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Romance स्वप्न सुंदरी (नई जिंदगी की ओर)

काफी देर तक हम ऐसे ही खड़े रहे, मुझे वक़्त का भी ध्यान था इसलिए मैं उसे अपने सीने से लगाये ही सब समझाता रहा, और वो किसी मासूम से बच्चे की तरह हांमी भरती रही।

मैंने उसे सोफ़े पे बिठाया और उस के बालों से बैंड निकाल के उसे देते हुए बोला "मेरे सामने ऐसे ही रहा करो" उसकी आँखों में आज शरम के साथ एक चमक, थी जो मुझे बहुत अच्छी लगी।

फ़िर मैंने जिग्नेश से कुछ खाने को मंगा कर मीनल को अपने हाथों से खिलाया। मैंने खुद को पूरी तरह नियंत्रित किया हुआ था ताकि कमज़ोर न पडूँ।

मैंने मीनल को ऑटो में बिठा के भेजा और थोड़ी देर में दूसरे ऑटो से घर आ गया।

सब से बात करते करते वक़्त बीत गया और मेरे जाने का समय भी हो चला, मेरे जाने के पहले पापा आ चुके थे। मैंने उन्हें एयरपोर्ट चलने से मना किया और कैब बुक करा ली। अपने कमरे में जब समान लेने गया तो मीनल के घर को एक नज़र देखा आपने आंसुओं को रोक के मुड़ने ही लगा था कि उसके कमरे की खिड़की पे वो हमारे ही घर की तरफ देखती हुई नजर आयी।

मैंने उसे फोन किया तो पहली ही घंटी में उस ने उठा लिया "मीनल मुझे हंस के विदा करो. ऐसे कमज़ोर नहीं होना. मैं हमेशा के लिए थोड़े ही जा रहा हूँ. " मैंने उसे अपने आंसू पोछ के मुस्कुराते हुए देखा।

"मीनल सामने देखो मैं खड़ा हूँ. " फ़िर न वो बोली न मैं. कुछ देर एक दूसरे को देख कर मैंने घड़ी देखी और कहा

" अब चलता हूँ; फिर मिलेंगे" और नीचे आ गया।

कैब आ गयी थी सामान रखते हुए मैं एक नज़र मीनल की तरफ देख लेता।

सबके पर छू के और जल्दी आने का वादा कर के मैं कैब में बैठ गया, मीनल को देखा और मुस्कुराने का इशारा किया तो उसने फ़िर आँसू पोछे और मुस्कुरा के हाथ हिलाया। मैं उसे देखता हुआ आगे बढ़ गया लेकिन मेरी ज़िंदगी वही रुक गयी मीनल के पास।

सीने के दर्द दूरियों के साथ बढ़ता ही रहा, मैंने अपना सिर सीट से लगा के आंखें मूंद ली और इस दर्द को जीने लगा, आँसू बेवजह ही आँखों के कोने से बाहर आने लगे।

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मैं चला तो आया लेकिन खुद को पीछे छोड़ आया था और साथ ले आया था मीनल की आंखें, उसकी घबराहट, उसकी मासूमियत और उसकी खिलखिलाहट;

बैगलोर उतरते ही बीती सब बातें एक सपना लगने लगी, जैसे मैं कहीं गया ही नही. वो ही भीड़ ,वो ही भागदौड़. कुछ भी तो नहीं बदला था अगर कोई बदला भी था तो वो मैं था।

अपने फ्लैट में पहुँचते ही दरवाजा खोला तो देखा सामने मोटू लैपटॉप पे कोई मूवी देख रहा है और लगातार कुछ न कुछ खाये जा रहा है।

मुझे देखते ही उसने तकिया उठा के मेरे ऊपर फेंक दिया।

"स्साले परफेक्ट.!! ये है तेरा परफेक्शन; एक बार भी फ़ोन कर के बताना ज़रूरी नहीं समझा के कब निकलेगा या मैं कब पहुँच रहा हूँ"

मैं मुस्कुरा के उस के पास गया और कहा " सॉरी यार ध्यान नहीं रहा"

कौस्तुभ को मेरे हृदय परिवर्तन से तगड़ा झटका लगा "क्या हुआ तबियत तो ठीक है. तूने उल्टा बहस नहीं की;"

"नहीं यार तू भी क्या बात करता है, इंसान के अंदर थोड़ा पेशेंस होना चाहिए.." ये सुन के उस का मुँह खुला का खुला राह गया।

"जल्दी बता कौन है वो. ?" वो लगभग मेरे ऊपर कूद गया, और मैं शरमा गया।

"भाई तू शरमाता भी है. तुझे कोई परफेक्ट लग गया. स्ट्रेंज.. शादी कब करेगा. इंगेजमेंट कब है. भाभी से बात करा. फ़ोटो दिखा जल्दी से।"

"रिलैक्स मोटू. ऐसा कुछ भी नहीं . मुझे तो परफेक्शन का मतलब भी अब समझ आया जब उस से मिला;" फिर मैंने उसे संक्षेप में सब बताया।

मैंने उसे अपनी सेल्फी दिखाई. वो बहुत देर तक फ़ोटो देख के सोचता रहा. फिर बोला" तू सच मे इस से शादी करेगा न, ये तेरी सोच जैसी तो बिल्कुल नहीं. "

"ह्म्म्म इसी लिए मैंने अपनी सोच बदल दी"

" आज तूने पहली बार कोई सही डिसिशन लिया है, मैं तो तेरी सोच वे डरता था कि कैसी लड़की से शादी करेगा।"

मोटू ने फिर एक बार सेल्फी देखी और पूछा "इसका कोई जुड़वा भाई भी है क्या??",

" नहीं क्यों.."

" क्योंकि लास्ट टाइम जब मैं मुम्बई गया था तब जिस लड़के से मेरा बैग एक्सचेंज हो गया था ,उसका चेहरा काफी कुछ इस के जैसा था. "

"ये एकलौती है. छोटा भाई था जो कि माँ बाप के साथ ही गुज़र गया।

"चल कोई नहीं, सब के वैसे भी 7 हमशक्ल होते हैं" इतना कह के वो हंस दिया।

मैंने मम्मी पापा को फ़ोन किया उस के बाद मीनल का नंबर डायल किया लेकिन फिर फ़ोन काट दिया, पता नहीं उसकी दादी आस पास हो तो बखेड़ा खड़ा हो जाएगा।

बहुत सोच के मैंने उसे व्हाट्सएप पे एक मैसेज किया कि मैं पहुँच गया और वो भी टाइम से जिग्नेश के पास चली जाए। उसका कोई रिप्लाई नहीं आया. मैं फोन देख देख कर करवटें लेकर कब सो गया पता ही नहीं चला।

सुबह उठते ही फ़ोन देखा तो उसका रिप्लाई आया था; सिर्फ़ ओके..इतने से मैसेज से मेरा क्या होता। टाइम देखा तो 12:45 पे रिप्लाई किया था, इतनी लेट. !! क्या वो भी मुझे याद कर रही होगी??

खैर! मैं तैयार हो के जिम चला गया और वहां से आने के बाद ऑफिक के लिए निकल गया।

मोटू मेरे साथ ही जाता था उसका ऑफिस मेरे ओफिस के बिल्कुल पास ही था इएलिये उसे ऑफिक छोड़ने की ड्यूटी मेरी थी , कार चलते ही उसने अपनी ग़ज़ल चला दी।

तमन्ना फ़िर मचल जाए अगर तुम मिलने आ जाओ

ये मौसम भी बदल जाये अगर तुम मिलने आ जाओ।।

नहीं मिलते हो तुम तो सब हमदर्द हैं मेरे

ज़माना मुझसे जल जाए अगर तुम मिलने आ जाओ।

मेरी आँखों के आगे मीनल का चेहरा घूम गया.. कितनी सुकून से जिंदगी चल रही थी और फिर मुझे प्यार हो गया।

मेरा चेहरा लटक गया तो कौस्तुभ अपनी गलती समझ गया "ओह सॉरी यार, बंद करता हूँ ग़ज़ल;"उसने म्यूजिक सिस्टम की तरफ हाथ बढ़ाया ही था कि मैंने टोक दिया।

"नहीं यार बजने दे अच्छा लग रहा है. " मोटू पता नहीं क्यों हंसने लगा, मेरे गुस्सा होने के बाद भी वो चुप नहीं हुआ।

उसका ऑफिक आया और मैंने उतर जा अभी बोल के उसे धक्का दिया। वो उतरने के बाद भी हंसता हुआ चला गया।

मैं आज कल हंसी का पात्र बनता जा रहा था।

ऑफिक में मुझे बगल की सीट में एक नई लड़की दिखी तो मैंने पूछ ही लिया, उसने बताया कि मेरे प्रॉजेक्ट में नई आयी है, इस के पहले दुसरे फ्लोर पे थी किसी और प्रोजेक्ट में.

पता नहीं क्यों. लेकिन वो मुझे मीनल की याद दिला रही थी। घबरायी सी कॉरपोरेट जगत की लड़कियों से अलग, साधारण पहनावा. मैं कुछ देर उसे देखता रहा, वो प्रोग्रामिंग ऐसे कर रही थी जैसे पहली बार कर रही हो, काफी सहमी सी थी।

"क्या हुआ. यू ओके?? मैंने पूछ ही लिया।

उसने न में गर्दन हिला दी, तो मैं उसकी सीट के पास खड़ा हो कर उसके कंप्यूटर में देखने लगा और वो बुरी तरह घबरा गई। उसका ये व्यवहार मुझे अजीब लगा. ख़ैर, उसने काफी गलतियां की थी जो मैंने सुधारी और ध्यान से काम करने का बोल कर अपने काम मे लग गया।

कुछ अंदेशा होने पे मैने उसकी तरफ देखा तो पता चला कि वो मेरी ही तरफ देख रही थी, मेरे देखते ही पलट गई; "नाम क्या है तुम्हारा?? इतना घबरायी हुई क्यों हो तुम आखिर. औऱ मुझे क्यो देख रही थी??" मैंने अपने ही नदाज़ में उस से पूछा"

"आद्या.. वो सिर झुका के बोली.. वो ऑफिक में सब ने कहा था कि आप बहुत गुस्से वाले हैं तो. " वो आगे नहीं बोल पायी.

"मेरे गुस्से से तुम्हारे काम का क्या मतलब आद्या?" और हां कंप्यूटर मेरे मुह पे नहीं लगा. तुम्हारी सीट पे है.… ध्यान से काम करोगी तो कोई गुस्सा क्यों करेगा भला"

"खड़ूस" वो धीरे से बोली. मुझे मीनल की याद सताने लगी.. लेकिन उस के सिवा कोई और ऐसा बोले मैं कैसे सह लेता।

" आज बोल दिया आइंदा से सोच समझ के बोलना मुझसे" मैंने उसे आंखें दिखाई, उस के बाद उसने पलट के नहीं देखा, लेकिन कुछ तो था जो छुपा रही थी. देख लूंगा मैं जो भी हो ।

मैंने फ़ोन देखा तो मीनल का मैसेज था " आपका मैसेज नहीं आया"। अब उसके ओके का मैं क्या रिप्लाई करता, "जब भी फ्री रहो मुझे मिस कॉल दिया करो, मैं सीधे फ़ोन करूँगा"मैंने मैसेज किया और अपना काम करने लगा।

लगा कि वो मेरा ही इंतेज़ार कर रही हो तुरंत ही कॉल आ गयी.. और मेरा चेहरा खिल उठा।

"हेलो.."

