• Hello Friends You can Register on the Forum and by posting you can earn money too.

अधूरी ख़्वाहिश

शायद अभ्युदय जी ने रिया को बता दिया होगा।वरना अगर मैंने और पंकज ने नही बताया तो उसे ये सब कैसे पता?लेकिन जरूरत क्या थी?अब वो रास्ते मे ही उतर कर वापिस आ जायेगी।अंकल का भी कुछ समझ नही आ रहा।भगवान तू ही भला कर सबका।

"चलें?" अभ्युदय जी ने आवाज देकर पीछे से कहा।

"कंहा जाना है अभ्युदय जी?"

"अंकल का चेक अप करवा लें?"

अंकल ने कहना चाहा कुछ र अभ्युदय जी फिर बोल उठे।

"रिया का फोन आया है।उसे उसके पापा इस हॉस्पिटल में मिले तो सोच लो क्या होगा?"

"होना क्या है हम तीनों कालिया,साम्भा हो जाएंगे और वो गब्बर।जल्दी ले चलो।मैं वार्ड बॉय को बुलाता हूँ।व्हीलचेयर मिल जाएगी।"

"पंकज मैं खुद चल लूंगा।"

"अंकल अभी आ जायेगी व्हीलचेयर।"

"नहीं निशी, मैं चल लूंगा।"

अंकल को लेकर हम सभी जबलपुर हॉस्पिटल आ गए।अच्छे कार्डियोलॉजिस्ट से मिलकर पता चला कि जैसा दर्द अंकल को हुआ उसे एनजाइना पेक्टोरिस ही कहते हैं और ये हार्ट अटैक ही था।लेकिन फिर पंकज ने क्यों कहानी बनाई? क्या सच में डॉक्टर को बताने के लिए एंकल ने ये कहा?

जबलपुर हॉस्पिटल में अंकल को एडमिट कर दिया गया।

"एक दिन ऑब्जरवेशन जरूरी है।" डॉक्टर ने कहा।

3 घण्टे ही बीते थे रिया को गए हुए और ये सब।रिया रास्ते मे ही उतर गई और वापिसी की कोई ट्रेन नही मिली तो कार रेंट पर लेकर जबलपुर पहुची।रात के 2 बजने को थे।अभी रिया पहुँची नही थी।

अगले दस मीनट में अंकल के सामने रिया थी।मांग में सिन्दूर, गले मे मंगलसूत्र।

ब्याहता रिया को देखकर अंकल रो पड़े और रिया भी।
 
दोनों बिना बोले एक दूसरे को कुछ भी,बस रोते रहे।तभी रवीश की एंट्री हुई।

"नमस्ते पापा जी।"

"खुश रहो रवीश।मैं बहुत नाराज़ था तुम दोनों से पर जानता हूँ तुम दोनों ने जो किया सही किया।"

"आपकीं तबियत कैसी है अब?सुबह पापा मम्मी भी आ रहे हैं।आपसे बात करने आगे की,क्या करना है?कैसे लोगों को बताना है या दुबारा से शादी करनी है?"

"आपने अपने घर पर बता दिया है अपनी शादी का?"

"जी पापा।मेरे घर सभी तैयार थे।रिया को सभी ने पसन्द कर लिया था।मैंने बताया था घर पर शादी का।पर घर पर लोगों का कहना था कि जब आप अपना लेंगे रिया को,तब वो भी हम दोनों को अपना लेंगे।"

"रिया तुम खुश हो न?"

"आप भी न पापा.. एक दिन तो बिताया नहीं अब तक साथ,पूछ रहे हैं खुश हो न?"

रिया की इस बात पर सभी हंस पड़े।

"डॉक्टर ने क्या बोला?अब पापा ठीक हैं न?"

अब ये थोड़ी टेंशन वाली बात थी क्योंकि अंकल को जो दर्द उठा था वो आगे के लिए एक वार्निंग साइन तो था ही।

"हाँ कल आएंगे राउंड पर तब बात करेंगे।अभी क्या करना है?"

"तू घर जाकर रेस्ट कर मैं और रवीश हैं अब यंहा।"

"हाँ।मैं भी बहुत थक गई हूं।"

"लेकिन तू जाएगी कैसे?दादा तो जा चुके हैं।"

"तू अंकल का ध्यान रख मैं निशी को छोड़ दूंगा।"

"लेकिन हीरोइन आंटी को बोला था?गेट पर तो ताला होगा न?"

"हम्म...मैं तो भूल ही गई थी।चलो आज रात यंही सही।"

"नही तू मेरे घर जा।बाहर की तरफ छोटे गेट पर ताला नही लगता है।रेस्ट कर ले वरना पैर में दर्द होगा।पापा चाबी कंहा है?"

"मेरे पास ही है।मैंने ही लॉक किया था।अब चलें?"पंकज बोला।

मैं, पंकज और रवीश बाहर निकल आये हॉस्पिटल से।

"ध्यान से जाना।गाड़ी संभाल कर चलाना पंकज।"

"मैं क्यों चलाऊँगा गाड़ी?हम ऑटो से चलेंगे।वैसे भी अभी बाइक पर बैठना रिस्की है।"

"थैंक्यू पंकज।मुझे भी वही लग रहा था कि कैसे बैठूंगी और पहुँचूंगी।"

"तू तो सोचा ही मत कर।चल अब।"

"आप जाओ रवीश, रिया को जरूरत है आपकीं।"

"बाय पंकज,निशी टेक केयर।"

रवीश वापिस हॉस्पिटल में चला गया।

"तू रुक मैं ऑटो बुलाता हूँ।"

"अकेले?न बाबा मुझे डर लगेगा।"

"डर?किस चीज़ का?"

"वो देख मर्चरी।"

"वो क्या होता?"

"मुर्दाघर।"

"तब तो तू चल।"

"तुझे भी डर लगता?"

"क्यों मैं डर नही सकता क्या?"

"नहीं मतलब तू तो लड़का है न?"

"तो लड़कों को भूत छोड़ देते हैं? जाओ भाई साब,आप लड़के हो।"

"हाहा डरपोक।भूत-बूत कुछ नही होता।"

"अच्छा तो तू क्यों डर रही थी?"

"चलें ऑटो ढूंढे?"

"वो रहा ऑटो स्टैंड चल।"

पंकज मेरा हाथ पकड़ कर चल रहा था।अब लँगड़ा कर चलना आसान सा था।मैं शायद बिना उसका हाथ पकड़े भी चल सकती थी।पर डरपोक को डर लग रहा था।हाथ पकड़ के रखना समझी बोलकर कस कर हाथ पकड़ा हुआ था पंकज ने।

ऐसी दोस्ती , ऐसा दोस्त किस्मत वालों को ही मिलता है।सोचते हुए मैं औऱ पंकज ऑटो तक आ गए।

"भैया लेबर चौक चलोगे?"

"हाँ जी साब चलेंगे।"

"कितना लेंगे भैया?"

"नाइट चार्ज लगेगा मैडम जी।"

"कितना भैया?"

"100 रुपये तो जाने का 200 नाईट चार्ज।"

"भैया हम जबलपुर में हैं,दिल्ली मुम्बई में नहीं।150 ले लेना चलो।"

"क्या मैडम जी।सीधा आधा करवा दिया आपने?"

"नही हो पाएगा तो बोलो।हम दूसरा ऑटो देखें फिर लेकिन 150 मतलब 150।"

"बैठिये फिर।"

मैं और पंकज बैठ गए।

"क्या बात है।"

"जी।हम लड़कियों की यही खास बात होती।बिना मतलब पैसे नही खर्चते।"

"ये पैसे बिना मतलब नही हैं और दूसरा तुम लोगों जितनी बातें और लड़ाइयां हम लोग नही कर सकते।"

"जब नही कर सकते तो क्यों लड़ने का मूड बना रहा है?"

पंकज चुप हो गया।ऑटो में भैया ने गाने चला दिए।रात का समय और एफ एम पर बजते पुराने गाने-गज़ल।

"तू अपने दिल की जवां धड़कनों को सुन के बता.. मेंरी तरह तेरा दिल,बेकरार है कि नही। दबा-दबा सा सही,दिल मे प्यार है कि नहीं।झुकी-झुकी सी नज़र।"
 
हम आधे घंटे चुप थे।बस दोनो का गुनगुनाना चलता रहा। "जब कोई बात बिगड़ जाए, खत्म होने को ही था और हम घर के सामने पहुच गए।

ऑटोवाले को रुकने को बहुत मनाया पर वो अब आगे जाने तैयार नही था।पैसे लेकर चला गया।

"चल ऊपर तक तो छोड़ दूं फिर देखता हूँ क्या करना है।"

"छोटा गेट खोल पहले।"

पंकज ने गेट खोलकर मुझे फिर पकड़ कर ऊपर सीढ़ियों से हाथ पकड़ कर ही चढ़ाया।

"तू दरवाजा खोल मैं नीचे का गेट बंद कर दूं।"

"हम्म।"

पंकज नीचे गेट बंद करने चला गया।मैंने ताला खोला और आकर दीवान पर पैर ऊपर कर के बैठ गई।

दर्द तो था पैर में पर संतुष्टि थी कि अंकल मान ही गए।

"सुन अभी तो कोई ऑटो नही मिलेगा।तुझे दिक्कत न हो तो दो घंटे मैं भी यंही राह जाऊं?"

"मुझे दिक्कत नही है पंकज पर जैन आंटी को हो जाएगी,उन्हें पता लगा तो।और भी बाकी लोग क्या सोचेंगे?"

"कौन से लोग?"

"रिया,अंकल, रवीश।"

"तू बताने जा रही है कि मैं यंही था?दो घंटे की बात है 4 बज चुके हैं।मैं 7 बजे तक निकल जाऊंगा।वैसे भी तुझे अकेले डर नही लगेगा क्या?"

"नही।मुझे घर में डर नही लगता।"

"सोच लाइट चली गई फिर?"

"पंकज sss नाटक मत मार।सो जा यही।"

"जे बात।मैं सोफे पर सो रहा हूँ।तुझे कुछ चाइये?"

"पानी।"

"रुक।लाया।"

पंकज मुझे पानी पकड़ा कर सोफे पर लेटते ही सो गया।मैंने रिया को फोन मिलाया।

"हाँ।पहुच गई?"

"पंकज भी यंही है।कोई दिक्कत तो नही होगी?"

"लेकिन वो घर?अपने घर क्यों नही गया?क्या चल रहा है तुम दोनों का?"

