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mastram kahani एक अधूरी प्यास.... 2

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Administrator
Staff member
प्रिय पाठक गणआप लोगों के कमैंट्स और आप लोगों की सराहना को देखकर मुझे फिर कहानी लिखने की इच्छा हो रही है इसलिए मैं एक कहानी थी जिसका नाम था एक अधूरी प्यास..... जिसको आप लोगों का ढेर सारा प्यार और ढेर सारे कमेंट मिले थे मैं उसी कहानी को उसका दूसरा भाग लिखने जा रहा हूं और उम्मीद है कि आप लोगों को यह कहानी बेहद पसंद आएगी...

आप लोगों को इस कहानी का दूसरा भाग पसंद आएगा कि नहीं आएगा यह तो मैं नहीं कह सकता लेकिन मैं अपनी पूरी कोशिश करूंगा कि आप लोगों को यह कहानी पहेली की तरह ही पसंद आए और यहां पर आप लोगों को एक बार फिर से निर्मला की खूबसूरत मद भरी जवानी के बारे में पढ़ने को मिलेगा शीतल की चंचलता और उसकी उत्सुकता जो कि शुभम के प्रति उसके साथ शरीर सुख पाने के लिए बढ़ती जा रही थी उसके बारे में आप लोगों को पढ़ने को मिलेगा...

आप लोग अपनी राय कमेंट में जरूर बताएं...

Completed add kariye,,
 
शुभम अपने कदम आगे तो बना रहा था लेकिन उसके मन में डर बराबर बना हुआ था वह अच्छी तरह से जान रहा था कि जिस तरह की हरकत करते हुए उसे उसकी मां ने अपनी आंखों से देखा है वह दृश्य शायद उससे बिल्कुल भी बर्दाश्त नहीं हुआ है तभी तो वह उससे एक शब्द भी नहीं बोली थी और उसका मन उखड़ा उखड़ा लग रहा था उसे यह समझ में नहीं आ रहा था कि वह अपनी मां का सामना किस तरह से करेगा लेकिन फिर भी वह अपनी मां से माफी मांगने के लिए निश्चय कर चुका था इसलिए वह अपने कदम को निर्मला के कमरे की तरफ आगे बढ़ा रहा था थोड़ी ही देर में वह अपनी मां के कमरे के आगे पहुंच गया जहां पर दरवाजा हल्का सा खुला हुआ था और अंदर डिम लाइट का बल्ब झिलमिला रहा था।

यहां तक पहुंचने के बावजूद भी शुभम का मन कर रहा था कि यहां से वापस चला जाए क्योंकि वह सच में अपनी मां से नजरें मिलाने के काबिल बिल्कुल भी नहीं था लेकिन इस स्थिति से मुंह फेर लेना भी उचित नहीं था आखिरकार वह भी अच्छी तरह से जानता था कि उसकी मां को समझने वाला केवल वही था इसलिए इस हालात में माफी मांग लेना ही उचित था और कमरे के दरवाजे को खुला देख कर वह इतना तो समझ ही गया था कि उसकी मां ने जानबूझकर कमरे का दरवाजा खुला रखी थी ताकि वह आराम से कमरे में दाखिल हो सके और निर्मला को इस बात की उम्मीद भी थी कि उसका बेटा उससे मिलने जरूर आएगा इसलिए वह जानबूझकर कमरे के दरवाजे को खुला छोड़ दी थी। अपने आप को पूरी तरह से तैयार करके शुभम कमरे के अंदर दाखिल हुआ जहां पर डिम लाइट की रोशनी में केवल उसे एक साया सा नजर आ रहा था जो कि बिस्तर पर पेट के बल लेटा हुआ था इसलिए वह एक बार अपनी मम्मी को आवाज लगाते हुए बोला।

मम्मी ओ मम्मी . (इतना कहते हुए शुभम अपने हाथों से दीवाल पर टटोलकर जल्द ही स्विच को लपक लिया और स्विच ऑन कर दिया जिससे पूरा कमरा ट्यूबलाइट की दूधिया रोशनी में नहा गया )

अब यहां क्या करने आया है । (निर्मला अपने बेटे की तरफ देखे बिना ही बोली )

क्या करने आया है ..मतलब मैं क्या अब इतना खराब हो गया कि तुम्हारे कमरे में भी नहीं आ सकता ....

आ सकता था लेकिन अब नहीं आ सकता जा अपनी शीतल के पास अब उसी से तेरा मन भरेगा मेरे से तो अब तेरा मन बिल्कुल भी भर गया है ना।

यह कैसी बातें कर रही हो मम्मी ........(इतना कहते हुए वह अपनी मां के बिस्तर के करीब जाकर बिस्तर पर बैठ गया जिसका एहसास निर्मला को अच्छी तरह से हुआ हालांकि वह अभी भी शुभम की तरफ अपनी नजर नहीं घूमाई थी। )

मैं जो भी कह रही हूं ठीक ही कह रही हूं अब मेरे पास क्या करने आया है मेरे पास कुछ भी नहीं है तुझे देने के लिए जो कुछ भी मेरे पास था मैं वह सब कुछ तुझ पर निछावर कर चुकी हूं ।
(शुभम अपनी मां को इतने गुस्से में पहली बार देख रहा था उससे अच्छा तो नहीं लग रहा था लेकिन क्या करें गलती उसकी ही थी लेकिन फिर भी इतनी तनाव युक्त माहौल होने के बावजूद भी शुभम की नजर अपनी मां की कदर आई हुई गांड पर घूम रही थी क्योंकि इस समय व पेट के बल लेटी हुई थी और जिस तरह से वह गुस्से में बोल रही थी उसकी वजह से उसके बदन में एक अजीब सी थीरकन हो रही थी और उस थीरकन की वजह से उसके भराव दार नितंबों में लहर सी दौड़ रही थी जोकि रेशमी पतली साड़ी पहने होने के कारण साफ साफ नजर आ रही थी और शुभम अपनी मां की मदमस्त गांड की थिरकन को देखकर मदहोश होने लगा था। उससे रहा नहीं गया और वह अपना एक हाथ आगे बढ़ा कर अपनी मां की मदमस्त गांड पर उसे रखते हुए बोला।)

मम्मी ऐसा क्यों बोल रही हो जो कुछ भी हुआ उसमें मेरी गलती बिल्कुल भी नहीं थी मैं नहीं चाहता था कि मैं शीतल मैडम के पास जाऊं ।(इतना कहते हुए शुभम अपनी मां की मदमस्त गांड को हल्के हल्के सहलाना शुरू कर दिया जिससे शुभम के तन बदन में उत्तेजना की लहर दौड़ने लगी लेकिन अपने बेटे की इस हरकत पर निर्मला उसका हाथ जोर से झटक ते हुए उठ कर बैठ गई और बोली।)

मेरी नहीं जाकर उसी कल की गांड को सहला क्योंकि मैं उसी दिन समझ गई थी जब तू ललचाई आंखों से उसकी मटकती हुई गांड को देख रहा था तभी मैं समझ गई थी कि अब तेरा मन भटक रहा है और मुझसे तेरा मन भरने लगा है तभी मैंने तुझे उस दिन हीं साफ साफ शब्दों में कह दी थी कि शीतल से दूर ही रहना लेकिन तू नहीं माना और लार टपका आते हुए पहुंच गया उसके पास क्लास में ।

मम्मी मैं सच कह रहा हूं मैं अपने आप वहां नहीं गया था ।

हां तुझको तो सीतल अपनी गोद में उठा कर अपने कमरे में ले गई थी।और खुद ही तेरे पेंट की चैन खोलकर तेरा लंड निकालकर मुंह में लेकर चूस रही थी यही कहना चाह रहा था ना तेरी तो गलती ही नहीं है तू बहुत सीधा-साधा है।
(निर्मला एकदम गुस्से में शुभम की आंखों में आंखें डाल कर उसे बोले जा रही थी शुभम एकदम घबरा गया था क्योंकि इससे पहले उसने अपनी मां को इस तरह गुस्से में कभी नहीं देखा था वह अपना बचाव करने हेतु सारे बयान दे डाल रहा था लेकिन यह बात वह भी अच्छी तरह से जानता था कि उसकी मां को उसकी एक भी बात का विश्वास होने वाला बिल्कुल भी नहीं था फिर भी वह जो कुछ भी हुआ उसमें उसका हाथ बिल्कुल भी नहीं था इस बात का विश्वास दिलाते हुए अपनी मां से बोला ।

मम्मी जो कुछ भी हुआ उसने मेरा हाथ बिल्कुल भी नहीं था मैं वहां अपने मन से नहीं गया था वह तो जबरदस्ती शीतल मैडम ने ही इशारा करके मुझे अपने क्लास रूम में बुलाई थी।

तू दुनिया को बेवकूफ बना सकता है लेकिन मुझे नहीं तू अपने मन से नहीं गया तो शीतल के मुंह में डालने के लिए तेरा लंड खड़ा कैसे हो गया तेरा मन नहीं कर रहा था तो तुझे मजा कैसे आ रहा था।
तुम मुझे बेवकूफ बनाने की कोशिश मत कर तूने मुझे धोखा दिया है मैं तुझे लड़के से मर्द बनाई हूं और तू मुझे ही धोखा दे रहा है चुदाई का पहला सुख तुझे मुझसे ही मिला; औरतों के साथ संभोग कैसे किया जाता है उन्हें कैसे चोदा जाता है मैं तुझे सिखाई जब तू कल्पना में औरतों के अंग से खेलता था तब तुझे पता भी नहीं था कि औरतों का अंग कैसा होता है साड़ी के अंदर उनकी चूची कैसी होती है उनकी गांड कैसी होती है और उनकी बुर का आकार कैसा होता है यह सब तुझे बिल्कुल भी पता नहीं था इन सब बातों से मैंने तुझे अवगत कराया और तू सब कुछ सीखने के बाद मजा लेने के बाद मुझसे मुंह फेर कर दूसरी औरत की बाहों में जाना चाहता है ।

मम्मी ऐसा बिल्कुल भी नहीं है (शुभम अपनी तरफ से अपनी मां को समझाने की पूरी कोशिश करते हुए बोला लेकिन निर्मला थी कि शुभम की बात सुनने को तैयार ही नहीं थी)

सब कुछ ऐसा ही है सब मर्द एक जैसे होते हैं तू भी तेरे बाप की तरह ही हो गया है जब मन भर गया तब दूसरी तरफ अपना ठिकाना ढूंढने लगा मैं सब जानती हूं और अच्छी तरह से जानती हूं कि मर्दों की फितरत सिर्फ औरतों को धोखा देना ही होता है भले होगा उसकी प्रेमिका हो या पत्नी हो या उसकी मां हो एक बार मजा लेने के बाद मन भर ही जाता है यह बात तो साबित कर चुका है तभी तो मजे लेकर मेरे लाख समझाने के बावजूद तू शीतल के पास गया और उसे अपना मोटा तगड़ा लंड उसके मुंह में डालकर उसको चुसवाने का मजा दे रहा था और ले भी रहा था‌।

यह क्या कह रही हो मम्मी (शुभम इससे ज्यादा कुछ बोल ही नहीं पा रहा था मन ही मन में वह अपने आप को कोसने लगा कि आखिरकार वह क्यों वहां गया ना वहां गया होता ना यह बखेड़ा खड़ा होता वह अपनी मां की तरफ बड़े ध्यान से देख रहा था वह एकदम गुस्से में थी उसके बाल बिखरे हुए थे आंखों में आंसू और वह बार-बार गुस्से में अपनी भड़ास निकाले जा रही थी।ज्यादा गुस्से में होने के कारण सुगंधा की साड़ी उसके कंधे पर से सरक कर नीचे आ गई थी जो कि नीचे बिस्तर पर बिखरी पड़ी थी और उसकी ब्लाउज का एक बटन खुला हुआ था जिसमें से उसकी बड़ी-बड़ी खरबूजे जैसी चूचियां बाहर झांक रहे थे जिस पर ना चाहते हुए भी शुभम की नजर बार-बार चली जा रही थी आखिरकार भले वह अपनी मां से दो चार बातें सुन रहा था लेकिन फिर भी अपनी मां के खूबसूरत बदन के आकर्षण से अपनी नजर को हटा नहीं पा रहा था‌। निर्मला अपने बेटे की नजरों को भांपते हुए गुस्से में बोली।

तुझे लगता है कि मेरी चुचियों में पहला जैसा कसाव नहीं रहा ना अब यह टाइट नहीं है ....यह पपाया की तरह लटक गई है तुझे ऐसा लग रहा है ना ले देख ले देख ले .. (इतना कहते हुए अपनी ब्लाउज के बटन खोलने लगी निर्मला पूरी तरह से गुस्से में थी लेकिन गुस्से में होने के बावजूद भी वह बहुत खूबसूरत लग रही थी और उसका यह अंदाज कि गुस्से में होने के बावजूद भी वह अपनी ब्लाउज के बटन को अपने बेटे की आंखों के सामने खोल रहे थे यह देखकर शुभम शर्मिंदा होने के बावजूद भी उत्तेजना का अनुभव करने लगा और देखते ही देखते उसकी मां ब्लाउज के सारे बटन को खोल दी जिससे उसकी बड़ी-बड़ी चूचियां पिंजरे में कैद कबूतर की तरह बाहर हवा में फड़फड़ाने लगे यह बात तो तय थी कि इस उम्र में भी निर्मला की चुचियों का कसाव जवानी के दिनों की तरह ही बरकरार थे फिर भी वह ऐसा समझ रही थी कि शायद शुभम को अब उसकी चूचियों में पहले जैसा कसाव महसूस नहीं हो रहा है इसीलिए वह दूसरी औरतों की सोबत में पड़ रहा है इसलिए वह अपने ब्लाउज के सारे बटन खोल कर अपने दोनों चूचियों को अपने हाथों में पकड़ कर उसकी तरफ आगे बढ़ाते हुए गुस्से में बोली ।)

ले शुभम पकड़ अपने हाथों में ले इसे जोर से दबा .. ने पकड़ी से अब चुप क्यों मिले पकड़ना इसे दबा अपने हाथों में भरकर इसे तुझे ऐसा लग रहा है ना कि इनमें कसाव नहीं है यह लटक गई है पहले जैसे तुझे मजा नहीं आ रहा है इतना कहते हुए निर्मला अपने हाथों से अपने बेटे का हाथ पकड़कर उसके हथेली को अपनी चुचियों पर रखकर उसे दबाने के लिए बोलने लगी अपनी मां का गुस्सा देखकर उसे हिम्मत नहीं हो रही थी कि वह अपनी मां की चूची को दबा दें वह सिर्फ आश्चर्य से अपनी मां की तरह देखे जा रहा था शुभम की तरफ से कोई प्रतिक्रिया ना होता देखकर वो खुद हीअपने बेटे की हथेली पर अपनी हथेली रखकर उसे जोर जोर से दबाते हुए अपनी चूचियों को दबाना शुरू कर दी । और अपने बेटे की आंखों में आंखें डाल कर गुस्से में बोली ।..

बोल तुझे मजा नहीं आ रहा है ना मेरी चूचियों को दबाने में अब ईसमें खरबूजे जैसा मजा नहीं रह गया इन में रस नहीं रहगया इसलिए तू शीतल की तरफ बढ़ रहा है यही बात है ना ।
(शुभम को अब कैसे अपनी मां को समझाना है इस बात का बिल्कुल भी समझ नहीं थी उसका दिमाग काम करना बंद हो गया था। उसकी मां को वह समझाना चाहता था उससे माफी मांगना चाहता था लेकिन उसकी मां सुनने को तैयार ही नहीं थी बल्कि उसकी हरकतों की वजह से शुभम के तन बदन में उत्तेजना की लहर दौड़ रही थी... पजामे के अंदर शुभम का लंड खड़ा होने लगा था । इस तरह की स्थिति ना होती तो जिस तरह की हरकत उसकी मां कर रही थी उसे देखते हुए शुभम अब तक उसे बिस्तर पर लेटा कर उसकी दोनों टांगों को फैला कर अपने लंड को उसकी रसीली बुर के अंदर डाल दिया होता लेकिन इस समय ऐसा करना उचित नहीं था यह बात वह भी अच्छी तरह से जानता था क्योंकि ऐसे हालात में अगर वह अपनी तरफ से इस तरह की कोई प्रतिक्रिया देता है तो उसकी मां को यही लगेगा कि यह केवल हुस्न का दीवाना है इसे औरतों से इसने नहीं बल्कि उनके बदन से मोहब्बत है इसलिए वह इस तरह की हरकत नहीं करना चाहता था कि उसकी मां को इस बात से ठेस पहुंचे वह किसी तरह से अपनी मां को मना लेना चाहता था इसलिए अपनी मां को मनाने के उद्देश्य से वाह अपना हाथ पीछे हटाते हुए बोला ।)

शीतल कीमत मस्त जवानी जिसे देखकर शुभम का भी मन भटकने लगा था उसकी बड़ी बड़ी गांड शुभम की हालत खराब कर रहे थे



शीतल की खरबूजे जैसी बड़ी-बड़ी चूचियां देखकर शुभम का मन करने लगा था कि उसे दबा दबा कर उसे मुंह में भरकर उस का रस पी जाए


शीतल जोकि शुभम के मोटे तगड़े लंड के दर्शन कर चुकी थी और उसकी ताकत को भाप कर उसे अपनी बुर के अंदर लेकर अपनी प्यास बुझाना चाहती थी इस तरह से

 
शुभम झटके से अपने दोनों हाथ को अपनी मां की मदमस्त गोलगोल चुचियों पर से हटाते हुए बोला ।

यह क्या कर रही हो मम्मी ?

वही जो तू चाहता है। तुझे अब दूसरी औरतें पसंद आने लगी है ।

ऐसी कोई भी बात नहीं है मम्मी आप मुझे गलत समझ रही हैं ।

मैं तुझे गलत समझ रही हूं जो मेरी आंखों ने देखा वह क्या गलत था क्या तू शीतल के पास नहीं गया क्या मैं तुझे शरीर सुख नहीं दे पा रही हूं या अब तुझे मेरे बदन में मजा नहीं आ रहा है या मुझसे ज्यादा खूबसूरत और सेक्सी है वह शीतल (निर्मला गुस्से में अपने बेटे से सब कुछ बोले जा रही थी जो कि एक मां को एक बेटे से नहीं बोलना चाहिए था।)

मम्मी जो कुछ भी तुमने देखा हुआ सब कुछ गलत था।

मुझे तो बेवकूफ समझ रहा है शुभम मेरी आंखों ने जो कुछ भी देखा वह गलत था मैं कैसे यकीन कर लूं कि वह गलत था तू शीतल के क्लासरूम मम्मी अपना लंड खड़ा करके खड़ा था और वह घुटनों के बल बैठकर तेरे मोटे तगड़े लंड को मुंह में लेकर चूस रही थी और तू कह रहा है कि मैंने जो कुछ भी देखी वह सब कुछ गलत था। (निर्मला की अश्लील गंदी बातें शुभम के तन बदन में उत्तेजना की लहर दौड़ आ रही थी जो कि इस तनाव भरी स्थिति में भी वह काफी उत्तेजित हो गया था उसे यकीन नहीं हो रहा था कि वह अपनी मां के मुंह से इस तरह के अश्लील शब्दों को सुन रहा है हालांकि वह इससे भी अश्लील बातें सुन चुका था लेकिन आज की बात कुछ और थी आज उसकी मां गुस्से में थी इसलिए उसे बड़ा अजीब लग रहा था लेकिन काफी उत्तेजना आत्मक भी क्योंकि गुस्से में होने के बावजूद भी निर्मला जिस तरह से बिस्तर पर घुटनों के बल बैठी हुई थी उसकी बड़ी-बड़ी खरबूजे जैसी चूचियां हवा में किसी को बारे की तरह झूल रहे थे जिसे देख कर शुभम की उत्तेजना बरकरार होती जा रही थी और उसके पजामे में तंबू सा बन गया था जिस पर निर्मला की भी नजर बनी हुई थी और वह अपने बेटे के पजामे मैंने तंबू को देखकर अंदर ही अंदर उत्तेजित भी हो रही थी लेकिन इस समय वह आगे के बारे में नहीं सोच रही थी ...उसके सामने केवल शीतल ही नजर आ रही थी जो कि उसे ऐसा प्रतीत हो रहा था कि वह उसके बेटे को अपने हुस्न के जलवे से छीन लेना चाहती है जो कि वह ऐसा होने देना नहीं चाहती थी इसलिए शुभम कुछ कहता है इससे पहले वह बिस्तर से उतर कर शुभम के बिल्कुल करीब जाकर उसके सामने ही घुटनों के बल बैठ गई और जबरदस्ती उसके पेंट की बटन खोलने लगी। और पेंट की बटन खोलते हुए बोली ‌।)

क्या शुभम तुझे क्या लगता है कि मैं तेरा लंड पहले की तरह नहीं चुस सकती ...क्या मेरी जीभ तेरे लंड के सुपाड़े पर अपना कमाल नहीं दिखा पाती जो तो उस हरामि के पास गया था अपना लंड चूस वाने ‌।
(ऐसा कहते हुए निर्मला अपने बेटे की पेंट की बटन को खोल चुकी थी और वह पहचाने में से उसके मोटे तगड़े खड़े लंड को बाहर निकालने जा रही थी लेकिन शुभम उसे बार-बार हाथ पकड़ कर रोक दे रहा था हालांकि वह मन ही मन यही चाह रहा था कि उसकी मां जबरदस्ती उसके मोटे तगड़े लंड को मुंह में लेकर चूसने क्योंकि आज तक जो भी हुआ था वह मर्जी से ही हुआ था लेकिन आज बस यही सोच रहा था कि उसकी मां उसके साथ जबरदस्ती करें आगे से वह कुछ भी नहीं करना चाहता था क्योंकि वह नहीं चाहता था कि उसकी मां को यह पता चले इस बात का एहसास हो कि शुभम को केवल औरतों के बदन से प्यार है उनके जज्बातों से नहीं‌।इसलिए वह ना चाहते हुए भी स्थिति को समझकर अपनी मां का हाथ पकड़कर झटके से उसे झटक दिया जिससे उसकी मां पीछे की तरफ गिरते-गिरते बची । शुभम के इस व्यवहार को देखकर निर्मला को इस बात का एहसास हो गया कि उसका बेटा अब उससे प्यार नहीं करता इसलिए वह इतने जोर से उसे धक्का दे दिया वह रोने लगी उसकी आंखों से आंसू गिरने लगे जिसे देखकर शुभम लगभग दौड़ते हुए अपनी मां की तरफ आया लेकिन निर्मला उसे वहीं रोक दी और बोली ।)

नहीं शुभम अब एक कदम भी आगे मत बनाना हमें अच्छी तरह से समझ गई हूं कि तू भी अब बदल गया है तुझे भी शीतल के बदन में अपनी प्यास और अपनी संतुष्टि नजर आने लगी है तभी तो मुझे इस तरह से धक्का देकर हटा दिया अगर तुझे मुझ से जरा भी प्यार होता तो तु मुझे इस तरह से धक्का नहीं देता (वह अपने बेटे से बोले जा रही थी और रोए जा रही थी उसकी स्थिति को देखकर शुभम को भी इस बात का एहसास हुआ कि उसे इतनी जोर से धक्का नहीं देना चाहिए था इसलिए वह माफी मांगते हुए बोला।)

मम्मी मैं तुम्हें धोखा नहीं देना चाहता था लेकिन मैं यह समझाना चाह रहा हूं कि तुम्हें क्या हो गया है‌।

(इतना सुनते ही फिर से निर्मला गुस्से में आ गई और लगभग अपने बेटे पर भड़कते हुए बोली।)

हां हां मैं पागल हो गई हूं .... पागल हो गई हो मैं क्योंकि मैं नहीं चाहती कि तुझे मुझसे कोई छीन ले...

यह कैसी बातें कर रही है मम्मी आखिरकार तुमसे मुझे कौन छीनना चाहता है और कौन छीन लेगा।

शीतल .....शीतल तुझे मुझसे छीन लेगी मैं अच्छी तरह से जानती हूं वह बहुत सातीर है ..बहुत पहले से ही तुझ पर उसकी नजर थी वह तुझे गंदी नजरों से देखती थी तेरे साथ शरीर सुख का आनंद लेना चाहती थी वह कई बार मुझसे बोल भी चुकी थी और इसीलिए मैंने तुझे समझाई थी कि तू उसके आसपास भी मत भटकना लेकिन जो मैं नहीं देखना चाहती थी वही तूने मुझे दिखा दिया। (इतना कहते हुए वह लगातार रोए जा रही थी उसकी आंखों से लगातार आंसू बह रहे थे जिसे शुभम नहीं देखना चाहता था क्योंकि आज तक उसने अपनी मां को इस तरह से रोते हुए नहीं देखा था इसलिए वह भी अंदर ही अंदर रोने लगा उसकी आंखों में भी आंसू आ गए वह किसी भी तरह से अपनी मां को मना लेना चाहता था इसलिए वह बोला।)

हां मम्मी जो तुमने अपनी आंखों से देखी वह बिल्कुल सच था शीतल मैडम मेरा लंड मुंह में लेकर चूस रही थी । (शुभम जानबूझकर इस समय अश्लील शब्दों का प्रयोग कर रहा था क्योंकि अपनी मां की स्थिति उसके नंगे बदन और उसकी बड़ी-बड़ी चुचियों को देखकर उसके तन बदन में उत्तेजना की चिंगारी फूट रही थी) तुमने जो अपनी आंखों से देखी वह बिल्कुल सच था लेकिन उस सच के पीछे की सच्चाई तुम नहीं जानती।

कैसी सच्चाई .....(निर्मला सीसकते हुए बोली)

मैं वहां अपने मन से नहीं किया था मम्मी मैं पहले भी तुम्हें बता चुका हूं मैं वहां जाना ही नहीं चाहता था वह तो बहुत जोर देने पर एग्जाम्स से संबंधित कुछ जरूरी बात करने के उद्देश्य से वह मुझे वहां पर बुलाई।

तू बच्चा नहीं है तो समझदार है अब बड़ा हो चुका है तो अच्छी तरह से जानता था कि वह तुझे किस लिए बुला रही है।

मम्मी में पहले तो यही समझ रहा था कि वह शायद मुझसे ऐसी वैसी हरकत करने के लिए ही वहां बुला रही है लेकिन एग्जाम का नाम लेकर वह मुझे बुलाई तो मैं चला गया और क्लास रूम में जैसे ही पहुंचा हुआ झट से मेरे सामने खड़ी हो गई मैं कुछ समझ पाता इससे पहले जो मुझे अपनी बाहों में भर कर मुझे चूमना शुरु कर दी ....

और उस कल मूवी के चुम्मा चाटी से तुझे मजा आने लगा होगा तभी तो तेरा लंड भी खड़ा हो गया अगर मजा नहीं आता तो खड़ा कैसे होता।

मम्मी तुम पहले मेरी बात सुनो तो सही ।(इतना कहते हुए वह धीरे-धीरे जाकर अपनी मम्मी के पास बैठ गया और उसकी आंखों में आंखें डाल कर बोला ‌‌)

व्ह जिस तरह से मुझे अपनी बाहों में जकड़े हुए थी मैं डर गया था और मैं झटके से उसे दूर कर के वहां से जाने वाला था कि वह मेरा हाथ पकड़ कर बोली‌।

रुक जाओ शुभम अगर तुम कमरे से बाहर जाने की कोशिश भी की है तो मैं शोर मचा दूंगी और कहूंगी कि तुम मेरे साथ छेड़खानी कर रहे थे इतना सुनते ही मैं एकदम से सन्न हो गया .....