थोड़ी ख़ामोशी के बाद मीनल ने कैसे हो पूछा।

तुम्हारे बिना कैसा होऊंगा?? मैने भी सवाल किया।

आद्या ने सुन लिया और फ़िर मुझे देखने लगी जैसे मैंने कोई अपराध कर दिया हो।

" व्हाट??

एकांतता बहुत पसन्द है मुझे मेरी, न मैं किसी की निजी जिंदगी मे झांकता हूँ न किसी को अपने लिए इस कि इजाज़त देता हूँ ;" मैंने फोन पे हाथ रख के आद्या से कहा और वहां से चला गया।

" बोलो मीनल;"

"वो. मीनल की आवाज़ भारी हो गयी"

"मीनल. तुम अगर कमज़ोर पड़ गयी तो कैसे होगा? " मैंने वास्तव में ये बात खुद के लिए कही क्यों कि मैं खुद को कमज़ोर महसूस करने लगा था।

" दादी; उन्हें शक हो गया है कि मैं झूट बोल के एडमिशन ले रही हूँ. मैं आज जिग्नेश के पास शायद न जा पाऊ"

कोई मेरी मीनल के सपनो के साथ खिलवाड़ करे ये मैं कैसे सह लेता. "

"मीनल मुझे विस्तार से बताओ;'

तो मीनल ने बताया कि दादी को किसी ने ये सब समझाया कि किसी ऑफिस के काम के लिये एनीमेशन सीखने की ज़रूरत नहीं, मैं उन्हें झूट कह रही हूँ;दादी बहुत नाराज है"

मीनल ने तो नाराज़ हैं कह के टाल दिया लेकिन मैं समझ गया था कि कितना तमाशा हुआ होगा।

मैंने मीनल से बहुत जानने की कोशिश की कि किसने उन्हें भड़काया लेकिन मीनल अनजान बनती रही।

" मीनल, तुम परेशान मत हो, तुम्हारी दादी तुम्हे भेजेंगी. तुम आराम करो. बाकी मुझ पे छोड़ दो समझी।।..अब मुस्कुराओ. "

" निशांत. !!"

"बोलो मीनल. " मैं तो चाहता था कि वो दिल की बात कहे।

"वो. तुम; तुम कब आओगे?" ये सुनते ही मेरी खोयी मुस्कुराहट वापस लौट आयी।

" जब तुम कहो;" मीनल चुप हो गयी ,शायद शरम आ गयी उसे।

" खाना खाया तुमने?. " मुझे याद आया तो पूछा मैंने।

जवाब में वो, मैं, आ, के सिवा कुछ नहीं मिला मैं समझ गया तो उसे थोड़ी देर में बात करने का बोल के फ़ोन काट दिया।
 
सुबह से वो भूखी थी, मेरा मन खराब हो गया. कैसे ये वक़्त कटेगा कैसे मीनल को उस नरक से मुक्ति मिलेगी।

मैंने जिग्नेश को फ़ोन मिला के सब बताया और उसे पापा से बात कर के मीनल की दादी को किसी तरह समझाने को कहा, फिर पापा को फ़ोन कर के सब बताया और ऑफिस के काम के बहाने सब से पहले मीनल को कुछ खिलाने को बोल के मैं सीट पे आ गया।

किस का काम हो सकता है ये मुझे समझ नहीं आ रहा था, नव्या तो अब ऐसा नहीं करेगी मुझे उम्मीद थी। खैर मैं निश्चिंत था कि दादी को पापा और जिग्नेश बड़े आराम से समझा लेंगे।

मेरा मन नहीं लगा, तो मैंने मोटू को फ़ोन किया ,

" हेलो फ्राइडे नाईट का करा दे;"

"इतनी जल्द क्यों;और रिटर्निंग" उसका सवाल आया।

" संडे" इतना कह के मैंने फ़ोन रख दिया।

फिर मैंने खुद को काम मे पूरी तरह डुबो लिया, शाम को सिगरेट के लिए उठा तो पापा और मीनल डराने लगे, मैंने जा के चाय पी फिर अपनी सीट पे आ के सारे पेंडिंग काम निपटाए।

रात को घर जाते समय पापा और जिग्नेश से बात कर के पता चला अब सब ठीक है. दादी को समझा दिया गया है।

मेरा मन थोड़ा शांत हुआ सब सुन के दूर रह के मीनल के लिए कुछ भी कर पाना आसान नहीं था।

कौस्तुभ के कहने पे भी मैंने खाना नहीं खाया, पता नहीं क्यों मुझे भूख नहीं लगी, मैं बार बार फ़ोन देख रहा था, अजीब सी बेचैनी ने मुझे घेरा हुआ था।

तमन्ना फिर मचल जाए अगर तुम मिलने आ जाओ बहुत ही गंदी आवाज़ में मोटू ने गाना गाया, कसम से मेरा खून खौल गया.." अब भाभी फ़ोन से नहीं निकल के आएंगी" इतना कह, के वो रावण की हंसी हंसने लगा। मैं उसका मर्डर करने जा ही रहा था कि मीनल का फोन आ गया. मैं भाग के दूसरे कमरे में गया और फ़ोन उठाते ही कहा "मन नहीं लग रहा मेरे बिना?" सच तो ये था मैं उस से बात करने के लिए बेचैन था।।

वो चुप रही मैं बस उसकी साँसों की आवाज़ मेरे कानों से होते हुए मेरे दिल को भेद रही थी।

"मीनल. मुझे बहुत अच्छा लगेगा अगर तुम कुछ बोलोगी"

"थैंक यू निशांत. वो भर्राई हुई आवाज़ में बोली"

"मीनल क्या इतना ही रिश्ता है हमारा; तुम थैंक यू कह के मुझे पराए लोगों में शामिल कर देती हो"

"तुम बहुत अच्छे हो निशांत;"

"सिर्फ तुम्हारे लिए मीनल वर्ना मैं बिल्कुल अच्छा नहीं. और मैं तो खड़ूस हूँ न" मैंने उसे चिढ़ाया, लेकिन वो नहीं हंसी।

"मीनल;! एक बात पूछूं तुमसे??"

"पुछो. ?"

"क्या तुम्हें भी मेरे पास आने का मन होता है?. आई मीन जितना मैं तुम्हे मिस करता हूँ उतना ही?"

मुझे फ़िर से सिर्फ़ साँसों की आवाज़ आयी. मैंने आगे बोला

"मीनल मैं सच में तुम्हे महसूस कर रहा था कल; कोई योगा नहीं था; तुम मेरे लिए बहुत खास हो मीनल. तुम समझती हो ना!!". उसकी साँसों की आवाज़ बढ़ चुकी थी।

और मुझे एक बेचैनी और सुकून का एहसास एक ही साथ हुआ।

मीनल का ना बोलना भी बोलने जैसा लग रहा था;दूरियां कम लग ही रही थी कि मेरे दरवाज़े पे मोटू ने जोर जोर से दस्तक दी और गाने लगा "ज़माना मुझ से जल जाए अगर तुम मिलने आ जाओ" मीनल तक आवाज़ पहुच चुकी थी और वो हंसने लगी।

सच ने भगवान ने दोस्त सिर्फ आपकी बेइज़्ज़ती के लिए ही बनाये हैं. "मोटू!!" मैं चिल्लाया. मीनल को सोने के लिए कह के मैं मोटू के पास गया, बहुत घमासान के बाद दोनों थक के सो गए।

दो दिन ऐसे ही गुज़र गए, मेरी हालत देवदास जैसी होती जा रही थी. हम IT वालों का यही है दिन भर किसी कोल्हू के बैल की तरह काम करो रात को थक के सो जाओ; लेकिन मैं तो सो भी नहीं पा रहा था. शुक्रवार को जिग्नेश ने फ़ोन कर के बताया कि मीनल को इंस्टीटूट ले के गया था, मीनल बहुत सहमी थी, उसके काम की तारीफ के बावजूद वो ठीक से बात नहीं कर पाई और उसे अपनी अंग्रेजी भी ठीक करनी पड़ेगी।

ये वो ही मीनल थी जो बचपन मे हर चीज़ में अव्वल थी, बिना कोचिंग के मेडिकल एग्जाम निकाला, वक़्त सब को क्या से क्या बना देता है।

मैने जिग्नेश को काफी कुछ समझा के फ़ोन रखा. " मीनल तुम्हें अगर मैंने आत्मविश्वास से न भर दिया तो कहना; और ये सब करने के बाद ही मैं तुम्हें शादी के लिए पूछूंगा..फिर चाहे कितना भी इंतेज़ार करना पड़े।" मैंने सोचा और अपने काम मे लग गया।
 
अगले दिन सुबह 9 बजे मीनल घर से निकली, ऑटो खोज ही रही थी कि एक कार उस के आगे रुकी और ड्राइवर ने उतर के उसे कहा "बैठिए मैडम आपको हमारे साथ चलना है।"

मीनल घबरा के दो कदम पीछे हो कि बोली "नहीं मैं ऑटो से जाउंगी"

"साहब ने कहा है कि आपको चलना है. इतना कहते ही उसने पीछे का दरवाजा खोला;"

मीनल ने पीछे की सीट पे देखा और उसके हाथ से सामान छूट गया और वो बोली "तुम!!"

"हाँ मैं. !" कहते हुए मैंने अपना हाथ उस की तरफ बढ़ाया. " मेरे साथ सफर करना पसंद करोगी" मैं मुस्कुराया..औऱ उसने न कहते हुए अपने आंसू पोछ लिए।

मैं नीचे उतरा फिर उसका समान उठाया , चलें मीनल मैंने कहा और वो मुझे देखती रही जैसे मैं सच मे नहीं बल्कि उसका वहम हूँ.

मैंने उसका हाथ थाम के गाड़ी का दरवाजा पकड़ा.." बैठो मीनल" कह के मैंने उसे बिठाया और दूसरी तरफ से जा के मीनल से थोड़ी दूरी बना के बैठ गया। मीनल अब भी मुझे उसी तरह देख रही थी, उसकी आँखों के बहते आँसू उसकी खुशी बता रहे थे. मैंने ड्राइवर से चलने के लिए कहा। मीनल के मन मे खुद के लिए इतना इंतेज़ार, इतनी तड़प देख के मुझे एहसास हो गया कि वो भी मुझे प्यार करती है। मैंने पहला पड़ाव इस रिश्ते का पार कर लिया।

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मीनल को ले कर मैं जिग्नेश के पास गया तो वो मुझे देखते ही बोल पड़ा "भाई क्या हालत बना ली आपने अपनी. ऐसे कैसे चलेगा" ।

यहां से जाने के बाद मैं खाना पीना, शेव करना तक भूल गया था. मेरे चेहरे की बढ़ी दाढ़ी सब बता रही थी. मीनल अब भी मुझे उसी तरह देख रही थी।

जिग्नेश ने हमे कुछ देर अकेला छोड़ना बेहतर समझा और चला गया. और हम खामोश एक दूसरे को देखते रहे, अब मुझे मीनल ख़ुश न हो कर कुछ उदास लगी. मैं समझ नहीं पाया तो पूछा.

