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Hindi Sex Kahani काला इश्क़!

update 70 (1)

ख़ुशी-ख़ुशी मैं बस से उतरा और अपने बचपन के हसीन दिन याद करता हुआ घर की ओर चल पड़ा| साड़ी पुरानी सुखद यादें ताज़ा हो चुकीं थीं और घरवालों से मिलने की बेचैनी बढ़ती जा रही थी| घर पहुँचा और दरवाजा खटखटाया तो ताऊ जी ने दरवाजा खोला| मुझे देखते ही उनकी आँखिन नम हो गईं, मैंने झुक कर उनके पाँव छुए और उन्होंने तुरंत मुझे अपने गले लगा लिया| रोती हुई आवाज में वो बस इतने बोले; "तेरी माँ...." इतना सुनते ही मेरे मन की ख़ुशी गायब हो गई और डर सताने लगा की कहीं उन्हें कुछ हो तो नहीं गया| मैं तुरंत माँ के कमरे की तरफ दौड़ा वहाँ जा के देखा तो माँ लेटी हुई थी और पिताजी उनकी बगल मैं बैठे थे| जैसे ही माँ की नजर मुझ पर पड़ी उन्होंने मुझे गले लगाने को तुरंत अपने हाथ खोल दिए, मैंने अपना बैग बाहर ही छो कर अंदर आया और माँ के गले लग गया| माँ का शरीर कमजोर हो गया था पर अब भी उनके कलेजे में वो तपिश थी जो पहले हुआ करती थी| माँ ने रोना शुरू कर दिया और मैं भी खुद को रोने से ना रोक पाया| पिताजी जो अभी तक सर झुका कर बैठे थे मुझे देखते ही उठ खड़े हुए और शर्म से उनका सर झुक गया, पीछे ताई जी, ताऊ जी और भाभी भी चुप-चाप आ कर खड़े हो गए| सभी की आंखें भीगी हुई थीं पर मेरा ध्यान अभी सिर्फ और सिर्फ मेरी माँ पर था| माँ ने रोती हुई आवाज में कहा; "मुझे माफ़ कर दे बेटा!" पर मैं उन के मुँह से कुछ नहीं सुनना चाहता था क्योंकि वो बहुत बीमार थीं इसलिए मैं ने उनको आगे कुछ बोलने का मौका ही नहीं दिया| "बस माँ... सब भूल जाओ!" मैंने कहा और जब मैं उनके पास से उठा तो मैंने सब को अपने पीछे खड़ा पाया| सबसे पहले ताई जी आगे आईं और मैंने उनके पाँव छुए और उन्होंने मुझे अपने गले लगा लिया| "बेटा....माफ़ कर दे....!" ताई जी ने रोते-रोते कहा| "छोडो ताई जी!" मैंने बस इतना ही कहा| उसके बाद भाभी भी मेरे गले लग गईं और मुझे उनके पाँव छूने का मौका ही नहीं दिया| "मानु भैया! मुझसे भी नराज हो!" भाभी ने रोते-रोते कहा| मैंने धीरे से कहा; "भाभी आपने तो कुछ किया ही नहीं?" फिर नजर पिताजी पर पड़ी जो सर झुकाये खड़े थे, मैं उनके पास पहुंचा और उनके पाँव छूने को झुका तो उन्होंने सीधा मुझे अपने गले लगा लिया और फूट-फूट के रोने लगे| "बेटा...मेरे पास अलफ़ाज़ नहीं कुछ कहने को....मैंने अपने ही बेटे को धक्के मार कर घर से निकाला, उसके मुँह पर दरवाजा बंद कर दिया! मुझे तो मर जाना चाहिए!" पिताजी रोते हुए बोले| "बस पिताजी...आपको पूरा हक़ है!" मैंने कहा और खुद को रोने से रोका| जब मैं वापस पलटा तो ताऊ जी बोले; "बेटा तू क्या गया घर से, इस घर की किस्मत ने हम से मुँह मोड़ लिया! तेरे साथ जो हमने किया उसी के कारन हम लोगों पर मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा! 8 जुलाई को कुछ हमलावर लोग उसके ससुराल में घुस आये और इसके सास-ससुर और पति को जान से मर दिया| वो तो शुक्र है की उसने खुद को घर के गुसल खाने में छुपा लिया था वर्ण वो लोग इसे भी मार देते! पूरा का पूरा खानदान खत्म हो गया! पुलिस का चक्कर हुआ और चार महीने तक हमें इसी घर में कैद रखा गया ताकि कहीं हम लोगों पर भी हमला ना हो जाए| इन चार महीनों में सारा खेती-बाड़ी का काम खराब हो गया, फिर तेरी माँ ने अन्न-जल त्याग दिया और कहने लगी जब तक मेरा बेटा नहीं आ जाता तब तक मैं कुछ नहीं खाऊँगी! तब मैंने तुझे फ़ोन किया! और तुम लोग जानते हो, मैंने बस इतना कहा की बेटा घर आजा और इसने एक शब्द नहीं कहा और सीधा घर आगया! इसके मन में हम में से किसी के लिए दिल में कोई मलाल नहीं और हमने ऐसे फ़रमाबरदार लड़के के साथ जो सलूक किया ये सब उसकी का फल है!" ताऊ जी बोले|

"ताऊ जी जो हुआ सो हुआ! आप सब मेरा परिवार हो और अगर आपने मुझे घर से निकाला भी तो क्या हुआ? आपको पूरा हक़ था!" मैंने अपने आँसू पोछते हुए कहा| तभी पीछे छुपी हुई रितिका सामने आई, आँखें आंसुओं से लाल, काली साडी पहने हुए और आ कर सीधा मेरे गले लग गई| मेरे जिस्म को ऐसा लगा जैसे की किसी काले साये ने मुझे दबोच लिया हो, मैंने तुरंत उससे खुद से अलग कर दिया| सब ने मेरा ये बर्ताव देखा और ताई जी बोलीं; "माफ़ कर दे इसे बेटा! इस बेचारी ने बहुत कुछ सहा है!"

"कभी नहीं ताई जी! इसे तो मरते दम तक माफ़ नहीं करूँगा! इसके कारन मुझे मेरे ही घर से मेरे ही परिवार ने निकाल दिया और ये खड़ी चुप-चाप सब देखती रही| आपको याद है न इसके बचपन के दिन, जब आप सब इसे डाँटा और झिड़का करते थे? तब मैं इसे बचाता था और उस दिन इसके मुँह से एक शब्द नहीं फूटा!" ये सुन कर सब का सर झुक गया, मेरे दिल में आग तो इस बात की लगी थी की इस लड़की ने मुझे अपने प्यार के जाल में फंसा कर मेरा इस्तेमालक किया पर वो मैं कह नहीं सकता था| इसलिए मैंने बात को नया मोड़ दिया था| अब मैं अपने परिवार को और दुखी नहीं देखना चाहता था और ऊपर से मुझे माँ की भी चिंता थी; "ताऊ जी मैं जा कर डॉक्टर को ले आता हूँ|" इतना कहते हुए मैं बाहर निकला और कुछ दूरी पर पहुँच कर मैंने अनु को फ़ोन मिलाया और उसे सारी बात बताई| माँ की हालत खराब सुन वो आने की जिद्द करने लगी पर मैंने उसे समझाया की ये समय ठीक नहीं है| एक बार उनकी तबियत ठीक हो जाए मैं उन्हें सब कुछ बता दूँगा और तब अनु को माँ से मिलवाऊँगा|

"ऋतू के साथ ....." आगे अनु कुछ कह पाती उससे पहले मैंने उसकी बात बीच में काट दी; "ऋतू नहीं रितिका! दुबारा ये नाम कभी अपनी जुबान पर मत लाना! मैं ये नहीं कहूंगा की जो हुआ वो अच्छा हुआ पर मुझे उससे घंटा कोई फर्क नहीं पड़ा! जब उसकी बला से मैं जीऊँ या मरुँ तो मेरी बला से वो जिये या मरे!" मैंने गुस्से से कहा|

"ok ...ok ... calm down! इस वक़्त तुम्हें घर को संभालना है, कहीं इतना गुस्सा कर के खुद बीमार न पड़ जाना|" अनु ने कहा| कॉल काट कार मैं कुछ दूर आया हूँगा की मुझे संकेत मिल गया| उसने अपनी बाइक रोकी और उतर कर मेरे गले लग कर रोने लगा| "भाई....." इसके आगे वो कुछ नहीं बोला| "देख मैं आ गया हूँ तो सब कुछ ठीक हो जायेगा| वैसे ये बता की घडी कैसी लगी?" मैंने बात बदलते हुए कहा| उसने तुरंत मुझे अपना हाथ दिखाया जिसमें उसने घडी पहनी हुई थी| "अब लग रहा है न तू हीरो!" मैंने हँसते हुए कहा| उसने पुछा की मैं कहाँ जा रहा हूँ तो मैंने उसे बताया की डॉक्टर को लेने तो वो बोला की मेरी बाइक ले जा| उसकी बाइक ले कर मैं फ़ौरन डॉक्टर के पहुँचा और उन्हें माँ का हाल बताया, जो-जो जर्रूरी था वो सब ले कर हम घर आये| डॉक्टर ने माँ को देखा और दवाइयां लिखीं, IV चढ़ाया और फिर मैं उसे छोड़ कर आ गया| शाम होने को आई थी और अभी तक किसी ने कुछ नहीं खाया था| तभी मुझे याद आया की चन्दर तो यहाँ है ही नहीं? "ताऊ जी चन्दर भैया कहा हैं?" मैंने पुछा तो उन्होंने कहा; "बेटा 4 महीने पुलिस का सख्त पहरा था और वो किसी को भी बाहर जाने नहीं देती थी, अब तू तो जानता ही है की चन्दर को नशे की लत है| उससे ये सब बर्दाश्त नहीं हो रहा था और उसकी हालत दिन पर दिन खराब होती जा रही थी| तब तेरी भाभी ने बताया की जाने से पहले तूने कहा था की उसे नशा मुक्ति केंद्र ले जाय जाए| इसलिए हम ने उसे वहाँ भर्ती कराया है और ईश्वर की कृपा से अब उसमें बहुत सुधार है|"

ये जान कर ख़ुशी हुई की अब चन्दर सुधर जाएगा| पकोड़े बन कर आये और मैंने माँ को अपने हाथ से खिलाये, नवंबर का पहला हफ्ता था तो सर्द हवाएँ चल रहीं थीं| सब माँ-पिताजी के कमरे में ही बैठे थे सिवाय रितिका के! "तो बेटा तू इतने दिन था कहा पर?" माँ ने पुछा|

"माँ पहले तो मैं बैंगलोर गया था जहाँ मैंने एक दोस्त की कंपनी में काम शुरू किया| उसने मुझे अपनी कंपनी में पार्टनर बनाया, मैंने इतने साल जो भी कमाया था वो मैंने उसके बिज़नेस में लगा दिया, फिर उसी के साथ मैं अमेरिका गया और वहाँ नया काम सीखा और हम वापस बैंगलोर आ गए| नया काम मिला और हम दोनों ने मिल कर काम बहुत फैलाया बाकी आप सब का आशीर्वाद है की बिज़नेस अच्छा चल रहा है|" मैंने कहा पर मैंने जानबूझ कर उन्हें अनु के बारे में कुछ नहीं बताया|

"अरे फिर तो तूने अमरीका में गाय-गोरु, सूअर, मछली, सांप, केकड़े और पता नहीं क्या क्या खाया होगा?" ताई जी ने नाक सिकोड़ते हुए कहा|

"नहीं ताई जी... मैं उन दिनों बीमार था और बाहर का खाना नहीं खा सकता था|वहाँ जा कर मैंने सलाद या फिर एक भारतीय रेस्टुरेंट था जहाँ मैं दाल-रोटी ही खाता था|" मैंने हँसते हुए कहा, क्योंकि मेरे परिवार को अब भी लगता था की बाहर सब यही खाते हैं!

"तुझे हुआ क्या था उन दिनों? तू एक दम से सूख गया था! वो तो हम लोग शादी-ब्याह के काम में लगे थे इस करके पूछना भूल गए!" पिताजी ने पुछा|

"कुछ नहीं पिताजी....जब सपने टूटते हैं तो इंसान थोड़ा टूट ही जाता है!: ये शब्द अपने आप ही निकल पड़े जिसे रितिका ने सब के बर्तन उठाते हुए सुना और फिर चली गई|

"क्या मतलब?" ताऊ जी ने पुछा|

"जी वो...मेरी जॉब छूट गई थी! मैं मन ही मन घर लेने की तयारी कर रहा था ...तो..." मैंने बात को जैसे-तैसे संभाला|

'पर बेटा ऐसा था तो तूने हमें क्यों कुछ नहीं बताया? पिताजी बोले|

"क्या बताता पिताजी? वो हालत आप सब से देखि नहीं जाती..... बिलकुल चन्दर भैया जैसी हालत थी मेरी..... मौत के कगार पर पहुँच गया था मैं! अगर मेरा दोस्त नहीं होता और मुझे नहीं संभालता तो मैं मर ही जाता!| मैंने उन्हें सच बता दिया पर अनु का नाम अब भी नहीं बताया था| इधर सब के सब हैरानी से मुझे देख रहे थे|

"तू शराब पीटा है?" ताऊ जी ने कहा|

"ताऊ जी इतने साल शहर में रहा, कभी-कभी जब टेंशन ज्यादा होती तो पी लेता था पर कण्ट्रोल में पीता था, पर उन दिनों काबू से बाहर हो गई!" मैंने शर्म से सर झुकाते हुए कहा|

"तो तू अब भी पीता है?" माँ ने पुछा|

"माँ मैं जिस माहौल में काम करता हूँ उसमें कभी-कभी कोई ख़ुशी मनानी होती है तो थोड़ा बहुत होता है|" मैंने कहा|

"देख बेटा हम सब के लिए तू ही एक सहारा है और तू ऐसा कुछ ना कर की...." आगे बोलने से पहले माँ की आँखें गीली हो गईं|

"माँ मैं वादा करता हूँ की मैं ऐसा कभी कुछ नहीं करूँगा!"

"अब तेरा बिज़नेस भी चल पड़ा है, तो शादी कर ले!" पिताजी बोले|

"बिलकुल पिताजी....पर पहले माँ तो ठीक हो जाए!" मैंने उत्साह में आते हुए कहा|

"तूने इतना कह दिया, मेरी आधी तबियत ठीक हो गई!" माँ ने कहा और सारे लोग हँस पड़े| रात का खाना मैंने माँ को अपने हाथ से खिलाया तो माँ बोली; "देख कितनी नसीब वाली हूँ मैं, पहले मैं तुझे खिलाती थी और आज तू मुझे खिला रहा है!" मैं ये सुन कर मुस्कुरा दिया| उन्हें अच्छे से खाना खिला कर मैंने भी उनके सामने बैठ कर खाना खाया और फिर उन्हें दवाई दी| माँ के सोने तक मैं उनके पाँव दबाता रहा और फिर अपने कमरे में आ कर पलंग पर सर झुका कर बैठ गया| मैं सोच रहा था की माँ जल्दी से तंदुरुस्त हो जाएँ तो मैं उन्हें अनु से मिलवाऊँ! पर एक ही दिक्कत है, रितिका! अभी उसका नाम लिया ही था की एक काला साया मेरे कमरे की चौखट पर खड़ा हो गया|

"आपकी बद्दुआ लग गई मुझे! कहते हैं की सेक सच्चे आशिक़ को कभी दुःख नहीं देना चाहिए और मैंने उसका दिल तोडा था, तो मुझे सजा तो मिलनी ही थी!" रितिका मेरे नजदीक आई| उसने एक शाल ओढ़ रखी थी; "मैंने कभी राहुल को आपके और मेरे प्यार के बारे में कुछ नहीं बताया| कभी हिम्मत नहीं हुई उसे कुछ कहने की, वो सच्चा प्यार करता था मुझसे पर मैं उसे भी 'छलने' लगी! ऋतू ने अपनी शाल हटाई और उसकी गोद में एक नन्ही सी जान थी, उसने उसे मेरी तरफ बढ़ाया और बोली; "ये आपके प्यार की निशानी! इसे आपको सौंपने आई हूँ....! नेहा....वही नाम जो आप देना चाहते थे!" मैं एक टक उस दो महीने की बच्ची को देखने लगा, आँखें बंद किये हुए वो सो रही थी| पर सर्द हवा से उसकी नींद टूटने लगी थी, मैंने उसे तुरंत अपनी गोद में ले लिया और अपने सीने से लगा लिया| जिगर में जल रही नफरत की आग पर आज पानी बरसने लगा था!
 
update 70 (2)

