• Hello Friends You can Register on the Forum and by posting you can earn money too.

वक्त की धूल

मिसेज ठाकुर ने चेहरे पर ऐसा मेकअप किया कि देखने में वह अपनी उम्र से दस साल छोटी लग रहीं थीं । खूबसूरत साड़ी और कीमती परफ्यूम की खुशबु में वह और भी जलवागीर बन गई थीं ।

उसने अपने आपको दर्पण में देखा और मुस्करा दीं ।

फिर वह कोठी से बाहर निकली और अपनी कार निकालने की बजाय एक टैक्सी में सवार होकर चल पड़ी । शीघ्र ही टैक्सी शहर के एक बदनाम होटल के सामने रुक गई ।

मिसेज ठाकुर ने टैक्सी का किराया अदा किया और होटल में प्रविष्ट हो गई । होटल डार्लिंग जैसी बदनाम जगह आने वाली औरतों के बारे में कोई अच्छी राय कायम नहीं की जा सकती थी ।

देवकाय शरीर का स्वामी डार्लिंग उसे अपने कमरे की खिड़की से देख रहा था । डार्लिंग खुद इस होटल का मालिक था । उसे देखते ही डार्लिंग ने घण्टी के बटन पर उँगली रख दी । एक खतरनाक शक्ल का नौजवान उसके पास पहुँच गया ।

“इस तरफ देखा ?” डार्लिंग बोला ।

“देखा बॉस ।”

“कौन है ?”

“नयी....बिल्कुल नयी बॉस ।”

“बुलाओ ।” डार्लिंग ने कहा और नौजवान ने गर्दन हिला दी ।

थोड़ी देर बाद वह मिसेज ठाकुर के पास पहुँच गया ।

“उठो ।” उसने सर्द स्वर में कहा और मिसेज ठाकुर चौंककर उसे देखने लगी ।

“क्या बात है ?”

“तकदीर बन रही है – देर न करो – उस्ताद डार्लिंग को जानती हो ?”

“नाम सुना है ।”

“देख भी – लो बुला रहा है तुम्हें, जल्दी चलो – देर हो गई तो वह क्रोध से भड़क जायेगा ।” नौजवान ने कहा और मिसेज ठाकुर एक गहरी साँस लेकर रह गई ।

वह नौजवान के पीछे-पीछे चल पड़ी ।

थोड़ी देर बाद सीढ़ियां तय करके वह ऊपर पहुँची और फिर एक कमरे के दरवाजे पर पहुँचकर नौजवान ने कहा – जाओ – अंदर चली जाओ और सुनो – उससे सहयोग की जिंदगी की जमानत है और असहयोग...” उसने वाक्य अधूरा ही छोड़ दिया ।

मिसेज ठाकुर दरवाजा खोलकर अंदर चली गई । उसने देवकाय व्यक्ति को देखकर बड़ी अदा से निगाहें झुका लीं ।

देवकाय व्यक्ति की दृष्टि मिसेज ठाकुर के चेहरे पर जम गई । चंद क्षण उसे घूरता रहा – फिर उसके होंठों पर मुस्कुराहट फैल गई ।

“वाह ! बहुत ही अच्छा मेकअप किया है तुमने । पता है अपनी उम्र से दस साल छोटी लग रही हो । कारोबार करने निकली हो ?” डार्लिंग ने पूछा ।

“नहीं डार्लिंग ! जिस कारोबार के बारे में तुम पूछ रहे हो, वह नहीं ।” मिसेज ठाकुर ने जवाब दिया ।

“खूब...खूब...फिर डार्लिंग का रुख कैसे हुआ ?”

“तुमसे मिलना चाहती थी ।” मिसेज ठाकुर ने जवाब दिया । और डार्लिंग संभलकर बैठ गया ।

“गोया – गोया तुम इस बात का इंतजार कर रही थीं कि मैं तुम्हें बुलाऊँ ।” उसने धीमे स्वर में कहा, लेकिन उसके स्वर में छिपी गुर्राहट मिसेज ठाकुर से छिपी न रह सकी ।

“नहीं ऐसा भी नहीं डार्लिंग ! यह बात मुझे मालूम नहीं थी कि तुम खुद ही मुझे तलब कर लोगे । बस – यहाँ बैठकर मैं किसी वेटर से तुम्हारे बारे में जानकारी प्राप्त करती और यह इच्छा प्रकट करती कि मुझे किसी तरह डार्लिंग से मिला दिया जाये ।”

“हूं – बात समझ में आने वाली है –क्यों मिलना चाहती थीं तुम मुझसे ?”

“क्या इतनी सी देर में यह सारी बातें कर लेना जरूरी है डार्लिंग ? अगर तुम मेरे साथ भद्र व्यवहार करना चाहते हो तो पहले मुझे कुछ पिलाओ – इस दरमियान बातें भी होती रहेंगी ।”

“क्या मँगवाऊं ?” डार्लिंग ने बटन पर हाथ रखते हुए पूछा ।

“शीरी – मेरे लिए शीरी ही ठीक है, और तुम जो उचित समझो ।”

“हश....बेवकूफ –- शीरी भी कोई पीने की चीज है ।” डार्लिंग ने कहा ।

वही नौजवान अंदर प्रविष्ट हुआ । डार्लिंग ने उसे व्हिस्की लाने का हुक्म दिया और मिसेज ठाकुर गहरी साँस लेकर खामोश हो गई ।

फिर उसने चंद क्षण बाद धीरे से कहा – “व्हिस्की पीने में मुझे कोई आपत्ति नहीं है–बस तुम्हारा साथ देने के लिए थोड़ी दी पियूँगी – इतनी शक्तिशाली नहीं हूँ कि व्हिस्की के दो या तीन पैग से अधिक बर्दाश्त कर सकूँ ।”

शक्तिवान तो काफी नजर आती हो, और जो कुछ तुमने अपने चेहरे पर किया हुआ है उसने भी मुझे काफी प्रभावित किया है । बड़ा बेहतरीन मेकअप किया हुआ है और मुझे सलीकेमंद महिलाएं बहुत पसंद हैं – बहरहाल अपनी कहो कि डार्लिंग की क्या आवश्यकता पड़ गई । मेरे पास दो ही किस्म की औरतें आती हैं ।”

“कौन-कौन सी किस्म की ?”

“नम्बर एक जरूरतमंद और नम्बर दो भी जरूरतमंद । बस यूँ ही समझो कि नम्बर एक और नम्बर दो दोनों जरूरतें भिन्न होती हैं । होती यह दोनों ही जरूरतमंद हैं, कुछ दौलत की और कुछ किसी और सिलसिले में, विवरण सहित नहीं जाऊँगा ।” डार्लिंग ने मुस्कराते हुए कहा । उसकी मुस्कुराहट भी बेहद खतरनाक थी । मोटे होंठ के नीचे उसके भयानक दांतो की कतार झांक रही थी ।

मिसेज ठाकुर ने मुस्कराकर कहा – “बस यूँ समझ लो कि जरूरत नम्बर दो मुझे यहाँ ले आई है ।”

“तो तुम अपनी जरूरत से यहाँ आई हो ।”

“हाँ – यही समझ लो ।”

“कोई काम है क्या ?”

“हाँ डार्लिंग ।”

“लेकिन तुम्हें यह मालूम है कि...किस नाम से पुकारूँ तुम्हें ?”

“मोहिनी ।” मिसेज ठाकुर ने जवाब दिया ।

“तुम्हें यह मालूम है मोहिनी कि डार्लिंग अपनी दुनिया से अलग आदमी है । सिर्फ अपने लिए काम करता है । किसी और के लिए नहीं – विशेष रूप से पैसा लेकर, और फिर कोई उसे प्रभावित कर जाये तो दूसरी बात है – दौलत उसे प्रभावित नहीं करती –लेकिन खैर तुम इस योग्य हो कि तुम्हारे लिए कुछ किया जा सकता है, थोड़ी देर खामोश रहो –मेरा आदमी आ रहा है ।”

मिसेज ठाकुर चौंककर उसे देखने लगी । उसे कोई अंदाजा नहीं हो रहा था कि कोई आ रहा है, लेकिन चंद क्षणों बाद डार्लिंग का वही नौकर शराब के बर्तन उठाये प्रविष्ट हो गया । इस बात से मिसेज ठाकुर ने अनुमान लगाया कि डार्लिंग की श्रवण शक्ति बहुत तेज है और वह किसी चीते की तरह चौकन्ना भी रहता है ।

बर्तन रखकर वह व्यक्ति चला गया और डार्लिंग ने दो पैग तैयार किये । मिसेज ठाकुर ने अपना पैग उठाया और दोनों ने जाम टकराकर पैग अपने होंठों से लगा लिए ।

पहली चुस्की लगाने के बाद वह बोला – “अब शुरू हो जाओ, क्या समस्या है ?”

“एक व्यक्ति के विरुद्ध काम करना है डार्लिंग ।”

“क्या काम है ?”

“बस वह खुद को बेहद चालाक समझता है – हालाँकि नौजवान छोकरा है । मेरे मुकाबले पर आने की कोशिश की है उस हरामी पिल्ले ने – और यह नहीं जानता कि मैं क्या चीज हूँ । डार्लिंग ! मैं तुम्हें बताने में कोई खतरा नहीं समझती कि मैं एक ब्लैकमेलर हूँ ।”

“अवश्य होगी । मुझे तुम्हारी आँखों में जो खतरनाक बात नजर आती है वह यही संकेत करती है कि तुम ब्लैकमेलिंग करती होगी – बेशक तुम अपने आर्ट में माहिर होगी – किस तरह के लोगों को ब्लैकमेल करती हो ?”

“बस जो भी हाथ आ जाये – लेकिन इस योग्य हो कि मुझे कुछ दे सके । व्यर्थ लोगों पर हाथ डालना पसन्द नहीं करती ।”

“पसंद आ रही हो –पसंद आ रही हो – आगे बोलो ।” डार्लिंग ने दूसरा जाम भरते हुए कहा ।

मिसेज ठाकुर भी जाम की चुस्कियां ले रही थीं ।

“उसने धोखा देकर वह कागजात हासिल कर लिए जिनमें ब्लैकमेलिंग का स्टंट मौजूद था और उसके बाद उस हराम के जने ने मुझे ही ब्लैकमेल करना शुरू कर दिया । बड़ा अपमानजनक व्यवहार किया उसने मेरे साथ । कहने लगा कि उसकी मातहत बनकर काम करूँ, वरना जिंदगी से महरूम कर दी जाऊँगी ।”

“बात दरअसल यह है डार्लिंग ।” वह जाम खाली करते हुए फिर बोली – “मैंने जिंदगी को बेहद करीब से देखा है । बहुत कठिन जिंदगी गुजारी है मैंने । तुम्हारे सामने मैं बयान नहीं कर सकती । इस तल्ख और कठिन जिंदगी के बाद जो कुछ मैंने हासिल किया उससे अपने भविष्य के सम्बंध में फैसला कर लिया । मर जाना पसंद करती हूँ लेकिन इस तरह अपमानित होकर, किसी की मातहती स्वीकार नहीं कर सकती । मैंने बहुत दौलत कमाई है डार्लिंग । लाखों रुपया का बैंक बैलेंस है मेरा । दौलत की इतनी हवस नहीं है मुझे ।”

“ओह – बस इतनी सी बात ।” डार्लिंग ने हँसते हुए कहा और मिसेज ठाकुर का दूसरा जाम भर गया ।

“पियो और पीती रहो । परेशान होने की जरूरत नहीं, यह समझो वह मर चुका है । अब उसका अस्तित्व शेष नहीं है । और यह बात डार्लिंग शराब के नशे में नहीं कह रहा है – यकीनन तुम इस बारे में जानकारी प्राप्त करके ही पहुँची होगी ।”

“ हाँ डार्लिंग ! यह सच है कि मैं तुम्हारे बारे में जानकारी प्राप्त करके ही यहाँ पहुँची हूँ और यह मेरा सौभाग्य है कि तुमने मेरा हाथ थाम लिया ।”
 
दूसरी सुबह ।

उसने डार्लिंग से वापसी की आज्ञा ली ।

“नाश्ते के बाद चली जाना जान । अभी तो तुम्हें उस व्यक्ति के सम्बन्ध में मुझे बहुत कुछ बताना है । तुमने मुझसे सहयोग किया है । मैंने तो अभी तुमसे कोई सहयोग नहीं किया ।” डार्लिंग ने कहा और मिसेज ठाकुर मुसकुराने लगी ।

नाश्ते के दौरान वह अमर के बारे में विवरण सहित बताती रही ।

“बस – इतनी सी बात – किसी राजे के छोकरे की भी यह हिम्मत हो गई कि वह ब्लैकमेलरों पर हाथ डाले । कोई बात नहीं, कहाँ बताया तुमने, कहाँ मिलता है वह ?”

“हाईलाइट क्लब में शाम को वह आता है ।” मिसेज ठाकुर ने बताया ।

“क्या शाम पांच बजे तुम वहाँ मौजूद होगी ?”

“सम्भव है मौजूद हूँ ।”

“तुम्हारी वहाँ मौजूदगी जरूरी है डियर । वरना डार्लिंग को मजा नहीं आएगा । तुम चिंता न करो – कोई यह नहीं जान सकेगा कि वहाँ होने वाले हंगामे से तुम्हारा कोई सम्बन्ध है ।” डार्लिंग ने कहा और मिसेज ठाकुर ने गर्दन हिला दी ।

☐☐☐

अमर मौजूद था ।

मिसेज ठाकुर के दिल की धड़कनें तेज हो गई । उसने बस एक निगाह अमर को देखा और इस तरह अजनबी बन गई जैसे अमर पर निगाह ही न पड़ी हो । पता नहीं अमर ने उसे देखा या नहीं । इस समय भी एक खूबसूरत लड़की उसे घेरे बैठी थी और वह यूँ सिर झुकाए शरमाया बैठा था जैसे कोई नई नवेली दुल्हन अपने पति के साथ पहली बार किसी पब्लिक प्लेस में आई हो । लड़की उससे कुछ बातें कर रही थी और अमर शर्मा शरमाकर दोहरा हुआ जा रहा था ।

मिसेज ठाकुर ने एक ऐसी मेज का चयन किया जहाँ से वह अमर पर भी निगाह रख सकती थी और दरवाजे पर भी । अमर को देखकर उसका खून खौल रहा था । कुछ अरसा पहले अमर ने उसे भी इसी तरह मूर्ख बनाया था और इस भरपूर नौजवान की यह मासूमना अदाएं देखकर मिसेज ठाकुर ने सोचा कि यह शख्समर्द की हैसियत से भी एक अनोखी चीज होगा । और फिर किस तरह इस नौजवान ने उसे मूर्ख बनाया बल्कि उसे हिला कर रख दिया, यह कोई अधिक पुरानी और लम्बी कहानी नहीं थी ।

अब मिसेज ठाकुर को यूँ भी लगता था कि अमर जनखा नहीं हो सकता – वह एक खतरनाक किस्म का जवां मर्द है – अनोखे व्यक्तित्व का स्वामी, जो अपने आपको एक हैरतअंगेज चीज बनाकर पेश कर रहा था ।

सोचते-सोचते मिसेज ठाकुर को डार्लिंग का ख्याल आया जो अब से ठीक दस मिनट बाद यहाँ पहुँचने वाला था । पांच बजे का उसने वादा किया था, और अब पांच बजने में दस मिनट शेष थे ।

डार्लिंग यहाँ आकर क्या करेगा ? डार्लिंग के व्यक्तित्व के सम्बन्ध में वह किसी हद तक अनुमान लगा चुकी थी । वह स्पष्टतः तो एक शातिर आदमी नजर आता था, लेकिन सम्भव है जज्बाती भी हो और स्वाभिमानी भी । इन परिस्थितियों में शायद यही होगा कि सीधा अमर की मेज पर पहुँचेगा – उसे उठाएगा और मारना शुरू कर देगा । उस वक्त क्या होगा ?

