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Incest ये प्यास है कि बुझती ही नही

दीदी की बात सुनकर अर्जुन ने झुक कर उनके होंठ चूमे और कपड़े पहन लिए. दीदी ने भी जैसे तैसे कपड़े पहने और अर्जुन को जाता देख वापिस वही लेट गई.

……………………………………..

अभी शरीर बिल्कुल हल्का महसूस हो रहा था और अर्जुन को उम्मीद थी की आज फिर पार्क मे प्रीति आएगी और वो उसके साथ बात करेगा. कुछ देर बाद वो पार्क के अंदर था. आज भी बुजुर्ग मंडली वही थी जिन्होने मुस्कुरा कर अर्जुन का अभिवादन किया और उसने भी भागते हुए ही प्रतिउत्तर मे गर्दन हिला दी. पता ही

नही चला कब वो 5 चक्कर पूरे कर चुका था. थकान ज़रा भी नही थी लेकिन आचार्य जी को अकेले टहलते देख उनकी तरफ हल्के कदमो से बढ़ गया.

"नमस्कार सर."

"कैसे हो बेटा. सब कुशल मंगल?" उन्होने ये बात कही तो अर्जुन ने सिर्फ़ हा मे सर हिलाया.

"ये वृक्षो को देख रहे हो. कितने दयालु होते है ये. हम इंसानो को ज़िंदगी भर फल, छाया, जीवदायिनी हवा और फिर मरने के उपरांत लकड़ी देते है.

हम सिर्फ़ इनको एक बार पानी देकर अपना कर्तव्य पूरा समझ बस इनसे ही आशा करते रहते है."

"आचार्य जी वृक्ष हमें प्यार देते है और हमारी वासना उनके प्रति जीवन भर रहती है." अर्जुन ने उनके पिछले पाठ को आज उनकी बात से जोड़ दिया था.

"सही बात कही बेटा." उन्होने नंगे पाव ही घास पर चलते हुए अर्जुन के कंधे पर हाथ रख लिया और एक फुलो से लदी डाल दिखाने लगे.

"ये खूबसूरत फूल देख रहे हो बेटा. यहा देखो तितलियाँ और मधुमाखिया मंडराती है लेकिन किसी नीम या बबुल के पेड़ पर तुमने कभी उन्हे देखा है?"

"नही सर. उनको फुलो से पराग लेना होता है जो उनका भोजन और जीवन का आधार रहता है." अर्जुन की ये ख़ास बात थी की हर विषय को महत्व से समझा था उसने. सिर्फ़ रट् मार कर प्रथम आने वाला लड़का नही था.

"बहुत खूब बात कही. अब इस बात को इंसान की जिंदगी से जोड़कर देखो. और बताओ क्या समझे."

अर्जुन ने काफ़ी देर इस बात पर विचार किया. उसको बात समझ आ रही थी लेकिन सही शब्द नही मिल पा रहे थे.

"ज़्यादा मत सोचो बेटा. जिसको ज़रूरत होती है वो उसके पास ही जाता है जो उसको पूरा कर सकता है. लेकिन फरक है एक पहले वाली बात और इस बात मे. एक मधुमखी पराग लेने के बावजूद फूल को नुकसान नही देती. वो बदले मे उसके नन्हे बीज ज़मीन पर बिखेर उन पेड़ो का विस्तार करती है. आज का पाठ यही

है. निस्वार्थ प्रेम करो इन वृक्षो की तरह. और अगर तुम्हे लगता है की इस प्रेम मे तुम्हे सामने वाली से लेना पड़े तो इतना ज़रूर करना की उनके चरित्र का अच्छा विस्तार हो, आत्मा को सुकून मिले और तुम उनकी अपेक्षा पर खरे उतरो. स्वार्थ प्यार को ही नहीं उस व्यक्ति को भी ख़तम कर देता है. जब एक घड़ा पानी चाहिए होता है तो सिर्फ़ उतना ही लेना चाहिए. अन्यथा तुमने तो सुना होगा की ज़्यादा के चक्कर मे नदी की दीवार देह जाती है तो खेत और नदी का वो भाग दोनो बर्बाद हो जाते है." कहते हुए वो वहाँ से आगे बढ़ चले और अर्जुन उनके साथ चलता रहा.

"कोई प्रश्न चल रहा है दिमाग़ मे बेटा?" उन्होने उसको चुप देखा तो पूछ लिया

"सर, एक सवाल परेशान कर रहा है कुछ दिनों से."

"बेटा मैं तो अंतर्यामी हूँ नही. और जीतने समस्या बताई ना जाए तो उसका हाल नही होगा." मुस्कुरा दिए

"अगर ज़िंदगी मे पहले कुछ भी घटा हो लेकिन फिर समय बीत जाए और तब तक सब ठीक हो तो क्या उन पुरानी बातो पर विचार कर के कुछ हाँसिल होगा?"

"तुम क्या चाहते हो?" उन्होने पलट कर सवाल कर दिया.

"मैं सिर्फ़ सच और उस सब बात के पीछे का कारण जान ना चाहता हूँ."

"सच क्या होता है बेटा? सच और झूठ जैसा कुछ नही होता अमूमन. एक इंसान किसी बात को अलग तरीके से कहता है. लेकिन दूसरे ने अगर वो वैसा नही पढ़ा हो तो वो उसको झूठ कहेगा. दोनो मे से कोंन सॅचा कोंन झूठ उसको फिर लोगो का मत (वोट) साबित करता है. लेकिन क्या यही सब सच है? जिसने तुम्हारे अतीत मे जो भी किया हो उसके पीछे कुछ मकसद रहा होगा. ज़रूरी नही के हर व्यक्ति जो तुम्हे दुख दे वो तुम्हारा दुश्मन हो और जो तुम्हारे साथ हर वक्त मीठी बातें करे वो दोस्त. ऐसी बातें मन को विचलित करती है, इसको काबू करना सीखो. अतीत से सिर्फ़ मीठी यादें ही लेना सही है और या फिर ग़लतियो से सीखना."

अर्जुन अब निरुत्तर था. वो भी तो अब जो सब कुछ हुआ उसको बदल नही सकता था. और जो भी ज़िंदगी मे उसके पिता ने किया था उसके साथ वो भी तो किसी बात को ध्यान मे रख कर किया होगा. संजीव भैया ने भी कहा था कि जब मैं पैदा हुआ तो उनको मुझमे उम्मीद नज़र आई थी. आज यही सब है जो मैं इतने अच्छे से पढ़ पा रहा हूँ और ये शरीर जो पैदा होने पर रोगी था वो आज स्वस्थ है.
 
अर्जुन अब निरुत्तर था. वो भी तो अब जो सब कुछ हुआ उसको बदल नही सकता था. और जो भी ज़िंदगी मे उसके पिता ने किया था उसके साथ वो भी तो किसी बात को ध्यान मे रख कर किया होगा. संजीव भैया ने भी कहा था कि जब मैं पैदा हुआ तो उनको मुझमे उम्मीद नज़र आई थी. आज यही सब है जो मैं इतने अच्छे से पढ़ पा रहा हूँ और ये शरीर जो पैदा होने पर रोगी था वो आज स्वस्थ है.

