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वक्त की धूल

सुबह हो चुकी थी । शोर-शराबा सुनकर बस्ती के अड़ोसी-पड़ोसी घर के आगे एकत्रित हो गए थे । राह चलते लोग ठिठक गए थे– मिसेज ठाकुर बचाओ–बचाओ की आवाजें निकालती बाहर की तरफ भागी ।

अजीब किस्म की बस्ती थी – बंजारों की बस्ती – मिसेज ठाकुर ने कभी यह बस्ती नहीं देखी थी । और न ही वह किसी शक्तिशाली मर्द से लड़ सकती थी । कलुवा ने भागकर उसकी चुटिया पकड़ ली । जूता अब भी उसके हाथ में था ।

उसने सरेआम जूता बजाना शुरू कर दिया ।

कुछ लोगों ने मिसेज ठाकुर की चीख पुकार पर बीच-बचाव कर दिया – वरना मिसेज ठाकुर की न जाने क्या गत बनती ? मिसेज ठाकुर को कुछ औरतें घेरे-घारकर पड़ोस के मकान में ले गई ।

बाहर से अब भी तरह-तरह की आवाजें आ रही थीं ।

“अरे कलुवा समझ से काम ले– बाबा भोपाली ठीक कहता है – तेरी बीवी चन्दा पर ऊपरी असर है । किसी झाड़-फूंक वाले को देखा दे, सब ठीक हो जायेगा । अपनी औरत पर हाथ उठाते हुए मर्द को शोभा नहीं देता ।”

“अरे नहीं काका, कोई भूत-प्रेत नहीं उस पर । नाटक करती है नाटक, हरामजादी मुझे भी पहचानने से इंकार करती है – कोई भगाकर लाया हूँ उसे क्या ? अरे ब्याह की रस्म की है । उसके बीमार बाप को हजार रुपये दिए हैं मैंने । ससुरा मर गया और यह आफत मेरे गले मढ़ गया ।”

इसी तरह की आवाजें थीं ।

मिसेज ठाकुर की कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था कि यह क्या तमाशा है । आखिर वह कलुवा देहाती की बीवी कैसे बन गई ।

“देख री चंदा ।” उधर औरतें उसे समझा रही थीं – अरे हम औरतें तो मर्द की जूती होती हैं – अगर तुझ पर दौरा पड़ता है तो अपने खसम को प्यार से समझा-बुझाकर इलाज करा ले – इस तरह कब तक फिरती रहेगी ।”

“मैं चन्दा नहीं हूँ– मेरा नाम मोहिनी है । यह सब क्या चक्कर है ? मेरी तो कुछ समझ में नहीं आता । प्लीज हेल्प मी....आसपास कोई पुलिस स्टेशन हो तो मुझे वहाँ तक पहुंचा दीजिये....मैं तुम लोगों को मालामाल कर दूँगी...बहुत बड़ा कारोबार है मेरा ।”

“हाय दैय्या...क्या हो गया इसे.... ?” एक बोली ।

“अंग्रेजी भी बोलने लगी है ।” दूसरी ने कहा ।

“जरूर किसी चुड़ैल का साया है...” एक बूढ़ी औरत ने कहा – “बाबा भोपाली ठीक ही कहता है, अरी देखना यह हम पर हाथ पैर न फेंकने लगे – पकड़ के रखना इसे ।”

मिसेज ठाकुर उछल पड़ी । वह इन जाहिल औरतों को नहीं समझा सकती थी । और उसका उछलना था कि औरतों ने उसे दबोच लिया । वह हाथ-पांव भी चलाने लगी – गलियां देने लगी– लेकिन देखते-देखते उसके हाथ-पांव भी बांध दिए गए ।

फिर एक औरत भागी-भागी बाहर गई ।

“मोहनी चुड़ैल का भूत है उस पर, अंग्रेजी बोल रही है । हमें भी नहीं पहचानती ।”

मिसेज ठाकुर चीखती रही ।

अड़ोसी-पड़ोसियों की सलाह पर कलुवा किसी तांत्रिक को पकड़ लाया । दोपहर हो गई थी और मिसेज ठाकुर ने कुछ खाया-पिया नहीं था । फिर उसके हाथ-पांव तांत्रिक के सामने ही खोले गए ।

लम्बी-लम्बी जटाओं वाला काला भुजंग देवकाय शरीर वाला तांत्रिक उसे सुर्ख-सुर्ख आँखों से घूर रहा था ।

मिसेज ठाकुर के सामने एक हवन की आग सुलग रही थी । और उसने चारों तरफ आटे की सफेदी का वृत्त खींच दिया था । मिसेज ठाकुर में अब इतनी भी हिम्मत नहीं थी कि उठ सके ।

फिर तांत्रिक ने हवन में कोई ऐसी चीज फेंकी जिसका तीखा धुआं उठा और मिसेज ठाकुर के नथुनों में घुस गया । वह बुरी तरह खांसने लगी । अब तांत्रिक ने चिमटा उठा लिया ।‘

“बोल....बोल कौन है तू...क्यों तूने इस औरत को पकड़ रखा है... ?”

“म...मैं सच कहती हूँ...म....म....म....मैं ।”

“मोहनी चुड़ैल...काली घाट वाली चुड़ैल...तू यहाँ...देख अब तेरी खैर नहीं.... ।” उसने एक चिमटा मिसेज ठाकुर की कमर पर मारा ।

मिसेज ठाकुर चीख पड़ी ।
 
“चली जा इसे छोड़कर...यह काली के पुजारी भैरव पंडित का हुक्म है । वरना लाल गर्म चिमटे से इतना पिटूँगा कि तुझे अपनी नानी याद आ जायेगी ।”

“ठ...ठहरो...” मिसेज ठाकुर कांप गई – “मैं चन्दा हूँ...हाँ मैं चंदा ही हूँ ।”’

“हा...हा....हा... ।” तांत्रिक हँसा– “मक्कारी करती है ?” उसने एक और चिमटा रसीद कर दिया – “मुझसे छल.... ।”

“मैं सच कहती हूँ – मैं चंदा हूँ – मोहिनी नहीं हूँ ।”

“कलुवा तेरा कौन है ?”

“मेरा पति ।”

कलुवा मूँछों पर ताव देने लगा ।

“इन सबको पहचानती है ?”

“हाँ....सबको....यह अम्मा है ।”

तांत्रिक ने एक तावीज उसके गले में डाल दिया ।‘’

फिर बोला “काली घाट की खतरनाक चुड़ैल मोहिनी इसे छोड़कर जा चुकी है –अब वह कभी इस पर नहीं आएगी । कसूर इसका नहीं था – कलुवा अब इसे मारना पीटना नहीं– यह घर का सारा काम काज अब ठीक हालत में करेगी और कभी कोई ऐसी वैसी बात हो तो मुझे भी बताना ।

और इस तरह मिसेज ठाकुर को कलुवा की बीवी चंदा बनना पड़ा ।

☐☐☐
 
“देख अम्मा – मुझे जोरू का गुलाम न कहा कर ।” कलुवा कह रहा था – “अरी अब वह सुधर गई है तो थोड़ा प्यार जताना भी तो मर्द का फर्ज होता है । एक धोती ले आया उसके लिए तो लगी सुनाने... ।”

“अरे मगर यह नासपीटी घर का काम तो देखे भी नहीं– दिन चढ़े सोती रहती है ।” औरत इतना कहकर बाहर निकल गई ।

मिसेज ठाकुर ने हालात से समझौता कर लिया था ।

“देख चंदा– चौका बर्तन करने के बाद कपड़े वगैरह धोया कर– अच्छा चल पहले नाश्ता लगा ।”

“चौका-चूल्हा तो मुझे आता ही नहीं– नाश्ता कैसे बनाऊँ मैं– मैं तो सब भूल गई हूँ ।”

“फिर कोई बीमारी लग गई है क्या तुझे– बाबा भैरव पंडित को बुलाना पड़ेगा क्या दोबारा से ?”