क्या ....?(निर्मला अपने बेटे की यह बात सुनकर एकदम गुस्से में और आश्चर्य के साथ बोली)

हां मम्मी शीतल मैडम की बात सुनकर तो मुझे यकीन ही नहीं हो रहा था कि वह क्या कह रही हैं मुझे समझ में नहीं आ रहा कि मैं क्या करूं .... मैं उनके क्लासरूम से निकल जाना चाहता था वहां से भाग जाना चाहता था इसलिए मैं दरवाजा खोलने ही वाला था लेकिन उनकी बात सुनकर मैं एकदम से ठिठक गया ....(शुभम झूठ का सहारा लेकर अपनी मां को किसी भी तरह से मना लेना चाहता था वह अपनी मां को विश्वास दिला देना चाहता था कि जो कुछ भी हुआ था उसमें उसका हाथ बिल्कुल भी नहीं था इसलिए वह अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए बोला।)
मम्मी ने वहां से दरवाजा खोल कर बाहर निकल जाने की स्थिति में बिल्कुल भी नहीं था क्योंकि मैं अच्छी तरह से जानता था कि अगर मैं कमरे से बाहर गया तो हो सकता है वह शोर मचा दे और ऐसे में हम लोगों की इज्जत जाने का डर बना हुआ था सोचो मम्मी अगर ऐसा हो जाता मैं वहां से बाहर निकल जाता और वह औरत शोर मचा देती तो मेरी और तुम्हारी इज्जत का क्या होता तुम स्कूल की टीचर हो और ऐसे में अगर कोई आपके बेटे पर इस तरह का लांछन लगाए तो सोचो कितनी बदनामी होती...(वह अपनी मां को विश्वास दिलाने के लिए लगातार झूठ का सहारा लेकर बातपे बात बनाए जा रहा था और तिरछी नजरों से अपनी मां की मदमस्त गोल गोल खरबूजे जैसी चूचियों को प्यासी नजरों से देखते भी जा रहा था अपनी मां की नंगी चूची को देखकर उसके लंड में तनाव बरकरार था। अपने बेटे की बात सुनकर निर्मला गुस्से में बोली।)

उस हरामजादी की इतनी हिम्मत .... वह मेरे बेटे को झूठा इल्जाम लगाने के बहाने इस तरह से फसाना चाहती थी। मैं उसे छोडूंगी नहीं मैं कल स्कूल जाकर सबके सामने उसके चरित्र को कैसे सबके सामने लाती हूं। (निर्मला एकदम गुस्से में बोल रही थी और उसकी बात सुनकर शुभम को सुकून महसूस हो रहा था उसे यकीन हो गया था कि उसकी मां ने उसकी बातों पर विश्वास कर ली है लेकिन इस बात का डर भी था कि कहीं सच में उसकी मां उससे जाकर झगड़ा ना करने लगे इसलिए वह अपनी मां को समझाते हुए बोला।)

नहीं मम्मी ऐसा बिल्कुल भी मत करना जो हुआ उसे जाने दो मैं नहीं चाहता कि इस तरह की बातें बाहर समाज में फैले और इससे हम दोनों की ही बदनामी होगी सबको ऐसा ही लगेगा कि जरूर मैं इस तरह का लड़का हूं तभी उसने मेरे सामने इस तरह का प्रस्ताव रखी। ....
(शुभम की बात सुनकर निर्मला कुछ हद तक शांत होने लगी .. वह अपने आंसू पोंछते हुए बोली।)

नहीं बेटा उसे सबक सिखाना ही पड़ेगा मैं कितना डर गई थी तू नहीं जानता देख अभी तक मेरी सांस कितनी तेजी से चल रही है।(इतना कहते हुए निर्मला अपने बेटे का हाथ पकड़कर अपनी छाती पर रख दी जोकी वह अपने बेटे की हथेली को अपनी चूची के ऊपरी सतह पर रखी थी जिससे शुभम उत्तेजित होने लगा..अपनी मां की छाती पर हथेली रखकर उसे इस बात का अहसास हुआ कि वास्तव में उसकी मां पूरी तरह से डर गई थी तभी उसके दिल की धड़कन बड़ी तेजी से चल रही थी। शुभम उत्तेजना आत्मक स्थिति में अपनी मां की छाती को हल्के हल्के सहलाते हुए बोला।)...
हां मम्मी मैं अच्छी तरह से जानता हूं कि आप बहुत डर गई हैं तभी तो आप इस तरह की बातें कर रही थी और कभी भी यह मत समझना कि मैं तुम्हें छोड़ कर जाऊंगा मैं तुम्हें कभी भी पापा की तरह नहीं छोड़ कर जाऊंगा। .

बेटा मुझे बहुत डर लगता है मैं फिर से अकेली नहीं होना चाहती हूं...बरसों के बाद मुझे तेरा सहारा मिला है मेरे सहारा नहीं खोना चाहती मैं नहीं चाहती कि कोई और तुझे अपना बना ले.
(निर्मला पूरी तरह से जज्बाती हुए जा रही थी और वास्तविकता यही थी कि वह अपने बेटे को खोना नहीं चाहती थी किसी भी कीमत पर और यह बात शुभम भी अच्छी तरह से जानता था तभी तो आज उसे अपनी मां का एक नया रूप देखने को मिला था।.. शुभम धीरे-धीरे अपनी हथेली को अपनी मां की बड़ी बड़ी छातियों की गोलाई पर रखते हुए बोला)

मुझे कोई भी अपना नहीं बना लेगा मम्मी और बनाना भी चाहेगा तो मैं उसका नहीं बनूंगा भला इस धरती पर तुमसे खूबसूरत औरत होगी कहीं तुम बहुत खूबसूरत मम्मी।( इतना कहते हुए शुभम उत्तेजित अवस्था में अपनी मां की एक चूची को अपनी हथेली में भर कर दबाना शुरू कर दिया...)

बेटा मैं भी यही चाहती हूं कि तू किसी और का ना होकर जिंदगी भर सिर्फ मेरा ही रहे।

ऐसा ही होगा मम्मी मैं जिंदगी भर सिर्फ और सिर्फ तुम्हारा ही रहूंगा .....(इतना कहते हुए शुभम एकदम भावुक हो गया अपने बेटे की बात सुनकर निर्मला की आंखों से आंसू बहने लगे जो कि यह आंसू दर्द और वेदना कि नहीं बल्कि स्नेह और खुशी के थे भावना में बहते हुए और अपनी मां की मदमस्त मादक बदन की खुशबू में मदहोश होते हुए शुभम अपनी मां के खूबसूरत चेहरे को अपने दोनों हथेली में लेकर अपने होठों को उसके करीब ले जाने लगा इतना करीब कि दोनों की गर्म सांसे एक दूसरे के चेहरे पर अपनी कशिश छोड़ रही थी शुभम अब बेहद चालाक हो गया था क्योंकि अपनी मदहोश जवानी का स्वाद चखा कर निर्मला अपने बेटे को पूरी तरह से मर्द बना चुकी थी जो कि हर औरत की पहली पसंद होती है और अपनी मर्दानगी दिखाते हुए शुभम अपने होठों को अपनी मां के लाल होठों के बेहद करीब ले जाने लगा । निर्मला तनाव भरी स्थिति से बाहर निकलने लगी थी दोनों की सांसो की गति तेज चलने लगी एक बार फिर से दोनों का मिलन होने वाला था जिससे निर्मला और शुभम के बदन में अत्यधिक उत्तेजना का अनुभव और एहसास हो रहा था क्योंकि जिस तरह की स्थिति बनी हुई थी उससे ऐसा ही लग रहा था कि अब शायद ही दोनों के मन और तन एक हो लेकिन बहुत ही जल्द शुभम ने स्थिति को संभाल लिया था और एक बार फिर से वह अपनी मां के मदमस्त बदन को अपनी बाहों में भरने के लिए मचल रहा था और निर्मला खुद अपनी मदहोश जवानी को अपने बेटे के हाथों लूटवाने के लिए तैयार थी। एक बार फिर से आधी रात के समय निर्मला के कमरे में और वह भी उसके ही बिस्तर पर एक अद्भुत दृश्य नजर आने वाला था इस समय घर पर अशोक नहीं था यह बात दोनों अच्छी तरह से जानते थे इसलिए दोनों संपूर्ण रूप से निश्चिंत होकर एक दूसरे में समाने की कोशिश करते हुए आगे बढ़ रहे थे।
निर्मला इस समय अर्धनग्न अवस्था में थी उसकी खरबूजे जैसी चूचियां सीना ताने किसी सैनिक की भांति दुश्मन को ललकार रही थी । और शुभम भी अपनी मां की मदमस्त नुकीली जवानी का सामना करने के लिए पूरी तरह से तैयार था धीरे-धीरे शुभम के तपते हुए होंठ अपनी मां के लाल लाल होठों के इतने करीब पहुंच गए कि निर्मला कि दहकती हुई जवानी की गर्मी शुभम को अपने होठों पर साफ साफ महसूस होने लगी। शुभम से अब बिल्कुल भी रहा नहीं जा रहा था और यही स्थिति निर्मला की भी थी.. ‌ वह भी अपने बेटे से एक पल की भी दूरी बर्दाश्त नहीं कर पा रही थी एक अजीब सी स्थिति सेवर गुजर चुकी थी जिस तरह से उसने शुभम को शीतल के साथ उस अवस्था में देखी थी उसे देखकर एक प्रेमिका और एक पत्नी का हाल होता है वही हाल निर्मला का भी था वह कुछ घंटों में ही ... जैसे बरसों का दर्द झेल गई थी एक वेदना उसके तन बदन में घर कर गई थी लेकिन वह मन ही मन भगवान का लाख-लाख शुक्र अदा कर रही थी कि जल्द ही वह स्थिति से बाहर आ गई थी और एक बार फिर से शुभम को पा चुकी थी। और इसी खुशी में वह शुभम से एकाकार होने के लिए तड़प रही थी और देखते ही देखते शुभम अपने प्यासे होठों को अपनी मां की दहकते हुए होठों पर रखकर उसके होठों का रसपान करना शुरू कर दिया ....

शुभम पागलों की तरह अपनी मां के होठों को अपने मुंह में भर कर उसे चूस रहा था ऐसा लग रहा था कि मानो वह किसी गुलाब की पत्ती को मुंह में लेकर उसके रस को निचोड़ रहा हो और उसकी मां भी उसका साथ देते हुए अपने फोटो के बीच से अपनी जीभ निकाल कर उसके मुंह में डाल कर उसके होठों का आनंद लेने लगी.. ...

ऐसा लग रहा था मानो होठों के जरिए शुभम अपनी मां की मदमस्त जवानी को पूरे बदन से निचोड़ लेना चाह रहा था इस तरह से वह पागलों की तरह अपनी मां के होठों को चुसे जा रहा था और साथ ही अपना एक हाथ उसकी मद मस्त तनी हुई जवानी पर रखकर उसे दबाना शुरू कर दिया था जोकि खरबूजे की तरह गोल गोल थी निर्मला को दुगना मजा आ रहा था एक तो होठों का रसपान और दूसरी तरफ स्तन मर्दन उसके तन बदन में आग लगा रही थी।
दोनों एक दूसरे को छोड़ना नहीं चाहते थे निर्मला का हाथ जल्द ही शुभम के पजामे पर पहुंच गए और वह उठो का चुंबन लेते लेते ही अपने उंगलियों की करामत दिखाते हुए अपने बेटे के पजामे के बटन को खोलकर उसे नीचे सरकाने की कोशिश करने लगी।जो कि बैठे होने की वजह से उसका पजामा नीचे नहीं उतर रहा था इसलिए शुभम अपनी मां के होठों के रस को पीते हुए ही हल्के से अपनी गांड को ऊपर उठा दिया जिससे निर्मला को उसका पहचाना उतारने में आसानी होने लगी और वह तुरंत अपने बेटे के पजामे को खींचकर घुटनों तक कर दी लेकिन अभी भी निर्मला को उसके खिलौने तक पहुंचने में उसका अंडरवियर बाधा रूपबन रहा था जिसे वह एक झटके से नीचे की तरफ सरका दी हालांकि वह अपनी नजरों से अपने बेटे की टांगों के बीच देख नहीं रहे थे लेकिन अपनी हथेली के स्पर्श से ही अंदाजा लगा ले रही थी कि कौन सा वस्तु कहां पर है जल्द ही उसके हाथ में शुभम का मोटा तगड़ा लंबा लंड जो कि इस समय पूरी तरह से टनटनाया हुआ था वह उसके हाथ लग गया. ‌‌

अपने बेटे के मोटे तगड़े लंड को अपनी हथेली में भरते ही उसके मुख से गर्म सिसकारी फूट पड़ी क्योंकि निर्मला को ऐसा महसूस हो रहा था कि इस समय उसके बेटे का लंड कुछ ज्यादा ही मोटा हो गया था.... अपने मोटे तगड़े लंड को अपनी मां की हथेली ने महसूस करते ही शुभम कुछ ज्यादा ही उत्तेजित हो गया और अपनी मां की जीप को अपने दांतों तले दबा दिया जिससे निर्मला को दर्द तो हुआ लेकिन मजा भी बहुत आ रहा था इसलिए वह कुछ बोली नहीं बस हल्के से सिसक कर रह गई दोनों एक दूसरे के होठों का रसपान करने में पूरी तरह से मगन हो चुके थे और निर्मला तो अपने बेटे के मोटे तगड़े लंड को अपने हाथ में लेकर हिलाना शुरू कर दी थी जो कि बेहद लुभावना और काफी हद तक भयंकर भी लग रहा था जिसे निर्मला अपनी बुर में लेने के लिए तड़प रही थी शुभम अपनी मां की चूची को बारी-बारी से दबाते हुए दोनों को एकदम लाल टमाटर की तरह लाल कर दिया था।

दोनों के बीच इस समय किसी भी प्रकार का वार्तालाप नहीं हो रहा था और दोनों किसी संवाद के लिए तैयार भी नहीं थे क्योंकि वह एक दूसरे के अंगों से आनंद ले रहे थे। पूरे कमरे में निर्मला की सिसकारी की आवाज गूंजने लगी थी ।

दीवार पर लगी घड़ी में 12:15 का समय हो रहा था 24:00 से भी ज्यादा समय गुजर चुका था लेकिन इस समय दोनों की आंखों से नींद कोसों दूर थी निर्मला के बिस्तर पर वह अपने बेटे के साथ अपनी जवानी लुटा रही थी शुभम बारी बारी से निर्मला के दोनों खरबूजे से खेल रहा था जो कि इस समय दबाने की वजह से टमाटर की तरह लाल हो चुके थे और शुभम अपनी मां के मुख से निकल रही गर्म सिसकारी की आवाज और उसकी गर्म सांसों के एहसास से पूरी तरह से मदहोश हो चुका था वह किसी भी कीमत पर अपनी मां के लाल लाल होठों को अपने मुंह से आजाद करना नहीं चाहता था एक अजीब सा नशा उसकी आंखों में छाने लगा था।

लगातार निर्मला अपने बेटे के मुसल जैसे लंड को हीलाए जा रही थी उसकी गर्मी उसके तन बदन में आग लगा रही थी। उत्तेजना के मारे टांगों के बीच छिपी उसकी रसीली बुर कचोरी की तरह फूल पिचक रही थी ऐसा लग रहा था मानो कोई उसमें हवा भर रहा हो और बार-बार उस में से हवा निकल जा रही हो उसमें से मदन रस का रिसाव बराबर हो रहा था जिससे उसकी पेंटी पूरी तरह से गीली हो चुकी थी। कुछ देर तक दोनों यूं ही एक दूसरे के अंगों से मन भर कर खेलते रहे दोनों की सांसें तेज गति से चल रही थी इसी दौरान निर्मला लगभग 1 बार झड़ चुकी थी लेकिन शुभम अभी भी बरकरार था लेकिन जिस गर्मी और हथेली की कसाव को बराबर बढ़ाते हुए निर्मला अपने बेटे के लंड को हिला रही थी उसे देखते हुए शुभम को लग रहा था कि उसका लंड पानी फेंक देगा लेकिन फिर भी वह अपनी मां को रोक सकने की स्थिति में बिल्कुल भी नहीं था क्योंकि उसे बहुत मजा आ रहा था। लेकिन निर्मला को इससे ज्यादा की उम्मीद थी इसलिए वह इस क्रम को तोड़ दी जैसे ही वह अपने होठों को अपने बेटे के होठों से अलग की मानो ऐसा लग रहा था कि उसकी सांस फूल रही हो वह इतनी गहरी गहरी सांसे ले रही थी....
बहुत दिनों बाद ऊन दोनों ने इस तरह की गाढ़ चुंबन का आनंद लिया था । निर्मला और शुभम दोनों पूरी तरह से हाथ रहे थे दोनों एक दूसरे की आंखों में देखते हुए मुस्कुराने लगे हालांकि अभी भी निर्मला अपने बेटे के लंड को थामे हुए थे जो कि उस समय उसकी हथेली में बड़ा भयंकर लग रहा था और मुस्कुराते हुए वह अपने बेटे के मोटे तगड़े लंड के कड़क पन को महसूस करते हुए उसकी तरफ देखी तो बोली।

बेटा आज तो लग रहा है कि तेरा लंड कुछ ज्यादा ही मोटा और लंबा हो चुका है।

हां मम्मी मुझे भी ऐसा लग रहा है यह सब तुम्हारे हाथ का जादू है तुम्हारा हाथ पड़ते ही इसमें जान आ जाती है।

चल बातें मत बना अगर ऐसा ही होता तो शीतल को लंड चूस जाते समय तेरा लंड एकदम खड़ा नहीं होता लगता है उसके हाथों में भी जादू है ।(निर्मला आहिस्ता आहिस्ता अपने बेटे के लंड को हिलाते हुए बोली।)

नहीं मम्मी ऐसा बिल्कुल भी नहीं है मैं सही कह रहा हूं तुम्हारे हाथों में जादू है तभी तो आज यह कुछ ज्यादा ही मोटा और लंबा लगने लगा है। (शुभम पीछे की तरफ झुक कर अपना पूरा वजन अपने हाथ के दोनों कहानियों पर टिका दिया और अपनी कमर को हल्के से और ऊपर उठा दिया जिससे उसका मोटा तगड़ा लंड और भी ज्यादा भयंकर लगने लगा जिसे देखते ही निर्मला के मुंह के साथ-साथ उसकी बुर में भी पानी आ गया।)

क्या तू सच कह रहा है शुभम क्या तुझे तब मजा नहीं आया था जब शीतल तेरे लंड को अपने मुंह में लेकर चूस रही थी।

नहीं मम्मी मुझे बिल्कुल भी मजा नहीं आया था वह तो मेरी मजबूरी थी इसलिए मैं वहां खड़ा था वरना कब से भाग गया होता।

तो क्या सच में मेरी तरह कोई भी लंड नहीं सोचता जितना मजा मैं तेरे लंड को चूस कर देती हूं कोई भी इतना मजा नहीं देता।(निर्मला उसी तरह से शुभम के लंड से खेलते हुए बोली)

मैं सच कह रहा हूं मम्मी कसम से मैं तो बल्कि तड़पता रहता हूं कि कब में अपने मोटे लंड को तुम्हारे मुंह में डालकर चुसवाऊ ।(शुभम अपनी मां से इस तरह की अश्लील बातें करके पूरी तरह से उत्तेजित हो गया था और इसलिए वह अपनी कमर को हल्के हल्के उसकी हथेली में आगे पीछे कर रहा था जिससे उसे बहुत मजा आ रहा था अपने बेटे के इस उत्तेजना आत्मक उतावलापन को देखकर वह मुस्कुराते हुए बोली।)

सच कहूं तो सुभम मुझे भी तेरे लंड को अपने मुंह में लेकर चूसने में जो मजा आता है वैसा मजा कभी नहीं आता.... (निर्मला अपने बेटे के लंड को ललचाई आंखों से देखते हुए बोली)

तो देर किस बात की है मम्मी कुंवा भी तुम्हारे सामने है और प्यासा भी तुम्हारे सामने है ‌।(शुभम अपनी कमर को हल कैसे उठाते हुए अपनी मां को इशारे में समझाते हुए बोला जो कि अपने बेटे के इसी सारे को निर्मला अच्छी तरह से समझती थी और वह मुस्कुराते हुए बोली)

मैं भी तेरे लंड की प्यासी हूं और आज तेरे लंड को अपने मुंह में लेकर अपनी प्यास अच्छी तरह से बुझाऊंगी.....(इतना कहने के साथ ही निर्मला अपने बेटे की दोनों टांगों के बीच की जगह पर झुकने लगी और जैसे जैसे वह झुक रही थी वैसे वैसे शुभम की सांसो की गति तेज होती जा रही थी एक अजीब सी हलचल उसके तनबदन को झकझोर कर रख दे रही थी। और देखते ही देखते निर्मला अपने बेटे के मोटे तगड़े लंड को आइसक्रीम कौन की तरह धीरे-धीरे करके उसे अपने मुंह की गहराई में उतार ली।)
. Gusse me bhi nirmala be had khubsurat lagti he

 
जैसे ही निर्मला ने शुभम के मोटे तगड़े लंबे लंड को अपने मुंह की गहराई अपने गले तक उतारी एक अजीब और अद्भुत अहसास के साथ ही शुभम के मुख्य से गरम आह निकल गई उसे एक अद्भुत सुख का अहसास हो रहा था आनंद की अनुभूति के सागर में व डुबकी लगाता हुआ मदहोश पलको जीते हुए वह अपनी आंखों को बूंद लिया वह इस पल की गहराई में खो जाना चाहता था वह चाहता था कि यह पल यही रुक जाएं।निर्मला जिस तरह से अपने बेटे के लंड को धीरे-धीरे करके अपने होठों की रगड़ से गोल बनाकर अपने बेटे के मोटे लंड को अपने मुंह के अंदर ली थी एक अजीब सा अहसास दोनों के तनबदन मैं अपना असर छोड़ गया था‌।
शुभम को अपनी मां के मुंह में लंड की अनुभूति इस समय बुर के अंदर उसकी गहराई नापते लंड की तृप्ति से भी ज्यादा सुखद एहसास दिला रहा था धीरे-धीरे करके शुभम अपनी कमर को उसी स्थिति में हल्के हल्के ऊपर नीचे करते हुए अपनी मां के मुंह कोई चोदना शुरू कर दिया और दूसरी तरफ निर्मला भी कहां पीछे हटने वाली थी वह भी अपने होठों को बार-बार ऊपर से नीचे की तरफ और वह भी एकदम कसाव भरी स्थिति में लंड चूसने का आनंद ले रही थी शुभम से रहा नहीं जा रहा था इस समय निर्मला के मुख से नहीं बल्कि शुभम के मुख से गर्म सिसकारी की आवाज गूंज रही थी।

शशशशशश.....आहहहहहहहह..... मम्मी यह क्या है मम्मी मुझे ऐसा लग रहा है कि मैं जैसे हवा में उड़ रहा हूं बहुत मजा आ रहा है मम्मी बस ऐसे ही ऐसे ही मेरा लंड को चुस्ती रहो मुझे बहुत मजा आ रहा है। आहहहहहहहह........ (निर्मला अपने बेटे की बातें और उसके मुख से निकल रही कर्म सिसकारी की आवाज को सुनकर एकदम मदहोश होने लगी थी और वह जोर-जोर से अपने मुंह को ऊपर नीचे करते हुए लंड की चुसाई कर रही थी बल्कि लंड की चुसाई नहीं मानो कि वह अपने मुंह से अपने बेटे के लंड को चोद रही थी। शुभम से यह स्थिति संभाले नहीं संभल रही थी हद से ज्यादा उसे अपने अंदर उत्तेजना का अनुभव हो रहा था उसके लंड की नसें इतनी ज्यादा कड़क हो चुकी थी कि मानो ऐसा लग रहा था कि अभी फट पड़ेगी पूरे बदन में अजीब सा अहसास चुटकी काट रही थी।
लगातार वह अपनी कमर को ऊपर नीचे करते हुए चुदाई के अहसास से भरा जा रहा था वह अपने दोनों हाथ को आगे लाकर उसे अपनी मां के रेशमी घने बालों में उलझा दिया और हल्के से रेशमी बालों को अपनी मुट्ठी में भींच कर खुद ही उसके मुंह को ऊपर नीचे करने लगा। अपने बेटे की इस हरकत पर निर्मला को भी बहुत मजा आ रहा था वह पूरी तरह से मदहोश होने लगी थी उसकी बुर में खुजली मच रही थी और बिना एक पल गांव आए वह अपनी स्थिति को बदलते हुए और अपनी बेटे के लंड को बिना मुंह से निकाले वह अपनी स्थिति को बदलने के लिए अपने बेटे की तरफ घूम गई और जल्द ही अपने घुटनों के बल होकर शुभम की चौड़ी छाती ओके इर्द-गिर्द अपनी जगह बना ली हालांकि कमर के नीचे अभी भी वह साड़ी में लिपटी हुई थी लेकिन अपनी मां की बदलती स्थिति को देखकर शुभम को समझते देर नहीं लगी कि उसे क्या करना है और वह तुरंत अपने दोनों हाथों से अपनी मां की साड़ी को ऊपर की तरफ उठाने लगा और अगले ही पल वह अपनी मां की साड़ी को कमर तक उठा दिया था अब उसकी आंखों के सामने उसकी मां की मदमस्त गोरी गोरी गाल लाल रंग की पेंटी में लिपटी हुई थी जिसे देखते ही उसके मुंह में पानी आने लगा और वह अपनी उत्तेजना को दर्शाने हेतु अपने दोनों हाथों की मदमस्त गांड पर चपत लगाने लगा जिसकी वजह से लंड चूसते चूसते निर्मला के मुंह से आह निकल गई ।
दोनों मां-बेटे इस समय बिस्तर पर गदर मचाए हुए थे... शुभम लगातार अपनी मां की मदमस्त गांड पर दोनों हाथों से चपत लगाए जा रहा था और हर चपत के साथ निर्मला के मुख से आह निकल जा रही थीं।
जिससे निर्मला को दर्द नहीं बल्कि आनंद की अनुभूति हो रही थी। और शुभम को इस तरह से अपनी मां की गांड पर थप्पड़ लगाने में जो आनंद मिल रहा था वह उसे अद्भुत सुख का एहसास करा रहा था बार-बार वह अपनी मां की मदमस्त गांड को बड़े-बड़े तरबूज की भांति अपनी हथेली में भरकर दबा दे रहा था वह इतनी ज्यादा उत्तेजित हो चुका था कि वह अपनी मां की पेंटिंग को भी उतारने की तस्दी बिल्कुल भी नहीं लिया।और अपनी मां की लाल रंग की पेंटी को एक छोर से पकड़ कर उसे दूसरी तरफ है खींचकर केवल फूली हुई बुर को उजागर कर दिया ... निर्मला के पूर्वी हिस्से में उत्तेजित होकर इतनी ज्यादा भूल चुकी थी कि ऐसा लग रहा था मानो गरमा गरम कचोरी हो और इसी वजह से ही पेंटिंग का दूसरा छोड़ दूसरे किनारे पर अटक गया जिससे शुभम की आंखों के सामने उसकी मां की मदमस्त रसीली पुर एकदम साफ साफ नजर आने लगी उसे देखते ही शुभम की आंखों में मदहोशी का नशा छाने लगा उसके मुंह में पानी आने लगा निर्मला भी अपने बेटे की इस हरकत की वजह से पूरी तरह से मस्त हुए जा रही थी और लगातार अपने बेटे के लंड को चूसने जा रही थी।
शुभम बड़े गौर से अपनी मां की मदमस्त रसीली बुर को देखे जा रहा था मानो बहुत दिनों बाद उसके दर्शन कर रहा हो और देखते ही देखते उत्तेजना के मारे निर्मला की फूली हुई कचोरी समान बुर में से उसका मदन रस टपक कर सीधे शुभम के होठों पर जा गिरा .... जिसे शुभम अमृत की बूंद समझकर चाट गया और अगले ही पल जिस तरह से उसकी मां उसके लंड पर टूट पड़ी थी उसी तरह से वह भी भूखे शेर की तरह अपनी मां की रसीली बुर को चाटना शुरु कर दिया। शुभम जितना हो सकता था अपनी जीभ को बाहर निकालकर अपनी मां की बुर की गहराई में उतार देना चाहता था वह उसके नमकीन और उसको लगातार जीभ के सहारे अपने गले के नीचे गटक रहा था।