"बेटा आओ थोड़ा साथ मे टहल ले. फिर तो हम अब एक हफ्ते बाद मिलेंगे." इतना कह कर वो उसको अपने साथ लिए पार्क मे चक्कर काटने लगे. धीमे कदमो से अर्जुन को अब कोई सवाल किसी से नही पूछना था. क्योंकि उसको पता चल गया था की किसी बीमारी को ठीक करने के लिए जो इंजेक्षन दिया जाता है वो दुख़्ता है लेकिन फिर मरीज ठीक भी उस से ही होता है. उसके सभी अवगुनन उसके पिता जी ने सख्ती से ही सही लेकिन ख़तम कर ही दिए थे. और अब उसको अपने आप को साबित करना था.

"आप कहाँ जा रहे है सर?" उसको जानकार अच्छा नही लगा था

"बेटा एक योगा और हृषि महोत्सव है हरिद्वार मे. बस वही. तुम सबसे ज़्यादा तब सीखते हो जब तुम उन्हीं लोगो की संगत मे रहो जिसमे वो सब या तो महारत रखते हो या फिर उनका दिल उसमे लगा हो. मेरे भी कुछ गुरु/दोस्त वहाँ मिलेंगे तो कुछ शायद सीख सकूँ ."

ऐसे ही चलते हुए वो अर्जुन को आसपास ज़िंदगी दिखा रहे थे. कही कोई बातें कर रहा था, कही बुजुर्ग बॅडमिंटन खेलते हुए भी मुस्कुरा रहे थे.

5 से उपर का समय हो चुका था और अच्छी ख़ासी रोशनी हो चुकी थी. उनके साथ अर्जुन समय भूल ही चुका था. घर से निकला था तो शरीर हल्का था

लेकिन अब तो उसका दिल और मन दोनो शांत थे.

"आपका इंतजार करूँगा." पहली बार अर्जुन ने उनके पाव स्पर्श किए तब तक आचार्य जी मित्र भी उधर गेट के पास आ चुके थे. आचार्य जी ने उसको गले से लगाकर सिर्फ़ इतना कहा, "प्रेम से जिंदगी जी ली जाए तो बेहतर है बेटा, सबके साथ. अकेला तो देखो सूरज भी गरम ही रहता है." उनके मज़ाक के भाव मे भी गहरी बात थी. "अपना ख़याल रखना और हमेशा ऐसे ही निश्चल्ल रहना." वो दोनो ही साथ मे बाहर चल दिए.

"बेटा आज भी दौड़ने गये थे?", रामेश्वर जी ने अर्जुन को घर मे आते देखा. 5:30 हुए थे अभी और वो चाय पी रहे थे.

"आज जल्दी चला गया था दादाजी. फिर एक दोस्त जैसे गुरुजी है और आज उनके साथ समय का पता ही नहीं चला."

"अच्छा तो अब तेरे दोस्त भी है? और गुरुजी?"

अपने दादाजी को तात्पर्य समझ उसने अच्छे से बताना ही सही समझा, "वो कोई साधु महाराज नही है दादा जी. वो योग और प्राणायाम वाले गुरु है. और 70 साल के भी होकर मुश्किल से पापा जीतने लगते है, बस सारे बाल आपकी तरह सफेद है. रोज एक पाठ सीखते है मेरी दौड़ पूरी होने के बाद और अगले दिन सबक पूछते है नया पाठ सीखने से पहले." अपने पोते का आचरण और लोगो का चुनाव भी पंडित जी को गदगद कर गया.

"आज का क्या पाठ सिखाया तेरे गुरुजी ने?"

"प्रेम और स्वार्थ. इसके साथ ही ये भी कहा की इंसान के प्रतिदिन के जीवन मे सत्या और असत्य जैसा कुछ नही होता. एक बात जिस व्यक्ति ने महसूस की हो वही बात दूसरे ने नही की हो तो वो सिर्फ़ उन दोनो के लिए एक भाव भर है. और उन्होने ये भी सिखाया की दुख देने वाला व्यक्ति आपका दुश्मन हो ऐसा ज़रूरी नही. शायद जब आपको वो बात दुख देती होगी तब आप कमजोर होंगे और उस से उबरने के बाद पता चले की ये सब उस सख़्त निर्णया का ही परिणाम है जो आज हम शक्तिशाली है." यहा अर्जुन ने द्वियार्थी बात करी थी. दादाजी को ये भी बता दिया की जो भी परिवार नि उसके साथ किया था

उसको अब उस बात का कोई गीला-शिकवा नही है.

"असाधारण बात कही है बेटे उन्होने. इतनी बड़ी शिक्षा देने वाला व्यक्ति कोआई आम गुरु तो नही हो सकता. क्या नाम बताया तुमने उसका?" रामेश्वर जी थोड़ा हतप्रभ हो गये थे उसकी बातों से.

"जी कोई आचार्य प्रमोद शास्त्री है. मेरे से भी लंबे और तगड़े है वो." रामेश्वर जी की भी आँखें चमक उठी नाम सुनकर

"खुशनसीब हो बेटा जो तुम उन जैसी शक्षियात के सान्निध्य मे हो. पूरे विश्वा मे जिनका नाम प्रचलती है वो तुम्हारे साथ समय बिता रहे है."

उन्होने अपने पोते का माथा चूमा. उनका मन भी प्रसन्न था. "चल उठ और दूध पी ले. फिर तेरा पता नही कहा निकल जाएगा." लाड से उन्होने कहा

और अर्जुन अंदर आ गया जहाँ मा रसोई मे सबके लिए चाय बना रही थी और ऋतु/अलका के लिए कॉफी.
 
तुम साथ हो

"काम-क्रोध-कुकर्म ये ऐसे त्रिकाल है की मनुष्य इनके बस मे हो जाए तो उसको रक्षश बन-ने से फिर भगवान भी नही बचा सकते. जनम से हर व्यक्ति किसी सफेद पन्ने की तरह कोरा होता है. वो वही धारण करता है जो उसपे लिखा जाए. जैसे महॉल हो मे वो बड़ा होता है, जैसी शिक्षा वो ग्रहण करता है और जैसे निर्णय वो अपने आसपास के लोगो को लेते हुए देखता है. फिर हम कैसे कह सकते है के सिर्फ़ उस शख्स की ही ग़लती है? असुर भी गयानी होते है और देव भी काम-पीपसा के भोगी. सुख मे रहता साधु और दरिद्रता मे जीता शख्स एक समान ही तो है."

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"ले बेटा तू दूध पी तबतक मैं तेरी बहनो को उठा डू. आज तो मधुरी भी अभी तक सोई हुई है. पता नही इतना कितना थक गई ये सब कल के संगीत मे. अपने घर जाएँगी तब भुगतेंगी." रेखा अपने बेटे के सर पर हाथ फिरते हुए बोल रही थी.