“हे भगवान, मैं क्या करूँ ?”

“अरे सब ठीक हो जायेगा– मात्र शाम को फिर बाबा के पास चले चलेंगे । चल जो कुछ है जल्दी ले आ ।”

गंदे बर्तन रखे हुए थे । दूध गर्म था – कुछ और चीजें भी मौजूद थीं । मिसेज ठाकुर के फरिश्तों ने भी कभी किचन का रुख नहीं लिया था । हमेशा नौकर ही खाना बनाते रहे थे ।

हालात ऐसे थे कि वह कुछ सोच भी नहीं पा रही थी ।

प्याला भरा दूध और हो कुछ भी सामने नजर आया एक टूटी सी ट्रे में रखकर कलुवा के सामने आ गई ।

झोपड़ी के दरवाजे के बाहर एक अहाता था और कलुवा उसी में बैठा नाश्ते का इंतजार कर रहा था । मिसेज ठाकुर ने नाश्ते की ट्रे उसके सामने रख दी ।

“अरी अम्मा-ओ अम्मा ।”

“क्या है रे ?”

“देख ले, ठीक काम कर रही है... ।”

“कल फिर बिगड़ जायेगी– फिक्र मत कर ।” अम्मा की आवाज उभरी और मिसेज ठाकुर उसे घूरने लगी । मैली कुचैली सास हमेशा उसकी काट करती थी ।

मिसेज ठाकुर खून का घूंट पीकर रह गई । कलुवा जो कुछ सामने था, चट कर गया और फिर मूंछें साफ करता हुआ उठ खड़ा हुआ ।

“अच्छा अम्मा चलता हूँ– जा रहा हूँ री ।” उसने लगावट भरे अंदाज में मिसेज ठाकुर से कहा और फिर एक कपड़ा कन्धे पर डालकर सीधा चल पड़ा ।
 
मिसेज ठाकुर वापिस झोपड़ी में आ गई । उसके दिल में आग लगी हुई थी । हाथ पांव बेजान से हो गए थे । यह सब क्या हुआ, कैसे हुआ ? उसका अपना लिबास कहाँ गया ? यह कौन सी जगह है ? कोई बात समझ में नहीं आती थी ।

झोपड़ी की जमीन पर चित होकर वह छत को घूरने लगी । हाथ पांव बुरी तरह सनसना रहे थे– दिलो दिमाग बेकाबू थे– मार का असर अभी तक बाकी था– जिसे सोचकर वह कांप उठती ।

“लेकिन...लेकिन यह सब क्यों हुआ– कैसे हुआ ? वह सोचने लगी, गुजरी हुई घटनाओं पर नजर दौड़ाने लगी ।

अमर...हाँ...अमर...वह अमर की उसी कोठी में गई थी उसे सबक पढ़ाने....उसके साथ वह नौजवान था जो अपने को हीरा कहता था– फिर वह अमर की उसी कोठी पर बेहोश हो गई थी ।

“तो क्या अमर....अमर ने उसे यह सजा दी थी ?”

उसने दोनों हाथ सीने पर रख लिए । दिल था कि सीने का पिंजड़ा तोड़कर बाहर निकलना चाहता था । तो क्या अमर को उस सारे षड्यंत्र का पता चल गया था । उसने सोचा और सिर थाम लिया । उसे वह वक्त याद आ गया जब सारी रात जनखे उसे गाते सुनाते रहे थे और वह दहशत के आलम में बैठी उनका रंग नाच देखती रही थी । तो क्या....तो क्या अमर की यह दूसरी सजा है–- मगर यह कैसी अनोखी सजा है ? लेकिन अब तो कुछ नहीं हो सकता ।

उसने भय के आलम में इधर-उधर देखा, अब वह क्या करे ? अब शायद अमर भी उसे माफ न करे । पिछली शाम ही इस घर के बाकी दो सदस्य भी आ गए थे– एक कालिया का भाई, दूसरी उसकी बहन और इन सबका उस पर पहरा था । वह फरार भी नहीं हो सकती थी ।

उस नौजवान हीरा का क्या हुआ ? वह कहाँ है ?

सोचते-सोचते मिसेज ठाकुर अपना सिर झटकने लगी– ऐसा कोई सवाल नहीं था जिसका हल वह खोज पाती ।

उसने उठकर बैठने की कोशिश की तो उसमें भी उसे कठिनाई का सामना करना पड़ा । मात्र उसे यहाँ दूसरा दिन था और अब उसे बर्तन मांजने थे, कपड़े धोने थे, अब वह चंदा थी सिर्फ चंदा ।

उसी समय अम्मा कमरे में आ गई । अजीब सी बदसूरत कुबड़ी औरत थी– देखकर ही घिन आती थी ।

“अरी वा री वाह, अभी तक आराम हो रहा है रानी जी !” उसने व्यंग्यात्मक स्वर में कहा और मिसेज ठाकुर बेबसी की निगाहों से उसे देखने लगी ।

“उठती है या उतारूँ जूती । अब तेरा खसम नहीं है घर पर– बड़ा प्यार करने लगा तुझे– अरी मैं तेरी सास हूँ समझी– उठ बर्तन कौन धोएगा तेरा बाप ।” बुढ़िया ने कहा ।

“मुझसे बर्तन नहीं धुलेंगे ।” मिसेज ठाकुर ने रुआँसी आवाज में कहा ।

“क्या कहा– अरी मक्खियाँ भिनक रही हैं– बाहर सारे बर्तन जमा हैं– कल तो तुझसे कोई काम नहीं कराया– अब उठती है या नहीं– या बाल पकड़कर दो जूते लगाऊँ ।” बुढ़िया आगे बढ़ गई ।

और मिसेज ठाकुर बौखलाकर खड़ी हो गई । एक लम्हे के लिए तो वह भयभीत हो गई थी, लेकिन फिर उसे अपनी बेबसी पर गुस्सा आ गया और उसने कहर भरी निगाहों से बुढ़िया को देखते हुए कहा –

“निकल जा तू बाहर यहाँ से– मैं कहती हूँ निकल जा...चली जा ।”

“ऐ– मुझसे जुबान चलाती है ।” बूढ़ी औरत आगे बढ़ी ।

“मैं कहती हूँ दफा हो जा यहाँ से– बाहर निकल- चल निकलती है या नहीं ?”

