" वो मा सुबह के लिए सॉरी. मुझे नही पता था कि ऐसा कुछ होगा लेकिन फिर पता नही मैं जैसे कही खो गया था." अपनी मा को रसोईघर मे चाय बनाते देख अर्जुन ने उनके पास जा कर क्षमा माँगी जो भी उसने सुबह देखा था उसके लिए.
"कोई बात नही बेटा. ग़लती मेरी भी थी. सावधानी नही रख पाई तो अंजाने मे हो गया. चल यहा बैठ मैं तुझे दूध देती हू." अपने बेटे की बात सुनकर रेखा जी को भी अच्छा लगा. वो काफ़ी देर से बस उस हादसे के बारे मे ही सोच रही थी. लेकिन अर्जुन की माफी ने बता दिया था की ग़लती तो रेखा की ही थी. बेटे को क्या पता था कि मा ऐसे बाहर आ जाएगी. लेकिन जो बात उन्हे खाए जा रही थी वो यही थी के अर्जुन ने उनको देख कर नज़र क्यो नही फेरी थी. उसका घूर्ना रेखा जी का सरदर्द सा कर गया था. लेकिन घर आते ही उसने दिल से माफी माँग कर उन्हे इस दर्द से निजात दिला दी थी.
"मुन्ना आज तू लेट कैसे आया रे?" ये ताईजी थी जो चाय पीने आई थी वहाँ. हल्के हरे रंग की सारी मे लिपटा उनका गदराया जिस्म और मेहन्दी रंग के ब्लाउस मे से बाहर निकलने को तड़प रहे मोटे बूब्स. ताईजी भी उसकी नज़र देख मुस्कुराइ और फिर कुर्सी पर बैठ गई.
मा वही थी तो अर्जुन भी शांति से थोड़ी दूर कुर्सी पर बैठ गया. "ले बेटा. आराम से पीना. जल्दी जल्दी पीने से दूध शरीर को सही से नही लगता." हिदायत देने के साथ उन्होने एक बड़ा गिलास दूध का जिसमे बादाम डालकर गरम किया था अर्जुन के सामने रख अपनी जेठानी को चाय का कप दिया. खुद भी वही बैठ गई.
एक बार अर्जुन ने फिर से दोनो को बारी बारी से देखा और फिर उपर कमरे मे चल दिया. नहाने के लिए घुसा तो अब गोर से प्रीति की बात पर ध्यान देने लगा. "अकेले भी दौड़ना पड़ता है ज़िंदगी मे. लेकिन कई बार मंज़िल से पहले ही बहुत लोग अपने बन जाते है और कई बार मंज़िल पर पहुचने के लिए कई लोग सफ़र मे पीछे रह जाते है. " उसको अब ये बात पूरी तरह से समझ आ गई थी. ज़रूरी नही के कोई ऐसा लक्ष्य बनाया जाए जहाँ अपने ही लोग ना हो साथ.
और अगर अपने लोग हमेशा साथ हो तो इंसान खुद ही इतना मजबूत होगा की वो किसी ऐसे लक्ष्य की तरफ़ देखेगा भी नही जिसके लिए सब से रिश्ता तोड़ कर जाना पड़े. नहा के बाहर आया तो बिल्कुल तरो ताज़ा था अब वो. नीचे अलका दीदी पता नही कब से इंतजार कर रही थी उसका. और जब अर्जुन ने उन्हे
खड़े देखा तो कान पकड़ लिए और उनके पीछे बाहर चल दिया.
"दीदी भूल गया था. गुस्सा नहीं होना प्लीज़."
"चुपचाप स्कूटी बाहर निकालो और चलो.", अलका दीदी थोड़ा गुस्से मे थी क्योंकि 30 मिनिट से अर्जुन नहा रहा था. वो भी हुकुम मानकर चल दिया ग्राउंड की तरफ. लेकिन उसने सीधा स्कूटी वहाँ रोकी जहाँ कॉलेज के बाद वो दीदी को लेकर आया था.
"मुझे चलाना सीखना है." ये बात सिर्फ़ उपर से ही अलका दीदी ने कही थी. जगह को याद करके उनका जिस्म रोमांच से भर उठा था.
"पहले मुझे अपनी प्यारी दीदी को गले लगा कर उनका गुस्सा कम करना है." इतना बोलकर उसने स्कूटी खड़ी करी और सीट पर बैठी अपनी गुस्से वाली दीदी को बाहो मे भरकर उपर उठा लिया.
