेय के दो जग बनाये और ट्राली पर सजाये अंदर आ गई । अमर इस मध्य खामोश बैठा उँगलियाँ मरोड़ता रहा था ।

“चलो शुरू हो जाओ ।” मिसेज ठाकुर ने कहा और तीनों ने गिलास उठा लिए ।

मिसेज ठाकुर ने डॉली को आँख का इशारा कर दिया था – डॉली सम्भल गई । उसने अपने गिलास से एक भी घूंट नहीं लिया जबकि अमर और मिसेज ठाकुर ने गिलास खाली कर दिया । मिसेज ठाकुर ने दोबारा गिलास भर लिया और फिर उसने सिर्फ अमर को पिलाई और फिर चंद क्षण बाद ही अमर की आँखें सुर्ख हो गईं ।

मिसेज ठाकुर के अंदाज में डॉली को देखा और डॉली ने आँखें झुका लीं ।

तभी अचानक अमर बोल पड़ा –

“बुआ....ऐ बुआ ।” उसने भौंडी सी आवाज में मिसेज ठाकुर को पुकारा – और मिसेज ठाकुर का मुँह हैरत से खुल गया ।

“किसे कह रहे हो अमर ?”

“यह साड़ी कितने की खरीदी है ?” उसने मिसेज ठाकुर की साड़ी हाथ में लेकर देखते हुए कहा ।

“क्यों पूछ रहे हो अमर ?” मिसेज ठाकुर ने पलकें झपकाई ।

“ऐ बांधूंगी मैं भी और काहे को पूछ रही हूँ, सच्ची बुआ – बड़ा दिल चाहे है साड़ी बांधने को ।” अमर ने तालियां फटकारते हुए कहा – साथ ही वह लचकता जा रहा था ।

“क्या व्यर्थ बकवास कर रहे हो अमर – तुम मर्द होकर साड़ी बांधोगे ।”

“मर्द होगी तू खुद....मैं तो लौड़ियां हूँ....कुंवारी.... हाय-हाय मुझे मर्द कह रही है । मेरे पैरों में घुंघरू बंधाय दे तो फिर मेरी चाल देख ले ।” अमर ने एक कूल्हे पर हाथ रखकर ठुमकते हुए कहा ।

“अमर....अमर....क्या बकवास है यह.... ?” मिसेज ठाकुर के चेहरे पर झुंझलाहट के भाव प्रकट हो गए ।

“इमरती नाम है मेरा तो...अमर होगा कोई और हाँ । ऐ मैं तो इमरती हूँ – मिस इमरती ।” अमर ने तालियां बजाकर ऊपरी बदन हिलाया ।

“चढ़ गई है इसे ।” मिसेज ठाकुर फीके स्वर में बोली ।

“जा री कमीनी कहीं की – चढ़े मेरे दुश्मन को...मैं तो चार बोतलें खाली कर दूँ और डकार न लूँ – ऐ चन्दा की चांदनी में झूमे झूमे मेरा दिल ।” अमर ने जोर-जोर से गाना शुरू कर दिया ।

मिसेज ठाकुर सिर थामकर बैठ गईं ।

“राम कसम । तुम दोनों बड़ी मूर्ख हो – बहन हम न तो मर्द हैं न औरत – ऐ हम तो जन्नत की चिड़िया हैं, ऐ हम तो छक्के हैं छक्के....बाप कहे तो लड़का....माँ कहे तो लड़की....झूमे–झूमे दिल मेरा.....अंगड़ाई भी आने लगी – ऐ मस्ती भी छाने लगी ।”

“बकवास बन्द करो ।” मिसेज ठाकुर मुट्ठियाँ भींचकर चीखीं ।

“आये हाये तू चीख क्यों रही है ? खुद तो बुलाकर लाई थी, कमीनी कोख जली । हमें राम ने जो बनाया है वही तो हैं – ऐ हम कैसे बदल लें खुद को – झूमे-झूमे दिल मेरा गाये – गाये दिल मेरा... ऐ चांदना की चांदनी में ऐ नाचे नाचे दिल मेरा.... ।



और फिर अमर गाता, ठुमके लगाता, तालियां फटकारता दरवाजा खोलकर बाहर निकल गया । वह निरन्तर गा रहा था और नौकर उसके गिर्द जमा हो गए थे ।

