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अधूरी ख़्वाहिश

रात 11.55 पर पंकज और अभ्युदय जी आ चुके थे।उन्होंने मेरे फोन पर मिस्ड काल करना शुरू कर दिया।मैंने फोन लगाया और पंकज को कहा कि चाबी तो खिड़की पर ही रखी है और रिया छत पर है।

पंकज ने रिया को काल किया।रिया ने आकर गेट खोला और पंकज को गले लगा कर रोने लगी।

"क्या हुआ बर्थडे गर्ल?इरादा बदल लिया क्या तूने? शादी मैं कर नही पाऊंगा देख।सुन न 12 बजने वाले हैं।रिया सुन तो वो भाभी ने देखा तो फिर समंझ ले.."

रिया पंकज से अलग होकर रूम में आ गयी और सीधे भागकर वाशरूम चली गयी।

अभ्युदय जी और पंकज अंदर आ गए।

"इसे क्या हुआ?"

"क्या हुआ?"

"रो रही है।"

"रिया रो रही है?क्यों?क्या बोला तूने?"

"मैंने?लो जी यंहा एक लड़का सुबह शाम खिदमत मे खड़ा है और मैंने ही कुछ कहा।"

"निशी पंकज ने कुछ नही कहा।रिया अचानक ही रो पड़ी।उससे पूछना होगा क्या हुआ?"

"जी अभ्युदय जी।लेकिन उसके लिए तो.."

मैंने पंकज की तरफ देखा।

"है। मेरे पास इंतजाम है।"

"क्या इंतजाम?"

"एक वोडका का शॉट और बस।"

"नहीं पंकज।कल शादी है उसकी।ये सब ठीक नही।"

"लेकिन अभ्यु.."

"मैंने कहा न,जो सही नही है वो सही नही है।"

"बस बोल दिया अभ्युदय जी ने।निशी तू बात करेगी तो वो सब बताएगी।"

रिया बाहर आ गई।हम तीनों साथ मे गाने लगे

"हैप्पी बर्थडे टू यू, हैप्पी बर्थडे डिअर रिया,हैप्पी बर्थडे टू यू।"

"थैंक्यू, थैंक्यू,, थैंक्यू।"

रिया ने हम तीनों की तरफ थोड़ा झुककर और देखकर कहा।

"जल्दी आ।" मैंने कहा तो रिया झट से आकर गले लग गयी।पंकज को चैन कंहा था वो भी आकर हम दोनों में मिल गया।मैंने अपना चेहरा उठाकर अभ्युदय जी को देखा ओर सिर हिला कर पास आने कहा।वो भी आ गए और हम चारो एक साथ थे।

ये सुकून का पल था।ये एक साथ होने का पल था।कल रिया कंहा रहेगी अब हमारी।पराई हो जाना है उसे।

"बस करो यार,दबा डाला मुझे।बर्थडे के दिन ही मारोगे क्या?"

"रात.."

"क्या रात?"

"बर्थडे की रात रिया।"

"तू बड़े अक्ल वाली बात कह रहा है।वाह वाह।"

"चल न केक काटे।"

पंकज ने केक निकाला चाकू रिया को पकड़ाया और कैंडल जला दी।

"कोई भी विश मांगो रिया।" अभ्युदय जी बोले।

रिया ने आंखे बंद कर लीं।जब आंखे खोली तो फिर आंसू से भरी थी उसकी पलकें।

"क्या हुआ रिया?"

"उहनहु.. कुछ नही।"

"क्या उनहूँ.. बता ना रिया क्या हुआ?मुझे नहीं बताएगी?ठीक है मत बता।"

"प..पापा.. निशी पापा।"

"बस कर इधर आ।"

गले लगकर रिया फिर रो पड़ी।

"ये तो शादी होने के पहले ही पिन्नी हो गई है यार।पंकज,अभ्युदय जी,शादी कैंसिल कीजिये।हमें नही करवानी कोई शादी।अच्छी खासी बहादुर लड़की को रोतड़ि बना दिया।"

"अभ्युदय जी मैं भी वही बोल रहा था।कैंसिल कर दें सब।"

"पागल है क्या?कुछ कंसल नही होगा।मैं भी आख़िर अपने पापा की ही बेटी हूँ।"

"पक्का बता दो रिया।तुम्हारा रोना इस तरह हम तीनों से नही देखा जाएगा।"

"मैं चुप हो जाती हूँ अभ्युदय जी पर.."

"निशी देखा तेरी और मेरी कोई औकात नही।अभ्युदय जी ने कहा मान गई।"

"सही बोला पंकज तू।लाइफ में पहली बार।"

"मैं सही ही बोलता।तुझे गलत लगता, तो मैं क्या करूँ?"

हम सभी हंस पड़े।

"क्या बोलती है निशी?इसकी शादी कैंसिल करा दूँ?"

"कैसे?"

"कैसे क्या कैसे?कल अंकल को फोन और रवीश को बताना है कि मैं दिलों जान से चाहता हूँ इस झल्ली को।"

कहते हुए पंकज बस मुझे देखे जा रहा था।अंदर एक बेचैनी बढ़ रही थी।क्या हो रहा है मुझे?क्यों पंकज का अब देखना,घूरना या अपने प्यार का इजहार करना बुरा नहीं लगता मुझे?क्या हो गया है?ये अट्रैक्शन है उसकी बातों की वजह से या4 ?

"पागल मत बन निशी।बस कर सोचना।कल शादी है रिया की।"

मन में चलती बातों को रोक कर रिया को देखा और कहा चाय चाहिए?

केक खाने के बाद सबने चाय के लिए हामी भर दी।अभ्युदय जी के रहते केक की वेस्टेज बच गई थी।उन्होंने केक मुँह पर लगाने को साफ मना कर दिया था।जिसके बाद मैं और पंकज तो शरीफ बन बैठ गए।पर रिया खुद कंहा मानने वाली थी।उसने केक लिलार सबसे पहले अभ्युदय जी फिर पंकज फिर मुझे लगा दिया।

सभी ने टिश्यू से केक हटाया और चाय के लिए तैयार हो गए।

"मैं कैसे जाऊंगी?"

"जैसे मैं जाता हूँ निशी।"अभ्युदय जी बोले।

"पर..दर्द?"

"गोद में उठाकर लें चलें रानी साहिबा?"

"नहीं बिल्कुल नहीं।तुम दोनों चाय ले आओ।यंही पियेंगे चाय।"

पंकज और रिया चाय लेने चले गए।रूम पर अकेले मैं और अभ्युदय जी।चुप्पी को तोड़कर अभ्युदय जी बोले।

"क्या गिफ्ट देना है रिया को?"

"मैं पैसे दूंगी।अभी काम आएंगे दोनो के।"

"कितने?"

"5 हजार?या दस हजार?कितना दूँ?"

"10 देना लेकिन 5 मेरी तरफ से मिला कर।"

"क्यों?"

"आप 5 हजार अलग दे दीजिये।"

"वो दोनों लेंगे नही।मन्दिर में फीस बहुत ले लेते है,जो कि यंहा लगी नहीं। रवीश को पता है कि यंहा सब मेरी वजह से हो गया तो थोड़ा फ्रेंडली है।"

"हम्म..समंझ गई।"
 
पंकज और रिया को गए बहुत समय हो रहा था।1 बजने को था और दोनों अब तक वापिस नही आये थे।अभ्युदय जी ने पंकज को फोन मिलाया।

"हेलो।"

"कंहा रह गए पंकज?"

"ये रिया को चाय के साथ कुछ और भी चाहिए।"

"क्या?"

"बस पहुँच रहे हैं अभ्युदय जी।मदन-महल आ चुके हैं।"

"ठीक है।"

अभ्युदय जी ने बताया कि दोनों मदन महल पर पहुचें हैं।

"मदनमहल क्यों गए?"

"पता नहीं।रिया को कुछ खाना है।"

"अभ्युदय जी।"

"हाँ निशी।"

"कल सब ठीक हो जायेगा न?"

"तुम्हें भी डर लग रहा है?"

"पास आइए।"

अभ्युदय जी पास आये तो मैंने उन्हें जोर से पकड़ लिया।गले लगकर बस इतना ही कह पाई।

"अपने लिए नही,रिया के लिए।सब ठीक होगा न?"