अपनी मा के इस दुलार भरे स्पर्श और उनके शरीर से आती एक मदमस्त सी खुसबु मे अर्जुन बस आँखें मुंडे बैठा रहा. कोमल दीदी जब उसके पास बैठी तब पता चला के मा तो कब की चली गई है वहाँ से. दूध की तरफ ध्यान लगाया और फिर मुस्कुराकर अपनी बड़ी बेहन को देखा. "सारी मे बहुत अच्छी लग रही थी दीदी आप."

"रहने दे तू तो. मेरे से ज़्यादा अच्छी माधुरी दीदी लग रही थी और कल तो तू भी कुछ अलग चमक रहा था." कोमल दीदी को दिल मे खुशी हुई के उसके भाई ने उसको ध्यान से देखा तो सही.

"अर्रे दीदी ऐसा नही है. माधुरी दीदी भी ठीक लग रही थी, लेकिन आपके शरीर पर तो सारी इतना ज़्यादा खिल रही थी के जैसे वो बनी ही सिर्फ़

आपके लिए हो. मैने तो एक सदा कुर्ता पाजामा ही तो पहना था." अर्जुन की बातों ने तो कोमल दीदी का आज दिन ही खिला दिया था.

"अच्छा बचु. मेरे पर सारी ठीक ठाक ही लग रही थी?" माधुरी दीदी जो कब से अर्जुन के पीछे खड़ी थी आख़िर मे बोली.

"वो.. वो दीदी मेरा कहने का मतलब था कि .. आप दोनो खूब अच्छी लग रही थी." इतना बोलकर वो भाग लिया वॉया से. और इधर ऋतु/अलका दीदी भी आ

गई थी.

"आ." माधुरी दीदी जैसे ही बैठी उनके मूह से निकली ये हल्की सीत्कार तीनो बहनो ने सुनी. अलका और ऋतु तो सिर्फ़ होल से हंस दी लेकिन कोमल ने पूछ ही लिया. "क्या हुआ दीदी? आपको अभी भी दर्द है क्या?"

"अर्रे कुछ नही वो छत पर सोने से शायद पैर की नास्स चढ़ गई थोड़ी. लेकिन ठीक हूँ मैं इतना भी कुछ नही हुआ है." जवाब देते हुए हे उन्होने

मॅन मे ही कहा, " एक बार तू लेके देख तो ज़रा उस घोड़े का अपने अंदर. मैं तो चल कर नीचे आ गई तू तो घिसट कर ही आती. हाए कितनी बुरी

तरह फाड़ कर रख दी है मेरी."

"दीदी कहा खोई हुई हो. चाय ठंडी हो जाएगी." अलका की आवाज़ से माधुरी दीदी ने चुदाई याद करके बस कप उठाया और उनके मूह पर लाली छा गई.
 
"दीदी कहा खोई हुई हो. चाय ठंडी हो जाएगी." अलका की आवाज़ से माधुरी दीदी ने चुदाई याद करके बस कप उठाया और उनके मूह पर लाली छा गई.

"आज तो फंक्षन शाम को जल्दी ही शुरू हो जाएगा. मा, दादी और ताईजी तो शायद अभी नाश्ता बना कर ही कामिनी आंटी के घर चले जाएँगे."

ऋतु को शादी के फंक्षन का बड़ा चाव था. उन दिनों यही तो एक समय होता था घर की लड़कियो का जब वो खुल कर शृंगार करती थी, अपने दिल के वो अरमान जीती थी जो अधिकतर दिनों मे घर की चार दीवारी मे क़ैद रहते थे. खाना पीना, भाभियों से मस्ती, उनके द्वियार्थी चुटकुले और आप बीती

को मज़े लेकर सुन-ना और फिर अपने मन मे उनके सपने देखना जब उनकी भी शादी होगी और वो किसी राजकुमारी की तरह दुल्हन बनेंगी. शादी-ब्याह मे इतनी रस्मे-रिवाज थे की 3-4 दिन तक बस वही होते थे. परिवार मे दूर दराज के सभी संबंधी एकसाथ होते थे.

"हा तो आज ज़्यादा कुछ तो करना नही है. वॅक्सिंग और फेशियल तो कल ही सबका हो चुका है. जो भी थोड़ा बहुत है वो आज कर लेंगे."कोमल ने बातजारी रखी.

"मेरी भव की भी थोड़ी शेप ठीक कर देना यार कोमल. और यहा की वॅक्सिंग भी." माधुरी दीदी ने शरम से अपनी कांख की तरफ इशारा किया तो बाकी सब हंस पड़ी. "हा हा क्यो नही. अगला नंबर आपका ही तो है अब. मैने सुना था कल एक आंटी को दादी से बात करते हुए और शायद दादी ने बाबा से बात भी करी होगी."

माधुरी दीदी तो ये बात सुनकर ही वहाँ से खड़ी हो गई. उनको बड़ी मुश्किल से तो एक प्यार करने वाला मिला था. "मैं मना कर दूँगी दादा जी को. अभी मैने कोई शादी नही करनी." ये कहकर वो बाथरूम मे चली गई लेकिन ये तीनो हँसती रही. ऐसे ही कुछ देर मे सब अपने कामो से फारिग हो कर नाश्ते मे लग गये.

………………………..

"बेटा वो तुम्हारी ड्रेस लाने के लिए मैं अर्जुन को कह देता हूँ. रामेश्वर जी के घर ही जा रहा हूँ तो वही बोल दूँगा. कुछ और भी चाहिए तुम्हे?"

कॉल साहब खाने की टेबल से हाथ सॉफ करते उठे. उनके सामने हे कमीज़ पाजामे मे बैठी प्रीति अपने हाथ मे पकड़ी ब्रेड पर माखन लगा रही थी.

"नही दादू. मैं भी वही जा रही हूँ तो खुद ही उसको बोल दूँगी. कुछ फिटिंग की प्राब्लम हुई तो बेचारे का एक और चक्कर लग जाएगा." और हँसती हुई खड़ी हो कर अपने दादाजी को एक गिलास जूस का थमा कर वापिस बैठ गई.

"इतना ख़याल मत रखा कर अपने इस बूढ़े दादा का बिटिया. तू जब अपने घर चली जाएगी तो फिर मैं खुद को संभाल नही पाउन्गा."

उनकी बात सुनकर प्रीति वापिस आ उनके बाह से लिपट ते हुए बोली, "तो ऐसा करना के लड़का घर ही रख लेना." और हँसने लगी.

उसको देख कॉल साहब भी हंस दिए. "तू कभी बड़ी नही होगी. है ना? और मैं तो बस यही सोचता रहता हूँ के कब तू मेरा पीछा छोड़े." गिलास टेबल पर रख उन्होने प्यार से अपनी इस बिटिया को गले लगाया और बाहर निकल दिए.

कुछ सोचते हुए प्रीति ने ब्रेड का पीस ख़तम कर अपना जूस का गिलास खाली किया और मुस्कुराती सी अपने कमरे मे भागगई.

……………………….
 
