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वक्त की धूल

विक्रांत के शब्द सुनकर मर्दनुमा औरत या औरतनुमा मर्द चौंककर उसे देखने लगा । उसकी आँखों में न जाने क्या था कि विक्रांत का रंग एकदम पीला पड़ गया ।

“अ....ओह....म.....मैं.....अरे.... ।” विक्रांत के मुँह से विचित्र सी घिघियाती आवाज निकली ।

“हाय...तू क्या बकरी का जना है....जो मैं...मैं कर रहा है – मर्द बच्चा है तो मर्दों की शान तो रख....तूने तो हम जैसी को मात कर दिया – हाय दैय्या....हाय अम्मा.... ।” वह अपना लिबास सँभालने लगा ।

उसके अंदाज में वही लचक मटक थी जो हिजड़ों में पाई जाती है ।

विक्रांत उठ खड़ा हुआ । वह खुश्क होंठों पर जुबान फेर रहा था और उसकी आँखों में भय के भाव स्पष्ट झलक रहे थे ।

“हाय....अब मुझ निगोड़ी का फैसला तो करो –यहीं पड़े –पड़े मर जाऊं क्या – जवान जहान को सड़क से उठा लाये हो – ऐसी भोली हूँ मैं तो हरेक की बातों में आ जाऊँ....ऐ विक्रांत भैय्या मुझे ठिकाने तो लगा दो – भगवान तुम्हें खुश रखे – इन मुओं ने तो मुझे कहीं का न रखा । मैं जाऊँगी अब – बच्चे इंतजार कर रहे होंगे ।”

“जो हुक्म उस्ताद ।”

“मोटर तो होगी तुम्हारे पास विक्रांत जी ?”

“मौजूद है ।” विक्रांत ने कहा । उसके शरीर में अब भी कंपकंपी थी । वह अत्यधिक कोशिशों के बावजूद इस कंपकंपाहट पर काबू नहीं पा सका था । अपने आदमियों को हिदायत दिए बिना चल पड़ने के लिए तैयार हो गया ।

विक्रांत अपने काले रंग की मर्सडीज का दरवाजा खोलकर खड़ा हो गया और हीरा उस्ताद गुनगुनाता हुआ अंदर आ बैठा ।

“हाय छोड़ मेरी कलाई, मुझे न सता....सैंया डोले मेरा मन क्यों मुझे बता, ऐ चलो न विक्रांत जी – जल्दी करो – मोहे गर्मी लगे है ।”

विक्रांत ने स्टियरिंग सीट पर बैठकर मर्सडीज स्टार्ट की और कार आगे बढ़ा दी । लेकिन उसके हाथ अब भी कांप रहे थे । हीरा उसकी तरफ अनदेखा करके अब भी गुनगुना रहा था ।

“मुझसे बहुत बड़ी गलती हो गई उस्ताद ।”

“भगवान माफ करेगा भैया । इंसान गलतियों का पुतला है – ऐ हमें देखो – खुद हमसे कितनी बड़ी गलती हुई है ।”

“आपसे उस्ताद ?”

“तो और क्या – माँ के पेट में छिप गए होते...खाक में मिल गए होते...ऐ दुनिया को मुँह दिखाने से इंकार कर देते – मगर गलती तो होनी ही थी सो हो गई । इस दुनिया में आ गए – तीन में न तेरह में – लौंडिया सहेली न बनायें –लौंडे दोस्त न बनायें, घर के न घाट के – धोबी के कुत्ते की तरह मारे-मारे फिर रहे हैं – बोलो क्या करें ?”

“आप बहुत कुछ हैं उस्ताद ।”

“चल री मरी के लिए – खुशामद न करियो – दिल जले हैं इन बातों से, ऐ उधर मोटर ले जा नया नगर की तरफ ।” हीरा ने अब मार्ग-दर्शन किया ।
 
विक्रांत ने कार का रुख नया नगर की तरफ कर दिया और फिर वह खामोश हो गया । उस्ताद का निवास स्थल उसे ज्ञात था जो डिफेंस कॉलोनी में था किन्तु यह नया नगर का रुख उसकी समझ में नहीं आया था । यद्यपि वह चलता रहा । हीरा ने अनेक बार रास्ता बताया, फिर एक शानदार कोठी के सामने कार रोक दी ।

“पों – पों बजाओ भैय्या जी । यह मुआ चौकीदार टट्टी में बैठा होगा । दिन के दस घण्टे वहाँ गुजारता है ।”

हॉर्न देने पर लोहे का फाटक खुल गया ।चौकीदार ने हीरा को पहचानकर जोर से सैल्यूट मारा और हीरा ने कमर लचकाते हुए कहा – “ऐ वाह ! ऐ वाह ! ठुमके लगाये है सुअर का जना ।

विक्रांत भैय्या हम ही क्या करें – देखो तो सही, चालीस इंच की छाती है और मुझ जनखे को देखकर ठुमके लगाये हैं ।”

कार इमारत के शानदार पोर्च में जाकर रुक गई । विक्रांत के शरीर की कंपकंपी किसी कदर कम हो गई थी, लेकिन सीने में अत्यधिक घुटन थी । उसे खतरा था कि हीरा उसे इस तरह नहीं छोड़ेगा – कुछ न कुछ अवश्य होगा । फिर भी उसने स्वयं को संभाला और नीचे उतरकर दरवाजा खोल दिया ।

हीरा नीचे उतर आया । वह लापरवाही से सीढ़ियों की तरफ बढ़ा और अंतिम सीढ़ी पर रुककर विक्रांत की तरफ देखा ।

“ऐ अंदर आओ न विक्रांत जी । बाहर क्यों रुक गए ? घड़ी दो घड़ी बैठो । आओ जी आओ परदेसी बालम जिया धड़के सखी री जोर से हाय ।” वह उँगली मरोड़कर मुस्कराया और कमर दोहरी करके अंदर चल पड़ा । उसकी आँखों में एक रहस्यमय शरारत भरी चमक थी ।

विक्रांत उसके पीछे तेजी से कदम बढ़ाता हुआ अंदर प्रविष्ट हो गया । कोठी बेहद शानदार थी । अगर विक्रांत की यह हालत न होती तो वह उसकी पसंद के सम्बंध में कुछ न कुछ अवश्य कहता । हीरा उसे लिए हुए एक कमरे में प्रविष्ट हो गया ।

“बैठ जाओ विक्रांत जी । तुमसे दो-चार बातें कर लूँ । दिल हल्का हो जाये । बैठो मेरे भोले बालम...वारी जाऊँ... क्यों सैंया जी, यह तुम्हारे साथी थे क्या ?”

“हाँ – मेरे आठ साथियों में से तीन ।” विक्रांत थूक निगलकर बोला ।

“देखो तो सही मेरी जान निकाल ली इन्होंने – खाल उधेड़ दी मेरी नाजुक सी....उसने फिर कमीज उतार दी और विक्रांत उसके शरीर की लकीरें देखकर कांप गया । उसके होंठ कंपकंपाने लगे थे ।

और फिर उसके कंठ से घिघियाती आवाज निकली ।

“मैं...मैं इसके उत्तर में...उन तीनों की खाल उतार लूँगा ।”

“हाये...हाये...नजर न लगे तुम्हारी जवानी को – कैसे उतार दोगे खाल...उलटा करवा के या सीधा करके – मगर मेरे राजा... तुमने उनके सामने मेरा नाम क्यों ले दिया ?”

वही प्रश्न कर दिया था जिसकी कल्पना से विक्रांत की जान निकल रही थी । हीरा भी बहुतों के लिए अजनबी था – सिर्फ चार व्यक्ति ऐसे थे जो इस नाम को पहचानते थे । यह चारों चार गिरोहों के सरदार थे और यह चारों ही हीरा के लिए काम करते थे और दौलत समेट रहे थे । लेकिन हीरा की उन सबको यह हिदायत थी कि उसका नाम तो सब जगह प्रयोग कर सकते हैं लेकिन उसके व्यक्तित्व की पहचान कहीं न हो सके, वरना उन्हें अत्यधिक हानि उठानी पड़ेगी ।

और यह उस समय एकाएक ही यह नाम विक्रांत के मुख से निकल गया था ।

“हाये...हाये...मैं क्या करूँ...अब तक तो सिर्फ चार ही जानते थे – अब तीन और जान गए...वह अपने दोस्तों को बताएँगे...ऐ विक्रांत भैय्या यह तुमने क्या कर दिया – मैं तो बदनाम हो गई....लुट गई मेरी इज्जत सरे बाजार ।” हीरा फ़ूट-फ़ूट कर रोने लगा ।

विक्रांत सिर खुजा रहा था । वह अत्यधिक भयभीत था, लेकिन इस तरह रोते-धोते देखकर उसे हँसी आ रही थी । अगर आतंक और भय ने उसे जकड़ा न होता तो वह खिलखिलाकर कहकहे लगाता । इस अजीबोगरीब जीवात्मा को वह आज तक नहीं समझ सका था ।

रोते-रोते वह एकदम चुप हो गया और आँसू भरी आँखों से विक्रांत की तरफ देखने लगा ।

“बोलो न बैरी बलमा – क्या मिल गया तुम्हें मेरे दिल को जला के ।”

“मैं । बहुत शर्मिंदा हूँ उस्ताद । क्षमा करें – भविष्य में ऐसी गलती नहीं होगी ।” विक्रांत ने घिघियाते हुए कहा ।

“हाय...हाय...मुझसे माफी मांगते हुए तुम्हें शर्म नहीं आती – माफ करने वाला तो ऊपर है – मैं उसका काम अपने हाथ में लूँगी तो नर्क न भोगना पड़ेगा मुझे...यह हमसे न होगा भइय्या जी अब तो तुम्हें कपड़े उतारने ही पड़ेंगे सजना, मोरे...बालमा...जल्दी से उतार दो कपड़े...उतार दो वरना... ।”

“माफ कर दो उस्ताद – बस एक बार माफ़ी कर दो ।”

“अरे सुनती हो...कोई है....देखो तो मुआ नर्क का भोगी बनाये है....अरी मेरी बच्चियों ! कहाँ हो तुम ?” हीरा ने इस बार किसी को पुकारकर कहा ।

फिर उसकी पुकार पर दो दुष्ट आत्माएं अंदरूनी दरवाजे से भीतर प्रविष्ट हो गई । यह भी देखने की चीज थी । पहलवानों जैसी कसरती बदन, लम्बे-लम्बे बाल, जिनकी दो-दो चोटियां गुंथी हुई थी । उनमे से एक घाघरा पहने हुए थी – दूसरी साड़ी लपेटे हुए थी । चौड़े-चौड़े चेहरों की शेव बढ़ी हुई थी ।

विक्रांत घबराकर खड़ा हो गया ।

“देखो तो बुआ इस बबुए को – मैंने कहा कपड़े उतार दे तो शर्माता है ।” हीरा ने कहा ।

“घबरा रहा होगा बेबी ।” उनमें से एक ने दांतो तले उँगली दबाकर कहा ।

“छेड़छाड़ करो जरा...दिल्लगी कर दो...देखें तो कैसे दम खम है इस जवान पट्ठे में – आओ री जल्दी करो....अरी छमिया...अरी रामकटोरी देख क्या रही हो ?”

