40
चिराग ने रात भर फुलवा के कमरे से सिसकियां और आहें भरने की आवाज़ें सुनी। चिराग ने फुलवा को वक्त देकर नए हालत से जुड़ने का मौका देना सही समझा।
सुबह 6 बजे चिराग उठ कर बाहर आया तो फुलवा किचन की मेज से लगी कुर्सी पर बैठ कर चाय पी रही थी। फुलवा का भरा हुआ बदन satin की महीन परत ओढ़े अपना हर उठाव हर कसाव दिखा रहा था। चिराग अपने इन विचारों को रोक कर गले की खराश की आवाज कर अपने आने की खबर फुलवा को देने में कामयाब हुआ।

फुलवा मुस्कुराकर, "अरे बेटा, तुम उठ गए! आओ बैठो मैंने हमारे लिए चाय बनाई है।"
फुलवा ने अपनी कुर्सी पर चिराग को बिठाया और चाय गरम करने के लिए बर्तन गैस पर रखा। Satin gown के आगे का हिस्सा खुल गया और फुलवा के गले से नाभि तक का हिस्सा साफ दिखने लगा।

चिराग का गला सुख गया और उसके मुंह से कुछ अजीब आवाज निकली।

फुलवा अपने गाउन को सीधे करते हुए, "माफ करना बेटा! मुझे परिवार के साथ रहने का तजुर्बा नही!"
चिराग ने बात बदलते हुए, "मैं समझ सकता हूं! हम बिलकुल अलग तरह से जिए हैं। आप बताओ की आप कैसे रहती थीं?"

फुलवा ने चाय को कप में भरते हुए, "वैसे तो हम सब औरतें ही थी। इस लिए हम सब सिर्फ ब्लाउज और साया पहनती थी। रात 8 बजे का पहला ग्राहक हमारा ब्लाउज खोल कर साया उठाता। फिर सुबह 6 बजे हम ब्लाउज बंद कर साया गिरा देती। आम तौर पर बीस से पच्चीस ग्राहक मिलते थे। अगर किसी रात धंधा कम हुआ तो हमें सिर्फ दस ग्राहक मिलते। खास मौकों पर एक रात में चालीस से पैतालीस ग्राहक मिलते ही थे।"

चिराग, "दस से चालीस ग्राहक कितनी औरतों के लिए?"
फुलवा अपने सर को झुकाकर, "हर एक को!"
चिराग ने फुलवा के हाथ पर हाथ रखा और उसे धीरज बंधाया।
फुलवा ने पतली मुस्कुराहट से, "तो सुबह हम में कुछ करने की ताकत नहीं होती। सुबह 6 बजे कोठे का दरवाजा बंद होने के बाद हमें चाय मिलती। फिर हम सब एक साथ नहाती और सब को काम मिलते। नाश्ता बना, खाना पकाना, साफ सफाई करना।"

फुलवा ने नीचे की अलमारी में से कुछ बिस्कुट निकाले और उन्हे एक छोटी थाली में रखा। झुकते हुए फुलवा की गदराई गांड़ के मोहक दर्शन से चिराग की जवानी तड़प उठी।

फुलवा चिराग के सामने बैठ कर चाय बिस्कुट खाते हुए, "दिन भर के कामों के बाद शाम को हमें हल्का खाना मिलता। ग्राहकों को मोटी रंडियां पसंद नहीं आती। फिर हम सब नहाकर अपने बदन पर सुगंध लगाती और चटाई पर लेट जाती। रात को 8 बजे कोठे का दरवाजा खुलता और रंडीखाने में नया दिन शुरू होता।"
फुलवा ने चिराग को देख कर बहादुरी से मुस्कुराया, "मेरी बात छोड़ो, अपनी बताओ!"