" नाराज़ हो!!"

"अपने आप से. "

" क्यों मीनल ऐसा मत कहो. खुद से नाराजगी क्यों. "

" तुम नहीं समझोगे निशांत. तुम मेरी जगह नहीं ना इस लिए. वैसे तुम कब आये. " मीनल की प्रतिक्रिया बहुत ठंडी थी।

" मीनल!! मैं यहां हूँ ये बात सिर्फ़ तुम, कौस्तुभ और जिग्नेश जानते हैं, होटल में रुका हूँ. कल रात चला जाऊंगा. " मैं थोड़ा अपराधबोध में था, पहली बार मम्मी पापा से छुप के कुछ किया था।

" निशांत! एक वादा करो मुझसे;"

"ह्म्म्म"

"आइंदा ऐसे मत आना..मेरे कारण तुम्हे झूठ बोलना पड़े ये मैं नहीं सह सकती; " ये सुन के मैं उस से नज़रें चुराने लगा।

"नहीं आऊंगा. मीनल अब नहीं आऊंगा. " कुछ देर सोच के मैं बोला.." क्या तुम आओगी अपना कोर्स खत्म होने के बाद..??" मैं उसे बड़ी हसरत से देख रहा था कि वो ही तड़प उस मे दिखे।

"निशांत तुम मेरी ज़िंदगी के बारे में जानते हो फिर भी क्यों सपने देख रहे हो; मैं ऐसे जी नहीं पाऊँगी. सब के साथ मेरे कारण गलत हुआ. अब तुम्हे ऐसे बर्बाद नहीं कर सकती. "

मीनल पता नहीं क्यों ऐसी बातें करने लगी थी।

मैं बंगलोर से उठ के उस के लिए आया और वो इस तरह का व्यवहार कर रही थी, मेरा दिल छलनी हो गया।

"मुझे पता होता कि मेरे आने से तुम ख़ुश नहीं होगी तो नहीं आता;" मुझे अपने वहाँ होने पर अफ़सोस होने लगा।

"मैं क्या करूँ मीनल. न चाह के भी खुद को रोक नहीं पाया. लेकिन आइंदा ऐसा नहीं होगा. " मैंने झूठी मुस्कान दी।

मीनल चुप थी, न जाने किस सोच में डूबी;मैं कुछ देर उसे देखता रहा. फ़िर अपने साथ चलने को कहा।

"कहाँ" वो हैरानी से बोली।

" बस चलो मीनल;और उसे ले के बाहर आ गया, हमारी शक्लें देख के जिग्नेश समझ गया था कि कुछ ठीक नहीं।

जिग्नेश के साथ ही हम एक कोचिंग सेंटर रुके. मीनल समझ नहीं पाई की हम कहाँ थे.

मीनल ने फिर सवाल किया " हम कहाँ जा रहे हैं. " मेरा अब कुछ बात करने का मन नहीं था, मैंने अपने होठों पे एक उंगली रख के उसे चुप रहने का इशारा किया. और सामने देख के चलने लगा।

अंदर पहुँच के हमने मीनल को एक जगह बिठाया और रिसेप्शन पे बात करने चले गए , अब मीनल भी समझ चुकी थी कि वो कहाँ है.

थोड़ी देर में मीनल को एक साधारण टेस्ट के लिए बुलाया गया। वो बहुत घबराने लगी तो मैं बोला "मीनल ये डर, ये घबराहट ही तुम्हारे रास्ते की रुकावट है जिस दिन इस से बाहर निकल जाओगी. दुनिया तुम्हारे कदमों में होगी।

मीनल को भेज कर मैं और जिग्नेश बाहर उसका इंतेज़ार करने लगे। "भाई आप इतना पसंद करते हो मीनल को. ?" उसने सवाल किया,जवाब में मैं केवल मुस्कुरा ही सका।

" और मीनल; क्या वो भी इतना ही;" पता नही ये सुन के मैं उदास हो गया, " जिग्नेश? वो क्या सोचती है उस पे मेरा बस नहीं है. मेरी भावनाएं उसके लिये बदल भी नहीं सकती अब. सब भगवान के हाथ मे हैं. "

" आप जैसा होना मुश्किल है भाई!!" वो मेरे कंधे पे हाथ रख के बोला और मैं कुछ न कह सका।

थोरी देर में मीनल आयी हम उसे बैठने को बोल कर बात करने चले गए।

" कॉन्फिडेंस बहुत कम है इस कारण कई गलतियां की है. " इन्हें हम सेकंडरी लेवल में डाल रहे हैं. ये हमारी टाइमिंग्स हैं आप लोग डिसाइड कर के बता दीजिए।"

मीनल गुस्से में बैठी दिखी, उस के पास आ कर हमने उसे एनीमेशन क्लास के बाद सीधा यहीं आने को कहां।

"मुझे नहीं करना ये. तुम क्या दिखाना चाहते हो निशांत" वो गुस्से से बोली।

"तुम्हारा दिमाग खराब है क्या मीनल??" मैं भी अब गुस्से में आ चुका था।

इतने में जिग्नेश ने माहौल भांप के मुझे कार की चाभी दी और बोला आप लोग मेरे ऑफिक जाओ और तब बात करो, मैं यहां सब फाइनल कर के आता हूँ।

चलो मीनल मैं गुस्से से बोला, लेकिन वो दूसरी तरफ़ देखने लगी। मैं दरवाज़े की तरफ बढ़ गया, लेकिन फिर लौट के आया और मीनल की बाजुओ को कस के पकड़ के उठाया। " चलना है या यही तमाशा करने का मन है" ।

मीनल इस बार मेरे बोलने से डर गई और चल दी, रास्ते भर हम दोनों के बीच कोई बात नहीं हुई।

मैं ना जाने क्या क्या सपने देख के आया था लेकिन सब चकनाचूर होने लगे थे;

ऑफिस पहुँच के मैं मीनल के साथ अंदर गया ताकी जो भी बात हो अकेले में हो सके। " तुमने मेरे एडमिशन इंग्लिश कोचिंग में क्यों कराया. तुम्हारे स्टैण्डर्ड की नहीं हूँ मैं इस लिए ??" मीनल मुझसे क्यों नाराज़ थी समझ नहीं आया. और उसकी बातें, उसकी सोच मुझे अंदर से खाये जा रही थी, मैं चुप रहा।

"मेरे पास तुम्हारी तरह इतने रुपये नहीं के जो चाहे कर लूं; कहाँ से लाऊंगी इतने रुपये मैं3 Question mark. तुम्हारी तरह ऐश की ज़िंदगी नहीं मेरी समझे तुम? . अपनी दादी को भी मनाना होता है मुझे।" मीनल मुझे आंखे दिखा रही थी जो मुझे अच्छा नहीं लग रहा था।

" तुम क्या चाहती हो मीनल..??" मैंने गुस्से को काबू में रखते हुए कहा।

"मुझे तुम्हारे एहसान. तुम्हारे रुपये नहीं चाहिए निशांत. समझो"।

जिस के लिए मैं इस तरह भाग के आ रहा हूँ वो इसे एहसान और मेरा स्वार्थ समझ रही है, अब मेरे सहने की सीमा समाप्त हो चुकी थी। मैंने उसकी बाज़ू को पकड़ के उसे अपने पास किया और दूसरे हाथ से दरवाज़ा बंद कर दिया; मीनल ने अपना हाथ छुड़ा के दरवाज़ा खोलना चाहा लेकिन अब मेरी बारी थी, मैंने उसे दीवार से लगा कर दोनों हाथों से उसके जाने के रास्ता रोक लिया।

चाह के भी मेरी आँखें अपना गुस्सा छुपा नहीं पा रही थीं. अब मैंने बोलना शुरू किया.

" तुमसे पहले भी कहा था न मैंने!. मेरी भावनाओं को एहसान का नाम मत दो, जो भी कर रहा हूँ उसकी कदर करो;"

मीनल नीचे देखने लगी तो मेरा गुस्सा और बढ़ गया.

" मेरी आँखों मे देख के सुनो मीनल..!!;ठीक वैसे ही जैसे मेरी आँखों मे देख के मुझ पे इल्ज़ाम लगा रही थी"

इतना कह के मैंने जबरन उसके चेहरे को ऊपर किया;

"मुझे कुछ खैरात में नहीं मिला मीनल. मेरा जो भी है मेरी मेहनत का है. लेकिन तुम? तुमने तो मुझे इतना गिरा दिया. और हाँ, मैं यहां अपनी मीनल के लिए आया था समझी!! . लेकिन वो तो अपनी है ही नहीं. ;

मैं जा रहा हूँ मीनल. आज के बाद तुमसे मैं तब मिलूंगा जब तुम मिलने आओगी. खुद!! वर्ना इसे अपना भाग्य मान के स्वीकार लूंगा"।

मैंने उसे छोड़ दिया और अपना बैग लेने के लिए सोफ़े की तरफ मुड़ गया, अब रुक के कोई फायदा नहीं था। जितना रोना मुझे पहली बार जाते समय नहीं आया था उस से कहीं ज्यादा अब आ रहा था।

मीनल अब भी वहीं खड़ी थी, मैं नाराज़ था लेकिन उस से प्यार करता था, उसका दुःखी चेहरा भी तकलीफ दे रहा था लेकिन मेरा होना ही जिसको तकलीफ दे उस के सामने से चले जाना बेहतर है। मैं दरवाज़े के पास आया और अपनी आंखें अच्छे से साफ कर के लंबी सांस ली और कुंडी खोलने के लिए हाथ बढ़ाया लेकिन मीनल ने मेरा हाथ पकड़ लिया। "मेरा हाथ छोड़ दो मीनल. " मैंने बिना उसे देखे कहा, देख लेता तो कमज़ोर पड जाता।

"निशांत. !! मैं कुछ कहना चाहती हूं. " मैंने कोई जवाब नहीं दिया दरवाजे को देखता रहा।

मीनल को कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली तो उसने मेरा हाथ छोड़ दिया और मैं दरवाज़ा खोल के बाहर निकल गया। ऑफिस से बाहर निकलते ही जिग्नेश आता दिख गया. "भाई!!ऐसे मत जाओ भाई. बात कर के बात सुलझाओ;"

"जिग्नेश;! मैं जो भी ये सब कर रहा हूँ न, उसे वो एहसान बोलती है और तो और मेरी कमाई को ऐश करना समझती है; जो मेरी भावनाओं की कदर नहीं कर सकती उस से क्या बात करूं.." मेरी आंखें फिर भर आयी, जिग्नेश मुझे देखता रह गया।

मैं खुद को सम्हाल कर बोला "मीनल को कोई दिक्कत मत होने देना जिग्नेश और उसे ये कोर्स करने के लिए समझाना. मैंने बात की है उसकी जॉब कौस्तुभ लगवा देगा। मैं अब यहां नहीं आऊंगा तुमसे पूछ लिया करूँगा उसका हाल" इतना कह के मैं तेज़ी से वहां से चला गया।
 
होटल पहुँच के बहुत देर तक अपने कमरे में बैठ के रोता रहा और न जाने कब सो गया। 3 बजे नींद खुली तो मीनल और जिग्नेश की बहुत सारी मिस कॉल थी, मैंने जिग्नेश को फ़ोन किया।

"हेलो भाई कहाँ हो?. कब से फ़ोन कर रहे हैं,कितना घबरा गए थे हम . "

"मैं ठीक हूँ जिग्नेश, थका था तो नींद आ गयी.."मैने महसूस किया कि मेंरी आवाज बहुत भारी हो गयी थी।

"भाई मीनल आपकी हालत देख के परेशान हो गयी थी इसलिए ऐसा कहा. वो नहीं चाहती कि उसके कारण आपको कोई परेशानी हो;"

"उसे घर छोड़ दिया ना. कोचिंग जाएगी न. "मैंने बात बदल दी।

"आप चिंता मत करो, वो जो आप कहेंगे वो सब करेगी. "

मैं चुपचाप सुनता रहा. "आप सुन रहे हो न भाई; निशांत भाई??"