रविवार था तो संजीव भैया भी घर थे. अर्जुन उनके साथ ही बैठा हुआ टेलीविजन पर वीडियो गेम खेल रहा था. केसेट लगा कर कॉंट्रा खेलता हुआ वो थोड़ा शोर मचा रहा था. ये वीडियो गेम भैया ही लेकर आए थे जब अर्जुन इस बार घर वापिस आया था और कभी कभी दोनो भाई बैठ कर एक साथ खेल लेते थे जब उनको ऐसा टाइम मिलता था.

"भैया इस 3र्ड स्टेज पर एक भी चान्स आउट नही होने देना मेरा. नही तो मैं बाहर हो जाउन्गा." वो पूरी तरह से उसमे खोया हुआ था और भैया भी किसी माहिर खिलाड़ी के जैसे अपना खिलाड़ी उस से आगे चला रहे थे.

इतने मे ही उपर ऋतु दीदी आई और सीधा टेलीविजन बंद.

"दीदी." अर्जुन तो चीख ही पड़ा लेकिन भैया ने हंसते हुए रिमोट टेलीविजन के नीचे पड़ी गेम पर रख दिया.

"यहा तू गोलियाँ चला रहा है नीचे दादा जी ने आवाज़ दे दे के घर सर पर उठाया हुआ है. भैया आपको भी एक बार हम को लेकर मार्केट चलना है. प्लीज़ जल्दी आ जाओ नीचे आप."

संजीव भैया हा कहते हुए अपने कमरे मे चले गये कार की चाबी लेने और अर्जुन भी उदास सा दादा जी के पास.

"लाला जी आप कोंनसि दुकान चला रहे हो की आवाज़ भी नही सुनती अब?" रामेश्वर जी की डाँट मे भी मज़ाक ही होता था. जो उन्होने अर्जुन के आते ही कहा.

अर्जुन ने कॉल साहब के पाव छुए और फिर दादा जी के सामने पड़ी खाली कुर्सी पर बैठ गया. "अभी तो दादा जी थोड़ा फ्री हुआ था कि आपकी आवाज़ आ गई."

"बेटा पूरी साहब कुछ बात पूछना चाहते थे और तेरा इंतजार कर रहे थे."

अर्जुन ने दादा जी की बात सुनकर अपना चेहरा प्रशनवचक निगाहो से कॉल साहब की तरफ किया.

"अर्रे बेटा ऐसी भी कोई बड़ी बात नही थी. वो मैं बस पूछ रहा था कि आज भी तुम मार्केट जा सकते हो अगर थोड़ा टाइम है तुम्हारे पास." कॉल साहब के दिल मे आज तक कुछ झिझक थी अर्जुन को लेकर. उन्हे हमेशा ऐसा लगता था कि ये बारूद फिर ना फट जाए. उपर से वो हमेशा शांत दिखते थे लेकिन.

"अंकल, आप भी तो मेरे दादाजी हे हो. तो फिर पूछा मत कीजिए बस बताया कीजिए क्या करना है. अच्छा अब बोलिए भी."

कॉल साहब ने एक बार रामेश्वर जी की तरफ थोड़ी शंका से देखा. "वो बेटा प्रीति का ड्रेस मार्केट मे है. और मैने सोचा तुम अगर उधर जाओ तो ले आओगे आते हुए."

"हा तो मैं लेके आ सकता हूँ क्योंकि दुकान वाला तो मुझे पहचानता है. लेकिन अभी तो 10:30 बजे है अंकल और ड्रेस 1 बजे तक तयार होगी. मैं ले आउन्गा आप परेशान मत होना. हा अगर और भी कुछ लाना है तो बता दीजिए." अर्जुन ने उनकी तरफ देखते हुए पूछा.

"हा वो प्रीति बेटी अभी यही आती होगी तो तुम पूछ लेना." उन्होने इतना ही कहा था कि एक सफेद सलवार कमीज़ पहने किसी सफेद गुलाब सी प्रीति सीधा आ कर रामेश्वर जी की बगल मे बैठ गई.

"दादा जी ये पीछे वाली शोकेस मे रखी लकड़ी की गुड़िया मेरी है ना.?"

जिस दीवान पर रामेश्वर जी बैठ थे उसके पीछे एक शीशे की 2 तरफ सरकने वाली शोकेस थी. उसमे कुछ फोटोफ्रम थे जिनमे घर के सदस्यो को पुरानी फोटोस लगी थी और कुछ चुनी हुई चीज़ें जैसे एक एइफ्फ़िल टवर का तांबे से बना नमूना, कुछ काँच के रंग-बिरंगे जानवर और 3 खिलोने रखे थे. जिनमे से एक चटख गुलाबी पैंट की हुई लकड़ी की गुड़िया थी.

"तुझे याद है ये मेरी बच्ची?" रामेश्वर जी ने प्रीति के सर पर हाथ फेरते पूछा.

वो किसी बिल्ली के जैसे अपनी चप्पल ज़मीन पर उतार कर शोकेस से गुड़िया उठा वापिस आ कर बैठ गई वही.

अर्जुन ध्यान से देख रहा था सबकुछ. कॉल साहब तो प्रीति का बचपना देख हँसने लगे थे.

"पंडित जी ये लड़की जब आँखों से दूर थी तो बता नही सकता के कैसे जी रहा था. अब भी देखो वैसे ही है."

"वैसे कहा रही ये पूरी साहब, मेरी बच्ची तो अब ज़्यादा अच्छी हो गई है." रामेश्वर जी ने स्नेह से ये बात कही.

"इसमे से बचे निकलेंगे. खोलो इसको बीच से पकड़ कर." जैसे ही अर्जुन ने ये बात कही तो तीनो ही हैरानी से उसकी ही तरफ देखने लगे.

फिर प्रीति ने उस गुड़िया को पेट की तरफ से गोल घुमाया तो वो खुल गई और उसके अंदर एक छोटी गुड़िया थी."

इसको भी खोलो तो एक और निकलेगी" और अर्जुन की बात सुनकर प्रीति ने दूसरी गुड़िया के साथ भी वही किया तो एक और निकली अंदर से..

प्रीति ने जैसे उसको उठाया तो अर्जुन बोल पड़ा, "बस कर इसमे और कुछ नही है अब. खाली होगी अंदर से. आख़िरी वाली तो मेरे बैग मे होगी." और हँसने लगा.

रामेश्वर जी और कॉल साहब को तो साँप सूंघ गया था ये बात सुनकर. वो गुड़िया कोई 10-11 साल पुरानी थी. इधर प्रीति को झटका तो लगा था लेकिन उसने जाहिर किए बिना ही कहा, "तुम्हे इसके बारे मे पता था?"

"ये मेरी ही तो थी. फिर मैने तुम्हे तुम्हारे 7त बर्तडे पर दी थी लेकिन तुमने वापिस यहा रख दी थी. दादाजी लेकर आए थे इसको कश्मीर से, शायद."

अर्जुन ने वैसे बैठे हुए ही जवाब दिया.

"ओह. मैने इसको पहले भी हाथ मे लिया था कई बार लेकिन ये नही पता था कि ये खुलती है. बस देख कर वापिस यही रख देती थी."

