[color=rgb(255,]अंतिम अध्याय: प्रतिकाष्ठा[/color]
[color=rgb(51,]भाग - 15[/color]
[color=rgb(26,]अब तक अपने पढ़ा:[/color]
संगीता खाना बनाने गई तो नेहा का बेचैन मन फिर एक बार मेरे खिलाफ सोचने लगा; "He (मैं) doesn't love me anymore! तभी तो मेरे साथ इतना सब कुछ हुआ लेकिन न तो 'पापा' मुझे लाड-प्यार करने आये और न ही उन्होंने उस अरमान को कुछ कहा! बल्कि वो तो दादी जी के साथ मंदिर चले गए ताकि उन्हें मेरा सामना ही न करना पड़े| वाह पापा वाह! आपने तो मुझे बिलकुल ही पराया कर दिया!" नेहा के मन में बैठी हुई नफरत बोली| गौर करने वाली बात ये थी की नेहा ने आज जा कर मुझे 'पापा' कहा था, जबकि नेहा मुझे हमेशा 'पापा जी' कहती थी| ये दर्शाता था की ठोकर लगने के बाद नेहा को मेरी कितनी जर्रूरत थी की उसने मुझे अपना पापा तो माना मगर संगीता की बात सुन नेहा के मन में पैदा हुई नफरत ने नेहा को मुझे मान-सम्मान देते हुए 'अपाप जी' कह पुनः अपना पिता मानने से रोक रखा था!
कई बार इंसान अपनी गलती मान कर अपनी गलती दुरुस्त करने के बजाए अपना गुस्सा उस आदमी पर निकालता है जो उसके गलत करने पर उसके साथ नहीं था! यही हाल इस समय नेहा का था, बजाए ग्लानि महसूस करने के वो तो मुझे ही कसूरवार मान रही थी!
[color=rgb(251,]अब आगे:[/color]
दोपहर के खाने के समय मैं, माँ और स्तुति मंदिर से दर्शन कर घर लौटे| घर में हुए इस हादसे का पता माँ, स्तुति और आयुष को नहीं था इसलिए संगीता ने नेहा को समझा दिया था की उसे तीनों (माँ, स्तुति और आयुष) के सामने खुद को पहले की तरह सामान्य दिखाना है|
माँ सबसे आगे थीं और उनके पीछे मैं तथा मेरी गोदी में स्तुति कहकहे लगाने में व्यस्त थी| माँ को देखते ही नेहा आ कर अपनी दादी जी की कमर से लिपट गई| माँ ने अपनी लाड़ली पोती का सर चूमा और उसके पढ़ाई करने के लिए दिन-रात एक करने को ले कर खूब शाबाशी दी| अपनी दादी जी से शाबाशी पा कर नेहा को और भी ग्लानि होने लगी थी की उसकी भोली-भाली दादी जी उस पर इतना विश्वास करतीं हैं जबकि नेहा अपनी दादी जी के साथ झूठ बोल कर छल कर रही थी!
नेहा को ग्लानि के कारण खामोश देख मैंने स्तुति को अपनी दिद्दा को प्रसाद देने की याद दिलाई| स्तुति मेरी गोदी से उतरी और अपनी दिद्दा को बस दो दाने प्रसाद के देते हुए बोली; "दिद्दा, आप को बस थोड़ा सा प्रसाद मिलेगा क्योंकि आप मुझे चॉकलेट नहीं देते! बाकी का सारा प्रसाद मेरे बड़े भैया को मिलेगा!" ये कहते हुए स्तुति ने सारा प्रसाद आयुष को दे दिया| स्तुति का बचपना देख सब ज़ोर से ठहाका लगा कर हँसने लगे|
अब नेहा को अपनी छोटी बहन को मनाना था इसलिए नेहा दो दाने प्रसाद के खाते हुए बोली; "अच्छा स्तुति जी, अगलीबार आपको चॉकलेट ला कर दूँगी!" नेहा ने स्तुति को चॉकलेट का लालच दे कर अपने पास बुलाया मगर स्तुति अपने बड़े भैया की पीठ पर चढ़ते हुए न में अपनी गर्दन हिलाने लगी| नेहा के मुक़ाबले स्तुति को अपने बड़े भैया से अधिक लगाव था इसलिए स्तुति अपने बड़े भैया की पीठ पर चढ़ खिलखिलाने लगी|
मैं, माँ और स्तुति तो मंदिर के भंडारे में भरपेट प्रसाद खा कर आये थे इसलिए हम तीनों ने खाना नहीं खाया| बचे माँ-बेटा-बेटी (संगीता-आयुष-नेहा) तो तीनों खाना खाने बैठ गए| इधर स्तुति को अपनी आज की मस्ती का ब्यौरा देना था इसलिए स्तुति रिपब्लिक चैनल के संवाददाता की तरह घूम-घूम कर अपनी आज की दिनभर की गई मस्ती के बारे में बड़े चाव से बताने लगी| स्तुति के इस बालपन ने घर का माहौल खुशनुमा बना दिया था तथा सबके चेहरे पर मुस्कान ला दी थी|
खाना खा कर सब ने आराम करना था, स्तुति तो मेरी गोदी में चढ़ कर मुझसे किसी कोअला (Koala) की तरह लिपट गई| नेहा अपनी दादी जी के साथ सोने के लिए जा रही थी मगर उसकी नज़र मुझ पर टिकी थी| मैंने गौर किया तो पाया की नेहा की नज़रों में मेरे प्रति गुस्सा है...नफरत है!
शायद मुझे नेहा की इस नफरत की आदत हो गई थी इसलिए मुझे इस समय कुछ महसूस नहीं हुआ इसलिए मैं चुपचाप अपने कमरे में आ कर लेट गया| वहीं मेरा ये उखड़ापन देख नेहा को हैरानी हो रही थी की उसका गुस्सा देख कर भी मैंने क्यों नेहा से कुछ नहीं कहा?!
जब स्तुति सो गई तब संगीता ने मुझे नेहा से हुई बातों के बारे में बताया| मुझे ये जानकार इत्मीनान हुआ की नेहा का दामन पाक साफ है| चूँकि संगीता ने इस परिस्थति में शांत दिमाग से काम लिया था इसलिए मैंने संगीता की भी थोड़ी तारीफ कर दी| अपनी तारीफ सुन संगीता शर्मा गई और मुझे चिढ़ाने के लिए उसने स्तुति के गाल पर पप्पी की| अपनी मम्मी के यूँ अचानक पप्पी करने से स्तुति की नींद खुल गई और जिस गाल पर संगीता ने पप्पी की थी उस गाल को अपने हाथ से पोंछ दिया| संगीता ने जब स्तुति को ऐसे करते देखा तो उसे आया प्यारा सा गुस्सा; "मेरी पप्पी तुझे अच्छी नहीं लगती?!" अपनी मम्मी का ये प्यारभरा गुस्सा देख स्तुति ने अपनी मम्मी को जीभ चिढ़ाई और मेरी छाती से लिपट कर छुपने लगी| मैंने भी अपनी बेटी को बचाने के लिए उसे अपनी बाहों में जकड़ लिया और स्तुति के सर को चूम लाड करने लगा|
शाम के समय सब चाय पी रहे थे जब मैं आयुष को अपने साथ ले कर नीचे आ गया| मेरे कारण आयुष अपनी दीदी से नाराज़ था और इस समय जब नेहा को अपने भाई के प्यार की जर्रूरत थी तब मुझे ही आयुष को मनाना था|
मैं: आयुष बेटा, अपनी दीदी को माफ़ कर दो| नेहा ने गुस्से में जो कहा या किया उसके लिए मैं आपसे माफ़ी माँगता हूँ|
मैंने नेहा की तरफ से आयुष के आगे हाथ जोड़कर माफ़ी माँगी तो आयुष ने फौरन मेरे दोनों हाथ अपनी हथेलियों में थाम लिए और भावुक हो कर बोला;
आयुष: पापा जी, दीदी ने आपको इतना गलत समझा, आपके लिए इतने गंदे शब्द कहे और आप उन्हीं की तरफ से माफ़ी माँग रहे हो? माफ़ी तो दीदी को आपसे माँगनी चाहिए जो उन्होंने आपका इतना दिल दुखाया!