निर्मला अपने बेटे के इस तरह से बुर की चटाई से आनंद विभोर हुए जा रही थी और लगातार गोल-गोल अपनी मदमस्त गांड को घुमाते हुए अपने बेटे से अपनी बुर चटवा रही थी। शुभम दोनों हाथों से अपनी मां की बड़ी बड़ी गांड कथा में बुर चाट रहा था उसमें से निकल रहा मदन रस उसके चेहरे को पूरी तरह से भिगो दिया था उसके खारे नमकीन रस से वह अपने तन बदन को तृप्त करने में लगा हुआ था।।
निर्मला पूरी तरह से मदहोश हुए जा रही थी ऐसा लग रहा था मानो उसे इतने से भी तृप्ति नहीं मिल रही है बहुत जोर जोर से अपनी बड़ी-बड़ी भरावदार गांड को अपने बेटे केचेहरे पर पटक रही थी। उसका इस तरह से चेहरे पर अपनी बड़ी बड़ी गांड पटकना शुभम के लिए निर्देश था कि इससे भी ज्यादा की तमन्ना उसके तन बदन को झकझोर रही है इसलिए वह एक साथ अपनी दोनों उंगलियों को अपनी मां की बुर के अंदर डालकर उसे अंदर बाहर करते हुए उंगली से उसकी बुर को चोदने लगा और साथ ही अपनी जीत का कमाल दिखाते हुए उसकी बुर को चाट कर उसके रस को पीता रहा।

दोनों बोल कुछ नहीं रहे थे बल्कि इशारे इशारे में अपनी भावनाओं को एक दूसरे को बता रहे थे जो कि दोनों एक दूसरे से इतने ज्यादा समझदारी से बने हुए थे कि दोनों एक दूसरे के इशारे को अच्छी तरह से समझ कर और उसी तरह की हरकत कर रहे थे पूरे कमरे में कोहराम मचा हुआ था लगातार शुभम और निर्मला की सिसकारी पूरे कमरे में गूंज रही थी घड़ी में तकरीबन एक बज चुके थे और दोनों बिस्तर पर गदर मचाए हुए थे।

लाल रंग की पेंटी में निर्मला की कसी हुई गोरी गोरी गांड किसी झील में कमल की तरह लग रही थी जिसे देखकर शुभम पूरी तरह से पागल हो चुका था और वह बुर से निकल रहे मदन रस में अपने चेहरे को पूरी तरह से तरबतर करके उसे चाह रहा था और अपनी उंगली से उसकी गहराई नाप रहा था जिससे निर्मला पूरी तरह से मदहोश होने लगी थी....
कुछ ही देर में निर्मला को अपनी फंसी हुई बुर में शुभम के मोटे तगड़े लंड की रगड़ की कमी महसूस होने लगी और वह तुरंत अपने बेटे के लंड को मुंह में से निकाल कर पीछे की तरफ नजर घुमाई तो अपने बेटे को बुर के रस में सना हुआ देखकर मन ही मन मुस्कुराते हुए उत्तेजित होने लगी.... वह पीछे की तरफ हाथ ले जाकर शुभम के बाल को सहलाने लगी मानो जैसे इस काम के लिए उसे शाबाशी दे रही हो शुभम तो लगातार निर्मला की बुर में खोया हुआ था ऐसा लग रहा था कि अगर जगह मिले तो वह बुर के अंदर ही घुस जाए। शुभम के जीव की कमाल को देखते हुए निर्मला अपनी उत्तेजना को सहन नहीं कर पाई थी और दूसरी बार झड़ चुकी थी अब उसे अपनी बुर में मोटे तगड़े लंड की आवश्यकता पड़ रही थी इसलिए वह अपने बेटे के बाल को सहलाते हुए बोली।

बस कर शुभम सारी रात ऐसे ही गुजार देगा क्या अब मेरी बुर में चींटियां रेंग रही है जल्द से जल्द इसमें अपना मोटा तगड़ा लंड डालकर मेरी खुजली मिटा दे. .....((अपनी मां की बात सुनते ही शुभम निर्मला की बड़ी बड़ी गांड से अपना चेहरा हटाया तो वह पूरी तरह से हांफ रहा था। वह समझ गया था कि अब उसकी मा एक जबरदस्त चुदाई के लिए तड़प रही है। इसलिए वह भी हांफते हुए बोला।)

तो देर किस बात की है मेरी जान मेरा लंड तो हमेशा तुम्हारी बुर के लिए ही बना है आ जाओ मैं तुम्हें लंड की सवारी कराता हूं। (इतना कहते हुए वह अपने ऊपर से अपनी मां को हटाने लगा और अगले ही पल निर्मला पीठ के बल अपनी दोनों टांगे फैलाए लेटी हुई थी और अपने एक हाथ से अपनी बचर की गुलाबी पंखुड़ियों के बीच के दाने को सहला रही थी...।और देखते ही देखते एक हाथ से अपने लंड को हिलाते हुए शुभम अपने लिए जगह बनाने लगा‌।
वह अपनी मां की मोटी मोटी जानू को अपने दोनों हाथों से पकड़ कर उसे अपनी तरफ खींचा जिससे उसकी मोटी मखमली मांसल जान शुभम की जहां पर आ गई जिससे शुभम के लिए बुर्का द्वार पूरी तरह से आमंत्रित करते हुए हल्की सी खुल गई और उसे देखकर लंड अपने आप उनकी मारने लगा मानो निर्मला की मदहोश कर देने वाली जवानी को सलामी दे रहा हो।

उत्तेजना के मारे निर्मला का गला सूखे जा रहा था लेकिन वह अपने आपको अगले पल के लिए पूरी तरह से तैयार कर चुकी थी उसे अच्छी तरह से मालूम था कि कुछ ही सेकंड में उसके बेटे का मोटा तगड़ा लंड उसकी बुर की गहराई में खो जाएगा और वह उसकी मस्ती भरी जुदाई के आलम में मदहोश होते हुए अपना अस्तित्व को पिघला देगी इसलिए वह धड़कते दिल के साथ अपने बेटे की अगली हरकत का बेसब्री से इंतजार करने लगी और शुभम एक हाथ से अपने लंड को पकड़ कर अपनी मां की रसीली टपकती हुई बुर पर उसके सुपाड़े को रखकर उसे ऊपर नीचे करते हुए रगड़ने लगा जिसकी रगड़ पाते हैं निर्मला की बुर उत्तेजना के मारे फूलने पिचकने लगी। अब निर्मला से एक पल भी सह पाना मुश्किल हो जा रहा था इसलिए वह खुद ही अपना एक हाथ आगे बढ़ा कर अपने बेटे के लंड को पकड़ कर उसके सुपाड़े को अपनी बुर की गुलाबी पत्तियों के बीच दबाने लगी।
अपनी मां की नरम नरम गोलियों का स्पर्श पाते ही और उसकी हरकत को देखकर शुभम और ज्यादा उत्तेजित हो गया और इस बार अपनी मां की दोनों टांगों को पकड़कर अपनी कमर को हल्के से अंदर की तरफ धक्का दिया जिससे पहले से ही गीली बुर होने की वजह से उसके लंड का सुपाड़ा बुर के अंदर सरक गया जिससे निर्मला पूरी तरह से मदहोश हो गए और वह अपना हाथ हटाकर दोनों हाथों से अपनी बड़ी-बड़ी चूचियों को थाम ली। ऐसा लग रहा था मानो कि वह अपने हाथ को आगे बढ़ा कर सिर्फ शुभम को रास्ता दिखाना चाह रही थी और शुभम भी अपनी मां का दिशानिर्देश पाकर अगले ही झटके में अपने लंड को आधा अपनी मां की बुर में गाड़ दिया एक बार फिर से वह सिसक उठी दोनों इस मद भरी स्थिति का भरपूर आनंद लूट रहे थे ।
निर्मला अपने चेहरे को उठाकर अपनी टीमों के बीच की स्थिति का जायजा लेने के लिए उस पर नजर खेल रहे थे और अपनी टांगों के बीच की स्थिति को देखते हुए वह अपने बेटे की मर्दानगी पर गर्व कर रही थी उसे नाचता अपने बेटे के मोटे तगड़े लंड पर जो कि इस समय आधा उसकी बुर में घुसा हुआ था लेकिन उसे ऐसा महसूस हो रहा था कि पूरा घुस गया है उसके चेहरे पर तृप्ति भरा एहसास साफ नजर आ रहा था जो कि अभी भी वह अधूरा ही था वह जानती थी कि अभी असली काम तो बाकी है इसलिए वह अपने हाथों की कोहनी पर अपना वजन देकर लगातार अपनी टांगों के बीच की स्थिति को देखने लगी और यह देखकर शुभम की उत्तेजना बढ़ने लगी कि उसकी मां उसकी बुर के अंदर बाहर हो रहे मोटे तगड़े लंड को देखना चाह रही है और वह स्थिति को समझते हुए अपनी मां की कमर को थाम लिया और अगला तेज धक्का लगाया ....
अब एक ही झटके में शुभम का मोटा तगड़ा लंड निर्मला की बुर की अंदरूनी अड़चनो को एक तरफ करता हुआ सीधे जाकर बुर की गहराई में गड़ गया ...प्रहार इतना जबरदस्त था कि जैसे ही शुभम का मोटा तगड़ा लंड बुर की गहराई में पहुंचा वैसे ही निर्मला के मुख से दर्द भरी आह निकल गई लेकिन ऐसे दर्द की वह आदी हो चुकी थी इसलिए यह दर्द उसके लिए अद्भुत उन्माद से भरा आनंद था जिससे वह पल भर में ही गर्म सिसकारी की आवाज निकालने लगी। .... शुभम अपने मोटे तगड़े लंड को अपनी मां की बुर की गहराई में डाले हुए ही उसकी आंखों में देखने लगा और मदहोश भरी आंखों से निर्मला भी अपने बेटे को देख रही थी दोनों की नजरें आपस में टकराई निर्मला के तन बदन में मीठी सी लहर दौड़ने लगी हालांकि कमर के नीचे अभी भी वह वस्त्र पहने हुए थी जल्दबाजी में और उत्तेजना के अधीन होकर शुभम ने कमर से नीचे के वस्त्र नहीं उतारे थे और लाल रंग की पेंटी को एक किनारे करके बस बुर के गुलाबी छेद जितनी ही जगह को खोल दिया था। इससे अर्धनग्न अवस्था में चुदवाने का आनंद निर्मला के लिए अत्यधिक उत्तेजना भरा था उसे अपने बेटे की इस हरकत पर और ज्यादा मजा आ रहा था।

दोनों गहरी गहरी सांसे ले रहे थे। सारी दुनिया से बेखबर दोनों एक दूसरे में समाने के लिए पूरी तरह से तैयार हो चुके थे निर्मला बार-बार अपनी मोटी मांसल जांघों के बीच नजर डाल दे रही थी। जहां पर उसकी छोटी सी रसीली बुर के मुख्य द्वार पर उसके बेटे का मोटा तगड़ा लंड जड़ तक घुसा हुआ था।
निर्मला को साफ साफ दिखाई दे रहा था कि उसकी बुर वास्तव में कचोरी की तरह खुली हुई थी जो कि इस समय तवे पर शेंका ही रोटी की तरह एकदम गरम थी। बेहद अद्भुत नजारा था और वह खुद इस नजारे को जी रहे थे यह उसके लिए गर्व की बात थी उम्र के इस दौर मैं उसे ऐसे मोटे तगड़े लंड से चुदाई करवाकर संतुष्टि भरा एहसास मिल रहा था यह उसके लिए सौभाग्य वाली बात थी वरना ऐसी उम्र में अक्सर औरतें प्यासी होकर केवल करवटें ही बदलती रहती है। लेकिन निर्मला उन औरतों में अपवाद थी वह खुशकिस्मत थी कि इस उम्र में उसे मोटे तगड़े लंबे लंड से चुदाई करने का सुनहरा मौका मिल रहा था और वह सुनहरे मौके का भरपूर फायदा उठाते हुए अपनी जवानी के रस को बाहर निकाल रही थी। शुभम की हालत खराब होती जा रही थी उसकी आंखों में खुमारी छाई हुई थी ऐसा लग रहा था कि जैसे उसे चार बोतल का नशा हो गया है और वैसे भी बहुत ही ज्यादा नशीली चीज का लुफ्त उठा रहा था निर्मला की मदहोश जवानी किसी शराब के नशे से कम नहीं थी ‌ । निर्मला धड़कते दिल से अपनी सांसों को था में गहरी गहरी आंखें भर रही थी जिसकी वजह से उसकी गुब्बारे जैसी गोल गोल चूचियां लहरा रही थी जिसे देख कर शुभम पागल हुए जा रहा था और अपने दोनों हाथों को आगे बढ़ाकर अपनी मां की दोनों चुचियों को पकड़ते हुए बोला।

शशशशशश हहहहह..... मम्मी.... तुम्हारे यह दोनों कबूतर मुझे बहुत परेशान करते हैं।

मैं जानती हूं इन कबूतरों को तुझसे बहुत प्यार हो गया इसलिए तेरे हाथ में आने के लिए फड़फड़ा ते रहते हैं ..... यह कबूतर भी अच्छी तरह से जानते हैं कि तू जिस तरह का दाना ईन्हें खिलाता है वह ईनहे कोई नहीं खिला पाएगा .....(शुभम के हाथों से स्तन मर्दन का आनंद लेते हुए आहें भरने लगी)

हम अभी मैं जानता हूं इन्हें जब तक दाना नहीं मिलेगा तब तक यह यूं ही फड़फड़ा ते रहेंगे वैसे भी मुझे तुम्हारे कबूतरों से खेलने में बहुत मजा आता है।(शुभम अपनी मां की चूची को दबाते हुए बोला हालांकि अभी भी उसका लंड बुर की गहराई में घुसा हुआ था और वह जरा सा भी उसे बाहर खींच नहीं रहा था वह उसी स्थिति में अंदर का अंदर ही था जिससे निर्मला को बुर के अंदर कुछ भारी चीज भरी होने का एहसास बराबर हो रहा था और उसमें उसे मज़ा भी आ रहा था।)

ससससससहहहहहह ... ‌ शुभम जब तू ऐसे ही नहीं दबा दबा कर कुछ करता है तो ही इनके साथ साथ मुझे भी बहुत मजा आता है तो ऐसे ही मेरे कबूतरों के साथ खेला कर इन्हें दाना डाला कर तभी खा पीकर तेरी सेवा करने लायक बने रहेंगे....

तुम बिल्कुल भी चिंता मत करो मम्मी में ऐसे ही तुम्हारे कबूतरों को दाना डालते रहूंगा क्योंकि तभी तो यह मेरे रहेंगे। (शुभम चूची की निप्पल को अपनी उंगलियों के बीच दबाता हुआ बोला जिससे निर्मला के मुख से सिसकारी छूट गई।)

ससहहहहहहहहह...... बेटा अब अपने लंड को अंदर-बाहर भी करके चोदेगा या ऐसे ही अंदर ही गाड़े रहेगा...

तुम्हारी बुर में ज्यादा खुजली हो रही है क्या मम्मी....

हां बेटा मेरी बुर में बहुत खुजली हो रही है अब जल्दी से मेरी खुजली मिटा मुझसे रहा नहीं जा रहा है।

(शुभम अपनी मां से इस तरह की गंदी वार्तालाप करके पूरी तरह से मस्त हो गया था ।अब वह भी धक्के लगाने के लिए पूरी तरह से तैयार हो चुका था इसलिए एक बार फिर से अपनी हथेलियों का कसाव अपनी मां की मदमस्त टेनिस के गेंद जैसी चुचियों पर बढ़ाते हुए अपनी कमर को हल्के से पीछे की तरफ खींचा जिससे उसका मोटा तगड़ा लंड बुर की अंदरूनी दीवारों से रगड़ खाता हुआ बाहर की तरफ आने लगा जिससे निर्मला के तन बदन में उत्तेजना की चीटियां रेंगने लगे वह मस्त होने लगी और अगले ही पल शुभम अपने मोटे तगड़े लंड का एक तिहाई हिस्सा बुर्के बाहर निकाल कर वापस तेज धक्के के साथ उसे अंदर ठेल दिया निर्मला अपने बेटे की इस धक्के पर पीछे की तरफ सरक गई और एक दम मस्त होने लगी अब धीरे-धीरे शुभम अपनी मां की चुदाई करना शुरू कर दिया हल्के हल्के धक्कों के साथ अपनी मां की मदमस्त बुर की अच्छे से चुदाई कर रहा था ।

शुभम के हर तेज धक्के पर निर्मला को स्वर्ग के सुख का अहसास हो रहा था लगातार वह अपनी मां की चुचियों को मसल ता हुआ उसे रगड़ता हुआ बुर में लंड पेल रहा था। 24:00 से ज्यादा का समय हो गया था बिस्तर पर कोहराम मचा हुआ था चादर पर सिलवटें ऊपर आई थी पूरा बिस्तर अस्त-व्यस्त हो चुका था दोनों के बदन की गर्मी से कमरे का वातावरण पूरी तरह से गर्मा गया था कमरे में केवल निर्मला की सिसकारीर्यों की आवाज ही गूंज रही थी साथ ही शुभम की मजबूत जागो से निर्मला की बंसल गोद आज जानो के टकराने की आवाज आ रही थी और यह सब आवाज किसी रोमांटिक धुन से कम नहीं लग रही थी जो कि दोनों की उत्तेजना हमें लगातार बढ़ोतरी करती जा रही थी।शुभम एक ही लय में अपनी कमर को आगे-पीछे करते हुए किसी मशीन की भांति अपने लंड को निर्मला की बुर में पेल रहा था।

फच.....फच.... की आवाज लगातार निर्मला की रसीली पुर से आ रही थी क्योंकि उसकी बुर नमकीन रस से तरबतर हो चुकी थी जिसमें शुभम का लंड गोते लगा रहा था।

सच शुभम आज तेरा लंड को ज्यादा ही मोटा और लंबा लग रहा है। (निर्मला अपने बेटे के तेज धक्कों के साथ कराहते हुए बोली।)

मम्मी है तुम्हारी बुर का पानी पी पीकर और ज्यादा तगड़ा हो गया है।

सच कहूं तो आज कुछ ज्यादा ही मजा आ रहा है ऐसा लग रहा है कि आज मैं तुझसे पहली बार चुदवा रही हूं।

मजा तो मुझे भी बहुत आ रहा है मम्मी. ।( शुभम अपनी कमर को तेजी से आगे पीछे करते हुए बोला ) लेकिन इसमें आज थोड़ी कमी लग रही है।

कैसी कमी बेटा....

तुम जब नंगी होकर चुदवाती हो तो और ज्यादा मजा आता है ...

तो तुझे रोका किसने है उतार दे बाकी के कपड़े...

(अपनी मां का इशारा पाते ही शुभम एक झटके से अपना लंड बुर से बाहर निकाल लिया ..जिसकी वजह से एक पल के लिए निर्मला तड़प उठी क्योंकि वह अपने बेटे के मोटे झगड़े लंड को अपनी बुर से बाहर नहीं होने देना चाहती थी लेकिन वह भी और ज्यादा मजा लेना चाहती थी इसलिए प्यासी आंखों से अपने बेटे की हरकत को देखती रही जो कि अपने दोनों हाथों से निर्मला की लाल रंग की पेंटी के दोनों छोर को पकड़ कर नीचे की तरफ खींच रहा था और अपने बेटे की मदद करने हेतु तुरंत निर्मला अपनी मदमस्त भराव धार गांड को ऊपर की तरफ उसका दी जिससे शुभम जल्दी से अपनी मां की लाल रंग की पेंटी को उसकी भरावदार गांड से नीचे की तरफ खींच लिया और अगले ही पल शुभम ने लाल रंग की पेंटी को नीचे फर्श पर फेंक दिया और बाकी का काम निर्मला खुद अपने हाथों से करने लगी और वह अपनी साड़ी को खोलकर नीचे फर्श पर फेंक दी इस समय दोनों संपूर्ण रूप से नग्न अवस्था में एक दूसरे को प्यासी नजरों से देख रहे थे और शुभम का मोटा तगड़ा लंड जो कि इस समय निर्मला की रसीली बुर के नमकीन पानी में पूरी तरह से नहाया हुआ था वह जैसे सांस ले रहा हो इस तरह से ऊपर नीचे हो रहा था। जिसे देखकर निर्मला की बुर फिर से कुल बुलाने लगी और अपने बेटे के लैंड को एक बार फिर से अपनी बुर के अंदर महसूस करने के लिए तड़पने लगी।

शुभम भी अपनी मां की रसीली पुर की तड़प को भाप गया और एक पल की देरी किए बिना फिर से दोनों टांगों के बीच आ गया और अपने लिए जगह बना कर एक बार फिर से अपनी मां की बुर में समा गया इस बार वह इतना ज्यादा उत्तेजित हो गया था कि शुरू से ही तेज धक्कों के साथ चोदना शुरु कर दिया उत्तेजना के मारे निर्मला सूखे पत्तों की तरह फड़फड़ा रही थी लेकिन उसे बेहद आनंद की अनुभूति हो रही थी शुभम के धक्के इतनी तेज थी कि निर्मला को कभी-कभी दर्द का अनुभव हो रहा था लेकिन फिर भी उसकी गर्म सिस कारीयो में उसकी वेदना खो। जा रही थी।

निर्मला पूरी तरह से मदहोश हो चुकी थी उसकी आंखों में खुमारी का नशा छाया हुआ था वह हर धक्के के साथ मस्त हुए जा रही थी। उसे ऐसा महसूस हो रहा था कि आज उसका बेटा और ज्यादा ताकत के साथ उसकी चुदाई कर रहा है वह आनंद से भाव विभोर हुए जा रही थी ‌

एक बार फिर से पूरे कमरे में निर्मला की गर्म सिसकारियां गुंजने लगी और उन गरम से इस कार्य को सुनने वाला इस समय घर में उन दोनों के सिवा तीसरा कोई भी नहीं था इसलिए तो दोनों बेफिक्र होकर एक दूसरे के मस्ती में खोते चले जा रहे थे।
शुभम अपनी मां की दोनों मत मस्त चूचियों को थाने उसके ऊपर झुक गया और दोनों चुचियों को बारी-बारी से अपने मुंह में भर कर पीते हुए अपनी कमर को हिला दे रहा जिससे निर्मला को दुगने मजे का अनुभव हो रहा था वह भी अपने बेटे को अपनी बाहों में लेकर उसके हर धक्के का स्वागत करने लगी रह रहे कर वह नीचे से भी अपनी गांड को ऊपर की तरफ उछाल दे रही थी।

दोनों पसीने से तरबतर हो चुके थे।दो बार निर्मला झड़ चुकी थी और तीसरी बार झड़ने के कगार पर थी और यही हाल शुभम काफी था वह तेज धक्के लगा रहा था क्योंकि उसे पता था कि उसका भी पानी निकलने वाला है दोनों एक दूसरे को कसकर अपनी बाहों में जकड़े हुए थे। शुभम के हर धक्के के साथ पलंग चरमरा जा रही थी।

दोनों एक दूसरे की तेज चलती सांसो की गति से अंदाजा लगा लिए थे कि दोनों झड़ने के बिल्कुल करीब थे इसलिए दोनों इस पल का और ज्यादा मजा लेते हुए एक दूसरे की बाहों में खो जाना चाहते थे निर्मला अपने दोनों हाथों के नीचे की तरफ लाकर शुभम के नितंबों को अपनी हथेली में जकड़ कर उसे और ज्यादा अपनी बुर पर दबाना शुरू कर दी जिससे शुभम को और ज्यादा मजा आ रहा था और वह और तेज धक्के लगा रहा था देखते ही देखते कुछ देर बाद दोनों एक साथ भला कर झड़ गए।

दोनों संपूर्ण लगना अवस्था में उसी तरह से एक दूसरे को बांहों में लिए बिस्तर पर लेटे रहे शुभम को हटने का मन नहीं कर रहा था इसलिए उसी तरह से अपनी मां की नंगे बदन पर लेटा रहा वह भी उसे सबासी देते हुए उसकी पीठ को थपथपा रही थी।
दोनों बुरी तरह से थक चुके थे समय भी काफी गुजर चुका था इसलिए दोनों बिना कपड़े पहने उसी तरह से लगना अवस्था में ही सो गए।

Nirmalaki madhosh jawani...