“हाँ....हाँ...आगे बोल– आगे बोल हरामजादी– मैं भी तो सुनूँ क्या कहेगी- आगे बोल ।” बूढ़ी औरत ने मिसेज ठाकुर के बाल पकड़ने की कोशिश की, लेकिन मिसेज ठाकुर का उलटा हाथ उसके मुँह पर पड़ा और बूढ़ी कई कदम पीछे हट गई ।

“हाये...हाये...हाये....हाथ उठा दिया मुझ पर । अरी कमबख्त हाथ उठाया मुझ पर तूने । हाय हाय रे अरे ओ जग्गी...सीता....अरे जल्दी आओ मेरे बच्चों । अरे मार डाला इस कलमुंही ने मुझे ।” बुढ़िया रोती-पीटती बाहर आई और बाहर अच्छा खासा हंगामा हो गया ।

मिसेज ठाकुर ने दोनों हाथ से सिर पकड़ लिया । उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करे– यह गुस्सा भी बस आ ही गया था जो नहीं आना चाहिए था । हालात को पूरी तरह जाने बगैर कोई ऐसा कदम उठाना निरुद्देश्य था जिससे उसके लिए कठिनाइयां पैदा हों– इन जंगलियों का क्या ? मार पीट शुरू कर देंगे और हुलिया बिगाड़कर रख देंगे ।

थोड़ी ही देर बाद बहुत से व्यक्ति झोपड़ी के अंदर घुस आये– जग्गी उनमें सबसे आगे था–बाकी अड़ोसी-पड़ोसी थे । जग्गी ने उसका बाजू पकड़ा और घसीटता हुआ बाहर ले गया ।

“तूने मेरी माँ पर हाथ उठाया ।” उसने गुर्राती आवाज में कहा । उसकी आँखों में खून उतर आया था ।

मिसेज ठाकुर ने गर्दन झुका ली ।

“नहीं भैया– मैंने सासजी पर हाथ नहीं उठाया– यह झूठ बोल रही हैं ।”

“हैं–हैं, अरी हाथ नहीं उठाया– अरी मुँह के मुँह पर झूठ बोल रही है । अरी अभी तो तूने मेरे मुँह पर थप्पड़ मारा था ।”

“क्यों झूठ बोल रही है अम्मा । इससे दुश्मनी निकाल रही है ।” जग्गी अचानक नरम पड़ गया ।

“अरे–अरे इससे मेरी काहे की दुश्मनी ? मैं झूठ बोलूंगी भला, मैं बुढ़िया जो मरने को हूँ तुझसे झूठ बोलूंगी– अरे इसने थप्पड़ मारा मेरे मुँह पर ।”

“नहीं भैय्या– अम्मा मेरी पूजनीय हैं– मैं भला हाथ उठा सकती हूँ इन पर ।” मिसेज ठाकुर फिर गिड़गिड़ाती हुई बोली और जग्गू बिल्कुल ही नरम पड़ गया ।

“अम्मा, भाभी पर उल्टे-सीधे इल्जाम मत लगाया कर– इतनी बुरी नहीं जितना तू इसे कहती है ।चल भाभी तू अपना काम कर । भाभी यह तो वैसे ही सबकी दुश्मन बनी रहती है ।” जग्गी ने कहा और बुढ़िया ने रोना पीटना शुरू कर दिया । वह बुरी तरह अपना सीना कूट रही थी और खूनी निगाहों से मिसेज ठाकुर को देख रही थी । झोली फैला-फैलाकर उसे कोस रही थी और मिसेज ठाकुर चकराए हुए जेहन में सोच रही थी कि इस वक्त जरा सी नरमी ने काम बना दिया वरना होशो-हवास दुरुस्त हो गए होते ।
 
फिर एक लड़की पीछे से आई और बोली– “चल भाभी बर्तन धो ले । मैंने जमा कर दिए हैं ।”

“कौन से बर्तन ?” मिसेज ठाकुर फाड़ खाने वाले अंदाज में बोली ।

“अरे वह रखे हैं न – बाल्टी में पानी भरकर रख दिया है– धोले जल्दी से, मैं दूसरा काम कर रही हूँ ।” सीता ने कहा और दूसरी तरफ चली गई ।

मिसेज ठाकुर ने लड़की के संकेत पर देखा और एक बार फिर उसके होशो-हवास जवाब देने लगे । बर्तन थे या बर्तनों की पूरी दुकान-ढेर लगा हुआ था । बाल्टी रखी हुई थी- अत्यधिक गंदी जगह थी, जहाँ बैठना तो दरकिनार, खड़ा भी न हुआ जा सकता था- रुख भी नहीं किया जा सकता था उस तरफ । बर्तनों पर मक्खियाँ भिनक रही थी न जाने कैसी-कैसी गंदगियों में वह लिथड़े पड़े थे ।

मिसेज ठाकुर की आँखें आकाश की तरफ उठ गई । जो हो चुका था और जो कुछ होने वाला था उसके बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता था । कुछ सोचा भी नहीं जा सकता था । उसकी आँखों में आंसुओं के कतरे जमा होने लगे ।

अचानक वह लड़की जो उसकी ननद थी फिर झोपड़ी में प्रविष्ट हुई और मिसेज ठाकुर को इस अंदाज में बैठी देखकर उसके तन-बदन में आग लग गई ।

“अरी ओ भाभी...उठती है या ठीक करूँ तुझे– क्या जूते खायेगी ? हरामजादी हरामीपन से बाज नहीं आएगी और फिर दूसरों के सामने मासूम बन जायेगी । चल जल्दी बर्तन धो । सीता ने उसे गालियां देते हुए कहा और मिसेज ठाकुर उसे घूरने लगी ।

“अरी हाँ, तू सुन क्यों नहीं रही ?” दूसरी तरफ से एक मर्दाना आवाज उभरी और मिसेज ठाकुर ने पलटकर देखना भी उचित नहीं समझा । वह तो दुश्मनों की बस्ती में आ फंसी थी । स्पष्ट है अमर ने उसे दोस्तों की बस्ती में तो न भेजा था । सजा ही देनी थी तो ऐसी ही सजा उचित हो सकती थी मिसेज ठाकुर के लिए ।

कमबख्त मानसिक विशेषज्ञ था । ऐसे-ऐसे गुर इस्तेमाल करता था सजा देने के लिए कि इंसान जिंदगी से अज़ीज़ आ जाये ।

वह अपने खूबसूरत हाथों को देखने लगी । इन हाथों से उसने कभी कोई सख्त चीज भी नहीं पकड़ी थी...लेकिन यह बर्तन हैं...हे भगवान ! यह बर्तन धोये जायेंगे...और इसके सिवा अब कोई चारा भी नहीं था कि जैसे भी बर्तन धोये जाएँ वह धो ले ।

अतः वह उनकी तरफ बढ़ गई और गंदगी से लिथड़े हुए बर्तन धोने लगी ।

इससे बड़ी सजा कोई नहीं हो सकती थी...अगर वह जख्मी कर देता तो वह अस्पताल पहुँच जाती । इलाज होता और ठीक हो जाती या मर जाती, लेकिन उसने इस तरह जख्मी किया था कि अब इलाज भी सम्भव नहीं था । न जाने इन लोगों के चंगुल में उसे कब तक फंसा रहना पड़े । एक-एक बर्तन को वह इस तरह उठा रही थी जैसे गंदगी की पोट हो और फिर उसे साफ करने का गुर भी नहीं आता था । मिट्टी से बर्तन मांजने पड़े थे और अब इन्हीं बर्तनों में खाना भी पकाना पड़ेगा ।

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राजन भी कोई साधारण हैसियत का इंसान नहीं था । पुलिस उसे एक जबरदस्त इनफॉर्मर की हैसियत से जानती थी...और प्रत्यक्ष में लोग उसे एक अखबारी नुमाइंदा समझते थे । चूंकि उसका कारोबार बड़ा ही खतरनाक था इसलिए वह आमतौर पर अपनी असलियत छुपाकर ही रखता था । गुलमोहर पार्क के एक फ्लैट में वह अकेला रहता था । बस एक नौकर फ्लैट में उसके साथ रहता था । देखने में तो वह जय का नौकर ही था, परन्तु जय ने उसे किस तरह हासिल किया था यह लम्बी कहानी है ।

जय का यह नौकर देखने में साधारण सा मरियल व्यक्ति नजर आता था । परन्तु वह किसी जमाने में एक थियेटर में काम करता था । बड़ा जबरदस्त कलाकार था । मेकअप कला में दक्ष और इसके अलावा वह सम्मोहन कला भी जानता था । उसके यह दोनों आर्ट जय के काम आते थे । जय उसे बम्बई से अपने साथ लाया था । नाम था रोमी ।

