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Romance स्वप्न सुंदरी (नई जिंदगी की ओर)

पापा मम्मी और मौसी ने कॉल पे मुझे जन्मदिन की शुभकामनाएं दी और मीनल को ले कर कई हिदायतें दी, मैंने उसका खयाल रखने का वादा किया और फोन रखा।

हमे महाबलेश्वर निकलना था,जिग्नेश और कौस्तुभ ने अपने खरीदे हुए कपड़े मुझे पहनाए. नीली डेनिम शर्ट के साथ क्रीम रंग का ट्राउज़र;फिर मुझे चिढ़ाने के लिए औरतों के जैसे मेरी नज़र उतारने लगे।

"क्या कर रहे हो छोड़ो मुझे.." मैं उन्हें धक्का दे कर बोला।

"तुझे क्या पता कल तुझे लोग कैसी हवस भारी नज़रों से देख रहे थे.." कौस्तुभ बोला।

"शरम कर" मैंने हंसते हुए कहा।

भाई जिग्नेश तू बता, लोग कैसे देख रहे थे इसे, और मॉल में वो दो लड़कियां. याद हैं ना।

जिग्नेश ने मुस्कुरा कर हां में सिर हिलाया, दोनों मेरी टांग खींच रहे थे।।

"मैंने भी देखा था" पीछे से मीनल बोली।

हम तीनों हैरान रह गए;

"क्या!!. तुम हो ही इतने प्यारे कोई भी देखेगा ही. " वो मेरे गाल खींचते हुए बोली।

मीनल ने नीली जीन्स और सफेद हाफ बाजू की टी शर्ट पहनी थी, बाल उसने खुले ही रखे थे आज. मुझे और क्या चाहिए था। लेकिन वहां ठंड होगी और मीनल को आदत नहीं, मेरे पास उस के नाप का जैकेट भी नही था, मैं सोच में पड़ गया।

खैर!! हम चारों निकल पड़े. आज मुझपे तरस खा के मीनल को आगे बिठाया गया था. मैं उसकी सीट बेल्ट लगाने को झुका लेकिन फिर पीछे हट गया, मीनल मुझे देखने लगी.. तो मैंने सीट बेल्ट का इशारा किया. और अपनी सीट बेल्ट धीरे से लगाने लगा..मीनल ने मुझे देखते हुए अपनी सीट बेल्ट लगा ली, हम दोनों एक दूसरे को देख के मुस्कुराये और मैंने कार चला दी।

मैंने रास्ते मे एक दुकान में कार रोकी और दो मिनेट में आने का कह के उतर गया. थोड़ी देर बाद मैं 2 थैलों के साथ कार में था।

"क्या है दिखा जल्दी;"मोटू चिल्लाया।

मैंने थैले पीछे फेंके और इशारे से चुप रहने को कहा। मीनल खोयी हुई बाहर देख रही थी। गाने चला के मैंने कार चलाई, और हम चल पड़े एक खूबसूरत सफर की ओर।

"छूटेया ना छूटे मोसे रंग तेरा डोलना,

इक तेरे बाजो दूजा मेरा कोई मोल ना,

बोलना माहि बोल ना

तेरे संग हँसना मैं, तेरे संग रोना

तुझमें ही रहना मैं,तुझमें ही खोना

दिल में छुपा के तुझे दिल नियो खोल ना

मरके भी माही तोसे

मुँह नहीं मोड़ना…

मैं गाने के साथ मीनल को देख के गुनगुनाने लगा; कितना हसीन था सब, जब तक मोटू बदतमीज़ चिल्लाया नहीं।

"करा दे!! एक्सीडेंट करा ही दे मेरा. शादी भी नही हुई मेरी अब तक;ऊपर से ये बोरिंग पंजाबी गाने;" कभी कभी मुझे लगता है कि कौस्तुभ ही मेरी मम्मी की असली औलाद है।

"तो कौन सा गाना बजाऊं?? . ओढ़नी ओढूं ओढूं पर उड़ी जाए. " मैं चिल्लाया। मीनल हंसने लगी।

"इसमे हंसने वाली कौन सी बात है. " मैंने मीनल को घूरा तो वो मुस्कुराते हुए ही खिड़की से बाहर देखने लगी।

मुझे पता नहीं चल रहा था लेकिन मैं धीरे धीरे वापस वो ही पुराना निशांत बन रहा था; शायद ये सभी महसूस कर रहे थे और खुश थे।

"भाई आप और मीनल पीछे बैठ जाओ; मैं ड्राइव करता हूँ. " हमारी टीम का सबसे शांत बंदा जिग्नेश बोला।

मुझे पीछे बैठना पसंद नहीं, लेकिन अब मैं और मीनल पीछे की सीट में एक एक खिड़की से चिपके नज़र आ रहे थे. कौस्तुभ ने काला चश्मा पहनते हुए मुझे देख के अपनी जीत का एहसास दिलाया और मैंने मुह टेढ़ा कर दिया।

" अपने बोरिंग गाने बजाए न!! , तो मैं यही उत्तर जाऊंगा. " मैं मोटू को देख के दहाड़ा.

"रोका किसने?? दरवाज़ा तेरे बगल में ही है. " मोटू का उड़ता तमाचा मुझे लगा।

मीनल फिर हंसने लगी. मैं उसे देखने लगा. फिर हम चारों ही हंस रहे थे।

मैं कभी बाहर देखता तो हवा से अपने बाल सम्हालते हुए बाहर के नजारों में खोयी मीनल को. मेरे लिए तो दुनिया की सारी खूबसूरती मेरे बगल में थी।

जिग्नेश सबका खयाल रखते हुए गाने बजा रहा था. एक जगह मीनल खिड़की से बाहर हाथ निकाल कर हवा को महसूस करने लगी; तो जिग्नेश ने मुझे आवाज़ दी और शीशे पे देख कर इशारे से ही मीनल पे ध्यान देने को कहा;

मैं मीनल के पास खिसक के बैठ गया , मुझे अपने पास देख के मीनल थोड़ा असहज हुई.. लेकिन मैंने उसके हाथ पे हाथ रख के उसे आश्वस्त किया।

"बाहर की हवा महसूस, करनी है मीनल?? मैंने पूछा तो वो खुशी से मुझे देखने लगी।

मैंने पीछे देखा तो आस पास कोई गाड़ी नहीं थी. जिग्नेश ने मेरा इशारा मिलते ही कार थोड़े और कोने पे कर दी ताकि कोई गाड़ी उस तरफ से ना जा सके. फिर मैंने मीनल को सहारा दे खिड़की से बाहर झांकने को कहा. मीनल ने खिड़की बाहर लटक के अपने हाथ फैला लिए. आगे कौस्तुभ भी निकल गया और जिग्नेश ने कार धीमी कर दी।

"हम जो चलने लगे, चलने लगे हैं ये रास्ते

आ हा हा मंजिल से बेहतर लगने लगे हैं ये रास्ते

आओ खो जाएँ हम, हो जाएँ हम यूं लापता

आओ मीलो चलें, जाना कहाँ न हो पता

हम जो चलने लगे, चलने लगे हैं ये रासते;"

जिग्नेश ने गाना चला दिया, मैंने मीनल को पीछे से पकड़ा हुआ था. उसे इन सब का अनुभव नहीं था.. और मेरे लिए वो किसी मासूम बच्चे की तरह थी जिसका हर पल खयाल रखना होता है। उसकि खिलखिलाहट कानों में मिश्री की तरह घुल रही थी. कौस्तुभ और मीनल एक दूसरे को चिढ़ाते हुए तो कभी हाथ पकड़ कर साथ चिल्लाते.

मैं और जिग्नेश मुस्कुराते हुए दोनो को देख रहे थे.

ज्यादा ठंड होने पर मैंने मीनल को अंदर किया. और कौस्तुभ को भी सीट पे बैठने को कहा।

मीनल ने बच्चों की तरह मुह बनाया, उनका मन नहीं भरा था। मैंने उसके चेहरे वे गौर किया तो देखा कि ठंडी हवा के कारण उसका चेहरा गुलाबी हो गया था और बाल बिखरे हुए थे. मुझे उसकी खूबसूरती पे प्यार भी आया और उसकि हालात देख कर हंसी भी आयी।

मैंने अपनी अंगुलीयों से उसके बाल थोड़े बहुत सुलझाते हुए ठीक किये. उसके बिना वैक्स के हाथों के रोएं ठंड से खड़े हो गए थे. मेरी नज़र पड़ी तो मैं बहुत हंसा. सब पूछते रहे लेकिन मैं कुछ कह नहीं पाया. मीनल समझ गयी तो उसे बुरा लगा,वो चुपचाप मुँह नीचे कर के बैठ गयी। मैंने गौर किया तो उसकी आंखें भर आयी थी. मुझे खुद पर बहुत गुस्सा आया।

मैंने उसका चेहरा ऊपर कर के उसकी आंखें पोछि. फ़िर अपने हाथ आपस मे रगड़े और गर्म हथेलियों को उसके चेहरे पे रखा।

"तुम जानती हो मीनल. तुम दुनिया की सब से अच्छी लड़की क्यों हो?" ये सुन कर मीनल मुझे देखने लगी..

मैं उसकि आंखों में झांकते हुए बोला "क्यों कि तुम बनावटी नहीं, तुम जैसी हो, वो ही दिखती हो. कोई मुखौटा नहीं. लड़कियां अपने बॉयफ्रेंड से मिलने जाने पर कितना सजती धजती हैं. लेकिन तुम जैसी हो वैसी आयी; बिल्कुल सच्ची और साफ मन की. "

मीनल की आंखें फिर गीली हो गयी. मैंने अपना एक हाथ उसके पीछे से ले जा कर उसके कंधे पे रखा और उसे खुद से सटा लिया; फिर अपनी गरम हथेलियों को उसके हाथों पे फेरा, जिस से उसे कुछ गर्माहट मिली।

थोड़ी देर में हम महाबलेश्वर में थे; प्रकृति की इतनी सुंदर रचना देख कर हम सभी चकित थे. चारों तरफ हरे नीले पहाड़ फैले थे. और उनसे आती धुन्ध हमें नम कर रही थी. ।

मैंने थैलों से डेनिम जैकेट निकाल कर जिग्नेश और मीनल को पहनने को दिया, कौस्तुभ मुँह न फुला ले इसके लिए उसे रुमाल दिया।

"मेरे लिए रुमाल क्यों" वो गुस्से में बोला।

" नाक पोछने के लिए. " अबकी कौस्तुभ को छोड़कर सब हंस रहे थे।

हम खूब भागे. साथ चिल्लाए. आस पास चाय बेचने वालों से चाय ले कर पी. दोस्तों के साथ कहीं घूमने का अलग ही मज़ा होता है।।

हम महाबकेश्वर के कई मशहूर हिस्सों में घूमे, मैं मीनल का हाथ पकड़े उसे सब दिखाता रहा. अंत में एक पहाड़ी के कोने पे आ कर हम खड़े हो गए और देखने लगे;

मीनल को शायद गहराई का अंदाजा नहीं था तो वो नीचे झांकने लगी. हम में से किसी ने ध्यान नहीं दिया कि वो क्या कर रही है. अचानक अपने हाथ में खिंचाव होने पर मैंने देखा तो मीनल लगभग नीचे की तरफ लटकी हुई थी, अगर मैंने उसका हाथ पकड़ा हुआ न होता तो वो गिर जाती।

ये नज़ारा देख कर मैं घबरा गया और मीनल की बेवकूफी ओर गुस्सा आया तो उसे पीछे खींचा और चिल्लाने लगा।

"दिमाग खराब है गिर गयी होती तो?; अकल है या नहीं तुम्हारे पास. क्या जवाब देता मैं सब को??. " मीनल डर से काँपने लगी.. उसकी इस तरह से बेइज़्ज़ती होने पर किसी को अच्छा नहीं लगा. मीनल की आंख से आंसू आ गए और कौस्तुभ मुझे डांटने लगा;

लेकिन जिग्नेश ने उसे रोका और अपने साथ ले गया. अब मैं और मीनल अकेले थे.. मीनल का इन तरह से रोना मुझे बहुत खल गया, मैं भी न ज्यादा ही गुस्सा कर जाता हूं।

मैं मीनल के पास उसे पकड़ने के लिए बढ़ा लेकिन उस ने गुस्से से मेरा हाथ झटक दिया, मैंने एक बार फिर कोशिश की लेकिन परिणाम वही रहा।

मन नहीं था लेकिन जबरदस्ती करनी ही पड़ी, मैंने मीनल के दोनों हाथों को अपने दोनों हाथों से कस के पकड़ा और अपने हाथ उसकी कमर पे रख दिये. हाथ पीछे हो जाने के कारण वो मेरे बहुत करीब हो गयी थी, गुस्सा इतना थी कि अब भी हाथ छुड़ाने की पूरी कोशिश कर रही थी. मैं उसकि इस नादानी पे मुस्कूराये बिना न रह सका।

उसके दोंनो हाथों को अपने एक ही हाथ मे कर के मैंने दूसरे हाथ से उसके बाल उसके कान के पीछे किये और बोला "इतनी नाराजी. वो भी मुझसे. ?? देखो लड़ भी नहीं पा रही ठीक से;" उसने अपने हाथ छुड़ाने की कोशिश करते हुए मुझे गुस्से से देखा तो मैंने अपना एक कान पकड़ लिया।

मीनल गुस्से से दूसरी तरफ देखने लगी. तो मैंने उसे खुद के और करीब कर लिया " अब कहाँ देखोगी. बोलो? "

वो कुछ नहीं बोली और गुस्से में उसकी साँसे तेज़ हो गई. मुझे वो एहसास फिर बेचैन कर गया. धड़कने दौड़ लगाने लगी. मैंने बिना जाने ही दूसरे हाथ से भी उसे कस लिया और उसके चेहरे की तरफ झुकने लगा।।

मुझे न जाने क्या हो गया था. लेकिन मैं कुछ गलत करता उस के पहले ही पापा मम्मी की हिदायतें कानों में गूंजने लगी;

मैं अपनी हरकत पे शर्मिंदा हो गया, मुझे माफ़ कर दो मीनल. कहते हुए मैंने उसे छोड़ दिया.. और नज़रें नीची कर के उस से दूर जा कर खड़ा हो गया। खुद पे बहुत गुस्सा आ रहा था, आज मैं मीनल, पापा और मम्मी के साथ खुद का भरोसा भी तोड़ने वाला था।

मीनल को पीछे मुड़ के देखने की हिम्मत भी नहीं थी, "चलो निशांत" कहते हुए मीनल मूझसे आगे बढ़ी और मैं उसके पीछे हो लिया।

हमे इस तरह से आते देख दोनो दोस्तों ने सिर पीट लिया

"तुझसे माफी भी ठीक से मांगी नही जाती. इतना अकड़ू क्यों है तू?" कौस्तुभ ने डाँटा।

"वो मान नहीं रही. " मैने लाचारी दिखाई।

" मत मानना मीनल;" इस बार जिग्नेश भी मेरे खिलाफ था।

मीनल ने एक नज़र मुझे देख के अपनी भौहें उचका के मुह टेढ़ा कर लिया तो मुझे फिर हंसी आ गयी।

सबने मुझे घूरा तो मैं फिर सॉरी कह के चुप हो गया. " चलो भाई उठक बैठक करो हमारे सामने. तब माफ करेगी मीनल" जिग्नेश मीनल को देख के इशारा करते हुए बोला।

"और हर बार आई एम सॉरी भी बोल" कस्तुभ ने सज़ा बढ़ा दी।

"लेकिन आज मेरा जन्मदिन है ना!! मैंने याद दिलाया.

"इसी खुशी में तो कम सज़ा मिल रही है. " जिग्नेश और कौस्तुभ ने ताली बजायी और मीनल ने हंसी दबा ली ।

अब मैं आई एम सॉरी कहते हुए उठक बैठक कर रहा था और मीनल खूब खिलखिला कर हंस रही थी. मेरे पक्के दुश्मन- दोस्त चिल्ला चिल्ला कर गिनती कर रहे थे।
 
आखिर हम चारों फ़िर साथ मे घूम रहे थे.. आज जब खाना खाने रुके तो मैंने मीनल को किसी और को खिलाने नहीं दिया. वो जब भी किसी और की तरफ हाथ बढ़ाती, मैं अपनी तरफ कर के खा लेता, थक के सब ने खुद ही खाना खाया।

वापस लौटने में आज भी रात हो गयी थी, कल के दिन हमे मीनल के साथ मुम्बई जाना था.. और परसों मीनल वापस. मैं फ़िर उसकि यादों के साथ रहूंगा.

"मीनल की दादी ने उसे कैसे भेज दिया ये सवाल फ़िर मेरे दिमाग मे आया, कहीं मीनल ने मेरे बारे में बता दिया;या झगड़ा हुआ. आखिर हुआ क्या. "

मैं मीनल के कमरे में गया तो मीनल वाशरूम गयी थी, मैंने बेचैनी में उसे आवाज़ दी.

"ऐसे किसी लड़की के कमरे में आते हैं क्या निशांत?. " वो वाशरूम में से गुस्से से चिल्लाई. मैं फ़िर शर्मिंदा हो कर बाहर आ गया और दोस्तों के मज़ाक का पात्र बना।

थोड़ी देर में मीनल ने मुझे बुलाया तो मैं गया और पूछा तो वो बोली.

"तुमने ही कहा था न निशांत.. मुझे खुद के लिए लड़ना होगा, हिम्मत करनी होगी. "

"तुम दादी से लड़ के आयी. " मैं आश्चर्य से भर गया।

"नहीं. थोड़ा समझा के और बहुत सारा झूठ बोल के" वो मुस्कुरायी।

"मतलब??"

"मतलब ये कि मैंने दादी से साफ कहा कि इन कम्पटीशन में मैं जाउंगी चाहे कुछ भी हो. क्यों अगर इसमे मेरा कोई नंबर आता है तो जॉब और रुपये दोनों होंगे। साथ ही दादाजी के इलाज के लिए फिर एक कोशिश कर सकूंगी।

दादी तब भी मानने को तैयार नहीं थी लेकिन दादाजी ने मेरा साथ दिया.

जानते हो निशांत मैंने ज़िंदगी मे पहली बार दादी से किसी बात के लिए बहस की.. और शायद यही उनकी हार थी. मेरी दृढ़ता देख कर वो स्तब्ध थी और दादाजी का साथ मिलने पर लाचार. "

"और झूठ??"

"ह्म्म्म3 Full, stopहम ट्रैन से जा रहे हैं. 3 दिन का कार्यक्रम है. " वो मुस्कुरा कर बोली।

"लेकिन मेरे पापा मम्मी को तो पता है मीनल;"

"उन्हें मैंने बताया निशांत; मैं उनसे झूठ कह के उनके बेटे के साथ उस के घर रहती. मेरी आत्मा मुझे पूरी ज़िंदगी धिक्कारती रहती. मैं तुम्हारे पास कब से आना चाहती थी लेकिन जिग्नेश ने तुम्हारे जन्मदिन तक रुकने को कहा. और भगवान की कृपा से मेरा कम्पटीशन में सिलेक्शन हो गया;"

मैं मीनल को देखता रहा. मेरी किस्मत पर मुझे नाज़ हो रहा था. मैंने नीचे बैठ के उस के पैरों पे अपना सिर रख लिया।

"मीनल!! मुझसे कभी दूर मत जाना. और नाराज़ भी नहीं होना;मैं सह नहीं पाउँगा मीनल. " पता नहीं क्यों मेरी आँखें नम हो गयी।.

"और तुम नाराज़ हो गए तो??" उसने मेरे सिर पे हाथ फेरते हुए पूछा।

"मुझे मना लेना. मैं बहुत जल्दी मांन जाता हूँ. " मीनल हल्का सा हँसी इस बात पे।

"कल मेरे लिए बहुत बड़ा दिन है निशांत. मुझे प्रेजेंटेशन भी देना है जो मैंने कभी नहीं किया;"

"देखना मीनल. तुम बहुत अच्छा करोगी. क्यों कि तुमने मेहनत की है. और तुम अब अपनी खूबियों को पहचानने भी लगी हो"

मीनल ने कुछ, नहीं कहा. केवल झुक के मेरे सिर से अपना सिर टिका लिया।

मुझे नींद आने लगी तो मीनल को लिटा कर चादर ओढ़ा कर मैं बाहर आ के सो गया।

.

अगले दिन हम मुम्बई के लिए निकल गए, मैंने और कौस्तुभ ने ऑफिस से मेडिकल लीव ले ली।

रास्ते भर मीनल अपने प्रेजेंटेशन की प्रैक्टिस करती रही और हम उसकी गलतियों को सुधारते रहे.

वहां पहुँच के देखा तो काफी सारे कॉलेज और इंस्टिट्यूट से लोग आए थे, मीनल थोड़ा घबरायी;सच कहूं तो मैं भी घबराया.. क्योंकि मीनल डिप्लोमा कोर्स वाली थी जब के वहां डिग्री वाले छात्र भी थे. लेकिन मीनल को उत्साहित रखना ज़रूरी था जो हम तीनों बखूबी कर रहे थे।

कुछ देर में मीनल को उस के इंस्टीटूट के 3 छात्र मिले. और वो उनसे मिल के तैयारी करने लगी।

तीन लड़के और मीनल अकेली लड़की थी अपनी टीम की. मैं ध्यान से सबको देखने लगा; एक लड़का जो मीनल के होने पर अलग ही खुश दिख रहा था. न जाने क्यों उस से मुझे जलन हुई. मीनल को वो ऐसे ही देख रहा था जैसे मैं देखा करता हूँ.