चिराग, "अधिकारी सर ने मुझे कड़े अनुशासन में पला और बढ़ाया। रोज सुबह 5 बजे उठने के बाद एक घंटे की कसरत, फिर नाश्ता। नहा धोकर सुबह 7 बजे स्कूल जाना। स्कूल से लौटने के बाद स्कूल की पढ़ाई, घर की पढ़ाई। अधिकारी सर ने मुझे घर के काम भी करना सिखाया ताकि मैं किसी औरत का बोझ ना बनूं!"
फुलवा ने मुस्कुराकर चिराग के हाथ पर अपना हाथ रखा।
चिराग, "रात को 10 बजे बत्ती बंद कर सोना जरूरी था। अधिकारी सर के जाने के बाद भी मैने यही दिनचर्या रखी। बस अब स्कूल की जगह मैं सुबह 9 बजे से 4 बजे तक लैपटॉप पर काम करता हूं।"
फुलवा, "मेरा बेटा कितना अच्छा है!!"

फुलवा ने चिराग की बाजू को छू लिया और अचानक अपना हाथ पीछे खींच लिया।
फुलवा बात बदलते हुए, "चलो, तुम्हें 8 बजे तयार होकर मोहनजी से मिलना है! ऐसा ना हो की मां की बुरी संगत में एक दिन में बिगड़ जाओ!"
चिराग ने फुलवा का हाथ पकड़ कर उसे रोका।
चिराग, "मां, आप कोई बुरी संगत नहीं हो! आप मजबूर थी!!"
चिराग नाश्ता कर नहाने चला गया। फिर तयार होकर, फुलवा के पैर छू कर पौने आठ बजे मोहनजी से मिलने घर से चला गया। फुलवा अकेली बैठी तो उसका मन कई दिशाओं में भागने लगा।
फुलवा सोचने लगी की औरतें अपने खाली समय में क्या करती होंगी? क्या वह बार बार वही सफाई करती होंगी या आते जाते हर मर्द से चुधवाती होंगी?

दरवाजे पर दस्तक हुई और फुलवा जैसे सपने में से जाग गई।
दरवाजे में एक बेहद खूबसूरत औरत खड़ी थी। फुलवा ने उसे अंदर बुलाते हुए अपने कपड़े ठीक किए।

औरत, "जी, मेरा नाम सत्या है और मैं मोहनजी की पत्नी हूं। कल आप के आने की खबर मिली तो सोचा की आप से मिल लूं।"
फुलवा समझ गई कि यह औरत डरी हुई थी। उसे डर था की उसका प्यार उस से ऊब कर किसी पेशेवर औरत की बाहों में ना चला जाए। फुलवा ने सत्या की तारीफ करते हुए उसका डर भगाया और उस से दोस्ती भी की।
सत्या ने बताया की अमीर औरतें (अब फुलवा भी उनमें से एक थी) अपना वक्त काटने के लिए किट्टी पार्टी करती हैं जहां खाने के साथ शराब और जवान लड़के भी होते हैं। फुलवा ने इस सुझाव को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि वह अपने जिस्म की बिक्री से सिख कर अब दूसरे का जिस्म खरीदने जैसे घटिया हरकत नही कर सकती।

सत्या मुस्कुराई और बोली कि फिर फुलवा अपना वक्त समाज सेवा में लगाए। फुलवा इस बात पर सहमत हुई और दोनों नई सहेलियों ने कई घंटों तक बातें की।
सत्या ने फुलवा को नए फैशन के कपड़े पहनना, सही तरीके से खाना, चलना और बोलना सिखाया। फुलवा ने सत्या को मर्दों के बदन के वह राज़ बताए की सत्या का चेहरे शर्म से लाल और धड़कनें तेज हो गई।
शाम को जब चिराग घर लौट रहा था तब उसके मन में एक अजीब कशमकश थी। उसे मोहन के साथ अच्छा काम करने नाज़ था और अपनी बरसों बाद मिली मां को सब बताने की चाह भी थी। लेकिन साथ ही उसे अपनी मां को देख कर अपने अंदर बनते आकर्षण से डर लग रहा था। चिराग को डर था की वह गलती से अपनी मां को उसकी अतीत की यादों से जोड़ कर अपने से दूर कर देगा।
चिराग ने घर के आंगन में देखा और देखता रह गया। फुलवा पीले रंग की साड़ी पहन कर बागीचे के पौधों को देख रही थी। राह चलते दो लोग फुलवा को देख उसे अलग अलग बातों में अपनी ओर आकर्षित करने की कोशिश कर रहे थे।

