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विक्रांत के शब्द सुनकर मर्दनुमा औरत या औरतनुमा मर्द चौंककर उसे देखने लगा । उसकी आँखों में न जाने क्या था कि विक्रांत का रंग एकदम पीला पड़ गया ।
“अ....ओह....म.....मैं.....अरे.... ।” विक्रांत के मुँह से विचित्र सी घिघियाती आवाज निकली ।
“हाय...तू क्या बकरी का जना है....जो मैं...मैं कर रहा है – मर्द बच्चा है तो मर्दों की शान तो रख....तूने तो हम जैसी को मात कर दिया – हाय दैय्या....हाय अम्मा.... ।” वह अपना लिबास सँभालने लगा ।
उसके अंदाज में वही लचक मटक थी जो हिजड़ों में पाई जाती है ।
विक्रांत उठ खड़ा हुआ । वह खुश्क होंठों पर जुबान फेर रहा था और उसकी आँखों में भय के भाव स्पष्ट झलक रहे थे ।
“हाय....अब मुझ निगोड़ी का फैसला तो करो –यहीं पड़े –पड़े मर जाऊं क्या – जवान जहान को सड़क से उठा लाये हो – ऐसी भोली हूँ मैं तो हरेक की बातों में आ जाऊँ....ऐ विक्रांत भैय्या मुझे ठिकाने तो लगा दो – भगवान तुम्हें खुश रखे – इन मुओं ने तो मुझे कहीं का न रखा । मैं जाऊँगी अब – बच्चे इंतजार कर रहे होंगे ।”
“जो हुक्म उस्ताद ।”
“मोटर तो होगी तुम्हारे पास विक्रांत जी ?”
“मौजूद है ।” विक्रांत ने कहा । उसके शरीर में अब भी कंपकंपी थी । वह अत्यधिक कोशिशों के बावजूद इस कंपकंपाहट पर काबू नहीं पा सका था । अपने आदमियों को हिदायत दिए बिना चल पड़ने के लिए तैयार हो गया ।
विक्रांत अपने काले रंग की मर्सडीज का दरवाजा खोलकर खड़ा हो गया और हीरा उस्ताद गुनगुनाता हुआ अंदर आ बैठा ।
“हाय छोड़ मेरी कलाई, मुझे न सता....सैंया डोले मेरा मन क्यों मुझे बता, ऐ चलो न विक्रांत जी – जल्दी करो – मोहे गर्मी लगे है ।”
विक्रांत ने स्टियरिंग सीट पर बैठकर मर्सडीज स्टार्ट की और कार आगे बढ़ा दी । लेकिन उसके हाथ अब भी कांप रहे थे । हीरा उसकी तरफ अनदेखा करके अब भी गुनगुना रहा था ।
“मुझसे बहुत बड़ी गलती हो गई उस्ताद ।”
“भगवान माफ करेगा भैया । इंसान गलतियों का पुतला है – ऐ हमें देखो – खुद हमसे कितनी बड़ी गलती हुई है ।”
“आपसे उस्ताद ?”
“तो और क्या – माँ के पेट में छिप गए होते...खाक में मिल गए होते...ऐ दुनिया को मुँह दिखाने से इंकार कर देते – मगर गलती तो होनी ही थी सो हो गई । इस दुनिया में आ गए – तीन में न तेरह में – लौंडिया सहेली न बनायें –लौंडे दोस्त न बनायें, घर के न घाट के – धोबी के कुत्ते की तरह मारे-मारे फिर रहे हैं – बोलो क्या करें ?”
“आप बहुत कुछ हैं उस्ताद ।”
“चल री मरी के लिए – खुशामद न करियो – दिल जले हैं इन बातों से, ऐ उधर मोटर ले जा नया नगर की तरफ ।” हीरा ने अब मार्ग-दर्शन किया ।
“अ....ओह....म.....मैं.....अरे.... ।” विक्रांत के मुँह से विचित्र सी घिघियाती आवाज निकली ।
“हाय...तू क्या बकरी का जना है....जो मैं...मैं कर रहा है – मर्द बच्चा है तो मर्दों की शान तो रख....तूने तो हम जैसी को मात कर दिया – हाय दैय्या....हाय अम्मा.... ।” वह अपना लिबास सँभालने लगा ।
उसके अंदाज में वही लचक मटक थी जो हिजड़ों में पाई जाती है ।
विक्रांत उठ खड़ा हुआ । वह खुश्क होंठों पर जुबान फेर रहा था और उसकी आँखों में भय के भाव स्पष्ट झलक रहे थे ।
“हाय....अब मुझ निगोड़ी का फैसला तो करो –यहीं पड़े –पड़े मर जाऊं क्या – जवान जहान को सड़क से उठा लाये हो – ऐसी भोली हूँ मैं तो हरेक की बातों में आ जाऊँ....ऐ विक्रांत भैय्या मुझे ठिकाने तो लगा दो – भगवान तुम्हें खुश रखे – इन मुओं ने तो मुझे कहीं का न रखा । मैं जाऊँगी अब – बच्चे इंतजार कर रहे होंगे ।”
“जो हुक्म उस्ताद ।”
“मोटर तो होगी तुम्हारे पास विक्रांत जी ?”
“मौजूद है ।” विक्रांत ने कहा । उसके शरीर में अब भी कंपकंपी थी । वह अत्यधिक कोशिशों के बावजूद इस कंपकंपाहट पर काबू नहीं पा सका था । अपने आदमियों को हिदायत दिए बिना चल पड़ने के लिए तैयार हो गया ।
विक्रांत अपने काले रंग की मर्सडीज का दरवाजा खोलकर खड़ा हो गया और हीरा उस्ताद गुनगुनाता हुआ अंदर आ बैठा ।
“हाय छोड़ मेरी कलाई, मुझे न सता....सैंया डोले मेरा मन क्यों मुझे बता, ऐ चलो न विक्रांत जी – जल्दी करो – मोहे गर्मी लगे है ।”
विक्रांत ने स्टियरिंग सीट पर बैठकर मर्सडीज स्टार्ट की और कार आगे बढ़ा दी । लेकिन उसके हाथ अब भी कांप रहे थे । हीरा उसकी तरफ अनदेखा करके अब भी गुनगुना रहा था ।
“मुझसे बहुत बड़ी गलती हो गई उस्ताद ।”
“भगवान माफ करेगा भैया । इंसान गलतियों का पुतला है – ऐ हमें देखो – खुद हमसे कितनी बड़ी गलती हुई है ।”
“आपसे उस्ताद ?”
“तो और क्या – माँ के पेट में छिप गए होते...खाक में मिल गए होते...ऐ दुनिया को मुँह दिखाने से इंकार कर देते – मगर गलती तो होनी ही थी सो हो गई । इस दुनिया में आ गए – तीन में न तेरह में – लौंडिया सहेली न बनायें –लौंडे दोस्त न बनायें, घर के न घाट के – धोबी के कुत्ते की तरह मारे-मारे फिर रहे हैं – बोलो क्या करें ?”
“आप बहुत कुछ हैं उस्ताद ।”
“चल री मरी के लिए – खुशामद न करियो – दिल जले हैं इन बातों से, ऐ उधर मोटर ले जा नया नगर की तरफ ।” हीरा ने अब मार्ग-दर्शन किया ।