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पापा मम्मी और मौसी ने कॉल पे मुझे जन्मदिन की शुभकामनाएं दी और मीनल को ले कर कई हिदायतें दी, मैंने उसका खयाल रखने का वादा किया और फोन रखा।
हमे महाबलेश्वर निकलना था,जिग्नेश और कौस्तुभ ने अपने खरीदे हुए कपड़े मुझे पहनाए. नीली डेनिम शर्ट के साथ क्रीम रंग का ट्राउज़र;फिर मुझे चिढ़ाने के लिए औरतों के जैसे मेरी नज़र उतारने लगे।
"क्या कर रहे हो छोड़ो मुझे.." मैं उन्हें धक्का दे कर बोला।
"तुझे क्या पता कल तुझे लोग कैसी हवस भारी नज़रों से देख रहे थे.." कौस्तुभ बोला।
"शरम कर" मैंने हंसते हुए कहा।
भाई जिग्नेश तू बता, लोग कैसे देख रहे थे इसे, और मॉल में वो दो लड़कियां. याद हैं ना।
जिग्नेश ने मुस्कुरा कर हां में सिर हिलाया, दोनों मेरी टांग खींच रहे थे।।
"मैंने भी देखा था" पीछे से मीनल बोली।
हम तीनों हैरान रह गए;
"क्या!!. तुम हो ही इतने प्यारे कोई भी देखेगा ही. " वो मेरे गाल खींचते हुए बोली।
मीनल ने नीली जीन्स और सफेद हाफ बाजू की टी शर्ट पहनी थी, बाल उसने खुले ही रखे थे आज. मुझे और क्या चाहिए था। लेकिन वहां ठंड होगी और मीनल को आदत नहीं, मेरे पास उस के नाप का जैकेट भी नही था, मैं सोच में पड़ गया।
खैर!! हम चारों निकल पड़े. आज मुझपे तरस खा के मीनल को आगे बिठाया गया था. मैं उसकी सीट बेल्ट लगाने को झुका लेकिन फिर पीछे हट गया, मीनल मुझे देखने लगी.. तो मैंने सीट बेल्ट का इशारा किया. और अपनी सीट बेल्ट धीरे से लगाने लगा..मीनल ने मुझे देखते हुए अपनी सीट बेल्ट लगा ली, हम दोनों एक दूसरे को देख के मुस्कुराये और मैंने कार चला दी।
मैंने रास्ते मे एक दुकान में कार रोकी और दो मिनेट में आने का कह के उतर गया. थोड़ी देर बाद मैं 2 थैलों के साथ कार में था।
"क्या है दिखा जल्दी;"मोटू चिल्लाया।
मैंने थैले पीछे फेंके और इशारे से चुप रहने को कहा। मीनल खोयी हुई बाहर देख रही थी। गाने चला के मैंने कार चलाई, और हम चल पड़े एक खूबसूरत सफर की ओर।
"छूटेया ना छूटे मोसे रंग तेरा डोलना,
इक तेरे बाजो दूजा मेरा कोई मोल ना,
बोलना माहि बोल ना
तेरे संग हँसना मैं, तेरे संग रोना
तुझमें ही रहना मैं,तुझमें ही खोना
दिल में छुपा के तुझे दिल नियो खोल ना
मरके भी माही तोसे
मुँह नहीं मोड़ना…
मैं गाने के साथ मीनल को देख के गुनगुनाने लगा; कितना हसीन था सब, जब तक मोटू बदतमीज़ चिल्लाया नहीं।
"करा दे!! एक्सीडेंट करा ही दे मेरा. शादी भी नही हुई मेरी अब तक;ऊपर से ये बोरिंग पंजाबी गाने;" कभी कभी मुझे लगता है कि कौस्तुभ ही मेरी मम्मी की असली औलाद है।
"तो कौन सा गाना बजाऊं?? . ओढ़नी ओढूं ओढूं पर उड़ी जाए. " मैं चिल्लाया। मीनल हंसने लगी।
"इसमे हंसने वाली कौन सी बात है. " मैंने मीनल को घूरा तो वो मुस्कुराते हुए ही खिड़की से बाहर देखने लगी।
मुझे पता नहीं चल रहा था लेकिन मैं धीरे धीरे वापस वो ही पुराना निशांत बन रहा था; शायद ये सभी महसूस कर रहे थे और खुश थे।
"भाई आप और मीनल पीछे बैठ जाओ; मैं ड्राइव करता हूँ. " हमारी टीम का सबसे शांत बंदा जिग्नेश बोला।
मुझे पीछे बैठना पसंद नहीं, लेकिन अब मैं और मीनल पीछे की सीट में एक एक खिड़की से चिपके नज़र आ रहे थे. कौस्तुभ ने काला चश्मा पहनते हुए मुझे देख के अपनी जीत का एहसास दिलाया और मैंने मुह टेढ़ा कर दिया।
" अपने बोरिंग गाने बजाए न!! , तो मैं यही उत्तर जाऊंगा. " मैं मोटू को देख के दहाड़ा.