"हम्म सुन रहा हूँ जिग्नेश. ",अभी रखता हूँ कह के मैंने फ़ोन काट दिया।

मैं होटल के रूम में पड़ा रहा किसी से मिलने और बात करने की इच्छा नहीं रह गयी थी , मीनल का फ़िर फ़ोन आया मैं फोन देखता रहा. उसका फ़ोन आता रहा मैं सुनता रहा।

फ़िर मैसेज आया "जो भावना तुम मेरे लिए रखते हो, वो ही मैं भी तुम्हारे लिए रखती हूं. तुम्हारी तरह मुझे भी तुम्हारी तकलीफ नहीं अच्छी लगती, सामने कह नहीं पाती हूँ।"

मैं मैसेज कई बार पढ़ता रहा जैसे किसी परीक्षा का पाठ्यक्रम हो जिसे याद करना हो।

मैंने कोई जवाब नही दिया, लड़कों में ये सुपर पावर होती है कि वो मैसेज का जवाब दिये बिना आराम से रह सकते हैं. जब कि लड़कियां बेचैन हो जाती हैं।

मैं बिना खाये उसी तरह पड़ा रहा रात को मीनल की फ़ोटो देखी और देखते देखते ही सो गया।

सुबह 8 बजे नींद खुली;बहुत कमज़ोरी सी लगने लगी थी, और पहाड़ सा दिन काटना था. अपने कमरे में ही चाय मंगा के पी और लेट गया।

9:45 बजे जिग्नेश ने कॉल की, मैंने फ़ोन उठाया तो बोला भाई जल्दी आ जाओ,,, मीनल. !!

" क्या हुआ मीनल को, मैं डर से काँपने लगा।

"आप आओ पहले;" कह के उन ने कॉल काट दी।

मैं जितना तेज़ हो सका उतना तेज़ भागा, लेकिन कमजोरी से हांफने लगा.. होटल के बाहर से कैब बुक कर के जिग्नेश के ऑफिस पहुँचा.

"जिग्नेश. जिग्नेश..मैं बाहर से ही चिल्लाता जा रहा था..

उसने अंदर के कमरे से मुझे हाथ से इशारा कर के बुलाया, मैं भागा भागा अंदर पहुँचा. और हांफते हुए जिग्नेश के कंधे वे हाथ रख के पूछा "क्या हुआ मीनल को!!" डर मेरी आँखों मे साफ था ,खुद को न जाने कितनी बार उसका फ़ोन न उठाने के लिए कोस चुका था।

"उसी से पूछ लो "कह के उसने एक कोने पे कुर्सी पे बैठी मीनल की तरफ इशारा किया। दिखने में ठीक लग रही थी बस उदास थी, मुझे लगा दादी ने कुछ किया होगा।

"मैं पास भाग कर मीनल के पैरों के पास घुटनो के बल बैठा गया. " क्या हुआ मीनल.. तुम ठीक हो न;दादी ने फ़िर तंग किया. बोलो मीनल!! मैंने उसे झकझोरा।

"किसी ने कुछ नहीं किया निशांत; जो भी किया मैने किया तुम्हारे साथ. जो मेरी दादी करती हैं उस से भी बुरा. " उसने मेरे चेहरे को हाथ से पकड़ के बोला।

"तुमने मुझे बेवकूफ बनाया. हाऊ डेयर यु!!" मीनल मुस्कुराने लगी। "जिग्नेश तुम भी; तुम लोगो ने मुझे पागल समझा है क्या. " मेरा गुस्सा उफन पड़ा "जा रहा हूँ मैं" लेकिन सच तो ये था कि मीनल को देख के बहुत सुकून मिल रहा था।

मैं खड़ा हुआ इसके पहले कि मैं कुछ कर पाता सॉरी भाई कहते हुए जिग्नेश बाहर चला गया और दरवाज़ा बंद कर दिया।

मैं हतप्रभ हो कर देखता रह गया. क्या कोई खिलोना था मैं. जिसकी कोई भावनाएं नहीं , जो चाहे खेल ले।

" वक़्त बहुत कम है निशांत या तो हम अच्छे से गुज़ार लें या लड़ ले" मीनल के प्रवचन आये।

"ये तुम कह रही हो. " मैंने व्यंग किया।

मीनल ने मेरा हाथ पकड़ के मुझे बिठाया, मैं कुछ ना कह सका। मैं बिना कुछ बोले सामने देखता रहा, मीनल ने मेरी तरफ खाने का निवाला बढ़ाया तो मैं उसे देखने लगा; उसने एक हाथ मेरे गाल पे रख के कहा " खाने पे गुस्सा नहीं करते; मैंने चुप रह के खा लिया।

मैं जानता था वो भी भूखी होगी. तुम भी खा लो मैंने उसे बिना देखे कहा।

"तुम खा लोगे तो मेरा भी पेट भर जाएगा"

" मेरे सामने ये फ़िल्मी डायलॉग मत मारा करो, मैंने गुस्से से उसे घूरा. " वो मुझे देख के मुस्कुरा रही थी।

फ़िर खुद भी खाती रही मुझे भी खिलाती रही। मैं चुपके से उसे खाते देख लेता। खाने के बाद वो मेरे पैरों से टिक के नीचे बैठ गयी और बोली "नाराज़ हो न मुझसे?" मैं उस के ऐसे बैठने से असहज हो गया।

" ऐसे मत बैठो मीनल मुझे अच्छा नहीं लग रहा. " मैंने उसे हटाना चाहा।

"मुझे अच्छा लग रहा है लेकिन तुम्हारे पास. " उसने कहा।

मुझे मेरे पैरों पे उसका बैठना गवारा नहीं था तो मैं भी नीचे बैठ गया।

हम आमने सामने एक दूसरे को देख रहे थे "माफ कर दो.." उसने मेरे दोनों हाथ पकड़े, मैं उसे देखता रहा।

"नहीं करोगे??"

मैंने न में सिर हिलाया।

"कभी भी नहीं. ??" मैंने फ़िर ना में सिर हिलाया, उसका मनाना बहुत अच्छा लग रहा था।

"कैसे मानोगे?"

" मीनल मैं कोई बच्चा नहीं कि जब चाहा दुत्कार दिया फिर लालच दे के मना लिया" मैंने उसकी आँखों मे झांका।

"मीनल मुझसे चिपक के मेरे बगल में बैठ गयी, गुस्सा तो बच्चों जैसा ही करते हो" उसने मेरे कंधे पे टिक के कहा और मेरे दिल में उथल पुथल हो गयी।

मैंने उसे खींच के आगे की तरफ किया और गले लगा लिया। ये पहली बार था जब मैंने खुद से उसे गले लगाया,उसने भी मुझे कस के पकड़ लिया.
 
मैं मीनल के लिए पागल सा हो गया था, यही वजह थी कि भाग के आ गया , लेकिन मीनल की कही बातें दिमाग मे थी और मैंने वादा भी कर लिया था, जिस कारण ये हमारी आखिरी मुलाकात भी हो सकती थी।

मैं मीनल का एहसास खुद में भर लेना चाहता था ताकि जब भी उसकी याद आये मैं उन एहसासों को जी लू।

इसी बीच मेरा ध्यान मीनल की चोटी पे गया तो मैंने खोल दी और उसके बालों को ठीक करते हुए बोला "तुम्हे कितनी बार कहा है समझ नहीं आता" वो चुप रही।

याद नही कितनी देर हम ऐसे ही गले लगे रहे, औऱ एक दूसरे में खोए रहे।

फिर मैंने मीनल को खुद से अलग किया और बोला " मैं अब नहीं आऊंगा मीनल, अब मैं तुम्हारा इंतेज़ार करूँगा; हमेशा ;लेकिन अगर ,भगवान न करे, कोई भी मुसीबत हो. तुम मुझे अपने पास पाओगी..फिर चाहे तुम्हारे मन मे मेरे लिए नफरत ही क्यों न हो।

. मुझे उस दिन का इंतेज़ार रहेगा जब तुम बिना डर के मेरे पास मुझसे मिलने आओगी. और जब वो दिन आएगा ना मीनल, मैं तुम्हे एक पल के लिए भी खुद से दूर नहीं जाने दूँगा; अब ये तुम पे हैं. वरना ये हमारी आखिरी मुलाकात समझ लो. " मीनल मुझे देखती रही, जैसे मैंने उसकि ज़िन्दगी मांग ली हो;

"निशांत. !!" कह के वो मेरे पैरों पे सिर रख के लेट गयी. मैं बैठा बैठा उसका सिर सहलाता रहा. मैं जानता था कि अगर उसका प्यार सच्चा होगा तो वो दादी से भी लड़ लेगी, और जब ये दिन आएगा. दुनिया उस के कदमों में होगी।

काफी देर हो गयी तो मैंने उसे चलने के लिए कहा, तो वो उठ के बैठी कुछ देर मुझे देखा और मेरे गले आ लगी; "भगवान से दुआ करना कि मुझे हिम्मत दें निशांत"; मैंने उसका माथा चूम लिया और उसकी कपन को महसूस करता हुआ बोला "हिम्मत भगवान ने तुम्हें पहले से दी है मीनल. इस्तेमाल करना न करना तुम्हारे हाथ है;कुछ भी निर्णय लेने से पहले मेरे बारे में सोचना ज़रूर. ऐसा न हो मैं ज़िन्दगी भर तुम्हारा इंतेज़ार करता रह जाऊ. माँ बाप का इकलौता बेटा हूँ. उनके भी अरमान है" इतना कह के मैंने मीनल को खुद से अलग किया और जिग्नेश को फ़ोन कर के बताया कि मेरी फ्लाइट है कल ऑफिस जाना है तो दरवाज़ा खोले।

जिग्नेश ने दरवाज़ा खोला तो मैंने एक नज़र मीनल को देखा , वो बहुत भावुक थी उस समय, चलता हूँ कह के मैं निकल गया।

मैं जानता था जब तक मीनल अपनी तरफ से कोशिश नहीं करेगी, मेरे लिए कुछ भी कर पाना नामुमकिन रहेगा। मैं हाथ बढ़ा कर उसे सहारा दे सकता हूँ लेकिन कदम तो उसे ही बढ़ाना होगा ना.