 
तनाव भरे पल से निकलते ही निर्मला ने एक बार फिर से अपने बेटे से जमकर चुदवाने के बाद संतुष्टि भरा एहसास लिए अपने बेटे की बाहों में बाहें डाल कर नींद की आगोश में चली गई दूसरी तरफ शीतल जो कि अपने बेडरूम में अपने बिस्तर पर करवटें बदल रही थी और करवटें बदलने की वजह से उसके बिस्तर पर बिछी चादर पर सिलवटें पड़ चुकी थी जो कि उसकी तनाव भरी जिंदगी की कहानी बयां कर रही थी। खूबसूरती और जवानी से भरपूर होने के बावजूद भी शीतल की हालत थी कि उसे शरीर सुख नहीं मिल पा रहा था ‌। वह भी अपने पति से शरीर सुख की प्राप्ति करने का सपना छोड़ दी थी वह जानती थी कि उसके पति से उसकी जवानी नीचोड़ी नहीं जा पाएगी... ऐसी परिस्थिति में वह जिंदगी की हर रात इसी तरह से बिस्तर पर करवटें बदलते हुए गुजार रही थी ।
अधूरी जिंदगी में आशा की एक सुनहरी कर नजर आई थी जो कि उसकी ही गलती के बदौलत उससे दूर जाती हुई नजर आ रही थी। वह अपनी गलती पर ही पछता रही थी क्योंकि अच्छी तरह से जानती थी कि निर्मला की नजर उन दोनों पर बनी हुई थी और ऐसे में शुभम खुद इस बात से आगाह कर चुका था कि उसकी मम्मी ने उसे मिलने से इंकार की है।
यही सोच सोच कर शीतल अपने आप पर ही गुस्सा हो रही थी लेकिन वह कर भी क्या सकती थी आखिरकार अपनी जवानी की गर्मी को बर्दाश्त न कर सकने की स्थिति में थक हारकर वह मजबूरी में शुभम को अपनी क्लास रूम में बुलाई थी ‌। जहां पर वह लगभग अपनी बढ़ती हुई प्यास को थोड़ा बहुत नियंत्रण करने के इरादे से उसके मोटे तगड़े लैंड को मुंह में लेकर चूसना भी शुरू कर दी थी लेकिन ऐन मौके पर निर्मला के आ जाने से उसकी नियंत्रण हो रही प्यास और ज्यादा भड़क गई थी और बदनामी भी हो चुकी थी भले ही वह उसकी सबसे बेस्ट फ्रेंड निर्मला के सामने हुई हो। ऐसे हालात में उसे कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करें वह निर्मला से मिलकर उस से माफी मांगना चाहती थी जिसके लिए वह अपने आप को पहले से ही तैयार कर चुकी थी। शीतल करती भी क्या आखिरकार वह भी निर्मला की तरह ही जिंदगी जी रही थी वह अपनी जवानी की प्यास को अब तक दबाते चली आ रही थी लेकिन जिस दिन से शुभम को देखी थी तब से उसकी यह जवानी की प्यास और ज्यादा भड़क चुकी थी। वह अपनी उफान मारती है जवानी को काबू में रख पाने में असमर्थ होती जा रही थी दिन-रात उसे शुभम ही शुभम नजर आ रहा था शुभम का जवान मर्दाना कद काठी उसकी चौड़ी छाती उसका भोलापन और सबसे खास बात यह कि टांगों के बीच का वह हथियार जिसके लिए हर औरत बेसब्र हो जाती है शीतल यह बात अच्छी तरह से जानती थी कि शुभम के पास जिस तरह का मर्दाना लंड है उसने आज तक जिंदगी में ऐसी लड़की सिर्फ कल्पना ही की थी हकीकत में ऐसे लंड का दीदार कर पाना उसके लिए असमर्थ था और जिस दिन से उसने शुभम के लंड को अपनी आंखों से देख कर उसे हाथों में लेकर उसका स्पर्श की थी उसकी गर्माहट भरी स्पर्श को पाते ही उसकी टांगों के बीच की रसीली बुर पसीजने लगी थी इस बात का एहसास उसे अच्छी तरह से था। शुभम के मोटे तगड़े लंड को हाथ में लेते हैं उसे इस बात का एहसास हो गया था कि जब इसकी गर्मी हाथ में लेने पर भी सही नहीं जा रही है तो जब यह उसकी टांगों को फैला कर उसके कसी हुई बुर के अंदर डालेगा तब उसका क्या हाल होगा और उसी पल को जीने के लिए वह तड़प रही थी मचल रही थी शुभम से चुदवाने के लिए वह दिन-रात मौके की तलाश में थी कि कब शुभम उसकी जवानी का रस अपनी मर्दाना ताकत से नहीं जोड़ डाले जो कि वह बरसों से बचाकर रखी थी।
छुप छुपा कर दुनिया की नजरों से बच कर क्लास रूम में वह अपनी इच्छा पूरी करने हेतु शुभम के मोटे तगड़े लंड को मुंह में लेकर उसके एहसास को महसूस तो कर चुकी थी लेकिन अच्छी तरह से उसके लंड को चूस नहीं पाई थी वह शुभम के लंड को आइसक्रीम कोन की तरह धीरे-धीरे अपने गले में उतारना चाहती थी और उसके पिघलते हुए एहसास से भर जाना चाहती थी। लेकिन एकाएक निर्मला के आ जाने से उसके किए किराए पर पानी फिर चुका था।

गलती तो उसने की थी इस बात का अंदाजा उसे अच्छी तरह से था लेकिन उस गलती का पछतावा उसे इस बात से नहीं था कि वह गलत कर रही थी बल्कि इस बात से था कि वह सही मौका और सही जगह को चुन नहीं पाई थी वरना ऐसा कभी भी नहीं होता वह निर्मला से माफी मांग कर फिर से अपने रिश्ते को पहले की तरह बरकरार रखना चाहती थी क्योंकि अच्छी तरह से जानती थी कि जब दोनों के बीच उसी तरह के पहले जैसे रिश्ते होंगे तभी वह शुभम को अपनी दोनों टांगों के बीच देख पाएगी वरना उसका यह सपना भी सपना ही बनकर रह जाएगा इसलिए वह किसी भी तरह से निर्मला से मिलकर अपनी गलती के पछतावे के रूप में उससे हाथ जोड़कर माफी मांग लेना चाहती थी और उसे उम्मीद थी कि निर्मला उसे जरूर माफ कर देगी।

यह तो बात की बात थी लेकिन इस समय बिस्तर पर शुभम के मोटे तगड़े लंड की तपिश उसके तन बदन में उत्तेजना की लहर दौड़ा रही थी जिसकी बदौलत उसकी बुर से लगातार नमकीन रस बह रहा था।
शीतल इस समय बिस्तर पर मचल रही थी और उसकी ट्रांसपेरेंट गाउन जो कि सिर्फ उसकी मोटी मांसल जांघों ता्क ही आ रहे थे और इस समय फिसल कर उसकी कमर तक पहुंच गई थी जिससे उसकी नंगी चिकनी जांघों के दर्शन बराबर हो रहे थे वो ट्यूबलाइट की रोशनी में किसी दूधिया बल्ब की तरह चमक रही थी। शीतल के बदन में इस समय आग लगी हुई थी और जिसके मोटे तगड़े लंड के लिए वह तड़प रही थी वह तो उस लगने से अपनी मां की चुदाई करके उसकी बाहों में सो चुका था और शीतल को तड़पते हुए छोड़ दिया था ‌।

शीतल ईस समय गर्म सिसकारी लेते हुए अपने हाथ को पेंटिंनुमा तिजोरी में डालकर अपने खजाने को अपनी नाजुक नाजुक उंगलियों से टटोलकर उसका जायजा ले रही थी जो कि इस समय तवे पर रखी हुई गरम रोटी की तरह भूल चुकी थी और उसमें से मधुर रस बह रहा था।

शीतल की मदहोश जवानी अंगड़ाई ले रही थी किसी मर्द की मजबूत बाहों में जाने के लिए उसका अंग-अंग टूट रहा था जो कि इस समय उसका तन मन शुभम के प्रति सम्मोहित हो चुका था और उसकी मर्दाना ताकत को याद करके शीतल अपनी कचोरी जैसी फूली हुई पुर की गुलाबी पत्तियों को अपनी उंगलियों के बीच दबाकर उसे रगड़ रही थी जिससे उसकी याद शांत होने की जगह और ज्यादा भड़क जा रही थी वह अपनी पेंटी में हाथ डाले लगातार अपनी बुर को अपने हाथों से ही मसल रही थी पूरे कमरे में उसकी सिसकारी की आवाज गूंज रही थी वह मस्त हुए जा रही थी।
वह कुछ देर तक ऐसे ही अपनी बुर को अपने हाथों से ही मचलती रही और मन ही मन शुभम का ख्याल करते हुए ऐसी कल्पना करने लगेगी उसकी बुर को मसलने वाली हथेली उसकी नहीं बल्कि शुभम की है जो कि अपनी उंगलियों का कमाल उसकी बुर पर दिखा रहा है। अपने ही हाथों से शीतल मस्त हुए जा रही थी वह अपनी आंखों को बंद करके एक असीम एहसास मैं खुद ही चली जा रही थी लेकिन इस हद तक प्यासी हो कि उसकी आंखों के सामने केवल एक अद्भुत लंबा तगड़ा लंड नजर आ रहा हो तब उसकी प्यास केवल हथेली की रगड़ से कहां बुझने वाली थी और वही हाल शीतल का भी हो रहा था वह अपनी भावनाओं पर काबू कर पाने में असमर्थ साबित हो रही थी अपनी गलती की वजह से शुभम को दूर होता हुआ देखने के बावजूद भी इस समय वहां शुभम को याद करके मस्त हुए जा रही थी उसे समझते देर नहीं लगी कि उसकी प्यास ऊंगली से बिल्कुल भी बुझने वाली नहीं है इसलिए वह तुरंत बिस्तर पर से उठ कर खड़ी हुई और किचन की तरफ चली गई।....

जिस तरह की मादक चाल वही समय चल रही थी अगर कोई उसे चलते हुए देख लेता तो उसका लंड तुरंत खड़ा हो जाता क्योंकि वह अपनी मदमस्त गोल-गोल गांड को मटका ते हुए किचन की तरफ जा रहे थे हालांकि इस समय उसकी अद्भुत चाल को देखने वाला घर पर कोई भी नहीं था वह बेफिक्र होकर अपने किचन की तरफ चली जा रही थी।
और किचन में पहुंचते ही फ्रिज खोलकर उसमें से एक लंबा मोटा तगड़ा बैगन निकाल कर उसको अपने हाथों में लेकर अपनी उंगली और अंगूठे से गोल बनाकर उसमें डालकर उसकी मोटाई को चेक करके प्रसन्नता के साथ वह वापस अपने कमरे में आ गए और अपने कमरे में आते ही वह अपने बदन पर से ट्रांसपेरेंट गाउन को उतार फेंकी जो कि उसने ब्रा नहीं पहनी थी जिसकी वजह से उसकी गोल-गोल चूचियां सीना ताने खड़ी थी और बिस्तर पर लेटने से पहले वह अपनी पेंटी को भी उतार कर फेंक दी बिस्तर पर वह पूरी तरह से नंगी होकर अपनी दोनों टांगों को फैला ली और एक बार फिर से उस बैगन की मोटाई का जायजा लेने के लिए .. उसे मुंह में लेकर चूसने लगी मानो कि जैसे वह बैगन नहीं शुभम का मोटा तगड़ा लंड हो... वह अपने मुंह में उस बैगन को लेकर अंदर बाहर करते हुए उस बैगन का मजा ऐसे लेने लगी मानो कि वह जीता जागता शुभम का लंड हो वह पूरी तरह से उसे अपने थूक से गीला कर ली और एक हाथ से लगातार अपनी बुर को मसले जा रही थी जिससे उसमें से नमकीन रस बह रहा था।

अपनी हरकतों से शीतल अपनी जवानी की आग पर काबू पाने में असमर्थ हो गई और वह तुरंत अपने मुंह में से बैगन को निकालकर अपनी दोनों टांगों को फैला ली और एक तकिया अपनी मदमस्त गोल-गोल गांड के नीचे रखकर उसे हल्का सा ऊपर उठा दी अब उसे अपनी टांगों के बीच कि वह रसीली पतली सी खुली हुई दरार अच्छी से नजर आ रही थी और उस दरार के गुलाबी छेद में गीले बैगन को धीरे धीरे अंदर डालने लगी...वह अपनी बुर में डाल तो रही थी बेगन को लेकिन उसकी कल्पना में शुभम का मोटा तगड़ा लंड बसा हुआ था उसे ऐसा ही लग रहा था कि जैसे खुद शुभम उसकी दोनों टांगों को फैला कर अपने मोटे तगड़े लंड को धीरे-धीरे ताकत लगाते हुए की बुर में डाल रहा है। जैसे-जैसे बैगन बोर के अंदर प्रवेश कर रहा था वैसे वैसे उसकी सांसों की गति तेज होती जा रही थी उसे मज़ा आने लगा था।
धीरे-धीरे करके आधा बैगन बुर की गहराई में जाने के लिए आतुर हो गया था।उसकी बुर में आधा देवगन भूल चुका था और वह आधी बेगम से ही उसे अंदर बाहर करते हुए बैगन से चुदने का आनंद ले रही थी।

ओहहहह शुभम काश तुम इधर होते तो कितना मज़ा आता तुम अपनी मजबूत बाहों में मुझे भर कर मुझसे प्यार करते हैं मेरी मोटी मोटी टांगों को अपने हाथों में पकड़ कर उसे फैलाते ... मेरी रसीली पंखुड़ियों से सुशोभित गुलाबी बुर को अपने होंठों से स्पर्श करके उसके मधुर रस को अपनी जीभ लगाकर चाटते हैं कितना मजा आ जाता।
ओहहहह शुभम मेरा अंग-अंग टूट रहा है मेरा बदन मीठी चुभन से एक अजीब सा दर्द महसूस कर रहा है तुम्हारी बाहों में आने के लिए शुभम कहां पर हो तुम चले आओ मेरे पास आ जाओ मेरी बाहों में समा जाओ मेरी दोनों टांगों के बीच आकर अपने मजबूत मर्दाना ताकत से मेरी जवानी के रस को निचोड़ डालो।
(शीतल एकदम मस्त हुए जा रही थी और मदहोशी के आलम में अपने मुंह से शुभम के बारे में सोच सोच कर उसे पुकारते हुए लगातार बैगन को अपनी बुर की गहराई में उतारती चली जा रही थी अब बैगन उसकी बुर की गहराई नाप रहा था वह पूरी तरह से शीतल की कसी हुई बुर में दस्तक दे चुका था। शीतल की सांसे ऊपर नीचे हो रही थी वह धीरे-धीरे करके बैगन को अंदर बाहर करते हुए अपनी बुर की चुदाई करना शुरू कर दी थी।
बेगाना पूरी तरह से उसकी बुर की गहराई लापता हुआ उसे चुदाई का आनंद दे रहा था वह लगातार शुभम का नाम लेते हुए मस्त हुए जा रही थी।
ओहहहह शुभम मेरे राजा ऐसे ही चोदते रहो मुझे जोर जोर से धक्के लगाए बस ऐसे ही पूरी गहराई में उतार दो अपने मोटे लंड को मुझे मस्त कर दे मेरे राजा औहहहहहह शुभम। .....आहहहहहहहह। ...आहहहहहहहह....

शीतल की गर्म सिसकारियो से पूरा कमरा गूंज रहा था।वह पहले भी इसी तरह से बैगन से अपनी प्यास बुझाती थी लेकिन उसे उतना मजा नहीं मिलता था जितना कि आज शुभम कि कल्पना करते हुए और उसका नाम लेकर बैगन से चुदाई करते हुए जो आनंद उसे आ रहा था ऐसा अनुभव उसे पहले कभी नहीं हुआ था और कुछ ही देर में वह भी भलभला कर झड़ गई।....

कुछ देर में वह बिल्कुल शांत हो गई लेकिन आज इस तरह का आनंद का लुफ्त उसने उठाई थी उस अनुभव को लेकर वह अपने मन में दृढ़ निश्चय कर ली कि वह एक ना एक दिन अपनी बुर में शुभम का लंड जरूर लेगी क्योंकि उसे इस बात का एहसास अच्छी तरह से हो गया कि जब उसका नाम लेने से बैगन से इतना मजा आ रहा है तो जब वह खुद अपना मोटा तगड़ा लंड उसकी बुर में डालेगा तो उसे कितना मजा आएगा. उसका स्त्रीत्व शुभम के मर्दाना अंग से तृप्त हो जाएगा।
वह मन ही मन सोचने लगी कि भले ही उसे आपत्तिजनक अवस्था में उसकी मां ने अपनी आंखों से उसे देख ली है लेकिन एक न एक दिन जरूर भाई शुभम को अपनी बाहों में ले जाएगी और उससे शारीरिक संबंध बनाकर अपने अरमान पूरा करेंगी।
आखिर कब तक बकरे की मां खैर मनाएगी यह सोचते हुए वह मंद मंद मुस्कुराने लगी।
 
एक बार फिर से निर्मला और शुभम के लिए सब कुछ सामान्य हो चुका था उन दोनों के बीच किसी भी बात को लेकर किसी भी प्रकार का विवाद और तनाव बिल्कुल भी नहीं था शीतल से निर्मला को अपने बेटे को का डर बना हुआ था जो कि शुभम की बात और उसके दिलाए विश्वास से वह डर निकल चुका था. ‌। हालांकि अभी भी उसके मन के किसी कोने में शीतल को लेकर असमंजस बना हुआ था क्योंकि वह मर्दों की फितरत से अच्छी तरह से वाकिफ थी लेकिन फिर भी दोनों के बीच सब कुछ सामान्य ही चल रहा था।
शीतल किसी भी तरह से निर्मला से माफी मांग लेना चाहती थी लेकिन निर्मला थी कि जब भी उसके सामने आ जाती थी नजर फेर लेती थी इतने बरसों से दोनों एक दूसरे के सुख दुख में हमेशा साथ देते आए थे दोनों सच्चे मायने में एक पक्की सहेलियां थी लेकिन शुभम को लेकर दोनों के बीच तकरार हो चुकी थी दोनों के बीच की दूरी बढ़ती जा रही थी निर्मला अब बिल्कुल भी नहीं चाहती थी कि उसकी आंखों के सामने दोबारा हुआ दृश्य नजर आए जो कि वह अपने दिल पर पत्थर लेख रख कर देख चुकी थी इसलिए वह शीतल से काफी दूरी बनाए हुए थी और शुभम को भी उससे दूर रहने की हमेशा सलाह देती रहती थी और शुभम भी अपनी मां की बात मानते हुए उससे दूरी बनाए हुए था क्योंकि वह अच्छी तरह से जानता था कि जब घर में ही इतनी खूबसूरत औरत की खूबसूरत बदन को भौगने का सुख मिल रहा है तो वह दूसरी औरतों में वह सुख क्यों जुड़े और अपना जुगाड़ खराब करें... हालांकि आते जाते व शीतल पर नजर फिर ही लेता था क्योंकि उसकी सबसे बड़ी कमजोरी थी औरत की खूबसूरत नितंब जिसके आकर्षण से वह कभी भी अपने आप को बचा नहीं पाता था।
आती-जाती अक्षर व शीतल की खूबसूरत नितंबों को देखकर गर्म आप भर ले रहा था उसके मुंह में उसके खूबसूरत जिस्म को देखकर पानी आ जाता था क्योंकि उसने शीतल को बेहद करीब से देखा था उसके खूबसूरत जिस्म से आती मादक खुशबू को अपनी छातियों में भरकर उसे महसूस कर चुका था।
वैसे भी जिस तरह की स्थिति दोनों के बीच बनी हुई थी शुभम को लगने लगा था कि अब उसे एक नई रसीली कसी हुई बुर चोदने को मिलने वाली है और ऐसा हो भी जाता अगर शीतल जल्दबाजी दिखाते हुए उसे अपनी क्लास रूम में बुलाकर उसका लंड मुंह में लेकर ना चुस्ती और उसी समय उसकी मम्मी ना आ जाती तो शुभम का यह सपना भी पूरा हो जाता और उसकी बाहों में शीतल नाम की खूबसूरत औरत मचल रही होती लेकिन सब कुछ धरा का धरा रह गया था एन मौके पर निर्मला ने उसका काम बिगाड़ दिया था।
लेकिन जब से निर्मला ने कड़क शब्दों में उसे शीतल से दूर रहने की हिदायत दी है तब से वह शीतल से दूर ही रहता था लेकिन दूर रहने के बावजूद भी उसके बदन पर अपनी नजरों को फिर ही लेता था भले ही हाथों से ना सही नजर के स्पर्श से वह शीतल की खूबसूरत बदन का जायजा ले लेता था और इस हरकत पर ना तो कभी दुनिया वालों को सब हो पाता और ना ही कभी निर्मला को इसलिए वह मौका मिलते ही शीतल के खूबसूरत बदन को अपनी आंखों से ही नाप लेता था और इस बात का एहसास शीतल को भी अच्छी तरह से था आते जाते वह शुभम की नजरों को भाप लेती थी कि उसकी नजर उसके बदन के कौन से हिस्से पर घूम रही है और वह मंद मंद मुस्कुरा देती थी क्योंकि उसके मन में यही चल रहा था कि बकरे की मां कब तक खैर मनाएगी उसे अपने ऊपर पूरा विश्वास था कि एक ना एक दिन वह अपने हुस्न के जादू से शुभम को अपनी दोनों टांगों के बीच ले आएगी और तब निर्मला से नजर से नजर मिला कर बात कर पाएगी जो कि इस समय बिल्कुल भी संभव नहीं हो पा रहा था एकाद बार शीतल आगे से चलकर निर्मला से इस बारे में बात करके माफी मांगने चाही लेकिन निर्मला यह कहकर इंकार कर दी कि उस बारे में मुझसे कोई भी बात करने की जरूरत नहीं हो रहा इंदा से मेरे और मेरे बेटे के करीब आने की बिल्कुल भी कोशिश मत करना वरना मैं तुम्हारी हरकत को सारे स्कूल को बता दूंगी और तुम्हारी शिकायत में प्रिंसिपल से करूंगी इज्जत के साथ-साथ तुम्हारी नौकरी भी जाती रहेगी।

निर्मला की बातें सुनकर शीतल को हिम्मत नहीं हुई कि उस बारे में वह शीतल से कोई बात कर सके लेकिन उसे विश्वास था कि एक न एक दिन वह जरूर इस बारे में बात करेगी और उससे माफी मांगेगी।

