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Hindi Antarvasna एक अनोखा बंधन - पुन: प्रारंभ


[color=rgb(255,]अंतिम अध्याय: प्रतिकाष्ठा[/color]
[color=rgb(51,]भाग - 15[/color]

[color=rgb(26,]अब तक अपने पढ़ा:[/color]

संगीता खाना बनाने गई तो नेहा का बेचैन मन फिर एक बार मेरे खिलाफ सोचने लगा; "He (मैं) doesn't love me anymore! तभी तो मेरे साथ इतना सब कुछ हुआ लेकिन न तो 'पापा' मुझे लाड-प्यार करने आये और न ही उन्होंने उस अरमान को कुछ कहा! बल्कि वो तो दादी जी के साथ मंदिर चले गए ताकि उन्हें मेरा सामना ही न करना पड़े| वाह पापा वाह! आपने तो मुझे बिलकुल ही पराया कर दिया!" नेहा के मन में बैठी हुई नफरत बोली| गौर करने वाली बात ये थी की नेहा ने आज जा कर मुझे 'पापा' कहा था, जबकि नेहा मुझे हमेशा 'पापा जी' कहती थी| ये दर्शाता था की ठोकर लगने के बाद नेहा को मेरी कितनी जर्रूरत थी की उसने मुझे अपना पापा तो माना मगर संगीता की बात सुन नेहा के मन में पैदा हुई नफरत ने नेहा को मुझे मान-सम्मान देते हुए 'अपाप जी' कह पुनः अपना पिता मानने से रोक रखा था!

कई बार इंसान अपनी गलती मान कर अपनी गलती दुरुस्त करने के बजाए अपना गुस्सा उस आदमी पर निकालता है जो उसके गलत करने पर उसके साथ नहीं था! यही हाल इस समय नेहा का था, बजाए ग्लानि महसूस करने के वो तो मुझे ही कसूरवार मान रही थी!

[color=rgb(251,]अब आगे:[/color]

दोपहर
के खाने के समय मैं, माँ और स्तुति मंदिर से दर्शन कर घर लौटे| घर में हुए इस हादसे का पता माँ, स्तुति और आयुष को नहीं था इसलिए संगीता ने नेहा को समझा दिया था की उसे तीनों (माँ, स्तुति और आयुष) के सामने खुद को पहले की तरह सामान्य दिखाना है|

माँ सबसे आगे थीं और उनके पीछे मैं तथा मेरी गोदी में स्तुति कहकहे लगाने में व्यस्त थी| माँ को देखते ही नेहा आ कर अपनी दादी जी की कमर से लिपट गई| माँ ने अपनी लाड़ली पोती का सर चूमा और उसके पढ़ाई करने के लिए दिन-रात एक करने को ले कर खूब शाबाशी दी| अपनी दादी जी से शाबाशी पा कर नेहा को और भी ग्लानि होने लगी थी की उसकी भोली-भाली दादी जी उस पर इतना विश्वास करतीं हैं जबकि नेहा अपनी दादी जी के साथ झूठ बोल कर छल कर रही थी!

नेहा को ग्लानि के कारण खामोश देख मैंने स्तुति को अपनी दिद्दा को प्रसाद देने की याद दिलाई| स्तुति मेरी गोदी से उतरी और अपनी दिद्दा को बस दो दाने प्रसाद के देते हुए बोली; "दिद्दा, आप को बस थोड़ा सा प्रसाद मिलेगा क्योंकि आप मुझे चॉकलेट नहीं देते! बाकी का सारा प्रसाद मेरे बड़े भैया को मिलेगा!" ये कहते हुए स्तुति ने सारा प्रसाद आयुष को दे दिया| स्तुति का बचपना देख सब ज़ोर से ठहाका लगा कर हँसने लगे|

अब नेहा को अपनी छोटी बहन को मनाना था इसलिए नेहा दो दाने प्रसाद के खाते हुए बोली; "अच्छा स्तुति जी, अगलीबार आपको चॉकलेट ला कर दूँगी!" नेहा ने स्तुति को चॉकलेट का लालच दे कर अपने पास बुलाया मगर स्तुति अपने बड़े भैया की पीठ पर चढ़ते हुए न में अपनी गर्दन हिलाने लगी| नेहा के मुक़ाबले स्तुति को अपने बड़े भैया से अधिक लगाव था इसलिए स्तुति अपने बड़े भैया की पीठ पर चढ़ खिलखिलाने लगी|

मैं, माँ और स्तुति तो मंदिर के भंडारे में भरपेट प्रसाद खा कर आये थे इसलिए हम तीनों ने खाना नहीं खाया| बचे माँ-बेटा-बेटी (संगीता-आयुष-नेहा) तो तीनों खाना खाने बैठ गए| इधर स्तुति को अपनी आज की मस्ती का ब्यौरा देना था इसलिए स्तुति रिपब्लिक चैनल के संवाददाता की तरह घूम-घूम कर अपनी आज की दिनभर की गई मस्ती के बारे में बड़े चाव से बताने लगी| स्तुति के इस बालपन ने घर का माहौल खुशनुमा बना दिया था तथा सबके चेहरे पर मुस्कान ला दी थी|

खाना खा कर सब ने आराम करना था, स्तुति तो मेरी गोदी में चढ़ कर मुझसे किसी कोअला (Koala) की तरह लिपट गई| नेहा अपनी दादी जी के साथ सोने के लिए जा रही थी मगर उसकी नज़र मुझ पर टिकी थी| मैंने गौर किया तो पाया की नेहा की नज़रों में मेरे प्रति गुस्सा है...नफरत है!

शायद मुझे नेहा की इस नफरत की आदत हो गई थी इसलिए मुझे इस समय कुछ महसूस नहीं हुआ इसलिए मैं चुपचाप अपने कमरे में आ कर लेट गया| वहीं मेरा ये उखड़ापन देख नेहा को हैरानी हो रही थी की उसका गुस्सा देख कर भी मैंने क्यों नेहा से कुछ नहीं कहा?!

जब स्तुति सो गई तब संगीता ने मुझे नेहा से हुई बातों के बारे में बताया| मुझे ये जानकार इत्मीनान हुआ की नेहा का दामन पाक साफ है| चूँकि संगीता ने इस परिस्थति में शांत दिमाग से काम लिया था इसलिए मैंने संगीता की भी थोड़ी तारीफ कर दी| अपनी तारीफ सुन संगीता शर्मा गई और मुझे चिढ़ाने के लिए उसने स्तुति के गाल पर पप्पी की| अपनी मम्मी के यूँ अचानक पप्पी करने से स्तुति की नींद खुल गई और जिस गाल पर संगीता ने पप्पी की थी उस गाल को अपने हाथ से पोंछ दिया| संगीता ने जब स्तुति को ऐसे करते देखा तो उसे आया प्यारा सा गुस्सा; "मेरी पप्पी तुझे अच्छी नहीं लगती?!" अपनी मम्मी का ये प्यारभरा गुस्सा देख स्तुति ने अपनी मम्मी को जीभ चिढ़ाई और मेरी छाती से लिपट कर छुपने लगी| मैंने भी अपनी बेटी को बचाने के लिए उसे अपनी बाहों में जकड़ लिया और स्तुति के सर को चूम लाड करने लगा|

शाम के समय सब चाय पी रहे थे जब मैं आयुष को अपने साथ ले कर नीचे आ गया| मेरे कारण आयुष अपनी दीदी से नाराज़ था और इस समय जब नेहा को अपने भाई के प्यार की जर्रूरत थी तब मुझे ही आयुष को मनाना था|

मैं: आयुष बेटा, अपनी दीदी को माफ़ कर दो| नेहा ने गुस्से में जो कहा या किया उसके लिए मैं आपसे माफ़ी माँगता हूँ|

मैंने नेहा की तरफ से आयुष के आगे हाथ जोड़कर माफ़ी माँगी तो आयुष ने फौरन मेरे दोनों हाथ अपनी हथेलियों में थाम लिए और भावुक हो कर बोला;

आयुष: पापा जी, दीदी ने आपको इतना गलत समझा, आपके लिए इतने गंदे शब्द कहे और आप उन्हीं की तरफ से माफ़ी माँग रहे हो? माफ़ी तो दीदी को आपसे माँगनी चाहिए जो उन्होंने आपका इतना दिल दुखाया!

आयुष उम्र बहुत छोटा था मगर वो बातें बिलकुल वयस्कों जैसी करता था| आयुष की बात सुन मैं उसके कँधे पर हाथ रख बोला;

मैं: बेटा, नेहा और मेरे बीच जो बोला-चाली हुई उसकी वजह से आपका अपनी बड़ी बहन से यूँ बात करना बंद कर देना क्या उचित है? किसी के गुस्से का बदला गुस्से से देना चाहिए, क्या यही संस्कार मैंने, आपके दादा जी ने, आपकी दादी जी ने आपको दिए हैं?! बेटा, नेहा आपकी बड़ी बहन है और कई बार बड़े भी गलती करते हैं और अपने से छोटों से माफ़ी माँगने में कतराते हैं| ऐसे में आपको चाहिए की आप खुद जा कर अपने से बड़ों को माफ़ कर दो और उन्हें पहले की तरह प्यार तथा सम्मान दो|

मैंने जब संस्कारों का वास्ता दिया तो आयुष निरुत्तर हो गया तथा मेरे गले लग कर रुनवासा हो कर बोला;

आयुष: जी पापा जी!

आयुष एक आज्ञाकारी बेटा था, उसके लिए मेरी या संगीता की कही बात पत्थर की लकीर होती थी जिसे आयुष भूल कर भी नहीं लाँघता था| इस समय मुझे आयुष पर बहुत गर्व हो रहा था इसलिए मैंने आयुष के मस्तक को चूम आशीर्वाद दिया|

कुछ देर बाद नेहा टीचर बन कर स्तुति को पढ़ा रही थी तब आयुष कमरे में आया और बिना कुछ कहे आयुष ने अपनी दीदी के पॉंव छू लिए| नेहा ने जब आयुष को उसके पॉंव छूते देखा तो वो एकदम से उठ खड़ी हुई और आयुष को अपने गले लगाते हुए बोली; "मुझे माफ़ कर दे आयुष, मैंने तुझ पर हाथ उठाया|" आयुष के पॉंव छूने से नेहा की आँखें भर आईं थीं और साथ ही नेहा का मन ग्लानि की आग में जलने लगा था इसलिए नेहा ने फौरन अपने छोटे भाई से माफ़ी माँग ली|

दरअसल, नेहा इस वक़्त ऐसे पड़ाव पर अकेली खड़ी थी जहाँ उसे अपने भाई और बहन के साथ की जर्रूरत थी इसीलिए नेहा ने बिना झिझके अपने भाई से माफ़ी माँगी थी|

"आप मेरी दीदी हो और पापा जी कहते हैं की दीदी माँ सामान होती हैं, फिर मेरे जुबान लड़ाने पर अगर आपने मुझे मार दिया तो कौन सा गुनाह किया?!" आयुष ने अपनी दीदी के आँसूँ पोछते हुए कहा| गले लगने के कारण दोनों भाई-बहन भावुक हो गए थे और ये दृश्य देख स्तुति भी भावुक हो गई थी| स्तुति एकदम से उठी और पहले अपने आयुष भैया के पॉंव छुए फिर नेहा के पॉंव छू कर मुस्कुराने लगी|

"तूने क्यों हमारे पॉंव छुए?" नेहा ने मुस्कुराते हुए स्तुति से सवाल पुछा तो स्तुति खिलखिलाते हुए बोली; "दिद्दा, पपई ने बोला की दीदी मम्मी का रूप होती हैं और बड़े भैया पापा का रूप इसलिए मैंने आप दोनों के पॉंव छू कर आशीर्वाद लिया|" एक छोटी बच्ची इतनी बड़ी बात कह रही थी, ये देख कर आयुष और नेहा को अपनी छोटी बहन पर गर्व हो रहा था| नेहा ने स्तुति को अपने गले लगाया और उसके गाल खींचते हुए बोली; "इतनी शैतानी करती है लेकिन बातें करती है बड़ी-बड़ी! तू सच में शैतान की नानी है!" अपनी दीदी की बात सुन स्तुति और ज़ोर से खिलखिलाने लगी तथा उसे यूँ हँसता देख दोनों भाई-बहन भी ज़ोर से खिलखिलाने लगे! एक छोटी सी बच्ची ने आज अपने दोनों भैया-दीदी को एकदम से हँसा दिया था!

चूँकि स्तुति ने घर का माहौल खुशनुमा कर दिया था तो आयुष को अपनी दीदी से बात करने का सही अवसर मिल गया| "स्तुति, आप जा कर बाहर खेलो तब तक मैं दीदी से पढ़ लेता हूँ|" आयुष ने बहाना बनाते हुए स्तुति को खेलने को कहा| स्तुति को पहले ही अपनी दिद्दा से पढ़ना अच्छा नहीं लगता था क्योंकि नेहा पढ़ाते समय एक कड़क मास्टरनी बन जाती थी इसलिए अपने बड़े भैया की बात सुन स्तुति फौरन खेलने के लिए भाग गई!

"दीदी, अब देखो सब ठीक हो गया है तो आप पापा जी से बता क्यों नहीं करते? उनसे माफ़ी क्यों नहीं माँग लेते?" आयुष ने बिना बात घुमाये अपनी दीदी से सवाल किया| परन्तु आयुष की बातों ने नेहा को फिर से दुखी कर दिया था, अतः नेहा नज़रें फेर कर अपना सर न में हिलाने लगी| "क्यों दीदी? प्लीज बताओ मुझे?" आयुष ने जवाब पाने के इरादे से नेहा पर ज़ोर डाला तो नेहा रुनवासी हो कर बोली; "जब तुझे जर्रूरत पड़ी तो उन्होंने (मैंने) तुझे प्यार से सँभाला मगर आज जब मुझे उनकी जर्रूरत है तो वो मुझसे बात तक नहीं करते और तू मुझे ही माफ़ी माँगने को कह रहा है?!" अपनी दीदी की बातें सुन आयुष को धक्का लगा की आखिर ऐसा क्या हुआ की उसकी दीदी इस कदर दुखी हैं इसलिए आयुष ने जिज्ञासा वश नेहा से उसके दुःख के बारे में बहुत बार पुछा मगर नेहा ने शर्म के मारे आयुष से कुछ नहीं कहा|

" ठीक है दीदी, अगर आपको नहीं बताना तो मत बताओ| लेकिन प्लीज पापा जी को गलत मत समझो, वो आपकी कही बातों के कारण दुखी हैं| वो पापा जी ही थे जिन्होंने मुझे समझाया की मुझे यूँ आपसे रूठे नहीं रहना चाहिए| आप मेरी बड़ी बहन और अगर आपको मुझसे बात करने में झिझक हो रही है तो मुझे, एक छोटा भाई होने के नाते आपसे बात करनी चाहिए| अगर पापा जी मुझे न समझाते तो मैं बेवकूफ तो आपसे नाराज़ हो कर बैठा था! पापा जी भले ही आपके पास न आये हों मगर उन्हें आपके दुःख का पता है, तभी तो उन्होंने मुझे यूँ समझाया|" आयुष ने अपनी तरफ से नेहा को समझाने की बहुत कोशिश की परन्तु नेहा के गुस्से ने उसे आयुष की बात को समझने की कोशिश भी नहीं करने दी|

इतने में संगीता कमरे में आ गई और उसे देख नेहा ने बात बदल दी ताकि कहीं संगीता न शक करने लगे| बाद में आयुष ने अपनी मम्मी से बहुत पुछा की आखिर क्यों नेहा इस कदर खामोश और उदास है, परन्तु संगीता ने बातें बनाते हुए आयुष को बहला दिया|

रात में खाना खाने के बाद माँ और बच्चे टीवी देखने में व्यस्त थे| इधर संगीता ने मुझे इशारा करते हुए ऊपर छत पर बुला लिया| मैं छत पर पहुँचा तो संगीता ने ऊपर दो कुर्सियाँ पहले से लगा रखीं थीं| मैं कुछ समझ पाता उससे पहले ही संगीता पीछे से आ कर मुझसे लिपट गई! "आई लव यू जानू!" कहते हुए संगीता ने मेरी पीठ पर चूम लिया| संगीता ने मुझे अपनी तरफ घुमाया और मेरे चेहरे को अपने हाथ में लेते हुए बोली; "आपने आज जो किया उसके लिए मुझे आप पर गर्व है! आई ऍम प्राउड ऑफ़ यू जानू! (I'm proud of you jaanu!" संगीता की आँखों में मैं आज अपने लिए अलग ही जोश देख पा रहा था, उसे मुझ पर आज इतना गर्व था की अगर उसका बस चलता तो वो मेरे कँधे पर चार सितारे लगा देती!

संगीता ने मुझे कुर्सी पर बिठाया और मेरे सामने कुर्सी खींच कर बैठ गई|

संगीता: आपने उस लड़के का हाथ तोडा, उसकी जो पिटाई की उसपर मुझे कोई गुस्सा नहीं आया| मुझे तो ये जानकार ख़ुशी हुई की आपने उस पापी लड़के को उसके कर्म की सजा दे दी| उस पल मुझे लगा की नेहा कितनी खुशनसीब है की उसे आपकी तरह प्यार करने वाले पापा जी मिले| काश जब मेरे साथ गलत हुआ उस वक़्त आप वहाँ मेरी रक्षा करने के लिए मौजूद होते!

इतना कहते हुए संगीता ने अपने उस बुरे वक़्त को याद किया और भावुक हो कर कुछ पल के लिए खामोश हो गई| संगीता कहीं रो न पड़े इसलिए मैंने उसके कँधे पर हाथ रख उसके कँधे को दबा कर संगीता को मूक हिम्मत दी|

मैं: जान...

मैंने संगीता को शांत करना चाहा ताकि वो आगे कुछ न कहे मगर संगीता ने अपना सर न में हिलाते हुए अपनी बात आगे जारी रखी;

संगीता: मुझे डर लगा तो बस इस बात का की कहीं आपने उसे लड़के पर बन्दूक चला दी होती, उसकी हत्या कर दी होती तो मेरा क्या होता? माँ का क्या होता? हमारे बच्चों का क्या होता?

संगीता अपनी बात कहते हुए बहुत डर गई थी इसलिए मैंने पुनः उसके कँधे को मसल कर संगीता को हिम्मत देते हुए कहा;

मैं: जान, बस! You don't have to repeat.

मैंने संगीता को रोकना चाहा मगर संगीता फिर एक बार सर न में हिलने लगी और मेरी बात काटते हुए बोली;

संगीता: मुझे गुस्सा आ रहा था की आपने अपने पास बन्दूक रखी और मुझे बताया तक नहीं?! लेकिन फिर आपने मुझे बन्दूक रखने का असली कारण समझाया, तब जाकर मुझे समझ आया की आपने बस मिश्रा अंकल जी के प्यार की लाज रखने के लिए बंदूक रखी थी| ज़िन्दगी में पहलीबार मैंने ठंडे दिमाग से काम लिया था वरना मैंने तो आपसे बन्दूक रखने के लिए लड़ पड़ना था!

मुझसे लड़ पड़ने की बात कहते हुए संगीता के चेहरे पर मुस्कान आ गई थी|

मैं: जान, तुम्हारी जगह अगर मैं होता तो मुझे भी गुस्सा आना स्वाभाविक था|

संगीता: आपको गुस्सा आता तो आप तो मेरे एक ठो (थप्पड़) लगा ही देते!

संगीता मुझे उल्हाना देते हुए बोली, वहीं उसकी बात सुन मुझे हँसी आ गई|

संगीता के हलके से मज़ाक ने मुझे हँसा दिया था और मुझे यूँ हँसता हुआ देख संगीता ने मुझसे सवाल पूछ लिया;

संगीता: मैं एक बात पूछूँ? जब मैंने आपसे कहा की आप अपनी बंदूक को बेच दो तो आप खामोश हो कर क्या सोच रहे थे?

संगीता ने बिना बात घुमाये सच पुछा तो मैंने उसे आज के दिन में मैंने क्या-क्या महसूस किया सब सुना दिया;

मैं: जब मैंने नेहा को यूँ रोते हुए देखा तो मैं गुस्से से जलने लगा था! फिर अगले ही पल नेहा के साथ कुछ गलत होने के भय ने मुझे जकड़ लिया| सच जानने के लिए मैं पिंकी के घर के लिए निकला, लेकिन पूरे रास्ते मैं बस ये ही दुआ कर रहा था की नेहा की इज्जत पर दाग न लगा हो! मन में पनपे डर ने मुझे उग्र बना दिया था और मैंने ये तय कर लिया था की अगर नेहा के दामन में दाग लगा तो मैं उस लड़के को जान से मार दूँगा|

पिंकी के घर पहुँच कर मुझे सब बात पता चली मगर मुझे पिंकी की बातों पर ज़रा भी भरोसा नहीं हो रहा था| मुझे तब भी यही भय सता रहा था की नेहा के साथ जर्रूर कुछ गलत हुआ और इसकी सजा मैं उस लड़के को दे कर रहूँगा| पिंकी के घर से निकलते हुए मेरे सर पर खून सवार हो चूका था| मेरा गुस्सा मेरे सर पर चढ़ चूका था और मैं अपने इस गुस्से में कुछ भी कर सकता था| अरमान के घर पहुँचने तक मैंने प्लान कर लिया था की आज मैं उस लड़के को जान से मार दूँगा|

गाडी खड़ी कर जब मैंने अपनी रिवॉल्वर निकाली तो आज सालों बाद ऐसा लगा जैसे मेरे भीतर कोई नई ऊर्जा आ गई हो| ऐसा लगा जैसे जिस्म से टूटा हुआ एक बहुत जर्रूरी पुरजा मेरे जिस्म से पुनः जुड़ गया हो| रिवॉल्वर में गोली भरते हुए तो मेरे ऊपर जैसे शैतान सवार हो गया था, ऐसा शैतान जिसे अपनी बरसों पुरानी भूख मिटानी हो| लेकिन मन में तुम्हारा प्यार बैठा था जो मुझे अब भी सँभाले हुए था| जब-जब मैंने रिवॉल्वर निकाली, तब-तब तुम्हारे प्यार ने मेरी उँगलियों को ट्रिगर दबाने से रोका वरना उस लड़के को पीटते हुए मेरे भीतर का ये शैतान मेरे काबू से बाहर हो जाता था और मन करता था की उस हरामज़ादे में एक गोली तो डाल ही दूँ!

फिर एक ऐसा पल आया जब मैं उस लड़के को लातों से पीट रहा था और उसका बाप पुलिस बुलाने के लिए जा रहा था| उस पल मेरे लिए उस आदमी को रोकना जर्रूरी हो गया था इसलिए मैंने सोच-समझ कर होश में रहते हुए फर्श की तरफ निशाना लगा कर गोली चलाई|

आज इतने सालों बाद किसी पर यूँ रिवॉल्वर तानकर चलाने में जो सुकून था, जो मज़ा था उसने मेरे जिस्म के सारे रोयें खड़े कर दिए थे! गोली चलने पर जो सन्नाटा पसरा था उसमें गोली की आवाज़ गूँज कर बार-बार मेरे कानों से टकरा रही थी| गोली चलने की इस आवाज़ ने मेरे गुस्से से जल रहे दिल को अजीब सी ठंडक दी थी| मेरे सर पर जो शैतान सवार था वो भी एकदम से शांत हो गया था, मानो ये आवाज़ उसके लिए कोई मधुर संगीत हो जिसने उसे शांत कर दिया था|

जब मेरे भीतर का ये शैतान शांत हुआ तो दिमाग ने काम करना शुरू किया और मुझे एहसास दिलाया की अगर मैंने गुस्से में गोली उस लड़के या किसी पर चला दी होती तो क्या गज़ब होता! लेकिन मेरी अंतरात्मा मेरे इस गुस्से को सही ठहरा रही थी, उसके अनुसार एक बाप ने जो किया वो बिलकुल सही किया| दिमाग के आगे अंतरात्मा का पलड़ा भारी था इसलिए मेरा गुस्सा पुनः लौट आया तथा मैंने अयान का हाथ तोड़ दिया! उसकी हड्डी टूटने की आवाज़ सुन कर एक बाप के दिल को इत्मीनान मिल रहा था| मैं तो उसे और पीटना चाहता था मगर दिमाग ने मुझे अपने परिवार से सदा के लिए दूर होने का डर दिखा कर रोक लिया|

जब तुमने कहा की मुझे अपनी रिवॉल्वर से पीछा छुड़ाना चाहिए तो मेरे भीतर के शैतान ने मुझे तरह-तरह के तर्क देने शुरू कर दिए की भविष्य में अगर मुझे अपने परिवार की रक्षा करने के लिए हथियार की जर्रूरत पड़ी तो मैं क्या करूँगा? अगर कभी स्तुति की इज्जत पर बन आई तो मैं किससे रिवॉल्वर माँगूँगा? कभी अगर मेरी या तुम्हारी जान पर बन आई तो मैं निहत्था क्या करूँगा?

इन सभी सवालों को सोच कर मैं खामोश था और जवाब ढूँढ रहा था| परन्तु माँ के साथ मंदिर जा कर मुझे मेरे सवालों का जवाब मिल गया| मैं क्यों कोई फ़िक्र करूँ जब मेरे पास भगवान जी हैं मेरी मदद करने के लिए इसलिए मैंने भगवान जी पर सब छोड़ दिया है| वही मेरी इस नैय्या को रास्ता दिखाएँगे|

मेरे मुख से मेरी मनोदशा जानकार संगीता डर गई थी| मेरे भीतर के जिस शैतान को संगीता के प्यार ने दबा दिया था वो अब खुल कर बाहर आ चूका था, वो तो संगीता का प्यार था जो मुझे सँभाले था वरना मैं क्या-क्या काण्ड करता इसका अंदाजा नहीं लगाया जा सकता|

संगीता: रिवॉल्वर हाथ में लेने से आपका मन बेचैन हो जाता है न?

संगीता कुछ सोचते हुए मुझसे बोली|

मैं: हाँ! मुझे अजब सा जोश चढ़ता है| मन करता है की मैं ट्रिगर दबा दूँ और गोली चलने की आवाज़ सुन कर अपना बेचैन मन शांत कर लूँ| पता नहीं ये कैसा नशा है जिसके लिए मेरा मन बेकाबू होने लगता है|

मैंने संगीता का हाथ अपने दिल पर रखते हुए कहा| रिवॉल्वर के बारे में बात करने भर से मेरा मन अभी से बेचैन हो रहा था इसलिए मैं चाहता था की संगीता मेरी ये बेचैनी महसूस कर ले ताकि उसे ये न लगे की मैं बातें बना रहा हूँ| वहीं मेरे हृदय की बढ़ी हुई गति महसूस कर संगीता घबरा गई और एक दृढ निस्चय के साथ बोली;

संगीता: ठीक है, इसका इलाज मैं ही करुँगी| मैं संगीता की बात का मतलब समझने लगा था की संगीता एकदम से मेरे गले लग गई तथा अपनी बाजुओं को मेरे इर्द-गिर्द कस लिया! यूँ तो संगीता ने मुझे कई बार अपने आलिंगन में जकड़ा था परन्तु आज उसके इस आलिंगन की बात ही अलग थी| इस आलिंगन में मुझे खो देने का डर था, मेरे हाथों किसी पर गोली चलने का खौफ था, साथ ही मुझे फिर से गलत रास्ते पर भटकने से रोकने का दृढ निस्चय था| मैं संगीता के भीतर बैठे डर को महसूस कर चूका था, मैं नहीं चाहता था की मेरी परिणीता इस तरह डरी-डरी रहे इसलिए अपनी परिणीता के डर को भगाने के लिए मैंने रास्ता निकालते हुए कहा;

मैं: कल सुबह मैं दिषु से बता करता हूँ, वही बताएगा की रिवॉल्वर और लाइसेंस को सरेंडर कैसे करते हैं|

मेरी बात सुन संगीता के दिल को चैन मिला और उसने अपनी ख़ुशी व्यक्त करने के लिए मेरे गाल पर kissi की! उस दिन से ले कर आज तक संगीता मेरा ध्यान एक छोटे बच्चे की तरह रखती है| मुझे कभी गुस्सा ना आये इसके लिए संगीता आज भी मुझ पर ख़ास नज़र रखती है, वो बात अलग है की मैं अपने गुस्से को उससे छुपाता हूँ!

खैर, अगली सुबह 6 बजे पता चला की हमारे किसी जानने वाले की मृत्यु हो गई है इसलिए मैं और माँ सीधा वहाँ चले गए| इधर घर पर आयुष और स्तुति तो स्कूल जाने के लिए तैयार हो गए मगर नेहा ने स्कूल जाने से मना कर दिया! "मेरी तबियत ठीक नहीं, मैं स्कूल नहीं जाऊँगी!" ये कहते हुए नेहा फिर से चादर ओढ़ कर सो गई| संगीता ने आयुष-स्तुति के सामने बात को और नहीं कुरेदा तथा दोनों बच्चों को स्कूल भेज दिया|

दरअसल, नेहा को डर लग रहा था की वो स्कूल जा कर पिंकी तथा अपने अन्य दोस्तों का कैसे सामना करेगी? क्या होगा अगर पिंकी ने सबको बता दिया की पार्टी में क्या काण्ड हुआ है?! ये सब सोचकर ही नेहा स्कूल जाने से मना कर रही थी|

संगीता ने नेहा को कुछ नहीं कहा और सोने दिया| कुछ समय बाद घर के दरवाजे पर दस्तक हुई, संगीता को लगा मैं हूँ इसलिए उसने बिना देखे ही दरवाजा खोल दिया| "नमस्ते संगीता जी!" ये मीठी सी आवाज और अपने सामने अपनी सबसे बड़ी शत्रु के देख संगीता का पारा एकदम से चढ़ गया! ये शक़्स कोई और नहीं बल्कि करुणा थी!

संगीता ने गुस्से से करुणा के यूँ अचानक आने का प्रयोजन पुछा तो करुणा बोली; "मैं इदर (इधर) नेहा को समझने आया! वो अपने पापा के साथ गलत कर रे इसलिए मैं उसे सच बताने आया!" संगीता नहीं चाहती थी की करुणा दुबारा से हमारे घर के मामलों में दखलंदाज़ी करे इसलिए उसने करुणा को घर के भीतर आने से साफ़ मना कर दिया| इतने में नेहा जो की कमरे के भीतर से आवाज़ सुन रही थी वो कमरे का दरवाजा खोल कर बाहर आई और सीधा करुणा के गले लग गई!

अपनी बेटी को यूँ करुणा के गले लगा देख संगीता खामोश हो गई और उसने करुणा को अंदर आने को कहा| बैठक में करुणा ने नेहा को अपने साथ बिठाया तथा उसका हाल-चाल पुछा| करुणा के सामने नेहा एकदम सामन्य थी तथा नेहा ने पार्टी वाले हादसे का कोई जिक्र करुणा से नहीं किया|

नेहा: आंटी जी आप अचानक यहाँ कैसे आये, आपकी तो केरला में जॉब लग गई थी न?

नेहा ने ख़ुशी-ख़ुशी सवाल पुछा|

करुणा: मेरा दीदी नया घर ले रे इसलिए मुझे बुलाया| मैं कल रात दिल्ली आया था तो सोचा आपसे मिल लूँ| एक्चुअली मैं आपसे मिलने के लिए बहुत मंथ्स (months) से आने का सोच रहा ता मगर पैसा नहीं ता!

नेहा: आप कितने दिन हो दिल्ली में?

करुणा: वन वीक (one week)!

नेहा: तो कल है न आप और मैं घूमने चलेंगे|

नेहा ने ख़ुशी-ख़ुशी बिना अपनी मम्मी से पूछे कल घूमने का प्लान बनाया तो संगीता को नेहा पर गुस्सा आने लगा| लेकिन इससे पहले की संगीता कुछ कहे करुणा ने बात शुरू करते हुए कहा;

करुणा: अच्छा पहले आप मेरा बात सुनो| मुझे आपका मम्मी ने बताया की आपने अपना पापा जी को क्या-क्या बोला! ये अच्छा बात नहीं है नेहा! आपको पता भी है आपका पापा जी आपको कितना प्यार करते? जब आप इदर नहीं था न तो आपका पापा जी आपको कितना याद कर के रोता था! जब भी हम मिलते तो आपका पापा जी मुझे बताते की आप कितना क्यूट है, उनको कितना प्यार करते और आप आपने पापा जी को इतना दुःख दे रे?!

करुणा की बात सुन नेहा का सर शर्म से झुक गया था परन्तु नेहा को अपने कहे शब्दों का कोई मलाल नहीं था| नेहा को बुरा लग रहा था तो बस इस बात का की उसकी इतनी अच्छी दोस्त करुणा आंटी जी उसे ही दोषी मान रही हैं!

उधर संगीता जो की अभी तक करुणा के घर आने पर आपत्ति जता रही थी वो अब इत्मीनान से बैठ कर करुणा की बात सुनने में लगी थी की आखिर करुणा कैसे नेहा को सही रास्ते पर लाती है|

नेहा: सॉरी आंटी जी!

नेहा सर झुकाये हुए सॉरी बोली| नेहा के इस सॉरी का कोई मोल नहीं था क्योंकि वो ये सॉरी बस अपनी करुणा आंटी जी की बातों से बचने के लिए कह रही थी| नेहा की इस बेमोल सॉरी को संगीता और करुणा भाँप चुके थे इसलिए करुणा ने नेहा को सही रास्ते पर लाने के लिए अपनी बात जारी रखी;

करुणा: मैं आपको आपके पापा जी के बारे में क्या-क्या बोला, आप उसका गलत मतलब निकाला है नेहा! आपको पता नहीं की आपका पापा जी इज़ आ जेम ऑफ़ आ पर्सन (is a gem of a person)! वो मेरे लिए क्या-क्या किये ये मैं आपको आज बताते| आपका पापा ने मुझे हर तरह से सपोर्ट किया: Financially, Morally and Mentally. मैं जब भी रोया तो आपका पापा जी मेरे को कंसोल (console) किया| मेरा जॉब के लिए आपका पापा जी ने कितना efforts किया, कितना थो..ठोकर खाया...कितना भागा-दौड़ी किया! मेरा एक एग्जाम था अर्ली मॉर्निंग (early morning) में, मेरा फॅमिली...मेरा दीदी साथ जाने से मना कर दिया! तब आपका पापा विंटर का नाईट में सुबह 4 बजे मुझे लेने आया, मुझे सेंटर छोड़ा और मेरा एग्जाम खत्म होने तक बाहर वेट किया और फिर मुझे घर भी छोड़ा!

वो खुद बीमार था, लेकिन मेरा सर्टिफिकेट लेने के लिए वो बिमारी का हालत में मेरे साथ आया| मेरा जोइनिंग था दूसरा सिटी में और मेरा फॅमिली वाला कोई मेरे साथ नहीं जा रहा था, तब आपका पापा जी मेरे साथ आया और मेरा जॉब दिलावाने के लिए वो धुप में कितना भागा| मेरे पास तब इतना पैसा कुछ नहीं था, लेकिन आपका पापा जी ने मुझे सपोर्ट किया और आजतक कभी पैसा नहीं माँगा|

आपका पापा जी के साथ जाने के टाइम मुझे कभी कोई टेंशन नहीं होता ता, कभी डर नहीं लगता ता, मुझे तो आपका पापा के साथ सेफ लगता ता| आपको पता, आजतक आपका पापा जी ने मुझे कभी टच (touch) नहीं किया! एकबार हम रोड क्रॉस (road cross) कर रा था उसी टाइम मैं बहुत स्लो ता, तब मेरा हेल्प करने के लिए आपका पापा जी ने मेरा एल्बो (elbow) पकड़ा ता और उसके लिए भी वो मेरे को सॉरी बोला की मैंने बिना आपको पूछे आपका एल्बो पकड़ा!

नहीं तो आज का टाइम में आपको पता न लड़के सब कितना गन्दा होते! हम लड़कियों का वलन....vulnerable situation का फायदा उठाने से पीछे नहीं रहता! लेकिन आपका पापा जी डिफरेंट ता, वो कभी मेरा एडवांटेज नहीं लिया| ऐसा नहीं ता की उनका पास ऑपरटूनिटी (opportunity) नहीं था, मैं तो इतना डम्ब (dumb) ता की अगर आपका पापा जी चाहता तो मेरा एडवांटेज ले सकता ता मगर उन्होंने कभी ऐसा नहीं किया!

आपका पापा जी ने मेरे लिए इतना कुछ किया लेकिन मैं कभी उनका वैल्यू नहीं समझा! मुझे उनका वलु (value) तब समझ आया जब मैं केरला अपना फर्स्ट जॉब के लिए गया| उसी टाइम वहाँ का लोग मुझे जैसे देखता ता, जैसे गंदे-गंदे कमेंट करता ता वो सब सुन कर मुझे बहुत रिग्रेट हुआ की मैं आपका पापा जी का वैल्यू नहीं किया|

केरला में मैं कैसे रह रहा ता मैं सब आपका पापा को बताता था, वो सब सुन कर ही आपका पापा जी ने मुझे रूल्स बना कर दिया| वो रूल्स से मेरे को ही फायदा ता मगर मैं आपका पापा जी का बात नहीं सुना| वो मुझे कब-कब वार्न (warn) किया, तब-तब मैं उनका नहीं सुना और मैं क्या-क्या प्रॉब्लम में पड़ा मैं आपको बता नहीं सकता|

आपका पापा जी ने मुझे डे वन (day one) बोला ता की मेरे से कुछ हाईड (hide) कर रे या झूठ बोल रे तो वो दिन हमारा फ्रेंडशिप खत्म| लेकिन मैं इडियट आपका पापा को फोरग्रान्टेड (for granted) लिया और उनसे झूठ बोला, उनसे बात हाईड किया इसलिए आपका पापा जी ने मेरे को फ़ोन करना बंद किया...मेरे से बात बंद किया|

It was me who was wrong, not your papa. वो मेरा अच्छा चाहता था मगर मैं मंदबुद्धि उनको कभी नहीं समझा.और अभी आप भी वही मिस्टेक कर रे जो मैंने किया| आप बहुत लकी हो की आपको इतना प्यार करने वाला पापा जी मिला, उनका वैल्यू करो वरना वो जिस दिन आप का ऊपर गिव अप (give up) किया न उस दिन आपका लाइफ हेल (hell) बन जायेगा! Appologize to your papa, before its too late!

करुणा ने अपनी टूटी-फूटी हिंदी-अंग्रेजी को जोड़कर, दिल खोलकर अपनी बात कह दी थी, इस उम्मीद में की नेहा उसकी बातों से सबक लेगी और मुझसे बात करेगी मगर नेहा के ऊपर कोई असर नहीं हुआ| नेहा के लिए तो करुणा बस मेरा बचाव कर रही थी, मुझे सही ठहरा रही थी जबकि नेहा के लिए मैं उसका कसूरवार था!

बहरहाल कुछ देर रुकने के बाद करुणा घर चली गई| करुणा के जाने के बाद संगीता ने एकबार फिर ठंडे दिमाग से नेहा को समझाया मगर नेहा ने अपनी मम्मी की किसी बात का कोई जवाब नहीं दिया क्योंकि नेहा अपना मन बना चुकी थी की मैं ही उसका कसूरवार हूँ!

इधर हम माँ-बेटे जहाँ शोक प्रकट करने आये थे वहाँ हमें बहुत समय लगा और हमें घर पहुँचते-पहुँचते दोपहर हो गई! जब हम घर पहुँचे तब तक आयुष और स्तुति स्कूल से घर आ चुके थे| मुझे देखते ही स्तुति मेरी गोदी में आना चाहती थी मगर माँ ने उसे रोकते हुए कहा; "अभी नहीं बेटा! पहले मानु को नहाने दे. फिर उसे छूना|" अपनी दादी जी की बात सुन स्तुति को हैरानी हुई मगर जब संगीता ने स्तुति को सारी बात समझाई तो स्तुति ख़ुशी-ख़ुशी मान गई|

नाहा-धो कर हम सबने खाना खाया और खाने के समय सामान्य बातें हो रहीं थीं| माँ के सामने नेहा पहले की तरह सामन्य बर्ताव कर रही थी, हाँ वो बात अलग है की हम दोनों अब भी बात नहीं कर रहे थे| खाना खाने के बाद मैं और माँ थके हुए थे इसलिए हम अपने-अपने कमरों में लेट गए| आयुष अपनी दादी जी के पास सोया और स्तुति मुझसे लिपट कर सो गई, वहीं संगीता टीवी देखते हुए कुछ सिलाई-बुनाई करने में लगी थी|

नेहा को नींद नहीं आ रही थी इसलिए वो अपने कमरे में अकेली पढ़ रही थी की तभी उसकी दोस्त रेखा का फ़ोन आया|

रेखा: नेहा, तू आज स्कूल क्यों नहीं आई?

नेहा: कुछ नहीं यार, वो.आँख नहीं खुली|

नेहा ने झूठ बोलते हुए बात खत्म करनी चाही|

रेखा: एक बात बता, तेरे बॉयफ्रेंड अरमान की बर्थडे पार्टी में कुछ हुआ था क्या?

रेखा का सवाल सुन नेहा की हालत खराब हो गई! उसे समझ नहीं आ रहा था की वो क्या जवाब दे इसलिए आनन-फानन में नेहा ने झूठ बोल दिया!

नेहा: कु...कुछ भी तो नहीं!

रेखा: आज लंच में वो अपने पापा के साथ स्कूल आया था और उसके हाथ पर प्लास्टर चढ़ा था! उसकी क्लास में मेरा भाई पढता है, वो बता रहा था की किसी ने अरमान को बहुत मारा और उसका हाथ तोड़ दिया!

रेखा की बात सुन नेहा को लगा की उसके साथ हुए हादसे की सजा अरमान को आखिर मिल ही गई| ये बात सोच कर नेहा के दिल को चैन मिला तथा उसके चेहरे पर ख़ुशी की मुस्कान फ़ैल गई|

रेखा: यही नहीं, मेरा भाई बता रहा था की शायद इसी पिटाई की वजह से अरमान बीच साल में स्कूल छोड़ रहा है!

अरमान के स्कूल छोड़ने की बात सुन तो नेहा ख़ुशी के मारे उछल ही पड़ी! अरमान के स्कूल छोड़ने का मतलब था की अब नेहा बिना डरे स्कूल जा सकती थी| लेकिन अभी भी एक समस्या तो थी और उस समस्या का नाम था पिंकी!

नेहा: पि...पिंकी आई थी आज स्कूल?

नेहा को डर था की पिंकी ने आज स्कूल में पार्टी वाली रात हुए काण्ड के बारे में सब बक तो नहीं दिया?! यदि ऐसा हो गया होता तो नेहा में दुबारा स्कूल जा कर अपने दोस्तों के सवालों का जवाब देने व उनसे नजरें मिलाने की हिम्मत नहीं थी|

रेखा: हाँ आई थी और उसके पापा भी साथ आये थे| पिंकी पढ़ती तो है नहीं ऊपर से उसके क्लास में फैशन करने को ले कर टीचर जी ने उसके पापा जी से शिकयत कर दी| फिर क्या था, अंकल ने पूरी क्लास के सामने पिंकी को इतना डाँटा की वो बेचारी रोने लगी! अंकल ने तो टीचर जी से कह दिया की वो पिंकी को पीटें और उसके कम नंबर आने पर सीधा उन्हें फ़ोन कर दें|

रेखा ने पिंकी की पिटाई के मज़े लेते हुए सारी कहानी सुनाई तो नेहा के चेहरे पर भी मुस्कान आ ही गई| बच्चों को अपने दोस्तों को उनके मम्मी-पापा से डाँट खाते व पीटते हुए देखने में बड़ा मज़ा आता है, वही मज़ा अभी दोनों सहेलियाँ ले रहीं थीं|

रेखा से बात कर नेहा का मन हल्का हो गया था और उसे अब स्कूल जाने से अधिक डर नहीं लग रहा था| हाँ नेहा के लिए पिंकी एक समस्या अभी भी थी, परन्तु इस समस्या का समाधान नेहा को तभी मिलता जब वो पिंकी से बात करती| अतः अपनी सारी हिम्मत बटोर कर नेहा ने पिंकी को फ़ोन किया, पर पिंकी फ़ोन उठाते ही नेहा पर बरस पड़ी;

पिंकी: मैंने तुझे कहा था न की अपना मुँह बंद रखिओ, लेकिन नहीं.महारानी जी तो टेसुएँ बहाने में लगीं थीं! मैं पूछती हूँ ऐसा कौन सा काण्ड हो गया था तेरे साथ जो तूने इतनी छोटी सी बात का बतंगड़ बना दिया?! अरे वो (अरमान) तुझे kiss ही तो करना चाहता था और तो कुछ नहीं?! तेरा मन नहीं था तो तू मना कर देती, उस बेचारे को अपने पापा से पिटवाने और उसका हाथ तुड़वाने की क्या जरूरत थी?! चैन मिल गया न अब तो तुझे?!

पिंकी ने जब कहा की मैंने अरमान को पीटा और उसका हाथ तोड़ दिया तो नेहा के पॉंव तले ज़मीन खिसक गई!

नेहा: क्या?

नेहा चौंकते हुए बोली|

पिंकी: ज्यादा अनजान बनने की कोशिश मत कर! तेरे पापा ने अरमान को उसी के पापा के सामने पीटा, उसका हाथ तोड़ दिया और तुझे कुछ पता ही नहीं?! हुँह!!!

पिंकी अकड़ते हुए बोली|

नेहा: तुझे कैसे पता?

नेहा ने बात को कुरेदते हुए पुछा|

पिंकी: अरमान ने बताया! वो बेचारा तेरे पापा के कारण इतना डरा हुआ है की उसके पापा आज ही दिल्ली छोड़ कर जा रहे हैं|

पिंकी की बातें सुन कर नेहा के पास शब्द नहीं थे की वो कुछ कह सके| इधर पिंकी की बात अभी पूरी नहीं हुई थी;

पिंकी: अरे अरमान की लाइफ बर्बाद की सो की, मेरी भी लाइफ तूने बर्बाद कर दी! तेरी वजह से अब मेरा बाप मुझ पर गिद्ध की तरह नज़र गड़ाए रहता है! पहले मैं कहीं भी आती-जाती थी, जो मन आता था करती थी लेकिन तेरी वजह से मेरा घर से बाहर निकलना तक बंद हो गया! और तो और तेरी वजह से मेरा बाप मुझे A सेक्शन में डाल रहा है ताकि मैं सुधर जाऊँ! इसलिए आज के बाद कभी मेरे से बात की तो तेरे लिए अच्छा नहीं होगा!

पिंकी ने गुस्से से नेहा को धमकाया और फ़ोन काट दिया| नेहा को डर था की अगर पिंकी ने स्कूल में सच कह दिया तो नेहा की छबि पूरे स्कूल में खराब हो जाएगी इसीलिए नेहा अभी तक खामोश थी|

पिंकी के फ़ोन काटने के बाद नेहा के अंतर्मन में द्व्न्द शुरू हो गया| नेहा का मेरे प्रति गुस्सा उसे पिंकी के बताये सच पर विश्वास नहीं करने दे रहा था| अब अगर नेहा को कोई सच बता सकता था तो वो थी उसकी मम्मी संगीता क्योंकि संगीता से इतनी बड़ी बात छुपी हो ऐसा तो हो ही नहीं सकता!

अपने सवालों का टोकरा लिए नेहा अपनी मम्मी के पास बैठक में पहुँची और बिना कोई समय गँवाये उसने सारे सवाल अपनी मम्मी से पूछ डाले;

नेहा: मम्मी, अरमान की पिटाई किसने की? किसने उसे स्कूल छोड़ने...यहाँ तक की ये शहर छोड़ने के लिए धमकाया?

नेहा के सवाल सुन कर संगीता को हैरानी हुई की भला उसे ये सब किसने बताया| लेकिन फिर अगले ही पल संगीता ने अंदाजा लगाया की हो न हो नेहा की किसी सहेली ने ही उसे फ़ोन कर सब बताया होगा|

संगीता: स्तुति के पापा जी ने!

संगीता ने गर्वपूर्ण मुस्कान लिए हुए कहा| संगीता ने जानबूझ कर मुझे स्तुति का पापा कहा था क्योंकि करुणा के जाने के बाद से संगीता ने नेहा के मन में मेरे प्रति नफरत महसूस कर ली थी| संगीता अगर इस समय चुप थी तो इसलिए क्योंकि अब उसने भी हार मान ली थी की नेहा कभी मुझसे माफ़ी माँगेगी|

बहरहाल, अपनी मम्मी की बात सुन नेहा की आँखें फटी की फटी रह गईं!

नेहा: प.पापा जी ने?

ये कहते हुए नेहा की आँखों से आँसूँ बह निकले| वहीं जब संगीता ने नेहा की आँखों में आँसूँ देखे तो उसे थोड़ी हैरानी हुई! गौर करने वाली बात ये थी की आज जा कर नेहा ने मुझे अपना पापा कहा था! नेहा के मुख से मेरे लिए पापा जी सुन कर संगीता के दिल को अजीब सी ख़ुशी मिली थी|

संगीता: क्यों? तुझे क्या लगा था की किसने उस लड़के को कूटा? इस पूरी दुनिया में कोई और है जो तेरे लिए इतना कुछ करे? तेरा सगा बाप भी ये नहीं कर सकता था, जो स्तुति के पापा जी ने किया!

संगीता के पूछे इस सवाल को सुन नेहा फफक कर रोने लगी| संगीता ने नेहा को अपने गले लगाया और उसे सारी बात शुरू से आखिर तक बताई| सारी बात सुन नेहा को ग्लानि हो रही थी, इतनी ग्लानि की नेहा का रोना बेकाबू होता जा रहा था और संगीता से नेहा को इस समय सँभालना दूभर होता जा रहा था|

"मैं...मैं बहुत बुरी हूँ मम्मी! मैंने पापा जी को इतना दर्द दिया, इतना बुरा भला कहा लेकिन फिर भी उन्होंने अपने पापा होने का फ़र्ज़ निभाया और अपनी बेटी के मान-सम्मान के लिए अरमान को पीट दिया!" नेहा को अपनी गलती का एहसास हो चूका था इसलिए उसका मन अब मुझसे माफ़ी माँगने को कचोट रहा था, परन्तु माफ़ी माँगना एक कठिन काम होता है! नेहा बहुत स्वाभिमानी थी और मुझसे माफ़ी पाने के लिए उसे मेरे सामने अपनी सारी गलतियाँ स्वीकारनी थीं, जो की उसके लिए कतई आसान नहीं था!

शाम का समय था और चाय बन रही थी जब माँ मुझे जगाने कमरे में आईं| माँ सीधा मेरे सिरहाने बैठ गईं और मेरे बालों में हाथ फेर जगाने लगीं| मैं उठ कर बैठा तो स्तुति भी जाग गई और मेरी गोदी में बैठ हम माँ-बेटे की बातों के दौरान अपनी बातें जोड़ने लगी| अब चूँकि माँ बैठीं थीं तो नेहा मुझसे कुछ कह न पाई और नजरें झुकाये चुप-चाप अपनी चाय पीने लगी| वहीं मैंने नेहा के भीतर आये बदलाव को महसूस कर लिया था मगर मैं ठीक से समझ नहीं पा रहा था की आखिर नेहा यूँ खामोश क्यों है?!

