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अधूरी ख़्वाहिश

रात भर चारों लोग न जाने किन बातों में लगे रहे।सुबह-सुबह चार बजे सबकी नींद लगी थी शायद।अभ्युदय मेरे पास पड़ी चेयर पर,रिया और माँ बगल वाले बेड पर और पंकज दूसरी साइड की चेयर पर।

मेरी नींद खुल गई थी और इन सबको डिस्टर्ब करने का मेरा कोई मूड नही था।

पापा जी मुझे फोन दे गए थे नया।मैं उसे ही उठाकर देखने लगी।माँ और पापा जी का नम्बर सेव किया।रिया,अभ्युदय जी का भी।पंकज का नम्बर अब भी मुझे याद नही हुआ तो सोचा बाद में ही करूँगी। मैंने फोन का कैमरा शुरू किया और सबकी वीडियो बना ली।पंकज के खर्राटे,अभ्युदय जी का सिर को चेयर पर टिकाना अजीब तरीके से।वीडियो बना कर भी जब बोर हो गई तो अपनी ही फोटोज लेने लगी। अजीब-अजीब मुँह बनाकर,अजीब-अजीब सी भौहें चढ़ाकर।

अचानक ही हंसने की आवाज सुनाई दी।मैंने देखा तो अभ्युदय जी मुझे देखकर मुस्कुरा रहे थे।

"बस भी करो।"

"आप कब जागे?"

"अभी-अभी।"

"बताना चाइये था न?"

"तुम्हारे इतने सारे चेहरे कैसे देखता फिर?"

"अभ्युदय जी गलत बात।"

"क्या चुपचाप वीडियो बनाना, गलत बात नही?"

"आप जाग रहे थे?"

"हाँ,जाग रहा था।"

"चाय पीने का मन कर रहा है।"

"पियोगी?"

"अभी कैसे लेकिन?"

"रुको।"

अभ्युदय जी ने ड्राइवर भैया को काल किया और चाय लेकर आने को कह दिया।

दस मिनट भी नही लगे और चाय हमारे सामने थी।

"थैंक्यू अभ्युदय जी।"

"कैसा थैंक्यू?तुम से ज्यादा मेरा मन हो रहा था चाय पीने का।"

"तो पहले क्यों नही मंगवाई आपने?"

"उधर देखो।"

चाय के कम से कम 20 से 25 डिस्पोजल कप पड़े हुए थे।

"इतनी चाय?आप सभी ने पी?"

"तुम्हें मिस किया हमने।"

"तो उठाया क्यों नही?"

"तुम बहुत गहरी और सुकून की नींद में थी निशी।"

"अभ्युदय जी रिया के लिए क्या प्लानिंग की है आप दोनों ने?"

"सब कुछ फाइनल कर दिया है।शादी 3 दिन बाद होगी, 7 अगस्त को।"

"7 अगस्त?"

"हाँ।क्यों क्या हुआ?"

"वो रिया का बर्थडे भी 7 अगस्त ही होता है।"

"ये तो और अच्छा है।रवीश को जन्मदिन और एनीवर्सरी अलग-अलग याद नही करनी होगी।"

"वेरी फनी,अभ्युदय जी।मैं तो भूल ही गई थी।हम दोनों में यही स्पेशल है, 7 जुलाई मैं,7 अगस्त वो।"

"फिर तो अच्छा सेलिब्रेशन होना चाहिए और भी प्लानिंग करनी होगी।"

"अभी तक क्या-क्या प्लानिंग है,वो भी तो बता दीजिए।"

"निशी सब जाग जाएंगे,धीरे बोलो।"

"सॉरी।अब धीरे ही पूछ रही हूँ, बता दीजिए न?"

मैंने धीमी आवाज में कहा।

"शादी गायत्री मन्दिर में सुबह 11 बजे होगी।रवीश की ट्रेन 9 बजे आ जायेगी।"

"अगर लेट हो गई तो?"

"शुभ-शुभ ही बोलो।कुछ गड़बड़ नही होनी चाहिए।"

"हाँ पर रिया की शादी होनी है न?शांति से होगी नहीं।उसकी शादी में पंगे न हों ऐसा होना मतलब गधे के सिर पर सिंग होना है।"

"निशी आगे सुनो।शादी के बाद दोनों का अरिहंत में कमरा बुक करवा दिया है।शाम को ही टिकट है वापिस दिल्ली की।"

"अरे,ऐसा क्यों?उसी शाम को क्यों?दोनो को साथ मे रहने का मौका भी नही मिलेगा क्या?और सुहागरात का क्या होगा?"

"मिलेगा न।सुहागरात न मना कर सुहाग दिन भी तो मनाया जा सकता है न?"

"हम्म.. पर फिर भी।ये तो साथियां मूवी सा हो गया न?"

"उफ्फ,तुम और तुम्हारे ये खयालात।मूवी क्यों ले आई अब बीच मे?"

"तो?शादी करके वो दिल्ली ये अपने घर?"

"कौन अपने घर?"

"रिया?"

"रिया भी दिल्ली जा रही है।रवीश-रिया का रेज़र्वेशन हो गया है।दोनों ही निकलेंगे साथ में।"

"लेकिन रिया क्यों?"

"ताकि वो अपने पापा को बता सके।"

"हम्म..ये भी ठीक है।यंहा ही हुई तो अंकल तो इसका पता नही क्या करेंगे।कुछ पंगा हुआ तो?"

"वकील है न अपने पास!"

"कौन वकील?"

"रवीश।"

हम दोनों साथ ही मुस्कुरा दिए।

"अभ्युदय जी।"

"हम्म.."

"हमारी शादी.."

"निशी, अभी नही।"

अभ्युदय जी ने अपने मुह पर उंगली रखकर माँ की तरफ इशारा कर के कहा।

मैं चुप हो गई।कुछ भी नही कहा बस अभ्युदय जी की आंखों में देखती रही।

"रिया को लेहगा गोल्डन चाहिए।"

"ह्म्म्म.."

"अभ्युदय जी।"मैंने जोर से कहा।अभ्युदय जी अब भी मेरी आँखों मे खोकर ही बैठे थे।

"हम्म बोलो।क्या हुआ?"

"रिया का लेनहगा? गोल्डन चाहिए उसे।"

"वो सब तुम वेदी से बात कर लेना।उसका नम्बर सेव कर लो।"

मैंने वेदी का नम्बर ले लिया।

बातें करते कितना समय बीत गया।माँ की नींद खुली तो देखा मैं और अभ्युदय जी बातों में व्यस्त हैं।

माँ उठकर पास आईं।सिर पर हाथ रखा और बहुत प्यार से गले लगा कर पूछा।

"अब कैसा लग रहा है निशु?"

"मैं ठीक हूँ माँ।दर्द तो बिल्कुल भी नही है।"

"आपको नींद ठीक से नही आई न?"

माँ की आंखे बिल्कुल लाल हो रखी थी।

"मैं ठीक हूँ निशु।बस नहाकर पूजा के लुंगी अच्छा लगेगा।"

माँ ने रिया कप जगाया और उसे लेकर रूम चली गईं।

वार्ड रूम में मैं अभ्युदय जी और पंकज थे।
 
पंकज अब भी घोड़े बेचकर सो रहा था।उसके खर्राटों से अब दिक्कत नही हो रही थी।पंखे और पंकज के बीच कोई प्रतिस्पर्धा सी चल रही थी।

कभी पंकज की आवाज तेज होती तो कभी पंखे के खड़खड़ाने की।मैं और अभ्युदय जी इस बात पर बिना बात ही मुस्कुरा रहे थे।

"अभ्युदय जी।रिया के घर मे कैसे और कौन बताएगा?"

"तुम्हे कुछ भी नही पता है निशी।"

"ऐसे कैसे?ऐसा क्यों पर?"

"क्योंकि रिया के पापा को अच्छा नही लगेगा कि तुमने उन्हें झूठ कहा।वो तुम्हे रिया की तरह ही अपनी बेटी मानते हैं।उन्हें धोका दिया तो उनका भलाई पर से विश्वास उठ जाएगा।"

"ऐसा होगा?मैं खुद ही बता देती हूं फिर तो अंकल को कि रिया क्या कर रही है।"

"तुम बस शांति से चलो और कुछ नही करना है।"

"हम्म।ठीक है।"

"अभी तो देखना है कि रिया की शादी की बात से कितना हंगामा होगा।और सुनो माँ को पता चल गया है रिया की शादी का लेकिन हम तीनों ने यह कह दिया है कि तुम्हें पता नही है।तो अनजान ही रहना।"

"हाँ जी।नही बोलूंगी।"

"माँ ने सिर्फ एक बात कही जो कि मेरे दिल को भी बहुत हद तक छूकर निकली है।"

"क्या बात अभ्युदय जी?"

"माँ ने कहा कि हम सब अपने न पैदा हुए बच्चे से भी कितना प्यार करते हैं,उसके लिए सपने संजोते हैं तो रिया तो उनकी इतने सालों जीती परछाई है।ऐसे दुःख से कितनी तकलीफ होगी उन्हें।"

"माँ हमेशा सच कहती हैं।"

"निशी,माँ का दिल मत दुखाना कभी भी।"

"कोशिश तो यही होगी अभ्युदय जी।"

"आज सारे और काम हो जाएंगे।वरमाला वगैरह सब।"

"मेंहदी कब लगेगी?"

"तुम्हारे इसी रुम में मेंहदी वालों को बुला लेंगे,पर सुनो तुम नही लगा पाओगी।"

"क्यों?क्यों नही लगा पाऊंगी?मुझे बहुत पसंद है मेंहदी और उसकी खुशबू भी।"

"खुशबू नही कहते उसे।बदबू कहते हैं।ठीक है लगवा लो,जब तक उसकी बदबू हट नही जाएगी मैं एक्सरसाइज नही करवाऊंगा।"

"इतनी नफरत?मेंहदी से।भला क्यों?'

"नफरत नही है निशी।बस पसन्द नही है मेंहदी।माँ भी सिर्फ करवा चौथ ही लगा पाती थीं।मैं बहुत रोता था गर माँ मेंहदी कभी लगवा लेती थीं तो।"

"तो मतलब अपनी शादी पर भी हम मेंहदी नही लगवाएंगे?"

"नहीं बिल्कुल भी नहीं।"

अभ्युदय जी बोल तो गए पर बोलने के बाद उन्होंने एक बार अपना चेहरा उठा के पंकज को देखा।

"निशी, एक बात सच-सच बताओगी?"

