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Incest ये प्यास है कि बुझती ही नही

इधर कर्नल पुरी के घर भी कुछ शांति सी थी. कॉल साहब अपने कमरे मे थोड़ा आराम कर रहे थे क्योंकि उनको पता था कि रात को आज दोस्तो के साथ जाम टकराएँगे. और अपने कमरे के अंदर बैठी प्रीति खरीदे हुए कपड़ो को निहार रही थी. कभी वो चूड़ियों को देखती तो कभी पायल की जोड़ी को. फिर कुछ सोचकर वो बाथरूम के अंदर चली गई बाहर निकली तो एक शॉर्ट निक्कर और बिना बाह की टीशर्ट मे थी. कमरे मे अलमारी पर लगे आदमकद शीशे मे खुद को ध्यान से देखा. बिल्कुल पास खड़ी वो अपनी बाह और टाँगो को देख रही थी. फिर अपनी कपड़ो के साथ वाली अलमारी खोली और उसमे से कुछ अलग अलग ट्यूब और डिब्बीया बिस्तर पर रखी और एक पॅकेट सा भी निकाला.

" पार्वती दीदी.. इधर आना ज़रा." उसकी आवाज़ रसोईघर मे सफाई करती पार्वती ने सुनी और फिर

प्रीति के कमरे मे चली आई. "जी दीदी कहिए."

"यहा आओ तो और दरवाजा बंद कर दीजिए." उसने प्यार से पार्वती को समझाया.

"एक पानी का मग बाथरूम से ले आइए और सॉफ्ट टवल भी." पार्वती भी तुरंत ही समान ले आई.

"पहले बस हल्के गीले तौलिए से मेरी बाह और गर्दन सॉफ कीजिए और फिर ये क्रीम हल्के हाथो से लगा दीजिए." प्रीति ने एक ट्यूब पार्वती की तरफ बढ़ा दी.

अगले 10 मिनिट मे पार्वती ने उतना कर दिया. "दीदी और भी कही?"

"हा यहा पैरो पर भी कर दो." पार्वती पहले वाला ही सब दोहरा रही थी और प्रीति अब उस पॅकेट से कुछ गीले टिश्यू निकाल कर अपनी बाह और गर्दन सॉफ करने लगी.

"दीदी एक बात कहूं ?" पार्वती ने थोड़ी शरम से कही ये बात तो प्रीति ने मुस्कुराते हुए गर्दन हा मे हिलाई.

"दीदी आपके पैर ना बहुत खूबसूरत है और मांसल होने के साथ कितने लंबे भी है. कही भी कुछ हल्का सा ज़्यादा या कम नही है. और वैसे ही आपकी बाहें और गर्दन भी है."

"चल कुछ भी बोलती है.इतना कुछ खास नही बस ये ज़रूर है के टेन्निस खेलने से थोड़ी मजबूत हो गई है." और फिर उसने अपनी टीशर्ट भी उतार दी.

बेदाग सुडोल जिस्म और हर अंग जैसे तराशा हुआ था. पेट भी ऐसा था कि उसपर कही कोई चर्बी ना थी. हल्की मासपेशियो की झलक मिल रही थी जो उसके उभरे यौवन को और बढ़ा रही थी. लेस वाली सफेद आधे कप की ब्रा मे उसके उभार सर उठाए खड़े थे. प्रीति का शरीर और अंगो को देख कर लड़की होते हुए भी पार्वती को जैसे उसके शरीर की तरफ खींचाव सा होने लगा था.

"पार्वती यहा पीठ और पेट पर भी कर देना." इतना बोलकर प्रीति पेट के बल नरम बिस्तर पर पसर गई.

पार्वती के हाथ जैसे अपने आप ही उसके शरीर पर रेंग रहे थे. सख़्त जांघे लेकिन उसपर बालरहित मुलायम खाल किसी माखन से लग रही थी पार्वती को. दोनो हाथो से अच्छे से जैसे वो क्रीम से मालिश करने लगी थी. जाँघो के जोड़ के पास जैसे ही हाथ पहुचे प्रीति की आवाज़ ने उसको चेताया. "बस दीदी अब उसको सॉफ कर दीजिए और यहा मेरी पीठ पर सॉफ करके क्रीम लगा दीजिए."
 
पार्वती भारी साँसों से पैरो का काम निपटा कर प्रीति की कमर के पास आ गई. "दीदी ये आपकी अंगिया की पट्टी मैली हो जाएगी."

प्रीति बात सुनकर हल्के से मुस्कुराइ और एक तौलिया सीने से लगा लिया और फिर खुद अपनी ब्रा के हुक खोल दिए. लड़की कितनी भी मॉडर्न हो, वो एकदम से किसी के सामने नंगी नही हो सकती.

यही प्रीति ने किया था. पूरी तरह से अपने गोरे उभार उसने सफेद तौलिए से छुपाए और फिर पार्वती ने पूरी पीठ को सॉफ किया और वापिस काम करने लगी.

"दीदी आपके तो जिस्म पर एक भी निशान नही है.और ये देखिए यहा से आपकी पीठ थोड़ी ज़्यादा चौड़ी और मजबूत सी है." पार्वती ने गोर से देखा था

ऐसे जिस्म को. पहली लड़की होगी जो कही से मोटी तो दूर की बात चर्बी रहित थी. "वो क्या है ना तू भी रोज दौड़ लगाएगी, कसरत करेगी या कोई मेहनत का खेल खेलेगी तो तेरा शरीर भी ऐसा ही हो जाएगा." थोड़ी गर्दन उचका कर प्रीति ने बात कही तो पार्वती की ज़ुबान फिसल गई,

"दीदी खेल तो मेहनत का रोज ही खेल लेती हूँ लेकिन हुआ तो कुछ नही." और फिर अपनी बात को समझ कर खुद ही क्षमा माँगने लगी..

"तेरा तो बस वही ध्यान रहता है. शायद 5 साल हुए ना तेरी शादी को, फिर भी परिणाम नही दिख रहा कोई." प्रीति ने चुटकी लेते हुए कहा तो

पार्वती शर्मा कर बोली, "जी मेहनत तो लगभग रोज होती है लेकिन वो कहते है के शायद भगवान की अभी मर्ज़ी नही है तो बस फिर नही कुछ हो रहा."

कुछ देर सोचने के बाद प्रीति ने कहा. "चलो बस हो गया सारा काम. थॅंक यू अब मैं नहाने जा रही हूँ."

……………
 
शाम घिर आई थी लगभग 7:30 के आसपास समय था. घर मे थोड़ी चहल पहल थी और सभी कमरो मे रोशनी हो रखी थी. रेखा जी को कोमल दीदी तैयार कर रही थी. एक रेशमी सुनेहरी सारी और सुर्ख लाल ब्लाउस मे वो बहुत आकर्षक लग रही थी. माँग मे सिंदूर, चेहरे पे सिर्फ़ एक बिंदी और हल्का काजल लगया हुआ था.