रोमी की उम्र खासी थी । बाल अधपके थे और चेहरे पर बुढ़ापे की झुर्रियां थीं । उसके आगे-पीछे कोई न था । थियेटर बन्द होने के बाद वह कुछ दिन फिल्म में मेकअप मैन का काम करता रहा... परन्तु एक अभिनेत्री के प्रेम के चक्कर में वह बर्बाद होकर रह गया । बलात्कार के जुर्म में पकड़ा गया । उस पर आरोप था कि मेकअप रूम में उसने उक्त अभिनेत्री के साथ बलात्कार किया था । इस तरह फिल्मी दुनिया उससे छूट गई और उस दुनिया से रोमी को नफरत हो गई । जय ने उसे इस जुर्म से बचाया था । उन दिनों जय बम्बई में फिल्मी रिपोर्टर था । वह एक खूबसूरत जवान था और फिल्मों में रुचि रखता था । फिल्म अभिनेत्रियों में उसे प्ले बॉय कहा जाने लगा था और जय अच्छी तरह जानता था कि जिस अभिनेत्री ने रोमी को गिरफ्तार करवाया वह वास्तव में अपने आपको प्रचलित करने के लिए इस तरह के घटिया हथकण्डे इस्तेमाल करती थी । इंडस्ट्री में उसने अपनी इमेज एक सेक्सी औरत की बना ली थी । रोमी बेचारा उसके जाल में फँस गया था ।

बाद में रोमी कुछ दिनों तक मजमा लगाता रहा । उसने अपनी सारी कमाई शराब में फूंक दी थी । जय का वह अहसानमन्द था, जिसने उस औरत को झूठा साबित कर दिया था ।

जय ने फिल्मों में एक दो रोल किये...लेकिन रोमी की घटना को लेकर कुछ अभिनेत्रियों ने जय के खिलाफ जेहाद छेड़ दिया । उसे दो- एक बार गुंडों से पिटवाया गया ।

उसकी फिल्मी रिपोर्टिंग का धंधा चौपट करवा दिया । बहुत से लोग उसके दुश्मन बन गए और उसके लेखों पर मुकदमे चलाये गए । परिणामस्वरूप पत्रिकाओं ने उसके हंगामे लेखों को छापना बन्द कर दिया ।

उन्हीं दिनों दिल्ली के एक अखबार ने उसके लेखों को देखते हुए अपने यहाँ स्थान दिया । जय के लेख और रिपोर्टिंग बड़ी सनसनीखेज हुआ करती थी । उसने फिल्म इंडस्ट्री में पर्दे के पीछे होने वाली बातों का असली मुखौटा खोल दिया था और यह नया अखबार हंगामा चाहता था कि वह क्राइम रिपोर्टर बन जाये ।

फिर जय उर्फ विकी क्राइम रिपोर्टर बन गया । जब वह बम्बई छोड़ रहा था तो रोमी उसे टकरा गया, जो फुटपाथ पर मजमा लगाये हुए था । जब जय ने बताया कि वह बम्बई छोड़ रहा है तो रोमी भी सबकुछ छोड़कर उसी के साथ दिल्ली आ गया । तब से रोमी बाबा उसके साथ साथ था और बाकायदा जय का सहयोगी था ।

राजन ने बहुत से तजुर्बे अपनी इस छोटी सी जिंदगी में देखे थे । उसने एक धनवान लड़की से मोहब्बत भी की थी लेकिन उसका यह प्रेम पहला और आखिरी प्रेम था, जिसमें उसे असफलता का मुँह देखना पड़ा । अगर वह उस लड़की के धनी बाप की हैसियत का आदमी होता तो शायद अनुराधा आज उसकी पत्नी होती ।

उसके बाद अब तक जय ने औरत को महज मनोरंजन का साधन समझा था । वह जरूरत पड़ने पर प्राइवेट इन्वेस्टिगेशन भी करता था और यह काम वह पैसे के लिए करता था । जो कुछ कमाता, उससे ऐश करता । पुलिस को महत्वपूर्ण इंफॉर्मेशन देता तो उसका पैसा भी मिलता रहता । इस फिजूल खर्ची के कारण कभी कभार उसे फाके भी करने पड़ते थे । रोमी बाबा ने शराब छोड़ दी थी, इसलिए वह थोड़ा बहुत जमा कर लिया था और जरूरत पड़ने पर जय रोमी बाबा से ही उधार मांगा करता था ।

रोमी बाबा उसे बराबर फिजूलखर्ची रोकने की सलाह देता रहता ।

और जय कहता– अरे बाबा, पैसा तो हाथ का मैल है और फिर पैसा जमा भी कर लें तो किसके लिए...अरे न तो अपना कोई है और न तुम्हारा, फिर काहे की हाय तौबा मचाएं, जितनी जरूरत होती है, ऊपर वाला दे ही देता है ।”

लेकिन साल भर पहले अचानक हंगामा अखबार बन्द हो गया । अखबार दिवालिया हो गया था । अचानक यह सब कैसे हुआ जय की समझ में नहीं आया था । ऐसी तो कोई स्थिति नहीं थी...फिर क्या हुआ ?

जय को इस अखबार ने बहुत कुछ दिया था । अखबार का मालिक और प्रमुख संपादक रमेश देव एक अच्छा इंसान था, नेकदिल, रहमदिल और काम का कद्रदान...और जय को वह बेहद चाहता था । उसे अपना पार्टनर तक बनाना चाहता था, लेकिन खुद जय इसके लिए तैयार नहीं हुआ ।

जय की समझ में नहीं आया कि अचानक ही रमेश देव ने उस चले चलाये अखबार को बन्द करने की घोषणा क्यों कर दी ? वह रमेश देव से मिला तो रमेश देव ने बड़ी मुश्किल से सच्चाई प्रकट की ।

रमेश देव ने जब यह अखबार शुरू किया था तो एक पूंजी-पति ने उसे फाइनेंस किया था और अखबार में लगभग पांच लाख रुपया लगाया था । परन्तु रमेश देव समय पर यह कर्जा उतार न पाया और उस पूंजीपति ने अखबार सील कर दिया ।

रमेश देव मार्क्सवाद से प्रभावित था । उसके विचार भी वही थे...लिहाजा यह लड़ाई चल पड़ी और इसका परिणाम यह हुआ कि सब लोग भूखे मरने लगे । रमेश देव भी टूट गया – फिर एक रात वह अपने परिवार सहित न जाने कहाँ गायब हो गया । उसके कई साथी पहले ही टूट चुके थे । बस आखिरी वक्त में सिर्फ जय ही साथ रह गया था । वह किराये की कोठी में ठहरा था । शायद अंतिम समय उसके पास उसके किराये के पैसे भी नहीं बचे थे ।

लेकिन जय अंदर ही अंदर सुलग रहा था ।

किसी तरह पांच लाख रुपया मिल जाये तो वह राय बहादुर केशवदास के मुँह पर मार सकता था । वह रमेश देव को उसी जगह लौटाना चाहता था और इसके लिए वह प्रयत्नशील भी था ।

पांच लाख रुपया ।

चोरी वह कर नहीं सकता था । डकैती डाल नहीं सकता था । ब्लैकमेलिंग से उसे सख्त नफरत थी– फिर क्या करता और अचानक एक दिन उसे अपने कॉलेज के जमाने का क्लास फैलो मधुकर पंत टकरा गया । मधुकर ने बताया कि वह हाल ही में ट्रांसफर होकर केंद्रीय गुप्तचर विभाग में आया है और इंस्पेक्टर के पद पर है ।

जय इन दिनों फ्री लांसिंग रिपोर्टर कर रहा था...लेकिन अब उसकी आमदनी भी घट गई थी । जब दोनों दोस्त मिले तो नई पुरानी बातें हुई ।

तब पंत ने बताया कि उसे हीरा का केस मिला है...और हीरा एक ऐसी शख्सियत है जिसने कई प्रान्तों की पुलिस को हिलाकर रख दिया है । जय ने भी हीरा के बारे में सुना था...लेकिन यह नहीं मालूम था कि हीरा पर कुल मिलाकर पांच लाख रुपया पुरस्कार लग चुका है ।

पांच लाख...