अभी हम सबकी बातें चल ही रहीं थीं की तभी दरवाजे पर दस्तक हुई| संगीता दरवाजा खोलने जा रही थी मगर मैं उसे रोकते हुए खुद दरवाजा खोलने चल दिया| मैंने दरवाजा खोला तो सामने मुझे भाईसाहब खड़े हुए दिखे| अभी मैं ठीक से उनका चेहरा देख भी नहीं पाया था की भाईसाहब ने मुझे एकदम से अपने गले लगा लिया और भावुक हो कर सिसकने लगे! भाईसाहब के इस बर्ताव से मैं बहुत हैरान हुआ और उन्हें शांत करवाते हुए पूछने लगा; "भाईसाहब, क्या हुआ? सब ठीक तो है?" मैंने चिंतित होते हुए सवाल पुछा|

मेरा सवाल सुन भाईसाहब ने मेरे चेहरे को अपने हाथों में लिया और मेरा मस्तक चूमते हुए बड़े गर्व से बोले; "मुन्ना, तूने जो नेहा के लिए किया...." भाईसाहब की बात सुन मुझे हैरानी हुई की भला उन्हें सब कैसे पता चला| खैर, घर में सब मौजूद थे और कहीं माँ ये सच सुन न लें इसलिए मैंने भाईसाहब की बात काट दी; "भाईसाहब, माँ और बच्चे घर पर हैं!" मेरा इशारा समझ भाईसाहब कुछ नहीं बोले तथा अपने आँसूँ पोंछ चेहरे पर मुस्कान लिए मेरे कमरे में पहुँचे|

अपने बड़े मामा जी को देख स्तुति और आयुष ख़ुशी से उछल पड़े तथा अपने बड़े मामा जी के पॉंव छूने को दौड़े| इधर भाईसाहब की नजरें नेहा पर टिकीं थीं, नेहा उन्हें देख कर भी डरके मारे अपनी जगह से नहीं हिली थी| "नेहा बेटी" भाईसाहब ने नेहा को पुकारा तथा अपने गले लगने को बुलाया| नेहा को इस समय सबके प्यार का सहारा चाहिए था इसलिए नेहा दौड़ कर अपने बड़े मामा जी से लिपट गई तथा भाव विभोर हो कर रोने लगी| उधर माँ ने जब नेहा को यूँ रोते हुए देखा तो उन्हें शक होने लगा की जर्रूर कोई बात है| अब मुझे बात छुपानी थी इसलिए मैंने फिर एकबार उनसे झूठ बोला; "नेहा अपने बड़े मामा जी को बहुत प्यार करती है इसलिए भावुक हो गई|" पता नहीं कैसे पर माँ ने इस बार भी मेरे इस झूठ को मान लिया और मुस्कुराने लगीं|

भाईसाहब, नेहा को लाड कर शांत करवा रहे थे इस करके आयुष और स्तुति को अपने बड़े मामा जी के पॉंव छूने और लाड-प्यार पाने का मौका नहीं मिला| आयुष ने तो इस बात का बुरा नहीं लगाया मगर स्तुति को आया गुस्सा और उसने मेरे फ़ोन से अपनी बड़ी मामी जी को फ़ोन कर सब बात बता दी|

मैंने जब स्तुति को फ़ोन पर बात करते हुए देख तो मैंने स्तुति से फ़ोन लिया| फ़ोन पर भाभी जी का नाम देख मैं कुछ-कुछ समझ गया की जर्रूर स्तुति ने कोई शैतानी की है इसलिए मैंने फ़ोन लाउडस्पीकर पर कर दिया; "हमार नीक-नीक छुटकी भाँजी, जे हम का अतना मूहात ही ऊ का लाड नाहीं करत हैं! बताओ तो?! तू तनिको चिंता नाहीं करो मुन्नी, आये दिहो तोहार बड़के मामा का घरे हम इनका घरे न घुसे देब! न इनका खाना देब! अरे इनका तो हम घामेमा बिठाब और रतिया का गोरु-बछवा लगे सुलाब! बताओ हमार छुटकी भाँजी का रुलावत हैं!" भाभी जी को लग रहा था की वो स्तुति से बात कर रहीं हैं इसलिए वो अपने झूठ-मूठ के गुस्से में भाईसाहब को दी जाने वाली सज़ा के बारे में बोलती जा रहीं थीं|

जब भाभी जी की बात खत्म हुई तो हम सभी ने ज़ोर से ठहाका लगा कर हँसना शुरू कर दिया, तब भाभी जी को समझ आया की हम सब ने उनकी बातें सुन ली हैं इसलिए उनकी भी हँसी छूट गई! इधर भाईसाहब को एहसास हुआ की उन्होंने अपनी छोटी भाँजी को लाड न कर के उसे दुखी किया है इसलिए भाईसहाब ने स्तुति को गोदी में ले कर लाड करना शुरू किया| उधर भाभी जी ने बारी-बारी सभी से बात की और सबसे ज्यादा बात उनकी नेहा से हुई जिसमें वो नेहा को हिम्मत बँधा रहीं थीं|

भाभी जी ने फ़ोन रखा तो संगीता प्यारभरे गुस्से से स्तुति से बोली; "जब से तेरे बड़े मामा जी आये हैं तूने उन्हें पानी पुछा? चाय पूछी? लेकिन फट से अपनी बड़ी मामी जी से शिकायत कर दी की बड़े मामा जी मुझे प्यार नहीं करते!" अपनी गलती पता चलने पर स्तुति ने फौरन अपने कान पकड़ अपने बड़े मामा जी से माफ़ी माँगी तथा उनकी सिफारिश करने के लिए पुनः अपनी बड़ी मामी जी को फ़ोन कर दिया| "बड़ी मामी जी...बड़ी मामी जी, आप है न मेरे बड़े मामा जी को मत डाँटना!" स्तुति का ये बालपन देख हम सभी उस पर मोहित हो रहे थे, वहीं भाभी जी अपनी भाँजी का बालपन फ़ोन पर सुन मोहित हो रहीं थीं| मेरी छोटी सी बिटिया अपने बालपन से सभी को खुश रखने में कामयाब हुई थी|

[color=rgb(97,]जारी रहेगा भाग - 16 में...[/color]
 

[color=rgb(255,]अंतिम अध्याय: प्रतिकाष्ठा[/color]
[color=rgb(51,]भाग - 16[/color]

[color=rgb(26,]अब तक अपने पढ़ा:[/color]

भाभी जी ने फ़ोन रखा तो संगीता प्यारभरे गुस्से से स्तुति से बोली; "जब से तेरे बड़े मामा जी आये हैं तूने उन्हें पानी पुछा? चाय पूछी? लेकिन फट से अपनी बड़ी मामी जी से शिकायत कर दी की बड़े मामा जी मुझे प्यार नहीं करते!" अपनी गलती पता चलने पर स्तुति ने फौरन अपने कान पकड़ अपने बड़े मामा जी से माफ़ी माँगी तथा उनकी सिफारिश करने के लिए पुनः अपनी बड़ी मामी जी को फ़ोन कर दिया| "बड़ी मामी जी...बड़ी मामी जी, आप है न मेरे बड़े मामा जी को मत डाँटना!" स्तुति का ये बालपन देख हम सभी उस पर मोहित हो रहे थे, वहीं भाभी जी अपनी भाँजी का बालपन फ़ोन पर सुन मोहित हो रहीं थीं| मेरी छोटी सी बिटिया अपने बालपन से सभी को खुश रखने में कामयाब हुई थी|

[color=rgb(251,]अब आगे:[/color]

भाईसाहब
रात घर ही रुकने वाले थे इसलिए उनकी मौजूदगी में नेहा की हिम्मत नहीं हुई की वो मेरे पास आ कर माफ़ी माँग सके| इधर भाईसाहब को मुझसे बात करनी थी इसलिए खाना खाने के बाद हम दोनों छत पर टहलते हुए बतुआने लगे|

नेहा के साथ हुए इस हादसे के बारे में उन्हें अनिल ने बताया था| इस हादसे की खबर सुन भाईसाहब बहुत घबरा गए थे और उन्हें लग रहा था की नेहा की इज्जत पर आँच आई है इसलिए वो फौरन दिल्ली के लिए निकल पड़े| संगीता ने अनिल को नेहा से हुई बात के बारे में कुछ देर से बताया था और ये खबर अनिल ने जब भाईसाहब को दी तब वे रास्ते में थे, परन्तु नेहा की इज्जत सलामत होने की बात जानकार भाईसाहब को आधा चैन मिल गया था| बाकी का चैन उन्हें तब मिलता जब वो नेहा को स्वयं देख लेते|

जब मैंने भाईसाहब से पुछा की इस हादसे के बारे में उन्होंने नेहा की नानी जी को तो नहीं बताया तो भाईसाहब ने बताया की ये बात केवल भाभी जी को पता है| यदि ये बात अम्मा (नेहा की नानी जी) को पता चलती तो वो बहुत गुस्सा होतीं और नेहा की शादी करने के पीछे पड़ जातीं| नेहा की नानी जी की विचारधारा अब भी रूढ़िवादी थी इसलिए वो परिवार के नाम पर किसी प्रकार की आँच आने देने का जोखम नहीं लेतीं|

"मुझे तुम पर गर्व है मानु, तुमने एक पिता होने का फ़र्ज़ अदा कर दिया| वो भी तब जब नेहा ने तुम्हें इतना कुछ कहा, तुमसे तालुक्कात तक तोड़ लिए थे! नेहा के कहे उन शब्दों को सुन कर अम्मा नेहा पर बहुत गुस्सा हुईं थीं की इस लड़की ने उनके लाडले बेटे का (मेरा) इतना दिल दुखाया| जब भी नेहा घर (गाँव) आई अम्मा नेहा से ज़रा भी बात नहीं करतीं थीं| माँ तो खुद को इतना लज्जित समझतीं थीं की वो तो तुमसे बात करने में कतरा रहीं थीं| वो कहतीं थीं की मैं किस मुँह से अपने मुन्ना से बात करूँ, जब मेरी ही नातिन ने उसे इतना बुरा-भला कहा| वो हमेशा नेहा को कोसती रहतीं थीं की इस लड़की के कारण अम्मा अब तुमसे कभी नजरें नहीं मिला पाएंगी| वो तो मैंने, संगीता और तुम्हारी भाभी ने उन्हें खूब समझाया की वो तुम्हारे सामने उन बातों को याद न करें ताकि तुम्हारा दिल और न दुखे, तब जा कर अम्मा तुम्हें फ़ोन कर बात करतीं थीं|" भाईसाहब ने छत पर टहलते हुए मुझे इन बातों से रूबरू करवाया| मैंने नेहा की नानी जी के मुझसे कम बात करने पर पहले कभी गौर नहीं किया| मुझे तो लगता था की शायद मैं ही इतना व्यस्त हो गया हूँ की उन्हें समय नहीं दे पाता|

"भाईसाहब, आप माँ को समझाइये की वो इस तरह से न सोचा करें| जो कुछ हुआ उसमें उनकी कोई गलती नहीं थी जो वो खुद को यूँ दोष दे रहीं हैं| आप माँ से कह दीजियेगा की अगर वो ऐसे सोचेंगी न तो मैं उनसे बात नहीं करूँगा|" मैंने बच्चों की तरह बात न करने की खोखली धमकी दी तो भाईसाहब हँस पड़े और हँसते हुए बोले की वो मेरी कही बात नेहा की नानी जी तक पहुँचा देंगे|

"वैसे एक बात कहूँ मानु, तुमने जिस तरह से संगीता को समझाया की उसे नेहा से कैसे बात करनी है वो काबिले-ऐ-तारीफ था क्योंकि हमारी सोच तुम्हारी जैसी नहीं है| ऐसे हालातों में हमारे लिए नेहा सबसे बड़ी कसूरवार साबित होती अतः सब नेहा को पीटते और फौरन उसके हाथ पीले कर देते ताकि ये बात सुन दुनिया हम पर कीचड़ न उछाले| मैं थोड़ा लड़ाकू स्वभाव का हूँ इसलिए मैं वही करता जो तुमने किया लेकिन उस लड़के को पीटने के बाद अगला नंबर नेहा का ही आता| वो लड़की ज़ात है इसलिए मैं उस पर हाथ तो नहीं उठा सकता था परन्तु उसे अच्छे से डाँट अवश्य सकता था|

लेकिन तुमने जो नेहा को प्यार से बात कर सँभालने का रास्ता संगीता को सुझाया, उसके बारे में सुन मैं और तुम्हारी भाभी बहुत हैरान थे! थोड़ा समय लगा हमें तुम्हारा पक्ष समझने में और तब हमें अक्ल आई की बच्चों को किस तरह सँभाला जाता है| हम बूढ़ा-बूढी को तुम जैसे नौजवान से बच्चों की परवरिश करने का ये सबक सीख कर हम दोनों ही तुम्हारी सरहाना करते नहीं थक रहे थे|" भाईसाहब मेरी पीठ थपथपाते हुए बड़े गर्व से बोले|

"भाईसाहब, बच्चों की परवरिश करने में मैं कोई विशेषज्ञ नहीं हूँ| मैं जब छोटा था तो पिताजी मेरी छोटी-छोटी गलतियों पर बिना पूरी बात जाने मुझे डाँट दिया करते थे, यहाँ तक की पीट भी दिया करते थे| उन्होंने कभी मुझे अपने सामने बिठा कर मेरे मन की बात नहीं जानी, मेरी भावनाएं नहीं समझीं| उनके अनुसार मैं छोटा बच्चा था और छोटे बच्चों को कहाँ कुछ पता होता है, वो तो मुर्ख होते हैं| यही सोच कर पिताजी मेरे प्रति सख्त रहते थे|

उसी पल मैंने सोच लिया था की जब मैं बड़ा हूँगा और मेरे बच्चे होंगे तो मैं अपने बच्चों के साथ ऐसी ज्यादती कभी नहीं करूँगा| मैं उनसे बात करूँगा, उन्हें गलत रास्ते पर जाने से रोकूँगा और यदि वे फिर भी नहीं माने तो उन्हें अपनी गलती से सबक लेने के लिए अकेला छोड़ दूँगा| ठोकर लगेगी तो बच्चे अपने जीवन में सीखे इस सबक को हमेशा याद रखेंगे|

नेहा मेरी गोदी में खेली है, भले ही जन्म से न सही मगर जितना भी उसने मुझसे प्यार पाया उससे मैं उसके नाज़ुक दिल को अच्छे से समझता हूँ इसीलिए मैंने संगीता को नेहा के साथ नरमी से बता करने को कहा था वरना वो तो रानी लक्ष्मी बाई बन कर लड़ने को तैयार बैठी थी!" मेरी बातें सुनकर भाईसाहब बहुत प्रभावी हुए थे| वहीं जब मैंने संगीता को लक्ष्मी बाई कहा तो भाईसाहब बड़ी ज़ोर से ठहाका लगा कर हँसने लगे|

जब मैं और भाईसहाब छत पर टहलते हुए बात कर रहे थे तब नेहा मुझसे बात करने के इरादे से छत पर आ पहुँची थी| परंन्तु जब उसने सुना की हम दोनों उसी के बारे में बात कर रहे हैं तो नेहा छुप कर हमारी सारी बात सुनने लगी| ये नया सच जानकार नेहा को और भी ग्लानि हो रही थी, भले ही मैं नेहा से बात करने, उसे सँभालने आगे नहीं आया मगर वो मैं ही था जिसने संगीता को सीख दी थी की उसे कैसे नेहा से बात करनी है| नेहा ने मुझे इतना गलत समझा था की अब उसे रह-रह कर पछतावा हो रहा था!

सोने का समय हुआ तो माँ अपने पोते के साथ सोईं, नेहा अपनी मम्मी के साथ हमारे कमरे में सोई और मैं, स्तुति तथा भाईसाहब बच्चों के कमरे में सोये| माँ-बेटी अकेले सो रहीं थीं तो नेहा ने अपनी मम्मी से छत पर जो मेरे और भाईसाहब के बीच बातें हुईं उसके बारे में पुछा| संगीता ने बिना कोई बात छुपाये नेहा को सब बता दिया की कैसे मैंने उसे नेहा के साथ नरमी से पेश आने को कहा था| सच जान कर नेहा का मन मुझसे माफ़ी माँगने और मेरा प्यार पाने को बेचैन होने लगा था| मन में हो रही आत्मग्लानि के कारण नेहा की आँख से पछतावे के आँसूँ बह निकले| नेहा को यूँ रोते देख संगीता.एक माँ अपनी बेटी को हिम्मत देने लगी; "स्तुति के पापा जी." संगीता इसके आगे कुछ कहती उससे पहले ही नेहा थोड़ा गुस्से में बोल पड़ी; "स्तुति के पापा जी नहीं, मेरे पापा जी!" नेहा ने आज इतने महीनों बाद बड़े हक़ से मुझे अपना पापा जी कहा तो संगीता के चेहरे पर गर्वपूर्ण मुस्कान आ गई|

"हाँ-हाँ तेरे पापा जी!...तो मैं क्या कह रही थी....हाँ तेरे पापा जी का दिल बहुत बड़ा है| जब मैंने उन्हें खुद से और तुझसे दूर कर के उनका दिल तोडा, तब भी उन्होंने मुझे माफ़ कर दिया| उसी तरह तू भी उनसे सच्चे दिल से माफ़ी माँग तो वो तुझे भी माफ़ कर देंगे|" संगीता ने नेहा के भीतर मुझसे माफ़ी माँगने के लिए हिम्मत फूँक दी थी| अब नेहा को जर्रूरत थी एक मौके की और संगीता ने उसका भी इंतज़ाम सोच लिया था!

अगली सुबह संगीता कमरे में आई और स्तुति को जबरदस्ती अपनी गोदी में ले कर चली गई| आज बच्चों के स्कूल की छुट्टी थी और मैं उम्मीद कर रहा था की स्तुति देर तक सोयेगी मगर संगीता के दिमाग में कुछ और ही चल रहा था! अब मुझे आ रही थी नींद इसलिए मैंने थोड़ा और सोने की सोची, जबकि भाईसाहब नहाने जा चुके थे|

15 मिनट के बाद संगीता और स्तुति कमरे में आये, भाईसाहब तब गाँव वापस जाने के लिए तैयार हो रहे थे| "हम सब मंदिर जा रहे हैं!" संगीता ने कमरे में आते ही एकदम से अपना फैसला सुना दिया| संगीता का फैसला सुन मैं उठ बैठा और आँख मलते हुए कुछ पूछने ही वाला था की उसने बिना मेरे कुछ पूछे ही जवाब दे दिया; "आयुष कह रहा था की आप (मैं) सबको मंदिर ले गए लेकिन हम माँ-बेटे का नंबर नहीं लगा इसलिए हम सब मंदिर जाएंगे और आप घर पर रहोगे|" मेरा जूतों का एक कार्टून घर आना था इसलिए मैं वैसे भी कहीं नहीं जा सकता था, अतः मैंने सर हाँ में हिला कर अपनी सहमति दे दी|

संगीता ने अपनी बातों में कहा था की बाकी सब मंदिर जाएंगे इसका मतलब था की भाईसाहब को भी मंदिर जाना होगा| अब भाईसाहब तो बस अड्डे जाने की तैयारी कर रहे थे इसलिए वो संगीता को प्यार से समझाते हुए बोले; "मुन्नी, मैं अभी बस अड्डे निकल रहा हूँ तो तुम सब जाओ|" अब संगीता ने थोड़ी दूर मंदिर जाना था और वो चाहती थी की कोई पुरुष सबके साथ जाए इसलिए संगीता अपने भाईसाहब को आदेश देते हुए बोली; "बस से ही जाना है न तो दो बजे वाली से चले जाना| अभी हम सबके साथ मंदिर चलो!" अब भाईसाहब को अपने व्यपार के कारण जल्दी घर जाना था इसलिए वो प्यार से अपनी बहन को समझाने लगे की वो उन्हें न रोके मगर संगीता ने ठान लिया था की वो भाईसाहब को अपने साथ मंदिर ले जा कर ही रहेगी| अतः संगीता ने स्तुति को आँखों से इशारा किया| इधर मैं और भाईसाहब दोनों माँ-बेटी के इस इशारों में दिए जा रहे संकेतों को देख हैरत में थे की भला ये दोनों माँ-बेटी करने क्या वाले हैं?!

उधर स्तुति अपनी मम्मी का इशारा समझ चुकी थी| स्तुति ने अपनी कमर पर दोनों हाथ रखे, भोयें सिकोड़ीं, निचला होंठ फुलाया और प्यारभरे गुस्से के साथ अपने बड़े मामा जी को देखने लगी| स्तुति जब भी नाराज़ होती थी वो ऐसे ही रूप इख्तियार कर लेती थी| अपनी भाँजी को ये प्यारा सा गुस्सा देख भाईसाहब की सिट्टी-पिट्टी गुल हो गई और उन्होंने फौरन अपने दोनों हाथ अपनी छोटी भाँजी के आगे जोड़ दिए और घबराते हुए बोले; "अरे नाहीं-नाहीं हमार छोट मुन्नी, तू हमसे न रिसयाओ नाहीं तो हम कहाँ जाब! जउन तू कहिओ, तौन होई!" भाईसाहब को यूँ एक छोटी सी बच्ची के आगे घबराते देख हम सभी हँस रहे थे, वहीं स्तुति खुद को इस वक़्त कोई महारानी समझ रहे थी जिसके डरके मारे उसके बड़े मामा जी इतना घबरा गए थे की उसके आगे हाथ जोड़े खड़े थे!

सब मंदिर जाने के लिए तैयार हो रहे थे, सिवाए नेहा और मेरे| जब माँ ने नेहा के बारे में पुछा तो स्तुति ने अपनी मम्मी द्वारा पढ़ाया हुआ झूठ कह दिया; "दाई, दिद्दा रात में देर तक पढ़ रही थीं इसलिए वो अभी सो रही हैं| पपई हैं यहाँ घर पर तो हम सब मंदिर चलते हैं|" माँ को ये सुन कर बहुत ख़ुशी हुई की उनकी लाड़ली पोती पढ़ाई के प्रति इतनी निष्ठा रखती है| माँ ने जाते-जाते नेहा के सर को चूमा और उसे आशीर्वाद दे कर चली गईं| इधर मैंने इस बात पर इतना ध्यान नहीं दिया क्योंकि नेहा अब पहले जैसी धार्मिक नहीं थी|

मुझे अपने प्रोडक्ट्स ऑनलाइन अपडेट (products online update) करने थे इसलिए मैं सीधा अपने कमरे में कंप्यूटर पर काम करने बैठ गया| करीब आधे घंटे बाद नेहा कमरे में आई और सर झुकाये हुए मुझसे बोली; "पापा जी, मुझे आपसे कुछ बात करनी थी|" आज इतने महीनों बाद नेहा के मुख से अपने लिए 'पापा जी' शब्द सुन कर मुझे कोई ख़ुशी नहीं हुई| ऐसा लगा जैसे कोई ठंडा हवा का झोंका मुझे स्पर्श कर के आगे बढ़ गया हो| हाँ इतना जर्रूर था की नेहा ने जब कहा की उसे मुझसे बात करनी है तब मैं पूरी एकाग्रता से उसकी ओर देख रहा था|

"पापा जी, मुझे माफ़ कर दीजिये...मुझसे बहुत बड़ा पाप हो गया जो मैं आपके प्यार को समझ न पाई!" ये कहते हुए नेहा ने एकदम से मेरे पैर पकड़ लिया और रोने लगी| नेहा का मुझसे यूँ पैर पड़कर माफ़ी माँगने का मुझ पर कोई असर नहीं हुआ, न ही मुझे आज नेहा को यूँ रोते हुए देख कुछ महसूस हुआ| मेरा दिल जैसे पत्थर का बन चूका था जिसपर नेहा के आँसुंओं का फर्क ही नहीं पड़ रहा था| उस समय मेरे दिमाग केवल एक ही बात चल रही थी; 'हमारे घर में लड़की को लक्ष्मी का रूप मन जाता है और उससे पॉंव स्पर्श नहीं करवाए जाते|' ये बात सोचते हुए मैंने तुरंत नेहा के कँधे पकड़ उसे उठाया|

जिसे कभी मैं अपनी जान से ज्यादा चाहता था, जिसे मैं अपना फर्स्ट बोर्न (first born).अपनी बेटी मानता था...आज उसकी आँखें पश्चाताप के आंसुओं से भरी थीं परन्तु मेरे लिए जैसे उन आँसुंओं का कोई मोल ही नहीं था!

नेहा जानती थी की उसके आँसूँ देख कर मैं पिघल जाता हूँ, परन्तु अभी जब उसने मेरी आँखों में सूनापन देखा तो वो एकदम से डर गई! मेरी आँखों में नमी न पा कर नेहा को डर लगा की शायद मेरे दिल में अब उसके लिए प्यार नहीं बचा! किसी भी बच्चे के लिए सबसे बड़ा डर यही होता है की उसके माँ-बाप अब उससे प्यार नहीं करते| इसी डर को महसूस कर नेहा बहुत घबरा गई थी और किसी भी तरह से मुझे मनाना चाहती थी ताकि उसे मेरा प्यार पुनः हासिल हो जाए|

अब मुझे मनाने का एक ही तरीका था और वो था अपना इक़बालिया जुर्म करना इसलिए नेहा ने अपनी सारी हिम्मत बटोर कर अपनी गलती का स्वीकारना शुरू कर दिया; "पापा जी, मैं गलत दोस्तों की संगत में पड़ गई थी और उनकी देखा-देखि अपनी ज़िन्दगी अपनी स्वेछा से जीना चाहती थी! नई क्लास में आई तो मेरे नए दोस्त बने| मेरी सबसे पहली दोस्त जिसे मैं अपना सच्चा दोस्त मानती थी वो थी पिंकी| फिर एक दिन पिंकी ने मेरी जान-पहचान अरमान से करवाई| पिंकी और अरमान ने मेरे दिलो-दिमाग में आज़ादी से घूमने-फिरने के विचार भरने शुरू कर दिए| दोनों ने मिलकर मुझे बताया की कैसे वो बेरोक-टोक बाहर घुमते हैं इसलिए मेरा भी मन उनकी तरह आज़ादी में जीने को करने लगा था| मैं चाहती थी की जिस प्रकार पिंकी तथा अरमान के माँ-बाप उनपर कोई रोक-टोक नहीं लगाते, आप और मम्मी भी मुझ पर कोई रोक-टोक न लगाओ|

लेकिन मैं एक पिता के अपनी बेटी की सुरक्षा के लिए पनपे डर को समझ न पाई| आपके डर, आपकी मेरी सुरक्षा के लिए चिंता को मैं आपका मुझे 'कण्ट्रोल' करना समझने लगी| उन्हीं दिनों मेरी करुणा आंटी जी से कभी-कभी बात होती थी और मैं उन्हें बताती थी की कैसे आप मुझे अकेले बाहर आने-जाने से रोकते हो| तब करुणा आंटी जी ने बताया की जब वो हॉस्टल में रहतीं थीं, तब आप उन्हें भी बाहर अकेले या किसी पुरुष कर्मचारी के साथ घूमने से रोकते-टोकते थे| करुणा आंटी की बातों से मुझे लगा की जैसे आप आंटी जी को कण्ट्रोल करते हैं, वैसे ही आप मुझे भी कण्ट्रोल करना चाहते हैं! मेरे मन में पैदा हुए इस विचार ने मुझे आपके रोकने-टोकने पर चिड़चिड़ा कर दिया था, नतीजन मैंने आपक्से झूठ बोलना, आपको धोका देना की सोची| मैं मूर्ख ये न समझ पाई की आप मेरी ख़ुशी के लिए मुझे थोड़ी ज़िम्मेदारी के साथ थोड़ी-थोड़ी छूट देते जा रहे हैं! मेरा बेसब्र मन सारी आज़ादी एक साथ पाना चाहता था इसलिए मैं आपसे उखड़ती जा रही थी|

धीरे-धीरे पिंकी तथा अरमान से मेरी दोस्ती गहराती जा रही थी और ऐसे ही एक दिन मैंने दोनों पर विश्वास कर आपके बारे में सब बताया दिया| आपके और मेरे रिश्ते के बारे में जान कर अरमान तथा पिंकी ने मेरे जहन में ये बात डाली की चूँकि आपका और मेरा बायोलॉजिकल (biological) रिश्ता नहीं इसलिए आपका मुझ पर यूँ रोक-टोक लगाने का हक़ नहीं बनता! ये बात मेरे मन-मस्तिष्क में बस गई और मेरे मन में बगावती तेवर अधिक तेज़ हो गए|

फिर एक दिन अरमान ने मुझे प्रोपोज़ (propose) किया और मैं बेवकूफ उसकी बातों पर विश्वास कर उससे प्यार करने लगी| अरमान की मीठी-मीठी बातों में मैं ऐसी बहकी की मुझे सिर्फ वही दिखाई देता था| लेकिन पापा जी, आपकी कसम मैंने कभी भी अरमान को खुद को छूने नहीं दिया! हम जब भी कहीं मिले तो हमने बस घूमा, खाया-पीया मगर मैंने कभी उसे न तो खुद को छूने दिया, न ही कभी किसी भी तरह की कोई गंदी हरकत करने दी| मुझे उससे बात करना, उसके साथ घूमने जाना बहुत पसंद था और मैं इसी से संतुष्ट थी|

अरमान के साथ घूमने-फिरने को मैंने सच्चा प्यार समझने की सबसे बड़ी भूल कर दी| इस घूमने-फिरने के चक्कर में मैं अपनी पढ़ाई की तरफ पूरी तरह से लापरवाह हो गई, नतीजन मैं परीक्षा में बड़ी मुश्किल से पास हुई! नंबर कम आये थे और मैं जानती थी की आपसे बहुत डाँट पड़ेगी इसलिए मैंने आपसे झूठ बोलने का फैसला किया| परन्तु आयुष की वजह से आपने मेरा झूठ पकड़ ही लिया और जब आपने मुझे डाँटना शुरू किया तो मुझे बहुत गुस्सा आया|

मेरे पढ़ाई में आये कम नम्बरों के लिए डांटने के बाद जब आपने मुझे समझाया की ये सब प्यार-व्यार नहीं बस केवल आसक्ति (infatuation) है तो मेरा गुस्सा उबले मारने लगा और मेरे मुँह से वो कटु शब्द निकल गए! यक़ीन मानिये पापा जी, मेरे मन में ऐसा गंदा विचार कभी नहीं आया| ये विचार अरमान और पिंकी ने ही मेरे दिमाग में भरा था!

उस समय आपसे वो कटु शब्द कह कर मुझे ज़रा भी बुरा नहीं लगा, यहाँ तक की जब आपकी तबियत खराब हुई तब भी मुझे कोई फर्क नहीं पड़ा! मुझे केवल गुस्सा आ रहा था की आपके कारण मम्मी ने मुझे मारा और तो और मुझे जान से मारने की धमकी भी दी!

आपसे लड़-झगड़ कर, मम्मी से झूठ बोल...उन्हें धोका दे कर मैंने आज़ादी तो पा ली लेकिन इस आज़ादी के कारण मेरे साथ जो हादसा हुआ उससे मेरा सारा घमंड टूट कर चकना चूर हो गया! जिसे मैं अपना सच्चा दोस्त मानती थी उसने मुझे अकेला छोड़ दिया था! उसे मुझसे ज्यादा अपने मम्मी-पापा से डाँट खाने का डर लग रहा था| उस रात मुझे समझ आया की आप क्यों मुझे अधिक बाहर आने-जाने से रोकते थे, एक पिता का अपनी बेटी की इज्जत पर आँच आने का डर क्या होता है? वो पूरी रात मैं बस पछता रही थी की क्यों मैंने आपकी बात नहीं मानी और अरमान को अपनी ज़िन्दगी से निकाल बाहर क्यों नहीं फेंक दिया?! मैं सुबह होने का इंतज़ार कर रही थी ताकि मैं घर आऊँ और आप मुझे अपने गले लगा कर प्यार कर मेरे दिल में बैठे डर को खत्म कर दो| परन्तु मेरे घर आने के बाद, मुझे रोता हुआ देख भी जब आपने मुझे अपने गले नहीं लगाया, बल्कि मुझसे पहले जैसी दूरी बनाये रखी तो तो मेरे मन में आपके प्रति बैठी नकारात्मक सोच ने मुझे ये सोचने पर मजबूर कर दिया की अब आप मुझे पहले जैसा प्यार नहीं करते..आप मुझसे घृणा करते हो!

लेकिन, मैं बहुत गलत थी, मैं आपके प्यार को कभी समझ ही न पाई! जब मैं छोटी थी तो मैं हमेशा मम्मी को ताना मारती थी की वो आपके प्यार को कभी समझ नहीं पाईं तथा वो जानबूझकर आपका दिल दुखाती हैं मगर विधि की विडंबना देखिये की मैं बड़े होते-होते खुद मम्मी जैसी बन गई!

मेरे आपका इतना दिल दुखाने के बावजूद, आपको हमेशा गलत समझने के बावजूद भी आपने कभी मेरी फ़िक्र करना नहीं छोड़ा| मेरी इज्जत पर जिसने हाथ डालने की कोशिश की आपने उसका हाथ तोड़ दिया, यहाँ तक की उसे शहर छोड़ने पर मजबूर कर दिया!

जिस वक़्त मेरा नाज़ुक मन सदमे के कारण टूटने की कगार पर था तब आपने ही मम्मी को समझाया की वो मुझसे आराम से बात करें वरना मम्मी ने तो मुझे उनसे झूठ बोलने, उनसे विश्वासघात करने के लिए चप्पल-जूतों से पीट देना था, पर आपने उन्हें समझाया और मुझे कैसे सही रास्ते पर लाना है ये सिखाया|

मैंने आपका बहुत दिल दुखाया है पापा जी, परन्तु जब धीरे-धीरे मेरे सामने आपकी अच्छाई आती गई तो मैं शर्म से ज़मीन में गड़ती चली गई| करुणा आंटी जी ने घर आ कर मुझे बताया की कैसे आपने उनकी मदद करने के लिए निस्वर्थ भाव से एड़ी-चोटी का ज़ोर लगाया| जो रोक- टोक पाबंदियाँ आपने उनके लिए लगाईं थीं वो तो केवल और केवल उनके भले के लिए थीं, उसमें आपका निजी कोई स्वार्थ था ही नहीं! इन बातों पर गंभीरता से सोच-विचार करते हुए मुझे समझ आया की भले ही मैं आपकी सगी बेटी न सही मगर आपने मुझे अपने दोनों सगे बच्चों से ज्यादा प्यार किया| आयुष और स्तुति के मुक़ाबले आपने मुझ पर थोड़ी सख्ती अवश्य दिखाई मगर उसमें केवल मेरी ही भलाई छुपी थी|

मैं आपसे हाथ जोड़कर माफ़ी माँगती हूँ पापा जी, प्लीज मुझे माफ़ कर दीजिये! आज से आप जो कहेंगे, मैं वही करुँगी| नहीं चाहिए मुझे कोई आज़ादी, नहीं चाहिए मुझे कोई ऐशों-आराम! मुझे बस अपने पापा जी और उनका प्यार चाहिए, जिसके लिए मैं इतने दिनों से तरस रही हूँ!" आत्मग्लानि में बहते हुए नेहा ने आज अपने दिल की सारी बात मुझसे कह दी थी| नेहा की आँखों में पछताप के आँसूँ थे और वो आज मुझसे सच्चे दिल से माफ़ी माँग रही थी| परन्तु मेरे लिए अब सब कुछ बदल चूका था! नेहा ने अभी जो अपनी 'सफाई' दी थी उसमें मुझे केवल बहाने ही बहाने नज़र आ रहे थे| मुझे कहे उन शब्दों के लिए वो अपने दोस्तों को जिम्मेदार ठहरा रही थी इसलिए मुझे नेहा की इस बात का खंडन करना था|

"जब बच्चा बड़ा होने लगता है तो वो हर समय अपने माँ-बाप के खूँटे से बँधा नहीं रह सकता, उसे आज़ादी चाहिए ही होती है| आज़ादी थोड़ी मस्ती करने की, आज़ादी अपने मन की करने की और आज़ादी गलती कर सीखने की| जब मैं छोटा था तो मुझसे पिताजी के डर के मारे चूँ नहीं निकलती थी, आज़ादी की तो बात ही छोडो| लेकिन मैंने उस समय ये तय कर लिया था की जब मेरे बच्चे होंगे तो मैं उन्हें कभी किसी चीज़ के लिए नहीं तरसाऊँगा| जैसे-जैसे मेरे बच्चे बड़े होंगे, मैं उन्हें जर्रूरत के अनुसार थोड़ी-थोड़ी आज़ादी देता जाऊँगा|

अगर आपको लगा था की मैं आपके साथ अधिक सख्ती दिखा रहा हूँ, अधिक रोक-टोक कर रहा हूँ तो आपको मुझसे बात करनी चाहिए थी| आप अगर अपनी आज़ादी को ले कर मेरे साथ लड़ भी लेते तो मैं इसका बुरा नहीं मानता, बल्कि मुझे लगता की आप बड़े हो गए हो और मुझे ही आपको थोड़ा स्पेस (space) देना चाहिए| लेकिन यूँ अपनी आज़ादी माँगने के लिए उस शक़्स को ही कह देना की वो आपका पिता नहीं है जो वो इस कदर आप पर पाबंदिया लगा रहा है, ये कतई जायज नहीं था!

रही बात आपके अपने दोस्तों की बातों में आ जाने, उनके आपके दिमाग में जहर भरने जैसी बातों की, तो मैं केवल यही कहूँगा की आप इतने छोटे नहीं की किसी के भी बहकावे में आ जाओ| आपका कोई दोस्त आपके मम्मी-पापा के बारे में कुछ भी बुरा-भला कहेगा तो सबसे पहले आप उसी से लड़ोगे की उसकी हिम्मत कैसे हुई आपके मम्मी-पापा के बारे में ऐसा कुछ कहने की| आप चुप रह कर उसकी बात तभी सुनोगे जब आपको लगेगा की उसकी बातों में सच्चाई है और आप भी उसकी बातों को कहीं न कहीं सच मानते हो!" मेरी कही ये बात नेहा के दिल को बहुत चुभी और वो सर न में हिलाते हुए बोली; "नहीं पापा जी...ऐसा नहीं." मगर मेरे लिए ये बस नेहा की सफाई थी जिसे मैं कभी नहीं मान सकता था इसलिए मैंने नेहा की बात को काटते हुए अपनी बात जारी रखी; "और जहाँ तक बात है मुझसे माफ़ी माँगने की और मेरा प्यार फिर से पाने की तो आपको ये अंतिम सबक सीखना होगा; 'हमारी ज़िन्दगी में रिश्ते एक बहुत ही कच्ची डोर से बँधे होते हैं| घमंड और अहंकार के कारण ये डोर अगर एक बार टूट जाती है तो फिर जोड़ने से नहीं जुड़ती| यदि जबरदस्ती इस डोर को जोड़ा भी जाए तो हमेशा के लिए रिश्तों में ऐसी गाँठ पड़ जाती है जो हमेशा उँगलियों के छूने पर महसूस होती है|' " स्कूल में मैंने रहीम का एक दोहा पढ़ा था;

'रहिमन धागा प्रेम का, मत तोड़ो चटकाय|

टूटे पे फिर ना जुड़े, जुड़े गाँठ परी जाय||'

आज मैंने इस दोहे का मोल-भाव नेहा को संक्षेप में समझा दिया था| बहरहाल, ज़ाहिर है की मेरी कही ये कष्टदाई बात नेहा के नाज़ुक दिल को तार-तार कर गई थी! परन्तु नेहा को अपने पापा जी का प्यार वापस चाहिए था इसलिए हार न मानते हुए नेहा ने फौरन मेरे साथ तर्क किया; "लेकिन पापा जी, जब मम्मी ने आपको खुद से और मुझसे दूर कर दिया था तब आपने उन्हें माफ़ कर दिया न? फिर मुझे क्यों..." नेहा ने अपनी बात अधूरी छोड़ दी, परन्तु मैं नेहा की बात समझ गया था|

"मैंने आपकी मम्मी को माफ़ कर दिया था क्योंकि मुझे 'मेरी बेटी नेहा' मिल गई थी और तब मेरे लिए मेरी बेटी नेहा ही सब कुछ थी! मेरी बेटी की आभा ऐसी थी की मेरे दिल में आपकी मम्मी के लिए कोई मलाल नहीं बचा था| मैंने कभी आपकी मम्मी से दुबारा रिश्ता नहीं जोड़ना चाहा मगर आपकी मम्मी ने ही जबरदस्ती करते हुए मुझसे पुनः रिश्ता जोड़ा| जबरदस्ती से जोड़े इस रिश्ते में एक गाँठ पड़ गई थी, जिसे मैं अपने बच्चों के मोह के कारण आजतक नजरअंदाज करता हूँ|

लेकिन आपकी मम्मी को हमारे रिश्ते में पड़ी वो गाँठ आज भी महसूस होती है| आपको पता है आपकी मम्मी कई बार अपने लिए फैसले को याद कर खुद को कोसती है! मुझे खुद से इतने सालों तक दूर करने पर जो मैं आयुष को अपनी गोद में खिला न सका उसे ले कर आपकी मम्मी के दिल में कितना मलाल है ये सिर्फ मैं जानता हूँ|" जब मैंने अपनी बात में 'मेरी बेटी नेहा' कहा तो एक पल के लिए नेहा के चेहरे पर मुस्कान आ गई थी लेकिन जब मैंने उसके तर्क का काट किया तो नेहा के चेहरे पर आई ये मुस्कान फिर से ओझल हो गई!

"पापा जी, इंसान को अपनी गलती सुधारने का एक मौका तो देना ही चाहिए न?" नेहा ने सिसकते हुए मेरे साथ अंतिम तर्क किया|

"इंसान की हर गलती सुधारी नहीं जा सकती, कुछ गलतियों के साथ हमें जीना पड़ता है और यही गलतियाँ हमारी ज़िन्दगी में एक सबक बन कर याद रहतीं हैं!" मेरी कही ये अंतिम बात केवल नेहा पर ही नहीं उतरती थी, बल्कि मेरे ऊपर भी यही बात उतरती थी| मेरे ऊपर ये बात क्यों उतरती थी इसका पता आपको जल्द ही चलेगा!

गौर करने वाली बात ये है की, हम दोनों के बीच हुई बातों में मैंने एक भी बार नेहा को 'बेटा, बेटी, मेरा बच्चा' कह कर नहीं पुकारा था| मैं नेहा को केवल आप शब्द से ही सम्बोधित कर रहा था जो की ये दर्शाता था की मैं अब नेहा से कोई रिश्ता नहीं रखना चाहता|

खैर, मेरी बातों से साफ़ हो चूका था की मेरे दिल में अब नेहा के लिए कोई जगह नहीं है, तभी मैं नेहा के दिए सभी तर्कों को विफल किये जा रहा था| मेरे भीतर अब जैसे नेहा के लिए कोई जज्बात ही नहीं बचे थे|

मैं अब नेहा से और कुछ कहना या सुनना नहीं चाहता था इसलिए मैं उठ कर छत पर आ गया| 10 मिनट में मेरा जूतों का कार्टन आ गया और मैं माल ऊपर चढाने में व्यस्त हो गया|

उधर कमरे के भीतर नेहा का दिल फट चूका था| इस पूरी दुनिया में उसे प्यार करने वाला बस मैं था और आज जब मैंने ही नेहा से मुँह मोड़ लिया तो नेहा के जीवन में जीने के लिए कोई कारण नहीं बचा था! नेहा ने अपनी जो हिम्मत बटोरी थी वो भी अब टूट चुकी थी इसलिए अब उसके पास सिवाए पछताने के और कुछ नहीं था|
[color=rgb(97,]जारी रहेगा भाग - 17 में...[/color]
 

[color=rgb(255,]अंतिम अध्याय: प्रतिकाष्ठा[/color]
[color=rgb(51,]भाग - 17 (1)[/color]

[color=rgb(26,]अब तक अपने पढ़ा:[/color]

उधर कमरे के भीतर नेहा का दिल फट चूका था| इस पूरी दुनिया में उसे प्यार करने वाला बस मैं था और आज जब मैंने ही नेहा से मुँह मोड़ लिया तो नेहा के जीवन में जीने के लिए कोई कारण नहीं बचा था! नेहा ने अपनी जो हिम्मत बटोरी थी वो भी अब टूट चुकी थी इसलिए अब उसके पास सिवाए पछताने के और कुछ नहीं था|

[color=rgb(251,]अब आगे:[/color]

दोपहर
एक बजे तक सब लोग मंदिर से दर्शन कर और बाहर खाना खा कर घर लौटे| जैसे ही मैंने दरवाजा खोला, वैसे ही स्तुति मेरी गोदी में आने को कूद पड़ी| मेरी गोदी में आते ही स्तुति बोली; "पपई, मैं आपके लिए और दिद्दा के लिए खाना ले कर आई|" असल में खाना माँ ने पैक करवाया था मगर स्तुति ने इसका सारा श्रेय खुद को दे दिया| "नानी, सब तू ही करती है! हम सब को कहाँ कुछ पता होता है?!" संगीता प्यार से स्तुति को ताना मारते हुए बोली|

हम सभी बैठक में बैठ कर बातें कर रहे थे, नेहा भी मुँह धो कर चेहरे पर नकली मुस्कान लिए अपनी दादी जी के पास बैठ गई| नेहा ने खुद को इस समय ऐसे सहेज के रखा था की संगीता भी धोका खा गई, उसे लगा की हम दोनों (मेरे और नेहा) के बीच सब कुछ पहले जैसा सामन्य हो गया है|

संगीता ने मेरे और नेहा के लिए खाना परोसा और स्तुति ने हमें थाली ला कर दी| खाना खाते हुए स्तुति अपनी मम्मी की शिकयत मुझसे करते हुए बोली; "पपई, मम्मी न मुझे बड़े मामा जी के साथ अकेले गाँव भेज रही थी! मम्मी ने बड़े मामा जी से बोला की ये लड़की (यानी स्तुति) बहुत शैतान है, इसे अपने साथ गाँव ले जाओ| तब है न मैंने बड़े मामा जी से बोला की मैं पापा जी के पास रहूँगी, लेकिन मम्मी है न फिर भी जबरदस्ती मुझे बड़े मामा जी के साथ भेज रही थीं| वो तो दाई ने कहा की मेरी शूगी को मेरे पास रहने दो तब जा कर मम्मी चुप हुईं, वरना तो मम्मी मुझे बड़े मामा जी के साथ गॉंव भेज ही देतीं!" स्तुति को अपनी मम्मी पर गुस्सा आ रहा था क्योंकि संगीता उसे मुझसे दूर जो कर रही थी|

"बेटा, सारी मम्मियाँ न ऐसी ही होती हैं| जब मैं छोटा था न तब मेरी शैतानी करने पर आपकी दादी जी कहतीं थीं; 'बंदर आजा, मानु को पकड़ कर ले जा|' तब मैं बहुत डर जाता और दरवाजे के पीछे छुप जाता!" मेरी बात सुन स्तुति को यक़ीन नहीं हुआ की मैं इतनी शैतानी करता था की माँ को मुझे डराने के लिए बंदर को बुलाना पड़े इसलिए स्तुति आँखें बड़ी कर मुझे देखने लगी| माँ ने जब स्तुति को यूँ आश्चर्यचकित देखा तो माँ बोलीं; "तू शैतान की नानी है तो तेरा पपई शैतानी करने में शैतान का परनाना था!" ये कहते हुए माँ ने मेरी बचपन की शैतानियों की लिस्ट गिनानी शुरू कर दी| जैसे-जैसे माँ मेरी शैतानियाँ गिनाती जा रहीं थीं, वैसे-वैसे स्तुति का मुँह अस्चर्य से खुलता जा रहा था| "पपई, आप तो मुझसे भी ज्यादा शैतान थे!" स्तुति हैरत के मारे अपने दोनों गालों पर हाथ रखते हुए बोली| स्तुति की प्रतिक्रिया देख सभी ने ज़ोर का ठहाका लगाया|

फिर बारी आई संगीता की और उसने आयुष के बचपन की शैतानियाँ गिनानी शुरू कर दी| आयुष की शैतानियाँ मेरी शैतानियों के मुक़ाबले कम थीं लेकिन फिर भी स्तुति को अपने बड़े भैया की शैतानियों के बारे में सुन बहुत मज़ा आया| अब बची थी केवल नेहा, जब स्तुति ने अपनी मम्मी से पुछा की उसकी दिद्दा कितनी शैतान थीं, तो माँ एकदम से नेहा के बचाव में आ गईं; "मेरी मुन्नी तुम तीनों की तरह बिलकुल शैतान नहीं थी| वो जब छोटी थी तो मेरी सबसे ज्यादा सेवा करती थी|" माँ ने नेहा को अपने गले लगा कर लाड करते हुए कहा|

माँ ने जब हम तीनों बाप-बेटा-बेटी को शैतान कहा तो स्तुति के दिमाग में एक आईडिया आ गया| स्तुति ने अपने बड़े भैया को अपने पास बुलाया और मेरी गोदी में बैठने को कहा| जैसे ही संगीता ने हम तीनों बाप-बेटा-बेटी को इस तरह बैठे देखा वो फौरन समझ गई की स्तुति के दिमाग में क्या खुराफात पक रही है| संगीता ने दबी आवाज़ में माँ को सब बताया तो माँ प्यारभरे गुस्से से हमे डाँटते हुए बोली; "खबरदार जो तुम तीनों शैतानों ने अपनी 'गैंग' बनाई तो वरना तीनों को कूट-पीट कर सीधा कर दूँगी!" माँ की इस खोखली धमकी के कारण स्तुति का अपनी शरारती गैंग बनाने का सपना टूट गया मगर स्तुति इससे निराश नहीं हुई| बल्कि स्तुति एक ऐसी शरारत सोचने लगी जिसमें वो मुझे और आयुष को भी शामिल कर सके|

बहरहाल, मेरे जूतों का नया माल आया था और आयुष नए जूते देखने को उत्सुक था इसलिए हम बाप-बेटा-बेटी बाहर स्टोर में आ गए| उधर माँ थक गईं थीं इसलिए वो आराम करने लगीं तथा माँ-बेटी हमारे कमरे में बैठ गए| संगीता ने ख़ुशी-ख़ुशी नेहा से पुछा की मैंने नेहा को कितना लाड-प्यार किया तो नेहा की आँखें आँसुंओं से लबालब भर गईं! आखिर नेहा ने रोते हुए सारी बात संगीता को बताई| सब बात जान संगीता का दिल दुखा और वो मुझे समझाने बाहर स्टोर में आ गई| "आयुष...स्तुति चलो अंदर जा कर पढ़ाई करो!" संगीता ने बहाने से दोनों भाई-बहन को घर के भीतर भेज दिया|

"जानू, नेहा को माफ़ कर दो! प्लीज! उसे अपने किये पर बहुत पछतावा है! बेचारी दो दिन से रात में ठीक से सोइ नहीं, बस आपसे माफ़ी माँगने को रोती-तड़पती रही है!" संगीता ने नेहा की वकालत करते हुए कहा| विधि की विडंबना तो देखिये जो लड़की हमेशा अपने पापा या मम्मी की वक़लत किया करती थी, आज उसकी वकालत उसकी मम्मी कर रही थी!