"पागल है क्या तू?मेरा कुछ नही चल रहा।ऑटो नहीं मिल रहे थे वो सो गया है सोफे पर।तू बोलेगी तो उठा के भगा दूंगी।"

"सोने दे।वो भी थका ही होगा।तू ठीक है न?"

"हाँ।"

"फिर आराम कर।ज्यादा मत सोच।कोई दिक्कत नही होगी।"

"ओक बाय।अंकल?

"पापा सो गए हैं।"

"ठीक है।"

फोन रख कर मैंने एक बार फिर पंकज की तरफ देखा।वो शायद बहुत गहरी नींद में था।थकान जायज़ है,दो-तीन दिन से लगातार कुछ न कुछ लगा ही हुआ है।

मैंने दरवाजे की कुंडी को देखा तो वो खुली थी।इससे ज़्यादा क्या विश्वास करु अब इस लड़के का।

मैं भी सोचते-सोचते सो गई।

"कैसे कोई इतना करीब आ जाता है?

कैसे कोई इतना प्यारा बन जाता है?

कैसे लोग किसी को अजीज मान बैठते हैं?

कैसे लोग किसी को अपनी दिलों जान तक देते हैं?

प्यार से भी प्यारा है

ये रिश्ता हमारा।

तू सच्चा दोस्त मेरा

तू ही सच्चा यारा।

तू ही एकलौता दुश्मन भी

तू ही है जान से प्यारा

कोशिश होगी मेरी दिल से

टूटे न कभी ये रिश्ता हमारा।

नींद के आगोश में भी बस यही बातें चलती रहीं।

"निशी सुन तू मुझसे प्यार करे न करे।मैं शादी तुझसे ही करूँगा।"

"पंकज एक ही बात?क्यों जिद कर रहा है?कितनी बार कहा है तुझे कि मैं अभ्यु..."

"वो तेरे लायक भी हैं?न खुद से चल पाते न हाथ चलता उनका?बस पैसा ही तो है न?और सुन वो भी उनके पापा का।खुद का क्या है?"

"पंकज चुप हो जा।"

"क्यों?सच कड़वा लग रहा है? सच ही तो है,उन्हें भी तुझसे क्यों मतलब है? क्योंकि तू डॉ है वरना उन्हें किस चीज़ की कमी है? बोल आजतक तेरे लिए इंतजार करते बैठे थे कि तू आएगी और उनसे प्यार करेगी?"

"पंकज बकवास बन्द कर और चला जा।"

"मैं तुझसे आज ही शादी करूँगा बिना शादी कंही नही जाऊंगा।"

"तू पागल हो गया है क्या?"

"सिंदूर कंहा है?मैं अभी आज ही तुझसे शादी करूँगा।"

"आइंदा बात मत करना मुझसे।शक्ल भी मत दिखाना अपनी।निकल जा यंहा से।"

"तुझसे बिना शादी किए नही जाऊंगा।"

"पंकज निकल जा कहा न?मैं अभी शोर मचा के सबको बुला लुंगी।"

"बुला.. चिल्ला.. जितना चिल्लाना है चिल्ला।मैं आज तुझसे शादी करूँगा बस कह दिया।"

"नहीं ssssssss.....।"

मेरी नींद अचानक ही खुल गई।

"मैं सपना देख रही थी?पंकज?"

पंकज अब भी सो ही रह था।उसका चेहरा दूसरी तरफ था।उसे सोता देख थोड़ा सुकून मिला।

ये कैसा सपना था?उफ्फ ये सिर दर्द।मैं अपने पैर के दर्द को भूल गई थी।

"आह।" अपने सिर को अपने हाथों से जोर से दबाया।

आह की आवाज से पंकज पलटा।

"निशु?क्या हुआ?"

"सिर दर्द।"

"दवाई कंहा होती हैं?"

"वो उस ड्रावर में होगी।डिस्पिरिन/एस्पिरिन होगी देखना।"

"हाँ ये ले,पानी दवाई।"

मैंने फटाफट दवाई ली औऱ फिर सिर पकड़ कर बैठ गई।

"मैं सिर मे बाम लगा दूँ?"

"अभी तो कहूँगी की बड़ा सा पत्थर ला कर सिर पर रख दे।"

"अभी भी बकवास।उफ्फ।तू रुक।"

पंकज ड्रावर से बाम ले आया।मुझे लेटने का कह कर बाम माथे पर लगाने लगा।

मैंने उसके हाथ को पकड़ कर जोर से माथे पर दबाया।पंकज ने अपने हाथ से मुठ्ठी बनाई ओर मेरे सिर पर हल्के हाथों से मारने लगा।

मैं दर्द में आराम महसूस कर रही थी।

"अच्छा तरीका है सिर दबाने का? लोगों से उनके किये के बदले ले लो मारकर।है न?"

"तुझे आराम मिल रहा है या नही वो बोल।"

"हम्म मिल रहा है।"

"तो नाटक बन्द कर और अपनी आंखें भी।सो जा थोड़ी देर।पता नही क्या-क्या सोच रही है।जागी क्यों हुई है अब तक?

"सपना देख कर नींद खुल गई।"

"क्या देख लिया ऐसा?"

"कुछ नही।"

"बता ना?"

"नहीं कुछ भी नहीं।"

"हमारी शादी देख ली क्या?"

"सो जाने दे प्लीज्।"

"हम्म अब कोई बात नही सो जा।"

पंकज हल्के हाथ से मुक्के मरता रहा माथे पर और मैं कब सो गई नही जानती।
 
सुबह-सुबह मैं नींद में ही थी और पंकज भी सिर दबाते वहीं दीवान पर ही टिक कर सो गया था।

जैन आंटी ने दरवाजा खटखटाया।दरवाजे की कुंडी तो बंद थी नही तो दरवाजा खुद ब खुद ही खुल गया।

हम दोनों सो रहे थे पर ऐसी कोई आपत्तिजनक स्तिथि में नही थे जिसका बवाल बनाया जा सके।पर ये मकानमालिक जो होते हैं न उनका कुछ कहा नही जा सकता।

"ये सब क्या चल रहा है यंहा?मेरा घर कोई कोठा है क्या?"

जैन आंटी की कर्कश आवाज से हम दोनों की नींद खुली औऱ हम दोनों ने खुद का सिर पीट लिया।

"पंकज, रिया को फोन लगा।"

बिना आंटी की तरफ देखे हुए मैंने कहा।

"बदतमीजी देखो ज़रा।ये नही की माफी मांगें, अकड़ दिखाएंगे।आजकल के बच्चे भी,नम्बर दो अपने माँ बाप का।"

"पापा, आंटी।बाप नही,और किस बात के लिए माफी मांगे हम?हमने क्या गलत किया?थके थे सो रहे थे।गलत क्या है इसमें?"

"हाँ एक साथ सोना ही जरूरी था?"

"कपड़े पहन रखे हैं न हमने?या आपको कपड़े दिख नही रहे?कुछ गलत ही करना होता तो दरवाजा खुला न होता।"

"अरे तुम्हारा, तुम जैसे लोगों का क्या भरोसा? रात भर क्या गुल खिलाये मैं क्या जानती नही।तभी कहूँ रात भर इतनी आवाज क्यों हो रही थी।"

"बकवास ना ही करें तो बेहतर है आंटी।हम 4 बजे आये हैं।आपके घर मे भूत ही होगा जिसकी आवाजे आपको आती हैं।आपका बेटा इसी साल ज्ञान गंगा में इंजीनियरिंग करने गया है न?"

"हाँ गया है तो?अब तुम मुझे धमकी दोगे?अभी पुलिस को बुलाती हूँ।बुला लीजिये आंटी,हमें कोई फर्क नही पड़ेगा पर आपके बेटे को जरूर पड़ सकता है और वैसे भी बुली करने पर कॉलेज में कोई एक्शन लिया नही जाता।आगे आप समझदार हैं।"

"ये लड़का बार-बार मुझे धमकी दे रहा है।तुम चुप क्यों बैठी हो?बोलती क्यों नही कुछ?"

"आंटी आप बैठिए पहले।"

जैन आंटी बैठ गईं।पंकज को भी बैठने का इशारा किया मैंने।पंकज भी चुप कर के बैठ गया।

"आंटी मेरा पैर टूटा हुआ है आप जानती है,कल रिया के पापा को हार्ट अटैक हुआ।हम सभी रात 3 बजे तक हॉस्पिटल में थे।रिया जब आई तब हम घर आये।4 बज चुका था और कोई ऑटो यंहा से मिल नही रहा था जिससे पंकज जा सके।रिया की गाड़ी भी मेरे रूम पर खड़ी है।ऐसे में पंकज भी यंही सोफे पर सो गया।पर सुबह मेरे सिर में दर्द हुआ तो पंकज ये बाम लगा रहा था।(बाम की शीशी दिखाते हुए) मेरी आँख लग गई और शायद पंकज की भी।अब आगे आपको जो सोचना है सोचिए और कीजिये।अपने माँ पापा का नम्बर मैं भी देती हूँ, पंकज तू भी दे दे।"

"तो पहले कहना था न?"

"सुन रही थी आप कुछ?"

"लेकिन ये धमकी दे रहा था।"

"शुरुआत आपने की आंटी।मैं क्या कह सकती हूँ।"

"रिया कंहा है?"

रिया को फोन पंकज ने कर ही दिया था।इतना सब तमाशा होने में समय का भी पता नही चला।

"मैं यंहा हूँ आंटी।क्या हुआ?"

"रिया तुम्हारी शादी हो गई?कब? कैसे?किससे?कंहा?"

अब आंटी का दिमाग हम दोनों की तरफ से हट चुका था और रिया पर अटक गया था।

पीछे ही रवीश भी आ गया,अंकल को साथ लेकर।

"नमस्ते भाई साब,कैसी है अब तबियत?"

"नमस्ते।ठीक हूँ।"

"ये रिया की शादी कब हो गई?"

"बस अभी करवा के ही ला रहा हूँ।ये जमाई जी हैं।"

"नमस्ते।"

रवीश ने ऑन्टी को नमस्ते कहा।आंटी रवीश को ऊपर से नीचे देखती रह गईं।

"ये?इसे तो कभी देखा नही हमने ,मुझे तो लगा था यही शादी करेगा रिया से।"

ऑन्टी का इशारा पंकज की तरफ था।रिया के घर आने जाने वाले लड़को में एक पंकज ही था जो आंटी को आते-जाते टकरा जाता था।

"मैं?क्यों?ऐसा क्यों लगा आपको?"