सीने में जितनी भी जलन थी, अगन थी वो सब ठंडी हो रही थी! आँख बंद किये मैं उस आनंद के सागर में डूब गया..... मेरे सीने की तपन पा कर वो बची भी जैसे मुझ में अपने पापा को ढूँढ रही थी| मैंने उसे अपने सीने से अलग किया और उसके मस्तक को चूमा| अपने दाहिने हाथ से उसके गाल को सहलाया! आँखें जैसे प्यासी हो चली थीं और उसके मासूम चहरे से हटती ही नहीं थी| आज मैं खुद को दुनिया का सबसे खुशकिस्मत इंसान समझ रहा था! मेरा जीवन जैसे पूरा हो चूका था! आज तक सीने में बीएस एक आशिक़ का दिल धड़कता था पर आज से एक बाप का दिल धड़कने लगा था| मैंने एक बार फिर से उसके माथे को चूमा, दिवार का सहारा ले कर मैं बैठा और अपने ऊपर चादर दाल ली और वो चादर मैंने मेरी बेटी के इर्द-गिर्द लपेटी| कुछ इस तरह से की उसे गर्माहट मिले पर सांस भी पूरा आये| नेहा की छोटी सी प्यारी सी नाक... उसके छोटे-छोटे होंठ.... गुलाब जामुन से गुलाबी गाल... तेजोमई मस्तक.... उसके छोटे-छोटे हाथ .... मैं मंत्र मुग्ध सा उसे देखता ही रहा| धौंकनी सी चलती उसकी सांसें जैसे मेरा नाम ले रही थी.... उसके छोटे-छोटे पाँव जिनमें एक छोटी सी जुराब थी| वो पूरी रात मैं बस नेहा को निहारता रहा और एक पल के लिए भी अपनी आँखें नहीं झपकाईं! सुबह कब हुई पता नहीं, कौन आया और कौन गया मुझे जैसे कोई फर्क ही नहीं पद रहा था| आँखें बस उसी पर टिकी थीं और मैं उम्मीद करने लगा था की वो अभी अपने छोटे से मुँह से 'पापा' कहेगी! सुबह जब उसकी आँख खुली तो उसने मुझे देखा और मुझे ऐसा लगा जैसे की वो मुस्कुराई हो| मैंने उसके माथे को चूमा और उसने अपने नन्हे-नन्हे हाथ ऊपर उठा दिए| मैंने जब उन्हें पकड़ा तो उसने एक दम से मेरी ऊँगली पकड़ ली| "मेरा बच्चा उठ गया?" मैंने उसकी मोतियों जैसी आँखों में देखते हुए कहा| "मैं आपका पापा हूँ!" मैंने कहा और उसके गाल को हुमा और वो मुस्कुराने लगी| मैं उठा क्योंकि मन ने कहा की उसे दूध चाहिए होगा और नीचे आया| मेरी गोद में नेहा को देख ताई जी बोलीं; "मिल लिए?" तभी रितिका सामने आई और उसके चेहरे पर एक मुस्कान थी| ये मुस्कान इसलिए थी की मैं आज अपनी बेटी को पा कर बहुत खुश था| "जानता था तू नेहा की वजह से रितिका को माफ़ कर देगा!" ताऊ जी बोले| "माँ-बाप के किये की सजा बच्चों को कभी नहीं देते और फिर ये तो मेरी बेटी है, मैं भला इससे गुस्सा कैसे हो सकता हूँ|" मैंने नेहा का कमाता चूमते हुए कहा| उस पल एक बाप बोल रहा था और उसे कुछ फर्क नहीं पद रहा था की कोई क्या सोचेगा| अगर उस समय कोई मुझसे सच पूछता तो भी मैं सब सच बोल देते! मेरे मुँह से 'मेरी बेटी' सुन कर रितिका फिर से मुस्कुरा दी, वो सोच रही थी की मैंने उसे माफ़ कर दिया है| पर मेरा दिल उसके लिए अब पत्थर का बन चूका था! उसने मेरे हाथ से नेहा को लिया और युपर उसे दूध पिलाने चली गई| मैं इधर अपनी माँ के पास आया और उनका हाल-चाल पुछा| चाय पी और मेरा दिल फिर से नेहा के लिए बेकरार हो गया मैं उसे ढ़ुडंछ्ता हुआ ऊपर पहुँचा| रितिका ने उसे दूध पिलाना बंद किया था और वो अपने ब्लाउज का हुक बंद कर रही थी| मैं वहाँ रुका नहीं और छत पर चला गया| वो मेरे पीछे-पीछे नेहा को गोद में ले कर आई और फिर मेरी तरफ बढ़ाते हुए बोली; "आपकी लाड़ली!" मैंने उसकी तरफ देखा भी नहीं और मुस्कुराते हुए नेहा को अपनी जो में उठा लिया| मैं नेहा की पीठ सहलाते हुए छत पर घूमने लगा| फिर अचानक से मुझे याद आया की अनु को कॉल कर के खुशखबरी दे दूँ| मैंने तुरंत उसे कॉल मिलाया और कहा की जल्दी से वीडियो कॉल पर आओ| मैं छत पर पैरापिट वॉल से पीठ लगा कर नीचे बैठा| मेरी दोनों टांगें जुडी थीं और नेहा उसी का सहारा ले कर बैठी थी, इतने में अनु का वीडियो कॉल आ गया; "आपको पता है आज है ना, मैं हैं ना, आपको है ना एक प्याली-प्याली, गोलू-गोलू princess से मिलवाना है!" मैंने तुतलाते हुए कहा| मेरी ऐसी भाषा सुन कर अनु हँसने लगी और बोली; "अच्छा जी? मुझे भी मिलवाओ ना!" मैंने फ़ोन साइड में रखा और नेहा को अपने सीने से लगा कर बिठाया और फिर फ़ोन दुबारा उठाया| नेहा को देखते ही अनु बोल पड़ी; "ये प्यालि-पयाली छोटी सी गुड़िया कौन है?" नेहा भी फ़ोन देख कर मुस्कुराने लगी| "मेरी बेटी नेहा!" मैंने गर्व से कहा| ये सुन कर अनु को एक झटका लगा पर उसने ये बात जाहिर नहीं की और मुस्कुराते हुए कहा; "छो छवींट!" मैंने नेहा के सर को चूमा और तभी अनु ने पुछा; "माँ कैसी हैं अब?"

"कल IV चढ़ाया था और दवाइयाँ दी हैं| कल सब कह रहे थे की शादी कर ले, तो मैंने कहा की माँ की तबियत ठीक हो जाये फिर| वैसे मैंने सब को तुम्हारे बारे में थोड़ा-थोड़ा बता दिया है|"

"क्या-क्या बताया?" अनु ने उत्सुकता से पुछा|

"यही की तुम ने मुझे मरने से बचाया और फिर मुझे अपने बिज़नेस में भी पार्टनर बनाया, बस तुम्हारा नाम नहीं बताया!" मैंने कहा|

"हाय! कितना wait करना होगा!" अनु ने साँस छोड़ते हुए कहा|

"यार जैसे ही माँ ठीक हो जाएंगी मैं उन्हें सब कुछ बता दूँगा| तब तक मैं तुम्हारा परिचय मेरी बेटी से करा देता हूँ| बेटा (नेहा) ये देखो ...मैं है ना... इनसे है ना... शादी करने वाला हूँ! फिर ये है ना आपकी मम्मी होंगी!" मैंने तुतलाते हुए कहा| पर मेरी ये बात शायद अनु को ठीक नहीं लगी|

"तुम बुरा न मानो तो एक बात पूछूँ?" अनु बोली| उसी आवाज में गंभीरता थी इसलिए मैंने पूरा ध्यान नेहा से हटा कर अनु पर लगाया और हाँ में सर हिलाया| "Are you sure!" अनु ने डरते हुए कहा| ये डर जायज था क्योंकि अगर किसी बाप से पूछा जाए की ये उसका बच्चा है तो गुस्सा आना लाज़मी है|

"हाँ ये मेरा ही खून है! तुम तो जानती ही हो की रितिका के कॉलेज के दिनों में हम बहुत नजदीक आ गए थे और रितिका की लापरवाही की वजह से उसके पीरियड्स मिस हो गए! तब मैं उसे डॉक्टर के ले गया था और उन्होंने कहा था की वो physically healthy नहीं है इसलिए उस टाइम कुछ भी नहीं हो सकता था| उन्होंने उसे कुछ दवाइयां दी थीं ताकि वो अपनी pregnancy को delay करती रहे! शादी के बाद रितिका ने वो गोलियाँ खानी बंद कर दी होंगी!" मैंने कहा| अनु को विश्वास हो गया की ये मेरा ही बच्चा है पर अब मेरे दिल में एक सवाल पैदा हो चूका था; "अगर तुम बुरा ना मनो तो मैं एक सवाल पूछूँ?" मैंने कहा पर अनु जान गई थी की मैं क्या पूछने वाला हूँ और वो तपाक से बोली; "हाँ... मैं इस प्यारी सी गुड़िया को अपनाऊँगी और अपनी बेटी की तरह ही प्यार करूंगी!" इस जवाब को सुन मेरे पास अब कोई सवाल नहीं था और मुझे मेरा परिवार पूरा होता दिख रहा था| "thank you!" मैंने नम आँखों से कहा|

"Thank you किस बात का? अगर तुम मेरी जगह होते तो मना कर देते?" अनु ने मुझे थोड़ा डाँटते हुए कहा| मैंने अपने कान पकड़े और दबे होठों से सॉरी कहा| "नेहा देख रहे हो अपने पापा को? पहले गलती करते हैं और फिर सॉरी कहते हैं? चलो नेहा को मेरी तरफ से एक बड़ी वाली Kissi दो!" अनु ने हुक्म सुनाते हुए कहा| मैंने तुरंत नेहा के दाएँ गाल को चूम लिया, नेहा एक दम से मुस्कुरा दी| उसकी मुस्कराहट देख कर हम दोनों का दिल एक दम से ठहर गया| "अब तो मुझे और भी जल्दी आना है ताकि मैं मेरी बेटी को खुद Kissi कर सकूँ!" अनु ने हँसते हुए कहा| तभी नीचे से मुझे पिताजी की आवाज आई और मैं bye बोल कर नेहा को गोद में लिए नीचे आ गया| नाश्ता तैयार था तो रितिका ने नेहा को गोद में लेने को हाथ आगे बढाए, पर मैंने उसे कुछ नहीं कहा और नेहा को गोद में ले कर माँ के कमरे में आ गया| मेरा और माँ का नाश्ता ले कर पिताजी कमरे में ही आ गए| "अच्छा बीटा अब तो नेहा को यहाँ लिटा दे और नाश्ता कर ले|" पिताजी बोले पर मेरे पास उनकी बात का तर्क मौजूद था| "आज माँ मुझे खिलाएँगी!" मैंने कहा तो माँ ने बड़े प्यार से मुझे परांठा खिलाना शुरू किया और मैंने नेहा के साथ खेलना जारी रखा| नाष्ते के बाद मैंने माँ को दवाई दी और फिर उन्हीं के बगल में बैठ गया, क्या मनोरम दृश्य था! एक साथ तीन पीढ़ी, माँ के बगल में उनका बेटा और बेटे की गोद में उसकी बेटी!

कुछ देर बाद रितिका आई और चेहरे पर मुस्कान लिए बोली; "नेहा को नहलाना है!" अब मुझे मजबूरन नेहा को रितिका की गोद में देना पड़ा पर मेरा दिल बेचैन हो गया था| नेहा से एक पल की भी जुदाई बर्दाश्त नहीं थी मुझे! माँ सो चुकी थी इसलिए मैं एक दम से उठा और ताऊ जी से कहा की मैं बजार जा रहा हूँ तू उन्होंने एक काम बता दिया| मैं पहले संकेत के घर पहुँचा और उससे चाभी माँगी और बजार पहुँचा| वहां मैंने माँ के लिए फल लिए और अपनी बेटी के लिए कुछ समान खरीदने लगा| गूगल से जो भी जानकारी ले पाया था वो सब खरीद लिया, दिआपेरस, बेबी पाउडर, बेबी आयल, बेबी वाइप्स, एक सॉफ्ट टॉवल, एक छोटा सा बाथ टब और बहुत ढूंढने के बाद हीलियम गैस वाले गुब्बारे! सब समान बाइक के पीछे बाँध कर मैं घर पहुँचा| समान मुझसे उठाया भी नहीं जा रहा था इसलिए माने भाभी को आवाज दी और वो ये सब देख कर हँस पड़ी| सारा समान ले कर हम अंदर आये, फल आदि तो भाभी ने रसोई में रख दिए और बाकी का समान ले कर मैं माँ वाले कमरे में आ गया| ये सारा समान देख सब हँस रहे थे की मैं क्यों इतना सामान ले आया| नेहा आंगन में चारपाई पर लेटी थी, मैंने सब समान छोड़ कर पहले गुब्बारे उसके नन्हे हाथों और पैरों से बाँध दिए| वो हवा में उड़ रहे थे और नेहा अपने हाथ-पैर हिला रही थी, ऐसा लगता था मानो ख़ुशी से हँसना छह रही हो! सारा घर ये देख कर खुश था और हँस रहा था| मैंने फ़ौरन एक वीडियो बनाई और अनु को भेज दी! उसने जवाब में; "Awwwwwwwwwwww" लिख कर भेजा, फिर अगले मैसेज में बोली; "मुझे भी आना है अभी!" उसका उतावलापन जायज था पर मैं मजबूर था क्योंकि घर वालों को अभी इतना बड़ा झटका नहीं देना चाहत था| माँ अकेली कमरे में थीं तो मैंने उन्हें उठा कर बिठाया और उन्हें भी कमरे के भीतर से ही ये नजारा दिखाया| उन्होंने तुरंत कहा; "जल्दी से बच्ची को टिका लगा, कहीं नजर ना लग जाए!" ताई जी ने फ़ौरन नेहा को टीका लगा दिया| पूरा घर नेहा की किलकारियों से भर चूका था और आज बरसों बाद जैसे खुशियाँ घर लौट आई हों! दोपहर खाने के बाद मैं नेहा को अपने सीने से सटाये था और माँ की बगल में लेटा था| कुछ देर बाद नेहा उठ गई क्योंकि उसने सुसु किया था| मैंने पहले बेबी वाइप्स से उसे साफ़ किया, पॉउडर लगाया और फिर उसे डायपर पहनाया| फिर रितिका का कमरे से दूसरे कपडे निकाल कर पहनाया, रितिका हाथ बाँधे मुझे ऐसा करते हुए बस देखती रही और मुस्कुराती रही, पर मेरा ध्यान सिर्फ नेहा पर था| जब नेहा को भूख लगी तो मजबूररन मुझे उसे रितिका के हवाले करना पड़ा, पर मेरा मन जानता है की उस टाइम मुझे कितना बुरा लग रहा था| तभी अनु का फ़ोन आया और उसने मुझे किसी से बात करने को कहा| मैं अपना फ़ोन ले कर आंगन में बैठ गया और पार्टी से बात कर रहा था, सारी बात अंग्रेजी में हो रही थी और मुझे ये नहीं पता था की घर के सारे लोग मुझे ही देख रहे हैं| जब मेरी बात खत्म हुई तब मैंने देखा की सब मुझे ही देख रहे हैं और गर्व महसूस कर रहे हैं|

रात को रितिका ने दूध पिला कर नेहा को मुझे दे दिया, मैंने नेहा को फिर से अपनी छाती से चिपकाया और लेट गया| अपने ऊपर मैंने एक चादर डाल ली ताकि नेहा को सर्दी ना लगे| नींद तो आने से रही और ऐसा ही हाल अनु का भी था| उसने मुझे एक miss call मारी और मैंने तुरंत कॉल बैक किया और उससे बात करने लगा| जब से हमारी शादी की तारिख तय हुई थी हम दोनों रात को एक दूसरे के पहलु में ही सोते थे और अब तो ऐसी हालत थी की उसे मेरे बिना और मुझे उसके बिना नींद ही नहीं आती थी| देर रात तक हम बस ऐसे ही खुसर-फुसर करते हुए बातें करते रहे| अनु तकिये को अपने से दबा कर सो गई और मैंने अपनी बेटी नेहा को खुद से चिपका लिया और उसके प्यारे एहसास ने मुझे सुला दिया| सुबह 6 बजे ताई जी ने मेरे सर पर हाथ फेरा तब मैं उठा और उनके पाँव छुए! फिर सब के साथ चाय पी और नहाने का समय हुआ तो रितिका फिर से नेहा को लेने आ गई पर मैंने उसकी तरफ देखे बिना ही "नहीं" कहा और राजसी में पानी गर्म करने रख दिया| नेहा अब तक उठ गई और अब उसे शायद मेरी आदत हो गई थी इसलिए उसकी किलकारियाँ शुरू हो गईं| पानी गर्म करके मैंने उसे नेहा के लिए लाये हुए टब में डाला और फिर उसमें ठंडा पानी डाला और जब वो हल्का गुनगुना हो गया तब मैंने नेहा को उसमें बिठाया| पानी बिलकियल कोसा था इसलिए उसे ठंड नहीं लगी पर पानी का एहसास पाते ही उसने हिलना शुरू कर दिया| ताऊ जी, ताई जी, पिताजी, भाभी और रितिका सब देखने लगे की मैं कैसे नेहा को नहलाता हूँ| मैंने धीरे-धीरे पानी से उसे नहलाया और साबुन लगा कर अच्छे से साफ़ किया| फिर उसे तौलिये से धीर-धीरे साफ किया, अच्छे से तेल की मालिश की और फिर उसे कपड़े पहनाये| मैंने ये भी नहीं ध्यान दिया की सब घरवाले मुझे ही देख रहे हैं और मुस्कुरा रहे हैं| अच्छे से तेल-पाउडर लगा कर नेहा एक सुन्दर गुड़िया की तरह तैयार थी! मैंने खुद उसके कान के पीछे टीका लगाया और उसके माथे को चूमा फिर उसे अपने सीने से लगा कर मैं पलटा तो देखा सब मुझे देख रहे हैं; "चाचा जी, मानु की बीवी बड़ी किस्मत वाली होगी! उसे कुछ नहीं करना पड़ेगा, सब काम तो मानु कर ही लेता है|" भाभी बोलीं और सब हँस पड़े, जो नहीं हँसा था वो थी रितिका क्योंकि उसे अब एहसास हुआ था की उसने किसे खो दिया! उस दिन से नेहा मुझसे एक पल को भी जुड़ा नहीं होती थी, दिन में बस उसे मुझसे दूर तब ही जाना पड़ता जब उसे भूख लगती और पेट भरने के बाद वो सीधा मेरे पास आती| हफ्ता बीत गया और मेरा नेहा के लिए प्यार दिनों-दिन बढ़ता जा रहा था| हम दोनों बाप-बेटी एक दूसरे के बिना नहीं रह पाते!

सोमवार को ताऊ जी ने कहा की आज चन्दर भैया को लाने जाना है तो मैं और वो साथ निकले| जब चन्दर से मिले तो वो काफी कमजोर होगया था और मुझे देखते ही वो मेरे गले लग गया| आज बरसों बाद मुझे उसके दिल में भाई वाला प्यार नजर आया, मैं बाहर आया और टैक्सी की और हम तीनों साथ घर लौटे| ताऊ जी आगे थे और मैं चन्दर के साथ उसका समान ले कर चल रहा था| जैसे ही मैं अंदर घुसा मैंने देखा की रितिका नेहा को डाँट रही है और उसे मारने के लिए उसने हाथ उठाया है, ये देखते ही मेरे जिस्म में आग लग गई और मैं जोर से चिल्लाया; "रितिका! तेरी हिम्मत कैसे हुई मेरी बेटी को मारने की!" मैंने उसे धक्का दिया और नेहा को अपने सीने से लगा लिया और उसके सर को चूमने लगा और इधर से उधर तेजी से चलने लगा ताकि वो रोना बंद कर दे| "ताई जी आप भी कुछ नहीं बोल रहे इसे?" मैंने ताई जी से शिकायत की!