"रोका किसने?? दरवाज़ा तेरे बगल में ही है. " मोटू का उड़ता तमाचा मुझे लगा।
मीनल फिर हंसने लगी. मैं उसे देखने लगा. फिर हम चारों ही हंस रहे थे।
मैं कभी बाहर देखता तो हवा से अपने बाल सम्हालते हुए बाहर के नजारों में खोयी मीनल को. मेरे लिए तो दुनिया की सारी खूबसूरती मेरे बगल में थी।
जिग्नेश सबका खयाल रखते हुए गाने बजा रहा था. एक जगह मीनल खिड़की से बाहर हाथ निकाल कर हवा को महसूस करने लगी; तो जिग्नेश ने मुझे आवाज़ दी और शीशे पे देख कर इशारे से ही मीनल पे ध्यान देने को कहा;
मैं मीनल के पास खिसक के बैठ गया , मुझे अपने पास देख के मीनल थोड़ा असहज हुई.. लेकिन मैंने उसके हाथ पे हाथ रख के उसे आश्वस्त किया।
"बाहर की हवा महसूस, करनी है मीनल?? मैंने पूछा तो वो खुशी से मुझे देखने लगी।
मैंने पीछे देखा तो आस पास कोई गाड़ी नहीं थी. जिग्नेश ने मेरा इशारा मिलते ही कार थोड़े और कोने पे कर दी ताकि कोई गाड़ी उस तरफ से ना जा सके. फिर मैंने मीनल को सहारा दे खिड़की से बाहर झांकने को कहा. मीनल ने खिड़की बाहर लटक के अपने हाथ फैला लिए. आगे कौस्तुभ भी निकल गया और जिग्नेश ने कार धीमी कर दी।
"हम जो चलने लगे, चलने लगे हैं ये रास्ते
आ हा हा मंजिल से बेहतर लगने लगे हैं ये रास्ते
आओ खो जाएँ हम, हो जाएँ हम यूं लापता
आओ मीलो चलें, जाना कहाँ न हो पता
हम जो चलने लगे, चलने लगे हैं ये रासते;"
जिग्नेश ने गाना चला दिया, मैंने मीनल को पीछे से पकड़ा हुआ था. उसे इन सब का अनुभव नहीं था.. और मेरे लिए वो किसी मासूम बच्चे की तरह थी जिसका हर पल खयाल रखना होता है। उसकि खिलखिलाहट कानों में मिश्री की तरह घुल रही थी. कौस्तुभ और मीनल एक दूसरे को चिढ़ाते हुए तो कभी हाथ पकड़ कर साथ चिल्लाते.
मैं और जिग्नेश मुस्कुराते हुए दोनो को देख रहे थे.