कोमल दीदी ने उनकी सारी को सेट किया और बोली, "लीजिए मा हो गया आपका तो. अब आप और ताईजी चलिए कामिनी आंटी की तरफ मैं भी अपने कमरे मे तयार होती हूँ."

"शुक्रिया बेटी." किसी गुलाब सी दिखती रेखा जी तो कोमल से कही ज़्यादा सुंदर लग रही थी. शायद उनके चेहरे का तेज उनको सबसे अलग ही दिखता था. अपनी जेठानी ललिता जी के पास गई तो वो भी अच्छे से तयार थी. एक रेशमी गहरे नीले रंग की सारी और वैसा ही ब्लाउज उनके गोरे शरीर को अच्छे से समेटे था.

"चले दीदी. माजी भी तयार है." ललिता जी ने उनकी बात सुनकर अपना पर्स और रुमाल उठाया और अपनी सास की तरफ हो ली.

ऋतु दीदी और अलका दीदी तो शायद एक घंटे से ही तयार हो रही थी. जहाँ ऋतु दीदी ने झिलमिल सा सुर्ख लाल सूट पहना था जिसके नीचे पंजाबी सलवार थी और बड़ी बड़ी आँखें काजल से और भी बड़ी लग रही थी. बालो की एक गूँथ कर की हुई चोटी उन्हे बिल्कुल ही किसी सरदार्णि जैसा दिखा रही थी. रंग भी फक्क सफेद था. पूरा शरीर दमक रहा था. वैसा ही कुछ अलका दीदी लग रही थी. लंबा कद और आसमानी रंग का फ्रॉक वाला कुर्ता जिसके नीचे सफेद चूड़ीदार पाजामी और खुले हुए बाल. एक काली लंबी बिंदी से चेहरा किसी अप्सरा से कम ना लग रहा था उनका भी. दोनो ऐसे ही कितनी देर तक निहारती रही खुद को.

दादी जी के कहने पर माधुरी दीदी ने आज एक क्रीम कलर की शिफॉं की सारी और हल्के हारे-नीले रंग का बिना बाजू का ब्लाउस पहना था. वो तो आज जैसे दुल्हन को ही टक्कर देने जा रही थी. इतने सादगी वाले पहनावे मे उनका शरीर और उनके उभार जानलेवा लग रहे थे. कोमल दीदी ने भी अपनी बड़ी बहन का अनुसरण करते हुए एक चमकदार काली सारी और काला ही मैचिंग बिना बाह का ब्लाउस पहन लिया. माधुरी दीदी ही उनको सज़ा रही थी. दोनो ने पहले भी कई बार सारी पहनी हुई थी तो वो सहज थी इस पहनावे मे. समय 8 के उपर होने को आया था तो चारो बहने भी चल दी अपने पड़ोस के फंक्षन मे. किसी ने एक बार भी अर्जुन को याद नही किया इस दौरान. सब शायद ये सोच रही थी की दूसरी ने उठा दिया होगा.

मल्होत्रा जी का घर जैसे पूरा रोशनी मे नहाया हुआ था. गलियारे और बाहर के आँगन मे खाने का कार्यक्रम था तो स्टॉल्स सजे थे वहाँ. बड़े ड्रॉयिंग रूम जो बाहर की तरफ ही था वहाँ पर सभी बड़े पुरुष एकत्रित थे अपनी महफ़िल सजाए. कोई 20-22 लोग सोफे दीवान पर गोलाई से बैठे थे और उनके सामने ऐसे ही टेबल लगे थे.

गप्पो का दौर चल रहा था. कॉल साहब तो शराब पीने वाले व्यक्ति थे तो उनको भी अच्छी सोहबत मिल गई थी. मल्होत्रा जी के संबंधी भी उनका साथ दे रहे थे. पंडित जी भी जूस/शरबत का गिलास हाथ मे थाम कर उनके किस्से सुन रहे थे और अपने सुना रहे थे. पिछले आँगन मे बड़े बड़े स्पीकर बज रहे थे. ये आँगन कुछ ज़्यादा ही खुला था क्योंकि यहा ज़्यादा कमरे नही बनाए गये थे जैसा की रामेश्वर जी के घर मे थे. कुछ छोटी उमर की लड़किया ऐसे ही नाच रही थी. अधिकतर लोग तो पड़ोस के ही थे या फिर सगे संबंधी मल्होत्रा जी के.

दूसरी मंज़िल पर भी 2 कमरे और नीचे की तरह एक बड़ा ड्रॉयिंग रूम था. यहा जवान लोगो का पीने पिलाने का दौर चल रहा था. मल्होत्रा जी के बड़े बेटे ने ये प्रोग्राम सावधानी और एहतियात से किया हुआ था. अपने दोस्तो को यही से सेवा के बाद उन्होने बाहर भेजना था क्योंकि घर मे इस बात की सख्ती थी की बाहर के लोग शराब पीकर तो अंदर आ नही सकते.

कुछ 15-16 लोग थे जो बियर और विस्की का लुत्फ़ ले रहे थे और 3-4 वेटर उनको खाने पीने का समान उपलदबध करवा रहे थे. यू तो वो सभी सभ्या घरो से थे और कुछ परिवार से ही थे. फिर भी कोई व्यक्ति ऐसा नही था जो ज़्यादा या जल्दबाज़ी मे शराब पी रहा था. अधिकतर तो वो लोग कल होने वाली शादी और अपने कम धंधे की बात कर रहे थे. अच्छी ख़ासी महफ़िल तीन तरफ सजी थी इस बड़े घर मे.
 
तकरीबन 8 बजे ही अर्जुन बाथरूम से नहा कर बाहर आया. संजीव भैया बिल्कुल तयार सोफा पर बैठे थे. उन्होने एक अच्छी सी फॉर्मल शर्ट और पैंट पहनी थी और भूरे चंदे के पोलिश किए हुए जूते. संजीव भैया ऐसे ही तयार होते थे जब भी कहाँ जाना होता था. उनका व्यक्तित्व भी इस तरह अच्छा लगता था.

"तयार हो जा छोटे नही तो फिर थानेदार साहब ने वहाँ नही पाया तो दोनो की क्लास पक्का लग जाएगी."

"बस 10 मिनिट भैया." बोलकर वो कमरे मे घुसा और तौलिया निकाल कर अलमारी से नये कपड़ो से एक जोड़ी निकल कर पहन ने लगा. कुछ देर बाद वो बाहर निकला तो अब हैरान होने के बारी संजीव भैया की थी.

काला घुटनो तक का पठानी कुर्ता जो उसकी चौड़ी छाती पर कसा हुआ था और कंधे पर भी. नीचे एक तंग पाजामी थी गोल सिलवट वाली और पैरो मे खुंडई वाली चमड़े के भूरी राजस्थानी जूती. उसके बालो के कुंडल भी कानो से नीचे आते उसके चेहरे को भरपूर रौनक दे रहे थे. 6 फीट लंबे चौड़े शरीर वाला लड़का किसी काल्पनिक कहानी के शूरवीर सा लग रहा था.