आयुष उम्र बहुत छोटा था मगर वो बातें बिलकुल वयस्कों जैसी करता था| आयुष की बात सुन मैं उसके कँधे पर हाथ रख बोला;
मैं: बेटा, नेहा और मेरे बीच जो बोला-चाली हुई उसकी वजह से आपका अपनी बड़ी बहन से यूँ बात करना बंद कर देना क्या उचित है? किसी के गुस्से का बदला गुस्से से देना चाहिए, क्या यही संस्कार मैंने, आपके दादा जी ने, आपकी दादी जी ने आपको दिए हैं?! बेटा, नेहा आपकी बड़ी बहन है और कई बार बड़े भी गलती करते हैं और अपने से छोटों से माफ़ी माँगने में कतराते हैं| ऐसे में आपको चाहिए की आप खुद जा कर अपने से बड़ों को माफ़ कर दो और उन्हें पहले की तरह प्यार तथा सम्मान दो|
मैंने जब संस्कारों का वास्ता दिया तो आयुष निरुत्तर हो गया तथा मेरे गले लग कर रुनवासा हो कर बोला;
आयुष: जी पापा जी!
आयुष एक आज्ञाकारी बेटा था, उसके लिए मेरी या संगीता की कही बात पत्थर की लकीर होती थी जिसे आयुष भूल कर भी नहीं लाँघता था| इस समय मुझे आयुष पर बहुत गर्व हो रहा था इसलिए मैंने आयुष के मस्तक को चूम आशीर्वाद दिया|
कुछ देर बाद नेहा टीचर बन कर स्तुति को पढ़ा रही थी तब आयुष कमरे में आया और बिना कुछ कहे आयुष ने अपनी दीदी के पॉंव छू लिए| नेहा ने जब आयुष को उसके पॉंव छूते देखा तो वो एकदम से उठ खड़ी हुई और आयुष को अपने गले लगाते हुए बोली; "मुझे माफ़ कर दे आयुष, मैंने तुझ पर हाथ उठाया|" आयुष के पॉंव छूने से नेहा की आँखें भर आईं थीं और साथ ही नेहा का मन ग्लानि की आग में जलने लगा था इसलिए नेहा ने फौरन अपने छोटे भाई से माफ़ी माँग ली|
दरअसल, नेहा इस वक़्त ऐसे पड़ाव पर अकेली खड़ी थी जहाँ उसे अपने भाई और बहन के साथ की जर्रूरत थी इसीलिए नेहा ने बिना झिझके अपने भाई से माफ़ी माँगी थी|
"आप मेरी दीदी हो और पापा जी कहते हैं की दीदी माँ सामान होती हैं, फिर मेरे जुबान लड़ाने पर अगर आपने मुझे मार दिया तो कौन सा गुनाह किया?!" आयुष ने अपनी दीदी के आँसूँ पोछते हुए कहा| गले लगने के कारण दोनों भाई-बहन भावुक हो गए थे और ये दृश्य देख स्तुति भी भावुक हो गई थी| स्तुति एकदम से उठी और पहले अपने आयुष भैया के पॉंव छुए फिर नेहा के पॉंव छू कर मुस्कुराने लगी|
"तूने क्यों हमारे पॉंव छुए?" नेहा ने मुस्कुराते हुए स्तुति से सवाल पुछा तो स्तुति खिलखिलाते हुए बोली; "दिद्दा, पपई ने बोला की दीदी मम्मी का रूप होती हैं और बड़े भैया पापा का रूप इसलिए मैंने आप दोनों के पॉंव छू कर आशीर्वाद लिया|" एक छोटी बच्ची इतनी बड़ी बात कह रही थी, ये देख कर आयुष और नेहा को अपनी छोटी बहन पर गर्व हो रहा था| नेहा ने स्तुति को अपने गले लगाया और उसके गाल खींचते हुए बोली; "इतनी शैतानी करती है लेकिन बातें करती है बड़ी-बड़ी! तू सच में शैतान की नानी है!" अपनी दीदी की बात सुन स्तुति और ज़ोर से खिलखिलाने लगी तथा उसे यूँ हँसता देख दोनों भाई-बहन भी ज़ोर से खिलखिलाने लगे! एक छोटी सी बच्ची ने आज अपने दोनों भैया-दीदी को एकदम से हँसा दिया था!
चूँकि स्तुति ने घर का माहौल खुशनुमा कर दिया था तो आयुष को अपनी दीदी से बात करने का सही अवसर मिल गया| "स्तुति, आप जा कर बाहर खेलो तब तक मैं दीदी से पढ़ लेता हूँ|" आयुष ने बहाना बनाते हुए स्तुति को खेलने को कहा| स्तुति को पहले ही अपनी दिद्दा से पढ़ना अच्छा नहीं लगता था क्योंकि नेहा पढ़ाते समय एक कड़क मास्टरनी बन जाती थी इसलिए अपने बड़े भैया की बात सुन स्तुति फौरन खेलने के लिए भाग गई!