"डरो मत पुच्चू।सब ठीक होगा।"

अभ्युदय जी ने माथे को चूमा ही था कि पंकज आ गया।

उसे समंझ नही आया कि वो ये देख कर क्या रियेक्ट करे।

उसने कुछ भी नही कहा बस घूर कर मुझे देखता रहा।

रिया भी अंदर आ गई।

"निशी देख।बस स्टैंड का पोहा।"

"क्या बात है रिया।जियो।ले आए जल्दी।वरना ठंडा हो जाएगा।"

"कल के बाद कब नसीब होगा पता नहीं।तो सोचा आज ही खा लिया जाए।"

"मैं निकलता हूँ।कल फिर काम हैं।तुम सब एन्जॉय करो।हैप्पी जन्मदिन रिया।खुश रहो हमेशा और ऐसी ही रहना।गिफ्ट तुम्हारा कल मिल जाएगा तुम्हें।"

"थैंक्यू अभ्युदय जी।"

रिया अभ्युदय जी के गले लग गई।दोनो का रिश्ता दोस्तों से ज्यादा था।आत्मीयता का रिश्ता बहुत बड़ा होता है।

"मैं आपको अभ्यु दादा बोल सकती हूँ क्या?या जीजू ही बोलूं?"

रिया ने मुझे आंख मारते हुए कहा।

"तुम्हारी मर्जी है रिया।मेरी कोई बहन नही है।"

"तब तो बढ़िया इसे भी तो परेशान करने कोई ननद मिलनी चाहिए न?"

पंकज के चेहरे पर बहुत गुस्सा था जिसे हम तीनों ही महसूस कर रहे थे।पर न पंकज कुछ बोल पा रहा था न हम में से कोई और।

अभ्युदय जी जाने को हुए तो उन्होंने पंकज को कल मिलने का कहकर गुड नाईट कहा।

पंकज ने गुड नाईट कहकर, अपना फोन हाथ मे निकल लिया।

अभ्युदय जी चले गए।

पोहे खत्म करके हम दोनों ने चाय पी।पंकज ने न कुछ खाया न चाय पी।बस गुस्से में ही बैठा था।

रिया ने पूछा कि अचानक क्या हुआ पर उसने कुछ भी नही कहा।

रिया का फोन बजा।

"रवीश जी।थैंक्यू सो मच" कहती रिया छत पर चली गई।

मैं चुप थी और पंकज भी।

"निशी।"

"हम्म.."

"प्यार करती हो न?"

"अभ्युदय जी को?हाँ।"

"अपनी मर्यादा भी जानती हो न?"

"पंकज फालतू की बातें न सोचना न करना।"

"नही सोच रहा पर.."

"पर क्या?"

"तुझे उनके साथ देखकर पूरे बदन में आग लग गई।आज से पहले कभी ऐसा हुआ नही।इतना दर्द भी नही हुआ कभी।पर आज जब वो इतने पास थे तुम्हारे तो लगा कि .."

"क्या लगा?"

"लगा कि किसी ने ऑक्सीजन ही गायब कर दी हो हर जगह से।घुटन सी हुई,ऐसी दर्दनाक तड़प।कहकर नही बता सकता।"

"तुम जैसे सोच रहे वैसा कुछ नही था।"

"जो भी था निशी।सही नही था।मेरी जगह भाभी भी हो सकती थीं।"

"हम्म.. समझ रही हूँ पंकज।"

"एक बात कहूँ?"

"तुम दो बोलो।"

"छोड़ो तुम.."

"बोलो.."

"नहीं छोड़ो।"

"बताओ न?मेरी कसम।"

"क्या है कसम-वसम?

"अब तो कह दिया बताओ पहले।"

"एक किस्सी करने दोगी हाथ पर अपने?"

"बात कुछ कहने की हो रही थी।"

"ओके।कोई बात नही"

"सॉरी।ये लो हाथ।"

"किस्सी कर लूं?

"हम्म.."

"पक्का?"

"नही कच्चा।"

"निशी अपनी लिमिट्स हमेशा याद रखना।ये उम्र के जिस पड़ाव में तुम हो न,लोग बहक जाते हैं।तुम अपना ख्याल रखोगी तभी चलेगा।वरना लड़के क्या चाहते हैं..।"

"पंकज बस करो।मैं भी जानती हूँ कुछ चीज़ें, और जिस शख्स के लिए तुम ऐसा सोच रहे हो वो कभी मुझे बहकने पर भी मेरा फायदा नही उठाएंगे।"

"भगवान करे ऐसा ही हो।अब मुझे जाना है।"

"तुम नाराज़ हो?"

"नहीं निशी, लेकिन तुम्हें अभ्युदय जी के इतने करीब देख कर दिल दुखी है।मुझे समंझ नही आया मेरी मोहब्बत में तो मैं क्लियर हूँ कि तुम मुझसे प्यार नहीं करती हो।फिर ये तुम्हारी नजदीकी से इतनी तकलीफ क्यों हुई नही जानता।"

"सॉरी पंकज।"

"छोड़ न ढूंढते रह गए इश्क की लकीर हम अपने हाँथ में। पता न था कि खुदा ने बस आधी लकीर बना छोड़ी है। थामेंगे तेरा हाथ तो शायद पूरी हो।आधी लकीर मेरे हाथों की खुदा ने तेरे हाथों में भेजी है।"

"पंकज ये तूने लिखा?"

"तुझे पसन्द आया?"

"बहुत।"

"प्यार,टूटा दिल क्या -क्या करवा देता है।"

"बता न?"

"हाँ मैंने लिखा।तुझे इम्प्रेस करने के लिए नही।अपने दिल की फीलिंग्स हैं।पर तुझे समंझ नही आएंगी।"

"माफ कर दे ना।तू पहले मिल जाता।तो शायद अभ्युदय जी से.."

"तब भी तुझे अभ्युदय जी से ही प्यार होता।क्योंकि तुझमें जो बात है वो तू खुद नही जानती।"

"क्या बात?"

"मैं जा रहा हूँ।बाय।कल मिलते हैं।"

"ओके गुड, नाईट।"

"हम्म.."

#
 
कल बहुत बड़ा दिन है।रिया के लिए भी और मेरे लिए भी।रिया की शादी।कल क्या होगा,कैसे होगा सब सोचते मैं कब सो गई नही जानती।रिया ने आकर करीब 2 बजे जगाया।

"निशी.."

"हम्म।"

"उठ न।देख कैसी है?"

"क्या?"

"उठ न.. मेंहदी देख।ठीक है?"

"तूने लगा ली?कहा था न मैं लगा दूंगी।"

"तो ये ले न।" रिया ने अपना दायां हाथ आगे कर दिया।मैंने रवीश रिया लिखकर मेंहदी शुरू कर दी।1 घण्टे की मेहनत के बाद रिया के दोनों हाथ भर गए।

रिया और मैं बातें करते कब सोए अंदाजा नही। सुबह नींद जब खुली तब रिया चुपचाप बैठी बाहर चिड़ियों को चावल खाते देख रही थी।

"रिया।"

"हम्म.."

"हैप्पी बर्थडे।"

"निशी।बहुत ही खतरनाक बर्थडे है ये।"

"चल ना अब खुश हो जा।मेंहदी दिखा अपनी पहले।रवीश का प्यार देखें पहले।"

"अभी पापा का फोन आया था।"

"क्या?क्या बोला तूने?"

"मैंने कुछ भी नहीं।बोल दिया करा दो शादी वरना भाग कर कर लूंगी शादी।"

"क्या?"

"हाँ बोल दिया।सुनते ही नहीं।"

"और कुछ तो नही बोल दिया न?"

"नहीं।और कुछ नही बोला।चाय पीयेगी?"

"हाँ जल्दी।क्योंकि अभी वेदी आती होगी।तुझे फिर पार्लर जाना है।"

"क्या यार तू नही चलेगी क्या?"

"मैं क्यों नही चलूंगी?"

"मैं भी चलूंगी।आज तो मैं भी सजूंगी।मेरे यार की शादी है।"

"कितना अच्छा होता ना मैं लड़का होती तू लड़की?शादी कर लेते।"

"चल भग मैं नही करती तुझसे शादी।"

"अच्छा क्यों?क्या कमी है मुझमे?"

"तू मेरे टाइप की नही होती।लोफर होती एक नम्बर की।"

"कमीनी।लेकिन तू तो मेरे ही टाइप की ही होती।मैं तो तुझे ही पटाती।"

"जा,जा..चाय बना जा।"

रिया चाय बनाने गई ही थी और पंकज भी आ गया।

"गुड मॉर्निंग जानेमन।"

"गुड मॉर्निंग, जाने.. क्या?"

"बोल न बोल।"

"हट।तू सुबह-सुबह कैसे आ गया?"

"बस सोचा रिया के हाथ की चाय पी लूं आखिरी बार।"

"शादी कर रही हूं।मर नही रही।आया बड़ा आखिरी बार।"

रिया अंदर से चिल्लाई।

"तेरी चाय बड़ी मेंहगी पड़ेगी बे।दिल्ली आना पड़ेगा पीने।"

"हाँ पंकज ये तो मैंने भी नही सोचा।"

"तू तो रहने दे,तू सोचती नही वही अच्छा है।"

"ऐसा क्यों बोला तूने?"

"बस ऐसे ही।वैसे एक बात बताऊँ?"

"बता।"

"मेरे लिए भी रिश्ते आ रहे हैं आजकल।"

"क्या?तू भी शादी कर रहा है?"