"तेरा तो कायाकल्प ही हो गया छोटे. ये सब कैसे और कब हुआ.?" टेबल पर से एक पुरुषो वाला इत्र उठाकर अपने छोटे भाई के कुर्ते पर छिड़कते हुए भैया बस उसको ही देख रहे थे.

अर्जुन बस मुस्कुरा रहा था.

"ये सब तुझसे तो होने वाला नही है और ना ही मैं इस घर मे किसी को जानता हूँ जो तेरा ऐसा परिवर्तन

कर दे. कौन ही अब भाई को भी नही बताएगा.?"

भैया की बात सुनते उसने कहा. "चलो रास्ते मे बताता हूँ."

मार्केट मे जब अर्जुन ने अपने कपड़े खरीदते हुए एक शर्ट पहन कर प्रीति को दिखाई थी तभी उसने ये कुर्ता उसको थमा दिया था. "मेरे कहने से बस एक बार पहन कर देख लो फिर जीतने यहा लोग खड़े है उनको देख कर खुद फैंसला करना." प्रीति की कही बात सही साबित हुई थी और उस दुकान पर खड़े लोगो ने भी अर्जुन को प्रशंसा भरी निगाहो से देखा था. एक लड़की जो वहाँ अपनी सहेली के साथ थी उसने तो अपनी सहेली को चुटकी काट ते हुए अर्जुन दिखाया था.

और यहा भैया की पारखी नज़रे भी कमाल कर गई थी.

"वो क्या हुआ भैया आज जब मार्केट गया था मल्होत्रा अंकल के काम से तो दादा जी ने कुछ पैसे दिए थे 2 ड्रेस लेने के लिए. वही एक दुकान पर ये पोशाक भी एक मूरत पर सजाई थी. मैने पहन कर देखी तो अच्छी लगी और फिर लेली. एक और भी ली है वो कल शादी के लिए रखी है." नीचे आते हुए उसने बात अपनी तरफ से बनाने की कोशिश करी थी. वो नही चाहता था की प्रीति का नाम ले.

"मैं मेरे भाई को कही ज़्यादा जानता हूँ. हा लेकिन तेरी इज़्ज़त भी करता हूँ तो मैं इतना समझ सकता हूँ के कुछ बात है जो तू अभी नही बताना चाहता. जब ठीक लगे तो बता देना. और हर तरह से तेरा ये बड़ा भाई तेरे साथ है. घबराना नही." संजीव भैया भी समझ चुके थे उनका छोटा भाई अब बड़ा हो रहा है और बात पक्का लड़की की है.

"आपको बिना बताए चैन नही आएगा भैया. लेकिन अभी ऐसा कुछ नही है." और दोनो बातें करते मल्होत्रा जी के घर के बाहर आ गये. कोई 8-9 कार और इतने ही दोपहिया वहाँ गली मे खड़े थे. अच्छी रौनक लगी थी. छत से नीचे तक आती लाइट की लड़ियों से पूरा घर गली मे जगमग हो रहा था.

कपिल, मल्होत्रा जी का बड़ा बेटा कोई 34-35 साल का पहली मंज़िल पर बाहर खड़ा था. उसने वही से संजीव भैया को आवाज़ लगाई तो भैया अर्जुन को साथ लेकर उपर चल दिए.

"आओ पंडित जी. पड़ोस मे रहते हो लेकिन देखो आज महीने बाद दर्शन दिए है." कपिल ने अर्जुन से हाथ मिलाया फिर अर्जुन की तरफ देख कर बोले, "भाई ये गबरू कोंन है? बड़ा तगड़ा दोस्त है तेरा"

संजीव भैया हंसते हुए बोले, "क्या भैया ये मुन्ना है. आप हमारे यहा नही आते और ये घर से बाहर नही निकलता. जब तक आप घर आते हो ये तो सो चुका होता है."

बात भी सही थी. कपिल की धागा फॅक्टरी थी शहर से बाहर और वो 10 बजे जाता था और 10-11 बजे रात मे ही आता था.

"अर्रे मुन्ना इतना बड़ा हो गया. सुना था बाऊजी से की हॉस्टिल से तू वापिस आ गया लेकिन जाकर तो तू ताड़ सा लंबा हो गया रे." अर्जुन को अपने साथ प्यार से लिए वो अंदर चल दिए. सजीव भैया भी साथ हो लिए. यहा पर हवा मे शराब की हल्की महक थी और सब खा पी रहे थे. कपिल ने सबसे दोनो को मिलवाया. संजीव भैया तो अधिकतर को जानते ही थे. अर्जुन आज पहली बार सबसे मिल रहा था.

"ये मेरे देल्ही वाले चाचा जी के सबसे छोटा बेटा है राजन, अभी कॉलेज मे है 2न्ड एअर मे." उन्होने बियर पी रहे एक लड़के से अर्जुन को मिलवाया जो वहाँ खड़े अभी युवको मे शायद सबसे छोटा था लेकिन अर्जुन से बड़ा.

लंबे बाल, थोड़ा भारी शरीर, घुटनो से फटी जीन्स की पैंट और कुछ अधिक ही स्टाइल वाला था वो.

" हल्लो ड्यूड. हाउ आर यू?" उसने हाथ बढ़ाया, दूसरे हाथ मे बियर की बॉटल थी.

"थॅंक यू. आई आम आब्सोल्यूट्ली फाइन. होप यू आर टू." अर्जुन से ऐसे प्रतिउत्तर की शायद उस लड़के को उम्मीद नही थी. लेकिन फिर भी दोनो बात करते रहे जब तक राजन की सारी इंग्लीश ख़तम नही हो गई.

"भाई थोड़ी तुम भी पी कर देखो. जन्नत सा मज़ा है इस बॉटल मे. ठंडी और गरम दोनो." ये बात आँख मारते हुए कही जैसे बियर पीना कोई महान

काम हो.

"नही भाई. मैं ऐसा कुछ नही पीता. मेरे लिए यही सही है." उसने अपने शरबत के गिलास को दिखाया.

"क्या संजीव भाई अकेले पी रहे हो थोड़ा अपने छोटे भाई को भी सीखा दो." उसने पास मे खड़े भैया का ध्यान अपनी और किया. भैया उनके ही किसी रिश्तेदार से बातें करते हुए कोला मे मिलकर विस्की को धीरे धीरे पी रहे थे.

"जब इसका टाइम आएगा तो मैं खुद अपने भाई को पिलाउन्गा. राजन, ये अभी उतना भी बड़ा नही है तो अभी इसको इस सब की ज़रूरत नही." उन्होने इतनी बात कही और फिर प्यार से अपने भाई की तरफ मुस्कुरा कर वापिस सामने वाले से बातों मे लग गये.