“माफ कर दे हीरा...ईश्वर के लिए माफ कर दे ।” विक्रांत की आवाज भय से कंपकंपा रही थी ।

“डरो न मेरी जान...अरे यह लड़कियाँ तुम्हारे कपड़े उतार कर यही तो देखे हैं कि मर्द आखिर होता कैसा है ? जरा हिम्मत से काम लो ।”\

“हीरा उस्ताद ! मैं तेरा गुलाम हूँ – लेकिन...लेकिन...मुझे मजबूर न कर...मैं इस कदर बुजदिल नहीं हूँ ।” विक्रांत की आवाज गुर्राहट में बदल गई ।

“ऐ जीते रहो...कलेजे में ठंडक पड़ गई...मर्द की जुबान में बोला तो– अरे हम एक दुखिया हैं....टार्जन की तरह दहाड़ें भी मारे तो लोग हँसते हैं हम पर....तुम्हारी बात ही क्या है....चलो री सजनियों क्यों खड़ी हो ।”

वह दोनों बलाएँ विक्रांत की तरफ बढ़ने लगी ।

विक्रांत कोई बुजदिल इंसान नहीं था, लेकिन हीरा उस्ताद से वह यूँ ही भयभीत नहीं हो रहा था । इससे पहले भी एक हादसा उसके साथ पेश आया था जब वह पहली बार हीरा से टकराया था । और इस टकराव का परिणाम यह निकला था कि विक्रांत ने हीरा को चौबीस घंटे में खत्म करने का ऐलान कर डाला था – फिर हीरा ने उसे अपने अरमान पूरे करने के लिए एक खण्डहर में बुलवा भेजा । विक्रांत ठीक वक्त पर उस जगह पहुँचा भी, जहाँ पहली बार उसका हीरा से आमना-सामना हुआ और फिर विक्रांत की जो दुर्गति बनी उसे वह आजीवन भुला नहीं सकता था । होश आने पर उसने खुद को नंगा म्युनिसिपल्टी के कचरा घर में पाया था और उसके साथी उसे कचराघर से घसीट रहे थे ।

वह दृश्य याद करके आज भी विक्रांत कांप जाता था – इसलिए उसने दूसरी बार टकराव होने से पहले वहाँ से फरार होने की ठानी और यह फैसला उसने तुरत फुरत किया ।

उसने दरवाजे पर छलांग लगा दी – परन्तु दरवाजा बाहर से बन्द था और विक्रांत उस दरवाजे पर पीठ टिकाकर उन बलाओं को घूरने लगा जो कूल्हे मटकाती उसके करीब कूदती-फांदती आ रही थीं ।

“हीरा ! मैं कहता हूँ रोक लो इन हरामजादों को – वरना इनकी मौत के जिम्मेदार तुम खुद होगे ।” इतना कहकर विक्रांत ने किसी कराटा फाइटर की तरह पोजीशन ले ली – “मैंने मार्शल आर्ट्स सीखे हैं, इसीलिए लोग मुझे विक्रांत के नाम से जानते हैं । उस दिन मैं नशे में था हीरा, जो मात खा गया – आज होश में हूँ...और यह... ।”

अचानक एक ने नाचते-नाचते लात चला दी और लात विक्रांत के पेट पर पड़ी तो उसका वाक्य मुँह में घुटकर रह गया । वह चोट खाये नाग की तरह पलटा और उसने एक बला पर छलांग लगा दी ।

लेकिन वह बला, जिसका नाम रामकटोरी था, बड़ी फुर्ती से एक तरफ हट गई । हटते-हटते उसने लात भी चला दी और विक्रांत औंधे मुँह फर्श पर जा टकराया । लेकिन वह हैरतअंगेज फुर्ती से संभलकर खड़ा हो गया ।

“ऐ....अब आया कुछ मजा...अरी रामकटोरी जरा ढोल तो ला । ये मुआ तो पूरा मर्द है – खूब नाच दिखावे है....” हीरा ने दोनों हाथों से विक्रांत की बलाएँ उतारते हुए कहा – “हाय कुर्बान जाऊँ, तू तो जापानी सांड की तरह लड़े है...अरी क्या बोले हैं इस लड़ाई को... ।”
 
लड़ाई रुक सी गई । रामकटोरी ढोल लेने चली गई और छमिया ठुमका लगाकर एक हाथ लहराकर गाना सुनाने लगी – “हाय नाचूं सारी रात – गाऊँ सारी रात मोरे सैंया....”

दूसरा हिजड़ा ढोल लेकर आ गया और उसने ढोल हीरा को थमा दिया । हीरा ने ढोल पर थाप देनी शुरू की और दोनों हिजड़े कमर लचकाकर लहराने लगे ।

विक्रांत आँखें फाड़कर उन्हें घूर रहा था । उसकी बुद्धि कुछ काम नहीं कर रही थी । यह दोनों बदरूहें कम फुर्तीली नहीं थीं ।

“हाय नयन कटारी से मारो मेरी जान... गाने वाले ने अचानक पैंतरा बदला और विक्रांत के गाल पर एक जोरदार थप्पड़ रसीद कर दिया । विक्रांत की पीछे तरफ लड़खड़ा गया ।

उसने भी हाथ-पांव चलाना शुरू कर दिए । उसके एक दो हमले कारगर भी हुए और जब भी ऐसा होता, हीरा जोर-जोर से खुश होकर ढोल पीटने लगता ।

“हाय मेरा भी जी करे है नाचने को – क्या हाथ दिखाया है विक्रांत भैय्या ने ।” हीरा उसे दाद देता ।

लेकिन विक्रांत ने जितने भी हाथ दिखाए उसका कुछ विशेष प्रभाव रामकटोरी और छमिया पर नहीं पड़ा – बल्कि ढोल की तेज होती रफ्तार के साथ उनके नाच में भी तेजी आती गई और अब विक्रांत उन दोनों के बीच इस तरह घिर गया कि एक पर नजर जमाता तो दूसरे की लात पड़ जाती – जब तक वह लात मारने वाले की तरफ पलटता उसके सिर पर चपत पड़ जाती ।

अचानक विक्रांत ने चाकू निकाल लिया ।

“हरामजादों....मैं एक-एक का खून पी जाऊँगा ।” विक्रांत ने चाकू का फल चमकाते हुए कहा ।

लेकिन इसका उन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा । दोनों ढोल की थाप पर नाचते रहे और इसी बीच किसी ने विक्रांत की कलाई पर हाथ डाल दिया – साथ ही दूसरे ने उसकी दूसरी कलाई पकड़ ली । यह काम इतनी तेजी के साथ हुआ कि विक्रांत बस हक्का-बक्का सा रह गया ।

दोनों कलाइयों पर बड़ी मजबूत पकड़ थी और उन्हें दायें बाएं सीधा खींचकर तान दिया गया था । अब विक्रांत के दोनों बाजू दायें-बाएं सीधे तन गए थे और वह पूरी शक्ति लगाकर भी उन्हें समेट नहीं पा रहा था ।

दोनों हिजड़ों ने उसके हाथों को इसी अंदाज में फैलाकर नाचना शुरू कर दिया । अब विक्रांत दोनों के बीच लट्टू की तरह घूम रहा था और वे दोनों उसके गिर्द एक वृत्त में चक्कर काट रहे थे ।

अचानक दोनों ने उसे एक साथ झटका देकर छोड़ दिया और विक्रांत फिरकनी की तरह घूमता हुआ एक दीवार से जा टकराया – फिर लहराता हुआ फर्श पर औंधा गिर गया । चाकू उसके हाथ से निकलकर फर्श पर गिर गया था । जिसे एक हिजड़े ने ठोकर मारकर हीरा उस्ताद के पास पहुँचा दिया ।

ढोल पर जोरदार थाप पड़ी और हीरा ने ढोल बन्द कर दिया ।

“अरी बुआ...मार डाला क्या बलमा को ?” हीरा ने पूछा ।

विक्रांत का सिर दीवार से टकराने के कारण फट गया था और फर्श पर जहाँ वह पड़ा था खून की पतली लकीर बन गई थी ।

हीरा उठकर उसके करीब पहुँचा – विक्रांत बेहोश हो चुका था ।

“सुनती हो छमिया जान...मुआ मरी नहीं, गश खा गया । इसे गली नम्बर एक में पहुँचा दो री सखी – और मैं चली उन मुओं के पास – देखूँ तो वह तीनों क्या कर रहे हैं ।” हीरा का संकेत कदाचित विक्रांत के तीनों साथियों की ओर था ।

वह कमर लचकाता उस कमरे से बाहर निकल गया ।

☐☐☐
 
डॉली तो चली गई लेकिन अपने पीछे मिसेज ठाकुर को बेचैनी के आलम में छोड़कर गई ।

डॉली ने तो यह सोच लिया था कि अमर को अब शायद ही इस जन्म में पा सके । अमर को हासिल करने के लिए उसने अपना सबकुछ दांव पर लगा दिया था, लेकिन अमर को शायद यह स्वीकार न था । उसने ऐसा नाटक किया कि बेचारी मिसेज ठाकुर भी उसका मुँह ताकती रह गई – हाँ डॉली की सोचें यही कह रही थीं कि अमर ने खुद की जान बचाने के लिए यह नाटक किया था – और बात सही भी थी – आखिर वह औरतों के बीच खिलौना बनना भी क्यों पसंद करता ?