"पूछिये।हम तो कभी झूठ बोलते ही नही हैं।"

"तुम क्यों शादी करना चाहती हो मुझसे?"

"जवाब आसान है अभ्युदय जी।प्यार करते हैं आपसे।"

"निशी प्यार क्या होता है?जानती हो?"

"आपने एक सवाल बोला था लेकिन ठीक है हम बता देंगे कि प्यार क्या है।प्यार कोई पैमाना नही अभ्युदय जी जिसे हम बता सकें।प्यार तो एक इबादत है।प्यार सच्ची पूजा है।प्यार को नापना गलती होगी,प्यार को समंझ पाना आसान नहीं।आकाश की ऊंचाइयों से ऊंचा है प्यार।समुंदर की गहराइयों से गहरा है प्यार।एक बार डूबेंगे अगर इसमे तो उबर नही पाएंगे।प्यार ही वो मंजिल है जिसके चलते हर मुकाम पूरे होते जाएंगे।"

"निशी, रियलिटी में आओ पुच्चू।"

"कैसी रियलिटी?क्या आपसे प्यार हो जाना रियल नही हो सकता?और अगर ऐसा है तो वेदी के प्यार को कैसे समझ लेते हैं आप?मेरे प्यार पर क्यों इतने प्रश्न लगा रहे हैं?"

"जब वेदी ने मुझसे प्यार किया मैं,ऐसा मैं नही था निशी।"

"अब आप ऐसे अभ्युदय जी हैं तो क्या वेदी का प्यार आपके लिए खत्म हो गया?"

"तुम सच्चाई से दूर बस प्यार में रहकर बात कर रही हो पुच्चू।समझने की कोशिश भी नही कर रही हो कि आखिर मैं कह क्या रहा हूँ।"

"मैं सब समझती हूँ अभ्युदय जी।आपके साथ रहना,आपको एक्सरसाइज करवाना।आपके साथ बैठना बातें करना भी प्यार ही है।आप जो सोच रहे हैं अगर बस वही करना प्यार है।या उसके बिना प्यार न होना संभव नही तो ये आपके सोच की दिक्कत है।मेरी नही।"

मेरे कहने में गुस्सा साफ झलक रहा था।शायद अभ्युदय जी का मतलब शादी के बाद बनने वाले संबंधों के आधार पर प्यार को नापने-तौलने पर चल रहा था।

ऐसा कैसे सोच सकते हैं वो?बिना मतलब ही ऐसा सोचना कि उनकी क्षमता या अक्षमता पर उनसे प्यार किया जाना चाहिए।हुह गुस्से में मैंने आगे कोई बात ही नही की।

पंकज अब अपनी चेयर पर ऊंघ रहा था।

"गुड मॉर्निंग निशी।"

"बात मत करो मुझसे,अभी।"

"सुबह-सुबह शेरनी को किसने छेड़ दिया?इतना गुस्सा?"

"पंकज.."

"निशी सुन।तू किसी को प्यार करती है तो उससे गुस्सा होना भी बनता है।पर कभी अपना ते गुस्सा साइड रख कर सोचा कर की वो इंसान तुझसे कितना प्यार करता होगा जो,प्यार करते हुए भी तुझसे पूछ रहा है,तेरी खुशियों के लिए सोच रहा है।छोटी-छोटी बातों को हम बहुत बड़ा कर देते हैं।उसके पीछे के सार को समझने की कोशिश किये बिना ही।"

"तू ज्यादा ज्ञान मत दे।मुझे नही सुनना।"

"नही देता पर सोचना जरूर जो कह रहा हूँ।"

पंकज बाहर की तरफ निकल गया।

मैं पंकज की बातों पर गौर करती कुछ कहती अभ्युदय जी को उससे पहले ही माँ और रिया आ गए।अब तो मेरी और अभ्युदय जी की बात हो पानी मुश्किल थी।

माँ नाश्ते में पोहे बना कर लाई थीं।

"पोहे?अभ्युदय जी के भी फेवरेट हैं।"

"अरे वाह अभ्यु बेटा, आइये लीजिये।निशु को भी बहुत पसन्द हैं पोहे।"

"जी माँ मुझे भी।पोहे भी और आपकीं नि.."

"जी बेटा?"

"कुछ नही माँ।"

मैं अभ्युदय जी को पोहे खाते हुए बस देखे जा रही थी।

"आपकीं नि5 शी क्यों नही कहा आपने?डरते हैं आप?किससे डरते हैं?

मैं आपकी तरफ हूँ जानते हैं फिर भी?आपको निडर होना अपनी बात रखना मैं सिखाऊंगी अभ्युदय जी।वायदा ही ये मेरा खुद से।"मन मे चल रही बातें कही तो नही बस ठान लिया कि अब क्या करना है।
 
आज का समय भी हंसते बतियाते बीत गया।माँ ने बहुत बार ये दिखलाने की कोशिश की कि पंकज पसन्द आया उन्हें,लेकिन मेरा न ध्यान देना ही बेहतर था।वैसे भी माँ को तो हर दूसरा लड़का पसन्द आ जाता है।

शाम को माँ से मिलने अभ्युदय जी की माँ भी आईं।

"आपसे मिलकर बहुत ही अच्छा लगा।लगा ही नही पहली बार मिले हों हम।घर भी आना जब अगली बार आना।"

"आपसे मिलकर भी बहुत अच्छा लगा भाभी जी।"माँ ने ये भाभी जी क्यों कहा नही जानती,शायद उम्र में बड़ी हैं आंटी इसलिए।

दोनो की बातें कुछ देर चलती रही और न जाने किस बात पर माँ का मूड कुछ खराब सा नजर आने लगा।

"देखिए भाभी जी निशु हमारी नाक है।ऐसा कुछ मत कहिएगा की हमें लगे कि गलत कह दिया आपने कुछ।"

"आप नाराज़ हो गईं?मैंने तो एक बात कही की बच्चे आपस मे बहुत अच्छी तरह घुल-मिल गए हैं।गलत क्या कहा?"

दोनों की बातों से समंझ आ रहा था कि एक माँ रिश्ता जोड़ने की बात कर रही थी जो दूजी माँ को शायद पसन्द नही आया।

बीच मे पड़कर किसे अपनी जान गंवानी है सोचकर हम सभी चुप थे।

पंकज धड़धड़ाते हुए अंदर घुसा।पहली बार एकदम सही समय पर।

"माँ जल्दी निकलना होगा अब। समय नही बाकी है।मदन महल सोचा था मैंने पर जबलपुर मैन स्टेशन ही जाना होगा।चलिए अब।"

"हाँ बेटा।"

माँ उठ खड़ी हुई।आकर मेरे पास प्यार से सिर पर हाथ फेरा और माथे को चूमते हुए बहुत सी हिदायतें दे डाली।खयाल रखना से शुरू होकर, न जाने क्या-क्या।

आज स्पेशल डायलॉग भी कहा गया 'निशु तुम नाक हो अपने माँ पा की इस बात का भी ख्याल रखना।' उफ्फ ये माँ भी न इतनी मेलोड्रामैटिक कैसे हो जाती हैं?

रिया को गले लगा कर उसे भी बहुत सी बातें समझाई।शादी से लेकर घर पर कैसे सबका दिल जीतना है वगैरह-वगैरह।

अभ्युदय जी पास आये पर माँ तो गुस्से में थीं।कुछ कह न दें।

मेरा दिल तेज धड़क रहा था।अभ्युदय जी ने कुछ गलत नही किया उन्हें कुछ कह दिया माँ ने तो मैं क्या, कैसे.. नहीं.. मुझे रोकना चाहिए माँ को या नहीं?

लेकिन माँ तो माँ ही होती हैं न।

माँ ने अभ्युदय जी को गले लगाया और प्यार से सिर पर हाथ रखा।

"आप बिलकुल ठीक हो जाइये बेटा, आपको ठीक होना ही है।"

"जी माँ।निशी है न।मैं जल्दी ही ठीक होकर आपसे मिलने आऊंगा।"

"हम इंतजार करेंगे अभ्यु।"

माँ भी न,मैं तो डर ही गई थी कि जो सोचा है मैंने वो आज ही खत्म।लेकिन ईश्वर है कंही न कंही और प्रेम तो सदियों से है ही।

माँ की आंखों में आंसू थे और वो फिर आकर गले लग कर चली गईं।

मेरा मन भी दुःखी हो गया था।आंटी घर निकल गई थीं, सिंह सर के साथ।पंकज और रिया अभ्युदय जी की गाड़ी से माँ को स्टेशन छोड़ने चले गए।

अब कमरे में थे सिर्फ मैं और अभ्युदय जी।हमारे बीच ही फैला पसरा था सन्नाटा।क्योंकि दुःखी मन से बात हो ही नही रही थी और एक मन जानता था मेरे दुःखी मन की व्यथा।

न जाने क्या सोचकर अभ्युदय जी बोले।

"निशी, मैं वेदी को बुला लेता हूँ।"

"क्यों? नहीं। मतलब,मेरा मतलब है कि वेदी क्यों?कुछ काम है?"

"तुम इतना मतलब-मतलब क्यों कर रही हो?वेदी तुम्हें पसन्द नही क्या?"

"मुझे क्यों नापसंद होगी वेदी?आपकीं पसन्द मेरी पसन्द।"

"तुम भी न जाने क्या बातें लेकर सोचती हो।मैं चाहता हूँ कि रिया की शादी के लिए जो ड्रेस तुम चाहती हो वो तुम वेदी से डिस्कस कर लो,बस इसलिए ही वेदी को बुला रहा था।"

"जब बुला ही रहे थे तो पूछा क्यों?बुला लीजिए।हम आपके हैं कौन?"

"तुम न निशी, कभी-कभी समंझ नही पाता हूँ तुम्हें, तुम्हारी बातों को, तुम्हारे इशारों को, तुम्हारे लफ्ज़ो को भी।"

"अच्छा।तो सीधे शब्दों में कह रही हूं, अभी अकेले ही रहना चाहती हूं मैं आपके साथ रहना।"

"ऐसा कहा फिर।लो बैठा हूँ अकेले तुम्हारे पास।"

"हाथ दीजिये अपना।"

"निशी कोई आ जायेगा।ठीक नही लगता।"

"ऐसा है कि फिजियो हूँ सब जानते हैं।अगर थोड़ी सी स्ट्रेचिंग करा दी मैंने तो कौन सा पहाड़ टूटना है?"

"ओह फिजियो।मुझे लगा"

"क्या लगा?"