ज्यादा ठंड होने पर मैंने मीनल को अंदर किया. और कौस्तुभ को भी सीट पे बैठने को कहा।
मीनल ने बच्चों की तरह मुह बनाया, उनका मन नहीं भरा था। मैंने उसके चेहरे वे गौर किया तो देखा कि ठंडी हवा के कारण उसका चेहरा गुलाबी हो गया था और बाल बिखरे हुए थे. मुझे उसकी खूबसूरती पे प्यार भी आया और उसकि हालात देख कर हंसी भी आयी।
मैंने अपनी अंगुलीयों से उसके बाल थोड़े बहुत सुलझाते हुए ठीक किये. उसके बिना वैक्स के हाथों के रोएं ठंड से खड़े हो गए थे. मेरी नज़र पड़ी तो मैं बहुत हंसा. सब पूछते रहे लेकिन मैं कुछ कह नहीं पाया. मीनल समझ गयी तो उसे बुरा लगा,वो चुपचाप मुँह नीचे कर के बैठ गयी। मैंने गौर किया तो उसकी आंखें भर आयी थी. मुझे खुद पर बहुत गुस्सा आया।
मैंने उसका चेहरा ऊपर कर के उसकी आंखें पोछि. फ़िर अपने हाथ आपस मे रगड़े और गर्म हथेलियों को उसके चेहरे पे रखा।
"तुम जानती हो मीनल. तुम दुनिया की सब से अच्छी लड़की क्यों हो?" ये सुन कर मीनल मुझे देखने लगी..
मैं उसकि आंखों में झांकते हुए बोला "क्यों कि तुम बनावटी नहीं, तुम जैसी हो, वो ही दिखती हो. कोई मुखौटा नहीं. लड़कियां अपने बॉयफ्रेंड से मिलने जाने पर कितना सजती धजती हैं. लेकिन तुम जैसी हो वैसी आयी; बिल्कुल सच्ची और साफ मन की. "
मीनल की आंखें फिर गीली हो गयी. मैंने अपना एक हाथ उसके पीछे से ले जा कर उसके कंधे पे रखा और उसे खुद से सटा लिया; फिर अपनी गरम हथेलियों को उसके हाथों पे फेरा, जिस से उसे कुछ गर्माहट मिली।
थोड़ी देर में हम महाबलेश्वर में थे; प्रकृति की इतनी सुंदर रचना देख कर हम सभी चकित थे. चारों तरफ हरे नीले पहाड़ फैले थे. और उनसे आती धुन्ध हमें नम कर रही थी. ।
मैंने थैलों से डेनिम जैकेट निकाल कर जिग्नेश और मीनल को पहनने को दिया, कौस्तुभ मुँह न फुला ले इसके लिए उसे रुमाल दिया।
"मेरे लिए रुमाल क्यों" वो गुस्से में बोला।
" नाक पोछने के लिए. " अबकी कौस्तुभ को छोड़कर सब हंस रहे थे।
हम खूब भागे. साथ चिल्लाए. आस पास चाय बेचने वालों से चाय ले कर पी. दोस्तों के साथ कहीं घूमने का अलग ही मज़ा होता है।।
हम महाबकेश्वर के कई मशहूर हिस्सों में घूमे, मैं मीनल का हाथ पकड़े उसे सब दिखाता रहा. अंत में एक पहाड़ी के कोने पे आ कर हम खड़े हो गए और देखने लगे;
मीनल को शायद गहराई का अंदाजा नहीं था तो वो नीचे झांकने लगी. हम में से किसी ने ध्यान नहीं दिया कि वो क्या कर रही है. अचानक अपने हाथ में खिंचाव होने पर मैंने देखा तो मीनल लगभग नीचे की तरफ लटकी हुई थी, अगर मैंने उसका हाथ पकड़ा हुआ न होता तो वो गिर जाती।
ये नज़ारा देख कर मैं घबरा गया और मीनल की बेवकूफी ओर गुस्सा आया तो उसे पीछे खींचा और चिल्लाने लगा।