"दीदी, अब देखो सब ठीक हो गया है तो आप पापा जी से बता क्यों नहीं करते? उनसे माफ़ी क्यों नहीं माँग लेते?" आयुष ने बिना बात घुमाये अपनी दीदी से सवाल किया| परन्तु आयुष की बातों ने नेहा को फिर से दुखी कर दिया था, अतः नेहा नज़रें फेर कर अपना सर न में हिलाने लगी| "क्यों दीदी? प्लीज बताओ मुझे?" आयुष ने जवाब पाने के इरादे से नेहा पर ज़ोर डाला तो नेहा रुनवासी हो कर बोली; "जब तुझे जर्रूरत पड़ी तो उन्होंने (मैंने) तुझे प्यार से सँभाला मगर आज जब मुझे उनकी जर्रूरत है तो वो मुझसे बात तक नहीं करते और तू मुझे ही माफ़ी माँगने को कह रहा है?!" अपनी दीदी की बातें सुन आयुष को धक्का लगा की आखिर ऐसा क्या हुआ की उसकी दीदी इस कदर दुखी हैं इसलिए आयुष ने जिज्ञासा वश नेहा से उसके दुःख के बारे में बहुत बार पुछा मगर नेहा ने शर्म के मारे आयुष से कुछ नहीं कहा|
" ठीक है दीदी, अगर आपको नहीं बताना तो मत बताओ| लेकिन प्लीज पापा जी को गलत मत समझो, वो आपकी कही बातों के कारण दुखी हैं| वो पापा जी ही थे जिन्होंने मुझे समझाया की मुझे यूँ आपसे रूठे नहीं रहना चाहिए| आप मेरी बड़ी बहन और अगर आपको मुझसे बात करने में झिझक हो रही है तो मुझे, एक छोटा भाई होने के नाते आपसे बात करनी चाहिए| अगर पापा जी मुझे न समझाते तो मैं बेवकूफ तो आपसे नाराज़ हो कर बैठा था! पापा जी भले ही आपके पास न आये हों मगर उन्हें आपके दुःख का पता है, तभी तो उन्होंने मुझे यूँ समझाया|" आयुष ने अपनी तरफ से नेहा को समझाने की बहुत कोशिश की परन्तु नेहा के गुस्से ने उसे आयुष की बात को समझने की कोशिश भी नहीं करने दी|
इतने में संगीता कमरे में आ गई और उसे देख नेहा ने बात बदल दी ताकि कहीं संगीता न शक करने लगे| बाद में आयुष ने अपनी मम्मी से बहुत पुछा की आखिर क्यों नेहा इस कदर खामोश और उदास है, परन्तु संगीता ने बातें बनाते हुए आयुष को बहला दिया|
रात में खाना खाने के बाद माँ और बच्चे टीवी देखने में व्यस्त थे| इधर संगीता ने मुझे इशारा करते हुए ऊपर छत पर बुला लिया| मैं छत पर पहुँचा तो संगीता ने ऊपर दो कुर्सियाँ पहले से लगा रखीं थीं| मैं कुछ समझ पाता उससे पहले ही संगीता पीछे से आ कर मुझसे लिपट गई! "आई लव यू जानू!" कहते हुए संगीता ने मेरी पीठ पर चूम लिया| संगीता ने मुझे अपनी तरफ घुमाया और मेरे चेहरे को अपने हाथ में लेते हुए बोली; "आपने आज जो किया उसके लिए मुझे आप पर गर्व है! आई ऍम प्राउड ऑफ़ यू जानू! (I'm proud of you jaanu!" संगीता की आँखों में मैं आज अपने लिए अलग ही जोश देख पा रहा था, उसे मुझ पर आज इतना गर्व था की अगर उसका बस चलता तो वो मेरे कँधे पर चार सितारे लगा देती!
संगीता ने मुझे कुर्सी पर बिठाया और मेरे सामने कुर्सी खींच कर बैठ गई|
संगीता: आपने उस लड़के का हाथ तोडा, उसकी जो पिटाई की उसपर मुझे कोई गुस्सा नहीं आया| मुझे तो ये जानकार ख़ुशी हुई की आपने उस पापी लड़के को उसके कर्म की सजा दे दी| उस पल मुझे लगा की नेहा कितनी खुशनसीब है की उसे आपकी तरह प्यार करने वाले पापा जी मिले| काश जब मेरे साथ गलत हुआ उस वक़्त आप वहाँ मेरी रक्षा करने के लिए मौजूद होते!
इतना कहते हुए संगीता ने अपने उस बुरे वक़्त को याद किया और भावुक हो कर कुछ पल के लिए खामोश हो गई| संगीता कहीं रो न पड़े इसलिए मैंने उसके कँधे पर हाथ रख उसके कँधे को दबा कर संगीता को मूक हिम्मत दी|
मैं: जान...
मैंने संगीता को शांत करना चाहा ताकि वो आगे कुछ न कहे मगर संगीता ने अपना सर न में हिलाते हुए अपनी बात आगे जारी रखी;
संगीता: मुझे डर लगा तो बस इस बात का की कहीं आपने उसे लड़के पर बन्दूक चला दी होती, उसकी हत्या कर दी होती तो मेरा क्या होता? माँ का क्या होता? हमारे बच्चों का क्या होता?
संगीता अपनी बात कहते हुए बहुत डर गई थी इसलिए मैंने पुनः उसके कँधे को मसल कर संगीता को हिम्मत देते हुए कहा;
मैं: जान, बस! You don't have to repeat.
मैंने संगीता को रोकना चाहा मगर संगीता फिर एक बार सर न में हिलने लगी और मेरी बात काटते हुए बोली;
संगीता: मुझे गुस्सा आ रहा था की आपने अपने पास बन्दूक रखी और मुझे बताया तक नहीं?! लेकिन फिर आपने मुझे बन्दूक रखने का असली कारण समझाया, तब जाकर मुझे समझ आया की आपने बस मिश्रा अंकल जी के प्यार की लाज रखने के लिए बंदूक रखी थी| ज़िन्दगी में पहलीबार मैंने ठंडे दिमाग से काम लिया था वरना मैंने तो आपसे बन्दूक रखने के लिए लड़ पड़ना था!
मुझसे लड़ पड़ने की बात कहते हुए संगीता के चेहरे पर मुस्कान आ गई थी|
मैं: जान, तुम्हारी जगह अगर मैं होता तो मुझे भी गुस्सा आना स्वाभाविक था|
संगीता: आपको गुस्सा आता तो आप तो मेरे एक ठो (थप्पड़) लगा ही देते!
संगीता मुझे उल्हाना देते हुए बोली, वहीं उसकी बात सुन मुझे हँसी आ गई|
संगीता के हलके से मज़ाक ने मुझे हँसा दिया था और मुझे यूँ हँसता हुआ देख संगीता ने मुझसे सवाल पूछ लिया;
संगीता: मैं एक बात पूछूँ? जब मैंने आपसे कहा की आप अपनी बंदूक को बेच दो तो आप खामोश हो कर क्या सोच रहे थे?
संगीता ने बिना बात घुमाये सच पुछा तो मैंने उसे आज के दिन में मैंने क्या-क्या महसूस किया सब सुना दिया;
मैं: जब मैंने नेहा को यूँ रोते हुए देखा तो मैं गुस्से से जलने लगा था! फिर अगले ही पल नेहा के साथ कुछ गलत होने के भय ने मुझे जकड़ लिया| सच जानने के लिए मैं पिंकी के घर के लिए निकला, लेकिन पूरे रास्ते मैं बस ये ही दुआ कर रहा था की नेहा की इज्जत पर दाग न लगा हो! मन में पनपे डर ने मुझे उग्र बना दिया था और मैंने ये तय कर लिया था की अगर नेहा के दामन में दाग लगा तो मैं उस लड़के को जान से मार दूँगा|
पिंकी के घर पहुँच कर मुझे सब बात पता चली मगर मुझे पिंकी की बातों पर ज़रा भी भरोसा नहीं हो रहा था| मुझे तब भी यही भय सता रहा था की नेहा के साथ जर्रूर कुछ गलत हुआ और इसकी सजा मैं उस लड़के को दे कर रहूँगा| पिंकी के घर से निकलते हुए मेरे सर पर खून सवार हो चूका था| मेरा गुस्सा मेरे सर पर चढ़ चूका था और मैं अपने इस गुस्से में कुछ भी कर सकता था| अरमान के घर पहुँचने तक मैंने प्लान कर लिया था की आज मैं उस लड़के को जान से मार दूँगा|
गाडी खड़ी कर जब मैंने अपनी रिवॉल्वर निकाली तो आज सालों बाद ऐसा लगा जैसे मेरे भीतर कोई नई ऊर्जा आ गई हो| ऐसा लगा जैसे जिस्म से टूटा हुआ एक बहुत जर्रूरी पुरजा मेरे जिस्म से पुनः जुड़ गया हो| रिवॉल्वर में गोली भरते हुए तो मेरे ऊपर जैसे शैतान सवार हो गया था, ऐसा शैतान जिसे अपनी बरसों पुरानी भूख मिटानी हो| लेकिन मन में तुम्हारा प्यार बैठा था जो मुझे अब भी सँभाले हुए था| जब-जब मैंने रिवॉल्वर निकाली, तब-तब तुम्हारे प्यार ने मेरी उँगलियों को ट्रिगर दबाने से रोका वरना उस लड़के को पीटते हुए मेरे भीतर का ये शैतान मेरे काबू से बाहर हो जाता था और मन करता था की उस हरामज़ादे में एक गोली तो डाल ही दूँ!