मेरी नज़रों ने भाप लिया. " वो कौन है जिग्नेश.." मैंने उसकी तरफ इशारा कर के पूछा।

"प्रवीण है उसका नाम. मीनल के बैच का है. बहुत होशियार भी है. "

"उसके बारे में इतनी डिटेल कैसे पता. " मैंने हैरानी से पूछा।

"नहीं ऐसा कुछ नहीं. " कह के उसने नज़रें चुराई।

"जिग्नेश; उस लड़के के देखने के तरीक़े से जो मैं सोच रहा हूँ. क्या वो सच है. " मैंने गंभीर हो कर पूछा. लेकिन मैं अंदर से जला, फूंका, चिढ़ा हुआ था; मैं उसकी नज़रें मीनल वे बर्दाश्त नहीं कर पा रहा था।

"बोलो जिग्नेश. जो मैं सोच रहा हूँ वो सच है ना. "

"हम्म्म्म. "

"तुम जानते थे लेकिन मुझे बताया क्यों नहीं जिग्नेश. क्या मीनल??. "

"कैसी बातें करते हो भाई. " जिग्नेश थोड़ा चिढ़ गया मेरी सोच से।

"तेरा दिमाग खराब है निशांत. ?" कौस्तुभ बोला।

मुझे कुछ सुनाई नहीं दिया और मैं मीनल की तरफ बढ़ गया।

जिस तरह का पागलपन मेरे अंदर आ गया था वो बिल्कुल सही नहीं था. मीनल को ले कर एक असुरक्षा की भावना हमेशा मेरे मन मे थी; जो शायद इस तरह से बाहर आ रही थी; लेकिन मैं ये समझता था कि किसी तरह का बखेड़ा नही खड़ा करना।

मेरे कदम खुद ब खुद बढ़ रहे थे कि अचानक जिग्नेश और कौस्तुभ मेरे सामने आ कर खड़े हो गए।

"मेरे रास्ते से हट जाओ तुम लोग प्लीज. !!" मैं रुकना ही नहीं चाहता था।

"ठीक है जा;केवल एक बात का जवाब दे. फिर मैं भी तेरे साथ चलूंगा. " कौस्तुभ बेहद शांत भाव से बोला।

"क्या. ?" मैंने पूछा।

"बैगलोर में जो तेरे साथ हुआ उस के पीछे क्या कारण था?"

मेरे सामने आद्या और उस से जुड़ी हर बात घूम गयी. और मेरे चेहरे का रंग उड़ गया, पास ही एक बैंच पे बैठ के मैंने अपने सिर पे दोनो हाथ रख लिए, कुछ हद तक मैं भी आद्या के बॉयफ्रेंड जैसी सोच पे आ गया था।

कौस्तुभ ने मेरे कंधे पे हाथ रखा और बोला " ज़िन्दगी हमें उतना ही देगी जितने के हम लायक है, जितना हमे ज़रूरी है. और उस से भी बड़ी बात. हर चीज़ अपने नियत समय पे ही हमारे पास आएगी.. .. न थोड़ा पहले, न थोड़ा बाद में;"

फ़िर जिग्नेश बोला " आज मीनल के लिए बहुत बड़ा दिन है; आज उसकी मेहनत की परीक्षा है. उसे इनाम मिले या ना मिले. लेकिन जब वो इतने लोगो के सामने अपने डिज़ाइन रखेगी ना;तो वो हम सबकी जीत होगी।"

"आज जहां मीनल है वो सिर्फ तेरे कारण है निशांत, वो यहां सिर्फ तेरे लिए आयी है; उसकी दादी ने कितना तमाशा किया, तुझे नहीं पता. मीनल ने बताया भी नहीं होगा. उस के बाद भी आई. क्योकि वो तुझसे प्यार करती है, जो तूने उसके लिए किया उसका सम्मान करती है।" कौस्तुभ ने फिर समझाया।

"बोल चलना है??;क्या करना है!! उस लड़के को मारना है या धमकाना है; चल उठ. ""

मैं रोने लगा. "ऐसा कुछ नहीं करता मैं पहले भी, न ही अब करूँगा. मुझे बहुत डर लगता है कौस्तुभ!!, मीनल को कोई नुकसान न पहुँचा दे. देखो कितनी चमक है अभी उस की आंखों में;अगर कोई वो छीन लेगा तो मैं सह नहीं पाउँगा. "

मैं आगे बोला.." तुम दोनों तो जानते हो न. कि मीनल की शादी भी लगभग नामुमकिन है. मैं फिर भी आस लगाए बैठा हूँ. ऊपर से मैं पंजाबी भी हूँ;फ़िर भी उम्मीद कर लेता हूँ. "

कैसी दुनिया है ये. वर्ण व्यवस्था बदलते-बदलते जात पात. बन गयी। अब कर्म से नहीं कुल से इंसान आंका जाने लगा. पहले लड़कियों को अपना वर चुनने की आज़ादी थी, स्वयंवर होते थे;आज माहौल ही अलग है. हम मॉडर्न बनते बनते न जाने कब दकियानूसी बन गए.

मेरा डर भी जायज़ था, जब हमें अंजाम पता हो, फिर भी हम उसे बदलने के लिए कोशिश में लगे रहते हैं ना!! तो ऐसा ही डर हर पल हमें सताता रहता है।

खैर!! मैं उठा और बोला " मैं मीनल की खुशी चाहता हूँ और कुछ नहीं. अगर वो मेरे साथ खुश है तो भी ठीक और कहीं और रह कर भी खुश तो भी ठीक; मैं ये भी जनता हूँ, जो भी उसे जान लेगा उस से प्यार ही करेगा. मेरी मीनल है ही इतनी प्यारी. "

मेरे दोनो दोस्तों ने मुझे गले लगा लिया. " अब चलें!! वर्ना पीछे की सीट मिलेगी. " मैंने आंसू पोछ कर मुस्कुराते हुए कहा।

इतने के बाद भी उस लड़के का मीनल से बात करना मुझे अखर रहा था, मैं दिल का बुरा नहीं हूँ. लेकिन ऐसा होने से खुद को रोक भी नहीं पा रहा था।

जब उस लड़के से बात चीत कर लेगा तू ना तो शायद ये सोच भी बदल जाएगी, मेरी अंतरात्मा ने मुझे समझाया।

उसी के लिए तो जा रहा था, लेकिन मेरे दोस्तों को लगा कि मार पिटाई ही कर दूंगा. मैं खुद से ही बुदबुदाया।

"क्या बोले भाई??" जिग्नेश सीट पर बैठते हुए बोला।

"नहीं तो कुछ भी नहीं. " मैंने जबरन दांत दिखाए।

हमे लंबा इंतेज़ार करना था.. क्योंकि पहले कुछ राउंड किसी दूसरी जगह होने थे.. जिनमे जज सारे प्रतिस्पर्धी के पास जा कर उनका डिज़ाइन और एनीमेशन देखने वाले थे, फ़िर आखिर में स्टेज पे प्रेजेंटेशन होना था कोई4, Full stop बाकी हमे इतना समझ भी नहीं आया.. हम तो बस मीनल को यहाँ बोलते देखने के लिए बेचैन थे।
 
वक़्त काटने के लिए जिग्नेश और कौस्तुभ मुझे दोनो दिन की फ़ोटो दिखाने लगे। हर फ़ोटो को देख कर मैं वो घटना याद करता और मुस्कुरा उठता।

आखिर में चीफ गेस्ट हॉल में आये, जो किसी बहुत बड़ी एनीमेशन कंपनी के डायरेक्टर थे, मिस्टर जे पी बजाज।

अब सारे प्रतिभागी बारी बारी अपनी कला का प्रदर्शन करने लगे.. दुनिया मे कितनी प्रतिभा छुपी है, ये देख के हम क्या, सभी दंग थे. आखिर मीनल, की टीम का भी नम्बर आया..

हमने देखा कि प्रवीण मीनल को कुछ समझाते हुए प्रोत्साहित कर रहा है और हमारी तरफ़ इशारा कर के उसे दिखाया। मीनल और हमने एक दूसरे को मुस्कुरा कर देखा और मीनल आगे स्टेज पे आयी।

सच कहूं तो मुझे बहुत घबराहट हो रही थी, ऐसा लग रहा था जैसे मेरा ही इम्तेहान हो. भगवान का नाम ले कर मैं प्रार्थना किये जा रहा था।

स्टेज पर मीनल ने बोलना शुरू किया, उसका आत्मविश्वास देख कर मन खुश हो गया। जब वो बड़े पर्दे पर अपने डिज़ाइन और एनीमेशन दिखाती तो ऐसा लगता ही नहीं कि ये उसका पहला अनुभव है और जितने भी एनीमेशन डिज़ाइन अब तक हमने देखे थे, मीनल की टीम उन्हें कड़ी टक्कर दे रही थी।

हम मीनल के लिए बहुत खुश थे, लेकिन मैं चाहता था कि उसे कुछ न कुछ तो इनाम मिले ही।

सब कुछ हो जाने के बाद आखिर में विजेताओं की घोषणा हुई, मीनल की टीम को ओवरऑल तीसरा स्थान मिला और उस के डिज़ाइन को दूसरा स्थान. हम खुशी से उछल पड़े; सब से बड़ी उपलब्धि हमारी ये रही कि मिस्टर जे.पी बजाज ने मीनल को अपने पास बुला के उसे कुछ बात की और एक कार्ड दिया। मीनल उनके पैर छू के वापस आयी।

हम तीनों खुशी से भीगी आंखे लिए हुए दूर से ये सब देख रहे थे, आज एहसास हुआ कि जब माता पिता अपने बच्चों के लिए मेहनत करते है तब बच्चों की सफलता के बाद उन्हें कैसा अनुभव होता है।

मैं इसके लिए जिग्नेश का एहसानमंद था, जिसने सब से ज्यादा मेहनत की. हमारे इंतेज़ार की घड़ियां खत्म हुई.. मीनल भागते हुए हमारे पास आ रही थी और हम तालियां बजा कर उसका स्वागत कर रहे थे।

मीनल मेरे पास न आ कर सबसे पहले जिग्नेश के पास गई और झुक कर उसके पैर छू लिए..जिग्नेश ने अपनी आंखें पोछते हुए उसे गले लगा लिया. " बहन की जगह यहां होती है. पगली"

आज मुझे जिग्नेश की अहमियत का एहसास हुआ, अगर वो न होता तो मैं मीनल के लिए चाह कर भी कुछ न कर पाता।

मैंने अपनी आंखें पोछि और उन्हें देखने लगा।

फिर मीनल कौस्तुभ के पास आई और बोली " तुम कितने स्पेशल हो पता है ना.. तुम अगर मेरे घर फ़ोन न करते ,मेरी दादी को डराते ना, तो मैं यहां नहीं होती. तुम्हारा एहसान.. "

ये सुन कर मेरा मुह खुला का खुला रह गया. मीनल के यहां होने में कौस्तुभ का कमाल है!! और किसी ने भी मुझे नहीं बताया।

"चुप रह न अब!!;मुझे रोना पसंद नहीं;और मेरी कुछ नहीं लगती तू क्या?? सारा प्यार जिग्नेश के लिए ही है. " कौस्तुभ ने आंसू पोछते हुए मीनल को डांटा और उसे गले लगा लिया।

जैसे जैसे मीनल मेरे पास बढ़ रही थी मुझे पता नहीं क्यों घबराहट हो रही थी. मुझे समझ नहीं आ रहा था कि मैं मीनल से क्या कहूंगा.. मैने तो कुछ किया ही नहीं उसके लिए; मीनल आखिरकार मेरे सामने थी।

अजीब बात ये थी कि हम दोनों ही एक दूसरे से नज़रें नहीं मिला पा रहे थे। कुछ देर इधर उधर देखने के बाद अचानक ही मीनल मेरे पैरों की तरफ झुकी पर मैंने बीच मे ही उसे थाम लिया..,;और ना में गर्दन हिलायी।

हम दोनों गले लग गए. मीनल ने कुछ कहा नहीं और मैं क्या कहता. मेरी मीनल मेरे पास थी, विजेता मीनल!!

आखिर में हम सब एक जगह बैठे तो मीनल बोली " निशांत मैं तुम्हे अपनी टीम के मेंबर से मिलवाना चाहती हूं. मैं जानता था कि वो कौन मेंबर है. " मैंने उसके सिर को सहलाया और कहा चलो कहाँ है वो.

मीनल मुझे अपने साथ ले जाने लगी तो मैंने आंखों से ही जिग्नेश और कौस्तुभ को आश्वस्त किया।

मैं और प्रवीण अब आमने सामने थे, प्रवीण मुझसे लंबाई में कम था लेकिन दिखने में अच्छा था, उसके चेहरे पर एक तेज था आत्मविश्वास का और अच्छाई का।

मैंने उसे हाथ मिलाने के लिए बढ़ाया तो वो हाथ पकड़ के मेरे गले लग गया " बहुत सुना था आपके बारे में. आज देख भी लिया. " ये सुनते ही मैंने मीनल को देखा तो उसने नज़रें झुका ली।

"मैं समझा नहीं " मैंने कहा।

" देखिये निशांत जी मुझे घुमा के कहना नहीं आता तो मैं साफ ही बता देता हूं. " कह के वो हंसा और मैं पता नही क्यों डर गया आगे की बात सोच कर।

"जब मैं मीनल से मिला तब ही मुझे ये बहुत पसंद आ गयी. " मैंने ये सुन कर मीनल को देखा तो वो वहां नही थी, दूर जा कर हमारी तरफ पीठ कर के खड़ी थी।

"मीनल थोड़ा डरी , घबरायी सी रहती थी. लेकिन उसका टैलेंट गज़ब का था. मैं डिग्री कोर्स 3rd ईयर का छात्र हूँ, इस प्रतियोगिता के लिए मैंने ही उसका नाम दिया था. सच कहूं तो मेरा स्वार्थ था, मैं मीनल को पसंद करने लगा था. और मीनल ये बात भांप गयी शायद. मैं उस से कुछ कहता उसके पहले ही उसने आप के बारे में बता दिया. तब से ही आपसे मिलने की इच्छा थी , मीनल की पसंद ज़रूर उम्दा ही होगी ये मैं जानता था, आज देख भी लिया. "

मैं आज फिर शर्मिंदा था अपने आप से. इस इंसान ने कितनी आसानी से मीनल की खुशी के लिये खुद का दर्द अपना लिया, जब कि वो भी उसे बहुत प्यार करता है, जो कि मैं उसकी आँखों मे देख सकता हूँ..

"नहीं. मैं. ऐसा नहीं मैं;" मैंने हकलाते हुए कहा.. तो वो मुस्कुरा दिया। मैं उस के सामने खुद को बहुत छोटा महसूस करने लगा।

"मीनल को सारी खुशियाँ दीजेगा;आप किस्मत वाले हैं जो उसने आपको चुना;" उसने नम आंखों से कहा.. तो मेरा भी गला भर आया।

चलता हूँ कह के मैं वहां से चला गया, प्रवीण का औरा मुझे वहां खड़ा नहीं रहने दे रहा था और उसका मीनल के लिए प्यार और त्याग मुझे चिढ़ा रहा था।
 
रात को हमे होटल में रुक कर सुबह निकल जाना था, हम सब थके हुए थे;कार जिग्नेश ने ही चलाई. मीनल पीछे मेरे कंधे पे सिर रख के नींद में थी और मैं रास्ते भर उसका इनाम और सर्टिफिकेट देखता रहा।

होटल पहुँच कर हमने दो कमरे बुक किये 1 मीनल और एक अपने लिए। मैं मीनल को उसके कमरे में ले गया, वो उदास थी और मैं जानता था क्यों.

थोड़ी देर में जिग्नेश और कौस्तुभ भी मीनल के कमरे में आये. और हमे हंसाया. कौस्तुभ लोगों की एक्टिंग कर के दिखाता और हम हंसते;

खाना हमने कमरे में ही मंगवा लिया, सबने पहले मीनल को खिलाया; मीनल सबकी प्यारी थी और सब उसका ख्याल भी रखते थे।

जिग्नेश और कौस्तुभ अपने कमरे में चले गये और हमे कुछ पल साथ बिताने को छोड़ गए।

"जानते हो निशांत. जे पी सर् ने मुझे अपना विज़िटिंग कार्ड दिया और बोले यु आर वेरी टेलेंटेड;" मीनल खुशी से कूद के बता रही थी और उसे ऐसे देख कर मैं मुस्कुरा रहा था।

"तुम तो हो ही टैलेंटेड मीनल;" मैं उसके बाल बिखेरते हुए बोला और वो मेरे गले लग गयी;" निशांत मैं खुद के लिए लड़ूंगी. कोई भी परिस्थिति हो अब; जब मैं एम बी बी एस नहीं कर सकी ना तब महीनों तक रोती थी, किसी भी डॉक्टर को देख के सोचती कि मैं भी ऐसी होती अगर. " उसका गला भर आया।

" मीनल, भगवान जो करते हैं अच्छा ही करते हैं;हर चीज़ में कुछ अच्छाई होती है. अब भी तुम बहुत अच्छा कर रही हो. देखना आगे तुम्हारा बहुत नाम होगा"।।। मैंने उस के सिर पे हाथ रख के कहा।

" तुम मिले मुझे , इस से अच्छा क्या हो सकता है; मुझे तो विश्वास नहीं होता कि तुम मेरे हो निशांत; तुम्हारे आगे क्या हूँ मैं. " मीनल भावुक हो गयी. ।

" तुम क्या हो!!;" मैं उसका चेहरा अपने चेहरे के करीब कर के बोला.." तुम मेरी ज़िंदगी हो मीनल. " हम दोनों कुछ पल एक दूसरे को देखते रहे, मैं उसके प्यार में बहक न जाऊ इस लिए जाने लगा;

"निशांत; चलो न!! डांस करें. और इस बार मुझसे नज़रें मत चुराना.." मीनल मुझे रोकते हुए बोली ,ये सुन के मैं शरमा गया।

कुछ ही पलों में हम डांस कर रहे थे;

खुदा जाने के मैं फ़िदा हूँ

खुदा जाने मैं मिट गया

खुदा जाने ये क्यूँ हुआ है

के बन गए हो तुम मेरे खुदा.

दिल कहे के आज तो छुपा लो तुम पनाहों में

के डर है तुमको खो दूंगा दिल कहे संभल ज़रा ख़ुशी को ना नज़र लगाके डर है मैं तो रो दूंगा.

करती हूँ सौ वादे तुमसे बांधे दिल के धागे तुमसे

ये तुम्हें न जाने क्या हुआ खुदा जाने के.

पूरा डांस हमने एक दूसरे को देख के किया, डांस था या भावनाएं;जो भी था बहुत खुल के हमारे साथ था।

मीनल जब बीच मे मुझे पीछे से पकड़ कर आगे आती. मैं पागल हो उठता.. जब वो घूम के मेरे हाथों में खुद को झुकाती तो दुनिया की सबसे खूबसूरत लड़की लगती. वो एक नदी की तरह मेरे इर्द गिर्द लहरा रही थी और मैं उसमे डूब गया।

मैंने आज अपनी मर्यादाओं का पूरा ख़याल रखा था. ऐसा गलती से भी कुछ न हो कि मुझे मलाल रह जाए। मीनल को भी मुझ पे भरोसा था इसी कारण वो इतना खुल के डांस कर पा रही थी।

अंत मे थक कर हम बैठ गए. , "मीनल सो जाओ अब " मैंने कहा।

" नींद आ रही है??" उसने पूछा और मैंने ना कहा।

" मेरे साथ बैठो न फ़िर;" मैं उसे देखता रह गया।

मैंने उसे अपने साथ बिठा लिया. उसने मेरे कंधे पे सिर टिका लिया और मैं उसका सिर सहलाता रहा।

थोड़ी देर में मुझे महसूस हुआ कि मीनल झपकी ले रही है;देखा तो वो सो गई थी। मैंने उसे सम्हाल कर पकड़ लिया, जब लगा कि वो पूरी तरह नींद में है तो मैंने उसे धीरे से गोद मे उठाया और अच्छे से लिटा के चादर ओढ़ा दी।

बहुत देर तक मैं उसे इसी तरह देखता रहा। उसे देख के मेरा मन नहीं भरा कभी भी. रात बहुत हो गई थी तो मैं उसका कमरा अच्छे से बंद कर के अपने कमरे में आ गया।

जिग्नेश और कौस्तुभ ने पूरे बिस्तर पे कब्ज़ा जमाया हुआ था और जिग्नेश के खर्राटे शोर मचा रहे थे। मैं सोफ़े पे पसर गया मगर नींद आंखों से कोसों दूर थी।

कल मीनल चली जायेगी और राह जाएगा एक लंबा इंतेज़ार;कितना लंबा ये कोई भी नहीं जानता;

समय अपनी परतों में जाने कितने रंग समेटे है. कुछ रंग बिखर जाते हैं तो कुछ ज़िन्दगी रंगीन कर जाते हैं;और कुछ की कालिख दामन से हटाए नहीं हटती।

अगले दिन मीनल विदा हो गयी,एयरपोर्ट के बाहर मैं आंसू रोके उसे जाते देखता रहा. वो मुड़ती रहती और जिग्नेश उसका हाथ सम्हाले आगे बढ़ता. वो आखों से ओझल हो गयी लेकिन मैं वैसे ही खड़ा रहा. न जाने कब कौस्तुभ मुझे अपने साथ गाड़ी तक ले आया।।

"चला पायेगा न. !! कोई ड्राइवर रख ले या फ़िर. "कौस्तुभ मेरी मनोदशा समझते हुए बोला।

मैं कुछ नहीं बोला और ड्राइविंग सीट पे आ कर बैठ गया. एक बार बगल की सीट देखी जिस पर मीनल कल बैठी थी और पुणे के लिए निकल पड़ा..एक इंतेज़ार के साथ;

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आगे की कहानी जानने के लिए अगले भाग का इंतेज़ार, करें।

धन्यवाद

मैं बिना कुछ बोले कार चला रहा था, दिमाग मे सारी घटनाएं घूम रही थीं, कौस्तुभ भी शांत हो कर बाहर देख रहा था।

मुझे अचानक याद आया तो मैं बोला

"कौस्तुभ!! तूने मीनल की दादी को फ़ोन कब किया, क्या कहा तूने उनसे?"