"दस बार चक्कर लगाओगे तो यही लगेगा।"

"जिसके लिए लगाओ उसे तो फरक भी नही पड़ता।जिसके लिए नही उसके साथ शादी करवा दो आप।क्या ऑन्टी?"

अंकल रवीश औऱ पंकज तीनों सोफे पर बैठ कर बातों कप बढ़ाते ही जा रहे थे।

"मैं निकलती हूँ।"

ऑन्टी चली गईं।रिया हाथ मुँह धोकर आ गई थी।

"पंकज दूध लेकर आ जा।"

"देखा रवीश मुझसे ही घर के सारे काम करवाती है तभी लगता है लोगो को कि शादी करूँगा तो इससे।"

"बढ़िया है न पंकज?"

"क्या बढ़िया है इसमें?चल पैसे निकाल।वैसे भी सुनने में आया है कि बीस हजार निकलवाए हैं तूने अंकल से।"

ये पंकज भी न बड़बोले के चक्कर मे देखता भी नही क्या, कब, कंहा बोलना है।

"रिया..पैसे कंहा है?क्या किया उन पैसों का?"

"कुछ भी नहीं पापा।एकाउंट में ही हैं।वो थोड़ा सेफ्टी के परपस से मंगवा लिए थे।"

"जो हुआ सो हुआ।अब कोई मुहूर्त निकलवा कर सबके सामने शादी करवा देते हैं।"

अंकल ने बात पूरी की ही थी कि बाहर से आवाज आई।

"ये तो बिल्कुल ठीक बात की आपने।"

रवीश के पापा भी आ चुके थे।पंकज दूध लेकर आ गया था।रिया ने अंकल के पैर छुए।

"बहुत आशीर्वाद है बेटा, हमेशा खुश रहो।"

"तिवारी जी आपको पसन्द है न रिया?"

"आपको तो पहले ही बता दिया था हमने।न जाने क्यों आपकीं न सुनकर दिल दुखी था।रवीश की नानी के बारे में ऐसी कोई बात ही नही थी जो छिपाई जाए।इनकी नानी भी कान्यकुब्ज ब्राह्मण ही थीं और, शादी होकर भी कान्यकुब्ज में ही आईं थीं।न जाने आपको किसने गलत बात कह दी।आपने साफ मना कर दिया तो हमने भी फिर जिक्र ही नही किया।"

"माफ़ी चाहते हैं तिवारी जी।शर्मिंदा हैं बहुत, कुछ लोगों की बातों में आकर अपनी ही बेटी की खुशियां नहीं देख पा रहे थे।"

"अरे अब बस सब बढ़िया हो जाएगा।ये बताइये दहेज कितना देंगे आप?"

दहेज की बात सुनकर सबके कान खड़े हो गए।एक वकील के पिता हैं और हिम्मत दहेज मांगने की?

"दहेज में तो आप जितना कहें तिवारी जी।बताइये? बिटिया के लिए तो अपनी औकात से बढ़कर सब कर देंगे।आप बस कहिये।"

"देखिये चौबे जी।हमारी एक ही डिमांड है कि बिटिया अपना मास्टर्ज़ भी कम्पलीट करे।आप उसे बिना मतलब ससुराल में बंधने नही कहेंगे।बस यही हमारा दहेज होगा।"

सबकी जान में जान आई । अंकल उठ खड़े हुए रवीश के पापा के पैर छूने को।पर अंकल ने रोक लिया।दोनो अंकल गले लगे और रिया रवीश एक दूसरे को देख कर मुस्कुरा उठे।

हम सब भी बोझ उतरा सा महसूस कर रहे थे अब।मेरा फोन बज उठा देखा तो अभ्युदय जी का फोन था।मैं फोन लेकर धूप में आ कर कुर्सी में बैठकर कल रात से लेकर जैन आंटी के नाटक और अब रिया के ससुर जी के दहेज की बातें बताने लगी।

"खुश हो न?"

"बहुत-बहुत-बहुत-बहुत ही ज्यादा।"

"ऐसे ही खुश रहना।अभी जरा जा रहा हूँ मालवीय चौक लौटते समय लेते हुए आ जाऊंगा तुम्हें घर।मशीन लगानी है आज।माँ भी याद कर रही हैं।"

"जी अभ्युदय जी।"

"बाय।"

"बाय।"
 
अभ्युदय जी मुझे लेकर रूम पर आ गए थे।

"रास्ते भर बक-बक करके भी थकी नहीं तुम?"

"क्यों? अब बातें इतनी सारी हैं तो क्या करूँ?"

"जाओ जाकर तैयार होकर आओ।"

"तैयार क्यों?मंदिर जाना है क्या?"

"तुम जाओ ना।तैयार होकर आओ।मैं आधे घंटे में आता हूँ।"

"ओके।"

मैं रूम पर आ गई,एक पैर टूटा हो तो नहाना बड़ा मुश्किल होता है।पर जैसे तैसे नहाया गया और मैं रेडी हो गई।

भगवान जी को अगरबत्ती लगाई और अपनी गणेश,दुर्गा चालीसा पढ़ ली।भगवान से सब कुछ ठीक कर देने के लिए भी थैंक्यू कहा।

फोन बजा जानती थी किसका होगा।

लेकिन माँ का फोन था।

"हाँ माँ।"

"निशु कैसी हो?"

"क्या माँ, रोज एक ही सवाल?एक दिन में क्या अच्छी, क्या बुरा होना है?"

"दर्द कैसा है अब पैर में?"

"मैं ठीक हूँ।आपको पता रिया की शादी ही गई अच्छे से।अब जल्दी अंकल लोग मिलकर करवा देंगे।"

"अरे वाह मान गए सब?"

"आपको पता है क्या माँ?"

"हाँ बेटा पता है।"

"पंकज या रिया?"

"अभ्यु,अभ्यु ने बताया हमें?"

"क्या अभ्युदय जी ने?क्यों?"

"क्यों क्या होता है?हम बड़े है। पता होना चाहिए इसलिए।लेकिन रिया के पापा गलत कर रहे थे।इसलिए हमने भी कुछ नही कहा।"

"हम्म..अब सब ठीक हो जाएगा।पापा भैय्यू?"

"अभी आये नही ट्यूशन और आफिस से।"

"ठीक है माँ।"

"निशु,तुझे कोई पसन्द है शादी के लिए?"

"माँ,टाइम आने पर बता दूंगी।"

"हम्म..पर मैं बता दूँ मुझे पसन्द है वो।"

"बाय माँ।"

"शरमा गई?बाय।"

क्या ये माँ भी न? लेकिन माँ को पसंद कौन है? अभ्युदय जी या पंकज?

माँ तो हर समय पंकज-पकंज ही बोल रही थीं।कंही ऐसा तो नही के पंकज पसन्द है माँ को और वो सोच रही हैं कि मुझे भी पंकज ही नही ऐसा होना तो नही चाहिए।बाहर गाड़ी का हॉर्न बजा और मैं उठकर खड़ी हुई।

"तू तैयार है?"

"रिया, वाओ क्या लग रही है।"

रिया साड़ी पहन कर ऊपर से नीचे सज-धज कर खड़ी थी।हाथ मे एक मिठाई का डिब्बा भी था।

"चलें?"

"जाना कंहा है?"

"पहले तो भाभी को मिठाई दे दूं।फिर बताती हूँ।तू तब तक लॉक लगा।"

रिया चली गई।मैं ताला चाबी उठाकर दरवाजे तक आई।

"बू।"

"आउच।"

पीछे पलटी तो पंकज था।

"कमीने,जान लेनी है क्या?"

"दे दे यार।जान ही सही।"

"सुधरोगे नही न?"

"नही, कभी भी नहीं।तू हट मैं लगाता हूँ ताला। "

"ले पकड़।"

"चाबी के साथ हाथ भी दे दे।"

"हाँ जी क्यों नही।ख्यालों में सपनो में"

"भग जा।"

"किसके साथ?"

"मेरे..औऱ किसके?"

"चलोगे दोनो?या यंही रात करनी है?"

रिया चिल्लाई।रिया के साथ ऑन्टी भी बाहर आई थीं।

रिया ने आकर मेरा हाथ पकड़ लिया और बाहर गाड़ी तक ले आई।

"भाभी ये हैं रवीश।रवीश ये भाभी हैं,निशी की लैंडलॉर्ड।"

"नमस्ते भाभी।"

"बहुत सुंदर जोड़ी है।बहुत खुश रहिये आप दोनों।congratulation आपको।"

"थैंक्यू।"

मैं अब तक बैठ चुकी थी।लेकिन आज कार में ड्राइवर भैया नही थे।पीछे मैं रिया और रवीश थे सामने अभ्युदय जी और गाड़ी चला रहा था, हमारा नौटँकी पंकज।

"हम जा कंहा रहे हैं?" गाड़ी अभ्युदय जी की घर की तरफ ही जा रही थी पर मेडिकल पहुँचते तक मैंने पूछ ही लिया।

"आधा किलो सेब और लौंग पहले ही ले लो,वरना वंहा मिले नही तो दिक्कत हो जाएगी।"

"आपको भी पता है अभ्युदय जी?इसके दिमाग का स्क्रू न ढीला है।"

"माता रानी के दर्शन को?रवीश ये कुछ भी कहती है,त्रिपुर सुंदरी माँ से मिलकर आपको भी बहुत अच्छा लगेगा।"

गाड़ी रोककर सेब और लौंग ले ली गई, थी।हम सभी भुट्टे खाते और गप्पे मारते मन्दिर पहुँच गए थे।

"आप नहीं चलेंगे आज भी?"

"तुम जानती हो न निशी।फिर भी?मैं नहीं जाना चाहता अभी।"

"ठीक है।हम सब चलें?अभ्युदय जी नहीं जाएंगे।आप गाड़ी में ही बैठेंगे?या अंदर बेंच पर?"

"नहीं मैं यंही ठीक हूँ आज।ठंडक है आज बाहर।"

हम चारों प्रसाद लेकर अंदर चले गए।लाइन में लगकर ज्यादा देर नही लगी।आज मन्दिर में भीड़ कम ही थी।पंडित जो ने रिया रवीश को माला दी पहनने।रिया को प्रसाद में चूड़ियां और सिंदूर भी दिया।उन दोनों से अच्छे से पूजन करवाया।अब मैं और पंकज खड़े थे तो न जाने पंडित जी ने क्या सोच की उन्होंने मुझे भी प्रसाद में मंगलसूत्र और सिंदूर दे दिया।

"पंडित जी।सिर्फ प्रसाद।"

"नहीं बेटी। मेरी नही,माँ की मर्जी है।वो चाहती हैं तुम दोनों हमेशा खुश रहो साथ-साथ।"

"पंडित जी लेकिन?"