डॉली को उसके शानदार अभिनय के बारे में सोच-सोचकर हँसी आ रही थी – बड़ा जोरदार अभिनय था और कुछ देर के लिए तो उसने सभी को जड़ कर दिया था – अमर को एक जनखे के रूप में देखकर उन पर तो जैसे बिजली सी टूट पड़ी थी, लेकिन अमर अपनी चाल में कामयाब रहा और दोनों के फैलाये जाल से साफ निकल गया ।

वापिस लौटते हुए डॉली यही सब सोच रही थी । वह खुद एक सुंदरी थी । नौजवान उसकी मुस्कुराहट के लिए तरसते थे । दौलत उसके पास भी बेशुमार थी और सबसे बड़ी बात तो यह थी कि करोड़पति बाप की इकलौती संतान थी । गोरा चिट्टा रंग, भरा-पूरा बदन और आकर्षक लम्बाई लिए शरीर ।

जब वह कमसिन थी – किशोरावस्था की सीढ़ी पर खड़ी थी तो उसने अपने मन के मंदिर में अनगिनत देवता बदले थे – वे सब आनी-जानी चीज थे । बहता दरिया था, जिसका जल कभी नहीं ठहरता – लेकिन आज की बात कुछ और थी – वह बालिग थी और अपनी जिंदगी के सम्बंध में भला बुरा सोचने का उसे पूरा हक था । लेकिन यह अमर अब उसके लिए एक कांटा बनता जा रहा था जो न निगलते बन रहा था और न उगलते – बस गले में आकर फँस गया था और उसकी चुभन भी कम कष्टदायक नहीं थी –- उसमें एक अजीब किस्म की पीड़ा का एहसास था और डॉली उस एहसास को कोई नाम नहीं दे पा रही थी ।‘

रायबहादुर केशवदास कपाड़िया की हैसियत दिल्ली महानगर के प्रमुख उद्योगपति में गिनी जाती थी । लक्ष्मी टैक्सटाइल के मालिक थे और उनकी सारी दौलत – सारी संपत्ति सिर्फ अपनी बेटी डॉली के लिए थी । डॉली बड़े लाड़-प्यार से पली थी – बचपन से ही उसकी हर जिद हर इच्छा पूरी होती आई थी – हर अमीर लड़की की तरह स्कूल कॉलेज शिक्षा का केंद्र नहीं वरन शौक और तफरीह का स्थान था । मसूरी के एक पब्लिक स्कूल से निकलने के बाद वह दिल्ली में रहकर ग्रेजुएशन कर रही थी और एक पंचवर्षीय योजना पूरी हो चुकी थी, परन्तु उसे डिग्री नहीं मिली थी ।

डिग्री की तो खैर डॉली को जरूरत भी क्या थी –- वह तो कॉलेज को मात्र एक तफरिह और सैर-सपाटा समझती थी, परन्तु अब उसके तफरीह के साधनों और स्थानों का विस्तार होने लगा था और इसका जीता-जागता उदाहरण अमर था ।

अमर को सबसे पहले उसने पन्ना जौहरी की पार्टी में देखा था । पन्नालाल जौहरी की पुत्री कामिनी की वर्षगांठ पर । कामिनी उसकी घनिष्ठ सहेली थी– दोनों परिवारों में पारिवारिक सम्बन्ध थे । पन्नालाल और केशवदास पुराने दोस्त थे और बराबर एक दूसरे के घर तीज-त्यौहारों में आना-जाना था । लेकिन कामिनी अपने घर की इकलौती संतान नहीं थी – उसका एक भाई कनाडा में पढ़ रहा था ।

कामिनी के पिता पन्नालाल एक जौहरी थे – दरीबाकलां में उनकी दुकान थी और हीरे-जवाराहत का उनका खानदानी काम था । उनके बाप-दादा भी यही कारोबार किया करते थे । पन्नालाल जौहरी साल में एक दो जोरदार पार्टियां अवश्य करते थे और कामिनी की वर्षगांठ तो हर साल ही इसी तरह मनाई जाती थी ।

अमर को पहली बार कामिनी ने इसी पार्टी में देखा था जो चंद लड़कियों से घिरा हुआ था और अपने शर्मीले स्वभाव के कारण उनसे बचने की कोशिश करता फिर रहा था ।

“यह कौन है ?” डॉली ने कामिनी से पूछा था ।

“राजा प्रताप सिंग का नाम सुना है कभी ?” कामिनी ने कहा ।

“शायद सुना हुआ है नाम है – वही तो नहीं जो ए.सी.एम. के डायरेक्टर हैं और ऑर्गेनाइजेश ऑफ कॉटन मिल्स के चैयरमैन भी ।”

“ हाँ – उन्हीं की बात कर रही हूँ । दरअसल हमारे पुराने ग्राहक हैं – जब राजाओं का जमाना था तब वे हीरे-जवाराहत हमारे ही पुरखों से खरीदते थे और अब उनके जवाराहतों का सौदा करवाने वाले भी हमारे बाप दादा ही रहे हैं ।” कामिनी ने बताया – “अमर उन्हीं का बेटा है ।”

“कमाल है – इससे पहले यह पंछी इस शहर में कभी नहीं चमका ।”

“स्विट्जरलैंड से हाल ही में आया है, बड़ा शर्मीला लड़का है – बात करके देख लो ।”

लेकिन उस पार्टी में अमर से परिचय भर हो सका ।

डॉली ने आज तक मन मंदिर में कल्पना के जितने बुत बनाये थे वह सब के सब एक ही रूप में साकार हो गए थे, और इस साकार का नाम अमर था – अमर को उसने पहली नजर में मन-मंदिर का देवता बना लिया था और उसका यह देवता यथार्थ के धरातल पर खड़ा उसके करीब था ।

डॉली कोई चरित्रहीन लड़की नहीं थी – अपने कौमार्य को उसने आज तक सुरक्षित रखा था और उसका स्वामी कोई एक ही हो सकता था । अमर अब उसकी जिद, उसकी हसरत और उसका सबकुछ था ।

लेकिन अमर अब भी उसके लिए एक उलझन, एक पहेली ही था – वह उसके इतने करीब आकर भी दूर क्यों है ? यह फासला तो अभी ज्यों का त्यों है – सदियों दूर या जन्म जन्मांतर का फासला ।

यूँ भी अमर एक राजसी परिवार का चिराग था । राजा प्रताप सिंग भले ही अब राजा नहीं रहे थे परन्तु उनकी शान-बान में अभी भी क्या कमी थी – अमर कॉटन मिल्स एक बहुत बड़ा औद्योगिक घराना था और उसके स्वामी खुद अमर के पिता राजा प्रताप सिंग थे । डॉली नारायण के बारे में इतनी जानकारी इसलिए भी रखती थी क्योंकि उसके पिता रायबहादुर के पास अमर कॉटन मिल्स के काफी शेयर थे, लेकिन रायबहादुर केशवदास उसके घराने की बराबरी नहीं कर सकते थे ।

अगर अमर किसी गरीब घर में पैदा हुआ होता तो डॉली को उसे प्राप्त करने में जरा भी मुश्किल नहीं आती – यूँ भी उसके डैडी घर दामाद चाहते थे – परन्तु अमर को प्राप्त करना एक टेढ़ी खीर थी ।

इसके बावजूद अमर डॉली की जिद बन गया था, लेकिन वह इस बात का पता अपने डैडी को नहीं चलने देना चाहती थी ।

अब यह उसे सोचना था कि अमर को कैसे हासिल करे ?

☐☐☐

मिसेज ठाकुर ने अपनी जिंदगी में कभी कच्ची गोलियां नहीं खेली थीं । वह एक दौलतमंद औरत थी । परन्तु सिवाय मिसेज ठाकुर के शायद ही कोई जानता हो कि यह दौलत उसने किस तरह कमाई थी ? समाज में उसने इज्जत बनाई थी...हालाँकि वह कुछ मामलों में थोड़ी बहुत बदनाम जरूर थी परन्तु धनवान लोगों में ऐसी बातें नोटिस में नहीं ली जाती । हर अमीर अपना कोई न कोई विशेष शौक रखता है । मिसेज ठाकुर के इस शौक को कोई बुरी नजर से नहीं देखता था ।

मिसेज ठाकुर भी बला की जवान थीं – लेकिन क्या करें ? जवानी में ही विधवा हो गईं, अब भला बिना किसी मर्द के सहारे वह अपना पहाड़ जैसा जीवन कैसे ढोती ? सो उसने नौजवान पालने शुरू कर दिए थे ।

मिसेज ठाकुर की उठ-बैठ ऊँचे वर्ग के लोगों में थी – बड़े-बड़े आई.ए.एस. ऑफिसर उसके मित्र थे...अमीरों की पार्टियों में वह अक्सर देखी जाती थीं । लेकिन उसके पास इतनी दौलत कहाँ से आती थी कोई नहीं जानता था । दिखाने के नाम पर एक कारोबार था लेकिन वास्तविक कारोबार तो कुछ और ही था ।

मिसेज ठाकुर एक बहुत बड़ी ब्लैकमेलर थी और उसके शिकारों से उसे खासी दौलत प्राप्त हो रही थी । जीवन बड़े चैन-ओ-सुकून से कट रहा था । वह नए-नए शिकार तलाश करके उनकी कमजोरियां तलाश करती, फिर उन्हें बाकायदा अपने फूल-प्रूफ जाल में फंसाकर प्रमाण जुटाती और ब्लैकमेलिंग शुरू कर देती । मजे की बात तो यह थी कि वह आज भी अपने शिकार लोगों की बेहतरीन दोस्त थी और वे नहीं जानते थे कि मिसेज ठाकुर ही उन्हें ब्लैकमेल करती हैं ।

जिंदगी बड़े आराम से कट रही थी– अब अगर वह सारी जिंदगी कुछ भी न करती, तो भी उसके पास बहुत कुछ था । उसके बाद उसकी दौलत भोगने वाला कोई था ही नहीं – और वह आखिर जीते-जी कितना खर्च कर लेती । जब वह इस बारे में सोचती तो तनहाइयाँ उसे बुरी तरह डसने लगतीं और फिर वह सोचती, गृहस्थी में सचमुच कुछ रस जरूर है – अगर आज उसके बच्चे होते तो उसकी आत्मा को कितना सुकून मिलता । लेकिन वह अकेली रह गई – बिल्कुल अकेली – उसकी रातें भांडे के मर्दों की बांहों में गुजरती हैं – और वह इस तरह उन्हें बदलती रहती है जैसे कोई औरत नयी साड़ी बदलने की चाहत रखती है ।

लेकिन अब वह थक रही थी और एक नयी चाहत उसमें जाग रही थी । एक ऐसा रैन बसेरा हो जहाँ बच्चे हों – किलकारियाँ हों –ठहाके हों और जिंदगी का रस हो – लेकिन ऐसा कैसे हो सकता था ? इसके लिए तो उसे फिर से शादी करनी पड़ती....और पति के नाम से उसे सख्त नफरत थी ।

वह रात मिसेज ठाकुर को आज भी याद थी –एक दहशत और खौफ से भरी रात – जब वह एक नौजवान को फांसकर घर लाई थी । उस नौजवान ने खुद ही उससे लिफ्ट मांगी थी । मिसेज ठाकुर की कार जब क्लब से बाहर निकल रही थी तो रात के अँधेरे में, फुटपाथ के सहारे एक इंसान खड़ा था । जनवरी माह की बात थी । बड़ी कड़ाके की ठंड थी और रात के अँधेरे के साथ-साथ कोहरा भी पांव पसारकर आता था । उस दिन मसूरी में खूब बर्फ गिरी थी और उसका शीत प्रकोप दिल्ली तक था ।