कौस्तुभ कुछ देर मुझे देखता रहा फ़िर वापस बाहर देखते हुए बोला.." आम खा. उसकी गुठली मत गिन.."

" बता ना प्लीज? " मैं गिड़गिड़ाया।

"कुछ नहीं किया यार; हर चीज़ बोलना ज़रूरी है क्या;खुद तू हमारे लिए जो करता है, मीनल के लिए जो किया. वो तुझे पता भी नहीं होता8 Full stop गाड़ी चला अब..मुझे घर जा के ऑफिस का कुछ काम भी देखना है. "

मैं अपना से मुँह ले के कार चलाने लगा, रास्ते मे एक जगह रुक कर हमने कुछ खाया. पता नहीं क्यों मीनल की याद आ गयी तब.

घर पहुँच के थोड़ी देर आराम करने के बाद कौस्तुभ अपने लैपटॉप पर काम मे लग गया और मैं अपने गिफ्ट फिर देखने लगा।

मीनल और मेरी सेल्फी; बहुत देर देखने के बाद मैंने जिग्नेश का कोलाज देखा. बीच में तब की फ़ोटो जब मीनल का चेहरा पानी से भीगा था. फ़ोटो में मैं मीनल का हाथ पकड़े उसे देख रहा हूँ और उसकी नज़रें शरम से नीची हैं। साइड में एक फ़ोटो मॉल की, जब हम हाथ पकड़े कुछ देख रहे हैं, एक फोटो और थी मॉल की, जब हम दोनों एक दूसरे की आंखों में देखे मुस्कुरा रहे हैं.

एक कोने में फ़ोटो थी जिसमे मीनल मेरी बाज़ुओं को पकड़े मेरे कंधे पे सिर टिकाए आगे बढ़ रही है और एक आखिर की फ़ोटो में वो मुझे खाना खिला रही है।

जिग्नेश ने सारे पल कितनी ख़ूबसूरती से कैद किये थे. मैं पता नहीं कितनी देर तक सब देखता रहा. फिर मीनल की बनाई तस्वीर को सीने से लगाये न जाने कब सो गया।

मीनल का फ़ोन आया तब मेरी नींद खुली, उसके दादाजी बहुत खुश थे और दादी भी शांत थीं. ये सुन कर मुझे सुकून मिला।

अगले दिन से मेरी वो ही ज़िन्दगी शुरू हो गयी, ऑफिस और घर; इधर बीच कौस्तुभ के रिश्ते की बात होने लगी।

एक लड़की पुणे में ही मिली. कौस्तुभ को अच्छी लगी तो मिल के आया. बात लगभग तय हो गयी. सगाई दशहरे में करने का तय हुआ तो मेरा मन भी मीनल से मिलने जाने के लिए उद्वेलित हो गया।

मेरी भी एक दिन ऐसे ही मीनल से सगाई होगी, शादी होगी. मेरे मन में ख़याल आया और मेरे चेहरे पे मुस्कान आ गयी।

मैंने पहले सोचा था कि मीनल के जन्मदिन पे जा के उसी की तरह सरप्राइज दूंगा. लेकिन अब पहले भी मिल पाउँगा।

मैं दिन गिनता रहा, इधर मीनल का कोर्स भी पूरा हो गया..कुछ दिन की ट्रेनिंग बाकी थी।

मैंने और कौस्तुभ ने उसे जॉब में हेल्प करने के लिए उस के घर मे बात करने की सोची.

मैं हर पल ये सोचता कि मीनल मुझे देख के कैसी प्रतिक्रिया देगी. कितना खुश होगी वो, घर नहीं आ पाएगी तो अपनी खिड़की से देखेगी. मैं सपने देखता रहता. और आखिरकार वो दिन भी आया जब मुझे अहमदाबाद के लिए निकलना था, कौस्तुभ 3 दिन पहले ही जा चुका था तैयारी के लिए।

मैं इतनी जल्दी में था कि अगर मेरा बस चलता तो अपने प्राइवेट प्लेन से चला जाता, लेकिन मेरे पास कोई प्लेन नहीं. तो कैब से एयरपोर्ट फिर वहां से फ्लाइट।

मैंने अहमदाबाद पहुँचते ही पापा को फोन किया लेकिन उन्होंने उठाया नहीं ,मम्मी का भी यही हाल; पता नहीं क्यों ये लोग फ़ोन कहीं भी रख के गायब हो जाते हैं. मुझे थोड़ा गुस्सा आया।

फ़िर कैब बुक कर के मैं घर के लिए चल दिया, खुशी के साथ एक घबराहट और डर भी था मन में. जब मीनल को सोचता तो पेट मे तितलियां उड़ने लगती. क्या पता कुछ ऐसा हो कि उसकि दादी मान जाएं, तो मैं भी साधारण सी सगाई कर लूंगा मीनल से. फिर वो मेरी;नहीं!! ऐसा करेंगें मंदिर में ही शादी कर लूंगा;मेरा पागल मन भी न, न जाने क्या क्या ख्वाब देखे जा रहा था।

जैसे ही सोसाइटी का गेट दिखा मेरी धड़कने बढ़ने लगी. कैब थोड़ा अंदर गयी तो कुछ आवाज़ें सुनाई दी, "आज क्या त्योहार है.." जो अजीब सा शोर है. जैसे लड़ाई हो रही हो; थोड़ा और आगे बढ़ने पर एक आध लोग मुँह लटकाए और बहस करते जाते दिखे. !!

मुझे अब घबराहट होने लगी. कुछ तो है.. जब अपने घर के पास, पहुँचा तो भीड़ दिखने लगी और आवाज़ें तेज़ हो गयी।

मैं खिड़की से बाहर झांक कर देखने लगा. लोग मीनल के घर की तरफ़ देख रहे थे, उसकि दादी के चिल्लाने की आवाज़ आ रही थी.. और लोगों के भी बोलने के कारण मैं ठीक से सुन नहीं पा रहा था.. लेकिन ये तो तय था कि कुछ बड़ा हुआ है।

मैं मीनल को सरप्राइज देने आया था यहां ज़िन्दगी ने मेरे लिए ही कुछ नया सोच कर रखा था।

मैं कैब से उतर के उसका किराया दे कर उस तरफ भागा ,मुझसे भी तेज धड़कनें भाग रही थीं. आखिर मेरी आँखों को सब दिखने भी लगा और कानों को सुनाई भी देने लगा।

"ये पैदा ही हमारी हमारी ज़िंदगी तबाह करने के लिए हुई है. " मीनल की दादी अपने घर के बाहर ही तमाशा कर रही थी।

मम्मी ने मीनल को पकड़ा हुआ था और वो मुँह नीचे किये आँसू बहा रही थी। उसके दादाजी अपनी भाषा मे कुछ कहना चाह रहे थे. लेकिन उनकी हालत केवल दयनीय थी।

पापा के साथ कुछ और लोग दादी को शान्त रहने और घर के अंदर जाने के लिए समझा रहे थे लेकिन उनपे तो कोई भूत सवार था.

अगर पापा ने पकड़ा न होता तो अब तक वो मीनल पे हाथ भी उठा चुकी होती.

मैं बहुत डर गया.." कहीं मीनल के पुणे रहने वाली बात सब के सामने तो नहीं आगयी. "

उसकी दादी फिर बोली. " आवारागर्दी के लिए ही ये सब नई पढ़ाई का नाटक किया इसने. हमें किसी लायक नहीं छोड़ा. " कह के वो रो भी रही थी।

अब मुझे पूरा भरोसा हो गया कि सब बात उन्हें पता चल चुकी है. मैंने आगे जा के मीनल का बचाव करने का निश्चय किया. कुछ भी हो मीनल मेरे लिए पुणे गयी थी. आज मुझे सब कुछ खुद पे लेना ही होगा।

मैं आगे बढ़ के सामने आ गया, "मीनल!!;घबराओ मत" मैंने कहा..तो सब मुझे आश्चर्य से देखने लगे।

" हाँ हॉं. तुम्हारे पापा ने ही इसका साथ दे कर इसे इस रास्ते धकेला. अब तुम भी उसके गलत में साथ देने आओ;" उसकी दादी चिल्लाई. ये किस बारे में बात कर रही थी मुझे समझ नहीं आया।

बात शायद कुछ और ही थी लेकिन मेरे सोचने के पहले ही उसकी दादी ने पापा की पकड़ से खुद को छुड़ा के मीनल को थप्पड़ लगा दिया।
 
मीनल बिना आवाज़ किये गाल पे हाथ रखे रोती रही, मेरे सब्र का बांध टूट गया था. मैं मीनल के पास गया और उसके आंसू पोछने लगा, क्या हुआ मीनल बताओ. मम्मी ने मुझे अलग रहने का इशारा किया और कुछ कहने के लिए मुँह खोला ही था कि मीनल की दादी का जवाब आ गया

" क्या हुआ?? महारानी जी अपने इंस्टीटूट के लड़के के साथ रंगरलियां मना रही थी. हमारे मुँह पे कालिख पोतने के लिए. " मैं स्तब्ध रह गया ,मीनल के लिए ऐसा सुन कर;मेरी मीनल ऐसा कर ही नहीं सकती, ये बात मेरी आत्मा समझती थी।

"देखिये आप को कोई गलतफहमी हुई है. ऐसे क्यों तमाशा बना रही हैं आप.." मैं दादी पे दहाड़ा तो मीनल ने मेरा हाथ पकड़ा मैंने उसे देखा तो उसने रोते हुए अपने हाथ जोड़ लिए और बहती आंखों से मुझे चुप रहने का आग्रह किया।

मेरा दिल तड़प उठा मीनल को ऐसे देख कर. "नहीं मीनल आज नहीं. मैंने कहा. " पापा ने भी आंखों ही आंखों में मेरा साथ दिया।

"इसके साथ भी कोई चक्कर है क्या तेरा. " दादी अब की मीनल और मुझे देख कर बोली, मीनल ने झट से मेरा हाथ छोर दिया।

"आपको बात करने की तमीज़ नहीं ये तो पता था, लेकिन दिमाग भी नहीं आपके पास ये आज समझ मे आया. " मैं उसकी दादी से भिड़ गया।

"खबरदार जो मेरे सामने ऐसी बातें की, मैं भूल जाऊंगा कि आप एक औरत हैं और उमर में बडी हैं. " मैं उन्हें आंखें और उंगली दिखाते हुए बोला तो वो एक बार को सहम गयीं।

"कैसी औरत हैं आप. दूसरी का दर्द तकलीफ समझ नहीं सकती. अरे!! किसी पराए को भी तरस आ जाये. लेकिन आप तो दादी के नाम के कलंक है. "

"बस कर लड़के;तू जनता ही क्या है? " दादी रोते हुए गला फाड़ रही थी। "इसने मेरा बेटा छीन लिया.. पहले उस औरत ने मेरा बेटा छीना फिर ये आ गयी; इकलौता बेटा था मेरा. चला गया. " दादी के करुण रुदन से सब का दिल दहल चुका था।

"आपका बेटा गया, वो वापस नहीं आ सकता. लेकिन उस के बदले वो बेटे से भी बढ़कर बेटी छोड़ गया. क्यों नहीं दिखता आपको??" मैंने उन्हें समझाना चाहा। "क्या नहीं करती ये आप लोगो के लिए. और आप केवल इल्ज़ाम लगाती हैं इस पे. "

"मेरे बेटे का एहसान ये पूरी ज़िंदगी भी चुकायेगी तब भी कम है. इसके कारण मेरे बेटे ने अपनी जान दे दी. माफ नहीं करूंगी इसे मैं"

भीड़, आपस मे गुड़मुड़ कर रही थी. जब कहीं कुछ होता तब आधे से ज्यादा लोग तमाशा देखने आते हैं और कुछ आग में घी डालने, कुछ मूक दर्शक बन जाते हैं. लेकिन सही का साथ देने की हिम्मत गिने चुने ही कर पाते हैं

"एहसान!!आपके बेटे का ही खून है ये;इसके सीने में आपके बेटे का दिल है,उसे क्यों तकलीफ देती हैं आप. कुछ तो इंसानियत. "मैं अपनी बात पूरी भी नहीं कर पाया कि दादी ने चिल्ला कर सब पर बम फोड़ दिया।

" नहीं है ये मेरे बेटे का खून; उठा के लाया था इसे वो. ? ..पहले मेरी मर्ज़ी के खिलाफ शादी की फिर बच्चा नहीं हो रहा था तो इसे उठा लाया किसी कचरे के डब्बे से. "

माहौल अचानक ही हद से ज्यादा शांत हो गया. सब खुले मुँह से दादी को देख रहे थे जैसे झूठ हो ये बात;मीनल पे तो जैसे वज्रपात ही हो गया।

दादी अब चिल्ला कर रो रही थी;" हमने बहुत अरमानों से बेटे की शादी तय की थी, लेकिन उसने एक दिन फोन कर के कह दिया कि उसने शादी कर ली. एक बार भी नहीं सोचा कि हमारा क्या होगा ,हमे बिरादरी से निकाल दिया गया, लड़की वालों ने बहुत हंगामा किया; उस सब के बाद भी आखिरकार हम बेटे को माफ करने के लिए तैयार हुए"

हम उसे अपने साथ ले जाने को कहते, पोते के लिए कहते तो वो टालता रहता, एक दिन फ़ोन कर के बोला कि माँ घर मे लक्ष्मी आयी है; हमे लगा बेटी हुई;लेकिन उसने हमारा दिल तोड़ दिया ये कह कर कि उसका बाप बन पाना मुश्किल है, ये लड़की किसी ने कूड़े के डिब्बे में फेंक दी थी तो वो उठा लाया।

हमने बहुत समझाया कि इसके दिल मे छेद है, किसी अनाथाश्रम छोड़ दे इसे;लेकिन वो नहीं माना. "

मेरे या किसी के पास भी दादी की इस बात के बाद कहने को कुछ था ही नहीं। इतनी बड़ी बात होगी दादी की नफ्ररत के पीछे , किसी ने भी नहीं सोचा था।

मेरे पापा उन्हें शांत करने की कोशिश करने लगे. भीड़ में फिर तरह तरह ही आवाज़ें आने लगी. मैं कभी मीनल को देखता जो बुत बनी खड़ी थी, कभी दादी को जो सिर पीट पीट के रो रही थी. और कभी का के दादा जी को एक कुर्सी पे कोने में बैठे फफक रहे थे।

किसी के मरने में भी ऐसा मातम का माहौल नहीं होता जो कि आज मीनल के घर के बाहर हुआ था।

पापा दादी को घर के अंदर ले जाने लगे. तो वो उनका हाथ झटक के चिल्लाई;" बात पूरी नहीं हुई मेरी अभी. आज मैं सब बोलूंगी, मेरे बेटे की कसम के कारण चुप थी अब तक;,लेकिन अब नहीं"

मैं डर गया कि अब क्या तमाशा होगा मीनल के साथ. उस बेचारी की क्या गलती थी आखिर..

"जब मेरे बेटे का एक्सीडेंट हुआ.." दादी ने फिर नया पिटारा खोला और चारों ओर सन्नाटा छा गया उनकी बात सुनने के लिए। "हम भागे भागे वहां गए. मेरा पोता और बहू मर चुके थे. सिर्फ ये मनहूस बची थी. मेरे बेटे के दोनों पैर काट दिये गए थे"

मैं जब उसके होश आने पर मिली तो वो बहकी बहकी बातें कर रहा था , बार बार मास्क हटा के कुछ कुछ कहता रहता ". मैं कुछ नहीं कर सकता अब. बोझ हूँ. मेरी बेटी मेरे सामने मर जाएगी. सब खत्म;" फिर बोला "माँ मीनल तुम्हारा ख़याल रखेगी.. उसे कुछ मत बताना पूरी ज़िंदगी साथ देना. किसी को कुछ मत बताना जो भी हो तुम्हे मेरी कसम, "

दादी ज़मीन पे बैठ गयी इतना कह कर; अपनी साड़ी के पल्लू से आंखें पोछि और बोली " फिर बोला माँ जाओ!! पापा को देख के आओ, वो परेशान होंगे. " उसकि ज़िद पे मैं गयी, लेकिन डॉक्टर ने मिलने नहीं दिया तो वापस बेटे के पास भागी;"

बाहर से देखा तो उसने अपना मास्क हटा दिया था और छटपटा रहा था, मेरी आवाज बंद हो गयी, होश नहीं रहा कि किसी को बुलाऊं. ..जैसे तैसे दरवाज़ा खोल कर मैं उस के पास पहुँची.. मास्क उठाने लगी तो उसने हाथ पकड़ लिया. "

मेरे सामने मेरा बेटा तड़प के जान दे रहा था; मेरी आँखों के सामने..? ." दादी रोते हुए बोली. "माँ मीनल;माँ मीनल;" ये कहते हुए उसने दम तोड़ दिया उसने।

मीनल ये सुनते ही गश खा के गिर गयी, मैने उसे सम्हाला।

भीड़ अब छंटने लगी. मैं बेहोश मीनल को गोदी में उठाये खड़ा था, पापा ने पानी ला के उस पे छिड़का तो उसने आंखें खोली.

पापा मीनल की दादी को अंदर ले गए और एक अंकल ने दादाजी को सहारा दे कर अंदर बिठाया।

पता नहीं किस की गलती थी ,कौन सही था. एक माँ के सामने मरता बेटा हो तो उसकि हालत शायद ऐसी ही हो जाये. लेकिन मीनल!! उस बेचारी का क्या दोष. क्यों ऐसा भाग्य मिला उसे।।।

मैं उसे गोदी में उठाये ही अंदर ले गया, मेरे आँसूं मीनल को भीगा रहे थे और मीनल को होश ही नहीं था कुछ भी।

दादा दादी को पानी पिलाया गया. मैंने मीनल को भी एक कुर्सी पे बिठाया. लेकिन दादी उसे देखते ही बोली. मेरे सामने से हट जा.. ? ;मैं तेरी शक्ल भी नहीं देखना चाहती, मीनल ने कुछ सुना ही नहीं जैसे. उसकि हालत देख कर मेरे सब्र का बांध टूट गया और मैं उठ खड़ा हुआ।

"चलो मीनल;!! मैंने उसका हाथ पकड़ते हुए कहा तो सब मुझे हैरानी से देखने लगे।।

"आपकी पोती को ले जा रहा हूँ मैं दादाजी. अब ये यहां नहीं रहेगी. "

"क्या कह रहा है पुत्तर तू. ऐसे कैसे. " मम्मी घबरायी हुई थी और रोने लगी।

मीनल के दादाजी ने रोते हुए गुजराती में कुछ कहा और हाथ से ले जाने का इशारा किया।

औरतें रोती हैं तो उतना नहीं खलता लेकिन दादाजी के उम्र के लोग बीमारी ही इस स्थिति में रोये तो वो दृश्य दिल चीर जाता है।

मीनल बेसुध पड़ी थी. मीनल उठो !! मैं चिल्लाया. मीनल!! लेकिन वो तो शून्य में खोयी थी। पापा उसे ऐसे देख कर सिसकने लगे।

मैं वहां एक पल भी रुकना नहीं चाहता था, मैंने मीनल को गोदी में उठाया और वहां से निकल गया।

मम्मी पीछे से मुझे आवाज़ देती रह गयी. घर आ के मैं सीधे अपने कमरे में गया और मीनल को गोदी में लिए बैठ गया, मेरे अंदर का सारा गुबार अब बाहर आने लगा औऱ मैं मीनल को आवाज़ देते हुए रोने लगा।

लगभग एक घंटे बाद पापा मम्मी घर आये, मैं उसी तरह मीनल को गोदी में के कर बैठा उसे देख रहा था, फर्क सिर्फ इतना था कि मैं अब रो नहीं रह था और मीनल अब भी कहीं खोयी थी।

" ये तूने क्या किया पुत्तर. ऐसे इसे यहां ले आया.." मम्मी अपना सिर पकड़े बोली।

पापा ने मीनल को मेरी गोदी से उठा कर बिस्तर पे लिटाया और बोले " जो हुआ सो हुआ. फिलहाल मैं डॉक्टर को बुलाता हूँ मीनल की हालत ठीक नहीं. "

मैं सिर झुकाए चुप चाप मीनल को देखता रहा.. डॉक्टर आये मीनल को देखा और इंजेक्शन लगाया। पापा से उन्होंने क्या बात की मुझे कुछ नहीं पता. मैं मीनल को एक पल के लिए भी नहीं छोड़ना चाहता था।

थोड़ी देर में पापा मेरे बगल में आकर बैठे. कुछ देर चुप रहने के बाद मैंने पूछा " क्या हुआ था पापा??"