पांच लाख...

बस वही क्षण था जब उसने हीरा को जिन्दा या मुर्दा गिरफ्तार करवाने का फैसला किया और अपना यह फैसला पंत को भी सुना दिया । पंत अपना प्रयास अलग से जारी रखे हुए था । जय ने प्राइवेट इन्वेस्टिगेशन का धंधा भी चलाया हुआ था ।
 
शहर की एक धनी महिला को ब्लैकमेल किये जाने के सम्बन्ध में जय तहकीकात करता हुआ मिसेज ठाकुर तक पहुँच गया, लेकिन उसके दिमाग में हीरा छाया हुआ था । उसने एक प्लान बनाया और खुद हीरा बन गया । उसे यकीन था कि जब हीरा को मालूम होगा कि उसके नाम से कोई ब्लैकमेलिंग कर रहा है तब हीरा खुद उस तक पहुँचने की कोशिश करेगा और यही हुआ । मिसेज ठाकुर पर रोमी ने सम्मोहन का प्रयोग सफल किया था और उन्हें मिसेज ठाकुर के सम्बन्ध में बहुत सी जानकारियाँ मिल चुकी थीं–- वह अपने पति की कातिल थी और वह जय के जाल में पूरी तरह फंस गयी ।

पंत के सहयोग से वह हीरा को गिरफ्तार करने चला था लेकिन खुद हीरा के जाल में जा फँसा ।

मिसेज ठाकुर कोई अधिक खूबसूरत औरत तो थी नहीं लेकिन जय ने उसे अपना दीवाना बनाकर छोड़ दिया था । उसका एक नौकर जय का जरखरीद गुलाम था ।

जब उसे होश आया तो एकाएक इसे महसूस हुआ कि उसके सीने पर एक वजनी पत्थर रखा हुआ है । टांगो पर भी ऐसा ही बोझ महसूस हो रहा था । उसने चौंककर आँखें फाड़ दीं– यह पत्थर कहाँ से उसके सीने पर आ गया ।

आँखें खोली तो अँधेरे में घिरा पाया । कहीं-कहीं सुराखों से हल्की-हल्की रोशनी झांक रही थी । सीने पर रखे हुए पत्थर को टटोला तो मांस का एक बहुत बड़ा तोदा उसके हाथ में आ गया । जय के कंठ से एक चीख निकल गई । उसने इस तोदे को सवीं पर से ढकेल दिया और उठने की कोशिश की, लेकिन उससे बड़ा तोदा टांगो पर रखा हुआ था । उसे हटाने में काफी कठिनाई का सामना करना पड़ा ।

जय ने अपने आसपास टटोल कर देखा तो पता चला की मांस की एक चट्टान उसके बराबर में मौजूद है ।

“अरे बाप रे ।” उसने बौखलाकर कहा और दूसरी तरफ छलांग लगा दी । उठकर बैठा ही था कि किसी ने गिरेबान पकड़ कर पीछे गिरा दिया ।

“कहाँ भाग रहा है सुबह ही सुबह...सो जा... अभी तो सूरज भी नहीं निकला ।” एक मोटी और भारी आवाज सुनाई दी, जिसे नारी स्वर कहा जा सकता था । लेकिन उसका अंदाज मर्दाना जैसा था...लेकिन जय की खोपड़ी चकराई हुई थी । यह आवाज, यह हाथ, यह पांव और फिर यह भारी मोटी आवाज मिसेज ठाकुर की तो नहीं हो सकती थीं उसने दहशत भरे अंदाज में सोचा और फिर बीती घटनाएं एक-एक करके याद आने लगीं ।

आँख फाड़-फाड़कर मांस भरे बोरे को देखने लगा, जो उसके बराबर में ही पड़ा था । उसके चेहरे वाले भाग पर निगाह पड़ी, क्योंकि रोशनी की एक किरण सीधी उसके चेहरे पर पड़ रही थी और जय के कंठ से एक घिघियाई चीख निकल पड़ी ।

“ब....बचाओ....बचाओ....चुड़ैल.... ।”

“अरे ओ चुड़ैल के बच्चे...सो जा...सोता है या नहीं....तेरे सपनों ने तो मुझे मुसीबत में डाल दिया ।” उस अजीब चीज ने उसका गिरेबान पकड़ कर झटक दिया ।

बहुत ही ताकतवर चीज थी...क्योंकि जय जैसी शख्सियत भी उसके एक ही झटके से नीचे जा पड़ी थी ।

जय ने इस बार कमर मोड़कर उसकी पकड़ से निकल जाने का गुर प्रयोग किया और फुर्ती से उठ खड़ा हो गया । गोरी औरत मुस्कराकर उसे देखने लगी ।

“कमीनेपन से बाज न आना– भँगी की शक्ल वाले– मैं कहती हूँ अभी लेट जा । सुबह ही सुबह तुझे न जाने क्या सूझती है कि उठकर बैठ जाता है ।”

“ऐ नेक औरत... ऐ महान महिला पुरुष कौन हैं आप ? कहाँ से टपक पड़ी हैं मेरे हिस्से में ? आसमान से टपकी हैं तो क्या सीधे मेरे ऊपर ? ओ गॉड...वैसे मुझे यकीन है कि आप मेरे ऊपर टपकती तो मेरी हड्डियां सुरमा बन चुकी होतीं ।”

“क्या बके जा रहा है

बड़ा शरीफजादा बन गया है । अरे यह जगह कौन सी है ?” अब जय को उस स्थान का ध्यान आया, उसने चकराई दृष्टि से चारों तरफ देखा ।

ऊंट के कोहान के मानिंद झोपड़ा था । सचमुच झोपड़ा ही था । जय खोपड़ी खुजाने लगा ।

“क्या दिमाग में खुश्की भर गई है...या फिर कोई बहुत ही भयानक सपना देख रहा हूँ । या किसी ने मुझे ही सम्मोहित कर दिया है ।” वह अपने शरीर पर थप्पड़ मार-मारकर अंदाजा लगाने लगा कि वह सो रहा है या जाग रहा है ।
 
लेकिन वह जाग रहा था और होशो-हवास में था और सचमुच झोपड़ी में ही था...लेकिन...लेकिन वह तो उस इमारत में बेहोश हुआ था...और वह तो एक अजीब किस्म के हालात में जा फंसा था ।

जय सोच रहा था और उसकी निगाहें उस अजीम इंसानी अस्तित्व पर घूम रही थीं । जिसे मीनारनुमा गुंबद कहा जा सकता था । या गुम्बदनुमा मीनार...इसके अलावा कोई और उपयुक्त शब्द उसके लिए मिलना मुश्किल था ।

फिर उसने एक खौफनाक अंगड़ाई ली और उठकर बैठ गई ।

“तू मुझे चैन नहीं लेने देगा फकीरे । सुबह ही सुबह उठकर बैठ जाता है और परेशान करके रख देता है । उस हसीन दिलरुबा ने मुस्कराते हुए कहा ।

“फकीरे ।” जय उछल पड़ा और महिला हँसने लगी ।

“अरे ओ नेक बन्दी... क्या इससे और सुंदर नाम तुझे मेरे लिए नहीं मिल सका ?”

“क्या बके जा रहा है, अभी तक सपना ही देख रहा है क्या ?