"माँ की मर्जी के आगे किसी की मर्जी नही चलती बेटी।आगे आ जाओ बेटा, टिका लगवाओ।तुम जल्दी ठीक हो जाओगी।पैर भी ठीक होगा जल्दी।"

पंकज ने सिर पर हाथ रख कर टिका लगवाया और कलावा भी बंधवाया।

पंडित जी के पैर छुए और प्रसाद के लिए हाथ बढ़ाया।

"चालीसा पूरी हो गई?"

"जी पंडित जी।लेकिन आपको कैसे पता कि मैं चालीसा पढ़ रहा हूँ?"

"बेटा माँ की आंखों में देखकर कोई बहुत देर तक कुछ नही मांगता और तुम्हे तो मिल गया है जो तुम माँ से मांगते हो?"

"कंहा पंडित जी?अभी कुछ नही मिला,न उम्मीद है।"

"बेटा माँ मुरादे पूरी करती हैं।ये बात एक दिन जरूर मानोगे।आना जरूर जब मुराद पूरी हो जाए।"

"जरूर पंडित जी।"

पंकज फिर एक तक माँ को देखता रहा।

"मैं जो चाहता हूँ वो तो आप जानती हो माँ।लेकिन वो भी किसी को चाहती है।कोशिश करना बिना दिल टूटे ही सब ठीक हो जाए।लेकिन निशी मेरी है माँ।सिर्फ मेरी।"

"हाँ जरूर होगी।चलो अब आगे बढ़ो और भक्तों को आने दो।"

पंडित जी ने पंकज को आगे सरका दिया।पीछे से निकल कर परिक्रमा करके पंकज भी हमारे पास आकर बैठ गया।

"बहुत शांति है यंहा।"

"हाँ रवीश,निशी भी हर खुशी, दुख, तकलीफ में माँ के पास आती है।मैंने सोचा तुम्हे भी दर्शन करवा दिए जाएं।"

"बढ़िया किया।आज तो मैं भी धन्य हो गया माँ के दर्शन कर के।"

"हमारे साथ रहोगे तो धन्य ही रहोगे।समझे?"

"हाँ नई नवेली दुल्हन जी।मैं सब समझ गया।"

मैं उठकर चलने को हुई तो पंकज आ गया।

"चल,गिर मत जाना।हाथ पकड़ ले।"

"गिर गई तो क्या होगा?"

"ज्यादा कुछ नही तेरी दूसरी टांग भी टूट सकती है बस।"

"तू न नालायक है एक नम्बर का।"

हम सभी गाड़ी में आ गए।मैंने अपने हाथ की अनामिका से अभ्युदय जी को टिका लगाया,प्रसाद देकर हम सभी गाड़ी में बैठ गए।रिया रवीश तो एक दूसरे की आंखों में ही डूबे जा रहे थे।मुझे पीछे बैठना असहज लग रहा था।

रास्ते मे एक-एक कप चाय और मंगोड़ी हरे धनिये की चटनी के साथ खाकर हम सभी अभ्युदय जी के घर आये।

"चलो अब अंदर भी।माँ से मिल लो।"

"जी दादा आज नही। कल।"

"क्यों?"

"दादा, रवीश का कहना है कि मिठाई बिना लिए नही।तो कल पकक्का।"

"कोई फॉर्मेलिटी की बात नही है रवीश।चलो आ जाओ।"

"समझा करिए न दादा।कल पक्का।"

"ठीक है।चलो निशी।"

"तू अभी यंही रुकेगी?"

"मशीन लगानी है न?"

"हम्म ठीक है कल मिलते हैं बाय।"

"बाय बाय।"
 
"कैसी हो निशी?पैर कैसा है अब?"

"ठीक हूँ ऑन्टी।पैर भी ठीक ही है।"

"वो रिया कंहा गयी?"

"आंटी कल आएगी।कल रात का खाना सब यहीं खाएंगें।"

"क्या पसन्द है रिया को?"

"उसे सब पसन्द है ऑन्टी।"

"ठीक है।तुम बैठो मैं पानी, रुमाल और मशीन भेजती हूँ।"

"जी।"

अभ्युदय जी भी कपड़े बदलने चले गए थे।मैं अपना फोन देखने लगी।रिया का मैसेज आया।

"रात का शो,नौ से बारह।रेडी रहना तुझे पंकज पिक कर लेगा।"

"क्यों?जरूरी है क्या?थकी नही तू?"

"सुन नाटक करना बंद कर।चली जाऊंगी तब दिखा लेना नखरे।"

"अच्छा ठीक है पर कौन सी मूवी जा रहे हैं?"

"हुड़-हुड़ दबंग।"

मुझे पढ़कर ही हंसी आ गई।

"ओके।पर फिर तेरे घर ही रुकूँगी।"

"रात भर का प्लान है लड़की।"

"अंकल?"

"पापा गए।मेरी शादी की तैयारी करनी है न?"

"तो पागल सुहागरात मना।ये मूवी क्यों?"

"पहले मूड बना लूं?फिर सुहागरात भी मना लुंगी।"

अभ्युदय जी आकर बैठ गए।मैंने भी फोन बंद कर रख दिया।

"बातें खत्म हो गईं?"

"जी।"

मैंने अभ्युदय जी को मशीन लगाई और उनका हाथ कस कर पकड़ लिया।

"बहुत दिनों से ये हाथ यही मिस कर रहा था पुच्चू।"

"क्या कहा पुच्चू फिर से उफ्फ, आपको फिर अचानक कैसे याद आ गया ये नाम?"

"आज फोन आया था न वेदी का।तो बस।"

"वेदी गई कंहा?"

"उसे निकलना पड़ा वो अभी मुम्बई है। फ्लाइट मिलते ही निकल जायेगी।"

"बेटी?"

"वो नाना-नानी के पास ही थीं।कभी-कभी मैं भी मिल आता हूँ।"

"वेदी खुश तो है न?क्या करती है वो उधर?"

"झूठ मैं बोलूंगा नहीं।सच तुम्हें पसन्द नही आएगा।"

"क्यों नही पसन्द आएगा?ऐसा क्या करती है?"

"वो वंहा एक बार में डांसर है।"

"क्या मतलब?"

"कहा था न, तुम्हें पसन्द नही आएगा।"

"नहीं ऐसा नही है।मेरा मतलब है कि जरूरत क्या है उसे ये सब करने की।घर आ जाये।यंहा नौकरी कर ले।"

"ऑन्टी अंकल को तो पता है वेदी के तलाक के बारे में पर उसके रिश्तेदारों को नही।ईसलिये वंही रहकर अपना स्टेटस मेन्टेन करने के लिए।बेवकूफ है एक नम्बर की।सुनती कंहा है पर?"

"आपकीं बात भी नही मानती?"

"मानती है,पर कहती है कि शादी कर लो मुझसे तो वापिस आ जाऊंगी।वरना जीने दो जैसे जी रही हूँ।"

"ओह।और आप क्या कहते हैं?"

"निशी 10 मिनट हो गए।"

"जी।"

मैंने मशीन बन्द की और पैर में लगा दी।

ऑन्टी आकर हमारे पास बैठ गईं।

"कल क्या बनवाना है निशी खाने में?"

"कुछ भी ऑन्टी।रिया को सब पसन्द है।"

"साउथ इंडियन?"

"नहीं ऑन्टी नार्मल खाना।पूरी सब्जी और खीर खाएंगे कल हम।"

"ठीक है।टाइम पर आ जाना सब।"

"जी ऑन्टी जी।"

आंटी उठकर गईं और चाय,सैंडविच ले आई।अभ्युदय जी का मशीन का टाइम भी हो गया।हमने चाय पी और सैंडविच खाई।

"आप मुझे रिया के घर छुड़वा देंगे?"

"रिया के घर क्यों?"

"वो आज मूवी का प्लान किया है मैडम ने।"

"रात का शो?"

"हम्म.."

"लौटोगे कैसे?"

"रवीश और पंकज भी तो होंगे।"

"ऑटो?"

"हाँ।"

"कार ले जाओ।"

"नहीं अभ्युदय जी।चार लोग हैं मैनेज हो जाएगा सब।"

"कोई दिक्कत हो तो फोन पास ही होगा ऑन रखूंगा।काल कर लेना।"

"जी।"

मैं ड्राइवर भैया के साथ रिया के घर आ गई।माहौल बड़ा बदला हुआ था घर का।हल्की रोशनी थी।परदे भी बदले हुए थे।गुलाबी सी खुशबू महकी हुई थी।जैसे पूरे रोस परफ्यूम की शीशी उड़ेली गई हो।रिया ने पिंक कलर का ही लांग गाऊन डाला हुआ था जिसमें वो खतनाक सी,बला की खूबसूरत लग रही थी।रवीश भी कुछ कम नही लग रहा था,गुलाबी शर्ट और ब्लैक ट्रॉउसर में वो भी स्मार्ट और डैशिंग लग रहा था।मैं तो ऐसे ही चली आई थी पर क्या फर्क पड़ता है।जिनका दिन और जिनकी रात वो सजें हमें क्या?10 मिनटों में पंकज भी आ गया।वो भी टी शर्ट जीन्स में था।

बढ़िया जोड़ी थी रिया रवीश एक दम हीरो-हीरोइन लग रहे थे। मैं और पंकज गरीब से साइड हीरो-हीरोइन।

"रिया तू तो एक दम हीरोइन लग रही है बे।"

"चुप कर अब शादी हो चुकी है मेरी।"

"तो अब लाइन नही मार सकता?"

"पंकज तू मुझसे पिट जाएगा।"

रवीश आज रिया की भाषा मे पहली बार बोला।

"ओहो देख ले निशी, अब तो डरना पड़ेगा भई।कहो तो जीजू बोलें तुम्हें रवीश?"

"बोलो-बोलो मुझे कोई ऐतराज नही।पर मेरी एकलौती बीवी को अब छेड़ो मत।"

"बन्द करो सब नौटंकी।मुझे सबमे रिया नजर आ रही है।रिया कितनी देर में निकलना है मूवी?"

"मूवी?"पंकज ने मुझे देखते हुए कहा।

"क्यों हम मूवी देखने जा रहे हैं न?"

"हाँ।पर अब प्लान बदल गया है।हम सब पेंच जा रहे हैं।"

"पेंच?" मैं और पंकज साथ मे बोले।

"हाँ।नाईट आउट मारेंगे और बॉन फायर भी।सुबह उठकर मोगली लैंड देखकर वापिस।"

"कितनी दूर है?सेफ तो है न?"