क्या अमर उसका प्रतिरोध करेगा या चुपचाप डार्लिंग के हाथों पिट जायेगा ?

अमर अब तक जिस रूप में मिसेज ठाकुर के सामने आया था उससे मिसेज ठाकुर को भी यही एहसास होता था कि वह भी स्वस्थ और शक्तिमान नौजवान है – ठंडी तबीयत का स्वामी भी है और खूंखार भी है । सम्भव है यहाँ कोई खून-खराबा हो ।

सबसे बड़ा प्रश्न यह था कि अमर को यह संदेह हो सकता है कि डार्लिंग को उसके विरुद्ध तैयार करने वाली मिसेज ठाकुर है । अगर ऐसा हुआ तो बहुत बुरा होगा । फैसला सिर्फ उसी वक्त हो सकता है कि डार्लिंग और अमर की उस मुठभेड़ में सफलता किसे मिलती है ?

मिसेज ठाकुर ने अपने लिये एक पेय मंगा लिया और उसकी चुस्कियां लेने लगी । जुबान सूखकर कांटा हुई जा रही थी । हलक खुश्क हो रहा था । वह धीरे-धीरे पेय के घूंट पी रही थी – लेकिन यूँ लगता था जैसे कुछ न पी रही हो । उसकी विचित्र सी हालत हो रही थी । उसे गम भी था और बेचैनी भी इस दौरान उसने कई बार निगाहें उठाकर अमर को देखा लेकिन यूँ लगता था जैसे अमर अभी तक उसकी उपस्थिति से बेखबर हो ।

समय बहुत धीमा गुजर रहा था – फिर पांच बज गए और उस समय घड़ी की सुई पांच बजकर तीस सेकेंड तक पहुँची थी कि डार्लिंग एक शानदार सूट पहने अंदर प्रविष्ट हुआ । आम हालात में डार्लिंग शक्ल से खौफनाक अवश्य नजर आता था लेकिन इस कदर असभ्य भी नहीं मालूम होता था कि कहीं उसका आगमन अजनबी दृष्टि से देखा जाये ।

दरवाजे में खड़ा होकर उस लम्बे-चौड़े आदमी ने पूरे हॉल में निगाहें दौड़ाई । पहले मिसेज ठाकुर को देखा और फिर अमर को ।

मिसेज ठाकुर उसके चेहरे का जायजा ले रही थी । उसने अंदाजा लगा लिया कि डार्लिंग ने अमर को पहचान लिया है – फिर वह खामोशी से एक मेज की दिशा में बढ़ गया और कुर्सी घसीटकर बैठ गया । वेटर उसके सिर पर सवार हो गया । डार्लिंग ने उसे कोई ऑर्डर दिया और वेटर वहाँ से चला गया । उसने भी कोई पेय ही मंगवाया था ।

पेय आने के बाद वह खामोशी से बैठा उसकी चुस्कियां लेता रहा । मिसेज ठाकुर ने इत्मीनान की साँस ली । अगर डार्लिंग आते ही अमर पर झपट पड़ता तो उससे उसकी जंगलियत का अंदाजा होता और हाईलाइट क्लब में इसकी भी संभावना थी कि परिस्थिति डार्लिंग के विरुद्ध ही चली जाती । स्पष्ट है वहाँ के प्रबन्धक उसे हंगामा करने की अनुमति नहीं देते । यह भी सम्भव था कि सारे नौजवान उस हंगामा करने वाले से लिपट पड़ते – डार्लिंग वहाँ किस-किससे निपट सकता था । हाँ पिस्तौल वगैरह की बात दूसरी थी ।

लेकिन डार्लिंग के वहाँ आकर खामोशी से बैठ जाने से यह अनुमान लगाया जा सकता था कि डार्लिंग बिल्कुल ही जाहिल आदमी नहीं है और वक्त की नजाकत का एहसास रखता है । अतः मिसेज ठाकुर को इत्मीनान हो गया ।

डार्लिंग भी इत्मीनान से बैठा रहा और मिसेज ठाकुर भी अपनी जगह बैठकर पेय की चुस्कियां लेती रही – उसने दोबारा वही पेय मंगा लिया था । एक अजीब सी सनसनी उसके शरीर में फैली हुई थी ।

उस समय साढ़े छः बजे थे जब मिसेज ठाकुर ने देखा कि अमर उस लड़की के साथ अपनी जगह से उठ गया है । अमर ने कुछ फासले पर चलकर लड़की से हाथ मिलाया और दरवाजे की तरफ मुड़ गया । मिसेज ठाकुर ने बेचैन होकर डार्लिंग को अपनी जगह से उठते देखा । वह अलबत्ता वहीं बैठी रही । अब उसे जो कुछ भी मालूम हो सकता था बाद ही में मालूम होता । इस समय वह उन दोनों का पीछा करने की हिम्मत भी नहीं कर पा रही थी । हालाँकि उसका दिल चाह रहा था कि उन दोनों के पीछे जाये और देखे कि ऊंट किस करवट बैठता है, लेकिन टांगे साथ नहीं दे रही थीं । यूँ लग रहा था उसे कि अगर उठने की कोशिश करे तो भी वह उठ नहीं सकती । अतः वह वहीं बैठी रही और उसके परिचित उसके इस एकांत को आश्चर्य से देख रहे थे ।

यह हकीकत भी थी कि डार्लिंग मूर्ख नहीं था । इससे पूर्व वह हाईलाइट क्लब में नहीं आया था । उसने यही सोचा था कि हाईलाइट क्लब कोई साधारण सी जगह होगी – वहाँ प्रविष्ट होकर वह अमर को भांप लेगा – उसकी अच्छी-खासी पिटाई कर देगा । उसे हिदायत देगा कि मिसेज ठाकुर के विरुद्ध कोई कार्रवाई न करे और अगर भविष्य में उसने ऐसा किया तो उसे खत्म कर दिया जायेगा – लेकिन हाईलाइट क्लब में प्रविष्ट होकर उसे एहसास हुआ कि यह जगह जरा टेढ़ी है । उसकी आशा से कहीं अधिक बड़े लोगों की तफरीह का स्थान है और अगर उसके हाथों किसी बड़े आदमी को हानि पहुँच गई तो परिस्थिति काफी बिगड़ सकती थी । वह गुंडा अवश्य था – लेकिन स्पष्ट है अपनी गुंडागिरी को बरकरार रखने के लिए भी कुछ उसूल अपनाने पड़ते हैं और वह हर जगह ही गुंडागिरी नहीं कर सकता था ।

अमर को उसने पहली ही निगाह में पहचान लिया था – मिसेज ठाकुर ने उस नौजवान के सम्बन्ध में जो कुछ बताया था वह उस विवरण पर पूरा उतरता था और डार्लिंग समझ गया कि वही अमर है । अतः उसने यही फैसला किया कि वह अमर का पीछा करेगा और कहीं रास्ते में उसे दबा लेगा । वैसे उसे बहुत हँसी आई थी अमर पर कि उस जैसा नौजवान भी ब्लैकमेलर हो सकता है । मिसेज ठाकुर जैसी घाघ औरत को काबू में कर सकता है ।

बात हँसी की ही थी । लेकिन डार्लिंग फिर भी सतर्क था । अपनी अब तक की जिंदगी में उसने बेशुमार कामों में हाथ डाला था और सफलता भी प्राप्त की थी लेकिन खूब सोच समझकर सतर्कता और सावधानी पूर्वक । वह इस उसूल को मानता था कि दुश्मन को कभी कमजोर न समझा जाये ।

अतः इस नौजवान की तरफ से भी वह इतना लापरवाह नहीं था । रात होने को थी । सड़कों पर कहीं-कहीं रोशनियाँ जल उठी थीं । वह अमर का पीछा करने लगा । उसका इरादा था कि किसी सूनसान सड़क पर अमर की गाड़ी रोक लेगा और फिर वहाँ उससे सरलता से बात हो जायेगी । – अतः उसके पीछे लगा रहा ।

कई सड़कें मुड़ने के बाद उसे यूँ लगा जैसे अमर को पीछा किये जाने का आभास हो गया है – क्योंकि अब वह कार ऐसी सड़कों पर घुमा रहा था जिनका एक दूसरे से कोई संपर्क नहीं था । ऐसा सिर्फ उन अवसरों पर किया जाता है जब किसी को पीछा किये जाने का पता चलाना हो ।

डार्लिंग को इसकी कोई चिंता नहीं थी – अगर उसे पता भी चल गया हो तो उसका क्या कर सकेगा ? उस समय अलबत्ता उसे हैरत हुई जब आगे जाने वाली कार एक सूनसान हाइवे पर मुड़ गई । और इस सूनसान जगह में कुछ भी किया जा सकता था । इसका मतलब तो यह था कि यह अमर राजकुमार अपने आपको काफी तीस मार खाँ समझते हैं – डार्लिंग ने सोचा, और फिर अपने मजबूत बाजू पर हाथ फेरने लगा । उसे अपने बाजुओं की शक्ति पर बड़ा नाज था । प्रतिदिन सुबह वह नियमित रूप से व्यायाम करता था और अपने शरीर की मालिश कराया करता था । उसके साथी उसे चीता कहा करते थे और वास्तव में डार्लिंग का शरीर चीते की तरह शक्तिशाली और फुर्तीला था ।

जमुना के किनारे एक रेतीले तट पर आ गए । सड़क यहाँ विस्तार से फैले रेतीले टीलों के मध्य से गुजरती थी और दूसरी तरफ खेत थे । जब तेज हवा चलती थी तो रेत उड़-उड़कर सड़क पर आ जाती थी । कुछ अवसरों पर तो उस सड़क को बाकायदा साफ करना पड़ता था । और फिर अमर ने डार्लिंग की और भी सहायता की । वह सड़क से कच्चे रास्ते पर उतर गया । समन्दर अधिक दूर नहीं था । टीलों के मध्य रेत पर गाड़ी दौड़ाता हुआ वह काफी दूर चला गया । हालाँकि यह मूर्खतापूर्ण हरकत थी – लेकिन पता नहीं उसे क्या हो गया था ?

डार्लिंग ने स्वयं भी अपनी कार रेत पर उतार दी और आगे उड़ने वाली धूल का पीछा करता रहा जो अब उसकी कार के विंडस्क्रीन पर आ गई थी । उसे कार ड्राइव करने में कठिनाई महसूस हो रही थी ।

लेकिन कुछ दूर चलकर उसने अपनी कार रोक दी । सामने ही अमर की कार नजर आ रही थी । अमर कार के बोनट से रेक लगाये बड़े इत्मीनान से खड़ा था ।

वह स्वयं भी दरवाजा खोलकर नीचे उतर आया और दरवाजा बन्द करके खड़ा होकर अमर को घूरने लगा । फिर उसने मोटा सिगार निकालकर दांतो में दबाया और फिर उसे सुलगाने लगा । तेज हवा में उसका लाइटर सही तरह से काम नहीं कर रहा था । डार्लिंग को कई बार अपना लाइटर जलाकर सिगार सुलगाने की कोशिश करनी पड़ी ।

सिगार के दो तीन गहरे गहरे कश लेकर एक हाथ पतलून की जेब में डालता हुआ वह आगे बढ़ गया । अमर अब भी उसी तरह इत्मीनान से खड़ा था ।

शाम बिल्कुल झुक आई थी और वातावरण अर्ध-अंधकारमय लग रहा था ।

डार्लिंग उसके सामने पहुँच गया । सिगार का गहरा कश लिया और धुआं अमर की तरफ फेंका । हवा ने धुआं अमर की तरफ नहीं जाने दिया ।

“हैलो !” अमर की आवाज उभरी – “बहुत देर से परिश्रम कर रहे हो । क्या बात है ?” स्वर बिल्कुल व्यापराना था ।

“ओह....तो मेरा ख्याल दुरुस्त था । तुम मेरे अनुसरण से परिचित हो गए थे ।” डार्लिंग ने भारी आवाज में कहा ।

“हाँ – मैंने यह अनुमान लगा लिया था कि क्लब से तुम मेरे पीछे ही उठे हो ।”

“चालाक आदमी मालूम होते हो, लेकिन डार्लिंग को तुम्हारी यह बात पसंद नहीं आई जानेमन ।”

“डार्लिंग ।” अमर हँसा – तुम्हारा नाम डार्लिंग है ।”

“हाँ....क्या तुम्हें इस नाम से कुछ एतराज है ?”

“नहीं – तुम्हारा नाम तो बहुत खूबसूरत है ।”

“हूं....तुमसे एक सौदा करने आया हूँ ।”

“कहो – क्या बात है ?” अमर ने पूछा ।

“बात दरअसल यह है ।” डार्लिंग चंद कदम आगे बढ़ आया । अब वह अमर से सिर्फ एक गज के फासले पर था ।

उसने सिगार उल्टे हाथ की उँगलियों में फंसाया और सीधा हाथ घुमा दिया । उसका मजबूत घूंसा अमर के गाल की ओर बढ़ा था, लेकिन अमर थोड़ा सा झुका और डार्लिंग का हाथ हवा में घुमाकर रह गया ।

“खूब...तो यह वार्ता करने तुम मेरे पीछे यहाँ तक आये हो ?” अमर मुस्कराते हुए बोला और डार्लिंग ने जलता हुआ सिगार एक तरफ उछाल दिया ।

उसने दोनों हाथ घुमाते हुए कहा – “मालूम होता है तुम्हारे साथ कुछ परिश्रम अधिक ही करना पड़ेगा ।”

“हाँ – बिना परिश्रम के इंसान को संसार में कुछ प्राप्त नहीं होता ।” अमर ने स्वयं भी दोनों हाथ फैलाकर उँगलियों से संकेत किया ।

और डार्लिंग भैंसे की तरह उस पर पिल पड़ा । उसे यह देखकर आश्चर्य हुआ कि अमर अपनी जगह से हटा ही नहीं था । हाँ जब वह बोनट पर पहुँचा तो अमर एकदम से नीचे बैठकर उसकी टांगो के मध्य से दूसरी तरफ निकल गया और डार्लिंग बोनट पर औंधा हो गया । यह बात उसे क्रोध दिलाने के लिए पर्याप्त थी । वह सीधा हुआ – पलटा और दोनों हाथ टिकाकर सीधा खड़ा हो गया ।

“यह क्या चूहों की तरह उछल कूद कर रहे हो ? आओ मुकाबला करो ।” उसने भारी आवाज में कहा ।

“पागलो से लड़ना मैं उचित नहीं समझता– आज अगर तुम दीवाने हो तो मैं तुम्हें किसी पागलखाने में पहुँचा सकता हूँ और अगर बुद्धिमान और चतुर हो तो मुझे बताओ कि यहाँ आने तक का कष्ट क्यों उठाया तुमने ? वरना फिर दूसरी सूरत में मैं सचमुच इस पर आमादा हो जाऊँगा कि तुम्हारा दिमाग ठिकाने लगा दूँ ।”