अर्जुन का वहाँ दिल नही लग रहा था. तभी कपिल भैया ने कहा, "मुन्ना तुझे नीचे आंटी बुला रहे है. पीछे के दरवाजे से ही नीचे चला जा."

"हा शायद वही ठीक जगह है इसके लिए." राजन ने हल्के नशे मे ये बात कही तो कपिल ने थोड़े गुस्से आँख दिखाई.संजीव भैया ने कुछ नही कहा और ना ही अर्जुन ने. वो बस बाहर निकल गया और भैया ने वापिस दरवाजा लगा लिया.
 
अर्जुन का वहाँ दिल नही लग रहा था. तभी कपिल भैया ने कहा, "मुन्ना तुझे नीचे आंटी बुला रहे है. पीछे के दरवाजे से ही नीचे चला जा."

"हा शायद वही ठीक जगह है इसके लिए." राजन ने हल्के नशे मे ये बात कही तो कपिल ने थोड़े गुस्से आँख दिखाई.संजीव भैया ने कुछ नही कहा और ना ही अर्जुन ने. वो बस बाहर निकल गया और भैया ने वापिस दरवाजा लगा लिया.

नीचे तो महॉल जबरदस्त था. संगीत बज रहा था और कुछ महिलाए और लड़किया नाच रही थी. आँगन की किनारे कोई 20 कुर्सिया लगी थी जिनपर लोग बैठे थे. हर कोई खूब साज संवार कर आया हुआ था. अपनी मा, दादी और ताईजी को वही मल्होत्रा आंटी के साथ बैठा देख वो सीढ़िया उतरताउनकी तरफ चल रहा था और आँगन मे खड़ी सब लड़कियो की नज़र बस उधर ही थी जिधर से अर्जुन आ रहा था.

"ये कोंन है रे?" एक लड़की ने ये बात कही तो माधुरी दीदी ने नाचते हुए पीछे की तरफ देखा और उनके पाव भी रुक गये. उनके साथ ही कोमल दीदी के भी. "मेरा छोटा भाई है. लेकिन पहचान मे तो नही आ रहा." माधुरी दीदी मंत्रमुग्ध से बोली यही हाल कोमल का भी था.

"तो तेरे भाई से बात करवा ना माधुरी?" ये लड़की मल्होत्रा जी के परिवार से ही थी जिसको दोनो बहने जानती थी.

"वो अभी छोटा है. उसको बकश दे." मन मारकर उन्होने ये बात कही. बीच आँगन मे सभी खड़े थे तो शरम से दोनो बहने वापिस हल्के कदमो से संगीत पर पाव थिरकने लगी. हम आपके है कौन फिल्म का गाना चल रहा था.

अर्जुन आकर अपनी दादीजी के पास खड़ा हो गया. वो सभी भी बस उसको ही देख रहे थे. रेखा जी तो पहली बार अर्जुन को ऐसे देख कर यही सोच रही थी की ये तो पूरा जवान हो गया है. वही हाल ललिता जी का भी था लेकिन उनको उसकी जवानी का पता पहले चल चुका था.

"ये है मेरा प्यारा बेटा अर्जुन." कौशल्या देवी ने ये बात कामिनी जी की एक रिश्तेदार से कही तो अर्जुन ने उनको नमस्कार किया.

"कौशल्या जी, लड़का तो आपका बड़ा अच्छा है. मैने तो देखते ही इसको अपनी पोती के लिए पसंद कर लिया था." उन्होने ये बात कही तो वो लड़की जो माधुरी दीदी से उसके बारे मे पूछ रही थी किसी अदृश्य डोर से खींची वही आ खड़ी हुई.

"हाहाहा. कैसी बात करती हो सुमित्र जी. बच्चा है ये अभी. इसकी शादी को अभी 10 साल पड़े है."

"कुछ भी कहो बहन मेरे पोते तो इस से उमर मे बड़े है लेकिन इसके आसपास भी नही दिखते." और अपनी आँखों से काजल उतार कर उन्होने अर्जुन के कान के पीछे लगाया और आशीर्वाद दिया.

"बेटा तू कुछ खा ले. तेरी बहने भी यही है आसपास." ताईजी को लगा के अर्जुन को यहा से थोड़ा दूर ही रखना चाहिए.

"जी ताईजी ." बोलकर वो वहाँ से कुछ कदम गलियारे की तरफ बढ़ा ही था कि फिर टकरा गया किसी से.

पीछे से खिलखिलाने की आवाज़ सुनकर होश आया तो सामने खड़ी अप्सरा को देख कर सुन्न हो गया. प्रीति काले सूट मे और खुले बालो मे आँखें बंद किए खड़ी थी. उसका हाथ अपने बाए कंधे पर था. नीचे उसका पर्स गिरा पड़ा था और साथ ही चाट-पापडी की प्लेट.

"ज़्यादा ज़ोर से लगी? सॉरी ध्यान नही था और एकदम से मुड़ा तो सामने तुम आ गई." अर्जुन की आवाज़ सुनकर प्रीति ने नज़रे उपर की तो फिर वही हुआ जो हर बार उसके साथ होता था. खो गया उन आँखों मे जिनमे हल्का काजल लगा था. और वो भीनी खुसबू जो उसकी सांसो मे समा रही थी.

"नही मैं ठीक हूँ." उसने इतना कहा तो अर्जुन ने नीचे झुक कर पर्स उठाया और आगे बढ़ाया. प्रीति अपने रुमाल से अर्जुन के कुर्ते पर लगे दही के छोटे से निशान को सॉफ करने लगी.

"प्रीति ये मेरा भाई है अर्जुन. और अर्जुन ये है प्रीति, कॉल अंकल की ग्रॅंडॉटर." अलका दीदी ने ये कहा जो पीछे से अब उनके पास ही खड़ी थी.

"हम मिल चुके है." प्रीति ने एक बार झुकी नज़रो से कहा और फिर बगल से निकल कर आँगन की तरफ आ गई.

"तू कब मिला रे इस से? और आज तो लगता है तू किसी शोरुम से तैयार हो कर सीधा इधर आ गया." ऋतु दीदी ने अपने छोटे भाई को बड़े प्यार से देखा.

वो तो जैसे उनकी नज़रो मे बस गया था. अलका दीदी भी बस अर्जुन को ही देख रही थी. "ये इम्तिहान मेरी जान ना ले ले." मन मे सोचा उन्होने.
 
वो तो जैसे उनकी नज़रो मे बस गया था. अलका दीदी भी बस अर्जुन को ही देख रही थी. "ये इम्तिहान मेरी जान ना ले ले." मन मे सोचा उन्होने.

"वो कॉल अंकल ने आज मार्केट मे प्रीति को भी मेरे साथ भेजा था. उसको भी समान लेना था तो मैं ले गया था.

" उसने स्टेडियम का जीकर नही किया.