"बेटा, तुम्हे ये सब कैसे याद है?" ये बात कही थी कॉल साहब ने.

"अंकल ये क्या बात हुई? याद तो ये भी है के आप मुझको अपने हाथो से आइस-क्रीम खिलाते थे, मेरे गले मे टवल पहना कर. प्रीति खुद से खा लेती थी लेकिन मैं कपड़े खराब कर लेता था. दादाजी आपको मना भी करते थे लेकिन आप कहते थे मेरा शेर बच्चा है ये इसको किसी बात की मनाही नही है."

अर्जुन थोड़ा मुस्कुरा कर बोला और उठकर कॉल साहब के साथ जा बैठा.

"छोटे दादू, अतीत की यादें पतझड़ सी ज़रूर होती है लेकिन हमें फिर भी कुछ महकते फूल हमेशा याद रहते है." और पहली बार उसने अपनी बाहे उस सख़्त इंसान के दोनो तरफ लपेट ली. ये इंसान जो हमेशा किसी मजबूत वृक्ष सा तना रहता था वो भी इस लड़के से लिपट सा गया था. "मेरे बच्चे मैने कोशिश की थी." इतना बोलकर कॉल साहब की आँखें बस नम हो चली.
 
"छोटे दादू, अतीत की यादें पतझड़ सी ज़रूर होती है लेकिन हमें फिर भी कुछ महकते फूल हमेशा याद रहते है." और पहली बार उसने अपनी बाहे उस सख़्त इंसान के दोनो तरफ लपेट ली. ये इंसान जो हमेशा किसी मजबूत वृक्ष सा तना रहता था वो भी इस लड़के से लिपट सा गया था. "मेरे बच्चे मैने कोशिश की थी." इतना बोलकर कॉल साहब की आँखें बस नम हो चली.

"मैं ना कहता था सतीश, की प्यार कही नही जाता. देख ले सब यही सोच रहे थे की ये एक नया अर्जुन है लेकिन सब ग़लत हे थे. ये आज भी तुझसे उतना हे प्यार करता है." रामेश्वर जी ने भी काफ़ी समय के बाद अपने इस अज़ीज दोस्त का नाम लिया था. उनको भी अर्जुन के इस व्यवहार और बातों ने अंदर से हिला ज़रूर दिया था लेकिन एक ख़ुसी थी की उनके बच्चे मे अपने अंधेरे अतीत से सिर्फ़ फूल हे चुगे थे, दर्द नही.

"अच्छा अब छोड़ मेरे दोस्त को और तयार हो कर आ." उन्होने अर्जुन से कहा जो अभी भी कॉल साहब से चिपका था और इधर प्रीति की तरफ किसी का ध्यान नही गया जो रोते हुए भी मुस्कुरा रही थी.

"देख ले मानो ये मुझे तेरे से ज़्यादा प्यार करते है, आज भी." अर्जुन ने अलग होते हे प्रीति की तरफ देख कहा और उठकर किसी बचे सा भाग गया. पीछे छोड़ गया तीन मुस्कुराते हैरान चेहरे.

"वैसे दादू आपसे तो बिल्कुल ये उम्मीद ना थी." प्रीति आँखें सॉफ कर खिलखिला उठी.

"अर्रे तेरा दादा कितना भी सख़्त क्यो ना हो इसने शहर के सभी डॉक्टर की जान निकाल दी थी जब अर्जुन पैदा होने के बाद बीमार हुआ था. मैं तो 2 दिन बाद आ पाया था पोस्टिंग की वजह से लेकिन इसने दिन रात एक कर दिया था उसको बचाने मे. ये कहता था कि अर्जुन को आर्मी मे भेजेंगे और फिर अपनी बात से मुकर भी गया था. जो दिल करेगा वो अर्जुन बनेगा."

कॉल साहब शांति से बैठे बस हल्का मुस्कुरा रहे थे. कितनो साल बाद उनका अंतर्मन हल्का हुआ था. अर्जुन के पिता शंकर जी भी तो सबसे करीब उनके ही थे. प्रीति वापिस गुड़िया वही रख उठकर अंदर चल दी और ये दोनो भूली बिसरी बातों मे लग गये.

"भैया हम 5 लोग कैसे बैठेंगी इसमे.?" अलका ने संजीव भैया, जो कार की ड्राइविंग सीट पर बैठे थे उनसे कहा.

"दीदी आप लोग जाओ, मैने नही जाना. मैं कल हो आई थी मार्केट." प्रीति जो अभी अर्जुन की चारों बहनो के साथ खड़ी थी बोली.

"सोच ले. मैं तो तुझे गोद मे बिठा लूँगी." माधुरी दीदी ने कार के अंदर से आवाज़ दी.

"नही आप लोग जाइए." और वो वहाँ से घर के अंदर चल दी और ये सब कार मे बाहर.

…………………
 
अंदर सारा घर ध्यान से देखती हुई प्रीति कुछ ढूँढ रही थी. वहाँ तो कोई नही था फिर वो अंदर आँगन मे बनी सीढ़ियों से उपर आ गई दूसरी मंज़िल पर. ड्रॉयिंग रूम मे कोई नही था. बाथरूम का दरवाजा भी खुला था. फिर उसने अपना सर जैसे ही संजीव भैया के कमरे के अंदर किया उसके पीछे से अर्जुन की आवाज़ आई, "वहाँ कोई नही है? भैया बाहर चले गये है. कुछ काम था?"

प्रीति का दिल पहले तो ज़ोर से धड़का लेकिन अर्जुन का इतना ठंडा रवैया देख वो बस वापिस मूडी ही थी की अर्जुन ने उसका हाथ पकड़ कर अपनी तरफ खींच लिया.

"मैने कहा ना कोई नही है, सिर्फ़ हम दोनो है" और अपने सीने से चिपका लिया. बला सी खूबसूरत प्रीति के गाल सुर्ख गुलाबी हो गये थे इस अहसास से की आज वो उस शख्स की बाहो मे है जो बचपन मे उसकी खुशियाँ था. उसको वापिस हाँसिल करने के लिए कितना कुछ किया और करने वाली थी लेकिन सबको ग़लत साबित करता वो सबकुछ जानते हुए उसके हे दिल से खेलता रहा और परेशान करता रहा.

"बहुत बुरे हो तुम. तुम्हे सब पता था पहले से?" नाराज़गी दिखाते हुए उसने इतना कहा

तो अर्जुन ने उसको गले लगाए हुए ही कहा, "बिल्कुल भी याद ना था मुझे ये सब कल रात से पहले. बस तुम्हारी आँखें मुझे सोने नही दे रही थी. और तुमने भी तो मुझे कुछ ना बताया था."

"कल रात से पहले मतलब? लेकिन जो सिर्फ़ तुम जानते थे वो तो तुम्हे कोई और बता नही सकता. फिर?" प्रीति ने अर्जुन की आँखों मे देखते हुए सवाल किया.