"नही कुछ नही।"

"अब तो बताना होगा।"

निशी तुम ना।ऐसा वैसा कुछ नही है जैसा तुम सोच रही हो।"

"हुह झूठे।"

"हाँ वही-सही।"

"मतलब नही बताएंगे?"

"बिल्कुल भी नही।"

"हाथ दीजिये।"

अभ्युदय जी ने इस बार हाथ दे दिया।मैंने हाथ लेकर एक किस्सी हाथ पर दे दी।

अभ्युदय जी बिल्कुल शांत हो गए।उन्होंने मेरे चेहेरे को ऊपर किया जिसे मैंने छिपा लिया था।

"निशी, कोई डरने वाले काम नही किया तुमने।"

"हाँ मुझे पता है कहकर मैने हाथ को तेजी से मोड़ा।आज शायद दर्द ज्यादा था तो आंख से आंसू गिरने को ही था।मैंने उस आंसू को पकड़ लिया और अपने हाथों पर मलकर अपने बालों पर लगा लिया।

न जाने मैंने ऐसा क्यों किया?मैं वजह भी नही जानती।

लेकिन प्रेम में अपने प्रेमी की हर चीज़ से प्यार होता है शायद फिरवो भले ही आँसू ही क्यों न हों।
 
माँ को छोड़कर आने के बाद पंकज और रिया सीधे मेडिकल ही आ गए।आज सब डिसाइड, होना है कि कल क्या होगा क्या नहीं।आखिर कल ही तो सब फाइनल करके परसो सुबह शादी होगी रिया की।

"माँ को अच्छे से बैठा दिया?"

"फोन भी कर दिया पापा जी को। टेंशन न ले या तेरी मम्मी मेरी मम्मी।"

"तू न ज्यादा स्मार्ट मत बन।आया बड़ा, तेरी मम्मी मेरी मम्मी।" रिया ने चिड़चिड़ाते हुए कहा।

अभ्युदय जी अब भी शांत थे।शायद हाथ का दर्द बढ़ गया था उनके।

"दर्द हो रहा है?"

"नहीं निशी।तुम हो न,फिर क्यों दर्द होगा?"

"पक्का?"

"हाँ पक्का।"

"अब हम कल के बारे में बात करें?" रिया ने बीच मे आकर बोला।

"हाँ तो सुनो सब।कल सारी तैयारियां हो जाएंगी।मैंने और अभ्युदय जी ने सब कर दिया है।बस रिया तुझे अपना लेनहगा पार्लर देखना है।"

"तू पागल हो गया है क्या पंकज? अभी क्यों खर्चा करना है पार्लर का?वैसे भी दिल्ली में क्या कंहा है मुझे क्या पता?"

"वेदी ने सब करवा दिया है।फ़िगरेट में सब कुछ बुक्ड है। " अभ्युदय जी बोले।

"फ़िगरेट?"

मैं और रिया एक साथ ही बोले।

फ़िगरेट जबलपुर के सबसे मेंहगे पार्लर में से एक था।सिर्फ दूर से ही दर्शन किये थे हमने कभी अंदर घुसने की कोशिश नही की।इतना पैसा होता ही नही था कभी।

रिया के मन में तो और बड़ी उलझन थी कि जब जबलपुर का फ़िगरेट इतना मेंहगा है तो दिल्ली में तो लाखों का खर्चा हो जाना है।

"रिया ओवर रियेक्ट करना बंद कर समझी।सब हो जाएगा।हम सभी हैं न।डर मत बस।" पंकज बोलकर चुप हो गया।

अब तक रिया को यही पता था कि हम दिल्ली जा आ रहे हैं शादी के लिए।लेकिन इस राज पर से पर्दा खुलना है या नही समंझ ही नही आ रहा है।

"रिया सुनो सब हो जाएगा अभी जाकर बस अपने आप को थोड़ा रेस्ट दो।" अभ्युदय जी ने अभी भी उसे नही बताया।

आज रात रुककर मैं भी घर जा सकती हूँ।सर तो दिन में ही बोल चुके थे पर माँ थीं तो हम सभी रुक ही गए थे।

रात को कौन रुकेगा इस बात पर रिया का झगड़ा शुरू था पंकज से।अभ्युदय जी कल रात रुके थे,कल सभी थे पर आज उनका आराम करना जरूरी है वरना बी पी बढ़ सकता है।

"न आप तो सोचिएगा भी नही।चुपचाप जाइये घर।कल सुबह आ जाइयेगा मुझे रूम तक पहुचाना होगा तब।"

"जा ही रहा हूँ।सिर में हल्का दर्द भी है।"

"क्यों?दर्द?किधर है?क्यों हो रहा?आपने सर को बताया?"

"निशी शांत हो जाओ।आज हाथ बहुत खिंच दिया है तुमने।बस तबसे ही दर्द है। रात भर सोने देना बस।सपने में मत आना वरना तबियत खराब हो जाएगी मेरी।"

"तबियत खराब हो आपके दुश्मनों की।"

"तू पंकज को क्यों बीमार करना चाहती है?"

रिया की बात पर सब पेट पकड़ कर हंस पड़े।अभ्युदय जी ने सिर पर हाथ रखा और प्यार से खयाल रखने का बोलकर निकल गए।

मैं पंकज और रिया तीनो ही अब भी साइड रूम पर थे।

"रिया चाय पीयेगी?"

"हाँ।"

"तो लेकर आना।"

"तू नालायक।भग यंहा से।"

"ले आना प्लीज।"

"पंकज देख मेरी शादी है एक दिन बाद।जान मत खा मेरी।बहुत टेंशन हो रही ही मुझे।ये रवीश भी फोन नही उठा रहे हैं।"

"ओहो रहे हैंतमीज देख निशी।"

मैं पंकज को देखकर मुस्कुराई लेकिन रिया अब भी अपनी शादी से निकल नही रही थी। बड़-बड़ शुरू ही थी कि भला हो रविश का की उसने फोन कर लिया।बात करते-करते रूम से जाते वक्त पूछकर गई है चाय का।

"भला हो इस मानुष का।"

"किसका?" कंधे उचका कर मैंने पंकज को देखा।

"ये रवीश का।चाय तो आएगी अब।"

"मजा आता है न तुम्हे?मेरी दोस्त को छेड़ने में?"

"सच बताऊ?बहुत।इतना कि बस पूछो मत।"

"मत बताओ।मुझे पूछना भी नही है। जानती हूं अच्छे से तुम्हें।"

"सच्ची?जानती हो? तब तो ये भी जानती होंगी की कितना प्यार करते हैं हम?"

"पंकज फिर वही बातें?"

"क्या करें? रिया की शादी की प्लानिंग में पानी शादी के सपने भी देख लिए।"

"बकवास मत करो।"

"निशी।माँ को कह चुका हूँ।"

"क्या?"

"अपनी माँ और तुम्हारी माँ को भी बता चुका हूँ।बस पापा जी से बात करनी बाकी है।तुम हाँ कह दो तो रिश्ता भेज दूंगा।"

"ठाकुर होकर?हाहा भूल जाओ कुंवर सा।लड़को का रिश्ता आता है जाता नही।"

"मेरा जाएगा।मेरे घर के लोग ऐसे दकियानूसी नही हैं।"

"रहने वाले रीवा के,और बातें मुंबई वाली।"

"निशी मैंने बताया न।"

"क्या?क्या बतय्या बाबू?हम क्या नए हैं?हम रग-रग से वाकिफ हैं।तुम्हारे माँ पा कितने ही नए खयालात के क्यों न हों पर ये समाज,ये रिश्तेदार जीने नही देते।"

"ऐसा क्यों कहा रही हो?"

"रिया को देखो।पापा को पसन्द है खानदान लड़का पर शादी ऐसे करनी पड़ रही है।क्यों?भाई,रिश्तेदार नही मान रहे।अब बोलो?कंहा गलत हूँ?"

"हम्म बात तो ठीक है पर मेरा घर अलग है।"

"कितना भी अलग हो पंकज।एक रिश्तेदार तो ऐसा ही होगा जो तुम्हे हर पल बतायेगा क्या गलती कर दी तुमने।"

"बस भी करो यार ये बुआ दादियों की बहस और बातें।"

"शुरू तुम करो।बस हम करें?"

"प्लीज न?"

"ठीक है जाओ बख्श दिया।"

"जहँनसीब।खुशमदिश।"

"हम खुश हुए।"

"हाँ बोल दे न?"

"पंकज।"

"हम्म"

"आई लव यू.."

"सच बोल न?पकक्का? लॉक कर दूं न?"

"हाँ सच्ची आई लव यू एज अ फ्रेंड।"

"माँ की जय हो4 अ फ्रेंड।हुह।"

पंकज पैर पटक कर भर चला गया।

कैसे कहूँ तुम्हे?

क्यों कहूँ तुमसे झूठ?

तुम लगते ही नही

मेरे लिए बने से

क्यों बनाऊं तुम्हें मैं

अपना वजूद?
 
आज की रात बड़ी दुःखद थी। रिया बहुत देर रवीश से ही बातें करती रही।पंकज का तो मुँह ही बना हुआ था फिर भी मुझे देख मुस्कुराने की भरपूर कोशिश कर रहा था।लेकिन जब उससे नही हुआ तो वो उठा और पास आकर बोला।

"निशी ध्यान रखना अपना।सुबह आता हूँ।थकावट सी महसूस हो रही है।"

"ठीक है पंकज।बाय टेक केअर।"

रिया को बिन बताए ही पंकज निकल गया।आज उसके दिल का हाल समंझ सकती हूँ।मैं भी कई बार ऐसा ही तो महसूस करती हूं जब अभ्युदय जी कह देते हैं कि मुझसे शादी नही करेंगे।

कितना दुःखद होता है जानना और उससे ज्यादा ये मानना कि आप जिसकव चाहते हैं,जिसे प्यार करते हैं वो आपसे प्यार नही करता।

रिया वापिस आ गई।

"क्या हुआ?बहुत उदास लग रही है?"

"कुछ नही यार।समंझ नही आ रहा निशी, कि जो कर रही हूँ सही है या नहीं?"

"रिया तू ज्यादा मत सोच।सब ठीक होगा।"

"पर पापा?"

"अंकल भी खुश ही होंगे।तुझे भरोसा नही खुद पर?"

"है यार।भरोसा है पर डर का क्या करूँ?"

"रिया बस कर अब।चल आज हेन्स पार्टी करें?"