डार्लिंग क्रोध से पागल हो गया – यह गुफ्तगू उसके लिए अजनबी थी और प्रतिद्वन्दी एक ऐसा छोकरा था जिसे डार्लिंग जैसा व्यक्ति काबू नहीं कर पा रहा था ।

उसने पागलों की तरह अमर पर छलांग लगा दी – लेकिन अमर उसकी तुलना में बहुत हल्का-फुल्का था– अतः डार्लिंग की यह छलांग भी व्यर्थ गई । अमर उछलकर एक तरफ हो गया ।

“तुम यह तीसरी कोशिश कर चुके हो और अब मेरी बारी है । आखिरी बार तुम्हें अवसर दे रहा हूँ कि मुझे इस उछल-कूद का उद्देश्य बता दो – वरना इसके बाद मैं कुछ नहीं पूछूँगा ।” अमर ने कहा ।

डार्लिंग ने उसे मोटी सी गाली दी । तब अमर ने आस्तीन चढ़ा लीं ।

“अच्छी बात है – अब हमारे मध्य बातचीत का सिलसिला उस वक्त तक के लिए खत्म हो गया..... जब तक हम में से एक बोलने पर तैयार नहीं हो जाता ।”

इतना कहते ही अमर अपनी जगह से उछला और उसकी लात डार्लिंग के सीने पर पड़ी । डार्लिंग ने हरचन्द इस आक्रमण से बचने की कोशिश की – लेकिन अमर की छलांग इतनी जँची-तुली थी कि वह बड़ी कठिनाई से अपना मात्र चेहरा बचा सका, अलबत्ता अमर की लात उसके सीने पर पड़ी और डार्लिंग को यूँ महसूस हुआ जैसे कोई फौलादी हथौड़ा उसके सीने पर पड़ा हो । बहुत पीड़ा महसूस हुई थी उसे अपने सीने पर । वह पीछे हटकर पुनः कार के बोनट से जा टकराया ।

वह अपने खून-खराबे की जंग लड़ने पर उतारू हो गया । उसने जेब में हाथ डालकर लम्बा सा चाकू बाहर निकाल लिया । उसे अफसोस हो रहा था कि दुश्मन को कमजोर समझने की उसने पहली मूर्खता क्यों की ? वह अपने साथ पिस्तौल लाता तो उससे काफी मदद मिल सकती थी । पिस्तौल लाता तो उससे काफी मदद मिल सकती थी । पिस्तौल न होने की वजह से उसे सिर्फ चाकू पर ही निर्भर होना पड़ रहा था ।

चाकू खोलकर वह अमर के सामने आ गया ।

अब अमर के चेहरे पर गंभीरता के भाव नजर आने लगे थे । उसके होंठ भिंच गए और चेहरे पर वह पहली जैसी मासूमियत नहीं रही ।

“तुमने चाकू निकाला है डार्लिंग ! अब तुम्हें इसका खामियाजा भी भुगतना पड़ेगा ।”

“सुअर के बच्चे ! मैं तुझे अभी मजा चखाता हूँ ।” डार्लिंग वहशियाना स्वर में बोला और सीधा चाकू लेकर अमर की तरफ झपटा ।

अमर ने उसके चाकू वाले हाथ पर अपने पंजे की पकड़ मजबूत की और उल्टे हाथ की जोरदार चोट उसके चेहरे पर लगाई । वह चंद कदम हट गया । उसे अंदाजा हो गया था कि प्रतिद्वन्दी कोई साधारण इंसान नहीं है – वह एक नौजवान छोकरा भी है लेकिन उसके हाथ फौलादी हैं । यह दो चोटें ही डार्लिंग की एहसास दिलाने के लिए पर्याप्त थीं – अतः वह खूनी निगाहों से नौजवान को घूरने लगा ।

इस बार वह अपने चाकू का वार कामयाब करना चाहता था । चाकू अगर डार्लिंग के हाथ में हो तो उसकी असफलता शायद ही कभी देखी गई हो । उसने अनेक बार चाकू भिन्न अंदाज में दोनों हाथों में बदला । वह अत्यधिक फुर्ती से चाकू दोनों हाथों में घुमाने लगा । नौजवान शरारत भरे अंदाज में डार्लिंग को देख रहा था – फिर जब उसने चाकू सीधे हाथ में लेकर नौजवान को झुकाई दी और उल्टे हाथ से हमला किया तो नौजवान इत्मीनान से पीछे हट गया । पीछे हटते ही उसने हाथ कमर पर रखकर एक ठुमका लगाया ।

“अरे कुर्बान...वारी जाऊँ मैं ।” नौजवान के स्वर में भी एक परिवर्तन आ गया ।

डार्लिंग का पारा और चढ़ गया । वह समझ गया कि नौजवान उसे क्रोध दिला रहा है । उसने पलटकर फिर वार किया । नौजवान बल खाकर फिर पलट गया और घूमकर उसने डार्लिंग की कलाई पर हाथ डाल दिया । उसके मजबूत पंजे की गिरफ्त डार्लिंग की कलाई पर पड़ी और वह इस तरह से उसके ऊपर से गुजर गया जैसे डार्लिंग इंसान ही न हो – अलबत्ता डार्लिंग का हाथ अपनी पकड़ में पकड़े-पकड़े इस तरह घूम गया कि डार्लिंग पलटी खाकर रह गया ।

चाकू रेत में पैवस्त हो गया । नौजवान ने लपककर उसे उठा लिया और फिर बड़े इत्मीनान से उसे बन्द करके पूरी शक्ति से रेत में फेंक दिया ।

“ऐ सदके...मेरे लाल, चाकू से मारना अच्छी बात नहीं है । मारना है तो नयन कटारी से मार दो – कुर्बान हो जायेंगे तुम पर – मारना है तो अपने मजबूत हाथों से मारो – देखें तो सही जरा कितनी जान है इन हाथों में ।” नौजवान सीना तानते हुए डार्लिंग के सामने आ गया । डार्लिंग ने फिर एक कोशिश की – इस बार उसकी लात नौजवान की पिंडली पर पड़ी और नौजवान दोहरा हो गया ।

“अये–अये–मार डाला– शहीद कर दिया तूने हमें–एक और–दूसरी पिंडली भी कोरी है ।”

और दूसरा पांव सामने कर दिया ।

डार्लिंग अपने आपको बाज न रख सका और उसने झुंझलाहट में दूसरी लात नौजवान की पिंडली पर रसीद कर दी । यह ठोकर ऐसी थी कि अगर किसी पत्थर को भी मारी जाती तो वह भी अपनी जगह छोड़ देता । नौजवान कराहकर बैठ गया ।

“अये हये...हाय....अरे वाह...जरा अपने जवान हाथों को प्रयोग नहीं करोगे – लातों ही लातों से काम चलाओगे –जरा आगे तो बढ़ो– देखें बदन में कितनी जान है । हम तो अपने आपको तुम्हारे सुपुर्द किये दे रहे हैं ।” उसने दोनों हाथ ऊपर उठा दिए ।

और डार्लिंग ने उसे अपनी पकड़ में ले लिया । वह नौजवान को बुरी तरह रौंद रहा था और नौजवान की आँखों में नशे की सी सुर्खी फैलती जा रही थी ।

डार्लिंग ने एक अजीबोगरीब तमाशा देखा । वह उसे कूट रहा था, पीट रहा था और नौजवान सिसकियाँ ले रहा था । हालाँकि डार्लिंग की चोटें इतनी हल्की नहीं थीं कि कोई इंसान बर्दाश्त कर लेता – लेकिन नौजवान तो अब हाथ भी नहीं हिला रहा था–बदन बिल्कुल बोझिल और ढीला पड़ गया था । डार्लिंग ने उसे दो-तीन बार उठा-उठाकर रेत पर पटका । दोनों का हुलिया बिगड़ गया था । नौजवान पिटता रहा । डार्लिंग को खुद ही थकन महसूस होने लगी ।

“थक गए – अरे जालिम अभी तो तबीयत भी खुश नहीं हुई – लो हमने तो खुद को तुम्हारे सामने पेश कर दिया और तुम्हें इतनी गैरत भी नहीं आ रही कि मारते रहो – अरे उस वक्त तक तो मारो कि हाथ-पांव पुरसुकून हो जाएँ – मारो न, खड़े क्यों हो ?”

लेकिन डार्लिंग मूर्खों की तरह खड़ा उसकी शक्ल देख रहा था । उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि यह क्या अजीबोगरीब चीज उसके सिर पर पड़ गई ।

अपनी जानकारी में उसने नौजवान को अधमरा कर दिया था – उसके जिस्म के कई भागों से खून रिसने लगा था लेकिन वह निरन्तर उसे छेड़-छेड़कर मारने के लिए उकसा रहा था ।

“खड़े हो जाओ ।” डार्लिंग ने खूंखार स्वर में कहा ।

“हम नहीं खड़े होते– पहले हमें और मारो ।” नौजवान मटक कर बोला ।

“मैं कहता हूँ खड़े हो जाओ वरना मैं तुम्हारी गर्दन दबा दूँगा ।”

“दबा दो न – कौन मना कर रहा है तुम्हें ? मैं वारी – मैं सदके ।” नौजवान दांत किटकिटा कर बोला और डार्लिंग सिर खुजाने लगा ।

उसकी समझ में कुछ नहीं आ रहा था । दो ही बातें हो सकती थीं । या तो उसे कत्ल करके यहीं दबा दे या फिर खामोशी से अपनी गाड़ी में बैठे और वापिस चला जाये । मिसेज ठाकुर का केस उसने अपने हाथ में जरूर ले लिया था लेकिन अब उसके जेहन में कुछ तबदीलियां पैदा हो गई थीं । वह उस नौजवान की हत्या नहीं करना चाहता था । वास्तविक बात यह थी कि वह उसे समझने में असमर्थ था कि यह किस्सा क्या है

नौजवान दिलेरी से लड़ते-लड़ते जनखों की सी हरकत क्यों करने लगा है । पिटने के बाद तो किसी और स्वर में बोलना भी नहीं चाहिए था । जो भी हो उसने नौजवान पर फिर हाथ नहीं उठाया । नौजवान प्रतीक्षा की बेचैन निगाहों से उसे देखता रहा ।

“बढ़ो प्यारे और एक जोरदार ठोकर मारो हमारी पसलियों पर – शाबाश ! आगे बढ़ो ।”

“मैं कहता हूँ खड़े होगे या नहीं ?”

“देखो – अगर मैं खड़ा हो गया तो तुम लेट जाओगे ।” नौजवान ने जमीन पर पड़े-पड़े कहा ।

“खड़ा हो जा वरना... ।” डार्लिंग ने एक मोटी सी गाली दी और नौजवान कराहता हुआ उठकर बैठ गया । फिर वह जमीन पर हाथ टिकाकर खड़ा हो गया ।

“कहा था न – हमारी मान लो– न माने– अब भुगतो ।” वह आगे बढ़ा और दूसरे ही क्षण उछलकर डार्लिंग के सीने पर एक लात रसीद कर दी ।

डार्लिंग उछलकर नीचे गिरा – उसके बाद नौजवान ने उसे अवसर नहीं दिया, वह डार्लिंग को गर्दन से पकड़कर उठाता और कहीं न कहीं उस पर चोट मार देता । चोटें इतनी घातक थीं कि डार्लिंग पूरी कोशिश के बावजूद उनसे बच नहीं पा रहा था और हर बार उसके मुँह से कराह निकल पड़ती ।

डार्लिंग अपनी जान बचाने के लिए लड़ रहा था, लेकिन नौजवान ने उसे इसका भी अवसर नहीं दिया – अंत में उसने डार्लिंग का मुँह रेत में घुसेड़ दिया और उसकी गर्दन पर पांव रखकर खड़ा हो गया ।

“बोल तेरे साथ क्या सुलूक किया जाये ?” नौजवान कमर लचकाकर बोला – “छोड़ दिया जाये या मार दिया जाये ?”
 
डार्लिंग बुरी तरह हाथ-पांव मार रहा था और अगर नौजवान कुछ देर तक इसी तरह खड़ा रहता तो डार्लिंग का दम ही निकल जाता । नौजवान ने स्वयं ही अपना पांव हटा लिया और उसे कॉलर से पकड़कर खड़ा कर दिया । डार्लिंग में अब इतनी भी शक्ति नहीं थी कि उठकर खड़ा हो जाये । वह बुरी तरह हांफ रहा था और उसने तीसरी बार नौजवान को एक और रूप में तबदील होते देखा ।

“चलो आगे बढ़ो और अपनी गाड़ी तक पहुँच जाओ ।” नौजवान का स्वर इस बार बड़ा ही भयानक और कठोर था । और डार्लिंग आगे बढ़ने लगा ।

जरा सी देर में इतने मंजर बदले थे कि डार्लिंग की बुद्धि ने काम करना ही छोड़ दिया । उस पर इतनी मार पड़ी थी कि उसके हवास दुरुस्त हो गए थे । वह सारी जिंदगी इतना नहीं पिटा था । बड़ी कठिनाई से वह गाड़ी तक पहुँच पाया ।

“हाँ – अब जरा बताओ –किसने भेजा था तुम्हें ? क्यों आये हो और कहाँ से आये हो ?”

“वह....म....मैं.....मैं.... ।” डार्लिंग ने हकलाते हुए कहा ।

“देखो दोस्त । अब तक जो होता रहा वह सचमुच एक मजाक था, लेकिन अब जो होगा उसमें मजाक का एक अंश भी शामिल न होगा और फिर इस खेल का समापन तुम्हारी मौत पर ही हो सकता है । मैं खामोशी से तुम्हारी हत्या करके चला जाऊँगा और यह कोई सोच भी नहीं सकेगा कि यहाँ क्या हुआ है ? उचित है सबकुछ ठीक-ठाक बता दो ।”

“तुम्हारा नाम डार्लिंग है ?” उसने फिर पूछा ।

“हाँ ।” डार्लिंग धीमे स्वर में बोला ।

“क्या करते हो ?”

“एक होटल चलाता हूँ ।”

“ओह...तो तुम ही वह डार्लिंग हो । मैं समझ गया....लेकिन मेरे और तुम्हारे बीच का तो कोई झगड़ा नहीं था ।”

“हाँ – हमारे बीच कोई झगड़ा नहीं था – लेकिन एक औरत ने मुझे तुम्हारे पीछे लगाया है ।”

“उसका नाम कहीं मिसेज ठाकुर.....मेरा मतलब मोहनी तो नहीं है ?”

“हाँ ।”

“क्या कहा था उसने तुमसे ?”

“यही कि तुम उसे ब्लैकमेल कर रहे हो --+ मैं तुम्हें कत्ल कर दूँ ।”

“हाये– फिर कत्ल क्यों न कर दिया तुमने हमें – अब खुद तैयार हो जाओ कत्ल होने के लिए । भला बताओ तो सही, इस कमबख्त ने एक ऐसे शख्स को कत्ल करने के लिए भेजा है जो हमें कत्ल भी नहीं कर सकता । डार्लिंग तुम बुजदिल चूहे हो – क्या मैं तुम्हारा चाकू तलाश करके तुम्हें दूँ ? चाकू से ही मुझे मार दो – कुछ तो मजा आएगा ।”

“दोस्त – मैं तुम्हें अमर के नाम से जानता हूँ । नाम भी मुझे उसी ने बताया था –लेकिन मुझे हैरत है कि मैं समझ ही न सका कि तुम क्या चीज हो ?”