फिर एक ऐसा पल आया जब मैं उस लड़के को लातों से पीट रहा था और उसका बाप पुलिस बुलाने के लिए जा रहा था| उस पल मेरे लिए उस आदमी को रोकना जर्रूरी हो गया था इसलिए मैंने सोच-समझ कर होश में रहते हुए फर्श की तरफ निशाना लगा कर गोली चलाई|
आज इतने सालों बाद किसी पर यूँ रिवॉल्वर तानकर चलाने में जो सुकून था, जो मज़ा था उसने मेरे जिस्म के सारे रोयें खड़े कर दिए थे! गोली चलने पर जो सन्नाटा पसरा था उसमें गोली की आवाज़ गूँज कर बार-बार मेरे कानों से टकरा रही थी| गोली चलने की इस आवाज़ ने मेरे गुस्से से जल रहे दिल को अजीब सी ठंडक दी थी| मेरे सर पर जो शैतान सवार था वो भी एकदम से शांत हो गया था, मानो ये आवाज़ उसके लिए कोई मधुर संगीत हो जिसने उसे शांत कर दिया था|
जब मेरे भीतर का ये शैतान शांत हुआ तो दिमाग ने काम करना शुरू किया और मुझे एहसास दिलाया की अगर मैंने गुस्से में गोली उस लड़के या किसी पर चला दी होती तो क्या गज़ब होता! लेकिन मेरी अंतरात्मा मेरे इस गुस्से को सही ठहरा रही थी, उसके अनुसार एक बाप ने जो किया वो बिलकुल सही किया| दिमाग के आगे अंतरात्मा का पलड़ा भारी था इसलिए मेरा गुस्सा पुनः लौट आया तथा मैंने अयान का हाथ तोड़ दिया! उसकी हड्डी टूटने की आवाज़ सुन कर एक बाप के दिल को इत्मीनान मिल रहा था| मैं तो उसे और पीटना चाहता था मगर दिमाग ने मुझे अपने परिवार से सदा के लिए दूर होने का डर दिखा कर रोक लिया|
जब तुमने कहा की मुझे अपनी रिवॉल्वर से पीछा छुड़ाना चाहिए तो मेरे भीतर के शैतान ने मुझे तरह-तरह के तर्क देने शुरू कर दिए की भविष्य में अगर मुझे अपने परिवार की रक्षा करने के लिए हथियार की जर्रूरत पड़ी तो मैं क्या करूँगा? अगर कभी स्तुति की इज्जत पर बन आई तो मैं किससे रिवॉल्वर माँगूँगा? कभी अगर मेरी या तुम्हारी जान पर बन आई तो मैं निहत्था क्या करूँगा?
इन सभी सवालों को सोच कर मैं खामोश था और जवाब ढूँढ रहा था| परन्तु माँ के साथ मंदिर जा कर मुझे मेरे सवालों का जवाब मिल गया| मैं क्यों कोई फ़िक्र करूँ जब मेरे पास भगवान जी हैं मेरी मदद करने के लिए इसलिए मैंने भगवान जी पर सब छोड़ दिया है| वही मेरी इस नैय्या को रास्ता दिखाएँगे|
मेरे मुख से मेरी मनोदशा जानकार संगीता डर गई थी| मेरे भीतर के जिस शैतान को संगीता के प्यार ने दबा दिया था वो अब खुल कर बाहर आ चूका था, वो तो संगीता का प्यार था जो मुझे सँभाले था वरना मैं क्या-क्या काण्ड करता इसका अंदाजा नहीं लगाया जा सकता|
संगीता: रिवॉल्वर हाथ में लेने से आपका मन बेचैन हो जाता है न?
संगीता कुछ सोचते हुए मुझसे बोली|
मैं: हाँ! मुझे अजब सा जोश चढ़ता है| मन करता है की मैं ट्रिगर दबा दूँ और गोली चलने की आवाज़ सुन कर अपना बेचैन मन शांत कर लूँ| पता नहीं ये कैसा नशा है जिसके लिए मेरा मन बेकाबू होने लगता है|
मैंने संगीता का हाथ अपने दिल पर रखते हुए कहा| रिवॉल्वर के बारे में बात करने भर से मेरा मन अभी से बेचैन हो रहा था इसलिए मैं चाहता था की संगीता मेरी ये बेचैनी महसूस कर ले ताकि उसे ये न लगे की मैं बातें बना रहा हूँ| वहीं मेरे हृदय की बढ़ी हुई गति महसूस कर संगीता घबरा गई और एक दृढ निस्चय के साथ बोली;
संगीता: ठीक है, इसका इलाज मैं ही करुँगी| मैं संगीता की बात का मतलब समझने लगा था की संगीता एकदम से मेरे गले लग गई तथा अपनी बाजुओं को मेरे इर्द-गिर्द कस लिया! यूँ तो संगीता ने मुझे कई बार अपने आलिंगन में जकड़ा था परन्तु आज उसके इस आलिंगन की बात ही अलग थी| इस आलिंगन में मुझे खो देने का डर था, मेरे हाथों किसी पर गोली चलने का खौफ था, साथ ही मुझे फिर से गलत रास्ते पर भटकने से रोकने का दृढ निस्चय था| मैं संगीता के भीतर बैठे डर को महसूस कर चूका था, मैं नहीं चाहता था की मेरी परिणीता इस तरह डरी-डरी रहे इसलिए अपनी परिणीता के डर को भगाने के लिए मैंने रास्ता निकालते हुए कहा;
मैं: कल सुबह मैं दिषु से बता करता हूँ, वही बताएगा की रिवॉल्वर और लाइसेंस को सरेंडर कैसे करते हैं|
मेरी बात सुन संगीता के दिल को चैन मिला और उसने अपनी ख़ुशी व्यक्त करने के लिए मेरे गाल पर kissi की! उस दिन से ले कर आज तक संगीता मेरा ध्यान एक छोटे बच्चे की तरह रखती है| मुझे कभी गुस्सा ना आये इसके लिए संगीता आज भी मुझ पर ख़ास नज़र रखती है, वो बात अलग है की मैं अपने गुस्से को उससे छुपाता हूँ!