फुलवा नीचे पड़ा एक फूल उठाने के लिए झुकी और दोनों की आंखें मानो बाहर निकल आईं। चिराग के अंदर से एक जंगली जानवर गुर्राया और वह आगे बढ़ा।
फुलवा, "ओह, वो देखो! मेरा बेटा आ गया!"
दोनों मर्दों ने स्कूली बच्चे के लिए नीचे देखा और उन्हें चिराग के पैर नजर आए।
चिराग ने हक्क जताते हुए फुलवा को गले लगाकर, "मां, आप को ऐसे मेरा इंतजार करने की कोई जरूरत नहीं थी। अब मैं स्कूल में नहीं, काम करने जाता हूं!"
फुलवा मुस्कुराकर, "बेटा ये अच्छे लोग मुझे बता रहे थे की यहां अच्छी फिल्में कहां लगती हैं। क्यों न हम इस हफ्ते एक फिल्म देख कर आएं?"
चिराग को अपनी मां की होशियारी पर हंसी और गुस्सा आ रहा था। हंसी इस लिए की उसने दोनों लट्टू मर्दों को सफाई से घुमाकर फेंक दिया। गुस्सा इस लिए की कहीं अंदर से एक मर्दाना जानवर अपनी मादा को बांटने के खिलाफ था।
चिराग ने फुलवा की हंसी से खिलखिलाती हुई आंखें देखी और उसके अंदर से एक गुर्राती हुई आवाज आई,
"मेरी!!!."
चिराग ने रात भर फुलवा के कमरे से सिसकियां और आहें भरने की आवाज़ें सुनी। चिराग ने फुलवा को वक्त देकर नए हालत से जुड़ने का मौका देना सही समझा।
सुबह 6 बजे चिराग उठ कर बाहर आया तो फुलवा किचन की मेज से लगी कुर्सी पर बैठ कर चाय पी रही थी। फुलवा का भरा हुआ बदन satin की महीन परत ओढ़े अपना हर उठाव हर कसाव दिखा रहा था। चिराग अपने इन विचारों को रोक कर गले की खराश की आवाज कर अपने आने की खबर फुलवा को देने में कामयाब हुआ।

फुलवा मुस्कुराकर, "अरे बेटा, तुम उठ गए! आओ बैठो मैंने हमारे लिए चाय बनाई है।"
फुलवा ने अपनी कुर्सी पर चिराग को बिठाया और चाय गरम करने के लिए बर्तन गैस पर रखा। Satin gown के आगे का हिस्सा खुल गया और फुलवा के गले से नाभि तक का हिस्सा साफ दिखने लगा।

चिराग का गला सुख गया और उसके मुंह से कुछ अजीब आवाज निकली।

फुलवा अपने गाउन को सीधे करते हुए, "माफ करना बेटा! मुझे परिवार के साथ रहने का तजुर्बा नही!"
चिराग ने बात बदलते हुए, "मैं समझ सकता हूं! हम बिलकुल अलग तरह से जिए हैं। आप बताओ की आप कैसे रहती थीं?"