“हीरा कहते हैं....हीरा कहते हैं हमें ।” अमर ने शरमाकर जवाब दिया और डार्लिंग की आँखें भय और आतंक से फैल गयीं ।

“हीरा उस्ताद ।” वह हैरत से बोला ।

“हाँ – तुम तो जानते हो हमें ।” अमर उसी तरह हकलाकर बोला और डार्लिंग का चेहरा भय और दहशत से पीला पड़ गया ।

“उस्ताद हीरा ! सूरत शक्ल से नहीं जानता था – नाम से अच्छी तरह जानता हूँ । मुझे क्या मालूम था – यकीन करें उस्ताद– मुझे नहीं मालूम था । अगर वह जलील औरत मुझे बता देती कि यह तुम हो तो मैं कभी यह जुर्रत न करता । मुझे माफ कर दो उस्ताद ! मुझे माफ कर दो ।” डार्लिंग की हालत पतली हो गई ।

“ऐ चल हट कमीने कहीं के – पहले तो दुलत्तियां चला रहा था – अब माफी मांग रहा है ।” अमर फिर उसी मूड में आ गया ।

“यकीन करो उस्ताद ! मैं बिल्कुल बेकसूर हूँ । मैं तो खुद आपसे मिलना चाहता था । मगर आपके किसी ठिकाने का पता ही नहीं मालूम था । धोखा हो गया उस्ताद हीरा – धोखा हो गया ।” डार्लिंग बुरी तरह गिड़गिड़ा रहा था ।

अमर अपने होंठ भींचकर उसे देखता रहा और फिर उसने गर्दन हिला दी ।

“ठीक है – अगर गलतफहमी के शिकार होकर यहाँ तक चले आये हो तो हीरा तुम्हें माफ करता है – लेकिन डार्लिंग ! हीरा के अंदर एक बहुत बड़ी खराबी है कि वह बदमाशों में सिर्फ अपने आपको बदमाश समझता है – गुंडागिरी में उससे बड़ा कोई गुंडा नहीं है और लड़ाई-भिड़ाई में भी वह बहुत सी गलतफहमियों का शिकार है – कोई उसकी यह गलतफहमी दूर करना चाहे तो उसे चैलेंज दे या धोखे से वार करे –हीरा को कोई आपत्ति नहीं होगी, लेकिन अगर वह हीरा से शिकस्त खा जाये तो फिर उसके लिए दो ही सूरतें होंगी – हीरा की गुलामी या फिर मौत । तुम इन दोनों में से कोई एक चीज पसंद कर लो । अगर हीरा के शागिर्द बनकर काम करना चाहते हो तो गर्दन झुकाकर यहीं रेत पर बैठ जाओ और अगर इस बात के इच्छुक हो कि थोड़ी मोहलत पाकर दोबारा हीरा के मुकाबले पर आओगे तो अब तक जो कुछ हुआ वह मेरे हिसाब में था – लेकिन यहाँ से नया हिसाब खुल जायेगा । हीरा की तरफ से तुमको दावत है कि जब चाहे हमला करना और उसे रास्ते से हटाने की कोशिश कर लेना – असफल रहे तो हीरा तुम्हें खत्म कर देगा, क्योंकि उसके बाद तुम्हारे लिए जिंदगी की कोई गुंजाइश नहीं होगी ।”

“नहीं हीरा उस्ताद ! बहुत दिनों से आपका नाम सुन रहा था । बहुत बड़े-बड़े कारनामे हमारी लाइन के लोगों में आपके नाम से जोड़े जा रहे हैं । मैं तो खुद आपसे मिलने का इच्छुक था और जिस तरह हमारी आपसे मुलाकात हुई है उससे मुझे यकीन हो गया है कि आपके नाम की ख्याति गलत नहीं है । मैं भी लड़का हूँ उस्ताद – बहुत से लोगों के साथ लड़ा हूँ और सफल रहा लेकिन आपने मुझ पर जो हाथ दिखाए उसके बाद डार्लिंग दुनिया के सामने सिर जरूर उठाएगा, आपके सामने नहीं । मैं खुशी से आपका सेवक बनने के लिये तैयार हूँ ।”

“अगर तुम धोखा नहीं कर रहे हो तो ठीक है – जाओ – आज से तुम हमारे लोगों में से हो । मुझे जब भी किसी काम की जरूरत पड़ी, तुम्हें सूचित कर दिया जायेगा ।”

“डार्लिंग दिलो-जान से तैयार है श्रीमान ।” डार्लिंग ने जवाब दिया और अमर गर्दन हिलाकर वहाँ से मुड़ गया ।

थोड़ी देर बाद उसकी कार फर्राटे भरती हुई दूर निकल गई । डार्लिंग अपनी जगह खड़ा अजीब निगाहों से उस कार के पार्श्व भाग को देख रहा था – फिर हीरा की कार दृष्टि से ओझल हो गई तो गहरी साँस लेकर अपनी चोटों को देखने लगा ।

जिस्म का कोई हिस्सा ऐसा नहीं था जहाँ पीड़ा नहीं हो रही थी – चेहरा रेत में अटा हुआ था – कपड़े भी बुरी तरह गंदे हो गए थे । उसने एक मोटी सी गाली मिसेज ठाकुर को दी और अपना लिबास झाड़ने लगा ।
 
मिसेज ठाकुर बेहद खुश थी । डार्लिंग के बारे में उसे कोई सही अंदाजा तो नहीं था, लेकिन फिर भी डार्लिंग के व्यक्तित्व से उसने अनुमान लगाया था कि वह वहशी आदमी है – सम्भव है अमर पर काबू पा ले । अलबत्ता हाईलाइट लाइट में डार्लिंग को हंगामा न करते देखकर उसने यही अनुमान लगाया था कि डार्लिंग अवसरवादी आदमी है ।

अमर समय से कुछ पहले ही चला गया था और डार्लिंग उसका अनुसरण करता चला गया ।

उनके जाने के बाद काफी देर तक हाईलाइट क्लब में मिसेज ठाकुर अपनी मेज पर अकेली बैठी रही – हालाँकि वह अकेली बैठने की आदी नहीं थी और जब लोगों ने उसे इस तरह बैठे देखा, उसके दो परिचित उठकर उसके पास आ गए ।

“हैलो मिसेज ठाकुर ।”

“हैलो ।” वह स्वयं को संभालकर बोली ।

“क्या बात है – लेकिन क्यों – क्या तुम्हें बीमार नजर आ रही हूँ ?” मिसेज ठाकुर ने अपने आपको सँभालते हुए कहा । उसने अपने चेहरे के भावों को तुरन्त ही परिवर्तित कर लिया था वह नहीं चाहती थी कि कोई उसके चेहरे से मानसिक स्थिति का अंदाजा लगा सके ।

“यह बात नहीं है – आप अकेली और खामोशी बैठी है और यह आपके स्वभाव के विपरीत है ।”

“ओह ! इंसान को कभी – कभी अपने स्वभाव के विपरीत भी कुछ करना चाहिए ।” मिसेज ठाकुर ने फीकी सी मुस्कुराहट के साथ कहा । वह कोशिश के बावजूद खुद को काबू में नहीं रख पा रही थी ।

“तो इस समय आप अपने स्वभाव के विपरीत कुछ कर रही हैं ।” दूसरे नौजवान ने मुस्कराते हुए कहा ।

मिसेज ठाकुर मुसकुराने लगीं, फिर वह एकाएक अपनी जगह से उठ खड़ी हुई ।

“क्यों खैरियत – कहाँ ?” उसके परिचित ने पूछा ।

“वापिस घर जा रही हूँ ।”

“अरे क्यों मिसेज ठाकुर ?”

“बस –तुम लोगों ने मुझे एहसास दिला दिया है कि सचमुच मेरे सिर में अत्यधिक दर्द है ।” मिसेज ठाकुर ने उँगली और अंगूठे से मस्तिष्क रगड़ते हुए कहा ।

“मेरा तो ख्याल था कि कुछ देर.... ।”

“नहीं फिर सही, सॉरी ।” मिसेज ठाकुर ने कहा और बाहर निकल गई ।

कार में बैठकर वह अपनी कोठी की ओर चल पड़ी । हाथ स्टियरिंग पर कांप रहे थे । अगर डार्लिंग सफल न हुआ तो...यह एहसास उसे बार-बार चिंतित कर रहा था – कहीं यूँ न हो कि डार्लिंग असफल हो जाये और अमर को उसके बारे में बता दे – फिर....फिर.... ।”

लेकिन मिसेज ठाकुर को फिर अपने आप ही क्रोध आने लगा – अकारण क्या से क्या बनकर रह गई थी – अमर जैसे जलील आदमी से भला वह क्यों भयभीत हो रही है ? आखिर अमर है क्या ? अमर जैसा व्यक्ति तो इस योग्य भी नहीं है जिसे कोई महत्व दिया जाये ।

किसी कीमत पर नहीं कुत्ते....किसी कीमत पर नहीं । उसने अपने दांत बुरी तरह भींच लिए – अगर...अगर डार्लिंग नाकाम हो गया तो फिर मेरे पास एक और भी खौफनाक ताकत है–- वह जिसके नाम पर मैं काम करती हूँ – हीरा, एक रहस्यमय ताकत जिसकी मैं गुलाम हूँ ।

वह खुद को दिलासे दे रही थी । लेकिन वह हीरा का पता ठिकाना नहीं जानती थी और उसने हीरा को देखा भी तो एक ही बार था । हीरा का कहना था कि जब उसे जरूरत पड़ेगी खुद संपर्क कर लेगा –- लेकिन सप्ताह में दो बार वह ठीक समय पर फोन करता था और मिसेज ठाकुर को नियमपूर्वक उसकी कॉल अटेंड करनी पड़ती ।

सिर्फ एक दिन बीच में था और फिर हीरा उससे फोन पर बात करने वाला था । अगर डार्लिंग नाकाम रहा तो वह हीरा को इस अमर से भिड़ा देगी । यह सब सोचते-सोचते उसकी कार कोठी में प्रविष्ट हुई, फिर वह सीधी बेडरूम में जाकर गिर गई । नौकरानी ने कॉफी चाय वग़ैरह के बारे में पूछा तो उसने इंकार कर दिया ।

अब उसे डार्लिंग के सन्देश का इंतजार था ।

कई घण्टे वह इसी तरह पड़ी रही और फिर उस समय ग्यारह बजकर पन्द्रह मिनट हुए थे जब वह अपनी जगह से उठी । अगर आज ही डार्लिंग की रिपोर्ट न मिली तो वह सारी रात बेचैनी से सो न सकेगी । संभव है वह बीमार पड़ जाये – उसने सोचा और उठकर लिबास तबदील करने लगी ।

डार्लिंग के अड्डे पर हमेशा की तरह रौनक थी । हॉल में अच्छे-खासे लोग नजर आ रहे थे । लड़कियाँ भी थीं- मर्द भी थे । सौदे हो रहे थे । वह काफी देर तक वहीं बैठी रही और यह अनुमान लगाती रही कि डार्लिंग मौजूद है या नहीं । जब उसे पता न चल सका तो उसने वेटर को बुलाकर पूछ ही लिया ।

“डार्लिंग मौजूद है ?”

“हाँ मैडम । साहब ऊपर मौजूद हैं ।”

“मैं उनसे मिलना चाहती हूँ ।”

“जाइये मिल लीजिये ।” वेटर ने जवाब दिया । मिसेज ठाकुर उन सीढ़ियों की ओर बढ़ गई, जहाँ से गुजरकर वह एक बार पहले भी डार्लिंग से मुलाकात के लिए जा चुकी थी । उसने एक दरवाजे पर दस्तक दी और अंदर से एक गुर्राहट उभरी ।

“आ जाओ ।”

मिसेज ठाकुर दरवाजा खोलकर अंदर प्रविष्ट हो गई । डार्लिंग एक लांग चेयर पर अधलेटा था । उसके शरीर पर स्लीपिंग सूट था । माथे पर पट्टी बन्धी हुई थी । बायीं आँख सूजी हुई थी । एक जबड़ा उभरा हुआ था । मिसेज ठाकुर उसे इस हाल में देखकर कांप गई ।

“आ गई अय्याश औरत ।” उसने गुर्राती आवाज में कहा और मिसेज ठाकुर झुरझुरी सी लेकर रह गई ।

“जानता हूँ – तुझे अच्छी तरह जानता हूँ । तूने मुझे यह नहीं बताया था कि मेरा मुकाबला किससे होगा । जलील औरत तूने मेरे साथ इतनी बड़ी चालाकी क्यों की ?” डार्लिंग क्रोध की अधिकता से कांप रहा था ।

“डार्लिंग.....डार्लिंग – तुम्हारी इन बातों का क्या मतलब है आखिर.... ?” मिसेज ठाकुर डार्लिंग की हालत देखते हुए उसके वह शब्द भी बर्दाश्त कर गई ।

“उस्ताद हीरा से भिड़ा दिया तूने मुझे ।”

“क....क....किससे ?” मिसेज ठाकुर का मुँह हैरत से खुल गया ।

“हीरा..... ।” डार्लिंग दहाड़ पड़ा – “हीरा डाकू....हीरा...स्मगलर....हीरा ब्लैकमेलर.....हीरा....हीरा उस्ताद ।”

“हीरा.... ।” मिसेज ठाकुर का सिर चकराने लगा ।

“बता तूने यह नाम नहीं सुना कभी ?” डार्लिंग चीख पड़ा ।

“स...सुना है....खूब सुना है....कितने ही किस्से अखबारों में छपते रहते हैं उसके...क्या तुम उसी हीरा की बात कर रहे हो ?” मिसेज ठाकुर का स्वर कांप रहा था ।

“हाँ – उसी हीरा उस्ताद की बात कर रहा हूँ कमीनी – और अब तू मेरी भविष्यवाणी सुन ले –अब तेरी मौत आ गई है – वह अमर नहीं हीरा है ।”

“म...मगर डार्लिंग जरूर तुम्हें कुछ धोखा हुआ है – वह हीरा कैसे हो सकता है...मैं तो उसके खानदान तक को जानती हूँ, अमर नाम है उसका ।”

“व्यर्थ बकवास मत करो । अगर तुम मुझे यह बता देती कि अमर का दूसरा नाम हीरा है तो कभी इस बात के लिए तैयार न होता । क्या तुझे इल्म नहीं है कि वह कितना खतरनाक इंसान है । वह एक वांटेड व्यक्ति है, जिसके लिए मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और दिल्ली स्टेट्स की पुलिस ने भारी इनाम घोषित कर रखे हैं । और हीरा को जिन्दा या मुर्दा गिरफ्तार करने वाले को कम से कम पाँच लाख का मुनाफा हो सकता है । बड़े-बड़े गुंडे उसका नाम सुनकर जगह खाली कर देते हैं । तूने मेरे साथ धोखा किया है मिसेज ठाकुर – बता मैं तेरे साथ क्या सुलूक करूँ ?”

“देखो – मेरी बात सुनो –मुझे गलत मत समझो–थोड़ा सोचने दो मुझे ।” वह सिर थामकर बैठ गई । और यह हकीकत थी कि उसे अब चक्कर सा आने लगा था ।

“अब तू यहाँ से दफा हो जा कमीनी – अगर उसे खबर लग गई कि तू यहाँ मेरे पास आकर सकुशल चली गई तो मेरी भी खैर नहीं होगी ।” डार्लिंग लांग चेयर पर सीधा होकर बैठ गया ।

“तुम मुझे बताओ डार्लिंग कि तुम उससे मुकाबले में कामयाब हुए या नहीं ?” मिसेज ठाकुर ने अपने आपको संयत करते हुए कहा ।

“देख ले, मेरी कामयाबी तेरे सामने है” डार्लिंग उसी प्रकार गुर्राहट से बोला ।

“और उसकी स्थिति क्या है ?”