अंदर मिसेज ठाकुर और डॉली हक्का-बक्का एक दूसरे की शक्ल देख रही थीं ।

अचानक बिजली की चमक धरती की तरह लहराती आई – शयनकक्ष की खिड़की से उसकी लकीर साफ-साफ जमीन पर गिरती दिखाई दी और फिर बादल भयानक गर्जन के साथ मानो फट पड़े हों ।

डॉली ने दोनों हाथों से अपना कान दबा लिए – और फिर उसने महसूस किया, उसकी हथेलियाँ पसीने से भीगी हुई हैं ।

☐☐☐
 
विक्रांत न जाने कैसे मूड में था । दिलीप और समर सख्त हैरान थे । समर ने तो निहायत मायूसी के आलम में फोन किया था । उसने फोन पर विक्रांत को अपनी गलती बताई थी और जब चंद क्षणों के लिए फोन पर खामोशी छा गई तो दोनों के दिल तेजी से धड़कने लगे थे ।

“उसे अपने निवास-स्थल पर लाने की क्या आवश्यकता थी । घर से दूर रहकर यह हरकतें नहीं की जा सकती ?”

“गलती हो चुकी है बॉस ! मैं सिर्फ आज्ञा की प्रतीक्षा में हूँ ।” समर ने कहा ।

“दिलीप के साथ रहो । दूसरा कोई प्रबन्ध होने तक तुम्हें वहीं रहना चाहिए । खुद को सुरक्षित रखने के लिए यह आवश्यक है कि हर मूर्खतापूर्ण हरकत से खुद को दूर रखा जाये । दूसरी गलती माफ नहीं की जायेगी ।” विक्रांत ने कहा और फोन बन्द कर दिया ।

समर हैरत से रिसीवर को घूरता रह गया और जब उसे विक्रांत के शब्दों का यकीन आया तो उसके कंठ से हर्ष भरी चीख निकल गई । दिलीप ने उसे दिल खोलकर शुभकामनायें दी थीं । समर वास्तव में एक बहुत बड़े खतरे से निकल गया था ।

“अनोखी बात है यार । यह विक्रांत इतना नर्म दिल कब से हो गया । बहरहाल तुम्हारी खुशकिस्मती है ।” दिलीप ने कहा और उसके बाद दोनों दोस्त साथ रहने लगे ।

विक्रांत इन दिनों खामोश बैठा हुआ था – कोई विशेष काम नहीं था । एक दो दिन तो इस घटना के प्रभाव में व्यतीत हो गए, फिर वे अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में लौट आये ।

समर की कहानी गिरोह के दूसरे लोगों को भी ज्ञात हो गई थी – और वे भी चकित हुए थे । इस अनोखी लड़की के लिए उनके दिलों में भी हलचल थी ।

अशरफ ने कहा – “यार इसकी तो जियारत करनी चाहिए ।”

“सुअर की बच्ची, बस एक बार मिल जाये तो शक्ल बिगाड़ दूँ उसकी ।” समर ने कहा ।

“शक्लो-सूरत कैसी थी ?” अशरफ ने पूछा ।

“यार खूबसूरत तो खासी ही थी और सलीके की मालूम होती थी । मगर बातें ऐसी कर रही थी जैसे लड़की न हो हिजड़ा हो ।” समर ने जवाब दिया ।

“बन रही होगी । मैं तो समझता हूँ बहुत ही चालाक लड़की थी, जो इस तरह शिकार फांसने निकलती होगी और लोगों को मूर्ख बनाकर कुछ ऐंठ लेती होगी । मेरा ख्याल है कि अगर तुम कुछ रकम देकर उसे खामोश करने की कोशिश करते तो वह हो जाती ।”

“वह कैसे ?”

“यह फ्लैटों की जिंदगी भी कोई जिंदगी है । हर समस्या का हल पड़ोसियों के पास होता है । जरा सी घर में तेज आवाज हो, दर्जनों पड़ोसी दरवाजे के बाहर जमा हो जाते हैं । अशरफ तुम खुशनसीब हो – तुम्हारा मकान सैपरेट है और तुम्हें ऐसे किसी खतरे से दो-चार नहीं होना पड़ता ।

“हाँ – यह हकीकत है । मकान भी सैपरेट है और यह दिलचस्प बात है कि उसके आस-पड़ोस में कोई आबादी नहीं है । सबसे पहला बंगला भी लगभग आधा फर्लांग फासले पर है । चीखते रहो – कोई आवाज ही नहीं जाती । इस सिलसिले में अपना इलाका बहुत उम्दा है ।” अशरफ ने कहा ।