मेरे मन मे अलग ही उथल-पुथल थी।अभ्युदय जी को भी नही बताया है।

"डोंट वरी निशी हम सब हैं न?"

"तू डर मत मैं हूँ न?रिया जब है साथ तो डरने की क्या है बात?"

मैं जाना नही चाहती थी पर अभी कुछ कहा तो दंगे-फसाद हो जाते इसलिए चुप रही।अभ्युदय जी को फोन मिलाया पर उन्होंने उठाया नहीं।

मैंने एक मैसेज छोड़ दिया।

"प्लान चेंज्ड।गोइंग टू मोंगली लैंड,पेंच।"

मैं चुप बैठी थी, बेमन जो काम करना पड़े तो खुश कैसे होकर दिखाऊ? मेरा उदास बैठना पंकज को समंझ आ रहा था।

"क्या हुआ?"

"उनहूँ कुछ नही।"

"कुछ तो?"

"नही।कुछ भी नही।"

"बोल न?"

"पंकज।"

"निशु।"

"तू न कभी नही सुधरेगा।"

"न कभी भी नही।सच्ची।अब बोल क्या हुआ?"

"मन नही है।"

"क्यों?"

"बस ऐसे ही।"

"तो मना कर दूँ?"

"नहीं।उन दोनों को बुरा लग जायेगा।"

"क्या बुरा लगेगा?पागल हैं कबाब में हड्डी कौन लेकर जाता?और ये दोनों निरे मूर्ख हड्डियां लेकर जा रहे।"

"चल कुछ भी।पागल।"

"रुक मैं कुछ तिकड़म भिड़ाता हूँ।"

"हाँ प्लीज।"

पंकज रिया रवीश के पास गया जो अभी रवीश के माँ-पापा से बात कर रहे थे।

फोन रखकर अंदर आये तो रवीश बोला।

"निशी अगर मैं और रिया अकेले जाएं तो तुम यंहा रुक सकती हो क्या?"

"हाँ रवीश वैसे भी मेरे पैर में दर्द है।तुम दोनों होकर आओगे तो मुझे भी अच्छा लगेगा।"

"पकक्का तुम नाराज नही हो?"

"हाँ बाबा।मैं नाराज नही हूँ।"

"उसको बोलो।कह रही कि निशी को बुरा लगेगा।"

"उफ्फ।बुलाओ उस नौटँकी को।"

रिया को रवीश पकड़ कर अंदर ले आया।

"सुन।तुझे यही करना था न?पहले मूवी फिर पेंच का परपंच और निकलना अकेले था।जाना ही था तो बुलाया क्यों हमें?"

पंकज मेरे बदले स्वरूप को देख कर कुछ समंझ नही पा रहा था। पास आया और कुहनी मार कर बोला।

"बस कर रुलायेगी क्या?"

"क्यों न रुलाऊँ?ये भी तो यही करती है।"

मैं और पंकज हंस पड़े जोरों से।

"जल्दी निकल जा रिया।मेरा दिमाग बदल न जाये।"

"पकक्का न?"

"हाँ यार।आजा।"

रिया आकर मेरे गले लग गई।

"सुन आज सुहाग रात मना ही लेना।और, सुन मुझे सारी डिटेल्स चाहिए।"

"वीडियो बना लाऊं तेरे लिए?"

"मुझे कोई प्रॉब्लम नही।"

"कमीनी।"

रिया रवीश निकल गए।एक गाड़ी बुक करवाई थी उन्होंने।मैने और पंकज ने बाहर से खाना मंगवा कर खाया।

"तू आज अकेली रुकेगी?"

"पंकज,कोई नाटक नही।"

"तुझे डर तो नही लगेगा न?"

"नालायक।अब एक शब्द और बोला तो मार खायेगा।"

"सोच ले लाइट गई तो?"

"पंकजssss बस।"

"ठीक है आइसक्रीम खाएगी?"

"हाँ।ब्लैक कर्रेंट।"

"चल लेकर आते हैं?"

"नहीं दर्द है अब भी।तू लेकर आ जा।"

पंकज चला गया आइसक्रीम लेने।मैं कब लेट कर सो गई नही जानती।
 
सुबह-सुबह जब नींद खुली तो पंकज सामने सोफे पर सोया हुआ था।

"पंकज..पंकज उठ।"

"हम्म क्या हुआ?"

"अब उठो औऱ जाओ वरना आज भी जैन आंटी क्लास ले लेगी।"

"हम्म.. तू सो गई थी।कैसे जाता?"

"मेरी आइस क्रीम?"

"वो मैंने खा ली।तुझे कॉलेज जाना है?"

"हाँ।जाना है पर मैं ऑटो से निकल जाऊंगी तू निकल जा।"

"पकक्का?"

"हाँ।"

पंकज निकल गया।मैं एक झपकी लेने फिर लेट गई पर नींद आ ही नही रही थी।

फोन बजा मैंने देखा तो माँ का फोन था।

"हाँ माँ।"

"कैसी हो निशु?"

"ठीक हूँ माँ।आप, भैयू, पापा जी?भैय्यू के एग्जाम?"

"सब बढिया, सब ठीक है पर सुनो आज ही आना होगा तुम्हें।"

"क्या हुआ माँ?सब ठीक है न?"

"हाँ निशु वो मढ़ी वाली बुआ जी की बेटी थी ना, उनकी शादी है।पापा जी का कहना है कि निशु को भी बुला लो।"

"पर माँ मेरा पैर?"

"निशु वंहा बैठो, यंहा पापा जी ले लेंगे।फिर शादी में गाड़ी से ही , In pagerनिकलना है।बहुत समय हो गया है किसी से मिले।सब मिलना भी चाहते हैं।"

"ठीक है माँ।आज ही निकलती हूँ।फोन करूँगी जब ट्रेन में बैठ जाऊंगी।"

"ध्यान रखना अपना और सुनो वो लेनहगा ले आना पहनने के लिए।"

"हाँ माँ।बाय।"

माँ का फोन रखकर पंकज को फोन मिलाया।

"हाँ बोल।"

"मुझे भी साथ लेकर चलना।आज कटनी निकलना है,तो पैकिंग देखनी है।"

"ठीक है आता हूँ।"

मैंने तब तक रिया के रूम पर ताला लगाया और सीढ़िया उतर कर नीचे आ गई।दो मिनट भी नही लगे और पंकज सामने था।

"चल बैठ जा।दिक्कत तो नही होगी न?"

"नहीं।मैं ठीक हूँ।"बोलकर मैं बाइक पर बैठ गई।

"कटनी क्यों जाना है?"

"शादी है दीदी की।"

"तेरी दीदी भी हैं?"

"मतलब बुआ की बेटी की।"

"अच्छा।मेरे चाचा के ससुराल में भी शादी है पर अब मुझे तो कोई पूछता ही नही।"

"क्यों?"

"मैंने बता दिया है न माँ को कि शादी अपनी पसन्द से करूँगा या नही करूँगा।तो अब शादी की जल्दी नही है।"

"ओह।तो मतलब मेरे घरवालों ने यही सोच रखकर मुझे स्पेशली बुलाया है।"

"और नही तो क्या? चार रिश्तेदारों में बात होगी लड़की डॉक्टर,फिर लड़के वाले देखेंगे तुझे।कुछ पसन्द करेंगे फिर घर देखने आएंगे।फिर तेरी सगाई,शादी, बच्चे।"

"ओ हीरो ब्रेक लगा ले अब।घर भी आ गया और बढ़ भी बहुत स्पीड में रहा है तू।"

"किस ट्रेन से जाना है?मैं महाकौशल से निकलूंगी आराम से।"

"ठीक है फिर मिलते हैं।"

"बाय।"

पंकज मुझे छोड़कर चला गया।मैं थोड़ा असमंजस में थी कि रात को मैसेज किया था कि पेंच जाना है और अब तक फोन भी नही आया अभ्युदय जी का।या तो नाराज हैं या फिर डिस्टर्ब नही करना चाहते।

मैंने फोन मिलाया।

"हेलो।"

"गुड मॉर्निंग।आपने काल नही किया?"

"अभी कंहा हो?सफारी?"

"नहीं हम गए ही नही।मेरा मतलब सिर्फ रिया ओर रवीश गए हैं।मैंने और पंकज ने प्लान कैंसिल कर दिया था।"

"और वो कब बताने वाली थीं तुम?"

"अभी तो बताया।"

"जी बड़ी मेहरबानी आपकीं।मुझे सिवनी में कुछ काम था सोचा कि कम करवा कर तुम लोगो के साथ ही थोड़ा टाइम बिता कर वापिस आऊंगा।"

"मतलब?"

"मतलब ये की मैं सिवनी के लिए निकल चुका हूँ।"

"अच्छा।कितना टाइम लगेगा आने में?"

"शाम हो ही जाएगी।क्यों?"

"मैं आज कटनी निकल रही हूँ।"

"अचानक?क्या हुआ?सब ठीक?"

"हाँ डरने वाली कोई बात नही है,शादी है कजिन की।महाकौशल से निकलूंगी 5.10 पर।"

"चलो हो कर आ जाओ फिर मिलते हैं।"

"आप नही मिलेंगे?"

"कोशिश करूंगा कि पहुच जाऊं समय पर।"

"ओके बाय।ध्यान रखिएगा।"

"गुलाब जामुन खाओगी सिवनी के?"

"हाँ बिल्कुल आप टाइम पर आगए तो जरूर।

फोन रखकर मैंने पैकिंग कर ली।कॉलेज पहुच कर इन्फॉर्म भी कर दिया। अब ज्यादा दिन की इंटर्न बची भी नही थी। अब सभी अपने मास्टर्स के लिए पढ़ाई में जुटे थे।रिया को मैसेज कर दिया था चाबी के लिए।

मैं भैय्यू के लिए और माँ पा के लिए कुछ लेना चाहती थी पर मेडिकल में कुछ अच्छा समंझ ही नही आता।

मैं गंजीपुरा जाकर आ जाऊंगी सोचकर ऑटो में बैठकर निकल ली।पैर में प्लास्टर अब भी था पर अब दर्द कम ही था।माँ के लिए सिल्क की लाल साड़ी जिसमे पल्लू पीला था और बॉर्डर हरी ली।पापा जी के लिए एक सिल्क में ही कुर्ता और भैय्यू के लिए उसके फेवरेट जॉन सीना की टी शर्ट्स।अपने लिए भी एक कुर्ती ले ही ली।

गंजीपुरा में बहुत समय लग गया।4 बजे पंकज का फोन आया।

"कंहा है?"