“स्थिति....कुछ नहीं – वह वापिस चला गया है अपने घर, और तूने मुझे हमेशा के लिए उसका गुलाम बना दिया है । अब मैं उससे मुकाबला नहीं कर सकता – और तेरे लिए मेरा बेहतरीन सुझाव यह है कि तू इस मुल्क से भाग जा या अमर से माफी मांग ले– या तो वह तुझे माफ कर देगा या फिर मार ही डालेगा ।”

“तुमने पहले भी कभी हीरा को देखा है ?” मिसेज ठाकुर ने झल्लाकर कहा ।

“नहीं – लेकिन इससे क्या होता है – उसका नाम तो सुना है ।”

“फिर तुम्हें कैसे पता चला कि वह हीरा है ?”

‘उसी ने बताया था ।”

“इस बात का कोई सुबूत दिया उसने कि वह हीरा है ?”

“सबूत....सबूत तुझे नजर नहीं आ रहा है– जिंदगी में पहली बार मैंने किसी के हाथों इतनी मार खाई है । यही क्या कम सबूत है ।” डार्लिंग ने खड़ा होना चाहा पर वह कराहकर रह गया ।
 
“उसने तुमसे झूठ बोला डार्लिंग ।”

“क्या बकवास कर रही है तू... ।” डार्लिंग को चीखते हुए खांसी आ गई – तू आखिर कहना क्या चाहती है ?”

“तुम हीरा को नहीं जानते इसलिए धोखा खा गए – मैं हीरा को जानती हूँ इसलिए धोखा नहीं खा सकती । उसने तुम्हें रोब में लेने के लिए यह नाम बताया होगा और फिर तुम चुपचाप पिट गए होगे । वह बहुत बड़ा फ्रॉड है । और अगर मेरी बात पर यकीन नहीं आता तो कल शाम सात बजे हीरा का फोन आएगा और मैं सारा किस्सा उसे बताकर तुम्हारी उससे मुलाकात की व्यवस्था करवाऊंगी – फिर डार्लिंग तुम देखना इस नकली हीरे की असली हीरा क्या गत बनाता है – वह इसकी तरह जनखा नहीं –भरपूर मर्द है और उसने मेरे साथ एक रात गुजारी है...जो मेरी जिंदगी की सबसे हसीन और सबसे भयानक रात थी ।”

डार्लिंग उठा और दो कदम आगे बढ़ा । फिर उसने एक झन्नाटेदार थप्पड़ मिसेज ठाकुर के गाल पर रसीद कर दिया ।

“हीरे को सिर्फ जौहरी पहचान सकता है कि असली कौन है और नकली कौन है । और जौहरी तुम नहीं मैं हूँ – हीरा मेरा असली है – असली हीरा तुम जैसी अय्याश औरतों का हमबिस्तर नहीं बन सकता –नाउ गेट आउट.... ।”

मिसेज ठाकुर लड़खड़ाती हुई दीवार से जा टकराई – उसकी खोपड़ी में इस थप्पड़ ने सितारों का नाच दिखा दिया था । उसने थोड़ी देर तक दीवार पर टेक लगाये गहरी सांसे ली और फिर थके थके अंदाज में दरवाजे की तरफ बढ़ गई ।

“मेरी बात याद रखना – और जब मैं हीरा से तुम्हारी मुलाकात करवाऊंगी तो इस थप्पड़ का हिसाब भी चुकता कर दूँगी ।” फिर वह लड़खड़ाते कदमों से बाहर निकल गई ।

डार्लिंग ने गहरी साँस ली और लांग चेयर पर ढेर हो गया ।

☐☐☐

मिसेज ठाकुर एक पल भी होटल के हॉल में न रुकी । सीधी बाहर निकली ।

होटल से बाहर उसकी शानदार मर्सिडीज खड़ी थी । वह सोच रही थी कुछ न कुछ भयानक खेल शुरू हो गया है । उसकी जिंदगी अब खतरे में पड़ गई है ।

अब उसे शीघ्र कुछ करना होगा । इतनी बड़ी दुनिया पड़ी है । वह कहीं भी जाकर अपना कारोबार चला सकती है ।

इसी उलझन में फंसी वह अपनी गाड़ी की तरफ बढ़ रही थी । उसने कार का दरवाजा खोला और अंदर बैठकर कार स्टार्ट कर दी । उसकी मानसिक स्थिति ठीक नहीं थी । इस समय उसे शराब की अत्यधिक जरूरत महसूस हो रही थी ताकि वह खुद को पुरसुकून रख सके । कार का रुख कोठी की ओर था ।

उस समय वह एक सूनसान सड़क से गुजर रही थी कि एकाएक कोई ठंडी से चीज पीछे से आकर उसकी गर्दन से चिपक गई ।

वह बुरी तरह चौंक पड़ी । उसके चेहरे के भाव बिगड़ गए, तभी पार्श्व से आवाज उभरी ।

“रुख बदल दे री...अगले चौराहे से सीधे मुड़ जाइयो ।” एक अत्यधिक भौंडी और फ़टी-फटी आवाज सुनाई दी और मिसेज ठाकुर का पांव ब्रेक पर जा पड़ा ।

उसने भयभीत निगाहों से पलटकर देखा तो उसे एक अजीबो-गरीब जीवात्मा नजर आई ।

लेकिन वह अमर ही तो था...हाँ, यह अमर ही था...लेकिन यह था या थी क्योंकि इस समय वह एक बेहद खूबसूरत रेशमी जनाना सूट में सजा हुआ था । चेहरे पर लड़कियों का सा मेकअप था । बाल निहायत खूबसूरत अंदाज में सेट किये गए थे । सिर पर दुपट्टे ओढ़े था, जिसके दोनों सिरे कानों में फंसा लिए गए थे । अजीबो-गरीब शक्ल लग रही थी उसकी....उपहास जनक भी और खूबसूरत भी ।

“अरी चल न कलमुंही...क्यों टुकर-टुकर मुँह देखे जा रही है मेरा –अगले चौराहे से सीधे हाथ पर मोड़ लिजियो । बड़ी बातें करनी हैं तुझसे...चल...चल, वरना यह तमंचा चल गया तो फिर तेरी गर्दन में सुराख़ हो जायेगा....चल आगे बढ़ ।”

पिस्तौल का दबाव मिसेज ठाकुर की गर्दन पर तेज हो गया और मिसेज ठाकुर ने घबराकर कार का क्लच छोड़ दिया कार गेयर में थी....इसलिए एक झटका लेकर बन्द हो गई । मिसेज ठाकुर ने बदहवासी के आलम में कार को दोबारा स्टार्ट कर दिया और उसे आगे बढ़ा दिया । अगले चौराहे से कार दायीं तरफ मुड़ गई ।

अमर ने ऐसे रास्ते पर उसे चलाया कि मिसेज ठाकुर चकरा कर रह गई । यूँ भी उसकी मानसिक स्थिति ठीक नहीं थी । न जाने किस तरह ड्राइविंग कर रही थी । बस यूँ कहा जाये तो गलत न होगा कि उसके हाथ पांव मशीनी अंदाज में हरकत कर रहे थे और कार ड्राइव करने में उसकी इच्छा शक्ति का कोई दखल नहीं था ।

फिर अमर ने एक तरफ मुड़वाई । एक खूबसूरत कोठी का मेन गेट सामने था ।

“हॉर्न बजाओ ।” अमर ने हुक्म दिया और मिसेज ठाकुर का हाथ हॉर्न पर जा पड़ा । कई बार हॉर्न बजाने के बाद एक चौकीदार ने बाहर निकलकर झाँका, फिर पीछे अमर को देखकर जल्दी से दरवाजा खोल दिया । मिसेज ठाकुर अमर के संकेत पर कार अंदर ले गई ।

वह खूबसूरत कोठी थी । पोर्च में कार रोककर उसने इंजन बन्द कर दिया ।

“आ जाओ बीबी ।” अमर ने कहा और मिसेज ठाकुर दरवाजा खोलकर नीचे उतर आई ।

अमर स्वयं भी पिछली सीट से नीचे उतर आया...लेकिन उसे देख देखकर मिसेज ठाकुर को चक्कर से आ रहे थे । वह लड़की मालूम हो रहा था । कोई यह नहीं कह सकता था कि यह कोई नौजवान है । पूरा शरीर किसी लड़की का नारीत्व प्रस्तुत कर रहा था । बस उसका अंदाज अजीबोगरीब था । उसने दुपट्टे का कोना अपने होंठों में दबाकर कहा –

“चलो, अंदर चलो जानेमन । तुम्हारे यहाँ आगमन पर बड़ी खुशी हुई है हमें...पर क्या करें बीबी...तुमने खुद ही हमें इसका अवसर दिया है, वरना हम तो तुम्हें खलूस से अपनों में शामिल कर चुके थे । चलो, जल्दी चलो...हमें परेशान मत करो । तमंचा अब भी हमारे हाथ में है ।” अमर ने पिस्तौल का रुख उसकी तरफ करते हुए कहा ।

वह कोठी के मुख्य दरवाजे से प्रविष्ट होने के बाद बहुत बड़े हॉल में पहुँच गए । हाल में सामने ही एक बहुत बड़ी राहदारी नजर आ रही थी । अमर के संकेत पर मिसेज ठाकुर उस राहदारी में चल पड़ी । राहदारी दोनों ओर से कवर्ड थी और उससे दूसरी तरफ नहीं देखा जा सकता था...लेकिन इसका समापन एक और हाल में हुआ ।

अमर उसे लिए हॉल में प्रविष्ट हो गया । अत्यधिक खूबसूरत ढंग से सजा हुआ हॉल था । फर्श पर एक कालीन बिछा हुआ था इसके अलावा हॉल में कोई फर्नीचर नहीं था । दीवारों पर मन लुभावना रंग किया गया था ।

अमर ने मुस्कराकर उसकी तरफ देखा और फिर दोहरा हो गया ।

“हाय मर जाऊँ...तुम्हारे आने पर किस तरह खुशी प्रकट करूँ...अच्छा ऐसा करो, तुम थोड़ी देर यहाँ बैठ जाओ, हम अभी आते हैं ।” अमर ने कहा और हॉल के दूसरे दरवाजे से बाहर निकल गया । मिसेज ठाकुर खुश्क होंठों पर जुबान फेर रहीं थीं ।

तब उसने चारों तरफ देखा । हॉल का दरवाजा खुला था, जिससे वह लोग अंदर आये थे । वह अगर चाहती तो भाग सकती थी...लेकिन इस समय उसमें इतनी शक्ति नहीं थी कि वह ऐसी कोई हरकत करती । अमर मूर्ख तो न था...यकीनी तौर पर बाहर उसकी फरारी के रास्ते बन्द हो चुके होंगे । वह पता नहीं अंदर गया था या बाहर....मिसेज ठाकुर इसका कोई अनुमान नहीं लगा सकी ।

चंद क्षणों बाद हॉल में कदमों की आवाजें सुनाई दीं और मिसेज ठाकुर उन्हें देखकर चौंक पड़ी ।

यह दो जनखे थे– लम्बे डीलडौल के । शेव बढ़ी हुई थी, लेकिन आँखों में काजल, होंठों पर सुर्खी, गालों पर लाली मौजूद थी और शरीर पर आकर्षक जनाना लिबास था । एक के गले में ढोल था और दूसरे के गले में हारमोनियम । वह शरमाते, लजाते अंदर आ गए । उन्होंने बड़े इत्मीनान से दोनों चीजें नीचे रख दीं



“तुम....तुम....तुम.... ।” मिसेज ठाकुर हकलाई ।

“हाँ बीबी....हमें रामकटोरी कहते हैं ।”

“और मुझे छमिया कहे हैं । दूसरे ने फटी-फटी आवाज में कहा ।

“मगर...मगर... ?”

“अगर...मगर कुछ नहीं बीबी...बैठ जाओ – यह बताओ कौन सा गाना सुनोगी ?”

“मैं कोई गाना नहीं सुनूंगी ।”

पर हम तो सुनाएंगी बीबी । यह तो पेशा है, शौक है हमारा । उस्ताद जी–ओ उस्ताद जी ।” रामकटोरी ने अंदर का रुख करके आवाज लगाई और एक और शख्स अंदर प्रविष्ट हुआ । यह भी एक साज लिए हुए था । अजीबोगरीब मसखरा था । चेहरे पर दाढ़ी लेकिन जनाना लिबास । आँखों पर चश्मा भी लगाया हुआ था ।

“चल री चल...उस्ताद जी आ गए । चल री....बजा तीन ताल ।” उसने राम कटोरी से कहा और स्वयं ही हारमोनियम पर व्यस्त हो गई या हो गया ।

उसके बाद कमरे में संगीत सभा जम गई । उस्ताद जी साज बजा रहे थे और मिस राम कटोरी और छमिया ढोल और हारमोनियम के साथ-साथ गायकी से शुगल फरमा रही थीं ।

मिसेज ठाकुर फटी-फटी आँखों से यह सबकुछ देख रही थी । वह पागलों की तरह मुँह फाड़े खड़ी थी और वह तीनों कंठ फाड़ रहे थे । बहादुर शाह जफर की एक खूबसूरत गजल थी जिसके साथ वह तीनों ज्यादती कर रहे थे । ऐसी भौंडी और बेतुकी आवाजें थीं कि कानों के पर्दे फटे जा रहे थे । फिर अंदर से एक और जनखा निकला । वह साड़ी पहने था और उसके मोटे-मोटे पैरों में घुंघरू बंधे हुए थे ।

हॉल में आकर वह कालीन पर थिरकने लगा ।

मिसेज ठाकुर तो अमर की सजा की प्रतीक्षा में थी । वह तो सोच रही थी कि अब अमर उसके साथ कोई कठोर व्यवहार करेगा, लेकिन अमर न जाने कहाँ गायब हो गया और वह चारों नाच गा रहे थे ।

बड़ी कठिनाई से गजल समाप्त हुई । नाचने वाला रुक गया । सजिंदे भी खामोश हो गए । मिसेज ठाकुर खड़े-खड़े थक गई ।

“अब कौन सा गायेगी री ?”

“कोई गीत हो जाये ।”

“नहीं गजल ।”

“नहीं गीत ।” वह झगड़ने लगी ।

“तू बता बीबी, क्या सुनेगी ?” उन्होंने मिसेज ठाकुर से पूछा ।

“क्या बकवास है...अमर कहाँ है ?”

“कौन अमर ? यहाँ कोई अमर नहीं रहता । यहाँ तो हम रहते हैं, मेरा नाम राम कटोरी है और यह छमिया ।”

“और बन्दी को नूरजहाँ कहते हैं ।” दाढ़ी वाली ने कहा ।

“मैं....मैं कहती हूँ...अमर कहाँ है ?”

