अगले 2 दिन जगदीश राय का बुरा हाल था। आशा की गांड और पुंछ उसके दिमाग से निकल ही नहीं रहा था।
जब भी आशा सामने से गुज़रती, जगदीश राय उसके गांड को ताकता रहता। इस उम्मीद में की पुंछ दिख जाये।
आशा भी यह सब समझती थी और अपने आदत से मजबूर, अपने गांड को और मटका कर चल देती।
आज का दिन भी कुछ ऐसा ही था। आशा, एक छोटी स्कर्ट पहनी, किचन में खड़ी , सब्जी काट रही थी।
सशा अपने कमरे में गाना सुन रही थी।
और जगदीश राय हॉल मैं बैठे , पेपर पढ़ रहा था, या यु कहे, पढने की कोशिश कर रहा था।
वह हॉल में बैठे , अपने बेटी की गांड को निहार रहा था। सामने उसकी बेटी, एक टाइट टॉप और छोटी स्कर्ट पहनी हुई थी।
टाइट टॉप में से निप्पल साफ़ दिख रही थी। और स्कर्ट उसके गांड को और भी मादक बना रहा था।
और अपने पापा के सामने , गांड में २ इंच का पुंछ घुसाए उसकी बेटी खड़ी सब्जियां काट रही थी।
जगदीश राय (मन में): क्या उसने पुंछ घुसायी होगी आज भी.।खडे रहने से लगता तो नहीं.।उसने कहा तो था की कभी कभार वह पुंछ को नहाती वक़्त धोती और सुखती है। और तब नही पहनती.।और अभी वह नहाकर खड़ी है.
जगदीश राय , को यह जानने की उत्सुक्ता , पागल कर रही थी।
और वह अपने सोफे पर करवटें बदल रहा था। वह उठकर, डाइनिंग टेबल पर बैठ गया।
थोड़ी देर बाद आशा , थोड़ी मूली लेकर आई
आशा: पापा.।आप इन्हे काट देंगे प्लीज.
और डाइनिंग टेबल पर टेकते हुयी, मूली की प्लेट रख दी।
उसने अपने गांड को इस तरह पीछे धकेला , मानो अपने पापा को दावत दे रही हो।
जगदीश राय से रहा नहीं गया , और उसने तुरंत गांड पर हाथ रख दिया। और पुंछ टटोलने लगा। आशा हँस पडी।
आशा : हे हे
जगदीश राय पूँछ को अपने हाथो में पाते ही , चौक भी गया और ख़ुशी भी हुई। उसने ज़ोर से पूँछ को पकड़ कर, बाहर की तरफ खींच दिया।
आशा: अअअअअ.पापा.क्या.
और अगले ही मिनट में ज़ोर से उसे अंदर ढकेल दिया।
आशा: ओहः।।।।मम.आज कल आप बहोत नॉटी हो रहे हो. चलिये मूली पे ध्यान दीजिये.
जगदीश राय पूरा गरम होकर लाल हो गया था। और आशा को अपने पापा का यह उतावला पन बहोत भा गया।
जब भी आशा सामने से गुज़रती, जगदीश राय उसके गांड को ताकता रहता। इस उम्मीद में की पुंछ दिख जाये।
आशा भी यह सब समझती थी और अपने आदत से मजबूर, अपने गांड को और मटका कर चल देती।
आज का दिन भी कुछ ऐसा ही था। आशा, एक छोटी स्कर्ट पहनी, किचन में खड़ी , सब्जी काट रही थी।
सशा अपने कमरे में गाना सुन रही थी।
और जगदीश राय हॉल मैं बैठे , पेपर पढ़ रहा था, या यु कहे, पढने की कोशिश कर रहा था।
वह हॉल में बैठे , अपने बेटी की गांड को निहार रहा था। सामने उसकी बेटी, एक टाइट टॉप और छोटी स्कर्ट पहनी हुई थी।
टाइट टॉप में से निप्पल साफ़ दिख रही थी। और स्कर्ट उसके गांड को और भी मादक बना रहा था।
और अपने पापा के सामने , गांड में २ इंच का पुंछ घुसाए उसकी बेटी खड़ी सब्जियां काट रही थी।
जगदीश राय (मन में): क्या उसने पुंछ घुसायी होगी आज भी.।खडे रहने से लगता तो नहीं.।उसने कहा तो था की कभी कभार वह पुंछ को नहाती वक़्त धोती और सुखती है। और तब नही पहनती.।और अभी वह नहाकर खड़ी है.
जगदीश राय , को यह जानने की उत्सुक्ता , पागल कर रही थी।
और वह अपने सोफे पर करवटें बदल रहा था। वह उठकर, डाइनिंग टेबल पर बैठ गया।
थोड़ी देर बाद आशा , थोड़ी मूली लेकर आई
आशा: पापा.।आप इन्हे काट देंगे प्लीज.
और डाइनिंग टेबल पर टेकते हुयी, मूली की प्लेट रख दी।
उसने अपने गांड को इस तरह पीछे धकेला , मानो अपने पापा को दावत दे रही हो।
जगदीश राय से रहा नहीं गया , और उसने तुरंत गांड पर हाथ रख दिया। और पुंछ टटोलने लगा। आशा हँस पडी।
आशा : हे हे
जगदीश राय पूँछ को अपने हाथो में पाते ही , चौक भी गया और ख़ुशी भी हुई। उसने ज़ोर से पूँछ को पकड़ कर, बाहर की तरफ खींच दिया।
आशा: अअअअअ.पापा.क्या.
और अगले ही मिनट में ज़ोर से उसे अंदर ढकेल दिया।
आशा: ओहः।।।।मम.आज कल आप बहोत नॉटी हो रहे हो. चलिये मूली पे ध्यान दीजिये.
जगदीश राय पूरा गरम होकर लाल हो गया था। और आशा को अपने पापा का यह उतावला पन बहोत भा गया।