जिग्नेश को थैंक्स बोल कर मैं होटल वापस गया और सामान ले के चल दिया, फिर एक सफर पे. इस बार मैं रोया नहीं. रो कर कुछ हासिल होना नहीं था. फ्लाइट में जब नीचे शहर को देखता तो लगता जैसे कहीं मीनल खड़ी होगी , मुझे देख रही होगी। ये आखिरी बार न हो ,ये ही दुआ करते हुए मैं बंगलोर पहुँच गया।
 
मेरी ज़िंदगी न जाने मुझे किस दिशा में ले जा रही थी, प्यार के लिए भी कितने मापदंड तैयार किये थे मैंने. लेकिन जब हुआ तो कोई मापदंड काम न आया. मैं इस एहसास की गहराई नापते हुए न जाने कब इसमे डूब गया;

मीनल. एक ऐसा नाम था जो मेरे मापदंडों के बिल्कुल विपरीत था.. और मेरी सारी अपक्षाओं को दरकिनार कर मेरी ज़िंदगी बन चुका था।

बंगलोर पहुँच कर खुद को ही धकेलता हुआ अपने फ्लैट पहुँचा, रात काफी हो चुकी थी इसलिए कौस्तुभ को जगाना ठीक न समझ के लॉक खोल के अंदर गया। अंदर कौस्तुभ को कुर्सी पे बैठे अपना इंतेज़ार करते पाया।

"तू सोया नहीं मोटू. " मैंने थकी आवाज़ में पूछा। वो बिना कुछ बोले ही मेरे पास आया मुझे गले लगा लिया, मैं समझ नहीं सका कि उसे हुआ क्या। "क्या हो गया. ?" मैंने गले लगे ही पूछा।

"कुछ नहीं. तू फ्रेश हो जा फिर साथ खाना खाएंगे.." आज वो कुछ ज्यादा ही गंभीर था।

"तूने खाना नहीं खाया अब तक. तू पागल है मोटू..तुझे भूख बर्दाश्त नहीं होती. मैं आता हूँ 5 मिनेट में"..जितना जल्दी हो सका मैं फ्रेश हो कि आया।

खाना खाते हुए मैने कोइ बात नहीं कि, कल से आज तक जो भी हुआ सब दिमाग मे घूम रहा था; कौस्तुभ भी पता नहीं क्यों चुप था.

सोते समय वो मेरे पास आया और मेरा सिर सहला के बोला, "तू सच्चा है ना निशांत. देर सवेर तेरे साथ सब अच्छा होगा देखना. " मैं उसे देखता रहा, मुझे वो निशांत तभी बुलाता था जब वो दुःखी या परेशान हो।

"जिसके पास तेरे जैसे दोस्त हो न वो कभी दुःखी नहीं हो सकता।"

मैं बहुत थका था लेकिन मन बहुत बेचैन भी था, मोटू मेरा सिर सहलाता रहा और मैं ना जाने कब सो गया।मोटू कब वहां से गया मुझे कुछ याद नहीं।

.

कौस्तुभ ने आज मुझे बिठा के जबरन मेरी शेव बनाई, साथ ही न जाने कौन कौन सी दार्शनिक बातों से मुझे समझाता रहा।

कम शब्दों में कहूँ तो वो मुझे मीनल को मुक्त रखने और उसे सोचने समझने का पूरा समय देने के लिए कह रहा था। बात उसकी सही भी थी, तो मैंने अमल करने का फैसला कर लिया।

दिन कटने भी लगे, पहले बहुत उदास, फिर उदास, फ़िर ठीक ठाक और अंत मे अच्छे भी; इंसान का मन उसे हर परिस्थिति में आगे बढ़ना सिखा ही देता है।

मीनल रोज़ फोन कर के अपने बारे में बताती, मुझे सुन कर सुकून मिल जाता. मैं केवल उसे प्रोत्साहित करता, अपने बारे में बातें बंद कर दी।इसी तरह 6 महीने बीत गए।

मेरा ऑफिस फेस्ट नज़दीक था, मेरा नाम जबरन गाने के लिए गया, जिग्नेश से बात हुई तो उस ने बताया कि मीनल बहुत मेहनत कर रही है और उसकी अंग्रेज़ी में भी सुधार है,उस के इंस्टीट्यूट में उसकी तारीफ हो रही थी। मन बहुत खुश था मीनल के लिए।

ऑफिस में आद्या अब ठीक रहने लगी थी, फेस्ट के 3-4 दिन पहले ही उसने ऑफिस के बाहर चाय पीने के लिए पूछा और मैं चला गया। बाहर चाय पीते वक़्त अचानक से एक लड़का आ कर चिल्लाने लगा ,अगल बगल देखने पर पता चला वो मुझे और आद्या को सुना रहा था। "क्या प्रॉब्लम है भाई..!!" मैंने पूछा।

"स्साले मेरी गर्लफ्रैंड के साथ घूम रहा है और पूछ रहा है प्रॉब्लम क्या है. वो मेरी तरफ कॉलर पड़कने के लिए बढ़ा;

उसे देख कर मुझे हँसी आ गयी, कम से कम खुद को देख तो लेता; पतला दुबला लड़का, जिसे मेरा जैसा हाथ भी लगा दे तो छटक के दूर जा गिरे. हुआ भी कुछ ऐसा ही, उसके कुछ कर पाने के पहले वो मेरी गिरफ्त में था;

उसके हाथ अच्छे से मरोड़ के मैं बोला "जब भरोसा ही नहीं तो गर्लफ्रैंड क्यों बनाता है. और मुझ जैसे से उलझने के लिए पहले उस लेवल का बन. "

उसे झटक के मैं अकेले ही ऑफिस वापस आ गया और आद्या से दूरी बना के रखने का सोच लिया. पता नहीं किस तरह का प्यार होता है आज कल;आद्या ने बाद में सॉरी कहा और बताया कि उसकी शादी होने वाली है उस लड़के से;मैंने कोई जवाब नहीं दिया.. और उस दिन के बाद से उस से बच के रहने लगा।

मीनल से बात होती रही लेकिन कभी मुझे ऐसा नहीं लगा कि वो हिम्मत करेगी हम दोनों के लिए, समाज की नज़र में प्यार कर लेना ही अपराध है; मेरा मन उदास हो जाता उस से बात कर के.

फेस्ट वाले दिन आद्या काफी उदास और रोई हुई लगी, पूछने पे बताया उस के बॉयफ्रेंड ने उस से मार पीट की थी. मुझे उस पे तरस आ गया, उसे काफी समझाया और सांत्वना दी मैंने; लेकिन ये सांत्वना मेरे लिए बहुत बड़ी मुसीबत लाने वाला था जिसका मुझे अंदाज़ा भी नहीं था।

फेस्ट में मॉडलिंग, ग्रुप डांस, कपल डांस, गाने सबकी व्यवस्था थी, डांस देख कर, मीनल की याद ताजा हो उठी;उसके साथ किया डांस, उसके साथ बिताए पल मेरी आँखों के आगे घूम रहे थे.…मैंने पर्स निकाल के उसका बैंड अपने हाथ में लिया, लगा मीनल साथ ही है. मेरी बारी आ चुकी थी..मैं बैंड को हाथ मे लिए ही स्टेज पे गया. और उसे देखते हुए ही गाना शुरू किया.

हम्म;ह्म्म्म. हम्म्म्म. हम्म.

.

कोई किसी को चाहे, तो क्यों गुनाह समझते है लोग

कोई किसी की खातिर तड़पे अगर तो हँसते हैं लोग

बेगाना आलम है सारा,यहाँ तो कोई हमारा दर्द नहीं पहचाने है।

पत्ता पत्ता, बूटा बूटा, हाल हमारा जाने है

जाने ना जाने, गुल ही ना जाने, बाग़ तो सारा जाने है.

इसके आगे मैं गा नहीं सका. वन्स मोर, वंस मोर. की गूंज के बाद भी मैं स्टेज से नीचे आ चुका था और सीधे वाशरूम भागा।

बहुत दिनों बाद मुझे रोना आया था आज. खुद को ठीक कर के मैं बाहर निकला और थोड़ी देर में घर के लिए वापस निकल गया।

आद्या से थोड़ी बहुत बात होती थी अब, वैसे भी मैं काम के वक़्त सिर्फ काम करता हूँ.

एक दिन काम का ज्यादा लोड होने के कारण मैं थक गया तो बीच मे ही चाय पीने के लिए चला गया। देखा तो मेरा मोबाइल साथ नहीं था, बहुत खोजने के बाद मेरी सीट पे ही मिला। ये बात मुझे बहुत खटकी. लेकिन फिर लगा कि मैं भूल गया शायद.

अगले दिन मुझे ऑफिक की मैनेजमेंट टीम ने बुलाया जहां मुझे बताया गया कि मेरे खिलाफ इन्क्वायरी बैठाई गयी है, मोलेस्टेशन केस में.

मेरे पैरों तले जमीन खिसक चुकी थी, जहां मैं लड़कियों से बहुत लिमिट में बात करता था. आज मेरे खिलाफ इन्क्वायरी शुरू हो गयी थी।

पूछने पर पता चला कि मैंने आद्या को अश्लील मैसेज किये थे. मेरी पूरी दुनिया घूम चुकी थी ये सोच कर. मैसेज और उसको भेजने का वक़्त देख के मैं समझ गया था कि मेरा फ़ोन कैसे नहीं मिल रहा था;लेकिन मैं फंस चुका था.

ऑफिस में मेरी बेइज़्ज़ती की कोई कसर नही छूटी, कुछ लोग अब भी थे जो मेरे साथ थे लेकिन उन से कुछ होना नहीं था.

मेरी सीट अलग कर दी गयी. और मैंने भी अपना काम शुरू कर दिया..

कौस्तुभ को सारी बात बताई तो वो भी सकते में आ गया. मैंने मीनल से भी उस दिन बात नहीं की, मुझे बहुत गहरा आघात लगा था।

मैं और कौस्तुभ बैठ के चर्चा करते रहे, लेकिन कुछ समझ नहीं आ रहा था कि किस का हाथ है इनमे. या तो आद्या ने खुद किया था या किसी से करवाया था.