"नहीं।मैं तो तुझसे शादी करूँगा।"

"हाँ पंकज तू और निशी शादी करके दिल्ली ही आ जाना।चाय भी मेंहगी नही पड़ेगी।"

रिया बोलते हुए,चाय लेकर आई।

हम तीनों ने बैठकर चाय पी।बीच-बीच में रिया पंकज की खिंचाई शुरू थी।

चाय पीकर बैठे ही थे कि रिया का फोन फिर बज उठा।

"पापा?"

"हाँ पापा।कब आज?मैं तो मंडला निकल रही हूँ।कैम्प के लिए।आप चाबी ले लेना जैन आंटी से।मुझे देर हो रही है।बाय।"

रिया अचानक बहुत टेंशन में आ गई थी।

फिर फोन बजा।

"हेलो।तुम पहुच गए?अब जल्दी करना पड़ेगा सब।पापा आ रहे हैं आज।"

रिया बिना कुछ बताए ही फिर बाहर निकल गई।

पंकज ने अभ्युदय जी को फोन मिलाया।पंकज भी बाहर खड़ा हो गया।

अब क्या हुआ?रिया के पापा क्यों आ रहे हैं?क्या रिया ने आज जो उन्हें कहा उससे डर गए हैं वो?कंही रिया तो कुछ नही छिपा रही?उफ्फ ये सिर दर्द।
 
अंकल का इस तरह आना, हम सभी के प्लान पर पानी फेरने सा है।कंही उन्हें भनक तो नही लग गई शादी की?कंही उनको किसी ने बता तो नही दिया न?

सोच-सोच कर दिमाग फटने को था कि वेदी आ गई।

"हेलो।"

"हाय वेदी।"

"कंहा है हमारी दुल्हनिया?"

"आ रही है बैठो।"

"टाइम नही है अब।तुम भी चलो।"

"मैं नही जा पाऊंगी।तुम और रिया निकल जाओ।"

"क्यों?तुम्हें रेडी नही होना?तुम्हारी बेस्ट फ्रेंड की शादी है।"

"हाँ बाबा।जानती हूँ पर अभी नही।मैं खुद हो जाऊंगी तैयार।"

"तो तुम्हारी ड्रेस यंही रखनी है।"

"हाँ यंही रखवा दो।"

"ठीक है।अभ्यु ने बताया और चॉइस किया है।"

"अच्छा।फिर तो मुझे भी पसन्द आएगा ही।यंही रखवा दो आ.. नहीं तुम।"

"रिया कंहा है?"

रिया छत से नीचे आई।उसके चेहरे की हवाइयां उड़ी हुई थी।

"क्या बात है रिया।फेसिअल का असर है पूरा।चमक रही है गोरी फक लग रही है।वैसे हैप्पी बर्थडे।"

"निशी, पापा आज आ रहे हैं।मेरे जन्मदिन पर एक और लड़के को दिखाने।मैंने बोल दिया है कि शादी कर रही हूँ मैं रवीश से।"

"क्या?क्या बकवास कर रही है?अंकल को बता दिया?अब?"

"क्या अब?देख नहीं रही अभी भी,उन्हें अपनी बेटी या अपनी नही पड़ी बल्कि अपने बड़े भाई की ही पड़ी है।"

"लेकिन ये क्यों बताया कि शादी?"

"अब जो होगा देखा जायेगा।रवीश एक घंटे में पहुच जाएगा।अब सीधे शादी।"

"तो चले बर्थडे गर्ल?"

"हाँ वेदी।थैंक्यू सॉरी वो थोड़ा।"

"कोई बात नही।टेंशन मत लो।"

"निशी तू?"

"मैं नही जाऊंगी।तू जा जल्दी तैयार हो।मैं पहुँचती हूँ।"

रिया और वेदी निकल गए।मैंने अपनी ड्रेस का पैकेट उठाया तो देखा रेड कलर में बहुत प्यारा लांचा था।गोल्डन लेस के साथ बहुत ही प्यारा लुक लिए।हल्का भी था शायद मुझे दिक्कत न हो इसलिए बिल्कुल सॉफ्ट कपड़े का बना लांचा।वो शिफ्फोन से ऊपर सॉफ्ट वाला चिनोन्न का।

मैं फ्रेम लेकर अपने चेहरे को धोकर आ गई।पंकज अब भी फोन पर था।अंदर रूम में कपड़े बदल कर तैयार हो जाना चाहिए सोचकर मैं चली गई।लांचा तो पहन लिया पर ये चोली?

चोली में पीछे हुक?अब क्या करूँ?

पंकज अंदर आया।

"निशी।"

"अंदर नही आना।"

"ओके।सुन मैं जा रहा हूँ,अभ्युदय जी अभी पहुचेंगे 15 मिनट में तेरे पास तू तैयार रहना।"

"पंकज सुन।"

"हाँ बोल?लेकिन जल्दी।अब टाइम नही है।"

"ऑन्टी को भेज दे मुझे ड्रेस पहनने में दिक्कत हो रही है।"

"ओके।रुक।"

पंकज बाहर चला गया।पंकज के साथ डर नही लगता।शायद विश्वास चीज़ ही ऐसी होती है।

"निशी।"

"हाँ।"

"भाभी नही हैं।ताला लगा है।"

"शीट।अब?"

"हुआ क्या?मैं कुछ हेल्प करु?"

"नहीं।तू जा।लेकिन फिर मैं।"

"हुआ क्या वो बता?"

"ये चोली में हुक पीछे हैं।कैसे लगाऊं?"

"तुझे भरोसा है मुझपर?"

"मैं कर लुंगी पंकज।तू जा।"

"भरोसा नही?"

"अरे ऐसा नही है। मैं मैनेज कर लूंगी सच।"

पंकज अंदर आ गया।

"तू अपनी आंखे बंद कर।"

"पंकज जा मैं कर लूंगी।"

"दो मिनट।"

पंकज मेरे पीछे आया।चोली को पकड़ा और हुक लगाने लगा।

ये कैसी छुअन थी? शर्म भी थी पर मैंने आंखे बंद कर लीं।दिल की धड़कन बढ़ गई थी।पंकज के हाथ मेरे शरीर को छू रहे थे।

पंकज की सांस मेरी गर्दन पर महसूस हो रही थीं।

पंकज ने चार-पांच जितने भी हुक़ थे बन्द किये और जाने लगा।

"हो गया निशी।अब मैं जा रहा हूँ।और सुनो बाल खुले ही रखना।इस चोली का गला ठीक नही है।"

"ठीक नही है मतलब?"

"पता नहीं।ज्यादा नही पता।बस इतना जनता हूँ कि अच्छा नही है।चलो बाय।कुछ और मदद तो नही चाहिए?"

"नही मैं तैयार हो जाउंगी।"

"पकक्का?"

"हाँ जी।"

"ठीक है मैं वंही मिलूंगा।"

"बाय पंकज। थैंक्यू।"

"तुम्हें लाल रंग पसन्द है?"

"लड़कियों पर हाँ।"

"मैं तुम्हारा पसंदीदा रंग पूछ रहा हूँ।"

"मुझे नीला,काला, लाल,हरा सब रंग पसन्द हैं।अब सफेद भी।"

"अब सफेद?"

"तुम्हे देर नही हो रही?"

"हो रही है, पर क्या करूँ ये दिल है कि मानता नही।"

"जाओ।बाय।"

पंकज चला गया पर मुझे एक बेचैनी ने घेर लिया था।

अंकल ने आकर शादी नही होने दी तो?

मेरा फोन बजा।

"हाँ रिया।"

"सुन तेरे पास फोन आएगा पापा का तो बोलना की मंडला गई हूं मैं।"

"और मैं?"

"तू तो टूटी हुई है न?"

"नालायक।"

"सुन मेरी लायक।पापा को बिल्कुल पता नही लगना चाहिए कि तू मिली हुई है।वरना अपनी दोस्ती चूल्हे में जाएगी।"

"ओके।तो करना क्या है?"

"ज्यादा तैयार नही,तू नॉर्मल रहना,पापा कभी भी तुझसे मिलने आ सकते हैं।"

"ओके समंझ गई।"

मैंने काजल लगा कर,हल्की सी लिपस्टिक लगाई।बिंदी,कुमकुम और दुप्पटा लेकर बैठ गई।अभ्युदय जी को आने में समय लग रहा था।मैंने फोन किया।

"अभ्युदय जी कंहा हैं आप?"

"बस पहुच गया रूम के सामने।आ जाओ।"

मैंने फोन कट करके अपने आप को एक बार आईने में देखा और ताला चाबी लेकर फ्रेम को पकड़ कर आ गई बाहर तक।

अभ्युदय जी भी अंदर आ ही गए थे।उनके हाथ मे एक पेपर पैकेट था।

"ये क्या पहना है निशी?"