शीतल को छोड़कर शुभम और निर्मला की जिंदगी अच्छे से कट रही थी रोज रात उनके लिए हसीन होती थी दिन तो अच्छे से कट ही रहे थे। अशोक अपनी बहन मधु के साथ आए दिन रंगरेलियां मनाने पहुंच जाता था जिसके बदले में मधु पैसे और अपनी जरूरत के सारे सामान ले लेती थी‌ । रोज रात को निर्मला से बम को या तो अपने कमरे में बुला लेती थी या तो खुद उसके कमरे में पहुंच जाती थी और संपूर्ण रूप से निर्वस्त्र होकर संभोग सुख का आनंद लूट रही थी जो सुख से जवानी के दिनों नहीं मिली थी वह सुख इस उम्र के पड़ाव पर आकर उसे भरपूर मिल रही थी और वह भी एकदम जवान लंड से जिससे चोदने के बाद उसका रोम-रोम पुलकित हो जाता था और एक अद्भुत तृप्ति का अहसास उसके तन बदन को तरोताजा कर देता था।
अब तक दोनों मां बेटी के संबंध के बारे में किसी को भनक तक नहीं लगी थी यहां तक कि अशोक को भी इस बात का बिल्कुल भी एहसास नहीं हुआ था कि उसके पीठ पीछे उसकी औरत उसके ही बेडरूम में और उसके ही बिस्तर पर अपने बेटे के साथ भरपूर चुदाई का आनंद ले रही है।
लेकिन अब निर्मला और शुभम के संबंध की दस्तक उसके बीच की उस्मा उसके ही पड़ोस में रहने वाली सरला चाची को होने लगी थी ‌। उसे इस बात का एहसास तो हो चुका था कि उसके पड़ोस में निर्मला कुछ तो गुल खिला रही है और यह सक उसे यूं ही नहीं हो गया था। उसने अपनी आंखों से उसी दृश्य को देखी थी जिसको देखने के बाद उसके दिमाग में शंका के बीच उपज ने लगे थे जिसको लेकर वह रात दिन परेशान सी हो गई थी और परेशानी वाली बात भी थी क्योंकि अब तक उसे ऐसा ही लगता था कि निर्मला बेहद संस्कारी और गुणवान औरत है लेकिन जिस देश को उसने अपनी आंखों से देखी थी उसे देखने के बाद उसकी विचारधारा पूरी तरह से बदल चुकी थी और वह पूरी तरह से अपने शंके को मजबूत कर लेना चाहती थी और इसी फिराक में हमेशा लगी हुई थी और वह इसीलिए छत पर आकर बार-बार निर्मला के कमरे की तरफ उसके घर की तरफ ताका झांकी लगाए रहती थी यहां तक कि अपनी कमरे की खिड़की में से भी वह लगातार निर्मला पर ही नजर बनाए हुए थी लेकिन उस दिन के बाद से उसे ऐसा कुछ भी देखने को नजर नहीं आया था जिसकी उसे उम्मीद थी लेकिन फिर भी उस दृश्य को देखने के बाद उसे पूरी तरह से विश्वास था कि निर्मला कुछ तो गड़बड़ कर रही है।
उसे इस बात की भनक बिल्कुल भी नहीं लगती अगर वह उस दिन दोपहर के समय उसके घर एक कटोरी दही मांगने ना गई होती क्योंकि आए दिन निर्मला और सरला चाची के बीच कटोरी के लेनदेन का संबंध बना हुआ था ज्यादातर इस संबंध को सरलाही निभा रही थी क्योंकि वही आए दिन कुछ ना कुछ लेने निर्मला के घर पहुंच जाती थी और ऐसा उस दिन भी हुआ दोपहर के समय जब वह निर्मला के घर एक कटोरी दही लेने को गई तो देखी कि दरवाजा बंद था। वह बार-बार घर की बेल बजाए जा रही थी लेकिन अंदर से किसी प्रकार का हलचल उसे महसूस नहीं हो रही थी वह दरवाजे पर दस्तक भी दे रही थी लेकिन कोई मतलब नहीं निकल रहा था तो वह समझ नहीं पा रही थी कि आखिरकार ऐसा क्यों हो रहा है क्योंकि निर्मला की गाड़ी पार्क की हुई थी जिससे साफ जाहिर था कि वह घर पर ही है इसलिए वह उसे देखने के लिए थोड़ा पीछे की तरफ गई जहां शीशे का पार्टीशन बना हुआ था और अंदर से परदे लगे हुए थे लेकिन एक जगह से पर्दा हल्का से खुला हुआ था वह शीशे पर अपनी नजर गड़ा कर अंदर देखने की कोशिश करने लगी तो कुछ सेकंड तक तो उसे अंदर कुछ भी नजर नहीं आया लेकिन थोड़ी ही देर में उसकी आंखों के सामने निर्मला संपूर्ण लगना अवस्था में केवल हाथ में एकता बल लिए हुए और वह भी अपने बदन पल्लपेटी नहीं थी उसे अपने हाथ से पकड़े हुई थी और मुस्कुराते हुए... वह किसी से बात कर रही थी लेकिन कांच की मोटी परत का पार्टीशन होने की वजह से अंदर की बात सरला चाची को बिल्कुल भी सुनाई नहीं दे रही थी। कुछ देर तक तो सरला चाची को पता ही नहीं चला कि अंदर चल क्या रहा है... कुछ सेकंड बाद उसके मानस पटल पर इस बात का एहसास होने लगा कि वह जो कुछ भी देख रही है वही उसकी आंखों का धोखा नहीं बल्कि हकीकत है वह निर्मल आपको घर के अंदर संपूर्ण रूप से नग्न अवस्था में देख रही थी उसकी आंखों के सामने निर्मला एकदम नंगी खड़ी थी एक पल को तो वह उसे नंगी देखकर एकदम से चोंक गई...उसे समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करें वहां से हट जाए या वही खड़ी होकर उसे दृश्य का आनंद लें क्योंकि एक औरत होने के नाते वह एक औरत के नंगे बदन को देख रही थी जो कि स्वर्ग से उतरी हुई कोई अप्सरा लग रही थी..‌ सरला चाची को अपनी आंखों पर और अपने आप पर विश्वास ही नहीं हो रहा था कि एक औरत इस कदर खूबसूरत हो सकती है और अभी इस उम्र में वैसे तो वह भी अच्छी तरह से जानती थी कि निर्मला काफी खूबसूरत औरत है लेकिन एकदम नंगी होने पर इतनी ज्यादा खूबसूरत लगती है वह उसे बिल्कुल भी अंदाजा नहीं था क्योंकि इस उम्र में भी उसके अंग के कटाव जवानी के दिनों वाले थे और उसकी खूबसूरत बदन के अंगो का कसाव खास करके उसकी नंगी छाती की शोभा बढ़ाते उसके दोनों बड़े बड़े दूध की गोलाई और उसका कसाव देखकर सरला चाची एकदम हैरान थी उसे अपनी आंखों पर विश्वास ही नहीं हो रहा था वह एकटक शीशे में से निर्मला के नंगे बदन को देखे जा रही थी।
वह निर्मला के घर क्या करने आई थी यह एकदम भूल गई वह तो बस निर्मला की खूबसूरती के आकर्षण में खोते चली जा रही थी। एक औरत होने के नाते हुए वह इतना तो जानती ही थी कि इस उम्र में औरत कितनी भी खूबसूरत हो उसके अंग का कसाव कमजोर पड़ जाता है और उसकी छातियों झूले लगती है लेकिन निर्मला को देखकर वह चकाचौंध हो चुकी थी उसे तो अपनी आंखों पर विश्वास ही नहीं हो रहा था उसे ऐसा ही लग रहा था कि जैसे वह 40 साल की निर्मला को नहीं बल्कि 25 साल की निर्मला को देख रही है निर्मला की खूबसूरती में उम्र किसी भी रूप से बाधा रूप नहीं बन रही थी बल्कि जैसे-जैसे उम्र गुजरती जा रही थी वैसे वैसे जैसे निर्मला की खूबसूरती में और ज्यादा निखार आता जा रहा था खुले बालों में और खूबसूरत लग रही थी हाथ में टावल लिए वह ऐसा लग रहा था मानो किसी से बातें कर रही हो।
सरला चाची को ऐसा ही लग रहा था कि जैसे वह अपने पति से ही बात कर रही है लेकिन उसे समझ में नहीं आ रहा था कि इतनी दोपहर में निर्मला नंगी होकर क्या कर रही है लेकिन वह मर्दों की हरकत से भी वाकिफ थी अच्छी तरह से जानती थी कि मर्द कभी भी शुरू पड़ जाते हैं और उसे ऐसा ही लग रहा था कि हो सकता है आज दीन में ही दोनों ने प्रोग्राम बना लिया हो।
क्योंकि यह बात वह भी अच्छी तरह से जानती थी कि इसी तरह से उसके साथ भी होता था दिन में भी मौका मिलने पर उसके पति उसके साथ इसी तरह की हरकत करते थे और उसके बदन से मजा लेने में बिल्कुल नहीं चूकते थे उसे अपनी जवानी के दिन याद आ गए जब वह भी इसी तरह से घर में एकदम नंगी होकर इधर से उधर घूमती रहती थी और अपने पति को तड़पाती रहती थी और ऐसे ही तड़पाते तड़पाते अपने पति से चुदवाने का आनंद लेते थे इस बात को याद करते ही सरला चाची की टांगों के बीच सुरसुरी से फैलने लगी।
वह इससे भी ज्यादा देखने की उम्मीद रखती थी इसलिए वहां से जाने का नाम नहीं ले रही थी वह मन ही मन सोच रही थी कि जल्द ही उसकी आंखों के सामने निर्मला की चुदाई वाला दृश्य पेश हो जाए लेकिन ऐसा हो नहीं रहा था निर्मला काफी देर से सीढ़ियों के पास खड़ी होकर किसी से बातें कर रही थी जो कि इस समय पर्दे की ओट में दिखाई नहीं दे रहा था ऐसा लग रहा था कि जैसे वह उधर खड़े खड़े निर्मला के ऊपर पानी की बूंदे फेकरा और जिस से बचकर वह अपने ऊपर टवाल से ढक ले रही थी और हंस रही थी।
दोनों में हंसी मजाक चल रही थी इस दृश्य को देखने के बाद सरला को यही लग रहा था। सरला चाचा की निगाहें निर्मला की मस्त कड़क चूचियों पर टिकी हुई थी जो अपनी हंसने की वजह से हल्का-हल्का उछल रही थी ऐसा लग रहा था कि जैसे पानी भरे गुब्बारे उछल रहे हो।... इस उन्मादम दृश्य को देखकर सरला चाची इस उम्र में भी मचल रही थी।
निर्मला की कड़क और चलती हुई चूचियों को देख कर अपने आप ही अनायास सरला चाची के हाथ अपने चुचियों पर चले गए जो कि इस समय ब्लाउज के अंदर ही थे। अंदर का दृश्य देखकर सरला चाची के बदन में भी हलचल मची हुई थी। वह एक टक अपनी नजरों को शीशे के पार टिकाए हुए थी।
सरला चाची के बदन में उस समय और ज्यादा हलचल मचने लगी जब वह किसी बात पर अपनी आंखों को बंद करके अपनी हथेली को अपनी टांगों के बीच ले जाकर बड़ी बेशर्मी के साथ अपनी रसीली बुर की गुलाबी पत्तियों को मसल ना शुरू कर दी जिसका असर निर्मला के बदन में भी हो रहा था और उस नजारे को देखकर सरला चाची की हालत खराब होने लगी उसे अपनी आंखों पर बिल्कुल भी भरोसा नहीं हो रहा था कि वहां निर्मला का एक और रूप देख रही है हालांकि इस बात सेवर अच्छी तरह से वाकिफ थी कि समाज के सामने औरत भले ही कितनी सीधी साधी और संस्कारी हो जाए लेकिन पति के सामने पति के साथ चुदवाते समय एकदम रंडी हो जाती है तभी तो दोनों को मजा मिलता है और वही इस समय निर्मला के घर में भी हो रहा था और निर्मला एकदम बेशर्म होते हुए अपनी रसीली पूर्व को अपनी हथेली से रगड़ रही थी और सरला के देखते ही देखते वह अपनी बीच वाली उंगली को अपनी बुर के अंदर डालकर उसे अंदर बाहर करने लगी और लगातार मुस्कुराते हुए किसी से बातें कर रही थीजोकि सरला यही समझ रही है कि वह अंदर अशोक सही बातें कर रही थी क्योंकि कोई भी औरत अपने घर में किसी गैर मर्द से इस तरह से तो बेशर्मी की हद पार करते हुए इस तरह की हरकत नहीं करेगी और वैसे भी निर्मला के चरित्र सेवा चित्र सेवा की थी इसीलिए उसे इतना पक्का यकीन था कि अंदर घर में अशोक ही है लेकिन अभी तक उसे अशोक नजर नहीं आया था वह चाहती थी कि जल्द ही अशोक उसे नजर आए वह भी उसे देखना चाहती थी।ज्यादातर उत्सुकता उसे इस बात से लेकर थी कि ऐसी खूबसूरत औरत के नंगी होने पर एक मर्द का लंड कितना ज्यादा खड़ा होता है और इसीलिए वह अशोक को देखना चाहती थी उसके लंड को देखना चाहती थी उसके मन में हलचल मची हुई थी।
लेकिन तभी उसके दिमाग में एक झटका सा लगा क्योंकि जब वह गेट के अंदर प्रवेश कर रही थी तो वहां सिर्फ निर्मला की ही गाड़ी थी अशोक की गाड़ी नहीं थी इस बात को जेहन में आते ही सरला चाची एकदम सकते में आ गई उसे समझ में नहीं आ रहा था कि क्या हो रहा है क्योंकि अक्सर जब भी अशोक घर पर होता था तो उसकी गाड़ी हमेशा पार्क होती थी लेकिन इस समय केवल एक ही गाड़ी घर में पार्टी थी जो कि निर्मला की थी इसका मतलब हुआ किसके सामने एकदम नंगी होकर इस तरह की हरकत कर रही है अब उसकी उत्सुकता एकदम पड़ने लगी थी और इस उत्सुकता के कारण उसकी दिल की धड़कन और ज्यादा तेज चलने लगी थी।
अंदर का दृश्य लगातार मादक होता जा रहा था निर्मला उसी तरह से अपनी बीच वाली उंगली को जोर जोर से अपनी पूर्ण के अंदर बाहर कर रही थी और अपनी चूची को एक हाथ से मसल रही थी। साला को ऐसा लग रहा था कि जैसे उसके सामने वाला व्यक्ति जिसे वह अशोक समझ रही थी लेकिन अब उसका मन भी शंका के घेराव में आ चुका था वह उसे इशारा करके उसे उस तरह की हरकत करने को कह रहा था और निर्मला भी मस्त होते हुए उसके बताए निर्देश के हिसाब से ही हरकत कर रही थी अब सरला उस शख्स को देखना चाहती थी जो कि इस समय घर में मौजूद था।
लेकिन निर्मला के चरित्र को देखते हुए उसे ऐसा भी लग रहा था कि हो सकता है उसे सोचने में कुछ धोखा हो रहा हो ऐसा भी हो सकता है कि अंदर और सो कहीं हो और वह अपनी गाड़ी कहीं और पारित किया हो लेकिन फिर भी वह उसे देखना चाहती थी जो कि इस समय बिल्कुल भी नजर नहीं आ रहा था वह सब सोच रही थी कि तभी उसे एक शख्स नजर आया जोकि टावर लपेटे हुआ था और डावल के आगे वाला भाग एकदम तंबू बना हुआ था जिसके नजर आते ही सरला चाची को समझते देर नहीं लगी की निर्मला की मदमस्त जवानी को देखकर उसका लंड पूरी तरह से खड़ा हो गया है।
उस शख्स का चेहरा उसे नजर नहीं आ रहा था केवल पीठ ही नजर आ रही थी जो कि टावर लपेटे हुए उस शख्स को देखकर इतना तो अंदाजा लगा दी थी कि वह कोई उम्र वाला शख्स नहीं था बल्कि नौजवान लड़का ही था लेकिन यह लड़का कौन हो सकता है व उसके चेहरे को देखना चाहती थी लेकिन वह सीडीओ से होता हुआ ऊपर की तरफ चला गया जिससे उसकी उम्मीद पर पानी फिर गया और देखते ही देखते उसकी आंखों के सामने ही निर्मला भी उसके पीछे-पीछे जाने लगी लेकिन जाते-जाते जब वह सिढ़ीया चढ़ रही थी इसलिए उसकी बड़ी-बड़ी मदमस्त गांड का घेराव और उसकी लचक देखकर इस उम्र में भी सरला की बुर नमकीन पानी से भर गए जो कि यह उसके साथ पहली बार हुआ था कि वह किसी ऐसी मादक दृश्य को देखकर इस तरह से उत्तेजित हो गई थी वह निर्मला को सीढ़ियां चढ़ते हुए देखती रह गई जो कि उस जवान लड़के की पीछे पीछे जा रही थी।
दोनों को इस हालात में देखकर सरला चाची को समझते देर नहीं लगी कि अब क्या होने वाला है वह अच्छी तरह से जान गई थी कि अब निर्मला जबरदस्त चुदाई के लिए तैयार हो चुकी थी लेकिन वह शख्स कौन था इस बात का खुलासा सरला के सामने बिल्कुल भी नहीं हो पाया था लेकिन तभी उसे तेज झटका सा लगा... उसके मन में शंका होने लगी कि कहीं वह जवान लड़का उसका खुद का बेटा शुभम तो नहीं क्योंकि उसकी भी कद काठी बिल्कुल वैसी ही थी जैसा कि उसने शीशे में से देखी थी हालांकि उसका चेहरा नजर नहीं आया था लेकिन कद काठी उसका गठीला बदन बिल्कुल शुभम की तरह ही थी।
अब उसका मन उत्सुकता से भरने लगा उसे समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या समझे क्या हुआ अपने बेटे के सामने से पूरी नंगी होकर इस तरह की गंदी हरकत कर रही थी कि कोई और लड़का था जिसके साथ निर्मला रंगरलिया मना रही है।
नहीं नहीं ऐसा नहीं हो सकता कोई मां अपने बेटे के सामने इस तरह की गंदी हरकत और वह भी एकदम पूरी तरह से नंगी होकर कैसे कर सकती है। एक तरफ उसका मन कह रहा था कि अंदर टावर लपेटे हुए वह शक्स उसका बेटा ही था तो दूसरा मन कहता था कि नहीं ऐसा नहीं हो सकता भला निर्मला इस तरह की हरकत कैसे कर सकती है और वह भी अपने ही बेटे के साथ लेकिन इस बात को झुठला भी नहीं पा रही थी कि इस समय घर पर केवल निर्मला और शुभम ही होते हैं और कभी-कभी अशोक भी होता है लेकिन उस शख्स की कद काठी अशोक के उम्र से बिल्कुल भी मैच नहीं कर रही थी इसलिए सरला चाची के मन में सवालों का बवंडर उठने लगा था कि अगर वह शख्स शुभम नहीं था तो वह कोई और लड़का था और अगर वह कोई और लड़का था तो इसका मतलब है कि निर्मला जिस तरह से दिखती है उस तरह की बिल्कुल भी नहीं है वह किसी के लड़के को अपने घर बुलाकर उसे चुदाई करवा रहे हैं और अगर वह कोई गैर लड़का नहीं है तो वह शुभम ही था और अगर शुभम ही था तो यह कैसे मुमकिन हो सकता है कि एक मां खुद अपने बेटे के सामने इस तरह की गंदी हरकत कर रही हो और वह भी हंस-हंसकर और उसके सामने उसका लड़का इस अवस्था में खड़ा हो जो कि टावल लपेटे होने के बावजूद भी उसका लंड पूरी तरह से खड़ा था।
सरला अपने मन में उठ रहे सवालों का जवाब खुद से ही ढूंढना चाहती थी इसलिए गेट पर आंख दिखाकर घंटों बैठी रही वह देखना चाह रही थी कि अगर दूसरा कोई लड़का होगा तो थोड़ी ही देर में घर से बाहर जरूर जाएगा लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ वह शाम तक बैठे रहे गई लेकिन घर से कोई भी दूसरा शख्स बाहर नहीं निकला और ना ही घर का दरवाजा ही खुला इसका मतलब पक्का था कि घर के अंदर शुभम ही था लेकिन फिर भी वह अपने मन को बार-बार झूठे लाने के लिए झूठी दिलासा दे रही थी कि एक मां भले अपने बेटे के साथ ऐसा कैसे कर सकती है लेकिन फिर भी जो नजारा उसकी आंखों में देखा था उसे वह भी कतई तौर पर चुटकुला नहीं सकती थी क्योंकि शाम तक अगर घर से कोई बाहर नहीं निकला और वह शख्स शुभम नहीं था तो शुभम कहां गया अगर उसे बंद नहीं होता तो 1 घंटे बाद 2 घंटे बाद शुभम जरूर अपने घर वापस तो लौटता लेकिन ऐसा बिल्कुल भी नहीं हुआ ना तो कोई घर से बाहर ही निकला और ना ही कोई घर के अंदर ही आया इसका मतलब साफ था कि अंदर जो दृश्य उसके सामने नजर आ रहा था । उस दृश्य में दोनों मां-बेटे ही थे अब इस बात से सरला जांच एकदम रोमांचित हो उठी थी वह अपने संघ के को पूरी तरह से विश्वसनीय कर लेना चाहती थी इसलिए अब दिन-रात उन दोनों के ताका झांकी में लगाए रहती थी वह बार-बार घंटों बैठकर निर्मला के घर की तरफ देखती रहती थी।

जो कि इस ताका झांकी का एहसास निर्मला को भी अच्छी तरह से हो गया था उसे समझते देर नहीं लगी कि सरला चाची उस पर नजर रख रही है क्योंकि दोपहर वाली बात वह 2 दिन बाद उससे एक बहाने से पूछ ही ली थी कि वह दोपहर में उसके घर दही लेने आई थी तो बेल बजाने के बावजूद भी दरवाजा नहीं खुला था। सरला चाची के इस बात का जवाब देते हुए निर्मला बोली थी कि उसकी बेल खराब हो गई है इसलिए आवाज नहीं आई थी जो कि यह बात सच है कि निर्मला के डोरबेल में खराबी हो गई थी लेकिन अगली बात सुनकर वो एकदम से चौंक गई थी कि उसके घर कोई और आया था क्या कोई लड़का जिसे वह शीशे मै से देखी थी। लेकिन निर्मला यह कहकर टाल गई थी कि नहीं ऐसा कुछ भी नहीं है कोई नहीं आया था जबकि निर्मला यह बात नहीं जानती थी कि सरला चाची ने उसे नग्न अवस्था में देख ली थी।और ना ही सरला ने इस बात का जिक्र की थी कि वह कमरे में नंग धड़ंग क्यों घूमती है। सरला नहीं चाहती थी कि उसे इस बात से आगाह कर दिया जाए ताकि वह आगे से संभल कर रहे क्योंकि वह उसे रंगे हाथ पकड़ना चाहती थी।
लेकिन सर ना जाने की बात सुनकर निर्मला सकते में आ गई थी और इस बारे में शुभम से भी बात कर चुकी थी और उसे समझा दि थी कि सरला चाची को हम पर शक हो गया है इसलिए आइंदा कमरे के बाहर कहीं भी इस तरह की कोई भी हरकत नहीं होनी चाहिए कि सरला चाची का शक यकीन में बदल जाए।
अपनी मां की बातें सुनकर शुभम भी कुछ हद तक घबरा गया था क्योंकि वह नहीं चाहता था कि दोनों की करतूत किसी भी रूप में सबके सामने आए इसलिए वह कदम फूंक-फूंक कर रखना चाहता था लेकिन अपने मन में यह बात बना लिया था कि कुछ ऐसा करना पड़ेगा ताकि सरला चाची अगर यह बात जान भी जाए कि उन दोनों में क्या चल रहा है तो भी वह किसी से भी कह सकने में समर्थ ना हो इसलिए वह अपने मन में ही प्लान बनाने लगा।
 
जबसे शुभम को उसकी मां ने यह बात बताई थी कि उसकी बाजू वाली सरला चाची उन दोनों पर नजर रख रही है तब से शुभम पूरी तरह से चौकन्ना हो गया था और कुछ ऐसा करना चाहता था कि अगर उसे इस बात का पता भी चल जाएगी शुभम खुद अपनी मां की चुदाई करता है तो भी वह किसी को कुछ भी बताने लायक ना रहे और ऐसा तभी हो सकता है जब वह वही करें जो कि गांव में अपनी मामी और मामी की लड़की के साथ किया था उनके साथ भी संबंध बनाकर वह उन दोनों की बोलती बंद कर दिया था और मामी की लड़की को यह बात अच्छी तरह से मालूम होने के बावजूद भी की शुभम अपनी मां को चोदता है फिर भी वह यह बात किसी को बता नहीं सकी क्योंकि शुभम खुद उसकी मां की चुदाई कर चुका था जो कि उसकी मामा की लड़की ने खुद अपनी आंखों से देखी थी।
अब शुभम को इधर भी वही करना था जो वह गांव में किया था इसलिए वह किसी भी तरह से बस अपनी बाजू वाली सरला चाची के घर में प्रवेश करना था लेकिन कैसे यह उसे भी पता नहीं था।
सरला चाची का एक लड़का था जिसकी अभी 3 साल ही हुए थे शादी को और वह अक्सर शहर के बाहर ही रहता था जिसकी वजह से घर में केवल सरला चाची और उनकी जवान बहू ही रहती थी सरला चाची के पति का काफी समय पहले ही देहांत हो चुका था।
शुभम के लिए यह बात राहत दिलाने वाली थी कि घर में केवल सरला चाची और उनकी जवान बहू हुई थी बाकी कोई भी नहीं था उनका लड़का जो कि शहर के बाहर रहता था वह कभी-कभी ही घर पर आता था उसी काम के सिलसिले में हमेशा बाहर ही रहना पड़ता था। शुभम को इतना तो पता ही था लेकिन अब सवाल यह था कि उसके घर में प्रवेश कैसे किया जाए इसी जुगाड़ में वह लगा हुआ था।
इसी तरह से दिन गुजरने लगे निर्मला और शुभम अब कमरे के अंदर ही और वह भी खिड़की और पर्दे लगाने के बाद ही एक दूसरे मैं समाने की भरपूर प्रयास में लगे रहते थे जो कि दोनों चुदाई का भरपूर मजा लेने के बावजूद भी हमेशा प्यासे ही रहते थे।
दोनों की प्यास एक दूसरे से पूछती ही नहीं थी हालांकि दोनों को तृप्ति का अहसास अद्भुत होता था लेकिन जब कभी भी एकांत पाते थे तो शुरू पड़ जाते थे एक दूसरे के बदन को नोचने खसोटने लगते थे।

शाम के वक्त शुभम के पास कोई काम ना होने की वजह से वह घूमने निकल गया था। संभोग सुख की प्राप्ति करते करते उसके बदन में काफी बदलाव आ गया था अब वह पहले से भी ज्यादा और हैंडसम और मजबूत शरीर वाला लगने लगा था या यूं कह सकते हैं कि वह पूरी तरह से मर्द हो चुका था।
वह काफी समय गुजरने के बाद अपने घर की तरफ लौट रहा था तो रास्ते में ही उसे सरला चाची नजर आ गई जो कि दोनों हाथ में थैला लिए घर की तरफ चले जा रहे थे। सरला को देखते ही शुभम के दिमाग में हलचल होने लगी वह तुरंत दौड़ते हुए सरला के पास गया और उनके हाथों में से जबरदस्ती दोनों थेले लेते हुए बोला।

क्या कर रही हो चाची मेरे होते हुए आप इतना वजन उठाकर घर ले जा रही हो मैं किस दिन काम आऊंगा।
Madhosh kar dene wail sarlaa

नहीं नहीं रहने दे मैं उठा लूंगी अभी मेरे में काफी दम बाकी है। (ऐसा कहते हुए सरला सब्जियों से भरे हुए थे वे को पीछे की तरफ खींचने लगी। क्योंकि शुभम को देखते ही उसकी आंखों के सामने उस दिन वाला नजारा घूमने लगा जब हुआ एक कटोरी दही लेने गई थी और उसकी आंखों ने वह दृश्य को देख ली थी जिसकी वह सपने में भी कल्पना नहीं कर सकती थी तुरंत उसकी आंखों के सामने निर्मला का नंगा बदन और टावर में लिपटा हुआ मजबूत शरीर वाला लड़का नजर आने लगा लेकिन वह अभी भी पक्के तौर पर नहीं कह सकती थी कि वह सुबह में था लेकिन उसे संघ का पूरा था कि वह शुभम ही था और वैसे भी उसकी मां इतनी ज्यादा खूबसूरत है कि कोई भी हो उसकी जवानी और वह भी नंगी जवानी देखकर फिसल जाए।इसलिए वह शुभम को खेला नहीं लेने देना चाहती थी लेकिन सुबह हाथ में आई इस मौके को गंवाना नहीं चाहता था इसलिए जबरजस्ती करते हुए सरला के हाथों से थेला ले लिया और बोला।)

मैं अच्छी तरह से जानता हूं चाची की अभी आप बुरी नहीं हुई है पक्के तौर पर मैं कह सकता हूं कि आप जैसी खूबसूरत औरत पूरे सोसाइटी में नहीं है सच कहूं तो आपने अपने बदन को इतना संभाल कर रखी है कि अभी भी मुझे ऐसा लग रहा है कि आप 28 या 30 साल की हैं। ,,( इतना कहकर वह सरला चाची के साथ साथ चलने लगा शुभम की बातें सुनकर एक पल के लिए सरला चाची अंदर ही अंदर खुश होने लगी और वैसे ही भी औरतों को अपनी तारीफ सुनना सबसे अच्छा लगता है लेकिन फिर मन में सोचे कि है कल का छोकरा कितना चालाक है एक औरत की तारीफ उसके ही मुंह पर कैसे बेशर्म होकर कह रहा है इसलिए वह शुभम से बोली। )

कैसा बेशर्म है रे तू इस तरह से औरत की तारीफ कर रहा है...।

सरला चाची इसमें बेशर्म वाली कौन सी बात आ गई आखिर चलो आप ही एक बात बताओ अगर आप किसी गुलाब के फूल को देखेंगे तो क्या कहेंगी...(शुभम की बात सुनकर उसकी तरफ देखते हुए)
नहीं नहीं बताइए आप क्या कहेंगी... यह कहेंगी कि यह कितना गंदा फुल है। ....ऐसा तो नहीं कहेंगी ना आप यह कहेंगे कि कितना खूबसूरत फूल है बस यही . ....यही मैं कह रहा हूं...।

तू बड़ा बेशर्म है । (इस बार शुभम की चालाकी देखकर सरला के चेहरे पर मुस्कान फैल गई और यह मुस्कान केवल शुभम के द्वारा की गई उसकी तारीफ की वजह से ही थी... औरतों की संगत की वजह से शुभम काफी चालाक हो गया था औरतों को किस तरह से अपने बस में करना है यह वह अच्छी तरह से जानता था इसी हथकंडे को अपनाते हुए अब तक वह कई औरतों के साथ संभोग सुख का मजा ले चुका था बातों से हुई शुरुआत उस औरत के बिस्तर पर ही जाकर खत्म होती थी और यही उद्देश्य लेकर के वह सरला चाची से चिकनी चुपड़ी बातें कर रहा था। पीछे से आते समय ही बस अल्लाह चाची की खूबसूरत बदन के साथ-साथ उसके भरपूर पिछवाड़े का जायजा वह अपनी नजरों से ले चुका था कमर के नीचे का घेराव देखकर शुभम की टांगों के बीच हलचल शुरू हो गई थी और वह दूर से सरला चाची को जाते हुए देख कर उसकी मटकती हुई गांड के आकर्षण में बंधता चला जा रहा था। जब से उसकी मां ने यह बताई थी कि वह उन दोनों को नजर रख रही है तब से वह इसी फिराक में था कि कब वह सरला के साथ भी हमबिस्तर हो और और उसका मुंह उसके राज से राज ही रह जाए लेकिन अब वह दृढ़ निश्चय कर चुका था की सरला चाची की चुदाई वह करके ही रहेगा क्योंकि उसकी मटकती हुई गांड ने शुभम को पूरी तरह से दीवाना बना दिया था। पड़ोस में रहने के बावजूद भी अब तक शुभम ने सरला चाची पर नजर नहीं डाली थी हालांकि कभी-कभार दोनों के बीच मुलाकात होती थी लेकिन कभी भी शुभम ने सरला चाची को उस नजरिए से नहीं देखा था क्योंकि वैसे भी उसकी 10 की 10 उंगलियां निर्मला नाम की एक ही में जो थी इसलिए दूसरी औरतों को देखने का उसका कोई मन भी नहीं था लेकिन आज सरला चाची की मटकती हुई गांड और उसकी खूबसूरती और खास करके ब्लाउज के अंदर का भरपूर भार देखकर उसके तन बदन में हलचल होने लगी थी और उसे भोगने के लिए वह तड़पने लगा था जिसके पीछे उसका इरादा भी सरला चाची को उनके राज से एकदम से शांत करने को था। शुभम हाथों में थैला लिए सरला चाची के कदम से कदम मिलाते हुए आगे बढ़ रहा था सरला को यह समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या समझे जिस तरह से वह उसकी मदद कर रहा था उसे अच्छा तो लग ही रहा था और खास करके उसके द्वारा की गई उसकी खूबसूरती और इस उम्र में भी शरीर को अच्छी तरह से संभाल कर रखने की तारीफ सुनकर उसका मन गदगद हुए जा रहा था।..... दोनों अब एक दूसरे से बिना बोले ही आगे बढ़ रहे थे शुभम सोच रहा था कि बात की शुरुआत कहां से की जाए वह पूरी तरह से सरला को अपनी बातों के जाल में फंसा लेना चाहता था इसलिए ऐसे ही बात को आगे बढ़ाते वह बोला।)

सरला चाची आपके दोनों थैले काफी वजनदार हैं जरूर इसमें कुछ अच्छी सी चीज खरीद के ले जा रही है।

ज्यादा वजन हो तो ला एक थैला मुझे दे दे....