“काश ! सपना ही हो । होशो-हवास में आप कैसी नाजुक गुलबदन, गुले-अंदाज को देखकर इंसान होशो-हवास कहाँ कायम रख सकता है । आपकी उत्पत्ति कहाँ से हुई मैडम... ?”

“अरे...अरे...पता नहीं क्या उल्टी-सीधी बके जा रहा है । क्या कह रहा है तू... ?

“हुजूरेवाला....बल्कि जानेमन, अर्ज यह कर रहा हूँ कि आपका आगमन कहाँ से हुआ ?”

“क्या हुआ ?” उसने परेशान से स्वर में कहा ।

“आगमन....प्रकट.... ।”

“तेरी बातें समझ में नहीं आती ।”

“गॉड ब्लेस मी कि आप भी अभी तक मेरी समझ में नहीं आई– वैसे एक बात बताएंगी आप ?”

“हाँ, हाँ, पूछ- क्या पूछ रहा है ?”

“मैं आपका कौन हूँ ?”’

“क्या मतलब ?”

“मतलब यह कि मेरा और आपका क्या रिश्ता है... ?”

“ऐ, यह भी कोई पूछने की बात है– मियां है हमारा और कौन है ?”

“मियां....अल्ला मियां... !” जय ने ठंडी साँस लेकर झोपड़ी की छत की तरफ देखा और बेगम साहिबा हँस पड़ी ।

“बड़ा ही मसखरा है तू ।”

“मेरा भाग्य ही मसखरा है– मैं क्या करूँ ?”

“अच्छा अब उठ ही गया है तो बैठकर बातें कर या फिर बाहर चलते हैं सैर करेंगे– ठंडी-ठंडी हवा चल रही होगी बाहर आओ देखें क्या हो रहा है ।”

“चलिए ।” जय साँस लेकर बोला – “कम से कम इस झोपड़ी से बाहर निकलकर...इर्द-गिर्द का वातावरण तो देखने को मिलेगा । किसी खूबसूरत जगह पर इस मासूम बला से बातें की जाये कि आखिर यह शादी कब हो गई ?”

अतः वह उस मीनारनुमा महिला के साथ झोपड़ी से बाहर निकला ।

लेकिन इर्द-गिर्द का वातावरण देखकर उसके होश ठिकाने आ गए । चारों तरफ झोपड़े ही झोपड़े बिखरे पड़े थे । पूरी आबादी थी जिसके बीच किसी एकांत स्थल का पाना बड़ा कठिन था । फिर भी वह इस औरत के साथ चलता रहा । कुछ नंग-धड़ंग बच्चे बाहर निकल आये थे । मर्द और औरतें अपने-अपने कामों में व्यस्त थे । गोया इतनी सुबह यहाँ सुबह हो जाती थी– सूरज निकला तो नहीं था, लेकिन पहाड़ों से झांक रहा था ।

पहाड़... वह चकरा गया ।

वह तो दिल्ली में था- फिर यह पहाड़ कहाँ से उग आये और यह आखिर कौन सी बस्ती है । वह स्तब्धता के आलम में उस औरत के साथ चलता हुआ एक जगह पहुँच गया ।

वह अत्यधिक भद्दे नयन नक्शे की नौजवान लड़की थी– जिसे शारीरिक बनावट के आधार पर लड़की कहना भी अत्यधिक मुश्किल था– लेकिन बहरहाली थी तो वह लड़की ही और यह भी कहती थी कि फकीरा उसका मियां है– ओह गॉड– नाम भी क्या रखा है उसका फकीरा ।

जी तशरीफ रखिये । उसने जय का दामन खींचकर कहा और जय धड़ाम से नीचे गिर पड़ा ।

“तुम औरत हो या हथिनी ।”

“क्या मतलब है तेरा ?” नाज से पूछा गया ।

“ईश्वर के लिए मुझे अपने बारे में बताओ– मैं कहाँ हूँ, यह कौन सी जगह है ? और....और अचानक मैं फकीरा कैसे बन गया ?”

“देख फकीरे । तू दारू पी लेता है तो फिर अपने हवास में नहीं रहता । हम तो तुमसे इतना प्यार करते हैं और तू तो ऐसे लगता है जैसे गैर हो– आखिर मियां है हमारा, शादी हुई है हमारी– कब तक हमसे अजनबी-अजनबी रहेगा ?”

“श....श....शादी.....शादी भी हो गयी....ओ गॉड ! मुझे मेरे किन पापों की सजा दे रहा है । बीवी ! यह मेरी और आपकी शादी कब हुई ?”

“छः महीने हो गए हैं और तू आज तक मुझसे यही सवाल करता रहता है ।”

“मैं इस तरह के मजाक का आदी नहीं हूँ मैडम ! ईश्वर के लिए इस मजाक को खत्म कर दें– मुझे मेरी हैसियत से आगाह कर दो ताकि मैं यहाँ से जाऊँ ।”

“कहाँ जाऊँ – फिर कहीं जायेगा ?”

“जी हाँ ! जी हाँ ! तो फिर क्या आपके ख्याल में आपकी गोद में ही परवरिश पाता रहूँगा ।” जय ने कहा और औरत अजीब से अंदाज में उसे देखने लगी ।

फिर उसके नथुने फूलने-पिचकने लगे । उसने दुपट्टा मुँह पर ढका और उसके बाद एक अजीबोगरीब आवाज उभरने लगी । भें-भें की आवाज– जैसे भेड़ निरंतर डकरा रही हो– इसके साथ ही वह टसुये बहाती जा रही थी ।

“हाय अल्ला ! अब तो... तू हमें इस जहान से उठा ले– अब तो इस दुनिया में जी नहीं लगता– हाय मेरे मौला- हाय मेरे मौला– हमारा मियां हमसे नफरत करता है– यहाँ से जाने की सोचता है, अरे करीम ओ...खुदा बख्श...अरे कहाँ हो तुम लोग...आओ देखो– यह फिर जाने की बात करता है ।” वह जोर-जोर से दहाड़ी और जय का मुँह हैरत से फैल गया ।

इससे पूर्व कि वह कुछ बोलता, चार लम्बे मुस्टंडे पहलवान हाथों में लाठियां लिए लड़की के पास पहुँच गए और वह खूनी निगाहों से जय को देख रहे थे ।

“हूं ।” वह चारों जय को घूरने लगे ।

“हूं तो तुझे बता दें तू कौन है, ससुरे जब दारू बर्दाश्त नहीं होती तो पीता क्यों है– बोल अब पियेगा ।” उनमें से एक आगे बढ़ा और उसने जय का गिरेबान पकड़ लिया ।

“नहीं...नहीं...साले साहब हरगिज नहीं, लानत है इस दारू पर...कमबख्त हमेशा दिमाग खराब करके रख देती है...अब हाथ लगाऊं तो जो चोर की सजा वह मेरी ।” जय ने बौखलाकर दोनों हाथ जोड़ दिए ।
 
लम्बे आदमी ने उसे दूसरे पर धकेल दिया– दूसरे ने तीसरे पर और तीसरे ने चौथे पर । जब चारों अपना कर्तव्य पूरा कर चुके तो उन्होंने उस लड़की की ओर धकेल दिया, जिसे अब लड़की ही कहना उचित था । औरत या हथिनी कहा तो यह चारों उसकी चटनी बना देंगे । जय ने सोचा और वह इस औरत के स्तम्भ नुमा पांवों में अपना बदन टिकाकर बैठ गया ।

“आप भी...आप भी....आप भी मुझसे नाराज हैं ।” उसने उसकी टांगो पर मुँह रगड़ते हुए कहा ।