"बेटा ये दूध पीने के बाद भी नहीं चुप हो रही थी, इसलिए रितिका को गुस्सा आ गया!" ताई जी बोलीं|

"इतनी छोटी बच्ची को कोई मारता है?" मैंने गुस्से से रितिका को झाड़ते हुए कहा, रितिका डरी सहमी सी अपने कमरे में चली गई और मैं नेहा की पीठ सहलाता हुआ आंगन में एक कोने से दूसरे कोने घूमता रहा| पर उसका रोना बंद नहीं हो रहा था, मुझे पता नहीं क्या सूझी मैंने गुनगुनाना शुरू कर दिया;

"कौन मेरा, मेरा क्या तु लागे
क्यूँ तु बांधे, मन के मन से धागे
बस चले ना क्यूँ मेरा तेरे आगे
कौन मेरा, मेरा क्या तु लागे
क्यूँ तु बांधे, मन के मन से धागे

ढूंढ ही लोगे मुझे तुम हर जगह
अब तो मुझको खबर है
हो गया हूँ तेरा
जब से मैं हवा में हूँ तेरा असर है
तेरे पास हूँ एहसास में, मैं याद में तेरी
तेरा ठिकाना बन गया अब सांस में मेरी

कौन मेरा, मेरा क्या तु लागे
क्यूँ तु बांधे, मन के मन से धागे
बस चले ना क्यूँ मेरा तेरे आगे
कौन मेरा, मेरा क्या तु लागे
क्यूँ तु बांधे, मन के मन से धागे|"

इस गाने के एक-एक बोल को मैं महसूस कर पा रहा था, ऐसा लगा जैसे मैं अपने मन की बात को उस छोटी सी बच्ची से पूछ रहा हूँ! कुछ देर बाद नेहा मुझसे लिपट कर सो गई| एक बार फिर सब मुझे ही देख रहे थे; "बेटा तेरे जैसा प्यार करने वाला नहीं देखा!" ताऊ जी बोले|

"इतना प्यार तो मैंने तुझे नहीं किया!" पिताजी बोले|

"चाचा जी, सच में मानु नेहा से सबसे ज्यादा प्यार करता है|" भाभी बोली|

"भाभी सिर्फ प्यार नहीं बल्कि जान बस्ती है मेरी इसमें और आप में से कोई इसे कुछ नहीं कहेगा|" माने सब को प्यारसे चेतावनी दी| ये मेरी पैतृक वृत्‍ति (Paternal Instincts) थी जो अब सबके सामने आ रही थी| खेर चन्दर भैया का बड़ा स्वागत हुआ क्योंकि वो सच में एक जंग जीत कर आये थे| जब नेहा को भूख लगी तो मैंने भाभी से कहा की वो नेहा को रितिका के पास ले जाएँ; "तुम ही ले जाओ! जाके अपनी लाड़ली को भी मना लो तब से रोये जा रहे है!" उनका मतलब रितिका से था; "मेरी सिर्फ एक लाड़ली है और वो है मेरी बेटी नेहा!" इतना कहता हुआ मैं ऊपर आ आया और देखा रितिका फ्रेश पर उकड़ूँ हो कर बैठी है, उसका चेहरा उसके घटनों के बीच था और मुझे उसकी सिसकने की आवाज आ रही थी| मैंने उसके कमरे के दरवाजे पर खटखटाया तो उसने मेरी तरफ देखा, उसकी आँखें लाल थीं और वो जैसे मुझे कस कर गले लगाना चाहती थी| पर मेरा व्यवहार अभी भी उसके लिए नरम नहीं हुआ था, अब भी वही सख्ती थी जो मुझे उससे दूर खड़ा किये हुए थी| रितिका ने अपने आँसू पोछे और नेहा को प्यार से अपनी गोद में लिया और मैं छत पर चल दिया| बड़ी बेसब्री से मैं एक कोने से दूसरे कोने के चक्कर लगा रहा था और इंतजार कर रहा था की कब नेहा मेरे पास वापस आये| कुछ देर बाद रितिका नेहा को ले कर आई और मुस्कुराते हुए मुझे गोद में वापस दिया, वो पलट के जाने को हुई पर फिर कुछ सोचते हुए रुक गई| "आपने मुझे माफ़ कर दिया ना?" रितिका ने मेरी तरफ घूमते हुए पुछा| पर मैंने उसकी किसी बात का जवाब नहीं दिया और नीचे जाने लगा| रितिका ने एकदम से मेरी बाजू पकड़ी, "प्लीज जवाब तो दे दो?" उसने मिन्नत करते हुए कहा|

"किस बात की माफ़ी चाहिए तुझे? मेरा दिल तोड़ने की? या फिर नेहा पर हाथ उठाने की?" मैंने गुस्से से उसकी तरफ देखते हुए कहा|

"दोनों की!" रितिका ने सर झुकाते हुए कहा|

"नहीं!" इतना कह कर मैं नीचे आ गया|
 
बहुत सुंदर अपडेट..... मन में खुशी भर गयी........... बच्चे हमेशा प्यारे लगते हैं..... एक दिन यही ममता येही स्नेह मानु को रीतिका से भी था.........
लेकिन वही बच्चे जब बड़े हो जाते हैं तो उसी स्नेह का नाजायज फाइदा उठाने लगते हैं............जैसे रीतिका ने उठाया

लेकिन मेरी छोटी सी समझ में एक बात नहीं आयी की मानु फिर उसी भ्रम में क्यों फँसता जा रहा है.............. मेरा और अपना......
आपके कहे अनुसार अगर ये बेटी रीतिका के मानु से अलग होने से पहले की है....... तो उसने तो शादी के बाद गोलियां खानी बंद की ...जैसा आपने मानु के हवाले से बताया.................. और मानु से सेक्स तो शादी से काफी दिन पहले से नहीं हुआ.......................................

चलो! फिर भी ठीक है...........मान लेते हैं

लेकिन अगर ये बेटी राहुल से हुई होती............ तो क्या वो अपनी नहीं थी......... रीतिका की सज़ा क्या बेटी को मिलती?.................... मानु का नेहा के लिए यदि प्यार इसलिए है की वो उसकी अपनी बेटी है तो मानु सिर्फ एक बेवकूफ (रीतिका के मामले में) ही साबित नहीं होता बल्कि एक खुदगर्ज भी साबित होता है

इस अपने पराए की सोच से मानु को बाहर आना होगा........... उसके बुरे वक़्त में किस "अपने" ने साथ दिया उसका......... बल्कि उसकी सारी मुसीबतें ही आफ्नो की दी हुईं थीं..... उसका हर दर्द अपनों का ही दिया हुआ था.............. अकेली रीतिका ही नहीं.............. माँ-पिताजी, ताऊजी-ताईजी सब मौकापरस्त थे........उन्होने मानु को तब याद किया जब उनके ऊपर खुद मुश्किलें और मुसीबतें थीं........... चंदर और उसकी पत्नी उतने बड़े गुनहगार नहीं क्योंकि वो डीसीजन लेने वालों में से नहीं थे......... वैसे ये तर्क अगर आप माँ को लेकर देंगे तो जायज नहीं क्योंकि हर माँ अपनी संतान के लिए डीसीजन मेकर होती है..........और उसका ये हक कोई छीन नहीं सकता.........अगर वो अपने हक का इस्तेमाल करती.......तो

इन सबसे बड़ा दिल तो अनु का है.......... मानु से भी बड़ा......... जिसने सिर्फ मानु को ही नहीं मानु ने अपने साथ जो कुछ भी जोड़ रखा था या जोड़ रहा है.......सबको अपनाने को तयार है....................और उसी अनु को अपने इस खुदगर्ज परिवार से मिलाने में उसे सोचना पड रहा है.............क्या ये वही मानु है जो अनु के माँ -बाप से हक से अनु का हाथ मांगने गया था......... क्योंकि उनकी नाराजगी या उनकी भावनाओं को वो अपने हौसलों से कम मानता था........... लेकिन अपने घरवालों के सामने भीगी बिल्ली बना हुआ उनकी चापलूसी करने में लगा हुआ है............... अनु की ज़िंदगी के फैसलों को अधर में लटकाकर.......... जिस माँ की तबीयत की इतनी चिंता है इसे...........उस माँ ने एक बार ये भी नहीं कहा था की मेरे बेटे को घर से मत निकालो..... तब उसके लिए पति और परिवार ही सबकुछ थे और बेटा कुछ नहीं..................

देखते हैं अभी और क्या क्या रंग दिखाता है मानु..................... ये रंग इश्क़ का नहीं मानु के मन का काला लग रहा है मुझे...
 
सर जी,

पहले सोचा था की आपके सवाल का जवाब नहीं दूँगा, जवाब आपको अगली अपडेट या कहानी के अंत तक मिल ही जाता| पर आपके सवाल रह-रह कर दिमाग में गूँज रहे थे और कुछ बातें इस कहानी को ले कर स्पष्ट कर देना चाहता हूँ!

रितिका की प्रेगनेंसी : कृपया निम्नलिखित पढ़ें जो मैंने कहानी में पहले बताया था|

मानु की बेटी या राहुल की बेटी :
सर जी पिता बनने का सुख क्या होता है ये मुझसे ज्यादा आप जानते होंगे! आपको उस वक़्त कैसा लगा होगा जब mam (अर्थात आपकी धर्मपत्नी) ने आपको माँ बनने की जानकारी दी होगी? या फिर उस वक़्त जब आपने पहलीबार अपने बच्चे को गोद में लिया होगा? दुनिया का कोई भी बाप इस ख़ुशी को व्यक्त नहीं कर सकता! इस ख़ुशी को बस महसूस किया जाता है! आपके मन में चाहे कितनी भी परेशानियाँ हों वो सब गायब हो जाती हैं! तो आप सोचिये मानु को कैसा लगा होगा जब उसने पहलीबार नेहा को अपनी गोद में लिया होगा? आप तो सीना ठोक कर कह सकते हैं की ये आपका खून है पर मानु बेचारा तो ये कह भी नहीं सकता! पहलीबार बाप बनने की ख़ुशी उससे संभाले नहीं सम्भल रही और ये गलत भी नहीं है!

अगर नेहा राहुल का खून होती तो भी वो मानु को प्यारी होती पर तब मानु का उससे वो मोह नहीं होता जो अब है! वो मानु की पोती समान होती और वही लाड-दुलार पाती जिस पर उसका हक़ होता| भला कोई पोती से वैसा स्नेह कैसे कर सकता है जो वो अपनी बेटी से करता है? कैसे वो सब के सामने उसे अपनी बेटी कहता| यहाँ बेटी का तातपर्य अपने खून से करना है| क्या ये जर्रूरी है की मानु राहुल की बेटी से वो दुलार करे जो वो अपनी बेटी से करता? इसमें कैसी 'बेवकूफी' और कैसी 'खुदगर्ज़ी'?

मानु के अपने-पराये: आप ने सही कहा की उसके परिवार ने उसके साथ जो व्यवहार किया वो गलत किया| पर आप का ये मानना की मानु का उसके परिवार के द्वारा की गलती दरकिनार करना गलत है वो सही नहीं है| चाहे जो भी उसके परिवार ने उसके साथ किया पर अगर मानु भी उनसे उखड़ जाता तो आप यही कहते की कैसा नाशुक्रा इंसान है जो अपने परिवार, जिसने उसे इतने साल पाला-पोसा उसे कमाने लायक बनाया उन्हीं को छोड़ दिया! माँ-पिताजी गुस्सा होते हैं और उनके पॉइंट ऑफ़ व्यू से देखा जाए तो गलती मानु की थी जो घर की शादी छोड़ कर विदेश जाना चाहता है| कुछ दिन बाद भी तो जा सकता था, पर फिर उन्हें मानु की कहानी पता नहीं थी! कई बार जोश-जोश में घर के बड़े गलत फैसला ले लेते हैं पर जब उन्हें इसका एहसास होता है तो वो बच्चों से माफ़ी भी मांग लेते हैं! तो क्या ऐसे में बच्चों को उन्हें माफ़ नहीं करना चाहिए? क्या उन्हीं से बदला लेना चाहिए?

अनु की जिंदगी का फैसला: मानु की माँ अभी बीमार हैं और बिस्तर पर लेटी हैं| ऐसे में पहले वो उन्हें तंदुरुस्त करे या अपनी शादी का नगाड़ा पीटे? पूरा घर बिखरा हुआ है, उसे समेटे या फिर अपनी शादी की पीपड़ी बजाए? मानु और अनु का रिश्ता इतना सरल नहीं है जिसे आसानी से सब के सामने पेश किया जा सके! आप शायद भूल रहे हैं की अनु न केवल मानु से उम्र में बड़ी है बल्कि तलाकशुदा भी है! ऐसे में जब सारा घर इस कदर तीतर-बित्तर है और मानु अपनी शादी की बात करेगा तो क्या घरवाले अनु को अपना लेंगे?

मानु की माँ: इस बारे में मैं बस इतना ही कहूँगा की मानु की माँ का उसे ना रोकना सिर्फ गाँव-देहात में औरतों को निचला तबका देने से जुड़ा है! जब उन्हें अपने बेटे की याद आई तो उन्होंने खाना-पीना छोड़ दिया...
आपके गाँव का तो नहीं कह सकता पर मेरे गाँव में अब भी मर्द ही सब फैसला लेते हैं और जो उनका फैसला होता है उसे औरतों को मानना पड़ता है! बाकी मैं आपके ऊपर छोड़ता हूँ की आप इसे कैसे judge करते हैं!

आशा करता हूँ आपको आपके सवालों के जवाब मिल गए होंगे!
 
मानु भाई आप तो इमोश्नल हो गए...... इतना सिरियस मत लिया करो मेरे कटु वचनों को........... ये मेरी आदत में शुमार है.........
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में इमोश्नल नहीं होता हु...... क्योंकि जिसे पूरा घर (सिर्फ अपने बीवी बच्चे नहीं... 2 भाई, 4 चाचा के भी परिवार) देखना होते हों उसे गुस्सैल या भावुक नहीं व्यावहारिक और संजीदा बनना पड़ता है........और कठोर भी.....
रितिका की प्रेगनेंसी :
ये एक ऐसी चीज आपने बताई है जो में अब भी नहीं समझ सका की मेडिकल्ली निषेचित शुक्राणु और अंडाणु को उसी अवस्था में लंबे समय तक बिना गर्भधारण के किसी दवा से कैसे रोका जा सकता है.... चलिये इसे छोड़िए....आईवीएफ़ की तरह का कोई शॉर्टकट होगा....
मानु की बेटी या राहुल की बेटी : ये भी मान लेता हूँ लेकिन जरूरत से ज्यादा मोह हमेशा दुख ही देता है............ अपने आप को भी और दूसरों को भी
मानु के अपने-पराये: कई बार जोश-जोश में घर के बड़े गलत फैसला ले लेते हैं पर जब उन्हें इसका एहसास होता है तो वो बच्चों से माफ़ी भी मांग लेते हैं! लेकिन उन्हें अपनी गलती का अहसास हुआ ही कब? उन पर तो जब मुसीबत आयी तब उन्हें याद आयी........... बीच में कभी किसी ने उसके बारे में जनने की कोशिश की......?
अनु की जिंदगी का फैसला: इसे भी मान लेता हूँ की मानु अब समझदार और जिम्मेदार हो गया है (?) इसलिए समझदारी से उन्हें मुश्किलों से बाहर निकालकर
करेगा......... वैसे आपको लगता है की जब कोई अपने आप मे समर्थ हो जाए और उसे आपकी जरूरत न रहे....जैसे की पिछले कई महीनों से इस घर के लोगों को नहीं थी मानु की ............ तो वो आपकी बात सुनेगा या मानेगा............ मेंने तो साक्षात अनुभव किया है की लोग आपकी बात अपनी गरज मे सुनते हैं...घर के हों या बाहर के.......................
मानु की माँ:
मेरा गाँव हो या आपका गाँव......... सभी जगह घर तभी चल पाता है जब सबकी बात सुनी जाती है........ आपके गाँव के इलाके में भी ...चाहे मानी जाए या न मानी जाए लेकिन अपनी बात कहने का हक सभी को होता है... आदमी हो या औरत....समाज या पंचायत में औरत का बोलना जायज नहीं मानते लेकिन घर में कोई भी औरत गूंगी नहीं होती सब बोल सकती हैं................... हाँ! फैसला आदमी या औरत के द्वारा नहीं ........ जो घर की ज़िम्मेदारी लेता है.... मुखिया होता है......उसे लेना होता है.......और वो ही उसका जवाबदेह होता है................. मानु की माँ की बात मानी बेशक न जाती... उन्हें अपनी बात कहनी तो चाहिए थी

चलिये....... लोग गलतियाँ करते हैं तभी तो कहानियों का जन्म होता है............ लेकिन गलतियाँ दोहराते हैं तो.........ये तो आप ही बताएँगे... में तो चुप ही रहूँगा
yH5BAEAAAAALAAAAAABAAEAAAIBRAA7
 
firefox420 आशा करता हूँ आपकी छुट्टियाँ अच्छे से बीती होंगी, एक साथ इतनी अपडेट पढ़ने को मिले तो मजा ही आ जाता है| यही कारन है की मैं अभी kamdev99008 सर की कहैं से दूरी बनाये हुए हूँ| अपडेट के लिए एक दिन से ज्यादा इंतजार नहीं होता मुझसे! लिंक टूटने लगता है कहानी से और फिर कई बार किरदार भी भूल जाता हूँ!

खेर अब आते हैं जो आपने कहा की मैंने कहानी को आप के और kamdev99008 सर के कमैंट्स के मद्दे नजर मोड़ दिए तो वो बात थोड़ी सही है! मेरा मानना है की 'Critic' वो इंसान होता है जो एक लेखक को उसकी गलतियों, plot holes से रूबरू कराता है| आप दोनों के comments से जो मैंने सीखा वो मैं इस कहानी के अंत में बताऊँगा| ना केवल आप दोनों बल्कि काफी लोग जिन्होंने कमैंट्स कर के सवाल पुछा उन्हीं के बदौलत कहानी निखर के आई है| यहाँ पर मैं उन ख़ास readers को धन्यवाद देना चाहता हूँ जिन्होंने ये forum ज्वाइन ही मेरी कहानी को पढ़ कर किया है! इस बड़ी गर्व की बात मेरे लिए तो नहीं हो सकती! हाँ ये बात सही है की मानु के किरदार को मैं जिस रंग में डुबोना चाहता था उसमें डुबो नहीं पाया क्योंकि kamdev सर ने उसके पीने को ले कर जो criticism दिया उसके चलते मैंने मानु के किरदार को छोटा कर दिया| वरना kamdev सर के शब्दों में कहीं तो मानु का करैक्टर कई ज्यादा काला नीकल कर आता पर जब कोई इंसान कीचड़ से उठ कर आस्मां को छूटा है तो उसकी बात ही कुछ और होती है| ये जर्रूरी नहीं होता की कीचड़ में गिरा इंसान हमेशा गंदा ही होता है! ऐसा मेरा मानना है!
अब आई बात रितिका की प्रेगनेंसी की! तो kamdev सर थोड़ी बहुत रियायत तो लेखक को दे दिन चाहिए की वो scientific बातों को ऊपर-नीचे कर सके! आखिर करिश्मे किस जगह नहीं होते? तो रितिका का मानु के बीज से प्रेग्नेंट होना आप करिश्मा ही मान लेते?