खैर, जब संगीता ने नेहा की यूँ वकालत की तो मेरे चेहरे पर से सारे जज्बात धूल गए! "वो तुम ही थी न, जिसने कहा था की चूँकि नेहा मेरा खून नहीं है तो मुझे उसके बारे में अधिक नहीं सोचना चाहिए और आज तुम ही नेहा की वकालत कर रही हो?!" मेरा ये उखड़ा हुआ सा जवाब सुन संगीता का चेहरा लटक गया और वो दो पल के लिए खामोश हो गई|

नेहा के माफ़ी माँगने पर मैं उसे जो न कह पाया वो मैं दिल खोल कर अब संगीता से कहना चाहता था इसलिए संगीता के खामोश होते ही मैं बोला; "जिस पछतावे की तुम बात कर रही हो, वो नेहा को केवल इसलिए हो रहा है क्योंकि उसके साथ ये हादसा घटित हुआ| यदि ये हादसा नेहा के साथ न हुआ होता तो उसे ये पछतावा कभी नहीं होता न?!

और किस माफ़ी की बात कर रही हो तुम?! बजाए अपनी गलती मानने के, नेहा बस बहाने बना रहे है की उसके दोस्तों ने उसके मन में ये ख्याल डाला की मैं उसका 'बायोलॉजिकल' पिता नहीं हूँ| मैं पूछता हूँ की कल को तुम्हें कोई आ कर कहे की हमारे बीच प्रेम नहीं बस जिस्मानी रिश्ता है तो तुम क्या करोगी?! चुपचाप उसकी बातें सुन हाँ में हाँ मिलाओगी या फिर उसका मुँह तोड़ दोगी?!

नेहा कह रही है की उस रात पिंकी के घर में जब वो डरी-सहमी रो रही थी तब उसे मेरे...एक पिता के दुःख-दर्द का एहसास हुआ, तो फिर घर आ कर वो सीधा मेरे पास क्यों नहीं आई? क्यों मेरे उससे पहले की तरह दूरी बनाने को उसने गलत समझा?! क्यों उसके मन में इसका गुस्सा बैठ गया?! अगर उसे तब इतनी ही ग्लानि हो रही थी तो वो तब क्यों नहीं आई मुझसे माफ़ी माँगने?

जब तुमने उसे सारा सच बताया, यहाँ तक की करुणा घर आई और हमारे (मेरी और करुणा की दोस्ती के) बारे में सच बता कर गई जिसका मुझे पता ही नहीं, तब कहीं जा कर.सारा सच जानकार ही नेहा को क्यों ग्लानि हुई? मतलब अगर उसे सच पता नहीं चलता तो वो मेरे प्रति अपने गुस्से और नफरत को अपने दिल में पाले ही रहती न?! तब तो उसे ग्लानि होती ही नहीं न?!

भई ये कैसा पछतावा है जो अपने साथ कुछ बुरा घटित होने पर ही होता है?! मुझे या तुम्हें तो कभी इस तरह पछतावा नहीं होता! हमें पता होता था की हम क्या गलत कर रहे हैं और हमें तो तभी से ये सोचकर पछतावा होने लगता था की जब हमें एक दूसरे के किये पाप के बारे में पता चलेगा तो हमें कैसा लगेगा?! कितना दुःख होगा...कितना कष्ट होगा!

यही नहीं, मुझसे माफ़ी पाने के लिए नेहा मुझ ही से तर्क कर रही है| वो मुझसे पूछ रही है की जब मैंने तुम्हें (संगीता को) मेरा दिल तोड़ने के लिए माफ़ कर दिया तो उस (नेहा) के साथ माफ़ी देने में मैं क्यों भेद भाव कर रहा हूँ? ये माफ़ी माँगने का तरीका है?" मेरे ये तीखे सवालों के बाण्ड से संगीता का सर शर्म के मारे झुक गया था| संगीता को अभी तक मैं ही गलत लग रहा था मगर जब उसने सुना की नेहा ने किस तरह मुझसे माफ़ी माँगी है तो वो मुझे गलत समझने के कारण खुद को लज्जित महसूस कर रही थी|

अब मुझसे संगीता का ये लटका हुआ चेहरा नहीं देखा जा रहा था इसलिए मैं अपनी बात पूरी करते हुए बोला; "नेहा ने मुझे मेरे जीवन का सबसे जर्रूरी सबक सिखाया है और वो ये की बच्चे बड़े हो कर अपने माँ-बाप का दिल एक न एक बार तो दुखाते ही हैं इसलिए बेहतरी इसी में है की अभी से अपना जिगर मज़बूत कर लो...दिल पत्थर का कर लो!

जिस प्रकार मैंने ये सबक सीख लिया है और इस सबक के परिणाम के साथ मैं जीवन जी रहा हूँ, वैसे ही नेहा ने जो सबक सीखा है उसे उस सबक के परिणाम के साथ जीना होगा|" मैंने अपने दिल की बात कह दी थी, इससे ज्यादा मैं संगीता को और नहीं सुनाना चाहता था| मेरी बातें सुन संगीता को मेरे गुस्से और दर्द का अंदाजा मिल चूका था| जिस जख्म को संगीता स्तुति के प्यार के कारण भरा हुआ समझ रही थी, वो जख्म तो नासूर बन कर अब भी मुझे दर्द दिए जा रहा था| फर्क बस इतना था की मैं अपने दर्द को अच्छे से छुपाये हुए था|

खैर, दो पल के लिए स्टोर में ख़ामोशी छा गई थी और इसी पल में संगीता ने कुछ सोच लिया था!

"So do you hate Neha?" संगीता ने बड़ी सरलता से मुझसे बिना बात घुमाये सीधा सवाल पुछा| अब ऐसे सवाल की मैंने संगीता से उम्मीद नहीं की थी इसलिए मैं संगीता के मन में पनपे इस सवाल का कारण समझने की कोशिश करने लगा| अगले 5 सेकंड के लिए मैं भोयें सिकोड़ कर गुस्से से संगीता को देख रहा था की भला वो ये कैसा सवाल मुझसे पूछ रही है?! भले ही मैं नेहा से गुस्सा था मगर मेरे मन में उसके लिए कभी कोई नफरत पैदा नहीं हुई थी|

असल में इस प्रश्न को पूछने के पीछे संगीता का मुख उद्देश्य ये था, की वो जानना चाहती थी की क्या मेरे दिल में नेहा के लिए नफरत पैदा हो गई है? यदि ऐसा है तो फिर मैं नेहा को कभी नहीं अपना पाऊँगा|

इधर, संगीता मुझसे अपने सवाल का जवाब पाने के लिए उत्सुक थी| "Hate is a very strong word! नफरत करने का मतलब होता है की आप उस शक़्स के साथ कुछ बुरा घटित होने की कामना करते हैं|" मैंने संगीता के सवाल का जवाब गोल-मोल कर के दिया था ताकि कहीं उसके सामने मेरा नेहा पर गुस्सा कम न नज़र आये और संगीता के मन में कोई और सवाल पैदा न हो जाए!

उधर संगीता को जैसे मुझसे इसी गोल-मोल जवाब की अपेक्षा थी इसीलिए उसके चेहरे पर एक अर्थपूर्ण मुस्कान तैरने लगी थी!

संगीता के दिमाग ने कंप्यूटर की तरह काम करना शुरू कर दिया था, जिसका परिणाम जल्दी दिखने वाला था|

हम मियाँ-बीवी स्टोर में थे, वहीं दूसरी तरफ स्तुति फुदकती हुई अपनी पढ़ाई करने के बजाए अपनी दिद्दा के पास जा पहुँची| अपनी दिद्दा को यूँ सिसकता हुआ देख स्तुति बहुत दुखी हुई और नेहा से उसकी उदासी का कारण पुछा| "पापा जी, मुझे प्यारी नहीं करते!" नेहा ने बात बनाते हुए कहा| अपनी दिद्दा की बात सुन स्तुति अपने प्यारे से गुस्से से तमतमाती हुई मेरे पास दौड़ी आई| नाक पर प्यारा सा गुस्सा लिए, गाल फुलाये और कमर पर अपने दोनों हाथ रखे हुए स्तुति मुझसे बोली; "पपई, आप दिद्दा को प्यारी क्यों नहीं करते? दिद्दा कितना रो रही हैं!" स्तुति की इस प्यारी सी शिकायत को सुन एक पल के लिए मेरा दिल जैसे धड़कना भूल गया! ऐसा क्यों हुआ ये मुझे तब समझ नहीं आया|

अब स्तुति को मनाना था इसलिए मैंने स्तुति को गोदी में लिया और उसके सवाल का जवाब देते हुए बोला; "बेटा, जब बच्चे बड़े हो जाते हैं न तो उन्हें अपने मम्मी-पापा के प्यार की जर्रूरत नहीं होती| अब जब बच्चे ही प्यारी नहीं माँगेंगे तो मम्मी-पापा की प्यारी धीरे-धीरे सूखती जाती है|" ये जवाब कम और नेहा के प्रति मेरे दिल में बैठा गुस्सा ज्यादा था|

स्तुति को उम्मीद थी की मैं उसका गुस्सा देख पिघल जाऊँगा और नेहा को पुनः प्यार करूँगा मगर जब मैंने स्तुति के सवाल का जवाब इस प्रकार दिया तो मेरी बिटिया एकदम से सहम गई| दरअसल स्तुति अभी इतनी बड़ी नहीं हुई थी की अपने जीवन के इस कटु सत्य से रूबरू हो सके| डर के मारे स्तुति एकदम से मेरे सीने से लिपट गई और रुनवासी हो कर बोली; "मुझे बड़ा नहीं होना! मुझे मेरे पपई की प्यारी चाहिए! मैं कभी बड़ी नहीं हूँगी!" स्तुति बार-बार यही बातें दोहराये जा रही थी| मेरी भावुक बिटिया को लग रहा था की वो अपनी उम्र को अपने काबू में कर खुद को बड़ी होने से रोक सकती है|

"बेटा, सब बच्चे एक न एक दिन बड़े हो जाते हैं| अब मुझे देखो, मैं भी कभी आपकी तरह छोटा बच्चा था और आज देखो मैं इतना बड़ा हो गया की आपको गोदी में खिला रहा हूँ|" मैंने स्तुति को प्यार से समझाते हुए कहा| ये मेरी मूर्खता ही थी की मैं एक फूल से नाज़ुक बिटिया को जबरदस्ती जीवन के सबक दिए जा रहा था, जबकि मुझे तो इस समय भवुक हुई मेरी बिटिया को प्यार से बहलाना चाहिए था|

खैर, स्तुति इस समय बहुत भावुक हो गई थी और बार-बार न में अपनी गर्दन हिलाते हुए रट रही थी; "नहीं पपई! नहीं पपई! नहीं पपई!" स्तुति लगभग रोने वाली थी की तभी मुझे अक्ल आई और मैं स्तुति को बहलाने लगा; "अच्छा बेटा, आप बड़े मत होना| हमेशा मेरी गोदी में रहना|" मैंने बस स्तुति को खुश करने के लिए कहा था मगर स्तुति ने इसे सच मान लिया और ख़ुशी से मेरे दोनों गालों पर पप्पी करने लगी|

कुछ देर बाद स्तुति ने ये बात अपनी दादी जी यानी मेरी माँ से कह दी| माँ ने जब ये बात सुनी तो उन्होंने मुझे फौरन आवाज़ दे कर अपने पास बुलाया| "क्यों रे लड़के, ये सब क्या मेरी शूगी को पढ़ाता रहता है?" माँ मुझे डाँटते हुए बोलीं|

"हाँ तो क्या गलत कहा मैंने?! जब मैं छोटा था तब आप मुझे कितना लाड-प्यार करते थे| मुझे गोदी लेते थे, मुझे अपने हाथों से खाना खिलाते थे, मेरे साथ खेलते थे और मुझे रात को कहानी सुनाते थे| लेकिन जब से मैं बड़ा हुआ आपने किया इसमें से कुछ?!" मैंने बड़े प्यार से बात को पलटते हुए माँ से तर्क किया| मेरी बात सुन माँ ज़ोर से हँस पड़ीं और बोलीं; "अरे तब तू छोटा सा था, अब तो तू लम्बाई में मुझसे बड़ा हो गया तो अब मैं तुझे कैसे गोदी लूँ?!"

"गोदी नहीं ले सकते मगर अपने हाथ से खाना तो खिला सकते हो न?! मुझे रात को कहानी तो सुना सकते हो न?!" मैंने पुनः माँ के साथ तर्क किया तो माँ ने हार मानते हुए मेरे आगे हाथ जोड़ दिए!

"दाई, गलत बात! आप पपई को खाना खिलाओ और कहानी भी सुनाया करो...नहीं तो...नहीं तो मैं आपसे गुच्छा हो जाऊँगी!" स्तुति ने अपने गाल फुलाते हुए नाराज़ होने का अभिनय किया तो माँ एकदम से डर गईं और स्तुति से बोलीं; "ठीक है मेरी माँ! तू मुझसे नाराज़ न होना, तू जो कहेगी मैं सब करुँगी!" जब कोई स्तुति की इस प्यारी सी धमकी के कारण हार मान जाता तो स्तुति को बहुत मज़ा आता| स्तुति फौरन अपनी दादी जी के गले लग गई और इनाम के रूप में अपनी दादी जी को दो पप्पी दी!

अपनी दादी जी का लाड-प्यार पा कर स्तुति मेरे पास आ गई और मुझे हुक्म देते हुए बोली; "पपई प्यारी दो!" स्तुति हमेशा मुझसे हक़ के रूप में प्यारी माँगती थी इसलिए मुझे इसकी आदत थी| परन्तु संगीता को हमेशा ही ये बात अजीब लगती थी इसीलिए आज जब स्तुति ने फिर से मुझपर हक़ जमाते हुए प्यारी माँगी तो संगीता स्तुति को टोकते हुए बोली; "ऐ लड़की! तू प्यारी माँग रही है या अपना कर्ज़ा वापस माँग रही है?"

"हो सकता है मानु ने शूगी का पिछले जन्म में प्यार का कोई क़र्ज़ चुकाना हो!" ये शब्द माँ के मुख से स्वतः ही निकले थे परन्तु मेरे दिल को ये बात छू गई थी! स्तुति और मेरा रिश्ता बहुत अनोखा था और ये बात कई बार प्रमाणित हो चुकी थी| बहरहाल, मैं माँ की बात को सोचने में लगा था जबकि माँ, स्तुति और संगीता इस प्यारभरी बात से प्रसन्न हो रहे थे|

बहरहाल, मेरे मन में फिर से नेहा के लिए प्यार पैदा करने के लिए संगीता ने एक रणनीति बनाई थी जो की उसने नेहा को अच्छे से समझा दी थी| वहीं मैं माँ-बेटी की इस रणनीति से अनजान पहले जैसा ही अपने जीवन की समस्याओं को हल करने में लगा था|

रात को खाना खाने के बाद संगीता ने स्तुति को अचानक लाड करना शुरू कर दिया| स्तुति को गोदी में लिए हुए संगीता रसोई में घुस गई और कुछ न कुछ काम दे कर स्तुति को व्यस्त कर दिया| सूखे बर्तनों को उनकी जगह सजा कर रखना, स्लैब साफ़ करना, दाल-सब्जी आदि को फ्रिज में रखने का काम दे कर संगीता ने स्तुति को व्यस्त कर दिया| स्तुति को अभी अपनी मम्मी की मदद करने में बहुत मज़ा आ रहा था इसलिए वो पूरी दयानदारी से काम कर रही थी|

रसोई के सब काम करने से स्तुति जल्दी थक गई और जल्दी ही सो गई| जब स्तुति सो गई तो संगीता उसे गोदी ले कर माँ के पास लिटा आई| मैं समझा की संगीता का मन रोमांस का होगा, जबकि मेरा मन नेहा तथा संगीता के साथ हुई बातों के कारण दुखी था इसलिए मैं आँखें बंद कर सोने का नाटक करने लगा| स्तुति को लिटा कर जब संगीता आई तो उसने मुझे सोता हुआ पाया, वो समझ गई की मेरा मन अभी स्थिर नहीं है इसलिए मेरी बगल में लेटते हुए संगीता बोली; "कम से कम मेरी तरफ मुँह कर के लेट जाओ, आपका मुखड़ा देख कर चैन से सो तो सकूँगी|" संगीता का ये प्यारा सा निवेदन सुन मैं उसकी तरफ करवट ले कर लेट गया|

लगभग आधे घंटे बाद कमरे का दरवाजा खुला तो मुझे लगा की स्तुति होगी, परन्तु ये स्तुति नहीं नेहा थी| "मम्मी, मुझे अकेले सोने में डर लग रहा है, मैं यहाँ सो जाऊँ?" नेहा आज सालों बाद एक छोट बच्चे की तरह बोली| नेहा की बात सुन संगीता पीछे को सरक गई और नेहा आ कर हमारे बीच में लेट गई| मैंने नेहा की बात सुन ली थी अतः मुझे समझते देर न लगी की नेहा जानबूझ कर मेरे नज़दीक आने के लिए ये कह रही है इसलिए मैं बिना कोई प्रतिक्रिया दिए आँख- मूँदें लेटा रहा| बीच में लेटते ही नेहा ने मेरी तरफ करवट ली और जैसे नेहा अपने बचपन में मेरे सीने से लिपट सुरक्षित महसूस करती थी, ठीक उसी तरह नेहा मेरे सीने से लिपट गई| इतने सालों बाद मेरे सीने से लिपट कर नेहा का मासूम दिल खुशियों से भर गया और कुछ पल के लिए नेहा के चेहरे पर सुकून की मुस्कान छा गई|

इधर मेरा मन पहले ही कठोर था ऐसे में नेहा के इस प्यार का मुझ पर कोई असर नहीं हुआ| मुझे न तो ख़ुशी महसूस हो रहे थी और न ही गुस्सा आ रहा था| अतः कुछ सेकंड बाद मैंने खुद को नेहा की पकड़ से छुड़ाया और दूसरी तरफ करवट ले कर लेट गया| मेरे इस रूखे व्यवहार के कारण नेहा का नाज़ुक दिल टूट गया और वो अपनी मम्मी से लिपट कर सिसकने लगी| मैंने नेहा की सिसकियाँ सुन ली थीं, ये सिसकियाँ मुझे चुभ रहीं थीं इसलिए मैं उठ कर बच्चों वाले कमरे में आ कर अकेला लेट गया|

मेरे कमरे से चले जाने पर नेहा अपना रोना रोक न पाई और उठ कर बैठ कर रोने लगी| नेहा को यूँ हार मानते देख संगीता ने उसका होंसला बढ़ाने के लिए उसे कुछ समझाया जिससे नेहा को हिम्मत मिली और उसने खुद को सँभाला|

इधर मैं अकेला कमरे में लेटा था परन्तु नेहा के साथ यूँ उखड़ा व्यवहार करने के कारण मेरा मन बेचैन हो रहा था| नींद आँखों से उड़ चुकी थी इसलिए करवट बदलते-बदलते रात के दो बज गए और जब नींद आई तो ऐसी नींद आई की सुबह उठा ही नहीं गया!

अपनी योजना पर काम करते हुए संगीता ने जल्दी से नेहा और बच्चों को स्कूल के लिए तैयार किया| चूँकि मैं अभी उठा नहीं था तो मौके का फायदा उठाते हुए संगीता ने तीनों बच्चों को दबे पॉंव कमरे में भेज दिया| दरअसल स्तुति की आदत थी की वो सुबह उठते ही मेरी पप्पी ले कर अपना दिन शुरू करती थी| संगीता अपनी छोटी बिटिया की इस आदत से परिचित थी इसलिए उसने अपनी योजना इसी के इर्द-गिर्द बनाई थी|

नेहा ने किसी तरह से स्तुति को समझा बुझा कर मेरी पहले पप्पी खुद लेने के लिए मना लिया था| स्तुति को ये खेल लग रहा था इसलिए वो तुरंत मान गई| नेहा ने मेरे गहरी नींद में होने का फायदा उठाते हुए आज सालों बाद मेरी पप्पी ली और मेरे पॉंव छू कर स्कूल के लिए चली गई| मैं भले ही नींद में था परन्तु मुझे एहसास हो गया था की कोई मेरी पप्पी ले रहा है| मुझे लगा की शायद ये स्तुति होगी इसलिए मैं चुप-चाप लेटा रहा| लेकिन नेहा के जाने के बाद जब स्तुति और आयुष ने भी बारी-बारी से मेरी पप्पी ली तो मुझे एहसास हुआ की मेरी पप्पी तीन बार ली गई है! इसका मतलब था की नेहा भी धोके से मेरी पप्पी ले कर गई है, ये ख्याल आते ही मैं उठ बैठा| परन्तु इससे पहले की मैं कुछ कहूँ या पूछूँ, स्तुति ने मुझे जगा हुआ देख कर मेरी गोदी में आने के लिए छलांग लगा दी तथा मैं स्तुति के मोहपाश में फँस सब भूल गया!

रात के समय संगीता ने फिर चाल चली और नेहा को कमरे में सोने के लिए बुला लिया| नेहा मुझसे लिपट कर लेटी थी की तभी मेरे क्रोध ने मुझे नेहा से दूर चले जाने को कहा| अब यदि मैं उठ कर चला जाता तो नेहा का दिल टूट जाता इसलिए मैंने केवल दूसरी तरफ करवट ले ली| इस बार नेहा ने मेरे दूसरी तरफ करवट लेने का बुरा नहीं लगाया और वो मेरी कमर पर हाथ रख कर सो गई|

अगली सुबह नेहा मेरी पप्पी ले कर स्कूल जाने वाली थी मगर मैं आज जल्दी उठ गया जिस कारण नेहा का ये प्लान फ़ैल हो गया! बच्चों के स्कूल जाने के बाद मैं भी काम पर निकल गया और सीधा रात के खाने पर घर पहुँचा| आज रात का खाना नेहा ने परोसा था और मुझे ये देख कर थोड़ा अस्चर्य हो रहा था| मैंने जब संगीता की तरफ देखा तो पाया की उसके चेहरे पर वही अर्थपूर्ण मुस्कान तैर रही है जो उस दिन स्टोर में तैर रही थी! मैं भोयें सिकोड़ कर उसे देखने लगा और उसकी इस मुस्कान का कारण समझने लगा| परन्तु संगीता की ये अर्थपूर्ण मुस्कान हर पल बढ़ती जा रही थी, ऐसा लगता था मानो संगीता मुझे चिढ़ा रही हो की बूझ के देखो मेरी इस मुस्कान का कारण?!

खाना परोसा जा चूका था और जैसे ही मैंने पहला निवाला खाया मुझे स्वाद में फर्क महसूस हुआ! मुझे माँ के हाथ के खाने की पहचान थी, संगीता के हाथ के खाने की पहचान थी परन्तु इस खाने का स्वाद अनजाना था| मैं इस स्वाद को पहचानने में लगा था की तभी संगीता बीच में बोल पड़ी;

संगीता: आपको पता है आज का खाना किसने बनाया है?

संगीता ने मुझे छेड़ने के मकसद से ये सवाल पुछा था| अब मैं तो पहले ही इस सवाल का जवाब खोज रहा था तो मैं क्या जवाब देता?! उधर स्तुति जो की हमेशा से अधिक उतावली रही है वो एकदम से बीच में बोल पड़ी;

स्तुति: पपई, मैंने बनाया!

स्तुति ने बड़े गर्व से खाना बनाने का सारा श्रेय खुद ले लिया! स्तुति के इस तरह खुद सारा श्रेय लेने पर मैं, आयुष और माँ खूब ज़ोर से हँस पड़े| वहीं संगीता को स्तुति पर प्यारभरा गुस्सा आ गया था इसलिए वो स्तुति को प्यार से डाँटते हुए बोली;

संगीता: चुप कर! एक गिलास पानी दे कर सारा खाना बनाने का श्रेय खुद को दे रही है! ये सारा खाना नेहा ने बनाया है और वो भी माँ से पूछ-पूछ के|

नेहा ने आज पहलीबार अपने आप रोटी, सब्जी तथा दाल बनाई थी और संगीता को एक माँ होते हुए आज अपनी बेटी पर बहुत गर्व हो रहा था| जैसे ही संगीता ने खाना बनाने का सारा श्रेय नेहा को दिया वैसे ही नेहा अपनी छोटी बहन के साथ अपनी ख़ुशी बाँटते हुए बोली;

नेहा: वैसे मम्मी, अगर स्तुति मुझे पानी ला कर नहीं देती तो मैं दाल कैसे बनाती इसलिए खाना बनाने का श्रेय हम दोनों बहनों को जाता है|

अपनी दीदी की बात सुन स्तुति फौरन नेहा के गले लग गई और मुझसे बोली;

स्तुति: पपई, दिद्दा को प्यारी करो!

स्तुति जानती थी की उसकी दीदी को इस समय बस मेरे प्यार की जर्रूरत है इसलिए स्तुति ने मुझे नेहा को प्यारी करने का हुक्म दिया|

जब क्रोध सर पर चढ़ा हो तो कहाँ से प्यार निकलता इसलिए मैं खाने पर से उठ गया| मुझे यूँ उठ कर जाते हुए देख संगीता ने मुझे रोकना चाहा मगर मैं उसे नज़रअंदाज़ कर अपने कमरे में आया और हाथ-मुँह धो कर अपने बटुए से 501/- रुपये ले कर वापस माँ के पास आया| मुझे दुबारा कमरे में देख और मेरे हाथ में पैसे देख संगीता की जान में जान आई वरना उसे लग रहा था की मैं गुस्से में खाने से उठ चूका हूँ|

मैंने पैसे माँ की तरफ बढाए तो माँ ने हाथ पोंछ के पैसे लिए और नेहा को अपने पास बुला कर उसे शगुन के रूप में पैसे देते हुए बोलीं;

माँ: आज मेरी बेटी ने पहलीबार खाना बनाया और बड़ा ही स्वाद खाना बनाया इसलिए मेरी तरफ से ये शगुन| इसे खर्च मत करना और हमेशा अपने पास रखना|

माँ ने नेहा को आशीर्वाद सहित पैसे दिए| नेहा ने पैसे अपने मस्तक से लगा कर अपने पास रख लिए और माँ के पॉंव छू कर आशीर्वाद लिया| फिर नेहा मेरे पास आई और मेरे भी पॉंव छुए| मैं उस समय को प्रतिक्रिया नहीं देना चाहता था परन्तु स्वतः ही मेरा हाथ आशीर्वाद देने के लिए नेहा के सर पर आ गया| भले ही मेरे मुख से बोल नहीं फूटे परन्तु मेरा हाथ सर पर रखने भर से नेहा का दिल ख़ुशी से भर उठा| नेहा एकदम से मेरे गले लग गई और स्तुति की तरह ख़ुशी के मारे कूदने लगी!

अपनी बेटी को इस तरह ख़ुशी से कूदता हुआ देख के माँ का दिल बहुत प्रसन्न था| वहीं मैंने जब संगीता को यूँ प्रसन्न देखा तो मैं समझ गया की ये सब करा-धरा उसी का है, वही है जो नेहा को यूँ मेरे नज़दीक करने के लिए नई-नई चालें चल रही है! मेरे मन में बैठे क्रोध ने मुझे फौरन संगीता की चाल से सतर्क करते हुए नेहा के मोह से कैसे बचना है इसका उपाए सीखा दिया|

उधर अपनी दीदी को यूँ पैसे ले कर ख़ुशी से कूदते हुए देख स्तुति को लालच आ रहा था; "दाई, कल मैं खाना बनाऊँगी और आप है न मुझे ढेर सारी रसमलाई शगुन के रूप में खाने को देना|" रसमलाई खाने के नाम से ही स्तुति के मुँह में पानी आ गया था इसलिए वो अपने होठों पर जीभ फिराते हुए बोली| स्तुति का ये बालपन देख सभी को हँसी आ गई तथा स्तुति भी खी-खी कर हँसने लगी!

खैर, मेरी छोटी सी बिटिया को ये महसूस हो गया था की मैं अब नेहा को पहले जैसा प्यार नहीं करता तभी तो स्तुति के हुक्म देने पर भी मैंने नेहा को प्यारी नहीं दी| अतः स्तुति ने ही अपनी दिद्दा को मेरी प्यारी दिलाने की जिम्मेदारी ली और एक नायाब तरीका खोज निकाला|

खाना खाने के बाद मैं और माँ बैठक में बैठ कर बात कर रहे थे जब स्तुति फुदकती हुई मेरे पास आई और मेरी गोदी में चढ़ कर बोली; "पपई, मुझे थर्टी (30) प्यारी दो!" आज तक जब भी स्तुति मुझसे प्यारी मांगती थी तो उसकी कोई निश्चित संख्या नहीं होती थी इसलिए जब स्तुति ने कहा की उसे तीस प्यारी चाहिए तो मैं सोच में पड़ गया की आखिर इस सँख्या के पीछे क्या राज़ है? मुझे सोचते हुए देख स्तुति फिर से बोली की उसे तीस प्यारी चाहिए| उस समय मुझे ये स्तुति का कोई खेल लगा इसलिए अपनी बिटिया की बात मानते हुए मैंने गिन कर स्तुति को तीस प्यारी दी|

स्तुति को प्यारी दे मैं फ़ोन पर बात करने छत पर आया| मेरे पीछे नेहा बैठक में आई तो स्तुति उसकी गोदी में बैठ गई और मेरे द्वारा दी गई तीस प्यारी में से 10 प्यारी अपनी दिद्दा को दे दी! फिर स्तुति अपने बड़े भैया की गोदी में बैठी और आयुष को बाकी बची 20 प्यारी में से 10 प्यारी दे दी| माँ चुपचाप बैठी हुईं मेरे द्वारा दी गई 30 प्यारियों का बँटवारा देखते हुए मंद-मंद मुस्कुरा रही थीं|

उस दिन से जब भी मैं स्तुति को खाली बैठा दिखता तो वो मेरी गोदी में चढ़ जाती और मुझसे अलग-अलग अंकों की प्यारी माँगती| कभी कहती; "पपई, मुझे वन हंड्रेड (एक सौ) प्यारी दो!" तो कभी कहती मुझे सेवेंटी (सत्तर) प्यारी दो! मैं स्तुति की इस अंकों वाले प्यारी को समझ नहीं पाता और इसे स्तुति का बचपना समझ गौर न करता|

परन्तु एक दिन मैंने गौर किया और पाया की मुझसे सौ प्यारी ले कर स्तुति सीधा अपनी दिद्दा के पास पहुँची और नेहा की गोदी में बैठ कर उसके दोनों गालों पर गिनती गिनते हुए प्यारी करने लगी| "दिद्दा, ये पपई की फिफ्टी (पचास) प्यारी है! बाकी की फिफ्टी प्यारी मेरी!" स्तुति अपने बालपन में बोली| अपनी छोटी बहन का ये प्यार देख नेहा ने स्तुति के मस्तक को चूम लिया और उसे धन्यवाद देते हुए बोली; "पापा जी की प्यारी मुझ तक पहुँचाने के लिए थैंक यू!" मेरे इस उखड़े व्यवहार के कारण दोनों बहने बहुत नज़दीक आ चुकी थीं|

मैं कमरे के बाहर खड़ा ये दृश्य देख रहा था की तभी पीछे से माँ का हाथ मेरे कँधे पर पड़ा| माँ ने भी कमरे के भीतर का दृश्य देख लिया था इसलिए वो मुस्कुराते हुए बोलीं; "तुझे पता है, तेरी लाड़ली बिटिया बनिये की तरह अपनी ही बहन के साथ तेरी प्यारी का सौदा करती है! तुझसे जितनी प्यारी लेती है उसका आधा अपनी दिद्दा को देती है और बाकी का कमीशन समझ वो खुद रख लेती है!" माँ मज़ाक करते हुए बोलीं तो मुझे भी हँसी आ गई|

खैर, मुझे पता था की आज रात फिर संगीता अपनी चाल चलेगी और नेहा को कमरे में सोने के लिए बुला लेगी इसलिए मैं जानबूझ कर कंप्यूटर पर काम करने के बहाने से जागता रहा| संगीता ने कई बार मुझे सोने को कहा मगर मैं जर्रूरी काम का बहाना कर जागता रहा| संगीता को समझते देर न लगी की मैं उसकी इस चाल के बारे में जान गया हूँ इसलिए वो खामोश हो कर लेटी रही|

अब जैसा की माँ-बेटी के बीच पहले से तय था, नेहा रात को साढ़े दस बजे कमरे में आई| नेहा को उम्मीद थी की मैं सो रहा हूँगा और वो इसका फायदा उठा कर मुझसे लिपट कर सो जाएगी मगर मैं तो जाग रहा था! मुझे जगा हुआ देख नेहा अपनी मम्मी को देखने लगी, उस पल दोनों माँ-बेटी के बीच नजाने क्या ख़ुफ़िया बात हुई की नेहा अपनी मम्मी की बात समझते हुए बिस्तर के बीच में लेट गई|

इधर मैं उम्मीद कर रहा था की नेहा मुझे जगा हुआ देख कर वापस चली जाएगी मगर यहाँ तो सब उल्टा ही हो गया! साफ़ था की मैं तब तक तो नहीं सो सकता था जब तक नेहा जाग रही है इसलिए मैं अपने काम में लगा रहा| जब रात के 12 बज गए और मैं नहीं लेटा तो नेहा समझ गई की मैं उसके कारण नहीं लेट रहा इसलिए नेहा बिना कुछ कहे उठ कर अपने कमरे में चली गई| नेहा जब जा रही थी तो उस समय मुझे कुछ महसूस हुआ, वो क्या था ये मुझे समझ नहीं आया|

नेहा के जाने के 15 मिनट बाद में लेटा तो संगीता मुझे ताना मारते हुए बोली; "ज़िद्दी बहुत हो आप!" इतना कह संगीता गुस्से में दूसरी तरफ करवट ले कर सो गई| संगीता के इस ताने का मतलब था की मैंने जानबूझ कर जागने की अपनी ज़िद्द दिखाई जिस कारण नेहा को ही उठ कर जाना पड़े|

अगली सुबह मुझे आगरा निकलना था इसलिए मैं जल्दी तैयार हो कर बच्चों के जागने से पहले ही निकल गया| मैं तो आगरा के लिए निकल गया मगर मेरे पीछे नेहा के स्कूल में काण्ड हो गया!

दरअसल, पिछले दो दिन से नेहा की दोस्त पिंकी स्कूल नहीं आई थी इसलिए दोनों का आमना-सामना नहीं हुआ था| परन्तु आज पिंकी स्कूल आई थी और आज दोनों के बीच लड़ाई होनी तय थी|

लंच टाइम में नेहा अपनी दोस्त रेखा के साथ कैंटीन से आ रही थी, जब पिंकी ने दोनों का रास्ता रोक लिया| "आखिर आज तू स्कूल आ ही गई, मुझे तो लगा था की तू स्कूल ही बदल लेगी!" पिंकी गंदी सी हँसी हँसते हुए नेहा को ताना मरते हुए बोली|

नेहा को डर था की कहीं पिंकी अरमान के घर हुए काण्ड का ज़िक्र सबके सामने न कर दे इसलिए नेहा सर झुकाये, चुपचाप निकलने लगी| परन्तु पिंकी ने फिर से उसका रास्ता रोक लिया और बोली; "बाप में तो गुंडे वाले तेवर हैं मगर बेटी डरपोक निकली?!" पिंकी नेहा का मज़ाक उड़ाते हुए बोली|

जैसे ही पिंकी ने मेरे लिए 'गुंडा' शब्द इस्तेमाल किया, नेहा के शरीर में आग लग गई और उसने खींच कर एक थप्पड़ पिंकी के मार दिया और उसकी कमीज़ का कॉलर पकड़ कर उसे दिवार से मारते हुए बोली; "खबरदार जो मेरे पापा जी के बारे में कुछ कहा तो, मुँह तोड़ दूँगी तेरा!" नेहा के अचानक हाथ उठाने से पिंकी को गुस्सा आ गया और उसने भी नेहा की कमीज का कॉलर पकड़ लिया|

फिर शुरू हुई दोनों के बीच गुथ्थ्म-गुथ्था जिसमें नेहा ही पिंकी पर भारी पड़ी| थप्पड़ मार-मार के, चोटी खींच और नाखून से नोच-नोच कर नेहा ने पिंकी की हालत खराब कर दी! जवाबी हमले में पिंकी ने भी अपने हाथ-पॉंव चलाये मगर नेहा को उतनी चोट नहीं आई जितनी पिंकी को आई थी|

दो लड़कियों की लड़ाई देखने लगभग सारा स्कूल इकठ्ठा हो चूका था| रेखा ने एक-दो बार बीच में पड़ कर नेहा को रोकना चाहा मगर नेहा उसके काबू में नहीं आई और पिंकी की दे दनादन पिटाई करती रही! आखिर बच्चों का जमावड़ा देख टीचर आईं और दोनों लड़कियों को अलग कर सीधा प्रिंसिपल मैडम के पास ले गईं| प्रिंसिपल मैडम ने इस लड़ाई का कारण पुछा तो नेहा बोली; "इसने मेरे पापा जी के बारे में गंदा बोला इसलिए मैंने इसे मारा|" नेहा ने जब पिंकी पर आरोप लगाया तो वो अपनी बात से साफ़ मुकर गई और नेहा को झूठी बोल दिया| नेहा को खुद को सच्चा साबित करना था इसलिए उसने रेखा को बुलाने के लिए कहा| जब रेखा से सारी बात पूछी गई तो उसने पिंकी द्वारा मारा हुआ ताना और मेरे खिलाफ की गई बात सच-सच बता दी| सारा सच जानकर फौरन नेहा और पिंकी के परिवारजनों को फ़ोन किया गया|

मैं तब आगरा में एक पार्टी के साथ बैठा माल देख रहा था जब मेरे पास नेहा के स्कूल से फ़ोन आया| प्रिंसिपल मैडम ने मुझे बस इतना बताया की नेहा ने किसी लड़की को मारा है इसलिए मुझे फौरन स्कूल आना होगा| अब मैं उस वक़्त दिल्ली में ही नहीं था तो मैं कैसे आता इसलिए मैंने प्रिंसिपल मैडम को बताया की चूँकि मैं शहर में नहीं हूँ इसलिए मेरी जगह नेहा की मम्मी आ जाएंगी|

मैंने संगीता को फ़ोन कर सारी बात बताई और उसे फौरन स्कूल जाने को कहा| संगीता फौरन नेहा के स्कूल के लिए निकली और वहाँ उसे सारी बात प्रिंसिपल मैडम से पता चली| सजा के रूप में प्रिंसिपल मैडम ने संगीता से एक माफ़ी पत्र माँगा जिसमें ये लिखना था की आगे से नेहा इस प्रकार मार-पिटाई नहीं करेगी| वहीं पिंकी को सजा के रूप में 1 दिन के लिए ससपेंड कर दिया गया|

इधर आगरा में नेहा के स्कूल से फ़ोन आने के कारण मैं बहुत चिंता में था| 'अगर छोटी-मोटी मार-पीट होती तो नेहा की स्कूल प्रिंसिपल मुझे फ़ोन थोड़े ही करतीं!' मन में आये इस ख्याल के कारण मैं बेचैन हो रहा था| परन्तु मुझे अभी थोड़ा इंतज़ार करना था ताकि संगीता स्कूल जा कर सारी बात जान ले|

करीब एक घंटे बाद मैंने संगीता को फ़ोन किया तो उसने मुझे सारी बात की जानकारी दी| नेहा ने मेरे कारण मार-पीट की ये जानकार मेरे दिल में फिर एक बार एक अजीब एहसास पैदा हुआ, परन्तु मैं इस एहसास को समझ नहीं पाया|

आगरा काम अधूरा छोड़ मैं बस से दिल्ली आने के लिए निकल पड़ा| मुझे घर पहुँचते-पहुँचते रात के 8 बज गए थे और मेरे आने तक माँ को स्कूल में हुई इस मार-पीट के बारे में पता चल गया था| माँ के अनुसार नेहा के इस गुस्से का स्त्रोत्र मैं था इसलिए उन्होंने नेहा को डाँटने के बजाए प्यार से समझाया था की वो अपने गुस्से पर काबू रखा करे और ऐसी बातें सीधा घर आ कर उन्हें बताया करे, वे स्वयं सबसे निपट लेंगी|

जैसे ही मैं घर पहुँचा माँ ने मुझे नेहा द्वारा की गई हिंसा का आरोपी बनाते हुए खूब डाँटा! हलांकि इसमें मेरी कोई गलती नहीं थी क्योंकि न तो मैंने आजतक अपने तीनों बच्चों के सामने कोई मर-पीट की थी और न ही कभी उन्हें मार-पीट करने की शिक्षा दी थी| परन्तु फिर भी मैं सर झुकाये माँ की सारी डाँट सुनता रहा| अगर अपने बचाव में कुछ कहता, तो माँ और डाँटती इसलिए चुप रहने में ही भलाई थी!

जब माँ का डाँटना हो गया तो उन्होंने मुझे नहाने जाने को कहा| पहले डाँटो फिर नहाने भेज दो...माँ का भी हिसाब-किताब सही था! मैं जब अपने कमरे में आया तो देखा की माँ-बेटा-बेटी (संगीता-स्तुति और आयुष)...तीनों नेहा को घेर कर बैठे हैं| तीनों की नज़र में नेहा ने जो किया वो सही था इसलिए तीनों नेहा की होंसला अफ़ज़ाई कर रहे थे|

जब मैं कमरे में दाखिल हुआ तो तीनों मुझसे उम्मीद कर रहे थे की चूँकि नेहा ने मेरे कारण लड़ाई-झगड़ा किया था ऐसे में मुझे ही उसे थोड़ा लाड-प्यार करना चाहिए| लेकिन मैं अपने गुस्से के कारण पहले ही नेहा से उखड़ा हुआ था इसलिए मैं किसी से बिना कुछ कहे बाथरूम में घुस गया और नहा-धो कर निकला| संगीता चाहती थी की मैं नेहा के किये इस काण्ड के लिए उसकी होंसला अफ़ज़ाई करूँ, उसे शाबाशी दूँ मगर जब मैं बिना कुछ कहे बाथरूम में नहाने लगा तो संगीता मुझसे बहुत नाराज़ हुई और उसने गुस्से में आ कर मुझसे बात करनी ही बंद कर दी|

जब मैं नहा कर निकला तबतक संगीता खाना गर्म करने जा चुकी थी, कमरे में बस तीनों बच्चे बैठे थे| मेरे बाहर आते ही स्तुति मेरी गोदी में चढ़ गई और मेरी ठुड्डी पकड़ कर मुझसे बोली; "पपई, दिद्दा ने उस लड़की को पीट कर अच्छा किया न?" स्तुति के इस सवाल का जवाब मुझे वही देना था जो माँ ने नेहा को समझाया था वरना बच्चे अपनी दादी जी के पढ़ाये अहिंसा के पाठ को गलत समझते!

"बेटा, स्कूल में जो बच्च्चे आपके साथ पढ़ते हैं वो हमेशा आपको चिढ़ाने के लिए कुछ न कुछ ऐसा बोलेंगे की आपको गुस्सा आएगा मगर कभी किसी के बहकाने या गुस्सा दिलाने पर यूँ लड़ाई-झगड़ा करना अच्छी बात नहीं होती| इस तरह लड़ाई-झगड़ा करने से स्कूल में आपकी छबि खराब होती है इसलिए जब भी गुस्सा आये तो अपना गुस्सा काबू करना सीखो| घर आ कर अपने मम्मी-पापा या दादी जी से बात करो ताकि हम सब मिल कर आपको सही रास्ता दिखायें|" मैंने स्तुति के सवाल का जवाब एक सीख के रूप में दिया था| मेरी दी हुई इस सीख को आयुष ने अच्छे से गाँठ बाँध लिया था परन्तु स्तुति मेरी इस सीख से सहमत नहीं थी! आज पहलीबार स्तुति मेरी बात का विरोध करते हुए बोली; "पपई, कोई मुझे कुछ भी कहे मैं चुप रहूँगी मगर किसी ने आपके बारे में कुछ बोला न तो मैं उसको बहुत मारूँगी!" स्तुति अपना गुस्सा दिखाते हुए बोली| मैं स्तुति के इससे गुस्सैल रूप को देख कर अचम्भित था, मैंने कभी नहीं सोचा था की मेरी चुलबुली बिटिया इतनी गुस्से वाली है!

खैर, मैं स्तुति को कुछ समझाता उससे पहले ही पीछे से माँ आ गईं| माँ ने मेरी दी जाने वाली सीख तथा स्तुति के बगावती तेवर देख-सुन लिए थे| "ओ झाँसी की रानी! इधर आ मेरे पास, तुझे मार-पीट सिखाऊँ!" माँ ने प्यार से डाँटते हुए स्तुति को अपने पास बुलाया| माँ ने स्तुति को गोदी लिए हुए प्यार से अहिंसा का पाठ पढ़ाया| स्तुति अपनी दादी जी का मान करती थी इसलिए उसने चुपचाप अपनी दादी जी की बात मान ली और कभी लड़ाई-झगड़ा नहीं करने के लिए राज़ी हो गई! परन्तु जैसा की होता है, अपनी मम्मी की तरह स्तुति भी अपनी बात पर अटल न रह पाई!

खाना खाने के बाद, स्तुति को पढ़ाई में लगा मैं कंप्यूटर पर अपना काम कर रहा था जब नेहा सर झुकाये मेरे पास आई और हाथ जोड़कर मुझसे माफ़ी माँगते हुए बोली; "पापा जी, मुझे माफ़ कर दीजिये! मेरे कारण दादी जी ने आपको इतना डाँटा! मैं आगे से ऐसा कोई काम नहीं करुँगी की दादी जी आपको डांटें|" मैंने नेहा की बात को सुन कर भी अनसुना कर दिया और अपने काम में लगा रहा| ठीक तभी संगीता कमरे में आई, उसने नेहा के माफ़ी माँगने और मेरे नेहा को नजरअंदाज करना देख लिया था| संगीता को मेरे इस रवैये पर बहुत गुस्सा आया इसलिए वो नेहा के सर पर हाथ फेरते हुए बोली; "चल बेटा मेरे साथ!" संगीता ने नेहा को खूब लाड किया परन्तु नेहा को चाहिए था बस मेरा प्यार| संगीता नेहा को मेरा प्यार तो दे नहीं सकती थी, ऊपर से मेरे दिल की कड़वाहट को देख संगीता और मेरे रिश्ते में भी कड़वाहट घुलने लगी थी! हम दोनों का ये प्यारभरा रिश्ता बोल-चाल बंद होने के कारण अब खींचने लगा था!

कुछ दिन बाद मेरी छोटी बिटिया स्तुति का गुस्सा फूटा और ऐसा फूटा की उसने अपनी ही क्लास के लड़के को दौड़ा-दौड़ा कर मारा! दरअसल हुआ कुछ यूँ की स्तुति की क्लास का एक शरारती लड़का स्तुति को बहुत तंग कर रहा था| जब स्तुति क्लास में पढ़ रही होती तो वो स्तुति के हाथ पर चुटी (चिमटी) काटता| जब लंच टाइम होता तो वो स्तुति का टिफ़िन ले कर भाग जाता|

स्तुति ने उसे पहले तो मौखिक चेतावनी दी की वो उसे तंग न करे| लेकिन उस लड़के ने स्तुति की बात को तवज्जो नहीं दी, नतीजन स्तुति ने उसके बाल पकड़ उसकी गर्दन गोल-गोल घुमा कर उसे इतना मारा की वो बेचारा रोने लगा! शुक्र है ये 'वारदात' लंच टाइम में हुई और उस लड़के ने टीचर से इसकी शिकायत नहीं की वरना नेहा की ही तरह हमें स्तुति के स्कूल से फ़ोन आना तय था| उस दिन से क्लास के सभी बच्चे स्तुति के गुस्से से डरने लगे थे, कोई भी भूल से स्तुति को गुस्सा नहीं दिलाता था!