"दिमाग खराब है गिर गयी होती तो?; अकल है या नहीं तुम्हारे पास. क्या जवाब देता मैं सब को??. " मीनल डर से काँपने लगी.. उसकी इस तरह से बेइज़्ज़ती होने पर किसी को अच्छा नहीं लगा. मीनल की आंख से आंसू आ गए और कौस्तुभ मुझे डांटने लगा;
लेकिन जिग्नेश ने उसे रोका और अपने साथ ले गया. अब मैं और मीनल अकेले थे.. मीनल का इन तरह से रोना मुझे बहुत खल गया, मैं भी न ज्यादा ही गुस्सा कर जाता हूं।
मैं मीनल के पास उसे पकड़ने के लिए बढ़ा लेकिन उस ने गुस्से से मेरा हाथ झटक दिया, मैंने एक बार फिर कोशिश की लेकिन परिणाम वही रहा।
मन नहीं था लेकिन जबरदस्ती करनी ही पड़ी, मैंने मीनल के दोनों हाथों को अपने दोनों हाथों से कस के पकड़ा और अपने हाथ उसकी कमर पे रख दिये. हाथ पीछे हो जाने के कारण वो मेरे बहुत करीब हो गयी थी, गुस्सा इतना थी कि अब भी हाथ छुड़ाने की पूरी कोशिश कर रही थी. मैं उसकि इस नादानी पे मुस्कूराये बिना न रह सका।
उसके दोंनो हाथों को अपने एक ही हाथ मे कर के मैंने दूसरे हाथ से उसके बाल उसके कान के पीछे किये और बोला "इतनी नाराजी. वो भी मुझसे. ?? देखो लड़ भी नहीं पा रही ठीक से;" उसने अपने हाथ छुड़ाने की कोशिश करते हुए मुझे गुस्से से देखा तो मैंने अपना एक कान पकड़ लिया।
मीनल गुस्से से दूसरी तरफ देखने लगी. तो मैंने उसे खुद के और करीब कर लिया " अब कहाँ देखोगी. बोलो? "
वो कुछ नहीं बोली और गुस्से में उसकी साँसे तेज़ हो गई. मुझे वो एहसास फिर बेचैन कर गया. धड़कने दौड़ लगाने लगी. मैंने बिना जाने ही दूसरे हाथ से भी उसे कस लिया और उसके चेहरे की तरफ झुकने लगा।।
मुझे न जाने क्या हो गया था. लेकिन मैं कुछ गलत करता उस के पहले ही पापा मम्मी की हिदायतें कानों में गूंजने लगी;
मैं अपनी हरकत पे शर्मिंदा हो गया, मुझे माफ़ कर दो मीनल. कहते हुए मैंने उसे छोड़ दिया.. और नज़रें नीची कर के उस से दूर जा कर खड़ा हो गया। खुद पे बहुत गुस्सा आ रहा था, आज मैं मीनल, पापा और मम्मी के साथ खुद का भरोसा भी तोड़ने वाला था।
मीनल को पीछे मुड़ के देखने की हिम्मत भी नहीं थी, "चलो निशांत" कहते हुए मीनल मूझसे आगे बढ़ी और मैं उसके पीछे हो लिया।
हमे इस तरह से आते देख दोनो दोस्तों ने सिर पीट लिया
"तुझसे माफी भी ठीक से मांगी नही जाती. इतना अकड़ू क्यों है तू?" कौस्तुभ ने डाँटा।
"वो मान नहीं रही. " मैने लाचारी दिखाई।
" मत मानना मीनल;" इस बार जिग्नेश भी मेरे खिलाफ था।
मीनल ने एक नज़र मुझे देख के अपनी भौहें उचका के मुह टेढ़ा कर लिया तो मुझे फिर हंसी आ गयी।
सबने मुझे घूरा तो मैं फिर सॉरी कह के चुप हो गया. " चलो भाई उठक बैठक करो हमारे सामने. तब माफ करेगी मीनल" जिग्नेश मीनल को देख के इशारा करते हुए बोला।
"और हर बार आई एम सॉरी भी बोल" कस्तुभ ने सज़ा बढ़ा दी।
"लेकिन आज मेरा जन्मदिन है ना!! मैंने याद दिलाया.