"कभी कभी हमारे पास ही हर सवाल का जवाब होता है लेकिन हम दुनिया भर मे उसको ढूँढते फिरते है लेकिन खुद के दिल की तिजोरी नही खोलते. बस मैने कल रात सही जगह ढूँढा था और मुझे वहाँ सिर्फ़ तुम मिली और वो यादें जिनमे तुम थी, हमारा बचपन था. आचार्य जी ने जो समझाया था वो मैं उस समय महसूस ना कर पाया. दुनिया भर की आवाज़ मे ध्यान लगाता रहा लेकिन बस एक बार तुम्हे ध्यान किया तो मुझे मेरी परी मिल गई." अर्जुन के लरजते

होंठ जा भिड़े प्रीति के शांत कोमल लाबो से. और एक बार दोनो गले लग गये.

"अच्छा अब हटो यहा से. तुम रो रहे थे तो आज नही रोका अगली बार मेरे कही भी टच या किस किया तो देख लेना." नकली गुस्सा दिखाती वो भाग गई नीचे और अर्जुन उसके पीछे चल दिया.

………………….

"संजीव भैया से रात बातें करने के बाद जब अर्जुन कमरे मे आया था तो उसको उनकी कही बातें समझ तो आ रही थी लेकिन "सतीश" नाम और "प्रीति" का उसके बचपन से संबंध उसको उलझा रहा था. लाइट बंद करके बस वो शांत मन से प्रीति का ही ध्यान करता रहा था. और उसकी नीली/हरी आँखों मे खोया वापिस वहाँ पहुच गया था जहा सारा दिन वो एक नन्ही परी से जुड़ा रहता था. सतीश जी कभी वर्दी मे तो कभी घर के कपड़ो मे उसको उठाए दिखते

उस ध्यान से जब वो बाहर आया था तो सुबह होने ही वाली थी जब उठकर वो माधुरी दीदी के पास गया था. आगे उसके बाकी विचारो को सुबह आचार्य जी सत्य और असत्य के पाठ से दूर कर दिया था."

अलका और ऋतु ने तो मार्केट मे गदर मचाया हुआ था. संजीव भैया बस उनको देख रहे थे कुछ बोल नही रहे थे. चाहे वो एक गंभीर इंसान थे लेकिन अपनी बहनो और परिवार की ज़िम्मेदारी बखुबी निभाते थे. कोमल दीदी और माधुरी दीदी एक पास के स्टोर मे, जो महिलाओ के अंगवस्त्रो की और ब्यूटी प्रॉडक्ट्स की थी वहाँ खरीद- दारी कर रही थी. यहा सब काउंटर पर लड़किया ही थी. कोमल दीदी तो नई-पोलिश और बिंदी वग़ैरह ले रही थी लेकिन माधुरी दीदी शायद अपने लिए कुछ खास तलाश कर रही थी.

"जी मेम, बताइए आपको क्या चाहिए?" एक लड़की उनके पास चल कर आई.

"वो मुझे शादी मे एक ड्रेस पहननि है लेकिन उसके कंधे का स्ट्रॅप ज़्यादा बड़ा नही है तो.." उन्होने थोड़ी परेशानी से अपनी बात कहनी चाही..

" मेम मैं समझ गई. आप इस काउंटर पर आए मेरे साथ." वो अपनी स्वाभाव से मुस्कुराती माधुरी दीदी को एक कोने वाले काउंटर पे ले गई.

"आपका साइज़?" उसने पूछा तो दीदी ने बताया 38-फ, जिसपर एक बार फिर उस लड़की ने दीदी की तरफ देखा और बिना कुछ बोले 2-3 बॉक्स निकाले. "आपका ड्रेस का कलर क्या रहेगा?" एक बार फिर से उसने पूछा.

"जी, डार्क ब्लू सारी और लाइट ब्लू ब्लाउस. थोड़ा स्लिम शोल्डर वाला." उन्होने अब खुद को बेहतर महसूस किया क्योंकि वहाँ कुछ खास भीड़ नही थी.

"ये देखिए मेम. इसके साथ ये स्ट्रॅप है जो ट्रॅन्स्परेंट है और अलग से निकाल भी सकते है और अड्जस्ट भी कर सकते है. लेकिन साइज़ की वजह से इसमे आपको ज़्यादा चाय्स नही दे सकते."

उस लड़की की बात और अपने साइज़ का सुनकर वो शरम से गड़ी जा रही थी. वहाँ रखी उन दो आधे कप की रेशमी ब्रा को गोर से देखने के बाद उन्होने एक पर हाथ लगा कर पॅक करने को बोला.

इतनी देर मे कोमल दीदी भी उनके पास आ गई थी. "क्या लेने लगी दीदी? अच्छा ये. तो फिर मेरे लिए भी ले लीजिए एक?" उन्होने ब्रा देख कर ही कहा.

"हा तेरी ड्रेस का रंग गहरा लाल है ना?"

"जी दीदी." कोमल दीदी ने कहा

"देखिए एक मरून रंग के ब्लाउज के साथ का भी दिखा दीजिए." माधुरी दीदी ने ही उस लड़की से कहा.

" मेम सेम साइज़?" उसके पूछने पर कोमल दीदी बोली, "नही 36- डी मे."

बिल्कुल माधुरी दीदी के पीस जैसी ही एक ब्रा उनको भी पसंद आई तो उन्होने वो भी पॅक करवा ली. बिंदी, चूड़ियाँ और अलका/ऋतु का बताया समान भी लेकर दोनो वहाँ से निकल आई. अलका और ऋतु बाहर वाली मार्केट मे फुटपाथ पर लगे एक मेहंदी के स्टॉल से अपने दोनो हाथो मे मेहंदी के डिज़ाइन बनवा रही थी. उनका खरीदा समान कार मे रख दिया था भैया ने.

"तुम दोनो ने भी लगवानी है?" संजीव भैया ने कहा तो दोनो ने ही मना कर दिया लेकिन कोमल के ज़ोर देने पर माधुरी दीदी बैठ गई वही मेहंदी लगवाने.

……………..
 
"हा तो आज तुम मुझे क्या दिलवा रहे हो? वो चूड़ियों का एक सेट तो खराब हो गया मेरा कल." मार्केट मे अर्जुन के साथ चलती प्रीति ने कहा तो वो बस मुस्कुरा दिया.

"कंजूस हो पक्के." और दिखावटी मूह बनाती प्रीति बस साथ चलती रही. ऐसे ही वो गोल-चक्कर पर पहुच गया और अर्जुन प्रीति को ले कर शृंगार घर मे घुस गया, जहा वो कल आए थे पलक दीदी का लहनगा लेने.

"यहा अब क्या काम है.?" उसने अर्जुन से प्रश्न किया.

वहाँ बस कल वाला लड़का था.

"हा भैया क्या चाहिए? दुकान बढ़ा कर अभी वापिस जाना है हमारे घर मे शादी है?" उसने अंदर से उनकी तरफ आते कहा लेकिन फिर अर्जुन को देख बोला, "अर्रे भाई कल वहाँ कुछ सही नही रहा जो आज हमारे पास आ गये.?" उसका मतलब वही लड़कियों के कपड़ो से था.