उस दिन क्या क्या हुआ , सारी बातें कौस्तुभ बिंदुओं में लिखता गया. आखिर में निष्कर्ष निकला कि उस दिन जो सहकर्मी मेरे पास कुछ काम से आया था वो मेरे मोबाइल गायब होने में सम्मिलित है। अब उसने ऐसा क्यों किया ये पता लगाना ज़रूरी था।

मेरी इज़्ज़त, मेरी जॉब सब कुछ अब इसी पे निर्भर था; पूरी रात मैं करवटें बदलता रह गया।

मैंने इन्क्वायरी टीम को अगले दिन सारी जानकारी दी, जिस वक्त मैसेज गए हैं उस वक़्त की सीसीटीवी फुटेज चेक करने को कहा.. मैं उस वक़्त चाय पीता नज़र आया, और फ़िर भागता हुआ. लेकिन टीम ने मेरी दलीलें ये कह कर खारिज कर दी कि मैं मैसेज कर के चाय पीने गया होऊंगा, नेटवर्क के कारण मैसेज देरी से मिले।

आद्या मुझे नफरत की निगाह से देखने लगी थी ,

. दिन गुज़र रहे थे और मेरे पास वक़्त बहुत कम था. फिर मैंने मजबूरी में आद्या से मदद मांगी; आद्या ने साफ इंकार कर दिया और मुझे जेल भिजवाने तक की बात कर डाली।

मेरी जिंदगी में ऐसा दिन भी आएगा मैंने नहीं सोचा था;

मेरे पास कोई सबूत नहीं था. आखिरकार मुझे जॉब से निकाल दिया गया, ये मेरी पहली गलती थी और मेरा काम हमेशा परफेक्ट रहा था इस लिए बात पुलिस तक नहीं पहुँची।

मैं बिना अपराध के सज़ा भुगतने लगा. ऑफिस में मेरे सामने ही तरह तरह की बातें होती रहीं और मैं सब सुनता रहा. सारे पेपर का काम निपटा कर मुझे शाम तक ऑफिस से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया।

मुझे सब धुंधला दिख रहा था , चक्कर आ रहे थे. सब कुछ छिन गया मेरे हाथ से.. मैं अपना सिर पकड़ के कार से सट के बैठ गया और रोने लगा. इस वक़्त पार्किंग में कोई देखने वाला नहीं होगा ये सोच, कर. लेकिन मैं गलत था. मैंने 2 लोगों को खुद पे हंसता पाया. देखा तो आद्या का बॉयफ्रेंड औऱ मेरा वो ही सहकर्मी था; मैं उन्हें देखता रहा. सब कुछ अब मेरे सामने था लेकिन मैं लाचार था। वो दोनो मेरी मज़ाक बना कर और मुझे न जाने कौन कौन आई धमकियां दे कर चले गए।

अपनी बर्बाद जिंदगी का नज़ारा देख कर जीने की इच्छा भी नहीं रह गयी। मैंने कौस्तुभ को फ़ोन किया और ऑफिस के बाहर मिलने को कह कर गाड़ी स्टार्ट की।

थोड़ी देर में मैं और कौस्तुभ अपने फ्लैट पर थे, मैं कौस्तुभ से गले लग कर बहुत देर तक रोता रहा. ऐसा लगता था कि ये रोना मेरे जीवन का अभिन्न अंग बन गया हो। जब शान्त हुआ तब कौस्तुभ को अब बताया. कौस्तुभ ने अब इस बात को अपने तरह से देखने की बात कही और मुझ से वादा किया कि मेरी दूसरी जॉब के पहले उन दोनों की जॉब भी जाएगी।

कौस्तुभ ने प्लान बनाया मेरे सहकर्मी से सच उगलवाने का. इस तरह के टेढ़े काम मे वो माहिर है. मैं मुंहफट हूँ इस लिए ऐसे में कुछ समझ नही आता।

ऑफिस के बाहर रोज़ चाय पीने के वक़्त कौस्तुभ उसे वहां मिलता.. और बात करता.. 3-4 दिन में वो अच्छे दोस्त बन चुके थे और कौस्तुभ उसे अपने ऑफिस में जॉब दिलवाने वाला था अच्छी सैलरी में।

कौस्तुभ ने एक दिन मुझे कहीं जाते हुए देख कर उस सहकर्मी को मुझ से दुश्मनी की बात कही; फिर दोनों ने मिल कर मेरी खूब बुराई की, और मुझे सबक सिखाने की भी बात हुई।

फिर एक दिन हमारे ही फ्लैट में दारू पार्टिनक आयोजन हुआ;उस दिन मैं बाहर ही रहा. और आखिरकार सच हमारे सामने था सबूत के साथ।

इस के लिए मैं कौस्तुभ के पैर भी पड़ता तो कम था. लेकिन दोस्त ये जानते भी नहीं कि अपने दोस्तों के लिए क्या क्या कर गए।

मेरा सहकर्मी, आद्या के बॉयफ्रेंड का दोस्त था जो मुझ पे नज़र रखता था. ऑफिस के बाहर हुई अपनी बेइज़्ज़ती का बदला लेने, और आद्या के मन मे डर पैदा करने के लिए उसने. मेरे सहकर्मी से मेरा मोबाइल उठवाया और आद्या को मैसेज किया। फ़िर बड़ी चालाकी से मोबाइल मेरी सीट पे वापस रखवा दिया;

कौस्तुभ और मैंने उन दोनों की सारी पोल पट्टी ऑफिस वालों के सामने रख दी. मुझे दोबारा जॉब ऑफर की गई लेकिन मुझे वहां रहना अब गवारा नहीं था।

कौस्तुभ भी मेरे साथ अब जगह बदलना चाहता था तो हमने इंटरव्यू की तैयारी की और पुणे की एक कंपनी में जॉब ले ली, कौस्तुभ को नोटिस पीरियड तक रुकना था इस लिए पहले मैं गया बाद में वो आया।

इतने दिनों में मैने मीनल से ठीक से बात भी नहीं की थी, अब पता नहीं मेरा मन भी नहीं होता था। वो भी मुझे ग़लत ही कहेगी ऐसा मेरा मानना था.

जब तक कौस्तुभ पुणे नही आया तब तक मेरी हालत ठीक नहीं रही। इस हादसे के बाद से मैं बहुत कम बोलने लगा था. अपने कमरे से बाहर नहीं निकलता ऑफिस में भी अकेला रहता ,रात को मीनल को याद कर के रोता रहता, मैं जान चुका था अब वो मेरी नहीं होगी।

जब जिंदगी में कुछ सही न चल रहा हो तो हम हर चेवज़ में केवल नकारात्मकता खोजने लगते हैं, मैंने भी मीनल के साथ अपने रिश्ते में यही खोज कर दिल को तसल्ली दे दी।

कौस्तुभ जब आया तो मेरी हालत देख कर मुझे बहुत समझाया; मैं जब खाली होता तो मीनल की फ़ोटो और उसका बैंड देखता रहता. मेरी जिंदगी में भी एक खालीपन पसर गया था।

उसका एहसास लेना होता तो गाना चला लेता. और उसके साथ किये डांस को , उस को गले लगाने को, माथा चूमने को महसूस करता.

मीनल ने भी कभी अपनी तरफ से ऐसा कुछ नही जताया कि मेरे लिए वो भी तड़पती है, मुझसे मिलना चाहती है. मैं यही सोचता. काश कभी वो कहती कि मेरे बिना नहीं रह पा रही, मेरे पास आना चाहती है सब कुछ पीछे छोड़ कर;लेकिन ये केवल मेरे खयालों में ही होता. और मैं अपनी इन सोच पर छुप के आँसू बहा लेता.

मीनल फ़ोन पे पूछती रहती , मैं बिजी हूँ कह देता, कौस्तुभ सब समझता था लेकिन कुछ नहीं कहता.
 
मीनल से मिले लगभग 10 महीने होने को थे और उस से ठीक से बात हुए लगभग 3 महीने हो चले थे। ऐसा नहीं था कि मेरा प्यार कम हो गया था लेकिन अब मैं खुद को मजबूत कर रहा था, मैं इस बात को मान चुका था कि मीनल मेरे पास नहीं आएगी न ही वो मेरी तकलीफ समझेगी।

घर गए भी वक़्त हो गया था. उन्हें इस हालत में मिल कर दुखी नही करना चाहता था।

दूरियाँ कभी कभी मन मे छुपे डर से भरे पूर्वाग्रह को सच की तरफ प्रस्तुत करने लगती हैं और हम सब भूल के उस पर भरोसा कर लेते हैं, मैंने भी कर लिया।

आज बहुत दिनों बाद कुछ अलग सपना देखा।

मैं मीनल को आवाज़ देता हुआ सूनसान जंगल मे भटक रहा हूँ9 Full stop वो सारी लड़कियां जिनके प्यार को मैंने ठुकरा दिया था. सब मुझ पे हँसती हैं; फ़िर अपने पास बुलाती हैं. मैं मीनल मीनल चिल्लाता हूँ. लेकिन मुझे मेरी ही आवाज़ टकरा के वापस सुनाई देती है;

सारी लड़कियां हँसती हैं. वो नहीं आएगी. भाग गई डर के; भाग गई.

मैं उन से बचने के लिए दौड़ता हूँ . इतना दूर की किसी की आवाज़ सुनाई न दे. अंत में ज़मीन पे गिर जाता हूँ. और रोने लगता हूँ; खूब रोता हूँ, मीनल को याद करता हूँ।

कोई मेरे कंधे पे हाथ रखता है;पलट के देखता हूँ तो मीनल है परियों सी सुंदर. मुस्कुराते हुए मुझे हाथ दे के खड़ा करती है, मैं सब भूल कर उसे देखता रहता हूँ.

वो मुझे गले लगाने के लिए आगे बढ़ती है, मैं मना करता हूँ, तुम फिर गुम हो जाओगी मीनल. मैं रोने लगता हूँ;मीनल मुझे फिर भी पकड़ लेती है। मैं डर से आंखें बंद किये हूँ. तभी मीनल के होठों का अपने होठों पे एहसास होता है मैं अंदर तक सिहर, उठता हूँ, डर खत्म हो जाता है। मैं मीनल को अपनी बाहों में जकड़ लेता हूँ. निशांत. निशांत. उठ; आवाज़ आती है, लेकिन मैं मीनल में खोया हूँ;अरे उठ ना. मेरे ऊपर पानी के छींटे पड़े. मोटू तू; मैं उठ बैठा, आज भी सपना ही था;उफ़्फ़. "7 बज गए, ऑफिस नहीं जाना क्या।।

मैं आज के सपने से थोड़ा शांत था; दोनों ऑफिस जा रहे थे तो मोटू ने गाना लगा दिया

"धड़कन कह रही है, यहां कोई आने वाला है।

सावन कह रहा है बादल कोई छाने वाला है।

मन मेरा पागल ढूढता है तुझे घबरा के;

एक नया आसमान मिल गया है हमे तुझको पाके।।

आज मेरा जहां तुम ही हो, अब मेरी दास्तान तुम ही हो

तुम यहाँ तुम वहां जाने जाना..जाऊं अब मैं जहां तुम ही हो. मिल गया रास्ता फूलों भरा; चलते

ऐसा लगा जैसे कौस्तुभ को मेरे सपने के बारे में पता हो. मुझे मीनल और अपनी आखिरी मुलाकात याद आ गयी जब मैंने उसे गले लगाया था। काश मीनल भी मेरे लिए इतना ही छटपटाती होती जितना कि मैं. लेकिन मेरी भावनाएं तो जैसे एकतरफा हो के रह गयी थी।

मेरी आँखें गीली हो गयी थी, कौस्तुभ से बच के मैंने पोछ ली और गाड़ी पार्क कर के हम ऑफिस चले गए।

थोड़ी ही देर में कौस्तुभ ने फ़ोन किया कि तबियत ठीक नहीं लग रही इसी लिए वो घर जा रहा है. मैं उसके पास जाने को हुआ तो उसने मना कर दिया और कहा कि ज्यादा जरूरत हुई तो बुला लेगा।

मैं अपने काम मे लग गया, लेकिन मन नहीं लग रहा था; तकरीबन 2 घंटे बाद कौस्तुभ ने कॉल की.