"इसी खुशी में तो कम सज़ा मिल रही है. " जिग्नेश और कौस्तुभ ने ताली बजायी और मीनल ने हंसी दबा ली ।
अब मैं आई एम सॉरी कहते हुए उठक बैठक कर रहा था और मीनल खूब खिलखिला कर हंस रही थी. मेरे पक्के दुश्मन- दोस्त चिल्ला चिल्ला कर गिनती कर रहे थे।
हमे महाबलेश्वर निकलना था,जिग्नेश और कौस्तुभ ने अपने खरीदे हुए कपड़े मुझे पहनाए. नीली डेनिम शर्ट के साथ क्रीम रंग का ट्राउज़र;फिर मुझे चिढ़ाने के लिए औरतों के जैसे मेरी नज़र उतारने लगे।
"क्या कर रहे हो छोड़ो मुझे.." मैं उन्हें धक्का दे कर बोला।
"तुझे क्या पता कल तुझे लोग कैसी हवस भारी नज़रों से देख रहे थे.." कौस्तुभ बोला।
"शरम कर" मैंने हंसते हुए कहा।
भाई जिग्नेश तू बता, लोग कैसे देख रहे थे इसे, और मॉल में वो दो लड़कियां. याद हैं ना।
जिग्नेश ने मुस्कुरा कर हां में सिर हिलाया, दोनों मेरी टांग खींच रहे थे।।
"मैंने भी देखा था" पीछे से मीनल बोली।
हम तीनों हैरान रह गए;
"क्या!!. तुम हो ही इतने प्यारे कोई भी देखेगा ही. " वो मेरे गाल खींचते हुए बोली।
मीनल ने नीली जीन्स और सफेद हाफ बाजू की टी शर्ट पहनी थी, बाल उसने खुले ही रखे थे आज. मुझे और क्या चाहिए था। लेकिन वहां ठंड होगी और मीनल को आदत नहीं, मेरे पास उस के नाप का जैकेट भी नही था, मैं सोच में पड़ गया।
खैर!! हम चारों निकल पड़े. आज मुझपे तरस खा के मीनल को आगे बिठाया गया था. मैं उसकी सीट बेल्ट लगाने को झुका लेकिन फिर पीछे हट गया, मीनल मुझे देखने लगी.. तो मैंने सीट बेल्ट का इशारा किया. और अपनी सीट बेल्ट धीरे से लगाने लगा..मीनल ने मुझे देखते हुए अपनी सीट बेल्ट लगा ली, हम दोनों एक दूसरे को देख के मुस्कुराये और मैंने कार चला दी।
मैंने रास्ते मे एक दुकान में कार रोकी और दो मिनेट में आने का कह के उतर गया. थोड़ी देर बाद मैं 2 थैलों के साथ कार में था।
"क्या है दिखा जल्दी;"मोटू चिल्लाया।
मैंने थैले पीछे फेंके और इशारे से चुप रहने को कहा। मीनल खोयी हुई बाहर देख रही थी। गाने चला के मैंने कार चलाई, और हम चल पड़े एक खूबसूरत सफर की ओर।
"छूटेया ना छूटे मोसे रंग तेरा डोलना,
इक तेरे बाजो दूजा मेरा कोई मोल ना,
बोलना माहि बोल ना
तेरे संग हँसना मैं, तेरे संग रोना
तुझमें ही रहना मैं,तुझमें ही खोना
दिल में छुपा के तुझे दिल नियो खोल ना
मरके भी माही तोसे
मुँह नहीं मोड़ना…
मैं गाने के साथ मीनल को देख के गुनगुनाने लगा; कितना हसीन था सब, जब तक मोटू बदतमीज़ चिल्लाया नहीं।
"करा दे!! एक्सीडेंट करा ही दे मेरा. शादी भी नही हुई मेरी अब तक;ऊपर से ये बोरिंग पंजाबी गाने;" कभी कभी मुझे लगता है कि कौस्तुभ ही मेरी मम्मी की असली औलाद है।
"तो कौन सा गाना बजाऊं?? . ओढ़नी ओढूं ओढूं पर उड़ी जाए. " मैं चिल्लाया। मीनल हंसने लगी।
"इसमे हंसने वाली कौन सी बात है. " मैंने मीनल को घूरा तो वो मुस्कुराते हुए ही खिड़की से बाहर देखने लगी।
मुझे पता नहीं चल रहा था लेकिन मैं धीरे धीरे वापस वो ही पुराना निशांत बन रहा था; शायद ये सभी महसूस कर रहे थे और खुश थे।
"भाई आप और मीनल पीछे बैठ जाओ; मैं ड्राइव करता हूँ. " हमारी टीम का सबसे शांत बंदा जिग्नेश बोला।
मुझे पीछे बैठना पसंद नहीं, लेकिन अब मैं और मीनल पीछे की सीट में एक एक खिड़की से चिपके नज़र आ रहे थे. कौस्तुभ ने काला चश्मा पहनते हुए मुझे देख के अपनी जीत का एहसास दिलाया और मैंने मुह टेढ़ा कर दिया।
" अपने बोरिंग गाने बजाए न!! , तो मैं यही उत्तर जाऊंगा. " मैं मोटू को देख के दहाड़ा.