"ओह अच्छा. वैसे तो वो हमारी पुरानी सहेली है लेकिन बाहर पढ़ रही थी और बस इस महीने ही आई है वापिस." चल री अलका फिर तेरा गाना लगवाते है

ये आंटियाँ ऐसे ही हिलती रहेंगी. दोनो हिरनी सी वहाँ से निकल गई. अर्जुन ने एक बार पलटकर देखा तो प्रीति अब उसकी मा के साथ वाली कुर्सी पर थी.

कामिनी आंटी को उनकी देवरानी अपने साथ ठुमका लगवा रही थी. घर के कुछ पुरुष सदस्य और लड़के भी वही बैठे नाच-गाना देख रहे थे और हल्का फूलका खा रहे थे. एक वेटर से जूस का गिलास लेकर वो वही साइड मे खड़ा बस उधर ही देखता रहा.

"भैया ये वाला गाना है आपके पास?" ऋतु दीदी ने डेक के पीछे खड़े युवक से कहा और गाना बताया. कुछ 2-3 मिनिट बाद गाना चला दिल तो पागल है फिल्म का और अब ज़्यादातर लड़कियों ने नाचने के जगह खाली कर दी थी. अगले 5 मिनिट कोई कुछ नही बोला जब अलका दीदी ने अपना हुनर दिखाया. उनका डॅन्स देख कर तो सभी की नज़रे उन्हीं पर लगी थी. अर्जुन के पास मे सीढ़ियों पर 2-3 लड़के बैठे थे. राजन भी वही था जो डॅन्स देख रहा था.

जैसे ही गाना ख़तम हुआ तो सब तालियाँ बजाने लगे. उनका डॅन्स भी जोरदार था. फिर बड़ी महिलाए वहाँ से उठकर खाना खाने जाने लगी. अब वहाँ ज़्यादातर हम उमर जवान लड़किया, भाभी लोग और कुछ युवक जो सिर्फ़ बैठे थे रह गया. ऋतु दीदी ने जा कर प्रीति का हाथ खींचा जो कब से कभी नाच तो कभी अर्जुन को देख रही थी.

"चल उठ अब तेरी बारी है. तूने प्रॉमिस किया था ना. सब हटो यहा से अब प्रीति का नंबर है और यही है अलका की टक्कर की.

बाकी तो बस कमर हिला के चल देते है." उन्होने इतना बोला तो पहले तो प्रीति नही नही करती रही फिर कुछ देर बाद आ गई जहाँ पहले अलका दीदी थी.

"अब बोल कॉन्सा गाना सुनकर तू अपना जलवा दिखाएगी?" ऋतु दीदी तो थी ही माहिर. प्रीति ने उनके कान मे कहा तो उन्होने वापिस गाना चलाने वाले लड़के को गाने के बोल बताए. कुछ ही देर मे गाने की धुन शुरू हुई. ये बिल्कुल ही नया गाना था जो ज़्यादातर लोगो ने नही सुना था. उसके बोल थे "सपने मे मिलती है कुड़ी मुझे सपने मे मिलती है."

संगीत भी बड़ा तेज और ढोल की मिलावट वाला था. फिर जब प्रीति के कदम थिरकने लगे तो वो बस कमर मे दुपट्टा बाँध ऐसे नाची की एक 2 लड़को के मूह से सीटी निकल गई. उनमे से एक राजन भी था. अर्जुन को उसका ये व्यवहार जचा नही लेकिन वो बस शांत रहा था.

"तुम यहा की नही लगती." राजन उठकर अब प्रीति के पास जा रहा था और उसकी तरफ देखते हुए उसने ये बात कही.

"तुमसे मतलब. चलो अपना काम करो. यहा पर लड़को का आना मना है. उपर से तुमने पी रखी है." ऋतु दीदी दिलेर थी और उन्होने राजन को पीछे कर दिया.

वो भी ज़्यादा बहस किए वहाँ से चल दिया. लेकिन था वो भी थोड़ा टेढ़ा. ऐसे ही हल्के फुल्के नाचने गाने के बाद सब खाना खाने चले गये. संजीव भैया ने भी अर्जुन को बुलवा लिया था. खाने की तरफ अच्छी ख़ासी भीड़ थी तो अलका, ऋतु, प्रीति और उनके साथ वही लड़की जिसने अर्जुन को पहली नज़र मे ही दिल दे दिया था,

चारों खाने की प्लेट लेकर उपर छत पर चल दी. कमरो मे भी लोग भरे थे तो उनका जाना कुछ अलग नही लगा. संजीव भैया को वो बताकर गई थी. सबने खाना खाया और बातें भी की. बड़े बुजुर्ग घर निकल लिए थे तब तक. रामेश्वर जी भी पूरी साहब के सहत ही चले गये थे.

इस बीच अर्जुन की आँखें प्रीति को ढूँढ रही थी. "छोटे चल सब को एक बार बोल दे फिर घर चलते है." अर्जुन ने सही तरफ देखा तो कामिनी आंटी ने बताया के मा, दादीजी और ताईजी जा चुके है. तभी ऋतु और अलका दीदी के साथ कोमल दीदी और माधुरी दीदी भी आ गये. सभी निकलने ही लगे थे की अलका दीदी ने बोला, "भाई जल्दी से उपर से मेरा पर्स ले आ. वो मैं वही खाने के टाइम भूल गई शायद."

उनकी बात सुनकर अर्जुन सीढ़िया चढ़ उपर चल दिया. दूसरी मंज़िल बिल्कुल शांत थी और पीछे हल्का अंधेरा था. लेकिन जब वो वहाँ से नीचे गया था तब तो बल्ब जल रहा था वहाँ. अर्जुन ने ये सोचा और थोड़ा तेज़ी से तीसरी मंज़िल पर चढ़ने लगा.

"मेरा हाथ छोड़ दीजिए. मैं आपसे कोई बात नही करना चाहती." प्रीति की इतनी बात ही अर्जुन के कानो पे पड़ी और अगली 5 सीढ़िया वो एक झटके मे पार कर उपर आ खड़ा हुआ. बीच छत पर 3 साए खड़े थे. पास जाते ही देखा तो वो लड़की, राजन और प्रीति थे वहाँ.

प्रीति अर्जुन को वहाँ देखते ही उसकी और लपकी, राजन ने अभी भी उसका हाथ पकड़ा हुआ था.

"हाथ छोड़िए इसका." राजन को ज़रा कड़ी आवाज़ मे उसने ये बात कही.

"तू जा यहा से. मुझे बात करनी है इस से." थोड़ी हेकड़ी से इतना ही बोला था राजन ने की उसकी चीख निकल गई.

वो साथ मे खड़ी लड़की भी दोनो की तरफ देख कर बोली, "छोड़ो मेरे भाई को और दफ़ा हो जाओ यहा से."

अर्जुन ने राजन का जो हाथ प्रीति की कलाई को पकड़े था वो पकड़ कर लगभग पूरा ही मरोड़ दिया था और अब राजन का शरीर आधा झुक चुका था और आँखों मे पानी आ गया था.