नहीं नहीं चाहती ऐसी कोई भी बात नहीं है मैं तो यूं ही कह रहा था कि आप इसमें ढेर सारी सब्जियां लेकर जा रही हैं आज लगता है कुछ खास है।

खास कुछ भी नहीं है मैं ऐसे ही सप्ताह की सब्जियां खरीद कर ले जाती हूं।

वैसे चाची सब्जियों में क्या-क्या है।

कुछ खास नहीं है मटर है करेला है बैंगन है और कद्दू है। (बैगन का नाम सुनते ही शुभम मन में ही सोचने लगा कि घर पर कोई नहीं है इसलिए लगता है बैगन घर पर ले जाकर के खुद ही अपनी बुर की प्यास बुझाती है क्योंकि वह अच्छी तरह से जानता था कि उसकी मा भी जब उसके पास अपनी प्यास बुझाने का कोई रास्ता ना था तो वह भी बाजार से लंबे मोटे बैगन खरीद कर लाती थी और उसी से अपनी बुर की प्यास बुझाती थी। हालांकि कद्दू का जिक्र सुनते ही वह बोला।)

चाची सच कहूं तो मुझे कद्दू बहुत पसंद है कद्दू की सब्जी मेरी सबसे ज्यादा फेवरेट है।

कोई बात नहीं सुबह जब बनेगी तो मैं तुझे बुला लूंगी। (सरला के ना चाहते हुए भी उसके मुंह से यह बात निकल गई वह साफ तौर पर शुभम को खाने का न्योता दे रही थी जोकि शुभम द्वारा की गई उसकी तारीफ का ही नतीजा था।)

मैं जरूर आऊंगा चाची बस जब बनाना तो मुझे मत भूल जाना।

इसमें भूलने वाली कौन सी बात है सब्जी ही तो तुझे खाना है की जमीन जायदाद खा जाएगा जो मैं तुझे ना बुलाऊ।
(सरला की बात सुनते ही शुभम अपने आप से ही बात करते हो बोला एक बार घर में तो आने दो उसके बाद तो मैं क्या-क्या खा जाऊंगा तुम्हें खुद पता नहीं चलेगा और अभी तुम्हारी आंखों के सामने)

चलो अच्छी बात है कि इसी बहाने मैं आपका घर भी देख लूंगा वैसे भी इतनी पड़ोस में होने के बावजूद भी मैं कभी आपके घर नहीं आया।

तू अपना ही घर समझना जब जी करे चला आना।

(शुभम सरला की बातें सुनकर मंद मंद मुस्कुरा रहा था उन दोनों को चलते हुए काफी देर हो चुकी थी लेकिन शुभम को इतनी देर में ऐसा कभी भी नहीं लगा कि सरला को उन पर शुभम और निर्मला के रिश्ते को लेकर किसी भी प्रकार का शक हो वरना वह कह चुकी होती लेकिन ऐसा कुछ भी साला चाची ने नहीं कहा था कि जिससे यह पता चलता कि वाकई में उन्हें उन दोनों पर शक है।और सलाह के मन में भी यही उत्तल पुथल चल रहा था वह अपनी शंका वाली बात शुभम से कहे भी तो कैसे कहे अगर वाकई में उसकी आंखों ने धोखा खा गई हो तो इस तरह का लांछन लगाना भी अच्छी बात नहीं है इसलिए वह शांत रह गई लेकिन उसकी तरफ से निर्मला और शुभम को चरित्रवान होने का सर्टिफिकेट नहीं मिल गया था वह मैंने फैसला कर चुकी थी कि वह सच्चाई का पता लगाकर रहेगी... दोनों के बीच काफी बातचीत होती रही।
शाम ढल चुकी थी दूर आसमान में सूरज अपनी लालिमा भी खेलते हुए अस्त होने जा रहा था जिसकी वजह से वातावरण में अंधेरा पन छाने लगा था। शुभम रह-रहकर चोर नजरों से निर्मला के कमर के नीचे के भराव दार हिस्से को देख ले रहा था और मन ही मन में गर्म आ भर ले रहा था और उसकी नजरें सुगंधा के ब्लाउज पर भी चली जा रही थी जो कि बड़ी-बड़ी चुचियों को अंदर समाने की वजह से ब्लाउज में से बीच की लकीर साफ नजर आ रही थी। वह मन ही मन सोचने लगा कि सरला चाची के उम्र में और उसकी मां की उम्र में कुछ ज्यादा फर्क नहीं था तीन-चार साल का ही फर्क था जोकि सरला ने भी अपने बदन को अच्छे से मेंटेन की हुई थी तभी तो इस उम्र में भी कसी हुई लग रही थी हालांकि निर्मला के सामने फीकी ही थी फिर भी खूबसूरत थी। शुभम को और क्या चाहिए था। वह मन ही मन खुश हो रहा था कि सपना चाची ने उसे अच्छे से बात की थी और उसे अपने घर आने का आमंत्रण भी दे दी थी लेकिन इतनी जल्दबाजी करना उसके लिए ठीक नहीं था इसलिए वह सही समय का इंतजार कर रहा था चलते चलते दोनों का घर आ गया सरला अपने हाथों से गेट खोल कर अंदर आते हुए बोली।

चल अंदरर आजा चाय पी कर जाना वैसे भी तूने मेरी बहुत मदद की है।

क्या चाची आप तो मुझे शर्मिंदा कर रही हैं यह कोई मदद नहीं थी यह तो मेरा फर्ज था एक पड़ोसी होने के नाते वैसे भी आप की जगह पर मेरी मम्मी होती तो क्या मैं उन्हें इस तरह से खेले उठाकर घर ला दे देता नहीं ना मैं तो बस अपना फर्ज निभा रहा था।

बातें बहुत बनाता है (सरला हंसते हुए बोली )चल अच्छा आज आप चाय पी कर जाना।

नहीं-नहीं चाची किसी और दिन मैं जरूर आपके हाथ की चाय पीने आऊंगा अभी मुझे जाना है ..(इतना कहते हुए शुभम दोनों थैले को सरला आंटी को पकड़ाने लगा कि तभी अंदर का दरवाजा खुला और सरला आंटी की बहू बाहर आ गई।)

लाइए माजी में रख देती हूं। (इतना कहते हुए उसने अपने दोनों हाथ आगे बढ़ाई और सरला ने शुभम के हाथों से थैला लेते हुए अपनी बहू को पकड़ते हुए बोली।)

Sarlaa


ले रुचि बहू इसे किचन में संभाल कर रख देना...

ठीक है मम्मी जी (इतना कहते हुए वह सरला के हाथों से दोनों थेली पकड़ ली और एक नजर शुभम की तरफ फेरकर वापस अंदर जाने लगी। इतना शुभम के लिए बहुत था। वह सरला चाची के बहू की खूबसूरती देखा तो देखता ही रह गया इतना खूबसूरत गोल चेहरा ऐसा लग रहा था कि जैसे चांद जमीन पर आ गया हो वह कुछ सेकंड तक उसे जाते हुए देखता रहा और कसी हुई साड़ी में उसकी चूसत गांड को देखकर अपने मन को बेकरार करने लगा। वह वापस घर के अंदर चली गई तो सरला शुभम से बोली।

यह मेरी बहू है रुचि बहुत प्यारी है। (शुभम अब वहां पर ज्यादा देर खड़ा रहना उचित नहीं समझ रहा था इसलिए अपने संस्कार दिखाते हुए अपने दोनों हाथ जोड़कर सरला से इजाजत मांगते हुए बोला ।

अच्छा तो चाची में अब चलता हूं अगर किसी भी प्रकार का कोई भी छोटा मोटा काम हो तो मुझे जरुर याद करिएगा आपको परेशानी नहीं होगी मैं आपका काम कर दूंगा।

ठीक है शुभम बेटा तो कितना अच्छा है मुझे आज पता चला कोई भी काम होगा तो मैं तुझे जरूर याद करूंगी।

बेफिक्र होकर याद करिएगा चाची।
(इतना कहकर वह अपने घर की तरफ चला गया आज सरला से मिलकर वह काफी उत्तेजित नजर आ रहा था और खास करके उसकी बहू रुचि से मिलकर हालांकि उसकी एक झलक भर देखा था लेकिन उसकी खूबसूरती देखकर उसकी आंखें चकाचौंध हो चुकी थी वह आपने कमरे में बैठकर सरला और उनकी बहू रुचि के बारे में सोच रहा था और इन सभी बातों को वह अपनी मां से बिल्कुल भी नहीं बताना चाहता था क्योंकि एक बार वह भुगत चुका है इसलिए किसी भी औरत की बात अब वह अपनी मां से नहीं बताएगा यह निश्चय कर चुका था। सरला की मटकती हुई गांड के बारे में सोचकर व काफी उत्तेजित हो चुका था दीवार घड़ी में 8:00 बज रहा था वह समझ गया था कि खाना बन रहा है और उसकी मां किचन में ही होगी इसलिए वह उत्तेजना बस किचन की तरफ जाने लगा।
 
सरला चाची के भराव दार बदन और उसकी बहू रुचि के खूबसूरत चेहरे को देखकर शुभम पूरी तरह से उत्तेजित हो चुका था बार बार उसकी आंखों के सामने सरला चाची की बड़ी-बड़ी मटकती गांड नजर आ रही थी। अब तक के अपने सेक्स जीवन के सफर को देखते हुए उसे इतना तो ज्ञान हो ही गया था कि हर औरत अंदर से प्यासी होती है उसके अंदर मोटे तगड़े लंड से चोदने का सपना हमेशा बना होता है बस उसे जगाना होता है और यही काम अब सरला के साथ उसे करना था।
लेकिन इस समय उसे एक रसीली बुर की आवश्यकता थी जिसके लिए वह पूरी तरह से उत्तेजित हो चुका था इसलिए वह किचन की तरफ जाने लगा उसे पूरा यकीन था कि उसकी मां किचन में खाना बना रही होगी और घर में उन दोनों के सिवा तीसरा कोई भी नहीं था माहौल और मौका सब कुछ शुभम के पक्ष में था। वैसे कई औरतों के साथ संभोग सुख पाने के बाद उसे इतना तो यकीन था कि वह दुनिया के किसी भी औरत के साथ संभोग कर ले लेकिन जो मजा उसे उसकी मां के साथ संभोग करने में आता था वैसा मजा किसी और औरत के साथ कभी नहीं मिला। और वैसे भी उसकी नजरों में उसकी ही नजरों में क्या निर्मला को जानने वाला हर कोई व्यक्ति की नजर में निर्मला बेहद खूबसूरत और हसीन औरत थी क्योंकि इस उम्र में भी उसके बदन की बनावट और अंगों का ढांचा एकदम जवान और कसा हुआ था जितना कसा हुआ बदन उसका वस्त्रों में लगता था उससे भी कहीं ज्यादा चुस्त उसका बदन नग्न अवस्था में लगता है और उन्हीं कसाव भरे अंगो के साथ खेल खेल कर शुभम जवान मर्द हो चुका था।
अगले ही पल सुभम किचन के बाहर खड़े होकर दीवार से अपना कंधा टेक कर अंदर के नजारे को देख रहा था। किचन के अंदर का नजारा पूरी तरह से कामुकता से भरा हुआ था...। उसकी मां रोटियां बेल रही थी... गर्मी का असर कुछ ज्यादा ही था जिसकी वजह से वह अपनी साड़ी को उतार कर हैंगर में टांग दी थी और इस समय उसके बदन पर मात्र ब्लाउज और पेटीकोट ही था ब्लाउज भी ऐसा की पीछे की उसकी चिकनी पीठ पूरी तरह से नंगी नजर आ रही थी बस उसके ऊपर पतली सी डोरी बनी हुई थी जिससे उसके पूरे ब्लाउज का हिस्सा टिका हुआ था और उस पतली सी रस्सी के वजह से ही निर्मला की मदमस्त दोनों जवानियां छलकने से बची हुई थी अगर जरा सी भी डोरी ढीली हो जाए तो देखते ही देखते निर्मला की दोनों जवानियां किसी भरे हुए पेमाने की तरह छलक जाए... निर्मला ने अपनी पेटीकोट को थोड़ा सा ऊपर की तरफ उठाकर उसे कमर पर खुश रखी थी जिससे नीचे से उसकी दोनों चिकनी मोटी टांगे पिंडलियों से नंगी थी उसकी मजबूत गोरी गोरी पिंडलियों देखकर शुभम का दिल बहक रहा था।
शुभम के पैंट में तंबू बना हुआ था दिल तो कर रहा था कि अभी किचन में घुस जाए और पेटीकोट उठाकर खड़े लंड को उसकी बुर में पेल कर चुदाई करना शुरू कर दें लेकिन उसकी आंखों के सामने जो अद्भुत और किसी चित्रकार की चित्रकारी की तरह नजर आने वाले दृश्य से वह अपना मन बहला रहा था। इसलिए वह वही खड़े होकर कुछ देर तक अपनी मां की मदमस्त जवानी का रसपान अपनी आंखों से कर रहा था

निर्मला रोटी बेलने के लिए जैसे जैसे अपने हाथों को आगे पीछे करके बैलेंस घुमा रही थी उसकी वजह से उसके बदन में एक अद्भुत तरंग नुमा लहर पैदा हो रही थी जिसकी वजह से उसके कमर के नीचे वाले भाग में उसकी मदमस्त नितंबों में एक अजीब सी थीरकन हो रही थी मानो की किसी बड़े बड़े दो गुब्बारों में पानी भरकर उसे हिलाया जा रहा हो। निर्मला की गांड की धड़कन शुभम के दिन पर छुरियां चला रही थी।
अपनी मां के भजन की पीछे की खूबसूरती को देखकर शुभम अपने आपसे ही बातें करते हुए बोला इसलिए कहता हूं कि मेरी मां से खूबसूरत इस दुनिया में कोई दूसरी औरत नहीं है भले ही मेरा मन इधर उधर की औरतों में भटक जाए लेकिन आखिरकार जो सुकून मुझे अपनी मां के साथ मिलता है वैसा सुकून मुझे किसी औरत के साथ नहीं मिलता।

अपनी मां के मदमस्त बदन को देखकर शुभम पैंट के ऊपर से अपने लंड को सहला ना शुरू कर दिया जो कि पैंट में तंबू बनाए हुए था ‌। निर्मला इन सबसे बेखबर रोटियां बनाने में व्यस्त थे उसे तो इसका आभास तक नहीं हुआ था कि उसके पीछे उसका बेटा खड़े होकर उसके मदमस्त यौवन का रसपान अपनी आंखों से कर रहा है। निर्मला इस समय पीछे से एक अद्भुत मुरत की तरह लग रही थी। जैसे कि खजुराहो की कलाकृति हो वैसे भी निर्मला का पिछवाड़ा कुछ ज्यादा ही आकर्षक था और पेटीकोट कशी होने के नाते उसका हर एक काटा उसका हर एक उपांग साफ साफ नजर आ रहा था शुभम तो यह देखकर एकदम उत्तेजित हो गया था उससे रहा नहीं जा रहा था पहले से ही सरला और उसकी बहू ने जिस तरह से उसके तन बदन में उत्तेजना की आग लगाई थी उसे बुझाना बहुत जरूरी था।
अपनी मां की मदमस्त भराव दार जवानी को देखकर शुभम के लिए अपने आप पर काबू पाना अब मुमकिन नहीं था इसलिए वह किचन में घुस गया और पीछे से जाकर अपनी मां को अपनी बाहों में भर लिया यू एकाएक अपने आप को किसी के बाहों में भरा हुआ देखकर वह एकदम से चौंक गई हालांकि उसे मालूम था कि ऐसी हरकत शुभम के सिवा कोई नहीं कर सकता लेकिन फिर भी वो डर गई थी। और ऊपर से तुरंत वह अपनी गांड के बीचोबीच ठोस अंग की चुभन महसूस करने लगी लेकिन शुभम कुछ बोल पाता इससे पहले ही उसे इस बात का एहसास हो गया कि उसे इस तरह से पीछे से अपनी बाहों में भरने वाला उसका बेटा नहीं है तो वह मन ही मन मुस्कुराने लगी।
शुभम उत्तेजना बस अपनी दोनों हथेली में अपनी मां की बड़ी-बड़ी चुचियों को ब्लाउज के ऊपर से पकड़कर दबाते हुए बोला।

वह मम्मी तुम ब्लाउज और पेटीकोट में कितनी खूबसूरत और सेक्सी लग रही हो और वैसे सच कहूं तो अगर तुम इसे उतारकर नंगी होकर खाना बनाती तो अभी कोई हर्ज नहीं था वैसे भी घर में मेरे और तुम्हारे सिवा कोई नहीं है।

धत कैसी बातें कर रहा है मैं नंगी होकर खाना नहीं बनाती। (निर्मला उसी तरह से तवे पर रोटियां सेकते हुए बोली।)

तुम सिर्फ नंगी होकर चुदवाती हो खाना नहीं बना सकती। (शुभम अपनी कमर को अपनी मां की बड़ी बड़ी गांड पर दबाते हुए और धीरे-धीरे ब्लाउज के बटन खोलते हुए बोला।)

तुझे क्या हो गया है शुभम जरा भी सब्र नहीं होता।

सब्र कैसे होगा मेरी रानी जब मेरी आंखों के सामने एक बेहद खूबसूरत औरत केवल ब्लाउज और पेटीकोट में खड़ी होकर अपनी बड़ी बड़ी गांड ( एक हाथ नीचे की तरफ ले जाकर पेटीकोट के ऊपर से ही अपनी मां की गांड दबाते हुए) खिलाते हुए खाना बना रही हो तो बना मेरे जैसा लड़का बेसब्र क्यों ना हो।

चल अच्छा बातें मत बना और अपना यह (एक हाथ पीछे की तरफ ले जाकर पैंट के ऊपर से ही अपने बेटे के खड़े लंड़ को पकड़ते हुए) इसे पीछे कर मेरी गांड में चुभ रहा है।

अच्छा गांड में चुभ रहा है और जब अपनी बुर में लेती हो तब नहीं चुभता।

तब तो बहुत मजा आता है। (तवे पर फूल रही रोटी को हाथ से गोल-गोल घुमाते हुए बोली।)

देख रही हो मम्मी जैसे तवे पर गर्म होकर रोटी फूलती है वैसे ही तुम जब गर्म होती हो तो तुम्हारी भूल भूल जाती है ऐसा लगता है कि जैसे गरम गरम रोटी हो।

बातें बहुत बनाने आता है तुझे अगर तुझे मेरी बुर भी गरम गरम रोटी लगती है तो खा जाया कर।

सच कहूं तो तुम्हारी बुर को खा जाने का बहुत मन करता है लेकिन उस में लंड डालने का भी बहुत मन करता है अगर उसे खा जाऊंगा तो लंड किस में डालूंगा।

(शुभम की ऐसी गंदी गंदी बातें सुनकर निर्मला को मज़ा आ रहा था और वह अपने बेटे की इस बात पर हंसते हुए बोली।)

चल अब तो बहुत बड़ा हो गया है और इस तरह की गंदी गंदी बातें करने लगा है अब तो मुझे खाना बना दे दे वरना रात को खाने के लिए कुछ नहीं रहेगा।

चलेगा मम्मी खाने के लिए कुछ नहीं रहेगा तो पेलने के लिए तुम्हारी ( पेटीकोट के ऊपर से ही अपनी मां की बुर दबाते हुए )यह तो है ना इसी से पेट भर लूंगा....

आहहहहहहहह..... क्या कर रहा है।(शुभम के द्वारा इस तरह से बुर दबाने की वजह से निर्मला के मुंह से सिसकारी की आवाज छूट गई हालांकि उसकी हरकतों की वजह से निर्मला भी काफी गर्म हो चुकी थी।)

वही कर रहा हूं जो एक खूबसूरत औरत के साथ करना चाहिए।

आज बहुत ज्यादा उतावला हो गया है तू खाना तो बना लेने दे।

नहीं मुझसे रहा नहीं जा रहा है।(शुभम काफी उत्तेजित हो गया था और बातों ही बातों में उसने अपनी मां की ब्लाउज के सारे बटन खोल दिए थे और राहत वाली बात यह थी कि आज निर्मला ने ब्लाउज के अंदर अपनी ब्रा नहीं पहनी थी पसीने की वजह से वह काफी चिपचिपी हो गई थी जिसे पकड़ कर दबाने में शुभम को काफी आनंद की अनुभूति हो रही थी।शुभम अपनी मां की गर्दन को चुमते हुए जोर-जोर से चूची को दबाना शुरू कर दिया जिसका असर निर्मला के बदन पर भी काफी हद तक मादकता का एहसास दिला रहा था।

ससससज्हहहहहहह आहहहहहहहह.... शुभम यह क्या कर रहा है कुछ तो सब्र कर मुझे खाना बना लेने दे।(निर्मला ऊपरी मन से अपनी बेटी को रुकने के लिए कह रही थी...जबकि अंदर से वह यही चाहती थी कि उसका बेटा बिना रुके अपना काम करते रहें क्योंकि शुभम की हरकतों ने उसकी लहसुन में भी आग लगाना शुरू कर दिया था जिसमें से मधुर रस बह रहा था।)

तुम खाना बनाती रहो मम्मी तुम्हें रोका किसने है मुझे अपना काम करने दो और इतना कहते हुए शुभम दोनों हाथों से अपनी मां की पेटीकोट पकड़कर ऊपर की तरफ उठाने लगा और अगले ही पल वो अपनी मां की पेटीकोट को कमर तक उठा दिया था।.....अपनी मां की नंगी गोरी गोरी बड़ी गांड देखते ही उसकी आंखों में चमक आ गई उसे इस बात की खुशी थी कि आज उसकी मां ने पेंटी नहीं पहनी हुई थी इसलिए वह अपनी मां की बड़ी बड़ी गांड पर चपत लगाते हुए बोला।

वाह मम्मी आज तो ऐसा लग रहा है कि तुम पहले से ही तैयारी करके रखी हो तभी तो देखो आज तुमने चड्डी भी नहीं पहनी हो अपनी गांड एकदम नंगी रखी हो शायद मेरे लिए ही।

ऐसा कुछ नहीं है आज गर्मी ज्यादा थी इसलिए मैं ना तो ब्रा पहनी हूं और ना ही चड्डी समझ गया ना तू (निर्मला जानबूझकर इतराते हुए बोली।)

कुछ भी हो मुझे तो खजाना मिल गया है।

खजाना तभी हाथ लगता है जब पहरेदार की रजामंदी हो मेरी रजामंदी है इसलिए तू खजाने तक आराम से पहुंच जाता है। (इतना कहते हुए निर्मला तवे पर फूली हुई रोटी को उठाकर बर्तन में रखने लगी तब तक शुभम अपनी पेंट घुटनों तक सरकार कर अपने मोटी खड़े लंड को हाथ में लेकर ही लाना शुरू कर दिया था जो कि इस समय काफी तगड़ा और कठोर नजर आ रहा था।निर्मला को भी इस बात का एहसास हो गया था कि अब सुभम क्या करने वाला है इसलिए वह पीछे नजर करके अपने बेटे के खड़े लंड को देखने लगी जिस पर नजर पड़ते ही उत्तेजना के मारे उसकी बुर कचोरी की तरह फूलने पीचकने लगी। शुभम एक हाथ में अपने लंड को पकड़ कर अपने लिए जगह बना रहा था जिसका साथ देते हुए निर्मला हल्के से नीचे की तरफ झुकी और अपनी गांड को ऊपर उठा दी जिससे उसकी बुर की गुलाबी छेद शुभम की आंखों के सामने साफ-साफ नजर आने लगी।
शुभम को अपनी मंजिल साफ नजर आने लगी बस अपनी गाड़ी को आगे बढ़ाना था और बा अपने लंड को एक हाथ में पकड़ कर उसके गर्म सुपाड़े को अपनी मां की बुर की गुलाबी छेद पर रख दिया जिससे निर्मला के बदन में आग लग गई वह सिहर उठी उसकी गुलाबी बुर भी जैसे लंड को अंदर लेने के लिए मचल रही हो इस तरह से सिकुड़ रही थी।
देखते ही देखते शुभम धीरे-धीरे करके अपने लंड को अपनी मां की बुर की गहराई में उतार दिया।
कुछ ही सेकंड में शुभम का मोटा तगड़ा लैंड निर्मला की गुलाबी पुर की गहराई में खो गया और शुभम की जांग निर्मला की जांघों से सट गई शुभम ने अपनी लंड को पूरी तरह से अपनी मां की बुर में उतार दिया था और दोनों का बदन आपस में इतना सड़ गया था कि दोनों के बीच से हवा भी गुजर नहीं रही थी।
यही पोजीशन इसी अवस्था में रोहन को चुदाई करना बेहद पसंद था वह अपने दोनों हाथों से अपनी मां की कमर को थामकर हल्के हल्के धक्के लगाने लगा और निर्मला भी अपने बदन की गर्मी दिखाते हुए अपने बेटे के हर धक्के के साथ गर्म सिसकारी छोड़ रही थी। एक बार फिर से सारे जग से अनजान मां बेटे दोनों अपने रिश्तो की मर्यादा भूल कर एक दूसरे में समाने के भरपूर प्रयास में लगे हुए थे शुभम हल्के धक्कों से शुरू करते हुए धक्कों की रफ़्तार बढ़ाने लगा। रसोई घर में जहां निर्मला खाना बना रही थी अब वहां चुदाई का खेल शुरू हो गया था। एक अद्भुत नजारा रसोई घर में नजर आ रहा था निर्मला किचन के फ्लोर पर झुकी हुई थी और शुभम अपनी मां की साड़ी को कमर तक उठाए हुए उसकी रसीली बुर में लंड पेल रहा था और साथ ही एक हाथ आगे बढ़ा कर उसके बड़े बड़े दूध को दबा रहा था निर्मला मस्त हुए जा रहे थे उसके मुंह से सिसकारी की आवाज लगातार पूरे रसोईघर में गूंज रही थी हालांकि इस मादक भरी सिसकारी को सुनने वाला शुभम के सिवा वहां कोई नहीं था और यही तो दोनों चाहते ही थे कि घर में केवल उन्हीं दो रहे ताकि वह जब चाहे तब चुदाई का सुख भोग सकें।
अशोक अपने काम में व्यस्त था और उसके पीठ पीछे उसका ही बेटा उसकी बीवी को चोद कर मस्त कर रहा था। शुभम के कमर की रफ्तार बढ़ने लगी वह तेज झटकों के साथ अपनी मां की चुदाई कर रहा था और उसके हर धक्के के साथ निर्मला की बड़ी बड़ी गांड पानी से भरे हुए गुब्बारे की तरह लहर जा रही थी। दोनों की सांसो की गति तेज चल रही थी। शुभम अपनी मां की बुर में लंड डालते हुए एक हाथ नीचे की तरफ ले जाकर अपनी मां की एक टांग को घुटनों से पकड़ कर ऊपर उठाते हुए बोला।

वैसे मम्मी आज तुम बना कर रही हो।

कद्दू की सब्जी। (शुभम के तेज धक्कों की वजह से निर्मला के मुख से हर एक शब्द सीहरते हुए निकले।)

कद्दू की सब्जी मम्मी तुम जानती हो कि मुझे कद्दू की सब्जी बिल्कुल भी नहीं पसंद है।

मैं अच्छी तरह जानती हूं बेटा लेकिन तू ही तो कह रहा था कि पहले खाने को कुछ ना हो चोदने के लिए बुर तो मिलेगी ना तु इसी से पेट भर लेना। .....