स्तुति को नहीं पता था की आयुष ने ये वारदात देख ली है| आयुष ने घर आ कर मुझे इस मार-पीट के बारे में बताया तो मैंने मन ही मन कल्पना की कि कैसे स्तुति ने उस लड़के को दौड़ा-दौड़ा कर पीटा होगा, ये सोच कर ही मुझे बहुत हँसी आई! मैंने स्तुति को अपने पास बुलाया और उसके हाथ चूमते हुए बोला; "बेटा इतना गुस्सा नहीं करते!" स्तुति को उम्मीद थी की मैं ये बात सुन कर उसे डाटूँगा परन्तु जब मैंने स्तुति से प्यार से बात की तो स्तुति एकदम से बोली; "पपई, मैंने उसे कहा था की मुझे तंग मत कर वरना बहुत मारूँगी मगर वो बाज़ नहीं आया इसलिए मैंने उसे कूट-पीट कर सीधा कर दिया!" स्तुति अपना प्यारा सा गुस्सा दिखाते हुए बोली| स्तुति का गुस्सा शांत करने के लिए मैं उसे लाड-प्यार करने लगा|

इतने में संगीता कमरे में आ गई, उसने स्तुति की सारी बात सुन ली थी इसलिए उसे गुस्सा आया हुआ था; "तेरे बहुत पर निकल आये हैं! रुक तुझे मैं सीधा करती हूँ!" ये कहते हुए संगीता ने स्तुति को मारने के लिए अपना हाथ हवा में उठाया| अपनी मम्मी का गुस्सा देख स्तुति डर गई और मेरी गोदी में चढ़ छुपने की कोशिश करने लगी| संगीता में इतनी हिम्मत नहीं थी की वो मेरी गोदी में चढ़ी स्तुति को कुछ कह या कर सके इसलिए वो भुनभुनाती हुई चली गई| इधर मैंने स्तुति को फिर से प्यार से समझाया और उसे मार-पीट न करने की सीख दी|

बहरहाल, दिन बीत रहे थे पर नेहा और मेरे बीच बनी दूरी वैसी की वैसी थी| नेहा मेरे नज़दीक आने की बहुत कोशिश करती मगर मैं उससे दूर ही रहता| मैं नेहा को अपने जीवन से निकाल चूका था और उसे फिर से अपने जीवन में आने देना नहीं चाहता था| मुझसे...एक पिता से पुनः प्यार पाने की लालसा नेहा के भीतर अब धीरे-धीरे दम तोड़ने लगी थी! फिर एक समय आया जब नेहा ने हार मान ली और वो इस कदर टूट गई थी की किसी के लिए भी उसे सँभालना नामुमकिन था|

[color=rgb(97,]जारी रहेगा भाग - 17 (2) में...[/color]
 

[color=rgb(255,]अंतिम अध्याय: प्रतिकाष्ठा[/color]
[color=rgb(51,]भाग - 17 (2)[/color]

[color=rgb(26,]अब तक अपने पढ़ा:[/color]

बहरहाल, दिन बीत रहे थे पर नेहा और मेरे बीच बनी दूरी वैसी की वैसी थी| नेहा मेरे नज़दीक आने की बहुत कोशिश करती मगर मैं उससे दूर ही रहता| मैं नेहा को अपने जीवन से निकाल चूका था और उसे फिर से अपने जीवन में आने देना नहीं चाहता था| मुझसे...एक पिता से पुनः प्यार पाने की लालसा नेहा के भीतर अब धीरे-धीरे दम तोड़ने लगी थी! फिर एक समय आया जब नेहा ने हार मान ली और वो इस कदर टूट गई थी की किसी के लिए भी उसे सँभालना नामुमकिन था|

[color=rgb(251,]अब आगे:[/color]

कुछ
दिन बीते, सुबह का समय था की तभी दिषु का फ़ोन आया, उसने मुझे बताया की एक ऑडिट निपटाने के लिए उसे मेरी मदद चाहिए थी| दरअसल हम दोनों ने इस कंपनी की ऑडिट पर सालों पहले काम किया था, लेकिन कंपनी के एकाउंट्स में कुछ घपला हुआ जिस कारण पुराने सारे अकाउंट फिर से चेक करने थे| समस्या ये थी की ये कपनी थी देहरादून की और कंपनी के सारे लेखा-जोखा रखे थे एक ऐसे गॉंव में जहाँ जाना बड़ा दुर्गम कार्य था| इस गॉंव में लाइट क्या, टेलीफोन के नेटवर्क तक नहीं आते थे| हाँ, कभी-कभी वो बटन वाले फ़ोन में एयरटेल वाला सिम कभी-कभी नेटवर्क पकड़ लेता था| ऑडिट थी 6 दिन की और इतने दिन बिना फ़ोन के रहना मेरी माँ के लिए सबसे ज्यादा चिंताजनक था|

उन दिनों मैं पिताजी का ठेकेदारी का काम बंद कर चूका था| मेरा जूतों का काम थोड़ा मंदा हो चूका था इसलिए मैं इस ऑडिट के मौके को छोड़ना नहीं चाहता था| जब मैंने माँ से ऑडिट के बारे में सब बताया तो माँ को चिंता हुई; "बेटा, इतने दिन बिना तुझसे फ़ोन पर बात किये मेरा दिल कैसे मानेगा?" माँ की चिंता जायज थी परन्तु मेरा जाना भी बहुत जर्रूरी था| मैंने माँ को प्यार से समझा-बुझा कर मना लिया और फटाफट अपने कपड़े पैक कर निकल गया|

जब मैं घर से निकला तब बच्चे स्कूल में थे और जब बच्चे स्कूल से लौटे तथा उन्हें पता चला की मैं लगभग 1 हफ्ते के लिए बाहर गया हूँ, वो भी ऐसी जगह जहाँ फ़ोन का नेटवर्क नहीं मिलता तो सबसे ज्यादा स्तुति नाराज़ हुई! स्तुति ने फौरन मुझे फ़ोन किया और मुझे फ़ोन पर ही डाँटने लगी; "पपई! आप मुझे बिना बताये क्यों गए? वो भी ऐसी जगह जहाँ आपका फ़ोन नहीं मिलेगा?! अब मुझे कौन सुबह-सुबह प्यारी देगा? मैं किससे बात करुँगी? अगर मुझे आपसे कुछ बात करनी हो तो मैं कैसे फ़ोन करुँगी?" स्तुति अपने प्यारे से गुस्से में मुझसे सवाल पे सवाल पूछे जा रही थी और मुझे मेरी बिटिया के इस रूप पर प्यार आ रहा था|

जब स्तुति ने साँस लेने के लिए अपने सवालों पर ब्रेक लगाई तो मैं स्तुति को प्यार से समझाते हुए बोला; "बेटा, मैं घूमने नहीं आया हूँ, मैं आपके दिषु चाचू की मदद करने के लिए आया हूँ| यहाँ पर नेटवर्क नहीं मिलते इसलिए हमारी फ़ोन पर बात नहीं हो सकती, लेकिन ये तो बस कुछ ही दिनों की बात है| मैं जल्दी से काम निपटा कर घर लौटा आऊँगा|" अब मेरी छोटी बिटिया रानी का गुस्सा बिलकुल अपनी माँ जैसा था इसलिए स्तुति मुझसे रूठ गई और बोली; "पपई, मैं आपसे बात नहीं करुँगी! कट्टी!!!" इतना कह स्तुति ने फ़ोन अपनी मम्मी को दे दिया| मैं संगीता से कुछ कहूँ उसके पहले ही संगीता ने अपने गुस्से में फ़ोन काट दिया|

दिषु मेरे साथ बैठा था और उसने हम बाप-बेटी की सारी बातें सुनी थी इसलिए वो मेरी दशा पर दाँत फाड़ कर हँसे जा रहा था! वहीं मुझे भी मेरी बिटिया के मुझसे यूँ रूठ जाने पर बहुत हँसी आ रही थी| मुझे यूँ हँसते हुए देख दिषु मेरी पीठ थपथपाते हुए बोला; "ऐसे ही हँसता रहा कर!" दिषु की कही बात से मेरे चेहरे से हँसी गायब हो गई थी और मैं एक बार फिर से खामोश हो गया था|

दरअसल नेहा और मेरे बीच जो दूरियाँ आई थीं, दिषु उनसे अवगत था| हमेशा मुझे ज्ञान देने वाला मेरा भाई जैसा दोस्त, नेहा के कहे उन ज़हरीले शब्दों के बारे में जानकार भी खामोश था| मानो जैसे उसके पास मुझे ज्ञान देने के लिए बचा ही नहीं था! वो बस मुझे हँसाने-बुलाने के लिए कोई न कोई तिगड़म लड़ाया करता था| ये ऑडिट का ट्रिप भी उसने इसी के लिए प्लान किया था ताकि घर से दूर रह कर मैं थोड़ा खुश रहूँ|

उधर घर पर, स्तुति के मुझसे नाराज़ होने पर आयुष और नेहा अपनी छोटी बहन को लाड कर समझाने में लगे थे की वो इस तरह मुझसे नाराज़ न हो| "तुझे पापा जी से नाराज़ होना है तो हो जा, लेकिन अगर पापा जी तुझसे नाराज़ हो गए न तो तू उन्हें कभी मना नहीं पायेगी!" नेहा भारीमन से भावुक हो कर बोली| नेहा की बात से उसका दर्द छलक रहा था और अपनी दिद्दा का दर्द देख स्तुति एकदम से भावुक हो गई थी! ऐसा लगता था मानो उस पल स्तुति ने मेरे नाराज़ होने और उससे कभी बता न करने की कल्पना कर ली हो!

अपनी दीदी को यूँ हार मानते देख आयुष ने पहले अपनी दीदी को सँभाला, फिर स्तुति का ध्यान भटकाने के लिए आयुष ने उस दिन की घटना का जिक्र किया जब मैं दोनों (नेहा-आयुष) से नाराज़ हो गया था; "एक बार मैं और दीदी, पापा जी से लड़ पड़े थे क्योंकि उन्होंने हमें बाहर घुमाने का प्लान अचानक कैंसिल कर दिया था| तब गुस्से में आ कर हमने पापा जी से बहुत गंदे तरीके से बात की और उनसे बात करनी बंद कर दी| लेकिन फिर दादी जी ने हमें बताया की साइट पर सारा काम पापा जी को अकेला सँभालना था, ऊपर से मैंने पापा जी के फ़ोन की बैटरी गेम खेलने के चक्कर में खत्म कर दी थी इसलिए पापा जी हमें फ़ोन कर के कुछ बता नहीं पाए| सारा सच जानकार हमें बहुत दुःख हुआ की हमने पापा जी को इतना गलत समझा| मैंने और दीदी ने पापा जी से तीन दिन तक माफ़ी माँगी पर पापा जी ने हमें माफ़ नहीं किया क्योंकि हम अपनी गलती पापा जी के सामने स्वीकारे बिना ही उनसे माफ़ी माँग रहे थे!

फिर मैंने और दीदी ने अपनी सारी हिम्मत बटोरी और कान पकड़ कर पापा जी के सामने अपनी गलती स्वीकारी| तब जा कर पापा जी ने हमें माफ़ किया और हमें गोदी ले कर खूब लाड-प्यार किया| उस दिन से हम कभी पापा जी से नाराज़ नहीं होते थे, जब भी हमें कुछ बुरा लगता तो हम सीधा उनसे बात करते थे और पापा जी हमें समझाते तथा हमें लाड-प्यार कर या बाहर से खिला-पिला कर खुश कर देते|

आपको पता है स्तुति, पापा जी हमारे लिए बहुत मेहनत करते हैं ताकि वो हमारी जर्रूरतें, हमारी सारी खुशियाँ पूरी कर सकें| हाँ, कभी-कभी वो काम में बहुत व्यस्त हो जाते हैं और हमें ज्यादा समय नहीं दे पाते लेकिन वो हमेशा तो व्यस्त नहीं रहते न?! हमें चाहिए की हम पापा जी की मजबूरियाँ समझें, वो हमारे लिए जो कुर्बानियाँ देते हैं उन्हें समझें और पापा जी की कदर करें| यूँ छोटी-छोटी बातों पर हमें पापा जी से नाराज़ नहीं होना चाहिए, इससे उनका दिल बहुत दुखता है|" आज आयुष ने वयस्कों जैसी बात कर अपनी छोटी बहन को एक पिता की जिम्मेदारियों से बारे में समझाया था| वहीं, स्तुति को अपने बड़े भैया की बात अच्छे से समझ आ गई थी और उसे अब अपने किये गुस्से पर पछतावा हो रहा था|

दूसरी तरफ नेहा, अपने छोटे भाई की बातें सुन कर पछता रही थी! आयुष, नेहा से 5 साल छोटा था परन्तु वो फिर भी मुझे अच्छे से समझता था, जबकि नेहा सबसे बड़ी हो कर भी मुझे हमेशा गलत ही समझती रही|

आयुष की बातों से नेहा की आँखों से पछतावे के आँसूँ बह निकले| स्तुति ने जब अपनी दिद्दा को यूँ रोते हुए देखा तो वो एकदम से अपनी दिद्दा से लिपट गई और नेहा को दिलासे देते हुए बोली; "रोओ मत दिद्दा! सब ठीक हो जायेगा!" स्तुति ने नेहा को हिम्मत देनी चाही मगर नेहा हिम्मत हार चुकी थी इसलिए उसके लिए खुद को सँभालना मुश्किल था| स्तुति ने अपने बड़े भैया को भी इशारा कर नेहा के गले लगने को कहा| दोनों भाई बहन ने नेहा को अपनी बाहों में जकड़ लिया और नेहा को हिम्मत देने लगे|

आयुष और स्तुति के आलिंगन से नेहा को कुछ हिम्मत मिली और उसने खुद को थोड़ा सँभाला| अपनी दीदी का मन खुश करने के लिए आयुष ने नेहा को पढ़ाने के लिए कहा, वहीं स्तुति ने मुझे वीडियो कॉल कर दिया| जैसे ही मैंने फ़ोन उठाया वैसे ही स्तुति ने फ़ोन टेबल पर रख दिया और कान पकड़ कर उठक-बैठक करने लगी! "बेटा, ये क्या कर रहे हो आप?" मैंने स्तुति को रोकते हुए पुछा तो स्तुति एकदम से भावुक हो गई और बोली; " पापा जी, छोलि (sorry)!!! मुझे माफ़ कर दो, मैंने आपको गुच्छा किया! मैं...मुझे नहीं पता था की आप काम करने के लिए इतने दूर गए हो| मुझे माफ़ कर दो पापा जी! मुझसे नालाज़ (नाराज़) नहीं होना!" ये कहते हुए स्तुति की आँखें भर आईं थीं और उसका गला भारी हो गया था|

"बेटा, किसने कहा मैं आपसे नाराज़ हूँ?! मैं कभी अपनी प्यारु बेटु से नाराज़ हो सकता हूँ?! मेरी एक ही तो छोटी सी प्यारी सी बेटी है!" मैंने स्तुति को लाड कर हिम्मत दी और रोने नहीं दिया|

"आप मुझसे नालाज़ नहीं?" स्तुति अपने मन की संतुष्टि के लिए तुतलाते हुए पूछने लगी|

"बिलकुल नहीं बेटा! आप मुझे इतनी प्यारी करते हो तो अगर आपने थोड़ा सा गुच्छा कर दिया तो क्या हुआ? जो प्यार करता है, वही तो हक़ जताता है और वही गुच्छा भी करता है|" मैंने स्तुति को बहलाते हुए थोड़ा तुतला कर कहा तो स्तुति को इत्मीनान हुआ की मैं उससे नाराज़ नहीं हूँ| स्तुति अब फिर से खिलखिलाने लगी थी और मैं भी अपनी बिटिया को खिलखिलाते हुए देख मैं बहुत खुश था|

खैर, हम दोनों दोस्त अपने गंतव्य स्थान पर पहुँचे और वहाँ से शुरू हुई एक दिलचस्प यात्रा! बस स्टैंड से गॉंव जाने का रास्ता एक ट्रेक (trek) था! मुझे ट्रैकिंग (trekking) करना बहुत पसंद था इसलिए इस ट्रेक के लिए मैं अतिउत्साहित था| कच्चे रास्तों, जंगल और एक झरने को पार कर हम आखिर उस गॉंव पहुँच ही गए| पूरा रास्ता दिषु बस ये ही शिकायत करता रहा की ये रास्ता कितना जोखम भरा और दुर्गम है! वहीं मैं बस ये शिकायत कर रहा था की; "बहनचोद ऑफिस के डाक्यूमेंट्स ऐसी जगह कौन रखता है?!"

"कंपनी का मालिक भोसड़ी का! साले मादरचोद ने सारे रिकार्ड्स और डाक्यूमेंट्स अपने पुश्तैनी घर में रखे हैं|" दिषु गुस्से से बिलबिलाते हुए बोला|

ट्रेक पूरा कर ऊपर पहुँचते-पहुँचते हमें शाम के 6 बज गए थे| यहाँ हमारे रहने के लिए एक ऑफिस में व्यवस्था की गई थी इसलिए नहा-धो कर हमने खाना खाया और 8 बजते-बजते लेट गए| पहाड़ी इलाका था इसलिए हमें ठंड लगने लगी थी| ओढ़ने के लिए हमारे पास दो-दो कंबल थे मगर हम जानते थे की ज्यों-ज्यों रात बढ़ेगी ठंड भी बढ़ेगी! "यार आज रात तो कुक्कड़ बनना तय है हमारा!" मैं चिंतित हो कर बोला| मेरी बात सुन दिषु ने अपने बैग से ऐसी चीज़ निकाली जिसे देखते ही मेरी सारी ठंड उड़न छू हो गई!

'रम' (RUM) दो अक्षर के इस जादूई शब्द ने बिना पिए ही हमारे शरीर में गर्मी भरनी शुरू कर दी थी| "शाब्बाश!" मैं ख़ुशी से दिषु की पीठ थपथपाते हुए बोला| बस फिर क्या था हम दोनों ने 2-2 नीट (neat) पेग खींचे और लेट गए| रम की गर्माहट के कारण हमें ठंड नहीं लगी और हम चैन की नींद सो गए| अगले दिन सुबह जल्दी उठ कर हमने काम शुरू किया| हमारे खाने-पीने का इंतज़ाम पहले से हो रखा था इसलिए हमें कोई चिंता नहीं थी| इसी के साथ आज रात में सोते समय दिषु ने एक और चीज़ का प्रबंध कर दिया था| रात को सोते समय साले ने हमें खाना बना कर देने वाले खानसामे से हशीश का जुगाड़ कर लिया था! "भोसड़ी के, ये कहाँ से लाया तू?" मैंने हैरान होते हुए पुछा तो दिषु ने मुझे सच बताया की वो यहाँ आने से पहले सारी प्लानिंग कर के आया था|

हशीश हमने ले तो ली मगर दिषु ने आज तक सिगरेट नहीं पी थी! वहीं मैंने सिगरेट तो पी थी मगर मैंने कभी इस तरह का ड्रग्स नहीं लिया था| कुछ नया काण्ड करने का जोश हम दोनों दोस्तों में भरपूर था इसलिए कमर कस कर हमने सोच लिया की आज तो हम ये नया नशा ट्राय कर के रहेंगे|

जब मैं छोटा था तब मैंने कुछ लड़कों को गॉंव में चरस आदि पीते हुए देखा था इसलिए हशीश को सिगरेट में भरने के लिए जो गतिविधि करनी होती है मैं उससे रूबरू था| हम दोनों अनाड़ी नशेड़ी अपना-अपना दिमाग लगा कर हशीश के साथ प्रयोग करने लगे| आधा घंटा लगा हमें एक सिगरेट भरने में, जिसमें हमने अनजाने में हमने हशीश की मात्रा ज्यादा कर दी थी|

सिगरेट तैयार हुई तो दिषु ने मुझे पहले पीने को कहा ताकि मैं उसे सिगरेट पीना सीखा सकूँ| मैंने भी चौधरी बनते हुए दिषु को एक शिक्षक की तरह अच्छे से समझाया की उसे सिगरेट का पहला कश कैसे खींचना है|

सिगरेट पीने का सिद्धांत मैं दिषु को सीखा चूका था, अब मुझे उसे सिगरेट का पहला कश खींच कर दिखाना था| सिगरेट जला कर मैंने पहला कश जानबूझ कर छोटा खींचा ताकि कहीं मुझे खाँसी न आ जाए और दिषु के सामने मेरी किरकिरी न हो जाये| पहला कश खींचने के बाद मुझे कुछ महसूस नहीं हुआ, ऐसा लगा मनो मैं कोई साधारण सिगरेट पी रहा हूँ| हाँ सिगरेट की महक अलग थी और मुझे ये बहुत अच्छी भी लग रही थी|

फिर बारी आई दिषु की, जैसे ही उसने पहल कश खींचा उसे जोर की खाँसी आ गई! दिषु को बुरी तरह खाँसते हुए देख मुझे हँसी आ गई और मैं अपना पेट पकड़ कर हँसने लगा| "बहनचोद! क्या है ये?! साला गले में जा कर ऐसी लगी की खांसी बंद नहीं हो रही मेरी! तू ही पी!" दिषु गस्से में बोला और सिगरेट मुझे दे दी| मैंने दिषु को सिखाया की उसे छोटे-छोटे कश लेने है और शुरू-शुरू में धुआँ गले से उतारना नहीं बल्कि नाक से निकालना है| जब वो नाक से निकालना सीख जाए तब ही धुएँ को गले से नीचे उतार कर रोकना है|

इस बार जब दिषु ने कश खींचा तो उसे खाँसी नहीं आई| लेकिन उसे हशीश के नशे का पता ही नहीं चला! "साला चूतिया कट गया अपना, इसमें तो साले कोई नशा ही नहीं है!" दिषु मुझे सिगरेट वापस देते हुए बोला| बात तो दिषु की सही थी, आधी सिगरेट खत्म हो गई थी मगर नशा हम दोनों को महसूस ही नहीं हो रहा था|

दिषु का मन सिगरेट से भर गया था इसलिए उसने रम के दो पेग बना दिए| बची हुई आधी सिगरेट मैंने पी कर खत्म की और रम का पेग एक ही साँस में खींच कर लेट गया| उधर दिषु ने भी मेरी देखा-देखि एक साँस में अपना पेग खत्म किया और लेट गया|

करीब आधे घंटे बाद दिषु बोला; "भाई, सिगरेट असर कर रही है यार! मेरा दिमाग भिन्नाने लगा है!" दिषु की बात सुन मैं ठहाका मार कर हँसने लगा| चूँकि मेरे जिस्म की नशे को झेलने की लिमिट थोड़ी ज्यादा थी इसलिए मुझे अभी केवल खुमारी चढ़नी शुरू हो रही थी|

करीब 10 मिनट तक हम दोनों बकचोदी करते हुए हँसते रहे| अब दिषु को आ रही थी नींद इसलिए वो तो हँसते-हँसते कब सो गया मुझे पता ही नहीं चला| इधर हशीश का नशा धीरे-धीरे मेरे सर चढ़ने लगा था| मेरा दिमाग अब काम करना बंद कर चूका था इसलिए मैं कमरे की छत को टकटकी बाँधे देखे जा रहा था| चूँकि अभी दिमाग शांत था तो मन ने बोलना शुरू कर दिया था|

छत को घूरते हुए मुझे नेहा की तस्वीर नज़र आ रही थी| नेहा के बचपन का वो हिस्सा जो हम दोनों ने बाप-बेटी की तरह ख़ुशी-ख़ुशी काटा था, उस बचपन का हर एक दृश्य मैं छत पर किसी फिल्म की तरह देखता जा रहा था| इन प्यारभरे दिनों को याद कर मेरा मन प्रसन्नता से भर गया था|

कुछ देर बाद इन प्यारभरे दिनों की फिल्म खत्म हुई और नेहा के कहे वो कटु शब्द मुझे याद आये| वो पल मेरे लिए मेरी ज़िन्दगी का सबसे दुखद पल था, ऐसा पल जिसे में इतने महीनों में चाह कर भी नहीं भुला पाया था| उस दृश्य को याद कर दिल रोने लगा पर आँखों से आँसूँ का एक कतरा नहीं निकला, ऐसा लगता था मानो जैसे आँखों का सारा पानी ही मर गया हो! जब-जब मैंने घर में नेहा को देखा, मेरा दिल उन बातों को याद कर दुखता था| लेकिन इतना दर्द महसूस करने पर भी मेरे मन से नेहा के लिए कोई बद्दुआ नहीं निकली| मैं तो बस अपनी पीड़ा को दबाने की कोशिश करता रहता था ताकि कहीं मेरी माँ मेरा ये दर्द न देख लें! माँ और दुनिया के सामने खुद को सहेज के रखने के चक्कर में मेरे दिमाग ने मेरे दिल को एक कब्र में दफना दिया था| इस कब्र में कैद हो कर मेरी सारी भावनाएं मर गई थीं| नकारात्मक सोच ने मेरे मस्तिष्क को अपनी चपेट में इस कदर ले लिया था की मैं ये मानने लगा था की स्तुति और आयुष बड़े हो कर, नेहा की ही तरह मेरा दिल दुखायेंगे| इस दुःख से बचने के लिए मैंने अभी इ खुद को कठोर बनाने की तैयारी करनी शुरू कर दी थी, ताकि भविष्य में जब आयुष और स्तुति मेरा दिल दुखाएँ तो मुझे दुःख और अफ़सोस कम हो!

समय का पहिया घुमा और फिर नेहा के साथ वो हादसा हुआ| उस दिन नेहा के रोने की आवाज़ अब भी मेरे कानों में गूँज रही थी| मैंने अपने गुस्से में आ कर जो किया उसके लिए मुझे रत्ती भर पछतावा नहीं था| मुझे चिंता थी तो बस दो, पहली ये की नेहा कहीं उस हादसे के कारण कोई गलत कदम न उठा ले और दूसरी ये की मेरी बिटिया के दामन पर कोई कीचड़ न उछाले| शायद यही कारण था की मैंने आजतक दिषु से उस हादसे का ज़िक्र नहीं किया|

उस हादसे को याद करते हुए मुझे वो पल याद आया जब नेहा ने मुझसे माफ़ी माँगी थी| उस समय मैंने कैसे खुद को रोने से रोका था, ये बस मैं ही जानता हूँ| नेहा की आँखों में मुझे पछतावा दिख रहा था मगर नेहा अपने किये के लिए जो कारण बता रही थी वो मुझे बस बहाने लग रहे थे इसीलिए मैं नेहा को माफ़ नहीं कर पा रहा था|

लेकिन जब संगीता ने मुझसे स्टोर में वो सवाल पुछा की क्या मैं नेहा से नफरत करता हूँ, तब पता नहीं मेरे भीतर क्या बदलाव पैदा हुआ की मैं थोड़ा-थोड़ा पिघलने लगा| मेरे दिमाग ने मेरे दिल को जिस कब्र में बंद कर दिया था, वो कब्र जैसे किसी ने फिर से खोद दी थी और मेरा दिल फिर से बाहर निकलने को बेकरार हो रहा था|

ज्यों-ज्यों संगीता, नेहा को मेरे नज़दीक धकेलने की जुगत करने में लगी थी त्यों-त्यों मेरा गुस्सा कमजोर पड़ने लगा था| उस रात जब नेहा मुझसे लिपट कर सो रही थी और मैं दूसरी तरफ करवट ले कर लेट गया था, तब नेहा की सिसकियों को सुन मेरा नाज़ुक सा दिल रोने लगा था मगर मेरे दिमाग में भरे गुस्से ने मुझे उस कमरे से उठ कर जाने पर विवश कर दिया था| अकेले कमरे में सोते हुए मेरा मन इस कदर बेचैन था की मैं बस करवटें बदले जा रहा था| मैं खुद को नेहा के सामने कठोर साबित तो करना चाहता था मगर मैं अपनी बिटिया का प्यारा सा दिल भी नहीं दुखाना चाहता था इसीलिए अगली रात से मैं नेहा के मुझसे लिपटने पर दूसरी तरफ करवट ले कर लेट जाया करता था| इससे मैं नेहा के सामने कठोर भी साबित होता था और नेहा का दिल भी नहीं दुखता था|

उस रात जब नेहा ने सारा खाना बनाया, तो अपनी बेटी के हाथ का बना खाना पहलीबार खा कर मेरा मन बहुत प्रसन्न था| मैं नेहा को गले लगा कर लाड करना चाहता था परन्तु मेरा क्रोध मुझे रोके था| लेकिन फिर भी अपनी बेटी की ख़ुशी के लिए मैंने माँ के हाथों उसे शगुन दिलवा कर उसकी मेहनत को सफल बना दिया|

परन्तु मुझे संगीता की नेहा को मेरे नज़दीक करने की चालाकी समझ आ चुकी थी और मेरे अहम ने मुझे सचेत कर इस प्यार में न पड़ने को सचेत कर दिया था| यही कारण था की मैं जानबूझ कर काम करने के बहाने कंप्यूटर चालु किये बैठा था| मेरी इस बेरुखी के कारण मेरी बिटिया का दिल टूट गया और वो सिसकते हुए खुद कमरे से चली गई| अपनी बेटी का दिल दुखा कर मैं खुश नहीं था, मेरा अहम भले ही जीत गया हो मगर मेरा नेहा के प्रति प्यार हार गया था!

इतने दिनों से नेहा के सामने खुद को कठोर दिखाते-दिखाते मैं थक गया था| असल बात ये थी की नेहा को यूँ पछतावे की अग्नि में जलते हुए देख मैं भी तड़प रहा था मगर दिमाग में बसा मेरा गुस्सा मुझे फिर से पिघलने नहीं दे रहा था| नेहा ने बहुत बड़ी गलती की थी मगर एक पिता उसे इस गलती के लिए भी माफ़ करना चाहता था, लेकिन मेरा अहम मुझे बार-बार ये कह कर रोक लेता था की क्या होगा अगर कल को नेहा ने फिर कभी मेरा दिल इस कदर दुखाया तो?! अपनी बड़ी बेटी के कारण मैं एक बार टूट चूका था, वो तो स्तुति का प्यार था जिसने मुझे बिखरने से थाम लिया था, लेकिन दुबारा टूटने की मुझ में हिम्मत नहीं थी|

कमरे की छत को देखते हुए मेरे मन ने अपना रोना रो लिया था मगर इसका निष्कर्ष निकलने में मैं असफल रहा| वैसे भी नशे के कारण मेरा दिमाग काम करना बंद कर चूका था तो मैं क्या ही कोई निष्कर्ष निकालता| अन्तः सुबह के दो बजे धीरे-धीरे नशे के कारण मेरी आँखें बोझिल होती गईं और मैं गहरी नींद में सो गया|

अगली सुबह मुझे दिषु ने उठाया और मेरी हालत देख कर थोड़ा चिंतित होते हुए बोला; "तू सोया नहीं क्या रात भर?" दिषु के सवाल ने मुझे कल रात मेरे भीतर मचे अंतर्द्व्न्द की याद दिला दी इसलिए मैंने बस न में सर हिलाया और नहा-धोकर काम में लग गया| काम बहुत ज्यादा था, मनोरंजन के लिए न तो इंटरनेट था और न ही टीवी इसलिए हम 24 घंटों में से 18 घंटे काम कर रहे थे ताकि जल्दी से काम निपटा कर इस पहाड़ से नीचे उतरें और इंटरनेट चला सकें| वहीं यहाँ आ कर मुझे माँ की चिंता हो रही थी और मैं माँ से फ़ोन पर बात करने को बेचैन हो रहा था| माँ से अगर बात करनी थी तो मुझे 8 किलोमीटर का ट्रेक कर नीचे जाना पड़ता और ये ट्रेक कतई आसान नहीं था क्योंकि पूरा रास्ता कच्चा और सुनसान था तथा जंगली जानवरों का भी डर था इसलिए नीचे अकेला जाने की मेरी हिम्मत नहीं थी! खाने-पीने का सामान नीचे से आता था इसलिए मैंने एक आदमी को अपने घर का नंबर दे कर कहा था की वो वापस जाते समय मेरे सकुशल होने की खबर मेरे घर पहुँचा दे| माँ को मेरे सकुशल होने की खबर तो मिल गई थी मगर घर में क्या घटित हो रहा था इसकी खबर मुझे मिली ही नहीं!

उधर घर पर, स्तुति मेरी गैरमौजूदगी में उदास हो गई थी| अब फ़ोन पर बात हो नहीं सकती थी इसलिए स्तुति को अपना मन कैसा न कैसे बहलाना था| अतः स्तुति पड़ गई अपनी मम्मी के पीछे और संगीता की मदद करने की कोशिश करने लगी| लेकिन मदद करने के चक्कर में स्तुति अपनी मम्मी के काम बढ़ाती जा रही थी| "शैतान!!! भाग जा यहाँ से वरना मारूँगी एक!" संगीता ने स्तुति को डाँट कर भागना चाहा मगर स्तुति अपनी मम्मी को मेरे नाम का डर दिखाते हुए बोली; "आने दो पापा जी को, मैं पापा जी को सब बताऊँगी!" स्तुति ने अपन मुँह फुलाते हुए अपनी मम्मी को धमकाना चाहा मगर संगीता एक माँ थी इसलिए उसने स्तुति को ही डरा कर चुप करा दिया; "जा-जा! तुझे तो डाटूँगी ही, तेरे पापा जी को भी डाँटूंगी!" मुझे डाँट पड़ने के नाम से स्तुति घबरा गई और अपनी दिद्दा के पास आ गई|

स्तुति को लग रहा था की उसकी शैतानियों की वजह से कहीं मुझे न डाँट पड़े इसलिए स्तुति अपनी दिद्दा से पूछने लगी; "दिद्दा, क्या मैं बहुत शैतान हूँ?" स्तुति के मुख से ये सवाल सुन नेहा थोड़ा हैरान थी| परन्तु, नेहा कुछ कहे उसके पहले ही माँ आ गईं| माँ ने स्तुति क सवाल सुन लिया था इसलिए माँ ने स्तुति को गोदी लिया और उसे लाड करते हुए बोलीं; "किसने कहा मेरी शूगी शैतान है?" जैसे ही माँ ने स्तुति से ये सवाल किया, वैसे ही स्तुति ने फट से अपनी मम्मी की शिकायत कर दी; "मम्मी ने!"

अपनी पोती की शिकयत सुन माँ को हँसी आ गई, माँ ने जैसे-तैसे अपनी हँसी दबाई और संगीता को आवाज़ लगाई; "ओ संगीता की बच्ची!" जैसे ही माँ ने संगीता को यूँ बुलाया, वैसे ही स्तुति एकदम से बोली; "दाई, मम्मी की बच्ची तो मैं हूँ!" स्तुति की हाज़िर जवाबी देख माँ की दबी हुई हँसी छूट गई और माँ ने ठहाका मार कर हँसना शुरू कर दिया|

"बहु इधर आ जल्दी!" माँ ने आखिर अपनी हँसी रोकते हुए संगीता को बुलाया| जैसे ही संगीता आई माँ ने उसे प्यार से डाँट दिया; "तू मेरी शूगी को शैतान बोलती है! आज से जो भी मेरी शूगी को शैतान बोलेगा उसे मैं बाथरूम में बंद कर दूँगी! समझी!!!" माँ की प्यारभरी डाँट सुन संगीता ने डरने का बेजोड़ अभिनय किया! अपनी मम्मी को यूँ डरते देख स्तुति को बड़ा मज़ा आया और उसने अपनी मम्मी को ठेंगा दिखा कर चिढ़ाना शुरू कर दिया|

अपनी दादी जी से अपनी मम्मी को डाँट खिला कर स्तुति का मन नहीं भरा था इसलिए स्तुति ने अपनी नानी जी को फ़ोन कर अपनी मम्मी की शिकायत लगा दी; "नानी जी, मम्मी कह रही थी की वो मेरे पापा जी को डाटेंगी!" अपनी नातिन की ये प्यारी सी शिकयत सुन स्तुति को नानी जी को बहुत हँसी आई| अब उन्हें अपनी नातिन का दिल रखना था इसलिए उन्होंने अपनी बेटी को प्यारभरी डाँट लगा दी; "तू हमार मुन्ना का डांटइहो, तोहका मार-मार के सोझाये देब!" अपनी माँ की डाँट सुन पहले तो संगीता को हैरानी हुई मगर जब उसने स्तुति को देखा तो वो सब समझ गई| "आप जब मारोगे तब मरोगे, पहले मैं इस चुहिया को कूट-पीट कर सीधा करूँ!" इतना कह संगीता स्तुति को झूठ-मूठ का मारने के लिए दौड़ी| अब स्तुति को बचानी थी अपनी जान इसलिए दोनों माँ-बेटी पूरे घर में दौड़ा-दौड़ी करते रहे, जिससे आखिर स्तुति का मन बहल ही गया!

जहाँ एक तरफ स्तुति के कारण घर में खुशियाँ फैली थीं, तो वहीं दूसरी तरफ घर का एक कोना ऐसा भी था जो वीरान था!

मेरे घर में न होने का जिम्मेदार नेहा ने खुद को बना लिया था| नेहा को लग रहा था की मैं उससे इस कदर नाराज़ हूँ की मैं जानबूझ कर घर छोड़कर ऐसी जगह चला गया हूँ जहाँ मैं अकेला रह सकूँ| नेहा के अनुसार उसके कारण एक माँ को अपने बेटे के बिना रहना पड़ रहा था, एक छोटी सी बेटी (स्तुति) को अपने पापा जी के बिना घर में सबसे प्यार माँगना पड़ रहा था तथा हम पति-पत्नी के बीच जो बोल-चाल बंद हुई थी उसके लिए भी नेहा खुद को जिम्मेदार समझ रही थी|

मेरे नेहा से बात न करने, उसे पुनः अपनी बेटी की तरह प्यार न करने के कारण नेहा पहले ही बहुत उदास थी, उस पर नेहा ने इतने इलज़ाम खुद अपने सर लाद लिए थे की ये सब उसके मन पर बोझ बन बैठे थे| मन पर इतना बोझा ले लेने से नेहा को साँस तक लेने में दिक्कत हो रही थी|

नेहा इस समय बहुत ही नाज़ुक दौर से गुज़र रही थी| उसके मन में जन्में अपराधबोध ने नेहा को इस कदर घेर लिया था की वो खुद को सज़ा देना चाहती थी| नेहा ने खुद को एकदम से अकेला कर लिया था| स्कूल से आ कर नेहा सीधा अपनी पढ़ाई में लग जाती, माँ को कई बार नेहा को खाने के लिए कहना पड़ता तब जा कर नेहा एक-आध रोटी खाती| कई बार तो नेहा टूशन जाने का बहाना कर बाद में खाने को कहती मगर कुछ न खाती|

माँ और संगीता, नेहा की पढ़ाई की तरफ लग्न देख इतने खुश थे की उन्होंने ध्यान ही नहीं दिया की नेहा ठीक से खाना खा रही है या नहीं| वहीं खाने में आनाकानी के अलावा नेहा ने देर रात जाग कर पढ़ना शुरू कर दिया| एक बार तो माँ ने नेहा को प्यार से डाँट भी दिया था की यूँ देर रात तक जाग कर पढ़ना अच्छी बात नहीं|

नेहा को लग रहा था की उसके इस तरह अपने शरीर को कष्ट दे कर वो पस्चताप कर रही है मगर नेहा का शरीर ये पीड़ा सहते-सहते अपनी आखरी हद्द तक पहुँच चूका था| मुझे खोने की मानसिक पीड़ा और अपने शरीर को इस प्रकार यातना दे कर नेहा ने अपनी तबियत खराब कर ली थी!

मेरी अनुपस्थिति में आयुष और स्तुति अपनी दादी जी के पास कहानी सुनते हुए सोते थे, बची माँ-बेटी (नेहा और संगीता) तो वो दोनों हमारे कमरे में सोती थीं| देर रात करीब 1 बजे नेहा ने नींद में मेरा नाम बड़बड़ाना शुरू किया; "पा...पा...जी! पा...पा...जी!" नेहा की आवाज़ सुन संगीता की नींद टूट गई| अपनी बेटी को यूँ नींद मेरा नाम बड़बड़ाते हुए देख संगीता को दुःख हुआ की एक तरफ नेहा मुझे इतना प्यार करती है की मेरी कमी महसूस कर वो नींद में मेरा नाम ले रही है, तो दूसरी तरफ मैं इतना कठोर हूँ की नेहा से इतनी दूरी बनाये हूँ|

अपनी बेटी को सुलाने के लिए संगीता ने ज्यों ही नेहा के मस्तक पर हाथ फेरा, त्यों ही उसे नेहा के बढे हुए ताप का एहसास हुआ! मुझे खो देने का डर नेहा के दिमाग पर इस कदर सवार हुआ की नेहा को बुखार चढ़ गया था! संगीता ने फौरन नेहा को जगाया मगर नेहा के शरीर में इतनी शक्ति ही नहीं बची थी की वो एकदम से जाग सके| संगीता ने फौरन माँ को जगाया, दोनों माओं ने मिल कर नेहा को बड़ी मुश्किल से जगाया और उसका बुखार कम करने के लिए क्रोसिन की दवाई दी| क्रोसिन के असर से नेहा का बुखार तो काम हुआ मगर नेहा का शरीर एकदम से कमजोर हो चूका था| नेहा से न तो उठा जा रहा था और न ही बैठा जा रहा था| नेहा को डॉक्टरी इलाज की जर्रूरत थी परन्तु रात के इस पहर में माँ और संगीता के लिए नेहा को अस्पताल ले जाना आसान नहीं था इसलिए अब सिवाए सुबह तक इंतज़ार करने के दोनों के पास कोई चारा न था| नेहा की हालत गंभीर थी इसलिए माँ और संगीता सारी रात जाग कर नेहा का बुखार चेक करते रहे|

अगली सुबह जब आयुष और स्तुति जागे तो उन्हें नेहा के स्वास्थ्य के बारे में पता चला| नेहा को बीमार देख आयुष ने जिम्मेदार बनते हुए अस्पताल जाने की तैयारी शुरू की, वहीं स्तुति बेचारी अपनी दिद्दा को इस हालत में देख नहीं पा रही थी इसलिए स्तुति अपनी दिद्दा से लिपट कर रोने लगी| नेहा में अभी इतनी भी शक्ति नहीं थी की वो स्तुति को चुप करवा सके इसलिए नेहा ने आयुष को इशारा कर स्तुति को सँभालने को कहा| "स्तुति, अभी पापा जी नहीं हैं न, तो आपको यूँ रोना नहीं चाहिए बल्कि आपको तो दीदी का ख्याल रखना चाहिए|" आयुष ने स्तुति को उसी तरह जिम्मेदारी देते हुए सँभाला जैसे मैं आयुष के बालपन में उसे सँभालता था|
अपने बड़े भैया की बात सुन स्तुति ने फौरन अपने आँसूँ पोछे और अपनी दिद्दा के दोनों गालों पर पप्पी करते हुए बोली; "दीदी, आप जल्दी ठीक हो जाओगे| फिर है न मैं आपको रोज़ रस-मलाई खिलाऊँगी|" स्तुति जानती थी की उसकी दीदी को रस-मलाई कितनी पसंद है इसलिए स्तुति ने अपनी दिद्दा को ये लालच दिया ताकि नेहा जल्दी ठीक हो जाए|

जब भी मैं ऑडिट पर जाता था तो मैं हमेशा माँ को एक दिन ज्यादा बोल कर जाता था क्योंकि जब मैं एक दिन पहले घर लौटता था तो मुझे देख माँ का चेहरा ख़ुशी से खिल जाया करता था| इसबार भी मैंने एक दिन पहले ही काम निपटा लिया और दिषु के साथ घर के लिए निकल पड़ा|

सुबह के 6 बजे मैं घर पहुँचा और दरवाजा खटखटाया| दरवाजा संगीता ने खोला, मुझे लगा था की मुझे जल्दी घर आया देख संगीता का चेहरा ख़ुशी के मारे चमकने लगेगा मगर संगीता के चेहरे पर चिंता की लकीरें छाई हुईं थीं! "क्या हुआ?" मैंने चिंतित हो कर पुछा तो संगीता के मुख से बस एक शब्द निकला; "नेहा"| इस एक शब्द को सुनकर मैं एकदम से घबरा गया और नेहा को खोजते हुए अपने कमरे में पहुँचा|

कमरे में पहुँच मैंने देखा की नेहा बेहोश पड़ी है! अपनी बिटिया की ये हालत देख मेरा कलेजा मुँह को आ गया! मैंने फौरन नेहा का मस्तक छू कर उसका बुखार देखा तो पाया की नेहा का शरीर भट्टी के समान तप रहा है! नेहा की ये हालत देख मुझे संगीता पर बहुत गुस्सा आया; "मेरी बेटी का शरीर यहाँ बुखार से तप रहा है और तुम....What the fuck were you doing till now?! डॉक्टर को नहीं बुला सकती थी?!" मेरे मुख से गाली निकलने वाली थी मगर मैंने जैसे-तैसे खुद को रोका और अंग्रेजी में संगीता को झाड़ दिया!

इतने में माँ नहा कर निकलीं और मुझे अचानक देख हैरान हुईं| फिर अगले ही पल माँ ने मुझे शांत करते हुए कहा; "बेटा, डॉक्टर सरिता यहाँ नहीं हैं वरना हम उन्हें बुला न लेते|" मैंने फौरन अपना फ़ोन निकाला और घर के नज़दीकी डॉक्टर को फ़ोन कर बुलाया| इन डॉक्टर से मेरी पहचान हमारे गृह प्रवेश के दौरान हुई थी| संगीता भी इन डॉक्टर को जानती थी मगर नेहा की बिमारी के चलते उसे इन्हें बुलाने के बारे में याद ही नहीं रहा| संकट की स्थिति में हमेशा संगीता का दिमाग काम करना बंद कर देता है, इसका एक उदहारण आप सब पहले भी पढ़ चुके हैं| आपको तो मेरे चक्कर खा कर गिरने वाला अध्याय याद ही होगा न?!

डॉक्टर साहब को फ़ोन कर मैंने रखा ही था की इतने में स्तुति नहा कर निकली| मुझे देखते ही स्तुति फूल की तरह खिल गई और सीधा मेरी गोदी में आने के लिए छलाँग लगा दी| मेरे सीने से लगते ही स्तुति को चैन मिला और उसकी आँखों से ख़ुशी के आँसूँ बह निकले| "पापा जी, I missed you!" स्तुति भावुक होते हुए बोली| मैंने स्तुति को लाड-प्यार कर बहलाया और उसके मस्तक को चूमते हुए बोला; "I missed you too मेरा बच्चा!"

स्तुति को लाड कर मैंने बिठाया और अपनी बड़ी बेटी नेहा के बालों में हाथ फेरने लगा| मेरे नेहा के बालों में हाथ फेरते ही एक चमत्कार हुआ क्योंकि बेसुध हुई मेरी बेटी नेहा को होश आ गया| नेहा मेरे हाथ के स्पर्श को पहचानती थी अतः अपने शरीर की सारी ताक़त झोंक कर नेहा ने अपनी आँखें खोलीं और मुझे अपने सामने बैठा देखा, अपने बालों में हाथ फेरते हुए देख नेहा को यक़ीन ही नहीं हुआ की मैं उसके सामने हूँ|

"पा..पा..जी" नेहा के मुख से ये टूटे-फूटे शब्द फूटे थे की मेरे भीतर छुपे पिता का प्यार बाहर आ गया; "हाँ मेरा बच्चा!" नेहा को मेरे मुख से 'मेरा बच्चा' शब्द सुनना अच्छा लगता था| आज जब इतने महीनों बाद नेहा ने ये शब्द सुने तो उसकी आँखें छलक गईं और नेहा फूट-फूट के रोने लगी!

"सॉ.री...पा.पा जी...मु.झे...माफ़...." नेहा रोते हुए बोली| मैंने नेहा को आगे कुछ बोलने नहीं दिया और सीधा नेहा को अपने गले लगा लिया| "बस मेरा बच्चा!" इतने समय बाद नेहा को मेरे गले लग कर तृप्ति मिली थी इसलिए नेहा इस सुख के सागर में डूब खामोश हो गई| वहीं अपनी बड़ी बिटिया को अपने सीने से लगा कर मेरे मन के सूनेपन को अब जा कर चैन मिला था|

नेहा को लाड कर मेरी नज़र पड़ी आयुष पर जो थोड़ा घबराया हुआ दरवाजे पर खड़ा मुझे देख रहा था| दरअसल, जब मैंने संगीता को डाँटा तब आयुष मुझसे मिलने ही आ रहा था मगर मेरा गुस्सा देख आयुष डर के मारे जहाँ खड़ा था वहीं खड़ा रहा| मैंने आयुष को गले लगने को बुलाया तो आयुष भी आ कर मेरे गले लग गया| मैंने एक साथ अपने तीनों बच्चों को अपनी बाहों में भर लिया और बारी-बारी से तीनों के सर चूमे| मेरे लिए ये एक बहुत ही मनोरम पल था क्योंकि एक आरसे बाद आज मैं अपने तीनों बच्चों को अपनी बाहों में समेटे लाड-प्यार कर रहा था|

कुछ देर बाद डॉक्टर साहब आये और उन्होंने नेहा का चेक-अप किया| अपने मन की संतुष्टि के लिए उन्होंने नेहा के लिए कुछ टेस्ट (test) लिखे और दवाई तथा खाने-पीने का ध्यान देने के लिए बोल चले गए| डॉक्टर साहब के जाने के बाद माँ ने मुझे नहाने को कहा तथा संगीता को चाय-नाश्ता बनाने को कहा|

चूँकि नेहा को बुखार था इसलिए उसका कुछ भी खाने का मन नहीं था, पर नेहा मुझे कैसे मना करती?! मैं खुद नेहा के लिए सैंडविच बना कर लाया और अपने हाथों से खिलाने लगा| मेरी बहुत जबरदस्ती करने के बावजूद नेहा से बस आधा सैंड विच खाया गया और बाकी आधा सैंडविच मैंने खाया|

नेहा को इस समय बहुत कमजोरी थी इसलिए नेहा लेटी हुई थी, वहीं मैं भी बस के सफर से थका हुआ था इसलिए मैं भी नेहा की बगल में लेट गया| मेरे लेटते ही नेहा मेरे सीने पर सर रख मुझसे लिपट कर आराम करने लगी| स्तुति ने जब ये दृश्य देखा तो स्तुति मुझ पर हक़ जमाने आ गई और अपनी दीदी की तरह मेरे सीने पर सर रख मुझसे लिपट कर लेट गई| स्तुति कुछ बोल नहीं रही थी मगर उसके मुझसे इस कदर लिपटने का मतलब साफ़ था; 'दिद्दा, आप बीमार हो इसलिए आप पापा जी के साथ ऐसे लिपट सकते हो वरना पपई के साथ लिपट कर सोने का हक़ बस मेरा है!' स्तुति के दिल की बात मैं और नेहा महसूस कर चुके थे इसलिए स्तुति के मुझ पर इस तरह हक़ जमाने पर हम दोनों के चेहरे पर एक प्यारी सी मुस्कान तैर रही थी|

स्तुति अपनी दिद्दा के साथ सब कुछ बाँट सकती थी मगर जब बात आती थी मेरे प्यार की तो स्तुति किसी को भी मेरे नज़दीक नहीं आने देती!

खैर, मेरे सीने पर सर रख कर लेटे हुए स्तुति की बातें शुरू हो गई थीं| मेरी गैरमजूदगी में क्या-क्या हुआ सबका ब्यौरा मुझे मेरी संवादाता स्तुति दे रही थी| मैंने गौर किया तो मेरे आने के बाद से ही स्तुति मुझे 'पपई' के बजाए 'पापा जी' कह कर बुला रही थी| जब मैंने इसका कारण पुछा तो मेरी छोटी बिटिया उठ बैठी और मेरी आँखों में देखते हुए बोली; "आप घर में नहीं थे न, तो मुझे बहुत अकेलापन लग रहा था| मुझे एहसास हुआ की पूरे घर में एक आप हो जो मुझे सबसे ज्यादा प्यारी करते हो इसलिए मैंने सोच लिया की मैं अब से आपको पपई नहीं पापा जी कहूँगी|" स्तुति बड़े गर्व से अपना लिया फैसला मुझे सुनाते हुए बोली| मेरी छोटी सी बिटिया अब इतनी बड़ी हो गई थी की वो मेरी कमी को महसूस करने लगी थी| इस छोटी उम्र में ही स्तुति को मेरे पास न होने पर अकेलेपन का एहसास होने लगा था जो की ये दर्शाता था की हम बाप-बेटी का रिश्ता कितना गहरा है| मैंने स्तुति को पुनः अपने गले से लगा लिया; "मेरी दोनों बिटिया इतनी सयानी हो गईं|" मैंने नेहा और स्तुति के सर चूमते हुए कहा| खुद को स्याना कहे जाने पर स्तुति को खुद पर बहुत गर्व हो रहा था और वो खुद पर गर्व कर मुस्कुराने लगी थी|

मैंने महसूस किया तो पाया की नेहा को मुझसे बात करनी है मगर स्तुति की मौजूदगी में वो कुछ भी कहने से झिझक रही है| अतः मैंने कुछ पल स्तुति को लाड कर स्तुति को आयुष के साथ पढ़ने भेज दिया| स्तुति के जाने के बाद नेहा सहारा ले कर बैठी और अपने दोनों हाथ जोड़ते हुए मुझसे बोली;

नेहा: पापा जी, मुझे माफ़ कर दीजिये! मैंने आपका बहुत दिल दुखाया! मेरी वजह से आप इतने दुखी थे की आप इतने दिन ऐसी जगह जा कर काम कर रहे थे जहाँ मोबाइल नेटवर्क तक नहीं मिलता था! मेरी वजह से स्तुति को इतने दिन तक आपका प्यार नहीं मिला, मेरी वजह से मम्मी और आपके बीच कहा-सुनी हुई, मेरे कारण दादी जी को...

इतने कहते हुए नेहा की आँखें फिर छलक आईं थीं| मैंने नेहा को आगे कुछ भी कहने नहीं दिया और उसकी बात काटते हुए बोला;

मैं: बस मेरा बच्चा! मैंने आपको माफ़ कर दिया! आप बहुत पस्चताप और ग्लानि की आग में जल लिए, अब और रोना नहीं है| आप तो मेरी ब्रेव गर्ल (brave girl) हो न?!

मैंने नेहा को हिम्मत देते हुए कहा| नेहा को मुझसे माफ़ी पा कर चैन मिला था इसलिए अब जा कर उसके चेहरे पर ख़ुशी और उमंग नजर आ रही थी|

नेहा को मुझसे माफ़ी मिल गई थी, अपने पापा जी का प्यार मिल गया था इसलिए नेहा पूरी तरह संतुष्ट थी| अब बारी थी संगीता की जिसे उसके प्रियतम का प्यार नहीं मिला था और नेहा ये बात जानती थी|

नेहा: मम्मी!