अब आते हैं मनु का नेहा से लगाव होने पर, तो यहाँ मैं आप दोनों की गलती निकालना चाहूँगा! आप दोनों में से किसी ने भी वो ख़ुशी वो आनंद महसूस नहीं किया जो मानु ने नेहा को अपनी गोद में ले कर किया| अगर आप बाकी की कहानी को इतना सीरियस रूप से पढ़ते हैं तो ये इमोशनल पल आप दोनों ने कैसे miss कर दिया? यहाँ तो आपकी प्रतिक्रिया ऐसी होनी चाहिए जिसे ये पता चले की आपको exactly कैसा लगा जब मानु ने नेहा को अपनी बेटी की तरह लाड करना शुरू किया| क्या आपने उस गाने की पंक्तियों को महसूस किया जो मानु ने नेहा को चुप कराने के लिए गाया था? अगर किया होता तो आपके मन में कोई doubt नहीं होता! एक 28 साल का लड़का बाप बनेगा तो वो Maturely कैसे रियेक्ट करेगा? या फिर शायद आप ये उम्मीद कर रहे थे की मानु उस छोटी सी बच्ची को बस एक बार गले लगा कर छोड़ देगा? खेर ये मेरे विचार हैं, अब आप इसे उम्र का अंतर् कह दीजिये या लेखक होने के कारन मेरा मानु के प्रति भेद-भाव आपकी मर्जी!

मुझे आप दोनों के कमैंट्स का बुरा नहीं लगता बस मेरी हमेशा से यही इल्तिजा रही है की कहानी को मानु के point of view से भी देखो! आपके point of view से तो हर कोई गलत निकलेगा! ये कहानी मानु के point of view से लिखी गई है और ऐसे में केवल अपना point of view ही देखना एक तरह का पक्षपात ही हुआ ना? बाकी का मैं आगे कुछ नहीं कहूँगा.... अगली अपडेट आपके सभी सवालों तथा अटकलों का जवाब ले कर आएगी|
 
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अगले दिन की बात है, सुबह मैं अपनी बेटी के साथ माँ के पास बैठा था की ताऊ जी आये और मुझे एक काम सौंपा| "ताऊ जी मैं थोड़ी देर बाद चला जाऊँ? अभी नेहा सोइ नहीं है, मैं नहीं हूँगा तो ये फिर से रोने लगेगी! इसे सुला कर चला जाता हूँ!" मैंने कहा तो ताऊ जी मुस्कुरा दिए और ठीक है कहा| कुछ देर बाद नेहा सो गई तो मैंने सोचा की मैं उसे रितिका को दे दूँ पर वो मुझे घर में कहीं नहीं मिली| मैंने नेहा को माँ की बगल में लिटाया और उन्हें बता कर ताऊ जी का कहा काम करने चल दिया| हमारे गाँव में एक कुँआ है जिसका लोग अब इस्तेमाल नहीं करते और ना ही वहाँ कोई आता-जाता है क्योंकि सब ने हैंडपंप लगवा लिया है| मैं उसी के पास से गुजर रहा था की मेरी नजर वहाँ एक लड़की पर पड़ी जो बड़ी तेजी से उसकी तरफ जा रही थी| साडी का रंग देख मुझे समझते देर ना लगी की ये रितिका ही है, मैं तुरंत उसके पीछे भागा| वो अंदर कूदने के लिए अपना एक पाँव बढ़ा चुकी थी की मैंने उसका हाथ पीछे से पकड़ा और जोर से पीछे जमीन पर गिरा दिया| "मरने का इतना शौक है तो किसी ऐसे कुँए में कूद जिसमें पानी हो! इसमें मुश्किल से 4 फुट पानी होगा और उसमें तू डूब के नहीं मारेगी! जान देने के लिए कलेजा चाहिए होता है, एक चाक़ू ले और अपनी कलाई पर vertically ऊपर की तरफ काट और गहरा काट! है हिम्मत?" मैंने रितिका पर चिल्लाते हुए कहा| "तुझे क्या लगता है तेरे जान देने से तेरे पाप कम हो जाएंगे?" मैंने उसे डाँटते हुए कहा|

"कम नहीं होंगे पर मुझसे आपकी ये बेरुखी नहीं देखि जाती!" रितिका ने रोते हुए कहा|

"मेरी ये बेरुखी कभी खत्म नहीं होगी! कम से कम मेरे जीते जी तो नहीं! और तुझे क्या पड़ी है मेरी बेरुखी की? अभी तेरा परिवार होता तो तुझे घंटा कोई फर्क नहीं पड़ता! ना ही कोई मुझे यहाँ बुलाता, तुझे क्या लगता है की मैं नहीं जानता की मुझे यहाँ क्यों बुलाया गया है? आखिर अचानक से कैसे सब के मन में मेरे लिए प्यार जाग गया| जहाँ कुछ महीनों पहले तक सब मेरे बिना त्यौहार मना रहे थे और मैं वहाँ सब को याद कर के मरा जा रहा था| जब दूसरों को उनके परिवार से मिलते देखता था तो टीस उठती थी मन में! बुरा लगता था की परिवार होते हुए भी मैं एक अनाथ की जिंदगी जी रहा था, मेरा मन मेरे परिवार से दूर नहीं रहना चाहता| अपना परिवार ...उसके प्यार के लिए स्वार्थी बन गया हूँ!" इतना कह कर मैं वहाँ से चल दिया| शाम को जब मैं वापस पहुँचा तो रितिका आंगन में सर झुकाये बैठी सब्जी काट रही थी| मैं माँ के पास पहुँचा और नेहा को अपनी छाती से लगा लिया और उसके माथे पर चुम्मियों की झड़ी लगा दी| "बड़ी मुस्किल से चुप हुई है!" माँ ने कहा| मैंने नेहा को गोदी में ऊपर उठाया, उसका मुँह मेरी तरफ था, मैं तुतलाती हुई जुबान में उससे बोला; "मेला बेटा दादी को तंग करता है! उनकी बात नहीं सुनता?" ये सुन कर नेहा की किलकारी गूंजने लगी|

मैंने उसे फिर से अपने सीने से लगाया और माँ के पास बैठ गया| माँ की तबियत में अब सुधार था पर अभी तक वो कमरे से बाहर नहीं आईं थी| कमजोरी अब भी थी, पर चूँकि मैं उनके पास रहता था और उन्हें समय पर दवाई देता था अपने हाथ से खाना खिलाता था इसलिए उनकी तबियत में अब सुधार था| रितिका जब घर आई तो मुझसे नजरें चुराती फिर रही थी, उसे डर था की कहीं मैं सबका ना बोल दूँ की वो खुदखुशी करने गई थी! खेर रात हुई और खाना खाने के बाद मैं और नेहा ऊपर मेरे कमरे में थे| नेहा को नींद नहीं आ रही थी, तो मैंने उसे अपनी जाँघों के सहारे बिठाया और उससे बात करने लगा| मुझे उस छोटी सी बच्ची से बात करना बहुत अच्छा लगता था? भले ही वो मेरी बात नहीं समझती थी पर जब वो किलकारियाँ मैं सुनता था तो दिल को एक अजीब सुकून मिलता था| रितिका का कमरा मेरे बगल में ही था तो वो चुप-चाप मेरी बातें सुना करती| जब काफी देर बात करने के बाद भी नेहा नहीं सोइ तो मैंने सोचा की उसे लोरी सूना दूँ|

"चंदनिया छुप जाना रे
छन भर को लुक जाना रे
निंदिया आँखों में आए
बिटिया मेरी मेरी सो जाए
हुम्म.निंदिया आँखों में आए
बिटिया मेरी मेरी सो जाए
लेके गोद में सुलाऊँ
गाउँ रात भर सुनाऊँ
लोरी लोरी लोरी लोरी लोरी...."

लोरी सुनते-सुनते ही मेरी बेटी नींद की आगोश में चली गई! मैंने खुद को कंबल से लपेट लिया ताकि मेरी बेटी ठंड से ना उठ जाए! सुबह हुई और धुप अच्छी थी, मैं नेहा को ले कर छत पर आ गया और पीठ टिका कर नीचे बैठ गया| नेहा अंगड़ाई लेते हुए उठी और मुझे अपने सामने देख कर उसके चेहरे पर मुस्कान आ गई| मैंने उसके माथे को चूम कर Good Morning कहा! तभी रितिका ऊपर आ गई, उसके हाथ में कपड़ों से भरी एक बाल्टी थी| रितिका कपड़े सुखाने के लिए डाल रही थी और मैं नेहा के साथ खेलने में व्यस्त था| "सॉरी कल जो भी मैं करने जा रही थी! पागल हो गई थी, दिमाग काम नहीं कर रहा था!" रितिका बोली पर मैंने उसका कोई जवाब नहीं दिया और नेहा को गोद में ले कर नीचे जाने लगा| तभी रितिका ने मेरे कंधे पर हाथ रख कर मुझे रोक दिया! "इन कुछ दिनों में मैं सपने सजाने लगी थी, वो सपने जिसमें सिर्फ हम दोनों और नेहा थे! क्या हम दोनों फिर से एक नहीं हो सकते? प्यार तो आप अब भी मुझसे करते हो, तो क्या हम इस बार घर से नहीं भाग सकते?" आँखों में आँसू लिए रितिका बोली|

"प्यार और तुझसे? 'बेवकूफ' समझा है मुझे? एक बार 'गलती' कर चूका हूँ तुझ पर भरोसा करने की, दुबारा नहीं करने वाला! तब तुझे ऐशों-आराम की जिंदगी चाहिए थी, अब मुझे चैन की जिंदगी चाहिए!" इतना कह कर मैंने रितिका का हाथ जतक दिया और नीचे आने लगा|

"तो आप ही बोलो की आपकी माफ़ी पाने के लिए, भरोसा वापस पाने के लिए क्या करूँ?" रितिका ने चीखते हुए कहा| उसकी आवाज नीचे तक गई और आंगन में बैठी ताईजी और भाभी ने साफ़ सुन लिया| मैं भी चिल्लाते हुए बोला; "Just leave me alone!" मेरे चिल्लाने से नेहा रोने लगी तो मैं उसे प्यार से पुचकारने लगा और बिना किसी को कुछ बोले घर से निकल गया| कुछ दूर तक पहुँचते-पहुँचते नेहा चुप हो गई; "सॉरी बेटा मैं इतनी जोर से चिल्लाया, पर आपकी मम्मी जबरदस्ती मेरे नजदीक आना चाहती है और मैं उसे जरा भी पसंद नहीं करता|" नेहा बड़ी मासूमियत से मेरी तरफ देखने लगी जैसे पूछ रही हो की क्या मैं उससे भी नफरत करता हूँ; "आप तो मेरी प्याली-प्याली राजकुमारी हो, आप में तो मेरी जान बस्ती है! मैं आपसे बहुत-बहुत प्याल करता हूँ!" ये सुन कर नेहा का चेहरा फिर से मुस्कुराने लगा| कुछ देर बाद मैं घर आया और माँ को दवाई दी और उनके पास बैठ गया| "बेटा माफ़ कर दे उसे! उसने बहुत कुछ भोगा है!" ताई जी पीछे से आईं और बोलीं| मैंने बस ना में गर्दन हिलाई और नेहा को लेके एक बार फिर से घर से बाहर आ गया| नेहा को गोद में लिए मैं ऐसे ही टहल रहा था की पिताजी का फ़ोन आया और उन्होंने मुझे जल्दी से घर बुलाया| मैं घर पहुंचा तो देखा बाहर एक पुलिस की जीप खड़ी है| अंदर पहुँच कर देखा तो थानेदार और काला कोट पहने वकील एक चारपाई पर बैठे थे और बाकी सब उनके सामने दूसरी चारपाई पर बैठे थे| पिताजी ने मुझे अपने पास बैठने को कहा, थानेदार कुछ बोल रहा था पर मुझे देखते ही चुप हो गया| "थानेदार साहब ये मेरा बेटा है, कुछ दिन पहले ही आया है|" पिताजी बोले और थानेदार ने अपनी बात आगे बढ़ाई; "काफी मशक्कत के बाद हमें वो लोग हाथ लगे जिन्होंने मंत्री साहब के घर पर हमला किया था! हमारी अच्छी खासी खातिरदारी के बाद उन्होंने सब कबूल कर लिया है| इस सब का मास्टरमाइंड राघव नाम का आदमी है जिससे मंत्री साहब की पुरानी दुश्मनी थी! उसी ने वो आदमी भेजे थे मंत्री साहब के पूरे परिवार को मरने के लिए! फिलहाल उसकी तलाश जारी है, हमे लगता है कि या तो वो सरहद पार कर नेपाल निकल गया है या फिर कहीं अंडरग्राउंड हो गया है| जैसे ही कुछ पता चलेगा हम आपको खबर कर देंगे|"

"पर साहब हमारे परिवार को तो कोई खतरा नहीं है?" ताऊ जी ने पुछा|

"नहीं कोई घबराने की बात नहीं है! राघव की दुश्मनी सिर्फ मंत्री जी से थी, हमें नहीं लगता की वो आप पर या रितिका पर कोई जानलेवा हमला करेगा|!" थानेदार ने आश्वसन दिया| अब बारी थी वकील साहब के बोलने की, पर उनके कुछ कहने से पहले ही मेरा फ़ोन बज उठा| कॉल अनु का था और मैं उस वक़्त बात नहीं कर सकता था इसलिए मैंने; "थोड़ी देर में बात करता हूँ" कह कर काट दिया|

"देखिये अब जो मैं कहने जा रहा हूँ वो आप सभी के फायदे की है! मंत्री जी तो अब रहे नहीं, नाही उनके खानदान का अब कोई बचा, ले दे कर एक रितिका उनकी बहु और उसकी बेटी बची है| ऐसे में उनकी सारी जायदाद पर रितिका का हक़ बनता है, मुझे आपकी आज्ञा की जर्रूरत है और मैं कोर्ट में claim का केस बना देता हूँ...." आगे वकील साहब कुछ भी कहते उसके पहले ही ताऊ जी बोल पड़े; "नहीं वकील साहब हमें कुछ नहीं चाहिए! मुझे और मेरे परिवार को इन कानूनी पचड़ों से दूर रखो|"

"भाई साहब आप दिल से नहीं दिमाग से सोचिये, कल को रितिका की बेटी बड़ी होगी उसकी पढ़ाई-लिखाई, शादी-दहेज़ का खर्चा और आप लोग जो अभी इस चार कमरों के घर में रह रहे हो उसकी जगह आलिशान महल में रहोगे! आप claim नहीं करोगे तो इसे पार्टी वाले खा जाएन्गे? फिर आपको क्या मिलेगा? कम से कम ये तो सोचिये की रितिका का सुहाग उजड़ा है!" वकील साहब ने अपनी तरफ से सारे तर्क एक थाली में परोस कर हमारे आगे रख दिए पर ताऊ जी का निर्णय अडिग था; "वकील साहब मेरा जवाब अब भी ना है, नेहा की परवरिश मैं और मेरा परिवार अच्छे से कर सकता है| उसके लिए हमें किसी की सहायता नहीं चाहिए! इसी दौलत के चलते ये हत्याकांड हुआ है और अब हम इसमें दुबारा पड़ कर फिर से कोई खतरा नहीं उठाना चाहते!" ताऊ जी ने हाथ जोड़ दिए और वकील साहब आगे कुछ न बोल पाए| ताऊ जी कहना सही था क्योंकि ये दौलत मंत्री ने खून से कमाई थी और अब इसे अपना लेना ऐसा था की गरीबों की हाय लेना! वकील साहब और थानेदार के जाने के बाद सब आंगन में बैठ गए|

भाभी ने सब के लिए चाय बनाई और सब कौरा तापने लगे| (कौरा = bonfire) रितिका सब को चाय देने लगी और ताऊ जी ने उसे वहीं बैठने को कहा| "देख बेटी तुझे चिंता करने की कोई जर्रूरत नहीं है| हम सब हैं यहाँ तेरे लिए!" ताऊ जी ने रितिका के सर पर हाथ फेरते हुए कहा| इतने में उसका रोना छूट गया और चन्दर भैया ने उसे अपने पास बिठाया और उसके आँसू पोछे| सब उसे दिलासा देने लगे और मैं नेहा को अपनी छाती से चिपकाए खामोश बैठा रहा| ताऊ जी ने जब मुझे खामोश देखा तो वो बोले; "बेटा माफ़ कर दे इसे! तू तो इसका बचपन से इसका ख्याल रखता आया है, तूने इसकी ख़ुशी के लिए हर वो चीज की जो तू कर सकता था और अब देख इसकी आँखें हमेशा नम रहती हैं! इतनी जिद्द ठीक नहीं!"