"बकवास बन्द कर हेन्स पार्टी।कौन करेगा तू और मैं?"

"तू कहे तो एक नमूने को भी बुलाया जा सकता है एंटरटेनमेंट के लिए?"

मैंने आंख मारकर रिया को इशारा कर के कहा।रिया हंस पड़ी।

"एक मैं ही अनोखी रहूंगी यार जिसकी हेन्स पार्टी हॉस्पिटल के एक साइड रूम में होगी।है न?"

"तू है तो।क्या किया जा सकता है?"

हम दोनों फिर हंसे।

"लेकिन हॉस्पिटल में दारू कैसे आएगी?उसके बिना तो हेन्स पार्टी अधूरी है न?"

"तू पागल है?मरवायेगी क्या?दारू यंहा?"

"फिर किस बात की हेन्स पार्टी।चाय मंगवाऊं न तेरे लिए?भग जा मैंने नही करनी कोई हेन्स पार्टी।हुह।"

इसको भी बड़ी गंदी बीमारी है।बिना बात मुँह बनाने की।मैंने पंकज को फोन लगाया।

"हाँ निशी।"

"सो गए क्या?"

"नहीं बोलो क्या हुआ?"

"पंकज तूने पी हुई है क्या?तेरी आवाज अजीब सी लग रही।"

"काम बता न यार..अरे सॉरी।मैं तुझे यार नही बोल सकता न? तुझे यार वर्ड पसन्द नही है।क्या बोलूं तुझे?"

"सच में पी कर बैठा है?"

"हाँ बैठा हूँ।पी है मैंने।इंसान हूँ, क्या करूँ? दिल दुखता है मेरा भी।"

"पंकज सॉरी पर समझने की.."

"तुझे कुछ कहा मैंने?तू जो चाहे वो कर।मेरे नसीब में जो होगी वो मिलेगी।पर ये दिल तुझसे क्यों मिला?मैं ऐसा नही था,सच में मैं ऐसा नही था।मुझे कभी फर्क नही पड़ता था किसी से।मैं क्यों तुझसे मिला?"

"पंकज सॉरी न।मैंने वो रिया की हेन्स पार्टी के लिए फोन किया था।"

"कितनी मतलबी हो तुम।अपनी दोस्त की पार्टी दिख रही तुम्हें।मेरा रोना नहीं।"

"बकवास बन्द करो समझे।तब से सुन रही हूँ।आज ही रो लो जितना रोना है।जिंदगी भर के रोने से तो बेहतर है न?"

"एक बात कहूँ निशी।"

"हाँ दे लो और गालियां जो बची हों पर मैं झूटी तस्सली नही देना चाहती।मैं खुद भी नही जानती मेरी किस्मत का।"

"बस इसी बात पर तो ये दिल और भी चाहने लगता है तुम्हें।क्यों हो तुम इतनी अच्छी?"

"मतलब?"

"कोई और लड़की होती तो कभी दिल की बात नही कहती।आजकल की लड़कियों के हिसाब से होती गर तुम तो कितने लड़को को साथ लेकर घूमती।पर तुम.. तुम अलग हो।एकदम अलग हो निशी।एक अनछुई परी सी हो।एक ऐसी सुंदर परी जिसे छूने पर लगे कि वो मैली न हो जाए।"

"पंकज ssss.."

"सुन लो न यार।बहुत हिम्मत करके कह पा रहा हूँ।बस सुन ले।तेरा जवाब तब भी न ही है जानता हूँ।पर सुन लो"

"बोलो।"

"तुम्हारी आँखे.. कशिश है इन आँखों में।जितनी बार देखता हूँ उनमें,उतनी बार दिल हार जाता हूँ।तुम्हारी हंसी,उफ्फ मुझसे बड़ा फैन कोई मिले तो बताना।एक छोटा सा मासूम बच्चा जैसे हंसता है न,बिल्कुल वैसी हंसी है तुम्हारी।शांत रहना तुम्हारा जैसे सागर ने लहरों को रोक दिया हो कंही।तुम्हारे बाल,तुम्हारे नाक की बाली,होंठ के ऊपर का वो तिल, गाल पर एक छोटा सा गढ्डा, चेचक का ही होगा जरूर।है न?"

"हम्म.."

"देखा कितनी अच्छी तरह जानता हूँ।तुम्हारा बिना बात किये भी आंखों से बात करना।निशी मैं कैसे तुमसे प्यार न करूँ?क्यों नहीं करू?क्योंकि तुम मुझसे प्यार नही करतीं इसलिए? मैं आज एक बात कहूँगा,कभी भी मेरी जरूरत पड़े तो मैं हूँ।जब तक तुम्हारी शादी अपनी आंखों से नही देख लूंगा शादी नही करूँगा।कोशिश करूंगा कि मेरे पहले प्यार का जितना इंतजार कर सकता हूँ करूँ।तुम आओ न आओ।तुम मुझे चाहो न चाहो।पर ये पंकज हमेशा सिर्फ तुम्हें प्यार करेगा।कभी भी लगे कि तुम्हें मेरी जरूरत है मैं हमेशा तुम्हारे लिए रहूंगा।कभी भी मतलब कभी भी।एक बात और मेरा नम्बर कभी नही बदलेगा,हमेशा यही नम्बर होगा मेरा जानती हो क्यों?"

"नहीं।"

"क्योंकि मेरे नम्बर में हम दोनों का जन्मदिन है।मैं अपने हर जन्मदिन पर तुम्हारे और मेरे नाम का ही केक काटूंगा।निशी-पंकज।"

दारू चीज़ ही ऐसी है,सेंटी हो गया है लड़का आज।वो भी अति वाला।नम्बर आज तक मैंने ध्यान नही दिया था पर अब शायद इसका नम्बर इसे ही याद रहे न रहे मुझे जरूर याद रहेगा।

क्या किस्मत मिलाई है भगवान ने हम दोनों का जन्मदिन भी एक ही दिन।लेकिन अभी इन सब की नहीं रिया की पार्टी के बारे में सोचना है।

"पंकज अब मैं कुछ कहूँ?"

"तुम पत्थरदिल हो निशी।कुछ दिल तोड़ने सा ही कहोगी।रुको जरा हाथ दिल पर रखने दो।"

"मेलोड्रामा बन्द कर न पंकज।अब सुन जो भी पी रहा है तू।वो लेकर आजा अभी।"

"हॉस्पिटल में?चेकिंग नही होगी रात में?"

"तेरी चेकिंग कौन करेगा?"

"मैं आना तो नही चाहता पर अभी-अभी तो तुझे कहा कि कभी भी कुछ भी सिर्फ तेरे लिए।करूँगा।टाइम लगेगा पर।"

"क्यों?"

"पहले अपनी उतार लूं।वरना तेरे बगल वाले बेड में मैं भी पड़ा होऊंगा टांग तुड़वा कर।"

"आजा फिर जल्दी।"

"निशी सुन।"

"हम्म बोल न?"

"आई लव यू य.. नही यार नहीं बोलूंगा तुझे।आई लव यू और बहुत सारा लव यू,सबसे ज्यादा लव यू और सिर्फ तुझको लव यू य.."

"बाय पंकज आराम से आना।अब पीना मत प्लीज।"

"तू बोलेगी तो कभी नही पियूँगा।"

"शादी न करूँ, लव यू न कहूँ तब भी छोड़ देगा?"

"बस इतना ही जाना है तूने मुझे?कभी आजमा लेना।मेरे लिए हमेशा तू ही मेरी फर्स्ट प्रियॉरिटी रहेगी।हमेशा।"

"पंकज बाय।अब पीना मत।"
 
फोन रखा तो रिया मुझे घूर रही थी।

"क्या हुआ?"

"तू जानती है,तू क्या कर रही है?"

"अब तू क्यों पिये हुई सी बातें करने लगी यार?"

"निशी, बहुत सोच समझ कर फैसला करना।जिंदगी बहुत बड़ी और लम्बी होती है।"

"तूने सोच लिया?रवीश के बारे में?"

"समझ अब भी नही आ रहा।सही है या गलत? कंही ताऊ जी के चक्कर में कोई गलती तो नही कर रही न?"

"चल तेरा तरीका अपनाते हैं।आंख बंद कर ले।"

"शाहरुख खान का तरीका है,मेरा नहीं।"

"तू आंख बंद कर ना।"

"हम्म.. ये ले।पर मुझे कुछ नही दिख रहा।सिर्फ काला रंग है।"

"जानती हूँ। अब सोच कि ताऊ जी का चेहरा अगर तेरी शादी उनके बताए लड़के से होगी तो।"

"तू रात में ऐसे भयंकर लोगों के चेहरे याद करने क्यों कहा रही है?वैसे बुढऊ मुस्कुराएंगे।मुझे अपने पसन्द के घर भेजकर।"

रिया ने आंखे खोलकर कहा।

"रिया आंखों को बंद कर और अब फिर ताऊ जी का चेहरा देख जब तेरी शादी रवीश से हुई तो।"

"क्या चाहती है?साफ-साफ बता न?"

"मैं चाहती हूँ कि तू देखे कि तेरे पापा क्या चाहते हैं?"

"वो तो बस ताऊ जी,ताऊ जी के चक्कर में हैं।मेरे बारे में सोचता कौन है?"

"बस फिर डीप वाली एकदम अपने फिजियो वाली गहरी सांस लो और मन मष्तिष्क से सब उल-जलूल बातें निकाल दो।"

"तेरी उल-जलूल बातें भी न।कंहा से आता है ये सब तेरे दिमाग मे?"

"ओ हेलो मेरा दिमाग तो तू है।"

"तू चल पाएगी न दिल्ली?"

"रिया तेरी शादी जबलपुर में ही होगी।"

"क्या?"

"हाँ सब हो चुका है।बस परसो रवीश आ जायेगा और यंही होगा सब।मेरे पैर की वजह से प्लान चेंज करना पड़ा।"

"तू भी न?अभी टूटना जरूरी था तेरा?हुह मेरी शादी के बाद टूटती।"

"नालायक।कैसी दोस्त है तू?अपनी शादी के लिए मेरा दर्द भी नही देख रही।"

"हाँ तो और क्या?अच्छा मजा आता न भाग कर शादी।"

"अभी भी वही कर रही है तू।"

"हाँ पर जबलपुर,दिल्ली फर्क तो है न?"

"सुहागरात दिल्ही में मना लेना।"

"मतलब?"