खैर, अगली सुबह 6 बजे पता चला की हमारे किसी जानने वाले की मृत्यु हो गई है इसलिए मैं और माँ सीधा वहाँ चले गए| इधर घर पर आयुष और स्तुति तो स्कूल जाने के लिए तैयार हो गए मगर नेहा ने स्कूल जाने से मना कर दिया! "मेरी तबियत ठीक नहीं, मैं स्कूल नहीं जाऊँगी!" ये कहते हुए नेहा फिर से चादर ओढ़ कर सो गई| संगीता ने आयुष-स्तुति के सामने बात को और नहीं कुरेदा तथा दोनों बच्चों को स्कूल भेज दिया|
दरअसल, नेहा को डर लग रहा था की वो स्कूल जा कर पिंकी तथा अपने अन्य दोस्तों का कैसे सामना करेगी? क्या होगा अगर पिंकी ने सबको बता दिया की पार्टी में क्या काण्ड हुआ है?! ये सब सोचकर ही नेहा स्कूल जाने से मना कर रही थी|
संगीता ने नेहा को कुछ नहीं कहा और सोने दिया| कुछ समय बाद घर के दरवाजे पर दस्तक हुई, संगीता को लगा मैं हूँ इसलिए उसने बिना देखे ही दरवाजा खोल दिया| "नमस्ते संगीता जी!" ये मीठी सी आवाज और अपने सामने अपनी सबसे बड़ी शत्रु के देख संगीता का पारा एकदम से चढ़ गया! ये शक़्स कोई और नहीं बल्कि करुणा थी!
संगीता ने गुस्से से करुणा के यूँ अचानक आने का प्रयोजन पुछा तो करुणा बोली; "मैं इदर (इधर) नेहा को समझने आया! वो अपने पापा के साथ गलत कर रे इसलिए मैं उसे सच बताने आया!" संगीता नहीं चाहती थी की करुणा दुबारा से हमारे घर के मामलों में दखलंदाज़ी करे इसलिए उसने करुणा को घर के भीतर आने से साफ़ मना कर दिया| इतने में नेहा जो की कमरे के भीतर से आवाज़ सुन रही थी वो कमरे का दरवाजा खोल कर बाहर आई और सीधा करुणा के गले लग गई!
अपनी बेटी को यूँ करुणा के गले लगा देख संगीता खामोश हो गई और उसने करुणा को अंदर आने को कहा| बैठक में करुणा ने नेहा को अपने साथ बिठाया तथा उसका हाल-चाल पुछा| करुणा के सामने नेहा एकदम सामन्य थी तथा नेहा ने पार्टी वाले हादसे का कोई जिक्र करुणा से नहीं किया|
नेहा: आंटी जी आप अचानक यहाँ कैसे आये, आपकी तो केरला में जॉब लग गई थी न?
नेहा ने ख़ुशी-ख़ुशी सवाल पुछा|
करुणा: मेरा दीदी नया घर ले रे इसलिए मुझे बुलाया| मैं कल रात दिल्ली आया था तो सोचा आपसे मिल लूँ| एक्चुअली मैं आपसे मिलने के लिए बहुत मंथ्स (months) से आने का सोच रहा ता मगर पैसा नहीं ता!
नेहा: आप कितने दिन हो दिल्ली में?
करुणा: वन वीक (one week)!
नेहा: तो कल है न आप और मैं घूमने चलेंगे|
नेहा ने ख़ुशी-ख़ुशी बिना अपनी मम्मी से पूछे कल घूमने का प्लान बनाया तो संगीता को नेहा पर गुस्सा आने लगा| लेकिन इससे पहले की संगीता कुछ कहे करुणा ने बात शुरू करते हुए कहा;
करुणा: अच्छा पहले आप मेरा बात सुनो| मुझे आपका मम्मी ने बताया की आपने अपना पापा जी को क्या-क्या बोला! ये अच्छा बात नहीं है नेहा! आपको पता भी है आपका पापा जी आपको कितना प्यार करते? जब आप इदर नहीं था न तो आपका पापा जी आपको कितना याद कर के रोता था! जब भी हम मिलते तो आपका पापा जी मुझे बताते की आप कितना क्यूट है, उनको कितना प्यार करते और आप आपने पापा जी को इतना दुःख दे रे?!
करुणा की बात सुन नेहा का सर शर्म से झुक गया था परन्तु नेहा को अपने कहे शब्दों का कोई मलाल नहीं था| नेहा को बुरा लग रहा था तो बस इस बात का की उसकी इतनी अच्छी दोस्त करुणा आंटी जी उसे ही दोषी मान रही हैं!
उधर संगीता जो की अभी तक करुणा के घर आने पर आपत्ति जता रही थी वो अब इत्मीनान से बैठ कर करुणा की बात सुनने में लगी थी की आखिर करुणा कैसे नेहा को सही रास्ते पर लाती है|
नेहा: सॉरी आंटी जी!
नेहा सर झुकाये हुए सॉरी बोली| नेहा के इस सॉरी का कोई मोल नहीं था क्योंकि वो ये सॉरी बस अपनी करुणा आंटी जी की बातों से बचने के लिए कह रही थी| नेहा की इस बेमोल सॉरी को संगीता और करुणा भाँप चुके थे इसलिए करुणा ने नेहा को सही रास्ते पर लाने के लिए अपनी बात जारी रखी;
करुणा: मैं आपको आपके पापा जी के बारे में क्या-क्या बोला, आप उसका गलत मतलब निकाला है नेहा! आपको पता नहीं की आपका पापा जी इज़ आ जेम ऑफ़ आ पर्सन (is a gem of a person)! वो मेरे लिए क्या-क्या किये ये मैं आपको आज बताते| आपका पापा ने मुझे हर तरह से सपोर्ट किया: Financially, Morally and Mentally. मैं जब भी रोया तो आपका पापा जी मेरे को कंसोल (console) किया| मेरा जॉब के लिए आपका पापा जी ने कितना efforts किया, कितना थो..ठोकर खाया...कितना भागा-दौड़ी किया! मेरा एक एग्जाम था अर्ली मॉर्निंग (early morning) में, मेरा फॅमिली...मेरा दीदी साथ जाने से मना कर दिया! तब आपका पापा विंटर का नाईट में सुबह 4 बजे मुझे लेने आया, मुझे सेंटर छोड़ा और मेरा एग्जाम खत्म होने तक बाहर वेट किया और फिर मुझे घर भी छोड़ा!
वो खुद बीमार था, लेकिन मेरा सर्टिफिकेट लेने के लिए वो बिमारी का हालत में मेरे साथ आया| मेरा जोइनिंग था दूसरा सिटी में और मेरा फॅमिली वाला कोई मेरे साथ नहीं जा रहा था, तब आपका पापा जी मेरे साथ आया और मेरा जॉब दिलावाने के लिए वो धुप में कितना भागा| मेरे पास तब इतना पैसा कुछ नहीं था, लेकिन आपका पापा जी ने मुझे सपोर्ट किया और आजतक कभी पैसा नहीं माँगा|
आपका पापा जी के साथ जाने के टाइम मुझे कभी कोई टेंशन नहीं होता ता, कभी डर नहीं लगता ता, मुझे तो आपका पापा के साथ सेफ लगता ता| आपको पता, आजतक आपका पापा जी ने मुझे कभी टच (touch) नहीं किया! एकबार हम रोड क्रॉस (road cross) कर रा था उसी टाइम मैं बहुत स्लो ता, तब मेरा हेल्प करने के लिए आपका पापा जी ने मेरा एल्बो (elbow) पकड़ा ता और उसके लिए भी वो मेरे को सॉरी बोला की मैंने बिना आपको पूछे आपका एल्बो पकड़ा!