मिसेज ठाकुर ने क्लब में व्हिस्की पी थी और उन दिनों उसके संग कोई नौजवान भी नहीं था, क्योंकि मिसेज ठाकुर को अब यह नौजवान भी सुकून नहीं पहुँचा पाते थे । वह इनके संग सोती थी, फिर खुद को तन्हा महसूस करती थी, इसलिए उसने उन दिनों किसी नौजवान को अपना दोस्त नहीं बनाया हुआ था ।

फुटपाथ पर खड़े कोहरे की धुंध में लिपटे उस इंसान ने मिसेज ठाकुर की कार के आगे छलांग सी लगाई थी और अगर उसकी कार की रफ्तार धीमी न होती तो निश्चय ही दुर्घटना हो जाती । नौजवान अचानक ही सामने आ कूदा था ।
 
कार के ब्रेक चरमराये तो मिसेज ठाकुर ने गहरी साँस ली, और कुछ कहने के लिये कार की खिड़की खोलनी ही चाही थी कि अचानक उसे अपने करीब सरसराहट महसूस हुई और फिर उसने चौंककर देखा, तो उस इंसान को बराबर वाली सीट पर बैठा पाया ।

“क...कौन हो तुम.... ?” मिसेज ठाकुर नशे की झोंक में हकलाकर बोलीं ।

“कार तो बढ़ाइए मिसेज ठाकुर....रास्ते में सबकुछ बता दूँगा ।” उस इंसान ने भर्राये स्वर में कहा और फिर खाँसने लगा ।

कार में अँधेरा था – मिसेज ठाकुर उसे ठीक से देख नहीं पा रही थीं । परन्तु जब उसने मिसेज ठाकुर को संबोधित किया तो मिसेज ठाकुर यही समझीं कोई पुराना जानकार होगा ।

उसने कार आगे बढ़ा दी ।

“कार के आगे इस तरह कूदने की क्या तुक थी ?” कुछ आगे जाकर मिसेज ठाकुर ने पूछा ।

उसने कोई उत्तर नहीं दिया ।

“क्या तुम्हीं कार के आगे कूदे थे ?” मिसेज ठाकुर ने दोबारा पूछा ।

“हाँ ।” वह बोला ।

“लेकिन क्यों ?”

“मैं एक बड़ी मुसीबत में फँसा हूँ मिसेज ठाकुर – सिर्फ आज रात की पनाह चाहता हूँ ।”

“मुसीबत....कैसी मुसीबत ?”

“फिलहाल मैं आपको कुछ नहीं बता सकता ।” वह अब भी भर्राये स्वर में बोल रहा था । “सुबह होने पर सबकुछ बता दूँगा ।”

“तुम मुझे कैसे जानते हो ?” मिसेज ठाकुर ने पूछा ।

“आपको कौन नहीं जानता मिसेज ठाकुर ! और फिर मैंने नागेश से आपका खूब चर्चा सुना है ।”

“नागेश...ओ....क्या तुम नागेश को जानते हो ?”

“हाँ...और एक बार उसने मुझसे कहा था –तुम एक शानदार पर्सनालिटी रखते हो । ऐसा मजबूत जवान अगर मिसेज ठाकुर के हाथ लग जाये तो....” उसने जान-बूझकर अपना वाक्य अधूरा छोड़ दिया और खाँसने लगा – “खड़े-खड़े ठण्ड खा गया हूँ ।”

“ठीक है – ठीक है ।”

कार चलती रही ।

न जाने मिसेज ठाकुर को क्या सूझी कि उस नौजवान को बिना जान पहचान के सीधे अपनी कोठी पर ले आई । शायद उसकी वजह यह थी कि उसने नागेश का हवाला दिया था । मिसेज ठाकुर की जिंदगी में नागेश एक जलजले का नाम था – ऐसा खूबसूरत – ऐसा शानदार कि उसके साथ बिताये क्षण मिसेज ठाकुर की तनहाइयों में आ घुसते थे ।

वह अजनबी इंसान को अपनी कोठी पर ले आईं ।

हष्ट-पुष्ट शरीर का नौजवान था वह – इस सर्द मौसम में भी बदन पर सिर्फ एक कमीज और पतलून थी ।

उसके कपड़ों से उसकी गरीबी की झलक मिलती थी – पुराने और घिसे हुए कपड़े थे –पांव में टूटी हुई चप्पलें थीं । मिसेज ठाकुर ने सिर से पांव तक उसका निरीक्षण किया और फिर मुस्करा उठी ।

“ठण्ड में खड़े-खड़े सर्दी लग गई है ।” वह बोला ।

“बैठो...सर्दी का इलाज भी है मेरे पास ।”

वह व्हिस्की की बोतल निकाल लाई ।

“क्या करते हो ?”

“नौकरी की तलाश में मारा-मारा फिर रहा हूँ । नागेश ने मुझसे कहा था कि आप मुझे नौकरी दिला सकती हैं । यही सोचकर मैं इस शहर में आया था । मेरे पास आपके नाम नागेश का एक खत भी था जो किसी जेबकतरे ने साफ कर दिया । उसी में आपका पता लिखा था –लेकिन पत्र खो जाने के बाद पता भी खो गया । और तीन दिन से मैं आपको खोजता फिर रहा हूँ । फिर मुझे अचानक याद आया कि नागेश ने हाईलाइट्स क्लब का जिक्र किया था जहाँ आपके साथ वह कई बार आया था...बस एक आखिरी आस लेकर मैं किसी तरह इस क्लब को खोजता-खाजता यहाँ तक आ पहुँचा और उसके बाद मैंने आपको क्लब से जाते देखा । आप कार से उतरकर अंदर चली गईं थीं ।

मैंने सोचा अंदर जाकर आपसे मिल लूँगा, लेकिन दरबान ने अंदर न जाने दिया तो आपकी कार का नम्बर याद करके बाहर प्रतीक्षा करने लगा । मैंने सोचा कहीं आप निकल न जाएँ । इसलिए कार रोकने का एक यही तरीका नजर आया । इधर एक गश्ती सिपाही काफी देर से मेरी फ़िराक में लगा था । वह मुझे आवारागर्दी ने बन्द करना चाहता था और मैंने उसे झांसा दिया था कि कुछ ही देर में मेरा एक मित्र आने वाला है...उसका इंतजार कर रहा हूँ...और उसे विश्वास दिलाया कि मित्र के आते ही उसे दस का नोट दूँगा । उस वक्त वह ठण्ड से बचने के लिए एक चाय वाले की अंगीठी में हाथ सेंक रहा था । अब जरूर वह हाथ मल रहा होगा ।” नौजवान ने हँसते हुए कहा

“नाम क्या है तुम्हारा ?”

“हीरा.... ।”

“हीरा...अगर कोई नौजवान हीरा है तो उसे परखने के लिए मेरे पास जौहरी की निगाहें भी हैं ।”

“तो फिर परख लीजिये...बन्दा हाजिर है ।”

उस नौजवान में कुछ न कुछ आकर्षण जरूर था या फिर मिसेज ठाकुर को ही नशा हो गया था या फिर कई दिनों की तनहाई के कारण वह टूट-फूट चुकी थी । जो भी बात रही हो परन्तु उसने नौजवान को अपने बेडरूम का रास्ता दिखा दिया और नौजवान की मजबूत बाँहों में अपनी बूढ़ी होती जवानी को आबाद कर दिया ।
 
रात को बारिश शुरू हो गई । सर्दियों की बरसात...कड़ाके की ठण्ड...गरजते बादलों का संघर्ष और इधर दो गर्म साँसों का संघर्ष छिड़ा था । नौजवान ने उसकी ढलती जवानी का भरपूर स्वागत किया था । मालूम पड़ता था, नागेश ने उसे सबकुछ बता दिया था और यह भी कि मिसेज ठाकुर की जिस्मानी हवस को और भी आकर्षण बनाने के लिए कौन सा हाथ आजमाए जाएँ । मिसेज ठाकुर उसकी दीवानी हो गई थीं – उसने जैसे एक बार फिर नागेश को पा लिया था और नशे की झोंक में वह उसे नागेश ही कहकर पुकार रही थी ।

फिर वह हवस के अंतिम सैलाब में मुँह छिपाकर डूब गई, और ऐसी डूबी कि थोड़ी ही देर में उसके खर्राटे गूंजने लगे थे । उसे नहीं मालूम की रात कौन सा पहर था । जब उसकी आँख खुली थी – आँख खुलने की कोई नामालूम वजह थी ।

परन्तु उसने जागते ही प्यास महसूस की – तब उसने सोचा, हो सकता है प्यास की वजह से जाग गई हो । उसका कंठ और होंठ खुश्क हो रहे थे । उसने दायें-बाएँ हाथ मारा । कमरे में अँधेरा था और शायद रोशनी करने के लिए वह बैडलैम्प के प्लग की तलाश कर रही थीं । शीघ्र ही प्लग उसके हाथ में आ गया और रोशनी जला दी ।

बेडरूम में अमर फैलते ही सबसे पहले उसकी निगाह अपने शरीर पर पड़ी जो बिल्कुल ही वस्त्रविहीन था और उसे अत्यधिक ठण्ड महसूस होने लगी । तेज सर्द हवा उसके शरीर को काटती प्रतीत हो रही थी । यह जानने के लिए कि उसके बेडरूम में आखिर इतनी तेज सर्द हवा कहाँ से आ रही है” उसने दायें-बायें देखा तो सहसा उछल पड़ी । उसने आँखें फाड़-फाड़कर चारों तरफ देखा– यह बेडरूम उसका नहीं था ।

“हे भगवान ।” उसने दोनों हाथों से सिर थाम लिया – “आज कुछ अधिक पी गई है क्या ?”