“ऐ अपनी अम्मा की गोद में होगा ।”

“पंगोड़े में पड़ा अंगूठा चूस रहा होगा ।”

“हाये...हाये...बातें बनाये जा रही हो तुम लोग....गाओ न, बजा री बजा – ढोल बजा ।”

और फिर एक बेसुरा राग शुरू हो गया ।

मिसेज ठाकुर परेशान निगाहों से उन्हें देख रही थीं । बेहूदा नाच और गीत । कानों के पर्दे फटे जा रहे थे । वह बेबसी से उन्हें देखती रही । आधे घण्टे से अधिक गुजर चुका था और जब बात उसकी बर्दाश्त से बाहर हो गई तो वह दरवाजे की तरफ पलटी । किसी ने आपत्ति नहीं उठाई, लेकिन उसका अनुमान दुरुस्त निकला । राहदारी के बाद दूसरे हॉल का दरवाजा बन्द था और बाहर जाने का कोई रास्ता नहीं था । वह बड़ी बेबसी महसूस कर रही थी । स्नायु फटे जा रहे थे ढोल और बाजे की आवाजें यहाँ भी साफ सुनाई दे रही थीं । अब कोई तीसरी गजल हो रही थी ।

मिसेज ठाकुर जमीन पर बैठ गई ।
 
अगर कोई खतरनाक सिलसिला शुरू हो जाता तो शायद उसकी हालत इतनी बुरी न होती...लेकिन यह यातना, आखिर इसका उद्देश्य.... ?”

कोई बात समझ में नहीं आ रही थी । जब यहाँ बैठे-बैठे वह तंग आ गई तो फिर हॉल में प्रविष्ट हो गई ।

“बन्द करो यह शोरगुल, क्या पागल हो गए हो तुम सब ?” वह कंठ फाड़कर चीखी और वह खामोश हो गए ।

“ऐ अनारकली ।”

“जी उस्ताद जी ।”

“कोई दूसरी गाओ....बीबी को पसंद नहीं आई ।”

“कोई फिल्मी गाना सुनोगी बीबी ?”

“अब अगर तुमने आवाज निकाली तो मुझसे बुरा कोई न होगा ।” मिसेज ठाकुर दहाड़ी ।

“तुमसे बहुत बुरा एक यहाँ मौजूद है बीबी । उसका कहना है कि सारी रात तुम्हें गाना सुनाते रहें और एक बात और सुन लो बीबी – सोने की कोशिश मत करना...चल री शुरू हो जा ।”

और ढोल के धमाके फिर गूंज उठे ।

“बन्द करो...मैं कहती हूँ बन्द करो ।” मिसेज ठाकुर दहाड़ी और फिर उन पर टूट पड़ी...लेकिन नृत्य करने वाले ने नाचते-नाचते पीछे से उसकी कमर पर लात रसीद कर दी और मिसेज ठाकुर औंधे मुँह कालीन पर जा पड़ी । नाचने वाला अब भी मटक-मटक कर नाच रहा था ।

मिसेज ठाकुर ने अपनी जगह से उठने की कोशिश नहीं की । लात बहुत जोरदार थी और उसकी रीढ़ की हड्डी में खासी चोट आई थी । जनखे निरन्तर बेहंगम आवाजों में गा रहे थे ।

तब एकाएक मिसेज ठाकुर के शरीर से ठंडा-ठंडा पसीना फूटने लगा । क्या यह सजा है । क्या अमर ने उसके लिए इस मानसिक यातना को सजा के तौर पर चुना है । ध्यान करने पर एहसास हुआ कि यह सजा दूसरी सजाओं से अधिक कष्टदायक हैं । उन लोगों की भयानक आवाजें बराबर उसे प्रभावित कर रही थी । और उसे यूँ महसूस हो रहा था –जैसे वह पागल हो जायेगी ।

वह फर्श पर पड़ी रही और वह गाते रहे । कमबख्त थक भी नहीं रहे थे । ज्यों-ज्यों गाते जा रहे थे, उनकी आवाजें खुलती जा रही थीं । मिसेज ठाकुर फिर उठकर बैठ गई और भयभीत दृष्टि से उन्हें देख रही थी ।

दो घण्टे गुजर गए । सिर का दर्द असहनीय हो गया तो वह फर्श पर लेट गई । उसने आँखें बन्द कर लीं...लेकिन इन कमबख़्तों ने एक और हरकत कर दी । बर्फ की तरह सर्द पानी से भरा हुआ जग उस पर उड़ेल दिया ।

मिसेज ठाकुर हड़बड़ा कर उठ गई । उसकी आँखें अंगारों की तरह सुर्ख हो रही थीं । उसने सहमी हुई निगाहों से पानी डालने वाले को देखा और वह हँस पड़ा ।

“नहीं बीबी....यहाँ सोना मना है ।”

“क्या.....क्या बकवास कर रहे हो तुम ?”

“ऐ.....हम क्या बकवास करेंगे बीबी....हम तो हुक्म के बन्दे हैं ।”

“हम तो गुलाम हैं उसके ।”

“किसके ?”

“हीरा के.....उस्ताद हीरा के.... ।”

“कहाँ है वह.....बुलाओ उसे....मैं उससे बात करूँगी ।” मिसेज ठाकुर ने कहा ।

“अरे वह तो चली गई । अब तो हम हैं...हमसे बात करो....गाने सुनो....चल री छमिया शुरू हो जाओ ।”

और वह फिर शुरू हो गए । मिसेज ठाकुर अपनी जिंदगी की सबसे शर्मनाक रात गुजार रही थी । सख्त शोर व हंगामों से उसके दिमाग की नसें फटी जा रही थीं । इस आलम में भी अगर उसका जेहन कभी सोने लगता तो ठंडे पानी से उसे भिगो दिया जाता । यूँ सारी रात गुजर गई । सुबह को उसकी बुरी हालत थी ।

और जब सूरज निकल आया तो गाना बजाना खत्म हो गया ।

“चलो उस्ताद जी । सुबह हो गई ।”

“चलो बीबी...आप आराम करो ।”

लेकिन मिसेज ठाकुर में अब उठने की शक्ति कहाँ थी । वह चारों उसे घसीटते हुए अंदर ले गई । कई राहदारियों से गुजरते हुए वह एक ऐसी जगह पहुँच गए जो शायद कैदखाने के तौर पर इस्तेमाल होती थी । बहुत बड़ी जगह थी मगर सलाखें लगी हुई थीं और इन सलाखों के पीछे आठ-नौ आदमी नजर आ रहे थे ।

दरवाजे से मिसेज ठाकुर को भी अंदर प्रविष्ट कर दिया गया । वे दरवाजा बन्द करके अंदर चले गए । मिसेज ठाकुर आँखें फाड़कर उन्हें देख रही थी । सबके सब खतरनाक चेहरों वाले थे, लेकिन उनकी हालत काफी पतली नजर आ रही थी । मिसेज ठाकुर को वह ध्यानपूर्वक देख रहे थे ।

“आप लोग...आप लोग कौन हैं ?” मिसेज ठाकुर ने स्वयं को सँभालते हुए पूछा ।

“पहली गलती के मुजरिम ।” उनमें से एक ने जवाब दिया ।

“क्या मतलब ?”

“मतलब तुम्हें मालूम होगा – क्या तुमने हीरा का किसी आज्ञा का उल्लंघन किया है ?” उनमें से एक ने कहा और वह खुश्क होंठों पर जीभ फेरने लगी ।

“हाँ ।” उसने बड़ी कठिनाई से कहा ।

“पहली बार किया है ?”

“हाँ ।” वह उसी अंदाज में बोली ।

“ठीक है....अभी तुम्हारे लिए माफी की गुंजाइश है । यहाँ तीन श्रेणियाँ हैं । पहली गलती करने वालों में हम सब शामिल हैं । दूसरी गलती करने वालों के लिए भी यहाँ कैदखाना है...लेकिन तीसरी गलती करने के बाद जिंदगी की कोई सम्भावना नहीं रहती और हीरा उन्हें कत्ल कर देता है ।”

“ओह....ओह....तुम सब उसके सामने बेबस हो ।”

“हाँ, इंसान को जिंदगी में किसी न किसी के सामने बेबस होना ही पड़ता है । वरना हम में से कौन शरीफ आदमी है । मेरा नाम दारा है । राम गढ़ के लोग आज भी मेरे नाम से कांपते हैं । यह जग्गा है । अस कत्ल किये हैं इसने जिंदगी में । वह दाऊद खान है । पुलिस जिसके नाम से कानों पर हाथ रखती है और वह फकीरा है– फकीरों की यूनियन का बादशाह, जिसके इशारे पर कत्ल होते हैं...लेकिन अब हम सब हीरा के गुलाम हैं । एक गलती वाले मुजरिम ।” दारा ने कहा ।

और मिसेज ठाकुर को सर्दी लगने लगी । उसका बदन बुरी तरह कांप रहा था ।

☐☐☐

डॉली को प्रेम रोग लग गया था जिसकी कोई दवा नहीं होती और यह रोग उसे भीतर ही भीतर खोखला किये दे रहा था । उसने अपनी सहेलियों...अपने दोस्तों से मिलना-जुलना बिल्कुल बन्द कर दिया था । घर की चारदीवारी में कैद होकर रह गई थी ।

उसने अमर से संपर्क स्थापित करने के लिए कई बार उसकी कोठी पर फोन किया, परन्तु अमर से कभी भी बात न हो सकी । उसने अमर को हाईलाइट क्लब में भी पूछा, लेकिन मालूम हुआ कि वह आजकल मिसेज ठाकुर के साथ क्लब में नहीं आ रहा है ।

डॉली उस क्लब में नहीं जाना चाहती थी । अमर के सम्बन्ध में वह दो बार लुट चुकी थी और मिसेज ठाकुर ने तो सारी जिंदगी के लिए लूट लिया होता । बस अमर की मेहरबानी से बच गई । डॉली नहीं चाहती थी कि मिसेज ठाकुर की निगाह में दोबारा आये ।

अमर के सम्बन्ध में डॉली की जो भी कोशिश हुई थी वह घर की चारदीवारी में रहकर ही हुई थी और अब उसने यह कोशिश भी बन्द कर दी थी । अमर उसकी यादों में आकर अमर हो गया था और अब डॉली उसके प्रेम में अंदर ही अंदर घुट रही थी ।

सिर्फ कामिनी ही जानती थी कि उसे क्या हो गया है....लेकिन इस सिलसिले में कामिनी भी उसके लिए कुछ नहीं कर सकती थी । वह तो एक ही बात कहती थी कि उसका ख्याल अब दिमाग से निकाल दे । प्रेम की आग कब एकतरफा होती है तो उससे कुछ भी हासिल नहीं होता । अगर अमर के दिल में उसके लिए चाहत होती तो वह खुद उससे मिलने की कोशिश करेगा...वरना बेहतर है कि वह उसे भूल जाये ।

“हाँ मैं यही कोशिश कर रही हूँ ।” डॉली कहती – “चंद दिन घर में रहूँगी – तनहाई सबकुछ भुला देगी ।”

“तू पागल हो गई है डॉली – अपनी जिंदगी में यह रोग न लगा – जहाँ तू पहुँच गई है वहाँ से वापस लौट आ.... वरना तुम्हारे डैडी को शक हो सकता है – इस तरह घर में पड़े रहना और तनहाई आवारा सोचों को जन्म देती है – इंसान कुछ का कुछ सोचता है और कभी-कभी इसके परिणाम बड़े भयंकर होते हैं ।”

कामिनी के लाख समझाने पर भी डॉली को होश न आया और अब यह उसकी जिद थी ।

रायबहादुर केशवदास एक कारोबारी व्यक्ति थे – उन्हें अपने बिजनेस से फुर्सत ही नहीं मिलती थी । उन्होंने गरीबी कभी नहीं देखी थी, हर खुशी दौलत से खरीदी थी । पुराने खानदानी रईस थे इसलिए रायबहादुर केशवदास को अपने जीवन को बनाने संवारने में कुछ भी संघर्ष नहीं करना पड़ा ।

लक्ष्मी टेक्सटाइल्स राजधानी एक प्रसिद्ध औद्योगिक घराना था और रायबहादुर केशवदास इस घराने के मुखिया थे । डॉली उनकी इकलौती बेटी थी । उनकी पत्नी का स्वर्गवास हुए दस साल गुजर चुके थे और उन्होंने दूसरा विवाह नहीं किया था । अब वह बुढ़ापे की सीढ़ियां तय कर रहे थे और अब एक ही चिंता उनके मन में थी – वह डॉली के लिए कोई घर-दामाद ले आयें – इसके लिए उनकी कोशिशें शुरू हो गई थी । बहुत से लड़के उनकी नजर में आये थे परन्तु पसंद पर खरा कोई नहीं उतरा ।

फिर उन्होंने सोचा किसी दिन फुर्सत के समय क्यों न डॉली से पूछ लिया जाये – जमाना काफी बदल चुका है, आजकल के लड़के-लड़कियाँ अपना जीवन साथी खुद ही चुन लेते हैं । और फिर डॉली एक जिद्दी लड़की है– आज तक उसकी हर इच्छा पूरी हुई है ।

लेकिन इस सम्बन्ध में डॉली के इरादों का पता लगाना भी जरूरी था । रायबहादुर अपनी बेटी की इच्छाओं का बेहद ख्याल रखते थे । यूँ वह अपनी बेटी से सीधे ही यह बात नहीं करना चाहते थे । जिंदगी में कई एक अवसर ऐसे भी आये थे जब उन्होंने अपनी बेटी को सरप्राइज दिया था– और उनका इरादा था कि जीवनसाथी के रूप में भी डॉली को सरप्राइज ही देंगे ।

ऑफिस में बैठे-बैठे उन्होंने एक नम्बर डायल किया । फिर फोन पर संपर्क स्थापित होने का इंतजार करने लगे ।

☐☐☐
 
अमर ने मिसेज ठाकुर को पहली गलती की सजा का सबक पढ़ाकर छोड़ दिया, क्योंकि मिसेज ठाकुर का दिमाग ठिकाने लगाने के लिए इतना ही पर्याप्त था । अब वह अमर की शख़्सियत से खौफ खाने लगी थी । उसे यकीन आ गया था कि अमर ही हीरा है ।

अगले रोज वह पागलों की सी स्थिति में घर पहुंची तो उसे उस हीरा का खौफ महसूस होने लगा जिसका फोन रूटीन के अनुसार आज शाम आने वाला था । और एक हीरा वह था जिसने उसे पहली सजा दी थी । मिसेज ठाकुर की समझ में नहीं आ रहा था कि उनमें से कौन असली था और कौन नकली ? वह बुरी तरह इस दलदल में फंस गई थी । जिससे निकलने का उसे कोई रास्ता दिखाई नहीं दे रहा था । स्वभाव से ही वह एक दंभी औरत थी और किसी की मातहती में काम करना पसंद नहीं करती थी ।

अचानक सोचते-सोचते उसने फैसला किया कि क्यों न इन दोनों हस्तियों को एक दूसरे से लड़ा दे और जब दोनों हस्तियां टकरा जाएँ तो फिर जाहिर है उनमें से एक ही जिन्दा रहेगा । जो जीवित रहेगा उसके लिए वह कोई और तदबीर सोच लेगी । हो सकता है इस टकराव में दोनों ही मारे जाएँ । और अगर जरूरत पड़ी तो तो वह पुलिस की पनाह भी हासिल कर लेगी ।

शाम के समय ठीक उसी वक्त पर वही कॉल उसने रिसीव की । रिसीवर उठाते समय उसके हाथ कांप रहे थे ।

“मिसेज ठाकुर ।” दूसरी तरफ से गुर्राती हुई आवाज सुनाई दी – “मैं हीरा बोल रहा हूँ ।”

“मैं तुमसे मुलाकात करना चाहती हूँ ।”

“वह किस सम्बन्ध में ?”

“तुम्हें यह बताने, कि मैं एक भारी मुसीबत में फंस चुकी हूँ । असली हीरा जान चुका है कि मैं ब्लैकमेलिंग के धंधे में उसका नाम इस्तेमाल कर रही हूँ ।”

“असली हीरा – कौन असली हीरा ?”