“हम भी कोशिश करके विक्रांत से ऐसा ही निवास स्थल मांगेंगे, चाहें मकान छोटा हो लेकिन इस किस्म के झगड़े से स्वतंत्र हो ।” दिलीप बोला ।

“हमारे अपने काम के लिए भी यह आवश्यक है ।” समर ने कहा ।

इस समय वह सभी दोस्त यही वार्ता करते हुए जा रहे थे । उद्देश्य कुछ भी न था – जेहन में सिर्फ तफरीह का ख्याल था । आवारागर्दी और तफरीह के साधन की तलाश थी ।

थोड़ी ही दूर कार चली होगी कि एकाएक समर के कंठ से एक आवाज निकल गई जो चीख जैसी ही थी ।

“खैरियत – क्या बात है ?” अशरफ ने पूछा ।

“यार अशरफ....यार वही है – कसम से वही है ।” समर ने कहा और अशरफ ने कार के ब्रेक पर पांव रख दिया ।

“कौन थी ?” अशरफ ने उधर देखा और फिर कार सड़क के किनारे खड़ी कर दी ।

“वही लड़की – वही जलील हरामजादी ।” समर ने नथुने फुलाकर कहा और अशरफ और दिलीप उसके संकेत पर दृष्टि दौड़ाने लगे ।

वह एक फुटपाथ पर बस स्टॉप के साथ खड़ी हुई थी । अशरफ ने उसे देखकर अर्थपूर्ण अंदाज में गर्दन हिला दी ।

“खूब – चीज तो वाकई उम्दा है ।”

‘तो फिर क्यों न इस चीज को साथ ले लिया जाये ?” समर ने कहा ।

“बात भी तुम्हारी उम्दा है – क्या ख्याल है, ट्राई करूँ ?” अशरफ ने कहा ।

“मैं बताऊँ ।” समर ने कहा और दोनों दोस्त उसे देखने लगे “यूँ करो अशरफ – तुम अकेले चले जाओ । हम दोनों टैक्सी में आ रहे हैं । मेरा ख्याल है कि वह तैयार हो जायेगी और फिर तुम उसे सीधे अपने बंगले पर ही ले जाना । हम पीछे-पीछे आ जायेंगे ।

“वेरी गुड – चलो तफरीह का सामान तो मिला ।” अशरफ ने कहा और समर गर्दन हिलाने लगा ।

“मैं अच्छी तरह तफ़रीह करूँगा ।” समर ने ठोस स्वर में कहा और फिर दोनों गाड़ी से नीचे उतर गए ।

अशरफ ने बड़े आत्मविश्वास से गाड़ी आगे बढ़ाई । थोड़ी सी आगे ले जाकर बिल्कुल उसके समीप रोक दी ।

उस दिलकश लड़की ने अपनी कजराई हुई आँखें उठाकर उसे देखा और फिर उसके होंठों पर हल्की सी मुस्कुराहट फैल गई ।

“क्षमा कीजियेगा मिस...मैं आपको थोड़ा कष्ट दे रहा हूँ । क्या आप अनुमान लगा सकती हैं कि हमारी और आपकी मुलाकात पहले कहाँ हुई है ?” अशरफ ने मुस्कराते हुए पूछा ।

“शायद आसमानों पर ।” उसने मुस्कराकर जवाब दिया ।

“अरे हाँ । हम दोनों छोटे से थे, बिल्कुल नन्हे-मुन्ने से । आइये न अंदर बैठकर बातें होंगी ।” यह कहते हुए अशरफ ने कार का दरवाजा खोल दिया ।

वह अंदर बैठ गई ।

अशरफ के दिल में गुदगुदी सी हो रही थी । लड़की कदाचित पहले से ही शिकार की तलाश में खड़ी थी । उसके शरीर से उठने वाली भीनी-भीनी महक ने अशरफ को मस्त कर दिया । उसने भी वही सारी बातें सोचीं जो इससे पूर्व श्रीमान समर साहब सोच चुके थे ।

तो आसमानों की उस मुलाकात को हमारे जेहनों ने आज तक याद रखा ।” अशरफ बोला ।

“हाँ – जेहन हमेशा हर बात को सुरक्षित रखता है ।” उसने उत्तर दिया ।

“क्या नाम है आपका ?”