"माफ़ करना ताऊ जी, पर मैं इसे माफ़ नहीं कर सकता! इसने मुझे पुछा-नहीं, बताया नहीं और उस लड़के से प्यार करने लगी! मैं शहर में ही रहता था ना, क्या इसने मुझे बताया की ये किसी से प्यार कर रही है? आप ही कह रहे हो की मैं इसका सबसे बड़ा हिमायती था तो इसे तब मेरी याद नहीं आई? चुप-चाप इसने सब कुछ तय कर लिया! ये सब जानती थी, उस मंत्री के बारे में अपनी माँ के बारे में और फिर भी इसने वो कदम उठाया| इसे नहीं पता की उस मंत्री के घर में इसे खून में डूबी रोटियाँ खानी पड़ेंगी? पर नहीं तब तो मैडम जी को इश्क़ का भूत सवार था! जब आप सब मुझे घर से निकाल रहे थे तब ये कहाँ थी? तब बोली ये कुछ आपसे? इसने एक बार भी कहा की 'मानु चाचा' को मत निकालो? मैं आप सब के सामने झूठा बना ताकि इसे पढ़ने को मिले और इसे इश्क़ लड़ाना था तो लड़ाओ भाई!" मैंने आग बबूला होते हुए कहा|

"बेटा जो हुआ उसे छोड़ दे...." पिताजी बोले पर उनकी बात पूरी हो पाती उससे पहले ही मेरा गुस्सा फिर फूटा;

"छोड़ दूँ? आप सब मुझे एक बात बताओ अगर ये हादसा नहीं हुआ होता, ये अपनी जिंदगी सुख से गुजार रही होती तो क्या मैं आज यहाँ बैठा होता? क्या जर्रूरत रहती इस घर को मेरी! मुझे माफ़ करना ताऊजी, पिताजी, ताई जी और माँ (जो अंदर बैठीं सब देख और सुन रहीं थीं!) पर आप सब तो मुझे घर निकला दे कर 'इसकी' खुशियों में लग गए, आप सब ने त्यौहार भी बड़े अच्छे से मनाये पर आप में से किसी ने भी मेरे बारे में सोचा? मानता हूँ की मैं इसे idiot की शादी मैं काम करने की बजाए अपनी जॉब और विदेश जाने के बारे में सोचा जो गलत था पर क्या इसकी इतनी बड़ी सजा होती है? आप सब को इसका गम दिखता है मेरा नहीं? पूरा एक साल मैंने आप सब को याद कर के कैसे गुजारा ये मैं जानता हूँ! दिवाली पर मैं रो रहा था की मेरा परिवार मुझसे दूर है! नए साल में मैं अपने माँ-बाप के पाँव छूना चाहता था, उनका आशीर्वाद लेना चाहता था पर मेरे परिवार ने तो जिन्दा होते हुए भी मुझे अनाथ बना दिया था! ऐसी भी क्या बेरुखी थी की आप सब ने मुझे इस कदर काट के खुद से अलग कर दिया जैसे मेरी आपको कोई जर्रूरत ही नहीं थी! आपको क्या लगा की संकेत आपके पास क्यों आया था? क्यों वो शादी ब्याह का काम देख रहा था? उसे पड़ी ही क्या थी पर उसने सिर्फ मेरे कहने पर ये सब किया! मैं तो ना रहते हुए भी आपको सहारा दे गया और मुझे क्या मिला? ताऊ जी के मुँह से बीएस चार शब्द सुन कर लौट आया क्यों? क्योंकि मुझे मेरा परिवार प्यारा है!" मैंने कहा तो सब के सर झुक गए| अब मैं क्या कहता इसलिए उठ कर ऊपर अपने कमरे में जाने लगा तो माँ ने अंदर से मुझे इशारे से अपने पास बुलाया, मैं नेहा को ले कर उनके पास आया तो उन्होंने मुझे अपने गले लगा लिया और रोने लगीं; "मुझे माफ़ कर दे बेटा! मैं तेरी गुनहगार हूँ...सब की तरह मैं भी स्वार्थी हो गई और अपने ही खून से मुँह मोड़ लिया| मैं तेरे पाँव पड़ती हूँ!" माँ ने मेरे पाँव छूने चाहे तो मैंने उन्हें रोक दिया; "क्यों मुझे पाप का भागी बना रहे हो माँ! जो कुछ भी हुआ मैं उसे भूलना चाहता हूँ पर मुझे जब जबरदति रितिका से बात करने को कहा जाता है तो ये सब बाहर आ जाता है! इस घर में मेरे अलावा और 6 लोग हैं जो 'अब' उसे प्यार करते हैं तो फिर मेरे प्यार की उसे क्या जर्रूरत है?" मैंने कहा तो पीछे से ताई जी आ गईं और बोलीं; "ठीक है बेटा! आज के बाद तुझे उससे बात नहीं करनी ना कर पर हम सब को माफ़ कर दे! हम सब ने बहुत बड़ी गलती की, बल्कि पाप किया है!" ताई जी ने हाथ जोड़ते हुए कहा| माँ और मेरी बात सब बाहर सुन रहे थे और मैं अब किसी को शर्मिंदा नहीं करना चाहता था इसलिए मैंने ताई जी के गले लग कर उन्हें माफ़ कर दिया| एक-एक कर सारे मेरे गले लगे और दुबारा माफ़ी मांगी, अब मैं क्या करता वो मेरा परिवार था और दिल से माफ़ी मांग रहा था| बदला तो ले नहीं सकता था इसलिए उन्हें माफ़ कर दिया! रात में अनु से बात हुई और उसे सब कुछ बताया तो वो मेरे दिल का हाल समझ गई और कोशिश करती रही के मैं उन बातों को दिल से लगा कर फिर गलत रास्ते पर ना भटक जाऊँ|

अगली सुबह फिर रितिका ने काण्ड किया! नेहा को दूध पिला कर उसने मुझे दिया और बोली; "अब से ये आपकी जिम्मेदारी है!" उसकी ये बात ताई जी, भाभी, माँ, चन्दर भैया और पिताजी ने सुन ली| ताऊ जी उस टाइम घर पर नहीं थे, इतना कह कर रितिका दौड़ती हुई बाहर चली गई| "मानु रोक उसे कहीं कुछ गलत ना कर ले!" पिताजी चिल्लाये मैंने नेहा को माँ के पास लिटाया और मैं उसके पीछे दौड़ा| पिताजी और सब लोग जल्दी से बाहर आये, मैंने करीब 100 मीटर की दूरी पर जा कर उसका हाथ पकड़ लिया और उसे खींच कर नीचे पटक दिया| मैंने रितिका को कंधे पर उठाया और वो रोते हुए छटपटाने लगी| मैं बस अपने आपको उसे मारने से रोकता रहा वर्ण मन तो किया अभी उसे एक झापड़ रसीद करूँ! सब ने मुझे उसे कंधे पर लाते हुए देखा तो सब अंदर चल दिए| एक-दो जन मुझे रितिका को ऐसे ले जाते हुए देखने लगे तो घर की इज्जत बचने के लिए मैंने हँसता हुआ चेहरा बना लिया ताकि उन्हें लगे की यहाँ मजाक चल रहा है| शुक्र है किसी ने कुछ कहा नहीं और वो अपने-अपने रस्ते चले गए| अंदर आंगन में आते ही मैंने उसे जमीन पर पटक दिया और उस पर जोर से चिल्लाया; "खत्म नहीं हुआ तेरा ड्रामा?" फिर मैं इधर-उधर डंडा ढूँढने लगा, रसोई में मुझे एक पतली सी लकड़ी मिली तो मैं उससे रितिका की छिताई करने को उठा लाया| मेरे हाथ में डंडा देख कर पिताजी बीच में आ गए और मेरा हाथ पकड़ लिया; "छोड़ दो पिताजी, आज तो मैं इसके सर से ये खुदखुशी का भूत उतार देता हूँ! आपको बताया नहीं पर कुछ दिन पहले ये कुँए में कूदने गई थी, वो तो मैं सही समय पर पहुँच गया और इसे रोक लिया और आज फिर इसने वही ड्रामा किया|" मैं गरजते हुए बोला| "पागल मत बन! वो दुखी है...." पिताजी बोले पर उनकी बात पूरी होने से पहले ही मैं चिल्लाया; "कुछ दुखी-वुखी नहीं है ये! इतना ही दुखी होती और सच में मरना चाहती तो उस दिन उस सूखे कुँए में कूदने ना जाती और आज भी मुझे बता कर, ढिंढोरा पीट कर जाने की क्या जर्रूरत पड़ी इसे?" माने रसोई से चाक़ू उठाया और रितिका को दिखाते हुए बताया की कैसे करते हैं खुदखुशी| "उस दिन बोला था न, ऐसे चाक़ू ले, यहाँ कलाई में घुसा और चीरते हुए ऊपर की तरफ ले जा!" मैं उस टाइम बहुत गुस्से में था और नहीं जानता था की क्या बोल रहा हूँ, तभी पिताजी ने मुझे एक थप्पड़ मारा और मेरा होश ठिकाने लगाया| रितिका जमीन पर पड़ी रोटी जा रही थी और मुझसे ये बर्दाश्त नहीं हो रहा था सो मैं नेहा को ले कर बाहर चला गया| दोपहर को खाने के समय आया, तब तक ताऊ जी भी आ चुके थे और सब आंगन में ही बैठे थे| मैंने नेहा को माँ के पास लिटाया और पिताजी से हथजोड़ कर अपने व्यवहार के लिए माफी मांगी| ताऊ जी ने मुझे अपने पास बिठाया और प्यार से समझाया की मैं अपने गुस्से पर काबू रखूँ पर जब मैंने उन्हें सारी बात बताई तो सब को समझ आ गया की ये सब रितिका का ड्रामा है! वरना अगर उसे मरना ही होता तो 36 तरीके हैं जान देने के, वो बस सब का ध्यान अपनी तरफ खींचना चाहती थी| सबसे जर्रूरी बात जो केवल मैं जानता था वो ये की रितिका मुझ पर मानसिक दबाव बना रहे थी ताकि मैं उसके बहकावे में आ जाऊँ और फिर से उससे प्यार करने लग जाऊँ| पर अब सबकुछ साफ़ हो चूका था और वो ये नहीं जानती थी की ताऊ जी के मन में क्या चल रहा है! वो पूरा दिन सभी उदास थे और चिंतित थे क्योंकि किसी के पास इसका कोई इलाज नहीं था पर ताऊ जी कुछ और सोच रहे थे| दोपहर को सब ने चुप-चाप खाना खाया और मैं माँ के पास बैठा हुआ था और उनके पाँव दबा रहा था| नेहा सो रही थी और पूरे घर में एक दम सनाटा पसरा हुआ था| मेरा फ़ोन साइलेंट था और उसमें एक के बाद एक अनु के फ़ोन आने लगे थे| फ़ोन कब switched off हुआ ये तक नहीं पता चला मुझे! रात में ताऊ जी ने भाभी को रितिका के पास सोने को कहा ताकि वो फिर से कुछ ना करे!

अगली सुबह चाय पीने के बाद सब आंगन में बैठे थे, मैंने भी सोचा की मुझे आये हुए डेढ़ महीना हो गया है और माँ अब तक उसी कमरे में हैं| मैंने आज उन्हें बाहर सब के साथ बैठने की सोची| पिछले कुछ दिनों से मैं माँ की रोज मालिश कर रहा था जिसका असर दिखा और माँ मेरा सहारा लेते हुए बाहर आंगन में आईं| माँ ने सबसे पहले सूरज भगवान को नमस्कार किया और फिर चारपाई पर बैठ गईं| नाश्ता होने के बाद ताऊ जी ने सब को आंगन में धुप में बैठने को कहा और बात शुरू की; "मैं तुम सबसे एक बात करना चाहता हूँ! भगवान् ने रितिका के साथ बड़ा अन्याय किया है, इतनी सी उम्र में उसके सर से उसका सुहाग छीन लिया! वो कैसे इतनी बड़ी उम्र अकेली काटेगी! इसलिए मैं सोच रहा हूँ की उसकी शादी कर दी जाए!" ताऊ जी की बात सुन कर सब हैरान हुए, पहला तो उनकी बात सुन कर और दूसरा की ताऊ जी आज सबसे उनकी राय लेना चाह रहे थे जबकि आज तक वो सिर्फ फैसला करते आये हैं!
 
अब तक आपने पढ़ा:

नाश्ता होने के बाद ताऊ जी ने सब को आंगन में धुप में बैठने को कहा और बात शुरू की; "मैं तुम सबसे एक बात करना चाहता हूँ! भगवान् ने रितिका के साथ बड़ा अन्याय किया है, इतनी सी उम्र में उसके सर से उसका सुहाग छीन लिया! वो कैसे इतनी बड़ी उम्र अकेली काटेगी! इसलिए मैं सोच रहा हूँ की उसकी शादी कर दी जाए!" ताऊ जी की बात सुन कर सब हैरान हुए, पहला तो उनकी बात सुन कर और दूसरा की ताऊ जी आज सबसे उनकी राय लेना चाह रहे थे जबकि आज तक वो सिर्फ फैसला करते आये हैं!

update 72

"भैया आप जो कह रहे हैं वो सही है, अभी उम्र ही क्या है बच्ची की!" पिताजी बोले और घर में मौजूद सब ने ये बात मान ली| मैं अपनी इसमें कोई प्रतिक्रिया नहीं दी क्योंकि मैं तो नेहा के साथ खेलने में व्यस्त था| मेरा मन में बीएस यही था की मैं नेहा को खुद से दूर नहीं जाने दूँगा फिर चाहे मुझे जो करना पड़े| "मानु तू भी बता बेटा?" ताऊ जी ने मुझसे पुछा| "ताऊ जी आप का फैसला सही है! एक नै जिंदगी की शुरुआत करना ही सही होता है|" मैंने कहा| पर मेरा ये जवाब रितिका को जरा भी नहीं भाया, वो तेजी से मेरी तरफ आई और नेहा को मेरे हाथ से लेने लगी| नेहा ने मेरी ऊँगली पकड़ी हुई थी और वो मेरी गोद में खेल रही थी| "क्या कर रही है?" मैंने थोड़ा गुस्सा होते हुए कहा| "ये मेरी बेटी है!" रितिका ने गुस्से से कहा और उसका ये गुस्सा देख मैं अपने गुस्से पर काबू नहीं कर पाया| "जन्म देने से कोई माँ नहीं बन जाती| तेरी शादी हो रही है ना? जा के अपनी नै जिंदगी की शुरुरात कर| क्यों नेहा को उसका हिस्सा बना रही है?" मैंने नेहा को उससे दूर करते हुए कहा| "अच्छा? नेहा मेरी बेटी है, मैं चाहे जो करूँ उसके साथ तुम होते कौन हो कुछ बोलने वाले?" रितिका बोली और उसकी बात सुन कर मुझे बहुत गुस्सा आया| मैंने एक जोरदार तमाचा उसके गाल पर मारा दूसरा तमाचा भी उसके गाल पर पड़ता इसके पहले ही चन्दर भैया ने मेरा हाथ पकड़ लिया और सिका फायदा उठा कर रितिका नेहा को मुझसे छीन कर ऊपर ले गई| अभी वो ऊपर की कुछ ही सीढ़ियां चढ़ी होगी की नेहा का रोना शुरू हो गया और उसका रोना सुन कर मेरा खून खोल गया| मैंने रितिका को रोकना चाहा पर सबने मुझे जकड़ लिया, मैं खुद को सबकी पकड़ से छुड़ाने लगा और छूट कर ऊपर भागना चाहता था ताकि आज रितिका की गत बिगाड़ दूँ! "छोड़ दो मुझे पिताजी! आज तो मैं इसे नहीं छोड़ूँगा!" पर किसी ने मुझे नहीं छोड़ा, सब के सब बस यही कह रहे थे की शांत हो जा मानु! पर मेरे जिस्म में तो आग लगी थी ऐसी आग जो आज रितिका को जला देना चाहती थी| जब मैं किसी के काबू में नहीं आया तो ताई जी ने नीचे से चिल्लाकर रितिका को आवाज मारी और उसे नीचे बुलाया| "मानु देख शांत हो जा...हम बात करते हैं!" ताई जी ने कहा पर मैं तो गुस्से से पागल हो चूका था और किसी की नहीं सुन रहा था| आखिर में माँ ही धीरे-धीरे उठीं और मेरे आगे हाथ जोड़ते हुए बोली; "बेटा....मान जा....शांत हो...जा...!" माँ ये कहते-कहते थोड़ा लडख़ड़ाईं तो मैंने एक जतके से खुद को छुड़ाया और उन्हें गिरने से थाम लिया| उन्हें सहारा दे कर बिठाया और गुस्से में उठा पर माँ ने मेरा हाथ पकड़ लिया; "तुझे मेरी कसम बेटा...बैठ यहाँ पे!" इतने में रितिका नीचे आ गई और मेरी तरफ देखने लगी| मेरी आँखों में गुस्से की ज्वाला उसे साफ़ नजर आ रही थी जिसे देख कर उसके मन में एक अजीब सी ख़ुशी मह्सूस हुई| वो अच्छे से जानती थी की मेरा दिल नेहा के बिना जल रहा है और वो इसी बात पर अंदर ही अंदर मुस्कुरा रही थी| उसकी मुस्कराहट उसके चेहरे पर आ रही थी और मुझे न जाने क्यों नेहा को खो देने का डर सता रहा था! मेरा गुस्सा मरता जा रहा था और एक पिता का पानी बेटी के लिए प्रेम बाहर आ रहा था| आज चाहे रितिका मुझसे जो मांग ले मैं सब उसे दे दूँगा, बस बदले में मुझे मेरी बेटी दे दे! पर वो दिल की काली औरत आज मुझे ऐसा तड़पता देख कर खुश हो रही थी! आखिर एक बाप अपना गुस्सा पीते हुए, आँखों में आँसू लिए बोल पड़ा; "तु चाहती थी न मैं तुझे माफ़ कर दूँ? ठीक है...मैं तुझे दिल से माफ़ करता हूँ पर प्लीज मेरे साथ ऐसा मत कर! नेहा मेरी जान है, उसे मुझसे मत छीन!" मैंने मिन्नतें करते हुए कहा| "मुझे अब किसी की माफ़ी-वाफी नहीं चाहिए!" रितिका अकड़ कर बोली| "तो बोल तुझे क्या चाहिए? जो चाहिए वो सब दूँगा तुझे बस मुझे नेहा से अलग मत कर!" मैंने घुटनों पर आते हुए हाथ जोड़े पर रितिका का कोई फर्क नहीं पड़ा बल्कि वो क्रूरता भरी हँसी हँसने लगी! "अब पता चला की कैसा लगता है जब कोई आपसे आपकी प्यारी चीज छीन ले? You cursed me that day and I lost everything.... fucking everything! This was the payback! बहुत प्यार करते हो न नेहा से? अब तड़पो उसके लिए जैसे मैं तड़प रही हूँ अपने पति के लिए!" मैं हैरानी से उसकी तरफ देख रहा था, क्योंकि मेरा दिल कह रहा था की रितिका ने नेहा को मुझे अपने पाप के प्रायश्चित के रूप में सौंपा था पर ये तो....!!! मैं अभी अपने ख्याल को पूरा भी नहीं कर पाया की रितिका बोल पड़ी; "जो सोच रहे हो वो सही है! ये सब मेरा प्लान था.... मैंने ही आपको नेहा के इतना करीब धकेला और अब मैं ही उसे आप से दूर कर के ये यातना दे रही हूँ! जीयो अब साड़ी उम्र इस दर्द के साथ, वो सामने होते हुए भी आपकी नहीं हो सकती!" जैसे ही उसकी बात पूरी हुई चन्दर भैया ने उसे एक जोरदार तमाचा मारा| उसके सम्भलने से पहले ही भाभी ने भी एक करारा तमाचा उसे दे मारा| "हरामजादी! इतना मेल भरा हुआ है तेरे मन में? तू पैदा होते ही मर क्यों ना गई? इतनी मुश्किल से ये परिवार सम्भल रहा था पर तुझे सब कुछ जला कर राख करना है!" चन्दर भैया बोले! इस सच का खुलासा होते ही मेरे अंदर तो जैसे जान ही नहीं बची थी, सांसें जैसे थम गईं और मैं जमीन पर गिर पड़ा| उसके बाद मुझे कुछ होश नहीं रहा की क्या हुआ....

शाम को जब मेरी आँख खुली तो सब मुझे घेर कर बैठे थे, मैं उठ के बैठा तो माँ की जान में जान आई| पर मेरा मन मेरी बेटी के लिए व्याकुल था और मैं प्यासी नजरों से उसे ढूँढ रहा था| "नेहा....?" मेरे मुँह से निकला तो भाभी ऊपर नेहा को लेने गईं, पर रितिका ने उसे उन्हें सौंपने से मना कर दिया| वो चिल्लाते हुए बोली ताकि मैं भी सुन लूँ; "मेरे साथ जबरदस्ती मत करना वरना मैं पुलिस बुला लूँगी!" ये कहते हुए उसने भाभी को डराने के लिए अपना फ़ोन उठा लिया पर बहभी को कोई फर्क नहीं पड़ा, उन्होंने पहले तो उसके गाल पर एक झन्नाटे दार तमाचा मारा और फिर उसकी गोद से नेहा को छीनते हुए बोलीं; "जो करना है कर ले!" नीचे आ कर उन्होंने नेहा को मेरी गोद में दिया| नेहा रो रही थी और जैसे ही मैंने उसे अपनी छाती से लगाया तो मेरे जोरों से धड़कते हुए दिल को चैन मिला| मिनट भी नहीं लगा नेहा को चुप होने में, मैंने उसके छोटे से हाथों में अपनी ऊँगली थमाई और उसे ये इत्मीनान हो गाय की उसके पापा उसके पास हैं| पर रितिका का दिमाग सनक चूका था, उसने पुलिस कंप्लेंट कर दी और नीचे आकर दरवाजा खोल दिया| कुछ ही देर में वही थानेदार आ गया जो उस दिन आया था, पुलिस की जीप का साईरन सुन सब बाहर आ गए थे| मैं और माँ कमरे में अब भी बैठे थे, नेहा मेरी छाती से चिपकी किलकारियाँ निकाल रही थी, ऐसा लगता था जैसे मानो कह रही हो की प्लीज पापा मुझे अपने आप से दूर मत करो! पर मैं उस वक़्त खुद को बेबस महसूस कर रहा था!