“वही जिसके नाम का खौफ तुमने मेरे मन में पैदा कर दिया था ।”

“क्या बकवास कर रही हो ?” वह गुर्राया – “हीरा मैं हूँ – सिर्फ मैं– और अब मैं तुमसे एक खास काम लेना चाहता हूँ ।”

“मैं तब तक कोई काम तुम दोनों के लिए नहीं करूँगी ।” मिसेज ठाकुर ने अपना स्वर संतुलित करते हुए कहा – “जब तक यह साबित नहीं हो जाता कि तुम में से असली हीरा कौन है ?”

“लेकिन वह है कौन ?”

“मैं फोन पर नहीं बता सकती ।”

“ठीक है – आज रात घर पर ही रहना – मैं आ रहा हूँ ।”

“किस वक्त ?”

“किसी भी वक्त मैं आ जाऊँगा ।” इतना कहने के उपरांत दूसरी तरफ से बोलने वाले ने फोन काट दिया ।

मिसेज ठाकुर ने एक गहरी साँस ली और रिसीवर रख दिया । लेकिन उसका दिल अब भी तेज धड़क रहा था । यह दोनों ही हस्तियां खतरनाक थीं । उनमें से एक आज रात उससे मुलाकात करने आ रहा था । मिसेज ठाकुर को वह रात याद आ गई जब वह नौजवान उसका हमबिस्तर बना था । वह एक जबरदस्त नौजवान था । ठीक नागेश की तरह । अमर और इस नौजवान की तुलना की जाती तो उसे यह अधिक पसंद था । वह पूर्ण रूप से उसका साथ दे सकती थी । न जाने क्यों उसे अमर से बेहद नफरत हो गई थी ।

आज रात किसी भी वक्त वह उसकी कोठी में आने वाला था । मिसेज ठाकुर के मन में जो आतंक विराजमान था बस अब धीरे-धीरे समाप्त होता जा रहा था । उसकी जगह उसके जिस्म की भूख और जवान उमंगें जागने लगी ।

उसने व्हिस्की का पैग बनाया और धीरे-धीरे उसे सिप करने लगी । अब वह इस समय को इसी प्रकार व्यतीत करना चाहती थी । बेडरूम से जुड़ा एक छोटा सा बार रूम था जहाँ वह बैठी थी । बार रूम ही उसका डायनिंग रूम भी था । इस कमरे में एक म्यूजिक बॉक्स भी मौजूद था । मिसेज ठाकुर उठी और उसने म्यूजिक बॉक्स में अपने मनचाहे संगीत का रिकॉर्ड बजाना शुरू कर दिया ।

समय बीतता रहा और वह पीती रही– ग़मों की धूल झाड़ती रही । अचानक उसे यूँ लगा जैसे बाथरूम में कोई और भी मौजूद है । उसने चौंककर दायें-बायें देखा तो उछल ही पड़ी ।

दरवाजे पर वह नौजवान मौजूद था और उसके होंठों पर वैसी ही दिलफरेब मुस्कुराहट थी ।

“करीब आधे घण्टे से मैं बेडरूम में तुम्हारा इंतजार कर रहा था ।” नौजवान ने मुस्कराते हुए कहा – “साढ़े ग्यारह बज चुके हैं मिसेज ठाकुर – क्या सारी रात पीते रहने का इरादा है ?”

“ओह तुम...तुम....तुम कब आये ?”

“बता तो चुका – आधा घण्टा हो चुका है ।”

“लेकिन मैंने तो नौकरों को हिदायत दी थी कि जब तुम आओ तो मुझे सूचित कर देना ।” मिसेज ठाकुर ने बौखलाए स्वर में कहा ।

“वह जरूर तुम्हें सूचित करते बशर्ते कि उन्होंने मुझे अंदर आते देखा होता ।” वह हँसकर बोला ।

“क....क्या मतलब ?”

“मतलब तुम्हारी समझ में नहीं आएगा – आओ ।” नौजवान ने दोनों हाथ फैला दिए ।

मिसेज ठाकुर उठी और लड़खड़ाते कदमों से आगे बढ़ी फिर किसी टूटी हुई शाखा की तरह उसकी मजबूत बाँहों में आ गिरी । उसने मिसेज ठाकुर को दोनों बाँहों में उठा लिया और बेडरूम में ले आया ।

इतना नशा मिसेज ठाकुर को नहीं हुआ था कि वह अपना होश खो बैठती ।

“हाँ– अब बताओ वह कौन है जो आपको हीरा बताता है ?” बेड पर गिराते हुए उसने पूछा ।

“मैं सबकुछ तुम्हें बता दूँगी बशर्ते तुम वादा करो कि मुझे उसके चंगुल से आजाद करा दोगे ।”

“चौबीस घण्टे के भीतर तुम्हें उसकी मौत की खबर मिल जायेगी – इससे बड़ा वादा मैं नहीं कर सकता ।”

“ओह हीरा ! मुझे तुमसे इसी जवाब की आशा थी...वह...वह बदमाश नीच....कमीना....उसने मेरा जीना मुहाल कर दिया है– उसने मुझे कंगाल बना दिया– मेरे सेफ में से सबकुछ लूट कर ले गया– जिन सबूतों के आधार पर मैं ब्लैकमेलिंग करती थी, वह सब चुराकर ले गया और अब कहता है कि मैं उसकी गुलामी करूँ ।” मिसेज ठाकुर के स्वर में मायूसी थी – “बताओ मैं क्या करूँ ?”

“सब्र करो....बस चौबीस घण्टे और इंतजार करो ।”

“मैं उसकी लाश देखना चाहती हूँ हीरा, उसकी लाश ।

“जरूर देखोगी –अब मुझे वह सबकुछ बता दो जो तुम्हारे साथ हुआ ।” और मिसेज ठाकुर ने उसे सबकुछ बता दिया । उसने कोई भी बात उस नौजवान से नहीं छिपाई ।

“ओह, तो यह बात है – अच्छा क्या तुम बता सकती हो कि वह कोठी कहाँ पर है जहाँ उसने अपना अड्डा बना रखा है ?”

“मैं उस समय इतनी घबराई हुई थी कि कुछ ठीक से याद नहीं – लेकिन इतना जरूर बता सकती हूँ कि उसका अड्डा दक्षिण क्षेत्र में है कि कहीं ।”

“दक्षिण क्षेत्र में कौन सा इलाका था ?”

“मेरे ख्याल से वह बसंत विहार का क्षेत्र था – लेकिन कोठी नम्बर मुझे याद नहीं । कोठी के गेट पर एक गोरखा चौकीदार रहता है और ऐसा मालूम पड़ता कि आबादी के अंतिम छोर पर है, लेकिन हो सकता है उसने वह कोठी किराये पर ली हुई हो और अब तक खाली कर चुका हो । लेकिन तुम्हें इस कोठी की जरूरत ही क्या है ? आदमी तो तुम्हारे सामने है ।”

“इस बात को तुम नहीं समझोगी । मैं एक और खेल खेलना चाहता हूँ ।

“क्या मुझे नहीं बताओगे ?”

“तुम्हारी मदद की तो जरूरत ही है मुझे – तुम जानती हो पुलिस किस कदर सरगर्मी से हीरा को तलाश कर रही है–उसे जिन्दा या मुर्दा पकड़ने वाले को एक भारी रकम मिल सकती है, मैं चाहता हूँ कि उसे कत्ल करके दोहरा लाभ उठाया जाये । अर्थात हीरा पर जो भी इनाम घोषित है वह मैं हासिल करूँ–मैं चाहता हूँ कि मेरे हाथ ऐसे सबूत भी लग जाएँ जो उसे हीरा साबित करते हों । तुमने बताया था कि वह एक छोटा सा कैदखाना भी है– और उसके कैदी उसे हीरा की हैसियत से जानते हैं– मुझे शिनाख्त के लिए उन लोगों के बयानों की जरूरत पड़ेगी, इसलिए मैं उसकी हत्या उसी के अड्डे पर करूँगा – और ठीक वक्त पर पुलिस वहाँ पहुँच जायेगी । इस तरह हीरा का हमेशा-हमेशा के लिए अंत हो जायेगा और मैं वह रकम पाकर एक शरीफ शहरी की तरह जी सकूँगा– बल्कि हो सकता है पुलिस में मुझे कोई स्थान भी मिल जाये ।”

“ओ.....वन्डरफुल....बहुत बेहतर.... ।” मिसेज ठाकुर खुशी से उछल पड़ी । – “तुम्हारे दिमाग को मान गई हीरा ।”
 
“वह एक राजा का बेटा है – अगर उसे सीधे ही कत्ल किया गया तो भारी हंगामा खड़ा हो सकता है– लेकिन उसे हीरा साबित करके मारा गया तो हम बहुत लाभ में रहेंगे । तुमने बताया था कि वह रात के वक्त तुम्हें वहाँ ले गया था । फिर एक बन्द गाड़ी द्वारा तुम्हें यहीं छोड़ दिया गया । हो सकता है तुम्हें रास्ता याद आ जाये – इसलिए मेरी इच्छा है कि हम इसी समय वहाँ चलें – यह फैसला शायद आज रात हो जाये ।”

“लेकिन वहाँ उसके बहुत से साथी होंगे और हम दो.... ।”

“हम दो नहीं सिर्फ मैं....तुम इत्मीनान रखो, मैं अकेला ही उन हिजड़ों पर भारी पड़ूँगा ।”

मिसेज ठाकुर जुनूनी कैफियत में उठ खड़ी हुई । वह किसी भी कीमत पर अमर की लाश देखना चाहती थी ।

पंद्रह मिनट के भीतर-भीतर उनकी कार मेन रोड पर दौड़ रही थी । कार स्वयं मिसेज ठाकुर ड्राइव कर रही थी । कार की रफ्तार धीरे-धीरे बढ़ने लगी । सड़कें सूनसान पड़ी थीं और कार के भीतर भी सन्नाटा था ।

कार के अंदर छाये अंधकार में वह नौजवान पिछली सीट पर बैठा था । मिसेज ठाकुर को इतना गहरा नशा नहीं था कि स्टियरिंग पर हाथ बहक जाये । वह अपनी याददाश्त पर जोर दे रही थीं ।

कार साऊथ दिल्ली की तरफ बढ़ रही थी । अपनी याददाश्त के अनुसार मिसेज ठाकुर उन्हीं सड़कों से बढ़ रही थीं जिन सड़कों से उन्हें ले जाया गया था । करीब पौने घण्टे की यात्रा के बाद बसंत विहार का क्षेत्र भी आ गया । यहाँ आने के बाद मिसेज ठाकुर ने रफ्तार धीमी कर दी । उबड़-खाबड़ मकबरे के पास उसने कार रोक दी ।

“क्या हुआ ?” पीछे से पूछा ।

“बस इस मकबरे के पास हो कोठी होनी चाहिए...दायीं तरफ....”

आगे कुछ कोठियां दूर-दूर तक के फासले पर बनी हुई थीं । उन सभी कोठियों में अँधेरा था । सड़क एकदम सूनसान थी और कदाचित यह आबादी का छोर था ।

“कार यहीं एक तरफ पार्क कर दो ।” नौजवान ने कहा ।

मिसेज ठाकुर ने कार एक साइड पर लगाकर पार्क कर दी ।

“अब तुम नीचे उतरकर प्रत्येक कोठी के गेट पर पहुँचो मैं तुमसे कुछ फासले पर रहूँगा । कोठी के गेटों पर पहुँचने के बाद यकीनन तुम उसकी निशानदेही कर लोगी और यदि कोई तुम्हें टोक दे तो कहना कि मिस्टर अमर की कोठी तलाश कर रही हूँ । चलो अब नीचे उतर जाओ । यदि असली कोठी तक पहुँच जाओ तो अमर से मुलाकात की कोशिश करना ।

मिसेज ठाकुर नीचे उतर गई ।

नौजवान कार में ही बैठा रहा । फिर जब मिसेज ठाकुर एक कोठी के गेट से गुजरकर आगे बढ़ गई तो वह भी कार से नीचे उतरा और कुछ फासले से मिसेज ठाकुर का पीछा करने लगा ।

मिसेज ठाकुर प्रत्येक कोठी के गेट के सामने पल भर को ठिठकती फिर आगे बढ़ जाती ।

नौजवान उसका पीछा करता रहा ।

अंततः मिसेज ठाकुर एक कोठी के सामने जाकर रुक गई । गेट पर खड़ी वह किसी से बात करती रही ।

नौजवान आड़ में होकर अंधेरे में छिप गया । लेकिन उसकी आँखें मिसेज ठाकुर पर जमीं रहीं । नौजवान ने फाटक खुलते देखा । अब वह तेजी से अंधकार से निकला और लगभग दौड़ता हुआ निकटवर्ती टेलीफोन बूथ तक पहुँचा ।

बूथ में घुसते ही उसने किसी का नम्बर डायल किया ।

दूसरी ओर शीघ्र ही संपर्क स्थापित हो गया ।

“आर यू रेडी इंस्पेक्टर पंत ? – बिल्कुल तैयार ।”

“लेकिन आपके आदमी कहीं दिखाई नहीं दे रहे हैं ?”