“गुल बकावली ।” वह हँसकर बोली । हँसी भी खासी दिलकश थी लेकिन आवाज में एक फटा-फटापन प्रकट होता था – फिर भी यह कोई ऐसी बात नहीं थी – कुछ लड़कियों की आवाजें किसी सीमा तक मर्दानगी लिए होती हैं ।

“ठीक – ठीक – ठीक – आप यकीनन एक तालाब में उगी होंगी और मैं तालाब के किनारे बरगद का पेड़ रहा हूँगा ।”

“बरगद का पेड़ ।” लड़की फिर हँस पड़ी – नहीं – नहीं – मैं ऐसी गुस्ताखी तो नहीं कर सकती, आप तो बड़े दिलकश आदमी हैं ।”

“खूब....खूब....और आप बड़ी चालाक ।” अशरफ ने मुस्करा कर कहा ।

“क्यों ? इसमें चालाकी की क्या बात है ?”

“देखिये न, आपने नाम किस खूबसूरती से छिपा लिया है ।”

“नामों का छिपे रहना ही अच्छा होता है ।” वह दार्शनिकों के अंदाज में बोली ।

“दोस्तों से भी ?”

“अभी हमारी और आपकी दोस्ती हुई कहाँ ?”

“मेरा ख्याल है हम अच्छे दोस्तों की तरह सफर कर रहे हैं । मेरा नाम अशरफ है और अगर आपका दिल चाहे तो अपना नाम बता दें ।”

“ठीक है – दिल चाहेगा तो बता दूँगी ।” उसने गहरी साँस लेकर कहा और अशरफ गर्दन मरोड़कर उसकी सूरत देखने लगा ।

समर ने जितना कुछ उसके सम्बन्ध में बताया था – वैसी बात तो नहीं थी – वह निहायत नफासत पसंद, अच्छा लिबास पहने हुए थी और एक ही नजर में काफी खूबसूरत स्मार्ट लड़की मालूम होती थी ।

लेकिन समर का बयान भी गलत नहीं हो सकता था – एक लड़की के लिये वह अपने दोस्त के बयान पर संदेह नहीं कर सकता था – अतः उसने धोखा न खाने का फैसला कर लिया । कार उसके बंगले की तरफ बढ़ रही थी ।
 
काम इतनी सरलता से बन गया था कि अशरफ को आश्चर्य हो रहा था । हालाँकि दिन-दहाड़े यह सब कुछ सम्भव नहीं था । लेकिन असम्भव संभव हो गया था । थोड़ी ही देर बाद वह अपने बंगले पर पहुँच गया । उसे यकीन था कि उसके दोनों दोस्त आते ही होंगे । उसने कार को बंगले के गेट के बाहर ही खड़ा कर दिया और फिर उस लड़की को लेकर अंदर आ गया ।

लड़की बेतकल्लुफी से पर्स को झुलाती हुई उसके साथ अंदर प्रविष्ट हो गई । वह उसे ड्राइंगरूम में ले आया ।

“तुम्हारा मकान है ?” उसने पूछा ।

“जाहिर है ।”

“बहुत खूबसूरत है – मुझे ऐसे मकान पसंद हैं ।”

“क्यों ? इसमें ऐसी क्या खासियत है ?”

“बस – मुझे पसंद है ।” वह इठलाकर बोली । और अशरफ उसे गहरी निगाहों से देखने लगा । चेहरे-मोहरे से लड़की किसी तरह भी फ्रॉड नहीं लगती थी । लेकिन अशरफ को उससे अधिक अपने दोस्त के बयान पर विश्वास था । समर ने जो कुछ कहा था गलत नहीं हो सकता ।

“कितने अरसे से इस प्रोफेशन में हो ?” अशरफ बोला ।

“कहाँ हो ?” उसने पूछा ।

“मेरा मतलब है कब से यह कारोबार कर रही हो ?”

“मेरे पास भगवान का दिया सबकुछ है । मैं कोई कारोबार नहीं करती ।”

“क्या पियोगी ?”