"वेदी ने कहा आपकीं पसन्द है।"

"तुम जल्दी अंदर चलो।"

"क्या हुआ?"

"चलो तो।फिर बताता हूँ।"

मैं और अभ्युदय जी अंदर आ गए।

"ये ड्रेस पहनो और आ जाओ।"

"क्यों?ये भी तो अच्छी है।"

"जितना बोला करो न निशी।"

"अरे पर इसमें खराबी क्या है?"

"निशी 10 मिनट हैं तुम्हारे पास।जाओ चेंज करो।"

"मैं नही कर सकती।मैं यही पहनूँगी बस।"

"रिया के पापा तुमसे जरूर मिलने को कहेंगे।अभी बहुत सी चीज़ों के बारे में सोचना बाकी है।जाओ जाकर चेंज करो।"

"मैं.. वो मेरी ड्रेस की चेन...नही बनेगी मुझसे खोलते।"

"ओह तो ऐसे कहो न।पलटो,हम्म जाओ अब।"

अभ्युदय जी ने चेन खोल दी।मैंने बिना पलटे ही सीधे अंदर चली गई।पैकेट खोला तो पीकॉक ब्लू कलर की लांग कुर्ती थी।मैंने फुर्ती से चेंज किया और बाहर आ गई।

"कैसी लग रही हूँ अब?"

"एक दम मोरनी।अब चलें?"

"जी।"

अभ्युदय जी ने पंकज को फोन किया।पंकज मन्दिर पहुँच चुका था।रवीश को ले कर उसे तैयार होने भेज दिया गया था।10.30 बजे हम सभी मन्दिर पहुँच गए थे सिवाय रिया और वेदी के।

"पंकज फोन करो रिया को।"

"फोन लगाया अभ्युदय जी।फोन उठाया नही उसने।"

"रवीश?"

"मेरा फोन भी नहीं उठा।"

"निशी फोन लगाओ।"

"जी।"

मैंने जैसे ही रिया को फोन लगाने को फोन उठाया।फोन बज उठा।

"अंकल?"
 
"फोन उठाओ निशी।" अभ्युदय जी बोले।

"हम्म।

हेलो।नमस्ते अंकल।"

"नमस्ते निशी बेटा कंहा हो?"

"अंकल मैं तो हॉस्पिटल में।"

"किस हॉस्पिटल?"

"मतलब,मेडिकल में हूँ।"

"रिया ने कहा कि मंडला जाना है।मिलेगी भी नही हमसे।"

"आपसे?आप कंहा हैं अंकल?"

"हम बस एक घंटे में पहुच रहे हैं।"

"अच्छा।अंकल मेरे पैर में फ्रैक्चर है इसलिए मैं जा नही पा रही मंडला।ये सब अभी 15 मिनट में निकल जाएंगे।"

"बात करवाओ जरा रिया से।फोन ही नही उठा रही है।सुबह बहुत नाराज थी,अजीब-अजीब बातें कर रही थी।"

"क्या हुआ अंकल?क्या कहा रिया ने?अभी तो वो लोग HOD सर के रूम में हैं।इसलिए नही उठा रही होगी।मैं डिपार्टमेंट में हूँ।"

"अच्छा।ध्यान रखना बेटा उसका। हो सके तो जाने मत देना मंडला।"

"जी मैं कोशिश करूँगी अंकल।पर कंपलसरी है जाना।मेरे तो पैर की वजह से सर ने मना कर दिया।"

"कोशिश करना।हो पाए तो।"

"ठीक है अंकल आप आ जाईये।"

अंकल ने फोन रख दिया।

, मैंने रिया को फिर फोन मिलाया।

"पीछे पलट।"

रिया बिल्कुल रहना है तेरे दिल में की दिया मिर्जा लग रही थी।

"तू इतनी सुंदर है?पता नही था,वरना पट जाती तुझसे।"

"कैसी लग रही हूँ?"

"एक दम राजकुमारी।"

"सच्ची?"

"नही झूठ।अब जल्दी चलें।अंकल एक घंटे में पहुच जाएंगे।"

हम सभी मन्दिर में अंदर आ गए।रवीश भी पंकज के साथ आ गया था।रवीश के साथ उसके 2 दोस्त भी थे।

पंकज ने रिया को देखते ही कहा

"देख लो रवीश, रिया का मेकअप उतारा तो पहचान लोगे न?"

"बकवास बन्द कर अपनी।"

"अब पक्का हो गया अपनी ही रिया है।"

मंदिर में पहले कुछ फॉर्मेलिटी हुई जिसमें दोनों की तरफ से दो लोगों को साक्षात्कार बनना था।

रवीश के दोनों दोस्त औऱ यंहा पंकज,अभ्युदय जी।

वेदी और मुझे मना कर दिया गया अपना आई डी कार्ड देने से।

फॉर्म वगैरह की फॉर्मेलिटी के बाद मंदिर के अंदर जंहा हवन कुंड था ,वंहा दोनो को बैठाया गया।

गांठ जोड़ने से लेकर, मांग भरवाना, बिछुये पहनना सभी रस्में बहुत ही सलीके से सम्पन्न हो गईं।

रवीश बहुत प्यारा मंगलसूत्र बनवा कर लाया था।जय माल से लेकर हर रस्म की फोटोज भी बकायदा खिंचती गई।रवीश के जूते चुराना और पैसे मांगने में भी मैंने और पंकज ने बिल्कुल कंजूसी नही की।हां रवीश ने थोड़ा कंजूसी दिखाई और हमें सिर्फ 5 हजार में टरका दिया।

समय की पावंदी नही होती तो ये बोली 5 हजार पर कभी भी नही रुकती।वेदी बीच शादी में ही जा चुकी थी।उसकी बेटी की तबियत खराब हो गई थी तो।

एक घण्टे में सब कुछ हो चुका था।शांति से,बिना किसी रुकावट।हम सभी अरिहंत पर आ चुके थे।सबको जोरो की भूख भी लगी थी।खाना खाना शुरू ही किया था कि रिया का फोन बज उठा।

"पापा।"

"उठा ले फोन।बोल देना की मंडला के लिए निकल गई है।"

"नहीं मुझे बात नहीं करनी।"

"रिया।फोन उठाकर पापा को बोलो कि तुमने शादी कर ली है।"

"ये क्या मजाक है अभ्युदय जी?"

मुझे अभ्युदय जी की बात बचकानी लगी।

हमारी इतनी बातों के बीच रिया का फोन बज कर बन्द भी हो गया।

लेकिन एक मिनिट भी नही हुआ औऱ अंकल का फोन मेरे फोन पर आ गया।

"जी अंकल आ गए आप?"

"हाँ बेटा घर पहुच गए हैं।कब तब आओगी तुम?"

"अंकल मेरे पैर में।मैं पंकज को कहती हूँ वो फ्री हुआ तो उसके साथ आ जाती हूँ।"

"हम आ जाएं?मेडिकल में हो न?"

"नहीं अंकल हम आते हैं ।आप परेशान मत होइए।"

फोन रखा तो सब मुझे ही देख रहे थे।

"चलो अब।"

"अच्छा तो तू इसलिए तैयार भी नही हुई?"

"हम्म..अभ्युदय जी को अंदाजा था।उन्होंने ही चेंज करवा दी ड्रेस।"

पंकज ने मुझे देखकर फिर मुँह बना लिया।उसे पता था कि ड्रेस चेंज कराने का मतलब करीब आना था।

चेन खोलने के लिए।वो गुस्से में तमतमाया लग रहा था।पर कुछ कह नही रहा था।

"तुम दोनों जल्दी मिलकर आ जाओ।तब तक इन्हें भी कुछ देर के लिए अकेला छोड़ देते हैं।"

"लेकिन अभ्युदय जी मैं बाइक पर?"

"मैं मालवीय चौक पर उतर जाऊंगा कुछ काम है।पंकज और तुम जाकर आ जाना।"

"ठीक है।"

पंकज का गुस्सा तो सातवें आसमान पर था।

"आप इसे गाड़ी से ही भेज दीजिये अकेले।मैं जाकर क्या करूँगा?"

"तुम दोनों का अंकल से मिलना जरूरी है।ताकि उन्हें तुम दोनों पर शक न हो।"

"हम्म..अभ्युदय जी सही कह रहे हैं।"

"तू चुप हो जा।अभ्युदय जी की पूछ।"

"पंकज,चलें?लड़ने से ज्यादा जरूरी है अभी कुछ और।"

"जी।पर इसे कहिये मुझसे बात न करे।"

"निशी।"

"अरे हद है।क्यों?"

"वंहा जाकर कोई भी हरकत मत पटकना।खास कर तुम निशी।"

"म..मैं क्यों करूँगी कुछ?"

"तुम करती नही हो।हो जाता है।इसलिए और सुनो मेरा नम्बर किसी प्रोफेसर के नाम से सेव कर दो।"

"ये क्यों?क्योंकि अब मुसीबत आनी है।"

"बस जाओ और झेलो।मुझे फोन करना रिया को नही।ओके?"