"मतलब ये मेरी बन्नो रानी कि यंहा तो सुहाग दिन मनेगा।रात तो ट्रेन में होगी।शाम को ही निकल जाओगे तुम दोनों संपर्क-क्रांति से दिल्ली के लिए।"

"क्या-क्या प्लानिंग कर ली है बे तुम लोगों ने?"

"शादी का रिसेप्शन भी होगा क्या?"

"हा हा.. तुम कहो तो जान?वो भी हो जाएगा।"

"नहीं रहने दो।जितना है बहुत है,पर मुझे दिल्ली जाकर.."

"पता था तेरा यही नाटक होना है,तभी तो किसी ने बताया नहीं।अब बतय्या तो फिर वही।"

"निशी, सही होगा न सब?"

"आजा यार..कुछ गलत नही होगा।मैं हूँ न?"

थोड़ी देर गले लगे हम दोनों बस अपने आने वाले कलो के बारे में ही सोच रहे थे कि पंकज आ गया।

"हेलो लेडिस।"

"गर्ल्स बोल यार पंकज।शादी के बाद बोलना लेडिस।आया बड़ा लेडिस।"

"सामान लाएं?"

"हाँ सब ले आया मैडम।मना लो हेन्स कॉक या बेचेलर पार्टी।"

"क्या-क्या है?"रिया की बेचैनी समझ पा रहे थे हम दोनों।

पंकज ने अपने कंधे से बैग उतारा और चेन खोल कर एक मिरिंडा की बोटल निकाली।

"ये क्या है?मिरिंडा?हद है यार।इससे अच्छा तो चाय पार्टी कर लेते।"रिया का मूड ही ऑफ हो गया।

"शांत हो जा तू।मैं जानता हूँ मैं क्या लाया हूँ।पर सुनो तुम दोनों,हॉस्पिटल तुम्हारा है।गलती की गलती से भी पकड़े गए तो तुम दोनों की डिग्री गई ही समझो।"

"मैं तो ले ही नहीं सकती पागल।एंटीबायोटिक्स के इतने हाई डोस में अल्कोहल?पॉसिबल नही है।तुम दोनों एन्जॉय करो मैं हूँ मजे देखने के लिए।"

"एक बात बता निशी पार्टी तेरे लिए है या मेरे लिए?"

"पंकज है क्या इसमे?"

"वोडका है और क्या होगा?मैं भी नही पी सकता अब।किसी ने मना किया है अब पीने को।वो कहेगी तभी पियूँगा।"

कितना बड़ा कमीना है ये।दिमाग मे चल रहा था कि खुद ही बोल पड़ा।

"कमीना नही हूँ सच मे।कभी भी नही पियूँगा आज के बाद।लेकिन आज के बाद न?आज तो पी सकता हूँ।"

दोनो ने मिरिंडा गिलास में निकाली और मूंगफली के साथ पी गए।

मुझे पता था पंकज और रिया को अगर ज्यादा पीने दी तो डिग्री की वाट लगती इसलिए सिर्फ 2 पेग के बाद मैंने बोटल गायब कर दी।अपने कम्बल में डाल कर।रिया को तो होश ही नही था।जाकर चुपचाप बगल के बेड पर सो गई।

मैं उठ नही सकती थी तो पंकज को कहा रिया को चादर ओढ़ाने।

पंकज ने चादर ढाँक कर कुछ देर रिया को देखा और आकर दूर चेयर पर बैठ गया।

मैं पंकज को ही देख रही थी।अब कितना सिंसियर बन कर बैठा है और कुछ देर पहले कैसा बच्चा बना हुआ था।जिसको चाहे पटा ले फिर भी न जाने क्यों जिद पकड़ कर बैठा है।

बेड पर टिककर मैंने आंखे बंद कर लीं पर ऐसा लगा जैसे कोई घूर रहा है और अचानक से आंख खुल गई।

पंकज एकदम पास ही खड़ा था।वो एहसास गलत नही था कि कोई मुझे घूर रहा है।

"क्या कर रहे हो?"

"तुम्हें देख भी नही सकता क्या?"

"पंकज दूर जाकर बैठो।"

"निशी सिर्फ एक बाए मेरी आँखों मे देखो न।तुम्हे भी मुझसे प्यार हो जाएगा।सिर्फ एक बार।"

"पंकज तुमने पी रखी है दूर जाओ।"

पंकज ने मुझे कसकर पकड़ा दोनो कंधों को।

"पी रखी है पर मर्यादा जानता हूँ अपनी वरना अब तक चूम चुका होता तुम्हें।तुम कितनी प्यारी लग रही थीं,छोटी सी गुड़िया के जैसी।रोक नही पाया।लेकिन तुम!तुम्हें लग रहा कि मैंने पी रखी है तो कुछ गलत करूँगा?निशी प्यार करता हूँ,अट्रैक्शन नही है जो सिर्फ तुम्हारे चेहरे से या शरीर से हो।"

"पंकज छोड़ो।"

"शादी तो मेरी तुमसे ही होगी।भले ही अगले जन्म तक रुकना क्यों न पड़े।"

"तुम पागल हो।"

"तुमने बना दिया है।"

"पंकज छोड़ो मुझे।"

पंकज ने मेरे कंधों को छोड़ दिया और चेयर पास रखके बैठ गया।

"हाथ दो।"

"नहीं।"

"निशी हाथ दो।"

"मुझे नही देना कहा ना?"

"हाथ दो बोला न?"

पंकज ने मेरा हाथ अपने हाथ मे ले लिया।मेरे गुस्से में अब धीरे-धीरे बवाल-उबाल बढ़ ही रहा था कि पंकज बोला

"माफ कर दो।तुम्हे देखकर पता नही क्या हो जाता है।ऊपर से ये मिरिंडा।सॉरी य.. नही नही यार नही।तुमको यार नही बोलना है।तुम तो प्यार हो निशु।सच्चा वाला प्यार।"

"पंकज सो जाओ।रात बहुत हो गई है।"

"तुम अभ्युदय से प्यार करती हो न?"

"पंकज सो जाओ।"

"जानता हूँ।तुम्हारी आँखों मे उनके लिए वही देखता हूँ जो अपनी आंखों में तुम्हारे लिए पाता हूँ।"

"पंकज.."

"नहीं सोना अभी मुझे।बात करो न मुझसे?"

"क्या बात करनी है तुम्हें?"

"तुम पूछो आज।जो पूछना चाहो,मैं सब बताऊंगा।"

"सोने का क्या लोगे अभी?"

"तुम्हारा वक्त ज़हनसीब।"

ये ऐसे नही मानेगा निशी, अब थोड़ी देर तक इसे इसके साथ झेलना-झिलना पड़ेगा।मैंने सोचकर पंकज से पूछा।

"तुम्हारे घर मे कौन-कौन है?"

"माँ है बहुत प्यारी।पापा हैं थोड़े ठाकुरों की नाक वाले अकड़ू और मैं।"

"कोई भाई या बहन?"

"नहीं अकेला ही हूँ तभी तो कभी वृद्ध आश्रम, कभी अनाथालय जाता है रहता हूँ।भला हो वृद्ध आश्रम वालों का।"

"क्यों?"

"तुम मुझे वंही मिली।

"इस झल्ली की वजह से।"

"हाँ मैं तो भगवान को रोज कहता हूँ तुम्हारी इस झल्ली को हमेशा खुश रखने के लिए।ये खुश तो तुम खुश।"

"हम्म.."

"एक बात बताऊं?मैं तो रोज अभ्युदय के ठीक हो जाने की भी प्रार्थना करता हूँ।तुम्हें कभी भी दुखी नही देखना चाहता।"

"पंकज अब नींद आ रही है।"

"तुम सो जाओ निशी और भरोसा करना मैं प्यार करता हूँ।लेकिन गलत नही सोचता।"

"हाथ?"

"ओह हाँ।"

पंकज ने हाथ छोड़ दिया और खड़ा हो गया पास आया और माथे पे किस करके बोला।

"गुड नाईट।सो जाओ तुम।"

मुझे अजीब सी सिरहन हुई पर डर नही लगा।क्योंकि शायद पंकज के प्यार पर भरोसा से हो गया।
 
रात बीत गई सुबह जब नींद खुली तो रिया भी सोई हुई थी और चेयर में ही पंकज भी सोया हुआ था।

नर्स अंदर आई और उसने अजीब सा मुँह बनाया।

"क्या हुआ सिस्टर जी?"

"महक अजीब सी आ रही है डॉ निशी।"

"क्या रूम फ्रेशनर डल सकता है?वो कल रात को फ्रेंड आया शायद उसने ड्रिंक कर रखी थी।उसकी ही महक है।"

"अभी बोलती हूँ वार्ड बॉय को,आपने तो?"

"नहीं सिस्टर जी।"

"आज आपको घर जाना होगा न?"

"हाँ आज घर चली जाऊंगी।"

"टेक केयर डॉ.निशी।"

"थैंक्यू सिस्टर जी।"

रिया हमारी बातों के बीच जग गई और मेरे पास आकर बोली।

"निशी तू बहुत-बहुत अच्छी है।लव यू मेरी जान।"

"बस कर,सिस्टर जी यंही हैं।"

"मैं वार्ड बॉय को भेजती हूँ, राउंड पर आने वाले हैं सर।"

सिस्टर जी चली गईं और मैंने रिया को पंकज को उठाने कहा।

अभ्युदय जी भी आ गए।

पंकज उठने का नाम नही ले रहा था जिसे देख कर लग रहा था कि बहुत देर जागा होगा।उसे उठाकर बेड पर सोने के लिए कह दिया।

सर आए और आकर चेक किया।

"आज घर?"

"यस सर।"

"टेक केयर एंड यू विल कम डेली टू डिपार्टमेंट।"

"ओके सर।शुड आई स्टार्ट वेट बेअरिंग?"

"यू कैन वाक बट डोंट पुट सो मच प्रेसर ऑन योर अफ्फेक्टेड लेग।एंड एंकल टो मूवमेंट यू नो आल।"

"ओके सर।"

सर चले गए।अभ्युदय जी अपने साथ फ्रेम भी लेकर आये थे।मैं 3 दिन बाद आज खड़ी हुई थी।हल्का दर्द था पर खुद ही जब डॉक्टर हो आप तो आपको कई बार अपनी हो रही तकलीफ को भी छिपाना पड़ जाता है।अभ्युदय जी के सामने बहादुर बनने की कोशिश में पैर के दर्द को झेल गई।

पंकज को बहुत उठाने की कोशिह हुई पर सारी नाकामयाब।आखिरकर हम लोग उसे वंही सोता छोड़ निकल आये। लिफ्ट से उतर कर घर की तरफ निकलने को हुए ही थे कि पंकज ने कार का शीशा थपथपाया।

रिया ने शीशा नीचे किया और बोली।

"उठ गए प्रभु?"