"रोका किसने?? दरवाज़ा तेरे बगल में ही है. " मोटू का उड़ता तमाचा मुझे लगा।
मीनल फिर हंसने लगी. मैं उसे देखने लगा. फिर हम चारों ही हंस रहे थे।
मैं कभी बाहर देखता तो हवा से अपने बाल सम्हालते हुए बाहर के नजारों में खोयी मीनल को. मेरे लिए तो दुनिया की सारी खूबसूरती मेरे बगल में थी।
जिग्नेश सबका खयाल रखते हुए गाने बजा रहा था. एक जगह मीनल खिड़की से बाहर हाथ निकाल कर हवा को महसूस करने लगी; तो जिग्नेश ने मुझे आवाज़ दी और शीशे पे देख कर इशारे से ही मीनल पे ध्यान देने को कहा;
मैं मीनल के पास खिसक के बैठ गया , मुझे अपने पास देख के मीनल थोड़ा असहज हुई.. लेकिन मैंने उसके हाथ पे हाथ रख के उसे आश्वस्त किया।
"बाहर की हवा महसूस, करनी है मीनल?? मैंने पूछा तो वो खुशी से मुझे देखने लगी।
मैंने पीछे देखा तो आस पास कोई गाड़ी नहीं थी. जिग्नेश ने मेरा इशारा मिलते ही कार थोड़े और कोने पे कर दी ताकि कोई गाड़ी उस तरफ से ना जा सके. फिर मैंने मीनल को सहारा दे खिड़की से बाहर झांकने को कहा. मीनल ने खिड़की बाहर लटक के अपने हाथ फैला लिए. आगे कौस्तुभ भी निकल गया और जिग्नेश ने कार धीमी कर दी।
"हम जो चलने लगे, चलने लगे हैं ये रास्ते
आ हा हा मंजिल से बेहतर लगने लगे हैं ये रास्ते
आओ खो जाएँ हम, हो जाएँ हम यूं लापता
आओ मीलो चलें, जाना कहाँ न हो पता
हम जो चलने लगे, चलने लगे हैं ये रासते;"
जिग्नेश ने गाना चला दिया, मैंने मीनल को पीछे से पकड़ा हुआ था. उसे इन सब का अनुभव नहीं था.. और मेरे लिए वो किसी मासूम बच्चे की तरह थी जिसका हर पल खयाल रखना होता है। उसकि खिलखिलाहट कानों में मिश्री की तरह घुल रही थी. कौस्तुभ और मीनल एक दूसरे को चिढ़ाते हुए तो कभी हाथ पकड़ कर साथ चिल्लाते.
मैं और जिग्नेश मुस्कुराते हुए दोनो को देख रहे थे.