"यस ओके।"

मैं औऱ पंकज अभ्युदय जी को मालवीय चौक पर छोड़ कर लेबर चौक रिया के घर की तरफ निकल गए।ड्राइवर भैया गाड़ी चला रहे थे।

पंकज अभी भी गुस्से में ही बैठा था।

"तुझे क्या हो जाता है?"

"निशी, बात मत कर प्लीज्।"

"पंकज बात नही करनी मत कर।एक बात बता दूँ लेकिन कि तू जैसा सोच रहा है वैसा कुछ है नही।"

"क्या नही है?अभ्युदय जी होंगे महान कि उन्हें तुझे मेरे साथ होने पर दिक्कत नही होती।पर मैं इंसान हूँ, चाहता हूँ।मैं नही देख पाता तुम्हें उनके साथ।मैं बहुत कोशिश करता हूँ कि नॉर्मल रहूँ पर ये गुस्सा क्यों आ रहा है मुझे।"

पंकज ने कहते हुए अपना हाथ गाड़ी पर ही दे मारा।

ड्राइवर ने कार रोकी और पंकज को कहा।

"सर मैं पानी ले आऊं?"

पंकज ने कुछ भी नही कहा।मैंने उन्हें हाँ बोलकर भेज दिया।

"पंकज एक लड़की हूँ और समंझ रही हूँ कि तुम क्या किस हद तक सोच रहे हो।अभ्युदय जी मुझे अच्छी तरह समझते हैं इसलिए उन्हें दिक्कत नही होती।तुम अभी न मुझे समझते हो,न जानते हो।तुमने कपड़े बदलने पर सोच लिया कि अभ्युदय जी ने मेरी कपड़े बदलवाने में मदद की और उस सोच ने तुम्हें कितना गिरा सोचने पर मजबूर कर दिया।"

"नहीं निशी।"

"अब मुझे बोल लेने दो।तुमने भी तो मदद की थी?मैं तुम्हारे साथ हम बिस्तर हो गई थी क्या?या तुम्हारे साथ हद पार कर गई।तुमने ही तो मेरी ड्रेस की चेन बन्द की थी न?तब तुम्हारे दिमाग में गलत विचार रहे होंगे शायद,तभी तुम्हे अभ्युदय जी का चेन खोलना गलत लग रहा है।इस हद तक गलत कि तुम बेवजह ही गुस्सा दिखा रहे हो।"

"लीजिये दीदी पानी।"

ड्राइवर भैया ने पानी दिया।मैंने चुप होकर बोटल खोली और पानी पिया।

"चलें दीदी?"

"हाँ भैया जल्दी।"

मैंने पानी पंकज को दिया उसने बस बोतल पकड़ ली पानी नही पिया।न ही उसने कुछ कहा।मुँह पर ताला लगा कर बैठ गया अगले 5 मिनट तक। हम रिया के घर पहुच गए थे।

सीढ़िया चढ़ने में दिक्कत होनी थी अब।
 
"चल हाथ पकड़ ले अब।"

"नहीं पकड़ना।पता नही अब तू क्या सोच लेगा।मैं तुझसे प्यार नही करती पंकज।"

"जानता हूँ या... नही यार नही।जानता हूँ निशी।माफ कर दे अब।"

"नहीं करना मुझे माफ़।ये प्यार है तेरा?भरोसे नाम का कुछ होता है प्यार या दोस्ती में?"

"माफ कर दे न?मैंने इतना नही सोचा जितना तूने लेक्चर दिया।सच में।माँ कसम।"

"बकवास बन्द बिल्कुल।अब माँ को लाने की जरूरत नही है बीच मे।चल लेकर वरना अंकल आ जाएंगे।"

हम दोनों ऊपर आ गए।अंकल के चेहरे पर अजीब सी बेचैनी थी।

"नमस्ते अंकल।"

"क्या हुआ निशी?ये कब हुआ?"

"मैं ठीक हूँ अब अंकल।"

"अरे पर बताना था न मैं ही आ जाता तुम्हारे घर।सीढियां चढ़ने में दिक्कत हुई होगी।"

"ये था न शेर अपना।"

"कैसे हो पंकज?"

"एक दम पहले जैसा अंकल।आप कैसे हैं?अपनी हीरोइन कंहा है?आज बर्थडे है और फोन भी नही उठाया नालायक ने।"

"रिया ने शादी कर ली है बेटा।रवीश से।"

"क्या??"

मैं और पंकज साथ ही बोले।हम दोनों टेंशन में थे कि अंकल को , कैसे पता?

"तुमने मुझसे झूठ कहा था न निशी,कि रिया मंडला जा रही है?"

"नहीं अंकल आज सुबह ही उसने कहा।मैं कॉलेज गई नही थी।"

"लेकिन तुमने तो कहा कि तुम डिपार्टमेंट में हो और रिया hod के रूम में।"

"अंकल मैं तो गई नही थी पर सोचा कि आप परेशान हैं इसलिए कह दिया था झूठ।सॉरी।पर शादी?ये कैसे मुमकिन है?"

"ये देखो।"

रिया ने खुद ही उसकी और रवीश की फ़ोटो अपने पापा को भेजी थी।इसको भी न अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने की पड़ी होती है।

"ये?ये कंहा की फ़ोटो है?कब की है?क्या सच में शादी कर ली उसने?मुझे भी नही बताया?"

चेहरा बहुत रुआंसा बना लिया मैंने।एक्टिंग ज्यादा करनी नही पड़ी क्योंकि पैर में दर्द इतना था कि सब ओरिजिनल ही लगा।

"शायद दिल्ली में है रिया रवीश के साथ।"

"आपको कैसे पता अंकल?" पंकज ने पूछा।

"बेटा कल ही बोल रही थी भाग के कर लुंगी शादी।तुमसे कब से नही मिली रिया, निशी?"

"दो दिन हो गए अंकल।"

"देखा दिल्ली जाकर ही।फोन मिलाओ उसको।बोलो कि उसके पापा को हार्ट अटैक हुआ है।"

"ठीक है अंकल।"

मैंने रिया को फोन मिलाया पर प्लान के मुताबिक उसे फोन उठाना ही नही था।

फोन नही उठा रही अंकल।जब तक काल करना कराना चला तब तक पंकज रिया को मैसेज डाल चुका था।

"तेरे पापा तेरे से भी 10 कदम आगे हैं।बोल रहे कि रिया को बोलो हार्ट अटैक आ गया।शाबास।"

अंकल का चेहरा एक दम मुरझा गया था

"अंकल आजकल फोटोशॉप भी होता है।क्या पता मजाक कर रही हो आपसे?"

"रिया को मुझसे अच्छा कोई नही जानता।वो ऐसी चीज़ों को लेकर कभी भी मज़ाक नही करेगी।"

"ये भी बात सही है आपकीं।फिर क्या करें?"

"रवीश को फोन मिलाओ।"

"नम्बर दीजिये अंकल।"

अंकल ने नम्बर दिया।मैने अपने फोन से रवीश को फोन मिलाया।

"हेलो।"

"रवीश?"

"जी।"

"रिया से बात हो सकती है?"

"आप कौन?"

"मैं उसकी दोस्त।"

"उसकी दोस्त?"

"जी निशी।"

"अच्छा निशी, जो हमें तब मिलीं थीं जब हम रिया को देखने आए थे।"

"जी।"

"आप आईं नही?"

"कंहा?"

"शादी पर?"

"आपने बुलाया नही?डर गए लगता है आप ठाकुर हैं हम ये जानकर।"

"नहीं ऐसा नहीं है।"

"तो बताया क्यों नहीं?बात कराइये उस नालायक से।"

"अच्छे से बात कीजिये।गलत तरीके से नही।"

"रवीश आपके साथ है क्या रिया?"

"जी मेरे साथ है और अब मेरी बीवी है।तो उसे नालायक बोलने का हक अब सिर्फ मुझे है।"

फोन स्पीकर पर सुन रही रिया तो हंस रही होगी पर मुझे यंहा एक्टिंग में कितनी मेहनत करनी पड़ रही थी।

अंकल तो सिर पकड़ कर बैठ गए।एक पल को लगा कि सच में उन्हें हार्ट अटैक ही न हो गया हो।

"अंकल आप ठीक हैं न?"

"क्या??क्या हुआ पापा को?"

"रिया,तू कंहा है?क्या नाटक चल रहा है?क्यों परेशान कर रही है सबको?"