चलेगा मम्मी मैं तो कह रहा हूं कि खाने को भले कुछ ना हो बस चोदने के लिए बुर चाहिए। चोद कर ही पेट भर जाता है ।(इतना कहते हुए और जोर जोर से धक्के लगाने लगा कद्दू की सब्जी का नाम सुनकर शुभम को सरला चाची की बात याद आ गई क्योंकि वह झूठ बोला था कि उसे कद्दू की सब्जी बहुत पसंद है वह किसी बहाने से सरला के घर में प्रवेश करना चाहता था। जबकि उसे कद्दू की सब्जी बिल्कुल भी पसंद नहीं थी।)

मेरे बेटे पर चिंता मत कर तेरे लिए मैंने सूजी का हलवा बनाकर रखी हूं। तू मेरा इतना ख्याल रखता है तो इतना तो मैं तेरा ख्याल रख ही सकती हूं।
(शुभम जिस टांग को पकड़ कर थोड़ा सा उठाए हुआ था निर्मला उसी काम को थोड़ा सा और उठाकर उसे किचन पर रख दी ताकि और ज्यादा आराम से शुभंकर लंड उसकी बुर में अंदर बाहर हो सके।)

क्या बात कर रही है मम्मी तुम सच कह रही हो आज तो मजा आ जाएगा। (शुभम को इस तरह से खुश होता देखकर वह भी मुस्कुराने लगी और खुशी और उत्तेजना का मिलाजुला असर शुभम के धक्के पर पड़ने लगा वह जोर जोर से धक्के लगाते हुए अपनी मां को चोदने लगा। निर्मला अपने बेटे के हर धक्के का मजा लेते हुए जोर जोर से सिसकारी की आवाज निकाल रही थी। और देखते ही देखते दोनों एक साथ झड़ गए। शुभम झड़ने के साथ ही अपनी मां के ऊपर एक दम से पसर गया। कुछ देर तक निर्मला भी उसी तरह से झुकी रही।
जब थोड़ी देर बाद निर्मला की सांसे शांत हुई तो वह शुभम को पीछे की तरफ धक्का देते हुए बोली।

अब हटे गा भी कि ऐसे ही मेरे ऊपर पड़े रहेगा चल हट मुझे खाना बनाने दे बहुत देर हो गई है।
(शुभम अपनी मां के ऊपर से हटा और पेंट पहनने लगा निर्मला भी अपनी पेटीकोट को व्यवस्थित करके ब्लाउज के बटन लगाने लगी। इसी तरह से एकाएक हुई चुदाई में निर्मला को काफी मजा आता था इसलिए उसके चेहरे पर संतुष्टि भरा एहसास साफ नजर आ रहा था वह वापस खाना बनाने लगी और शुभम अपने कमरे में चला गया।

रात को अपने बिस्तर पर सरला शुभम की कही बातें याद कर करके करवट बदल रही थी यह उसके साथ पहली बार हुआ था कि कोई जवान लड़का उसकी खूबसूरती की तारीफ किया था जिससे वह गदगद हुए जा रही थी। कुछ घंटों पहले वह शुभम के ऊपर एकदम शक कर दी थी कि वह खुद अपनी मां को चोदता है और इस बात को लेकर हुआ है उसे से काफी नाराज भी थी लेकिन आज बाजार में जिस तरह से उसने थैला उठाकर उसकी मदद किया था और बातों ही बातों में उसकी खूबसूरती उसके बदन की तारीफ किया था उसे सुनकर सरला के तो जैसे होश उड़ गए थे वह सपनों की दुनिया में खोने लगी थी उसे यकीन नहीं हो रहा था कि शुभम जैसा जवान लड़का उसकी खूबसूरती की तारीफ कर रहा है। वह बार-बार बिस्तर पर करवट बदल रही थी सरला को अपनी टांगों के बीच हलचल सी महसूस होने लगी और इसी तरह की हलचल उसे उस दिन महसूस हुई थी जब वह निर्मला के घर पर शीशे की दीवार से अंदर का दृश्य देखी थी जहां पर खड़ी होकर निर्मला एकदम नग्न अवस्था में अपनी बुर के साथ खेल रही थी उस दृश्य को याद करके सरला का इमान भी गड़बड़ाने लगा।
उसके मन में तुरंत यह ख्याल आया कि निर्मला की उम्र में और उसकी उम्र में कुछ ज्यादा फर्क नहीं था केवल तीन चार साल का ही फर्क था । हां थोड़ा यह बात था कि वह निर्मला से शरीर में कुछ ज्यादा भारी थी और वह भी ज्यादा नहीं बल्कि बदन का हर हिस्सा कसा हुआ ही था और वह यह भी बात जानती थी कि निर्मला उससे ज्यादा ही खूबसूरत है लेकिन वह भी किसी से कम नहीं थी इसलिए वह अपने बदन की तुलना निर्मला के बदन से करने हेतु बिस्तर पर से होती और आईने के सामने जाकर खड़ी हो गई वह इधर-उधर घूमकर आईने में अपने अक्स को देखने लगी। उसे अपने बदन पर अपने चेहरे पर उम्र का प्रभाव ज्यादा नहीं लग रहा था उसका चेहरा गोल मटोल एकदम गोरा हॉट एकदम लाल-लाल थे और हर तरह से आकर्षक चेहरा था रही बात बाकी के इसे की तो वह अपने कंधे पर से साड़ी के पल्लू को नीचे गिरा कर अपनी छातियों को देखने लगी जो कि ब्लाउज के अंदर काफी आकर्षक लग रहे थे और ऊपर का एक बटन खुला होने की वजह से दोनों के बीच की लकीर किसी नहर की तरह नजर आ रही थी।उससे अभी भी रहा नहीं किया तो वह आईने में देखते हुए अपने हाथों से अपने ब्लाउज के बटन खोल कर अपने दोनों चुचियों को आजाद कर दी वह ब्रा नहीं पहनती थी जिसकी वजह से उसकी चुचियों में हल्का सा लटक पना गया था जिसे वो खुद अपने हाथों से ऊपर की तरफ उठाते हुए बोली की ‌
यह मेरी ही गलती है अगर मैं हमेशा ब्रा पहनती तो आज भी मेरी चूचियां एकदम टाइट रहती। वह मन में निश्चय कर ली कि आगे से वह हमेशा ब्रा पहनेगी।

Sarlaa ki badi badi chuchiya


वह अपनी नजर नीचे की तरफ ले गई तो उसे अपने पेट को देखकर अपने आप ही इस बात का ख्याल आ गया कि अगर थोड़ा सा मेहनत की होती तो उसका पेट और आकर्षक लगता जो कि उस दिन चिकना दूधिया रंग का था। वह अपने हाथों से अपने पेट को सहलाने लगी।
सरना अपने पेट को चलाते हुए आईने में अपने आप को देख रही थी जो कि सांस लेने की वजह से उसकी भारी-भरकम चूचियां ऊपर नीचे हो रही थी जिसे देखकर उसके मन में कुछ-कुछ हो रहा था और उससे रहा नहीं गया और वह अपने एक हाथ से अपनी चूची पकड़ कर दबाना शुरू कर दी यह शुभम की कही बातों का ही असर था कि आज वह इस कदर अपने आपको आईने में अर्धनग्न अवस्था में देख रही थी। सरला को अपनी ही हरकत पर मजा आ रहा था उसे अपने मन में यह सवाल उठ रहा था कि जरूर उसके बदन में कुछ बात होगी तभी तो शुभम जैसा जवान लड़का उसकी खूबसूरती की तारीफ कर रहा था। इसलिए अपने आप को जांचने के उद्देश्य से वह कमर से पति अपनी साड़ी को खोलकर नीचे फर्श पर गिरा दी अब हुआ आईने के सामने केवल पेटीकोट में खड़ी थी जिसकी डोरी उसकी नाजुक नाजुक उंगलियों में थी और उसे खींचकर अगले ही पल पेटीकोट को भी नीचे गिरा दी।
आईने में अपने आप को एकदम नंगी देखकर वह शरमा गई पहली बार वह अपने आप को नंगी देख रही थी और वह भी खुद ही अपने हाथों से ही अपने आप को नंगी की थी।
अपने पति के देहांत के बाद वह अपने आप को कभी भी नग्न अवस्था में नहीं देखी थी वह नहाती भी थी तो कपड़े पहने हुए ही होते थे लेकिन आज पहली बार वह आईने के सामने अपने आप को पूरी तरह से निर्वस्त्र करके आईने के सामने नंगी खड़ी थी।
वह आदम कद आईने में अपने आप को देख रही थी उसके बदन की बनावट और खूबसूरती देखकर उसे पहली बार ऐसा लग रहा था कि वह भी किसी से कम नहीं है। वह ना चाहते हुए भी अपने दोनों हाथों से अपनी बड़ी-बड़ी चुचियों को पकड़ कर दबाने लगी उसे निर्मला की हरकत याद आ रही थी और उसकी हरकत को याद करके आईने में अपनी टांगों के बीच के उस पतली दरार की तरफ नजर घुमाई तो वहां पर उसे ढेर सारा झांटों का झुरमुट देखने को मिला। उसे देखकर वह एक हाथ नीचे की तरफ ले गई और अपने झांटो के रेशमी बालों में उंगली फिराते हुए मन ही मन बोली की बालों वाली ही उसके पति को पसंद थी इसलिए वह जल्दी साफ नहीं करती थी।

अपने बुर के बाल में उंगली घुमाते हुए उसे इस बात का एहसास हो गया कि उसकी बुर पूरी तरह से गीली हो चुकी थी जिस की बूंदे उसकी उंगली को भिगो रही थी। वह मस्त होने लगी और निर्मला वाला दृश्य याद करके वह अपने आप ही अपनी बुर को मसल ना शुरू कर दी जैसे कि निर्मला कर रही थी और देखते ही देखते वह शुभम की बातों के असर में और निर्मला की हरकत की वजह से अपनी बुर के अंदर अपनी एक उंगली डालकर उसे अंदर बाहर करने लगी जिसमें उसे मजा आने लगा बरसों से सूखी पड़ी बुर में सावन भादो बरसने लगा। सूखी पड़ी बंजर जमीन में पानी की बौछार पड़ने लगी उसका बदन करेगा तो हमें लगा थोड़ी ही देर में उसकी सांसों की गति तेज होने लगी अपनी बुर को उंगली से ही चोदने में उसे मजा आने लगा हालांकि इस तरह की हरकत उसने अभी तक बिल्कुल भी नहीं की थी। लेकिन आज वह मजबूर थी एक छोकरे ने उसे अपनी जवानी के दिन याद दिला दिए थे।
उत्तेजना बस और बदन में आनंद की लहर उठता हुआ देखकर उसकी उंगली रोक नहीं रही थी और वह जोर-जोर से अपनी एक उंगली को बुर में डालकर अंदर बाहर कर रही थी उसे मज़ा आने लगा था आईने में अपने आप को देख कर वह मस्त हुए जा रही थी वह हल्के से अपनी दोनों काम को थोड़ा सा और फैला दी जिससे उंगली डालने में उसे आसानी हो।

आज पहली बार बार इस तरह से बहक गई थी और जोर जोर से अपनी बुर में उंगली पर रही थी थोड़ी ही देर में उसकी बुर से भलभलख कर नमकीन रस बहने लगा।
वह आनंद के सागर में गोते लगा रही थी उसे मजा आ गया था और वह अपने ऊपर दी सांसों को व्यवस्थित करने के लिए बिस्तर पर आकर बैठ गई।
थोड़ी ही देर में उसे ऐसा महसूस होने लगा कि तूफान गुजर चुका है वह काफी शांत हो चुकी थी लेकिन एक अद्भुत अहसास से गुजर चुकी थी जिसका एहसास उसके चेहरे पर संतुष्टि का प्रभाव छोड़ गया था वह मस्त हो चुकी थी।
वह नंगी ही बिस्तर पर लेट गई और कब उसकी आंख लग गई उसे पता ही नहीं चला।
 
शुभम की नजर अब तीन औरतों पर थी एक तो थी उसकी शीतल मैडम जिसकी मदहोश जवानी को वह एकदम करीब से देख पाया था उसकी मदहोश कर देने वाली खुशबू हर पल उसके बारे में सोचने से ही मादकता का एहसास दिलाती थी वह किसी भी हाल में शीतल से संभोग सुख प्राप्त करना चाहता था हालांकि उसे मंजिल दूर लग रही थी लेकिन नामुमकिन नहीं।अच्छी तरह से जानता था कि एक ना एक दिन शीतल को अपनी बाहों में लेकर उसकी भरपूर चुदाई का सुख भोगेगा।

Sheetal ki badi badi gol chuchiya


शीतल के साथ-साथ आप उसकी नजर उसकी पड़ोस की सरला चाची और उसकी बहू रुचि थी जिसे देखते ही उसके तन बदन में झंकार बजने लगे थे वह रुचि का केवल मुखड़ा ही देख पाया था और जाते समय उसके नितंबों का सीमित घेराव जिस पर नजर पड़ते ही उसे इस बात का आभास हो चुका था कि रुचि की मदहोश जवानी अभी तक पंखुड़ियों के भीतर ही छुपी हुई है वह पंख लेकर बाहर उड़ने के लिए तड़प रही है। और सरला चाची जिसकी परिपक्व जवानी का रस पीना चाहता था। उसके बड़े बड़े नितंबों को अपनी दोनों हथेली में भर कर उसे अपने लंड पर बिठाकर जवानी की शेर कराना चाहता था।अब उसके सामने सवाल ये था कि आप यह काम कैसे पूरा किया जाए और उसे उम्मीद थी कि वह अपनी मंजिल को जरूर प्राप्त कर लेगा क्योंकि अभी तक उसकी जिंदगी में सब कुछ अच्छा ही होता आ रहा था जो शुरुआत उसने अपनी मां के साथ संभोग करके शुरू किया था उस कारवा में अब तक उसकी तीनों मामी और बड़ी मामी की खूबसूरत लड़की के साथ साथ खुद उसकी बुआ जुड़ी हुई थी। और जब से उसकी मुलाकात सर लाचारी और उसकी बाहों से हुई थी तब से उसे लगने लगा था कि उसके कारवां में शीतल सरला और रुचि के भी जुड़ने की उम्मीद हो गई है। अब वह इसी ताक झांक में हमेशा लगा हुआ था।
आए दिन वह हमेशा जब भी चलना चाची को देखता था तो किसी ना किसी बहाने उनसे मुलाकात कर लेता था और आए दिन उनके छोटे-मोटे काम भी कर दिया करता था।अब तो ऐसा लगने लगा था कि सरला चाची जैसे खुद उत्सुक थी उससे अपना काम कराने के लिए क्योंकि जिस तरह का अनुभव शुभम के द्वारा उसे महसूस हुआ था उम्र गुजर गई थी उस तरह का अनुभव उसे कभी नहीं हुआ था शुभम की कही बातों की वजह से वह बरसों के बाद अपनी सूखी पड़ी बुर में नमी महसूस कर पाई थी उसे भी यह सब अच्छा लगने लगा था तभी तो वह दूसरे दिन से ही ब्रा और पैंटी पहनना शुरू कर दी थी और अब तो वह अपना कुछ ज्यादा ही ध्यान देती थी पहले वह साधारण रूप से तैयार होती थी लेकिन अब थोड़ा सा बदलाव लाई थी। और थोड़ा सा बदलाव लाने के बाद वह और ज्यादा सुंदर लगने लगी थी यह सब देख कर उसकी बहू खुद टोकते हुए बोलती थी कि।

वाह मम्मी अब तो तुम बहुत खूबसूरत लगने लगी हो क्या बात है।...
वह अपनी बाहों की बात सुनकर हंस देती थी और इतना कहती थी कि क्या मैं सजने सवरने लायक नहीं हूं क्या तो जवाब नहीं उसकी बहू यह कहकर उसका हौसला बढ़ा दी थी कि

क्यों नहीं मम्मी आप तो बहुत खूबसूरत लगती हो आजकल तो कितनी उम्र होने के बाद भी औरतें सजना सवरना नहीं छोड़ती लेकिन अभी तो आप मेरी बड़ी बहन जैसी लगती हो मैं भी यही चाहती थी कि आप सज संवर कर अच्छी तरह से रहे।

अपनी बहू की बातें सुनकर वह जवाब में मुस्कुरा देती थी।

उसकी जिंदगी में यह बदलाव शुभम के द्वारा आया था लेकिन फिर भी वह निर्मला के घर पर ताक झाक बनाए हुए थी। कोई और बात होती तो वह कब से भूल जाती लेकिन उसकी संका मां बेटे के बीच में अनैतिक संबंध को लेकर था इसलिए ना चाहते हुए भी उसके मन की उत्सुकता उसे बार बार उन दोनों पर नजर रखने को उकसा रही थी और वह लगातार उन पर नजर बनाए हुए थी इस बात से वाकिफ निर्मला अब कदम कदम पर बचकर चलती थी उसे इस बात का डर बराबर बना हुआ था कि कहीं उसके और उसके बेटे के बीच के संबंध के बारे में सरला को कुछ पता ना चल जाए।

दूसरी तरफ शीतल जो कि अपनी गलती के कारण अब हाथ मलने के सिवा उसके पास कोई दूसरा रास्ता ना होता देखकर वह बार-बार निर्मला से माफी मांगने की कोशिश कर रही थी लेकिन निर्मला थी कि उसकी तरफ जरा भी ध्यान नहीं दे रही थी। आखिरकार निर्मला भी एक औरत थी और एक औरत होने के नाते वा चित्र से जानती थी कि मर्दों का झुकाव हमेशा औरतों की तरफ बढ़ता ही रहता है भले ही उनकी झोली में दुनिया की सबसे हसीन औरत ही क्यों ना हो। इसलिए वह यही चाहती थी कि शीतल से वह और उसका बेटा जितना दूर रहेंगे उतना खुश रहेंगे और उतना ही निर्मला खुद निश्चिंत रहेगी। इसलिए शीतल के लाख कोशिश के बावजूद भी वह निर्मला से ना तो बात ही कर पा रही थी और ना ही उससे माफी मांग पा रही थी वह अंदर ही अंदर घुट रही थी।
हालांकि जब भी उसकी आंखों के सामने शुभम नजर आता था उसके अंदर के सारे दुख दर्द गायब हो जाते थे उसके चेहरे पर मुस्कान तैरने लगती थी और यही हाल शुभम का भी था जब भी वह शीतल को देखता तो उसके तन बदन में उत्तेजना की लहर दौड़ने लगती थी वह शीतल के मजबूत बदन को अपनी बाहों में भर कर उन्हें प्यार करने के लिए मचलने लगता था लेकिन अपनी मां की उपस्थिति में वह केवल नजरों से ही शीतल के सुंदरता का रसपान कर पा रहा था।
ऐसे ही एक दिन सीढ़ियों से उतरते समय शीतल की मुलाकात शुभम से हो गई और उसका दिल फिर से जोरो से धड़कने लगा क्योंकि उस समय सीढ़ियों पर दूसरा कोई नहीं था क्योंकि क्लास चालू था और किसी काम की वजह से शीतल ऊपर की तरफ जा रही थी और शुभम नीचे आ रहा था और दोनों की मुलाकात सीढ़ीयो के बीच हो गई दोनों एक दूसरे को देख कर मुस्कुराने लगे ....
Sheetal or Shubham sidhiyo par kuch is tarah se


क्या शुभम तू तो अब मुझ पर ध्यान ही नहीं देता क्या मैं तुझे खराब लगने लगी हूं या ....(इतना कहने के साथ है उसके चेहरे पर उदासी की लकीर साफ नजर आने लगी)

नहीं नहीं मैडम ऐसी कोई भी बात नहीं है। (शुभम उसके ब्लाउज में से झांकते दोनों कबूतरों को देखते हुए बोला)

नहीं ऐसी ही बात है तभी तो तू मुझे मैडम कह रहा है वरना मैं तुझे कितनी बार कहीं हूं कि तुम मुझे अकेले में शीतल बोला कर।

देखो शीतल तुम भी अच्छी तरह से जानती हो कि अभी हालात कुछ ठीक नहीं है मम्मी ने जिस दिन से हम दोनों को उस अवस्था में देखी है तब से वह मुझसे और तुमसे दोनों से खफा है इसलिए अभी हम दोनों का मिलना और मुश्किलें बढ़ा सकता है।

मैं जानती हूं शुभम मेरी गलती की वजह से हम दोनों आज इतनी दूर है वरना हम दोनों का मिलन अब तक हो चुका होता (शीतल तिरछी नजरों से शुभम के पेंट में बन रहे तंबू को देखते हुए बोली और उस तंबू को देखकर उसकी बुर कुल बुलाने लगी)

देखो शीतल अपने आप को दोषी मत ठहराओ जो होना था हो गया....

लेकिन मैं तो तुमसे दूर हो गई ना पहले तो मैं तुमसे बात भी कर लेती थी लेकिन अब वह भी मुश्किल होता जा रहा है। (शीतल बात तो कर रही थी शुभम से लेकिन उसकी नजरों पर अपनी नजर गड़ाए हुए थे क्योंकि वह अच्छी तरह से जान रहे थे कि शुभम उससे बात करते समय उसकी चूचियों को घूर घूर कर देख रहा था जो कि इस समय ट्रांसपेरेंट साड़ी में से साफ साफ नजर आ रही थी और यह देखकर वह खुश भी हो रही थी।)

देखो शीतल सब कुछ ठीक हो जाएगा बस सब्र करो मुझे भी तुमसे मिले बिना चैन नहीं मिलता लेकिन क्या करूं मजबूर हूं। (काफी समय बाद शीतल को अपने इतने करीब पाकर शुभम काफी उत्तेजित होने लगा था शीतल के बदन से उठ रही माधव खुशबू का अहसास शुभम को उत्तेजना के सागर में लिए जा रहा था वह अपने आप पर कंट्रोल नहीं कर पा रहा था और इसीलिए इतना बोलते समय वह एक कदम आगे बढ़ाकर शीतल के और करीब आने की कोशिश करने लगा और शीतल भी उसके बढ़ाए कदम को देखकर अपने चारों तरफ नजर दौड़ाते ही तुरंत उसे अपनी बाहों में कस ली और बिना एक पल गांव आए ही अपने होठों को उसके होठों पर रखकर चूसना शुरू कर दी .. शीतल के मन में और उसके बदन में अजीब सी भावनाएं उठ रही थी कि एक शिक्षिका होने के बावजूद स्कूल के अंदर वह एकांत पाकर शुभम के सामने वह अपनी भावनाओं पर बिल्कुल भी काबू नहीं कर पाई थी और इसी के चलते वह उसे अपनी बाहों में लेकर लोक लाज शर्म सब कुछ त्याग कर उसके होठों का रसपान कर रही थी शीतल की इस कामुक हरकत की वजह से शुभम के तन बदन में आग लग गई थी और वह भी तुरंत शीतल के मजबूत खूबसूरत बदन को अपनी बाहों में करते हुए अपनी दोनों हथेलियों को पीठ पर से फीसलाते हुए नीचे की तरफ लेकर आया और तुरंतअपनी दोनों हथेलियों में जितना हो सकता था उतना साड़ी के ऊपर से ही सीतल की मत मस्त बड़ी बड़ी गांड को भर कर दबाना शुरू कर दिया रुई से भी नरम मुलायम गांड को अपनी हथेली भरकर दबाते हुए शुभम पूरी तरह से उत्तेजित हो गया था और उसके पेंट में तुरंत तंबू बन गया था जो कि इस समय उसकी ठोकर शीतल को अपनी टांगों के बीच अपनी रसीली फूली हुई बुर के ऊपर बराबर हो रही थी जिसका अहसास होते ही उसकी बुर ने समर्पण की भावना के अधीन होकर अपनी बुर में से मधुर रस की दो बूंदे नीचे टपका दी जो कि उसके बदन की स्वीकृति थी।
करीब-करीब केवल दोनों के मिलन मैं अभी 1 मिनट भी नहीं हुआ था कि सीढ़ियों पर किसी के कदमों की आहट सुनते ही दोनों फिर से अलग हो गए ना तो शीतल ही उसे अपनी बाहों से अलग करना चाहती थी और ना ही शुभम शीतल को अपने से जुदा करना चाहता था लेकिन मजबूरी थी दोनों अलग हो गए और अपने अपने रास्ते पर चलते बने लेकिन दोनों पीछे पलट कर एक दूसरे को देखने लगे जोकि शुभम तो काफी खुश नजर आ रहा था लेकिन इस बिछड़ने के पल की वेदना शीतल की आंखों में साफ नजर आ रही थी। वह भारी मन से अपने रास्ते चली गई और शुभम अपने रास्ते शुभम को इस बात से राहत थी कि मौका मिलते ही जब चाहे तब शीतल के खूबसूरत बदन कुआं भोग सकता था लेकिन खासा मेहनत उसे सरला चाची और उसकी बहू को पाने में करनी थी इस बात का अंदाजा उसे अच्छी तरह से था इसलिए वह अपने काम में जुटा हुआ था।

आए दिन वह छत पर टहलने के लिए चला जाया करता था जहां से सरला चाची की छत आपस में जुड़ी हुई थी और एक दूसरे की छत पर बिना अड़चन के आया जा सकता था । क्योंकि छत पर ढेर सारे कपड़े हमेशा सूखने के लिए तंगी रहते थे और वह चित्र से जानता था कि उन्हें लेने के लिए सरला चाची या उनकी बहू जरूर आएगी। लेकिन ऐसा नहीं हो पा रहा था।
वह रोज छत पर इसी तरह से टहलने के लिए चला जाया करता था कि उन दोनों का दीदार हो जाए और उनसे बातें करके कुछ रास्ता निकले लेकिन ऐसा नहीं हो पा रहा था एक दिन ऐसे ही वह छत पर टहल रहा था उसे उम्मीद थी कि आज सरला चाची जरूर कपड़े उतारने के लिए आएगी। वह ईसी ताक में इधर से उधर छत पर टहल रहा था। कि तभी उसे सरला चाची की बहू रुचि नजर आ गई जोकि आते ही कपड़े उतारने लगी रस्सी पर टंगे हुए सारे कपड़ों को एक-एक करके उतार कर संभाल कर रख रही थी मौका देख कर शुभम तुरंत रुचि के करीब गया। उसका कसा हुआ और सीमित पिछवाड़ा देखकर वह एकदम पागल हो गया था।
अब तक कई औरतों के संगत और उनसे संभोग के कारण वह काफी परिपक्व हो चुका था और खास करके औरतों के मामले में तो कुछ ज्यादा ही परित कहो गया था उनसे बात करने का ढंग से किया था उन्हें कैसे अपनी बातों के जादू में उलझाना है यह उसे अच्छी तरह से आने लगा था इसलिए वह रुचि के करीब पहुंचते ही बोला।

और भाभी क्या कर रही हो...