"अपने भाई को कहो की लड़की की इज़्ज़त करना सीखे. कोई जागीर नही है प्रीति उसकी. और तुम एक लड़की होकर अपने भाई के ग़लत काम मे साथ दे रही हो. इतना भी मत गिरो के फिर उठ ही ना पाओ खुद की नज़र मे."

प्रीति बुरी तरह चिपक चुकी थी अर्जुन की छाती से. ऐसा नही था कि वो कोई कमजोर लड़की थी लेकिन

किसी शादी वाले घर मे वो भी अकेली एक शराब पिए लड़के के सामने वो डर गई थी. नही तो किसी और जगह तो राजन जैसा लड़का उसको हाथ भी ना लगा सकता था.

अर्जुन ने उसको अपने से अलग किए बिना ही वहाँ पड़ी चारपाई से पर्स उठाया ओर चलने लगा.

प्रीति का हाथ थोड़ा गीला सा लगा तो बस अन उसको अपनी नज़रो के सामने ही किया और फिर राजन की तरफ वापिस घूम कर उसके गाल पर पूरे ज़ोर से तमाचा जड़ दिया. एक के बाद एक लगातार 4-5 झापड़ खाने के बाद राजन भी घुटनो पे गिर गया था. नाक से खून आ चुका था उसके. प्रीति ने अर्जुन को अपनी तरफ किया और भीख मांगती सी बोली, "प्लीज़ यहा से चलो अर्जुन. अब और कोई तमाशा नही करना. प्लीज़."

अर्जुन उसका सर सहलाता सर्द आवाज़ मे राजन को बोला, "मेरी प्रीति का एक कतरा खून भी इतना कीमती है की इसके बदले मे तेरी जान भी ले लू मैं. और तूने तो उसका हाथ ही ज़ख्मी कर दिया. अगर फिर तू नज़र आया तो मैं भूल जाउन्गा सबकुछ." और इतना बोलकर वो प्रीति को साथ लिए नीचे चल दिया.
 
अर्जुन उसका सर सहलाता सर्द आवाज़ मे राजन को बोला, "मेरी प्रीति का एक कतरा खून भी इतना कीमती है की इसके बदले मे तेरी जान भी ले लू मैं. और तूने तो उसका हाथ ही ज़ख्मी कर दिया. अगर फिर तू नज़र आया तो मैं भूल जाउन्गा सबकुछ." और इतना बोलकर वो प्रीति को साथ लिए नीचे चल दिया.

आँगन मे आने पर देखा तो वो सफेद काली चूड़ियाँ जो उसके सीधे हाथ की कलाई मे थी उनमे से 4-5 टूट कर उपर ही रह गई थी. कलाई पर अभी भी हल्का खून था. \

"मुझे रोक कर अच्छा नही किया तुमने." अर्जुन अभी भी गुस्से मे था और प्रीति उसको इस तरह देख कर बस मुस्कुरा दी.

"ओये तू पर्स लेने गया था या बनाने. आरू प्रीति तुम कहा थी.?" अलका दीदी उनकी तरफ आती हुई बोली.

"आप के साथ गई थी ना ये? तो लेकर भी साथ आना चाहिए था आपको." अर्जुन बिना कोई जवाब सुने वहाँ से निकल लिया.

गेट पर ही संजीव भैया और बाकी दीदी भी खड़े थे. सबको सामने देख कर थोड़ा शांत पड गया अर्जुन और उनके पास रुक गया.

"चलो भी अब. सब ऐसे क्यू खड़े हो."अलका दीदी ने हंसते हुए कहा और सब चलने लगे. अपने घर के बाहर पहुचते ही माधुरी दीदी ने अर्जुन को रोका.

"पहले प्रीति को घर तक छोड़कर आ."

"प्रीति आज तुम हमारे यहा रुक जाओ ना." ऋतु दीदी ने उसके करीब जा कर कहा.

"नही दीदी. आज तो नही लेकिन जल्दी ही आउन्गी. आज वैसे भी थकान है थोड़ी और फिर दादाजी को नही बताया है."

"चल ठीक है. कल आ जाना साथ मे तयार होंगे. गुडनाइट." सब आपस मे मिले. संजीव भैया ने भी शिष्टाचार दिखाते हुए "गुडनाइट गुड़िया कहा"

और सामने से भी प्रीति ने जवाब दिया.

"आप सब ऐसे मिल रहे हो जैसे ये अगले शहर जा रही है. 2 घर दूर ही इनका घर है." अर्जुन की बात सुनकर सब हंस दिए और प्रीति अर्जुन को छोड़कर सब अंदर चले गये.

"वैसे मुझे लगा था की अब तुम्हे गुस्सा आना बंद हो गया होगा. बड़े शांत से तो दिखते हो." प्रीति ने चलने से पहले घर से बाहर आती रोशनी मे एक बार उसके चेहरे को ध्यान से देख कर कहा

"बंद हो गया होगा से मतलब.? तुम्हे क्या पता है मेरे बारे मे.?"

"तुम्हारी दीदी ने बताया था कि बचपन मे तुम्हे बड़ा गुस्सा आता था. लेकिन फिर तुम हॉस्टिल मे रहने के बाद से ही बिल्कुल शांत हो गये थे." सफाई से प्रीति ने जवाब दिया.

"अच्छा तुम्हारा घर आ गया है." अर्जुन और प्रीति दोनो बातें करते हुए घर तो पहुच गये थे लें साथ चलने पर उनके साथ वाले हाथो की उंगलियाँ एक दूसरे से खेल रही थी. उसकी बात सुनते ही प्रीति ने एक बार अर्जुन का पूरा हाथ पकड़ वापिस छोड़ दिया.

"मेरी प्रीति को हाथ भी लगाया तो तेरी जान ले लूँगा." गेट की तरफ जाती प्रीति ने अर्जुन की नकल करते हुए उसकी ही बात दोहराई तो वो शर्मा कर अपने घर की और वापिस चल दिया और प्रीति खुद के घर के अंदर.
 
सत्य-असत्य

"भैया आप सो गये?" अर्जुन कपड़े बदल कर भैया के कमरे मे आया.

"क्या बात है तुझे नींद नही आ रही क्या?" भाई वैसे ही लेटे थे.

"नही भैया बस कपड़े बदल कर यही आ आपके पास."

"कुछ पूछना है क्या भाई?" भैया अब बिस्तर पर टेक लगा कर बैठ से गये. उन्होने अपने छोटे भाई को थोड़ा परेशान देखा

"आप मेरे बारे मे सबकुछ जानते है ना? सबसे बड़े तो आप ही है. मुझे ज़्यादा कुछ याद नही लेकिन क्या आप कुछ बता सकते है?" अर्जुन की बात सुनकर

थोड़ी देर तक तो संजीव भैया किसी गहरी सोच मे डूब गये फिर उसको अपने पास बिठा लिया.