"पापा ठीक हैं न?निशी तू नहीं जानती पापा कितना कुछ सह रहे हैं।उनके बड़े भाई होंगे वो पर उनका ऐसा दोगला सलूक नही बर्दाश्त होता मुझसे।अपनी बेटी की शादी खुद से छोटे पंडितों में की तब कोई हंगामा नहीं।लेकिन भाई की बेटी सुखी होगी तो दिक्कत।पापा को भी रवीश पसन्द थे पर ताऊ जी,ताऊ जी।मैंने वो किया जो मेरे पापा और मेरी पसन्द है।"

"रिया तू है कंहा?मुझे तो बता देती।"

"तुझे? चमची एक नम्बर की। एक दिन क्या एक सेकंड नही लगाती तू,पापा को बताने में।"

"रिया तू कंहा है?"

"मैं जंहा भी हूँ ठीक हूँ।पापा का ख्याल रखना।सुन,पापा को कहना जब मेरी शादी के लिए तैयार हो जाएंगे तब काल करेंगे।मैं आ जाऊंगी।"

"लेकिन रिया सुन तो।"

"बाय निशी, अपना ख्याल रखना।बाय पापा।"

अंकल ने रिया से बिल्कुल भी बात नही की।

उठकर गए और मुँह धोकर आ गए।

"चाय के लिए दूध ले आओ पंकज।"अंकल बोले।

पंकज उठकर चला गया।

"मुझे लगता है ये पंकज मिला हुआ है।इसे सब पटाता रिया का भागना और शादी का।"

"कैसे अंकल?"

"बस लग रहा है ऐसा। अंतरआत्मा की आवाज़ हो जैसे।"

"अभी कान पकड़ कर पूछते हैं आने दीजिये।"

"अरे नहीं।उसको मत बोलो कुछ अब तो हो गया जो होना है।बस जानते हैं हम ये जरूर मिला हुआ है।"

पंकज के आने पर अंकल और पंकज किचिन में चाय बना रहे थे।

"हमें तो लगता निशी भी मिली हुई है।"

"कैसे अंकल?किससे?"

"रिया की शादी का,सब पता था उसे पर उन्होंने बताया नही।

"कैसे अंकल?"

"अंतरात्मा की आवाज़।"
 
चाय बना कर हम तीनों साथ में पी रहे थे कि ड्राइवर भैया आये।

"दीदी अभ्यु भैया ने बुलाया है।मैं जाऊं क्या?"

"हाँ आप ले आइये उन्हें।हम यंही है तब तक।"

मैंने फोन निकाला तो अभ्युदय जी के मिस्ड काल थे।

"हेलो।"

"फोन रखती क्यों हो गर उठाना नही होता?"

"सॉरी वो.."

"कितनी देर?"

"अभी बस चाय पी रहे हैं।रिया ने शादी कर ली है।वो अभी दिल्ली में है।"

"अच्छा।चलो मैं आता हूँ।पहुच कर बात करते हैं।"

मैं और पंकज एक दूसरे को देख कर मुस्कुरा रहे थे।शायद मेरे और उसके दोनों के मन में एक ही बात चल रही थी।मैं सोच रही थी कैसा पागल है अंकल को शक है इस पर।वो भी यही सोच रहा होगा शायद।

"अब क्या करना है अंकल?"

"रिया को वापिस बुलाना है और जल्द से जल्द उसकी शादी करवा देना है।"

"लेकिन रवीश से तो शादी हो गई है उसकी फिर?"

"किसे पता?कौन गया था?जब कोई सबूत ही नही होगा तो कौन मानेगा इस शादी को?"

"लेकिन फ़ोटो तो भेजी है उसने अंकल?" पंकज से भी रहा नही गया।

, "कौन मानता इन फ़ोटो को?वैसे भी अभी निशी बिटिया ने बताया कि फोटोशॉप भी होता है आजकल।है न बिटिया?"

"जी अंकल।होता तो है पर वो रवीश वकील है।उसने क्या ऐसे ही बिना सबूत के शादी की होगी?मेरा मतलब है कि उसने शादी रजिस्टर करा ली होगी तो?"

"इतनी जल्दी नही होते ये सब काम।पंकज कितना टाइम लगता है?"

"अगर आज शादी की है तो कम से कम 2 से 3 दिन तो लगेंगे न?"

"हम्म।लेकिन हम सारे सबूत ही मिटा देंगे।"

"सही कह रहे हैं अंकल।बेटी है ऐसे कैसे किसी से भी शादी करवा देंगे?लेकिन रवीश का रिश्ता भी तो आप ही लाये थे न अंकल?"

"लाया था पर।बड़ो का सम्मान रखना भी जरूरी है।"

"ऐसा कैसा सम्मान अंकल?" पंकज ने अंकल पर प्रश्न दागा।

"बड़ो की बातें मानना ही उनका सम्मान करना होता है।हम सभी बड़ो की बातें मान कर ही बड़े हुए हैं।"

"पर अंकल ऐसा सम्भव नही है न कि आप सारे सबूत मिटा कर उसकी शादी दुबारा करवाएंगे।"

"तुम दोनों सुन लो।जानता हूँ तुम दोनों मिले हो उसकी शादी में।वंहा जाकर मिले हो या यंहा से सपोर्ट किया हो।लेकिन मैं भी पिता हूँ उसका।ऐसे नही झुकूंगा उसकी जिद के सामने।"

"मतलब?"

"मतलब ये कि जंहा मैं चाहूंगा वंहा शादी होगी उसकी।बता देना उसे।"

"फिर तो वो कभी नही आएगी अंकल।मुझे लगा था आप बहुत समझदार हैं।पर रिया सही थी।अच्छा किया उसने शादी करली और आपको या मुझे किसी को भी नही बताया।क्योंकि अगर बताती तो न आप न मैं।उसे ऐसे शादी नही करने देते।"

इस डायलॉग का असर थोड़ा ज्यादा हुआ।अंकल एकदम शांत हो गए।मुझे तो क्लीन चिट मिल गई कि मैं इस प्लान में शामिल नही हूँ।

पंकज थोड़ी देर शांत रहा फिर बोला।

"अंकल कैसे और किन बड़ो की बातें कर रहे हैं आप?रिश्ता आप लाये, लड़का पसन्द आपने किया लेकिन सिर्फ अपने बड़े भाई के सामने आप बड़े लोग में शादी न कर पाएं तो अब शादी नही।गलत है,मैं भी यही कहूंगा तब तो कि ठीक किया रिया ने।बस नालायक ने एक बार बता दिया होता तो बर्थडे की पार्टी पहले ले लेता।"

अंकल को शायद अब हम दोनों पर से शक हट गया हो।लेकिन इन बड़ो का कोई भरोसा भी तो नही होता।ऐ
 
ड्राइवर भैया आ गए।

"दीदी गाड़ी ले आया हूँ।अब चलें?"

"अंकल अब जाना होगा।निकलते हैं रिया से बात कीजिएगा लेकिन उस पर गुस्सा मत कीजियेगा।वो जो करती है आपके लिए ही करती है।"

"निशी ध्यान रखना अपना।अच्छा वो जो 20 हजार जमा होने थे कॉलेज में वो हो गए क्या?"

"20 हजार?किस बात के लिए?"

"रिया ने मंगाए थे 2 दिन पहले ही डलवाएं है उसके एकाउंट में।"

"20 हजार?लेकिन किस लिए?"

"रिया ने कहा कॉलेज में जमा करने हैं,कुछ मास्टर्ज़ के लिए।"

"नहीं तो।ऐसा तो कुछ भी नहीं करना है।"

"देख लो फिर अब कहो।मेरे लिए करती है?20 हज़ार मंगवा कर भागी है।"

"ऐसे कैसे कर सकती है रिया?"

मैं और पंकज एक दूसरे को देखते रह गए।शादी का खर्चा तो अभ्युदय जी ने उठाया,फिर ये रिया ने पैसे क्यों मंगाए वो भी झूठ बोलकर? या फिर ये अंकल की कोई नई चाल है जानने के लिए कि हमारे मुह से कुछ निकले।

हम दोनों अंकल को नमस्ते बोल कर निकल आये।पंकज ने हाथ पकड़ कर उतरवाया सीढ़ियों से।

अंकल के भी घुटनों में दर्द की वजह से अंकल नीचे नही आये।

गाड़ी में बैठे तो अभ्युदय जी ने हम दोनों को देख कर कहा।

"क्या खबर है?"

"20 हजार मंगवाए इस नालायक ने अंकल से?"

"हाँ बताया था रिया ने।अभी दिल्ली में अकेली होगी तो कुछ लिक्विड मनी होना चाहिए उसके पास।क्या पता रवीश के पास अभी कुछ है भी के नही?"

"तो बता तो देती।"

"मुझे बताया था।मैंने मना कर दिया था तुम दोनों को बताने के लिए।"

"वाह जी वाह।देख ले निशी।जान जोखिम में हमारी पड़ी थी और मैडम अपने सीक्रेट भी हमें नही बता रही थीं।"

"छोड़ पंकज।अब क्या फायदा।हो गई शादी।अभी क्या करना है?कंहा जाना है?"