ज्यादा ठंड होने पर मैंने मीनल को अंदर किया. और कौस्तुभ को भी सीट पे बैठने को कहा।
मीनल ने बच्चों की तरह मुह बनाया, उनका मन नहीं भरा था। मैंने उसके चेहरे वे गौर किया तो देखा कि ठंडी हवा के कारण उसका चेहरा गुलाबी हो गया था और बाल बिखरे हुए थे. मुझे उसकी खूबसूरती पे प्यार भी आया और उसकि हालात देख कर हंसी भी आयी।
मैंने अपनी अंगुलीयों से उसके बाल थोड़े बहुत सुलझाते हुए ठीक किये. उसके बिना वैक्स के हाथों के रोएं ठंड से खड़े हो गए थे. मेरी नज़र पड़ी तो मैं बहुत हंसा. सब पूछते रहे लेकिन मैं कुछ कह नहीं पाया. मीनल समझ गयी तो उसे बुरा लगा,वो चुपचाप मुँह नीचे कर के बैठ गयी। मैंने गौर किया तो उसकी आंखें भर आयी थी. मुझे खुद पर बहुत गुस्सा आया।
मैंने उसका चेहरा ऊपर कर के उसकी आंखें पोछि. फ़िर अपने हाथ आपस मे रगड़े और गर्म हथेलियों को उसके चेहरे पे रखा।
"तुम जानती हो मीनल. तुम दुनिया की सब से अच्छी लड़की क्यों हो?" ये सुन कर मीनल मुझे देखने लगी..
मैं उसकि आंखों में झांकते हुए बोला "क्यों कि तुम बनावटी नहीं, तुम जैसी हो, वो ही दिखती हो. कोई मुखौटा नहीं. लड़कियां अपने बॉयफ्रेंड से मिलने जाने पर कितना सजती धजती हैं. लेकिन तुम जैसी हो वैसी आयी; बिल्कुल सच्ची और साफ मन की. "
मीनल की आंखें फिर गीली हो गयी. मैंने अपना एक हाथ उसके पीछे से ले जा कर उसके कंधे पे रखा और उसे खुद से सटा लिया; फिर अपनी गरम हथेलियों को उसके हाथों पे फेरा, जिस से उसे कुछ गर्माहट मिली।
थोड़ी देर में हम महाबलेश्वर में थे; प्रकृति की इतनी सुंदर रचना देख कर हम सभी चकित थे. चारों तरफ हरे नीले पहाड़ फैले थे. और उनसे आती धुन्ध हमें नम कर रही थी. ।
मैंने थैलों से डेनिम जैकेट निकाल कर जिग्नेश और मीनल को पहनने को दिया, कौस्तुभ मुँह न फुला ले इसके लिए उसे रुमाल दिया।
"मेरे लिए रुमाल क्यों" वो गुस्से में बोला।
" नाक पोछने के लिए. " अबकी कौस्तुभ को छोड़कर सब हंस रहे थे।
हम खूब भागे. साथ चिल्लाए. आस पास चाय बेचने वालों से चाय ले कर पी. दोस्तों के साथ कहीं घूमने का अलग ही मज़ा होता है।।
हम महाबकेश्वर के कई मशहूर हिस्सों में घूमे, मैं मीनल का हाथ पकड़े उसे सब दिखाता रहा. अंत में एक पहाड़ी के कोने पे आ कर हम खड़े हो गए और देखने लगे;
मीनल को शायद गहराई का अंदाजा नहीं था तो वो नीचे झांकने लगी. हम में से किसी ने ध्यान नहीं दिया कि वो क्या कर रही है. अचानक अपने हाथ में खिंचाव होने पर मैंने देखा तो मीनल लगभग नीचे की तरफ लटकी हुई थी, अगर मैंने उसका हाथ पकड़ा हुआ न होता तो वो गिर जाती।
ये नज़ारा देख कर मैं घबरा गया और मीनल की बेवकूफी ओर गुस्सा आया तो उसे पीछे खींचा और चिल्लाने लगा।
"दिमाग खराब है गिर गयी होती तो?; अकल है या नहीं तुम्हारे पास. क्या जवाब देता मैं सब को??. " मीनल डर से काँपने लगी.. उसकी इस तरह से बेइज़्ज़ती होने पर किसी को अच्छा नहीं लगा. मीनल की आंख से आंसू आ गए और कौस्तुभ मुझे डांटने लगा;