"वो बात नही है भाई. मुझे पता था कि शायद आज भी दुकान बंद हो आपकी लेकिन सोचा पहले एक बार देख लू. कल यहा एक लड़कियों की बड़ी अच्छी जूती देखी थी सोचा अगर दुकान खुली हुई तो ले लेंगे. हा वो रही." उसने बात पूरी करके सामे ही शीशे की अलमारी से दिखती एक जूती की जोड़ी की तरफ इशारा किया. जिसका तला हल्का लाल और उपर से पूरी सुनेहरी थी. जिसपर छोटे छोटे सुनेहरी घुँगरू टगे थे पूरी ही सतह पर.

"बड़ी ही अच्छी कारीगरी वाली चीज़ है भाई ये. जो लड़किया लहंगे के नीचे चप्पल या सेंडल नही डालती उनके लिए ये बिल्कुल सही है. इनकी तो लंबाई भी काफ़ी है तो इन्हे तो लहंगे के साथ यही जँचेगी." उसने प्रीति की तरफ बस सर से ही इशारा किया था.

"नंबर कितना है जी मेडम आपके पाव का?" ये अर्जुन ने पूछा तो प्रीति ने धीमे से इतना ही कहा "7".

"भैया 2 मिनिट दीजिए मैं अंदर से इनके साइज़ का जोड़ा निकाल के लाया. कोई दुकान मे आए तो बोल दीजिएगा के बंद है." इतना कह वो भीतर दौड़ गया.

"ये तुमने कब सोचा लेने का?" प्रीति ने प्यार से देखते हुए कहा. उसकी एक बालों की लट दाहिनी आँखों के सामने आई हुई थी जो बार बार छु रही थी

"बस सोच लिया था कल ही लेकिन आज मन पक्का कर लिया था कि यही लेनी है." और प्यार से उस लट को कान के पीछे कर उसकी तरफ देखने लगा.

"दादा जी कहते थे ना की मेरे साथ खेलने गोरी मेम आई है, और देखो ये नीली-हरी आँखों वाली आज फिर यही है."

अर्जुन का प्यार देख कर प्रीति ने नज़रे चुराते हुए कहा,

"हा कहा मैं उस वक्त दूध जैसी होती थी और तुम काले." और धीमे धीमे हँसने लगी.

"मैं काला था." इतना बोलकर वो हाथ पकड़ने ही लगा था के वो युवक जोड़ी निकाल लाया.

"ये लीजिए." उसने आते ही वो डब्बा सामने किया.

"भाई इनका दाम?" अर्जुन ने उपर जेब मे रखे पैसे निकाल लिए

"भाई वैसे तो ये जोड़ी 800 की है लेकिन तुम 500 दे दो. इतना तो चलता है मेरे भैया और पापा तो है नही यहा."

अर्जुन ने धन्यवाद किया और पैसे देकर दोनो बाहर आ गये.
 
ऐसे ही घूमते हुए प्रीति को कुछ याद आया तो उसने अर्जुन से कहा, "तुम यही रूको मैं आती हूँ?" अर्जुन ने हैरानी से देखा लेकिन प्रीति सामने वाले स्टोर

मे जा घुसी. उस स्टोर के बोर्ड पर लिखा था "लॅडीस कॉसमेटिक्स आंड गारमेंट्स". बस देख कर मुस्कुराता वो वही खड़ा हो गया. तकरीबन 15 मिनिट बाद एक बैग लेकर प्रीति सड़क पार करके उसके पास आ गई.

"ज़्यादा इंतजार तो नही करवाया?"

रहस्यमई मुस्कान से सिर्फ़ ना मे अपनी गर्दन अर्जुन ने हिला दी.

अब ये दोनो लोग जहा पहुचे वहाँ कोमल दीदी खड़ी थी.

"आप जाओ मैने तो नही जाना मार्केट. उस टाइम तो यही बोला था तूने प्रीति की बच्ची."

अर्जुन भी प्रीति के साथ वही जड़ हो गया. पीछे से संजीव भैया की भी आवाज़ आई. "अच्छा तुम दोनो. रूको प्रीति मैं तुम्हारे लिए भी जूस लेके आया." उन्होने ज़्यादा कुछ कहे 2 गिलास जूस के कोमल दीदी के हाथो मे थमा दिए और वापिस चल दिए.

"आप दोनो यहा?" अर्जुन ने इतना कहा तो उनके तरफ आती हुई अलका दीदी ने कहा, "हम भी यही है जी. कोई इधर भी देख लो." उनके दोनो हाथो मे उपर तक मेहंदी लगी थी. कोमल दीदी के पास जा कर वो जूस के गिलास मे लगी पाइप से हे पीने लगी. जो कोमल के हाथ मे ही था.

"अच्छा तो प्रीति स्पेशल ड्राइवर के साथ आई है." ऋतु दीदी भी कुछ वैसे ही हालत मे थी लेकिन चहक रही थी. प्रीति का तो बुरा हाल था.

अर्जुन ये देख बोल पड़ा, "दीदी वो दादाजी ने यहा मुझे समान लाने भेजा था और प्रीति का ड्रेस भी यही दिया हुआ था सिलाई के लिए तो मैं इसको भी ले आया कॉल अंकल के कहने पर."

"भाई हम को तो कभी नही लाया?" अलका दीदी ने ये बात कही तो अर्जुन ने आँखों से जैसे उनको कहा हो के तुम तो मत ही कहो दीदी और अलका दीदी ने नज़र नीचे कर ली.

"अर्जुन ये चुन्नी ठीक कर." ऋतु दीदी ने कहा तो प्रीति ने ऋतु दीदी की चुन्नी जो हाथ पे आ रही थी को अच्छे से गले मे कर दिया.

"प्रीति को कहो तो अर्जुन बोलता है और अर्जुन को काम कहो तो प्रीति. अलका इसको घर ले जा कर ठीक करना पड़ेगा. हाथ से निकल रहा है." थोड़ा शरारत

से इतनी बात ही कही थी की प्रीति तो ज़मीन मे गाड़ी जाने लगी.

"तुम सब ने अपने चाव पूरे कर लिए ना. तो इस बेचारी को भी करने दो. तू इनकी बातों की परवाह मत कर प्रीति और इस ड्राइवर को अच्छे से इस्तेमाल कर."

माधुरी दीदी संजीव भैया के साथ ही चलती उस तरफ आ गई.

"आप सबने महंदी कहा से लगवाई दीदी?" प्रीति ने बात को घूमते हुए पूछा तो ऋतु दीदी ने फिर खिंचाई कर दी. "अर्जुन ने बताया नि के हॉस्टिल मे इसने

महंदी भी लगाना सीख लिया है.?"

"बस करो और चलो अब. तुम ये लो गुड़िया." उन्होने एक जूस का गिलास प्रीति को दिया और कार की तरफ चल दिए. फिर वापिस आए और अर्जुन से बोले, "छोटे पैसे है या चाहिए?" ये उन्होने बहुत धीरे से उसके कान मे कहा था.