फुलवा ने चाय को कप में भरते हुए, "वैसे तो हम सब औरतें ही थी। इस लिए हम सब सिर्फ ब्लाउज और साया पहनती थी। रात 8 बजे का पहला ग्राहक हमारा ब्लाउज खोल कर साया उठाता। फिर सुबह 6 बजे हम ब्लाउज बंद कर साया गिरा देती। आम तौर पर बीस से पच्चीस ग्राहक मिलते थे। अगर किसी रात धंधा कम हुआ तो हमें सिर्फ दस ग्राहक मिलते। खास मौकों पर एक रात में चालीस से पैतालीस ग्राहक मिलते ही थे।"

चिराग, "दस से चालीस ग्राहक कितनी औरतों के लिए?"
फुलवा अपने सर को झुकाकर, "हर एक को!"
चिराग ने फुलवा के हाथ पर हाथ रखा और उसे धीरज बंधाया।
फुलवा ने पतली मुस्कुराहट से, "तो सुबह हम में कुछ करने की ताकत नहीं होती। सुबह 6 बजे कोठे का दरवाजा बंद होने के बाद हमें चाय मिलती। फिर हम सब एक साथ नहाती और सब को काम मिलते। नाश्ता बना, खाना पकाना, साफ सफाई करना।"

फुलवा ने नीचे की अलमारी में से कुछ बिस्कुट निकाले और उन्हे एक छोटी थाली में रखा। झुकते हुए फुलवा की गदराई गांड़ के मोहक दर्शन से चिराग की जवानी तड़प उठी।

फुलवा चिराग के सामने बैठ कर चाय बिस्कुट खाते हुए, "दिन भर के कामों के बाद शाम को हमें हल्का खाना मिलता। ग्राहकों को मोटी रंडियां पसंद नहीं आती। फिर हम सब नहाकर अपने बदन पर सुगंध लगाती और चटाई पर लेट जाती। रात को 8 बजे कोठे का दरवाजा खुलता और रंडीखाने में नया दिन शुरू होता।"
फुलवा ने चिराग को देख कर बहादुरी से मुस्कुराया, "मेरी बात छोड़ो, अपनी बताओ!"

चिराग, "अधिकारी सर ने मुझे कड़े अनुशासन में पला और बढ़ाया। रोज सुबह 5 बजे उठने के बाद एक घंटे की कसरत, फिर नाश्ता। नहा धोकर सुबह 7 बजे स्कूल जाना। स्कूल से लौटने के बाद स्कूल की पढ़ाई, घर की पढ़ाई। अधिकारी सर ने मुझे घर के काम भी करना सिखाया ताकि मैं किसी औरत का बोझ ना बनूं!"
फुलवा ने मुस्कुराकर चिराग के हाथ पर अपना हाथ रखा।
चिराग, "रात को 10 बजे बत्ती बंद कर सोना जरूरी था। अधिकारी सर के जाने के बाद भी मैने यही दिनचर्या रखी। बस अब स्कूल की जगह मैं सुबह 9 बजे से 4 बजे तक लैपटॉप पर काम करता हूं।"
फुलवा, "मेरा बेटा कितना अच्छा है!!"

फुलवा ने चिराग की बाजू को छू लिया और अचानक अपना हाथ पीछे खींच लिया।
फुलवा बात बदलते हुए, "चलो, तुम्हें 8 बजे तयार होकर मोहनजी से मिलना है! ऐसा ना हो की मां की बुरी संगत में एक दिन में बिगड़ जाओ!"
चिराग ने फुलवा का हाथ पकड़ कर उसे रोका।
चिराग, "मां, आप कोई बुरी संगत नहीं हो! आप मजबूर थी!!"
चिराग नाश्ता कर नहाने चला गया। फिर तयार होकर, फुलवा के पैर छू कर पौने आठ बजे मोहनजी से मिलने घर से चला गया। फुलवा अकेली बैठी तो उसका मन कई दिशाओं में भागने लगा।
फुलवा सोचने लगी की औरतें अपने खाली समय में क्या करती होंगी? क्या वह बार बार वही सफाई करती होंगी या आते जाते हर मर्द से चुधवाती होंगी?

