आशना ने दिमाग़ मे उठ रहे सवालों को झटका और बोली: मुझे भूख लगी है.
वीरेंदर: शूकर है तुम्हें भी भूख लगी, मुझे तो लगा कि तुम डाइयेटिंग पर हो. मेरा तो भूख के मारे बुरा हाल है. वीरेंदर ने होटेल की तरफ गाड़ी दौड़ा दी और करीब 15 मिंटो मे वो एक बड़े से होटेल "दा लयंज़" की पार्किंग मे गाड़ी खड़ी करके उतर गये.
आशना: यही होटेल क्यूँ????
वीरेंदर: इस होटेल का नोन-वेज बहुत मशहूर है.
आशना: आज फिर से नोन-वेज, ना बाबा ना, तुम ही खाओ. मैं तो कुछ वेज ही खाउन्गी.
वीरेंदर:अरे एक बार टेस्ट करके तो देखो, खाने वाले की उंगलियाँ ना चाट जाओ तो बोलना.
आशना:खाने वाली की उंगलियाँ चाटूँगी तो खिलाने वाले का क्या क्या चाटना पड़ेगा. यह बात आशना के मूह से एकाएक निकल गई. अपनी बात समझ मे आते ही उसकी आँखें झुक गई और वो शरम से दोहरी हो गई.
वीरेंदर: बड़ी जल्दी है तुम्हें, सबर रखो, सबर का फल मीठा होता है.
आशना ने वीरेंदर की तरफ देखा और शरमा कर अपने चेहरे को अपने हाथों से ढक लिया.
वीरेंदर: अभी से इतना शरमाना, उस वक्त क्या होगा?
आशना: वीरेंदर प्लीज़, मैं मर जाउन्गी.
वीरेंदर: मैं तुम्हें मरने नहीं दूँगा, बिल्कुल प्यार से करूँगा.
वीरेंदर की बात सुनकर आशना ने अपने चेहरे से अपने हाथ हटाए और उसकी छाती पर प्यार से मुक्के मारने लगी और बोली: तुम बड़े गंदे हो. उस फोन वाली से ही करना जो करना है, मैं तो कल वापिस जा रही हूँ.
वीरेंदर उसकी बात सुनकर एकदम निराश हो गया.
आशना: हां वीरेंदर, मैं कल वापिस जा रही हूँ.
वीरेंदर: लेकिन क्यूँ?.
आशना: वीरेंदर अभी मुझे और पढ़ना है, तुम भूल रहे हो मैं कुछ दिन की छुट्टी पे आई थी. कुछ ही दिनों मे मेरी 5थ सेम की क्लासस शुरू होने वाली है. डॉक्टर. बीना के कहने पर मैं कुछ दिनों तक तुम्हारी हेल्प की है मगर अब मुझे जाना है.
आशना का एक एक शब्द वीरेंदर की आत्मा को झिंजोड़ रहा था. वीरेंदर ने सोचा कि वो भी कितना पागल है. बिना कोई रिश्ता बनाए वो इस लड़की पर अपना हक़ मानने लगा था. उसका खाना खाने का दिल ज़रा सा भी नहीं था लेकिन आशना को भूख लगी थी तो उसने भी उसे कंपनी दी. खाना खाते हुए दोनो ही अपने अपने ख़यालो मे खोए थे. आशना यह सोच रही थी कि क्या उसे वीरेंदर को सच बता देना चाहिए कि वो बस एक-दो दिन के लिए वहाँ जा रही है ताकि अपना समान वहाँ से ला सके. फिर उसके मन मे वीरेंदर को थोड़ा और तड़पाने का ख़याल आया
वहीं वीरेंदर यह सोच कर परेशान था कि आशना के चले जाने के बाद वो फिर से तन्हा हो जाएगा. कितने सालों बाद उसे फिर से जीने की चाह जागी थी और फिर कुछ ही दिनो की खुशी के बाद उसकी ज़िंदगी अंधेरे मे डूबने वाली थी. वीरेंदर ज़ोर ज़ोर से रोना चाहता था, वो किसी की बाहों मे सुकून पाना चाहता था मगर वो बिल्कुल अकेला हो गया था. वीरेंदर अपने ख़यालों से बाहर आता है जब वेटर बिल के लिए पूछता है. वीरेंदर ने बिल पे किया और दोनो होटेल से बाहर आ गये.
आशना: तुम मुझे किसी शॉपिंग माल मे ले चलोगे? मुझे अपनी फ्रेंड के लिए कुछ शॉपिंग करनी है. जब जाउन्गी तो मेरा दिमाग़ चाट देगी अगर उसके लिए कुछ ना लिया तो.