मैं कुछ कह पाता उससे पहले ही एक महिला पुलिस कर्मी और उनके साथ एक हवलदार कमरे में घुस आये और मेरी गोद से नेहा को लेने को अपने हाथ खोल दिए| मैंने ना में सर हिलाया तो पीछे से थानेदार की आवाज आई; "ये रितिका की बेटी है और तुम जबरदस्ती इसे इसकी माँ से छीन कर रहे हो!" मैं उसी वक़्त बोलना चाहता था की ये मेरी भी बेटी है पर मेरे मन में नेहा को खो देने के डर ने मेरे होंठ सिल दिए थे! "थानेदार साहब ये रितिका का चाचा है!" ताऊ जी बोले| "मौर्या साहब आप रितिका को समझाइये, कंप्लेंट इसी ने की है और हमारा काम है करवाई करना!" थानेदार बोलै और उसने महिला पुलिस कर्मी को इशारा किया की वो नेहा को मुझसे छीन ले| वो पुलिस कर्मी भी समझ सकती थी की मैं नेहा से कितना प्यार करता हूँ, फिर भी उसने जबरदस्ती नेहा को मेरी गोद से ले लिया पर नेहा अब भी मेरी ऊँगली पकडे हुए थी जिसे उसने अपने दूसरे हाथ से छुड़वाया! उसने नेहा को रितिका को सौंप दिया और रितिका मेरी तरफ देख कर मुस्कुराने लगी और ऊपर चली गई| मैं बस आँखों में आँसू लिए घुट कर रह गया, मेरा दर्द वहाँ समझने वाला कोई नहीं था| नेहा के रोने की आवाज सुन मैं आज फिर से टूटने लगा था, जिस्म में जैसे जान ही नहीं बची थी! मैं सर दिवार से टिका कर चुप-चाप बैठा रहा और हिम्मत बटोरने लगा|

थानेदार के जाने के बाद भाभी ने नीचे से रितिका को गालियाँ देनी शुरू कर दी थीं| ताऊ जी भी गुस्से में भरे थे, घर का हर एक सदस्य रितिका के पागलपन के कारन सख्ते में था और उसे कोस रहा था| माँ मेरे सर पर हाथ फेर रहीं थीं पर मेरा दिमाग सुन्न हो गया था उसे सिवाए नेहा के रोने के और कुछ सुनाई नहीं दे रहा था| "भाभी मुझे समझ नहीं आता की आखिर हो क्या रहा है? क्यों मानु ऐसी हरकतें कर रहा है? नेहा उसकी बेटी नहीं है फिर भी वो इतना मोह में क्यों बहे जा रहा है?" मेरे पिताजी ताई जी से बोले| पर ताऊ जी मेरे इस मोह को कुछ और ही समझ रहे थे; "तुम सब जानते हो की मानु रितिका से कितना प्यार कृते आया है! बचपन से एक वही है जो उसकी हर फरमाइश पूरी करता था इतना सब कुछ करने के बाद जब रितिका ने उसे बिना बताये शादी की तो वो बहुत गुस्सा हुआ और फिर उस दिन हमने उसे घर से निकाल दिया वो बेचारा टूट गया था! इस कुलटा (रितिका) ने नेहा को जानबूझ कर आगे किया और जबरदस्ती मानु के मन में उसके लिए प्यार पैदा किया और जब मानु का लगाव उससे बढ़ गया तो जानबूझ कर नेहा को उससे दूर कर दिया| सब कुछ इसने जानबूझ कर किया, हमारे लड़के को इसी ने बरगलाया है! अँधा-लूला जो कोई भी मिलता है बांधो इसे उसके गले और छुट्टी पाओ इस मनहूस से! रही मानु की बात तो उसे कुछ टाइम लगेगा पर वो ठीक हो जाएगा|" ताऊ जी ये कहते हुए कमरे के अंदर आये और मेरे सर पर हाथ फेरते हुए बोले; "बेटा...तू चिंता ना कर! हम सब यहाँ हैं तेरे लिए! और सुनो कोई भी उसे इसके आस-पास भटकने मत देना|" ताऊ जी ने सबको आगाह किया और भाभी से कहा की वो खाना परोसें| भाभी खाना परोस कर लाइन पर मैं बस सामने की दिवार को घूर रहा था, मुझे उसमें नेहा का अक्स दिख रहा था| भाभी ने मेरा हाथ पकड़ कर झिंझोड़ा तो मैं अपने ख़्वाबों की दुनिया से बाहर आया| आँखें आँसू बहने से लाल हो चुकी थीं, भाभी के हाथ में खाना देख कर समझ ही नहीं आया की क्या कहूं? पर फिर माँ की तरफ देखा जो आस कर रहीं थीं की मैं खाना खाऊँ, मैंने एक नकली मुस्कान अपने चेहरे पर चिपकाई और माँ की तरफ थाली ले कर घूम गया| मैंने उसी नकली मुस्कराहट से माँ को खाना खिलाया, माँ बार-बार मना कर रही थीं की पहले मैं खाऊँ पर मैंने जबरस्ती करते हुए उन्हें खिलाने लगा| उनके खाने के बाद मैं थाली ले कर बाहर आया, सब को लगा की मैंने खा लिया पर भाभी जानती थी की मैंने माँ को खिला दिया है, उन्होंने मेरे लिए दूसरी थाली में खाना परोसा पर मैंने गर्दन हिला कर मना कर दिया| "मानु ऐसे मत करो! क्यों उस हरामजादी के लिए खाना छोड़ रहे हो? उसने तो पेट भर के धकेल लिया, तुम क्यों...." भाभी खुसफुसाती हुए बोलीं| "भाभी बिलकुल इच्छा नहीं है..... आप बस किसी को कुछ मत कहना!" इतना कह कर मैं घर के बाहर आया और कुछ दूर तक जेब में हाथ डाले चल दिया| मैं जान बुझ कर घर से निकला था ताकि थोड़ी देर बाद जब मैं घर में घुसूँ तो माँ को लगे की मैं खाना खा रहा था| अकेले चलते हुए मुझे मेरी बेबसी का एहसास कचोटे जा रहा था! नेहा मेरी बेटी है और जो रितिका ने आजतक मेरे साथ किया उससे उसका नेहा पर कोई हक़ नहीं बनता! नेहा को उसने एक हथियार की तरह इस्तेमाल कर के मेरे कलेजे को छलनी किया था, उसका बदला तो हो चूका था पर मेरा अभी बाकी था! मेरी बेबसी अब गुस्से में तब्दील हो गई थी| मुझे उसे जवाब देना था.....पर अभी नहीं!

कुछ देर बाद मैं घर लौटा और माँ के सामने ऐसे जताया जैसे मैंने खाना खा लिया हो! माँ को दवाई दी और सोने ऊपर जाने लगा, पर पिताजी ने मेरा हाथ पकड़ कर मुझे रोक लिया; "तू आज अपनी माँ के पास सो जा, वो बहुत उदास थी पूरा दिन|" मैंने पिताजी की बात मान ली और माँ के पास लेट गया| रात के 1 बजे मैं उठा, अपने गुस्से को निकालने का यही सही समय था| मैं दबे पाँव ऊपर गया और देखा की रितिका के कमरे का दरवाजा खुला है, मैंने धीरे से उसे खोला और अंदर पहुँचा| दरवाजे की आहट से रितिका उठ गई और उसने लाइट जला दी; "अब क्यों आये हो यहाँ?" रितिका अकड़ते हुए बोली| मैंने उसके बाल उसकी गुद्दी से पकडे और उसकी आँखों में झांकते हुए गुस्से से बोला; "बहुत शौक है ना तुझे बदला लेने का? अब देख तू मैं क्या करता हूँ! याद है माने तुझे क्या curse किया था? 'Every fucking day will be like hell for you!' याद राख इस बात को!" इतना कह कर मैंने उसके बाल झटके से छोड़े और अपने कमरे से फ़ोन का चार्जर ले कर मैं नीचे उतर आया| फ़ोन चार्जिंग पर लगाया और लेट गया, पर नींद नहीं आई! मन में बस नेहा को पाने की ललक लिए पूरी रात जागते हुए काटी| सुबह उठ कर मैंने अपना फ़ोन देखा जो पूरा चार्ज हो चूका था| जैसे ही फ़ोन ऑन हुआ उसमें अनु की 50 मिस्ड कॉल्स दिखीं, ये देखते ही मेरी हवा टाइट हो गई! मैं नेहा को तो लघभग खू ही चूका था, अनु को नहीं खो सकता था| मैंने तुरंत उसके नंबर पर कॉल करना शुरू किया पर उसका फ़ोन स्विच ऑफ था! मैंने ढ़ढ़ढ़ कॉल करने जारी रखे और उम्मीद करता रहा की वो उठा लेगी, पर उसका फ़ोन स्विच ऑफ ही रहा| माँ मुझे ऐसे कॉल करता देख परेशान हो रही थी, मैंने उन्हें कुछ नहीं कहा बस चुपचाप टिकट बुक करने लगा| इतने में डैडी जी (अनु के डैडी) का फ़ोन आ गया| मैं फ़ोन उठा कर आंगन में एक कोने में खड़ा हो गया; "मानु बेटा सब ठीक तो है? तुम्हारी अनु से कोई लड़ाई हुई? परसों जब से आई है बस रोये जा रही है?" ये सुनते ही मेरी हालत खराब हो गई; "डैडी जी....मैं आ रहा हूँ...3-4 घंटे में पहुँच रहा हूँ!" इतना कहते हुए मैंने फ़ोन काटा और अपना पर्स उठाने भागा; "क्या हुआ? इतना परेशान क्यों है?" पिताजी ने पुछा| "वो मेरा बिज़नेस पार्टनर यहाँ है....मुझे जल्दी जाना होगा ....!" इतना कहते हुए मैं बिना मुँह-हाथ धोये घर से निकल गया| दाढ़ी बढ़ी हुई, बाल खड़े, रात के टी-शर्ट और पजामा पहने ही मैं निकल गया| मन में बुरे विचार आ रहे थे की कहीं अनु कुछ कर ना ले?! अगर उसे कुछ हो गया तो मैं भी मर जाऊँगा! ये सोचते हुए मैं बस में चढ़ा| पूरे रास्ते उसका नंबर मिलाता रहा पर अब भी उसका नंबर बंद था|

कॉलोनी के गेट से अनु के घर तक दौड़ता हुआ पहुँचा और घंटी बजाई, दरवाजा मम्मी जी ने खोला और मेरी हालत देख कर वो हैरान थीं| मैंने अपनी साँसों को काबू किये बिना ही हाँफते हुए कहा; "अनु.....कहा...?" मम्मी जी ने मुझे अंदर की तरफ इशारा किया| मैं तेजी से अंदर पहुँचा और देखा तो अनु दूसरी तरफ मुँह कर के लेटी है और अब भी रो रही थी| उसकी पीठ मेरी तरफ थी इसलिए वो मुझे नहीं देख पाई| उसे जिन्दा देख आकर मुझे चैन मिला, मैंने अपनी सांसें काबू की और उसके पास पहुँचा और उसे पुकारा; "अनु'| ये सुनते ही अनु बिजली की रफ्तार से उठ बैठी और मेरे गले लग गई| मुझे उसकी शक्ल देखना का भी मौका नहीं मिला| अनु का रोना और भी तेज हो गया था और मैं बस उसके सर पर हाथ फेर कर उसे चुप कराना चाह रहा था| "बस-बस...मेरा बच्चा....बस!" मैंने खुद को तो रोने से रोक लिया था पर अनु को रोक पाना मुश्किल था| "मुझे.....लगा.....आप.... अब....कभी नहीं....आओगे!" अनु ने रोते-रोते कहा| "पागल! ऐसे मत बोलो! I love you! ऐसे कैसे तुम्हें छोड़ दूँगा?" ये सुनने के बाद ही अनु ने रोना बंद किया| पीछे डैडी जी और मम्मी जी ने सब सुना और बोले; "देखा? मैं कहता था न मानु अनु से बहुत प्यार करता है!" डैडी जी बोले और हमने पलट कर देखा तो वो हमें इस तरह लिपटे हुए देख कर मुस्कुरा रहे थे| जब अनु ने मुझे ठीक से देखा तो उसकी आँखें फिर से भर आईं; "ये क्या हालत बना ली है 'आपने'? " अनु बोली| मैं चुप रहा क्योंकि मैं मम्मी जी और डैडी जी के सामने कुछ कहना नहीं चाहता था| उन्हें भी इस बात का एहसास हुआ और दोनों बाहर चले गए| "मेरी छोड़ो और ये बताओ तुमने कैसे सोच लिया की मैं तुम्हें छोड़ कर हमेशा के लिए गाँव रहूँगा? मैंने तुम्हें प्रॉमिस किया था ना की मैं वापस आऊँगा... फिर?" मैंने अनु के आँसू पोछते हुए कहा|

"मैं यहाँ आपको सरप्राइज देने के लिए आई थी, मैंने आपको कितने काल किये पर आपने एक भी कॉल नहीं उठाया! फिर फ़ोन स्विच ऑफ हुआ....मुझे लगा आपने मुझे ब्लॉक कर दिया और अब आप मुझसे शादी करने अब कभी नहीं आओगे!"

"It was a rough day .... very bad ....." मैंने सर झुकाते हुए कहा|

"क्या हुआ? Tell me?" अनु बोली पर यहाँ कुछ भी कहना मुझे ठीक नहीं लगा और अनु ये समझ भी गई| इतने में मम्मी जी चाय ले कर आ गईं और डैडी जी भी आ गए और वहाँ बैठ गए| "बेटा ये क्या हालत बना रखी है तुमने?" डैडी जी ने पुछा|

"वो दरअसल डैडी जी घर से फ़ोन आया था, सब ने मुझे वापस बुलाया और वहाँ जा कर पता चला की मेरा परिवार बड़े बुरे हाल से गुजर रहा था| मेरी भतीजी के ससुराल वालों को दुश्मनी के चलते किसी ने सब को जान से मार दिया! बस मेरी भतीजी जैसे-कैसे बच गई| तो अभी पूरा घर बहुत परेशान है!" ये सुनते ही मम्मी और डैडी जी को बहुत दुःख हुआ और उन्होंने सब से मिलने की इच्छा जाहिर की; "जी मैं पहले अनु को सबसे मिलवाना चाहता हूँ!" मैंने कहा पर उन्हें एक डर सता रहा था की कहीं मेरे घरवालों ने शादी के लिए मना कर दिया तो? "ऐसा कुछ नहीं होगा डैडी जी! वो मान जाएंगे!" मैंने मुस्कुराते हुए कहा पर ये तो मैं ही जानता था की ये कितनी बड़ी टेढ़ी खीर है! इधर अनु मुझसे मेरी हालत का कारण जानने को बेकरार थी, पर यहाँ तो मैं उसे कुछ बताने से रहा इसलिए वो उठ कर खड़ी हुई और मेरी तरफ अपने बैग से निकाल कर एक तौलिया फेंका; "Get ready!" मैं तथा मम्मी-डैडी उसकी तरफ हैरानी से देखने लगे क्योंकि जो इंसान पिछले 48 घंटों से बस रोये जा रहा था उसमें अचानक इतनी शक्ति कैसे आ गई? हम सब को हैरानी से उसे देखते हुए वो हँसते हुए बोली; "क्या? हम दोनों घूमने जा रहे हैं!" ये सुन कर मम्मी-डैडी हंस पड़े और मई भी मुस्कुरा दिया| अनु के इसी बचपने का तो मैं दीवाना था! मैं उठा और तभी मेरा फ़ोन आ गया, "जी पिताजी! नहीं सब ठीक है... जी ...नहीं कोई घबराने की बात नहीं है! मैं परसों आऊँगा? हांजी...कुछ जर्रूरी काम है!" मैंने जर्रूरी काम है बहुत धीरे से बोला जिसे कोई सुन नहीं पाया| उसके बाद मैं नहाया और अनु मेरे कुछ कपडे ले आई थी वो पहने और हम घूमने निकले| अनु जानती थी की मैंने कुछ नहीं खाया होगा इसलिए पहले उसने जबरदस्ती मुझे कुछ खिलाया और फिर आंबेडकर पार्क ले आई| वहाँ एक शांत जगह देख कर हम बैठे और अनु ने मेरा दायाँ हाथ अपने हाथ में लिया और सारी बात पूछी| मैंने रोते-रोते उसे सारी बात बताई और ये सब सुन कर उसका पारा चढ़ गया| वो एकदम से उठ खड़ी हुई और मेरा हाथ पकड़ कर खींचते हुए मुझे खड़ा किया और बोली; "चलो घर, आज इसे मैं जिन्दा नहीं छोडूँगी!" मैंने अनु के दूसरे हाथ को पकड़ लिया और उसे अपने गले लगा लिया| "आप क्यों..... मार दो उसे जान से! बाकी सब मुझ पर छोड़ दो!" अनु ने कहा|

"मन तो मेरा भी यही किया था पर उसकी जान ले कर मैं तुम्हें भी खो दूँगा!" मैंने अनु से अलग होते हुए कहा| ये बात सच भी थी क्योंकि फिर मुझे जेल हो जाती और हम दोनों हमेशा-हमेशा के लिए जुदा हो जाते| "तो फिर क्या करें? हाथ पर हाथ रखे बैठे रहे?" अनु ने गुस्से से कहा|

"शादी करेंगे!" मैंने कहा और अनु कुछ सोचते हुए बोली; "ठीक है! चलो आज ही घर चलते हैं!"

"नहीं...आज नहीं.... कल पहले तुम्हारा बर्थडे सेलिब्रेट करते हैं|" मैंने कहा|

"पर क्यों? वहाँ जा कर सेलिब्रेट करेंगे!" अनु ने कहा|

"घरवाले इतनी आसानी से हमारी शादी के लिए नहीं मानेंगे और मैं नहीं चाहता की तुम्हारा जन्मदिन खराब हो!" मैंने अनु को फिर से अपने सीने से लगा लिया| अनु मेरी बात समझ गई थी और उसने कल के लिए सारा प्लान भी बना लिया था| पर मैं तो बस उसे अपने सीने से चिपकाए नेहा की कमी को पूरा करना चाह रहा था| पर जो गर्म एहसास मुझे नेहा को गले लगाने से मिलता था वो मुझे अनु को गले लगाने से नहीं मिल रहा था| नेहा की कमी कोई पूरी नहीं कर सकता था!
 