नेहा ने अपनी मम्मी को आवाज़ दे कर बुलाया|

संगीता: हाँ बोल?

संगीता ने नेहा से पुछा तो नेहा ने फौरन अपने कान दुबारा पकड़े और मुझसे बोली;

नेहा: पापा जी, मुझे माफ़ कर दीजिये! मेरे कारण आप दोनों के बीच लड़ाई हुई और आपने एक-दूसरे से बात करना बंद कर दिया|

मैंने नेहा के सर पर हाथ रख उसे आशीर्वाद दिया| फिर मैं उठ कर खड़ा हुआ तो देखा की संगीता मुझे देख कर मंद-मंद मुस्कुरा रही है! मुझे संगीता की ये मुस्कराहट समझ न आई और मैं भोयें सिकोड़े, चेहरे पर अस्चर्य के भाव लिए संगीता को देखने लगा| दरअसल, मुझे लगा था की मेरे डाँटने से संगीता नाराज़ होगी या डरी-सहमी होगी परन्तु संगीता तो मुस्कुरा रही थी! मेरे भाव समझ संगीता मुस्कुराते हुए बोली;
संगीता: मैं आपके मुझ पर गुस्सा करने से नाराज़ नहीं हूँ| मुझे तो ये देख कर बहुत ख़ुशी हुई की आपने आज इतने समय बाद नेहा पर इतना हक़ जमाया की मुझे झाड़ दिया!
संगीता को मुझ पर बहुत प्यार आ रहा था और वो अपना ये प्यार मुझे अपनी आँखों के इशारे से जता रही थी| वहीं अपनी मम्मी से ये बात सुन नेहा गर्व से फूली नहीं समा रही थी!
नेहा: मम्मी, चलो पापा जी के गले लगो!

नेहा ने प्यार से अपनी मम्मी को आदेश दिया तो हम दोनों ने मिलकर नेहा के इस आदेश का पालन किया|

अभी हम दोनों का ये आलिंगन शुरू ही हुआ था की इतने में स्तुति फुदकती हुई आ गई! अपनी मम्मी को मेरे गले लगे देख स्तुति को जलन हुई और उसने फौरन अपनी मम्मी को पीछे धकेलते हुए प्यार से चेता दिया;

स्तुति: मेरे पापा जी हैं! सिर्फ मैं अपने पापा जी के गले लगूँगी!

स्तुति की इस प्यारभरी चेतावनी को सुन हम दोनों मियाँ-बीवी मुस्कुराने लगे| वहीं नेहा को स्तुति के इस प्यारभरी चेतावनी पर गुस्सा आ गया;

नेहा: चुप कर पिद्दा! इतने दिनों बाद पापा जी और मम्मी गले लगे थे और तू आ गई कबाब में हड्डी बनने!

नेहा ने स्तुति को डाँट लगाई तो स्तुति मेरी टाँग पकड़ कर अपनी दीदी से छुपने लगी| अब अपनी छोटी बिटिया की ख़ुशी के लिए मैंने इशारे से नेहा को शांत होने को कहा और स्तुति को गोदी ले उसे बहलाते हुए बोला;

मैं: वैसे स्तुति की बात सही है! वो मुझे सबसे ज्यादा प्यार करती है इसलिए मुझ पर पहला हक़ मेरी छोटी बिटिया का है!

मैं स्तुति को लाड कर ही रहा था की माँ कमरे में आ गईं| मुझे स्तुति को लाड करते हुए देख माँ बोलीं;

माँ: सुन ले लड़के, आज से तू फिर कभी ऐसी जगह नहीं जाएगा जहाँ तेरा फ़ोन न मिले और अगर तू फिर भी गया तो शूगी को साथ ले कर जाएगा| जानता है तेरे बिना मेरी लालड़ी शूगी कितनी उदास हो गई थी?!
माँ ने मुझे प्यार से चेता दिया तथा मैंने भी हाँ में सर हिला कर उनकी बात स्वीकार ली| उस दिन से ले कर आज तक मैं कभी ऐसी जगह नहीं गया जहाँ मोबाइल नेटवर्क न हो और मैं माँ तथा स्तुति से बात न कर पाऊँ|

नेहा को मेरा स्नेह मिला तो मानो उसकी सारी इच्छायें पूरी हो गई| मेरे प्रेम को पा कर मेरी बड़ी बिटिया इतना संतुष्ट थी की उसका बचपना फिर लौट आया था| नेहा अब वही 4 साल वाली बच्ची बन गई थी, जिसे हर वक़्त बस मेरा प्यार चाहिए होता था यानी मेरे साथ खाना, मेरे साथ कहानी सुनते हुए सोना, मेरे साथ घूमने जाना आदि|

अपनी दिद्दा को मुझसे लाड पाते देख स्तुति को होती थी मीठी-मीठी जलन नतीजन जिस प्रकार स्तुति के बालपन में दोनों बहनें मेरे प्यार के लिए आपसे में झगड़ती थीं, उसी तरह अब भी दोनों ने झगड़ना शुरू कर दिया था| हम सब को नेहा और स्तुति की ये प्यारभरी लड़ाई देख कर आनंद आता था, क्योंकि हमारे अनुसार नेहा बस स्तुति को चिढ़ाने के लिए उसके साथ झगड़ती है| लेकिन धीरे-धीरे मुझे दोनों बहनों की ये लड़ाई चिंताजनक लगने लगी| मुझे धीरे-धीरे नेहा के इस बदले हुए व्यवहार पर शक होता जा रहा था और मेरा ये शक यक़ीन में तब बदला जब मुझे कुछ काम से कानपूर जाना पड़ा जहाँ मुझे 2 दिन रुकना था|

मेरे कानपुर निकलने से एक दिन पहले जब नेहा को मेरे जाने की बात पता चली तो नेहा एकदम से गुमसुम हो गई| मैंने लाड-प्यार कर नेहा को समझाया और कानपूर के लिए निकला, लेकिन अगले दिन मेरे कानपुर के लिए निकलते ही नेहा का मन बेचैन हो गया और नेहा ने मुझे फ़ोन खड़का दिया| जितने दिन मैं कानपूर में था उतने दिन हर थोड़ी देर में नेहा मुझे फ़ोन करती और मुझसे बात कर उसके बेचैन मन को सुकून मिलता|

असल में, नेहा एक बार मुझे लगभग खो ही चुकी थी और इस बात के मलाल ने नेहा को भीतर से डरा कर रखा हुआ था| नेहा को हर पल यही डर रहता था की कहीं वो मुझे दुबारा न खो दे इसीलिए नेहा मेरा प्यार पाने को इतना बेचैन रहती थी|

नेहा के इस डर ने उसे भीतर से खोखला कर दिया था| ये डर नेहा पर इस कदर हावी होता जा रहा था की नेहा को फिर से मुझे खो देने वाले सपने आने लगे थे, जिस कारण वो अक्सर रात में डर के जाग जाती| जितना आत्मविश्वास नेहा ने इतने वर्षों में पाया था, वो सब टूट कर चकना चूर हो चूका था| स्कूल से घर और घर से स्कूल बस यही ज़िन्दगी रह गई थी नेहा की, दोस्तों के साथ बाहर जाना तो उसके लिए कोसों दूर की बात थी| कुल-मिला कर कहूँ तो नेहा ने खुद को बस पढ़ाई तथा मेरे प्यार के इर्द-गिर्द समेट लिया था| बाहर से भले ही नेहा पहले की तरह हँसती हुई दिखे परन्तु भीतर से मेरी बहादुर बिटिया अब डरी-सहमी रहने लगी थी|

नेहा के बाहर घूमने न जाने से घर में किसी कोई फर्क नहीं पड़ा था क्योंकि सब यही चाहते थे की नेहा पढ़ाई में ध्यान दे| परन्तु मैं अपनी बेटी की मनोदशा समझ चूका था और अब मुझे ही मेरी बिटिया को उसका खोया हुआ आत्मविश्वास पुनः दिलाना था|

कानपूर से लौटने के बाद शाम के समय मैं, स्तुति और नेहा बैठक में बैठे टीवी देख रहे थे| नेहा को समझाने का समय आ गया था अतः मैंने स्तुति को पढ़ाई करने के बहाने से भेज दिया तथा नेहा को समझाने लगा|

मैं: बेटा, आप जानते हो न बच्चों को कभी अपने माँ-बाप से कुछ भी नहीं छुपाना चाहिए, फिर आप क्यों मुझसे बातें छुपाते हो?

मैंने बिना बात घुमाये नेहा से सवाल किया ताकि नेहा खुल कर अपने जज्बात मेरे सामने रखे| परन्तु मेरा सवाल सुन नेहा हैरान हो कर मुझे देखने लगी;

नेहा: मैंने आपसे कौन सी बात छुपाई पापा जी?!

नेहा नहीं जानती थी की मैं कौन सी बात के बारे में पूछ रहा हूँ इसलिए वो हैरान थी|

मैं: बेटा, जब से आप तंदुरुस्त हुए हो, आप बिलकुल स्तुति की तरह मेरे प्यार के लिए अपनी ही छोटी बहन से लड़ने लगे हो| पहले तो मुझे लगा की ये आपका बचपना है और आप केवल स्तुति को सताने के मकसद से ये लड़ाई करते हो मगर जब आपने रोज़-रोज़ स्तुति से मेरे साथ सोने, मेरी प्यारी पाने तक के लिए लड़ना शुरू कर दिया तो मुझे आपके बर्ताव पर शक हुआ| फिर जब मैं कानपूर गया तो आपने जो मुझे ताबतोड़ फ़ोन किया उससे साफ़ है की आप जर्रूर कोई बात है जो मुझसे छुपा रहे हो| मैं आपका पिता हूँ और आपके भीतर आये इन बदलावों को अच्छे से महसूस कर रहा हूँ| अगर आप खुल कर मुझे सब बताओगे तो हम अवश्य ही इसका कोई हल निकाल लेंगे|

मैंने नेहा के कँधे पर हाथ रख उसे हिम्मत दी तो नेहा एकदम से रो पड़ी!

नेहा: पापा जी...मु...मुझे डर लगता है! में आपके बिना नहीं रह सकती! आप जब मेरे पास नहीं होते तो मैं बहुत घबरा जाती हूँ! कई बार रात में मैं आपको अपने पास न पा कर घबरा कर उठ जाती हूँ और फिर आपकी कमी महसूस कर तब तक रोती हूँ जब तक मुझे नींद न आ जाए|

उस दिन जो हुआ उसके बाद से मैं किसी पर भरोसा नहीं करती! कहीं भी अकेले जाने से मुझे इतना डर लगता है, मन करता है की मैं बस घर में ही रहूँ| स्कूल या घर से बाहर निकलते ही जब दूसरे बच्चे...ख़ास कर लड़के जब मुझे देखते हैं तो मुझे अजीब सा भय लगता है! ऐसा लगता है मानो मेरे साथ कुछ बहुत बुरा होने वाला है! मुझ में अब खुद को बचाने की ताक़त नहीं है इसलिए मुझे बस आपके साथ सुरक्षित महसूस होता है, मैं बस आपके पास रहना चाहती हूँ| लेकिन जब स्तुति मुझे आपके पास आने नहीं देती तो मुझे गुस्सा आता है और हम दोनों की लड़ाई हो जाती है|

नेहा की वास्तविक मनोस्थिति जान कर मुझे बहुत बड़ा धक्का लगा| नेहा के साथ हुए उस एक हादसे ने नेहा को इस कदर डरा कर रखा हुआ है इसकी मैंने कल्पना नहीं की थी|

इधर अपनी बातें कहते हुए नेहा फूट-फूट कर रो रही थी इसलिए मैंने नेहा को अपने सीने से लगा कर उसके सर पर हाथ फेर कर नेहा को चुप कराया| जब नेहा का रोना थमा तो मैंने नेहा के दोनों हाथ अपने हाथों में लिए और नेहा को समझाते हुए बोला;

मैं: बेटा, ज़िन्दगी में ऐसे बहुत से पल आते हैं जो हमें बुरी तरह तोड़ देते हैं! हमें ऐसा लगता है की हम हार चुके हैं और अब हमारे पास जीने के लिए कुछ नहीं बचा| लेकिन बेटा, हमारी ज़िन्दगी में हमेशा एक न एक व्यक्ति ऐसा होता है जो हमें फिर से खड़े होने की हिम्मत देता है| वो व्यक्ति अपने प्यार से हमें सँभालता है, सँवारता है और हमारे भीतर नई ऊर्जा फूँकता है|

ज़िन्दगी में अगर कभी ठोकर लगे तो उठ कर अपने कपड़े झाड़ कर फिर से चल पड़ना चाहिए| हर कदम पर ज़िन्दगी आपके लिए एक नई चुनाती लाती है, आपको उन चुनौतियों से घबरा कर अपनी आँखें बंद नहीं करनी चाहिए बल्कि अपनी सूझ-बूझ से उन चुनौतियों का सामना करना चाहिए| अपने बचपन में आपने बहुत दुःख झेले मगर आपने हार नहीं मानी और जैसे-जैसे बड़े होते गए आप के भीतर आत्मविश्वास जागता गया| जब भी आप डगमगाते थे तो आपकी दादी जी, मैं, आपकी मम्मी आपके पास होते थे न आपको सँभालने के लिए, तो इस बार आप क्यों चिंता करते हो?!

अब बात करते हैं आपके किसी पर विश्वास न करने पर| बेटा, हाथ की सारी उँगलियाँ एक बराबर नहीं होती न?! उसी तरह इस दुनिया में हर इंसान बुरा नहीं होता, कुछ लोग बहुत अच्छे होते हैं तो कुछ बुरे| क्या हुआ अगर आपसे एक बार इंसान को पहचानने में गलती हो गई तो?! आप छोटे बच्चे ही हो न, कोई बूढ़े व्यक्ति तो नहीं...और क्या बूढ़े व्यक्तियों से इंसान को पहचानने में गलती नहीं होती?!

बेटा, एक बात हमेशा याद रखना, इंसान गलती कर के ही सीखता है| आपने गलती की तभी तो आपको ये सीखने को मिला की सब लोग अच्छे नहीं होते, कुछ बुरे भी होते हैं| आपको चाहिए की आप दूसरों को पहले परखो की वो आपके दोस्त बनने लायक हैं भी या नहीं और फिर उन पर विश्वास करो| यदि आपको किसी को परखने में दिक्क्त आ रही है तो उसे हम सब से मिलवाओ, हम उससे बात कर के समझ जाएंगे की वो आपकी दोस्ती के लायक है या नहीं?!

अब आते हैं आपके दिल में बैठे बाहर कहीं आने-जाने के डर पर| उस हादसे के बाद आपको कैसा लग रहा है ये मैं समझ सकता हूँ मगर बेटा इस डर से आपको खुद ही लड़ना होगा| घर से बाहर जाते हुए यदि लोग आपको देखते हैं. घूरते हैं तो आपको घबराना नहीं चाहिए बल्कि आत्मविश्वास से चलना चाहिए|

हम ऐसे समाज में रहते हैं जहाँ ऐसे दुष्ट प्रवत्ति वाले लोग भी रहते हैं जो की लड़कियों को घूरते हैं, तो क्या ऐसे लोगों के घूरने या आपको देखने के डर से आप सारी उम्र घर पर बैठे रहोगे? कल को आप बड़े होगे, आपको अपना वोटर कार्ड बनवाना होगा, आधार कार्ड बनवाना होगा, पासपोर्ट बनवाना होगा तो ये सब काम करने तो आपको बाहर जाना ही पड़ेगा न?! मैं तो बूढ़ा हो जाऊँगा इसलिए मैं तो इसमें आपकी कोई मदद नहीं कर पाऊँगा, तब अगर आप इसी प्रकार घबराओगे तो कैसे चलेगा? ज़िन्दगी बस घर पर रहने से तो नहीं चलेगी न?!

बेटा, आपको अपने अंदर फिर से आत्मविश्वास जगाना होगा और धीरे-धीरे घर से बाहर जाना सीखना होगा| कोई अगर आपको देखता है तो देखने दो, कोई आपको घूर कर देखता है तो देखने दो, आप किसी की परवाह मत करो| आप घर से बाहर काम से निकले हो या घूमने निकले हो तो मज़े से अपना काम पूरा कर घर लौटो|

आपको एक बात बताऊँ, जब मैं छोटा था तो मैं बहुत गोल-मटोल था ऊपर से आपके दादा जी-दादी जी मुझे कहीं अकेले आने-जाने नहीं देते थे इसलिए जब लोग मेरे गोलू-मोलू होने पर मुझे घूरते या मुझे मोटा-मोटा कह कर चिढ़ाते तो मैं बहुत रोता था| तब आपकी दादी जी ने मुझे एक बात सिखाई थी; 'हाथी जब अपने रस्ते चलता है तो गली के कुत्ते उस पर भोंकते हैं मगर हाथी उनकी परवाह किये बिना अपने रास्ते पर चलता रहता है|' उसी तरह आप भी जब घर से बाहर निकलो तो ये मत सोचो की कौन आपको देख रहा है, बल्कि सजक रहो की आगे-पीछे से कोई गाडी आदि तो नहीं आ रही| इससे आपका ध्यान बंटेगा और आपको किसी के देखने या घूरने का पता ही नहीं चलेगा|

मेरी बिटिया रानी बहुत बहादुर है, वो ऐसे ही थोड़े ही हार मान कर बैठ जायेगी| वो पहले भी अपना सर ऊँचा कर चुनौतियों से लड़ी है और आगे भी जुझारू बन कर चुनौतियों से लड़ेगी|

मैंने बड़े विस्तार से नेहा को समझाते हुए उसके अंधेरे जीवन में रौशनी की किरण दिखा दी थी| अब इसके आगे का सफर नेहा को खुद करना था, उसे उस रौशनी की किरण की तरफ धीरे-धीरे बढ़ना था|

बहरहाल, नेहा ने मेरी बातें बड़े गौर से सुनी थीं और इस दौरान वो ज़रा भी नहीं रोई| जब मैंने नेहा को 'मेरी बहादुर बिटिया रानी' कहा तो नेहा को खुद पर गर्व हुआ और वो सीधा मेरे सीने से लगा कर मुस्कुराने लगी|

उस दिन से नेहा के जीवन पुनः बदलाव आने लगे| नेहा ने धीरे-धीरे अकेले घर से बाहर जाना शुरू किया, शुरू-शुरू में नेहा को उसका डर डरा रहा था इसलिए मुझे एक बार फिर नेहा का मार्गदर्शन करना पड़ा|

आज इस बात को साल भर होने को आया है और नेहा धीरे-धीरे अपनी चुनौतियों का अकेले सामना करना सीख गई है|


तो ये थी मेरे जीवन की अब तक की कहानी|
[color=rgb(255,]समाप्त?[/color]


[color=rgb(255,]नहीं अभी नहीं! [/color]
 
[color=rgb(51,]मुन्नार की यात्रा[/color]

आयुष और नेहा की विंटर वेकेशन (winter vacation) शुरू होने वाली थीं| घर में रहते हुए नेहा मुझे सबके समाने पापा जी नहीं कह पाती थी, जब रात होती और हम बाप-बेटी सोने जाते तभी नेहा मुझे बिना डरे पापा जी कह पाती| नेहा का मन था की वो मुझे बिना डरे पापा जी कहे, अब ऐसा घर पर रहते हुए तो हो नहीं सकता था इसलिए मेरे बालमन ने इसका एक रास्ता निकाला|

मैं नेहा को गोदी लिए हुए माँ के पास पहुँचा और अपना बचपना दिखाते हुए बोला; "माँ, मैं नेहा को घुमाने शहर से बाहर ले जा रहा हूँ|" मेरी बात सुन नेहा ख़ुशी से मेरी गोदी में नाचने लगी| लेकिन जैसे ही मैंने माँ को अपना फैसला सुनाया तो पीछे से आयुष बोला; "और मैं?" अब मैं आयुष को कुछ कहता उससे पहले ही मेरी गोदी में चढ़ी हुई नेहा उसे डाँटते हुए बोली; "तू यहाँ रह कर गेम खेलिओ!" अब आयुष को भी मेरे साथ घूमने जाना था इसलिए उसने साथ चलने की ज़िद्द पकड़ ली|

एक तरफ दोनों बच्चों की मेरे साथ घूमने जाने की रस्सा-कसी चल रही थी तो दूसरी तरफ संगीता ने हम बाप-बेटा-बेटी की इस यात्रा में अपनी टाँग घुसा दी; "ये सही है, आप तीनों घूमने जाओगे तो मैं, माँ और पिताजी यहाँ बैठ कर अचार डालेंगे?" संगीता की बात सुन माँ फौरन अपनी बहु की तरफ हो गईं और उन्होंने नेहा को भावुक करते हुए कहा; "मुन्नी, अगर तू मानु के साथ चली जायेगी तो मैं यहाँ अकेली क्या करुँगी?" नेहा अपनी दादी जी के भावुक होने के ड्रामे को असल समझ बैठी और मेरी गोदी में आ कर बोली की मैं तीनों को (माँ, नेहा और आयुष को) घूमने ले जाऊँ|

जब नेहा ने संगीता का नाम नहीं लिया तो संगीता ने घर में गृहयुद्ध छेड़ दिया| कुछ देर बाद पिताजी घर लौटे तो संगीता ने साफ़ ऐलान कर दिया की अगर घूमने जाएंगे तो सब जाएंगे वरना कोई नहीं जाएगा| पिताजी चाहते थे की मैं सबको घुमा लाऊँ और वो यहाँ अकेले रह कर काम सँभालें| लेकिन नेहा और आयुष ने पिताजी को अपने मोहपाश में जकड़ लिया और जिद्द करते हुए बोले की वो भी हमारे साथ चलें| थोड़ी ना-नुकुर के बाद माँ-पिताजी मान गए और मुन्नार जाने का प्रोग्राम बन गया|

मौका अच्छा था और मैं इस मौके में रोमांस का तड़का मारना चाहता था इसलिए मैंने एक गुप्त योजना बनाई| दिषु के साथ मिलकर मैंने जुगाड़ लगा कर होटल बुक किया और मैनेजर से बात करते हुए तीन कमरे बुक किये| एक डबल कमरा माँ-पिताजी के लिए और दो सिंगल कमरे मेरे और संगीता के लिए| हम दोनों के कमरे आमने-सामने थे जिससे रात को हमारा मिलना आसान था|

जब मैंने अपनी इस योजना के बारे में संगीता को बताया तो वो ख़ुशी से फूली न समाई| दुनिया की नजरों से छुप कर हम दोनों पति-पत्नी का रिश्ता निभा ही रहे थे ऐसे में ये यात्रा हमारे लिए किसी हनीमून से कम नहीं थी|

फिर आया संगीता का जन्मदिन और वो दिन बहुत ख़ुशी-ख़ुशी बीता| देर रात को मौका पा कर माँ-पिताजी से छुप कर संगीता को उसका ख़ास उपहार भी दिया गया!

मुन्नार पहुँचने की यात्रा आप सभी ने पढ़ी थी| होटल पहुँच कर मैंने चालाकी से होटल के मैनेजर को ले कर कमरे का मुआइना करने के बहाने अकेले में समझा दिया की मुझे पीने-खाने की आदत है और अपने परिवार की उपस्थ्ति में ये सम्भव नहीं इसलिए मुझे एक अकेला कमरा चाहिए| मेरे पितजी उससे (मैनेजर से) अवश्य कहेंगे की वो हमें तीन की बजाए दो डबल कमरे दे दे ताकि हमारे पैसे बच जाएँ मगर उसे कुछ भी कर के उनकी बात नहीं माननी है| यदि मेरे पिताजी ज्यादा ज़ोर दें तो वो उन्हें दिखाने के लिए डिस्काउंट का झाँसा दे दे, बाद में मैं उसे अपने पिताजी की चोरी पूरे पैसे दे ही दूँगा|

अब जैसा की मैंने सोचा था, पिताजी ने मैनेजर से बहुत कहा की वो हमें दो कमरे दे-दे मगर मैनेजर मेरे पढ़ाये पाठ पर कायम रहा और झूठ-मूठ का डिस्काउंट देने को राज़ी हो गया|

अंततः मुन्नार की यात्रा के दौरान हम दोनों को प्यार करने के अवसर रात 12 बजे के बाद जब सब सो जाते थे तभी मिलते थे|

[color=rgb(51,]चन्दर का घर आना और संगीता की जान लेने की कोशिश करना|[/color]

सब कुछ सुखद चल रहा था मगर नियति ने हमारे प्यार की इस गाडी को पहला झटका देना था| हमारे घर की खुशियों को दुःख का ग्रहण लग चूका था!

जिस समय हम सब मुन्नार में अपनी खुशियाँ मनाने में लगे थे, उसी समय चन्दर नशा मुक्ति केंद्र से भाग आया था और उसे संगीता के गर्भधारण के बारे में पता चल गया था| चन्दर जनता था की उसने संगीता को 5 साल में छुआ तक नहीं इसलिए ये बच्चा उसका तो हो ही नहीं सकता! एक बस मैं ही था जो संगीता के सबसे करीब था इसलिए उसे पूरा यक़ीन था की ये बच्चा मेरा ही है|

गुस्से की आग में जलते हुए संगीता की जान लेने के इरादे से चन्दर दिल्ली आया था| जिस दिन हम मुन्नार से लौटे, उसी सुबह चन्दर घर में घुस आया और संगीता की जान लेने के लिए उसका गला दबाने लगा| मेरे और संगीता के रिश्ते पर कीचड़ उछालते हुए, संगीता को गरियाते हुए चन्दर संगीता का गला दबा रहा था| ख़ुशक़िस्मती से मैं उस वक़्त घर पर मौजूद था, उसके बाद जो मार-पीट हुई उसके बारे में आप सभी पढ़ ही चुके हैं|

संगीता इस समय बहुत डरी हुई थी और उसे सँभालना किसी के लिए भी नामुमकिन था| वहीं दोनों बच्चे भी इस हिंसा को देख कर डरे-सहमे हुए थे| जब माँ-पिताजी घर लौटे और उन्हें मार-पीट के बारे में पता चला तो मैं ने आधी बात छुपा ली| "चन्दर वहाँ अस्पताल (नशा मुक्ति केंद्र) में था और संगीता यहाँ थी इसलिए चन्दर को बहुत गुस्सा आया और वो संगीता की जान लेने के लिए यहाँ आया था| खुशकिस्मती से मैं घर पर था और संगीता की जान बचाने के लिए मैंने उस पर हाथ छोड़ दिया!" मेरी बात सुन माँ-पिताजी ने मुझे कुछ नहीं कहा| बल्कि माँ को तो आज मुझ पर बहुत गर्व हो रहा था की उनके लड़के ने एक स्त्री की रक्षा की है| आस-पड़ोस के लोग सभी माँ-पिताजी से मेरी सरहाना कर रहे थे की कैसे मैंने डट कर चन्दर का सामना किया तथा मार-मार कर उसका बुरा हाल कर दिया|

वहीं दूसरी तरफ जब ये खबर गॉंव पहुँची तो सबसे ज्यादा मिर्ची लगी मामा जी को! उन्होंने बड़के दादा को फौरन फ़ोन कर मेरे खिलाफ भड़का दिया और मेरे ऊपर पुलिस केस करने को उकसाया|

पुलिस स्टेशन में सारा मसला हमारे वकील साहब ने सुलटा दिया और हम बाप-बेटा घर लौट आये| मुझ पर पुलिस केस करने के लिए पिताजी आज पहलीबार अपने भाईसहाब पर क्रोधित हुए, बची-कुचि कसर माँ ने अपने गुस्से में पिताजी को बड़के दादा के खिलाफ भड़का कर पूरी कर दी| पिताजी को गुस्सा तो बहुत आया मगर उनमें अपने भाईसाहब को कुछ कहने की हिम्मत नहीं थी| मैं अपने पिताजी के आचरण को जनता था इसलिए मैंने सभी का ध्यान डरे-सहमे बच्चों तथा संगीता की तरफ मोड़ दिया| माँ-पिताजी अपने लाड-प्यार से संगीता और बच्चों को सँभालने में जुट गए| बच्चे तो अपने दादा-दादी जी के मोह के कारण शांत हो गए मगर संगीता को सँभाल पाना माँ-पिताजी के मुश्किल था| "बेटा, तू ही अपनी दोस्त को समझा|" माँ ने मुझे संगीता को सँभालने का कार्य दे दिया, जिसे मैंने पूरी शिद्दत से निभाया| वो बात अलग है की संगीता तब भी नहीं सँभली!

संगीता अपने भविष्य को ले कर बहुत डरी हुई थी क्योंकि इस सबके बाद जल्द ही संगीता को गॉंव से बुलावा आना था, आखिर चन्दर कानूनी तौर पर उसका पति जो था! इस समय मैं भी संगीता और अपने बच्चों को खोने के नाम से डरा हुआ था परन्तु मेरे पास इसका हल पहले से ही तैयार था|

मैं बार-बार संगीता को यही समझा रहा था की अब हमारे पास सिवाय शादी करने के और कोई रास्ता नहीं है, परन्तु संगीता ने मेरी इस बात का कोई जवाब नहीं दिया| मुझे लगा शायद संगीता सदमे में है इसलिए वो कोई भी फैसला लेने में असमर्थ है इसलिए मैंने संगीता के जख्म भरने का इंतज़ार करना ठीक समझा| जहाँ एक तरफ मैं संगीता को प्यार से सँभालने में लगा था और उसका जी हल्का करने की हर कोशिश कर रहा था वहीं दूसरी तरफ संगीता मुझसे कटती जा रही थी| संगीता ने जैसे मन ही मन ये मान लिया था की अब हम दोनों हमेशा-हमेशा के लिए अलग हो जायेंगे!

संगीता का मेरे प्रति ये रूखा व्यवहार देख मैं चिड़चिड़ा होता जा रहा था और ऊल-जुलूल चीजें सोचने लगा था| इसी बीच गॉंव से बड़के दादा का फ़ोन आया, चूँकि पिताजी का फ़ोन मेरे पास था इसलिए मैंने ही वो फ़ोन उठाया| मेरी आवाज़ सुन बड़के दादा बहुत गुस्सा हुए और मुझे मेरे पिताजी के साथ गॉंव आने को कहा| मुझे डर था की कहीं चन्दर ने गॉंव में मेरे और संगीता के बारे में सब सच तो नहीं कह दिया, यदि ऐसा हो गया होता तो मेरे पिताजी क्या प्रतिक्रिया देंगे उसके लिए मैं तैयार नहीं था इसलिए मैंने बिना किसी को कुछ बताये अकेले गॉंव जाने का फैसला किया|

जब मैं गॉंव पहुँचा तो वहाँ पंचों वाली पंचायत नहीं बल्कि घर के सदस्यों की पंचायत बैठी थी| इस पंचायत के सदस्य थे;

१. बड़के दादा

२. संगीता के पिताजी

३. मामा जी

४. बड़की अम्मा और

५. मामी जी
मुझे अकेला देख सभी हैरान हुए और मुझसे पुछा गया की मेरे पिताजी क्यों नहीं आये तो मैंने साफ़ कह दिया की; "मार-पीट मैंने की है, पिताजी ने नहीं|" मेरे ये तेवर दर्शाते थे की मुझे अपने किये पर ज़रा भी पछतावा नहीं है|

आगे जो बहस हुई उसे मैं आप सभी के सामने रख रहा हूँ;

बड़के दादा: चन्दर हुआँ बहु और बच्चा का लिए खतिर गवा रहा, तू काहे ओकरे संगे मार-पीट किहो? तोहार का हक़ रहा ओपर हाथ उठाये का?

बड़के दादा ने गुस्से से मेरी ओर इशारा करते हुए मुझे पर झूठा आरोप लगाया|

मैं: बड़के दादा, चन्दर वहाँ आपकी बहु को लेने नहीं बल्कि उसकी हत्या करने के इरादे से आया था!...
मैंने बड़ेक दादा की बात का काट करते हुए कहा| मेरा जवाब सुन मामा जी को मिर्ची लग गई और वो एकदम से मेरी बात काटते हुए बोले;

मामा जी: तू झूठ कहत हो! मुन्ना (चन्दर) हुआँ कउनो लड़ाई-झगड़ा किये नाहीं गवा रहा| तू ऊ बेचारे का इतना बुरी तरह मारयो की ओकरा हाथ टूटी गवा|

मैं: झूठ मैं नहीं ये (चन्दर) कह रहा है|

मैंने गुस्से से चन्दर की तरफ इशारा करते हुए कहा|

चन्दर: चुपये रहो! नाहीं तो...

चन्दर ने मुझे धमकाना चाहा और अपनी बात अधूरी छोड़ दी| दरअसल चन्दर कहना चाहता था की अगर मैं चुप नहीं रहा तो वो मेरे और संगीता के रिश्ते के बारे में सब बता देगा| लेकिन मैं उसकी इस गीदड़ भभकी से डरा नहीं और सीधा मुद्दे की बात पर आ गया;

मैं: अगर आप सबको लगता है की मैं झूठा हूँ तो मैं भवानी माँ की कसम खाने को तैयार हूँ| कहिये इस चन्दर को की ये भी भवानी माँ की कसम खा कर कह दे की ये मेरे घर क्यों आया था?! हम दोनों में से जो भी झूठा होगा उसे भवानी माँ अभी के अभी सजा दे देंगी!

मैंने जानबूझ कर चन्दर के आगे ये चुनौत रखी थी, ज़ाहिर था की उसके मन में था चोर इसलिए वो भवानी माँ की कसम खाने से मुकर गया|

चन्दर के मुकरने से बड़के दादा और बड़की अम्मा का सर शर्म से झुक गया था| मुझे सच्चा साबित होता हुआ देख चन्दर तिमिला गया और सच बोलने ही वाला हुआ था की मैंने उसे चुप कराने के लिए एक बार फिर उस पर आरोपों से हमला कर दिया;

मैं: मुझे यक़ीन नहीं होता की आप सब ने क्या सोच कर मुझे गलत समझा? जब आखरीबार मैं गॉंव आया था तब इसने (चन्दर ने) अपनी चमड़े की बेल्ट से मेरी खाल उधेड़ दी थी, जबकि मैं इसे अपना बड़ा भाई मानकर इसकी मार सहता रहा| दिल्ली में हमारे साथ रहकर हमारे ही साथ विश्वास घात किया इसने, पैसों का घपला किया इसने, मेरे पिताजी की सालों की बनी-बनाई इज्जत खराब की इसने, लेकिन फिर भी मेरे पिताजी ने यहाँ किसी से एक शब्द नहीं कहा और आप सब इस आदमी की बातों में आ कर मुझे दोषी समझने लगे?!

मेरी माँ ने मुझे सिखाया है की स्त्री का मान-सम्मान करना चाहिए उसकी रक्षा करनी चाहिए और वही मैंने उस दिन किया.और अगर इसने फिर ऐसा कुछ किया तो मैं इसे फिर पीटूँगा! इस बार तो हाथ तोडा था, अगलीबार इसकी ऐसी हालत करूँगा की ये बिस्तर से उठ नहीं पायेगा!

अपनी बात कहते-कहते मैं तेश में आ चूका था और मेरा गुस्सा देख सभी हैरान थे की आखिर बचपन में जो लड़का सबसे बड़े अदबों-अदब से बात करता था वो इतना हिंसक...इतना गुस्सैल कैसे हो गया?!

बहरहाल, मेरी सारी बातें सुन कर घर के पंचों के सर शर्म से झुक गए थे| वहीं सबको यूँ खामोश देख और मेरे मुख से अपनी तीखी आलोचना सुन, चन्दर भुनभुना गया था! वो इस समय खामोश था तो सिर्फ इसलिए की वो झूठा साबित हुआ था और उसका पक्ष लेने वाला इस समय कोई नहीं था|

चन्दर गुस्से से खड़ा हुआ और बिना किसी से कुछ कहे वहाँ से भाग खड़ा हुआ|

मैं गॉंव रुकने के इरादे से नहीं आया था इसलिए मैंने हाथ जोड़कर सभी से अपने वापस जाने की अनुमति माँगी| वहाँ कोई नहीं चाहता था की मैं घर में रुकूँ इसलिए किसी ने मुझे झूठे मुँह भी रुकने को नहीं कहा|

बड़के दादा इस समय अपने बेटे के कारण शर्मिंदा थे और कुछ भी कहने की स्थिति में नहीं थे| मैंने भी उनसे कुछ और बात करना ठीक नहीं समझा| मैंने उनके पॉंव छुए परन्तु बड़के दादा ने मुझे आशीर्वाद नहीं दिया! बड़के दादा द्वारा किये इस तिरस्कार को देख मुझे अपनी माँ द्वारा बताई वो बात याद आई जब माँ-पिताजी शादी कर गॉंव आये थे और बड़के दादा ने उन्हें भद्दी-भद्दी गालियाँ दे कर उनका तिरस्कार किया था|

फिर मैंने बड़की अम्मा के पॉंव छुए तो बड़की अम्मा ने मेरे मस्तक को चूमते हुए मुझे आशीर्वाद दिया| इस समय अगर किसी को मेरे ऊपर गर्व हो रहा था तो वो थी मेरी बड़की अम्मा, उन्हें ये देख कर ख़ुशी हुई थी की कैसे मैंने उनकी बहु की रक्षा की|

जब मैं संगीता के पिताजी के पॉंव छूने लगा तो उन्होंने मुझे रोक दिया तथा मुझे अपने गले लगा लिया| "हम मुन्ना का सड़क तक छोड़ देब और आपन घरे निकल जाब|" संगीता के पिताजी ने सभी से हाथ जोड़कर अपने जाने की आज्ञा लेते हुए कहा|

मामा जी और मामी जी के पैर न छू कर मैंने उन्हें पूरी तरह से अनदेखा कर दिया और संगीता के पिताजी के साथ चल पड़ा| संगीता के पिताजी को मुझ पर गर्व हो रहा था की मैंने कैसे उनकी बेटी की रक्षा की| चूँकि वो एक लड़की के पिता थे इसलिए वो अपनी बेटी के बचाव में कुछ कह नहीं सकते थे| मेरे लिए इतना ही बहुत था की इस पूरी बहस के दौरान उन्होंने मेरे खिलाफ एक शब्द नहीं कहा|

सड़क तक पहुँचते-पहुँचते हमारी बातें जारी थीं और इसी दौरान मुझे उनके कर्जे (loan) का पता चला| मैं उस समय उनकी मदद करने की स्थति में था इसलिए मैंने गुपचुप उनकी मदद कर दी|

घर वापस लौटा तो वापस संगीता का वो मुरझाया हुआ चेहरा दिखा| मुझसे अब संगीता का ये हाल नहीं देखा जा रहा था इसलिए मैं चिड़चिड़ा हो उठा था| उसी समय मेरे दिमाग में एक ख्याल आया; 'कहीं संगीता मुझसे शादी का प्रस्ताव इसलिए तो अस्वीकार कर रही क्योंकि मैं कमाता नहीं?' ये फज़ूल का ख्याल दिमाग में आते ही मैंने नौकरी करने का फैसला कर लिया|

मुझे एक अच्छी नौकरी चाहिए थी ताकि मैं संगीता और बच्चों की जिम्मेदारी अच्छे से निभा सकूँ| नौकरी करने की सनक दिमाग पर चढ़ी और अगले ही दिन मैं मुंबई के लिए निकल गया| वहाँ अपने दोस्त से मिल, एक अच्छी नौकरी सिक्योर (secure) कर मैं अनिल और संगीता की माँ से मिला| अनिल का ऑपरेशन हुआ और आखिर मैं घर वापस लौटा|

मैं संगीता से उसके पिताजी से मिलने, मुंबई में अनिल और उसकी माँ से मिलने की सारी बातें इसलिए छुपा रहा था क्योंकि ये सब जानकार संगीता खुद को मेरे एहसान के बोझ तले दबा महसूस करती, फिर वो मेरे एहसान का बदला चुकाने के लिए मेरा शादी का प्रस्ताव मान लेती और मुझे ये कतई गवारा नहीं था| मैं चाहता था की संगीता को मेरे प्यार पर विश्वास हो जाए और वो दिल से मेरे शादी के प्रस्ताव को मान ले|

जब मैं मुंबई से वापस लौटा तब भी मुझे संगीता के बर्ताव में कोई फर्क नहीं दिखाई दिया| वो एक चलती-फिरती लाश की तरह मेरे सामने रहती थी, न मुझसे ठीक से बात करती थी और प्यार करने की तो कोई उम्मीद थी ही नहीं! एक दिन जब घर में कोई नहीं था तब मेरे गुस्से का प्याला छलक गया और मैं संगीता पर बरस पड़ा; "मैं जानता हूँ की तुम हमारे रिश्ते के टूटने को ले कर भीतर से कितनी डरी हुई हो मगर कब तक यूँ दुखी हो कर खामोश बैठी रहोगी?! इस समस्या का बस एक ही हल है और वो है हम दोनों का हमेशा-हमेशा के लिए एक हो जाना|

मैंने सब कुछ सेट कर दिया है| मुंबई में मैंने एक MNC में नौकरी ढूँढ़ ली है, 3-4 महीनों में मुझे offshore posting मिल जाएगी तो हम चारों (मैं, संगीता और दोनों बच्चे) विदेश में settle हो जायेंगे| जब यहाँ सब शांत हो जायेगा, तो हम लौट आएंगे और मैं सबको मना लूँगा|" मैंने जब अपना ये प्लान संगीता को बताया तो वो एकदम से गुस्से से तमतमा गई!

"मतलब की हम भाग जाएँ? अपने सोचा की हमारे यूँ भागने से हमारे परिवार पर क्या बीतेगी? आपके माँ-पिताजी पर क्या बीतेगी? मेरे माँ-पिताजी पर क्या बीतेगी? हमारे माँ-पिताजी किसी को मुँह दिखाने लायक नहीं रहेंगे, यही चाहते हो आप?" संगीता मुझे गुस्से से घूरते हुए मुझसे सवाल करने लगी|

"नहीं...मैं ये बिलकुल नहीं चाहता! मैं तो चाहता था की मैं पहले अपने माँ-पिताजी से हमारी शादी की बात करूँ और फिर तुम्हारे माँ-पिताजी से बात करूँ| लेकिन तुमने मुझे अपनी 'बेहूदा कसम' से बाँध रखा है! जब तुम मुझे सीधे रास्ते जाने नहीं दोगी तो मुझे घुमा कर कान पकड़ना ही पड़ेगा न?! या फिर मैं भी तुम्हारी तरह हाथ पर हाथ रखे बैठ जाऊँ और दुनिया को हमें अलग करते हुए देखता रहूँ?!!" मैं बिदकते हुए बोला|

"ये नामुमकिन है! आपके माँ-पिताजी ही नहीं मानेंगे तो मेरे माँ-पिताजी के मानने की तो बात ही छोडो! ये सब उतना आसान नहीं है जितना आपने कल्पना कर अपनी कहानी में लिखा है|" मेरे गुस्से को देख संगीता का गुस्सा डर के कारण शांत होने लगा था|

"सब कुछ मुमकिन है! भले ही मेरे पिताजी न माने मगर माँ तुम्हें बहुत चाहती हैं| मैं अपनी माँ के पॉंव में गिर जाऊँगा, उनसे मिन्नतें करूँगा और मुझे पूरा यक़ीन है की वो अपने बेटे की ये विनती मान जाएँगी| तुम्हें बस मुझे अपनी कसम से आज़ाद करना है!" अगर उस पल संगीता मान गई होती तो मैं अपनी माँ को मेरी शादी के लिए मना लेता| रही पिताजी की बात तो, उनके मानने न मानने से क्या फर्क पड़ता...आखिर उन्होंने अंत में अपने असली परिवार को तो छोड़ ही दिया न?!

खैर, संगीता को मेरे प्यार पर ज़रा भी भरोसा नहीं था इसलिए वो बिना कुछ कहे चली गई| इधर मैं अपने गुस्से की आग में बुरी तरह जल रहा था| अगर आयुष और नेहा मेरे पास न होते तो मैं अपने गुस्से की आग में पूरी तरह जल ही गया होता!

मुसीबत के समय में इंसान को उपाए खोजना चाहिए, न की मुसीबत के आगे घुटने टेक देने चाहिए|

जहाँ एक तरफ मैं संगीता को अपने प्यार पर विश्वास दिला कर हमारे रिश्ते को जायज नाम देने के लिए लड़ना चाहता था, वहीं सब कुछ खोने के डर से संगीता ने मुसीबत के आगे अपने हथियार डालकर खुद को हालातों के सहारे छोड़ दिया था|

कुछ दिन बीते की गॉंव से खबर आई की संगीता के पिताजी उसे लेने दिल्ली आ रहे हैं| ये खबर सुन मेरे होश फाख्ता हो गए! मुझे एक क्षण नहीं लगा ये कप्लना करने में की हम दोनों का ये साथ अब हमेशा-हमेशा के लिए छूट जायेगा. और टूट जायेगा बाप-बेटी का ये पाक रिश्ता!

दरअसल मेरे वापस चले आने के बाद, चन्दर ने घर पर ये राज़ खोल दिया था की संगीता के पेट में पल रहे बच्चे का बाप मैं हूँ| ये बात जानकार बड़के दादा का खून खौल गया था| वो तो सीधा पिताजी को फ़ोन करने वाले थे लेकिन बड़की अम्मा ने बीच में पड़ते हुए पहले संगीता को घर बुला कर बात पूछने को कहा| एक बार इस बात की पुष्टि हो जाती तो फिर घर में कोहराम मचना तय था!

वहीं, संगीता के पिताजी को ये बात जानबूझ कर बताई नहीं गई थी क्योंकि मामा जी का कहना था की वो संगीता को सब बता कर पहले से ही सचेत कर देंगे और संगीता कोई न कोई बहाना बना कर बच निकलेगी!

मैंने सुना था की, इंसान जब डूबने लगता है तो उसकी असली fighting spirit बाहर आती है, खुद को बचाने के लिए इंसान मौत से भी लड़ लेता है...मुझे तो बस संगीता की कसम तोड़नी थी!

"कल जब तुम्हारे पिताजी आएंगे तो मैं सबके सामने सब सच कह दूँगा| फिर चाहे मुझे सबके पैर पड़ने पड़ें या नाक रगड़नी पड़े मगर मैं सबको हमारी शादी के लिए मना कर रहूँगा| I don't give a fuck about your कसम!" मैंने गुस्से में संगीता के सामने उसकी कसम तोड़ने की अपनी मंशा साफ़ कर दी थी|

"मेरी कसम तोड़ कर तो देखो! न मैंने उसी पल अपनी जान दे दी तो कहना! मेरी कसम को यूँ हल्के में लेने की भूल मत करना!" संगीता की आँखों में अंगारे जल रहे थे जिन्हें देख कर मुझे उसे खो देने का भय सताने लगा! मैं संगीता के जीते जी उसे खुद से दूर होते हुए देख कर जो दर्द महसूस करता वो संगीता के मृत शरीर को अपने सामने देखने की पीड़ा से बहुत कम था! संगीता को अपनी नज़रों से दूर देख कर मैं शायद जी लेता मगर उसके इस दुनिया में न रहने पर मेरे लिए जीना नामुमकिन था!

जितनी हिम्मत और आत्मविश्वास से मैं संगीता की कसम तोडना चाह रहा था, संगीता की इस धमकी ने सब पर पानी फेर दिया था! अब मेरे पास सिवाए बेबस बन कर सब कुछ अपनी आँखों के सामने घटित होते हुए देखने के कोई और चारा न था|

भले ही मैं कुछ कह नहीं सकता था मगर मुझ में जीने की इच्छा नहीं थी| अपने प्यार...अपने बच्चों को खो कर मैं कैसे जेता यही कारण है की मैंने उसी पल से अन्न-जल त्याग दिया!

अगले दिन संगीता के पिताजी घर पहुँचे, पूरा समय मेरी नजरें संगीता पर जमी हुई थीं...इस आस में की वो हमारे प्यार की लाज रख ले और अपने पिताजी के साथ जाने से मना कर दे| लेकिन संगीता के मुख से कोई बोल नहीं फूटे| संगीता बिना किसी से कुछ बोले अपने कमरे में जा कर अपना सामान पैक करने लगी|

इधर मैं संगीता को मनाने जाना चाहता था मगर संगीता के पिताजी ने मुझे अपने पास बिठा लिया| "मुन्ना, आभायें हम केवल मुन्नी का लिये जाइथ है| दू-तीन महीना बाद, जब दुनो बच्चा का परीक्षा पूर होइ तब हम फिर आब और दुनो का आपन साथै लेइ जाब|" संगीता के पिताजी से मिली ये जानकारी मेरे गले में फाँस के समान अटक गई थी!

'संगीता तो मुझसे दूर हो ही रही थी, तीन महीने बाद बच्चों से भी मेरा नाता छूट जायेगा!' मन में आये इस ख्याल ने मुझे झकझोड़ कर रख दिया और मेरी आँखों में दर्द भरे आँसूँ उतर आये| मैं किसी को अपने आँसूँ दिखा कर उनके मन में सवाल नहीं जगाना चाहता था इसलिए मैं फ़ोन का बहाना कर संगीता के कमरे में आ गया|

इधर, संगीता को अपने आँसूँ छुपाने की महारथ हासिल थी इसलिए संगीता बिना कुछ कहे बैग में अपने कपड़े रख रही थी|

"प्लीज जान! मत जाओ! तुम्हारे बिना मैं जी नहीं पाऊँगा!" आँखों में आँसूँ लिए, हाथ जोड़े मैंने संगीता के सामने अपने घुटने टेक कर मिन्नत माँगी| ये वही शब्द थे जो मैंने संगीता को रोकने के लिए आखरी बार कहे थे| मेरी आवाज़ सुन संगीता मुड़ी और मुझे घुटने टेके देख उसकी आँखें छलछला गईं! वो फौरन दौड़ती हुई मेरे पास आई और मेरे कँधे थाम मुझे उठाया और मेरे आँसूँ पोंछ कर दबी हुई सी आवाज़ में बोली; "आपको जीना होगा!" इतना कह संगीता ने मुझसे मुँह मोड़ लिया और मेरी ओर पीठ कर खड़ी हो सिसकने लगी| संगीता मुझे अपने आँसूँ दिखा कर कमजोर नहीं करना चाहती थी इसीलिए वो मेरी ओर पीठ कर खड़ी थी| उस पगली को क्या पता की उसके जाने से मैं वैसे ही टूट जाऊँगा!

मैंने संगीता के बाएँ काँधे पर हाथ रख उसे अपनी तरफ घुमाया और उसके चेहरे को थामे बोला; "प्लीज मुझे अपनी कसम से आज़ाद कर दो! मैं सबके सामने भीख माँग कर सबको हमारी शादी के लिए मना लूँगा, तुम बस थोड़ा सा मेरा साथ दो!" मैंने पूरे आत्मविश्वास से कहा परन्तु संगीता को अब भी मेरे प्यार पर भरोसा नहीं था| संगीता ने न में अपनी गर्दन हिलाई और अपने दोनों हाथ मेरे हाथों पर रख अपना चेहरा मेरी पकड़ से छुड़ा कर बाहर चली गई|

मैं जानता था की जितना दर्द मुझे संगीता से दूर होने का हो रहा है उतना ही दर्द संगीता भी महसूस कर रही है मगर फिर भी वो आखिर क्यों मुझसे यूँ उखड़ी हुई है? क्यों वो मुझ पर मेरे प्यार पर विश्वास नहीं कर रही? क्यों वो मेरे साथ नहीं खड़ी? मन में ऐसे बहुत से सवाल थे और मैं अकेला कमरे में खड़ा, रोते हुए इन सवालों का जवाब खोज रहा था|

कुछ देर बाद माँ ने मुझे आवाज़ दी तो मैं मुँह-हाथ धो कर बाहर आया ताकि किसी को मेरे दर्द में जल रहे दिल का हाल पता न चले| माँ ने मुझे संगीता और उसके पिताजी को बस स्टैंड छोड़ने जाने को कहा| उस पल मेरे मन में हुक उठी की शायद रास्ते में संगीता का मन बदल जाए और वो अपने पिताजी के साथ गॉंव जाने से मना कर दे| दिल में उम्मीद की आखरी किरण लिए मैंने फ़ोन कर टैक्सी बुलाई और अपनी जानेमन का बैग खुद टैक्सी में रखा|

कैसी विडंबना थी, जिसे मैं अपने पास रोकना चाहता था उसी का सामान मैं टैक्सी में रख रहा था!