"निशांत, प्लीज घर आ जा. कुछ ठीक नहीं लग रहा;और हां लॉक खुद खोल लेना , मेरी उठने की भी हिम्मत नहीं"

मैं हाफ डे ले कर घर भगा. कौस्तुभ की चिंता हो रही थी।

मैने लॉक खोला, तो दिन में भी रात जैसा अंधेरा किया हुआ था उसने. मैंने बैग उतारते हुए आवाज़ लगाई तो उसने कोई जवाब नहीं दिया; मुझे घबराहट होने लगी तो जल्दी से लाइट जलाई।

सामने का नज़ारा देख कर बैग मेरे हाथ से छूट के नीचे गिर गया। सामने मीनल खड़ी थी. उसी मासूमियत के साथ जैसे उसे पहली बार देखा था। मुझे लगा मेरा वहम है, मैंने अपनी आंखें मली. मीनल अब भी वहीं मुस्कुरा रही थी।

मैं वहीं जड़वत खड़ा रहा. बिना पलकें झपकाए. मीनल धीरे धीरे मेरे पास आ रही थी, मैंने मुँह खोला कुछ बोलने के लिए लेकिन शब्द न फूटे। उसने आ कर मेरा हाथ पकड़ा और मेरे शरीर मे बिजली कौंध गयी। उसने मुझे एक कुर्सी पे बिठा दिया, मैं उसे देखता हुआ बैठ गया, मुझे पानी का गिलास दिया लेकिन मुझे कुछ दिख ही नही रहा था तो उसने अपने हाथों से पिलाया। ना जाने कितना पानी मैंने पिया और कितना कमीज पे गिराया।

मीनल ने मेरे दोनों हाथों से मुझे पकड़ के उठाया और मेरे सीने से लग गयी मेरी धड़कने बहुत बढ़ गयी, और मैं काँपने लगा।

"निशांत मुझे गले नहीं लगाओगे " मीनल बोली लेकिन मैं वैसे ही खड़ा रहा।

"मेरे आने से खुश नहीं तुम. वो अलग हो कर बोली।

"मैं जाऊं क्या फिर. ? वो मासूमियत से बोली। मैंने ना में गर्दन घुमायी।

" तो फ़िर मुझसे दूर क्यों हो निशांत. " वो भीगी आंखों से बोली।

मैं नही जानता लेकिन मैं उस के सामने असहज था और कुछ कह पाने में भी कतरा रहा था ।

" तुम ऐसे भागोगे मुझसे तो मैं यहाँ रह के क्या करूँगी. वो दरवाज़े की तरफ चली गयी.." अब मैं भागा और दरवाज़े पे खड़ा हो गया. उसे रोकने के लिए।

इस बार मीनल ने अपनी बाहें फैलाई और मैं उनमे समा गया; मैंने उसे कस लिया ताकि वो कभी अलग न हो सके।

अनायास ही मेरे हाथ उसकी पीठ सहलाते हुए उसके बालों तक चले गए. एक हाथ से उसे जकड़े हुए मैं दूसरे हाथ से धीरे धीरे उसकि चोटी खोल कर उसके बाल अपनी उंगलियों से संवारने लगा।

इतने लंबे अरसे के बाद जैसे मुझे सुकून मिला, मैं पिछला सब भूल गया; याद रह गयी तो सिर्फ मीनल.

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कहानी को समझने के लिए अगले भाग के इंतेज़ार, करें।

मेरे दिल ने ना जाने कितने ख्वाब देखे और खुद ही उन ख्वाबों को गलत साबित कर दिया. मीनल आज मेरे पास मेरे साथ थी. क्यों और कैसे ये मुझे पता भी नहीं था; मैं तो कौस्तुभ के लिए भागा आया था. लेकिन यहां तो मेरी ज़िंदगी बाहें बिछाए खड़ी थी.

मीनल के गले लग के मेरे सारे वहम दूर हो गए. पिछली कंपनी से मिले घाव भी भर गए।।।

जब मीनल की धड़कन मुझे सुनाई देती तो ऐसा लगता कि मुझे मेरी सांसें वापस मिल गयी हैं।

मीनल ने काफी देर बाद मुझसे कहा " ऐसे ही रहना है क्या आज. " तो मैं जैसे नींद से जागा और उस से अलग हुआ। न जाने क्यों मुझे उस से इतनी देर गले लगे रहने के कारण शरम आ रही थी. मैं नज़रें चुराता हुआ इधर उधर देखने लगा;फिर कुछ समझ नहीं आया तो "बैठो " कह कर कुर्सी आगे खींच दी।

मीनल की नजरें मुझ पे थी ये पता होते हुए भी मैं उसे देख नहीं पा रहा था।

"तुम आ गए हो नूर आ गया है, नहीं तो बेवजह ज़िन्दगी जा रही थी"

मोटू का बेसुरा राग मेरे कानों में पड़ा. तो याद आया कि उसकी तबियत ख़राब थी इस लिए मैं घर आया था।

मैं आवाज़ की तरफ मुड़ा. तो कौस्तुभ जिग्नेश के साथ दूसरे कमरे से गाते हुए निकला।

"दोस्त दोस्त ना रहा प्यार प्यार ना रहा" फिर एक बेसुरा गाना. मैं दोनो को देख कर अवाक रह गया।

"तुम लोगों ने योजना बना के ये सब किया!!" मैं जिग्नेश से गले मिलते हुए बोला।

"तू अब भी ऐसी रोनी सूरत बना के बैठा है; हंस दे यार; ;तुझे याद भी है परफेक्ट. तू कब हंसा था आखिरी बार.."

मुझे कैसे याद होता भला. मैं तो कब से मुस्कुराया भी नहीं.

"जिग्नेश. ये सब कैसे. ? मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा. "

"भाई, मीनल की टीम एक कम्पटीशन के फाइनल राउंड के लिए सेलेक्ट हुई है. परसों जाना है मुम्बई.."

"तुमने बताया नही मीनल. और तुम्हारी दादी??."अब मैं मीनल की तरफ मुड़ा.

"क्यों सरप्राइज अच्छा नहीं लगा..?" मीनल ने पूछ लिया।

बहुत अच्छा लगा. मैं आंखों के कोने पोछते हुए बोला।

"हमारे पास दो दिन हैं.. घूमने के लिए. जल्दी से रेडी हो जाओ. " कौस्तुभ का आदेश आया, और घर मे भागदौड़ मच गई..15 मिनेट में ही सब तैयार थे। सब से मजेदार बात ये थी कि मीनल सब से पहले तैयार हुई थी।

"मीनल!!. क्या तुम सच मे लड़की हो. ?" कौस्तुभ उसे घूरते हुए बोला। सब हंस पड़े।

"मैं नहीं मानता. दुनिया की कोई भी लड़की इतनी जल्दी तैयार हो ही नहीं सकती. ये धोखा है. " वो अपने सीने पे हाथ रख के बोला।

मीनल बहुत हंसी, और मैं उसे देखता रह गया; मेरे चेहरे पे भी मुस्कान उभर आई।

हम घूमने निकल पड़े मीनल को पीछे जिग्नेश के साथ बिठाया गया, कौस्तुभ बोला कि मैं मीनल को देखते देखते गाड़ी कहीं ठोक दूंगा, मैं मुस्कुरा दिया. और हम निकल पड़े।

चाहता तो मैं मीनल को शीशे में देख सकता था लेकिन ये सब मुझे पसंद ही नहीं था, मेरे लिए तो मीनल के होने का एहसास ही काफी था।

काफी बहस के बाद लोनावला जाने का निर्णय हुआ और हम चल दिये; वैसे ये जगह बारिश में घूमने के लिए मशहूर हैं और अभी बारिश थम चुकी थी।

मीनल खिड़की से बाहर देखते हुए बहुत खुश हो जाती थी बीच बीच में।।
 
लोनावला पहुँच कर सबसे पहले मैंने मीनल को हाथ दे कर उतारा, और बाकी दोनों हंस पड़े। मीनल का हाथ जैसे ही मेरे हाथों में आया तो मेरे मन मे विचार आया.." एक दिन ऐसे ही मीनल अपना हाथ हमेशा के लिए मेरे हाथों में देगी". कितना खुश था मैं. मीनल को पहाड़ों पर चलने की आदत नहीं थी तो मैं उसे पकड़ के सम्हालता हुआ चलता. जिग्नेश और कौस्तुभ आगे बढ़ गए।

मैं मीनल को सम्हाले पीछे रह गया.…

"निशांत. तुमहे मैंने बहुत याद किया, तुमसे मिलने का रोज़ मन होता था. जब भी मैं उदास होती थी ना. तो तुम्हारा हंसता हुआ चेहरा याद कर लेती . और ख़ुश हो जाती। "

मैं रुक कर मीनल को देखने लगा. कितनी शांत, कितनी गंभीर थी वो.. अपनी उमड़ती भावनाओं को भी सम्हाल के सही शब्दों में बयान कर दिया..…..शायद मैं ही था जो जल्दबाजी में रहा या शायद मीनल से दूरी सह न सका।

चलते चलते मीनल ने मेरी बाज़ुओं को अपने दोनों हाथों से पकड़ लिया, मेरे सीने मे आज वो ही पुरानी टीस उठी. "कोई गाना गाओ न निशांत;" मीनल मेरी तरफ देख के बोली और मैं चमकती हुई उसकी आँखों को देखता रह गया;

"मीनल अब जो मैं गाऊंगा उसे ध्यान अब सुनना और समझना;" मैं बोला.. फिर सामने देखते हुए गाने लगा।

तुम मेरे पास हो, इस पल मेरे हो

कल शायद ये आलम ना रहे।

कुछ ऐसा हो तुम तुम न रहो,।कुछ ऐसा हो हम हम न रहे

ये रास्ते अलग हो जाएं, चलते चलते हम खो जाए

मैं फिर भी तुमको चाहूंगा, इस चाहत में मर जाऊंगा

मैं फ़िर भी तुमको चाहूंगा।

ऐसे ज़रूरी हो तुम मुझको, जैसे हवाएं साँसों को..

लेकिन जब याद करोगे तुम, मैं बनके हवा आऊँगा

.

