वहीं वीरेंदर भी अपनी यादों से बाहर आया जब उसके दरवाज़े पर नॉक हुई. एक 15-16 साल का दिखने वाला लड़का वीरेंदर केलिए खाना लेकर आया था.
अंदर आते ही लड़के ने बोला: आपका ऑर्डर सर.
वीरेंदर रख दो, बाद मैं आकर बर्तन ले जाना. वीरेंदर को खिड़की के पास बैठा देख कर पहले तो वो लड़का कुछ कहने को हुआ लेकिन फिर चुप चाप चला गया.वीरेंदर वहीं खिड़की पर बैठा पिछले दिन से हुई घटनाओ के बारे मैं सोचने लगा. थोड़ी देर बाद उसे याद आया कि उसने तो कल शाम से कुछ खाया ही नहीं है. वीरेंदर ने ना चाहते हुए भी खाना खाया, वो मन मैं यही सोचे जा रहा था कि "वीरेंदर इतना कमज़ोर दिल नहीं कि एक लड़की के लिए खाना पीना छोड़ दे". खाना खाकर वो फिर से वहीं अपनी जगह बैठ गया.
रात के करीब 9:30 बज रहे थे, लेकिन बाज़ार की रौनक ऐसी थी कि यहाँ के लोगों को पता ही ना हो कि रात किसे कहते हैं. सड़क पर ज़्यादातर पैदल चलने वाले लोग ही थे, बीच बीच मे इक्का दुक्का गाड़ियाँ और बाइक्स भी नज़र आ रही थी. सब अपने आप मे ही मसरूफ़ थे और वीरेंदर इतनी भीड़ के बावजूद भी बिल्कुल अकेला, बिल्कुल तन्हा. वीरेंदर ने अपना फोन उठा कर एक बार फिर से आशना का नंबर. डाइयल किया लेकिन फिर से स्विचऑफ. वीरेंदर ने झल्ला कर फोन को बिस्तर पर पटक दिया.
वीरेंदर (अपने आप से): कोई फ़ायदा नहीं होगा यहाँ रुकने का, वो लड़की तुझसे फ्लर्ट करके चली गई और तू फिर भी उसके पीछे यहाँ तक आ गया. वीरेंदर ने डिसाइड किया कि वो यहाँ से जल्द ही निकल जाएगा. वीरेंदर ने एरपोर्ट फोन करके पूछा कि बांदलोरे की आगे फ्लाइट कब की है तो उसे मालूम हुआ कि सुबह 7:00 बजे की एक फ्लाइट है. वीरेंदर ने अपने लिए एक टिकेट बुक करवा दी और अपना क्रेडिट नंबर. बता कर पेमेंट कर दी. वीरेंदर जैसे ही खिड़की को बंद करने लगा तभी वो लड़का बर्तन उठाने आ गया.
लड़का: बाबू जी खिड़की बंद कर दीजिए मौसम काफ़ी ठंडा है और यहाँ मच्छर भी बहुत हैं. इतनी ठंड मैं भी मच्छर सिर्फ़ इसी एरिया मे ही मिलते हैं. साले रात भर सोने नहीं देते.
वीरेंदर: कोई बात नहीं मेरा खून बहुत कड़वा है, मुझे काटेंगे तो मर जाएँगे.
यह सुन कर वो लड़का हँसने लगा और बोला "साहब मेरे साथ भी ऐसा ही है, जो मच्छर मुझ पर हमला करता है सुबह तक अपनी जान गँवा चुका होता है. अब तो इनको मेरे से वाकफियत हो गई है, कोई मेरे पास फटकता ही नहीं.
वीरेंदर: क्या नाम है तुम्हारा.
लड़का: जी मोनू.
वीरेंदर: मोनू तुम यहाँ कब से काम कर रहे हो.
मोनू: मैं तो इस बिल्डिंग मैं सिर्फ़ खाना सप्लाइ करता हूँ, मेरे पिता जी का होटेल यहाँ पास मे ही है. दिन भर पढ़ता हूँ और रात को पिताजी का हाथ बँटाता हूँ.
वीरेंदर: कॉन सी क्लास मे हो.
मोनू: 11थ साइन्स.
वीरेंदर: वाह यह तो बहुत बढ़िया है कि तुम पढ़ाई भी करते हो और अपने पिता जी का हाथ भी बाँटते हो.
मोनू:अब एक दूसरे के सिवा हमारा है ही कॉन तो एक दूसरे की मदद करना तो हमारा फ़र्ज़ है.