“जौ के सत्तू ।” उसने इत्मीनान से उत्तर दिया ।

“मैं लाता हूँ ।” अशरफ ने शरारत भरी मुस्कुराहट से कहा और ड्राइंगरूम का दरवाजा खोलकर बाहर निकल आया । दिल ही दिल में उसने कहा – “अभी वह आते ही होंगे, जौ के सत्तू पिला देंगे ।”

मेन गेट पर एक टैक्सी रुकी – उससे समर और दिलीप उतरते दिखाई दिए और चंद क्षण बाद अंदर प्रविष्ट हो गए ।

“कहाँ है ?” समर ने बेइख़्तियार पूछा ।

“ड्राइंगरूम में बन्द कर दिया है । ससुरी कप, यह तुम्हारे हाथ में क्या है ?”

“हंटर – रास्ते में खरीदा है ।” समर ने जवाब दिया ।

“खतरनाक इरादे हैं – मगर तुम्हें यकीन है कि यह वही है ?”

“हंड्रेड पर्सेंट – और मैं तो इस सुअर की बच्ची की खाल उधेड़ दूँगा ।” समर ने कहा और फिर वह तीनों अंदर प्रविष्ट हो गए ।

अशरफ के साथ समर और दिलीप को देखकर लड़की खड़ी हो गई । उसने आश्चर्य से अशरफ को देखते हुए कहा – “यह जौ के सत्तू हैं ।”

“हाँ – जल्दी में यही मिले थे ।” अशरफ ने कहकहा लगाया ।

समर क्रोधित दृष्टि से लड़की को देख रहा था ।

“रपट लिखोगे थानेदार जी ।” वह मुस्कराकर बोली ।

“अब बोल सुअर की बच्ची – बड़ी पवित्र बन रही थी उस रात – बोल अब मैं तेरे साथ क्या सलूक करूँ ?” समर गरजा ।

“जो सिकन्दर ने पोरस के साथ किया था ।” वह इत्मीनान से बोली ।

“सारी मुंहजोरी न निकाल दूँ तो समर मेरा नाम नहीं ।”

“मर जाऊँ....मुओ – कैसे – कैसे गबरू जवान हो – मारोगे मुझे, किस माँ के जने हो ? नाम तो बता दो ।” वह हवा में हाथ घुमाकर बलाएँ लेने लगी ।

और तीनों की स्थिति बड़ी विचित्र हो गई । कभी उन्हें क्रोध आता और कभी आश्चर्यचकित रह जाते । लड़की अब दांत किटकिटा रही थी – खुश्क होंठों पर जुबान फेरते हुए वह समर के हाथ में दबे हंटर को देख रही थी ।

समर आगे बढ़ा और उसने लपककर लड़की का गिरेबान पकड़ लिया ।

“अब मचा शोर हरामजादी – अब यहाँ नई एक्टिंग कर रही है । लेकिन यहाँ तेरी कोई चालाकी नहीं चलेगी । पहले तो मैं तुझे नंगी करूँगा – फिर तेरी खाल उतारूँगा ।” इतना कहकर समर ने एक झटके से उसकी कमीज के बटन तोड़ दिए ।

दूसरे ही क्षण उन लोगों की आँखें हैरत से उबल पड़ीं ।

लड़की का ऊपरी शरीर नग्न हो गया था और उसका जो बदन प्रकट हुआ – वह एक चौड़ा चकला चट्टानी सीना था – जिसमें नारीत्व की नजाकत का कहीं कोई अस्तित्व ही न था । कृत्रिम उपाय से सीने को उभारकर नारी रूप दिया गया था । लेकिन अब वह किसी ठोस शरीर वाले जवान का सीना था ।

“य...यह तो मर्द है....” अशरफ आश्चर्य से बोला ।

“गाली मत दो सूफी साहब ! हम तो भगवान की अमानत हैं – न मर्द न औरत... ऐ हम तो जनखे हैं....हिजड़े हैं...राम कसम जब बनाने वाले ने अपना काम पूरा नहीं किया तो हम क्या करें.... ?” उसने तालियां बजाकर लचकते हुए कहा ।

अशरफ के गालों पर दाढ़ी थी जिस कारण उसे सूफी साहब कहा गया था ।

“तू लड़की बनकर मर्दों को मूर्ख बनाता है ।” दिलीप ने कहा ।

“लड़का बनें तो औरतें मूर्ख बनाती हैं । बताओ हम क्या करें ? हाय हम बीच में क्यों रह गए राम कसम....”