"मैं गंजीपुरा।"

"स्टेशन नही निकलना?"

"अभी तो एक घण्टा है।"

"तू गंजीपुरा क्यों गई?वंहा से निकल अब,वरना लेट हो जाएगी।"

"बस निकल ही रही हूँ।"

मैं बाहर की तरफ ही बढ़ रही थी। गलियों में बिंदी,चूड़ी और कान के झुमकों में अगर आप एक बार नही रुके तो क्या गंजीपुरा गए? 20-20 रुपये के इअर रिंग्स।चूड़ियां,बिंदिया देख कर मन भर लिया और कुछ बिंदिया चूड़ियां ले भी लीं।

बाहर निकल कर देखा तो कोई ऑटो ही नही।अब क्या करेगी निशी?

10 से 15 मिनटों बाद एक ऑटो मिला।मैं जब रूम पर पहुची तो पंकज पहले ही खड़ा था बाहर।आंटी भी साथ ही थीं।

"चलें?वरना तेरी ट्रेन निकल ही जानी है।"

"हम्म.. लेकिन रिया नही आई अब तक?उसकी चाबी तू रख लेना।"

"भाभी के पास छोड़ो चाबी।"

मैने जाकर अभी वाला समान जल्दी बैग में भरा और लेकर बाहर आने लगी।पंकज पास आया हाथ से बैग लिया और गुस्से से घूरकर मुझे देखा।

बाहर ऑटो आ चुका था।

"तेरी गाड़ी?"

"भाभी यंही रहने दूँ बाइक?अभी रात में या कल उठा लूंगा?"

"हाँ पंकज।कोई बात नही।अंदर लगा दो।"

पंकज ने गाड़ी अंदर लगाई और हम दोनों आंटी को नमस्ते कर के निकल गए।रास्ते में मेरी और पंकज की ज्यादा बातें नही हुई।

स्टेशन आने के पहले मैंने बैग से निकालकर उसे एक छोटा सा गिफ्ट दिया।

"ये क्या है निशी?"

"ये तेरा बर्थडे गिफ्ट।"

"वाओ।क्या है इसमें?"

"खुद देख ले।"

"अभी?"

"मैंने चिट्स बना कर नही लिखी हैं जो यंहा नही खोल सकता।देख ले।"

पंकज ने गिफ्ट खोल कर देखा और चुप बैठ गया।

"क्या हुआ?पसन्द नही आया?"

"थैंक्यू निशी।"

"एटिकेट्स।ओ गॉड।कौन सीखा रहा है तुझे?"

"चुप कर।ये बता तुझे कैसे पता कि मुझे इसकी जरूरत थी?"

"सारा दिन तो हमारे साथ रहता है।अब पढ़ता कब है ये तो भगवान जाने।शिवानी के सहारे ही जिंदगी चलती तुम लोगों की।जानती हूँ।"

"कैसे?"

"अरे दुकान वाले से पूछा उसने बताया कि अभी न्यू सेट है ले लो आप पहले ही। बाद में तो फोटोकॉपी करके बेचनी पड़ती है।सोचा इससे अच्छा क्या गिफ्ट होगा।अच्छे से पढ़ना।"

"हम्म.. चल अच्छा है ये बुक्स हमेशा सम्भाल कर रखूंगा।"

"पता था कुछ ऐसा ही कहेगा।ये ले।"

"ये क्या है अब?"

"ऐसा जो हमेशा संभाल कर रखना होगा।"

छोटा सा गिफ्ट औऱ पकड़ाया।पंकज ने उसे पॉकेट में रख लिया बिना खोले ही।स्टेशन पर उतर कर चार नम्बर प्लेटफार्म पर महाकौशल ट्रेन लग चुकी थी।

"तू सामने की तरफ बैठ चलकर मैं समान और टिकट लाता हूँ।"

"हम्म।"

ट्रेन अभी खाली ही थी।मैं सामने जनरल के डिब्बे में आकर बैठ गई।

"पंकज।इधर।"

पंकज भी अंदर आ गया।

"इसमे क्या है?"

छोटे से गिफ्ट की तरफ इशारा करके पंकज ने पूछा।

"इसे भी खोलकर देख ले।"

पंकज ने खोला तो एक छोटी सी कांच की बोटल थी।ऊपर कॉर्क से बन्द अंदर एक विशिंग लेटर था।मिनिएचर सी विशिंग बोटल।

"वाओ निशी, थिस इस सो क्यूट।"

"यस आई नो।"

"पढू क्या लिखा है?"

"हम्म.."

"बी द वे यू आर टुडे,नेवर चेंज।विश यू आल लक पागल।निशी।"

"लव यू निशी।"

"लव यू टू पंकज पर तू मेरा सबसे अच्छा दोस्त है।"

ट्रेन चल दी।

"पंकज जा उतर।ट्रेन.."

"थैंक्यू, मैं भी कटनी चल रहा हूँ।"

"क्या?लेकिन क्यों?"

"बस आज घूमने का मन है ट्रेन में।"

"तू पागल है?"

"तूने बनाया है।"

"नाटक मत कर अभी भी टाइम है कूद जा।"

"निशी, आई एम कमिंग विथ यू।"

"अरे।पर क्यों?"

"चुप बिल्कुल।"

मेरा फोन बजा।अभ्युदय जी का था।इस पंकज की वजह से न माँ को फोन कर पाई न अभ्युदय जी को।

"हेलो।मैं निकल गई हूँ अभ्युदय जी।आपको मशीन अभी रिया लगा दिया करेगी।मैं 4 से 5 दिन में आउंगी।"

"ध्यान रखना।पंकज भी जा रहा है?"

अब इन्हें कैसे पता चला ये ???
 
"जी पंकज को भी अचानक कटनी घूमने का मन है।"

"निशी, अपना ख्याल रखना।"

"जी अभ्युदय जी,आप भी।विल मिस यू।"

"क्या सच में मुझे मिस करोगी?"

"आपको नहीं लगता क्या?"

"हम्म।पंकज को मैने ही कहा था कटनी स्टेशन में ट्रेन से उतरने में दिक्कत होगी।लेकिन सुनो अगली बार से मैं जाऊंगा तुम्हें छोड़ने।"

"वाह जी वाह।छोड़ने।लेने आने की बात करते तब तो कोई बात होती।हुह।"

"चाहती हो लेने आऊं?"

"मैं क्यों नही चाहूँगी?"

"तो पक्का रहा।बता देना जिस दिन आना हो।"

"अच्छा जी पक्का।अब माँ को फोन करके बता दूँ?"

"निशी।"

"जी।"

"कुछ नहीं।"

"आप खुद को हम दिल दे चुके सनम के अजय देवगन समझते हैं न?"

"क्यों?ऐसा क्यों कहा तुमने?"

"हर बार वही डायलॉग।निशी.. फिर कुछ नहीं।बोला नही जाता आपसे?"

"क्या नहीं बोला जाता?"

"वही।"

"वही क्या निशी।"

मैंने अपने आसपास देखा पंकज दूर था।अभी इतना खुश था उसके दिल को दुखाने का कोई इरादा नही था तो मैंने धीरे से कहा।

"वही आई लव यू।"

"अच्छा आई लव यू?"

"अभ्युदय जी।"

"हाँ निशी।"

"आप मेरी नकल कर रहे हैं?"

"नहीं सच में कह रहा हूँ,प्यार करता हूँ।"

"सच?"

"पहले मुस्कुराना बन्द करो।"

"नहीं करूंगी।बाय।"

"पागल हो पूरी।बाय।हैप्पी जरनी।"

मैंने फोन रख दिया और माँ को फोन किया।माँ को सारी इन्फॉर्मेशन पंकज के द्वारा पहले ही मिल चुकी थी।मुझ से ज्यादा तो वो पंकज के घर आने पर खुश हो रही थीं।क्या पसन्द है उसे?क्या खायेगा से लेकर सब पंकज की पसन्द।मैंने फोन रख दिया।

जो भी ब्लश चेहरे पर आया था वो अब गुस्से में बदल गया।

"क्या हुआ?"

"कुछ नही।"

"जल रही है न?"

"तुझसे?चल भग।"

"तू साथ चल तो कंही भी भाग लूंगा सच्ची।"

"पंकजss।"

"हाँ निशी sss।बोल न?"

"कुछ नहीं, छोड़।"

"मैंने कब पकड़ा तुझे?"

"तू न ओवर स्मार्ट मत बना कर।"

"मैं जब स्मार्ट हूँ तो ओवर स्मार्ट क्यों बनूंगा।"

"धन्य हो प्रभु जी।"

"खुश रहो बच्चा।"

"तुझे मज़ा आता है मुझे परेशान करके?"

"नहीं।और ज्यादा प्यार आता है तुझ पर।"

"बकवास बन्द कर ना।"

"निशी।"

"हम्म।"

"ये तेरे लिए।"

"क्या है ये?"

"खुद पढ़ ले।"

"फिर से तेरे लव लेटर तो नहीं?अभी पढूं?"

"नहीं।अभी नहीं पढ़ेगी?घर से जब मैं निकल जाऊं तब रात को पढ़ना अकेले में।और मुझे जवाब नहीं चाहिए।मैं तेरा जवाब जानता हूँ।लेकिन मैं छिपा के नही रख सकता जो मेरे दिल में है।"

"ओके।रख लूं न?पढ़ना नही है अभी?"

"हाँ रख ले।सुन?"

"हाँ बोल।"

"समोसे खाएगी?"

"हम्म, दो समोसे।"

सिहोरा में पंकज समोसे लेने उतर गया।मुझे समझ नही आता ये लड़का।सब जानता है।मेरे खयालों से,मेरे प्यार से अनजान नही है फिर भी कैसे मेरे लिए ये महसूस कर पाता है?कुछ भी कहना सुनना भी नही चाहता।बस कहता है जिंदगी भर इंतजार करूँगा।पागल है एक नम्बर का।

"तू खयालों में तो मुझे पागल कहना बन्द कर दे।"

"तुझे खयाल पढ़ने भी आते हैं पंकज?"

"हाँ।जब तू मुझे पागल कहती है वही वाले एक्सप्रेशन देगी तो समझ तो जाऊंगा ही।"

"पागल।"

"ले समोसे खा।"

पंकज और मैंने समोसे खाये और कब हम दोनों की आंख लग गई नही जानते।कटनी आने पर जो शोर मचा उससे जाग कर जल्दी स्टेशन पर उतरे।

मैंने फोन निकाल कर पापा जी को फोन मिलाया।

"रुक जा।मैंने अंकल को मना कर दिया था।"

"क्यों?"