"मीनल को सोसायटी में से किसी ने उस के इंस्टिट्यूट के किसी लड़के के साथ. गलत अवस्था मे देखा; तो उसकी दादी को बता दिया" मेरे सामने प्रवीण का चेहरा घूम गया।

"मैं नहीं मानता पापा; कुछ गकतफहमी है;"

"मुझे भी यही लगता है ,लेकिन उसकी दादी को किसी ने फ़ोटो भी दिखाई;" ये सुनते ही मेरा मुँह खुला का खुला रह गया। मीनल ऐसा नहीं कर सकती , वो तो मेरे सामने भी कितना झिझकती है. कोई उसे नुकसान पहुचाने के चक्कर मे है।

"नव्या; नव्या ने किया न ये सब;" मैं बड़बड़ाया।

"नव्या? उसने कुछ नहीं किया. वो यहां पर है नहीं आज कल" पापा ने सफाई दी।

"तो फिर किसने?;"

"भीड़ या समाज का कोई चेहरा नहीं होता बेटा. ये कब आपको किस चीज़ के लिए गलत ठहरा दे आप नहीं जानते। लोगों को दूसरे घर की आग में हाथ सेंकने में बहुत मज़ा आता है. अभी ये सब किसने किया ये ज़रूरी नहीं;तुम भी आराम करो मीनल के उठने के बाद सोचेंगे"।

"पापा मैं मीनल के पास रहूंगा. मैं ठीक हूँ"

मैं बहुत देर तक मीनल को देखता रहा; फिर जिग्नेश को फोन किया और पूछा "मीनल प्रवीण से मिलने क्यों गयी थी जिग्नेश??"

"प्रवीण से मिलने?? कब . मुझे नहीं पता. कल वो बाजार जाने का बता कर गयी थी कुछ काम से;क्या हुआ भाई"

मैंने उसे सब बताया तो वो स्तब्ध रह गया और मैं आता हूँ कह कर फ़ोन रख दिया।

मैं मीनल को बहुत देर तक देखता रहा फ़िर बेसुध मीनल के पास जा कर पूछा " तुम क्यों मिलने गयी थी प्रवीण से मीनल; क्यों??" मेरी आँख से आँसू निकल कर मीनल के चेहरे पे गिर गया।

दोस्तों कुछ व्यस्तता के कारण मैं अगले कुछ भाग शायद इस हफ्ते न लिख पाऊं. फिर भी कोशिश रहेगी कि बीच मे छोटा ही सही आगे का भाग लिख दूँ।

इन्तेज़ार करवाने के लिए क्षमा प्रार्थी हूँ.. धन्यवाद।।

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क्रमशः
 
मैं नीचे गया तो मम्मी पूछने लगी " तू क्या कर रहा है पुत्तर. तुझे पता भी है. ऐसे ज़िन्दगी के फैसले नहीं लिए जाते;तूने सब कुछ मजाक बना के रख दिया है;मीनल की ऐसे और बदनामी होगी. "

मैं मम्मी का हाथ पकड़ के बोला "मम्मी. आप बताइए !मीनल के साथ गलत हुआ, क्या उस के लिए कुछ करना गुनाह है??"

"नहीं , मैं ऐसा नहीं कह रही. मुझे बस तेरी चिंता है पुत्तर. कितना हंसता खेलता बेटा था मेरा. अब क्या हालत हो गयी है। "

"सब ठीक होगा मम्मी. मैं भी पहले जैसा रहूंगा. आप लोग मेरा साथ दीजिये बस।"

इतने में कौस्तुभ का भी फ़ोन आया. अगले दिन उसकी सगाई में वक़्त से पहुँचने के लिए. हमने उसे मीनल का जिक्र नहीं किया।

थोड़ी देर में जिग्नेश घर आया मीनल को देख बहुत दुःखी हुआ, हम बात कर के सोचते रहे. " मीनल का फ़ोन कहाँ है? उस से पता चल जाये शायद.." जिग्नेश बोला।

"मीनल के घर ही होगा क्योंकि जब मैं उसे यहां लाया तब वो खाली हाथ थी" मैंने कहा।

"तो कैसे होगा. मैं मीनल की दादी से बात करता हूँ. सामान मांगता हूँ;" हम नीचे आये तो पापा ने पूछ लिया कि क्या प्लान है.

"अंकल मीनल का मोबाइल और सामान ले कर आते हैं. अब वहां नहीं रहेगी वो, अपने घर ले जाऊंगा मैं. "

मैं जिग्नेश को देखता रह गया, कितना प्यार करता है वो मीनल को.

बाहर जाते ही मीनल की दादी अपने घर के बाहर ही दिख गयी जो हमे देख कर बड़बड़ाने लगी..और दरवाज़ा बंद कर लिया. मैंने जिग्नेश से कहा " ये काम मैं करूँगा, तुम जा के दादी को समझोगे बुझाओगे उतने में मैं सब निपटा चुका होऊंगा. "

"नहीं भाई. अब कोई पंगा नहीं करना;" जिग्नेश डरा।

"मैं एक शब्द भी नहीं बोलूंगा जिग्नेश. तुम उस के घर के बाहर खड़े रहना..कुछ लगा तो आ जाना. "

मैंने दरवाज़ा खटखटाया तो दादी ने खोला और मुझे देखते ही चिल्लाने के लिए मुँह खोला उस के पहले ही मैंने अपनी आंखें दिखाते हुए अपनी उंगली से चुप रहने का इशारा किया तो वो घबरा गई. " किनारे हटिये. " मैंने बहुत धीमी लेकिन धमकाने वाली आवाज़ में कहा. और वो डर के रास्ते से हट गई।

मैं दिखने में जितना प्यारा और भोला हूँ उतना ही स्वभाव से खूंखार भी हूँ. आज दादी के हाव भाव देख के ये समझ आ गया।

मैं सीधे मीनल के कमरे में गया और उसका मोबाइल खोज के अपनी जेब मे रखा. फिर एक दो बैग ले के मीनल के कपड़े एक बैग में भरने लगा.

लड़कियों के कपड़े रखना बहुत मुश्किल काम है, कुछ आंख बंद कर के, कुछ बिना देखे और कुछ देख भाल के मैंने बैग भर ही लिए. साथ ही लैपटॉप और एनीमेशन से जुड़े सब सामान भी;

मीनल के दादाजी के कमरे में जा के मैंने उनके पैर छू लिए. आपकी मीनल को कुछ नहीं होगा, आप निश्चिंत रहिए. " ये सुन के उनकी आंखें भर आयी. मैं उनके आँसू पोछ के और समझा कर बाहर निकला. उनकी बात भले ही मुझे समझ न आती हो लेकिन मेरी बात वो अच्छे से समझ रहे थे।मुझे शांति से सामान के साथ बाहर आता देख जिग्नेश हैरत में पड़ गया।

घर पहुँचते ही हमने मीनल का मोबाइल देखा लेकिन कुछ हाथ ना लगा । जिग्नेश ने मीनल से उस घटना का ज़िक्र करने से मना किया और बहुत प्यार से पेश आने की हिदायत दी।

हम ऊपर गए तो देखा मीनल उठ चुकी थी, मम्मी उसे सूप पिला रही थी और पापा साथ बैठे थे। मीनल अब भी ख़ामोश थी।

जिग्नेश ने जब उसे आवाज़ दी तो वो रोने लगी. मम्मी किनारे हो गयी और जिग्नेश ने उसे गले लगा लिया।

"वो फ़ोटो. मैं..".मीनल कुछ कहना चाहती थी लेकिन जिग्नेश ने रोक दिया।

"मीनल. चलो चुप हो अब;दुनिया मे सब के लिए सुख दुःख है, तुम अकेली नहीं जो ऐसे ही हार मान ली. " जिग्नेश को पहली बार मैंने इतनी तेज आवाज में बात करते सुना था लेकिन एक अपनापन था उसकी आवाज़ में ;";हमे किसी सफाई की ज़रूरत, नहीं;" वो बोला फिर उस के आंसू पोछ के सूप पिलाया।

मैं एक दर्शक बना सब देखता रहा, मीनल ने एक बार भी मेरी तरफ नहीं देखा; जिग्नेश से बात कर के वो ज़मीन पे नज़र गड़ा के बैठी रही। मैं उम्मीद में रह गया कि मुझसे भी वो कुछ कहे।

"चलो मीनल अपने घर चले. तुम्हारे भाई का घर. अब से हम वहीं रहेंगे. " जिग्नेश बोला और जैसे मुझ पे वज्रपात हो गया।

क्या मीनल चली जायेगी, मेरे साथ नहीं रहना चाहती वो; मुझे एक बार के लिए भी देखा तक नहीं उस, ने8 Full stop शायद जो मैंने आज किया उस से आहत है. मजबूत रहने की कोशिश के बावजूद मेरी एक आंख से आँसू गिर गया, मैं साँसे रोके खड़ा था ये जानने के लिए कि मेरी क्या अहमियत है मीनल के लिए।

मीनल खामोश रह कर जिग्नेश के गले लगी रही. मैंने कुछ कहना चाहा लेकिन ज़ुबान नहीं खुली। मैं आस भारी नज़रों से मीनल को देखता ही राह गया. शायद वो मुझे भी कुछ बोले, कुछ बताये।

जिग्नेश और मीनल को ऐसे देख मम्मी पापा अपने कमरे में चले गए, मैं पीछे खड़ा रहा. आखिरकार एक बार जिग्नेश के गले लगे हुए मीनल की नजरें मुझ से टकराई, मेरा दिल छलनी हो गया उन नज़रों का सामना कर के. उसकी नज़रों में मेरे लिए प्यार न हो कर नज़राजगी थी, वो बिना पलकें झपकाए मुझे देखती रही और मेरे कदम खुद ब खुद पीछे होते गए. जब उसकी नज़रों से घबरा गया तो नीचे भाग गया और सोफ़े पे टिक के बैठ गया।

न जाने क्योँ कमज़ोरी सी होने लगी थी. सिरगेट पीने का मन हुआ लेकिन लाचार था, मेरे पास अब सिगरेट नहीं होती थी।

मैं बैठा रहा. ये समय ऐसा था कि न कोई भाव था न कोई विचार. थोड़ी देर में जिग्नेश आया और पूछा कि मैंने मीनल के लिए क्या सोचा है।

"सोचा तो बहुत कुछ है जिग्नेश. लेकिन वो पहले मुझे और मेरे प्यार को समझे तो सही.";कौस्तुभ ने मेरे कंधे पे हाथ रख दिया;

"अभी उसे तुम्हारी ही ज़रूरत है. चाहे वो कुछ कहे या न कहे. उसे तुम्हारा साथ चाहिए हर निर्णय में, हर सोच में, हर कदम में. " मैंने हाँ में सिर हिलाया. ."

मुझे मीनल के पास बैठने के लिए कह के जिग्नेश चला गया, मैं भारी कदमों से ऊपर गया और कमरे के दरवाज़े पे ही खड़ा हो के उसे देखने लगा, वो लेटी हुई छत देखते हुए सोच रही थी।

काफी सोच विचार के मैं बोला " क्या सोच रही हो मीनल?"

मेरी आवाज सुन के मीनल ने मुझे देखा तो मैं घबरा गया, कहीं मीनल ज्यादा नाराज़ न हो।

"मैं अकेले रहना चाहती हूं निशांत. "उसका सपाट जवाब आया और मैं उल्टे कदम नीचे चला गया; मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था इसी लिए सोसाइटी के बाहर निकल के चलने लगा;जब चलते चलते थक गया तो वापस लौट आया.. इतनी देर में मीनल को खाना खिला के सुलाया जा चुका था, मैं उस के पाया गया भी नहीं।

मम्मी ने मुझे अपने हाथों से खाना खिलाया. " अपना ध्यान नहीं रखेगा तो किसी और का कैसे रख पाएंगा. "

"मैं ठीक हूँ मम्मी "मैं फीका से मुस्कुराया।।

मुझे ऊपर नीचे गेस्ट रूम में सोने के लिए कह कर पापा मम्मी सोने चले गए, मैं सोफ़े पे ही बैठा रहा; नींद आ ही नहीं रही थी. थक गया तो सोफ़े के हत्थे पे ही सिर टिका के बैठ गया।

रात को 3 बजे के आस पास कुछ आहट लगी तो देखा मीनल धीरे धीरे नीचे उतर रही है, रात की कम रैशनी में भी उसकी उदासी साफ झलक रही थी। मैं असहज हो गया उस को देख कर, छुपता भी कहाँ. तो खड़ा हो गया. आखिरी सीढ़ी उतरते हुए मीनल ने भी मुझे देख लिया और ठिठक गयी।

मैं उस से नज़रें हटा के अपनी मेज़ देखने लगा. मेरी धड़कने बहुत तेज़ थी.. शरीर फ़िर कमज़ोर सा लगने लगा.

"पानी चाहिए था. " मीनल ने धीमी आवाज़ में कहा।

मैं बिना कुछ बोले, एक जग में पानी और गिलास ले आया लेकिन तब तक वो जा चुकी थी, मैं मजबूरी में ऊपर गया।

पानी मेज़ पे रख के लौटने लगा तो मीनल बोली " मैंने कोई गलत काम नहीं किया निशांत. " मैं उसे देखने लगा. और "जानता हूँ "कह कर वहां से निकल गया।

अगले दिन कौस्तुभ के घर जाने के पहले मैंने मीनल के कमरे मे उसके बैग उस के पास रख दिये, "ये क्या है " वो बोली।

"तुम्हारा सामान. " इस से ज्यादा मैंने नहीं कहा। मीनल ने बैग खोल के कुछ कपड़े बाहर निकाले और फिर दोनों बैग टटोलने लगी. बैग के अंदर ही सामान देखती फिर हैरानी से मुझे देख के पूछा "तुम लाये मेरे कपडे?!"।

उसके सवाल और देखने के तरीके से मेरे गाल शर्म से गरम हो गए. मैं नीचे देखने लगा तो मीनल समझ, गयी।

मैंने कनखियों से मीनल को एक बार देखा तो वो मुस्कुराहट छुपाते हुए अपने कपडे वापस बैग में डाल रही थी.. फिर बोली.." अब जाओ निशांत मैं तैयार हो कर नीचे आऊंगी और मैं शराम से लाल हुए तेज़ी से वहां से भाग निकला.

जिग्नेश घर आया उसका कहना था कि इतना सब होने के बाद अगर मीनल मेरे साथ अकेले जाएगी तो बात और बनेगी.

मीनल ने आज वो ही कपडे पहने थे जो पहली बार घूमने जाने समय पहने थे, मेरे आंखों के आगे सब कुछ घूम गया। उसने फिर वो ही टाइट चोटी बनाई थी जिस से मुझे चिढ़ थी लेकिन आज मैं कुछ नहीं कर सकता था;

कौस्तुभ के घर पहुँचते ही हम तीनों किसी मज़े हुए कलाकार की तरह अपने अपने किरदार निभाने लगे, मीनल जिस तरह से कौस्तुभ से हंस बोल रही थी, झूठा ही सही मुझे अच्छा लग रहा था।

कौस्तुभ की मंगेतर मीरा बहुत ही सुंदर लग रही थी, सच कहूँ तो वो बिल्कुल वैसी ही थी जैसी लड़की मैं अपने लिए सोचता था लेकिन अब मैं उन को भी अपने मीनल वाले चश्मे से देख रहा था।

वापस आते समय मीनल ने रास्ते में एक जगह मीनल बोली " मुझे बात करनी है.. आगे बेंच के पास रोक दो.." जिग्नेश और मीनल बेंच पर बैठ गए और मैं हाथ बांधे जिग्नेश के बगल में खड़ा हो गया।

"परसों मैं बाजार गयी थी;मीनल ने कहना शुरू किया

" वहां मेरी ट्रेनिंग के दो लड़के और एक लड़की मिली. उन लोगों की ज़िद पे एक रेस्टॉरेंट चली गयी। वहां धक्का लगने के कारण मैं एक लड़के पे गिर गयी, हम लोगों और उस लड़के में बहस और थोड़ा झगड़ा भी हुआ. हमारी सोसाइटी की एक लड़की वहां थी उसने या उसके बॉयफ्रेंड ने मेरी फ़ोटो ले ली. जिस तरह से फ़ोटो ली गयी उसमे मेरा गिरना , सम्हलना सब गलत लग रहा था; फ़ोटो में कुछ एडिट कर के दादी को दिखाया फिर।"

"किस का काम है ये नाम बताओ;मैं गुस्से से चीखा. " तो मीनल और जिग्नेश एक सहम गए..। मेरा बस चलता तो मैं ये काम करने वाले को सड़क के बीचों बीच पीटता फिर चाहे वो लड़की ही क्यों न हो9 Full stop मीनल को मेरे गुस्से का अंदाज़ा था।

"नाम कुछ भी हो अब कोई फायदा नहीं. मेरी बदनामी हो चुकी है. अब कोई मुझे अच्छे चरित्र का नहीं मान लेगा;सफाई देने पर. "

"तुम्हे महानता दिखाने का कुछ ज्यादा ही शौक है ना. कोई तुम्हारी फ़ोटो एडिट कर के बदनाम कर रहा है और तुम हो कि;" मुझे मीनल की इस हरकत से चिढ़ हो रही थी, मैं उसे पकड़ने के लिए मुड़ा तो जिगनेश ने मेरा हाथ थाम लिया।

"भाई. कल जाना है आपको.. आज अच्छे से बात कर लो.. सब बैठ के सोचो कि अब अगला कदम क्या होना है. मीनल मेरे घर रहेगी या पुणे ले जाओगे।. "

"मुझे कहीं नहीं जाना.. मैं अपने घर वापस जाउंगी. मेरे पापा. " मीनल बोलते बोलते रुक गयी कुछ देर. " मुझे कर्जा चुकाना है. " मैंने क्रोध से मीनल को घूरा तो उसकि साँसे अटक गई।

"घर चलो फिलहाल; मुझे रास्ते मे कोई तमाशा नहीं करना.." बोल कर मैं कार में आ बैठा और पीछे से मीनल और जिग्नेश भी आये।

जिग्नेश को रास्ते मे छोड़ कर हम घर आये तो पापा मम्मी किसी के घर निकलने वाले थे, पापा ने मीनल को कोई तकलीफ न होने देने की हिदायत दी और निकल गए।

उनके जाते ही मीनल ऊपर कमरे में चली गयी, मैं सोफ़े पे बैठ के सोचने लगा कि किस का काम होगा लेकिन कोई चेहरा नहीं सूझा।

मैं मीनल के जानने के लिए ऊपर गया तो देखा उसने दरवाज़ा बंद किया हुआ था. मुझे बहुत बुरा लगा. फ़िर दरवाज़ा खटखटाया तो वो बोली " क्या काम है. "

"तुम जानती हो. " दरवाज़ा खोलो एक मिनट।

"निशांत. मुझे कोई बात नहीं करनी;" मीनल का ड्रामा शुरू हो गया।

"खोलोगी दरवाज़ा. या तोड़ के अंदर आना होगा. " मेरा सधा से सवाल हुआ मीनल से और दरवाज़ा तुरंत ही खुल गया।

मैंने क्रोध में उसे घूरा तो वो डर से थरथराने लगी, मैं आगे बढ़ा उसे पकड़ने के लिए और वो उतनी ही तेज़ी से पीछे होने लगी. सब इतना जल्दी हुआ कि उसे सोचने का मौका नहीं मिला और उसके पैर बिस्तर से टकरा गए, वो पीछे गिरती उस के पहले ही मैंने को पकड़ लिया .. मेरी गिरफ्त में वो बुरी तरह कांपने लगी;लेकिन मेरा दिमाग अब खराब हो चुका था। मीनल जिस तरह से मुझे अनदेखा कर रही थी कल से. उस का सारा दर्द आज मेरे गुस्से में घुल के उसे बढ़ाने लगा।

सबसे पहले मैंने उसकि चोटी खोल के बैंड फेंक दिया.

"मना किया था न!!. क्यों रहती हो मेरे सामने चोटी बना के??" मैं गुर्राया और उसके बाल ठीक करने लगा. मीनल की साँसे तेज़ हो गयी तो मैं उस से अलग हो गया. वो बालों को कान के पीछे करने की कोशिश करने लगी और मैं उसे इस तरह असहज होते देखता रहा. फिर धीरे से बोला " मीनल मुझे देख के बात करो आज. आज तुम्हे अपना भविष्य तय करना है;"

मीनल अब भी अपने डर से बाहर नहीं आ पाई थी।

"किसने फ़ोटो ली तुम्हारी मीनल;"

"प्लीज निशांत;मुझे इस बारे में कोई बात नहीं करनी. " वो रुआंसी हो गयी।

" पुणे कल चलोगी या ट्रेनिंग कर के आओगी?" मैंने सवाल बदल दिया।

" मुझे कहीं नहीं जाना; मैं दादी के घर जाउंगी वापस.. मेरी वो ही ज़िन्दगी है"
 
मीनल ने बहुत हिम्मत जुटा के ये बात कही लेकिन उसकी घबराहट छुपाए नहीं छुपी; ये बात मुझे फिर उकसा गयी और मैंने टेबल पे हाथ मार के सामान गिरा दिया, ये देखते ही मीनल सहम गयी।

"तुम ने मुझे क्या समझा है मीनल!!. "मैं चिल्लाया " मैं पागलों की तरह तुम्हारे लिए यहां वहां भाग रहा हूँ, सब से लड़ रहा हूँ. ताकि तुम नरक से निकल कर जी सको लेकिन तुम हो कि9 Full stop" मैंने फिर मेज़ पे हाथ दे मारा।

मीनल दुबक के बिस्तर के कोने में खड़ी कांप रही थी; मैंने लंबी सांसें ले कर खुद को संयत किया और उसके पास गया; " देखो मीनल. "

" क्या देखूँ; और क्यों देखूं. " मीनल मुझे धकेलने की नाकाम कोशिश, करते हुए बोली। " लगते क्या हो तुम मेरे जो तुम्हारी हर बात मानती रहूँ9 Full stop"

मेरी पूरी ज़िंदगी जिस पे सीमित हो के रह गयी. वो मुझसे ये बात कह रही थी; मेरे सीने में तेज दर्द हो उठा ; मैं मुह खोले उसे देखने लगा, क्या सच मे मीनल ने ऐसा कहा मुझसे. अब मेरे वहां रहने का कोई औचित्य नही रह गया अब. तो मैं नीचे भागा.