इस चाहत में मर जाऊंगा..मैं फिर भी तुमको चाहूंगा।

मैं चुप हो गया और रुक के एक नज़र मीनल को देखा. निशांत कह कर वो मेरे सीने से आ लगी. मैंने आस पास देखते हुए उसे खुद से अलग किया।

काश कोई न होता आस पास. मैं मीनल को अलग न करता खुद से।

हम झरने के पास पहुँचे. कौस्तुभ और जिग्नेश पहले से वहां थे. उस के बाद हमने पानी से एक दूसरे पे खूब छींटे मारे।

जब मैंने मीनल के चेहरे पे पानी की बूंदें देखीं तो होश खो बैठा. मैं खेलना भूल गया और मीनल की बाहें पकड़ के अपनी तरफ कर लिया, मीनल झेंप गयी. मैंने अपनी जेब से रुमाल निकाल कर उसका चेहरा पोछा और कहा " तुम्हें इस तरह देखने का हक़ सिर्फ़ मुझे है मीनल. है ना मीनल??" मीनल ने नज़रें झुका ली।

"भाई हमे भी देख लो. "जिग्नेश मुझे छेड़ते हुए बोला, और मैं मीनल से अलग हो गया।

थोड़ी देर और रुक कर हम आगे बढ़े अम्बे वैली की तरफ़. दूर होने के कारण यहां बहुत कम लोग ही जाते हैं।

हम जगह जगह गाड़ी रोकते, खेलते , मिल कर गाते हुए घूम रहे थे; इतना मज़ा मुझे शायद ही कभी आया हो और मीनल का तो ये पहला मौका था. उसके चेहरे के भाव देख कर ही मन खुश हो जाता था।

एक जगह मौका देख के कौस्तुभ मुझसे बोला. " तूने बिल्कुल परफेक्ट लड़की खोजी है परफेक्ट. !! तू जनता है तुझे कोई भी लड़की पसंद क्यों नहीं आयी. क्यों कि तुझे अपनी पसंद का अंदाज़ा ही नहीं था. और अब शायद तू भी अपनी पसंद समझ चुका होगा।"

मुझे छोड़ कर मुझे सब जानते थे. ये सोच कर मैं मुस्कुरा दिया।

वापस लौट कर हमने एक ढाबे में खाना खाया,मीनल ने मुझे खिलाया तो बाकी दोनों ने भी अपना मुंह खोल दिया, मीनल हंसते हुए सबको खिलाने लगी और हम तीनों उसे।

शहर में वापस आ कर हम मॉल में उतरे।

मीनल वहां की चमक और भव्यता देख कर स्तब्ध रह गयी, मैंने मीनल का हाथ पकड़ लिया और उसे सब दिखाते हुए चलने लगा।

जब ऊपर जाने की बारी आई तो मीनल एस्केलेटर को देख के घबरायी. मैं कौस्तुभ और जिग्नेश को ऊपर मिलने का कह कर मीनल को अपने साथ लिफ्ट की तरफ चला गया।

"हम कहाँ जा रहे हैं निशांत।" उसने पूछा।

"जहां सिर्फ तुम और मैं हों वहां. " मैं मुस्कुराया और वो भी मुस्कुरा उठी।

"लिफ्ट में पहले गयी हो कभी मीनल. ?" मैंने जानना चाहा..

" बचपन मे कुछ एक बार. "

मैंने उसका प्यार से सिर सहलाया , ऊपर जिग्नेश और मोटू हमे साथ छोड़ कर अपनी अलग शॉपिंग में चले गए। मैं और मीनल हाथ पकड़े यहां वहां घूमें.. फिर मैंने ऑफिस के हिसाब से कुछ कपडे लिए.

मीनल से ज़िद करने पर भी वो कुछ भी लेने के लिए राजी नहीं हुई। मैं चाहता तो ज़िद कर के उसे कुछ दिला सकता था लेकिन इस मामले में मैं उसके आत्मसम्मान को कोई ठेस नहीं पहुँचाना चाहता था।

" जिस के पास तुम हो निशांत उसे दुनिया मे और किसी चीज़ की ज़रूरत नहीं हो सकती;" मीनल ने कहा।

मीनल मुझसे ऐसा कह रही थी लेकिन ये बात वास्तव में मीनल के लिए जंचती थी।

मीनल बीच मे एक बार वाशरूम के लिए गयी तो मैंने उस पे गौर किया। हल्की नीले रंग की जीन्स में गहरे नीले रंग की पूरी बाजू की टी शर्ट. साधारण पहनावे में भी वो जंच रही थी; अगर उसका आत्मविश्वास मिल जाये तो उसकि चाल और हाव भाव किसी को भी मात दे सकने में सक्षम थे।

रात का खाना बाहर खा के हम घर आये, मैं हद से ज्यादा थक चुका था तो लेट गया. लेकिन बाकी सब बात करने में व्यस्त थे। मैं मीनल को देखता देखता पता नहीं कब सो गया.

रात को अचानक से मेरी आंखे खुली, ऐसा आभास हुआ जैसे कोई मेरे आस पास खड़ा है. मैं डर से उठ बैठा. अचानक कमरे की लाइट जली. मैं हैरानी से देखने लगा. मीनल, कौस्तुभ और जिग्नेश मुझे घेरे खड़े थे. "क्या हुआ3 Full, stop टाइम कितना हुआ. ये सब हो क्या रहा है मैंने हड़बड़ा कर पूछा"

इतने में मोटू ने घड़ी देखी. बज गए 12. और तीनों हैप्पी बड्डडे टू यु गाने लगे.

"मेरा बर्थडे है??.. आज. ??" मैं हैरान था कि मैं ये दिन भी भूल गया।

मुझे तीनो दूसरे कमरे में ले गए. जो सजाया हुआ था.. साथ मे केक था..

"कब किया ये. "

"ओए तू केक काट, सवाल न कर. भूख लग गयी है. "मोटू का जवाब आया।

मैंने केक काटा और सब को खिलाया, तीनो ने गिफ्ट दिए मुझे. मोटू ने मेरे और मीनल की सेल्फी फ्रेम कराई थी, जिग्नेश ने आज चुपके से ली मेरी औ मीनल की फ़ोटो का कोलाज बनवाया था। "ये कब बनवा लिया?" मकई हैरानी से बोला।

"आज मॉल में ही एक शॉप से" ।

अंत मे मीनल का गिफ्ट देखा मैंने.. उसने मेरी पेंटिंग बनाई थी. पानी वाले रंगों से. " ये तुमने बनाई. हम तीनों आश्चर्य, में बोले.." और जवाब में वो शरमा दी।

इतने से वक़्त में इतनी खुशी; भगवान भी न !!कभी इतना रुला देते हैं कभी ऐसे खुशियो से मिला देते हैं।

कुछ सोच कर मोटू और जिग्नेश हमे अकेला छोड़ कर दूसरे कमरे में चले गए। " थोड़ी देर में आ जाना. " मोटू का फरमान भी आ गया।

अब मैं मीनल फ़िर अकेले थे. एक साथ, लेकिन थोड़ा घबराए हुए।

"थैंक यू मीनल" मैंने चुप्पी तोड़ी।

"किस लिये"

"ये मेरी ज़िंदगी का सब से अच्छा जन्मदिन है; मैं तो ये भी भूल गया था कि मेरा जन्मदिन कब होता है. सब कुछ भूल गया था मीनल. " मैं भावुक हो गया बहुत।

"जिसके होने से कई लोगों की जिंदगियां खुशियों से भर गई हो. उसका तो हर दिन सब से अच्छा होना चाहिए. चलो अब तुम भी सो जाओ. मैं ये ठीक कर देती हूँ" इतना कह के उसने जूड़ा बांध लिया।

मैं उसके पास गया और उसे अपनी तरफ किया, फिर उसका जूड़ा खोल दिया.. " मुझे तुम कैसे पसंद हो जानती हो न. " मैं अपने पुराने कड़क अंदाज़ में उसे घूर के बोला।

मीनल घबरा गई थोड़ा. "मुझसे डर लग रहा है.?" मैंने उसका हाथ कस के पकड़ के पूछा। मीनल शरमा गयी और अपना चेहरा नीचे कर लिया।

ये देख कर मेरे दिल मे अजीब से बेचैनी ने दस्तक दे दी, जो मुझे मीनल के करीब रहने को मजबूर करती थी।

मैं उसके थोड़ा और करीब हुआ और उसका चेहरा अपने हाथ से ऊपर किया.. .." मेरी तरफ देखो मीनल. !!"

लेकिन न जाने क्यों वो मुझे देख नहीं पा रही थी।

मैंने उसके बाल अपनी उंगलियों से सवारे, फिर उस के माथे को चूमने के लिए झुका. लेकिन शायद ये वक़्त सही नहीं था. मीनल की तेज साँसे मुझे अपनी गर्दन पे महसूस हुई.

मैं हट गया. "मीनल.. सो जाओ आराम से मैं जाता हूँ" कह कर मैं मुड़ गया तो मीनल ने मेरा हाथ पकड़ लिया, मैंने पीछे पलट के देखा तो वो अब भी गर्दन झुकाए खड़ी थी।

इस शरम और प्यार के मिश्रण ने उसको मेरी नज़रों में दुनिया की सबसे खूबसूरत लड़की बना दिया था।

"क्या हुआ मीनल. " मैंने उसकी मनोदशा जानने के लिए पूछा।

"वो. निशांत..कुछ देर मेरे साथ बैठो न. सिर्फ तुम और मैं. " मैं मुस्कुराये बिना न रह सका।

उसे खुद से सटाये हुए मैं बैठ गया, न वो कुछ बोली न मुझे कुछ कहने की ज़रूरत थी।

रात ज्यादा होने पर मैंने उसे बिस्तर पे लिटाया, और चद्दर ओढ़ा कर बाहर आ कर सो गया।

मीनल के आने की खुशी थी या जन्मदिन की खुशी जो भी था. मेरी नींद जल्दी ही खुल गयी. जिग्नेश के खर्राटे संगीत की तरह मेरे कानों को भेद रहे थे।

कौस्तुभ जिग्नेश पे एक पैर रख के सोया था, मेरे दोनों दोस्त मेरे पिछले जन्मों के अच्छे कर्मों का ही फल थे, ये मैं अच्छे से जानता था।

मेरे मन मे मीनल को देखने की तीव्र इच्छा जागी और मैं धीरे से उस के कमरे में गया।

मीनल भी अभी तक सो रही थी, पैर सिकोड़ के छोटे बच्चे की तरह. उस के खुले बालो का एक हिस्सा उस के चेहरे पे आ रहा था।

मैं वहीं नीचे बैठ गया और उसे देखने लगा, जब मन नहीं माना तो धीरे से उसके बालों को पीछे कर दिया, मेरे चेहरे पे इतना सुकून ,इतनी शान्ति बहुत समय के बाद आई थी।

कहीं ये जो भी हुआ वो सपना तो नहीं ये सोच कर मैंने खुद को चिंगोटी काट ली. और खुद की ही हरकत पे मुस्कुरा उठा।

कुछ देर वहां रुक कर मैंने चाय बनाई और चिल्लाया

"हाँ.. हां. जन्मदिन के दिन भी सारे काम मुझे ही करने होंगे. यही है मेरी पार्टी. !!"

और कुछ ही देर में तीनों उठ कर आंखें मलते हुए मेरे सामने थे. मैं उन्हें देख कर खूब हंसा. जब रुका तो महहूस किया कि बाकी तीनो लोग बहुत खुशी से मेरी तरफ देख रहे हैं.

"क्या हुआ तुम लोगों को. "मैंने हैरानी से पूछा. कुछ नहीं कह कर जिग्नेश और कौस्तुभ मेरे गले लग गए।

मीनल ने चुपके से अपनी आंखें पोछ ली, लेकिन मैंने देख लिया.

मेरे दोनो दोस्त जब अलग हुए तो उनकी आंखों में भी छुपाई गयी नमी मुझे दिख गयी.

मैं समझ गया था कि मेरे इतना खुल के हंसने के कारण ऐसा हुआ. मेरी हंसी को सब तरस गए थे।

मैंने अब अपने दोस्तों की खुशी के लिए हंसते रहने का निश्चय किया. हम सब मिल कर चाय पीने लगे और आज के दिन कहाँ जाना है सोचने लगे।
 
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