"तुम लोग मुझे वंहा सोता छोड़कर भाग रहे थे?"

"नहीं सिस्टर जी को कह दिया था एक घंटे बाद एक नींद का इंजेक्शन लगाने।"

"उठाया क्यों नही?"

"देखो जरा इस कुम्भकर्ण को।जब उठा रहे थे तब तो हिल नही रहा था अब कैसे रावण बन रहा है।"

"निशी, तुम ठीक हो न?"

"हम्म.."

लेकिन पंकज ने शायद चेहरे पर आ रहे दर्द को समझ लिया और हमें निकलने का कहकर अपनी बाइक से पीछे आने लगा।

मैं बिल्कुल चुप थी पर अब आंखों से आंसू नही रोक पाई।

"निशी, रो क्यों रही है?"

"कुछ नही।"

अभ्युदय जी ने पीछे देखा और आंखों में आंखे डालकर कहा।

"अभी सब ठीक हो जाएगा।परेशान नही होते।जानता हूँ दर्द बहुत हो रहा होगा।है न?"

"नहीं बस थोड़ा ही है ज्यादा नही।"

हम रूम के सामने पहुच चुके थे।गाड़ी से निकलने के समय पंकज भी आ चुका था वो पास आया और किसी को बिना कुछ कहे ही मुझे अपनी गोद में उठा लिया।

"पंकज मुझे उतारो।मैं चल कर जाऊंगी।"

"शक्ल देखी है अपनी?हिम्मत हो नही रही चलना है।रिया लॉक खोल जल्दी।"

पंकज का मुझे इस तरह गोद में उठाना,उसके इतने करीब होना।उसके शरीर से आ रही वो अलग सी महक।उसके गठीले हाथ और शरीर।पता नही मुझे क्यों उसका इस तरह उठा लेना बुरा नही लगा।शायद दर्द से बचना अभी ज्यादा सही लगा।लेकिन पूरे मोहल्ले मे बातो से बचने के लिए बहुत बोला उसे उतारने पर उसने एक नही मानी।

अभ्युदय जी के चेहरे पर उदासी के भाव थे।जरूर यही सोच रहे होंगे कि वो अगर ठीक होते तो वो मुझे उठाकर ला सकते थे।

रिया ने ताला खोला,आंटी भी तभी आ गईं।उन्होंने मुझे पंकज की गोद मे देखकर भी कुछ नही कहा जल्दी आकर मेरे बिस्तर को ठीक किया।

पंकज ने मुझे बिस्तर पर लेटा दिया।मैं अब अपने रूम पर थी।बहुत सुकून सा वापिस आ गया था जैसे।

"मैं जा रहा हूँ।कोई काम हो तो बता देना।ध्यान रखो अपना।बाय।"

पंकज ने निकलते वक्त अभ्युदय जी से बात की और निकल गया।

अभ्युदय जी अब भी चुप थे।आंटी ने चाय बनाने का कहकर अपने घर चली गईं।रिया भी मुँह हाथ धोने अंदर गई।

"अभ्युदय जी।"

"हाँ निशी।"

"क्या हुआ आपको?"

"तुम्हें तकलीफ में देखकर अच्छा नही लगा पुच्चू।"

अभ्युदय जी के पुच्चू कहने पर मेरे दिल ने फिर सामान्य गति से धड़कना शुरू कर दिया।

"डर जाती हूँ,आपको उदास देखकर।"

"मत डरो।मैं तुम्हें उदास या तकलीफ में देखकर ही उदास था।अब ठीक हूँ क्योंकि तुम ठीक हो।"

"अभ्युदय जी।"

"बोलो निशी।"

"आई "

"अभी नही निशी।"

अभ्युदय जी ने क्यों रोक दिया?क्या हुआ उन्हें?

"आप नही करते मुझे प्यार?"

"निशी।अभी नही कहा न।"

"मैं अभी सुनुगी।अभी कहिये।क्या?"

आंटी चाय लेकरा गईं।

"रिया-रिया,कंहा गई ये?"

"अंदर ही है आंटी।फ्रेश होने गई होगी।"

"माँ-पापा चले गए?"

"जी।आप मिली नहीं क्या माँ से?निकलते समय?"

"नही मिल पाई।छोटू तो रो रहा था नानी जी से बात करवाओ बोलकर।"

"मैं नम्बर दे दूंगी।करवा दीजियेगा।अच्छा लगेगा छोटू को।"

अभ्युदय जी ने जल्दी ही चाय गटक ली और उठकर खड़े हो गए।

"निशी अभी मैं चलता हूँ।कल की कुछ तैयारियां देखनी है।आज वेदी आएगी तुमसे मिलने।घर का अड्रेस दे दिया था उसे।"

"जी ठीक है।आप रोज शाम को 1 घंटा यंही आएंगे अब।"

"क्यों?"

आंटी और अभ्युदय जी ने मुझे घूर कर देखा।

"मशीन लगवाने।मेरी वजह से आपकीं प्रोग्रेस नही रुकनी चाहिए।"

"लेकिन तुम्हारे घर रोज आना ठीक नही।लोग यंहा बातें करेंगे।"

आंटी को न जाने क्या सूझा उन्होंने कहा

"आप आइये और इलाज करवाइए।हम देख लेंगे कौन क्या कहेगा।आप करवाइए इलाज।"

"शुक्रिया।जी कोशिश करूंगा कि निशी को ही घर बुलवा लूं।वरना अभी एक दो दिन मैं आ जाऊंगा।अब चलता हूँ नमस्ते।"

अभ्युदय जी चले गए।मैंने ऑन्टी और रिया ने चाय पी।ऑन्टी भी चली गईं।

"रिया सुन।आज वो वेदी आ रही है।"

"ओह वो अमेरिका रिटर्न वाली?"

"हाँ वही।उसने ही तेरी ड्रेस का कलर चूस किया है।"

"मैं बता रही हूं अगर ऐसा-वैसा हुआ तो बाल नोच लुंगी उसके।"

"जो करना हो करना।अभी मुझे स्पोंजिंग कर दे।बहुत, अजीब लग रहा है।"

"हाँ जी मैडम अभी लो।"

रिया ने स्पोंजिंग करा के कपड़े भी बदली करा दिए।

घर के लोअर टी शर्ट में जो आराम और सुख है वो किसी मे नही।

"पोहे बनाऊ?"

"तू बना लेगी?पकक्का?आता है न तुझे पोहे बनाते?"

"चुप कर जा अब।रिया को क्या नही आता वो पूछो।आई बड़ी पोहे बनाते आता हूं कि नही।"

रिया ने कभी मेरे रहते पोहे नही बनाए।मैं ही बनाती थी पहले भी अब भी आगे भी बनाती रहूंगी शायद।रिया ने देखा मुंगफली नही है।

"मैं मूंगफली लेकर आई।"

"बिस्कुट भी पारले जी लेते आना।"

"जी मैडम।" बोलकर रिया निकल गई।
 
रिया के जाते ही दरवाजे के खड़कने की आवाज़ आई।मैंने देखा तो बाहर वेदी थी।

इसे भी इतनी जल्दी आना था।रुक कर आ जाती।

"आजाओ वेदी।"

"हाई निशी।कैसी हो?अब दर्द कैसा है?"

"मैं ठीक हूँ अब।"

"गाड़ी नही चलाते आती तो क्यों चलाती हो?"

"ऐसा नही है,वो तो बस रास्ते में.."

"लाइट चली गई थी है न?"

इसे कैसे पता?क्या ये भी वंही थी?कंही इसने ही तो मेरा एक्सीडेंट नही किया ना? कितने ही सवाल-जवाब दिमाग पर चल उठे।

"कंहा खो गई निशी?"

"न कंही नही।वो रिया अब तक नही आई तो उसके बारे में।"

"अच्छा नाश्ता लेकर आई हूँ।अभ्यु कि घर गई थी वो मिला नही।माँ ने बताया यंहा होगा।उन्होंने ही नाश्ता भेजा है।इडली साम्भर।"

तभी कमरे में रिया ने एंट्री मारी।

"धनिया नही मिला यार।आप??"

"हाई रिया।मैं वेदी।"

"ओह आप वेदी हैं।"

"हाँ, और तुम रिया।जिसकी कल शादी है।"

"हाँ वही।"

"लेकिन तुम यंहा क्यों हो?पार्लर नही जाना क्या तुम्हें?"

"आज से तैयार होना शुरू कर दूं क्या?" रिया ने हंस कर मुझे हाथ पर ताली मारी।

"नहीं लेकिन फेसिअल,वैक्स सिंग जैसी चीज़े भी होती हैं जो करवानी पड़ती हैं।"

"अबे निशी ये तो ध्यान ही नही रहा।"

"टेंशन मत लो।मैंने सब बुक कराया है।वैसे भी शादी बार-बार नही होती।जो भी इक्षाएँ हैं अभी पूरी कर लो।"

वेदी की इन बातों से हम दोनों कुछ समझते पर वेदी ने मौका नही दिया।

"जल्दी खाओ पहले नाश्ता।"

तीनों ने नाश्ता साथ ही किया।बातों-बातों में पता चला कि वेदी ने सब कुछ एकदम डिज़ाइनर लुक में करवाया है।

"लेनहगा कैसा है वेदी मेरा?"

"तुम्हारे लिए मैंने सोचा था कुछ-कुछ होता है का काजोल वाला गोल्डन।पर अब तुम्हे देखा न तो इतने गोरे रंग पर मेहरून और गोल्डन क्या गजब ढायेगा।"

हमारी शेर रिया को आज कोई सवा शेर मिला था।जो वो औरों के साथ हमेशा करती थी आज उसके साथ हो रहा था।समंझ नही पा रही थी क्या कहे।

"अच्छा मेहरून गोल्डन।काजोल सांवली भी तो है। सही कह रही है वेदी।है न निशी?"

"लाल रंग से सुंदर कुछ नही होता।"

"तू अपनी शादी में पहनना लाल।ठीक है?"

"हाँ ठीक है।लेकिन कल क्या पहनूँगी?"