लेकिन जिग्नेश ने उसे रोका और अपने साथ ले गया. अब मैं और मीनल अकेले थे.. मीनल का इन तरह से रोना मुझे बहुत खल गया, मैं भी न ज्यादा ही गुस्सा कर जाता हूं।
मैं मीनल के पास उसे पकड़ने के लिए बढ़ा लेकिन उस ने गुस्से से मेरा हाथ झटक दिया, मैंने एक बार फिर कोशिश की लेकिन परिणाम वही रहा।
मन नहीं था लेकिन जबरदस्ती करनी ही पड़ी, मैंने मीनल के दोनों हाथों को अपने दोनों हाथों से कस के पकड़ा और अपने हाथ उसकी कमर पे रख दिये. हाथ पीछे हो जाने के कारण वो मेरे बहुत करीब हो गयी थी, गुस्सा इतना थी कि अब भी हाथ छुड़ाने की पूरी कोशिश कर रही थी. मैं उसकि इस नादानी पे मुस्कूराये बिना न रह सका।
उसके दोंनो हाथों को अपने एक ही हाथ मे कर के मैंने दूसरे हाथ से उसके बाल उसके कान के पीछे किये और बोला "इतनी नाराजी. वो भी मुझसे. ?? देखो लड़ भी नहीं पा रही ठीक से;" उसने अपने हाथ छुड़ाने की कोशिश करते हुए मुझे गुस्से से देखा तो मैंने अपना एक कान पकड़ लिया।
मीनल गुस्से से दूसरी तरफ देखने लगी. तो मैंने उसे खुद के और करीब कर लिया " अब कहाँ देखोगी. बोलो? "
वो कुछ नहीं बोली और गुस्से में उसकी साँसे तेज़ हो गई. मुझे वो एहसास फिर बेचैन कर गया. धड़कने दौड़ लगाने लगी. मैंने बिना जाने ही दूसरे हाथ से भी उसे कस लिया और उसके चेहरे की तरफ झुकने लगा।।
मुझे न जाने क्या हो गया था. लेकिन मैं कुछ गलत करता उस के पहले ही पापा मम्मी की हिदायतें कानों में गूंजने लगी;
मैं अपनी हरकत पे शर्मिंदा हो गया, मुझे माफ़ कर दो मीनल. कहते हुए मैंने उसे छोड़ दिया.. और नज़रें नीची कर के उस से दूर जा कर खड़ा हो गया। खुद पे बहुत गुस्सा आ रहा था, आज मैं मीनल, पापा और मम्मी के साथ खुद का भरोसा भी तोड़ने वाला था।
मीनल को पीछे मुड़ के देखने की हिम्मत भी नहीं थी, "चलो निशांत" कहते हुए मीनल मूझसे आगे बढ़ी और मैं उसके पीछे हो लिया।
हमे इस तरह से आते देख दोनो दोस्तों ने सिर पीट लिया
"तुझसे माफी भी ठीक से मांगी नही जाती. इतना अकड़ू क्यों है तू?" कौस्तुभ ने डाँटा।
"वो मान नहीं रही. " मैने लाचारी दिखाई।
" मत मानना मीनल;" इस बार जिग्नेश भी मेरे खिलाफ था।
मीनल ने एक नज़र मुझे देख के अपनी भौहें उचका के मुह टेढ़ा कर लिया तो मुझे फिर हंसी आ गयी।
सबने मुझे घूरा तो मैं फिर सॉरी कह के चुप हो गया. " चलो भाई उठक बैठक करो हमारे सामने. तब माफ करेगी मीनल" जिग्नेश मीनल को देख के इशारा करते हुए बोला।
"और हर बार आई एम सॉरी भी बोल" कस्तुभ ने सज़ा बढ़ा दी।
"लेकिन आज मेरा जन्मदिन है ना!! मैंने याद दिलाया.
"इसी खुशी में तो कम सज़ा मिल रही है. " जिग्नेश और कौस्तुभ ने ताली बजायी और मीनल ने हंसी दबा ली ।
अब मैं आई एम सॉरी कहते हुए उठक बैठक कर रहा था और मीनल खूब खिलखिला कर हंस रही थी. मेरे पक्के दुश्मन- दोस्त चिल्ला चिल्ला कर गिनती कर रहे थे।