"आएंगे लेने फिर यंहा से घर जाना वापिस।तू इतनी बड़ी अकेली ऑटो करके नही जा सकती क्या?"

"जाती हूँ हर बार।लेकिन वो पैर।"

"बहाने मत मार डरपोक।चल बाहर तक।"

हम दोनों स्टेशन से चलकर ऑटो तक आ गये थे।मोल भाव करने के बाद 100 रुपये में हमने ऑटो मंगल नगर के लिये कर लिया।

घर पहुचने में 30 मिनट का समय लगा।आज मिशन चौक पर बहुत जाम लग गया था।पंकज को झर्रा टिकुरिया नाम बताया तो उसने हंस-हंस कर पेट पकड़ लिया।

"सच मे झर्रा टिकुरिया?"

"तू हँसना बन्द करेगा बहुत हो गया।"

और मुझे भी हंसी आ गई।दोनों ही हंसते हुए घर पहुच गए।सामने की तरफ लोहे की सीढ़ियां थीं जिनपर से चढ़ कर जाना थोड़ा मुश्किल था। मैं पीछे की तरफ से चलने लगी।माँ पापा भी आ गये थे।भैय्यू पंकज के साथ सामने की लोहै की सीढ़ियों से ही आया।

पीछे की तरफ काकी माँ से मिलकर मैं घर आ गई।काकी माँ सालों से इस बिल्डिंग के इसी कमरे में रहती हैं।मशीन में पानी चलाना, टंकी भरी, नही भरी का ध्यान रखना।सभी छोटी-मोटी जिम्मेदारी काकी माँ की ही थी।

हम सभी घर आ चुके थे।और बैठ कर चाय नाश्ते पर पंकज की बातों को झेल रहे थे।
 
पंकज ने रात को ही वापिस लौटने की जिद की।पर माँ पा के सामने कुछ कह नही पाया।

भैय्यू उसे बजरिया पर नटराज के डोसे खिलाने ले गया।मैं टॉयज बस घर पर ही रहना और माँ के हाथों का ही खाना चाहती थी।

पंकज का भी खास मन नही था जाने का पर भैय्यू का मन था उसे घुमाने का।

रात को सभी छत पर बैठे थे।लाइट जाने का अलग सुख है।आसपास के सभी लोग छतों पर निकल आते हैं और एक अलग सी जिंदगी चलती है उतनी देर जितनी देर लाइट गोल होती है।अरे मेरे मतलब करंट नही आता।

"निशी।"

"कैसा लगा डोसा पंकज?"

"अच्छा था।"

"कटनी कैसा लगा?"

"मैं पहली बार थोड़े न आ रहा हूँ या .. सॉरी नो यार।"

"तुझे अब भी याद है?"

"हाँ पर तुझे ये यर वर्ड से प्रॉब्लम क्या है?तू खुद तो रिया को यर बोलती है।"

"किसी लड़के को तो नही बोलती न?"

"लेकिन दिक्कत क्या है?"

"छोटी थी जब तबला सीखने जाती थी,संगीत क्लास।तब एक छोटी बच्ची भी आती थी कत्थक सीखने उसका भाई छोटा था मुझसे।बातों ही बातों में उसे यार कह दिया था मैंने और उसकी बहन ने मुझे कहा- 'मेरा भाई आपका यार नही है।आप उसे यर क्यों कहा रही हैं?यार वर्ड अच्छा नही होता।आपको पता नही है क्या?' बस तबसे ही इस शब्द से नफरत हो गई।रिया तो है मेरी यार तो वो बोल सकती है पर कोई और कहता है तो मुझे वही बच्ची याद आ जाती है।"

"इतनी छोटी बात को अब तक दिल मे लगा कर रखा है?"

"नही पंकज कुछ बातें अपने आप ही लग जाती हैं दिल में।आपको उन्हें लगाने की जरूरत नही होती।"

"निशी देख।"

"क्या?"

"तेरा एक और चाहने वाला।"

"चल भग।वो रिज़वान है।" मैंने हाय करते हुए पंकज को कहा।

"इतनी देर से तुझे-मुझे देख रहा।नही-नही घूर रहा है,पकक्का इसे भी तू पसन्द है।"

"पागल, हो गया है क्या?अच्छा दोस्त है।पड़ोसी है और तो और बता दूँ की यंही ऑर्डिनेन्स फैक्ट्री में अप्रेंटिस कर रहा है।"

"लेकिन उससे क्या होता?तुझे घूर तो ऐसे ही रह है न जैसे खा ही जायेगा।"

"तू चल नीचे अब।लाइट भी आ गई है।"

"सुन।"

"हम्म।"

"मैं तुझसे प्यार करता हूँ।शादी भी करना चाहता हूँ।तेरे लिए हमेशा इंतजार करूँगा।"

"जानती हूं पंकज।पर"

"हाँ वो पता है। पर सोच आज पहली बार तेरे घर पर हूँ क्या पता आज तू हां कह दे।कोई मौका छोड़ना नही चाहिए।चल नीचे।"

"पंकज,मुझे माफ़ कर देना।"

"मैं तो कर दूंगा पर तेरा रिज़वान मुझे कच्चा खाने का प्लान बना लेगा।चल नीचे।"

हम नीचे आ गए।रात इतने दिनों बाद बहुत ही अच्छी कटी।रिया से और अभ्युदय जी से बात हो चुकी थी।

सुबह उठी तो पंकज तैयार था निकलने को।पापा जी उसे छोड़ने स्टेशन जा रहे थे।माँ ने पंकज को टिका करके 500 का नोट पकड़ाया।जिसे पंकज ने बहुत प्यार से माँ को मना कर वापस कर दिया।मेरे पास आकर ख्याल रखना कहकर पंकज सभी को बाय बोलकर निकल गया।

सुबह की दिनचर्या मजे से कट रही थी।शाम को बुआ जी के घर के लिए निकलना था।माँ अपनी तैयारी में लगी थीं और मैं घर पर तेज वॉल्यूम में गाने सुन भी रही थी और चीख-चीख कर गा भी रही थी।

"निशु,आकर मेरी मदद करो।"

"क्या मदद माँ?"

"कौन सी साड़ी कब पहननी है?"

"हाँ माँ आई।"

गाने का वॉल्यूम और बढ़ा कर माँ के रूम में आ गई।दो चार साड़िया देख मैंने

वह्हा होने वाले कार्यक्रम के बारे में पूछा।

"माँ कितने दिन के लिए?और क्या क्या फंक्शन है?"

"सगाई,हल्दी,शादी ये मेन होंगे जिसमे अच्छी साड़ियां पहननी होंगी।बाकी तो फिर थोड़ा डेली के लिए।"

"माँ कितने दिनों के लिए जाना है?"

"चार दिन निशु।"

"चार दिन?फिर पापा जी?वो चार दिन की लीव लेंगे?"

"तुम तो जानती हो न पापा जी को?वो सगाई से वापिस आ जाएंगे फिर बारात वाले दिन आ जाएंगे।"

"हम्म वही तो मैंने सोचा।"

मैंने माँ की सारी साड़ियों में से सबसे सुंदर तीन साड़ियां चुन लीं।

"तुम क्या पहनोगी निशु?"

"माँ शादी में लेंहगा, और बाकी दो में कोई भी सलवार सूट।"

"नहीं कोई भी सलवार सूट क्यों?ये साड़ी, ये पहनोगी तुम सगाई में।"

"माँ मैं क्यों साड़ी?नहीं मुझे साड़ी नही पहननी।"

"निशु मेरे लिए।"

"माँ, इस टूटे पैर के साथ साड़ी? प्लीज न माँ।"

"कह दिया न?"

"ठीक है मैं पहन लुंगी पर आपकीं नहीं।मैं अपनी साड़ी पहनूँगी जो मैंने अपने फेयरवेल में ली थी।"

"वो नेट की?"

"हाँ।पिंक कलर नेट वाली।"

"ठीक है।उसकी मैचिंग का भी सब है।बिल्कुल सही।वही पहनना।"

शाम को निकलना है।घर का खाना खाकर नींद में खो जाना कितना सुकून वाला होता है।सभी की तैयारी हो चुकी थी।भैय्यू का एक एग्जाम बाकी है।वो औऱ पापा जी काल रात ही वापिस आ जाएंगे।

शाम को हम निकल गए शादी के लिए।
 
हम देर रात मढ़ी पहुँच ही गए।गांवों के ज्यादा उजाला नही था पर बुआ जी के घर मे लाइट की झालरें जगमगा रही हैं।जयंती संग विजय घर की दीवाल पर रंग-बिरंगे तरीके से लिखा हुआ है। ढोल व शहनाई भी बनी हुई हैं।शुभ विवाह से घर के दरवाजे को लिख कर सजाया गया है।

जया दी बुआ जी की सवसे बड़ी बेटी हैं।घर के अंदर पहुच कर सबसे मिलना जुलना चलता रहा।फोन में नेटवर्क न होना,गांवों की जिंदगी में सुकून भर देता है।

बुआ जी, फूफा जी से मिलकर इतने दिनों बाद दिल खुश हो गया,लेकिन मेरे पैर पर लगे प्लास्टर पर सभी ने दुःख अफसोस जताया।जया दी भी बहुत खुश थीं।मुझे लगा था कि वो उदास होंगी।क्योंकि उन्हें बचपन से ही अरविंद भैया के साथ देखा था।मैं तो हमेशा सोचती थी कि अरविंद भैया की ही शादी होगी जया दी से।मैंने भी जया दी से कोई भी जिक्र नही किया।कल ही सगाई है ऐसा कहकर बुआ जी ने सभी को खाना खाकर सोने की हिदायत दे दी।

अपने फोन पर नेटवर्क न मिलने की वजह से अब उलझन हो रही थी।सामने देखा तो विनय बुआ का बेटा,फोन पर बातें कर रहा था।

"विनय।"

"हाँ जिज्जी।"

"कौन सा नेटवर्क है जो चल रहा?"