“मैं क्यों नाराज हूँगी– तू ही ऐसी बातें कर रहा है । चल अब घर चलें– नाश्ता करना होगा तुझे भी ।”

“जी हाँ....जी हाँ....चलिए चलिए ।” जय ने कहा और शीघ्रता से खड़ा हो गया । स्तम्भ भी उसके साथ ही खड़ा हो गया था । अजीब सी जोड़ी थी ।

घर पहुँचकर नाश्ता मिला – गंदे से बर्तन में गंदा सा नाश्ता, जो उसके मुँह पर जूते की तरह था– लेकिन वह खौफनाक शख़्सियत सामने बैठी हुई थी जिसकी जरा भी सी भें-भें की आवाज पर चार पहलवान चार जिनों की तरह आकर चार कोनों पर खड़े हो जाते थे– अतः यह नाश्ता तो करना ही था और बड़े प्रेम से करना था । इस दौरान उसे एक बार भी अपना लिबास याद नहीं आया था—लेकिन नाश्ते में फारिग होकर उसने अपने पेट पर हाथ फेरा तो एकाएक उसे उस मोटे से कुर्ते और धोती का एहसास हुआ जो उसके बदन पर मौजूद था और एक बार फिर वह नाचकर रह गया ।

यह सारा ड्रामा साधारण नहीं था– और अब यह बात उसके जेहन में साफ हो गई थी कि वह हीरा का कैदी है– एक ऐसा कैदी जिसका शरीर आजाद था लेकिन जिसका मन मस्तिष्क कैदी था । अगर उसने यहाँ जरा सी भी उद्दंडता दिखाई होती तो खासी मरम्मत हो जाती ।

“चल तैयार हो जा– अब खेत में हल भी जोतना है तुझे ।” अचानक औरत की आवाज सुनाई दी ।

और जय की खोपड़ी हिलकर रह गई ।

☐☐☐

दोनों पहरेदारों ने एक दूसरे की ओर देखा और गहरी साँस लेकर करीब आ गए । दोनों के अंदाज से थकन का एहसास हो रहा था । उन्होंने अपनी वजनी राइफलें दीवार के साथ खड़ी कर दीं और उनमें से एक वर्दी का ऊपरी बटन खोलकर सीने पर फूंक मारने लगा ।

इस वक्त खासी गर्मी थी– वायुमंडल की घुटन बताती थी कि बारिश की सम्भावना है ।

“देखो– वह बिजली चमक रही है ।” एक ने कहा ।

“अच्छा है बारिश हो जाये– इस मौसम ने हालत पतली कर दी है– यार सिगरेट तो निकाल ।”

पहले आदमी ने वर्दी की जेब से सिगरेट का पैकेट निकालकर दूसरे की तरफ बढ़ा दिया ।

रात के लगभग दो बजे होंगे । चारों तरफ अंधकार और सन्नाटे का राज था । सड़कों पर लगे हुए इलेक्ट्रानिक पोल भी वातावरण की घुटन का शिकार थे– इन पर लगे हुए पीले बल्ब उदास आँखों से एक दूसरे को देख रहे थे । दिन में मौसम अच्छा-खासा था लेकिन रात को अचानक बादलों के गोल आकाश पर जमा होने लगे और फिर फिजा में घुटन पैदा हो गई ।

काफी वक्त गुजर चुका था घुटन को– लेकिन न तो बारिश ही हुई और न ही बादलों के गोल साफ हुए– अलबत्ता बिजली कभी-कभी चमकने लगती थी । इस खूबसूरत इमारत के फौलादी गेट पर पहरा देने वाले दोनों रक्षक इस घुटन से बुरी तरह उकताए हुए थे ।

सिगरेट के पैकेट से एक-एक सिगरेट निकालकर दोनों ने होंठों पर लगाया और माचिस से जलाकर उसके कश लेने लगे ।

“क्या सोच रहे हो ?” उनमें से एक ने दूसरे से पूछा ।

कोई खास बात नहीं– बस यूँ ही अपने घर का ख्याल आ गया था ।

“घर ?” पहले ने हसरत भरे स्वर में कहा–- “हम जैसे लोग घरों से दूर रहकर ही जिंदगी गुजारने के लिए पैदा हुए हैं ।”

“हाँ- ऐसा ही लगता है । नौकरी बहरहाल नौकरी होती है । कुछ अवसरों पर तो मैं सोचता हूँ कि घर वाले हमें कुछ अरसे बाद भूल जायेंगे । हमारा उनमें कोई मुकाम नहीं रहेगा...सिर्फ एक याद रह जायेगी उनके दिल में कि हम भी कहीं जिन्दा हैं ।”

“यह सच्चाई है ।” दूसरे ने गहरी साँस लेकर कहा और उसकी निगाहें फिर आकाश की ओर उठ गईं ।

बिजली अब भी चमक रही थी और उसकी सीमा बढ़ती जा रही थी । फिर बादलों की गड़गड़ाहट सुनाई देने लगी । फिजा कुछ और भी भयानक हो गई ।

दोनों संतरी दूर-दूर तक निगाहें दौड़ाने लगे । पूरी इमारत खामोश खड़ी थी– इमारत के चारों तरफ लगे वृक्ष ऐसे खामोश थे जैसे किसी विशेष घटना की प्रतीक्षा कर रहे हों ।

लेकिन वह आवाज बहुत हल्की थी जिसे सिगरेट पीने वाले ने बखूबी सुन लिया था । क्योंकि आवाज अधिक दूर से नहीं आई थी । दूसरे ही पल उसने सिगरेट को अपने जूते से मसल दिया और अंधकार में आँखें फाड़ने लगा ।

एकाएक बिजली चमकी और उसके साथ बादल भी गरजे और पहरेदार के कंठ से हल्की सी आवाज निकल गई । दूसरा पहरेदार यह आवाज सुनकर चौंक पड़ा ।

“क्या बात है ?” उसने आश्चर्य से पूछा ।

लेकिन पहले पहरेदार ने जवाब देने की बजाय जल्दी से लपक कर अपनी राइफल उठा ली ।

“क्या हो गया– बताओगे नहीं ?”

“मैंने– मैंने दो साये देखे हैं, बिल्कुल साफ ।” पहले ने जवाब दिया ।

“नहीं ।”

“हकीकत है – सावधान हो जाओ – सम्भव है कोई खतरा पेश आ जाये ।” पहले पहरेदार ने कहा और दोनों अपनी राइफलें उठाये आगे बढ़ने लगे ।

अब वह चंद कदम ही आगे बढ़े थे कि फौलादी गेट के ऊपर से दो साये उन पर कूदे और दोनों पहरेदारों को लपेटे में लेते हुए उन पर जा पड़े । इससे पूर्व कि पहरेदार कुछ करते एकाएक जोर से बादल गरजे और इसके साथ ही पहरेदारों की चीखें भी गूंज उठी । उनकी गर्दनों पर तेज छुरियाँ चल गई थीं और देखते ही देखते उनके कंठ से खरखराहटें उत्पन्न होने लगीं ।

नरखरा कट गया था । इसलिए आवाजें तो सुनाई नहीं दे रही थीं । लेकिन खरखराहट की आवाज के साथ खून भल-भल बह रहा था ।

छुरियों वाले साये उन पर से हट गए और फिर उन्हीं के लिबास से छुरियाँ साफ करके उन्होंने अपने लिबास में रख लीं– उसके बाद वह अंदर प्रविष्ट हो गए ।
 