मैं ड्राइवर साहब के साथ आगे बैठा था और संगीता तथा उसके पिताजी पीछे बैठे थे| सारे रास्ते संगीता खिड़की से बाहर देखने का दिखावा करते हुए मुझसे नज़रें फेरे रही| वहीं संगीता के पिताजी मुझसे बातें करने में लगे थे, मैं भी मज़बूर था इसलिए मैं उनकी बातों का जवाब दिए जा रहा था|

आखिर बस स्टैंड आया और संगीता के पिताजी टिकट लेने लाइन में लगे, मैं टिकट लेने लाइन में लग सकता था मगर मैं जानबूझ कर नहीं गया ताकि एक आखरी बार अपनी परिणीता को रोकने की कोशिश कर सकूँ| "जान..." आँखों में आँसूँ लिए मैंने संगीता को पुकारा मगर संगीता ने मुझसे नजरें फेर लीं| साफ़ था की अब कुछ नहीं हो सकता इसलिए हार मानते हुए मैं सर झुका कर बैठ गया!

कुछ देर बाद संगीता के पिताजी बस की टिकट ले कर आये और मैंने दोनों को बस में बिठा दिया तथा उनके लिए पानी और चिप्स-बिस्किट ले कर आया| बस चलने को हुई तो मैंने संगीता के पिताजी के पॉंव छु कर आशीर्वाद लिया| फिर जब मैंने संगीता की ओर देखा तो उसने मुझसे फिर नजरें फेर लीं और खिड़की से बाहर देखने लगी|

मेरा दिल टूट कर चकना चूर हो चूका था, जो रही-सही उम्मीद थी की संगीता अपने पिताजी के साथ गॉंव जाने से मना कर देगी वो भी टूट चुकी थी! आँखों में आँसूँ लिए मैं बस से उतरा और बिना पीछे मुड़े सीधा बस स्टैंड से बाहर आ गया!

दोपहर को जब मैं घर पहुँचा तो मुझे मेरे दोनों बच्चे उदास मिले| दरअसल जब वो स्कूल से घर आये तो उन्हें पता चला की उनके नाना जी उनकी मम्मी को गॉंव ले जा चुके हैं तथा परीक्षाओं के बाद उन्हें भी गाँव चले जाना है|

बच्चों को जितना दुःख हो रहा था उससे कई गुना दर्द मुझे हो रहा था| अपनी जान को तो मैं खो ही चूका था और कुछ दिनों में मैं अपने बच्चों को भी खोने वाला था| मैंने दोनों बच्चों को गोदी लिया और छत पर आ गया| मेरी ही तरह आयुष को भी अपने आँसूँ सबको दिखाना अच्छा नहीं लगता था इसलिए छत पर पहुँच आयुष सिसकते हुए बोला; "चाचू, मुझे गॉंव नहीं जाना! मैं यहीं रहूँगा आपके पास! आप मम्मी को वापस ले आओ, फिर हम सब यहीं रहेंगे|" आयुष जानता था की मैं उसकी हर माँग पूरी करता हूँ इसीलिए उसने मुझसे ये माँग की, इस उम्मीद में की मैं उसकी ये माँग भी पूरी करूँगा|

अब मैं आयुष को कैसे समझाता की उसकी मम्मी मेरी बात मान ही नहीं रही, अगर वो मेरी बात मान जाती तो हम सब एक साथ ख़ुशी-ख़ुशी रह रहे होते| आयुष को ये सच बता कर मैं उसके मासूम मन में उसकी मम्मी की छबि खराब नहीं करना चाहता था इसलिए मैंने आयुष के सवाल का जवाब दिए बिना उसे अपने सीने से लगा लिया और उसके सर को चूम उसके मन में उथल-पुथल को शांत किया|

नेहा इस समय एकदम खामोश थी और उसकी ये ख़ामोशी मुझे डरा रही थी| आयुष को बहला कर मैंने नीचे खेलने भेज दिया तथा नेहा को अपने सीने से लगा कर रो पड़ा! मेरे रोने पर नेहा भी खुद को रोक न पाई और मुझसे कस कर लिपट रो पड़ी! नेहा को मुझे अपनी बाहों में कसना ये दर्शाता था की वो मुझसे दूर नहीं जायेगी, लेकिन नियति को कुछ और ही मंज़ूर था|

"प्...पापा जी...मैं गॉंव नहीं जाऊँगी! मैं आपके साथ ही रहूँगी!" नेहा ने मुझे अपना फैसला सुनाते हुए कहा| न मेरे पास आयुष के सवाल का जवाब था और न ही नेहा के फैसले को सुन मैं कुछ कर सकता था! मैं तो बेबस था, ऐसा बेबस पिता जो कुछ ही दिनों में अपना सब कुछ खो देने वाला था!

मुझे खामोश देख नेहा का नाज़ुक मन दहल गया था, वो मुझे खोना नहीं चाहती थी इसलिए नेहा ने मेरी आँखों में देखते हुए पुछा; "बोलो न पापा जी, आप मुझे खुद से दूर जाने नहीं दोगे न? बोलो न पापा जी? मैं जानती हूँ आप मुझसे बहुत प्यार करते हो और आप मुझे खुद से दूर जाते हुए नहीं देख सकते!" नेहा का सवाल सुन, उसका मुझ पर इतना विश्वास देख मैं टूट गया; "I'm sorry बेटा! आपकी मम्मी नहीं चाहतीं की हम सब एक साथ रहें| मैंने उनसे कहा था की वो मुझसे शादी कर लें ताकि हम सब एक साथ रहें, मैं अपने तीनों बच्चों को खूब लाड-प्यार करूँ मगर आपकी मम्मी डरती हैं की जब सबको सच पता चलेगा तो हम हमेशा-हमेशा के लिए अलग हो जायेंगे!" मैंने रोते हुए सब सच कहा तो नेहा को अपनी मम्मी पर बहुत गुस्सा आया और वो गुस्से से चीखी; " तो क्या अभी हम अलग नहीं हो रहे? मम्मी क्यों आपकी बात नहीं मान रहीं? ठीक है...उन्हें नहीं रहना न आपके साथ तो न सही, मैं आपने पापा जी के साथ रहूँगी! मैं किसी हाल में गॉंव नहीं जाऊँगी! अगर किसी ने मेरे साथ जबरदस्ती की न तो मैं और आप ये घर छोड़ कर भाग जायेंगे! हम मज़े से जिंदगी जियेंगे, फिर हमें अलग होने का कोई डर नहीं होगा!" इतनी छोटी उम्र में नेहा इतनी हिम्मत दिखा रही थी की मेरे साथ...अपने पापा जी के साथ भाग कर नई ज़िन्दगी शुरू करना चाहती थी, जबकि उसकी मम्मी में इतनी हिम्मत नहीं थी की वो मेरे साथ बस खड़ी रहे!

अपनी बेटी की हिम्मत देख मुझे उस पर गर्व हो रहा था इसलिए मैंने नेहा को अपने सीने से लगा लिया और फफक कर रो पड़ा! संगीता की बेरुखी ने मुझे इतना कमजोर कर दिया था, इतना बुज़दिल बना दिया था की मैं अपनी बेटी के हिम्मत दिखाने पर उसका साथ ही नहीं दे पाया!

मैं पहले ही अन्न-जल त्याग चूका था, दवाई लेना बंद कर चूका था और संगीता की जुदाई का दुःख मेरे सर पर इस कदर सवार हुआ की मेरा शरीर ये पीड़ा बर्दाश्त न कर पाया तथा चक्कर खा कर मैं ऐसा गिरा की पहले अस्पताल पहुँचा और फिर कोमा (coma) में!

उधर अगले दिन संगीता गॉंव पहुँची और उसके पिताजी सीधा उसे उसके ससुराल छोड़ने पहुँचे| दोपहर के 1 बजे थे जब गॉंव में मेरी तबियत खराब होने की खबर पहुँची! मेरी हालत की खबर जान कर संगीता के प्राण सूख गए और उसने वापस दिल्ली आना चाहा मगर तभी चन्दर ने पूरे परिवार के सामने उस पर तोहमद लगा दी;

चन्दर: अब का आपन पेट मा पल रहे ई मनहूस का बाप से मिले खतिर जाइहो?!

चन्दर के मुख से निकले इन विषैले शब्दों को सुन संगीता के पिताजी के पॉंव तले ज़मीन खिसक गई! उन्हें विश्वास ही नहीं हो रहा था की चन्दर उनके खून...उनकी बेटी पर इतना गंदा आरोप लगा रहा है! वहीं चन्दर ने जब हमारे होने वाले बच्चे पर कीचड़ उछाला तो संगीता के गुस्से की सीमा नहीं रही! वो गुस्से से चन्दर पर चिल्लाई;

संगीता: खबरदार जो हमार बच्चा के बारे में कछु कहेऔ तो?! एहि लागे तोहआर गला रेत (काट) देब!!

हमेशा दबी-सहमी रहने वाली, सब कुछ सहने वाली बहु के ये तेवर देख कर सभी दंग थे!

बड़के दादा: खामोश बड़का (बहु)! ई तोहार मरद है, आपन मरद का जान लिहो तो बिधबा हुई जाबो!

संगीता सबसे बड़ी बहु थी इसलिए उसे बड़के दादा और बड़की अम्मा 'बड़का' कहते थे| बड़के दादा ने जब गुस्से से संगीता को विधवा होने का डर दिखा कर खामोश करवाना चाहा तो संगीता गुस्से से चन्दर पर ही बरस पड़ी;

संगीता: काहे का मरद? जे आपन पत्नी का गला दबाये का मारे चाहत रहा ऊ कौन मरद? जे आपन पत्नी पर सबका सामने गंदा इलज़ाम लगावता है, ऊ काहे का मरद? जे आपन पत्नी का हमेशा डराए के रखत है, ऊ का साथे जबरदस्ती करत है...जबरदस्ती ऊ का छुअत है ऊ काहे का मरद?

संगीता ने जब चन्दर की मर्दानगी को ललकारा तो चन्दर का खून खौल गया और वो संगीता को मारने के लिए आगे बढ़ा| लेकिन इससे पहले की चन्दर कुछ कर पाता, बड़के दादा बीच में आ गए और अपनी आँखों से उसे घूर कर देखने लगे तथा गुपचुप इशारे से अपने समधी यानी संगीता के पिताजी की मौजूदगी का एहसास करवाया| बड़के दादा का इशारा समझ चन्दर रुक गया और संगीता पर सीधा आरोप लगाते हुए बोला;

चन्दर: ओकरे संगे (मेरे साथ) रही के बहुत जबान (जुबान) उग आई है न तोहार?! तो हमका ई बतावा की जब हम तोहका पाँच साल से छूबे नहीं किहिन तो ई तोहार कोख मा बच्चा कहाँ से आवा? सच कही दे की ई खून ऊ मानु का है!

चन्दर के आरोप लगते ही संगीता मेरे बचाव में कूद पड़ी और चन्दर को ही दोषी बना दिया;

संगीता: भूल गए ऊ दिन जब रतिया के साइट से पी कर धुत्त होइ के आयो रहेओ और हमरे संगे जबरदस्ती किहे रहेओ?! हम गहरी नींद मा सोवत रहन, जे का तू फायदा उठाये रहेओ! जब हम जागी गयन और तोह से बची के भागत रहन तब हमरे ऊपर हाथ उठाये रहेओ? फिर अगले दिन साइट पर पिटे रहेओ?!

संगीता ने जैसे ही चन्दर को साइट पर मेरे पिटाई की याद दिलाई चन्दर की आँखों में खून उतर आया;

चन्दर: @#$* हम कब तोहका @#$*&!

चन्दर ने संगीता को गालियाँ देनी शुरू कर दी थी, ये दृश्य देख कर संगीता के पिताजी का खून खौल रहा था मगर वो चुप थे तो बस एक बेटी के बाप होने के कारण|

चन्दर: रंग-रँलियाँ मनाओ तू ऊ मानु संगे और बच्चा थोपो हमार सिरे!

चन्दर ने जब फिर से संगीता पर आरोप लगाया तो संगीता ने चन्दर तथा सबको डराने के लिए वही अस्त्र चलाया जो उसने पिछली बार यानी आयुष के पैदा होने के समय चलाया था;

संगीता: चलो आभायें डॉक्टर लगे और हमरे संगे DNA टेस्ट करवाओ, तब सब दूध का दूध और पानी का पानी हुई जाई! एक बार डॉक्टर कही दे की ई तोहार बच्चा है तो फिर देखो हम का करित है?! न हम तोहका जेल मा चक्की पिसवाइन, तो हमार नाम संगीता नाहीं!

संगीता ने बड़े आत्मविश्वास से अपनी बात कही, इतने आत्मविश्वास से की सभी उसकी बातों पर विश्वास करें| खैर, संगीता ने जैसे ही पुलिस की धमकी दी वैसे ही चन्दर की पतलून गीली होने लगी! वहीं बड़के दादा और बड़की अम्मा की आँखें फटी की फटी रह गईं की उनकी सीधी-साधी बहु आज उन्हें कचेहरी की धमकी दे रही है?!
बड़के दादा: बड़का? तू आपन मरद पर केस करिहो? हम सबका कचेहरी ले जाबो?

बड़के दादा ने संगीता को घूर कर देखते हुए कहा|

संगीता: काहे? जब आप बिना किसी की बात सुने सीधा पुलिस भेज दिहो रहा तो हम आपन जान बचाये खतिर, आपन इज्जत बचाये खातिर ई पर केस नाहीं करि सकित है?!

संगीता ने आज पहलीबार अपने ससुर को सीधे मुँह जवाब दिया था| सबको लगा था की संगीता डर जाएगी मगर संगीता के ये तेवर देख सब हैरान थे| उधर, बड़के दादा संगीता के ये तेवर देख कुछ कहते उसके पहले ही मामा जी बेच में बोल पड़े;

मामा जी: शहर जाए का सब लाज-सरम बेच खायो है का, जो आपन ससुर से कौन मेर के बात की जात है ऊ तक भुलाये गया? हम सब हियाँ आराम से बात किये खतिर इकठ्ठा भवे रहे की तोहार पेट मा जउन बच्चा है ऊ किसका है और तू आपन ससुर पर ही केस करे खतिर तैयार हो? ई दिखावत है की तोहार मन कितना काला है, ई जर्रूर तोहार और मानु का नाजायज बच्चा है!

संगीता इस समय तक गुस्से से भर चुकी थी, जैसे ही मामा जी ने हमारे बच्चे को सबके सामने नाजायज कहा उन्होंने अनजाने में ही संगीता के क्रोध को दावी दे दी! अब तो संगीता ने गुस्से से फट ही जाना था;

संगीता: तू हमका लाज-सरम सिखैहो?...तू? जे आपन बेटा सामान भाँजा का बिगाडिस...ओहका गलत आदत डाली के ओकरी ज़िन्दगी बर्बाद करिस! .कही दो की ई तोहार घरे आई के तोहार घर के बगल वाली रंडी का पास नाहीं जावत है?! कही दो की तू आपन भाँजा का शराब, चरस, गाँजा पिए का नाहीं सिखायो?!

बड़के दादा ये तो जानते थे की मामा जी ने बचपन से ही चन्दर को लाड-प्यार कर बिगाड़ा है मगर वो ये नहीं जानते थे की चन्दर की सारी बुरी आदतों का स्त्रोत्र मामा जी ही हैं| लेकिन आज जब उन्हें सच पता चला तो उनकी आँखें फटी की फटी रह गईं!

वहीं दूसरी तरफ संगीता ने जैसे ही पलट कर मामा जी पर आरोप लगाया वो गुस्से से तिलमिला गए;

मामा जी: आपन गलती माने का बजाए तू हमरे ऊपर कीचड़ उछलत हो?!...अरे तू तो हो ही....

मामा जी ने खुद को बचाने के लिए संगीता के चरित्र पर ही कीचड़ उछालना चाहा मगर संगीता ने उन्हें कोई मौका नहीं दिया;

संगीता: हम झूठ कहित है? का अम्मा....कही दो की हम झूठ कहित है?! तुहुँ ऊ दिन हमका बताये रहयो न की तोहार 'सपूत' आपन मामा के घरे जाए का-का गुल खिलावत है?

जब संगीता ने बड़की अम्मा का नाम लिया तो बड़की अम्मा का सर शर्म से झुक गया| अपनी पत्नी का शर्म से झुका हुआ सर देख बड़के दादा को बहुत बड़ा धक्का लगा और वो अपना सर पकड़ कर चारपाई पर बैठ गए! वहीं मामा जी ने जब अपनी बहन का झुका हुआ सर देखा तो वो खामोश हो गए! उधर चन्दर एकदम से खामोश हो गया था क्योंकि अब बलि का बकरा उसके मामा जी बने थे! अब अगर वो अपने मामा जी का पक्ष लेता तो बड़के दादा उसी पर बरस पड़ते|

सबको खमोश देख संगीता को मौका मिल गया की वो सभी को भावुक कर इस बात को हमेशा-हमेशा के लिए दबा दे! "आप खुद ही सोचिये की आप किसकी बात पर भरोसा करेंगे, अपनी बहु की बात पर जो डॉक्टर के पास जा कर DNA टेस्ट करवाने को तैयार है या फिर अपने बेटे की जो की नशे और गंदी आदतों का इतना आदि है की उसे होश-खबर ही नहीं रहती की वो क्या कर रहा है?" संगीता ने बड़ी ही होशियारी से डॉक्टरी टेस्ट (DNA Test) की माँग की थी क्योंकि वो जानती थी की परिवार की इज्जत बचाने के लिए कोई भी DNA test के लिए कभी राज़ी नहीं होगा| वहीं चन्दर का चरित्र पहले से ही इतना खराब था की अब उस पर कोई विश्वास करने वाला था नहीं|

खैर, संगीता के पूछे सवाल पर किसी के मुख से कोई बोल न फूटे इसलिए सभी को भावुक करने के लिए संगीता ने अपनी बात आगे बढ़ाई; "जिस लड़के पर (मुझ पर) आप सभी इतने गंदे आरोप लगा रहे हो उसका चरित्र कैसा है ये आप सभी बहुत अच्छे से जानते हो| बचपन से ही चंचल मन था मगर सिवाए प्यार पाने के उसके मन में कभी किसी के लिए कुछ बुरा नहीं था| मेरे साथ हमेशा दोस्तों जैसा रिश्ता निभाया, मैं रोई तो अपने बालपन से मुझे हँसाया, बुलाया, चुप कराया| मैं बीमार हुई तो एक दोस्त की तरह मेरी तीमारदारी की! लेकिन आप सबने इस झूठे आदमी (मामा जी) के बहकावे में आ कर अपने मासूम मुन्ना पर ही कीचड़ उछाल दिया?!

भूल गए आप सब रसिका को, उस पर जब हवस सवार हुई तो कैसे वो हाथ धो कर पीछे पड़ी थी और कैसे खुद को बचाने के लिए खुद को कष्ट दे कर (वो) अपनी जाना बचा रहे थे| अगर आपके बेटे जैसे होते तो कब का रसिका के साथ सब कुछ कर लिया होता और किसी को पता भी नहीं चलता! लेकिन नहीं, उन्होंने सिर्फ आप सबका प्यार चाहा इससे ज्यादा उन्होंने कभी आपसे कुछ माँगा ही नहीं|

अम्मा, आप के लिए तो वो बेटे जैसे हैं...आपकी गोदी में खेले हैं...क्या आपको अपने बेटे के चरित्र पर शक है? चलो मेरी न सही, मैं तो आई ही दूसरे घर से हूँ, लेकिन बप्पा क्या आपको अपने खून...अपने सगे भाई के खून पर भी भरोसा नहीं?! क्या सोचेंगे चाचा (मेरे पिताजी) जब उन्हें पता चलेगा की आप सबने उनके इकलौते बेटे पर इतने घिनोने इल्जाम लगाए हैं?!" संगीता की बातों से प्रभावित हो बड़की अम्मा रो पड़ीं और संगीता उन्हें सँभालने के लिए आगे आई| संगीता के गले लग कर बड़की अम्मा ने रोते हुए माफ़ी माँगी की चन्दर की बातों में आ कर उन्होंने उसके चरित्र पर शक किया|

वहीं बड़के दादा माफ़ी माँगने से रहे क्योंकि वो अपनी बहु के आगे कैसे झुकते इसलिए उन्होंने अपना गुस्सा सीधा अपने साले पर निकाला; "मरी कटऔ!!! निकर जाओ हमार घरे से और आज का बाद अगर हियाँ कभौं पैर धरेऊ तो तोहार टुकड़े-टुकड़े कर सरजू जी मा बहा देब! और तू चन्दर, कल का कल तू नशा मुक्ति केंद्र मा भर्ती हुईहो और आपन ई नशे की लत से पीछा छुड़ाओ नाहीं तो तोहका हमार जमीन-जायदाद मा एको हिस्सा न मिली! और खबरदार जो कभौं आपन मामा के हियाँ गया तो वरना हमार-तोहार रिस्ता खत्म!" बड़के दादा उम्र में बड़े थे और उनका गुस्सा बहुत तेज़ था इसीलिए उनका गुस्सा देख मामा जी अपना मुँह छुपा कर निकल गए, वहीं चन्दर डर के मारे घर में घुस गया|

"अम्मा, आपके मुन्ना की तबियत खराब है वो अभी अस्पताल में हैं|" संगीता ने जब सबको ये बात बताई तो बड़की अम्मा के प्राण सूखने लगे| "वहाँ बस चाचा-चाची हैं और वो अकेले सब नहीं सँभाल सकते इसलिए मुझे जाना होगा|" संगीता ने जब अम्मा को ये बात बताई तो अम्मा ने सर हाँ में हिला कर संगीता को जाने की अनुमति दे दी|

संगीता अपने पिताजी के साथ उसी वक़्त बस अड्डे के लिए निकल पड़ी और रास्ते में उसे पता चला की मैं सबकी चोरी गॉंव आया था तथा कैसे मैंने सबका सामना अकेले किया था|

दिल्ली पहुँचने तक संगीता की जान उसके हलक़ में अटकी हुई थी की पता नहीं मेरा क्या हाल हुआ होगा! दिल्ली पहुँचते-पहुँचते संगीता ने अपने पिताजी को समझा दिया था की वो गॉंव में हुए इस छीछालेदर के बारे में मेरे माँ-पिताजी को न बताएं क्योंकि ये सच जानकार उनका दिल दुखता और गुस्से में माँ घर सर पर उठा लेतीं|

खैर, जब संगीता ने मुझे अस्पताल में लेटा पाया तो उसकी हिम्मत टूट गई, वो तो माँ-पिताजी की मौजूदगी थी इसलिए वो अपना रोना रोके हुए थी| माँ-पिताजी ने उसे सब बात बताई तो संगीता समझ गई की उसके मेरे जीवन से चले जाने का मुझे इतना बड़ा धक्का लगा की मेरी ये हालत हुई|

वहीं, आयुष ने जब अपनी मम्मी को देखा तो वो अपनी मम्मी की गोदी में चढ़ कर रो पड़ा; "मम्मी...चाचू को क्या हुआ?" आयुष के पूछे सवाल का संगीता क्या जवाब देती?! एक माँ का फ़र्ज़ निभाते हुए संगीता ने आयुष को उम्मीद देते हुए चुप कराने लगी| लेकिन तभी नेहा अपने मम्मी पर गुस्से से बरस पड़ी; "सब मम्मी की वजह से हुआ है आयुष!" नेहा ने गुस्से में आ कर अपनी मम्मी पर आरोप तो लगा दिया मगर वो सच कह न पाई|

नेहा को सबके सामने बदतमीजी करते देख पिताजी ने आज पहलीबार नेहा को डाँटा| अपने दादा जी का मान रखते हुए नेहा खामोश हो गई और सर झुकाये सिसकने लगी| माँ ने नेहा को चुप कराने के लिए उसे अपने गले लगा लिया और उसे प्यार से समझाने लगीं|

वहीं संगीता के पिताजी जानते थे की मैं दोनों बच्चों से कितना प्यार करता हूँ इसलिए उन्होंने नेहा की बात का ये मतलब निकाला की संगीता के कारण मेरे और चन्दर के बीच मार-पीट हुई तथा जिसके फल स्वरूप बच्चे मुझसे दूर हो रहे थे| मेरे लिए अपने बच्चों की जुदाई बर्दाश्त करना मुश्किल था इसीलिए मैंने खाना-पीना तथा दवाई लेना छोड़ दिया और अपनी ये हालत बना ली!

संगीता के पिताजी को मेरी ये हालत देख कर बहुत दुःख हुआ| उनके अनुसार संगीता को मुझे बच्चों से अधिक मोह बढ़ाने नहीं देना चाहिए था| अपनी बेटी के सर सारा दोष मढ़ते हुए उन्होंने संगीता को बहुत डाँटा| अपने इसी क्रोध में बहते हुए उन्होंने गॉंव में मेरा उनसे मिलना तथा मेरे द्वारा की गई उनकी मदद के बारे में बता दिया!

मेरे माँ-पिताजी को मेरे बिना बताये गॉंव जाने का सुन कर धक्का लगा था लेकिन सबसे बड़ा धक्का संगीता को ये जानकार लगा की उसकी जानकार के बिना मैं उसके पिताजी की कितनी बड़ी मदद की थी!

सबके सामने संगीता बड़ी मुश्किल से खुद को सहेज कर रखे हुए थे, जबकि उसका मन मेरे कोमा में पड़े शरीर से लिपट कर रोने का था इसलिए उसने सभी को घर भेज दिया और खुद अस्पताल में मेरे पास अकेली रुक गई| सबके जाने के बाद संगीता मुझसे लिपट कर बहुत रोई, उसने मुझसे बहुत माफियाँ माँगी मगर उसकी ये गुहार सुनने वाला मैं मूर्छित पड़ा था|

'मेरे सीने कि आग या तो मुझे जिंदा कर सकती थी या मुझे मार सकती थी.
पर साला अब उठे कौन? कौन फिर से मेहनत करे दिल लगाने को.. दिल तुडवाने को..'
रंझाना फिल्म का ये डायलाग इस परिस्थति में सही उतरता था|

अगले दिन संगीता की माँ और अनिल अस्पताल पहुँचे और उन्हें जब ये सब सच पता चला तो उन्होंने भी संगीता को ही दोषी बना दिया तथा उससे मुँह मोड़ लिया| अनिल ने नेहा को बहलाते हुए सच पुछा तो नेहा ने उसे बता दिया की संगीता जाने से पहले मुझसे बहुत उखड़ी हुई थी और ज़रा भी बात नहीं करती थी| ये भी एक कारण था मेरे बीमार होने का| ये बात जानकार अनिल को और गुस्सा आया और उसने अपनी दीदी को अपने ऑपरेशन के बारे में बताया| ये सच जानकार संगीता को एक बार फिर धक्का लगा और वो रात में मुझसे लिपट कर फिर रोने लगी|

2 दिन बाद बड़की अम्मा मेरा हाल-खबर लेने दिल्ली आईं, जब उन्होंने मेरी हालत देखि तो वो ग्लानि के कारण खूब रोईं| उसके बाद जो कुछ हुआ आप सभी ने पढ़ा है इसलिए दुबारा वो सब नहीं दोहराना चाहूँगा| संगीता ने होशियारी दिखाते हुए बड़की अम्मा को गॉंव में हुई छीछालेदर के बारे में बोलने से रोक लिया|

जब मुझे होश आया तो बिना आँखें खोले ही मैंने संगीता की मौजूदगी को महसूस कर लिया| मैंने महसूस किया की मेरी ये हालत देख कर संगीता पर क्या बीती होगी| संगीता की गर्भावस्था में जब मुझे उसे खुशियाँ देनी चाहिए थीं मैं उसे दुःख दे रहा था! ये सब सोच कर ही मैं "सॉरी" शब्द बुदबुदाने लगा|

खैर, घर पहुँचने तक मुझे और संगीता को बात करने का ज़रा भी मौका नहीं मिला| माँ, पिताजी, बड़की अम्मा, संगीता के माँ-पिताजी, अनिल, आयुष और नेहा सभी मुझसे बात कर रहे थे, मुझे फिर कभी कोई लापरवाही करने के लिए अभी से थोड़ा-बहुत डाँट रहे थे|

जब मैं घर पहुँचा तो दोपहर को खाना खाते समय मुझे संगीता के साथ बात करने का थोड़ा समय मिल गया| मुझे आज भी अपने कहे वो शब्द याद हैं; "आखिर मेरा प्यार तुम्हें मेरे पास पुनः खींच ही लाया न?" मैंने संगीता को छेड़ते हुए कहा| मेरी बात सुन संगीता के चेहरे पर मुस्कान छा गई और उसने बड़े अदब से अपनी नजरें झुका ली| मौका अच्छा था तो मैंने एक बार फिर संगीता के सामने शादी का प्रस्ताव रख दिया; "अब तो तुम्हें मेरे साथ निकाह करना कबूल है न?" मैंने बात को थोड़ा हलके रूप में कहा ताकि संगीता मेरी बात से आहात हो कर फिर से गुमसुम न हो जाए|

"पहले आप ठीक हो जाओ!" संगीता ने नई-नवेली दुल्हन की तरह लजाते हुए अपनी नजरें झुकाये हुए कहा| संगीता के इस तरह बात करने का मैं हमेशा से कायल रहा हूँ इसलिए जब उसने आज मुझसे इस तरह बात की तो मेरा सारा शरीर ख़ुशी से झनझना गया!

"अगर पता होता की मेरे बीमार पड़ने से तुम शादी के लिए मान जाओगी तो मैं पहले ही बीमार पड़ जाता!" मैंने मज़ाक करते हुए कहा मगर संगीता को मेरी बात पर प्यारभरा गुस्सा आ गया!

"खबरदार जो ऐसा फिर कभी किया तो!!" संगीता ने मुझे आपने प्यारे से गुस्से से चेता दिया| संगीता को खुश करने के लिए मैंने फ़ौरन छोटे बच्चे की तरह अपने दोनों कान पकड़ कर उससे माफ़ी माँग ली, जिसपर संगीता खिलखिला कर हँस पड़ी! सच, एक आरसे बाद मैंने संगीता को यूँ मुस्कुराते हुए देखा था|

मुझे विश्वास हो चूका था की संगीता को मेरे प्यार पर पूरा विश्वास हो चूका है, अब तो मुझे और भी जल्दी से ठीक होना था ताकि हमारी जल्दी से शादी हो सके!

मेरे किये इस काण्ड की वजह से सब संगीता से नाराज़ थे इसलिए मैंने सबसे माफ़ी माँग, सभी के मन में संगीता के लिए प्यार पुनः जीवित किया| दो दिन बाद बड़की अम्मा ने गॉंव जाने की बात कही, वो अपने साथ संगीता को भी ले जाना चाहती थीं मगर संगीता ने मेरे सामने ही उनसे कहा; "अम्मा, अभी इनकी तबियत थोड़ी सुधर जाए तब..." संगीता ने जानबूझकर अपनी बात अधूरी छोड़ दी| अम्मा मेरे सामने संगीता को मना नहीं कर पाईं और मुस्कुराते हुए संगीता को यहाँ रहने की अनुमति दे दी|

मेरे तंदुरुस्त होते-होते घर में छोटे-मोटे काण्ड होते रहे जैसे की करुणा का मेरी ज़िन्दगी में पुनः आना तथा मेरे पिताजी का नेहा और आयुष को अप्रत्यक्ष रूप से ये बात समझाना की उन्हें मेरे साथ अधिक घुलना-मिलना नहीं चाहिए क्योंकि परीक्षाओं के बाद दोनों बच्चों ने गॉंव चले जाना है|

करुणा के मेरी ज़िन्दगी में पुनः आने से संगीता को जो मिर्ची लगी उसके बारे में आप पढ़ ही चुके हैं|

परन्तु जब पिताजी ने बच्चों को मुझसे अधिक घुलने-मिलने से रोकना चाहा तो दोनों बच्चे इससे बहुत आहात हुए| आयुष अपने दादा जी के गुस्सा होने से डरता था इसलिए वो बेचारा तो अपने दादा जी की बात मानते हुए मुझसे धीरे-धीरे दूर होने लगा मगर नेहा को ये बात आघात कर गई थी! कुछ दिन पहले पिताजी ने अस्पताल में नेहा को डाँट दिया था इसलिए नेहा में इतनी हिम्मत नहीं थी की वो अपने दादा जी को कह सके की वो मेरे पास ही रहेगी| अपने मन को मारते हुए नेहा ने मुझसे धीरे-धीरे दूरी बनाने की कोशिश की मगर उसका नाज़ुक मन उसे मुझसे दूर नहीं रहने देता था| आपने पढ़ा ही कैसे रात को मेरे बिना सोने के समय नेहा डर के उठने लगी|

एक रात मैंने नेहा को अकेले रोते हुए देख लिया और उसे गोदी ले कर सारी बात पूछी| जब मुझे पिताजी द्वारा कही बता का पता लगा तो मैंने नेहा को प्यार से समझाया; "बेटा, हम बाप-बेटी कभी दूर नहीं होंगें| मैंने आपकी मम्मी को शादी करने के लिए मना लिया है, जैसे ही मैं तंदुरुस्त हूँगा मैं आपके दादा जी और नाना जी से शादी की बात करूँगा और फिर हम सब एक साथ हँसी-ख़ुशी रहेंगे|" मेरी बात सुन नेहा को इतनी ख़ुशी हुई की वो कस कर मेरे सीने से लिपट गई| उस दिन से मैंने आयुष और नेहा को खुद से दूर नहीं जाने दिया, माँ-पिताजी के सामने ही मैं दोनों को खूब लाड-प्यार करता| माँ-पिताजी मेरी तबियत का ध्यान रखते हुए कुछ कह नहीं पाते थे जिसका मैं भरपूर फायदा उठा रहा था|

ऐसे ही एक दिन नेहा स्कूल से आई और "आई लव यू पापा जी!" चिलाते हुए ख़ुशी से मेरी गोदी में आने को छलाँग लगाई| तब नेहा को नहीं पता था की उसके दादा-दादी जी घर पर हैं|

उस समय माँ-पिताजी अपने कमरे में से निकल रहे थे जब उन्होंने नेहा की ख़ुशी से चिल्लाने की आवाज़ सुनी| नेहा का मुझे 'पापा जी' कहना माँ-पिताजी को बहुत अजीब लगा! "नेहा बेटा, ऐसा नहीं कहते! मानु तुम्हारा चाचा है, तुम्हारा पापा चन्दर है|" कहीं मुझे बुरा न लगे इसलिए पिताजी ने बड़ी नरमी से नेहा को समझाया| लेकिन उनका नेहा को चन्दर की बेटी कहना मुझे चुभ गया था! जितना दर्द मुझे इस समय हो रहा था, उतना ही दर्द मेरी बिटिया भी महसूस कर रही थी| नजाने उस समय नेहा को क्या सूझी की वो बड़े प्यार से अपने दादा जी से बोली; "दादा जी, मेरे असली पापा ने तो कभी मुझे प्यार किया ही नहीं?! मैं इतनी बड़ी हो गई मगर आजतक उन्होंने मुझे कभी गोदी नहीं लिया, कभी मुझे अपने हाथ से खाना नहीं खिलाया, कभी मुझे ज़रा सा भी लाड-प्यार नहीं किया| मुझे आजतक जो भी प्यार मिला वो मेरे चाचू ने दिया इसलिए मैं तो उन्हें ही अपना पापा जी मानती हूँ| मेरे लिए ये ही मेरे पापा जी है और हमेशा मेरे पापा जी ही रहेंगे|" नेहा की कही बात माँ-पिताजी को छु गई और उनकी आँखें नम हो गईं! माँ ने नेहा को अपने पास बुलाया और उसके दोनों गलों को चूमते हुए बोलीं; "बेटा, मैं समझ सकती हूँ की तुझे तेरे असली बाप से कभी प्यार नहीं मिला, लेकिन बेटा अगर तू सबके सामने अगर मानु को पापा जी कहेगी तो लोग क्या कहेंगे? सबको तो नहीं पता न की तुझे चन्दर प्यार नहीं करता?!" माँ की समझाई बात नेहा को समझ आ गई और उसने फौरन एक बीच का रास्ता खोज निकाला; "आप ठीक कह रहे हो दादी जी, मैं पापा जी को सबके सामने नहीं लेकिन अकेले में तो पापा जी कह सकती हूँ न?" अपनी पोती की चतुराई भरी बातें सुन माँ-पिताजी मुस्कुराने लगे और नेहा को मुझे घर के भीतर पापा जी कहने की इज्जाजत दे दी|

इस छोटी सी आज़ादी को पा कर नेहा इतनी खुश हुई की उसका चेहरा ख़ुशी से जगमगाने लगा|

कुछ दिन बीते थे, आयुष मुझे अपने स्कूल के किस्से सुना रहा था और मैं बड़े गौर से उसकी बात सुन रहा था| हम बाप-बेटे को यूँ बातें करते देख, नेहा के बालमन में एक आस जगी की क्यों न आयुष भी मुझे नेहा की ही तरह 'पापा जी' कहे| अगर ऐसा होता तो फिर दोनों भाई-बहन मुझे 'पापा जी' कहते और नेहा को इसमें बहुत मज़ा आता|

नेहा: आयुष, मेरी एक बात मानेगा?

नेहा ने बड़े प्यार से हम बाप-बेटे की बात को काटते हुए कहा| अपनी दीदी की प्यारी सी अर्ज़ी सुन आयुष फ़ट से बोला;

आयुष: हाँजी दीदी!

नेहा: तू आज से मेरे पापा जी को चाचू नहीं, पापा जी बोलेगा|

अपनी दीदी की बात सुन आयुष एकदम से शर्मा गया और सर झुका कर बैठ गया| आयुष के चेहरे पर आई उस बाल मुस्कान को देख मेरा मन बोला की आयुष भी मुझे अपना पापा जी मानता है मगर वो ये शब्द कहने से शर्माता है...डरता है की कहीं उसे कोई डाँट न दे|

खैर, मैं नहीं चाहता था की आयुष किसी के दबाव में आ कर मुझे पापा जी कहे इसलिए मैं बीच में बोल पड़ा;

मैं: कोई बात नहीं बेटा, आप मुझे चाचू ही कहो| रिश्ते को बस नाम देने से कुछ नहीं होता, जब तक की आप उस रिश्ते को दिल से ना अपनाओ|

मेरी बात सुन आयुष मेरे सीने से लग गया और ख़ुशी से खिलखिलाने लगा| उस पल नेहा को ये बात समझ आ गई थी की मुझे सिर्फ उसी के मुख से पापा जी सुनना अच्छा लगता है| नेहा भी मेरे सीने से लिपट गई और ख़ुशी से आयुष के साथ खिलखिलाने लगी|

दिन प्यारभरे बीत रहे थे, आयुष का जन्मदिन आया जो की मैंने इतनी हर्ष और उल्लास से मनाया की वो दिन हमेशा-हमेशा के लिए एक सुनहरी याद बन कर मेरे मन में बस गया| आयुष के जन्मदिन के बाद कुछ ऐसी घटनाएं घटी जिनकी मैंने उम्मीद नहीं की थी|

आयुष की जन्मदिन की पार्टी के बाद मेरा मन रोमांस करने का था जबकि संगीता थोड़ी चिढ़ी हुई थी| उस वक़्त क्या हुआ वो आप सबने पढ़ ही लिया था| रोमांस को ले कर मैं संगीता से नाराज़ था इसलिए उसके मुझे रिझाने के सारे जतन मैं एक के बाद एक फ़ैल विफल किये जा रहा था| उसी बीच मुझे नेहा के असली डर का पता लगा| नेहा के साथ स्कूल में हो रही bullying के बारे में जानकार मेरा खून खौल गया|

जब हम नेहा की counselling करवा कर घर लौटे तो नेहा ने स्कूल में अपने दोस्त न होने का दो कारण बताये:
पहला, चूँकि नेहा गॉंव से आई थी तो उसके बोलने के लहजे में, पहनावे-ओढावे में थोड़ा बहुत देहाती ढंग अभी भी था| ये देहाती ढंग हमारे घर में इतना उभर कर नहीं आता था क्योंकि घर में नेहा को किसी से बात करने में भय नहीं लगता था| लेकिन जब नेहा-आयुष गली के बच्चों के साथ खेलने जाते तो खेल-खेल में कभी-कभी नेहा की बातों में ये देहाती ढंग नज़र आता था| जब गली के बच्चों ने नेहा के इस देहाती ढंग का मज़ाक उड़ाया तो नेहा ने डर के मारे बहार खेलने जाना ही बंद कर दिया| गली में न खेल कर तो नेहा खुद को दूसरे बच्चों के सामने शर्मिंदा होने से बचा लेती थी मगर जब वो स्कूल गई तो गली के कुछ बच्चे उसके स्कूल में भी थे, जिन्होंने स्कूल में भी नेहा का मज़ाक उड़ाना शुरू कर दिया|

दूसरा कारण था मेरा और संगीता का रिश्ता| चन्दर के घर से जाने के बाद भी संगीता हमारे घर रह रही थी और आस-पड़ोस में इस बात को ले कर खुसर-फुसर हो रही थी| हालांकि मैं और संगीता सबके सामने उपयुक्त दूरी बनाये रखते थे ताकि किसी को हमारे रिश्ते पर शक न हो लेकिन फिर भी पड़ोसियों ने एक शादीशुदा औरत का मुझ जैसे कुंवारे लड़के के घर रहने को ले कर तरह-तरह की बातें बनाना शुरू कर दिया था| अब बच्चे तो वही सीखेंगे जो वो अपने घर में देखेंगे-सुनेंगे, जब गली के बच्चों को इसका पता चला तो उन्होंने मेरे और संगीता के रिश्ते को ले कर नेहा को ताने मारने शुरू कर दिए| ये वो एक सवाल था जो संगीता ने मुझसे उस दिन छत पर पुछा था जब मैंने पहलीबार शादी का प्रस्ताव रखा था की क्या होगा अगर हमारी शादी हो गई तो हमारे रिश्ते को लेकर आस-पड़ोस वाले हमारे बच्चों को क्या कहेंगे?!

ये सब सच जानकार मेरा खून खौल गया और मैं अक्षय यादव को सबक सिखाने के इरादे स्कूल पहुँचा| मन तो मेरा अक्षय को थप्पड़ मारने का था परन्तु इससे सब नेहा से डरने लगते न की उससे दोस्ती करते! अपने दिमाग का इस्तेमाल कर मैंने स्थिति को कैसे सँभाला ये आपने पढ़ा ही था|

वहीं जब ये बात पिताजी को पता चली तो उन्होंने क्या किया वो आप सभी ने पढ़ा था| पिताजी का ये गुस्सा देख संगीता मन ही मन ये सोच रही थी की क्या होता अगर माँ-पिताजी को गॉंव में मची छीछालेदर के बारे में पता चलता?!

बहरहाल, आयुष के जन्मदिन वाले रात संगीता के गुस्से ने मेरे रोमांस के कीड़ों पर फ्लिंट केमिकल उड़ेल कर मेरे रोमांस के सारे कीड़े मार दिए थे| अब संगीता को मुझे मनाना था इसलिए वो तरह-तरह की जुगत करती रहती थी| वहीं संगीता की सारी जुगत विफल करने के लिए मैंने साइट पर देर रात तक काम खींचना शुरू कर दिया था| एक रात जब मैं देर रात साइट से लौटा तो दरवाजा संगीता ने खोला| अपनी चतुराई से संगीता ने सभी को खाना खिला कर जल्दी सुला दिया था| जब मैं घर आया तो मुझे खाना खिला संगीता ने मुझ पर चाँस मारा|

उस दिन मुझे संगीता पर गुस्सा आया और हमारे बीच जो तू-तू मैं-मैं हुई उसे मैंने आप सभी से साझा किया था| गुस्से में आ कर मैंने जो संगीता को मेरे और करुणा के बारे में बताया था, वो सब संगीता ने अगले दिन मेरी माँ को बता दिया और फिर जो कोहराम हुआ उसे आप सबने पढ़ा ही है|

[color=rgb(51,]संगीता के पिताजी की मृत्यु[/color]

संगीता के पिताजी की मृत्यु मेरे जीवन में दूसरा बहुत बड़ा मोड़ था, ऐसा मोड़ जिसने मुझे पूरी तरह से बदल दिया| जहाँ मेरे भीतर हिंसा और क्रोध ने जन्म लिया, वहीं मेरा परिवार अचानक से टूट गया!

जिस वक़्त मैं कोमा में था, उस वक़्त बड़के दादा ने जबरदस्ती चन्दर को नशा मुक्ति केंद्र में दुबारा भर्ती करवाया| परन्तु नशे का आदि चन्दर वहाँ कुछ ही दिन टिका और फिर वहाँ से भाग कर अपने मामा जी के यहाँ दुबक गया! चन्दर के नशा मुक्ति केंद्र से भागने की बात बड़के दादा को कुछ दिन बाद पता चली| नतीजन बड़के दादा ने गुस्से में आ कर चन्दर से अपने तालुक़्क़ात ही तोड़ लिए! हालांकि ये गुस्सा बस कुछ ही समय के लिए था! यही कारण था की बड़के दादा ने अपनी बहु संगीता को गॉंव वापस नहीं बुलाया था|

जब संगीता के पिताजी की मृत्यु हुई तब उनकी आखरी इच्छा का मान रखते हुए मैं और संगीता गॉंव पहुँचे| संगीता के पिताजी के अपने बेटों के द्वारा नहीं बल्कि मेरे द्वारा मुखाग्नि दी जानी है ये बात पूरे गॉंव में आग की तरह फ़ैल गई थी| इसी बात के साथ एक अफवाह और उड़ाई जा चुकी थी की संगीता के पिताजी ने अपना घर तथा ज़मीन मेरे नाम कर दी है!

जब ये बात संगीता के दोनों जीजाओं को पता लगी तो उन्होंने पहले तो इसका विरोध किया परन्तु जब उनके विरोध को अनिल और भाईसाहब ने मिलकर दबा दिया तो सब खामोश हो गए| संगीता के दोनों जीजा अकेले पड़ गए थे, ऐसे में उन्हें मिला चन्दर! चन्दर की मेरी वजह से पहले ही किलसति थी इसलिए उसने अपने दोनों सालों के साथ मिल कर मेरे ही खिलाफ एक क्षद्यंत्र रच डाला| तीनों जीजा-साले ने मिलकर 15,000/- रुपये इकठ्ठा किये और मेरे ही नाम की सुपारी दे डाली!

[color=rgb(255,]अपनी आत्मरक्षा में मैंने जिस व्यक्ति को मारा वो चन्दर नहीं, बल्कि एक गुंडा था जिसे चन्दर और संगीता के दोनों जीजाओं ने मेरे नाम की सुपारी दी थी![/color]

मैंने अपनी कहानी में चन्दर को मारने की बात इसलिए लिखी थी क्योंकि मैं आज भी यही चाहता हूँ की काश उस दिन मेरे हाथों चन्दर का खून हुआ होता! काश वो हरामजादा मर गया होता तो आज मैं और संगीता सुखी-सुखी जीवन जी रहे होते!

खैर, जब इस हत्यकांड की तफ्तीश शुरू हुई तो भाईसाहब के साले साहब यानी SP साहब को चन्दर और बाकी दोनों जीजाओं का नाम पता चला| अगर ये बात खुल जाती तो तीनों के खिलाफ केस दर्ज होता और करवाई होती जिससे भाईसाहब की तीनों बहनों के ससुराल में हाहाकार मच जाता| एक भाई हमेशा अपनी बहन का घर बचाता है, यही कारण था की भाईसाहब ने ये केस उसी वक़्त दबा दिया!

"मानु, मुझे माफ़ करना लेकिन अगर ये बात खुली तो मेरी तीनों बहनों के घर उजड़ जायेंगे!" भाईसाहब ने उस दिन मुझसे हाथ जोड़कर माफ़ी माँगते हुए यही शब्द कहे थे| एक भाई की विनती के आगे मैं कुछ कह नहीं सकता था इसलिए मैंने चुप्पी साध ली और आजतक ये बात न अपनी माँ और न ही संगीता को बताई!

खैर, इस हत्याकांड की खबर पूरे गॉंव में फ़ैल चुकी थी, गॉंव देहात में ऐसी खबरें मिर्च-मसाला लगा कर फैलती हैं|

जब संगीता के पिताजी की मृत्यु हुई और खासकर मेरा इंतज़ार किया जा रहा था तो बड़के दादा को ये सब बहुत चुभा| शोक प्रकट करने आये सभी लोगों ने बड़के दादा को बहुत भड़काया की उनके बेटे चन्दर की बजाए मेरा यानी बड़के दादा के सबसे छोटे भाई के बेटे का इंतज़ार किया जा रहा था! नतीजन बड़के दादा मेरे पहुँचने से पहले ही अपना गुस्सा दिखाते हुए वापस घर चले गए|

जब मेरे हाथों हत्या होने की खबर बड़के दादा को मिली तो उन्हें अपने छोटे भाई को नीचे दिखाते हुए पुनः रिश्ता जोड़ने का बहाना मिल गया| दरअसल, बड़के दादा को अपने से छोटों से माफ़ी माँगने से चिढ थी, उनका मानना था की जो छोटे होते हैं उनसे क्या माफ़ी माँगना! आपने पढ़ा होगा की जब पिताजी मेरी माँ को ब्याह घर ले गए थे तब बड़के दादा ने उनका कितना तिरस्कार किया, फिर बाद में जब उन्हें मेरे पिताजी की जर्रूरत पड़ी तो उन्हें बुलाने के लिए बिना कोई माफ़ी माँगें चिठ्ठी लिख दी! यही नहीं, जब आयुष पैदा होने वाला था और बड़के दादा को लड़के की आस थी तब मैंने उनके इस लड़का-लड़की के भेदभाव करने को लेकर उनसे बहस की थी तब भी बड़के दादा ने मुझसे माफ़ी माँगने के बजाए बात ही खत्म कर दी थी| ये घटनायें वो सबूत हैं जो दर्शाती हैं की बड़के दादा के लिए उनका अभिमान सबसे ऊपर था|

" किसी ने सही कहा है, जैसा बाप वैसा बेटा! जब तू गुंडा बन कर शहर में ठेकेदारी करता था तो तेरा बेटा तो तुझसे चार कदम आगे ही निकला! पहले तेरे लड़के ने अपने चचेरे बड़े भाई चन्दर को पीटा और आज एक अनजान आदमी को मौत के घाट उतार दिया!" कुछ ऐसे ही जहरीले शब्द कह कर बड़के दादा ने मेरे पिताजी के मन में मेरे खिलाफ नफरत का बीज बो दिया था| मेरे हाथों खून हुआ इस बात ने मेरे पिताजी को झकझोड़ कर रख दिया था! जहाँ एक तरफ मेरी माँ अपने बेटे के स्वस्थ को ले कर चिंतित थीं, वहीं मेरे पिताजी ये सोच कर चिंता कर रहे थे की वो दुनिया को क्या जवाब देंगे? अपने बेटे से ज्यादा मेरे पिताजी को समाज की चिंता थी की समाज उन्हें एक हत्यारे का पिता कहेगा! मन में जन्में इस एक भय ने मेरे पिताजी को मुझसे और अपनी पत्नी से दूर कर दिया!