(यू एकाएक आवाज सुनते ही रुचि एकदम से डर गई और चौक ते हुए बोली।)

बाप रे तुम तो मुझे डरा ही दिया इस तरह से कोई बोलता है क्या।

मैं तो इसी तरह से बोलता हूं।

अरे मेरा मतलब है अपने आने का कुछ तो आहट देते मैं तो डर ही गई कि यह कौन सी बला टपक पड़ी। (रुचि रस्सी पर से कपड़ों को उतारते हुए बोली।)

अच्छा भाभी तो मैं आपके लिए बला हो गया। (शुभम रुचि के सामने तकरीबन 3 _ 4 की फीट की दूरी पर रस्सी पकड़कर खड़े होते हुए बोला)

इस तरह से आकर किसी को डर आओगे तो वह तुम्हें बला ही कहेगी।

अच्छा चलो कोई बात नहीं बला ही सही...(शुभम रुचि के खूबसूरत चेहरे को देख रहा था रुचि किसी हीरोइन से कम नहीं लगती थी पतली सी काया चर्बी ओ का नामोनिशान नहीं था चर्बी उतनी ही थी जितनी की खूबसूरती में चार चांद लगा रहे थे ब्लाउज में कैद दोनों कबूतर अभी खा पीकर बड़े नहीं हुए थे लेकिन इतने बड़े तो हो ही गए थे कि हवा में उड़ सके जिन्हें देखकर शुभम को ऐसा लग रहा था कि जैसे भाभी ने हथेली में आ सके उतने साइज के संतरे अपनी ब्लाउज में कैद करके रखे हो. होठों की लालीमां बदन के लहू की तरह लग रही थी.. जिसे शुभम अपने होंठों में भर कर पीना चाहता था... कलाइयों में लाल रंग की चूड़ी बेहद खूबसूरत लग रही थी और उससे भी ज्यादा खूबसूरत चूड़ियों की खनक से उठ रही मधुर ध्वनि की थी जो कि उसके कानों में मादकता का एहसास दिला रही थी। शुभम रुचि की खूबसूरती के रसपान करने में इतना खो गया कि वह एकटक बस उसे ही देखे जा रहा था और रुचि सुभम की इस हरकत से शर्मा आ रही थी‌। इसलिए वह बोल दी।)

ऐसे क्या देख रहे हो?
(रुचि की बात सुनते ही शुभम हड़बड़ाते हुए बोला)

ककककक... कुछ नहीं बस यह देख रहा हूं कि मेरे बगल में इतनी खूबसूरत औरत है और मेरी नजर उस पर पड़ी ही नहीं। (शुभम अपनी बातों का जाल बुनता हुआ बोला। शुभम की ऐसी बातें सुनते ही रूचि एकदम से जीत गई वह रस्सी पर से कपड़े उतारते उतारते वैसे ही खड़ी रह गई उसे समझ में नहीं आया कि यह शुभम ने क्या कह दिया वह आश्चर्य से शुभम की तरफ देखने लगी तो शुभम अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए बोला।)

क्यों क्या हुआ ऐसे क्यों देख रही हो मैं जो कुछ भी कह रहा हूं एकदम सच कह रहा हूं मेरी बातों में इतनी सी भी झूठा पर नहीं है एक एक शब्द शतप्रतिशत खरा है...
Ruchi kapde rassi par se utarte huye


ऐसे मत कहो कोई सुन लेगा तो क्या कहेगा...(रुचि अपने चारों तरफ नजर दौड़ आते हुए बोली जिसका मतलब एकदम साफ था कि शुभम की कही बातें उसे अच्छी लग रही थी..)

मुझे तुम पागल समझी हो क्या कि मैं किसी के सामने तुम से ऐसी बातें कहूंगा मैं अच्छी तरह से जानता हूं कि घर में बहू की क्या मर्यादा होती है इसलिए मैं दुनिया की नजरो से बचकर तुमसे यह बात कह रहा हूं अगर मेरी बात से तुम्हें जरा भी दुख पहुंचा हो या बुरा लगा हो तो मैं माफी चाहता हूं (शुभम जानबूझकर हाथ जोड़कर माफी मांगते हैं बोला।)

नहीं नहीं ऐसी कोई बात नहीं है ‌। देखो मुझे इस तरह की बातें पसंद नहीं अगर मम्मी जी आ गई और इस तरह की बातें करते हुए सुन ली तो क्या कहेंगी।

चलो कोई बात नहीं अगर तुम्हें इस तरह की बातें पसंद नहीं है तो मैं अब कभी नहीं कहूंगा लेकिन जो मैंने कहा वह बिल्कुल सच है तुम बहुत खूबसूरत हो।

(इस बार रुचि के चेहरे पर मुस्कुराहट तैर गई और वह मंद मंद मुस्कुराने लगी उसकी मुस्कुराहट में भी एक अद्भुत आकर्षण था जिस के आकर्षण में शुभम पूरी तरह से बंधता चला जा रहा था। रुचि को हंसता हुआ देखकर शुभम तुरंत बोला ।)

तुम हंसती मतलब कि तुम्हें मेरी बात अच्छी लग रही है और वैसे भी कही हुई सच्ची बात हमेशा अच्छी ही लगती है यह बात तुम भी अच्छी तरह से जानती हो।

चलो सब बात छोड़ो तुम मुझे यह बताओ कि यहां क्या करने आए हो। (रुचि उसी तरह से अपने स्थान पर खड़े होकर बोल रही थी वह रस्सी से कपड़े उतारना भूल चुकी थी ऐसा लग रहा था कि उसे भी शुभम का यह साथ अच्छा लग रहा है इसलिए तो वह उसी तरह से खड़े होकर उससे बातें कर रही थी।)

कुछ नहीं बस ऐसे ही छत पर डाल रहा था थोड़ा व्यायाम कर रहा था। और तुमको देखा तो सोचा चलो अपनी भाभी से थोड़ी गपशप कर लिया जाए वैसे भी मैं पहली बार तुमसे मिल रहा हूं जबकि हम दोनों इतने पास में रहते हैं फिर भी।

अच्छा तो जनाब मुझसे मिलने आए हैं और तुम व्ययाम करते हो लगता तो बिल्कुल भी नहीं है कि तुम व्यायाम करते हो.. ( रुचि शुभम को ऊपर से नीचे की तरफ देखते हुए बोली।.... रुचि की बात सुनकर शुभम को यही सही मौका लगा अपना खूबसूरत और गठीला बदन दिखाने के लिए ... क्योंकि यह बात शुभम अच्छी तरह से जानता था कि औरतें हमेशा गठीले बदन को पसंद करती हैं उन्हें हट्टी कट्टी चौड़ी और मजबूत शरीर वाले मर्द पसंद होते हैं और वह उनके प्रति आकर्षित भी होती हैं। और शुभम को अपनी जवान मजबूत बदन पर भरोसा और विश्वास दोनों था वह अच्छी तरह से जानता था कि अगर वह किसी तरह से अपनी चौड़ी छाती खूबसूरत शरीर को वह रुचि को दिखा दे तो रुचि उसके प्रति आकर्षित हो जाएगी और रुचि कि कहीं बात का फायदा उठाते हुए बिना एक शब्द बोले वह तुरंत अपनी टीशर्ट को ऊपर की तरफ करते हुए बोला।)

तुम्हें विश्वास नहीं होता ना रुको रुको मैं बताता हूं कि मैं व्ययाम करता हूं कि नहीं...(शुभम को अपनी टीशर्ट निकालता हुआ देखकर वह उसे रोकते हुए बोली।)

अरे अरे अरे यह क्या कर रहा है अरे मत निकाल टीशर्ट कोई देखेगा तो क्या कहेगा ...(रुचि अपने चारों तरफ नजर दौड़ते हुए बोली।.. वह अपनी बात पूरी कर पाती इससे पहले ही फुर्ती दिखाते हुए शुभम अपनी टीशर्ट निकाल दिया और टीशर्ट निकालते ही वह दोनों हाथ फेरते हुए अपने बदन को रुचि को दिखाते हुए बोला..)

लो देख लो भाभी क्या मैं झूठ कह रहा था ‌।
(रुचि अभी भी इधर उधर देख ले रही थी कि कहीं कोई देख तो नहीं रहा है क्योंकि वह नहीं चाहती थी कि कोई यह देखकर कुछ भी कहे लेकिन चारों तरफ देखने के बाद वह जब सुभम की तरफ नजर दौड़ाई तो वह उसे देखते ही रह गई.... मजबूत शरीर आकर्षक चेहरा चौड़ी छाती चर्बी का नामोनिशान नहीं एकदम किसी हीरो की तरह उसका बदन एकदम फिट देखकर रूचि के तन बदन में एक अजीब सी हलचल होने लगी उसके मन के कोने के साथ-साथ उसकी टांगों के बीच भी झंकार बजने लगी जैसे मर्दे कि वह कल्पना करते आ रहे थे उस कल्पना को साक्षात रुप शुभम देता हुआ नजर आ रहा था वह उसे एकटक देखती ही रह गई ‌। शुभम के लाजवाब और मजबूत शरीर को देखकर उसे अपना पति याद आ गया जिसके पतले शरीर की ओट में वह अपनी जवानी पिघला नहीं पा रही थी उसकी कमजोर भुजाओं में अपनी प्यास नहीं बुझा पा रही थी इस दौरान उसकी नजर उसके पैंट में बने हल्के से तंबू की तरफ गई जो कि हल्का सा उठा हुआ था जो इस बात को साबित कर रहा था कि शुभम रुचि के संदिग्ध में उत्तेजित हुआ जा रहा था रुचि शुभम के पेंट में बने हल्के से उठाव को देखकर उत्तेजित होने लगी उसकी टांगों के बीच पेंटी के अंदर हलचल होने लगी। वह शुभम की खूबसूरत बदन को देखती ही जा रही थी कभी चौड़ी छाती को देखती तो कभी पेंट में बने उभार को देखती रहती जोकि हल्का-हल्का ऊठ रहा था यह देख कर रुचि शर्म से लाल हो गई उसके गालों पर सूर्ख लालिमा छाने लगी।
दूर आसमान में सूरज ढल रहा था जिसकी पीली रोशनी छत पर बिक्री हुई थी और पीली रोशनी में रुचि का खूबसूरत बदन सोने की तरह चमक रहा था और साथ ही शुभम की नंगी छाती मर्दाना ताकत को उजागर कर रही थी रुचि तो शुभम को देखती रह गई उस पर से नजर हटाने का उसका मन नहीं हो रहा था वह उसी तरह से रस्सी पकड़े खड़ी होकर शुभम की जवानी भरे बदन को देख रही थी।
शुभम भी जानबूझकर उसी तरह से खड़ा था वह अच्छी तरह से जानता था कि रुचि की नजर उसके पैंट में बने उभार पर भी चली जा रही थी जिससे शुभम भी अपने बदन में उत्तेजना का अनुभव कर रहा था और वह इस पल को जी लेना चाहता था इसलिए अपने बदन को ढकने की बिल्कुल भी दरकार नहीं ले रहा था रुचि ही इस तंद्रा को भंग करते हुए बोली।

बस बस शुभम टी शर्ट पहन ले मैं अच्छी तरह से समझ गई हूं कि तू बहुत कसरत करता है तभी तेरा बदन इतना गठीला हो गया है। (रुचि के मुंह से अपने बदन की तारीफ सुनकर शुभम पूरी तरह से गदगद हो गया हुआ अच्छी तरह से समझ गया कि थोड़ी सी और मेहनत करने पर रुचि उसके जाल में आ जाएगी। इसलिए वह खुद रस्सी पर से कपड़ों को उतारते हुए रुचि को दबाने लगा और रुचि भी शुभम की मदहोश जवानी के आकर्षण में आकर्षित होते हुए उसके हाथ से कपड़े ले रही थी।

भाभी तुम रोज शाम को इसी तरह से कपड़े उतारने आती हो।...

क्या कह रहा है तू तुझे जरा भी अंदाजा है।
(रुचि की बात सुनकर वह अपने कहे गए शब्दों पर ध्यान देता हुआ बोला।)

मुझे माफ करना मेरा मतलब वह नहीं था मैं कहना चाहता हूं कि तुम इसी तरह से रस्सी पर से सूखे हुए कपड़े उतारने आती हो।(शुभम रस्सी पर से रुचि की साड़ी को उतारते हुए बोला... और रूचि भी शुभम की हड़बड़ाहट देख कर मुस्कुराते हुए बोली।)

हां मेरा तो काम ही यही है मैं रोज इसी तरह से शाम को रस्सी पर से सूखे हुए कपड़े इकट्ठे करके वापस ले जाते हैं क्यों कोई काम है क्या।

नहीं काम तो नहीं है बस तुमसे मुलाकात होती रहेगी तो मुझे भी अच्छा लगेगा। (शुभम साड़ी को रुचि के हाथों में थमाते हुए बोला।)

लेकिन मुझे अच्छा नहीं लगेगा तुम्हारी इस तरह की मुलाकात के बारे में अगर मम्मी जी को पता चल गया तो वह क्या समझेंगी।

अरे कुछ नहीं समझेंगी मैं सब संभाल लूंगा...(इतना कहते हुए शुभम रस्सी पर से रुचि की सूखी हुई पेटीकोट को उतारने लगा जो कि यह देखकर रुचि शर्मिंदा होने लगी लेकिन वह कुछ कह पाती इससे पहले ही वह रस्सी पर से पेटिकोट उतार कर रुचि को थमाने लगा लेकिन तभी पेटिकोट के नीचे रखी हुई जोकि रुचि ने खुद अपने हाथों से सूखने के लिए रखी थी वह पैंटी और ब्रा हाथ से छूट कर नीचे गिर गई। जिस पर नजर पड़ते ही रूचि एकदम से हड़बड़ा गई लेकिन वह कुछ कह पाती इससे पहले ही शुभम नीचे झुक कर उसे अपने हाथों में उठा लिया और अपने दोनों हाथ में उसे पकड़ कर रुचि को थमाने लगा जो कि रुचि तुरंत अपना हाथ आगे बढ़ाकर एक झटके से शुभम के हाथ में से अपनी ब्रा और पेंटी को खींचकर कपड़ों में छुपा ली और हंसते हुए वहां से चली गई... शुभम पूरी तरह से उसकी खूबसूरती के आकर्षण में जकड़ चुका था उसे इस बात का अंदाजा बिल्कुल भी नहीं था कि वह नीचे झुककर जिससे कपड़े को उठा रहा है वह रोजी की पैंटी और ब्रा थी जब इस बात का एहसास उसे हुआ तो वह पूरी तरह से उत्तेजित हो गया कि रुचि के खूबसूरत बदन को ढकने वाले अंग वस्त्र जो कि वह उसके बदन से लिपटे हुए रहते थे उन कपड़ों को अपने हाथों में उठाया था इस बात का एहसास उसे पूरी तरह से उत्तेजित कर गया और जो उधार उसकी पेंट में हल्का सा उठा हुआ था वह पूरी तरह से तंबु बन गया।
रुचि जिस तरह से उसके हाथ से अपनी ब्रा और पेंटी को छीन कर हंसते हुए गई थी उसे देखते हुए शुभम को इस बात का अंदाजा लग गया कि उसके जाल में एक और नई चिड़िया फंसने वाली है बस अब दाना डालने की जरूरत है। रुचि से बात करता हुआ पूरी तरह से उत्तेजित हो गया था। पेंट में उसका लंड पूरी तरह से तन कर खड़ा हो गया था अब उसको शांत करना उसके लिए बेहद जरूरी हो गया था और वह तुरंत अपने कमरे में गया जो कि वह अच्छी तरह से जानता था कि इस समय उसकी मां बाजार से सब्जी लेने गई थी।
वह अपने कमरे में जाते ही दरवाजा बंद करके एकदम नंगा हो गया और रूचि के खूबसूरत बदन की कल्पना करते हुए अपने लंड को हिलाने लगा और तब तक हिलाता रहा जब तक की रुचि के नाम से उसके लंड ने पानी नहीं फेंक दिया।........
 
स्कूल जाने का समय हो गया था शुभम जल्दी जल्दी तैयार हो गया वैसे भी आज उठने में देर हो गई थी इसलिए जैसे तैसे करके नाश्ता करके वह अपनी मम्मी को आवाज लगाने लगा।

मम्मी..... ओ मम्मी आज बहुत देर हो रही है आप कहां रह गई...

अभी आई...(इतना कहकर निर्मला फिर से अपनी ब्लाउज की डोरी बांधने की कोशिश करने लगी जो कि उससे बांधी नहीं जा रही थी। जब निर्मला को लगने लगा कि उससे ब्लाउज की डोरी नहीं बांधी जाएगी तब वह शुभम को आवाज लगाते हुए बोली।)

शुभम औ शुभम जरा इधर तो आना..

क्या बात है मम्मी..

अरे इधर तो आ तब मैं तुझे बताती हूं... एक तो देर हो रही है और यह डोरी नहीं बांधी जा रही..(निर्मला अपने आप से ही बोलते हुए फिर से अपने हाथ को पीछे की तरफ ले जाकर आईने में अपने प्रतिबिंब को देखते हुए डोरी बांधने की कोशिश करने लगी लेकिन उसकी कोशिश फिर नाकाम हो गई तब तक दरवाजे पर शुभम पहुंच चुका था और उससे आईने में देखते ही बोली।)

शुभम जरा ले ब्लाउज की डोरी तो बांध देना आज पता नहीं क्यों मुझसे बांधी नहीं जा रही।
(जिस तरह से निर्मला परेशान होते हुए अपने ब्लाउज की डोरी को बांधने की कोशिश कर रही थी उसे देख कर शुभम बंद मन मुस्कुराने लगा और इस समय निर्मला कुछ ज्यादा ही खूबसूरत लग रही थी बाल अभी भी गीले थे और उसमें से आ रही मादक खुशबू पूरे कमरे को मोहक बना रही थी। शुभम अपनी मां के कमर के नीचे के भरावदार ऊभार को देखते हुए अपने कदम आगे बढ़ाते हुए बोला।)

क्या बात है मम्मी आज तो तुम एकदम कयामत लग रही हो।

आज क्या खास बात है रोज ही तो लगती हूं।

आज तुम्हारी यह कुछ ज्यादा बड़ी बड़ी लग रही है (शुभम अपनी मां की गांड पर चपत लगाते हुए बोला)

आऊचचच.... क्या कर रहा है पागल हो गया है क्या? कितनी जोर से मारा। (निर्मला अपनी गांड सहलाते हुए बोली।)

अच्छा अभी लग रही है मुझे पूरा लंड अंदर डालकर जोर जोर से धक्के लगाता हूं तब तो बोलती हो और जोर से और जोर से....(शुभम साड़ी के ऊपर से अपनी मां की गांड सहलाते हुए बोला।)

तब की बात कुछ और होती है उस समय पूरे बदन में जोश भरा होता है तो उस समय चाहे जितनी जोर जोर से धक्के लगा चपत लगा कुछ भी कर सिर्फ और सिर्फ मजा ही आता है ( निर्मला मुस्कुराते हुए बोली)

मम्मी तुम्हारी बड़ी बड़ी गांड देखकर आज मेरा मन कुछ और कर रहा है। (शुभम जोश के साथ पीछे से अपनी मां को बांहों में भरते हुए और अपने पेंट में बने तंबू को साड़ी के ऊपर से अपनी मां की गांड पर रगड़ते हुए बोला।)

अच्छा तो बता क्या कर रहा है तेरा मन....( निर्मला आईने में अपने बेटे को अपने आप को बाहों में लिए हुए देखते हुए बोली। जो कि इस समय शुभम ब्लाउज के ऊपर से ही अपनी मां की खरबूजे जैसी चूचियों को दबाना शुरू कर दिया था।)

आज मेरा मन तुम्हारी गांड मारने को कर रहा है।
(इतना सुनते ही निर्मला उछल पड़ी और बोली।)

पागल हो गया क्या ना ना ना ना बिल्कुल नहीं उस बारे में सोचना भी नहीं .. बहुत दर्द होता है और तेरा लंड कोई पतला तो है नहीं कि आराम से चला जाएगा साला है मुशल जैसा.... एकदम हड़कंप मचा देता है।(डोरी ना बदले की वजह से धीमी हो चली ब्लाउज को वह वापस से पीछे की तरफ ले जाते हुए बोली।)

क्या मम्मी तुम्हें भी तो मजा आता है ना।

हां आता है मजा लेकिन दर्द भी बहुत होता है। इसलिए अभी इस बारे में कोई बात नहीं करनी है जब करना होगा तब सोचेंगे अभी तू बस जल्दी से मेरे ब्लाउज की डोरी बांध दे बहुत देर हो रही है स्कुल भी पहुंचना है।(शुभम अभी भी अपनी मां को कस के बाहों में झगड़ा हुआ था जिसकी वजह से उसके पेंट में बना तंबू बराबर गांड के बीचो बीच अपने लिए जगह बना रहा था शुभम को अपनी मां की बड़ी बड़ी गांड पर अपना लंड रगड़ना में मजा आ रहा था और निर्मला भी अपने बेटे की मस्ती में मस्त हुए जा रही थी लेकिन वह इतना जरूर जानती थी कि अगर वह शुभम को नहीं रोकी तो स्कूल जाने से पहले ही लगता है वह उसकी चुदाई कर देगा और भाई ऐसा नहीं चाहती थी क्योंकि बहुत देर हो चुकी थी।इसलिए वह एक हाथ पीछे की तरफ ले जाकर पेंट में बने तंबू को अपने हाथ से पकड़ कर उसे पीछे की तरफ ठेलते हुए बोली।)

बेटा अपने इस मुसल को पीछे ही रखना... बड़ा बदतमीज है... घुसता ही चला रहा है।

इसका काम ही है घुसना जहां थोड़ी सी जगह देखी नहीं की घुसना शुरू कर देता है।(शुभम वापस अपनी कमर को अपनी मां की गांड पर सटाते हुए बोला।)

तो क्या कहीं भी घुस जाएगा (निर्मला फिर से उसे उसी तरह से पकड़कर पीछे की तरफ ठेलते हुए बोली।)

हां घुस जाएगा क्योंकि इसके घुसने लायक छोटे-छोटे बिल सिर्फ तुम्हारे पास है।
(इस तरह की अश्लील गंदी बातें करके निर्मला को भी मजा आने लगा था लेकिन दीवार पर टंगी घड़ी की तरफ देखते ही अंदर ही अंदर गुस्सा होने लगी क्योंकि वह भी अपने बेटे की हरकत की वजह से काफी उत्तेजित हो चुकी थी और उसे अपनी पेंटी गीली होती हुई महसूस होने लगी थी वह भी अपने बेटे के पेंट में बने तंबू को अपनी पेंटी के अंदर छुपे खजाने में घुसाना चाहती थी लेकिन समय का अभाव था इसलिए वह मन मारते हुए बोली।)

बहुत बातें करने लगा है चल अब जल्दी से मेरे ब्लाउज की दूरी बांधे बहुत देर हो चुकी है समय पर पहुंचना भी है।

क्या मम्मी ....(शुभम उदास होता हुआ बोला।)

मुझे कुछ नहीं कहना बस जल्दी से आप डोरी बांध दे।

(शुभम भी अच्छी तरह से समझ रहा था कि स्कूल पर उस समय पर पहुंचना बहुत जल्दी है और वास्तव में उन दोनों को बहुत देर हो रही थी इसलिए वह भी अपने मन से अपने दोनों हाथ आगे बढ़ा कर अपनी मां के ब्लाउज की डोरी को बांधने लगा। और इसके बाद दोनों मुस्कुराते हुए कार में बैठकर उसको की तरफ निकल गए ‌ । घर में एकांत पाते ही निर्मला अपने बेटे के द्वारा की गई हरकत का पूरा मजा उठाती थी उसे अपने बेटे की इस तरह की गंदी हरकतों में बहुत मजा आने लगा था और उसे मालूम भी रहता था कि जब घर में कोई नहीं होता है तो वह अक्सर उसके साथ इस तरह की छेड़खानी करता रहता है।
और निर्मला भी अपने बेटे की हरकतों का खुलकर मजा लेती थी और उसे पूरी तरह से मजा लूटने देती थी क्योंकि उसकी जिंदगी में जिस तरह का बदलाव आया था और एक तरह से हुआ दूसरा जन्म ली थी वह सिर्फ शुभम के बदौलत थी।इसलिए वह शुभम को किसी भी तरह से नाराज नहीं करना चाहती थी और वैसे भी इसमें नाराजगी की कोई बात नहीं थी बरसों से प्यासी है निर्मला इस तरह की हरकतों को महसूस करने के लिए तरस गई थी अशोक के साथ रहकर उस पर आधार रखकर वह जिंदगी के असली सुख को भूल गई थी घर गृहस्ती मे वह इस कदर डूब गई थी कि औरतों की जिंदगी में उनकी एक अलग दुनिया भी होती है इस बात का एहसास उसे बिल्कुल भी नहीं था और इस बात का एहसास उसे उसके बेटे ने कराया था इसलिए वह अपनी पूरी जिंदगी अपने बेटे पर निछावर कर देना चाहती थी बदले में उससे वही प्यार चाहती थी जो एक प्यार एक प्रेमी और एक पति दे सकता था और शुभम दोनों का फर्ज बखूबी निभा रहा था। और कुल मिलाकर निर्मला अब अपनी जिंदगी से बहुत खुश थी।

शाम ढल चुकी थी अंधेरा होने लगा था। छत पर निर्मला सूखे हुए कपड़ों को इकट्ठा कर रहे थे और बाजू वाली छत पर सरला चाची भी आज सूखे हुए कपड़ों को रस्सी पर से उतार कर उन्हें इकट्ठा कर रही थी। निर्मला की नजर सरला चाची पर पढ़ते ही वह अंदर ही अंदर सिहर उठी क्योंकि अब जब भी निर्मला की नजर सरला चाची पर पड़ती थी तो उसे इस बात का डर रहता था कि... कहीं वह उसके और शुभम के बारे में पूछताछ करना शुरू कर दें इसलिए इस समय भी छत पर सरला चाची को देखकर वह घबरा गई थी और उसकी घबराहट तब और ज्यादा बढ़ गई जब वह उसे पुकारते हुए उसकी तरफ ही बढ़ते चले आ रही थी.... उसे इस बात का डर लग रहा था कि कहीं वह कुछ पूछना ले....

रुको निर्मला ..(निर्मला सरला से बिना कुछ बोले जाने वाली थी कि उसकी बात सुनते ही रुक गई।)

शुभम कहां है कहीं नजर नहीं आ रहा।

इतना सुनते ही निर्मला के पैर वहीं के वहीं जम गए उसे लगने लगा कि लगता है या वह फिर से पूछताछ करेगी।

क्यों क्या हुआ क्या बात है। (निर्मला सरला की तरफ देखते हुए बोली।)

अरे हुआ कुछ नहीं है (एकदम खुश होते हुए निर्मला की तरफ कदम बढ़ाते हुए) आज घर पर कद्दू की सब्जी बनने वाली है इसलिए मैं कह रही थी कि शुभम को बोल देना कि आज वह मेरे घर पर खाना खा ले...

कद्दू की सब्जी ... लेकिन......(निर्मला आश्चर्य के साथ बोली।)

लेकिन वेकिन कुछ नहीं बस उसे इतना कह देना कि आज का खाना मेरे घर पर है और वह समय पर चले आए।

लेकिन सरला कद्दू की सब्जी....( निर्मला फिर से आश्चर्य जताते हुए बोली)

हां हां मैं जानती हूं शुभम को कद्दू की सब्जी बहुत पसंद है।

यह आपको किसने कहा।

शुभम खुद मुझे बताया कि उसे कद्दू की सब्जी बहुत पसंद है उस दिन बाजार से लौटते समय वह बाद बाद में मुझे बताया था कि उसे कद्दू की सब्जी बहुत अच्छी लगती है इसलिए मैं कही थी कि जिस दिन बनाऊंगी तुझे अपने घर बुलाऊंगी।... उसे भेज जरूर देना मुझे बहुत काम है मैं जा रही हूं।
( इतना कहकर सरला वापिस चली गई और निर्मला उसे जाते हुए देखती रही उसे समझ में नहीं आ रहा था कि शुभम ने उसे ऐसा क्यों कहा कि कद्दू की सब्जी उसे बहुत पसंद है जबकि कद्दू की सब्जी वह बिल्कुल भी पसंद नहीं करता था....। अब वह शुभम से इस बारे में बात करना चाहती थी। वो जानती थी कि कुछ ही देर में शुभम घर पर आने वाला था इसलिए वह नीचे चली गई।
 
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