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बुरा नहीं बनाया भाई....ये रितिका का असली रंग है....काला रंग... जो अब उभर कर आया है|

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मोह तो बाप-बेटी का है.... रितिका तो बीएस अपनी बेटी का इस्तेमाल कर रही थी मानु से बदला लेने के लिए! देखते हैं मानु इस सबसे कैसे उभरेगा? या फिर उभरेगा भी या नहीं?

ये तो आपको आगे पता चल ही जायेगा!
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खराब situation इसलिए है क्योंकि मानु अपनी बेटी के मोह में बंध चूका है! क्या वो इस मोह को तोड़ पायेगा या फिर इसी में बांध कर फिर कुछ गलत कर बैठेगा?!

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आपने सही कहा मित्र! ऐसे लोग Sadist होते हैं, जिन्हें दूसरों को दुःख देने में बड़ा मजा आता है| अनु के आने पर बवाल होना तय है...!!!

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अपने दिल को थाम कर रखिये मित्र!

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रितिका से मतलबी इंसान इस दुनिया में कोई हो ही नहीं सकता| मानु उसके साथ तब था जब कोई उसके साथ नहीं था पर उसने मानु के साथ सिर्फ और सिर्फ खिलवाड़ किया! शहर आ कर उसे ऐशों-आराम की जिंदगी जीने को मिली और अब जब ऐश करने का चस्का लग हजाये तो वो कहाँ मानु के साथ दरबदर की ठोकरें खाती!

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DNA टेस्ट तो हो सकता है पर ये सच सामने आते ही मानु और रितिका की मौत पक्की है| हो सकता है की नेहा भी इसी आग में झुलस जाए, फिर अनु का क्या होगा?

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I can understand your feelings bruh! But it is true that she got greedy with money and realized that Manu can never guarantee her a beautiful life, a life where she need not worry about anything. When Manu returned and told everybody about his life in Bangalore, she hoped that he'll accept her love one more time and they both can plan their escape. But he wasn't that dumb and this irked her and when all her attempts failed to sway Manu off the right path she revealed her true colors.

दुःख की बात है दोस्त...पर यही सच है!

कीर्ति जी,

आपका इस फोरम पर स्वागत है! जान कर बहुत ख़ुशी हुई की आपने ये फोरम सिर्फ और सिर्फ मेरी कहानी पर कमेंट करने के लिए कोइन किया है| बहुत-बहुत शुक्रिया!!!!!
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रितिका जितना गिर सकती थी उतना गिर चुकी है, इससे ज्यादा गिरने के लिए अब उसके पास अब जगह नहीं है| दूसरी तरफ अनु का करैक्टर इस कदर निखर के आया है की क्या कहूँ! एक वही है जो मानु को संभाले हुए है, अनु ही वो anchor है जिसके सहारे मानु की कश्ती पानी में टिकी हैं वरना रितिका नामक लहर मानु को कब का किनारे से टकरा देती और मानु हमेशा के लिए दुखों के सागर में डूब जाता|

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वो है ही इतनी लालची की क्या कहें.... पर फिर भी वो बुज़दिल है और अकेले कोर्ट के चक्करों में नहीं पड़ेगी!
 
अब तक आपने पढ़ा....

"घरवाले इतनी आसानी से हमारी शादी के लिए नहीं मानेंगे और मैं नहीं चाहता की तुम्हारा जन्मदिन खराब हो!" मैंने अनु को फिर से अपने सीने से लगा लिया| अनु मेरी बात समझ गई थी और उसने कल के लिए सारा प्लान भी बना लिया था| पर मैं तो बस उसे अपने सीने से चिपकाए नेहा की कमी को पूरा करना चाह रहा था| पर जो गर्म एहसास मुझे नेहा को गले लगाने से मिलता था वो मुझे अनु को गले लगाने से नहीं मिल रहा था| नेहा की कमी कोई पूरी नहीं कर सकता था!

update 73

"आपकी दिल की धड़कनें क्यों तेज हैं?" अनु ने पूछा| अब मैं उसे क्या कहता? शायद वो मेरी बात को समझ ना पति, या फिर वो इसका कुछ और मतलब निकालती इसलिए मैंने बात घुमा दी; "इतने दिनों बाद तुम्हें गले लगा ना इसलिए दिल बेकाबू हो गया!" पर अनु मुझे अच्छे से जानती थी और ये भी जानती थी की मेरे मन में क्या चल रहा है| मेरे मन के विचारों और पीड़ा को महसूस कर के अनु डर गई थी, जिस मानु को उसने इतनी मुश्किल से संभाला था कहीं वो फिर से अंतहीन गम की खाईं में न गिर जाए! "अच्छा ये बताओ ये तुमने आजकल मुझे 'आप' कहना क्यों शुरू कर दिया?" मैंने बातों को आगे बढ़ाते हुए कहा वरना अनु को शक हो जाता की मैं अंदर से दुखी हूँ|

"मम्मी को देख कर! उस दिन मैं जब आपसे बात कर रही थी तो मम्मी ने मुझे टोका और कहा की पति परमेश्वर होता है और मुझे आदर से बात करनी चाहिए जैसे वो करतीं हैं पापा से|" अनु ने बड़े भोलेपन से जवाब दिया| मम्मी जी का तातपर्य था की शादी के बाद वो मुझे आप कहे पर ये अनु का बचपना था जो की उस बात को अभी से मानना चाहता था|

"अच्छा जी? तो ठीक है मैं भी अबसे तुम्हें आप ही कहूँगा?" मैंने कहा|

"नहीं.... इतनी मुश्किल से तो आप तुम पर आये हो अब फिर से आप पर जाना चाहते हो?" अनु ने चिढ़ते हुए कहा|

"यार अगर आप मुझे इज्जत देकर बात कर रहे हो तो मैं भी करूँगा| ये कहाँ लिखा है की सिर्फ पत्नियाँ ही पति को आप कह सकती हैं और पति नहीं?" मैंने तर्क दिया|

"वैसे .... एक बात कहूँ?" अनु ने शर्माते हुए कहा|

"आय-हाय!! शर्म से गाल लाल हो गए आपके तो?" मैंने अनु की टाँग खींचते हुए कहा|

"ये हम दोनों का एक दूसरे को आप कहना.....एक अजीब सा एहसास दिलाता है! लगता है मानो जिस्म में हजारों तितलियाँ उड़ रही हों! क्या यही प्यार है? अनु ने मेरी आँखों में देखते हुए कहा| उसकी आँखों में मुझे आज अलग ही कसक दिखी, इधर मेरी आँखों में सुनापन था और मुझे अपने जज्बात अनु से छुपाने थे!

"हम्म्म....." इसके आगे मैं कुछ बोल ना पाया और अनु को अपने सीने से लगा लिया|

शाम होने को आई थी इसलिए मैंने अनु से कहा की घर चलते हैं, ठंड में बाहर ठिठुरने से अच्छा है घर जा कर बैठें| तभी घर से फ़ोन आया; "जी .... वो एक जर्रूरी मीटिंग थी और मैं उसके बारे में भूल गया था| कपडे? जी वो मैंने यहाँ से ले लिए थे..... कल एक और मीटिंग है ....उसके बाद मैं परसों आ जाऊँगा.....और हाँ.....मैं अपने पार्टनर को भी साथ ला रहा हूँ .... जी.... जी ठीक है....माँ से कह दीजियेगा की वो चिंता ना करें!" पिताजी से बात कर के मैंने उन्हें इत्मीनान दिला दिया था की मैं ठीक-ठाक हूँ| इधर मेरे मुँह से मिलवाने की बात सुन अनु भी बहुत खुश थी! हम घर लौटे तो डैडी जी से थोड़ी डाँट पड़ी; "तुम दोनों की अभी तक शादी नहीं हुई है, ज्यादा इधर-उधर घूमा न करो!" पर मम्मी जी मेरे बचाव में सामने आईं; "इसे (अनु को) डाँटो मानु को यही ले गई थी, वो तो बेचारा कुछ कहता नहीं इसे!"

"बहुत दिन हुए ना तुझे डाँट खाये?" डैडी जी ने अनु को थोड़ा डराया और अनु का सर झुक गया| "सॉरी डैडी जी, नेक्स्ट टाइम से हम दोनों ध्यान रखेंगे!" मैंने अनु का बचाव किया और ये देख डैडी-मम्मी हंस पड़े और हम दोनों हैरानी से उन्हें देखने लगे| "बेटा अभी शादी नहीं हुई और तुम अभी से इसकी गलतियों पर पर्दा डाल रहे हो?" डैडी जी ने हँसते हुए कहा| रात को खाने के बाद मैं वॉक लेने के लिए अकेले निकल पड़ा, जब वापस आया तो अनु नराज हो चुकी थी; "अकेले क्यों गए? मैं भी चलती!" अनु बोली| "बेबी....दुबारा डाँट खानी है?" मैंने बहुत प्यार से अनु से पुछा तो उसे डैडी जी की डाँट याद आ गई| मैं वाशरूम गया और वापस आया तो अनु ने मेरा हाथ पकड़ा और हम दोनों सोफे पर टी.वी. के सामने बैठ गए, कुछ देर बाद डैडी जी और मम्मी जी भी बैठ गए| नौ बजे और मम्मी-डैडी उठ कर सोने के लिए चले गए, उनके जाते ही अनु मुझसे सट कर बैठ गई| फिर अचानक ही उसने मुझे अपना सर उसकी गोद में रखने को कहा| वो मेरे बालों में उँगलियाँ फेरने लगी; "अगर आप आज ना आते तो मैंने सोच लिया था की मैं अपनी जान दे दूँगी!" अनु बोली| मैं उठ के बैठा और मेरी आँखें आँसुओं से भर गई; "नेहा को तो मैं खो चूका हूँ अब तुम्हें खोने की ताक़त नहीं रही मुझ में! भूलकर भी कभी ऐसा कुछ मत करना वरना तुम्हारे साथ मैं भी मर जाता!" मैंने कहा तो अनु ने मेरे आँसू पोछे और बोली; "ना आपने नेहा को खोया है और न मुझे खाओगे!" अनु ने मुस्कुराते हुए कहा, शायद वो जानती थी की उसे क्या करना है| मेरे दिमाग ने अनु की बात को ठीक से समझा ही नहीं, मुझे लगा की वो मेरा दिल रखने को ऐसा कह रही है| आगे हम कुछ बात कर पाते उससे पहले ही मम्मी जी आ गईं और हमें ऐसे गले लगे देख कर प्यार से टोकते हुए बोलीं; "बेटा और दो महीने की बात है!" ये सुन कर हम दोनों शर्म से लाल हो गए और दूर-दूर बैठ गए| "चल अनु सो जा!" मम्मी जी बोलीं| "आप चलो मैं आती हूँ!" अनु ने हँसते हुए कहा और मम्मी जी के जाते ही मेरी गोद में सर रख कर सो गई| मैंने अनु के माथे को चूमा और उसे गोद में ले कर कमरे में आया और धीरे से मम्मी जी की बगल में लिटा दिया| घडी में अभी दस बजे थे और मुझे बारह बजने का इंतजार था| मैं चुपचाप आ कर सोफे पर बैठ गया और फ़ोन में नेहा की तसवीरें देखने लगा| स्क्रीन पर उसके गालों को सहलाता और उस प्यार को महसूस करने की कोशिश करता| दिल अंदर से बहुत दुखी था और आखिर एक बाप के आँसू छलक ही आये, वो दर्द बाहर ही गया और मैं सोफे पर लेटा उस दर्द को अपने अंदर दफन करने में लग गया पर दर्द को वापस सीने में दफन करना इतना आसान नहीं होता! मुझे ये डर भी सता रहा था की अगर मम्मी-डैडी जी ने मुझे यहाँ ऐसे देखा तो मैं उनसे क्या कहूँगा? उनसे सच भी तो नहीं कह सकता था वरना वो मेरे बारे में क्या सोचते? और फिर शायद मैं और अनु फिर कभी एक नहीं हो पाते! मैंने अपने आँसू पोछे और टाइम देखा तो घडी में 11:59 हुए थे, मैं डैडी जी वाले कमरे में आया जहाँ मैंने केक रखा था जो मैंने वॉक पर जाते समय खरीदा था| उसे ला कर मैंने ड्राइंग रूम में रखा और कैंडल जलाएं फिर मैं अनु को उठाने गया| अनु बायीं तरफ करवट ले कर लेटी थी, मैं उसके सामने घुटनों पर बैठ गया, झुक कर उसके गालों को चूमा और खुसफुसाती हुए कहा; "Happy Birthday My Would Be Wife!" ये सुनते ही अनु ने मुस्कुराते हुए आँख खोली और उठ कर बैठी| कमरे में उस वक़्त रोशिनी कम थी इसलिए वो मेरी लाल आँखें नहीं देख पाई और सीधा मेरे गले लग गई| बिस्तर पर हुई हलकजहल से मम्मी जी की आँख खुल गई और उन्होंने साइड लैंप ऑन कर दिया| उन्होंने हम दोनों को गले लगे हुए देखा तो प्यार से बोलीं; "तुम दोनों की शादी जल्दी करनी पड़ेगी वरना तुम दोनों मुझे सोने नहीं दोगे!" पर मम्मी जी की बात सुन कर भी अनु मुझसे चिपकी रही| मम्मी जी अनु का बर्थडे भूल गई थीं इसलिए मैंने अपने होंठ हिलाते हुए उन्हें इशारे से याद दिलाया की अनु का बर्थडे है| "बेटी थोड़ा तो शर्म किया कर? बर्थडे है तो क्या मानु को छोड़ेगी नहीं?" ये सुन कर अनु मुझसे अलग हुई और उसने मेरी लाल आँखें देख लीं और उसे समझते देर न लगी की ये लाल क्यों है! वो आगे कुछ कहती उससे पहले ही मम्मी जी ने उसे अपने गले लगा लिया और बोलीं; "हैप्पी बर्थडे मेरी लाडो! मेरी लाडो को दुनिया की सारी खुशियाँ मिले!" मैं भी जान गया था की अनु ने मेरी लाल आँखें देख ली हैं और अब वो ज्ररूर पूछेगी, इसलिए उससे नजरें चुराते हुए मैं डैडी जी को उठाने चल दिया| डैडी जी को तारिख का अंदाजा नहीं था और उन्हें लग रहा था की बर्थडे परसों है पर मैंने उन्हें यक़ीन दिलाया तो वो उठे और उन्हें बुरा ना लगे इसलिए मैंने उन्हें इस बात के बारे में कुछ नहीं कहा| वो बाहर आये तो ड्राइंग रूम में केक पर मोमबत्ती जलते हुए देखि और वो मेरा प्लान समझ गए| डैडी जी अनु की बाईं तरफ बैठ गए और उसे अपने गले लगा कर जन्मदिन की बधाई दी और बहुत सारा प्यार दिया पर अनु की नजरें मुझ पर गड़ी हुई थीं| अनु की नजरें मुझे चुभ रही थीं और मैं आज के दिन को अपना दुखड़ा सूना कर खराब नहीं करना चाहता था| "चलिए केक काटते हैं!" मैंने अनु से आँखें चुराते हुए कहा| केक की बात सुन कर मम्मी जी चौंक गई पर मैं नहीं चाहता था की अनु को लगे की उसके मम्मी-डैडी उसका बर्थडे भूल गए इसलिए मैंने सारा क्रेडिट उन्हें दे दिया| "डैडी जी ने केक मंगवाया है, चलो जल्दी!" इतना कह कर मैं सबसे पहले बाहर आया और सारी लाइट्स जला दीं, पीछे से मम्मी-डैडी और अनु आ गए|

केक पर मैने जानबूझ कर Happy Birthday Anu लिखवाया था क्योंकि और कुछ लिखवाता तो हम दोनों ही मम्मी-डैडी के सामने शर्मा जाते! केक काट के वो पहला टुकड़ा डैडी जी को खिलाने लगी पर डैडी जी ने उसका हाथ पकड़ कर मेरी तरफ कर दिया और अनु ने हँसते हुए मुझे केक खिलाया और फिर मैंने एक छोटी सी बाईट अनु को खिलाई उसके बाद उसने मम्मी-डैडी को खिलाया और हम सारे ड्राइंग रूम में ही बैठ गए| "डैडी कल सुबह हम दोनों बर्थडे सेलिब्रेट करने जाएँ?" अनु ने शर्माते हुए कहा|

"ठीक है....पर रात का डिनर साथ करना है!" डैडी जी ने मुस्कुराते हुए कहा| ये सुन कर अनु खुश हो गई डैडी जी के गले लग गई| कल का प्रोग्राम सेट था तो मम्मी-डैडी और मैं उठ खड़े हुए ताकि सोने जा सकें पर अनु ने मेरा हाथ पकड़ लिया और मुझे बैठने को कहा| मैंने गर्दन ना में हिलाई क्योंकि एक तो मुझे पता था की वो क्या पूछेगी और दूसरा डैडी जी कहीं डाँट ना दे! अनु ने एक दम से मुँह बना लिया और मुझे उसके पास बैठना पड़ा, डैडी-ममममय ने जब देखा तो वो मुस्कुराते हुए बोले; "बेटा ज्यादा देर तक जागना मत!" और वो सोने चले गए| अनु ने मेरा चेहरा अपने हाथों में थाम लिया और बोली; "नेहा को याद कर के रो रहे थे ना?" नेहा का नाम सुनते ही मैं खुद को रोक नहीं पाया और आंखें फिर छलक आईं| अनु ने मुझे कस कर गले लगा लिया और बोली; "मैं हूँ ना?.... सब ठीक हो जायेगा!" फिर मेरी पीठ पर हाथ फेरती रही ताकि मैं चुप हो जाऊँ| बड़ी ताक़त लगी मुझे खुद को संभालने में ताकि मैं अनु का ये स्पेशल दिन अपने रोने-धोने से बर्बाद न कर दूँ! मैंने अपने आँसूँ पोछे और नकली मुस्कराहट होठों पर चिपकाते हुए कहा; "Thank You! चलो अब सो जाते हैं, सुबह का क्या प्लान है?" पर अनु मुझे अच्छे से समझती थी और चूँकि हम घर पर थे इसलिए यहाँ वो कुछ ज्यादा पूछ नहीं सकती थी| "कल का सारा दिन हम साथ spend करेंगे!" इतना कहते हुए वो खड़ी हुई और एक बार मुझे अपने गले लगा लिया और इस बार मैंने खुद को रोने से रोक लिया| मैंने ऋतू को उसके कमरे के बाहर छोड़ा और मैं डैडी जी वाले कमरे में आ कर सो गया|

अगली सुबह बड़ी प्यारी थी....अनु मुझे उठाने आई और चूँकि वहाँ मैं अकेला सो रहा था तो उसने मेरे गले पर अपने होंठ रखे और उन्हें अपने मुँह में भर कर धीरे से काट लिया| इस जोरदार Kiss से मेरा पूरा शरीर हरकत करने लगा, माने आँखें खोले बिना ही अनु का हाथ पकड़ कर अपने ऊपर खींच लिया और उसे अपनी बाहों में जकड़ लिया| "ससस....Good ..... Morning!!!" अनु ने मेरे जिस्म के स्पर्श से सीसियाते हुए कहा| मैंने अनु के माथे को चूमा और कहा; "Happy Birthday मल्लिकाय हुस्न जी!" अनु शर्मा गई और अपना सर मेरे सीने पर रख कर लेट गई, तभी मम्मी जी आ गईं और अपनी कमर पर हाथ रखते हुए बोली; "हे राम! सुबह-सुबह तुम दोनों का रोमांस चालु हो गया?!" उनकी आवाज सुनते ही अनु छिटक कर खड़ी हुई और बाहर भाग गई, मैं भी उठ के बैठ गया और मम्मी जी मेरे पास आईं और मेरे कान पकड़ते हुए बोलीं; "चल बदमाश बाहर!" मैं बाहर आया और मेरा डायन कान अब भी मम्मी जी के हाथ में था; "सुनते हो जी? जल्दी से शादी कराओ इनकी, ये दोनों दिन पर दिन पागल होते जा रहे हैं!" मम्मी जी की बात सुन कर मेरे और अनु के गाल शर्म से लाल हो गए और डैडी जी जोर से हँसने लगे| "सॉरी मम्मी जी! नेक्स्ट टाइम से ..... " आगे मैं कुछ कह पाटा उससे पहले अनु कूदती हुई नजदीक आई और मम्मी जी के गले लगी और उनके कान में बोली; "नेक्स्ट टाइम से आप हमें पकड़ नहीं पाओगे!" इतना कहते हुए अनु खिलखिला कर हँसी और अपने कमरे में भाग गई| "रुक जा बदमाश!" मम्मी जी मेरा कान छोड़ते हुए बोली| डैडी जी जो ये सब सुन नहीं पाए थे पूछने लगे; "क्या हुआ?"