"दीदी आप जानती नही की आप नाराज़ होती हो तो मुझे खुद पर कितना गुस्सा आता है. " उसने ये बात अलका दीदी को गले लगाए ही कही थी. इसमे कोई वासना या भूख नही थी. लेकिन एक प्रेमी का प्रेमिका के लिए प्यार ज़रूर था.
अलका दीदी ने भी उसको थोड़ा ज़ोर से कस लिया. "तू ना मुझे मिनिट मे बेवकूफ़ बना लेता है." और मुस्कुरा कर होंठो पर किस करके ज़मीन पर पाव टीका लिए. "चल अब सीखा."
फिर अर्जुन ने जैसे ऋतु दीदी को समझाया था वैसे वो अलका दीदी को समझाने लगा. पीछे बैठकर उसने वैसे ही उनको चलाने दिया. हर मोड़ पर वो खुद स्कूटी घुमाता. थोड़ी देर बाद अर्जुन ने शरारत शुरू कर दी. एक हाथ हॅंडल पर एक हाथ से दीदी की उभार का निचला हिस्सा सहलाने लगा.
"ऐसे मत कर वरना गिर जाएँगे." महसूस होते ही दीदी डरने लग गई. मज़ा भी आ रहा था और हॅंडल छूटने का डर भी था.
"नही गिरते दीदी. आप बस पकड़े रहो." इतना बोलकर वो अब थोड़ा उपर हाथ ले आया था.
"भाई तू वही रोक ले जहाँ पहले रोकी थी." और अर्जुन ने वापिस वही पेड़ो के झुंड के पास स्कूटी खड़ी करी और उनको साथ लेकर झुंड के बीच आ गया. उस से ज़्यादा उत्तेजित तो अलका दीदी थी जिन्होने रात को अर्जुन और माधुरी दीदी का अद्भुत संगम देखा था. वो उसके शरीर पर नागिन सी चिपकती होंठ चूसने मे लगी थी यहा अर्जुन ने हाथ सीधा सलवार के अंदर डाल दिया और कच्छी के उपर से ही उनकी चूत सहलाने लगा.
"भाई ये मत कर नही तो मैं सबर खो दूँगी. देख मेरे 4 पेपर बचे है फिर मैं चाहती हू खुद मेरे कपड़े उतार मेरे अंदर समा जाए. बस इतने दिन उपर से जो भी कर ले." हाथ हटाने की कोई कोशिश नही की थी दीदी ने.
अर्जुन ने भी बिना कुछ बोले अपने हाथ पीछे कुल्हो पर रख दबाने शुरू कर दिए और उनको अच्छे से चूमने लगा. कोई 10 मिनिट बाद दोनो खुद को दुरुस्त कर वापिस घर की तरफ चल दिए. इस बार अलका दीदी का हाथ बड़े प्यार से भाई की कमर मे था.
"ले लिए मज़े?" घर के अंदर अभी आए ही थे की ऋतु ने अलका को देखते ही कहा.
"कोन्से मज़े लेकर आ रही हो?" माधुरी दीदी की आवाज़ सुनकर तो तीनो एक बार ठिठक गये. ऋतु तो बोलने लगी थी की दीदी हमारे मज़े तो आप वाले मज़े के सामने कुछ भी नही. लेकिन अलका ने आराम से कहा , "दीदी स्कूटी चलाने मे भी मज़ा आता है. बस वही बात हो रही थी."
माधुरी दीदी गहरी निगाहो से देखती मशीन की तरफ चली गई जहाँ कोमल दीदी कपड़े भिगो रही थी.
"किसी दिन पक्का मरवाएगी तू ऋतु की बच्ची.", अलका दीदी ऋतु को खींचती हुई अंदर ले चली.
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सभी काम से फारिग हो कर अर्जुन उपर ड्रॉयिंग रूम मे बैठ कुछ सोच रहा था. टेलीविजन पर कोई कार्टून चल रहा था और अभी तकरीबन 10 बजे थे.
"ये प्रीति को देख कर ऐसा क्यो लगता है के मैं शायद पहले से जानता हू. लेकिन वो तो कभी हमारे घर भी नही आई. दादा जी के इतने अच्छे दोस्त है पुरी अंकल और दादाजी भी उनके पास जाते रहते है. फिर ऐसा क्यो है के वो घर मे अकेली होते हुए भी कभी हमारे घर नही आई?" अर्जुन हर बात पर गोर कर रहा था. प्रीति की उन नीली-हरी आँखों को पता नही उसने कब देखा था. लेकिन वो उसको बड़ी जानी पहचानी लग रही थी. जैसे उनको उसने पहले बहुत करीब से देखा है, महसूस किया है.