दरवाजे पर दस्तक हुई और फुलवा जैसे सपने में से जाग गई।
दरवाजे में एक बेहद खूबसूरत औरत खड़ी थी। फुलवा ने उसे अंदर बुलाते हुए अपने कपड़े ठीक किए।

औरत, "जी, मेरा नाम सत्या है और मैं मोहनजी की पत्नी हूं। कल आप के आने की खबर मिली तो सोचा की आप से मिल लूं।"
फुलवा समझ गई कि यह औरत डरी हुई थी। उसे डर था की उसका प्यार उस से ऊब कर किसी पेशेवर औरत की बाहों में ना चला जाए। फुलवा ने सत्या की तारीफ करते हुए उसका डर भगाया और उस से दोस्ती भी की।
सत्या ने बताया की अमीर औरतें (अब फुलवा भी उनमें से एक थी) अपना वक्त काटने के लिए किट्टी पार्टी करती हैं जहां खाने के साथ शराब और जवान लड़के भी होते हैं। फुलवा ने इस सुझाव को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि वह अपने जिस्म की बिक्री से सिख कर अब दूसरे का जिस्म खरीदने जैसे घटिया हरकत नही कर सकती।

सत्या मुस्कुराई और बोली कि फिर फुलवा अपना वक्त समाज सेवा में लगाए। फुलवा इस बात पर सहमत हुई और दोनों नई सहेलियों ने कई घंटों तक बातें की।
सत्या ने फुलवा को नए फैशन के कपड़े पहनना, सही तरीके से खाना, चलना और बोलना सिखाया। फुलवा ने सत्या को मर्दों के बदन के वह राज़ बताए की सत्या का चेहरे शर्म से लाल और धड़कनें तेज हो गई।
शाम को जब चिराग घर लौट रहा था तब उसके मन में एक अजीब कशमकश थी। उसे मोहन के साथ अच्छा काम करने नाज़ था और अपनी बरसों बाद मिली मां को सब बताने की चाह भी थी। लेकिन साथ ही उसे अपनी मां को देख कर अपने अंदर बनते आकर्षण से डर लग रहा था। चिराग को डर था की वह गलती से अपनी मां को उसकी अतीत की यादों से जोड़ कर अपने से दूर कर देगा।
चिराग ने घर के आंगन में देखा और देखता रह गया। फुलवा पीले रंग की साड़ी पहन कर बागीचे के पौधों को देख रही थी। राह चलते दो लोग फुलवा को देख उसे अलग अलग बातों में अपनी ओर आकर्षित करने की कोशिश कर रहे थे।

फुलवा नीचे पड़ा एक फूल उठाने के लिए झुकी और दोनों की आंखें मानो बाहर निकल आईं। चिराग के अंदर से एक जंगली जानवर गुर्राया और वह आगे बढ़ा।
फुलवा, "ओह, वो देखो! मेरा बेटा आ गया!"
दोनों मर्दों ने स्कूली बच्चे के लिए नीचे देखा और उन्हें चिराग के पैर नजर आए।
चिराग ने हक्क जताते हुए फुलवा को गले लगाकर, "मां, आप को ऐसे मेरा इंतजार करने की कोई जरूरत नहीं थी। अब मैं स्कूल में नहीं, काम करने जाता हूं!"
फुलवा मुस्कुराकर, "बेटा ये अच्छे लोग मुझे बता रहे थे की यहां अच्छी फिल्में कहां लगती हैं। क्यों न हम इस हफ्ते एक फिल्म देख कर आएं?"
चिराग को अपनी मां की होशियारी पर हंसी और गुस्सा आ रहा था। हंसी इस लिए की उसने दोनों लट्टू मर्दों को सफाई से घुमाकर फेंक दिया। गुस्सा इस लिए की कहीं अंदर से एक मर्दाना जानवर अपनी मादा को बांटने के खिलाफ था।
चिराग ने फुलवा की हंसी से खिलखिलाती हुई आंखें देखी और उसके अंदर से एक गुर्राती हुई आवाज आई,
"मेरी!!!."