गला सूखने लगा था. .किचन में जा के एक गिलास पानी पिया, फिर दूसरा;तीसरा गिलास अभी होठों तक पहुँच भी नहीं सका था कि अपनी पीठ पर मीनल की गर्माहट महसूस हुई. मैं कुछ समझ पाता उस के पहले ही मीनल के हाथ मेरे सीने पे थे; पानी का गिलास मेरे हाथ से छूट के गिर गया9 Full stop पहली बार मीनल शांत थी और मेरी साँसे बढ़ गयी. मैं कमज़ोर पड़ गया. ।

"निशांत;? " कह के मीनल मेरी पीठ से चिपकी फफक के रोने लगी. मैं वैसे ही खड़ा रहा. मेरा शरीर जम चुका था. "आई एम सॉरी निशांत. आई एम सॉरी. " मीनल कहे जा रही थी. मैं पिघलता चला गया।

मीनल का हाथ पकड़ के मैंने उसे किनारे किया और बिना उसे देखे बोला " ऐसे मत रो मीनल;"न जाने क्यों मेरे हाथ कांप रहे थे। मीनल ने मेरी बाहों को पकड़ के अपनी तरफ किया, मैं उस से नज़रें चुराता खड़ा रहा। मीनल मुझसे गले लग के फिर सॉरी कहने लगी.

मेरी मीनल ऐसे रोये तो मैं कैसे सह पता भला. उसका चेहरा ऊपर कर के अपने हाथों से उसकि आंखें पोछी. और बोला "तुमसे नाराज़ हो कि कहां जाऊंगा मीनल;"

मीनल मुझे ध्यान से देखने लगी; आज उसकी नज़रों में कुछ अलग बात थी. मेरी धड़कने बढ़ने लगी और मैंने आंखें बंद कर ली;

मुझे अपनी बाहों पे मीनल की पकड़ महसूस होने लगी और मीनल की साँसे अपने चेहरे पे; मैंने घबरा के एक हाथ से किचन का स्लैब पकड़ लिया।

मीनल ने मेरे दाहिने गाल पे अपने होंठ रख दिए और मैं अंदर तक सिहर उठा. स्लैब पे पकड़ मजबूत करते हुए मैंने हकलाते हुए कहा "ये सही नहीं मीनल. ये गलत है. ये गलत है. मेरी आवाज गले मे अटकने लगी थी; और इतनी ही देर में मीनल मेरे चेहरे को 5- 6 बार छू चुकी थी।

मीनल मुझसे अलग हुई और बोली " अब शायद तुम्हें मेरी ज़िंदगी मे तुम्हारी अहमियत समझ आ गयी होगी निशांत"।

मीनल के लिए मेरा प्यार उमड़ आया और मैंने उसे गले लगा लिया;

"मुझे ऐसे सबूत की ज़रूरत नहीं मीनल; मैं बस तुम्हारी जिंदगी संवारना चाहता हूँ.. ताकि तुम अपने स्वाभिमान के साथ मेरी संगिनी बनो. न कि एहसान समझ के;" मैं उसके सिर को चूमते हुए बोला।

"मुझे ज़रूरत है निशांत. आज. आज ज़रूरत है..…"मीनल ने अपनी पकड़ मजबूत कर ली.." मुझे भी ये एहसास चाहिए निशांत. ताकि मैं कभी भी आंखें बंद करू तो मुझे केवल वो एहसास याद आये।"

मैं मीनल की ये बात सुनते अंदर तक कांप गया. आज मीनल क्यों ये सब कर रही है।

"क्या सोच रही हो तुम मीनल;" मैंने पूछ ही लिया।

वो मुझसे अलग होते हुए बोली "कुछ मत बोलो निशांत. वक़्त बीत रहा है. " चलो. !!"

"कहाँ!! "मैं हकलाया।

"अपने कमरे में. " कहते हुए वो मेरा हाथ पकड़े आगे बढ़ गई और मैं साथ खींचता चला गया।

--0--

क्रमशः
 
मेरे माँ बाप ने अगर मुझे खुली छूट दी थी तो साथ मे अपना विश्वास भी दिया था. वो विश्वास जो मुझसे, मीनल से या मेरे प्यार से;सब से बढ़ कर था. मैं जानता था कि मीनल ऐसी नहीं, अगर ऐसा हो रहा है तो कोई बात ज़रूर ही है; ऐसा भी नहीं कि मैं साधू हूँ जो मीनल के इस व्यवहार के बाद भी नहीं मचलेगा।

मैं मीनल के पीछे खींचा चला जा रहा था, उसकि पकड़ मेरी समझने की क्षमता को कमज़ोर बनाने की पूरी कोशिश कर रही थी, लेकिन मेरा दिमाग बहुत तेज़ी से दौड़ रहा था। मीनल ऐसा क्यों कर रही थी, उस का कारण खोज रहा था. साथ ही पापा मम्मी की बातें मुझे मजबूत कर रही थी. कमरे में पहुँचने तक मैं खुद को संयत कर चुका था।

"क्यों कर रही हो ये मीनल. तुम जानती हो, ये तुम नहीं;" मैंने कमरे में पहुँच के कहा तो मीनल ने मेरा हाथ छोड़ दिया।

"निशांत ;ये मैं ही हूँ. बैठो निशांत;!!" उसने मुझे इशारा करते हुए कहा और मैं बिस्तर पे बैठ के उसे देखने लगा; मीनल वहीं नीचे बैठ गयी और मेरे पैरों पे अपना सिर रख लिया. "मीनल नीचे मत बैठो प्लीज. ! मै असहज होते हुए बोला।

"नहीं निशांत. जो सुकून इस तरह तुम्हारी गोदी में है वो दुनिया मे कहीं नहीं ," मैं चुप हो गया और उसका सिर सहलाने लगा।

"जानते हो निशांत; जब तुम से पहली बार गेट के बाहर मिली. तुम बहुत प्यारे लगे..लेकिन जब तुमने मुझे डाँटा तो दुनिया के सब से गंदे इंसान लगे;" मैं ये सुन के मुस्कुरा उठा।

"फ़िर तुमसे मिलती रही और पता लगा कि तुम दुनिया के सब से अच्छे इंसान हो. जब तुमने घूमने के लिए कहा था पहली बार. मैं पहले घबरायी लेकिन फिर तुम्हें सोचती रही, हर वक़्त. और तब एहसास हुआ कि तुमसे ज्यादा सुरक्षित मैं कहीं नहीं;"

मुझे तृप्ति मिल रही थी मीनल की बातों से;"जब भी तुम मेरे लिए कुछ करते, मेरी मदद करते तो मैं सोचती कि तुम हर चीज़ में मुझसे कहीं बढ़ कर हो, मैं तुम्हारे आगे कुछ भी नहीं फिर भी तुम मेरे लिए इतना क्यों करते हो;तुम्हारे साथ मेरी ज़िंदगी की सब से अच्छी दीवाली मनी…मैं आज जो भी कर पायी हूँ, सिर्फ़ तुम्हारे कारण.

मेरा वादा है तुमसे निशांत, मैं बहुत आगे जाउंगी….और मेरी हर सफ़लता सिर्फ़ और सिर्फ तुम्हारे नाम होगी।"

मैं उस के हाथ पकड़ के मुस्कुराया. मीनल कितने आत्मविश्वास से भरी थी. अब मीनल खुद भी अपने लिए कुछ कर सकने में समर्थ थी. हम सब ने उस के लिए जो भी किया वो आज दिख रहा था।

मीनल ने मेरा हाथ चूम लिया और सिर ऊपर कर के मुस्कुरायी, मैंने झुक कर उसका माथा चूम लिया।

"निशांत;! "मीनल बोली। " तुम मेरे लिए क्या कर सकते हो??"

"बोलो मीनल. " मैंने फिऱ उस के सिर पे हाथ फेरा।

"मैं किचन में बोल चुकी हूं. " मीनल का जवाब आया और मेरे हाथ रुक गए।

मैं लड़का हूँ और उस लिहाज से मुझे इसमें आनंद मिलना चाहिए था, लेकिन मीनल के लिए भावनाएं अलग प्रकार की थी; मैं बहका ज़रूर था कुछ एक बार, लेकिन वो उस वक़्त के बहाव में हुआ था।

आज ऐसा नहीं था तो मुझे घबराहट होने लगी. मैं सोचता रहा तब तक मीनल मेरा हाथ पकड़ के खड़े हो चुकी थी. और मेरी आँखों मे देख रही थी. मैंने भी देखा और उन मछली के जैसी आंखों के भवर में डूब गया.

मुझे पता भी नहीं कि कब मैं भी खड़ा हो गया. मीनल मेरे हाथ पकड़े एक कदम बढ़ के मेरे करीब हो गयी। उसकी साँसे फिर मेरी गर्दन से टकराने लगीं तो खुद को उस बेचैनी से सम्हालने के लिए मैंने मीनल से अपना हाथ छुड़ाना चाहा . लेकिन आज मीनल की पकड़ मेरी सारी शक्तियों पे भारी पड़ रही थी या यूं कहना ठीक होगा कि मीनल से आज हार जाने में ही मेरा चैन था.

मैं खोने लगा..अब दिमाग मे कोई विचार नहीं बचा; ना अपने नियम, उसूल न ही मम्मी पापा की बातें. मीनल की साँसों को खुद पे महसूस करते न जाने कब मैंने उसे अपनी गिरफ्त में कर लिया; आज मैं अपनी सीमाएं तोड़ने के कगार पर था;लेकिन मीनल के लिए मेरी सुरक्षा की भावना, मुझे उस के जुड़ने नहीं दे रही थी.

"निशांत;!!" मीनल ने बेहद धीमी आवाज़, में मुझे जगाया. मीनल आज ज़िद पे थी. मेरे विचार फिर दौड़ने लगे के आखिर क्यों कर रही है ऐसा मीनल.

"निशांत प्लीज!!. मीनल ने उतनी ही धीमी आवाज़ में मुझे देखते हुए मिन्नत की. मैंने उसकी उदासी और बेसब्री पढ़ ली और आंखें बंद कर के मीनल के चेहरे पे झुक गया।

ना जाने कितने वक़्त तक आंखें बंद किये मैं मीनल में खोया रहा. जब होश आया और आंखे खोली तो मीनल को आंख में आँसू लिए खुद को ही देखता पाया; मैं एक झटके में उस से अलग हो गया. आज क्या हो गया मुझसे ये सोचते हुए मैं अपने सिर पे हाथ फेरने लगा।

मैं अब मीनल से नज़रे नहीं मिला पा रहा था, "क्यों किया मैंने ऐसा; पापा का सामना कैसे करूँगा;मीनल क्या सोचेगी. " मैं बड़बड़ाने लगा।

"ये पल सिर्फ़ हमारे हैं निशांत. सिर्फ़ तुम और मैं;सब भूल जाओ निशांत. मेरे साथ रहो मेरे पास;!!"मीनल की आवाज़ में दर्द था।

मैं अब कुछ भी समझ पाने में असमर्थ हो गया था;

" मुझे अपनी गोद मे सुला लो न निशांत; बहुत वक़्त हुआ चैन से सोए. " मीनल लगभग गिड़गिड़ाई. और मैं उसकी तरफ बढ़ चला।

मीनल को गोद मे उठा के मैंने बिस्तर पे लिटा दिया;और उसे देखने लगा. उस ने मेरा हाथ पकड़े इशारा किया तो मैं उसके बगल में लेट गया. और उस ने मेरे सीने पे सिर रख लिया और मैंने सांस रोके उसे पकड़ लिया;

मीनल ने निश्चिंत हो कर आंखें बंद कर ली. और मैं उसका सिर सहलाने लगा. वो बहुत शांत थी. लेकिन मेरे मन मे उथल पुथल हो चुकी थी।

मैं आंखे खोले सोचता रहा कि मीनल क्यों कर रही है ऐसा; न जाने क्यों इन गुज़रे हुए पलों के लिए मुझे कोई खुशी नहीं थी; " कहीं मीनल..!!, नहीं वो इतनी कमज़ोर नहीं कि जान दे दे. "

" इसका मतलब की मीनल अपनी दादी के पास लौट जाएगी. फिर उसी ज़िंदगी मे. इतना समझाने पर भी उस ने ये निर्णय क्यों लिया ,इस हाल में उसकी शादी कभी नहीं होगी8 Full stop इसी लिए वो आज इतनी ज़िद;" मेरी आँखें गीली हो गयी।

आज मुझे अपने सारे सपने याद आने लगे. आज के बाद मीनल भी सपना ही बन के रह जाएगी मेरे लिए;!!

मुझे सीने में दर्द के साथ फिर एक कमजोरी ने घेर लिया, और मैंने मीनल को कस लिया ताकि वो अपनी दादी के पास कभी न जा सके.

"मीनल!! मैं फुसफुसाया और रो पड़ा; आवाज़ न निकले इस लिए अपना मुँह दबा लिया। मीनल सुकून से मेरी बाहों में आंखें बंद किये लेटी रही. और मैं दर्द में घुटता रहा।

"मुझे छोड़ के मत जाओ मीनल; दादी हमे फिऱ नहीं मिलने देगी. " मैं धीरे से बोला। "मैं तुम्हारे बिना कैसे जियूँगा. तुम सामने हो के भी मेरी नहीं होगी तो. मैं सह नहीं सकूंगा. " मैं रोते हुए गिड़गिड़ाया।

मीनल की तरफ़ से कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई तो मैंने उसे देखा. वो सो चुकी थी;

मैं धीरे से उस से अलग हुआ और उसे सोता हुआ देखने लगा. मेरी आँखों से मेरा नियंत्रण खत्म हो चला था, एक आखिर बार अपनी आंखें पोछ के मैँ मीनल के चेहरे को देखने लगा; मैंने उसकि आंखें, गाल और माथा धीरे से चूम लिये. इस बार ये मेरी मर्ज़ी से था; वो नींद में मुस्कुरा उठी तो मेरे चेहरे पर स्वतः ही मुस्कान आ गयी।

मीनल को चादर ओढ़ा कर मैं नीचे आ गया; उसे अब ना पा सकने का दर्द असहनीय हो चला था. मीनल ने मेरा हाथ थामे आत्मविश्वास हासिल करना छोड़ के अपनी पुरानी ज़िन्दगी चुन ली।

मैं हार गया, मेरी सारी मेहनत, सारा प्यार हार गया;मीनल का डर, उसकि दादी जीत गए।

मैं पड़े पड़े अपनी हार पे रोता रहा;मीनल के साथ जबरदस्ती कर नहीं सकता था, आखिर उसने सब जान सोच के निर्णय लिया।

मेरी जिंदगी मीनल की ज़िंदगी मे उजाला करने की कोशीश करते करते आज अंधकार में डूब रही थी।

सिर दुःखने लगा तो दवा खा के मैं कमरे में लेट गया, मम्मी पापा को फोन कर के पूछा तो उन्होंने देर हो जाने का बताया और सो जाने के लिये कहा।

मैं एक बार भाग के मीनल के कमरे में गया, दरवाज़े से देखा तो वो निश्चिंत सो रही थी, मैं उस के पास बैठ गया; एक बार फिर उसका माथा चूमा और अपने कमरे में आ कर लेट गया, बेचैनी से करवट लेता तड़पता रहा और अंत मे दवा के असर से सो गया।

सुबह अचानक मैं घबरा के उठ बैठा, बहुत बेचैनी हो रही थी; सीने में रह रह के टीस होती4 Full, stop मैं भागा भागा मीनल के कमरे में गया. मीनल वहां नहीं थी। मेरा दिल धक्क रह गया, "मुझसे बिना मिले चली गयी. इतनी जल्दी क्या थी;" फिर भी मन नहीं माना तो पापा मम्मी के कमरे में गया. दोनों थक के सोए हुए थे.

मेरी साँसे रुकने लगी. मैं जितनी तेजी से हो सका नीचे भागा. मीनल कहीं नहीं थी, फिर से उस के कमरे में गया तो देखा उसका कोई सामान नहीं था. मैं फिर भाग के नीचे आया. "फ़ोन करता हूँ. आज मेरे जाने तक साथ रह लेती. ऐसा क्या उतावलापन था;मुझे बिछड़ने का. " मैं अपने आप से बाते कर रहा था।

"क्यों मीनल; क्या बिगाड़ा था तुम्हारा मैंने;" तुमसे जवाब ले के रहूंगा मीनल;" बड़बड़ाते हुए मैंने फोन उठाया और खोलते ही उसमे मीनल का मैसेज दिखा, किसी अनहोनी की आशंका से मेरा दिल बैठ गया. मैसेज खोलने के पहले मैं भगवान से प्रार्थना करता रहा कि मीनल ने कोई गलत कदम न उठाया हो. काँपते हाथों से मैसेज खोला और पढ़ना शुरू किया. मेरा दिल डर से जोरों से धड़क रहा था।

प्यारे निशांत,

मैं जानती हूँ, तुम्हें केवल तकलीफ दे रही हूँ जब से तुम्हारी ज़िन्दगी में आयी हूँ। आज की रात मेरी ज़िंदगी की सब से खुशनसीब रात थी. तुम आज मेरे थे..सिर्फ मेरे। अभी तक भी वो एहसास मुझे बेचैनी दे जा रहा है; ये एहसास ही अब मेरे जीने एक सहारा है अब निशांत.

मैं जा रही हूँ. सब से दूर, दादी का घर मेरा नहीं तो वहां जा नहीं सकती और तुम्हारे पास मैं इस तरह रहना नहीं चाहती;

मैंने तुमसे वादा किया है निशांत;जिस दिन वो वादा पूरा होगा मैं मिलने ज़रूर आऊंगी. मैं अलग ज़रूर हो रही हूँ लेकिन मेरी हर सांस सिर्फ़ तुम्हारी है;

तुमने जो किया है मेरे लिए वो अमूल्य है, अगर कहीं भगवान है तो मेरे लिए वो तुम ही हो. सिर्फ़ तुम।

मैं किसी से हार कर नहीं जा रही निशांत, मैं खुद को खोजने. खुद की पहचान बनाने जा रही हूँ;

वादा करती हूं एक दिन आऊंगी वापस उस सोसाइटी में एक नई पहचान के साथ; तब कोई मुझ पे उंगली उठाने वाला नहीं होगा. और तुम्हारा लोन भी तो चुकाना है.

मेरे इस अपराध के लिए माफ कर देना मुझे निशांत. तुम्हें छोड़ कर जा रही हूँ; मुझे खोजना मत निशांत;

तुम्हारी मीनल।

मैंने 2 बार मैसेज पढ़ा कि कहीं तो उसका इंतज़ार करने के लिए कहा होगा, मेरे साथ ज़िन्दगी जीने की बात की होगी; लेकिन मीनल ने लोन चुकाने की बात कर के मेरे मुह पे तमाचा मार दिया था। मैं मीनल को फ़ोन करने लगा लेकिन फ़ोन ऑफ था।

मैंने मैसेज का टाइम देखा तो डेढ़ घंटे पहले का था, मैं पापा के कमरे में भागा और कार की चाभी मांगी. पापा पूछने लगे तो मैंने भागते हुए ही कहा कि मीनल चली गयी।

कार स्टार्ट करते ही जिग्नेश को फोन लगाया.." जिग्नेश.…मीनल; मीनल पता नहीं कहाँ चली गयी; उसे खोज दो जिग्नेश;" कह के मैं रोने लगा।

"क्या? . मीनल. भाई कहाँ हो बताओ मैं आता हूँ. " जिग्नेश घबराया।।

"एयरपोर्ट जा रहा हूँ;" मैं रोते हुए ही बोला।

"वहाँ मत जाओ.. मीनल को फ्लाइट में डर लगता है..वो कभी वहां नहीं जाएगी.."

"मैं कार मोड़ते हुए बोला "ठीक है रेलवे स्टेशन;"

जब आपके पास वक़्त कम होता है ना!! तब घड़ी भी दुगनी गति से दौड़ती है. रास्ते भर मैं मीनल को फ़ोन लगाता रहा लेकिन फ़ोन ऑन नहीं हुआ।

मैं जैसे तैसे सम्हलते हुए रेलवे स्टेशन पहुँचा. प्लेटफार्म पे एक ट्रेन रुकी थी. मुझे उम्मीद थी कि मीनल होगी उसमे. मीनल मीनल चिल्लाते हुए मैं भागने लगा. लोग मुझे ऐसे देख रहे थे जैसे मैं कोई पागल था..लेकिन मुझे सिर्फ मीनल सूझ रही थी. ट्रेन चल दी..मीनल नहीं दिखी. मैं दूसरे प्लेटफार्म पे भागा और मीनल-मीनल चिल्लाने लगा।

"मीनल मैं कह रहा हूँ उतरो अभी. सुना तुमने.". मैं गुस्से में चिल्ला रहा था। "तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है. उतरो अभी. " दूसरी ट्रेन भी चल दी लेकिन मेरी मीनल का कहीं कोई निशान नहीं था।

मैं भाग रहा था यहां वहां;जब तक कि कौस्तुभ और जिग्नेश ने आ कर मुझे पकड़ा नहीं;" मोटू. देख न !! वो चली गयी .. ट्रेन रोक न उसी में कहीं होगी. उसे बोल, अब से मैं कभी गुस्सा भी नहीं करूंगा . " मैं सारी दुनिया से बेखबर चिल्ला चिल्ला कर रो रहा था।

जिग्नेश और कौस्तुभ मुझे खींच के बाहर लाये और जबरन मुझे कार में बिठाया।वो लोग न जाने क्या क्या बोल रहे थे लेकिन मुझे कुछ सुनाई पड़ना बंद हो चुका था।

मैं रास्ते भर रो कर कर मीनल के पास ले जाने की ज़िद कर रहा था. "मीनल अकेले नहीं रह पायेगी, कहाँ जाएगी वो; "

पापा मम्मी का कई बार फ़ोन आ चुका था, उन्हें कुछ पता ही नहीं था कि क्या हो गया है। जिग्नेश और कौस्तुभ ने उन्हें सब समझाया. घर पहुँचते ही मैं पापा के गले लग के रोने लगा. " पापा मीनल चली गयी पापा!!; एक बार भी नहीं सोचा मेरे लिए; कहती है कि लोन चुकाने आएगी; यही इज़्ज़त रह गयी मेरी. "

मुझे किसी तरह से पानी पिला कर बिठाया गया. रो रो कर मेरी हिचकियाँ बंध गयी. अब मम्मी के सब्र का बांध टूट गया " मेरे पुत्तर की ऐसी हालत कर दी ,कभी सुखी नहीं रहेगी वो;मेरी बद्दुआ लगेगी उसे. देख लेना. " मम्मी के टेप रिकॉर्डर में आज बद्दुआओं का कैसेट चल रहा था, मुझे उनकी बातें चुभने लगी. मैं उठ के अपने कमरे में जाने लगा तो सब पीछे भागे. " मैं ठीक हूँ..और हां, आत्महत्या करने नहीं जा रहा. मुझे अकेला रहना है. " मैं चिढ़ा हुआ बोला।

कमरे में पहुँच के फिर से मीनल को फ़ोन किया. लेकिन लगता था उसने हमेशा के लिए अपना फ़ोन ऑफ कर दिया था।

मैं कमरे को देखने लगा. रात की सब बातें याद करता अपने बिस्तर पे हाथ फेरने लगा, यही पे मीनल मेरी गोदी में लेटी थी.