कुछ देर तक वह इसी तरह सिर थामे बैठी रही, फिर उसे कुछ ख्याल आया तो चौंककर अपने गाउन की तलाश में इधर उधर निगाह दौड़ाई – परन्तु उसे अपना गाउन कहीं नजर नहीं आया । वह एक ऐसे कमरे में थी जिसकी दीवारें बिल्कुल खाली और सूनी-सूनी थीं – हवा खिड़कियों से भीतर आ रही थी और इन खिड़कियों पर कोई पट भी नहीं था – ऐसा मालूम पड़ता था जैसे उन के पट टूट चुके हैं ।

फर्श पर कोई फर्नीचर नहीं था बल्कि धूल सी उड़ रही थी । और रहा वह बिस्तर जिस पर वह खुद विराजमान थी उस पर एक मोटा सा भद्दे किस्म का डलनप गद्दा पड़ा था जिस पर न तो कोई चादर थी न कवर ही चढ़ा था । ओढ़ने के लिए कोई चीज वहाँ नहीं थी ।

मिसेज ठाकुर को बड़ी हैरत हुई कि वह क्या देख रही हैं –यह कोई सपना है या नशे का प्रभाव है । उसने बैठे-बैठे अपने शरीर को चिकोटी काटी – और शी करके रह गई । फिर अपनी कलाई में बंधी घड़ी में वक्त देखा तो रात के तीन बज रहे थे । लेकिन अचानक उसकी निगाह घड़ी पर ठहर गई और वह चौंक पड़ी । उसके हाथ में अपनी घड़ी नहीं थी ।

अब मिसेज ठाकुर का दिल चाह रहा था कि बाल नोच ले – आखिर यह सब क्या देख रही है । रात की घटनाएं याद करने लगी तो सबकुछ याद आ गया । हीरा नामक एक नौजवान को साथ लेकर वह अपनी कोठी में आई थी और फिर वह उसकी बांहों में ही पसरकर सो गई थी । यह सबकुछ उसे ठीक-ठाक याद था ।

तब आँख खुलने पर वह कहाँ आ गई ?

उसने सबसे पहले अपना शरीर ढकने के लिए किसी वस्त्र को तलाश करना चाहा । इधर-उधर निगाह डाली । कमरे में कोई ऐसी चीज नहीं थी जिससे वह बदन ढक सके – वह एकदम से बौखलाकर बेड से कूद गई ।

“कोई है ?” उसने सर्दी से कांपते हुए पुकारा । लेकिन कोई जवाब नहीं मिला ।

उसे कमरे से जुड़ा एक दरवाजा नजर आया तो निश्चय ही अटेच बाथरूम था और उस तरफ से पानी टपकने की आवाज आ रही थी । दूसरा दरवाजा कमरे में आवागमन का एक मात्र दरवाजा था जो बन्द नजर आ रहा था ।

मिसेज ठाकुर ने सोचा चेहरे पर पानी के छपाके मारकर देखा जाये, हो सकता है यह नशा ही हो – हालाँकि उसे यह वास्तविक ही महसूस हो रहा था और उसका दिल तेज-तेज धड़कने लगा था । फिर भी वह बाथरूम की तरफ बढ़ी – एक उम्मीद यह भी थी कि हो सकता है वहाँ कोई ऐसा कपड़ा मिल जाये, जिससे बदन ढक सके । बाथरूम में प्रविष्ट होकर उसने स्विच टटोला और रोशनी जला दी ।

बाथरूम में एक नल के सिवा कुछ न था । वाश बेसिन के सामने एक शीशा लगा था ।

मिसेज ठाकुर ने वाश बेसिन में अपने हाथ धोये, फिर चेहरे पर पानी के छपाके मारे और फिर ज्यों ही उसकी निगाह आईने पर पड़ी तो बुरी तरह हड़बड़ा गई । उसके हाथ तेजी के साथ अपना चेहरा टटोलने लगे ।

“नहीं..... ।” उसका दिल बैठने लगा – “नहीं –यह कैसे हो सकता है ? बेडरूम अजनबी –कलाई घड़ी अजनबी और अब अपना चेहरा भी... ।”

अब वह बुरी तरह डर गई थीं । भय के कारण उसकी टांगे कांपने लगी थीं । दर्पण में उसे एक भद्दा सा चेहरा नजर आ रहा था जो उसका तो हरगिज नहीं था – अलबत्ता किसी कोठे वाली का बूढ़ा चेहरा लगता था । इस चेहरे को देखने से ही घिन आती थी । अचानक बिजली गुम हो गई – पूरा वातावरण अंधकार में डूब गया ।

वह लड़खड़ा कर पीछे हटी – फिर वह जंगली बिल्ली की तरह कूदकर बाथरूम से निकली – दौड़ती हुई दरवाजे तक पहुँची और गिरती-पड़ती कमरे के मुख्य द्वार की तरफ बढ़ी ।

बाहर अचानक बिजली चमकी और उसे यूँ लगा जैसे बिजली की यह चमक खिड़की के रास्ते होती हुई खुद उसी पर गिरी हो बादलों का घन-गर्जन कानों के पर्दे फाड़ देने वाला था । उसके साथ-साथ मिसेज ठाकुर की भी चीख शामिल हो गई ।

बिजली की उस रोशनी में मिसेज ठाकुर ने साफ-साफ एक इंसान को उसी बेड पर अधलेटी स्थिति में देखा और यह इंसान ।

नहीं – ऐसा कैसे हो सकता है ? मिसेज ठाकुर के दिल ने कहा – “दिनेश ठाकुर को मरे हुए तो कई बरस बीत गए हैं ।”

“क...कौन हो तुम...कौन हो ?” वह घिघियाते स्वर में बोली ।

“दिनेश ठाकुर ।” कमरे में एक आवाज गूंजी – “नहीं पहचाना – मैं दिनेश ठाकुर हूँ – तुम्हारा पति ।”

“बकवास...झूठ...दिनेश ठाकुर को तो मरे हुए कई बरस हो गए हैं... ।” वह हकलाने लगीं ।

“इंसान मर जाता है – जरूर मरता है लेकिन रूहें कभी नहीं मरती...रूहें तो कभी नहीं मरती – मैं तो आज भी जिन्दा हूँ – अलबत्ता तुम मर चुकी हो – तुमने अपना रूप खो दिया, अपना सबकुछ खो दिया – तुम सिर्फ एक वेश्या बन गई हो...सिर्फ एक वेश्या... । मैं तुमसे सिर्फ एक सवाल पूछना चाहता हूँ, आखिर मेरा एक्सीडेंट क्यों करवाया था ?”

“मैंने...तुम्हारा एक्सीडेंट... ।”

“हाँ...तुमने...बोलो, क्यों करवाया था ?”

“नहीं, तुम दिनेश ठाकुर नहीं हो सकते – तुम कोई फरेब हो, छलावा हो तुम...तुम... ।”

“मैं कोई फरेब नहीं हूँ – मैं कोई धोखा नहीं हूँ – मैं कोई छलावा नहीं हूँ – मैं दिनेश ठाकुर हूँ ।”

“दिनेश ठाकुर मर चुका है ।”

“मरता वह है जिसका जमीर मर जाता है – जिसकी हकीकत मर जाती है । मर तुम चुकी हो, मैं नहीं...और इसका सबसे बड़ा सबूत यह है कि मैं आज भी अपनी असली शक्ल में हूँ और तुमने अपनी शक्ल खो दी– इसलिए खो दी क्योंकि तुम अपना शरीर गँवा चुकी हो और तुम्हारी आत्मा एक वेश्या का शरीर धारण किये हुए है ।”

“हे भगवान...” मिसेज ठाकुर कांपती टांगो का सहारा भी खो बैठी और फर्श पर लुढ़क गई ।

कमरे में अब गहन अंधकार व्याप्त था ।

“बताओ तुमने मेरा कत्ल क्यों करवाया था ? जब तक तुम सच-सच नहीं बोलोगी तुम्हारी आत्मा को मुक्ति नहीं मिल सकती – वेश्या के इसी शरीर में रहोगी ।”
 
मिसेज ठाकुर ने होश नहीं गंवाया था – लेकिन उसकी घिग्घी बंधी हुई थी । उसकी समझ में कुछ नहीं आ रहा था । दिनेश ठाकुर की आवाज बराबर उसके कानों में गूंज रही थी, जो आत्मा तक को छेद रही थी और अब इस सारी मुसीबत से बचने का एक ही चारा, एक ही उपाय समझ में आता था – वह दिनेश ठाकुर के सामने घुटने टेक दे ।

और फिर उसे अपनी ही आवाज दूर से आती महसूस हुई ।

“मैंने तुम्हें खो तो दिया, लेकिन ऐशो इशरत के मोड़ पर गुजरते हुए एक ऐसा समय भी आया जब मैं खुद थक गयी हूँ...मुझे किसी पति के साये की जरूरत महसूस होती है –अपने आँगन में बच्चों को खेलते देखना चाहती हूँ । जिस दौलत की हवस के कारण मैंने तुमसे विवाह किया और तुम्हारी हत्या भी कर दी, वह दौलत आज मेरे लिए बेमानी चीज बन गई है – मुझे महसूस हो गया कि दौलत सब कुछ नहीं है ।”

मिसेज ठाकुर ने एक कत्ल का राज फाश कर दिया – अपने पति का कत्ल, जिसकी चल अचल संपत्ति की आज वह मालिक बन बैठी थी – और यह सबकुछ उसने नागेश के प्रेम की खातिर किया था, फिर वह नागेश से भी उकता गई । सारे संसार की तरह नागेश भी यही जानता था कि उसके पति का एक्सीडेंट हुआ था । लेकिन हकीकत कुछ और थी और जो भी हकीकत थी वह आज उसे दिनेश ठाकुर को बतानी पड़ी – यदि वह दिनेश ठाकुर ही था कोई बहरूपिया नहीं ।

वह कहानी सुना चुकी तो किसी की आवाज सुनाई दी ।

“अच्छा अब सो जाओ...सो जाओ...सो जाओ... ।”

और उसे नींद आने लगी – फिर वह गहरी नींद में सो गई थी ।

☐☐☐

उस रात के बाद आज तक खुद मिसेज ठाकुर एक ब्लैकमेलर के चंगुल में फँसी हुई थी । जिसके पास इस बात के प्रमाण थे कि मिसेज ठाकुर ने अपने पति की हत्या की थी और इस ब्लैकमेलर का नाम था हीरा ।

उसके बाद से अब तक हीरा को मिसेज ठाकुर ने कभी नहीं देखा था – बस उसकी फोन पर काल्स आ जाती थी और वह मिसेज ठाकुर को कोई न कोई हिदायत दे दिया करता ।

मिसेज ठाकुर को यह इंसान बहुत ही विचित्र और रहस्यमय मालूम पड़ता था । यह अजीब किस्म का ब्लैकमेलर था जिसने उससे अब तक रकम के नाम पर एक फूटी कौड़ी भी नहीं ली थी । परन्तु वह अपना नाम चाहता था – उसे एक बड़े ब्लैकमेलर की हैसियत से अपना नाम और आतंक पैदा करना था । इसलिए उसने मिसेज ठाकुर को निर्देश दिया था कि मिसेज ठाकुर अपना हर गैर-कानूनी काम उसी के नाम से करेगी ।

और मिसेज ठाकुर को भला इसमें क्या आपत्ति हो सकती थी – वह हीरा के नाम से लोगों को ब्लैकमेल कर रही थी और हीरा की कॉल सप्ताह में दो बार उसे प्राप्त होती थी – एक बुधवार शाम और दूसरी रविवार सुबह सात बजे । उसका एक नियम था – उसी पर वह सारी रिपोर्ट लेता था ।

ब्लैकमेलिंग के धंधे में हीरा का नाम समाचार पत्रों तक में छपने लगा था ।

सब कुछ सामान्य सा चल रहा था । मिसेज ठाकुर को हीरा से कोई परेशानी नहीं थी, इसके बावजूद वह उस रात को आज तक नहीं भूल पाई थी जब उसने अपने पति दिनेश ठाकुर को जिन्दा देखा था और आज तक यह नहीं समझ पाई थी कि हीरा का दिनेश ठाकुर से क्या सम्बंध था ?