नहीं तो आज का टाइम में आपको पता न लड़के सब कितना गन्दा होते! हम लड़कियों का वलन....vulnerable situation का फायदा उठाने से पीछे नहीं रहता! लेकिन आपका पापा जी डिफरेंट ता, वो कभी मेरा एडवांटेज नहीं लिया| ऐसा नहीं ता की उनका पास ऑपरटूनिटी (opportunity) नहीं था, मैं तो इतना डम्ब (dumb) ता की अगर आपका पापा जी चाहता तो मेरा एडवांटेज ले सकता ता मगर उन्होंने कभी ऐसा नहीं किया!
आपका पापा जी ने मेरे लिए इतना कुछ किया लेकिन मैं कभी उनका वैल्यू नहीं समझा! मुझे उनका वलु (value) तब समझ आया जब मैं केरला अपना फर्स्ट जॉब के लिए गया| उसी टाइम वहाँ का लोग मुझे जैसे देखता ता, जैसे गंदे-गंदे कमेंट करता ता वो सब सुन कर मुझे बहुत रिग्रेट हुआ की मैं आपका पापा जी का वैल्यू नहीं किया|
केरला में मैं कैसे रह रहा ता मैं सब आपका पापा को बताता था, वो सब सुन कर ही आपका पापा जी ने मुझे रूल्स बना कर दिया| वो रूल्स से मेरे को ही फायदा ता मगर मैं आपका पापा जी का बात नहीं सुना| वो मुझे कब-कब वार्न (warn) किया, तब-तब मैं उनका नहीं सुना और मैं क्या-क्या प्रॉब्लम में पड़ा मैं आपको बता नहीं सकता|
आपका पापा जी ने मुझे डे वन (day one) बोला ता की मेरे से कुछ हाईड (hide) कर रे या झूठ बोल रे तो वो दिन हमारा फ्रेंडशिप खत्म| लेकिन मैं इडियट आपका पापा को फोरग्रान्टेड (for granted) लिया और उनसे झूठ बोला, उनसे बात हाईड किया इसलिए आपका पापा जी ने मेरे को फ़ोन करना बंद किया...मेरे से बात बंद किया|
It was me who was wrong, not your papa. वो मेरा अच्छा चाहता था मगर मैं मंदबुद्धि उनको कभी नहीं समझा.और अभी आप भी वही मिस्टेक कर रे जो मैंने किया| आप बहुत लकी हो की आपको इतना प्यार करने वाला पापा जी मिला, उनका वैल्यू करो वरना वो जिस दिन आप का ऊपर गिव अप (give up) किया न उस दिन आपका लाइफ हेल (hell) बन जायेगा! Appologize to your papa, before its too late!
करुणा ने अपनी टूटी-फूटी हिंदी-अंग्रेजी को जोड़कर, दिल खोलकर अपनी बात कह दी थी, इस उम्मीद में की नेहा उसकी बातों से सबक लेगी और मुझसे बात करेगी मगर नेहा के ऊपर कोई असर नहीं हुआ| नेहा के लिए तो करुणा बस मेरा बचाव कर रही थी, मुझे सही ठहरा रही थी जबकि नेहा के लिए मैं उसका कसूरवार था!
बहरहाल कुछ देर रुकने के बाद करुणा घर चली गई| करुणा के जाने के बाद संगीता ने एकबार फिर ठंडे दिमाग से नेहा को समझाया मगर नेहा ने अपनी मम्मी की किसी बात का कोई जवाब नहीं दिया क्योंकि नेहा अपना मन बना चुकी थी की मैं ही उसका कसूरवार हूँ!
इधर हम माँ-बेटे जहाँ शोक प्रकट करने आये थे वहाँ हमें बहुत समय लगा और हमें घर पहुँचते-पहुँचते दोपहर हो गई! जब हम घर पहुँचे तब तक आयुष और स्तुति स्कूल से घर आ चुके थे| मुझे देखते ही स्तुति मेरी गोदी में आना चाहती थी मगर माँ ने उसे रोकते हुए कहा; "अभी नहीं बेटा! पहले मानु को नहाने दे. फिर उसे छूना|" अपनी दादी जी की बात सुन स्तुति को हैरानी हुई मगर जब संगीता ने स्तुति को सारी बात समझाई तो स्तुति ख़ुशी-ख़ुशी मान गई|
नाहा-धो कर हम सबने खाना खाया और खाने के समय सामान्य बातें हो रहीं थीं| माँ के सामने नेहा पहले की तरह सामन्य बर्ताव कर रही थी, हाँ वो बात अलग है की हम दोनों अब भी बात नहीं कर रहे थे| खाना खाने के बाद मैं और माँ थके हुए थे इसलिए हम अपने-अपने कमरों में लेट गए| आयुष अपनी दादी जी के पास सोया और स्तुति मुझसे लिपट कर सो गई, वहीं संगीता टीवी देखते हुए कुछ सिलाई-बुनाई करने में लगी थी|
नेहा को नींद नहीं आ रही थी इसलिए वो अपने कमरे में अकेली पढ़ रही थी की तभी उसकी दोस्त रेखा का फ़ोन आया|
रेखा: नेहा, तू आज स्कूल क्यों नहीं आई?
नेहा: कुछ नहीं यार, वो.आँख नहीं खुली|
नेहा ने झूठ बोलते हुए बात खत्म करनी चाही|
रेखा: एक बात बता, तेरे बॉयफ्रेंड अरमान की बर्थडे पार्टी में कुछ हुआ था क्या?
रेखा का सवाल सुन नेहा की हालत खराब हो गई! उसे समझ नहीं आ रहा था की वो क्या जवाब दे इसलिए आनन-फानन में नेहा ने झूठ बोल दिया!
नेहा: कु...कुछ भी तो नहीं!
रेखा: आज लंच में वो अपने पापा के साथ स्कूल आया था और उसके हाथ पर प्लास्टर चढ़ा था! उसकी क्लास में मेरा भाई पढता है, वो बता रहा था की किसी ने अरमान को बहुत मारा और उसका हाथ तोड़ दिया!
रेखा की बात सुन नेहा को लगा की उसके साथ हुए हादसे की सजा अरमान को आखिर मिल ही गई| ये बात सोच कर नेहा के दिल को चैन मिला तथा उसके चेहरे पर ख़ुशी की मुस्कान फ़ैल गई|
रेखा: यही नहीं, मेरा भाई बता रहा था की शायद इसी पिटाई की वजह से अरमान बीच साल में स्कूल छोड़ रहा है!
अरमान के स्कूल छोड़ने की बात सुन तो नेहा ख़ुशी के मारे उछल ही पड़ी! अरमान के स्कूल छोड़ने का मतलब था की अब नेहा बिना डरे स्कूल जा सकती थी| लेकिन अभी भी एक समस्या तो थी और उस समस्या का नाम था पिंकी!
नेहा: पि...पिंकी आई थी आज स्कूल?