अपने परिवार को टूटने से बचाने के लिए. मैं पिताजी को सच बताने बड़के दादा के घर पहुँचा| लेकिन बड़के दादा ने मुझे मुहारे (घर के आंगन) तक में पैर रखने नहीं दिया; "खबरदार जो एक्को कदम अगर बढ़ायो! एक हत्यारे से हम या हमार परिवार का कउनो आदमी रिस्ता न रखी!" बड़के दादा के कहे इन कड़े शब्दों ने सबके सामने मेरे माथे पर खुनी का तमगा लगा दिया था| इस समय मेरी हालत बिलकुल वैसी थी जैसी उस दिन चन्दर की हुई थी जब संगीता ने उस पर एक के बाद एक आरोप लगा दिए थे| उस समय न कोई चन्दर की बात का विश्वास करता और न ही आज कोई मेरे ऊपर विश्वास करता|

भले ही किसी को मुझ पर विश्वास न हो मगर मेरी बड़की अम्मा को मुझ पर विश्वास था| बड़की अम्मा की आँखों में वही प्यार और गर्व था जो मेरी माँ की आँखों में था| जबकि मेरे अपने पिता की आँखों में मेरे प्रति शर्म थी की उनका बेटा एक खूनी है!

मेरा परिवार टूट चूका था और मैं अब गॉंव में नहीं रहना चाहता था, वहीं मेरी माँ को मेरी जान का खतरा अब भी डरा रहा था इसलिए माँ ने दिल्ली वापस जाने की बात कही| संगीता मेरे दिल की हालत जानती थी, मेरा इस समय गॉंव से दूर रहना ही ठीक होगा इसलिए संगीता ने मुझे नहीं रोका| अभी संगीता के पिताजी की तेरहवीं बाकी थी इसलिए संगीता को अभी कुछ दिन और गॉंव में रहना था|

इधर मेरी बिटिया नेहा मेरे बिना रह नहीं सकती थी, ऊपर से जब से मेरे ऊपर जानलेवा हमला हुआ था तब से तो नेहा मुझे ले कर बहुत डर गई थी इसलिए नेहा भी मेरे और माँ के साथ दिल्ली आने की जिद्द करने लगी| जबकि आयुष अपने नाना जी की तेरहवीं के लिए गॉंव में अपनी मम्मी के पास रुक गया था|

हम यहाँ दिल्ली पहुँचे और वहाँ गॉंव में बड़के दादा ने संगीता और आयुष को घर वापस बुलाने के लिए बुलावा भेजा| चन्दर उस समय घर पर ही था और संगीता के लिए वापस न जाने का ये सबसे अच्छा बहाना था| "हम ऊ जानवर लगे (चन्दर) न जाब! जब तक ऊ आपन नशा का इलाज न करवाई, जब तक ऊ दोसर औरत लगे जाना ना छोड़ी हम वापस न जाब! पाहिले ओकरा इलाज कराओ तभाएं हम वापस आबे!" संगीता ने जानबूझ कर अपने वापस आने की ये शर्त रखी थी क्योंकि वो जानती थी की चन्दर इतनी जल्दी सुधरने वाला है नहीं और जबतक वो सुधर नहीं जाता संगीता मेरे पास आसानी से रह सकती है| वहीं बड़के दादा के प्राण बेस थे आयुष में इसलिए उनके पास अपनी बहु की शर्त मानने के अलावा कोई चारा नहीं था| उन्होंने संगीता की शर्त मान ली और एक विनती की कि संगीता कुछ दिनों के लिए आयुष को उनके पास रहने दे ताकि वो अपने पोते को लाड-प्यार कर सकें| संगीता के लिए इतना बहुत था की बड़के दादा अपने पोते के मोह में थोड़ा झुक गए हैं इसलिए उसने उनकी ख़ुशी के लिए आयुष को स्कूल खुलने तक बड़के दादा के पास भेज दिया|

मेरे पिताजी के अचानक से अपने परिवार को यूँ मझधार में छोड़ने से सारी जिम्मेदारियाँ मेरे सर पर आ चुकी थीं| मैं उस समय शारीरिक तौर पर जख्मी था, कहीं मैं बीमार न पड़ जाऊँ इसलिए मैंने धीरे-धीरे काम और घर के बीच तालमेल बनाना शुरू किया|

उधर बड़के दादा और गॉंव वालों ने मेरे पिताजी को मेरे ही खिलाफ कर दिया था| सब उन्हें डरा रहे थे की मैं अपनी माँ के साथ भी बुरा सलूक करूँगा और माँ को भी घर से निकाल दूँगा| ये बेसर-पैर की बात सोच पिताजी को माँ की चिंता होने लगी की माँ क्या करेंगी अगर मैंने उन्हें घर से निकाल दिया तो?! पिताजी ने माँ को फ़ोन कर जब ये डर दिखाया और गॉंव बुलाया तो मेरी माँ ने उन्हें खूब सुनाया और पिताजी की अक्ल ठिकाने लगा दी!

पिताजी के हमें छोड़ कर अपने भाई-भाभी के पास रहने से माँ थोड़ी अकेली पड़ गई थीं क्योंकि उनका जीवनसाथी जो छूट गया था! इस दुःख को संगीता...एक औरत होते हुए अच्छे से महसूस कर सकती थी इसलिए वो अपने पिताजी की तेरहवीं के अगले दिन ही हमारे पास वापस दिल्ली आने की तैयारी करने लगी| जब बड़के दादा को ये खबर पता चली की संगीता वापस दिल्ली हमारे घर आ रही है तो उन्होंने संगीता को दिल्ली न जाने की चेतावनी दे डाली| "हमार पोता पर ऊ मनहूस (मेरी) का साया न पड़ी!" बड़के दादा के कहे ये जहरीले शब्द सुन संगीता को बहुत दुःख हुआ, लकिन उसने दिल्ली आने की ठान ली थी इसलिए संगीता ने अपने भाईसाहब को बड़के दादा के पास मेरा पक्ष समझाने के लिए भेजा|

भाईसाहब की पहचान गॉंव के मुखिया से थी और हमारे गॉंव में जो मुखिया से रसूख रखता है उसका बड़ा मान-सम्मान होता है| भाईसाहब ने बड़के दादा को इत्मीनान से उस दिन की सारी घटना बताई| सारी सच्चाई जानकार बड़की अम्मा...एक माँ का दिल पिघल गया वहीं बड़के दादा और मेरे पिताजी को भाईसाहब की बातें सुन कर भी मुझ पर विश्वास नहीं हुआ| बड़के दादा संगीता को दिल्ली जाने देने के लिए राज़ी हो गए मगर आयुष को दिल्ली भेजने के लिए वो कतई राज़ी न थे|

संगीता जानती थी की ऐसी परिस्थिति जर्रूर पैदा होगी इसलिए उसने भाईसाहब को इसके लिए पहले से ही सीखा-पढ़ा कर भेजा था| भाईसाहब ने शहर के स्कूलों के गुणगान करना शुरू कर दिया तथा बड़के दादा को थोड़ा डराने के लिए एक झूठ भी कह दिया की छोटे बच्चे का बार-बार स्कूल बदलने से बच्चे का पढ़ाई में मन नहीं लगता! अब बड़के दादा ठहरे अपने पोते के प्यार में अंधे, वो कैसे अपने पोते का जीवन बर्बाद होने देते?! दिल पर पत्थर रख कर उन्होंने आयुष को भी दिल्ली जाने के लिए इजाजत दे दी मगर उन्होंने ये शर्त रखी की छुट्टियों में आयुष को गॉंव उनके पास रहने आना होगा| आयुष को छुट्टियों में गॉंव पहुँचाने की जिम्मेदारी खुद भाईसाहब ने अपने सर ली तब जा कर बड़के दादा को इत्मीनान हुआ और उन्होंने आयुष को लाड कर भेजा|

संगीता और आयुष को यूँ अचानक घर पर देख माँ हैरान हुईं| जब माँ ने संगीता से पुछा की वो अपने ससुराल क्यों नहीं गई तो संगीता बोली; "मेरी एक माँ को सँभालने के लिए उनका बड़ा बेटा गॉंव में है लेकिन मेरी इस माँ को सँभालने के लिए मेरा यहाँ होना ज्यादा जर्रूरी था|" संगीता की ये भावुक बात सुन माँ ने संगीता को अपने गले लगा लिया और ख़ुशी से उसका मस्तक चूम लिया| उस पल मेरा मन कह रहा था की काश माँ को पता होता की मैं संगीता से कितना प्यार करता हूँ, तो आज माँ ने संगीता को अपनी बहु के रूप में अपना लिया होता|

दोनों बच्चों को मेरे माँ-पिताजी यानी अपने दादा-दादी जी के अलग होने के बारे में कुछ नहीं पता था, लेकिन इतना जर्रूर था की दोनों बच्चे ये महसूस अवश्य कर रहे थे की उनकी दादी जी अकेली हैं| इस समयसा का हल बच्चों ने खुद निकाला और मुझे तथा अपनी दादी जी को अपने प्यार के मोहपाश से जकड़ लिया| दोनों बच्चों के इसी प्यार के कारण हम माँ-बेटे को पिताजी की कमी महसूस नहीं हो रही थी|

कुछ ही दिन बीते होंगें की प्रेगनेंसी के कारण संगीता को मूड स्विंग्स (mood swings) शुरू हो गए| संगीता के ये मूड स्विंग्स समय से पहले शुरू हुए थे इसलिए मेरा ये मानना है की संगीता जानबूझ कर यूँ बच्चों की तरह बर्ताव करती थी| उधर माँ को संगीता का ये बालपन देखना अच्छा लगता था इसलिए वो संगीता को कुछ अधिक ही लाड करती थीं| वहीं मुझे...अपने बेटे को माँ ने घर का नौकर बना कर सारा काम मेरे सर डाल दिया था| स्तुति के पैदा होने तक, यानी पूरे 7 महीने इतने प्यार भरे बीते की वो हर एक दिन मुझे आज भी अच्छे से याद हैं|

समय बीता और आखिर वो दिन आ ही गया जब स्तुति पैदा हुई तथा मैंने पहलीबार स्तुति को गोदी में लिए| आप सभी ने पढ़ा ही होगा की कैसे उस पल हम बाप-बेटी का एक अनोखा रिश्ता बन गया था! स्तुति में मेरी जान बसती थी, तो वहीं स्तुति के मन को चैन तभी मिलता था जब वो मेरी गोदी में होती थी|

ज्यों-ज्यों स्तुति बड़ी होती गई उसका मेरे प्रति लगाव गहरा होता गया| जब स्तुति बोलने लायक हुई तो मेरी बिटिया ने मुझे बड़ा ही प्यारा नाम दिया; "पपई"! इस शब्द का मतलब घर में मेरे और स्तुति के सिवा आज तक कोई नहीं जानता| दरअसल, स्तुति ने अपनी दीदी को मुझे "पापा जी" कहते हुए सुना था| उम्र में छोटी होने के कारण स्तुति पूरा शब्द तो बोल नहीं पाती थी इसलिए उसने दोनों शब्दों को जोड़ कर मुझे ये नया नाम दे दिया| सारा समय मेरी लाड़ली बिटिया मुझे पपई-पपई कह घर में खिलखिलाती रहती थी|

स्तुति के प्रति मेरा प्यार इस कदर बढ़ गया था की मैं अब संगीता से शादी करने को आतुर था ताकि जल्दी से जल्दी मैं अपना ये परिवार पूरा कर सकूँ| मैंने अंतिम बार संगीता से शादी के विषय में बात की और जैसा की होना था....संगीता ने इस बार भी मेरा प्रस्ताव ठुकरा दिया! "आखिर क्यों?" मैंने तुनक कर बड़ा ही सरल सवाल पुछा था मगर संगीता मेरे इस सवाल से चिड़चिड़ी हो गई थी!

"क्योंकि मैं ये सब खोना नहीं चाहती! मेरे पास अभी जो है मैं उसी से खुश हूँ और इससे ज्यादा की मैं न तो उम्मीद करती हूँ और न ही मैंने कभी कामना की थी! कम से कम हम अभी साथ तो हैं, आप बच्चों को प्यार तो दे पा रहे हो लेकिन आपकी ये ज़िद्द सबकुछ उजाड़ कर रख देगी!" संगीता बहुत बुरी तरह मुझ पर चिल्लाई थी!

"खो तो तुम दोगी सबकुछ...अभी नहीं तो कुछ दिनों बाद सही! अगर तुमने मुझे अपनी कसम से आज़ाद नहीं किया तो एक दिन तुम ये सारे रिश्ते तबाह कर दोगी!...और जब वो दिन आएगा तो तुम पछताओगी...रोओगी! संगीता को चेतावनी दे मैं स्तुति को ले कर घर से निकल गया| मैंने संगीता को चेतावनी तो दे दी थी मगर इस चेतावनी से संगीता से ज्यादा मैं डर गया था!

वहीं मेरी दी गई इस चेतावनी का संगीता पर कोई असर नहीं हुआ| संगीता मुझे मनाना जानती थी इसलिए उसने मुझे बहला-फुसला कर फिर से हँसा ही दिया!

अगले दो साल बड़े ही उथल-पुथल भरे रहे!

इधर मैं काम की जिम्मेदारियों और बच्चों के प्यार में लीन था तो वहीं गॉंव में चन्दर को सही राह पर लाने के लिए सारा परिवार एकजुट हो चूका था| चन्दर को नशा-मुक्ति केंद्र में फिर से भर्ती करवाने का कोई फायदा नहीं था क्योंकि वो वहाँ टिकता ही नहीं और घरवालों की नजर से दूर होने का फायदा उठा कर फिर से मामा जी के घर भाग जाता इसलिए बड़के दादा ने चन्दर को घर पर रख कर ही उसका इलाज करवाना ठीक समझा| घर पर रहते हुए बड़के दादा और मेरे पिताजी की नजरें हमेशा चन्दर पर गड़ी रहती थी इसलिए चन्दर कोई काण्ड न कर पाता| चन्दर को कहीं भी बाहर आने-जाने की इजाजत नहीं थी, घर से खेत और खेत से घर यही ज़िन्दगी रह गई थी उसकी| जाहिर है चन्दर ने इसका विरोध किया और कई बार घर में सबसे लड़ाई भी की लेकिन बड़के दादा का एक चाँटा पड़ते ही चन्दर डरके मारे चुप हो जाता!

बड़की अम्मा ने कोई वैध, कोई हकीम, कोई तांत्रिक नहीं छोड़ा...वो सभी के पास जातीं और वहाँ से लाई भभूत आदि चन्दर को खिलाती-पिलातीं ताकि उनका बेटा सही राह पर आ जाए| लेकिन अगर चन्दर के सर पर कोई भूत-बाधा होती तब तो कुछ होता न, उसे तो बस नशे की आदत थी!

अगर आप सभी ने कभी सरकारी बस से सफर किया हो तो आपने देखा होगा की बस में एक किताब बेचने वाला चढ़ता है जो की कहानियों, चुटकुले, ज्ञान-विज्ञान आदि की हिंदी में लिखी किताबें बेचता है| इन किताबों के अंतिम पन्नों पर बहुत अड्वॅरटीज़मेंट होते हैं| कुछ बाबाओं-ओझाओं के तो कुछ हकीमों के| कुछ ऐसे हकीम होते हैं जो कहते हैं की उनकी दवाई लेने से बुरी से बुरी नशे की आदत छुड़ाने की दवाइयाँ दी जाती हैं जिन्हें यदि खाने की चीजों में मिला कर खिलाने से नशे के आदि व्यक्ति का नशा छूट जाता है| यदि वह आदमी फिर भी नशा करे तो उसे तुरंत मितली हो जाती है|

ये नायाब नुस्खा अजय भैया खोज कर लाये थे और इसी से कुछ महीनों तक चन्दर का इलाज हुआ, वो बात अलग है की इसका कोई ख़ास फायदा हुआ नहीं!

चन्दर नशे का आदि था और जब उसकी इस लत ने उसके जिस्म को झकझोड़ना शुरू किया तो उसने घर वालों को धोका दे कर आधी रात को घर से निकलने की तैयारी कर ली| आधी रात के समय जब सब सो रहे होते तो चन्दर घर से चुप-चाप निकलता और अपने किसी गंजेड़ी दोस्त के साथ मिल कर गाँजा फूँकता| ऐसे ही एक रात उसे जाते हुए बड़के दादा और मेरे पिताजी ने देख लिया| बस फिर क्या था लाठी-डंडे से चन्दर और उसके दोस्त की अच्छे से तुड़ाई की गई!

घर में सबके सारे नुस्खे बर्बाद होते जा रहे थे और परिणाम कुछ निकल नहीं रहा था| आखिर किसी ने एक प्राइवेट संस्था के बारे में बताया जहाँ नशे का पक्के तौर पर इलाज किया जाता था| ये संस्था एक बाबा चलाता था और वहाँ उस बाबा के चमचे आदि नशे के आदि व्यक्तियों को कूट-पीट कर सीधा कर देते थे|

तीन महीने चन्दर वहाँ रहा और उपचार के साथ लात-घुसे खाये तब जा कर उसमें थोड़ा बहुत सुधार आया| चन्दर का शराब पीना तो छूट गया मगर उसकी गांजे की लत नहीं छूटी| गाँजा पीने से चन्दर की शराब की लत काबू में रहती थी|

गाँजे के साथ ही चन्दर को बीड़ी पीने की लत लग गई थी, उस साले ने बाबा के आश्रम में रहते हुए छुप कर बीड़ी पीना शुरू कर दिया था| आखिर तंग आ कर उस बाबा ने भी अपने हाथ खड़े कर दिए की वो चन्दर जैसे दुष्ट को नहीं सुधार सकते!

चन्दर घर आ गया पर बड़के दादा ने उस पर सख्ती दिखाते हुए उसका गाँजा पीना कम करवा दिया| चन्दर को सँभलता हुआ देख बड़के दादा को इत्मीनान आया की उनका लड़का अब पहले जैसा ऐयाश नहीं रहा| लेकिन चन्दर अपने पिताजी से बहुत तेज़ था वो छुप-छुप कर गाँजा फूँक लिया करता था, साथ ही उसने गॉंव के बाहर रह रहे बंजारों की लड़कियों के साथ भी दुष्कर्म करने शुरू कर दिए थे|

लेकिन चन्दर की क़िस्मत बहुत खराब थी, जल्द ही उसके इन दोष-कर्मों का भाँडा फुट गया जब एक लड़की घर आ गई और बड़के दादा से उनके लड़के के कर्म-कांडों का सारा भाँडा फोड़ दिया! उस लड़की का मुँह बंद करने के लिए चाहिए थे पैसे और इस मौके का फायदा उठा कर मामा जी फिर से अपना रिश्ता पुनः स्थापित करने अपनी बहन के घर आ धमके| 5,000/- नकद दे कर उन्होंने उस लड़की का मुँह बंद कर भगा दिया| मामा जी की ये बनावटी 'दरियादिली' देख बड़के दादा ने उन्हें अंततः माफ़ कर दिया|

उसके बाद मामा जी ने चन्दर को ऐसी पट्टी पढ़ाई की चन्दर एक दिन में सीधा हो गया| अगले दिन से चन्दर खेतों की जुताई में लग गया और उसने सबको यक़ीन दिला दिया की वो अब पूरी तरह से सुधर चूका है| सबको लगा की ये सब मामा जी का जादू है इसलिए सभी मामा जी का मान-सम्मान करने लगे| जबकि असल में मामा जी ने चन्दर को सुधरने का दिखावा करने को कहा था ताकि फिर से उसका उनके घर आना-जाना शुरू हो जाए और वो मामा जी के घर के पास रहने वाली औरत से अपने नाजायज रिश्ते पुनः स्थापित कर पाए|

'चन्दर की तबियत सुधर रही है!' बड़के दादा ने ये खबर अपनी समधन तक पहुँचा दी ताकि वो संगीता को वापस बुला लें| संगीता की माँ ने ये खबर संगीता को दी और उसे घर वापस बुलाया| अब संगीता मुझसे तो इस बारे में कोई मदद माँग नहीं सकती थी क्योंकि मेरे पास इस समस्या का बस एक ही हल था...शादी इसलिए उसने अपना दिमाग चलाते हुए अपने भाईसाहब को फ़ोन कर वापस न जाने का ये बहाना दिया की चूँकि स्तुति को पैदा हुए 3 महीने हुए हैं, ऊपर से ठंड का मौसम है तो स्तुति के बीमार होने का खतरा है| फिर दोनों बच्चों के मध्यमवर्गी परीक्षाएं भी आ रहीं हैं, ऐसे में उसका वापस जाना सम्भव नहीं| संगीता जानती थी की उसके भाईसाहब की कही बात बड़के दादा नहीं टाल पाएंगे इसीलिए उसने जानबूझकर अपने भाईसाहब को आगे कर दिया|

बजाए सच का साथ देने के, बजाए कमर कस कर मेरे साथ खड़े होने के, संगीता बहाने बना कर बचना चाह रही थी| खैर, खुशकिस्मती से संगीता की ये चाल काम कर गई और कुछ महीनों के लिए संगीता चिंता मुक्त हो गई| लेकिन जब बच्चों की परीक्षाएं खत्म हुई तो संगीता के लिए गॉंव से पुनः बुलावा आ गया| इस बार भी संगीता ने अपना दिमाग लड़ाते हुए नया बहाना सोच लिया और वो बहाना था 'बच्चों की अच्छी पढ़ाई' का! संगीता जानती थी की बड़के दादा के लिए उनके पोते की अच्छी शिक्षा बहुत मायने रखती है, अब गॉंव में कोई प्राइवेट स्कूल है नहीं जहाँ आयुष अच्छे से पढ़ सके इसलिए इस आपदा को अवसर में तब्दील कर संगीता ने आयुष के अच्छे भविष्य की दुहाई देते हुए अपने भाईसाहब को सब समझा दिया|

वहीं मेरी बड़ी बिटिया नेहा को आयुष को यूँ बार-बार छुट्टियों में गॉंव जाना अखर रहा था| अपनी मम्मी की मुखबरी करते हुए बातें सुन नेहा सारी बात जान गई और उसने मेरे पास रुकने का अपना नायब प्लान तैयार कर लिया| नेहा ने आयुष को अच्छे से पट्टी पढ़ाई की उसे गॉंव जा कर बड़के दादा के सामने अपने दिल्ली के स्कूल की दिल खोल कर तारीफ करनी है| यहाँ कितनी अच्छी पढ़ाई कराई जाती है ये जानकार बड़के दादा का दिल पिघलता और वो आयुष को यहाँ रह कर पढ़ने देते|

अपनी दीदी की बात मानते हुए आयुष ने वही किया जो उसकी दीदी ने कहा था| आयुष ने शहद में डुबो-डुबो कर अपने स्कूल की तारीफ की तथा जो थोड़ी बहुत अंग्रेजी आयुष यहाँ सीखा था वो भी बोल कर बड़के दादा को सुना दी| अपने पोते को पढ़ाई में अव्वल आते देख, उसके मुँह से मेरी जैसी फर्राटेदार अंग्रेजी सुन बड़के दादा बड़े खुश हुए| उनके खानदान का चश्मों-चिराग आयुष, उनके खानदान का नाम सुनहरे अक्षरों में लिखेगा ये सोच कर बड़के दादा ने आयुष को मेरे घर रहने की इज्जाजत दे ही दी|

जैसा की होता आया है, इंसान के बहाने कुछ समय तक ही काम करते हैं! जब तक स्तुति दो साल की हुई तब तक हमारे गॉंव से कुछ ही दूरी पर एक नया प्राइवेट स्कूल खुल गया! संगीता के लिए बहानों के ज़मीन पर भागते-भागते अब ज़मीन खत्म हो चुकी थी! उसे अब अपनी ज़िन्दगी का सबसे बड़ा निर्णय लेना था, या तो मेरे प्यार पर भरोसा रख मुझसे शादी कर ले और ख़ुशी-ख़ुशी रहे या फिर मुझसे रिश्ते-नाते तोड़ गाँव लौट जाए!
 
[color=rgb(51,]संगीता[/color][color=rgb(51,] की दूसरी भूल[/color][color=rgb(51,]![/color]

संगीता की पहली भूल, उसका स्तुति को गाली देने के बारे में तो मैं आप सभी को बता ही चूका हूँ, तो अब आते हैं संगीता की दूसरी भूल पर:

जब मामाजी का बड़के दादा के घर में आना-जाना पुनः शुरू हो गया तो उन्होंने संगीता और चन्दर की रिश्ते को सुधारने की सोची| अपना बोरिया-बिस्तरा उठा कर वो, मामी जी और संगीता की मुँह बोली मामी जी...तीनों हमारे घर आ धमके| मुझे बाद में पता चला की संगीता की मुँह बोली मामी जी का ससुराल मामा जी का गाँव था! इधर मुझे तीनों के आने का तो पता था मगर मुझे ये नहीं पता था की आखिर मामा जी आये क्यों हैं?! असल में, संगीता ने मुझसे गॉंव में हो रही ये सभी बातें छुपाई थीं|

मामा जी की ख़ुशक़िस्मती से मेरी माँ और दोनों बच्चे उस दिन मंदिर दर्शन करने गए थे और रात को आने वाले थे तथा इस मौके का पूरा फायदा मामा जी ने उठाना था| संगीता को समझाना छोड़ कर मामा जी ने तो सीधा ही महफ़िल जमाने का प्लान बना लिया| मामा जी और संगीता की मामी जी को पीने-खाने की आदत थी, उस पर उन दोनों ने मामी जी (मामा जी की पत्नी) और संगीता को भी अपने साथ मिला लिया| वाइन पीते हुए मामा जी लगे संगीता को पति-पत्नी के एक साथ रहने पर ज्ञान देने, लेकिन जब वाइन की खुमारी संगीता के सर चढ़ी तो उसने मामा जी की बात एक कान से सुन दूसरे कान से निकाल दी और वाइन के नशे में भंड हो गई!!

वहीं दूसरी तरफ वाइन का नशा मामा जी और संगीता की मम्मी जी के लिए काफी नहीं था क्योंकि उन्हें आदत थी अत्यधिक शराब टिकाने की इसलिए दोनों ने वाइन के ऊपर व्हिस्की का अध्धा खींच कर खत्म कर दिया! नशे में धुत्त तीनों बच्चों वाले कमरे में ही पसर गए, मामा जी फर्श पर फैले पड़े थे और दोनों मामी जी पलंग पर फैले पड़ीं थीं! वहीं संगीता नशे में झूमते हुए मेरे कमरे में पहुँची और पलंग पर औंधे मुँह गिर के सो गई!

शाम को जब मैं घर लौटा तो मैंने घर में चार नशे में धुत्त लोगों को पाया.मेरे घर में, जहाँ मेरी छोटी सी बच्ची अकेली थी! एक नन्ही सी बच्ची की मौजूदगी में चार लोगों ने शराब पी, ये सोचकर ही मेरे सर पर खून सवार हो गया! जब मैं संगीता को जगाने आया तो मैंने उसे भी नशे में धुत्त पाया| मैंने संगीता के कँधे पकड़ उसे झकझोड़ कर जगाया और मैं उससे कुछ पूछता इतने में वहाँ मामा जी और मामी जी आ गए! संगीता को थोड़ा बहुत जो होश आया था उसमें उसे उनकी मौजूदगी का पता नहीं चला और संगीता मेरी बाहों में झूलते हुए बोली; "जानू..." संगीता नशे के कारण बहुत रोमांटिक हो गई थी और नशे में के कारण बहक रही थी, कहीं नशे में संगीता के मुख से कुछ उल्टा-सीधा निकल जाए इसलिए संगीता कुछ कहती उससे पहले ही मैंने कस कर उसे थप्पड़ मार दिया और संगीता औंधे मुँह बिस्तर पर जा गिरी!

मुझे यूँ संगीता पर हाथ उठाते देख मामा जी ने फौरन मुझे पकड़ा और कमरे से बाहर ले आये| "आपन बड़का भौजी पर हाथ उठावत हो?!" मामा जी मुझे डाँटते हुए बोले| गौर करने वाली बात ये है की ये वही मामा जी हैं जिन्होंने मेरे और संगीता के रिश्ते को नाजायज कहा था! लेकिन तब मुझे इन बातों का पता नहीं था वरना मैं उन्हें अपने घर में कदम न रखने देता!

"बदतमीज़ी बर्दाश्त नहीं मुझे!" मैंने गुस्से से कहा और स्तुति को गोदी ले कर बाहर छत पर आ गया| संगीता ने जो नशे में धुत्त हो कर मेरी बाहों में झूलते हुए मुझे जानू कहा था उसी हरकत के लिए मैंने संगीता को बद्तमीज़ कहा था|

मेरा गुस्सा देखते हुए मामा जी मुझे मनाने छत पर आ गए और तरह-तरह की बातें बनाने लगे ताकि मेरा गुस्सा शांत हो जाए| जब उन्हें लगा की मेरा गुस्सा शांत हो गया है तब वो मुझसे बोले; "मुन्ना, आपन भौजी का समझाओ की ऊ चन्दर संगे बोले-बतुआये काहे से की चन्दर अब सुधरी गवा है! अब ऊ तोहार भौजी कम और दोस्त ज्यादा है तो तोहार बात तो मनबे करि न?!" मामा जी चाहते थे की मैं संगीता को...अपने प्यार को समझाऊँ की वो गॉंव वापस चली जाए!

"आपको सच में लगता है की 'आपका भाँजा' चन्दर सुधर गया है...या भविष्य में सुधर जायेगा?" भोयें सिकोड़ कर मामा जी से नजरें मिलाते हुए जब मैंने ये सवाल पुछा तो उनकी नजरें झुक गईं| वो जानते थे की मैं चन्दर को अच्छे से जानता हूँ और मेरे सामने उनका ये झूठ नहीं टिकेगा! मुझे भी मामा जी से और बात करने की इच्छा नहीं थी इसलिए मैं स्तुति को गोदी लिए छत पर टहलने लगा| जब स्तुति की नींद खुली और उसने खुद को मेरी गोदी में पाया तो वो ख़ुशी के मारे खिलखिलाने लगी|

मामा जी, मम्मी जी और संगीता की मामी जी ने जब स्तुति की खिलखिलाहट सुनी तो तीनों ने स्तुति को अपनी गोदी में लेना चाहा| मैं नहीं चाहता था की स्तुति तीनों के पास जाए क्योंकि तीनों ने शराब पी रखी थी लेकिन मैं ये बात उन सबसे तो कह नहीं सकता था| वहीं मेरी बिटिया को ये अजनबी चेहरे और उनकी आभा पसंद नहीं आ रही थी इसलिए वो तीनों की तरफ देख तक नहीं रही थी, गोदी में जाने की बात ही और थी!

रात में जब माँ आईं और उन्होंने तीनों अनअपेक्षित मेहमानों को देखा तथा मुझसे तीनों के कारनामे के बारे में सुना तो उनका जी खट्टा हो गया! दिखावे के लिए माँ ने तीनों से बात की और सोने चली गईं| आयुष फिर भी तीनों से मिला और पैर छु आशीर्वाद लिए, लेकिन नेहा तीनों के पास भी नहीं गई| "ई देखो...ई लड़की तो हमका चिनहत्य नाहीं!" मामी जी ने नेहा को टॉन्ट मारते हुए कहा तो मैं नेहा के बचाव में बोल पड़ा; "नेहा को शराब की महक तक से चिढ है और आपने तो..." मैंने जानबूझकर अपनी बात अधूरी छोड़ दी| मेरी कही ये बात मामी जी को बहुत ज़ोर से लगी और उनका मुँह टेढ़ा हो गया| बात को शांत करने के लिए मामा जी बीच में बोल पड़े; "अरे कउनो बात नहीं!" इतना कह वो और मामी जी बच्चों वाले कमरे में सो गए, संगीता की मामी जी मेरे कमरे में संगीता के साथ सो गईं| बचा मैं और मेरी दोनों बेटियाँ, तो हम बैठक के फर्श पर बिस्तर बिछा कर लेट गये|

मामा जी सोच रहे थे की जैसे वो बेशर्म हैं, मेरे बारे में इतना ज़हर उगल कर वो हमारे घर आ सकते हैं तो हम (मैं और मेरी माँ) भी बड़ा दिल रख उन्हें माफ़ कर देंगे मगर यहाँ तो मैं और माँ दोनों ही उखड़े हुए थे| ऐसे हालात में उन्होंने और रुकना ठीक नहीं समझा और अगली सुबह ही हमसे विदा ले कर चले गए|

उनके जाने के बाद संगीता ने माँ को अपने गॉंव जाने वाली बात काट-छाँट कर बताई| साड़ी बात सुन माँ को बहुत गुस्सा आया की उनके बेटे के बारे में इतना ज़हर उगलने के बाद भी मामा जी की इतनी हिम्मत कैसे हुई की वो हमारे घर आ गए?! माँ ने मुझे भी डाँट लगाई की मैंने उन्हें घर में आने क्यों दिया| मैं उस वक़्त संगीता के कारण वैसे ही गुस्से से भरा बैठा था इसलिए मैंने संगीता का नाम ले कर उसे फँसा दिया; "मैं साइट पर था जब वो सब यहाँ पहुँचे! घर पर आपकी चहेती बहु थी जिसने उन्हें अंदर आने दिया! अगर मैं होता तो उनके मुँह पर दरवाजा बंद कर उन्हें उलटे पॉंव वापस भेज देता|" जैसे ही मैंने संगीता की गलती निकाली, माँ तुरंत अपनी चहेती बहु के बचाव में उतर आईं और बोलीं; "देखा जाए तो संगीता की कोई गलती नहीं थी, हमारे शास्त्र कहते हैं की घर के दरवाजे पर अगर दुश्मन भी आये तो उसका भी स्वागत किया जाता है|"

"मेहमान और दुश्मन में अंतर् होता है की नहीं?"! मैंने गुस्से से संगीता की ओर देखते हुए कहा| माँ जानती थीं की मैं संगीता के वाइन पीने को ले कर गुस्से में हूँ इसलिए उन्होंने मुझे चुप करा कर बात ही खत्म कर दी| उसके बाद वही माँ ने संगीता का पक्ष ले कर मुझे समझाया की मैं संगीता को माफ़ कर दूँ!

जब मैंने अपडेट का ये हिस्सा लिखा था तो मैंने जानबूझ कर मामा जी और मामी जी के आने का ज़िक्र नहीं किया क्योंकि तब मुझे आप सभी को उनके आने का कारण बताना पड़ता इसीलिए मैंने जानबूझ कर अपडेट में केवल संगीता की मुँह बोली मामी जी के आने का ज़िक्र किया!

[color=rgb(51,]संगीता का सबसे बड़ा पाप![/color]

गॉंव से संगीता को फ़ोन आ रहे थे मगर मैं इन बातों से अनजान अपनी लाड़ली बिटिया स्तुति को लाड-प्यार करने में व्यस्त था| स्तुति के पैदा होने से मेरी दुनिया पूर्ण हो चुकी थी और मैं ये भूल ही चूका था की संगीता को कभी गॉंव जाना भी पड़ सकता है!

स्तुति के दो साल के होने तक मैंने स्तुति को इतना प्यार दिया था की हम बाप-बेटी के इस प्यार को जमाने की नज़र लग चुकी थी!

बड़के दादा ने संगीता और अपने पोते को गॉंव वापस आने का अंतिम बुलावा भेजा| नेहा की नानी जी ने जब संगीता को वापस आने को कहा तो संगीता ने केवल "ठीक है" कह फ़ोन रख दिया| फ़ोन रख संगीता बहाना खोजने में लगी थी, वहीं नेहा की नानी जी को अपनी बेटी का ये व्यवहार समझ नहीं आया, इस कर के उन्होंने सीधा मेरी माँ को फ़ोन कर सारी बात बताई और उन्हें ये भी कहा की वो संगीता को समझा-बुझा कर वापस गॉंव वापस भेज दें| दोपहर को खाना खाने के बाद जब माँ ने हमें ये खबर दी तो मेरी साँस मेरे गले में ही अटक गई!

मैं एक टक आँखें फाड़े संगीता को देखे जा रहा था, वहीं संगीता मेरे डर के मारे अपनी गर्दन झुकाये खामोश बैठी थी! संगीता का यूँ खामोश होना उसके अपराधी होने का साक्षी था इसलिए मुझे संगीता पर बहुत गुस्सा आ रहा था|

इधर, जब दोनों बच्चों ने हमेशा-हमेशा के लिए गॉंव जाने की खबर सुनी तो दोनों बच्चे रुनवासे हो गए| आयुष जा कर अपनी दादी जी से लिपट गया और तुतलाते हुए बोला; "दादी जी...मैं आपके साथ रहूँगा...मैं गॉंव वापस नहीं जाऊँगा!" अपने पोते का मोह देख माँ उसे लाड करने लगीं और बोलीं; "बेटा, आप हमेशा के लिए गॉंव थोड़े ही जा रहे हो, जब आपके स्कूल की छुट्टियाँ होंगी तो आप मेरे पास घूमने आ जाना|" माँ ने आयुष को हिम्मत देते हुए कहा मगर जब आयुष का दिल नहीं माना तो माँ ने आयुष को बहलाना शुरू कर दिया; "आपको पता है, गॉंव में नया स्कूल खुल गया है| नया-नया स्कूल होगा, आपके नए-नए दोस्त बनेंगे...सब कुछ नया-नया होगा!" माँ ने आयुष को नई चीज़ों के सपने दिखा कर बहलाना चाहा मगर आयुष का नाज़ुक मन नहीं बहला| आयुष का मुरझाया हुआ सा चेहरा देख मेरा मन बोला की आयुष मुझे छोड़ कर नहीं जाना चाहता इसीलिए वो माँ के इतना बहलाने पर भी खामोश है!

इधर नेहा बेचारी इस खबर से सहम गई थी! उसका मुझे खो देने का सपना सच होने जा रहा था इसलिए उसका यूँ डरना लाज़मी था| नेहा मेरे सीने से लिपट कर सिसकने लगी थी, कहीं नेहा रो न पड़े इसलिए मैं उसे ले कर अपने कमरे में आ गया और नेहा के आँसूँ पोंछते हुए बड़े आत्मविश्वास से बोला; "बस बेटा! रोना नहीं, मैं आपको खुद से दूर नहीं जाने दूँगा|" मेरी आत्मविश्वास से भरी बात पर नेहा को विश्वास हो गया और नेहा मुझसे कस कर लिपट गई|

माँ की आदत थी की वो दोपहर को खाना खा कर एक झपकी लेती थीं इसलिए जैसे ही माँ सोईं मैंने संगीता को ऊपर छत पर आने को कहा| छत पर हम दोनों खुल कर बात कर सकते थे और इस समय यहाँ माँ के आने का खतरा भी नहीं था!

"तुम्हें सब पता था न?" मैंने गुस्से से संगीता को देखते हुए पुछा| मैंने ये सवाल संगीता से इसलिए पुछा था क्योंकि मैं जानना चाहता था की क्या उसे इस सब के बारे में सब पता है? लेकिन मेरा सवाल सुनकर संगीता सर झुकाये खामोश हो कर खड़ी हो गई! संगीता की ये ख़ामोशी उसका इक़बाल-ऐ-जुर्म कर रही थी की उसे पहले से सब पता था और सब जानते-बूझते हुए भी उसने मुझसे इतनी बड़ी बात छुपाई!

"तो...क्या फैसल लिया तुमने? मेरा प्यार चुनोगी.मेरे साथ शादी कर के हमेशा मेरे साथ रहोगी या फिर हमेशा-हमेशा के लिए वापस गॉंव चली जाओगी?" मैंने गुस्से से मुँह बिदकते हुए संगीता से ये सवाल पुछा| सवाल तो मैंने पूछ लिया मगर मन ही मन मैं उम्मीद कर रहा था की संगीता मुझे चुने!

"मैं...मजबूर हूँ! मेरे...पास दूसरा...कोई चारा...नहीं!" आँखों में आँसूँ लिए संगीता मेरी तरफ देखते हुए बोली| संगीता की बातों से दिख रहा था की उसने हार मान ली है और मुझे उसे यूँ हारा हुआ देख बहुत गुस्सा आ रहा था!

"तुम मज़बूर नहीं हो!...नहीं हो तुम मज़बूर! तुम्हारे पास रास्ता है...तुम बस उस रास्ते को चुनना नहीं चाहती! बुज़दिल बन कर हार मान सकती हो लेकिन हिम्मत कर के मेरे साथ खड़ी नहीं हो सकती!" मैंने संगीता को बुज़दिल कह कर चुनौती दी ताकि वो हिम्मत कर मेरे साथ खड़ी हो मगर उस डरपोक ने तो सर मेरी बात सुन सर झुका लिया! ऐसा लगता था मानो उसने ये स्वीकार कर लिया हो की वो बुज़दिल है!

"मैं पूछता हूँ की तुम्हें क्या परेशानी है मुझसे शादी करने में? क्या तुम मुझसे प्यार नहीं करती? क्या तुम मेरे साथ अपना जीवन नहीं बिताना चाहती?" मैंने संगीता के दोनों कंधे पकड़ उसे जकझोड़ते हुए एक के बाद एक सवाल पूछे और इन सभी सवालों के जवाब में संगीता की आँखों से 'हाँ" के रूप में आँसूँ निकले|

"तो फिर प्रॉब्लम क्या है? कौन है जो हमें शादी करने से रोकेगा? मेरे पिताजी ने अपना परिवार ही छोड़ दिया तो उनकी बला से मैं कुछ भी करूँ! तुम्हारे पिताजी भी इस दुनिया में नहीं और अगर होते भी तो मैं उनके सामने गिड़गिड़ा कर उन्हें हमारी शादी के लिए मना लेता! जब उन्होंने अपनी ज़मीन-जायदाद मेरे नाम कर दी तो क्या वो मेरी ख़ुशी के लिए थोड़ा नहीं झुकते?

मेरी माँ तुम्हें कितना चाहतीं हैं, तुम्हें अपनी बेटी की तरह लाड-दुलार करती हैं| भूल गई तुम्हारी प्रेगनेंसी के दिनों में मेरी माँ ने तुम्हें कितना लाड-प्यार से रखा| मैं दावे से कहता हूँ की नेहा की नानी जी ने भी तुम्हें आजतक इतना लाड-प्यार नहीं किया होगा| ज़रा सोचो, जब तुम्हारे साथ उनका रिश्ता बस चाची-बहु का था तब उन्होंने तुम्हें इतना लाड किया, अगर तुम उनकी बहु बनोगी तो क्या वो तुम्हें नहीं स्वीकारेंगी?

और जहाँ तक नेहा की नानी जी की बात है, तो वो मुझे अपने बच्चों से भी ज्यादा चाहती हैं| अगर मैं उनसे हमारे रिश्ते की बात करता तो क्या वो मुझे...अपने बेटे की इस ख़ुशी के लिए मना करेंगी?! तुमने देखा है न उनकी आँखों में मेरे लिए प्यार, तुम्हें लगता है की वो हमारी शादी के लिए मना करेंगी?" एक-एक कर मैंने संगीता को सभी जर्रूरी रिश्ते गिनाये और संगीता को ये विश्वास दिलाने की कोशिश की कि वो इस शादी के लिये हाँ कह दे| मानता हूँ अपनी बातों में मैं संगीता के स्वर्गवासी पिताजी का नाम ले गया था, जो कि गलत था मगर मैं उस वक़्त बहुत जोश में था और मुझे बस संगीता को इस शादी के लिए मनाना था!

मेरी जोश भरी बातें सुन संगीता रो पड़ी और उसके मुँह से आखिर वो सच निकला जिससे मैं अब तक अनजान था; "नहीं...ये सब इतना आसान नहीं है! हमारे रिश्ते को ले कर पहले ही गॉंव वाले थू-थू कर रहे हैं, अगर उन्हें हमारी शादी के बारे में पता चला तो लोग हम पर और कीचड़ उछलेंगे!" ये कहते हुए संगीता ने मुझे उस दिन कि पूरी बात बताई जब वो अपने पिताजी के साथ अपने ससुराल पहुँची थी और हमारे बच्चे पर कीचड़ उछाला गया था|

इन दबी हुई बातों को जानकार मुझे बहुत गुस्सा आया| संगीता ने मुझसे इतनी बड़ी बात छुपाई थी और मैं इसके लिए उसे डाँटना चाहता था मगर ये समय संगीता पर चिल्लाने का नहीं था| बल्कि मुझे संगीता को प्यार से समझाना था, उसे हमारे प्यार पर विश्वास दिलाना था| मैंने संगीता के चेहरे को अपने दोनों हाथों में लिया और उसकी नजरों से नजरें मिलाते हुए बड़े आत्मविश्वास से बोला; "जान, ये दुनिया कभी खामोश नहीं रहेगी, इसका तो काम ही है दो प्यार करने वालों को जुदा करना| तुम बस मुझ पर विस्वास करो...मेरे परिवार पर विश्वास करो! गाँव में कोई कुछ कहे हमें उससे कोई फर्क नहीं पड़ना चाहिए| हमने सच्चा प्यार किया है न, फिर हमें क्यों डरना?!" मैं अपनी तरफ से संगीता के भीतर हिम्मत जगाने कि कोशिश कर रहा था, वहीं संगीता के भीतर नेश मात्र हिम्मत नहीं थी, उसे चिंता थी तो बस दुनिया की.समाज की!

संगीता ने मेरी पकड़ से अपना चेहरा छुड़ाया और मेरी बात का काट करते हुए बोली; "शादी कर के रहना तो हमें इस दुनिया...इस समाज में ही है न?! क्या कहोगे आप जब आस-पडोसी आप पर हसेंगे की आपने अपनी ही भाभी से शादी कर ली?! माँ (मेरी) को जब लोग ताने देंगे की उनके लड़के ने क्या किया है, तो माँ कैसे सहेंगी ये बदनामी?!

कुछ समय पहले जब हमारे रिश्ते को लेकर एक लड़के ने नेहा को ताना मारा तो आप आग बबूला हो उठे थे, क्या होगा जब हमारी शादी हो जायेगी और यही ताना दुनिया वाले आयुष को मारेंगे...स्तुति को मारेंगे?! किस-किस को चुप कराओगे आप?" संगीता के सवाल जायज थे मगर मुझे मेरे प्यार पर पूरा विश्वास था की मैं ये जंग न केवल लड़ सकता हूँ बल्कि जीत भी सकता हूँ| मुझ में इतनी हिम्मत थी की मैं अपना बनाबनाया सबकुछ छोड़कर अपने परिवार के साथ एक नई जगह...एक नई शुरुआत करने को तैयार था क्योंकि मेरे लिए मेरा परिवार अगर मेरे साथ है, मेरा परिवार खुश है तो मैं किसी भी परेशानी से लड़ सकता था|

वहीं संगीता के पूछे ये सवाल उसकी हारी हुई मानसिकता दर्शा रहे थे और संगीता को यूँ हारा देख मुझे खुंदक चढ़ रही थी! "I DON'T GIVE A FUCK!!! मुझे घंटा कोई फर्क नहीं पडत की ये दुनिया हमारे बारे में क्या सोचती है या क्या कहती है! मैं तुम्हारे साथ जंगल में अकेला रहने को भी तैयार हूँ!" मैं गुस्से से गरजा तो संगीता सहम गई और शर्म से अपनी गर्दन नीचे झुका कर रोने लगी!

संगीता का यूँ हारकर रोना मेरे गुस्से की आग में घी डाल रहा था इसलिए मैंने संगीता के दोनों बाजू पकड़ उसे झकझोड़ कर सवाल पुछा; "अगर तुम्हें दुनिया की इतनी ही चिंता थी तो क्यों मेरी ज़िन्दगी में दुबारा घुस आई? जब मैं तुमसे बस दोस्ती का रिश्ता रखने को कह रहा था तो तुमने क्यों हमारे बीच जबरदस्ती नज़दीकियाँ बढ़ाईं? तब तुम्हें नहीं पता था की हमारे रिश्ते का कोई भविष्य नहीं है?! लेकिन नहीं मैडम जी को लगी थी आग...मेरे नज़दीक आने की! और आज जब मैं कह रहा हूँ की मुझे अपनी कसम से आज़ाद कर दो, मेरे साथ हिम्मत कर के खड़ी हो जाओ ताकि मैं सारी दुनिया से अकेला लड़ सकूँ तो तुम्हें समाज और दुनियादारी की चिंता है?!" मेरी कही इस बात में 'घुस' और 'आग' शब्द संगीता को बहुत चुभे थे मगर वो फिर भी खामोश थी क्योंकि संगीता में मुझसे कुछ कहने की हिम्मत नहीं बची थी!

कल्पना कीजिये की आप एक शक़्स से बात कर रहे हैं, उससे गुस्से में आ कर सवाल पूछ रहे हैं और वो इंसान सर झुकाये बस रो रहा हो तो आपको कितना गुस्सा आएगा?! यहाँ तो संगीता सरासर गलत थी, ऊपर से जब मैं उससे सवाल पूछ रहा था तो वो बस डरके मारे रोये जा रही थी तो मुझे कितना गुस्सा आना चाहिए?!

संगीता को यूँ रोता हुआ देख मेरा सब्र अब जवाब दे चूका था| अब तो मेरे लिए आर या पार वाली स्थिति थी, या तो संगीता मुझे चुन सकती थी या फिर गॉंव वापस जा सकती थी! "मैं आखरी बार तुमसे पूछ रहा हूँ, तुम्हें मुझसे शादी करनी है या नहीं?" मैंने गुस्से से संगीता के चेहरे को हाथों में ले कर उठाया और संगीता की आँखों से आँखें मिला कर सवाल पुछा| मेरा सवाल सुनकर भी संगीता से कुछ कहा नहीं गया, वो बस मुझसे नजरें चुरा कर रोये जा रही थी! साफ़ था की उसे मेरे प्यार पर विश्वास ही नहीं, तो मेरे से शादी करने का सवाल कहाँ से पैदा होता?

बहरहाल, बात साफ़ हो चुकी थी की संगीता और मेरा ये अनोखा बंधन हमेशा-हमेशा के लिए टूटने जा रहा है| संगीता तो गॉंव में अपनी ज़िन्दगी में लौटने वाली थी लेकिन मेरा क्या होता? मैं तो यहाँ एक हारे हुए बादशाह की तरह, जिसने अपना सब कुछ खो दिया अकेला रह जाता! मुझे भी ज़िंदा रहने का हक़ था लेकिन बिना किसी वजह के मैं ज़िंदा कैसे रहता?! प्यार के समुन्द्र में डूबते हुए मुझ बेचारे को तैर कर किनारे तक पहुँचने के लिए कोई सहारा तो चाहिए था न?! तो मैंने संगीता से वो छीनना चाहा जिनके सहारे मैं ये पहाड़ जैसी ज़िनदगी चैन से काट सकता था!