और फिर एक दिन अमर से उसकी मुलाकात हाईलाइट नाइट क्लब में हो गई । मिसेज ठाकुर ने उसे पहली ही नजर में पसन्द कर लिया था और बड़ी आसानी से उससे दोस्ती भी गांठ ली थी । उस नौजवान की हर अदा मिसेज ठाकुर को भा गई थी । वह एक अमीर घराने से सम्बंध रखता था ।

हालाँकि शुरू-शुरू में जब यह नौजवान उसके करीब आया था तो मिसेज ठाकुर के दिल में वही अरमान जाग उठे थे – एक पति –एक घर –बच्चे – और– यह नौजवान ऐसा तो जरूर था कि कोई भी स्त्री उसे पति या प्रेमी के रूप में पाकर सुख महसूस कर सकती थी । उसे मिसेज ठाकुर ने बड़ी जल्दी मुट्ठी में कर लिया था । और हालत यह हो गई थी कि अमर के पास अब वह किसी लड़की को फटकने भी नहीं देती थी ।

लोग कहते हैं चोर चोरी से चला जाये पर हेरा फेरी से नहीं जाता । मिसेज ठाकुर ने सोचा, अमर उसकी मुट्ठी में तो है ही, क्यों न उसके जरिये कुछ अमीर घर की औरतें फांसकर उनकी कमजोरियां हासिल कर ली जाएँ । जहाँ भी अमर जाता – जिस महफ़िल में भी होता, औरतों के लिए शमा बन जाता और औरतें उस शमा के लिए पतंगा बन जातीं – मिसेज ठाकुर को बड़ा फख्र महसूस होता कि ऐसा मर्द उसका साथी है जो दूसरी किसी भी औरत को घास नहीं डालता ।

मर्दों के प्रति अपनी जिंदगी में उसे एक लम्बा तजुर्बा हासिल था – तब से जब वह कुल दस-ग्यारह साल की थी । तब से अब तक की उम्र में उसने यही सीखा था कि मर्द चाहे किसी कौम का हो, चाहें कितना ही शिक्षित, साफ और इज्जत वाला हो – चाहे निरा अहमक या जंगली हो – वह किसी एक औरत का नहीं होता । विवाह से पहले से वह इश्क चाहता है –यह बात अलग है कि किसी लड़की को नसीब न हो पाये, लेकिन शादी के समय लड़की तो कुंवारी मिल भी जाती है, मर्द कुंवारा नहीं होता । शादी के बाद भी अगर कोई औरत हलवे की प्लेट बनकर उसके सामने आ जाये तो वह मुँह मारने में कोई बुराई नहीं समझता – इसे वह मर्द की मर्दानगी समझता है – औरत हर सदी में जुल्म सहती रही है – अगर कोई उसका प्रेम प्रसंग अमर में आता है तो वह गुनहगार बन जाती है । उसकी तरफ उठने वाली हर आँख उसे दूसरी ही निगाह से देखने लगती है – समाज में उसे बहिष्कार मिलता है और अगर कोई शादीशुदा औरत अपने पति के अलावा किसी दूसरे मर्द से प्यार करे तब तो मौत तक का खतरा उसकी जिंदगी में पैदा हो सकता है ।

यही वजह थी कि अमर पर भरोसा नहीं कर सकती थी और फिर अमर जिस घराने का इकलौता चिराग था वह भला यह सब क्यों और कैसे होने देते ? इसलिए मिसेज ठाकुर ने सबसे पहले यही उचित समझा कि न सिर्फ अमर को माध्यम बनाकर अमीर घराने की लड़कियों या औरतों को फांसा जाये बल्कि खुद अमर को भी पूरी तरह मुट्ठी में जकड़ लिया जाये और मिसेज ठाकुर दूसरे ही धारे में बह गई ।

संयोग से डॉली उसका पहला शिकार बन गई । डॉली के सम्बंध में उसे सारी जानकारी हासिल हो गई थी । वह भी अपने बाप को इकलौती जिद्दी लड़की थी और मिसेज ठाकुर के लिए वह मोटी मुर्गी बन गई ।

मिसेज ठाकुर ने फोटोग्राफी का सारा प्रबन्ध कर दिया था – वह खुद भी इस खेल में शामिल होती और फिर डॉली को उसकी तस्वीरें दी जाती तो डॉली भागी-भागी मिसेज ठाकुर के पास आती और मिसेज ठाकुर स्वयं अपनी तस्वीर भी उसके सामने रखती कि हीरा उसे भी ब्लैकमेल कर रहा है – इस तरह वह दोनों एक ही नौका में सवार हो जाती और अमर जैसा नौजवान भी उसके काबू में आ जाता ।

यह था ब्लैकमेलर हीरा के नाम से किये जाने वाले एक और अपराध का फूलप्रूफ प्लान ।

लेकिन अमर ने जो हंगामा किया, उससे मिसेज ठाकुर की बुद्धि चकरा गई । दो दिन तक वह इसी सम्बंध में सोचती और छानबीन करती रही । अमर उसे इन दो दिनों में नजर नहीं आया था । अब उसे अमर की एक-एक हरकत याद आती थी – उसका शर्मीलापन, उसकी बातों और आवाज में एक अजीब सा खुरदरा पन... ।”

तो क्या अमर सचमुच जनखा है ?

लेकिन एक हिजड़ा आखिर इतने बड़े घराने का इकलौता वारिस किस तरह हो सकता है – क्या अमर के माँ-बाप को इसका पता नहीं... ? और अगर मालूम है तो उन्होंने इसे जन्म के समय ही हिजड़ों के हवाले क्यों नहीं किया और अपना कोई दूसरा वारिस क्यों नहीं बनाया ?

अमर उसके लिए एक उलझी हुई पहेली बन गया और फिर मिसेज ठाकुर के भाड़े के आदमी उसके लिए जानकारियाँ एकत्रित करने लगे । अमर के सम्बंध में मिसेज ठाकुर को जो सूचनाएं मिलीं वह आशाप्रद थीं । अमर का एकांत में पालन-पोषण...और बचपन से ही विशेष देख-रेख, परिवार से दूर शिक्षा-दीक्षा ऐसी कई संदिग्ध बातें सामने आ रही थीं । और यह सब बातें इस बात का संकेत करती थीं कि अमर वास्तव में हिजड़ा है और राजा प्रताप सिंग और उसकी धर्मपत्नी गायत्री देवी को इसका अच्छी प्रकार इल्म है ।
 
गायत्री देवी कैंसर से पीड़ित थीं और न्यूयार्क में उनका इलाज चल रहा था और एक खास डॉक्टर केवल अमर के लिए तैनात था । जो स्विट्जरलैंड से महीने में एक बार अमर के चेकअप के लिए आता था । आखिर अमर को ऐसा क्या रोग था । इस डॉक्टर के सम्बंध में पता लगाया तो मालूम हुआ वह एक मशहूर सेक्सोलॉजिस्ट है और उसने बहुत से यौन विकारों को सफल ऑपरेशन से ठीक भी किया है – उसने सेक्स बदल जाने वाले बहुत से केसों का सफलतापूर्वक निदान किया था ।

मिसेज ठाकुर खुशी से उछल पड़ी ।

उसने इन तमाम रिपोर्ट्स की ड्राफ्टिंग करके नोट्स तैयार किये और जब वह संतुष्ट हो गई तो एक नया ख्याल, नया धमाका उसके जेहन में हंगामा बरपा कर चुका था । वह इतनी बड़ी हस्ती राजा प्रताप सिंग को ब्लैकमेल करने जा रही थी । जाहिर है राजा प्रताप सिंग इस भेद को गोपनीय रखे हुए थे और इस गोपनीयता को बनाये रखने के लिए अब अगर उनके सागर जैसे खजाने से एक बूंद और निकल जाती तो सागर कौन सा खाली हो जाता ।

दो-चार लाख रुपया तो वह यूँ ही मिसेज ठाकुर के मुँह पर मार देते – बस अब एक और अंतिम पुख्ता प्रमाण मिसेज ठाकुर को हासिल करना था – अमर के कुछ ऐसे चित्र लेने थे जो उसे हिजड़ा साबित कर दें ।

मिसेज ठाकुर एक रहस्यमय मुस्कुराहट लिए स्टडी से उठी और फिर उन नोट्स को संभालकर तहखाने में पहुँची । उसने अपनी कोठी में एक गुप्त तहखाना बनाया हुआ था, जहाँ एक मजबूत सेफ में उसके महत्वपूर्ण दस्तावेज और धन-सम्पदा भरी हुई थी ।

मिसेज ठाकुर के लिए तहखाने में मौजूद यह सेफ बैंक के सुरक्षित लॉकर जैसा था और ब्लैकमेलिंग के सभी प्रमाण वह इसी में रखे रहती थी । यह उसकी सबसे बड़ी संपत्ति थी ।

मिसेज ठाकुर तहखाने में पहुँची तो एकाएक ठिठक गई ।

पहले तो वह एकदम स्तब्ध सी रह गई – उसका मुँह खुला का खुला रह गया । फिर जैसे उसे बिजली का कोई शौक लगा – एकदम उछलकर तहखाने में पड़े सेफ पर झपटी ।

सेफ खुला हुआ था और उसकी सारी धन-सम्पदा सेफ से गायब थी ।

मिसेज ठाकुर पागलों की तरह सेफ के खाने खोज रही थी ।

“हे भगवान....यह क्या हो गया ? मैं लुट गई...मैं बर्बाद हो गई.... ।” वह बड़बड़ा रही थी और उसके ललाट से पसीने की बूंदे टपक रही थीं ।

फिर उसके हाथ में एक अंगूठी आ गई ।

खाली सेफ में सिर्फ यही एक अंगूठी रखी थी । मिसेज ठाकुर के हाथों में वह अंगूठी कांप रही थी । फिर उसका जबड़ा क्रोध से भिंच गया ।

“अमर.... ।” उसने अंगूठी मुट्ठी में जकड़ ली ।

☐☐☐

लाल कागज में लिपटा वह पैकेट गिफ्ट पैकेट जैसा था और रग्घू ने उसे डॉली तक पहुँचा दिया था ।