नेहा को डर था की पिंकी ने आज स्कूल में पार्टी वाली रात हुए काण्ड के बारे में सब बक तो नहीं दिया?! यदि ऐसा हो गया होता तो नेहा में दुबारा स्कूल जा कर अपने दोस्तों के सवालों का जवाब देने व उनसे नजरें मिलाने की हिम्मत नहीं थी|
रेखा: हाँ आई थी और उसके पापा भी साथ आये थे| पिंकी पढ़ती तो है नहीं ऊपर से उसके क्लास में फैशन करने को ले कर टीचर जी ने उसके पापा जी से शिकयत कर दी| फिर क्या था, अंकल ने पूरी क्लास के सामने पिंकी को इतना डाँटा की वो बेचारी रोने लगी! अंकल ने तो टीचर जी से कह दिया की वो पिंकी को पीटें और उसके कम नंबर आने पर सीधा उन्हें फ़ोन कर दें|
रेखा ने पिंकी की पिटाई के मज़े लेते हुए सारी कहानी सुनाई तो नेहा के चेहरे पर भी मुस्कान आ ही गई| बच्चों को अपने दोस्तों को उनके मम्मी-पापा से डाँट खाते व पीटते हुए देखने में बड़ा मज़ा आता है, वही मज़ा अभी दोनों सहेलियाँ ले रहीं थीं|
रेखा से बात कर नेहा का मन हल्का हो गया था और उसे अब स्कूल जाने से अधिक डर नहीं लग रहा था| हाँ नेहा के लिए पिंकी एक समस्या अभी भी थी, परन्तु इस समस्या का समाधान नेहा को तभी मिलता जब वो पिंकी से बात करती| अतः अपनी सारी हिम्मत बटोर कर नेहा ने पिंकी को फ़ोन किया, पर पिंकी फ़ोन उठाते ही नेहा पर बरस पड़ी;
पिंकी: मैंने तुझे कहा था न की अपना मुँह बंद रखिओ, लेकिन नहीं.महारानी जी तो टेसुएँ बहाने में लगीं थीं! मैं पूछती हूँ ऐसा कौन सा काण्ड हो गया था तेरे साथ जो तूने इतनी छोटी सी बात का बतंगड़ बना दिया?! अरे वो (अरमान) तुझे kiss ही तो करना चाहता था और तो कुछ नहीं?! तेरा मन नहीं था तो तू मना कर देती, उस बेचारे को अपने पापा से पिटवाने और उसका हाथ तुड़वाने की क्या जरूरत थी?! चैन मिल गया न अब तो तुझे?!
पिंकी ने जब कहा की मैंने अरमान को पीटा और उसका हाथ तोड़ दिया तो नेहा के पॉंव तले ज़मीन खिसक गई!
नेहा: क्या?
नेहा चौंकते हुए बोली|
पिंकी: ज्यादा अनजान बनने की कोशिश मत कर! तेरे पापा ने अरमान को उसी के पापा के सामने पीटा, उसका हाथ तोड़ दिया और तुझे कुछ पता ही नहीं?! हुँह!!!
पिंकी अकड़ते हुए बोली|
नेहा: तुझे कैसे पता?
नेहा ने बात को कुरेदते हुए पुछा|
पिंकी: अरमान ने बताया! वो बेचारा तेरे पापा के कारण इतना डरा हुआ है की उसके पापा आज ही दिल्ली छोड़ कर जा रहे हैं|
पिंकी की बातें सुन कर नेहा के पास शब्द नहीं थे की वो कुछ कह सके| इधर पिंकी की बात अभी पूरी नहीं हुई थी;
पिंकी: अरे अरमान की लाइफ बर्बाद की सो की, मेरी भी लाइफ तूने बर्बाद कर दी! तेरी वजह से अब मेरा बाप मुझ पर गिद्ध की तरह नज़र गड़ाए रहता है! पहले मैं कहीं भी आती-जाती थी, जो मन आता था करती थी लेकिन तेरी वजह से मेरा घर से बाहर निकलना तक बंद हो गया! और तो और तेरी वजह से मेरा बाप मुझे A सेक्शन में डाल रहा है ताकि मैं सुधर जाऊँ! इसलिए आज के बाद कभी मेरे से बात की तो तेरे लिए अच्छा नहीं होगा!
पिंकी ने गुस्से से नेहा को धमकाया और फ़ोन काट दिया| नेहा को डर था की अगर पिंकी ने स्कूल में सच कह दिया तो नेहा की छबि पूरे स्कूल में खराब हो जाएगी इसीलिए नेहा अभी तक खामोश थी|
पिंकी के फ़ोन काटने के बाद नेहा के अंतर्मन में द्व्न्द शुरू हो गया| नेहा का मेरे प्रति गुस्सा उसे पिंकी के बताये सच पर विश्वास नहीं करने दे रहा था| अब अगर नेहा को कोई सच बता सकता था तो वो थी उसकी मम्मी संगीता क्योंकि संगीता से इतनी बड़ी बात छुपी हो ऐसा तो हो ही नहीं सकता!
अपने सवालों का टोकरा लिए नेहा अपनी मम्मी के पास बैठक में पहुँची और बिना कोई समय गँवाये उसने सारे सवाल अपनी मम्मी से पूछ डाले;
नेहा: मम्मी, अरमान की पिटाई किसने की? किसने उसे स्कूल छोड़ने...यहाँ तक की ये शहर छोड़ने के लिए धमकाया?
नेहा के सवाल सुन कर संगीता को हैरानी हुई की भला उसे ये सब किसने बताया| लेकिन फिर अगले ही पल संगीता ने अंदाजा लगाया की हो न हो नेहा की किसी सहेली ने ही उसे फ़ोन कर सब बताया होगा|
संगीता: स्तुति के पापा जी ने!
संगीता ने गर्वपूर्ण मुस्कान लिए हुए कहा| संगीता ने जानबूझ कर मुझे स्तुति का पापा कहा था क्योंकि करुणा के जाने के बाद से संगीता ने नेहा के मन में मेरे प्रति नफरत महसूस कर ली थी| संगीता अगर इस समय चुप थी तो इसलिए क्योंकि अब उसने भी हार मान ली थी की नेहा कभी मुझसे माफ़ी माँगेगी|
बहरहाल, अपनी मम्मी की बात सुन नेहा की आँखें फटी की फटी रह गईं!
नेहा: प.पापा जी ने?
ये कहते हुए नेहा की आँखों से आँसूँ बह निकले| वहीं जब संगीता ने नेहा की आँखों में आँसूँ देखे तो उसे थोड़ी हैरानी हुई! गौर करने वाली बात ये थी की आज जा कर नेहा ने मुझे अपना पापा कहा था! नेहा के मुख से मेरे लिए पापा जी सुन कर संगीता के दिल को अजीब सी ख़ुशी मिली थी|
संगीता: क्यों? तुझे क्या लगा था की किसने उस लड़के को कूटा? इस पूरी दुनिया में कोई और है जो तेरे लिए इतना कुछ करे? तेरा सगा बाप भी ये नहीं कर सकता था, जो स्तुति के पापा जी ने किया!
संगीता के पूछे इस सवाल को सुन नेहा फफक कर रोने लगी| संगीता ने नेहा को अपने गले लगाया और उसे सारी बात शुरू से आखिर तक बताई| सारी बात सुन नेहा को ग्लानि हो रही थी, इतनी ग्लानि की नेहा का रोना बेकाबू होता जा रहा था और संगीता से नेहा को इस समय सँभालना दूभर होता जा रहा था|
"मैं...मैं बहुत बुरी हूँ मम्मी! मैंने पापा जी को इतना दर्द दिया, इतना बुरा भला कहा लेकिन फिर भी उन्होंने अपने पापा होने का फ़र्ज़ निभाया और अपनी बेटी के मान-सम्मान के लिए अरमान को पीट दिया!" नेहा को अपनी गलती का एहसास हो चूका था इसलिए उसका मन अब मुझसे माफ़ी माँगने को कचोट रहा था, परन्तु माफ़ी माँगना एक कठिन काम होता है! नेहा बहुत स्वाभिमानी थी और मुझसे माफ़ी पाने के लिए उसे मेरे सामने अपनी सारी गलतियाँ स्वीकारनी थीं, जो की उसके लिए कतई आसान नहीं था!