सोसाइटी में बात फैल चुकी थी, मेरे घर पे हंगामा शुरू हो गया; लोग अब खुल के दादी के पक्ष में सामने आ, रहे थे।

मीनल से मेरे रिश्ते पे सवाल उठ रहे थे, पापा के संस्कारों को बदनाम किया जा रहा था; मीनल के खून के रिश्ते पर दाग लगाए जा रहे थे;

सब को समाज के नियमों की चिंता थी; चिंता नहीं थी तो केवल मीनल की, मेरी औऱ घर वालों की. हमारे जज़्बातों और दुःख से किसी का लेना देना नहीं था। ये वो ही लोग थे जो परिवार की तरह मिल कर हर तीज त्योहार मनाते थे. और जब आज सच मे परिवार बन के साथ आने की बारी थी तो सब को नियम कानून ,रीति रिवाज याद आने लगे।

मैं कमरे में बैठा सब सुनता रहा;आँसूं मेरे वैसे ही सूख चले थे;कमरे से निकल कर मैं नीचे गया और भीड़ को घूरा, कुछ सेकण्ड्स के लिए घुप शांति छा गयी जो पहले खुसुर पुसुर और फ़िर तेज़ आवाज़ में बदल गयी.

इसी भीड़ में एक तरफ नव्या थी जो उदास सी मुझे देख रही थी और उस के बगल में सिद्धि थी जिसके चेहरे पे कुटिल मुस्कान तैर रही थी; उसकी मुस्कान से मुझे समझ आ गया कि इस फसाद की जड़ वो ही है. मैं उसे घूरते हुए ही बोला "जिस जिस को यहां मीनल की और उसकी दादी की फिक्र है वो जा के मीनल को खोजे, न कि यहां तमाशा करे; वरना मेरा तमाशा अगर शुरू हुआ तो यहां सारे शरीफों की इज़्ज़त उत्तर जाएगी" मेरे बोलने में इतना प्यार था कि आधी भीड़ वहां से खिसक ली.

सिद्धी अब भी वहीं मज़े ले के देख रही थी. मैं उसे देखते हुए ही फिर बोला " जिस किसी ने भी मीनल की फ़ोटो खींची और एडिट की..मैं जानता हूँ कौन है, वो अपनी उल्टी गिनती शुरू कर दे अब;" सिद्धि के चेहरे का रंग उतर चुका था.. और मेरे कलेजे को ठंढक मिल गई।

बची हुई भीड़ को असमंजस में डाल कर मैं वापस कमरे में आ के बैठ गया. पड़ा रहा. सोचता रहा..

मैं फ्लाइट के वक़्त पे ही कमरे से सामान सहित निकला; जिग्नेश, पापा और मम्मी मुझे देखते ही हैरानी से खड़े हो गए; कौस्तुभ पहले ही जा चुका था हमे साथ ही पुणे जाना था।

"पुत्तर सामान ले के कहाँ जा रहा है. मीनल को खोजने तो नहीं जा रहा ना तू. !! "मम्मी घबरा के मेरे पास दौड़ती हुई बोली।

"मीनल;कौन मीनल, मैं किसी मीनल को नहीं जानता??" मैं भावहीन चेहरे से बोला और सारे अवाक रह गए।

मीनल को मैं अपने घर ले आया था, पूछने पर भी उसने उसकि फ़ोटो खींचने वाले के बारे में नहीं बताया और मुझे छोड़ कर चली गयी।

मैं उसे खोजने रेलवे स्टेशन गया लेकिन वो नहीं मिली, सोसाइटी में मुझ पर बहुत इल्ज़ाम लगाए गए, मैंने सबको धमकाया और आखिर में पुणे के लिए निकल गया।

मेरे माँ बाप को सारी सोसाइटी के बीच बेइज़्ज़त होना पड़ा. और इसका जिम्मेदार सिर्फ़ और सिर्फ़ मैं था; अगर मीनल को अपने घर लाने के बदले मैंने सिद्धि के बारे में पहले पता लगा लिया होता तो शायद मीनल हमारे साथ होती; और मेरे माता पिता भी बेइज़्ज़त नहीं होते।

और जिसके लिए ये सब किया वो महानता दिखा के भाग चुकी थी, एक बार भी मेरे और मेरे परिवार के बारे में नहीं सोचा.

मैं अब किसी के भी सामने ये नहीं जताना चाहता था कि मीनल के जाने से मुझे फर्क पड़ता है।

मैं पापा मम्मी से हंस के ठीक वैसे ही विदा हुआ जैसे पहले हुआ करता था. कौस्तुभ जब एयरपोर्ट पर मिला तो उसने भी कोई जिक्र नहीं किया, शायद जिग्नेश ने उसे बता दिया था , न ही मैंने कोई दुख जताया. मैं हंसते बोलते पुणे आया।

लेकिन मेरा दिल हर क्षण रोया. मैं जानता था कि मीनल एयरपोर्ट पे नहीं होगी.. फिर भी चुपके से किसी लड़की को देख लेता कहीं मीनल ना हो।

पुणे आ कर अपने कमरे में मीनल की पेंटिंग, और फ़ोटो देखी; मीनल और अपनी सेल्फी देख के उस से बोल पड़ा

" मैं तुम्हारा इंतेज़ार करूँगा मीनल. और अपना लोन भी वापस लूंगा सूद समेत. तुमने मेरे प्यार का मज़ाक बनाया. ये हमेशा याद रखूंगा. और तुम्हें भूलने भी नहीं दूंगा;तुम मिलो तो सही मुझसे;"

मेरी नफरत, गुस्सा या चिढ़ ये जो कुछ भी था;अपने परवान पर था। लेकिन परतों दर परतों मेरा प्यार वहीं था जो मना रहा था मीनल सुरक्षित हो, मुझे जल्दी मिल जाये. मेरे सिवा उसकी जिंदगी में कोई न आये. और न जाने क्या क्या।

मैं अब भी उसे फ़ोन कर रहा था; दोनो की फ़ोटो देखता रहा. मीनल पे गुस्सा निकलता रहा, फिर प्यार जताता रहा।

अगले दिन से मैं ऑफिस जाने लगा. हमेशा की ही तरह. आधी-आधी रात को भी मीनल को फ़ोन करता; खुद को व्यस्त रखने के लिए मैं शाम को हॉबी क्लासेज जाने लगा. इतना थक जाने के बाद भी मीनल मेरा पीछा नहीं छोड़ती, मैं दिन और घण्टे गिनता रहता मीनल के अलग हुए वक़्त से।

इधर सिद्धी को भी सबक सिखाने की तैयारी कर ली थी मैंने, लड़की हो कर भी उस ने किसी दूसरी लड़की की इज़्ज़त उछाल दी ,मीनल के साथ जो उसने किया उस के लिए माफी दे दूं, मैं बिल्कुल भी ऐसा नहीं। मैं अपने काम मे लग गया लेकिन मेरे सिवा ये कोई नहीं जानता था, सिद्धि भी नहीं9 Full stop मेरा तरीका बहुत गलत होने वाला था , सावधानी बरतनी थी. छोटी सी चूक भी सब खत्म कर सकती थी। कौस्तुभ की शादी आने तक मेरा काम हो चुका था ,और सिद्धी मेरे जाल में फंस चुकी थी।

शादी में जब अहमदाबाद आया तो घर नहीं रुका. कौस्तुभ के घर ही रहा. शादी में खूब नाचा. खूब हंसा. और जब भी मौका मिला तो छुप के बहुत रोया. मीनल से शादी के, मैंने भी ऐसे ही सपने देखे थे. जो चकनाचूर हो गए थे।

शादी के बाद मैं घर आया. और सिद्धि को फ़ोन किया. मैं आ गया हूँ मिलने आ जाओ।

उसे जगह बता के मैं घर से काम के बहाने निकल गया.….. सिद्धी के लिए एक रेस्टोरेंट में स्पेशल जगह बुक कराई थी मैंने;

"आओ सिद्धी आओ;कैसी हो?" उसे देखते ही मैं कुटिल मुस्कान देते हुए बोला, वो मुँह लटकाए बैठ गयी।

"तुम्हारा बॉयफ्रेंड कैसा है??. क्या नाम था उसका. " मैं सिर खुजाते हुए बोला।" हैंडसम बंदा है. है ना!! किस भी अच्छी करता है. और;"

क्या चाहते हो तुम?? वो मेरी बात बीच मे काटते हुए बोली.

"मीनल की फ़ोटो वाला तमाशा क्यों किया ये बताओ;"

"क्या बकवास कर रहे हो तुम.…" उल्टा तुम मेरी फ़ोटो मैसेज कर के मुझे धमका रहे हो;मेरे बॉयफ्रेंड का नंबर तुम्हारे पास कैसे आया??"

"ओफ्फो सिद्धि. तुम लड़कियां भी न. अभी दो फ़ोटो में ही तुम्हारी हालत ऐसी हो गयी;चलो तुम्हे एंटरटेन करता हूँ. मेरे पास वीडियो और फ़ोटो हैं बहुत सेक्सी. यहां हम दो ही हैं. मज़ा आएगा.." मैं उसके चेहरे को एक हाथ से पकड़ के अपनी तरफ करते हुए बोला।

"मैं पुलिस में कंप्लेन करूँगी;"

मैं बहुत जोरों से हंसने लगा. "तुम्हारे नंबर पे फ़ोटो तो तुम्हारे बॉयफ्रेंड ने भेजी याद है ना ; उसका फ़ोन हैक था मिस सिद्धी;अभी और भी हैं देखो ना कह के मैंने उसका हाथ कस के पकड़ के अपने साथ बिठा लिया और एक वीडियो चला दी. उसने आंखें बंद कर ली.." शरम नहीं आती ऐसी वीडियो दिखाते हुए. "

"शरमाना कैसा इसमें. है तो तुम्हारी ही. "मैं हंसते हुए बोला।

"मेरी नहीं है ये. " वो रोने लगी।

"च च च. लेकिन सोसाइटी वालो को क्या पता. चेहरा तो तुम्हारा ही है ना..और फ़ोटो तो असली हैं ना!!." मैं उसके कान में धीरे से बोला।

" फ़ोटो कहाँ से मिली तुम्हें;डिलीट कर दो. मेरे घर पे मत दिखाना. मैंने ब्रेक अप भी कर लिया तुम्हारे कारण; और क्या चाहते हों।"

"तड़पाना चाहता हूँ ,वैसे ही जैसे मैं तड़पता हूँ हर सेकंड, जैसे मीनल तड़पी;" मैं आंखे दिखाते हुए बोला। "और फ़ोटो मिलना क्या मुश्किल, डिटेक्टिव लगाया था तुम्हारे पीछे ,अब जल्दी बोलो क्यों किया. मेरे पास वक़्त नही. वर्ना तुम जानती हो क्या होगा. "

"तुम्हारे कारण; " वो चिल्लाई।"मीनल के साथ मैंने जो भी किया तुम्हारे कारण किया. " मैं हैरान रह गया उसे देख के।

"तुमने नव्या के घर हमारी वीडियो दिखाई थी याद है??.. उस के पापा ने मेरे घर पे तमाशा किया था बहुत. बहुत पाबंदियां लग गयी मुझ पे.. मैं अपने बॉयफ्रेंड से भी नहीं मिल पाती थी. तुमने मीनल के लिए हमारे साथ ऐसा किया मैंने बदला ले लिया. जैसे तुम मीनल के लिए रोये वैसे मैं भी रोई थी बहुत. "

मैंने बिना सोचे और बिना देरी के सिद्धी को दो थप्पड़ लगा दिए. "मैंने वीडियो क्यों बनाई ये याद नहीं तुम्हें. मीनल को तो पता भी नहीं था इस बारे में. और तुमने उस से बदला ले लिया।।।. अब सब के सामने ये कुबूल करो या मैं ये सब दिखाता हूँ सबको;"

"मीनल को पता था ,मैंने बताया था उसे10 Full stop उस दिन रेस्टोरेंट में उसने मुझे मेरे बॉयफ्रेंड के साथ देख लिया था8 Full stopउसके दोस्तों का मेरे बॉयफ्रेंड और उस के दोस्त के साथ झगड़ा हुआ था" वो रोते हुए बोली " तभी मैंने तुम्हारी वीडियो वाली बात उन्हें बतायी तो उन दोनों ने मीनल को सबक सिखाने के लिए उसकी फोटो खींची और एडिट की"

मीनल को सब पता था फिर भी चुप रह कर सिद्धी को बचा लिया. अगर मुझे उस समय पता होता तो मेरे गुस्से से क्या हंगामा होता मीनल ये जानती थी. क्यों किया मीनल तुमने ऐसा..अपनी इज़्ज़त वे दाग लगवा लिया, सच जानते हुए भी. मेरा दिल रो रहा था और आंखें नम हो गयी।

"जिस बॉयफ्रेंड के सीखाने पर तुमने ये किया ना. उसकी करतूतें भी देख लो. और हां ये ओरिजिनल हैं" कह के मैंने उसके बॉयफ्रेंड की दूसरी लड़कियों के साथ फोटो दिखाई।

सिद्धी रोने लगी, हाथ जोड़ कर माफी मांगने लगी. लेकिन मैं तय कर के आया था.

कुछ समय बाद मीनल के घर के बाहर सिद्धी सब से माफी मांग रही थी. सब लोग स्तब्ध हो गए थे ये सुन के. और पहली बार मैंने दादी को आंखें पोछते हुए पछतावे में देखा लेकिन अब क्या फायदा था;

मेरे मन मे एक सुकून था कि मेरी मीनल पे अब कोई उंगली नहीं उठाएगा; लेकिन मीनल से नाराज़गी कम नहीं हुई।

खैर!! मैं पुणे के फ्लैट से बेदखल कर दिया गया था.. मीरा बहूत अच्छी थी लेकिन उसे अपनी प्राइवेसी प्यारी थी; मैं बगल के फ्लैट में कौस्तुभ का पड़ोसी बन के रहने लगा। मीरा दोस्त की तरह ही थी लड़ती भी डांट भी लगाती और मेरे खाने का खयाल रखती. मुझे एक अच्छी दोस्त मिल गयी थी।

मैं अब कहीं भी कोई अनाथ बच्चा देखता तो मीनल याद आती. मैं गाय, कुत्तों बिल्लियों. सब से प्यार करने लगा था। सब से छूप के अनाथ आश्रम में वक़्त बिताता. जब मीनल की बहुत याद आती तो उसकी फोटो से लड़ता रहता।

एक साल हो गया था मीनल को गए हुए. एक दिन पापा का फ़ोन आया "बेटा, वो चली गयी. अब उस के लिए अपनी ज़िंदगी मत खराब कर. अपने लिए कोई देखो या बोलो तो मैं कोई लड़की बताता हूँ;हो सके तो दीवाली पे घर आ जाओ इस बार. " मेरा मन खराब हो गया ये बात सुनते ही. मैं फ़ोन पे बात करते करते ही मीनल की फ़ोटो देखने लगा।

"पापा, एक साल और दे दीजिए; उसे भूलने के लिए4 Full, stopफिऱ आप जिस से भी कहेंगे मैं शादी कर लूंगा;और दीवाली तो मैं मनाना छोड़ चुका पापा. ना मैं उस दीवाली में घर आया होता न ही ," आगे कह पाने की हिम्मत खत्म हो गयी थी मेरी।

वक़्त के साथ मैं भी अपनी जिंदगी में आगे बढ़ने लगा, मेरी मेहनत के कारण प्रमोशन भी हुआ साथ और ऑफिस की तरफ से 6 महीने के लिए विदेश जाने का मौका भी।

सच कहूँ तो मैं जाना नहीं चाहता था, मुझे लगता था कि इस बीच अगर मीनल कहीं वापस आ जाये तो मैं कैसे मिलूंगा. लेकिन जो होता है ना अच्छे के लिए ही होता है. मेरा ऐसा मानना है। मैं अपना कोलाज, सेल्फी और मीनल की पेंटिंग्स साथ ही ले के गया था.

अमेरिका जा के मैं बहुत खुश रहने लगा था. मीनल यादों में होती लेकिन नया माहौल नए दोस्त. मैं ढलता चला गया, बदलता चला गया, नहीं बदले तो मेरे संस्कार और मेरे उसूल. सिगरेट छोड़ ही चुका था; लोग जब मुझ पे आश्चर्य करते तो मुझे बहुत हंसी आती. लेकिन मैं ऐसा ही था। अब हल्की दाढ़ी भी रखने लगा था. लोग कहते थे कि मैं दाढ़ी में और भी अच्छा लगता हूँ।

6 महीने बाद, वो दिन भी आया जब मुझे अपने देश वापस लौटना था. टाइम का पाबंद होने के कारण मैं एयरपोर्ट पहले ही पहुँच गया.. और आदतन हेड फ़ोन लगा कर गाने सुनने लगा, और चारों तरफ देखने लगा।

एक 3-4 साल की बच्ची पे नज़र गयी तो उसे देखने लगा जो दिखने में भारतीय लग रही थी;वो एक खिलौने से बात करती सी लगी. और मेरे सामने मीनल से पहली मुलाकात का मंजर छा गया. न चाहते हुए भी मैं हेड फ़ोन निकाल के उस के पास पहुँच गया और सुनने लगा.

" मेली चॉकलेट खायेगा. " कह के वो खिलौने को चॉकलेट दिखाती थी। मैं मुस्कुरा उठा. ऐसा लगा छोटी मीनल मिल गयी. फिऱ ना जाने मेरा मन क्रोध से भर गया और मुट्ठी भींच के मैं जाने को हुआ , तब तक उस लड़की की नज़र मुझ पर चली गयी।

"अंकल. आप भगवान जी के फ्रेंड हैं? " वो तोतली भाषा मे मुझसे बोली. तो मुझे हँसी आ गयी.. आज मैं अंकल बन गया था.. वैसे भी 30 साल का होने ही वाला हूँ अब तो.

"नहीं बेटा!! मैं भगवान जी का फ्रेंड नहीं;"

"लेकिन भगवान जी बिल्कुल आप के जैसे हैं. " उसकी बातें मेरी समझ से परे थीं; " बेबी! आप अकेले हो? पैरेंट कहाँ हैं;

"माय नेम इस निशी. वो मेरी मम्मा हैं..उनकी इम्पोर्टेन्ट कॉल है;" कह के उसने मुझे इशारे से दिखाया।

कमर तक लंबे बालों की एक पोनी;डेनिम कैप्री और ऊपर सफेद रंग का खूबसूरत टॉप. अच्छी लग रही थी. शकल भी अच्छी होगी..बेटी भी इतनी प्यारी है मैंने सोचा।

खैर! मैं पलट के आ गया और अपनी सीट पे बैठ गया. थोड़ी देर में बच्ची की मम्मी को उस के पास झुक के कुछ बातें करता देखा. लेकिन आगे वाले के कारण चेहरा फिर नहीं दिखा. मेरे अंदर उतावलापन नहीं था लेकिन न जाने क्यों मैं उसे देखना चाहता था. ऐसा कभी हुआ भी नहीं था मेरे साथ. शायद मीनल की याद आ गयी थी मुझे।

फ्लाइट का वक़्त होने पर मैं चल दिया. फ्लाइट में आज मुझे अजीब सी घबराहट हो रही थी. तो मैं आंखें बंद कर के लेटा रहा; गाने सुनता रहा. जब मुम्बई पहुँचने की घोषणा हुई तब उठा।

इंसान कहीं भी चला जाये लेकिन अपने देश की मिट्टी जैसी खुशबू कहीं नहीं. मैं सामान लेने के लिए निर्धारित बेल्ट की तरफ़ बढ़ गया. भीड़ काफी होने पर एक किनारे हो कर पापा से फ़ोन पे बात करने लगा. और अपना सामान देखने लगा।

भीड़ में एक झलक फिर उस बच्ची की दिख गयी, न जाने क्या था उसमें. उसकी हरकतें , मासूमियत मुझे मीनल याद दिला रही थी. मैं मुस्कुराया और फ़िर चिढ़ से उसे देखने लगा। वो किसी से बात कर रही थी; मैंने भी उस दिशा में देखा. भीड़ में बेल्ट से अपना बैग उठाते हुए उसकी मम्मी ने जब चेहरा ऊपर किया तो मेरी दुनिया घूम गयी.