"अभी हम सभी रिया रवीश को छोड़ने स्टेशन जा रहे हैं।"

"वो दोनों हैं कंहा?"

"हम दोनों का जाना जरूरी है क्या?क्या पता अंकल हमारा पीछा न कर रहे हों?"

पंकज की बात में दम था।

"अक्ल की बात करता है आजकल पंकज।गजब।"

"तो तुझे क्या लगता सब तेरी तरह हैं?"

"मतलब?"

"मतलब कुछ नही उल्लू।"

"ज्यादा मत बन।मैं कोई नही उल्लू वुल्लु।समझा।"

"तुम दोनों शांत होंगे थोड़ी देर।बस लड़ाई।पंकज की बात सही है।लेकिन हमें अंकल अगर हैं तो उन्हें धोखा देकर ही सही पर स्टेशन तो पहुचना होगा।"

"तो करना क्या है अभ्युदय जी बताइए।"

"पंकज तुम्हें हम हीरा स्वीट्स पर उतार देंगे वंहा से तुम रिया के लिए कुछ मिठाई भी ले लेना।मैं और निशी एक नम्बर प्लेटफार्म से पहुचेंगे।लेकिन मैं ही उतरूंगा 1 नम्बर पर और फिर निशी गाड़ी के साथ गेट नम्बर 4 पर पहुचेगी। हमारी गाड़ी 4 नम्बर से ही जानी है।"

"मैं ऑटो से आ जाऊंगा?"

हम प्लान के मुताबिक अपनी-अपनी जगह से स्टेशन पहुँचने लगे।अभ्युदय जी स्टेशन पर उतर कर 4 नम्बर की तरफ निकल गए।मैं चार नम्बर की तरफ से चलने को बैठी रही।

पंकज अभी ऑटो से पहुँचने ही वाला होगा।

मैं 4 नम्बर पर उतर ही रही थी कि अभ्युदय जी का फोन आया।

"जी अभ्युदय जी।"

"कंहा हो?"

"बस उतर रही हूँ।"

"बाहर ही रुको।अंदर रिया के पापा हैं रवीश और रिया के साथ।"

"पर?"

"पर वर कुछ नहीं।रुको वंही और पंकज को भी फोन करो।"

"जी।"

मैंने सीधे पंकज को काल किया।

"हाँ बोल?"

"रिया के पापा।"

"तो?"

"अंकल स्टेशन के अंदर हैं रिया रवीश के साथ।"

"क्या?फिर क्या करना है?"

"तू कंहा है?"

"उतर गया ऑटो से।"

"गाड़ी में ही आजा।4 नम्बर की तरफ ही है।"

"चल आता हूँ बाय।"

ये अंकल को कैसे खबर लगी अब?
 
पंकज और मैं गाड़ी में बैठे इंतजार कर रहे थे।

मेरा फोन बजा।

"रिया का फोन।"

"उठा के देख क्या बोल रही है?"

"हेलो।हाँ रिया मैं और पंकज बाहर ही हैं।अंकल को कैसे पता सब?"

"डरपोकों आ जाओ अंदर।अभ्युदय जी ने तुम दोनों का पोपट बनाया है।"

"क्या?"

"हाँ मेरी और उनकी शर्त लगी थी।"

"क्या बचपना है ये रिया?"

"आजा निशी, अब जा रही हूँ मैं।कब मिलूंगी पता नहीं।"

"बकवास न ही कर।आई बड़ी।कब मिलूंगी।तेरे पापा तुझे दो दिन में वापिस लाने का प्लान कर रहे हैं और तू है की।रख फोन आते हैं हम।"फोन रखकर मैंने पंकज की तरफ देखा।हम दोनों ही हंस पड़े।

"चल,वो नौटंकी बिना रुलाये जाएगी नहीं।"

हम दोनों स्टेशन पर आ गए।अभ्युदय जी पर गुस्सा आ रहा था पर उनके खिले चेहरे को देखकर बड़ी तस्सली भी मिल रही थी। खुश थे अभ्युदय जी।जिंदादिली यही तो होती है शायद।खुद की तकलीफ को भूलकर दूसरों की खुशियों में खुश।

"आपको भी कुछ और नही मिला शर्त लगाने?"

"अब रिया ने कहा कि वो शर्त हारती नहीं कभी।तो ट्राय कर , लिया।"

"हा हा वेरी फनी।"

"पापा ठीक हैं?"

"हाँ, लेकिन उनके इरादे बिल्कुल भी ठीक नही हैं।"

"क्या मतलब?"

"मतलब पंकज बताएगा।"

मैंने पंकज की तरफ इशारा किया।

"रिया तेरे पापा तेरी इस शादी को नही मान रहे।"

"हाँ औऱ उनका कहना है कि वो तेरे सारे डाक्यूमेंट्स को हटवा कर तेरी दूसरी शादी करवाएंगे।"

"पापा ने कहा ऐसा?"

"हाँ जी।अंकल ने ही कहा।"

"रुको अभी बताती हूँ उनको।"

रिया ने फोन निकाल लिया।पर रवीश ने फोन लेकर कहा

"अरे मेरी बीवी अभी से माँ चंडी का अवतार मत दिखाओ, डर जाऊंगा मैं।हम मिल कर बात करेंगे न पापा से।वो मान जाएंगे।"

रिया बिल्कुल चुप हो गई और साथ ही साथ हल्के से मुस्कुरा दी।

मैंने रिया को साइड में लिया।

"ओ हीरोइन सुहाग दिन मना लिया क्या?"

"चल बे।बेशरम।"

"ओहहो...मैडम को शर्म आ रही है?"

"निशी मार खानी है तुझे?"

"ना बिल्कुल भी नहीं।उसके लिए अब है एक नमूना तेरे पास।मार पीट जो करना है कर।बस ये बता सच्ची-सच्ची कि सुहाग दिन?"

"बस भी कर यार।इतना भी आसान नही होता सब।एक दिन में ऐसे लड़के के साथ जिससे दूसरी बार सामने मिले हो।"

"ओह तो कितनी बार मे होता सब?"

"निशी.. तेरी दूसरी टांग भी तोड़ दूंगी मैं।समझी?"

"चल नही बताना मत बता।कर दिया न तूने पराया?"

"क्या करूँ इस लड़की का।अब मेरे जैसी नौटंकियां क्यों मार रही है?"

"क्या करूँ सीखी है तुझसे।अच्छा जब सब होगा तब बताना मुझे।डिटेल में सब?"

"तेरे लिए पूरा कामसूत्र लिख दूँ?"

"मुझे कोई प्रॉब्लम नहीं।मुझे चलेगा।"

"बहुत कमीनी हो गई है तू।सच में।"

"संगत का असर।तेरी संगत का।पर अब सुधर जाऊंगी न?अब तू नही होगी तो?"

"रुलायेगी अब?"

"न मैं क्यों रोउंगी या रुलाऊंगी?"

दोनों ने एक दूसरे को देखा और बस गले लगते ही रो पड़े हम दोनों।

पता नही कितनी देर आंसू बहाते रहे।अपनी बातें याद करते रहे।

ट्रेन स्टेशन पर आकर लग गई और सामान भी रखवा दिया गया।

"रिया अब चलें,गाड़ी का येलो सिग्नल हो गया है।"

"हम्म।"

रिया ने पंकज को गले लगकर बाय कहा।अभ्युदय जी के पैर छूने झुकी ही थी कि उन्होंने रोका।

"बहनें पैर नहीं छूती रिया।अपना ख्याल रखना। रवीश और तुम्हें कभी कोई भी परेशानी नही होगी इसके लिए भगवान से प्रार्थना करेगा तुम्हारी दोस्त।खुश रहो दोनों।"

"थैंक्यू दादा।"

रवीश ने मुझे गले लगाया फिर पंकज को गले लगा कर हाथ मिलाया और अभ्युदय जी के भी गले लगा।

"आप सभी जल्दी आइयेगा दिल्ली।मिलकर पार्टी करेंगे।"

दोनों ट्रेन में चढ़ गए।ट्रेन का सिग्नल भी ग्रीन हो गया।

गाड़ी बढ़ने लगी।मेरी धड़कने भी बढ़ती जा रही थीं साथ-साथ।हल्का सा चक्कर आया और गाड़ी के ओझल होते तक मैं भी बोझिल हो बेहोश होती वही गिर गई।

पंकज पीछे ही था उसने पकड़ लिया था और उठाकर जल्दी गाड़ी में ले आया।

रिया ने शायद मुझे देख लिया था तो अभ्युदय जी के पास तुरंत ही फोन आया।

"क्या हुआ?"