“यह क्या है ?” रग्घू से पूछा ।

राजधानी स्टोर से कोई आया था, वह यह पैकेट दे गया । आपने मंगवाया था ।”

“मैंने मंगवाया था ?” डॉली आश्चर्य से उसे घूरने लगी ।

“जी बीबीजी ।”

“मुझे तो याद भी नहीं, मैंने कब ऑर्डर दिया था ?” डॉली सोचने लगी ।

“वह तो यही कह रहा था कि आपने फोन पर ऑर्डर दिया था ।”

“खैर रख दो... ।”

रग्घू ने पैकेट रख दिया और बाहर चला गया । डॉली ने तुरन्त पैकेट नहीं देखा बल्कि रोमांटिक नॉवेल पढ़ने में लग गई । नॉवेल समाप्त होने वाला था – इसी बीच रग्घू आया था ।

अचानक फोन की घण्टी बज उठी ।

फोन बाहर कमरे में रखा था और घर में इस समय नौकर चाकरों के अलावा कोई नहीं था । फोन भी रग्घू ने ही उठाया ।

फिर कुछ सेकेंड बाद उसने डॉली को बताया कि उसका फोन है ।

“कौन है फोन पर..... ?” डॉली ने नॉवेल से दृष्टि हटाये बिना कहा ।

“अमर साहब हैं ।” रग्घू ने कहा ।

“कह दो....बाद में....अ...र....र.....एक मिनट..... ।” डॉली ने एकदम से नॉवेल बन्द करते हुए कहा – “अमर ।”

“जी हाँ ।”

और फिर डॉली एक चौकड़ी भरकर दरवाजे तक पहुँची । अगले ही पल वह फोन पर मौजूद थी ।

“माफ करना अमर....म.....मैं दरअसल मैं.... ।” वह फोन पर हकलाने लगी ।

“आपको राजधानी स्टोर का गिफ्ट पैकेट मिल गया ?”

“राजधानी स्टोर....गिफ्ट पैकेट....ओह...वह जो अभी.... ।”

हाँ वही जो अभी-अभी रग्घू ने आपको दिया होगा । दरअसल वह मेरी तरफ से आपके लिए उपहार है...और हाँ फोन इसलिए किया है कि आपको बताना चाहता हूँ कि जो कुछ आप कर रही हैं वह आप जैसी शरीफ घर की लड़की को शोभा नहीं देता । अगर आप मिसेज ठाकुर के चंगुल में फँस गई होतीं तो सारी जिंदगी.... ।

“लेकिन सुनो तो...वह सब....वह सब....मैं तुम्हें बताना चाहती थी अमर, मैं तुम्हारे लिए.... ।”

“मुझे मालूम है – बस–- आपको कुछ बताने की जरूरत नहीं – मिसेज ठाकुर जैसी औरतों से दूर रहने में ही तुम्हारी भलाई है – वह एक बहुत बड़ी ब्लैकमेलर है – वह तुम्हारे खानदान को तबाह कर सकती है, आइन्दा ध्यान रखना ।”

“तुम कहाँ मिलोगे अमर ?”

“कहीं नहीं....और कभी नहीं.... ।” उसका स्वर रुखा हो गया । तुम्हारी बेहतरी इसी में है कि मुझे भूल जाओ ।

अंतिम शब्द उसने बड़ी रुखाई से कहे और फोन डिस्कनेक्ट हो गया ।

डॉली हाय-हैलो करती रह गई । उसने एक गहरी साँस ली और फोन को घूरती हुई रिसीवर क्रैडिल पर रखकर अपने कमरे की तरफ मुड़ गई । फिर उसे उस गिफ्ट पैकेट का ध्यान आया ।

उसने पैकेट खोल डाला ।

पैकेट के अंदर एक और पैकेट था और उसमें करेंसी नोट भरे हुए थे । उसके साथ ही एक स्लिप थी जिस पर टाइप किया हुआ था ।

“यह वह रकम है जो आप मिसेज ठाकुर से जुए में हारी थी – ब्याज सहित ।”

डॉली ने नोटों को गिनने की हिम्मत नहीं की और उस स्लिप को धीरे-धीरे फाड़ने लगी ।

“लेकिन अमर, मैं तुम्हें जरूर पाकर रहूँगी – ।” वह बड़बड़ा रही थी ।

☐☐☐

मिसेज ठाकुर ने हाईलाइट क्लब फोन किया – वह क्लब नहीं जा रही थीं परन्तु अमर के सम्बंध में पूछ लेती थीं ।

“अमर साहब आये हैं क्लब में ?”

“जी हाँ ।” दूसरी तरफ से एक लड़की की आवाज सुनाई दी – “वह हॉल में बैठे हैं । आप कौन बोल रही हैं ?”

मिसेज ठाकुर ने अभी कुछ कहना मुनासिब नहीं समझा – फोन रखा और जल्दी से साधारण सा मेकअप करके क्लब की तरफ रवाना हो गई । रास्ते भर मिसेज ठाकुर यह सोचती रही कि उसने अमर को इतनी छूट देकर एक बार फिर मर्द पर विश्वास करके चोट खाई थी । अमर के लिए उसने नौकरों को हिदायत दी थी कि उसे बेरोक टोक आने जाने दिया जाये । मिसेज ठाकुर ने यह इसलिए किया था कि अमर को उसने पहले अपने लिये पसंद किया था ।

कार हाईलाइट क्लब के पार्किंग लॉन पर रुक गई । मिसेज ठाकुर अपने आपको पुरसुकून रखने की कोशिश करती पर्स झुलाती क्लब के हॉल में प्रविष्ट हुई ।
 
अमर के पास इस समय दो लड़कियाँ बैठी हुई थीं । जो खासी खूबसूरत थीं और हँस-हँसकर उससे बातें कर रही थीं ।

मिसेज ठाकुर उसके पास पहुँची तो अमर के चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगीं ।

“ओह...आप....आप....क्षमा कीजियेगा मिस । मेरी आंटी आ गई हैं ।” अमर ने बौखलाए अंदाज में कहा और मिसेज ठाकुर का चेहरा धुआं हो गया ।

वह अंगूठी अब भी मिसेज ठाकुर के पर्स में थी जो सेफ में मिली थीं और यह अंगूठी खुद उसी ने अमर को उपहार में दी थी, इसलिए मिसेज ठाकुर उसे अच्छी तरह पहचानती थी ।

“व्यस्त हो अमर ?” उसने अपने आपको संतुलित रखते हुए कहा ।

“जी....जी नहीं ।” अमर ने जवाब दिया ।

“मुझे तुमसे कुछ काम है ।”

“यहीं आंटी या कहीं और चलूँ ?” अमर ने पूछा ।

“उचित होगा कि यहाँ से उठ जाओ ।” मिसेज ठाकुर स्वयं को काबू रखने की भरपूर कोशिश कर रही थी । अमर उन लड़कियों से क्षमा मांगकर उठ गया ।

“मिसेज ठाकुर की मानसिक स्थिति इस कदर खराब थी कि वह हॉल में न रुकी और अमर को साथ लिए बाहर आ गई । “मुझे तुमसे कुछ बातचीत करनी है – आओ कार में चलें – कहीं और बैठकर बातें करेंगे ।”

“जो हुक्म ।” अमर ने खालिस लखनवी अंदाज में कहा और सिर झुकाकर मिसेज ठाकुर के साथ चल पड़ा ।

कार सड़क पर आ गई । यह मिसेज ठाकुर की मानसिक स्थिति का दोष था कि कार की रफ्तार स्वतः ही तेज होती जा रही थी । थोड़ी देर बाद उसे एहसास हुआ कि इस तेज रफ्तारी के कारण पुलिस उनके प्रति आकर्षित हो सकती है । अतः रफ्तार कम कर दी ।

गर्दन घुमाकर अमर का चेहरा देखा तो अमर का चेहरा भाव-रहित पाया । उसके चेहरे पर कोई भाव न देखकर मिसेज ठाकुर को सख्त मायूसी हुई और उसके साथ यह अंदाजा भी कि अमर काफी गहराई में है ।

मिसेज ठाकुर ने कार एक रेस्टोरेंट के सामने रोक दी । पुरसुकून एयर कंडीशंड रेस्टोरेंट में बैठकर मिसेज ठाकुर को अपनी जेहनी जलन कुछ और महसूस हुई । अमर खामोशी से सामने बैठा था । चेहरे पर वही मासूमियत और मूर्खता विराजमान थी जो उसके आकर्षण में चार चाँद लगा देती थी । लेकिन इस समय मिसेज ठाकुर को यह सूरत जहर लग रही थी । मिसेज ठाकुर ने उसे खूंखार निगाहों से घूरते हुए कहा –

“मैं तुमसे उसी शाम की हरकत के बारे में पूछना चाहती हूँ – क्या शराब पीकर तुम्हारा दिमाग ऐसे ही उलट जाता है ?”

“नहीं मिसेज ठाकुर । शराब मुझ पर प्रभावहीन है ।” अमर ने बदले हुए स्वर में उत्तर दिया । उसके स्वर में जरा भी मासूमियत नहीं थी । मिसेज ठाकुर ने चौंककर उसे देखा । उसके बदले हुए अंदाज में मिसेज ठाकुर को हैरत हुई ।

“क्यों, क्या तुम अधिक पीते रहे हो ?”

“हाँ – मैंने अपने गम को इस बुरी चीज के नशे में डुबोने की कोशिश की, लेकिन यह मेरे दर्द की दवा न बन सकी ।”

“तुम्हारा दर्द ?”

“ हाँ – और आप इससे वाकिफ हैं ।”

“मैं नहीं समझ सकी अमर ।”

“इससे अधिक मैं आपको क्या बता सकूँगा ।” अमर ने लापरवाही से मुँह बनाकर कहा ।

मिसेज ठाकुर चंद क्षण तक उसे खामोशी से देखती रहीं और फिर बोली – “क्लब में तुमने मुझे आंटी कहकर पुकारा था – आखिर क्यों – लोग तो तुम्हें मेरे महबूब की हैसियत से जानते हैं ।”

“महबूब की हैसियत तो आप पर खुल चुकी है मिसेज ठाकुर ।” वह तसल्ली से बोला ।

“मैं नहीं मानती कि तुम फरेबी हो ।”

“सम्भव है ।” उसने लापरवाही से कंधे हिलाते हुए कहा और मिसेज ठाकुर को पुनः खामोशी धारण करनी पड़ी ।

इसके बाद वह असली उद्देश्य पर आ गई ।

“मैंने तुम्हें एक अंगूठी दी थी ।”

“हाँ । वह आपको वापिस मिल गई होगी ।”

“क्या मतलब ?” मिसेज ठाकुर सरसराती आवाज में बोली ।

“मुझे यक़ीन है मिसेज ठाकुर कि आपका उपहार आपको खाली तिजोरी में मिल गया होगा ।” अमर ने बेजिगरी से कहा और मिसेज ठाकुर के दिल में हौल सा उठने लगा ।

वह अत्यधिक क्रोध के आलम में बोली – “और तिजोरी में रखे कागजात-धन संपत्ति-करेंसी और जवाहरात ?”