"है बहुत है भैया. थॅंक यू." दोनो मुसकुरुआ दिए और वो पाँचो वहाँ से निकल

लिए.

"अब मुझे भी महंदी लगवानी है."

"तो मेडम चलिए ड्राइवर साथ है आपके." दोनो ऐसे ही हंसते हुए मेहंदी वाले स्टॉल पर चले गये. वहाँ से फारिग होकर उन्होने प्रीति की ड्रेस उठाई और सब समान स्कूटर पर सेट कर दिया आगे.

"अब मैं कैसे बैठूँगी?" दोनो हाथो मे मेहंदी लगी थी तो प्रीति दुविधा मे पड गई.

"रूको" अर्जुन ने स्कूटर डबल स्टॅंड पर वापिस लगाया और धीमे से प्रीति को कमर से पकड़ उपर उठा लिया और सीट पर बिठा दिया दोनो पैर एक ही तरफ कर. स्कूटर का पायेदं नीचे कर उसके पाव वहाँ रखवाए और फिर स्कूटर स्टार्ट कर आराम से नीचे उतार कर चल लिया. प्रीति चिपक के बैठी थी बिल्कुल नीचे गिरने के दर्र से. ऐसे ही वो आराम से उसको लिए घर आ गया.
 
दिन मे सभी ने खाना मल्होत्रा जी के ही घर खाया था सिवाए प्रीति और अर्जुन के. कॉल साहब ने प्रीति को चलने को कहा भी था लेकिन उसने कहा के वो घर पर ही खा लेगी और अर्जुन का दिल नही किया इस समय वहाँ जाने का तो वो बस अपने कमरे मे आकर लेट गया.

………………

राजन का गाल अभी भी हल्का सूजा हुआ था और निचला होंठ भी, जहा थोड़ा सा चोट का निशान था. उसकी छोटी बेहन और अर्जुन को चाहने वाली, उर्मिला ने घर मे यही बताया था कि उसके भैया सीढ़ियों मे दीवार से टकरा गये थे. ऋतु ने खाना खाते हुए राजन को ध्यान से देखा और अलका को भी दिखाया.

"क्या लगता है ये उसका मूह सूजा कैसे होगा?"

"क्या बता शराब पी रखी थी तो कही टकरा गया होगा." दोनो खिलखिला दी. उर्मिला को बड़ा गुस्सा आया था उनकी बात सुनकर और ये सुना राजन ने भी

था लेकिन वो शांत था.

"दीदी आप मेरे भाई की चोट का मज़ाक उड़ा रही हो?" तुनक कर उर्मिला ने ये बात कही तो अब अलका ने जवाब दिया, "जिस तरह की उसकी हरकत है तो ये देख कर तरस तो आने से रहा. खुद ही देखा था ने तेरे भैया को तूने की कैसे शराब पी कर आया था बदतमीज़ी करने प्रीति से."

"वो लड़की कुछ ज़्यादा हे समझती ही अपने आप को." बस इतना बोलकर वो भी वहाँ से उठकर चल दी.

"इसको क्या हुआ?" ऋतु दीदी ने कहा तो अलका दीदी ने कंधे उचका दिए. खाने के बाद पूजा, गीत और लेंन-देंन का काम होने लगा तो लड़किया घर आ गई

संजीव भैया बाहर गये हुए थे कुछ काम से. 4 बजे के पास प्रीति भी रामेश्वर जी के घर आ गई जहा अलका और ऋतु उसको अपने कमरे मे ले गई.

"तेरी मेहंदी तो बहुत खूब रची है." अलका ने प्रीति के हाथ देख कर कहा जहा गहरा भूरा डिज़ाइन उसके गोरे हाथो पर बेहद खूबसूरत लग रहा था.

"दीदी आप दोनो की भी तो इतनी अच्छी लगी है." अलका दीदी की बात का जवाब प्रीति ने उनके और ऋतु दीदी के हाथो को देखते हुए कहा.

"वैसे एक बात है ऋतु, प्रीति का रंग पहले से थोड़ा गहरा होने के बाद भी तेरी टक्कर का है. पहले तो इसके नैन-नक्श सही से दिखते भी नही थे."

"हा तो ये राजकुमारी कॉन्सा इस देश मे पैदा हुई. लेकिन बात सही है तेरी. पहले बरफ जैसी थी अब तो जैसे केसर वाला दूध हो गई है." आँख मारते हुए कहा

ऋतु ने तो अलका ने झिड़क दिया. "शरम कर तू."

प्रीति बस इन दोनो की हरकते देख रही थी उसको समझ कुछ नही आ रहा था.

"चल अच्छा नही करती यार. वैसे कुछ भी कह देख तो इसको हम दोनो से कही ज़्यादा सुंदर तो ये है. मैं तो अपने आप की तारीफ ही करती रहती थी या फिर तेरी. इसको देख कर तो लड़का बन जाने का दिल करता है." उसकी बात से वो दोनो भी खिलखिला उठी.

"अच्छा चल अब थोड़ा तयार हो जाते है फिर पता नही टाइम मिले या ना." तीनो वही लड़कियो वाले काम मे लग गई.

"दीदी, वैसे याद है बचपन मे आप कितना रोती थी और अलका दीदी और मैं आपको चुप करवाती थी. लेकिन अब देखो आप ही हिट्लर बन गई हो, ब्यूटिफुल हिट्लर."

प्रीति की बात से एक बार ऋतु सोच मे पड गई और अपने हाथ रोक दिए नेल-पोलिश लगाते हुए. फिर एकदम से प्रीति को बेड पर खीच लिया.

"तूने भी बहुत रुलाया है मुझे देख आज हिट्लर तेरे साथ क्या करती है?" और प्रीति को गुदगुदी करने लगी जो हंसते हुए इधर उधर हाथ पाव चला रही थी. एक बार तो ऋतु के हाथ जा टकराए प्रीति के उभारों से और दोनो शांत हो कर अलग हो गई. लेकिन शरम और मुस्कान सी थी चेहरो पर.

"वैसे इसके तो पत्थर जैसे है अलका." ऋतु के इतना बोलते ही अलका हँसने लगी और प्रीति,

"दीदी,प्लीज़ " उसके कानो तक लाली छा गई थी.

"अर्रे मेरी बन्नो तू तो ज़रा भी फिरंगी ना रही रे. हम यहा लड़किया ही तो है और कल को तेरे होने वाले वो तो इनपर पता नही क्या क्या ज़ुल्म करेंगे." ऋतु दीदी तो रुक ही नही रही थी और अलका बस हँसे जा रही थी.

"किसी को हाथ ना लगाने दूँगी." थोड़ा संयत होते ही प्रीति ने कहा तो दोनो लड़किया खिलखिला उठी.

"पूछ के थोड़ी हाथ लगाएगा." ये हँसी मज़ाक चल रहा था कि कोमल दीदी और माधुरी दीदी ने दरवाजा खटखटा दिया. अब सब शांति से अपना तयार होने लगे.
 
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