"कुछ नही अब उसकी नौटंकी है,शर्त जीतना चाहती है।"

"उसे कहना बहुत गजब की एक्टिंग की।नौटंकी नही तो।मुझे डरा दिया।बात करवाइए।"

"वो दोनों आगे हैं।तुम आराम से बैठो अभी बात करवाता हूँ कार में पहुच कर।"

"ठीक है।इंतजार करूँगी।"

"रिया किसी भी स्टेशन में कंही भी नही निकलना।न किसी से कोई बात करना।रवीश से भी अभी शादी से रिलेटेड कोई बात नहीं करना।ऐसे दिखाना जैसे कोई एग्जाम देने जा रही हो।ठीक है न?"

"जी दादा।"

"चलो बाद में करता हूँ बात।हैपी जरनी।"

फोन कट करके अभ्युदय जी भी कार में आ गए।मुझे पानी डालकर होश में ले आया गया था।पर रो-रो कर मैंने अपनी हालत थोड़ी बिगाड़ ही ली थी।

"ये लो।"

अभ्युदय जी ने फ्रूटी पकड़ाई ओर पीने को कहा।

"मन नही है।"

"चुपचाप, खत्म करो।"

कोई बिना बहस या बात के मैंने फ्रूटी ओपन की और पी गई।

"चलें?"

"हम्म.."

मैंने और पंकज ने साथ ही हम्म कहा।
 
रिया को छोड़कर मुझे मेरे रूम पहुँचा दिया गया।पंकज और अभ्युदय जी निकल गए।मैं अकेली बैठ कर अभी आज की हुई सारी बातों को सोचती हुई खो गई।

रिया का अपने पापा को बताना,उनका जबलपुर आ जाना,रिया की शादी हो जाना,उसकी इस शादी को शादी ही न माना जाना,रिया का दिल्ली चले जाना।उफ्फ एक दिन और कितने सारे कांड।

फोन बजा तो अपनी सोच से बाहर निकली।

"नमस्ते अंकल।"

"रिया कंहा हो?"

"अंकल निशी।निशी बोल रही हूँ।"

"हाँ वो निशी बेटा, मैंने रिया कहा क्या?"

"जी अंकल।क्या हुआ?आपकीं आवाज़ ऐसी कांपती सी लग रही है।"

"बेटा, रिया के ताऊ जी को किसी ने कह दिया है कि उसने भाग कर शादी कर ली।अब क्या करें,नाक कटवा दी इस लड़की ने।"

"अंकल आप ताऊ जी को कहिये कि आपने शादी कराई है।फिर किसी की कोई हिम्मत नही होगी।"

"झूठ कैसे बोल दें बेटा?बहुत दिक्कत सी लग रही है।बहुत उलझन महसूस हो रही है।"

"अंकल आप ठीक तो हैं न?"

"हहहहहम ssss ठीssssकssssहैsssss बेटा sss।"

मुझे अंकल की आवाज कुछ ठीक नही लगी।फोन रखकर तुरंत ही जैन आंटी को फोन लगाया।

, "हेलो।"

"नमस्ते आंटी जी।निशी बोल रही हूँ।अंकल को,मेरा मतलब रिया के पापा को एक बार देख लीजियेगा वो ठीक तो हैं न?"

"क्या हुआ उनको?"

"अभी बात हो रही थी, तबियत ठीक नही है शायद।"

"देखती हूँ।रिया कंहा है?"

"वो है नही अभी।"

फोन रखकर मैंने पंकज को फोन मिलाया।

"हाँ बोल,थोड़ी देर भी मुझसे बात किये बिना रहा नही जाता तुझसे न?"

"पंकज रिया के घर पहुच अंकल ठीक नही हैं।"

पंकज ने फोन रख दिया शायद आस-पास ही था।अब आखिरी फोन अभ्युदय जी को लगाया गया।

"आपकीं गाड़ी मिल सकती है?"

"क्या हुआ निशी?"

"वो रिया के पापा.."

पीछे से पंकज का फोन वेटिंग पर आता दिखा तो मैंने अभ्युदय जी को होल्ड पर रखकर फोन उठाया।

"हाँ पंकज।"

"निशी, अंकल को हार्ट अटैक।मतलब तुम लोग जो भी बोलते हो।यंहा डॉक्टर्स कुछ एनजाइना बोल रहे हैं।"

"ओह।अभी कैसे हैं अंकल?"

"अभी ठीक हैं पर मैं अगर टाइम पर नहीं पहुचता तो..शायद.."

"बकवास मत कर।किस हॉस्पिटल में है?"

"मैं लेबर चौक पर ही जो शिशु आलय है वंहा।"

"तू ? हे प्रभु?"

"सुन ओए जो समंझ आया किया।अंकल इस फाइन।डॉक्टर भी बोली एक दम सही डिसीज़न था मेरा।"

"खुश हो जा फिर।मैं आती हूँ।तू वहीं रहना।"

"हम्म.."

"और सुन।"

"हाँ जी मैडम जानता हूँ।रिया को फोन मत करना।किसी को पता नही लगना चाहिए।"

"समझदार हो गया है संगत में रहकर।"

"चल आऊं लेने या आ जायेगी?"

"मैं आती हूँ।"

मैंने फोन रखा ही था कि ड्राइवर भैया आ गए।

"दीदी चलिए।"

मैं उठकर चलने को हुई तो फ्रेम दूर होने की वजह से लड़खड़ा गई।पर कोई था नही मदद के लिए तो खुद ही पैर पर जोर दिया और पलंग पर बैठ गई।

"जल्दबाजी में काम बिगड़ेंगे निशी, आराम से।सब ठीक होगा।सब ठीक है।"

खुद को दिलासा देकर ताला चाबी उठाया और लॉक करके गाड़ी में आ गई।

"आप?आप क्यों आये?रेस्ट करना चाहिये था न?"

"बैठो और बताओ क्या हुआ?"

"वो रिया के पापा को हार्ट अटैक आया है।"

"अभी कंहा हैं वो?"

"वो उस पंकज ने लेबर चौक पर ही एडमिट करवा दिया है उन्हें।शिशु आलय में।"

"चलो मतलब अभी वो खतरे से बाहर हैं पर उन्हें प्रॉपर ट्रीटमेंट के लिए जबलपुर हॉस्पिटल या सिटी हॉस्पिटल में एडमिट करवाना होगा।"

"जी।"

"रिया को बताया?"

"नहीं।अभी नही।"

"ठीक है।अच्छा ही किया।घर पर किसी को?"

"उसका भाई गांव गया है।शादी के चक्कर में भेज दिया था।"

" नम्बर है उसका?"

"जी है।उसे फोन करके बता दूँ?"

"नहीं वो रिया से छोटा है।रहने दो डर जाएगा।"

पंकज हॉस्पिटल के सामने ही मिल गया।

"कैसे हैं अंकल?"

"समझ नही आ रहा।अभी तक कुछ बात नही की उन्होंने।"

"मतलब?"

"मतलब वो सोच रहे कि रिया का फोन क्यों नही आ रहा।"

"डॉक्टर ने क्या कहा?"

"डॉक्टर ने अभी कहा कि सर ने अपनी बेटी से बात करने के लिए ये नाटक किया।"

"मतलब?अंकल ठीक हैं?"

"ठीक तो हैं पर बात नही कर रहे बिल्कुल भी।"

"रुक अब मैं बात करती हूँ।"

हम दोनों अंदर चले गए।

"अंकल क्या हुआ?कैसी तबियत है आपकीं अब?"

"तुम कैसे दोस्त हो रिया के?अब तक उसे बताया नही के उसके पापा को कुछ हुआ?"

"नही अंकल ऐसी बात नही है।वो इतनी दूर है उसे ऐसे बताना ठीक नही।बहुत परेशान हो जाएगी।आधी बावली है ही आपको कुछ हुआ है उसकी वजह से तो पता नही क्या कर लेगी।बस इसलिये नही बताया।मैं फोन करती हूँ उसे।आप बात करेंगे?"

"नहीं बात करनी मुझे बिल्कुल भी।कोई बात नही करनी।मुझे मेरे घर जाना है अब बस।"

"पर अंकल,सुनिए तो।"

अंकल ने दूसरी तरफ मुँह फेर लिया।अंकल का फोन बजा।फोन रिया का था जिसे देखकर अंकल के चेहरे पर चमक आ गई।

"हेलो ss"

बड़ी बीमार सी आवाज में अंकल बोले।

"पापा मैं आ रही हूँ। आपको शादी नही माननी मत मानिए।पर आपको कुछ हो गया तो मैं कभी खुद से नजरें नही मिला पाऊंगी।आपको मेरी वजह से कुछ नही होगा पापा।आप नही जानते आप क्या हैं मेरे लिए।मैं माँ के साथ शायद ही कभी इतनी बातें कर पाई हूँ जितना आपके साथ।आपके रहते कभी किसी दोस्त की कमी महसूस नही हुई।पापा मैं आपकी जान हूँ न?"

"रिया.. आजा बेटा।जल्दी आजा पापा के पास।सुबह से कुछ अच्छा नही लग रहा।"

"मैं ट्रेन में ही हूँ पापा।आप अपना ख्याल रखिये।"
 
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