"ये लड़की है न सच्ची बहुत बदमाश हो गई है!" ये कहते हुए मम्मी जी हँस के डैडी जी के पास जाने लगीं और मेरा हाथ भी पकड़ कर साथ ले गईं| मुझे उन्होंने डैडी जी के साथ सोफे पर बिठाया और वो मेरे सामने पफ्फी पर बैठ गईं; "बेटा.... मुझे ये कहने की जर्रूरत तो नहीं पर फिर भी एक माँ हूँ इसलिए कह रही हूँ, इसका बहुत ख्याल रखना! हम दोनों इसे एक बार लघभग खो चुके थे क्योंकि हम इसे समझ नहीं पाए थे, पर वो तुम थे जिसने हमें इसके जज्बात समझाये! इसके मन में तुम्हारे लिए बहुत प्यार है और मैं जानती हूँ तुम भी इसे बहुत चाहते हो, इसलिए इसे हमेशा खुश रखना, बहुत सारा प्यार देना! वो प्यार भी देना जो हम इसे ना दे पाए!" मम्मी जी ने रुंधे गले से कहा| मैं उनके सामने घुटनों पर बैठ गया और बोला; "मम्मी जी मैं आपसे वादा करता हूँ मैं अनु को बहुत खुश रखूँगा, पूरी कोशिश करूँगा की उसकी आँखों में कभी आँसू ना आये!"

डैडी जी ने मेरे सर पर हाथ रखा और कहा; "बेटा मुझे तुम पर पूरा भरोसा है और Thank you की कल रात तुमने केक का सारा क्रेडिट हमें दिया, वरना हम तो भूल ही गए थे!"

"डैडी जी आप केक लाओ या मैं लाऊँ बात तो एक ही है!" इतना कह कर मैं बैठ गया की अनु अपने कमरे के बाहर से चिल्लाई; "क्या प्लानिंग हो रही है?"

"किसने कहा यहाँ तेरी बात हो रही है?" डैडी जी ने उसे प्यार से डाँटते हुए कहा| पर मुझे अपने मम्मी-डैडी के इतने करीब बैठा देख अनु का दिल गदगद हो उठा!

नहा-धो कर हमें निकलते-निकलते बारह बज गए, अनु डैडी जी की गाडी ड्राइव कर रही थी, उसने पहले गाडी एक ठेके के बाहर रोकी और मुझे रेड वाइन लाने को कहा| मैंने उसके हुक्म की तामील की, फिर उसने कुछ खाने के लिए स्नैक्स लेने को कहा और फिर गाडी एक होटल के बाहर रोक दी| "हम यहाँ क्या कर रहे हैं?" मैंने पुछा|

"वही जो हम घर पर नहीं कर पाते!" अनु ने मुस्कुराते हुए कहा|

"यार ये सही नहीं है!" मैंने झिझकते हुए कहा|

"क्यों? घर पर मम्मी-डैडी होते हैं और हम साथ बैठ भी नहीं पाते!" अनु ने कहा तो मुझे इत्मीनान हुआ की अनु 'उस' काम के लिए यहाँ नहीं आई है| हम ने check in किया और रूम के अंदर आये;

"यार बड़ा अजीब सा लग रहा है?" मैंने कहा तो अनु हँसने लगी; "क्यों डर लग रहा है?" अनु ने पुछा|

"ऐसी जगह एक बॉयफ्रेंड अपनी गर्लफ्रेंड को लाता है 'उस' काम के लिए!" मैंने शर्माते हुए कहा|

"इसीलिए तो लाई हूँ आपको यहाँ! आप तो मुझे कहीं ऐसी जगह ले जाते नहीं, सोचा मैं ही ले जाऊँ?" अनु ने बिस्तर पर गिरते हुए कहा| मैं अनु की बगल में ही लेट गया और अनु ने अपना सर मेरे सीने पर रख दिया और मेरे दिल की धड़कनें सुनने लगी;

"हाय! आपका दिल तो अभी से रोमांटिक हो गया?" अनु बोली|

"रोमांटिक नहीं डर से धड़क रहा है!" मैंने हँसते हुए कहा|

"किस बात का डर?" अनु ने हैरान होते हुए कहा|

"जिस काम के लिए यहाँ लाये हो?" मैंने अनु को चिढ़ाते हुए कहा|

"आपका मन नहीं है?" अनु ने थोड़ा सीरियस होते हुए कहा|

मैंने अनु को एक दम से मेरे नीचे किया और उसके ऊपर झुक कर उसकी आँखों में देखते हुए कहा; "बेबी ये सब सुहागरात तक बचा रहा हूँ मैं! वो रात हमारी एक दूसरे को सौंप देने की रात होगी!" मैंने कहा|

"और अगर वो रात नहीं आई तो?" अनु ने मेरी आँखों में देखते हुए कहा|

"क्या? ऐसा क्यों कह रही हो?" मैंने चिंता जताते हुए कहा|

"कल हम आपके घर जा रहे हैं ना, आपको लगता है की मेरा past जानकार आपके सब घरवाले मान जायेंगे? उन्होंने अगर इस शादी से मना कर दिया तो? हमें मार दिया तो? मरना तो मैं सह लूंगी पर आपकी जुदाई नहीं सह सकती!" अनु ने कहा|

"मैं तुम्हें कुछ नहीं होने दूँगा! समझ आया? रही हमें अलग करने की तो उसका उन्हें (मेरे घरवालों को) कोई हक़ नहीं है| हमारी शादी तो हो कर रहेगी चाहे मुझे कुछ भी करना पड़े!" मैंने थोड़ा गुस्सा दिखाते हुए कहा|

"तो मेरे लिए क्या फिर से अपना घर छोड़ दोगे?" अनु बोली|

"हाँ" मैंने इतना कहा और अनु की आँखों में आँखें डाले देखने लगा, वो कुछ कहने वाली थी पर चुप हो गई| उसके होंठ कांपने लगे थे और उसने मुझे kiss करने के लिए अपनी बाँहों को मेरी गर्दन पर लॉक कर लिया और मुझे अपने होठों पर झुकाने लगी| मैंने अपनी ऊँगली उसके होठों पर रख दी और उसके दाएँ गाल को चूम लिया| अनु मुस्कुरा दी और बोली; "वैसे आपको सुबह वाली Kissi कैसी लगी?"

"बहुत अच्छी, और आगे से मुझे ऐसे ही जगाना!" मैंने हँसते हुए कहा|

हम दोनों उठे और अनु ने गिलास में वाइन डाली और खाने के लिए जो स्नैक्स लिए थे वो खोले और मैं वाशरूम में फ्रेश होने गया| फ्रेश हो कर आया तो अनु पलंग पर बेडपोस्ट को सहारा ले कर बैठी थी और टी.वी. जोर से चल रहा था| मैं भी जूते उतार कर उसकी बगल में बैठ गया;

"टी.वी. की आवाज कम कर दो वरना लोग सोचेंगे की यहाँ 'गर्मागर्म' प्रोग्राम चल रहा है!" मैंने हँसते हुए कहा|

"सही है, उन्हें लगना भी चाहिए!" अनु ने हँसते हुए कहा|

कुछ देर बाद अनु ने मुझे अपनी तरफ खींचा और मेरा सर अपनी गोद में रखा, मेरी शर्ट का कालर पकड़ कर नीचे की तरफ किया जिससे मेरी गर्दन उसे साफ़ नजर आने लगी| धीरे-धीरे उसने अपने होंठ मेरी गर्दन पर रखे और धीरे-धीरे अपनी जीभ से चुभलाने लगी| पता नहीं उसे इसमें क्या मजा आता था पर अगले दस मिनट तक वो इसी तरह मेरी गर्दन के माँस के टुकड़े को कभी धीरे से काटती, कभी उसे चुभलाती और कभी उसे चूसने लगती| दस मिनट बाद जब अनु ने मेरी गर्दन पर से अपने गुलाबी होंठ हटाए तो जितना हिस्सा उसके मुँह में था वो लाल हो चूका था और अनु के मुख के रस की तार मेरी गर्दन और उसके होठों को जोड़े हुए थी| मेरी आँखें बंद थीं जो ये बता रही थीं की मुझे कितना मज़ा आ रहा है! अनु की नजर मेरे अकड़ चुके लंड पर पड़ी और वो उभार देख उसकी सांसें थम गई| सेक्स का डर उसे सताने लगा और उसके हाथ-पाँव काँपने लगे! मेरी आँखें खुलीं और उसकी तेजी से ऊपर-नीचे होती छातियां देख मैं उसके डर को भाँप गया| मैं उठ कर बैठा तो अनु का दिल जोर से धड़कने लगा, मैंने अनु की तरफ देखा तो उसने अपनी आँखें झुका ली| मैं सीधा हो कर तकिये पर सर रख कर लेट गया और अपने दोनों हाथ खोल कर अनु को अपने पास बुलाया| अनु का डर एक सेकंड में फुर्र हो गया और वो आ कर मेरे सीने से लिपट गई और हम दोनों ऐसे ही लेटे रहे| जब अनु के दिल की धड़कन सामन्य हुई तो मैंने उसके कान में खुसफुसाती हुए कहा; "मेरा बेबी डर गया था? आपको क्या लगा की मैं......सेक्स....." मैंने थोड़ा अटकते-अटकते कहा और ये सुन अनु ने हाँ में सर हिलाया| "awww .... मेरा बेबी! don't worry!" फिर हम ऐसे ही लिपटे सो गए, वाइन की कुछ खुमारी थी बाकी अनु के जिस्म की गर्माहट जिसने मुझे और अनु को सुला दिया|

शाम 5 बजे डैडी जी का फ़ोन आया तब हम उठे और मुँह-हाथ धो कर निकले और घर पहुँचे| कपडे बदल कर हम सब निकले, आगे मैं और डैडी जी बैठे थे और पीछे अनु और मम्मी जी| पार्किंग में गाडी पार्क कर के हम सब अंदर जा रहे थे की मैंने एक कॉल का बहाना बनाया और 10 मिनट के लिए बाहर रुक गया! मैं जल्दी से अंदर आया तो अनु की नजरें बस मुझे ही ढूँढ रही थीं| "सॉरी जी....वो घर से कॉल आया था!" मैंने डैडी जी को झूठ बोलते हुए कहा| अनु घर का कॉल सुनते ही थोड़ा चिंतित हो गई, मैंने गर्दन ना में हिला कर उसे कहा की कोई सीरियस बात नहीं है तब जा कर उसे इत्मीनान हुआ| खाना आर्डर हुआ और वहाँ बॉलीवुड के गाने बजने लगे, कोई शोर शराबा नहीं था बस सॉफ्ट म्यूजिक बज रहा था| इधर मम्मी जी ने मेरी गर्दन पर लाल निशान देख लिया और पुछा की ये कैसे हुआ, मैंने थोड़ा शर्माते हुए कहा "एक मच्छर ने काट लिया!" ये सुनते ही अनु ने टेबल के नीचे से मुझे पैर मारा और मैं हँसने लगा| डैडी जी मेरी बात समझ गए और वो भी हँस पड़े| अनु ने जब उन्हें हँसते हुए देखा तो वो शर्म से लाल हो गई|

फिर डैडी जी ने शादी की बातें शुरू की, वो मेरे घर आना चाहते थे और मैंने उन्हें कहा कि कल अनु को मिलवा कर वापस आता हूँ और फिर आप सब मिल लीजियेगा, इतने में खाना आया और हमने खाना शुरू किया| डेजर्ट आर्डर करने के बाद मम्मी जी और अनु वाशरूम चले गए और मुझे डैडी जी से कुछ पूछने का मौका मिल गया| "डैडी जी.... एक बात पूछनी थी?" मैंने थोड़ा झिझकते हुए कहा|

"क्या हुआ बेटा? बोलो?" डैडी जी ने मुझे इज्जाजत दी फिर भी मैंने थोड़ा डरते हुए कहा; "वो.......वो मैं ....अनु को अभी प्रोपोज़ करना चाहता था!" डैडी जी ने कहा; "भई इसमें पूछने की क्या बात है?" कुछ देर बाद जब अनु और मम्मी जी आये तो मैंने खड़े हो कर अनु का हाथ पकड़ लिया और उसे बैठने नहीं दिया, मैं एक घुटने पर झुका और जेब से रिंग की डिब्बी निकाली और कहा; "थोड़ा बुद्धू हूँ, थोड़ा स्टुपिड हूँ, थोड़ा पागल हूँ पर जैसा भी हूँ तुमसे बहुत प्यार करता हूँ! Will you marry me?" अनु ख़ुशी से कूद पड़ी और हाँ में गर्दन हिलाते हुए अपना बायाँ हाथ आगे कर दिया| मैंने अनु को अंगूठी पहनाई और उठ के खड़ा हुआ| अनु फ़ौरन मेरे गले से लग गई और बोली; "I love you!" मम्मी-डैडी भी उठ खड़े हुए और हमें अपने गले लगा लिया| बहुत सारा आशीर्वाद दिया और बहुत सारा प्यार दिया| डेजर्ट आ गया था और वो खाने के बाद डैडी जी ने जबरदस्ती बिल पे किया| फिर हम घर आ गये, मम्मी जी ने सब को सोने के लिए कहा क्योंकि कल सुबह अनु और मुझे घर के लिए जल्दी निकलना था| पर अनु कहाँ सोने वाली थी, चेंज करने के बाद मैं पानी पीने किचन जा रहा था की वो मुझे खींच कर सोफे पर ले आई| टी.वी ऑन कर के हम दोनों बैठ गए, ड्राइंग रूम में आज काफी सर्दी थी पर अनु ने सारि तैयारी कर रखी थी| अनु ने एक डबल वाला कंबल अपने और मेरे ऊपर डाल दिया, अपने घुटने उसने अपनी छाती से चिपका लिए और मेरे कंधे पर सर रख कर टी.वी. देखने लगी| "बेबी! आज रात सोना नहीं है क्या?" मैंने खुसफुसाते हुए कहा| अनु ने ना में गर्दन हिलाई और कंबल के अंदर मेरा दायाँ हाथ पकड़ लिया| दस मिनट बाद मम्मी जी अनु को बुलाने आई; "बेटी सो जा और मानु को भी सोने दे! कल सुबह तुम दोनों को जाना है!"

"मम्मी मैं बस थोड़ी देर में आ रही हूँ!" अनु ने उनकी तरफ देखते हुए कहा| मम्मी जी मुस्कुरा दीं और सोने चली गईं| उनके जाते ही अनु ने मेरी गोद में सर रख दिया; "वैसे बेबी ....थैंक यू!" मैंने कहा|

"क्यों?" अनु ने पुछा|

"आपने मेरा इतना ध्यान रखा, एक पल भी मेरा ध्यान नेहा पर जाने नहीं दिया, उसके लिए..." मैंने कहा तो अनु मुस्कुरा दी फिर कुछ सोचते हुए बोली; "आज रात हम यहीं सोते हैं?"

"क्यों बेबी? मैंने थोड़ा हैरान होते हुए कहा|

"बस ऐसे ही, आज आप से अलग सोने को मन नहीं कर रहा है!" मैं समझ गया की उसके मन में कल के लिए डर पैदा हो चूका है|

"बेबी कल कुछ नहीं होगा! Everything will be fine!" मैंने अनु को आश्वासन दिया पर उसका दिल इस आश्वासन को मानने वाला नहीं था|

"कल अगर हम नहीं रहे.... तो कम से कम ये रात तो याद रहेगी ना?" अनु की आँखें छलक आईं| मैंने अनु को उठा के बिठाया और उसके चेहरे को अपने हाथों में थाम लिया; "तुम्हें पता है आज ही मैंने मम्मी-डैडी से वादा किया है की मैं तुम्हारी आँखों में आँसू का एक कटरा नहीं आने दूँगा और तुम हो की रो रही हो? क्यों मुझे झूठा बना रही हो? I promise तुम्हें कुछ नहीं होगा!" मैंने कहा|

"और अगर आपको कुछ हो गया तो? मैं तो तब भी मर जाऊँगी!" अनु ने अपने आँसू पोछते हुए कहा|

'किसी को कुछ नहीं होगा!" मैंने कहा पर इस बार मेरी बात में वजन कम था, मैं मन ही मन तैयारी कर चूका था की अगर हालत बिगड़े और हालत ऐसे बने जैसे तब बने थे जब भाभी वाला काण्ड हुआ तो मुझे कैसे भी कर के अनु को बचाना है| उसे मेरी वजह से कुछ नहीं होना चाहिए! उस काण्ड के बारे में सोचते ही मेरे रोंगटे खड़े हो गए थे!
 
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