वीरेंदर: हां माल्स तो काफ़ी हैं, लेकिन यहाँ पास मे ही एक नया माल खुला है, मैं भी कभी नहीं गया, चलो वहीं चलते हैं.
आशना: तो चलो.
माल मे पहुँच कर आशना ने कुछ शॉपिंग की जिसकी पेमेंट वीरेंदर ने की. आशना ने अपनी फ्रेंड के लिए एक ड्रेस और वीरेंदर के लिए एक ब्लेज़र खरीदा. वीरेंदर से नज़रें बचा कर उसने दो सेट ब्रा-पैंटी के भी लिए. एक बार तो उसके मन मे आया कि वीरेंदर से पूछ लूँ कि एक सेट तुम्हें भी लेकर दे दूं ताकि तुमको चुराने की ज़रूरत ना पड़े लेकिन फिर उसने कुछ सोच कर यह ख़याल मन से झटक दिया. उसे लगा कि शायद माल मे वीरेंदर को शर्मिंदा करना ठीक नहीं होगा, पहले ही काफ़ी परेशान कर चुकी हूँ. आशना ने क्या क्या शॉपिंग की वीरेंदर ने भी नहीं देखा उसका ध्यान तो कहीं और ही था. आशना जानती थी कि वो उसके जाने को लेकर परेशान है. आशना ने सोचा घर पहुँच कर उसे सच बता देगी कि वो जल्द ही वापिस आ जाएगी. शॉपिंग के बाद आशना ने वीरेंदर को घर चलने के लिए बोला. जैसे ही आशना ने गाड़ी का पीछे का दरवाज़ा खोल कर समान रखना चाहा, वहाँ पड़े समान को देख कर हैरान रह गई.
आशना: यह किसका समान है.
वीरेंदर: घर के लिए थोड़ा समान लिया था अपने शोरुम से.
आशना: सब कुछ तो है तुम्हारे पास, फिर और समान की क्या ज़रूरत है.
वीरेंदर: "हां सब कुछ तो है मेरे पास" और यह कहकर गाड़ी मैं बैठ गया.
आशना ने महसूस किया कि वीरेंदर काफ़ी परेशन है, वो उसे और परेशान नहीं करना चाहती थी मगर वो उसे इतनी जल्दी बताना भी नहीं चाहती थी कि वो तो सिर्फ़ अपना समान लेने जा रही है.
आशना: अच्छा एक काम करो मेरे लिए बॅंगलॉर की कल शाम की टिकेट बुक करवा दो. वीरेंदर ने दुखी मन से फोन मिलाया और बॅंगलॉर की एक एरटिकिट बुक करवा दी.
आशना: एर-टिकेट क्यूँ करवाई, ट्रेन से जाती तो परसों सुबह आराम से पहुँच जाती.
वीरेंदर: ट्रेन मे रात के सफ़र से अच्छा है कि तुम फ्लाइट से जाओ. कल शाम 6:00 बजे की फ्लाइट है. अपनी फ्रेंड को कॉल करके बता देना कि तुम्हे टाइम पर रिसीव कर ले.
आशना: थॅंक यू.
वीरेंदर भारी मन से घर की ओर चल दिया. घर मे आते ही वीरेंदर गाड़ी पार्क करके गाड़ी से उतरा और सीधा अंदर की तरफ चल दिया. आशना ने अपना समान उठाया और वीरेंदर को आवाज़ देकर पूछा: आपका समान तो गाड़ी में ही रह गया.
वीरेंदर: रहने दो, अब इसकी कोई ज़रूरत नहीं है. आशना को वीरेंदर का जवाब बड़ा अजीब सा लगा.
उसने अपना समान लिया और घर के अंदर आ गई. अंदर आते ही उसने देखा कि वीरेंदर अपने रूम मे घुस रहा है. आशना ने सोचा कि वीरेंदर को थोड़ी देर अकेला छोड़ना ठीक रहेगा. आशना ने हाल मे समान रखा और किचन की तरफ चल दी जहाँ बिहारी दो ग्लासो मे ऑरेंज जूस डाल रह था.
बिहारी: आ गये बिटिया तुम दोनो.
आशना: जी काका.
बिहारी: छोटे मालिक को क्या हुआ, बड़े गंभीर लग रहे हैं.
आशना: शायद थक गये हैं, आप जाकर उन्हे जूस दे दीजिए.
बिहारी ने आशना को जूस का एक ग्लास पकड़ाते हुए कहा "जी बिटिया".
आशना ने बिहारी की तरफ देखा तो उसे देख कर बोली:काका, आपकी तबीयत तो ठीक है ना.
बिहारी आशना के इस सवाल से हड़बड़ा गया.
बिहारी: हां, हां बस थोडा थक गया हूँ बेटी.
आशना: आप आराम कीजिए, रात का खाना मैं बना लूँगी.