"जिज्जी आइडिया।"

"जरा एक मिनट दो न, एक फोन करना है।"

"जिज्जी मिस्ड कॉल करना।बैलेंस नही है।"

"एक मिनट की काल करनी है।"

"ठीक है जिज्जी।कर लो बात,कौन हैं?मेसेज कर लो जिज्जी फ्री हैं।"

"फोन दो।"

मैंने फोन लेकर अभ्युदय जी को फोन लगाया।पर उन्होंने फोन उठाया ही नहीं।शायद नया नम्बर देखकर।तीन बार में भी जब फोन नही उठा तो मैंने फ्री मेसेज में से एक मैसेज कर दिया।

"निशी हियर।वांट टू टॉक।"

फोन लिए आधे घण्टे हो गए पर न फोन आया न मेसेज।विनय आकर अपना फोन ले गया।

मैं भी कल क्या-क्या होना है,जीजा जी क्या करते हैं, वगैरह-वगैरह बात करते सो गई।

सुबह उठकर सभी नहाने धोने में लगे ही थे कि विनय पास आया और बोला

"जिज्जी अपना के उनका फोन आवा रहा।"

"किनका?"

"अपना के उन का।"

"विनयssss?"

"जिज्जी आपने जिनको फोन किया था कल उनका।"

"हाँ तो ऐसे कहो न,अपना के उनका।हुह।"

"आवाज़ अच्छी है।"

"अच्छा?क्या बोले?फोन दो जरा अपना?"

"अब तो फीस लगेगी।"

"फोन दो।"

"फीस?"

"क्या फीस बताओ?"

"फ़ोटो दिखाओ उनकी।"

"हाँ दिखा दूंगी।फोन दो।"

मैं फोन लेकर आंगन की तरफ आ गई,अभ्युदय जी को फोन किया तो उन्होंने फोन काट दिया।

"फिर बिजी?हुह जाओ अब फोन करूँगी ही नहीं।"

अपने आप से बात करते जैसे ही फोन देने मुड़ी फोन बजा।

"हेलो।"

"हेलो निशी।कैसी हो?"

"ठीक हूँ।आप कैसे हैं?"

"मैं भी ठीक हूँ।तुम पहुच गई हो शादी में?"

"जी।यंहा नेटवर्क नही है एयरटेल में।"

"कोई बात नही।विनय का फोन है न?"

"आपको नाम भी याद हो गया अभ्युदय जी?"

"अब वो तुम्हारा भाई बात ही इतनी करता है कि बस पूछो मत।सारी कुंडली निकालना चाह रहा था।"

"अच्छा।मुझे बोला आपकीं आवाज अच्छी है और फीस लेगा फोन देने की।"

"अच्छा?क्या फीस?"

"अभी तो आपकीं फ़ोटो देखना है उसे।"

"एक काम करो।उसे आमिर खान की फ़ोटो दिखा देना।"

"हा हा।पागल हो जाएगा मेरा भाई।आ भी न?"

"अपना ध्यान रखो।पैर ठीक है?"

"जी मैं ठीक हूँ।पैर भी ठीक है।कल जाकर प्लास्टर यंही कटवा दूंगी।शादी में तो कम से कम नाच पाऊंगी।"

"और कोई हड्डी मत तोड़ लेना।ध्यान से सब।"

"हाँ बाबा।आप काल करते रहना।जब भी मन करे।और इस नालायक का फोन नम्बर सेव कर लीजियेगा।उठाइयेगा नहीं, गरीब इंसान के फोन में बैलेंस नही होता।"

"ऐसे नही कहते।मैं कर लूंगा फोन।ठीक है अब जो एन्जॉय करो।"

"बाय,मिस यू।"

"बाय निशी।यू विल नेवर नो व्हाट आई फील।"

"क्यों?बताइये?बताएंगे तो पता चल जाएगा।"

"नहीं कभी ओर अभी बाय।"

88

अभ्युदय जी से बात हो जाने से अब खुश थी मैं।

पापा जी और भैय्यू के साथ जाकर अपना प्लास्टर भी कटवा चुकी थी।

"आप तो खुद डॉक्टर हो।आपको क्या बताना कि अब क्या करना है?"

"जी सर।मैं कर लूँगी आगे सब,सिकाई भी और एक्सरसाइज भी।"

"गुड निधि।"

"सर निशी।"

"ओह वेरी नाइस नेम।"

"थैंक्यू सर।माइसेल्फ वीर प्रताप सिंह।"

"नाइस टू मीट यू सर।"

हल्के पैर से लंगड़ाते हुए मैं वापिस आ गई।गांव के छोटे से अस्पताल को अच्छी तरह चला रहे थे डॉ.वीर।

शाम का वक्त,सगाई/फलदान में साड़ी पहनने की जद्दोजहद शुरू हो गई।

"माँ, जरूरी है साड़ी?"

"हाँ निशी।आज तो बहुत जरूरी है।जानती नही क्या कौन आ रहा है?" जया दी तैयार होते वक्त आंखे मटका कर बोलीं।

"कौन आ रहा है दीदी?"

"आज एक डॉक्टर आ रहा है तुम्हें देखने।शादी के लिए।"

"क्या?" मैंने माँ की तरफ नजर घुमाई।

"मुझे मत देखो निशु,ये बुआ जी ने बुलाया है किसी को।"

, In pager"आपने मुझे बताया भी नहीं।"

"मुझे भी सुबह ही पता चला।"

"झूठ मत कहिये माँ।"

"बेटा शादी तो करनी ही है,आज नहीं तो कल।तो लड़के देखने मे बुराई क्या है?"

"माँ अभी मेरा मास्टर्स भी जरूरी है।"

"लड़का डॉक्टर है तो समझेगा न तेरी पढ़ाई।"

"पर माँ।"

"निशु क्यों झगड़ रही है?शादी मत करना सगाई कर के अगले साल कर लेना शादी।ठीक है न मामी जी?"

जया दी भी न आज अजीब सी होकर बातें कर रही हैं।मन मे अजीब सी चिड़चिड़ाहट भर गई।

साड़ी पहन कर बिना मेकअप किये ही मैं कमरे से बाहर निकल आई।

"जिज्जी।आपका फोन।"

"आया क्या?देना।"

"आया नहीं, अभी आएगा।आया था लेकिन तब हम यंहा-वंहा लगे थे।"

मैंने फोन लेकर अभ्युदय जी को फोन लगा दिया।सामने से फोन कट गया।

अब इन्हें भी बात नही करनी हुह ऐसा सोचकर फोन देने को मुड़ी।फोन आया।

"हेलो।"

"हाँ निशी।कैसा है पैर?दर्द ठीक है?वंहा एक्स रे तो नही हो पाया होगा?"

"मेरी शादी हो रही है और आपको एक्स रे की पड़ी है?"

"शादी?कब?किससे?कौन है वो बेचारा?"

"आपको मज़ाक सूझ रहा है?रखिये फोन।आपसे अच्छा तो पंकज है वो कम से कम लड़ाई करता मेरे लिए।"

"निशीsss पहले थोड़ा शांत हो जाओ।अब ये बताओ कि क्या आज ही शादी हो रही है?"

"आज नहीं।वो मेरा मतलब है कि आज लड़का देखने आएगा।"

"तो क्या बुराई है उसमें?"

"अभ्युदय जी।आपको समझ भी आता है कि नही?"

"क्या?"

"क्या?क्या??"

"अरे बाबा क्याsss?"

"यही कि प्यार करती हूँ आपको।शादी करना चाहती हूँ।"

"जानता हूँ निशी।मैं भी चाहता हूँ पर सुनो अभी जो माँ पा कहते हैं करो।मैं जल्द ही अपनी तरफ से कुछ करता हूँ।"

"क्या?"

"अरे मतलब अपने माँ पा को भेजने की तैयारी।"

"पकक्का?"

"हाँ।अब मूड मत खराब करो।जाओ तैयारी करो।"

"आज तो बिल्कुल भी तैयार नही होना मुझे।वो डॉ देख कर ही भाग जाए तो बढ़िया।"

"पागल हो पूरी।जाओ अच्छे से तैयार हो।माँ को परेशान मत करो।"

"कोई और ब्याह के ले जाएगा आप माँ की परेशानी की चिंता करते रहना।"

"शांत हो जाओ पुच्चू।"

"आप ना।शांत हो गई।"

"पकक्का पुच्चू?"

"बस कीजिये ये पुच्चू-पुच्चू।मैं ठीक हूँ।" चेहरे पर मुस्कान थी और अभ्युदय जी को संतुष्टि।

मैं फोन लिए हुए ही कमरे में वापिस आ गई।लिपस्टिक उठाकर सजने लगी तो माँ और दीदी दोनों के चेहरे खिल गए।

"सुंदर लग रही हो निशु।"

"थैंक्यू बुआ जी।"

"जाओ जाकर वंहा थाली में सामान जमवाओ।"

"जी बुआ जी।"

सगाई फलदान की रस्में पूरी हो गईं।जीजा जी बहुत ही अच्छे लगे मुझे।

"निशी यंहा आओ।"

बुआ जी ने मुझे अपनी तरफ बुलाया।

मैं अब डर रही थी कि होने को है जिसका मुझे अंदाजा है।

"ये है डॉक्टर..वीर।"

"वीर?सर आप?"

"अरे निधी,नन नन निशी?"

"जी।एक ही न के साथ निशी।"

"व्व व्व वो मैं समझा नही और नाम भूल गया था।सामने देखा तो पहचान भी नही पाया।"

"सर इट्स ओके।"

बुआ हम दोनों को देखती रहीं।

"आप दोनों जानते हैं एक दूसरे को?"

"जी वो बुआ जी आज आपने ही हमारा प्लास्टर हटाया है।"

"अच्छा।ये तो और भी बढ़िया बात है।भाभी सुनो जरा।"

बुआ जी चली गईं।

"तो निशी।अभी तो पी जी की तैयारी चल रही होगी?"

"जी सर।"

"वीर नाम है मेरा।यू कैन काल मि वीर।"

"हम्म।ओके वीर।जी अभी तैयारी है पी जी की।"

"आप मुझे पसन्द हो।मैं आपको पसन्द हूँ?"

"मतलब?"

"मतलब आपको बताया नही गया क्या?'

"क्या नही बताया गया वीर।प्लीज् क्लियर ।"

"गलत बात है ये।लेकिन कोई बात नहीं, मैं बताता हूँ।"

"जी बताइये।"

"हमारी शादी की बात चल रही है।डॉक्टर हैं दोनों कहकर बस अपनी ही कहते हैं ये बड़े।मैं किसी और को पसन्द करता हूँ,लेकिन माँ पा।"

"वो कंहा हैं?आए हैं क्या?"

"नहीं पापा आये है।उन्हें तुम पसन्द हो,मुझे भी तुम पसन्द हो।"

"मतलव?"

"मतलब पसन्द तो हो पर इतनी नही कि शादी कर लूँ।"

"ओह.. उहमह.. ये तो अच्छी बात है।"
 
Back
Top