पहरेदारों की मौत के बाद कुछ और व्यक्ति भी दीवार फांद कर कूद पड़े । फिर वह धीरे-धीरे इमारत के अंदरूनी हिस्से की तरफ बढ़ने लगे । अंदरूनी हिस्से में पहुंचकर एकाएक उन्होंने दरवाजे पर गोलियों की बारिश कर दी और ताला टूट गया । लेकिन गोलियों की इन आवाजों से अंदर मौजूद लोग जाग गए । जरा सी देर में अंदर चीखें सुनाई देने लगीं । लेकिन उसके साथ ही फायरिंग की आवाजें भी ।

उसी समय बारिश हो गई– लेकिन खून बहाने वाले इंसानों ने बारिश की परवाह नहीं की और यह खूनी ड्रामा देर तक जारी रहा । इमारत के अंदर उपस्थित एक-एक व्यक्ति को कत्ल कर दिया गया । फिर वह फरार की राह पकड़ने लगे ।

बारिश अब भी तेज रफ्तार से हो रही थी । लेकिन यह अनुमान नहीं लगाया जा सकता था कि वह लोग किधर गए । वह सब अंधकार में गुम हो गए थे– अलबत्ता रात की इस कार्रवाई का प्रभाव दूर तक गया ।

यह इमारत एक विदेशी दूतावास थी । दूतावास के सभी व्यक्तियों की हत्या कर दी गई थी और सुबह ही इसका पता चल सका । इमारत के चारों तरफ पुलिस का भारी जमाव हो गया । देश के बड़े-बड़े अधिकारी वहाँ जमा हो गए । यह कोई साधारण घटना नहीं थी । जिस देश का यह दूतावास था उस देश से बड़े अच्छे सम्बन्ध थे । सरकार के लिए जवाब देना ही मुश्किल हो गया ।

पुलिस ऑफिसर दूतावास की इमारत के अंदर वह चिन्ह तलाश करते फिर रहे थे जिनसे हत्यारों का कोई निशान मिल सके– फिर एक ऑफिसर को इमारत के अंदरूनी हिस्से में एक सफेद सा सिक्का नजर आया– अजीबोगरीब सिक्का जिसका डिजाइन बेहद अजीब था । इस सिक्के पर एक नाम लिखा था जिसे पढ़कर ऑफिसर चौंक पड़े ।

यह नाम था सोलो ।

गुप्तचर विभाग में यह सिक्का भेज दिया गया और सोलो की फाइल तलाश कर ली गई । सोलो अब से कुछ अरसे पहले भी इस देश में आया था । यह एक खतरनाक मुजरिम था– दूसरे महायुद्ध में नाजियों के लिए काम कर चुका था– फिर इसकी मौत का समाचार मिला– लेकिन उसके बाद यूरोप के चंद देशों में इसने खतरनाक गतिविधियाँ शुरू कर दी । वह विभिन्न देशों के लिए काम करता था और बड़े भारी पारिश्रमिक पर खतरनाक से खतरनाक काम करने के लिए तैयार हो जाता था ।

इस बार वह न जाने किस उद्देश्य के तहत यहाँ आया था– हालाँकि अब से कुछ अरसे पूर्व वह देश में गिरफ्तार भी हुआ था लेकिन चंद घण्टे कैद रहने के बाद वह फरार हो गया था । लम्बे अरसे बाद यह नाम पुलिस डिपार्टमेंट में दोबारा आया था और तमाम डिपार्टमेंट में खलबली मच गई थी ।

सोलो के बारे में अधिक जानकारी किसी को भी नहीं थी– अतः पुलिस ऑफिसर एक दूसरे से जानकारी प्राप्त करने लगे और अच्छी खासी हंगामाखेज स्थिति पैदा हो गई ।

यह सोलो का विशेष तरीका था– वह जहाँ भी प्रकट होता खुरेन्जी करता और इस तरह अपने आगमन की घोषणा करता । इस बार भी उसने इसी तरह शुरुआत की थी और पुलिस डिपार्टमेंट के लिये खासा सिरदर्द पैदा हो गया था ।

पुलिस अधिकारियों की एक विशेष मीटिंग हुई, जिसमें सोलो की गिरफ्तारी और उसकी गतिविधियों पर निगाह रखने के लिये उचित सुरक्षा व्यवस्था के फैसले लिए गए । उन सभी महत्वपूर्ण स्थानों पर पुलिस को तैनात कर दिया गया था जहाँ सोलो की उपस्थिति की सम्भावना हो सकती थी । लेकिन सोलो जैसे खतरनाक मुजरिम का पता निकालना कोई आसान काम नहीं था । उसकी कार्य-प्रणाली भी भिन्न थी । वह अधिक लोग साथ लेकर नहीं चलता था । जिस देश में जाता वहीं के लोगों को हायर करता और उन्हीं से काम लेता- अतः उसकी कार्यवाहियाँ जारी थी ।

दूतावास की इमारत पर जिन लोगों ने हमला किया था, वह स्थानीय थे और सोलो जैसे खतरनाक मुजरिम को यह इत्मीनान था कि अगर उनमें से कोई गिरफ्तार भी हो गया तो वह अधिक से अधिक सोलो का नाम ले देगा । इसके अलावा उसके बारे में कोई कुछ नहीं बता सकता था ।

दुबले-पतले शरीर का यह व्यक्ति इस समय एक गन्दे से मोहल्ले के गन्दे मकान में बैठा हुआ था । उस कमरे में जिसमें वह उपस्थित था, मोमी शमाएं रोशन थीं । इस क्षेत्र में बिजली नहीं थी और यहाँ रहने वाले मिट्टी के तेल के लैम्पों, लालटेनों या मोमबत्तियों से काम चलाते थे । लेकिन जिस कमरे में सोलो मौजूद था वहाँ अत्यधिक आधुनिक यंत्र रखे हुए थे जिन पर वह विभिन्न लोगों से संपर्क स्थापित कर रहा था । यह भी उसके काम करने का ढंग था । वह होटलबाजी या श्रेष्ठकोटि के स्थानों में ठहरना पसन्द नहीं करता था, बल्कि साधारण लोगों की हैसियत से गन्दे-गन्दे मोहल्लों में ठहरता था, जिससे कि लोग उसकी ओर आकर्षित न हो सकें ।

उसके तीन साथी जो शक्ल से ही विदेशी नजर आते थे, उसके समीप ही बैठे हुए थे और सोलो के होंठों पर मुस्कुराहट थी ।

इसका मतलब कि हमने जिन लोगों को साथ लिया है वह सचमुच काम के हैं । उन्होंने अपना काम बड़े अच्छे ढंग से निपटाया है । पुलिस को हमारे बारे में सूचना मिल गई – बहुत बेहतर हुआ– अब काम करने का आनंद आएगा । सोलो ने कहा ।

“हाँ बॉस ! इसमें शक नहीं है – लेकिन हमारा दूसरा निशाना कौन सा होगा ?”

“इसका फैसला मैं अभी दो-चार दिन बाद करूँगा । जरा पुलिस की कार्रवाई देख लूँ कि किन रास्तों पर काम करती है । चार दिन के अंतराल के बाद ही फैसला करूँगा कि दूसरा निशाना कौन सा होगा, और फिर इस पर अमल किया जायेगा– लेकिन अभी मैं महसूस करता हूँ कि हमारे गिरोह में लोगों की कमी है । कुछ और लोगों को हममें में शामिल होना चाहिए ।”

“इसका प्रबन्धन कठिन तो नहीं होगा बॉस ।”

“हाँ कठिन नहीं होगा । तुम चार्लिस को होटल फ्लोरा में बुलाओ – मैं वहाँ उससे मुलाकात करूँगा ।”

“बहुत उचित –मैं अभी संपर्क स्थापित कर लेता हूँ ।” दूसरे व्यक्ति ने कहा और अपनी जगह से उठ गया ।

फिर रात के अंधकार में वह इस कच्चे मकान से बाहर निकल गया ।

☐☐☐
 
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