वो मीनल थी. मीनल से पहली मुलाकात से ले कर उस के छोड़ के जाने तक कि सारी बातें मेरे आगे घूम गयी;

आज पूरे एक 21 महीने 9 दिन बाद मीनल मेरी आँखों के सामने थी वो भी एक माँ के रूप में.

जिसके कारण घर वालो से वक़्त मांग रहा था, जिसे भूलने की कोशिश तक नहीं की वो ज़िन्दगी में इतना आगे बढ़ गयी थी और मैं वहीं का वहीं खड़ा रह गया।

दिल बहुत जोरों से धड़क रहा था, मैं अपने आप को समझाना चाह रहा था कि ये मीनल, नही, लेकिन मेरी जिंदगी का सब से कड़वा सच मेरे सामने था।भीड़ कम हो गयी थी और वो मुझे कभी भी देख सकती थी. मन तो था कि उस से जा कर सारे हिसाब माँगू लेकिन मैं अब खुद को उस के आगे बहुत छोटा और पिछड़ा हुआ महसूस करने लगा. वो मुझे देख न ले इस लिए चोरों की तरह एक किनारे छुप गया।

कितनी बदल गयी थी वो, दूर से देख के भी पता चल रहा था कि वैक्स करवाने लगी है, बौहें बनी हुई, हल्की लिपस्टिक काजल. सब था; मेरी आँखें भर गई. " ये मेरी मीनल नहीं. ऐसी नहीं थी मेरी मीनल. " मेरा दिल रो रो कर मुझसे कहा रहा था।

इस वक़्त मीनल का आत्मविश्वास, सुंदरता, सहजता हर चीज़ देख कर मुझे खुशी होनी चाहिए थी लेकिन मैं जलन से भर गया, क्योंकि ये बदलाव ना ही मेरे कारण था न ही मेरे लिए था. उसकी तो ज़िन्दगी में कोई और आ चुका था।

वो सामान ले कर आगे चली गयी और मैं गश खा कर गिर गया. होश आया तो एयरपोर्ट के ग्राउंड स्टाफ को अपने पास पाया। वो क्या कह रहा है क्या पूछ रहा है ये सब भूल के मैं कमरे से निकल के मीनल को खोजने भागा.. लेकिन वो जा चुकी थी. मेरे सामने हो कर भी मैं उसे मिल न सका।

अपना सामान ले कर मैं एयरपोर्ट की एक दुकान पे आया और सिगरेट का पैकेट ले के स्मोकिंग ज़ोन में चला गया। लगभग 3 साल से सिगरेट छूटी थी तो पीने से खांसी होने लगी।

मैं कश लेता और खांसता, फिर कश लेता फिर खांसता; मेरी हालत ये सब मुस्कुरा रहे थे. आखिरकार आधी सिगरेट फेंक कर मैं बाहर निकल गया।

कैब लेकर मैं पुणे के लिए चल दिया. आज फिर वो ही मंज़र था. मैं रो रहा था। मेरे मन के कोने में एक उम्मीद थी कि मीनल आएगी मेरे लिए, मेरे प्यार के लिए. लेकिन वो तो सच मे चली गयी हमेशा के लिए. कैब वाला भी शायद मेरे रोने का मज़ा के रहा था तो गाना चला दिया।

जहाँ से तुम मोड़ मुड़ गए थे,

ये मोड़ अब भी वहीं पड़े हैं

हम अपने पैरों पे जाने कितने

भवर लपेटे हुए खड़े हैं।

कहीं किसी रोज़ यू भी होता

हमारी हालत तुम्हारी होती।

जो रात हमने गुज़री मर के

वो रात तुमने गुजारी होती।

हज़ार रहें जो मुड़ के देखी

कहीं से कोई सदा न आई

बड़ी वफ़ा से निभाई तुमने

हमारी थोड़ी सी बेवफ़ाई।

मुझे ऐसा लगा जैसे ये गाना नहीं मेरे और मीनल के बीच बातें हो रही हैं। मैं सिर पकड़ के बैठ गया; "बंद करो ये बकवास गाने" मैं चिल्लाया।

कैब ड्राइवर घबरा गया और गाना बंद कर दिया; मैं पूरे रास्ते खिड़की से टिके रोटा रहा। पुणे पहुँचते ही कौस्तुभ को फ़ोन किया और मुझे लेने आने को कहा।
 
घर पहुँचा तो कौस्तुभ और मीरा दोनो ही नीचे खड़े थे, मैं लड़खड़ाते हुए कार से उतरा तो कौस्तुभ ने मुझे सम्हाल लिया।

मीरा ने मेरा सामान निकाला और दोनो मिल के मुझे अंदर ले गए। मेरी आँखें देख कर मेरे रोने का अंदाज़ा उन्हें हो चुका था, लेकिन मेरी तबियत खराब होने का कारण नहीं पता था।

मुझे दोनों ने मिल कर बिस्तर पे लिटाया और तबियत के बारे में पूछा; मैं क्या बताता उन्हें, जिस के प्यार का इंतेज़ार था वो मेरा मज़ाक बना कर जा चुकी है. मैं चुप रहा और अकेले रहने का मन है कह के उन्हें बाहर भेज दिया।

अपने मोबाइल में मीनल और अपनी सेल्फी देखी;" क्यों किया तुमने मेरे साथ ऐसा मीनल. क्यों; तुमनें शादी भी कर ली. मैं आंखें मलते उसकि फ़ोटो देख के बोला;

गुस्सा बढ़ रहा था अब मेरा "मेरा लोन चुकाने वाली थी न तुम. लाओ कहाँ हैं मेरे रुपये; या उन रुपयों से ही शादी कर ली. और मज़े से विदेश घूम रही हो;" इतना कहने तक मेरी आवाज बुलंद हो गयी थी और मैंने अपना फ़ोन फेंक दिया।

कौस्तुभ और मीरा आवाज़ से अंदर भागे आये. और मुझे बिस्तर पे पड़े गुस्से में रोते हुए देखा तो घबरा गए. " निशांत क्या हुआ तुझे..". कौस्तुभ डर से चिल्लाया।

मैंने उठ के सिगरेट जलाते हुए कहा " वो ; शादी कर चुकी कौस्तुभ; और मैं उस का इंतेज़ार करते रह गया. "भर्राए हुए गले कहते हुए मैंने सिगरेट का धुआं उड़ा दिया।

"कौन??;तू किस की बात कर रहा है " कौस्तुभ चिल्लाया।

"मीनल !!" मैं रोने के साथ खांसते हुए बोला.

"मीनल, मीनल मीनल; तेरी सुई 2 साल से वही अटकी है;तुझसे ज्यादा नफरत मुझे हो गयी है उस से. " " कहते हुए उसने मेरी सिगरेट फेंक कर मुझे थप्पड़ लगा दिया और मैं नीचे गिर गया।

मैंने सिद्धी के खिलजी सबूत जमा किये और कौस्तुभ की शादी के बाद..सिद्धी ने सब से अपनी गलती की माफी मांगी।मेरा प्रमोशन हुआ और 6 महीने के लिए अमेरिका गया, वापस आते वक्त मुझे मीनल दिखी जिस के साथ बेटी भी है. सदमे से उबर के किसी तरह मैं कौस्तुभ के पास पहुँचा

अब आगे।

मैं जैसे ही नीचे गिरा तो मीरा कौस्तुभ को डांटने लगी। "क्या कर रहे हो , चोट लग जायेगी उसे, उसकी हालत देखी है. ?" मीरा मुझे उठाते हुए बोली।

बिस्तर पे बिठाते ही उसने मेरा माथा और गला छुआ तो घबरा गई "इसे तेज़ बुखार है कौशू;" इतनी देर में मैं सिर्फ मीनल को याद कर के आंसू ही बह रहा था।

मीरा खिचड़ी बना के लायी, मेरे मना करने के बाद भी डांट कर अपने हाथों से खिलाया।

मैं बीच बीच मे नाक पोछता और फिर सुड़कते हुए खाता. कौस्तुभ मेरी आँखें पोछता रहता। खाने के बाद मीरा ने मुझे दवा खिलाई और बोली "तुम्हे कैसे पता कि उसने शादी कर ली . "

"मैंने आज एयरपोर्ट पे देखा उसे, बेटी के साथ;" मैं सिसकते हुए बोला।

"क्या!!"दोनों एक साथ चिल्लाए।

"इतनी जल्दी शादी कर के बेटी भी पैदा कर ली?" कौस्तुभ स्तब्ध था। " यही प्यार था उस का तेरे लिए?"

मैं अंदर तक जल गया ये सोच कर क़ि किसी और ने उसे छुआ होगा, मैने खुद भी कभी अपनी सीमाएं पार नहीं की थी;लेकिन मीनल ने तो खुद से ही खुद को किसी और को सौंप दिया। उस दिन मीनल की जिद के कारण मैं थोड़ा आगे बढ़ा था लेकिन तब भी मैं अपनी हद में था.

"तुम कैसे कह सकते हो उस की ही बेटी थी? आई मीन. हो सकता है किसी और का बच्चा पकड़ा हो उसने;" मीरा का प्रश्न सुन कर मैं जागा।

"उस की बेटी ने बताया मुझे. " मैं मुह लटका कर बोला।

"व्हाट? . तुम पागल हो क्या निशू. दो साल में शादी हो कर बेबी हो गया और वो भी बोलने समझने वाला;"

मैं मुँह खोले मीरा को देखने लगा, उसकी बात में दम था. रही बात उस की मुझे डांटने की तो वो मुझे हमेशा ही ऐसे डांटती रहती है।

"क्या?? ऐसे क्या देख रहे हो तुम दोनों मुझे. " मीरा का इतना कहते ही मैंने कौस्तुभ पे नज़र डाली तो उसे भी मीरा को आंखें फाड़े देखता पाया।

"नहीं कुछ नहीं; पता नहीं. मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा" मैंने सिर खुजाया।

"दिमाग होगा तुम लड़कों के पास तब कुछ समझ आएगा न. " इतना बड़ा कटाक्ष..!! वो भी मुझे!! और वो भी एक लड़की के द्वारा. जिस प्रजाति को मैं बुद्धिहीन कहता आया हूँ, आज उसी प्रजाति की एक लड़की ने मेरे दिमाग होने पर ही सवाल खड़ा कर दिया।

"वो. नहीं. उस की बेटी ने. तुम गुस्सा क्यों हो रही हो यार. !!" न जाने क्यों मैं हकला रहा था. इतनी बेइज़्ज़त्ति के बाद आवाज़ निकलती भी कैसे।

लेकिन सच कहूं तो मन को थोड़ा सुकून मिला कि शायद मीनल की बेटी होने के पीछे कोई और राज हो।

"कितनी बड़ी थी बेटी उसकी.." अब की बार कौस्तुभ बोला।

"3-4 साल शायद.."

" हो सकता है कि वो पहले से ही. इसी लिए वो ऐसे अचानक से भाग गई" कौस्तुभ बोला और मेरा गुस्सा परवान चढ़ गया, मैं झटके से उठा और उसकी टी शर्ट को गले के पास से पकड़ते हुए बोला " खबरदार जो ऐसी बात सोची भी तो; मैं भूल जाऊंगा कि तू मेरा दोस्त है"

"निशू;!!निशू छोड़ो उसे. तुम लोग बात सुलझाने के बदले आपस मे ही उलझ रहे हो. " मैंने मीरा की बात सुनते ही कौस्तुभ को छोड़ दिया और सॉरी कहा।

"नहीं चाहिए. अपना सॉरी अपने पास रख.."कौस्तुभ चिल्लाया। "तूने कभी खुद को देखा है, मीनल मीनल जाप करते करते तू सब भूल गया. और उस ने क्या किया?.. मुझे नहीं देखी जाती तेरी ऐसी हालत. लेकिन तुझे क्या; तुझे तो सिर्फ उसकी परवाह है, हम हैं क्या तेरे लिए;कुछ भी नहीं.."

मुझे इस बात पर आत्मग्लानि होने लगी, मैं सच मे मीनल के लिए सब भूल चुका था.

"सॉरी मोटू.. मुझे माफ़ कर दे यार. मेरे कारण तू भी झेलता आया है. " मैंने हाथ जोड़ लिए

"कौशू.. अब ड्रामा मत करो.. चलो दोनो गले लगो. "मीरा का धमकी भरा फरमान आया और अगले ही पल हम दोनों एक दूसरे के गले लगे खड़े थे।

"निशू. हो सकता है उस ने बच्चा गोद लिया हो. " मीरा बोली।

मैं बहुत देर तक सोचता रहा और जवाब दिया "गोद भी लिया था तो क्या मुझसे मिल के बता नहीं सकती थी;"

"ये सब जानने के लिए मीनल का पता मिलना बहुत ज़रूरी है.." मीरा ने कहा।

"हाँ. लेकिन कैसे. कहां खोजू उसे. "

"जो उसका फील्ड है उस हिसाब से मुम्बई में ही होगी वो शायद. " मीरा ने सुझाया।

" हम सारी एनीमेशन कम्पनीज में कोशिश करते हैं पता करने का. शायद कोई सुराग मिले।" कौस्तुभ बोला " लेकिन वादा कर कि अगर वो अपनी जिंदगी में आगे बढ़ गयी होगी तो तू भी शादी कर के अपनी लाइफ सैटल कर लेगा. "

"ह्म्म्म. !! मैं उदास हुए बोला।

मुझे सुला कर दोनों चले गए, मैं भी दवा के प्रभाव से जल्दी ही सो गया;

बहुत भीड़, है; मैं धक्का खाते हुए कुछ खोज रहा हूँ;

हल्का अंधेरा है कोई चेहरा साफ नहीं दिखता. अचानक दो हाथ मुझे पकड़ लेटे हैं. मैं चेहरे को ठीक से पहचानने की कोशिश करता हूँ.

"मीनल. "

वो हंसने लगती है. कितना भागोगे मेरे पीछे. मैंने पहले ही कहा था न मेरे कारण अपनी जिंदगी बर्बाद मत करो;"

"चली जाओ यहां से. मैं चिल्लाया और उसे धक्का देने को हाथ बढ़ाया..

"मम्मा मम्मा;" उसकी बेटी भागती हुई आयी. वो मुझे साफ दिख रही है. " उसे देख कर मैं पीछे हटने लगता हूँ. " मैं तुम्हे नहीं छू सकता; जाओ यहां से. " मैं रोता हूँ।

मीनल की बेटी मेरे पास आ कर मेरे हाथ पकड़ लेती है. और मुझे देखने लगती है;

"देखो मेरी बेटी भी हो गयी, मैं कितना आगे निकल गयी;खुद को देखो.. कहाँ हो. हो क्या तुम मेरे आगे. " मीनल ये कह कर हंसने लगती है।

मैं पीछे भागने लगा..तेजी से और किसी चीज़ से टकरा कर गिर गया.

गिरते ही मेरी आँख खुली तो खुद को दीवार से चिपके हुए सोता पाया।

बहुत देर तक मैं ऐसे ही बैठे शून्य में खोया रहा;ज़िन्दगी कहाँ से चल कर कहाँ आ गयी थी. अब न पीछे जा सकता था , न ही जो हुआ उसे बदल सकता था।

अगले दिन मैं जल्दी ही ऑफिस के लिए निकल गया, कुछ वक्त कौस्तुभ के घर रह के नया फ्लैट खोजना था।

कौस्तुभ और मैंने कई जगह पता करने की कोशिश की लेकिन मीनल का पता नहीं चला.. मैं अपने फ्लैट में शिफ़्ट हो गया लेकिन कौस्तुभ के फ्लैट पर ही ज्यादा वक्त बिताता।

एक शाम को ऑफिस से घर आया तो अपनी ही धुन में कौस्तुभ के फ्लैट का दरवाज़ा खोल के अंदर गया लेकिन वहां जो भी देखा तो आंखें बंद कर के सॉरी सॉरी कहने लगा।

"निशू के बच्चे? दरवाज़ा नॉक करने में क्या प्रॉब्लम है?" अपने बाल ठीक करते मीरा चिल्लाई। कौस्तुभ भी उस से अलग हो कर हाथ बांधे खड़ा हो गया।

"सॉरी यार!! अच्छा हुआ कि मैं जल्दी आ गया वर्ना थोड़ी देर में आता तो न जाने क्या. " मैं पता नहीं क्या बकवास किये जा रहा था।

कौस्तुभ तो मुझे ऐसे घूर रहा था जैसे समुद्रमंथन से निकला अमृत का घड़ा मैंने उस से छीन लिया हो।

"मैं ना;! मेरे सामने से चले जाओ ..शक्ल मत दिखाना अपनी. " मीरा ने पानी की बोतल मुझ पे फेंकते हुए कहा।

मैंने बोतल पकड़ ली और "थैंक यू यार. बहुत प्यास लगी थी. यु कैरी ऑन " कह के बोतल सहित बाहर आ कर सोसाइटी के पार्क में बने एक बैंच पर बैठ गया।

ना जाने क्यों मुझे बहुत हंसी आ रही थी आज. तभी कौस्तुभ का फ़ोन आ गया "कहाँ है स्साले.."

"अपने अड्डे पे. " मैं हंसी रोकता हुआ बोला।

"अपने फ्लैट पे आ, वहीं हूँ मैं. " कौस्तुभ का आदेश आया और मैं अपने फ़्लैट पे गया। अंदर जाते ही वो मुझ पे चिल्लाने लगा. " तेरे कारण उस ने मुझे भी धक्के दे कर निकाल दिया. ग्रहण बन के आना ज़रूरी था क्या. खाने का इंतज़ाम कर अब. आज खाना भी नहीं मिलेगा"

मैं ये सुन कर खूब हंसा. सॉरी यार बोल कर फिर हंसा, मुझे देख कर कौस्तुभ भी मुस्कुराने लगा।

मैं खाना बनाने लगा और उसने टी वी चला ली. जब मैं रोटियां सेंक रहा था तब अचानक ही कौस्तुभ ज़ोर से निशांत चिल्लाया। मैं गैस बंद कर के बाहर भागा तो देखा कि वो हाथ मे रिमोट लिए मुँह खोले खड़ा है. " क्या हुआ. " मैंने घबरा के पूछा तो उसने कहा "जल्दी खाना ले कर आ;"

"क्या मतलब. " मैंने हैरानी दिखाई।

"एक शो आने वाला है. "

मैं मुँह टेढ़ा कर के बड़बड़ाते हुआ खाना लाया, टी वी के आगे बैठे हम खाने लगे। पता नहीं दूरदर्शन का कोई उबाऊ सा कार्यक्रम आने लगा।

"जैसा कि आप जानते हैं इस कार्यक्रम में हम आपको उन लोगों से मिलवाते हैं जो पर्दे के पीछे रह हमारे लिए कुछ करते हैं।

मैं रोटी खाते हुए कौस्तुभ को देख कर चिढ़ रहा था. "क्यों बोर कर रहा है यार" मैं बड़बड़ाया।

"चुप रहने क्या लेगा; टी वी देख पहले।कौस्तुभ परेशान लगा मुझे।

"फेमस किड्स शो टिन-टैन का नाम आपने सुना ही होगा, आइये मिलवाते हैं उस शो को डिज़ायन करने वाले "जे पी डिज़ाइन्स " नामक कंपनी की डिज़ाइन टीम के खास मेंबर्स से;"

"आप हैं श्रीमान सुरेश सहगल जी" सहगल जी ने हाथ जोड़े।

"आप है श्रीमती मीनल. " और मेरे सामने मीनल थी। मेरे हाथ से निवाला छूट कर गिर गया।

उस के बाद 2 और लोगों से मिलवाया गया, शो चलता रहा . मीनल बीच-बीच मे बोलती रहती;मैं जड़वत देखता रहा। मेरे दोनो कानों में शंख बज रहा था. और लग रहा था जैसे सिर वे हथोड़े से प्रहार हो रहा है।

मीनल आगे निकलते निकलते इतना आगे निकल गयी और मैं वहीं एक सॉफ्टवेयर कंपनी का मामूली का कर्मचारी। आज मुझे मेरा आत्मविश्वास कम होता सा लग रहा था या मीनल से जलन हो रही थी या फिर मेरे बिना ही मीनल का बुलंदी हासिल कर लेना पच नहीं रहा था; मैं वास्तविक कारण से अनजान था और इस बारे में सोच कर अपनी ऊर्जा बर्बाद नहीं कर सकता था।

मुझे केवल एक ही शब्द का ध्यान था अच्छे से, वो था "श्रीमती मीनल. " मीनल के शादीशुदा होने के पुख्ता सबूत अब मेरे सामने थे।

आधे घंटे का शो खत्म हो गया, मैं अब भी मुँह के पास हाथ किये टी वी निहार रहा था. फर्क सिर्फ इतना था कि सारा खाना मेरी थाली में ही था।

"निशांत. ? निशांत!!" कौस्तुभ मुझे हिलाते हुए बोला.