“वह मेरी तिजोरी में हैं ।”

“क्यों ?”

“इसलिए मिसेज ठाकुर कि मुझे उनकी आवश्यकता थी । आपने ब्लैकमेलिंग के लिए ऐसी शख़्सियत को भी चुन लिया जो इस योग्य न थी – उनकी अमानतें अभी वापस लौटानी हैं और उनकी छटनी के बाद जो बाकी शिकार बच जायेंगे – वह मेरे होंगे ।”

“त....तो क्या तुम भी ।” मिसेज ठाकुर आश्चर्य चकित स्वर में बोली ।

“हाँ मिसेज ठाकुर ! आज के बाद आपको मेरी मातहती में काम करना होगा और इसकी अस्वीकृति आपके लिये मौत का सूचक बन जायेगी ।” अमर का स्वर इस कदर जहरीला था कि मिसेज ठाकुर काँपकर रह गई । इस मूर्ख से नौजवान का यह रूप उसके लिए बड़ा भयानक था ।

मिसेज ठाकुर पागलों की तरह मुँह फाड़े उसे देखने लगी । कुछ देर तक वह इसी प्रकार उसे देखती रही, फिर उसके होंठों पर मुस्कुराहट उजागर हो गई ।

“तुम्हारे इस नए व्यक्तित्व और तुम्हारे इस रूप ने तो मुझे स्तब्ध कर दिया है अमर । लेकिन मुझे आश्चर्य है, तुम्हें इन चीजों की क्या जरूरत है ?”

“जरूरत ।” अमर ने कहा – “कभी-कभी इंसान स्वयं भी नहीं जानता मैडम कि उसकी जरूरतें क्या हैं ?”

“मगर तुम तो एक बड़े बाप के बेटे हो ।”

“लोग कहते हैं – लेकिन वह बहुत बड़ा बाप मेरी बुनियादी जरूरतें भी पूरी न कर सका ।”

“कौन सी जरूरतें ?”

“बस मिसेज ठाकुर, मैं अपने मातहतों से अधिक बेतकल्लुफ़ नहीं होता....” अमर का स्वर फिर खुश्क हो गया ।

“मातहत ! मिसेज ठाकुर ने जले कटे स्वर में कहा और अमर अपनी खूबसूरत और मासूम आँखें उठाकर उसे देखने लगा ।

“मेरा कुछ उसूल है मिसेज ठाकुर ! जिन लोगों को मैं अपने लिए चुन लेता हूँ उन्हें हर हालत में मेरे आदेशों पर चलना होता है और असहयोग की सूरत में उन्हें भिन्न-भिन्न किस्म की सजायें मिलती हैं । यह सजाये तुरन्त ही मौत की सजायें नहीं होतीं लेकिन उनका दिलचस्प पहलू यह है कि इंसान मौत की आरजू करने लगता है ।”

“लेकिन जानेमन ! मुझे उन लोगों में मत गिनो । तुम इतने हसीन हो कि मैं तो सारी उम्र तुम्हारी गुलामी में गुजारना पसंद करूँगी । उस दिन तुम पर शरारत सवार हो गई थी – मेरा ख्याल है उस लड़की डॉली की वजह से... ।”

“नहीं मिसेज ठाकुर ! वह एक हकीकत थी – रही डॉली की बात – तो मुझे मालूम था मिसेज ठाकुर कि आप क्या खेल खेल रही हैं ?”

“व्यर्थ बकवास ।” मिसेज ठाकुर ने कहा, लेकिन दूसरे ही क्षण चटाख की आवाज उभरी और मिसेज ठाकुर का एक कान सुन्न होकर रह गया । वह स्तब्ध रह गई ।

गाल पर पड़ने वाला हाथ इतना जोरदार था कि चंद क्षणों के लिए मिसेज ठाकुर की सोचने-समझने की शक्तियाँ पंगु होकर रह गई ।
 
“मैं तुमसे कह चुका हूँ मिसेज ठाकुर कि मैं अपने मातहतों के बदतमीजी कभी पसंद नहीं करता । तुम्हें कुछ बोलते हुए इस बात का ख्याल रखना है ।” अमर की गुर्राहट उभरी और मिसेज ठाकुर एकदम चौंक पड़ी ।

उसकी आँखों में खून उतर आया । दूसरे ही पल वह खड़ी हो गई और एक खौफनाक गुर्राहट के साथ उसने अमर पर हमला कर दिया – लेकिन उसके लम्बे नाखून अमर तक नहीं पहुँच सके । अमर पीछे हटकर खड़ा हो गया । आसपास बैठे लोगों ने शायद उस थप्पड़ की आवाज तो नहीं सुनी थी, लेकिन मिसेज ठाकुर की गुर्राहट और उसके बाद एक वहशियाना चीख अवश्य सुनी थी ।

मिसेज ठाकुर को वह चौंककर देखने लगे । मिसेज ठाकुर झुकीं, फिर उसने एक कुर्सी उठा ली और फिर यह कुर्सी उसने पूरी शक्ति से अमर पर दे मारी ।

लेकिन स्पष्ट यह है कि यह कुर्सी दूसरी खाली कुर्सी पर पड़ी क्योंकि अमर तो एक ओर हट गया था । इतनी शक्ति से मिसेज ठाकुर ने यह कुर्सी मारी थी कि दूसरी कुर्सी के टुकड़े-टुकड़े हो गए ।

रेस्टोरेंट के कई बेयरे उसकी ओर आकर्षित हो गए – स्वयं काउंटर मैनेजर भी अपनी जगह से निकलकर आगे आ गया था ।

मिसेज ठाकुर पर वहशत का भूत सवार हो गया था – उसने मध्य में रखी मेज उलट दी और अमर उछलकर पीछे हट गया – उसके कंठ से भयपूर्ण आवाजें निकल रही थीं ।

“बचाओ...बचाओ ?”

“यह पागल हो गई है ।”

“कुत्ते....हरामी...मैं तेरा खून पी जाऊँगी ।” मिसेज ठाकुर दांत पीसकर अमर पर झपटी और ज्यों ही उसने अमर पर झपट्टा मारा वह नीचे बैठ गया और मिसेज ठाकुर एक वेटर पर जा पड़ी । वह वेटर के साथ जमीन पर ढेर हो गई ।

वह ऊँची हील की चप्पल पहने हुए थी जिससे फिसलने में आसानी हुई और उसके पांव में मोच आ गई । नीचे दबा हुआ वेटर भयभीत अंदाज में चीखने लगा था और अमर खड़ा-खड़ा चिल्ला रहा था ।

“दौरा पड़ा है – पागलपन का दौरा पड़ा है – शायद यह महिला नशे में है – इसके मुँह से शराब की गंध आ रही है – सूँघो तो सही – अचानक – अचानक ही – ।” अमर कहे जा रहा था ।

दूसरे ही क्षण वेटर दौड़ पड़े और उन्होंने मिसेज ठाकुर को पकड़ लिया ।

“देखो – देखो कोई कष्ट न होने पाये इन्हें – नशे की हालत में ऐसी हरकतें कर रही हैं । वरना बड़ी सभ्य महिला हैं । यह मिसेज ठाकुर के नाम से प्रसिद्ध हैं प्लीज...प्लीज..... ।” अमर ने मिसेज ठाकुर को पीछे से सँभालने की कोशिश की ।

हॉल में अफरा-तफरी सी मच गई थी – लोग अपनी सीटों को छोड़-छोड़कर खड़े हो रहे थे । अमर मासूमियत से लोगों को परिस्थिति से अवगत करा रहा था ।

“लेकिन यह थीं तो आपके साथ ।” काउंटर मैनेजर ने अमर को देखते हुए कहा ।

“मैं तो यहाँ बैठा था । यह आ गई और मुझसे अजीब-अजीब सी बातें करने लगी । तुम बेहद खूबसूरत हो – क्या मेरे साथ कुछ वक्त गुजारना पसंद करोगे ? मैं स्टूडेंट हूँ श्रीमान ! बस यहाँ आ बैठा था और इन महिला की बातें सुन-सुनकर शर्मा रहा था – ओ गॉड ! क्या जमाना आ गया है ।”

“जलील –कुत्ते– मैं तुझे देख लूँगी – अच्छी तरह देख लूँगी ।” मिसेज ठाकुर दांत पीसते हुए बोली ।

“देखा – देखा आप लोगों ने –- यह भी कोई बात हुई – कैसा जमाना आ गया है – क्या ख्याल है बुजुर्ग महाशयों ?”

एक बूढ़ा वेटर अपने कानों को हाथ लगाने लगा – “लाहौल विलाकुवत, पर....पर साहब हम क्या करें, हम ऐसे बहुत से खेल देखते रहते हैं और जुबान बन्द रखते हैं साहब ! यह बड़े लोगों के खेल ही ऐसे होते हैं – आप जाइये – ऐसे होटलों में ऐसी औरतों के साथ मत बैठा कीजिये ।”

“तुम चुप रहोगे या मैं तुम्हारी खबर लूँ ।” मिसेज ठाकुर ने उसकी तरफ देखते हुए कहा ।

“जी नहीं बीबी – आप मेरी खबर न लें – अपनी तरफ देखें ।” वेटर ने कहा और दूसरी तरफ चल दिया ।

मिसेज ठाकुर अपना हुलिया ठीक करने लगी । पर्स उठाया– चप्पल तलाश की और वापसी के लिए मुड़ी तो काउंटर मैनेजर सामने आ गया ।

“मैडम ! सारी बातें अपनी जगह – या तो आप हमारा नुकसान पूरा कर दीजिये वरना पुलिस.... ।”

मिसेज ठाकुर ने खूंखार नजरों से उसे देखा और पर्स की जिप खींची, फिर उसमें से कुछ बड़े नोट निकालकर काउंटर मैनेजर के मुँह पर दे मारे ।

“मैं....तुम....तुम सबको...” उसने वाक्य अधूरा छोड़ दिया । क्रोध की अधिकता से उसके मुँह से शब्द नहीं निकल रहे थे ।

अमर एक कोने में सिमट गया था और मिसेज ठाकुर की निगाह उस पर नहीं पड़ी । वह कदाचित यही समझी थीं कि अमर बाहर चला गया है और वह तेजी के साथ बाहर निकल गई ।

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