"जो भी मैं बताउन्गा तू वो किसी से नही कहेगा. ख़ासकर घर मे तो बिल्कुल भी नही." उन्होने अर्जुन की तरफ देखा तो उसने हा मे सर हिला दिया.

"तू समय से पहले पैदा हुआ था मेरे भाई. उसकी वजह से काफ़ी दिक्कत उठाई थी सबने. तुझे 3 साल तक तो बहुत ही प्यार से और एहतियात से संभाला.

कही बाहर नही ले जाते थे की तू कही बीमार ना हो जाए. तुझे जो भी पसंद होता सब फरमाइश पूरी होती थी. फिर जब एक दिन जब डॉक्टर ने बताया की तू अब बिल्कुल ठीक है तो घर मे थोड़ा आराम हुआ सबको. लेकिन सबके इस प्यार ने तुझे ज़िद्दी बना दिया था. ऋतु तो तुझे अपने से चिपकाए ही घूमती रहती थी. उसके साथ ही तुझको स्कूल भी भेजना शुरू किया लेकिन तू वहाँ भी ऋतु की क्लास मे बैठने की जिद्द करता था.

दादा जी का अच्छा नाम था वो बड़े पुलिस अधिकारी थे तो स्कूल मे भी तुझे इतनी आज़ादी मिल गई." फिर भैया ने एक गहरी साँस ली और कहा, "तेरी वजह से अलका और ऋतु दोनो के ही खराब नंबर आने लगे थे तो शंकर चाचा जी नाराज़ रहने लगे. दादा जी ने ही उनको समझाया. कुछ समय बाद सतीश अंकल का बेटा और बहूँ आए पड़ोस मे,उनकी बेटी भी उसके साथ आई थी. वो लोग शायद अमेरिका मे कही रहते थे."

"सतीश?" अर्जुन ने ये नाम दोहराया.

"हा कॉल सतीश पूरी जी. और जब वो हमारे घर आते तो उनकी पोती भी यहा आती थी. ऋतु, अलका के साथ साथ तू उसके साथ भी खेलने लगा था. दोनो इतना साथ रहने लगे की कई बार वो यही सो जाती या तू उनके घर. तीन साल तक हर साल वो यहा आते एक महीने के लिए और तू उनकी बेटी के साथ ही खेलता रहता.

फिर उस साल वो लोग वापिस चले गये और जब सतीश अंकल तुझे समझाने लगे तो तूने उनके उपर पत्थर फेंक के मार दिया था. तू 7 साल का था उस समय. ये बात चाचा जी को गुस्सा दिला गई. तू सबके साथ झगड़ने लगा था. सिर्फ़ ऋतु और अलका के साथ ही शांत रहता. और वो दोनो भी तेरे उपर जान छिडकती थी. लेकिन चाचा जी ने ठान लिया था कि तुझे वो ठीक करके ही रहेंगे. उनको सबसे ज्याद उम्मीद तेरे जनम लेने से हुई थी लेकिन तेरी जिद्द और गुस्से ने उनको बड़ा फैंसला लेने को मजबूर कर दिया था. फिर उन्होने तुझे हॉस्टिल भेज दिया, सबके मना करने के बावजूद. रेखा चाची तो सदमे मे चली गई थी.

सब धीरे धीरे शांत होने लगा. दादाजी ही तुझ से मिलने हॉस्टिल जाते थे और कोई नई. हॉस्टिल के वॉर्डन और स्कूल के अनुशाशण ने तेरा गुस्सा तुझ पर ही प्रयोग कर तेरा ध्यान सिर्फ़ चुनोतियो पर लगा दिया. अब जो गुस्सा और ज़िद थी वो तेरी ताक़त थी. गुस्सा तो ख़तम ही हो गया था. और अपने दादाजी ने भी बड़े प्यार से तेरे जीवन मे ये परिवर्तन किया की तू सबकी भावनाओ को समझे. मुझे आज भी याद है जब तू वापिस आता था तो वो सब काम छोड़ कर 2-3 घंटे सिर्फ़ प्यार, संस्कार और भगवान की बातें सिखाते थे. अलका और ऋतु को तो सॉफ बोल दिया गया था कि उस एक महीने कभी घर के बाहर वालो कमरे मे नही जाएँगी. तुझे जो ये सब बगीचे के काम अब अच्छे से आते है ये तू 5-6 साल से कर रहा है. है ना."
 
"हा. हमारे घर के पिछले हिस्से मे किरायेदार रहते है और वहाँ बिल्कुल नही जाना. ये दादाजी की कही बात मुझे याद है. अभी 2 साल पहले ही मुझे बताया था कि अब सभी वापिस यहा रहते है." अर्जुन ने सिर्फ़ इतना कहा. उसकी आवाज़ भर्रा गई थी.

"तू जानता है छोटे, कई बार तो शुरू शुरू मे हम सबको पुराने घर भेज दिया जाता था. तुझे याद है वो घर?"

भैया के इस सवाल से अर्जुन ने सोचा लेकिन कुछ याद नही आया तो ना मे सर हिला दिया.

"ये हमारे वाले कमरे बाद मे बने थे और इनके पीछे भी 3 कमरे है दूसरी तरफ. जो बंद रहते है." अर्जुन ने हा मे सर हिलाया.

"इस घर मे पहले दादा-दादी, तेरे पापा-मम्मी, दीदी और तू रहता था. पुराने घर पर हम सब रहते थे. तेरे हॉस्टिल के पहले 4 साल तो सभी लोग एक महीने के लिए वही रहने आ जाते थे. और दादा दादी के साथ कभी रेखा चाची तो कभी मेरी मा आती थी. लेकिन ये सब तेरे पिताजी के कहने पे ही हुआ था. वो नही चाहते थे की उनका वारिस ज़िंदगी के पाठ से अलग हो जाए और अपना जीवन खराब कर ले. पूरे 4 साल लगे थे तेरे गुस्से और महॉल को ख़तम करने मे." संजीव भैया इतना बोलकर छत की तरफ देखने लगे.

"और ये लड़की प्रीति वही है?"

"हा. जब वो अमेरिका मे बीमार रहने लगी तो फिर सतीश अंकल उसको यहा अपने ही पास ले आए. अब इतना कुछ बता दिया है तो तू अपना मूह बंद रखेगा और जा कर बिना कोई सवाल करे सो जाएगा."

अर्जुन के दिमाग़ पर छाए बादल कुछ हद तक हॅट चुके थे. कुछ सवाल थे लेकिन उसके उत्तर सिर्फ़ उसके पिता रामेश्वर जी ही दे सकते थे इतना उसको पता था. कमरे आकर बिस्तर पर थोड़ी देर वो सोचता रहा और अपने आप उसकी आँखे बंद हो गई.