"शो 5 मिनेट पहले खत्म हो चुका;कब से आवाज़ दे रहा हूँ; मीनल का पता चल जाएगा अब !खुश हो जा. "

"अब पता लगा कर भी क्या मिलेगा. जब वो शादी कर ही चुकी है;" मैं थाली किनारे रखते हुए बोला;मीनल के धोखे से ही पेट भर गया था मेरा;

"पता तो करेंगे ही. क्यों दिया उसने तुझे धोखा; तूने क्या नहीं किया उस के लिए. " मोटू अपने सिर पे हाथ रख के बोला।

"हमे जे पी ग्रुप का ध्यान पहले क्यों नहीं आया यार; ..ये उसी की कंपनी है ना जिसने मीनल को उस दिन प्रतियोगीता में अपना कार्ड दिया था. " कौस्तुभ बोला।

मैंने हाँ में सिर हिलाया और मीनल की इस हरकत के पीछे के कारण को सोचने लगा. लेकिन कौस्तुभ ने गुस्से में मुझे बिना पूछे ही जवाब दे दिया।

"वाह. !! क्या लड़की है. पहले तेरा इस्तेमाल किया. तेरे साथ जिग्नेश का सहारा लिया. फिर जैसे ही लगा काम हो गया तो चल दी अपने जे पी के पास. "

मुझे ऐसा लगा कि मेरे दिल पर आरियां चल रही हों;इतना सब जान कर भी मीनल के लिए अपशब्द नहीं सुन पा रहा था।

"बस कर कौस्तुभ; प्लीज मैं नहीं सुन पाऊंगा. " मैं रोते हुए बोला। "वो खुश हैं ना भले ही किसी के भी साथ हो;" के कहते हुए मैंने अपनी आंखें पोछी और जा कर सिगरेट जला ली. आज खांसी भी बहुत कम थी लेकिन कौस्तुभ को सहन नहीं हुआ और मेरी सिगरेट फेंक दी।

"उस के कारण खुद को क्यों नुकसान पहुँचा रहा है??. चल उस से मिल कर पूछेंगे की ऐसे क्यों किया उसने तेरे साथ. "

"नहीं यार. ! कैसे जाऊ मैं. वो कितनी आगे जा चुकी. मैं किस हैसियत से मिलूंगा.. वो तो टीवी पर आती है, उस के शो को कौन नहीं जानता , मुझे कौन जानता है?? मुझे तो हमारी बिल्डिंग के लोग भी नहीं जानते होंगे;" मैं अपने पिछड़ेपन को जताते हुए अपने पैरों के अंगूठों से चप्पलों को कुरेद रहा था।

कौस्तुभ के लाख समझाने पर भी मैं नहीं माना. लेकिन उसे एक बार देख लेने के लिए दिल तड़प रहा था, उसका पति कौन है ये जानने को अतिउत्सुक्ता हो रही थी मुझे।

"मैं जा कर बस दूर से देख लूंगा उसे मोटू;कि वो खुश है ना अपनी जिंदगी में. उसकि बेटी इतनी बड़ी कैसे है ये भी जानना चाहता हूँ. लेकिन ये संभव नहीं;" मैं चेहरा ज़मीन वे गड़ाए भर्राए हुए गले से कह रहा था।

कौस्तुभ ने आ कर मुझे गले लगा लिया. और मेरी पीठ सहलाते हुए बोला." गोद ली होगी या फिर. मीनल उसके पति की दूसरी पत्नी होगी. " इतना सुनते ही मेरे सीने में तेज दर्द हो कर पेट तक पहुँच गया। "खुद को मज़बूत कर अब; और अपनी जिंदगी में भी आगे बढ़. " वो मुझे गले लगाए हुए ही बोला।

इतने में मीरा आयी और हमे हैरान हो कर देखने लगी;" मैंने घर से क्या निकाल दिया, तुम दोनों का मातम शुरू हो गया;"

"मीनल का पता चल गया मीरा4 Full, stop" कौस्तुभ मरी हुई आवाज़ में बोला। "वो शादीशुदा है. "

"व्हाट? आई कांट बिलीव दिस. "

इतने में पापा का फ़ोन आ गया. कैसा है मेरा बेटा. ! सब ठीक है ना.."

"मैं बहुत अच्छा हूँ पापा. " मैं ज़रूरत से ज्यादा तेज़ आवाज़ में बोला ताकि उन्हें मेरे रोने की भनक भी न लगे।

"ऐसी आवाज़ क्यों है तेरी निशू;" पापा घबरा कर बोले।

"पापा कौस्तुभ और मीरा यहां हैं न. तो हम बहुत हंस रहे थे इस लिए आपको ऐसा लगा. " मैं कौस्तुभ को देखते हुए बोला. जो मेरी दुर्दशा पर दुःखी था।

" तेरी भी लाइफ ऐसे हो जाती तो. लेकिन कोई बात नही..तूने साल का वक़्त मांगा था न!!. उम्मीद करता हूँ तब तक तू सब भूल के आगे बढ़ जाएगा।"

" पापा मैं सब भूल चुका; आपको मेरी शादी जिस से भी करनी हो, जब भी करनी हो मैं तैयार हूं. " मैं अपने भरे हुए गले को सामान्य करने की कोशिश करते हुए बोला।

बात हाथ से निकलटी देख कौस्तुभ ने फ़ोन ले कर पापा से बात शुरू कर दी.

मैं वही ज़मीन पर पड़ गया और सिगरेट सुलगा ली; आखिरी बार हैं ये, खुद को दिलासा दे कर आँसू भी गिरने दिये;मीरा ने नींचे बैठ कर सिगरेट ले कर फेंकनी चाही लेकिन मैंने उसे नहीं दी;

"मेरे जीने का सहारा मत छीनो मुझसे मीरा. " मैंने उसे देखते हुए कहा. और सिगरेट का धुआं उड़ा दिया।

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मैं खुद को हारा हुआ महसूस करने लगा था, मीनल की तरक्की के बाद भी मैं खुश नहीं था. होता भी कैसे. वो सामने आई भी तो "श्रीमती" बन के।

मुझे सिगरेट पीते मीरा और कौस्तुभ देखते रहे;जब खत्म हुई तो मैं उठ के बालकनी की तरफ चल दिया, कौस्तुभ और मीरा मेरे पीछे आये;

" मुझे छूट्टी लेनी होगी कौस्तुभ ,मैं एक दो दिन मुम्बई में रह कर ही उसे देखना चाहता हूँ.."

" मैं उसके ऑफिस का पता निकालता हूँ फिर साथ चलेंगे.." कौस्तुभ ने मुझे ढांढस बंधाया।

"नहीं . अब मैं अकेला जाऊंगा. जब जिंदगी ने अकेला कर ही दिया है तो अकेला ही आगे बढ़ना होगा. "

"कैसी बातें करते हो निशू;क्या हम तुम्हारे साथ नहीं.."मीरा उदास हुई।

" साथ हो . और हमेशा रहोगे मीरा . लेकिन मेरी ज़िंदगी का ये पड़ाव मुझे अकेला ही गुजरना है.. मैं अंदर से अकेला हो गया हूँ ,प्लीज तुम लोग जिद मत करो. वैसे भी कहाँ जाऊंगा;लौट कर तुम लोगों के पास ही आऊंगा।"

मैं आसमान के तारे गिनते हुए बोला।

अगले दिन तक कौस्तुभ ने जे पी डिज़ाइन्स का पता निकाल कर मुझे दे दिया और मैंने ऑफिस में छुट्टी की अर्जी दे दी..

2 दिन बाद से छुट्टी मिली मुझे. दो दिन मैंने मीनक के किड शो के न जाने कितने एपिसोड देख डाले;

जिस दिन निकलने को हुआ तो मन घबराने लग गया. सच सामने आने के बाद भी दिल का एक कोना अब भी उम्मीद में था कि शायद ये सब झूठ या सपना है;मैं उसी आवाज़ को सच मानना चाहता था।

मुझे बहुत हिदायतों के साथ कौस्तुभ और मीरा ने विदा किया. कौस्तुभ आखिर तक साथ चलने की ज़िद करता रहा लेकिन मैं ना माना;तब कौस्तुभ ने कसम दी कि अगर कुछ भी गलत लगे या तबियत ठीक न हो तो मैं तुरंत उसे मुम्बई बुला लूंगा. मैंने वादा किया और निकल पड़ा;

वैसे तो मैं पुणे से मुम्बई कई बार आया गया था लेकिन ये यात्रा बहुत अलग थी; मैं अपने प्यार को और उस के परिवार को देखने जा रहा था। दो दिन की छुट्टियां मिली थी तो मैं वक़्त बिना बर्बाद किए सुबह ही निकल गया था. ताकी ऑफिस टाइम में मीनल दिख सके।

पता नहीं कैसे बर्दाश्त कर पाऊंगा उसे किसी और के साथ. मेरा डर चरम सीमा पर था;उम्मीद भी क्या चीज़ है ना, सामने सच देख कर भी उसे नकार के कुछ और मान बैठती है।

खैर!!, मुम्बई पहुँच कर मैं होटल गया जो रात में ही कौस्तुभ ने बुक करवा दिया था. फ्रेश हो कर नाश्ता कर के मैं निकल गया;यहां से ऑफिस बहुत पास था लेकिन फिर भी मैं कार से निकला ताकि मुझे वो देख न ले।

ऑफिस के बाहर पहुँच कर मैंने कार एक तरफ लगाई. बहुत देर तक बैठे रहने के बाद भी मीनल नहीं दिखी. वैसे भी जब तक मैं ऑफिस के अंदर नहीं जाता उसे देख पाना मुश्किल था. यहां से केवल झलक भर ही मिल सकती है उसकी अगर वो कार या ऑफिस कैब में हो;

मैं साँसे रोके हर कैब, कार स्कूटी और बाइक को देखता रहता. लेकिन मीनल के दर्शन नहीं हुए। ऐसी हालत तो उनकी भी नहीं होती होगी जिनके आईएएस के आखिरी प्रयास का परिणाम आना हो। ऑफिस टाइम लगभग खत्म हो गया था. अब शाम तक का इंतेज़ार करना होगा.. उस के बाद रात का;मेरे पास कोई चारा भी नहीं था।

दोपहर होने को आयी, बैठे बैठे मेरा शरीर अकड़ने लगा था. भूख प्यास भी चरम पे थी तो काला चश्मा लगा कर मैं उतरा और रोड के किनारों के ठेलों और छोटी दुकानों की तरफ गया। बाहर की गर्मी बहुत तेज़ थी तो पानी पिया फिर कोल्ड ड्रिंक;

इतनी गर्मी में झुलसते हुए भी कुछ लोग चाय पीने और गर्मागर्म कचौरियां, समोसे खाने में व्यस्त थे। मुझे कुछ भी खाने की इच्छा नहीं थी लेकिन मीनल को देखना था तो अपना स्वास्थ्य भी सही रखना ज़रूरी था, और मैं यहां से कहीं और जाना भी नहीँ चाहता था;पता नहीं कब मीनल दिख जाए।

आखिरकार मैंने भी बहुत असमंजस के बाद कचोरी और सब्जी ली और खड़ा हो कर खाने लगा. मेरे पीछे कुछ लोग समूह में हंस बोल के खा रहे थे. और मेरे ठीक सामने कुछ लोग सिगरेट का धुआं उड़ा रहे थे।

हम भारतीय चाहे कितनी भी बड़ी जगह रह ले, बड़े काम कर ले;खाने का मज़ा हमे छोटे ठेलों पर ही आता है।

मैं मीनल को सोचते हुए, सब्जी में डुबो डुबो कर कचौरियां खाने लगा. पीछे से किसी के हंसने की आवाज़ आयी और मेरे हाथ ठिठक गए।।

मीनल;ये मीनल के हंसने की आवाज़ है;मेरे दिल ने कहा। मैं पलट के देखना चाहता था लेकिन कैसे? अगर मीनल हुई और उसने भी मुझे देख लिया तो. मेरी धड़कने बढ़ती जा रही थीं. क्या करूँ कैसे पता करूँ, कैसे देखूं; मैं हाथ मे प्लेट पकड़े सोचता रहा. "छी. कितना धुआं है सिगरेट का..मुझे सिगरेट पीने वालों से चिढ़. " उसने बात अधूरी छोड़ दी और मैं जान गया कि ये मीनल के सिवा कोई नहीं।

"क्या हुआ रुक क्यों गयी. "एक लड़का बोला।

"नहीं कुछ नहीं. " अब कि बार उसकी आवाज़ से खनक गायब हो चुकी थी।

"चलो गाएस.. देर हो रही है.. मेरा प्रेजेंटेशन भी है. " कोई बोला, और मीनल का पूरा ग्रुप मुझे अपने बगल से जाता हूआ महसूस हुआ. " मेरे हाथ पैर कांप रहे थे कहीं मीनल ने देख ले. सब के जाते ही मैं पलटा और अपनी कार की ओट में छिप के देखने लगा। सच कहूं तो मुझसे घबराहट में खड़ा भी नहीं हुआ जा रहा था. लेकिन काँपते पैरों को कार से सहारा दे कर छुप गया.

मीनल बहुत बदल गयी थी, अगर उस दिन एयरपोर्ट पे देखा न होता उसे तो शायद आज पहचान न पाता।

घुटनो तक की वन पीस ड्रेस, पैरों में हल्के हील वाली जूती, और लंबे बालों की पोनी। चेहरा मुझे दिखा नही लेकिन उसकी चाल में जो आत्मविश्वास मैं चाहता था आज मीनल में साफ झलक रहा था।

देखते ही देखते वो मेरी आँखों से ओझल हो गयी और मैं वैसे ही खड़ा रह गया. जब होश आया तो देखा कि मेरी टेढ़ी हुई प्लेट से सब्जी मेरी जीन्स पे गिर गयी है; और मेरी आँखों के सामने उस दीवाली में मीनल के खाने की थाली गिरने वाला मंज़र घूम गया , मैं मुस्कुरा उठा और अगले ही पल उदास हो गया।

अपनी जीन्स को पानी से साफ कर मैं कार में वापस आ कर बैठ गया. काश मीनल मुझे छोड़ कर न गयी होती!!. " तुम्हे क्या डर था मीनल. मैं क्या तुम्हारे रास्ते मे रुकावट डालता? मैं तो तुम्हारी तरक्की से खुश था; क्या कमी थी मुझमे मीनल;" मैं आंखें मीच के बुदबुदाया।

बैठे बैठे न जाने कब झपकी लग गयी. आंख खुली तो 2 घंटे बीत चुके थे; मैं वैसे भी ठीक से सोया ही कहाँ इन दिनों. हर वक़्त मीनल मेरे दिमाग मे विचरण करती रहती.

मैं कभी टाइम देखता, कभी खिड़की खोल कर बाहर झांकता फिर बंद कर के स्टेयरिंग पे सिर टिका लेता; जब किसी का इंतेज़ार हो तो घड़ी रूक सी जाती है. हम सदियों का लंबा इंतेज़ार कर के घड़ी देखते हैं तो केवल एक मिनेट यानी 60 सेकंड ही गुज़रे होते हैं।

हार कर मैंने गाने चला लिए और इंतेज़ार करने लगा. आखिरकार ऑफिस से कारें और कैब निकलते दिखने लगे. मैं आंख गड़ा कर मीनल को खोजने लगा; और इस बार किस्मत ने भी साथ दिया मीनल दिख गयी.. कार में पीछे बैठी थी एक फ़ाइल देख रही थी. आगे ड्राइवर चला रहा था. इस अनदाज़ से ये गाड़ी उसी की लगी।

मैंने धीरे से कार स्टार्ट की और मीनल की कार के पीछे हो लिया; न जाने मेरे पेट मे कितनी तितलियां उड़ रही थी.

तकरीबन आधे घंटे के बाद एक सोसाइटी के बाहर गाड़ी रुकी और मीनल उतर गई. ड्राइवर से उसने कुछ कहा जो मैं सुन न सका, और ड्राइवर कार ले कर आगे चला गया. मीनल जैसे ही गेट के अंदर गयी. मैं उतर के भागा. और गेट के बाहर से उसे देखने लगा. मेरी हालत चोरों जैसी हो चुकी थी. लेकिन क्या करता मैं आखिर.

मीनल की बेटी मम्मा मम्मा करते उस के पास भाग के आयी. और पीछे से एक आदमी आता दिखा. "मीनल का पती तो नहीं. " मैं घबराया।

मैं चाहता था कि झूठ हो सब, मीनल शादिशुदा न हो. तेज़ धड़कनों के साथ मैं उन्हें पास आते देख रहा था, उसने मीनल से फ़ाइल ली और एक किनारे से उसके कंधे पे हाथ रख के कुछ कहा. मीनल ने क्या प्रतिक्रिया दी वो मुझे नहीं दिखा।

मैं आगे देख नहीं सका तो भाग के कार में आ कर बैठ गया और सिगरेट जला ली। मुझे उस आदमी का मीनल के कंधों पे हाथ रखना अखर रहा था।

"मुझे सिगरेट पीने वालों से चिढ़ है. " मीनल की आज की आवाज़ गूंजी और मैं चिल्ला पड़ा. " और मुझे तुम से नफरत है;" फिर चुप हो कर सोसाइटी के गेट को देखते हुए सिगरेट खत्म की और होटल आ गया।

मीनल की फ़ोटो देख कर उस से न जाने कितने सवाल पूछता रहा. वो सारे सवाल जो उस से मिल के पूछना चाहता था लेकिन जब वो मिली तो मैं भागा फिर रहा हूँ;

अगली सुबह रोड के दूसरी तरफ मीनल की सोसाइटी के ठीक सामने ,मैं सुबह 7 बजे मौजूद था। खिड़की से टिक कर गेट को देखे जा रहा था। तकरीबन साढ़े आठ बजे मीनल गेट के पास आ कर खड़ी हुई, आज उसने कुर्ती और पैंट पहनी थी; बाल बनाने का वोही पुराना तरीका जिस से मुझे चिढ़ थी। थोड़ी देर में कल वाली ही कार रुकी और मीनल उसमे बैठ गयी, उसकी कार यू टर्न ले कर बगल से गुज़री तो मैं भी पीछे हो लिया।।

इन तरह से मुझे कुछ हाथ नहीं लगना था. लेकिन आज रात को वापस जाना है ये सोच कर मैं फिर मीनल के ऑफिस के बाहर था।

आज दिन मे भी वो अपने ग्रुप के साथ आई, और समोसे चाय खाने लगी.. मैं आज भी उनकी तरफ पीठ किये खड़ा था।

" छी यार ये जे पी ने बहुत परेशान किया हुआ है" एक बोला।

" काम है तो करना ही पड़ेगा न. " मीनल की आवाज़ आयी।

"तू तो रहने दे जे पी की चमचि;"एक हंसी।

" शट अप यार. ऐसा कुछ नहीं. " मीनल ने अपना पक्ष रखा।

"हां ये केवल अपने पति की चमची है. क्यों मीनल.." एक हंस के बोली।

ये सुनते ही मेरे कलेज छलनी हो गया. लेकिन मैं पलट नहीं सकता था।

"और क्या. ही इज़ द बेस्ट!!"मीनल बोली। मुझे लगा कि जैसे मेरे सिर पे किसी ने जोरों से प्रहार किया हो. मैं कार में आ कर बैठ गया।

"वाह मीनल. तुम्हारा पति बेस्ट है;अच्छी बात है, वो भी तुम्हारी तरह कोई बड़ी हस्ती होगा. मैं कहाँ. और तुम कहाँ।" मैं बुदबुदाया।

मैंने फिर सिगरेट जला ली, मुझे छोड़ के चली गयी तुम, तब भी मैं सोचता था कि तुम एक एक दिन मेरे पास आओगी।।

तुमने मुझे कहीं का नहीं छोड़ा मीनल; मैं गुस्से में बोले जा रहा था।

शाम को जैसे ही मीनल निकली मैं फिर पीछे हो लिया. "आज देखूंगा कि क्या बेस्ट है तुम्हारे पति में. " मीनल की सोसाइटी के बाहर कार रोक कर मैं उसे उत्तर के जाते हुए देखता रहा।

मैं आज पीछे नहीं गया, जाता तो शायद अपने होश में न रहता और उनकी पति से भिड़ जाता।

मीनल चली गयी मैं सिगरेट का धूआँ उड़ाते वहीं बैठा रहा. न जाने क्यों वापस होटल जा के रुकने का मन नहीं था.

मैं खुद अपने आप से बात करते हुए बैठा रहा. कुछ देर में मीनल मुझे गेट के बाहर फिर दिखी, साथ मे वो ही आदमी उसकी बेटी को गोदी में उठाये खड़ा हुआ। मुझे उस आदमी से जलन होने लगी.. तो मुट्ठी भींच ली, मीनल इतना बड़ा सदमा लगाएगी मुझे. मैंने सपने में भी नहीं सोचा था।

अभी उसने जीन्स और टीशर्ट पहनी थी साथ ही एक बैकपैक लिया हुआ था; लगता था तीनो कहीं जाने की तैयारी में हैं मैंने सोचा।

मीनल और वो कुछ बातें करते रहे फिऱ गार्ड से कुछ बातें करने लगे. अचानक मीनल में मेरी कार की तरफ देखा तो मैं स्टेयरिंग पे झुक गया ताकि वो मुझे देख न ले, हालांकि इतनी दूरी से वो मुझे पहचान भी नहीं पाती।

मैं ऐसे ही छुपा रहा, और मीनल के बारे में सोचता रहा कि मेरी खिड़की पे किसी ने दस्तक दी. मैंने पलट के देखा तो सामने मीनल थी. मेरी साँसे धड़कने सब रुक चुकी थी; न चाहते हुए भी मीनल ने मुझे देख लिया।

उधर मीनल की आंखें फटी रह गयी , घबराहट और डर साफ झलकने लगा;

हम दोनों लगभग एक ही मनोस्थिति में एक दूसरे को बीना पलकें झपकाए देखे जा रहे थे; मैं धीरे से बोला "मीनल"

और मीनल के होंठ हिलते दिखे. उसने क्या कहा मैंने सुना नहीं लेकिन उसके होंठों को देख कर समझ गया कि उसने निशांत कहा।

मेरी आँखें भर आयी मन हुआ कि उसके गले लग के खूब रो लू। उसे बताऊँ कि कितना प्यार करता हूँ उसे. लेकिन अगले ही पल मेरे भाव बदल गए और चेहरे पे नफरत के बादल छा गए।

मेरा आंसू नीचे गिरता, या मीनल कुछ कह पाती मैं कार स्टार्ट

कर के आगे बढ़ गया।

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