"सबकी ड्रेस रेडी हैं।कल सबको मिल जाएंगी।वेदी का काम एकदम फिट होता है।"

"क्या बात है वेदी।" रिया को वेदी-वेदी करता देख मुझे गुस्सा आ रहा था।

"जाओ अब तुम दोनों।पार्लर निकलो।"

"तू ध्यान रखना अपना।पानी की बोटल वो रखी हैं बेड के नीचे।इडली साम्भर जो अभी बचा है वो भी।दवाइयां भी हैं और कुछ चाहिए?"

"मेरे पारले जी?"

"लाती हूँ।" बोलकर रिया ने पारले जी भी लाकर बेड के पास ही रख दिये।

"थैंक्यू।अब जा।जी ले अपनी जिंदगी।"

"हाँ-हाँ।तू आराम कर।कुछ भी दिक्कत हो मैं हूँ।नमूना भी है,ओके।"

"हम्म।"

"दरवाजा लगाना नही।मैं आ जाऊंगी जल्दी।"

"ठीक है।"

रिया और वेदी निकल गए।आंटी को रिया शायद ध्यान रखने का कह गए थी हर 5 मिनट में पूछ लेती थीं कुछ चाहिए या नही।

मुझे झपकी आने को होती ही थी कि आंटी आ जाती थीं।

अबकी बार जैसे ही दरवाजा खुला गुस्से में मैंने कहा दिया।

"नींद आ रही है सोने दीजिए प्लीज्।"

सामने पंकज था।

"निशी, क्या हुआ?"

"उफ्फ..नही कुछ नही।तू क्यों आया?"

"रिया ने बताया कि वो जा रही कंही तो मैं आ जाऊं इसलिए।"

आंटी फिर आ गईं।

"अरे पंकज कैसे हो?"

"ठीक हूँ भाभी।आप?"

"मैं भी ठीक हूँ।अच्छा हुआ तुम आ गए।मैं भी बस छोटू को लेने ही जा रही थी।तुम हो ना यंहा अभी?"

"हाँ भाभी मैं हूँ।"

बेड़ा गरक।मेरे साथ ही ऐसा होता।एक गया तो दूजा हाजिर।

"पंकज मैं सो जाऊंगी।तुम देख लो कोई काम हो तो।"

"तुम्हें देखना और तुम्हारे पास रहने से ज्यादा अच्छा भी कोई काम हो सकता है क्या?"

"तुम कॉलेज भी जाते हो अपने या नही?"

"प्रॉक्सी मेडम।हमारे चाहने वाले कम नही हैं।वो तो एक हम ही हैं जो आपके पीछे पड़े हैं।"

"मुझे नींद आ रही है।भूख लगे तो इडली रखी है।"

"हम्म.. सोजाओ।"

मैं सोने की कोशिश करती रही पर नींद आई ही नही।

"निशी।"

"हम्म"

"सो जाओ।"

"हम्म.. कोशिश जारी है।"

"लोरी सुनाऊं?"

"सोना है रोना नही?"

"रूठ न जाना तुमसे कहूँ तो..

मैं इन आँखों मे जो रहूँ तो..

तुम ये मानो

या न मानो

तुम ये जानो

या न जानो

मेरे जैसा दीवाना तुम पाओगी नही।

याद करोगी मैं जो न हूँ तो

रूठ न जाना तुमसे कहूँ तो।"

वक्ज गाना गाते समय पास आया और बालों में हाथ फेरता रहा।मैं नही जानती कब मैं नींद के अगोह में चली गई और पंकज कितनी देर मेरे लिया गाता रहा।
 
नींद खुली तो देखा पंकज बेड पर ही बैठा सो गया है।उसका हाथ अब भी मेरे सिर पर था।

मासूम सा चेहरा और सुंदर पलकें।पंकज को कभी ध्यान से देखा ही नही मैंने।या सच कहूं तो कुछ कभी महसूस भी नही किया।

पंकज बहुत सुलझा हुआ है।आज तक कभी हिचक नही हुई उसे अपने दिल की बात कहने में।

वो दिल की बात मुझसे करनी हो,मुझे कहनी हो या किसी अपने बड़े को।

एक बार जो कह दो उसे टालता नही।जो कह दो हमेशा हंस कर कर देता है।कौन करता है आजकल इतना किसी के लिए?

बिना किसी शिकायत हमेशा हर काम के लिए आगे रहना।इतना प्यार,क्या वाकई प्यार है ये?क्यों मेरी इतनी परवाह है इस लड़के को?

न ये मेरे बारे में कुछ ज्यादा जानता है, न हम पहले से एक दूसरे को जानते हैं।फिर भी इतना अपनापन क्यों है?क्या एक डेढ़ महीने में इतना करीबी रिश्ता जुड़ जाना पॉसिबल है।

मैं अपनी सोच में ही गुम थी कि पंकज बोला-

"ज्यादा मत सोच पगली।प्यार हो जाएगा मुझसे।"

"रहन दे।मुझे नही होगा तुझसे प्यार।"

"क्यों?कभी हो गया तो?"

"तो क्या तो?"

"मुझे बता जरूर देना।मैं भी खुश होना चाहता हूँ।"

"पंकज जब तुझे पता है कि मैं.."

"तू अभ्युदय से प्यार करती है तो मैं तुझसे प्यार क्यों करता हूँ?नहीं जानता मैं।मैं खुद नही चाहता तुझे प्यार करना पर जब-जब तू सामने आती है।तेरी आंखों में खो जाता हूँ।तेरे लिए पागल हो जाता हूँ।"

"तूने मेरी डायरी पढ़ी?"

"तू डायरी लिखती है?"

"सच बता?"

"तुझे लगता है ऐसा कुछ करूँगा जिससे तू नाराज हो मुझसे?"

"तेरा क्या भरोसा?"

"बोला ना प्यार नही करना मत कर,पर भरोसा पूरा करना कि ये पंकज कंही भी हो बस तुझे ही प्यार करता है।"

"बातें बन्द कर भूख लगी है मुझे।"

"क्या खाना है बता?"

"कुछ भी चलेगा।"

"तू मुझे खा ले।"

"पंकज मजाक मत कर ना।"

"तू रुक मैं आया।"

पंकज चला गया।लेकिन फोन यंही था उसका।मन किया फोन उठा के देखूँ, जैसा बनता है वैसा ही है या सब नाटक है।

फोन उठाकर बस ऑन ही किया तो स्क्रीन पर मेरी और उसकी फोटो लगी थी।

केक काटते हुए हम दोनों।पागल है लड़का सोचकर मैंने फोन रख दिया।

पंकज रूम में आया हाथ मे थाली सजी जिसमें दाल-चावल,रोटी सब्जी और सलाद था।

"ये सब?"

"तुझे नही खाना?"

"खाना है।पर तू लेकर कंहा से आया?"

"मैडम तुमसे ज्यादा पहचान है अब इस एरिए में हमारी।"

"अच्छा जी।आंटी ने बनाया?"

"हाँ।बहुत अच्छी हैं भाभी।अब जल्दी खाना शुरू कर।"

मैंने और पंकज दोनों ने ही भूखों की तरह खाना शुरू कर दिया।पेट भरकर खा लेने के बाद थाली साफ कर के बैठ गए।

"पंकज हाथ धोना है।"

"रुक मैं पानी लाता हूँ।थाली में धो लेना।"

"नहीं।मैं थाली में हाथ नही धोती।"

"फिर?"

"फ्रेम इधर दे।"

"ये पकड़ अपना फ्रेम।बार-बार गोद में नहीं उठा रहा तुझे।वैसे भी बहुत भारी है तू।"

"अच्छा।नालायक।अभी के अभी भाग जा वरना बहुत मार खायेगा।भारी हूँ।हुह।"

"अब जो सच है वही तो बोलूंगा न?"

"पंकजबाहर.. अभी के अभी।"

"नही जा रहा, बता क्या करेगी?"

"तू रुक।"

पंकज की तरफ बढ़ते हुए पैर में दर्द बढ़ गया और मैं गिरते-गिरते बच गई क्योंकि पंकज ने मुझे पकड़ लिया।

उलझ सी गई थी मैं पंकज की बाहों में।दर्द भी औऱ ऐसे उलझे समंझ नही आ रहा था कैसे हटूं।

"तू डर मत।तुझे प्यार नही होगा मुझसे।क्या भगवान जी?ऐसे?आप भी न?"

"क्या मतलब?"

"मतलब अभी-अभी भगवान को कहा कि एक झप्पी देनी है निशी को।ऐसे इतनी जल्दी सुनेंगे पता नही था।"

"कुछ भी।"

"सच्ची।मैं तुझसे झूठ नही बोलता।"

"तो किससे बोलता है?"

"बाकी सबसे चलता है पर तू और माँ हैं जिनसे झूठ नही बोलता।"

बातों में उलझा कर मुझे पंकज ने बहुत आराम से बाहों से अलग भी कर दिया और फ्रेम भी सही से रख दिया।

"निशी,अब ठीक है तू?"

"हम्म..थैंक्यू पंकज।"

"चल बे चल।जाए हाथ धोकर आ।"

"तू सच में भगवान से ऐसा भी कुछ मांगता है?"

"मांगता तो बहुत कुछ हूँ।सुनते नही वो मेरी।चल मैं भी साथ चलता हूँ तेरे।"

पंकज मेरे साथ-साथ अंदर बेसिन तक आया। हाथ धोने के बाद मुझे टॉवल देकर हम दोनों बाहर आए।सामने दरवाजे पर अभ्युदय जी थे।

मैं उन्हें देखकर थोड़ा सकपका गई।

"फिर से गिरने का इरादा है क्या मैडम?"

"न..नहीं।"

पंकज के चेहरे के भाव में कोई बदलाव नही थे।क्या मैं कुछ गलत कर गई या सोच रही थी जो मुझे अभ्युदय जी के अचानक आने से सकपकाहट महसूस हुई?समझ से परे है ये सब मेरे लिए।

अभ्युदय जी अंदर आ गए।

"कैसी हो निशी?"

"ठीक हूँ अब।"

"माँ ने खाना भेजा है।लेकिन लगता है तुम लोगों ने खा लिया।"

रखी साफ थाली की तरफ इशारा करते हुए अभ्युदय जी बोले।

"जी।अभी-अभी खत्म किया।हाथ धोने ही गए थे।"

पंकज चुप था।उसने कुछ भी नही कहा।

"पंकज कल के लिए रवीश से बात हो गई?"

"कंहा अभ्युदय जी, अभी इन मैडम ने फुरसत ही नही दी।"

"मैंने क्या किया?"