वीरेंदर (गहरी सोच मे डूबते हुए): वो तो है.
मोनू: बाबू जी अगर बुरा ना मानो तो एक बात पूछूँ?
वीरेंदर:हां पूछो.
मोनू: बाबू जी आप कहाँ के हैं और यहाँ क्या कर रहे हैं.
वीरेंदर ने मोनू की तरफ देखा और बोला: मोनू मेरा नाम वीरेंदर शर्मा है और मैं देल्हिी से हूँ, यहाँ किसी काम से आया था.
मोनू: तो फिर आप खिड़की के पास ही क्यूँ बैठे हो जब से आए हो.
वीरेंदर उसके इस प्रश्न से हडबडा गया.
मोनू: सॉरी, बाबू जी ऐसे ही पूछ लिया. वो क्या है ना कि जब आप टॅक्सी से उतार कर किसी से छुप रहे थे तो मेरी नज़र आप पर पड़ी थी. आप उस वक्त हमारे होटेल के आगे ही खड़े थे. आप को देख कर लगता है कि आप एक अच्छे घर से हो तो फिर आप छुप क्यूँ रहे थे??
वीरेंदर मोनू के सवालो से परेशान हो गया.
वीरेंदर: तुम अपने काम से मतलब रखो और जाओ यहाँ से. सुबह 5:00 बजे चाइ ले आना तो तुम्हारा हिसाब कर दूँगा.
मोनू: माफ़ कीजिएगा बाबू जी लेकिन मैने पहले ही कहा था के बुरा मत मानना.
विरेडनेर: इट्स ओके, नाउ गो.
मोनू: ऐज यू विश मिस्टर. वीरेंदर जी.
मोनू जैसे ही जाने के लिए बर्तन उठाने लगा, वीरेंदर ने बोला: यार नाराज़ मत होना, मेरा मूड ही नहीं है बात के लिए.
मोनू के चेहरे पर स्माइल आ गई.
मोनू: मुझे तो पहले ही आप सब से अलग लगे थे, अब तो यकीन भी हो गया.
वीरेंदर: मतलब?
मोनू: रहने दीजिए, आप फिर नाराज़ हो जाएँगे.
वीरेंदर: अच्छा मेरे भाई बोल क्या कहना चाहता है तू, मैं नाराज़ नहीं होऊँगा.
मोनू: मुझे पता है कि आप आशना दीदी या प्रिया दीदी का पीछा कर रहे थे, मैने देख लिया था. (वीरेंदर यह सुनकर हैरान रह गया कि एक छोटा सा बच्चा उसपर नज़र रख रहा था).
वीरेंदर: तो क्या हुआ, मैने तुम्हारी दीदियो को कुछ बोला थोड़े ही.
मोनू: तभी तो मुझे लगा कि आप अलग हैं. आशना दीदी और प्रिया दीदी के लिए तो यह रोज़ की बात है. कितने ही आवारा लड़के उनके पीछे आते हैं, उनसे बात करने की कोशिश करते हैं लेकिन मूह उठाए चल देते हैं. कई बार तो वो हमारे होटेल पर बैठ कर चाइ वागेहरा पीते हैं और आशना-प्रिया दीदी के लिए गंदी गंदी बातें बोलते हैं.
वीरेंण्दर: तो क्या तुम्हारी दीदिया इतनी सुंदर हैं कि हमेशा उनके पीछे लड़कों की लाइन लगी रहती है.
मोनू: और नहीं तो क्या, वो दोनो तो बहुत ही सुंदर हैं तभी तो आप भी उनका पीछा करते हुए आ गये.
वीरेंदर के पास कोई जवाब नहीं था.
मोनू: लेकिन प्रिया दीदी की तो एंगेज्मेंट हो गई है, लड़का उनके साथ ही काम करता है और आशना दीदी तो बस पूछो ही मत.
वीरेंदर : क्यूँ??
मोनू: अगर रास्ते मे उनका कोई दोस्त भी पास से गुज़र जाए तो उन्हे पता ही नहीं लगता. कभी नज़र उठाकर किसी को देखती ही नहीं.
वीरेंदर: हो सकता है वो किसी को चाहती हो तो उसे किसी और को देखने की ज़रूरत ही क्या है.
मोनू: मैं आशना दीदी को अच्छे से जानता हूँ, अफेर होना तो दूर अगर कोई लड़का उन्हे रास्ते मे बुला भी ले तो उसकी बॅंड बज जाती है.
वीरेंदर: तब तो बड़ी ख़तरनाक है तेरी आशना दीदी.