“हरामजादे....तूने मुझे घर से बेघर कर दिया है । मैं तेरी खाल उतार दूँगा ।” समर ने झुंझलाए अंदाज में कहा और हंटर घुमा दिया ।

पूरा हंटर उसके ऊपरी बदन पर पड़ा और एक लकीर छोड़ गया ।

“कुर्बान जाऊँ.....ऐ मर जाऊँ...ऐ वारी जाऊँ...मुए मर्द है तू....बाजुओं में जान तो है नहीं –-मारने चला है । ऐ रख दो हंटर, लानत हो तुम पर, नाम समर, पहाड़ों का राजा और काम मच्छरों का ।” उसने कहा ।

अशरफ सिर खुजाने लगा ।

लेकिन समर खार खाये बैठा था । दूसरी बार पूरी शक्ति से उसने हंटर घुमाया । इस विचित्र चीज ने अपने को बचाने की कोशिश नहीं की और यह दूसरा भरपूर वार भी उसके शरीर पर ही पड़ा ।

“ऊंहूं....हाथों में जान ही नहीं....ऐ चूड़ियाँ पहन लो – ऐ मैं कोई मर्द हूँ जो इस फुलझड़ी से डर जाऊँ – अब भी मुझे लड़की ही समझ रहे हो ?”

“कुतिया के बच्चे ।” समर दांत पीसकर बोला और उसके बाद उसने शरीर की सारी शक्ति खर्च कर दी । उसके बदन पर हंटर के सुर्ख चिन्ह बनते जा रहे थे । कुछ स्थानों पर खून भी छलक आया था– लेकिन चेहरे पर शिकन भी नहीं थी ।

जरा सी देर में समर थक गया ।

“इन भेड़ों की मदद लो अब – तुम्हारी जान तो निकल गई – यह दोस्त हैं तुम्हारे – कैसे खड़े हैं अलग ?”

“मर जायेगा मेरे हाथों ।” समर चीखा ।

“अबे जाओ छक्कों – मैं बताने आई थी तुम्हें । ऐ तुम शक्ल के मर्द हो – जाओ –जाओ – बाजुओं की मालिश कराओ पहले, आये हैं मेरे सामने ।”

“दिलीप, जरा देखो इसे ।” समर ने हंटर उसकी तरफ उछाल दिया – जिसे दिलीप ने उचक लिया ।

“हम शक्ल से मर्द नहीं लगते तुझे ?” वह बोला ।

“किसी लानतपड़ी ने जना था तुम्हें । पैदा हुए होंगे तो बाप ने ढोल बजाये होंगे कि बेटा पैदा हुआ है – झाड़ू फिरे – बेटे ऐसे होते हैं ।”

और दिलीप ने पूरी शक्ति से हंटर बरसाना शुरू कर दिया ।

“ऐ वारी...ऐ सदके जियो जब तक जी चाहे, जरा एक हाथ और दिखाना ।” उसके शरीर में सरूर था ।

दिलीप ने यह बरसात जारी रखने के लिए फिर हाथ उठाया । तभी अशरफ ने उसका हाथ पकड़ लिया ।

“मेरे ख्याल में तुम दोनों ही पागल हो गए हो – मर गया तो खून गर्दन पर आ जायेगा ।” अशरफ ने कहा ।‘

“लो ।” वह तीसरा बोला – “ऐ सूफी साहब तुम बाहर ही जाकर मरो...कहाँ मर्दों में आ गए हो...जाओ मियां । यह मर्दों के खेल है । तुम तो मुझे किसी बाई जी के कोठे के तबलची लगते हो ।”

“मैं दावे से कहता हूँ समर – यह पागल है और किसी पागल को मारने से कोई फायदा नहीं ।” अशरफ बोला ।

और दिलीप का हाथ रुक गया ।

“देखो बच्चों । या तो मुझे जी भर के मारो, वरना फिर मैं तुम्हें मारूँगी । एक तो मुझ दुखिया को पकड़ लाये हो, ऊपर से यह सलूक । मारो मुझे, ऐ हरामियों मारते क्यों नहीं मुझे ?”