शाम का समय था और चाय बन रही थी जब माँ मुझे जगाने कमरे में आईं| माँ सीधा मेरे सिरहाने बैठ गईं और मेरे बालों में हाथ फेर जगाने लगीं| मैं उठ कर बैठा तो स्तुति भी जाग गई और मेरी गोदी में बैठ हम माँ-बेटे की बातों के दौरान अपनी बातें जोड़ने लगी| अब चूँकि माँ बैठीं थीं तो नेहा मुझसे कुछ कह न पाई और नजरें झुकाये चुप-चाप अपनी चाय पीने लगी| वहीं मैंने नेहा के भीतर आये बदलाव को महसूस कर लिया था मगर मैं ठीक से समझ नहीं पा रहा था की आखिर नेहा यूँ खामोश क्यों है?!
अभी हम सबकी बातें चल ही रहीं थीं की तभी दरवाजे पर दस्तक हुई| संगीता दरवाजा खोलने जा रही थी मगर मैं उसे रोकते हुए खुद दरवाजा खोलने चल दिया| मैंने दरवाजा खोला तो सामने मुझे भाईसाहब खड़े हुए दिखे| अभी मैं ठीक से उनका चेहरा देख भी नहीं पाया था की भाईसाहब ने मुझे एकदम से अपने गले लगा लिया और भावुक हो कर सिसकने लगे! भाईसाहब के इस बर्ताव से मैं बहुत हैरान हुआ और उन्हें शांत करवाते हुए पूछने लगा; "भाईसाहब, क्या हुआ? सब ठीक तो है?" मैंने चिंतित होते हुए सवाल पुछा|
मेरा सवाल सुन भाईसाहब ने मेरे चेहरे को अपने हाथों में लिया और मेरा मस्तक चूमते हुए बड़े गर्व से बोले; "मुन्ना, तूने जो नेहा के लिए किया...." भाईसाहब की बात सुन मुझे हैरानी हुई की भला उन्हें सब कैसे पता चला| खैर, घर में सब मौजूद थे और कहीं माँ ये सच सुन न लें इसलिए मैंने भाईसाहब की बात काट दी; "भाईसाहब, माँ और बच्चे घर पर हैं!" मेरा इशारा समझ भाईसाहब कुछ नहीं बोले तथा अपने आँसूँ पोंछ चेहरे पर मुस्कान लिए मेरे कमरे में पहुँचे|
अपने बड़े मामा जी को देख स्तुति और आयुष ख़ुशी से उछल पड़े तथा अपने बड़े मामा जी के पॉंव छूने को दौड़े| इधर भाईसाहब की नजरें नेहा पर टिकीं थीं, नेहा उन्हें देख कर भी डरके मारे अपनी जगह से नहीं हिली थी| "नेहा बेटी" भाईसाहब ने नेहा को पुकारा तथा अपने गले लगने को बुलाया| नेहा को इस समय सबके प्यार का सहारा चाहिए था इसलिए नेहा दौड़ कर अपने बड़े मामा जी से लिपट गई तथा भाव विभोर हो कर रोने लगी| उधर माँ ने जब नेहा को यूँ रोते हुए देखा तो उन्हें शक होने लगा की जर्रूर कोई बात है| अब मुझे बात छुपानी थी इसलिए मैंने फिर एकबार उनसे झूठ बोला; "नेहा अपने बड़े मामा जी को बहुत प्यार करती है इसलिए भावुक हो गई|" पता नहीं कैसे पर माँ ने इस बार भी मेरे इस झूठ को मान लिया और मुस्कुराने लगीं|
भाईसाहब, नेहा को लाड कर शांत करवा रहे थे इस करके आयुष और स्तुति को अपने बड़े मामा जी के पॉंव छूने और लाड-प्यार पाने का मौका नहीं मिला| आयुष ने तो इस बात का बुरा नहीं लगाया मगर स्तुति को आया गुस्सा और उसने मेरे फ़ोन से अपनी बड़ी मामी जी को फ़ोन कर सब बात बता दी|
मैंने जब स्तुति को फ़ोन पर बात करते हुए देख तो मैंने स्तुति से फ़ोन लिया| फ़ोन पर भाभी जी का नाम देख मैं कुछ-कुछ समझ गया की जर्रूर स्तुति ने कोई शैतानी की है इसलिए मैंने फ़ोन लाउडस्पीकर पर कर दिया; "हमार नीक-नीक छुटकी भाँजी, जे हम का अतना मूहात ही ऊ का लाड नाहीं करत हैं! बताओ तो?! तू तनिको चिंता नाहीं करो मुन्नी, आये दिहो तोहार बड़के मामा का घरे हम इनका घरे न घुसे देब! न इनका खाना देब! अरे इनका तो हम घामेमा बिठाब और रतिया का गोरु-बछवा लगे सुलाब! बताओ हमार छुटकी भाँजी का रुलावत हैं!" भाभी जी को लग रहा था की वो स्तुति से बात कर रहीं हैं इसलिए वो अपने झूठ-मूठ के गुस्से में भाईसाहब को दी जाने वाली सज़ा के बारे में बोलती जा रहीं थीं|
जब भाभी जी की बात खत्म हुई तो हम सभी ने ज़ोर से ठहाका लगा कर हँसना शुरू कर दिया, तब भाभी जी को समझ आया की हम सब ने उनकी बातें सुन ली हैं इसलिए उनकी भी हँसी छूट गई! इधर भाईसाहब को एहसास हुआ की उन्होंने अपनी छोटी भाँजी को लाड न कर के उसे दुखी किया है इसलिए भाईसहाब ने स्तुति को गोदी में ले कर लाड करना शुरू किया| उधर भाभी जी ने बारी-बारी सभी से बात की और सबसे ज्यादा बात उनकी नेहा से हुई जिसमें वो नेहा को हिम्मत बँधा रहीं थीं|
भाभी जी ने फ़ोन रखा तो संगीता प्यारभरे गुस्से से स्तुति से बोली; "जब से तेरे बड़े मामा जी आये हैं तूने उन्हें पानी पुछा? चाय पूछी? लेकिन फट से अपनी बड़ी मामी जी से शिकायत कर दी की बड़े मामा जी मुझे प्यार नहीं करते!" अपनी गलती पता चलने पर स्तुति ने फौरन अपने कान पकड़ अपने बड़े मामा जी से माफ़ी माँगी तथा उनकी सिफारिश करने के लिए पुनः अपनी बड़ी मामी जी को फ़ोन कर दिया| "बड़ी मामी जी...बड़ी मामी जी, आप है न मेरे बड़े मामा जी को मत डाँटना!" स्तुति का ये बालपन देख हम सभी उस पर मोहित हो रहे थे, वहीं भाभी जी अपनी भाँजी का बालपन फ़ोन पर सुन मोहित हो रहीं थीं| मेरी छोटी सी बिटिया अपने बालपन से सभी को खुश रखने में कामयाब हुई थी|
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