…………………………
 
"मेरी प्रीति." अपने आप से कहती हुई प्रीति अपने बिस्तर पर लेटी थी. आज उसने वो देख था जो 8-9 साल पहले होता था. अर्जुन का उसको खुद से चिपकाना और किसी को उसके साथ नही खेलने देना. आज जिस तरह से उसने अर्जुन को अपने अंदर तक उतरता महसूस किया था वैसा कभी उसके साथ नही हुआ था. अपनी कलाई का दर्द भूल चुकी थी लेकिन चूड़ियाँ टूटने का दर्द बहुत था उसको. ये अर्जुन ने दिलाई थी. उनको उतार कर डब्बे मे बंद कर वो वापिस लेटी ख़यालो मे खो गई. फिर नींद मे.

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समय से पहले ही अर्जुन की नींद खुल गई थी. घड़ी मे देखा तो अभी 3:30 दिखा रही थी वो. बिस्तर से उठकर वो नीचे आया और पानी की बॉटल निकाल कर सीधा छत पर चल दिया. वहाँ पर कोई सोया हुआ था.

"माधुरी दीदी." इतना सोचकर ही उसने पानी पीकर बॉटल दीवार पर रखी और उस एक ही गद्दे पर सोए इंसान की चद्दर मे आ घुसा. ये माधुरी दीदी ही थी. उनके साथ लेटते ही अर्जुन फिर उस नशे मे खोने लगा जिसमे अक्सर वो दोनो खो जाते थे जब भी अकेले होते थे. उनके कमीज़ के उपर से ही अर्जुन ने हाथ फिराए. बड़े बड़े और मोटे उभार कमीज़ के अंदर आज़ाद ही थे. दीदी के कमीज़ के अंदर हाथ डालकर उनका एक नंगा दूध उसने हाथ मे भर लिया और सहलाने लगा. निपल कड़ा होता हुआ उसको महसूस हुआ तो वो और जोश से उनसे चिपक गया था.

नीचे वाला हाथ तो चुचे पर था, दूसरा हाथ उसने पीछे से सलवार मे डाल उनके नंगे चुतड़ों पर फेरना शुरू कर दिया. दीदी की गरम साँसें उसकी भी गर्मी बढ़ा रही थी. अपने होंठ उसने माधुरी दीदी के होंठो पर रख उनके दोनो होंठ पीने शुरू किए तो नींद मे ही दीदी ने उसको खुद से चिपका लिया.

इतने जोश मे उसने उनका वो मॉटा दूध मुट्ठी से दबाया तो दीदी के आँखें खुल गई. अपनी आँखों के सामने अर्जुन को देख उनके होंठ भी हरकत देने लगे

अर्जुन भी ज़ोर ज़ोर से उनकी गान्ड की दरार तक उंगलिया डाल कर उनके कूल्हे मसल रहा था. मुलायम रब्बर से कूल्हे एक अलग ही मज़ा दे रहे थे. अपने कपड़े निकाल वो फिर से उनसे लिपटने लगा तो दीदी भी बैठ गई और कमीज़ और सलवार खोल कर अर्जुन के उपर हो गई. अपने मूह के पास लटकते उनके भारी दूध वो नीचे लेट कर पीने लगा और माधुरी दीदी अपनी चूत उसके लंड पर रगड़ने लगी. वो दोनो कई देर तक ऐसे ही लगे रहे.

अर्जुन ने उनके कूल्हे दबा दबा कर लाल कर दिए थे. और निप्पल भी फूल कर मोटे होने लगे थे. लंड किसी लकड़ी सा सख़्त नीचे से ही चूत में जाने की कोशिश कर रहा था. जब बर्दाश्त ना हुआ तो उसने दीदी को अपने नीचे घुमा लिया और उनके उपर आते ही चूत पर लंड लगाकर धक्का जड़ दिया.

"ऊ मा.. भाई आराम से कर. कही नही भागी जा रही तेरी बहन."

आधा लंड गीली चूत में किसी खुन्टे की तरह घुस गया था और चूत चौड़ी हो गई थी. दोनो हाथो से उनकी टांगे उपर उठा कर उसने फिरसे एक धक्का दिया और 2 इंच के लगभग लंड और आगे चला गया. दीदी तड़प रही थी और उनके चुचे हिल रहे थे. ये देख कर अर्जुन उनके उपर झुक गया और उनके दोनो उछलते फुटबॉल पकड़ कर चूमते हुए धक्के लगाने लगा. प्यार से आधा लंड ही बाहर निकाल वो एक रफ़्तार मे चुदाई करता रहा. दीदी के हाथ जब उसकी पीठ सहलाने लगे तो उसने उनके होंठ छोड़ एक धक्के मे लंड जड़ तक ठूँस दिया.

"आ भाई.. हर बार ये मेरे पेट मे दर्द देता है. हाए राम.. लेकिन इसका ये दर्द...आ मज़ा भी खूब.. आ आ देता है.. उनकी बात बीच बीच मे रुक जाती जब अर्जुन लंबे करार धक्के लगता.

"दीदी आपका जिस्म ही ऐसा है... आ.. के मैं...आ खो जाता हूँ.. " सुपाडे तक लंड निकाल फिर जड़ तक ठोकते हुए अर्जुन भी मज़े मे डूबा लगा हुआ था.

नीचे से उसके हाथ जब दीदी की गान्ड के छेद से टकराए तो उसने एक उंगली से उसको सहला भर दिया..

"आ भाई ये क्या दबा दिया.. मेरी मा..

दीदी की चूत इतने मे झड् गई.. चूत से निकलता पानी जब अर्जुन की उस उंगली पर पड़ा तो उस वो गीली उंगली वापिस छेद पर दबाई. उसका नाख़ून तक का भाग अंदर चला गया....

"हाए रे.. ये कैसा नशा है.. अर्जुन भाई.. मर जाउन्गी मैं.. " वो गान्ड के इस हमले से पागल हो उठी थी..

अर्जुन भी उंगली अंदर करते हुए धक्के बढ़ाता जा रहा था... पूरी उंगली गान्ड के अंदर बाहर हो रही थी और चूत हवा मे उठी पूरा लंड खाने लगी थी... 10 मिनिट मे ही दीदी फिर से अकड़ने लगी.. और जैसे ही वो झड़ी तो अर्जुन ने भी लंड दोनो टाँगे उठा उनकी गान्ड की लकीर पर सटा दिया.. उसका सारा सफेद पानी गान्ड के छेद पर दबाव से गिरा.. अपनी गान्ड पर गरम वीर्य महसूस कर के दीदी को लगातार झटके लगे.. मज़े मे वो बिस्तर पर गिर पड़ी थी..

"तूने ये कॉन्सा नया जादू किया रे.. कसम से ऐसा लग रहा है के हवा मे हूँ मैं.. "

दीदी की बात सुनकर अर्जुन ने झुक कर उनके होंठ चूमे और कपड़े पहन लिए. दीदी ने भी जैसे तैसे कपड़े पहने और अर्जुन को जाता देख वापिस वही लेट गई.

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