अब परिस्थिति दूसरी ही हो गई थी । उन लोगों की बुद्धि तो पहले ही भ्रष्ट हो गई थी – और नई परेशानी अब शुरू हुई । वह एक-दूसरे की सूरतें देख रहे थे और ठीक उसी समय दरवाजे पर किसी के कदमों की चाप सुनाई दीं ।

तीनों की गर्दनें घूम गईं । और फिर उनके मुँह हैरत से खुल गए । दरवाजे पर विक्रांत खड़ा था । हंटर दिलीप के हाथ से गिर गया ।

“क्या कर रहे हो तुम लोग ?” भीमकाय और खूंखार शक्ल में विक्रांत के मुँह से गुर्राहट निकली ।

“ओह...बॉस...वह, यह....ओह बॉस ।” अशरफ ने उसकी तरफ संकेत किया और पहली बार विक्रांत ने कमरे के मध्य में बैठे हुए इस मर्दनुमा औरत या औरतनुमा मर्द को देखा और दूसरे ही क्षण वह कांप गया ।

“अरे....अरे...सुअर के बच्चों....यह...यह क्या कर रहे हो, अरे यह तुमने क्या किया । उस्ताद....हुजूर आप...आप...यहाँ....आप यहाँ कहाँ गुरु ।....आखिर यह क्या हो रहा है ?” विक्रांत की आवाज में बेपनाह खौफ था ।

उन्होंने विक्रांत के शरीर में कंपकंपी देखी ।

विक्रांत विद्युत गति से आगे बढ़ा और उस विचित्र शख़्सियत के कदमों में बैठ गया – दूसरे ही क्षण एक जोरदार लात विक्रांत के सीने पर पड़ी और भीमकाय विक्रांत उछलकर दूर जा गिरा ।

उस विचित्र इंसान की आवाज उभरी – “तू कहाँ से आ गया ?”

“यह...यह साले मेरे आदमी हैं हीरा उस्ताद ।” विक्रांत ने मुर्दा आवाज में कहा ।

☐☐☐

जरायम की दुनिया में हीरा का नाम जिस तेजी से उभरा था इससे पहले शायद ही कोई मुजरिम इतने कम समय में चमका हो । बात सिर्फ दिल्ली तक ही सीमित नहीं थी । हीरा आस-पड़ोस के प्रदेशों में भी मुजरिमों और पुलिस के लिए एक जाना-माना नाम बन गया था । उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश की पुलिस उसे हीरा डाकू के नाम से तलाश कर रही थी । हरियाणा में वह कुख्यात तस्कर की हैसियत से जाना जा रहा था और दिल्ली के बदमाश उसे हीरा उस्ताद कहते थे । यहाँ पुलिस उसे एक खतरनाक ब्लैकमेलर की हैसियत से तलाश कर रही थी ।

लेकिन पुलिस ने हीरा का नाम और कारनामे तो सुने थे परन्तु उनके पास न तो हीरा की तस्वीर थी और न कोई प्रमाण, जिसके आधार पर उसे अदालत तक पहुँचाया जाता ।

यूँ हीरा पुलिस के लिए आतंक नहीं बना था – उसने अभी तक ऐसा कोई जुर्म नहीं किया था जो सीधे पुलिस से उसका टकराव हो जाये, बल्कि एक अजीब किस्म का मुजरिम था – पुलिस ने उसकी सूचनाओं और प्रमाणों पर बहुत से अपराधियों को गिरफ्तार भी किया था – लेकिन कई जगह ऐसे मामले सामने आये थे जब बदमाश लोग हीरा को कमीशन देकर काम करते थे – वे पुलिस से अधिक हीरा से खौफ खाते थे ।

हीरा नाम का यह मुजरिम वास्तव में गुंडे-बदमाशों के लिए आतंक एक सिरदर्द बन गया था । हीरा से छिपकर जुर्म करना अब जान जोखिम में डालने जैसा था । शहर का बड़े सा बड़ा बदमाश उसके अधीन था ।

इतने कम अरसे में इतनी अधिक दहशत और इतना विस्तारवादी नाम किसी मुजरिम ने नहीं कमाया था और सबसे दिलचस्प बात यह थी कि हीरा को किसी मुजरिम ने देखा भी नहीं था – सिर्फ गिनती के मुजरिम थे जो शायद हीरा को पहचानते थे और ये सभी बड़े गिरोह के सरगना थे ।

विक्रांत भी एक ऐसा मुजरिम था जो हीरा को पहचानता था ।

और हीरा जैसी रहस्यमय हस्ती को इस रूप में देखकर तीनों ही दंग थे बल्कि आत्मा तक कांप रही थी ।
 
Back
Top