इसकी फिक्र न करो – यह बताओ कहाँ पहुँचना है – पांच मिनट से अधिक का समय नहीं लगेगा – हम आपके पास होंगे ।” दूसरी तरफ से कहा गया ।

“बसंत बिहार कोठी नम्बर तीस – मैं उस इमारत में प्रविष्ट होने जा रहा हूँ । आप उसे चारों तरफ से घेर लीजियेगा – और यदि मैं आधे घंटे तक बाहर न निकला तो आप कोठी में प्रविष्ट हो जाइयेगा – यह कोठी राजा प्रताप सिंग के पुत्र अमर की है – और अमर ही वह शख्सियत है जिसकी तलाश पुलिस को है यानी हीरा ।”

“ओ.के. ।”

उसने फोन डिस्कनेक्ट कर दिया ।

फिर वह बूथ से बाहर निकला । वह कोठी नम्बर तीस की तरफ बढ़ गया । अब वह यह देखना चाहता था कि मेन गेट के अलावा कोठी में प्रविष्ट होने का कौन सा रास्ता बेहतरीन और सुरक्षित हो सकता है ।

वह कोठी के सामने से गुजर गया ।

गेट पर रोशनी थी और एक गोरखा दरबान मुस्तैद था । गेट बन्द था । कोठी की चारदीवारी खासी बन्द थी और चारदीवारी की ऊपरी परत पर कदाचित कांच गड़े थे । यह कोठी बिल्कुल अलग-थलग थी । नौजवान ने उसका एक पूरा चक्कर लगाया । पार्श्व में भी दीवार इतनी ही ऊँची थी । उसे कोई रास्ता ऐसा नजर नहीं आया जिससे सरलतापूर्वक अंदर दाखिल हो सकें । कोठी की चारदीवारी खासी सुरक्षित थी । हताश होकर वह पुनः सामने की साइड पर आया ।

फिर अचानक उसे एक तरकीब सुझाई दी । वह कार की तरफ बढ़ गया । उसने कार स्टार्ट की और मेन रोड से गुजरता हुआ एक कच्चे मार्ग पर आ गया । कार हिचकौले खाती उबड़-खाबड़ पथरीले मार्ग से गुजरती कोठी के पिछले भाग में चारदीवारी से लगाकर खड़ी हो गई ।

मुख्य इमारत चारदीवारी से खासी दूर थी ।

कार रोककर वह कार की छत पर चढ़ उसने कांच जैसी चीजों से बचने के लिए चमड़े के दस्ताने पहन लिए । अब एक हल्के से जम्प के साथ उसने ऊपरी हिस्सा पकड़ लिया । उसका सन्देह सही निकला । ऊपर कांच के टुकड़े गड़े थे ।

उसने पकड़ मजबूत करके बाजुओं के सहारे अपने आपको ऊपर खींचा और फिर शीघ्र ही वह चारदीवारी के ऊपर पहुँच गया । चारदीवारी पर चढ़ते ही उसने कुछ क्षण तक अंदर का जायजा लिया । सर्वत्र सन्नाटा छाया हुआ था – किसी कुत्ते की उपस्थिति का भी निशाना नहीं था ।

वह सावधानी पूर्वक दूसरी तरफ उतर गया ।

एक अँधेरे हिस्से में खड़े होकर उसने चारों तरफ का जायजा लिया – उसकी इस हरकत की प्रतिक्रिया कहीं नजर नहीं आती थी । वह दबे कदम इमारत की तरफ बढ़ने लगा ।

मुख्य इमारत के समीप पहुँचने के बाद वह कोई ऐसा रास्ता तलाश करने लगा जिससे अंदर प्रविष्ट हो सके । फिर उसने एक खुली खिड़की की चौखट को पकड़ लिया । फिर वह उछलकर खिड़की पर बैठा और अंदर समाता चला गया ।

वह किसी अंधेरे हिस्से में खड़ा था । कुछ देर तक वह चुपचाप खड़ा अपनी ही साँसे सुनता रहा – अपने ही दिल की धड़कनें गिनता रहा – फिर सावधानी के साथ आगे बढ़ा और थोड़ी ही देर में उसकी आंखें अंधकार को भेद पाने में सक्षम हो गयीं ।

उसे एक दरवाजा दिखाई दिया जो खुला था । वह सावधानी पूर्वक दरवाजे से बाहर निकला और ज्यूँ ही उसने दरवाजे से बाहर कदम रखा किसी ने उसे जबरदस्त धक्का दिया, बिल्कुल यूँ लगा जैसे बिजली का शॉक लगा हो । वह लड़खड़ाता हुआ आगे को गिरा और फिर न जाने क्या हुआ, उसका जेहन तारीकी में डूबता चला गया । उसने अपने आपको होश में रखने की बहुत कोशिश की परन्तु वह नाकाम रहा । बस उसे बेहोशी से पूर्व इतना ही आभास रहा कि कोई वजनी सी चीज उसके सिर पर आ गिरी थी । वह क्या चीज थी वह नहीं जानता था ।

☐☐☐

इंस्पेक्टर पंत ने कोठी नम्बर तीस पर रेड कर दी । पुलिस ने कोठी को चारों तरफ से घेर लिया था । कोठी की तलाशी ली जा रही थी – परन्तु यह कोठी बिल्कुल खाली थी । कोठी का दरबान तक गायब था । अंदर की हालत बताती थी कि वह नवनिर्माणधीन है । उसमें कहीं कोई फर्नीचर नहीं था । सब कमरे खाली पड़े थे । उन्होंने एक-एक दीवार तक ठोक बजाकर देख डाली लेकिन कहीं कुछ बरामद नहीं हो पाया था ।

इससे पहले भी हीरा को जाल में फंसाने की जितनी कार्रवाइयाँ हुई थीं, सब असफल रहीं थी । किन्तु इस बार एक भारी सफलता जरूर मिल गई थी । अर्थात यह बात प्रकट हो गई थी कि हीरा वास्तव में कौन है ?

लेकिन राजा प्रताप सिंग के सुपुत्र को गिरफ्तार करना कोई हँसी खेल नहीं था । आई.जी. की परमिशन के बिना उस पर हाथ नहीं डाला जा सकता था, और यहाँ तो कोई प्रमाण ही नहीं था । सबूतों के अभाव में तो जनसाधारण के प्रति भी कुछ नहीं किया जा सकता था ।

पंत बुरी तरह झल्लाया ।
 
पिछले एक साल से हीरा ने आतंक फैलाया हुआ था और वह इस केस पर काम कर रहा था । इस बात के पुख्ता सबूत उसके पास थे कि हीरा ने अपना हेडक्वार्टर राजधानी में बना रखा है परन्तु अब तक उसकी शख्सियत पर नकाब ही पड़ी रही थी, और यह पहला अवसर था जब उसकी नकाब उतर गई थी, परन्तु उसे गिरफ्तार करना उतना ही असम्भव था जितना कि पहले था । पंत ने आस-पड़ोस से भी पूछताछ की परन्तु कोई सुराग न लग सका । कोठी के पिछवाड़े अब भी वह कार खड़ी थी जिससे मिसेज ठाकुर और एक नौजवान यहाँ तक आये थे और अब वे दोनों ही गायब थे ।

कोठी को सील करने के बाद पंत इन उलझनों में गिरफ्तार वापिस लौट पड़ा ।

इंस्पेक्टर पंत खुद एक साहसी व्यक्ति था । वह एक कर्तव्यनिष्ठ ऑफिसर था और न सिर्फ इतना ही बल्कि एक चतुर दिमाग रखने वाला पुलिस अधिकारी था । पूरे विभाग में उसकी एक धाक थी और आज तक उसने किसी केस में असफलता का मुंह नहीं देखा था । और फिर इस केस में तो उसे जय जैसे बुद्धिमान व्यक्ति का सहयोग प्राप्त था ।

यदि कोई मुजरिम है तो वह उसकी हैसियत नहीं देखता था । बस वह उसे सीखचों के पीछे देखना पसंद करता था और वह हर मुजरिम का बड़ी बारीकी से निरीक्षण करता था । मुजरिम कितना चालाक है – कितना सामर्थ्य रखता है – कहाँ तक उसकी पहुँच है, कितना बड़ा गिरोह है, यह सब बातें वह बारीकी से जाँच करने के बाद अपनी प्लानिंग तैयार करता था । हीरा के सम्बन्ध में उसने इस बार जय से समझौता करके बहुत बड़ा ड्रामा स्टेज किया था और इस ड्रामे में किसी हद तक कामयाब हो गया था – लेकिन ठीक आखिरी वक्त पर हीरा ने उसे चोट दी ।

रात भर के जागरण के बाद भी कुछ हाथ नहीं लगा, फिर भी उसने आशा नहीं छोड़ी । सब इंस्पेक्टर माथुर को आवश्यक निर्देश देकर वह घर की तरफ रवाना हो गया । वह एक लम्बा नोट तैयार करके उच्च अधिकारियों के समक्ष रखने की सोच रहा था । वह अमर को गिरफ्तार करने से पहले उच्च अधिकारियों से अनुमति प्राप्त कर लेना चाहता था । जय गायब हो गया था ।

लेकिन पंत हिम्मत हारने वाला व्यक्ति नहीं था । राजाओं के जमाने लद चुके थे । संदेह के आधार पर वह अमर को गिरफ्तार ही कर सकता था । लेकिन इससे यह तो हो सकता था कि हीरा जैसा मुजरिम पुलिस के लिए आगे सारे रास्ते बन्द कर सकता था ।

मधुकर पंत केंद्रीय गुप्तचर विभाग में जब से आया था, अपनी प्रतिष्ठा की धाक बनाये हुए था और उसने स्वयं हीरा को गिरफ्तार करने का बीड़ा उठाया था ।

घर पहुँचने के कुछ देर बाद ही उसे एक फोन मिला । उसने फोन रिसीव की तो दूसरी तरफ से अजीब-सी फ़टी-फटी आवाज सुनाई दी, जो न तो जनाना थी न मर्दाना ही कही जा सकती थी ।

“ऐ इंस्पेक्टर मधुकर जी हैं क्या ?”

“कौन हो तुम ?”

“अल्ला की मारी है भैय्या – तुम कौन हो ?” दूसरी तरफ से कहा गया । “तुम ही इंस्पेक्टर भैया हो क्या ?”

“हाँ – मैं ही इंस्पेक्टर मधुकर पंत हूँ । अब तुम ठीक-ठाक बताओ कि तुम कौन हो ?”

“ऐ – वही तो हैं भैय्या जिसके यहाँ से छापे पे छापा डालकर आ रहे हो । हम तो बदनाम हो गई, नाक कट गई हमारी सारी बिरादरी में – इंस्पेक्टर भैय्या तनिक हमको तो बताई दो हमसे क्या कसूर हुआ ?”

“तुम हीरा बोल रहे हो ?” मधुकर चौंक पड़ा ।

“सखियाँ तो हीरा बीबी कहे हैं – कई नाम हो गए हमारे । ऐ घर वाले तो अमर कहे हैं – अम्मा जी ने हमारा नाम उमा रखा है – हाय मैं मर जाऊँ, क्या कसूर हुआ हमसे ?”

“यह क्या बकवास कर रहे हो – ठीक ढंग से बात करो ।”

“तो फिर सुनो ठीक ढंग से ।” इस बार आवाज बिल्कुल बदल गई – “शायद तुम पहली बार यह कोशिश नहीं कर रहे हो । मैं कई बार तुम्हारी गलतियां माफ कर चुका हूँ – आगे नहीं करूँगा इंस्पेक्टर ।”

“धमकी दे रहो हो मुझे ?”

“जब तुम्हारा आदमी तुम्हारे पास वापस लौटकर आएगा तो वह खुद एक चेतावनी होगा । तुम अगर मेरे दोस्त बनकर रहो तो बेहतर होगा – इस शहर में मैंने ऐसा कोई गुनाह नहीं किया जिसके लिए तुम इतना परेशान हुए फिर रहे हो । और हाँ राजा प्रताप सिंग की कोठी में कदम भी न रखना, वरना मैं तुम्हारा भी दुश्मन बन जाऊँगा ।”

“मैं देख लूँगा तुम्हें ।”

“जरूर देख लेना – जब कहोगे थाने में खुद चला आऊँगा ।” इतना कहकर उसने फोन डिस्कनेक्ट कर दिया ।

“ओ माई गॉड ।” पंत ने सिर थाम लिया – “यह शख्स क्या बला है – इसे किस तरह मेरी प्लानिंग का पता चला गया ?”

☐☐☐
 
अब मिसेज ठाकुर की जो गति बननी शुरू हुई वह उसे पागल कर देने के लिए काफी थी । कोठी नम्बर तीस में प्रविष्ट होने के बाद जैसे ही अंदर प्रविष्ट हुई अमर से उसका सामना हो गया । उस समय अमर पहचानने में नहीं आता था । वह एक औरत के लिबास में था और हाथ में एक परफ्यूम स्प्रे थामे हुए खड़ा था ।

“ले री तू भी महक जा मेरी तरह...जरा यह खुशबू तो लगा ले बदन पर...फिर तेरा हम श्रृंगार करेंगे... ।”

और फिर परफ्यूम की स्प्रे चलने लगी । मिसेज ठाकुर को एक तेज महक महसूस हुई । वह ठगी सी खड़ी थी और उसी तरह खड़े अमर की बाँहों में गिर गई । वह बेहोश हो चुकी थी ।

होश में आने के बाद उसने खुद को चरमराती हुई खाट पर पाया । किसी के चौड़े-चकले सीने से वह चिपकी पड़ी थी । फिर जो उसने उसकी शक्ल देखी तो चीख मारकर उछल पड़ी और अपने आपको समेटते हुए खाट छोड़कर एक तरफ जा खड़ी हुई ।

उसकी चीख का लेटे हुए व्यक्ति पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा उसके खर्राटे निरन्तर गूंज रहे थे । वह कोई उजड़ किस्म का देहाती मालूम पड़ता था । बड़ी-बड़ी मूँछें थीं –चेहरे पर चेचक के दाग थे ।

मिसेज ठाकुर ने बौखलाई नजरों से चारों तरफ देखा – यह एक गंदा सा कमरा था । एक तरफ मैले कुचैले कपड़ों का ढेर पड़ा था । एक टूटी हुई सी मेज अंदर पड़ी थी जिस पर कुछ झूठे बर्तन रखे थे । और बर्तनों में बकरे की बची खुची हड्डियां पड़ी थीं । मेज पर एक देसी ढर्रे की खाली बोतल लुढ़की पड़ी थी ।

मिसेज ठाकुर ने घबराकर दरवाजे की तरफ देखा – दरवाजा बन्द था ।

और उसके अपने शरीर पर वह कपड़े भी नहीं थे, जिन्हें पहनकर वह घर से निकली थी । एक मैली-कुचैली सी धोती उसके शरीर पर थी – चिथड़ियां जुड़ा ब्लाउज था और बाल एक फुन्गेदार चोटी से गुंथे हुए थे । वह चकराए जेहन से दरवाजे की तरफ बढ़ी ।

लेकिन दरवाजा अंदर की बजाय बाहर से बन्द था ।

मिसेज ठाकुर ने दरवाजा जोर-जोर से बजाना शुरू कर दिया । साथ ही वह हिस्टिरियाई अंदाज में चीख रही थी । इस चीख पुकार के कारण देहाती की आँख खुल गई और वह उठकर मिचमिची आँखों से चीख पुकार का कारण जानने के लिए इधर उधर घूरने लगा ।

“अरी ओ हरामजादी ।” अचानक वह दहाड़ पड़ा – तुझ पर फिर दौरा पड़ गया क्या ?”

उसकी दहाड़ सुनकर मिसेज ठाकुर की चीख पुकार बन्द हो गई ।

“कौन हो तुम....मैं कहाँ हूँ ?”

“रात की धुनाई भूल गई– ससुरी जूते के बिना बाज ही नहीं आती – अपने खसम को ही पहचानने से इंकार करने लगती है । चल इधर चुपचाप सो जा वरना कसम से खाल में भूँस भर दूंगा ।”

“क्या बकवास करता है ।”

“बकवास....अच्छा... ।” वह अपना तहमद संभालकर उठा ।

नीचे देखकर जूता उठाया और बेरहमी से मिसेज ठाकुर पर झपट पड़ा ।

फिर तो देहाती का जूता था और मिसेज ठाकुर थीं । मिसेज ठाकुर चीख रही थी और वह जूते बजाये चला जा रहा था । इतने में बाहर से दरवाजा खुला और एक बुढ़िया ने अंदर झाँका ।

“क्या है रे कलुआ ?” बुढ़िया ने पूछा ।

“बचाओ.... ।” मिसेज ठाकुर चीखती हुई बाहर भागी ।

“हट जा अम्मा – आज मैं इसका दिमाग ठिकाने लगा ही देता हूँ – चाहें बस्ती वाले कुछ भी न क्यों कहें – इसका नाटक आज के बाद नहीं चलने दूँगा ।”

“क्या फिर दौड़ा पड़ा है रे.... ?” बुढ़िया ने पूछा ।

“ दौरा नहीं नाटक है सब । मुझसे पीछा छुड़ाना चाहती है साली ।”

मिसेज ठाकुर बुढ़िया को धक्का देकर बाहर निकल गई ।

“हाय राम क्या जमाना आ गया है ।” बुढ़िया चीख पड़ी – “क्या हो गया इस कलमुंही को । मेरे बेटे का जीना हराम कर दिया इसने । अरे मोहल्ले वालों...अरे पंचो ! कसूर मेरे बेटे का नहीं – इसी चुड़ैल का है ।”

मिसेज ठाकुर उस झोपड़ेनुमा घर से बाहर निकल पड़ी ।
 
Back
Top