"कुछ नही।रुको अब बात करने दो।"

पंकज फोन लेकर बाहर निकल गया।

"मैंने कुछ भी नही किया अभ्युदय जी।मैं तो सो रही थी।फिर खाना खाकर हाथ धोने जा रही थी तो गिर गई और.."

"पुच्चू.. मैंने कुछ पूछा?"

"नहीं लेकिन.."

"शांत हो जाओ।मैं जानता हूँ पंकज को।वो बुरा नही है।"

"अच्छा भी नही है।"

"प्यार करता है तुम्हें।"

"आप..आपको कैसे पता?"

"शक्ल पर लिखा है उसकी।पागल नही है जो तुम्हारे लिए सब छोड़कर बैठा है।"

"और आप?"

"रिया कंहा है?"

"फोन करती हूँ।"

रिया का फोन दो बार रिंग जाकर बन्द हो गया।

"वेदी को काल कीजिये।"

"वेदी भी साथ में है?"

"हाँ।फोन लगाइए।उसने फोन भी नही उठाया और अब फोन बंद है।"

"परेशान मत हो।रुको मैं कॉल कर रहा हूँ।"

वेदी ने भी पहली बार में फोन नही उठाया।

"हेलो अभ्यु।"

"वेदी कंहा हो?"

"मैं घर पर हूँ।"

"और रिया?"

"रिया को तो पहुच जाना चाहिए था?आई नही क्या अब तक?"

"तुमने कंहा छोड़ा था उसे?"

"उसने जंहा बोला मुझे।छोटी लाइन पर।"

"फोन क्यों नही करके बताया तुमने?"

"अभ्यु नाराज़ क्यों हो रहे हो?क्या हुआ?"

"कितनी देर हुई छोड़े हुए?"

"करीब एक घंटा।"

अभ्युदय जी ने गुस्से में फोन काट दिया।

"एक नम्बर की पागल।कोई काम बनता नही बिगाड़ने वाले पहले आ जाते हैं।बस मनमानी,सुनना तो है नही।पहले सुनो मत फिर बाद में रोते बैठो सारी जिंदगी।वो भी अकेले।"

"अभ्युदय जी।क्या हुआ?क्यों इतना गुस्सा कर रहे हैं आप?"

"मैं सच कह रहा हूँ कभी तुमने मेरी बात नही मानी न तो सोच लेना।मैं जो कहूँ वही करना।वो वेदी कितना कहा था मत कर शादी पर उस पर ऐसा भूत सवार था।बेटी पैदा हुई और पति निकल गया हमेशा के लिए हाथ से।सिर्फ पैसा चाहिए था उसे।अब सिंगल मदर है और पोल डांसिंग,दिन में एक पार्लर में काम करके पैसे कमा रही।यंहा लोगो को रिश्तेदारों को पता न चल जाये तो स्टेटस मेंटेन करने के लिए इतना सब नाटक।बेटी बड़ी हो रही है,उसे सच्चाई से दूर करने अपने नाना नानी के पास छोड़ देगी और वंहा विदेश में अकेले ये क्या-क्या,किन परिस्थितियों से गुजरेगी भगवान जाने।समझाओ तो सुनना नही है।बस दिखावा जरूरी है।"

अभ्युदय जी गुस्से में सब बोल गए और वेदी के दुःख का कारण आज मेरे सामने था।

अगर अभ्युदय जी ने वेदी से शादी कर ली होती तो वो आज इन हालातों से नही गुजर रही होती।

"अभ्युदय जी।हुआ क्या?रिया कंहा है?कब तक आएगी?"

"गई रिया अब रीवा।"
 
"कुछ भी?क्यों जाएगी वो रीवा?"

"क्योंकि वो एक घण्टे से गायब है।"

"ऐसा क्यों बोल रहे हैं आप?वो ऐसे क्यों करेगी?पागल थोड़े न है वो।"

"पागल ही है निशी।कल भी रो रही थी कि पापा के बिना शादी नही करूँगी।"पंकज भी अंदर आ गया और हमारी बातों को सुनकर उसने कहा।

"मतलब?"

"पंकज उसे देखने जाना पड़ेगा।वो 1 घण्टे पहले छोटी लाइन पर उतरी है। एक बार गोरखपुर का चक्कर लगा लेना ठीक होगा।"

"हाँ अभ्युदय जी।आपकी बात सही है।मैं देखने निकलता हूँ।"

पंकज मुड़ा ही था कि दरवाजा खुला।

सामने ही रिया खड़ी थी।हाथ मे सेवन इलेवन का बैग।

"कंहा थी अब तक?"

"क्या अब तक?तेरे लिए ही तेरी फेवरेट पेस्ट्री लेने गई थी।इतना ट्रैफिक के बस रिक्शा जो फसा तो पूरे एक घण्टे के ऊपर लगा कर वापिस लाया छोटी लाइन। फिर तो अपना ऑटो ही बढ़िया 5 रुपये वाला।पर फूटी किस्मत मेरी।आज जिस ऑटो में बैठी वो भी पंचर हो गया।ऑटो बदला और अभी पहुची।फोन की बैटरी भी चली गई।"

हम तीनों बस रिया को सुनते जा रहे थे।किसी ने भी उसे नही रोका और न ही उससे कुछ पूछा।

"रिया तू चमक रही है।" मैंने छेड़ते हुए कहा।

"तू।तू तो रहने ही दे।किस के साथ भेजा तूने मुझे।तू शादी कर फिर बदले लूंगी सारे।"

"ऐसा क्या हो गया?मैडम फ़िगरेट से आ रही हैं पर गुस्सा तो देखो?"

"अभी चुप हो जा सब बताऊंगी,कितने नाटक करवाये उस वेदी ने।"

"नाटक ? मतलब?"

"मतलब..पहले ब्लीच,फिर वैक्स,फिर स्क्रब, फैशियल,पॉलिशिंग और भी ऐसा कुछ जो बस तू सोच ले।बदला लुंगी तुझसे।"

"ऐसा क्या कर दिया?पीछे मुड़ कर बाल दिखा?कटवाए तो नही न?"

"मैं गला न काट देती उनलोगों का?"

"हम्म तभी बच गए।"

"मत पूछ कितना दर्द झेल कर आई हूँ।ऐसे-ऐसे बाल निकलवाये है उसने के बस पूछ मत।"

"ठीक है।नही पूछती।"

"अरे? ये क्या बात हुई?पूछ न?"

"छोड़ ना,वैसे भी तू थकी लग रही है।"

"हम दोनों निकलते हैं।तुम दोनों रेस्ट करो।शाम का खाना मैं ले आऊंगा।"

"नही अभ्युदय जी।आप क्यों परेशान होंगे?टिफिन आ जायेगा।"

"निशी, खाना आ जायेगा।ठीक है?"

"अब इतने गुस्से में कहेंगे तो ठीक है।"

पंकज और अभ्युदय जी चले गए।

"अब बता क्या-क्या कराया?"

"अच्छा तो इसलिए भगाया दोनो को?बहुत होशियार?"

"हाँ तो?उन दोनों के सामने क्या पूछती?अब बता,क्या-क्या मजे लेकर आई?"

"सच कहूं निशी मजा नही सजा।वो वेदी।बहुत हद वाली बेशर्म।हुह।"

"बता न?शर्मा तो ऐसे रही है जैसे मैं रवीश और तू अभी घूंघट डाल कर बैठी रीता।"

"यार हर जगह के बाल निकाल डाले सिर्फ सर के बाल छोड़कर।"

"हा.. हा आया मज़ा।"

"चुप हो जा।नालायक मैं दर्द में हूँ तुझे मज़े सूझ रहे?"

"बेटा मज़े भी तुम्हें ही लेना है।"

"निशी.."

"हम्म बोल न?"

"यार पापा.."

"रिया बस भी कर।अब मत सोच ज्यादा।सब ठीक ही होगा।"

"डर लग रहा है निशी।समझ नही आ रहा क्या सही, क्या नही।"

"बस कर पगली।कल सब होना है और आज तेरे नाटक शुरू हैं।"

"तू समझ नही रही है।दिल बहुत बैचैन है।"

"समंझ रही हूँ सब कि क्यों दिल बैचेन है।"

"निशी मैंने कभी बिना पापा के, बिना उनकी सलाह के किया नहीं कुछ तो ये शादी?"

"रिया सुन एक बात।क्या ताऊ जी ने ये रिश्ता न अटकाया होता तो अंकल रवीश से ही तेरी शादी करते न?"

"हम्म 100 परसेंट।"

"फिर चुप कर जा।मूड सही कर और जा आंटी से चाबी लेकर रख ले।"

"चाबी क्यों?"

"आज रात चाय पीनी है मुझे।" खाना खाकर मैंने रिया को ऑन्टी के पास भेज दिया।रिया ऑन्टी के पास जाकर चाबी की बात करने गई।

उतनी देर में मैंने पंकज को फोन मिलाया।

"हाँ जानेमन बोलो।"

"अब ये जानेमन क्या है?"

"तुम न..कभी नही समझोगी बोलो।"

"आज का क्या प्लान?"

"आज का?"

"हम्म.."

"चलो आज ही शादी कर लेते हैं।"

"पंकज sss"

"हाय एक बार और बोलना.."

"क्या?"

"वैसे ही फिर सेपंकज ssss"

"बकवास बन्द करो।रिया का बर्थडे शुरू होने को है और याद ही नही जनाब को।"

"याद है।सब याद है।केक लेकर पहुच जाएंगे हम।"

"हम? बारात नही लानी है।"

"तू न.. अभ्युदय जी और मैं।"

"अभ्युदय जी भी आएंगे?"

"हाँ।अब तैयार हो लेना तू भी थोड़ा,उनके लिए।मुझे तो तू सिर्फ काजल में भी पसन्द है।"

"अच्छा?"

"हाँ सच्ची।तुझे पता है जब तू काजल लगा कर अपनी आंखें झपका कर बातें करती है न.."

"हम्म.."

"तब.."

"हम्म.."

"तब.."

"क्या sss?"

"नहीं बताना जा।सारे मूड का कचरा कर देती है।रिया को चॉक्लेट केक पसन्द है न?"

"नहीं रिया को चॉकलेट नही पसन्द।वो सिर्फ पाइनएप्पल फ्लेवर या फ्रूट ही खाती है।"

"लो।अब एक और काम।रख फोन केक चेंज करूँ पहले।"

फोन रख दिया।दवाई खाकर सोच में थी कि पंकज क्या कहना चाहता था? काजल में आँखे.. क्या कहती हैं मेरी?
 
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