"ठीक है!!! तुम गॉंव जा सकती हो लेकिन नेहा और स्तुति मेरे पास रहेंगे! मैं उन्हें कानूनी रूप से गोद लूँगा और उन्हें अपना नाम दूँगा!" जैसे ही मैंने नेहा और स्तुति पर अपना हक़ जताया और उन्हें अपने पास रखने की बात कही, संगीता की आँखों का पानी मर गया! उसकी जगह संगीता की आँखों से अब अंगारे बरसने लगे थे| संगीता के इस गुस्से का सही कारण तो मुझे नहीं पता मगर मेरा ऐसा मानना है की संगीता को नेहा और स्तुति से जलन हो रही थी की मैं उन्हें अपने साथ जबरदस्ती रखने को कैसे तैयार हो गया जबकि मैं तो संगीता से प्यार करता था?!

खैर, कारण कुछ भी हो मुझे संगीता का मुझे यूँ गुस्से से देखना गुस्सा दिला रहा था! "ऐसे क्या घूर रही हो? मैंने तुमसे उसी दिन कह दिया था की मैं स्तुति को अपनी गोदी में खिलाऊँगा, उसे अपना नाम दूँगा आखिर वो मेरा खून है! रही नेहा की बात तो तुमने उसे कभी बेटी वाला प्यार किया ही नहीं, वो तो तुम्हारे साथ हुए धोके की निशानी थी न?!" जब मैंने स्तुति पर अपने बाप होने का हक़ जताया तो संगीता का गुस्सा और तेज़ हो गया, पता नहीं वो कौन सी शक्ति थी जो उसे मुझ पर रासन-पानी ले कर चढ़ने से रोके हुए थी?!

इधर अपने गुस्से में बहते हुए जब मैंने नेहा को 'धोके की निशानी' कहा तो संगीता के होटों पर कुछ शब्द आये थे मगर किसी तरह संगीता ने खुद को रोक लिया!

"मैं तुमसे आयुष को नहीं माँग रहा क्योंकि तुमने उसे मुझसे मेरे प्यार की निशानी के रूप में माँगा था| लेकिन नेहा और स्तुति पर तुम्हारा कोई हक़ नहीं, वो मेरी बेटियाँ हैं!" मैंने फिर से नेहा और स्तुति पर हक़ जमाते हुए कहा तो संगीता से बर्दाश्त नहीं हुआ और वो बिना कुछ बोले गुस्से से तमतमाते हुए नीचे चली गई! मुझे संगीता के हाँ या न सुनने की कोई जर्रूरत नहीं थी इसलिए मुझे संगीता के गुस्सा हो कर नीचे जाने का कोई फर्क नहीं पड़ा|

जैसे ही संगीता छत के दरवाजे से नीचे गई, वैसे ही दरवाजे के पीछे छुप सारी बात सुन रही नेहा दौड़ती हुई मेरी कमर से लिपट गई! "I love you पापा जी! मम्मी को जाने दो गॉंव, उनकी कमी पूरी करने के लिए मैं और स्तुति आपको इतना प्यार देंगे की आपको कभी मम्मी की याद आएगी ही नहीं!" नेहा जानती थी की मैं उसकी मम्मी से बहुत प्यार करता हूँ, भले ही मैं संगीता पर कितना ही गुस्सा करूँ मगर अंत में मैं उसके प्यार को पाने के लिए तड़प ही जाता था| मैं संगीता के प्यार को न तरसूँ, उसके लिए ही नेहा ने कहा था की वो और स्तुति मुझे खूब-खूब प्यार करेंगे|

"I love you too मेरा बच्चा!" मैंने बड़े गर्व से नेहा को अपनी बाहों में भरते हुए कहा| नेहा और स्तुति को पा कर मुझे संगीता को खोने का ज़रा भी ग़म नहीं हो रहा था क्योंकि अब मेरे लिए मेरी दोनों बेटियाँ ही सब कुछ थीं!

मैंने अपने जीवन का सबसे बड़ा फैसला लिया था और अब वक़्त था अपने इस फैसले पर अपनी माँ की रज़ामंदी की मोहर लगवाने का!

शाम का समय था और सभी बैठक में बैठे चाय पीते हुए टी.वी. पर कार्टून देख रहे थे! चूँकि नेहा ने छुप कर छत पर मेरी और अपनी मम्मी की बातें सुन ली थीं इसलिए नेहा अपनी मम्मी से बिलकुल बात नहीं कर रही थी| आयुष अपनी दादी जी के साथ बैठा कार्टून देखने में व्यस्त था| वहीं मैं सोफे पर आलथी-पालथी मारे बैठा था तथा मेरी गोदी में बैठी स्तुति कार्टून देखते हुए अपनी बोली-भाषा में कुछ कहने की कोशिश कर रही थी| नेहा मेरी बगल में बैठी थी और अपनी मम्मी तथा आयुष के गॉंव जाने की बात से पूरी तरह निश्चिंत थी!

"स्तुति बेटा, आप अपने दीदी और बड़े भैया के साथ जा कर अंदर खेलो|" जैसे ही मैंने स्तुति को अपनी गोदी से उतारना चाहा स्तुति ने फट से अपनी मुठ्ठी में मेरी टी-शर्ट पकड़ ली! ये स्तुति की आदत थी, जैसे ही मैं उसे अपनी गोदी से उतार कर कहीं जाने की कोशिश करता वो फट से मेरे कपड़े अपनी मुठ्ठी में जकड़ लेती! "बेटू, मैं घर पर ही हूँ, मुझे बस आपकी दादी जी से बात करनी है| तब तक आप अंदर जा कर खेलो!" मैंने स्तुति को समझाया तो स्तुति ने मुझ पर विश्वास करते हुए अपनी मुठ्ठी खोल दी| इधर नेहा जानती थी की मैं यहाँ कौन सी बात करूँगा इसलिए वो आयुष और स्तुति को बहलाते हुए अपने साथ कमरे में ले आई तथा कंप्यूटर पर गेम चला कर दोनों भाई-बहन को व्यस्त कर छुप कर हमारी बात सुनने लगी|

"माँ, मैंने स्तुति और नेहा को गोद लेने का फैसला किया है!" मैंने इतनी बड़ी बात माँ की आज्ञा माँगने नहीं बल्कि उन्हें अपना फैसला सुनाते हुए कही थी|

"तुझे पता भी है तू क्या बकवास कर रहा है? दो छोटे बच्चों को उनकी माँ से अलग करना चाहता है!" माँ ने बहुत ज़ोर से मुझे डाँटते हुए कहा| माँ की कही बात सही थी, मैं कर तो एक पाप ही रहा था! अपने जीने के लिए मैं एक माँ को उसके बच्चों से अलग करने का पाप! लेकिन उस समय मुझे अपनी दो अनमोल चीज़ों में से एक तो चाहिए ही थी, या तो संगीता...या फिर मेरे दोनों बच्चे!

"मैं अपने पूरे होशों-हवास में हूँ| गॉंव में आजतक नेहा को कभी प्यार नहीं मिला तो स्तुति को कौन सा प्यार मिलेगा?! उस बेचारी के पैदा होने पर गॉंव से एक फ़ोन नहीं आया तो आपको लगता है की उसे वहाँ कोई लाड-प्यार करेगा?! इस पूरी दुनिया में एक बस मैं ही हूँ जो दोनों को अपनी बेटी की तरह प्यार करता है| आपने तो खुद देखा न की दोनों बच्चे मेरे पास कितना खुश रहते हैं तो मेरे बिना...मुझसे दूर मेरी दोनों बेटियाँ गॉंव में कैसे रहेंगी?!" आज मैंने बिना डरे माँ के सामने स्तुति और नेहा को गर्व से अपनी बेटियाँ कहा था| खैर, संगीता को खोने के ग़म में मैं बावरा हो गया था और बेसर-पैर की बातें कर अपनी माँ को अपनी इस ज़िद्द के लिए मनाने के लिए उलटे-सीधे तर्क दिए जा रहा था| मेरा ये बात करने का ढंग मेरी डगमगाई मानिसक हालत दर्शा रहे थे जो की माँ और संगीता को मेरे लिए चिंतित कर रहे थे|

"बेटा, मैं जानती हूँ तू बच्चों से कितना प्यार करता है| लेकिन बच्चे सबसे ज्यादा अपनी माँ के पास ही खुश रहते हैं| बच्चों को उनकी माँ से अलग करना बहुत बड़ा पाप होता है! तुझे कैसा लगता अगर कोई मुझे तुझसे अलग करता तो?

गॉंव में जब तेर पिताजी ने मुझे अपने साथ चलने को कहा था तब तू कितना डर गया था, सोच अगर मैं सच में उनके साथ चली जाती तो तू क्या करता?! उसी तरह नेहा और स्तुति भी अपनी मम्मी के बिना नहीं रह सकते क्योंकि उन्हें अपनी मम्मी के प्यार की जर्रूरत है जो तू कभी पूरी नहीं कर सकता| तू चाहे कितनी भी कोशिश कर ले, लेकिन तू बच्चों को उनकी माँ का प्यार नहीं दे सकता|

इतने समय से जो तू दोनों बच्चों को इतना लाड-प्यार करता है न, ये तेरा बच्चों से मोह है जो तुझे ये सब बातें सोचने पर मज़बूर कर रहा है!" जब मैं छोटा था और कभी किसी खिलोने की जिद्द करता था तो माँ मुझे बड़े प्यार से समझाती थीं, आज भी माँ मुझे प्यार से उदहारण दे कर समझा रहीं थीं ताकि मैं अपनी ये ज़िद्द छोड़ दूँ|

झूठ नहीं कहूँगा, जब माँ ने मुझे उस दिन की याद दिलाई जब संगीता के मायके में मेरे पिताजी ने मेरी माँ को मुझे छोड़ अपने साथ चलने को कहा था तो मेरी जान हलक़ में आ गई थी! उस दिन को याद कर मैं आज फिर काँप गया था मगर मेरा अपने दोनों बच्चों को पाने का जूनून मुझे थामे हुए था|

जब इंसान पर किसी चीज को पाने का जूनून सवार होता है तो वो किसी की नहीं सुनता, उसे चैन तभी मिलता है जब वो उस चीज़ को पा लेता है| यहाँ मुझे मेरी दोनों बेटियाँ चाहिए थीं और उन्हें पाए बिना मेरा...एक पिता का जूनून शांत नहीं होता! "आप ठीक कह रहे हो माँ, एक बच्चे को उसकी माँ से अलग करना पाप है!...लेकिन अगर माँ अपनी ख़ुशी से अपने बच्चों को मुझे सौंप दे तब तो आपको कोई आपत्ति नहीं न?" ये कहते हुए मैं आँखों में उम्मीद लिए संगीता को देखने लगा ताकि वो माँ के सामने हाँ कह दे और मुझे मेरी दोनों बेटियाँ मिल जाएँ|

"संगीता, तुम तो गॉंव वापस जा ही रही हो मगर जाते-जाते मुझे मेरी दोनों बेटियाँ मुझे सौंप जाओ! मैं वादा करता हूँ की मैं तुमसे कोई बैर, कोई नफरत नहीं करूँगा| तुम जानती हो की नेहा और स्तुति मुझे कितना प्यार करती हैं, वो मेरे बिना नहीं रह पायेंगी इसलिए प्लीज....प्लीज मुझे मेरी दोनों बेटियाँ गोद दे दो!" मैंने हाथ जोड़कर संगीता से मिन्नत की|

मुझे संगीता से यूँ मिन्नत करते हुए देख माँ की आँखों में जिज्ञासा थी की भला अब संगीता क्या कहेगी?! अगर उस पल संगीता ने ख़ुशी-ख़ुशी हाँ कह दिया होता तो मेरी माँ मेरी इस ज़िद्द के आगे घुटने टेक देतीं, लेकिन संगीता के भीतर पता नहीं कौन सी आग लगी थी की उससे मेरी ये ख़ुशी देखि न गई! वो बिना कुछ कहे उठ कर बच्चों वाले कमरे में चली गई और भड़ाम से दरवाजा बंद कर दिया! संगीता का ये बर्ताव देख माँ को मुझ पर बहुत गुस्सा आया और वो मुझ पर बरस पड़ीं; "देख तूने एक माँ के दिल को कितना दुखा दिया! तुझे एक बार में समझाई हुई बात समझ नहीं आती?! अपने सर से ये फज़ूल का भूत उतार और खुद को सँभाल| परसों संगीता का बड़ा भाई सबको लेने आ रहा है, तब तक अपना दिमाग ठीक कर और नेहा को भी समझा की वो तुझसे इतना मोह न करे की जाते समय तुम दोनों का रो-रो कर बुरा हाल हो जाए!" मुझे झिड़क कर माँ संगीता को मनाने चली गईं|

मुझे लगा था की मैं माँ को मना लूँगा, लेकिन मेरी सारी बाज़ी संगीता के कारण पलट गई थी इसलिए मैं दुखी हो कर सर झुकाये बैठा था! तभी मुझे हिम्मत देने के लिए वहाँ नेहा आ गई| नेहा ने सारी बातें सुन ली थीं मगर फिर भी मेरी छोटी सी बच्ची ने हार न मानते हुए मुझे हिम्मत देने आई थी| "पापा जी, मैं हूँ न! मैं दादी जी को मनाऊँगी|" नेहा बड़े आत्मविश्वास से बोली| नेहा की हिम्मत देख मेरे लिए ये ऐसा था जैसा डूबते को तिनके का सहारा| मैंने अपनी सारी हिम्मत बटोरी और ये फैसला किया की मैं एकबार संगीता से प्यार से बात करता हूँ और उसे मेरे दोनों बच्चों को गोद देने के लिए मनाता हूँ|

रात में जब संगीता खाना बना रही थी तब मैं अपने तीनों बच्चों के साथ अपने कमरे में लेटा था| स्तुति मेरी छाती पर बैठी अपनी बोली-भासा में बात कर रही थी तो आयुष मेरी बगल में लेटा अपनी छोटी बहन की बातें बड़े गौर से सुनने में लगा था| वहीं नेहा के मन में कुछ चल रहा था इसलिए उसका ध्यान इस वक़्त कहीं और था!

अपनी दिद्दा और पपई को चुप-चाप देख स्तुति को जिज्ञासा हुई! "पपई...पपई...दिद्दा...दिद्दा" कहते हुए स्तुति ने हमारा ध्यान अपने ऊपर खींचा और अपनी बोली-भासा में पूछने लगी की हम दोनों खामोश क्यों हैं?! "तू पापा जी के साथ खेल मैं अभी आती हूँ|" नेहा ने स्तुति के हाथ चूमते हुए कहा और वो सीधा जा पहुँची अपनी दादी जी को मनाने!

माँ टेबल पर पैर रख कर बैठीं टीवी देख रहीं थीं| नेहा माँ के पास पहुँची और उसने सीधा अपनी दादी जी के पॉंव पकड़ लिए और फ़रियाद करते हुए बोली; "दादी जी, मैं यहाँ आपके पास रहना चाहती हूँ| मैं मम्मी के साथ गाँव नहीं जाना चाहती| मुझे गॉंव में कोई प्यार नहीं करता, मुझे बस पापा जी (मैं) और आप प्यार करते हो इसलिए मैं आपके ही पास रहना चाहती हूँ| प्लीज दादी जी, अपनी पोती की बात मान लीजिये और मुझे यहाँअपने पास रहने दीजिये! मैं वादा करती हूँ की मैं आपको या पापा जी को कभी तंग नहीं करुँगी! आप जो कहोगे, आपकी हर बात मानूँगी! कभी कोई जिद्द नहीं करुँगी! रात को आपके पैर दबाऊँगी और..." अपनी आधी बात कहते हुए नेहा फफक कर रो पड़ी| माँ ने जब अपनी लाड़ली पोती को यूँ फफक कर रोते हुए देखा तो माँ ने नेहा को एकदम से अपने गले लगा लिया और उसे चुप कराने लगीं|

"बस मेरी बच्ची! बस! रोते नहीं हैं! बेटा, मैं जानती हूँ तू मुझे और मानु को बहुत चाहती है मगर बेटा एक बच्चे को हमेशा उसकी माँ के साथ रहना होता है|..." माँ इसके आगे नेहा को कुछ समझा पातीं उससे पहले ही नेहा का अपनी मम्मी के ऊपर आया गुस्सा फूट पड़ा; "लेकिन मम्मी मुझे प्यार नहीं करतीं! जितना प्यार मुझे आपने किया उसका आधा भी उन्होंने नहीं किया! उन्होंने हमेशा मुझे डाँटा है, मुझे अपने गुस्से से डराया है...मेरी खुशियों को हमेशा कुचला है!" नेहा के बगावती तेवर आज फिर माँ के सामने आये थे| इससे पहले माँ ने नेहा के ये बागवती तेवर तब देखे थे जब मैं कोमा में था|

मेरी माँ को बच्चों की इस तरह की ज़िद्द कतई पसंद नहीं और यहाँ तो नेहा अपने गुस्से में अपनी मम्मी को दोष दे रही थी तो माँ ये कैसे बर्दाश्त करतीं इसलिए उन्होंने नेहा को डाँट दिया; "बस! मानु के साथ रह कर तू बहुत बद्तमीज़ हो गई है नेहा! यही संस्कार दिए हैं मैंने तुझे की अपनी मम्मी को दोष दो, उसे गलत समझो?!" अपनी दादी जी की डाँट सुन मेरी लाड़ली बिटिया का दिल टूट गया और वो रोते हुए मेरे पास आ गई| आयुष तब बाथरूम में था, जब नेहा रोते हुए कमरे में दाखिल हुई| नेहा ने रोते-रोते सारी बात बताई तो मैंने फौरन नेहा को अपने गले लगा उसे प्यार से शांत करवाया|

नेहा की बातें स्तुति ने बड़े गौर से सुनी थी, मेरी छोटी सी बिटिया को सारी बात समझ आ गई थी और अब तो उसे भी मुझसे दूर होने का ग़म सताने लगा था इसलिए स्तुति बहुत ज़ोर से रोने लगी| तभी आयुष बाथरूम से निकला और अपनी दोनों बहनों को रोता हुआ देख उसे लगा की जर्रूर मुझसे दूर होने का दुःख स्तुति और नेहा को सता रहा है इसीलिए दोनों रो रहीं हैं| आयुष दौड़ता हुआ मेरे पास आया और मेरे सीने से लग कर उसने भी सिसकना शुरू कर दिया| मेरे तीनों बच्चे मुझसे लिपट कर रो रहे थे और मैं बेबस पिता चाह कर भी उन्हें ये उम्मीद नहीं दे पा रहा था की मैं उन्हें खुद से दूर जाने नहीं दूँगा!

स्तुति का रोना सुन माँ मेरे कमरे में आईं और मुझे तीनों बच्चों को खुद से लिपटाये चुप कराते हुए देख सारा माज़रा समझ गईं| माँ ने स्तुति को जबरदस्ती मेरी गोदी से छीनना चाहा ताकि वो उसे लड़ कर चुप करवा सकें मगर स्तुति ने अपनी छोटी-छोटी मुठ्ठी में मेरी टी-शर्ट इतना कस कर पकड़ रखी थी इसलिए माँ उसे मुझसे अलग ही नहीं कर पाईं!

अब चूँकि माँ ने ही नेहा को अभी थोड़ी देर पहले डाँटा था इसलिए माँ ने नेहा को कुछ नहीं कहा और उसे मुझसे लिपट कर सिसकने दिया| फिर माँ की नज़र पड़ी आयुष पर जो मुझसे लिपट कर सिसक रहा था इसलिए माँ ने आयुष को पुकारा| आयुष बेचारा अपनी दादी जी के गुस्से से डरता था इसलिए वो बेमन से अपनी दादी जी के साथ चला गया| माँ ने आयुष को लाड कर प्यार से समझाया और उसे अपने पास बिठा कर लाड करने लगीं|

जब खाना बना तो खाना खाते समय भी स्तुति मेरे सीने से चिपकी हुई थी| मेरी नन्ही सी बच्ची को डर था की अगर उसने अपने पापा जी को अपनी पकड़ से आज़ाद किया तो उसके पापा जी हमेशा-हमेशा के लिए उससे दूर हो जायेंगे! वहीं नेहा और आयुष का खाना खाने का मन नहीं था, मन तो मेरा भी खाने का नहीं था मगर माँ के सामने खाना तो खाना था वरना हम तीनों बाप-बेटा-बेटी को डाँट पड़ती! मैंने ही पहल करते हुए दोनों बच्चों को अपने हाथ से खाना खिलाया| बच्चे मुझे न नहीं कह सकते थे इसलिए उन्होंने मेरे हाथों से खाना खा लिया|

खाना खा कर माँ ने मुझे अकेले में खूब डाँटा की मैंने बच्चों से इतना मोह बढ़ा लिया है की जब उनके वापस जाने का समय हुआ है तो तीनों बच्चों के नाज़ुक से दिल दर्द से छटपटा रहे हैं| साथ ही माँ ने मुझे सख्त हुक्म दिया की मैं कल सुबह तीनों बच्चों को प्यार से समझाऊँ ताकि परसों जब उनके बड़े मामा जी आएं तो जाते समय बच्चे न रोएं| मैंने सर झुका कर माँ की सारी बात सुनी मगर मैंने कोई जवाब नहीं दिया और सीधा अपने कमरे में आ गया|

माँ ने मुझे बच्चों को समझाने के लिए आदेश तो दे दिया था मगर उन्होंने ये नहीं सोचा की उनका बेटा अपने बच्चों से दूर कैसे होगा? कैसे वो अपने तीनों बच्चों की जुदाई बर्दश्त कर पायेगा?

अपनी दोनों बेटियों को पाने की आखरी उम्मीद दिल में अब भी जगी थी और इस उम्मीद को ज़िंदा रखने के लिए मैं सब कुछ करने को राज़ी था| रात बारह बजे जब सब सो गए तो मैंने धीरे से खुद को स्तुति की पकड़ से छुड़ाया और संगीता से बात करने बच्चों वाले कमरे में आ गया| आयुष अपनी दादी जी के पास सोया था और मेरी दोनों बेटियाँ मेरे साथ सोईं थीं इसलिए संगीता इस वक़्त कमरे में अकेली थी|

जैसे ही मैंने कमरे की लाइट जलाई तो मैंने संगीता को अपने दोनों घुटने सीने से लगाए बैठ कर सिसकता हुआ पाया| ऐसा नहीं था की संगीता मुझसे जुदा होने पर दुखी नहीं थी, लेकिन पता नहीं क्यों वो बेवकूफ मुझसे अपना ये दुःख छुपाना चाह रही थी!

इधर जैसे ही कमरे में उजाला हुआ तो हम दोनों की नजरें मिलीं| मुझे देखते ही संगीता ने फौरन अपना मुँह अपने घुटनों के पीछे छुपा लिया ताकि मैं उसके आँसूँ न देख पाऊँ| वो पगली ये भूल गई की 'हमारे दिल अब भी कनेक्टेड हैं' तो मैं उसका दुःख वैसे भी महसूस कर सकता हूँ!

खैर, मुझे इस वक़्त मेरी बेटियाँ चाहिए थीं और उन्हें पाने के लिए मैं कुछ भी कर सकता था इसलिए मैंने सीधा संगीता के दोनों पॉंव पकड़ लिए और रोते हुए उससे बोला; "जान...प्लीज...मुझे मेरी दोनों बेटियाँ दे दो! मैं तुम्हारे आगे हाथ जोड़ता हूँ, पॉंव पड़ता हूँ...मिन्नत करता हूँ! तुम तो जा ही रही हो, कमसकम मुझे मेरी बेटियाँ देती जाओ ताकि मैं ज़िंदा तो रह सकूँ! अगर मुझे मेरी बेटियाँ न मिलीं तो मैं जी नहीं पाऊँगा!" मेरी ये दर्द भरी फ़रियाद सुनकर भी संगीता का दिल नहीं पसीजा!

उसने गुस्से में आ कर मेरी पकड़ से अपने पॉंव छुड़ाए और मुझे आँखें बड़ी कर घूरने लगी! संगीता की ये अजीब प्रतिक्रिया मेरी समझ से परे थी, मेरा ध्यान इस वक़्त बस मेरी दोनों बेटियों को पाने पर था इसलिए मैंने ज़मीन पर घुटने टेके हुए अपने दोनों हाथ जोड़े और संगीता से फिर मिन्नत करते हुए बोला; "प्लीज जान! प्लीज...कल सुबह माँ से बस इतना कह दो की तुम स्तुति और नेहा को मुझे गोद दे रही हो! प्लीज...मैं तुम्हारे आगे हाथ जोड़ता हूँ!" अपनी बेटियों को पाने के लिए एक बाप जितना झुक सकता था उससे कई ज्यादा मैं झुक चूका था इसके आगे अब सब संगीता के हाथ में था!

बहरहाल मुझे अपने सामने यूँ मिन्नत करते देख भी संगीता का दिल नहीं पिघला, उसकी आँखों में वही गुस्सा था...जलन थी| संगीता ने मुझे उठाने तक की कोशिश नहीं की, बल्कि वो तो दूसरी तरफ मुँह कर के लेट गई!

जो औरत कभी मुझे रोते हुए नहीं देख सकती थी, आज वो इतनी निर्दई हो गई थी की उसे मेरी दर्द भरी आवाज़ सुन कर भी कोई फर्क नहीं पड़ रहा था! मैं आगे कुछ कहता उससे पहले ही नेहा कमरे में आ गई और अपनी ताक़त लगा कर मुझे सहारा दे कर खड़ा कर मुझे कमरे में वापस ले आई| मुझे पलंग पर बिठा, मेरे आँसूँ पोंछ बोली; "पापा जी, मैं आपको किसी के आगे भी इस तरह झुक कर मुझे पाने के लिए भीख माँगते हुए नहीं देख सकती!" नेहा के मुँह से इतनी बड़ी बात सुन मैंने उसे कस कर अपने गले लगा लिया और फफक कर रो पड़ा!

एक तरफ मेरी बेटी, इतनी छोटी होते हुए भी अपने पापा जी के दुःख को महसूस कर रही थी, वहीं उसकी माँ का दिल जैसे पत्थर का हो गया था...जो की मेरा दुःख देख कर भी अनदेखा कर रही थी! मैंने जैसे-तैसे खुद को सँभाला तथा इस उम्मीद में की कल सुबह संगीता माँ से कह देगी की वो नेहा और स्तुति को मुझे ख़ुशी-ख़ुशी कानूनी रूप से गोद दे रही है इस एक उम्मीद के सहारे नेहा और स्तुति को खुद से लिपटाये सो गया!

अगली सुबह एक मनहूस सपने ने मुझे भीतर से झकझोड़ कर उठाया| मैंने सपना देखा की मेरे दोनों बच्चे मुझसे सदा के लिए दूर हो गए और मैं कुछ नहीं कर पाया! घड़ी में बजे थे सुबह के 5 बजे और कहीं ये सपना सच न हो जाए इसलिए मैं फौरन मुँह-हाथ धो कर बैठक में आ गया| बैठक का दृश्य बड़ा सामान्य सा था, संगीता और माँ दोनों बैठीं चाय पी रहीं थीं और पहले की तरह आराम से बातें कर रहीं थीं| ये दृश्य देख मैं समझ गया की संगीता ने माँ से दोनों बच्चों को ले कर कोई बात नहीं कही है वरना मुझे देख माँ ने बच्चों का ज़िक्र जर्रूर किया होता!

मैंने संगीता को इशारों में फिर विनती की कि वो माँ से नेहा और स्तुति की बात करे, लेकिन संगीता ने मेरे इशारों को देख कर भी अनदेखा कर दिया! संगीता जानती थी की अगर वो उठ कर रसोई में गई तो मैं उससे फिर यही बात कहूँगा इसलिए वो जानबूझकर माँ के साथ बैठ कर बातें करती रही! मुझे संगीता से बात करनी थी और मुझे उसके लिए अब एक मौका तराशना था!

मैं अपने कमरे में बैठा सोच में बैठा था की तभी आयुष मुझे सुबह की गुड मॉर्निंग वाली पप्पी देने आया| आयुष को देख मेरे दिमाग में एक तरकीब आ गई| मैंने आयुष को समझा-बुझा कर माँ के साथ मंदिर जाने की ज़िद्द करने को कहा| मेरी बात मानते हुए आयुष ने ज़िद्द पकड़ ली और माँ ने अपने पोते की ज़िद्द को ख़ुशी-ख़ुशी स्वीकारा| जैसे ही दोनों दादी-पोता मंदिर के लिए निकले, मैं संगीता का हाथ पकड़ कर उसे खींच कर बच्चों वाले कमरे में ले आया| "जान...मेरी किस गलती की तुम मुझे सजा दे रही हो? मैंने तुमसे ऐसा क्या माँग लिया जो तुमसे नहीं दिया जा रहा?! तुमने एक बार कहा था की तुम्हारी आत्मा तक पर मेरा हक़ है, फिर आज जब मैं तुमसे अपनी दोनों बच्चियाँ माँग रहा हूँ तो तुम क्यों खामोश हो?!" मेरी आवाज़ में मेरी मज़बूरी झलक रही थी, लेकिन संगीता का दिल अब भी नरम नहीं पड़ा था! कल से अभी तक मैं संगीता से मिन्नत किये जा रहा था इसलिए उसे अब कुछ तो जवाब देना था! मेरी आँखों में देखते हुए संगीता 'न' में अपनी गर्दन हिलाने लगी| इस समय मैं हर ज़िल्ल्त बर्दाश्त कर सकता था मगर संगीता की 'न' मैं बर्दाश्त नहीं कर सकता था!

आँखों में आँसूँ लिए मैं अपने दोनों घुटनों पर आ गया और संगीता के आगे हाथ जोड़ते हुए बोला; "क्यों?" इस एक शब्द से ज्यादा मुझसे बोला न गया और मेरी आँखों से दर्द भरे आँसूँ छलक आये! जिस इंसान को संगीता ने सबसे ज्यादा चाहा था आज वही इंसान उसके सामने घुटनों के बल खड़ा हो कर उससे दूसरीबार मिन्नत कर रहा था, मेरी इस दयनीय हालत को देख कर संगीता की आँखों में दया रुपी आँसूँ आ गए| मैं अबउम्मीद कर रहा था की संगीता अब मुझे थाम कर उठाएगी और मेरी ये अंतिम आरज़ू पूरी कर देगी मगर नहीं! संगीता मुझसे दो कदम दूर हो गई और फिर से अपनी गर्दन न में हिलाने लगी!

संगीता का ये बर्ताव देख मेरा होंसला टूटने लगा था| लेकिन तभी मेरे भीतर से आवाज़ आई की शायद मैं संगीता...एक माँ से कुछ ज्यादा ही माँग रहा हूँ! 'एक माँ से मैं उसके तीन बच्चों में से दो माँग रहा था, था तो ये एक माँ के लिए घाटे का सौदा! एक माँ कैसे ये घाटे का सौदा करती, कहीं इसीलिए तो संगीता मना नहीं कर रही?!' मेरे डरे-सहमे मन में ये बेवकूफी भरा ख्याल आया और मैंने इस ख्याल को सही भी मान लिया! मेरा मानसिक संतुलन उस वक़्त इतना खराब हो चूका था की मेरे मन में जो ऊल-जुलूल ख्याल आ रहा था मैं उसे ही सच मान रहा था!

एक पिता को अब अपनी ज़िन्दगी का सबसे मुश्किल चुनाव करना था और वो चुनाव था अपनी दोनों बेटियों में से एक को चुनना! स्तुति को मैं अपने जीवन के दो साल दे चूका था, उसके पैदा होते ही...मेरी गोदी में आते ही उससे मेरा अटूट रिश्ता बन गया था| वहीं दूसरी तरफ नेहा, जिसे मेरे अलावा किसी से प्यार मिला ही नहीं, जो मुझे अपना सबकुछ मानती थी, जिसे मैं अपनी पहली औलाद मानता था उसे मैं कैसे छोड़ सकता था?!

मेरे लिए ये चुनाव बहुत कठिन था, लेकिन तभी मन में एक और विचार कौंधा; 'स्तुति अभी बहुत छोटी है, अगर वो मुझसे छीन गई तो शुरू में वो बहुत रोयेगी लेकिन ज्यों-ज्यों वो बड़ी होगी त्यों-त्यों उसकी यादाश्त धुँधली पड़ती जाएगी और वो मुझे...अपने पपई को भूल जायेगी| वहीं दूसरी तरफ नेहा है, जिसका दिल अभी पुराने घावों से उबर रहा है...अगर वो मुझसे दूर हुई तो वो मेरे बिना जी नहीं पाएगी!' मन के इस ख्याल ने मेरे लिए चुनाव स्पष्ट कर दिया| अपने दिल पर पत्थर रख, अपने कलेजे को मजबूत कर मैंने नेहा का नाम लिया; "ठीक है...स्तुति और नेहा न सही...कमसकम मुझे नेहा ही दे दो! मैं उसे ही पा कर संतुष्ट हो जाऊँगा!" मैंने संगीता के आगे हाथ जोड़े हुए अंतिम विनती की| एक बाप आज बनिया बन कर अपनी ही बेटियों का पाने का सौदा उनकी माँ से कर रहा था!

इधर संगीता को मेरे मुख से ऐसी बात सुनने की उम्मीद नहीं थी इसलिए वो भौंचक्की हो कर आँखें फाड़े मुझे देख रही थी! हैरान मैं भी था की कैसे मैं उस औरत से अपनी बेटियों को पाने के लिए भाव-ताव कर रहा हूँ जिसे मैंने इतना चाहा था!

खैर, जैसे ही मैंने संगीता से नेहा को माँगा वैसे ही नेहा दौड़ती हुई कमरे में आई और अपनी मम्मी के पॉंव पकड़ कर गिड़गिड़ाने लगी; "मम्मी...प्लीज मम्मी...मुझे पापा जी के साथ रहने दो...प्लीज मम्मी...मेरी अच्छी मम्मी!" नेहा गिड़गिड़ाते-गिड़गिड़ाते रो पड़ी! परन्तु संगीता पर अपनी बेटी के रोना का भी कोई असर नहीं हुआ, वो पत्थर दिल औरत नेहा को दूर धकेलते हुए कमरे से बाहर जाने लगी|

संगीता ने जब नेहा को यूँ दूर धकेलते हुए दुत्कारा तो एक बाप का दिमाग गुस्से से बेकाबू हो गया! संगीता मेरी बगल से होते हुए बाहर जा रही थी, मैं बिजली की रफ्तार से खड़ा हुआ और संगीता के दाएँ हाथ की कलाई पकड़ उसे झटके से खींच कर रोका!

मेरी आँखों में अचानक खून उतर आया था और सर पर गुस्सा सवार हो चूका था| "दो दिन से मैं तुम्हारे आगे अपने बच्चों के लिए गिड़गिड़ा रहा हूँ, लेकिन तुम्हारा दिल ज़रा भी नहीं पसीजा! अपने दिल के दो टुकड़ों (नेहा और स्तुति) में से एक टुकड़ा तुम्हें ख़ुशी-ख़ुशी देने तक को तैयार हो गया मगर तुम्हारा दिल फिर भी नहीं पिघला! तो ठीक है, अब तुम्हें दिखाता हूँ की मैं क्या कर सकता हूँ! बहुत गुरूर और घमंड है न तुम्हें एक माँ होने का?!

आने दो भाईसाहब को, उनके सामने मैं अपनी दोनों बेटियों को तुमसे छीनूँगा और तुम कुछ नहीं कर पाओगी! अगर तुम्हारे मुँह से ज़रा सी भी चूँ निकली न तो उसी वक़्त मैं भाईसाहब के सामने हमारे (मेरे और संगीता के) रिश्ता का सारा राज़ खोल दूँगा! फिर चाहे मुझे जिससे लड़ना पड़े मैं लड़ लूँगा लेकिन अपनी दोनों बेटियों को खुद से अलग नहीं होने दूँगा!" मैं गुस्से से संगीता पर चीखा और नेहा को गोद में ले कर स्तुति के पास आ गया|

एक बाप ने बहुत मिन्नत कर ली थी, बहुत नाक रगड़ ली थी...अब समय था लड़ने का! मैं इस वक़्त इतने जोश में था की मैं अकेला किसी से भी भिड़ सकता था| मुझे अब किसी रिश्ते की कोई परवाह नहीं थी, मुझे चाहिए थीं तो बस अपनी दोनों बेटियाँ|

इधर नेहा ने जब अपने पापा जी के अंदर ये जोश देखा तो उसका दिल आत्मविश्वास से भर गया| नेहा को इत्मीनान हो चूका था की उसे और स्तुति को मुझसे कोई अलग नहीं कर सकता| अगर किसी ने कोशिश भी की तो मैं उसे कच्चा खा जाऊँगा! "I'm proud of you पापा जी!" नेहा ख़ुशी से चीखी और मेरे सीने से कस कर लिपट गई|

संगीता ने अपनी कसम से बाँध कर मेरी नाक में नकेल फँसा रखी थी और इसी नकेल के दम पर वो मुझे अब तक मिमियाने पर मजबूर किये हुए थी| लेकिन जब उसने मुझे अपनी बच्चियों से अलग करना चाहा तो मैंने अपनी नाक में फँसी नकेल उखाड़ फेंकी! मैं अब आवारा सांड हो चूका था जिसे बस अपना लक्ष्य दिख रहा था और ये आवारा सांड संगीता का सारा खेल बिगाड़ने वाला था!

मेरी माँ हमेशा कहतीं हैं की 'दुश्मन को कभी कम नहीं समझना चाहिए' मगर उस समय मैं अपने अतिआत्मविश्वास में इतना उड़ रहा था की मैंने संगीता को कम आँकने की गलती कर दी!

संगीता जानती थी की अब वो चाहे अपनी नाक रगड़ ले लेकिन मैं उसके काबू आने वाला नहीं इसलिए उसने मेरे खिलाफ एक क्षद्यंत्र रचा, ऐसा क्षद्यंत्र जो की शकुनि जैसे के आगे फेल हो जाए!

संगीता ने छुपकर अपने भाईसाहब को फ़ोन कर दिया तथा उनके साथ उन्हें अपने साथ मिलाकर मेरे ही खिलाफ एक झूठ का जाल बुन लिया|

थोड़ी देर में स्तुति जागी और जागते ही मेरी गोदी में आ कर मुझे सुबह की प्यारी दी| "स्तुति, तू और मैं हमेशा पापा जी के साथ रहेंगे|" नेहा उत्साह से चिलाते हुए बोली| स्तुति को अपनी दिद्दा की बात सुन इतनी ख़ुशी हुई की स्तुति अपने दोनों हाथ हवा में उठा कर मेरी गोदी में ही नाचने लगी! स्तुति की देखा-देखि नेहा ने भी हाथ उठा कर नाचना शुरू कर दिया| मेरी दोनों बेटियाँ आज इतनी खुश थीं की क्या कहूँ?!

मेरी दोनों बेटियाँ तो मेरे साथ रहने की खबर से खुश थीं, अब समय था मेरे बेटे को इस सच से रूबरू करवाने का वरना कल को उसे जब ये बात पता चलती तो वो बहुत रोता और अपने साथ हुए इस भेद-भाव के लिए मुझे तथा अपनी दोनों बहनों को दोषी मानता|

जब माँ और आयुष मंदिर से लौटे तो मैं तीनों बच्चों को ले कर ऊपर छत पर आ गया| मेरा मानना है की भावुक बातें करने के लिए घर की छत सबसे उपयुक्त होती है क्योंकि खुली हवा में इंसान ठंडे दिमाग से काम लेता है|

छत पर हमने चार कुर्सियों को जोड़ कर एक गोल चक्कर बनाया और फिर हम चारों उन कुर्सियों पर बैठ गए|

मैं: बेटा, कल जब आपके बड़े मामा जी आएंगे न तो बस आप और आपकी मम्मी ही उनके साथ जायेंगे...आपकी दीदी और स्तुति यहीं मेरे पास रहेंगे|

मैंने बड़े ध्यान से ये बात आयुष को बताई| ये बात सुनते ही आयुष डर गया और रुनवासा हो कर मुझे देखने लगा|

नेहा: आयुष रोते नहीं हैं! देख मैं और स्तुति पापा जी के बिना नहीं रह सकते! गॉंव में सब तुझे प्यार करते हैं: दोनों दादा जी, दादी जी, चाचियाँ| लेकिन मुझे तो बस मेरे पापा जी ही प्यार करते हैं| उसी तरह स्तुति को भी वहाँ गॉंव में कोई प्यार नहीं करता इसलिए हम तेरे साथ नहीं जा रहे|.

नेहा आगे कुछ कहती उससे पहले ही आयुष रो पड़ा और खड़ा हो कर मेरे गले लग गया!

आयुष: चाचू...मैं भी आपसे बहुत प्यार करता हूँ और आपके बिना नहीं रह सकता!

आयुष रोते हुए बोला|

मैं: बेटा...मैं जनता हूँ आप मुझे बहुत प्यार करते हो लेकिन मैंने आपकी मम्मी से एक वादा किया था! जब आप पैदा नहीं हुए थे तभी मैं आपको एक वचन के रूप में आपकी मम्मी को सौंप दिया था!...

मैं आयुष को खुलकर सब बात नहीं बता सकता था इसलिए मैं बात को थोड़ा गोल-मोल कर रहा था और उम्मीद कर रहा था की आयुष मेरी बात समझ जाए| ज़ाहिर है की मैं एक छोटे बच्चे से बहुत बड़ी बात समझने की अपेक्षा रख रहा था जो की नामुमिन था| अतः मेरी बात को सही दिशा देने के लिए नेहा ने मेरी बात काटते हुए बात सँभाली;

नेहा: देख आयुष, अगर हम तीनों ही पापा जी के पास रहेंगे तो मम्मी अकेली हो जाएँगी न? फिर तुझ गॉंव में सब प्यार करते हैं और अगर तू भी हमारे साथ यहाँ पापा जी के पास रहेगा तो गॉंव वाले सब यहाँ लड़ाई करने आ जायेंगे| तू यही चाहता है की तेरी वजह से सब यहाँ आ कर दादी जी और पापा जी से लड़ाई करें?

लड़ाई क्या होती है ये आयुष ने पहली और आखरीबार तब देखि थी जब चन्दर, संगीता की जान लेने घर में घुस आया था| उस दिन के दृश्यों को याद कर आयुष डर गया और अपनी दीदी के पूछे सवाल के जवाब में न में सर हिलाने लगा|

मैं: बेटा, घबराते नहीं है| मैं आपसे वादा करता हूँ की जब-जब आपके स्कूल की छुट्टियाँ होंगी मैं आपको यहाँ हमारे पास बुला लूँगा और हम सब मिलकर खूब मस्ती करेंगे| फिर जब आप ट्वेल्थ (बारहवीं) पास कर लोगे न तो मैं आपका दाखिला दिल्ली यूनिवर्सिटी के कॉलेज में करा दूँगा और आप हमेशा यहाँ रह कर पढ़ाई कर सकोगे|

मैंने आयुष को बहलाने के लिए तरह-तरह के प्रलोभन दिए तो आयुष को मेरी बातों पर यक़ीन हो गया| वहीं आयुष कहीं अपने भोलेपन में ये बात माँ से न कह दे उसके लिए नेहा ने उसे अभी से चेता दिया|

मैं और नेहा आयुष को प्यार से समझा-बुझा चुके थे| अब बारी थी सबसे सयानी बिटिया...यानी स्तुति की बारी| उसे अपने बड़े भैया को हँसाना था इसलिए स्तुति ने कुर्सी पर बैठे-बैठे ही अपने बड़े भैया को फ्लाइंग kiss दे दी जिसे पा कर आयुष ख़ुशी से खिलखिलाने लगा| स्तुति को अपने बड़े भैया को इस प्रकार हँसाने पर गर्व हो रहा था इसलिए वो अपने दोनों हाथ ऊपर उठा कर नाच रही थी!

संगीता के प्लान से अनजान हम चारों भविष्य के सुनहरे सपने संजो कर खुश हो रहे थे| हमें क्या पता था की हमारी इस ख़ुशी के गुब्बारे में सुई कोई और नहीं बल्कि संगीता ही चुभायेगी!

अगले दिन सुबह-सुबह भाईसाहब घर पहुँचे, बातों ही बातों में भाईसाहब ने बताया की उन्हें आज और कल दिल्ली में काम है इसलिए वो परसों सबको साथ ले कर लौटेंगे| भाईसाहब का काम के सिलसिले में महीने में एक-आध चक्कर लगता रहता था और वो जब भी दिल्ली आते तो हमारे घर ही ठहरते थे| अक्सर भाईसाहब सुबह दिल्ली पहुँचते और अपना काम निपटा कर, हमसे मिलकर गॉंव लौट जाते| हाँ, कभी अगर कोई सरकारी छुट्टी पड़ जाए तो भाईसाहब एक-दो दिन हमारे घर रुक जाते थे| यही कारण है की जब भाईसाहब ने कहा की वो दो दिन रुक कर जाएंगे तो मुझे कोई शक नहीं हुआ|

मैं स्तुति और नेहा को गोद ले रहा हूँ, इतनी बड़ी बात मैं सबको अभी नहीं बताना चाहता था क्योंकि फिर अगले दो दिन माँ और भाईसाहब मुझे समझाने के लिए मेरे पीछे हाथ धोकर पड़ जाते! मुझे ये हमला अचानक करना था और ये अचानक हमला उसी दिन ठीक होता जब भाईसाहब सामना ले कर घर से निकलने वाले होते| चूँकि उन्हें ट्रैन पकड़नी होती ऐसे में वो रुक कर मुझे समझाने में समय व्यर्थ नहीं करते|

मेरी की ये प्लानिंग 100% कामयाब होती लेकिन नियति को कुछ और ही मंज़ूर था!

अगली सुबह जब मैं उठा तो घर में सब कुछ सामन्य था, ऐसा लगता ही नहीं था की संगीता ने वापस गॉंव जाना है! जब से मैंने संगीता को धमकी दी थी, तभी से मैंने उससे बात करनी बंद कर दी थी| वहीं संगीता भी मुझसे बात करने से कतरा रही थी| रही बात नेहा के तो उसे अपनी मम्मी से नफरत हो गई थी इसलिए वो अपनी मम्मी के पास भी नहीं भटक रही थी|

स्तुति को गोदी में लिए मैं बैठक में बैठा टी.वी. देख रहा था की तभी मुझे संतोष का फ़ोन आया| संतोष ने मुझे बताया की मिश्रा अंकल जी की साइट पर जो काम चल रहा था वहाँ पैसे को ले कर लेबर ने काम बंद कर दिया है! दरअसल, मिश्रा अंकल जी ने मुझे परसों एक चेक दिया था जो की संतोष ने बैंक में जमा कराया था परन्तु चेक अभी तक क्लियर नहीं हुआ था| आज हमें लेबर की दिहाड़ी का भुगतान करना था और पैसे न होने के कारण लेबर ने काम बंद कर दिया था|

मैं उस समय तक अपना जूतों का नया काम शुरू कर चूका था और पुराना सारा काम मैं संतोष के ज़िम्मे कर चूका था| मैं लेबर से काम निकलवाने में तेज़ था, तो संतोष थोड़ा डरपोक था| एक दिन भी अगर काम रुकता तो संतोष का बहुत नुक्सान होता इसलिए उसने मुझसे मदद माँगी की मैं साइट पर आ कर काम शुरू करवा दूँ|

घड़ी में बजे थे दोपहर के 12 और स्तुति का दूध पीने का समय हो रहा था इसलिए अपनी बिटिया को दुद्दू पीने के लिए छोड़ मैं संतोष की मदद करने घर से निकला| इस बात से अनजान की जब मैं लौटूंगा तो मेरा सब कुछ लुट चूका होगा!

इधर मैं घर से निकला और उधर संगीता ने स्तुति को दूध पिला कर सुला दिया तथा फटाफट अपने कपड़े पैक कर लिए| सामान पैक कर संगीता ने भाईसाहब को फ़ोन कर दिया और वो टैक्सी ले कर घर पहुँच गए| स्तुति को गोदी में लिए और आयुष का हाथ पकड़े जब संगीता कमरे से निकली तो नेहा समझ गई की अब क्या होने वाला है! अपनी पहले से सुनियोजित चाल के तहत संगीता मेरे घर पर न होने का फायदा उठा कर गॉंव 'भाग' जाना चाहती थी! नेहा को जब ये बात पता चली तो उसका नाज़ुक सा दिल डर के मारे काँप गया! मेरे घर पर न होने से नेहा की उसी की माँ से रक्षा करने वाला कोई नहीं था!

अब नेहा को खुद कुछ करना था ताकि वो मेरे आने तक कैसे भी खुद को और अपनी बहन को गॉंव जाने से बचा सके| कुछ सोचते हुए नेहा ने आगे बढ़ कर स्तुति को गोदी लेना चाहा ताकि दोनों बहनें अंदर के कमरे में जा कर कमरे का दरवाजा अंदर से बंद कर दें! लेकिन संगीता एक माँ थी और वो नेहा की सारी होशियारी जानती थी| जैसे ही नेहा अपनी छोटी बहन को गोदी लेने आई, संगीता ने फौरन उसका हाथ कस कर पकड़ लिया!

नेहा समझ गई की अब वो भाग नहीं पाएगी इसलिए उसने अपनी मम्मी की पकड़ से अपना हाथ छुड़ाना और चिल्लाना शुरू कर दिया! "छोडो मुझे मम्मी! मैं नहीं जाऊँगी आपके साथ! छोडो मुझे!" नेहा गुस्से से अपनी मम्मी के हाथ की पकड़ छुड़ाना चाह रही थी मगर संगीता ने अपनी पकड़ और कस ली थी| एक 11 साल की लड़की की ताक़त अपनी माँ के आगे तो कम ही होती है इसलिए नेहा की सारी ताक़त विफल हो गई! नेहा के पास अब सिवाए रोने के कोई चारा नहीं था, उसे लगा था की उसके रोने से शायद उसकी दादी जी का दिल पिघल जाए और वो मदद करने आगे आएं इसलिए नेहा रोते हुए बोली; "दादी जी...दादी जी...मुझे बचाओ...मैं नहीं जाऊँगी...मैं पापा जी के पास रहूँगी....मुझे छोडो....!!!"

अपनी पोती को यूँ दर्द से छटपटाते देख एक दादी का दिल फट पड़ा! माँ नेहा को रोकना चाहतीं थीं परन्तु संगीता ने अब भी नेहा का हाथ कस कर पकड़ रखा था जो की दर्शाता था की एक माँ अपनी बेटी को खुद से अलग नहीं करेगी| यही कारण था की माँ चाह कर भी नेहा को रोक न पाईं!
"बस मुन्नी!!! बस बेटा!!!" माँ ने बड़ी मुश्किल से झुक कर नेहा को अपने गले लगाते हुए उसकी पीठ थपथपा कर शांत करवाना चाहा मगर नेहा का रोना थम ही नहीं रहा था!

अपनी दीदी को यूँ रोते हुए देख आयुष भी रोने लगा था, उस बेचारे में ज़रा भी हिम्मत नहीं थी की वो अपनी दीदी को सँभाल सके| उधर अपनी मम्मी की गोदी में सो रही स्तुति भी अपनी दीदी का रोना सुन जाग गई थी! "स्तुति...मम्मी हमें पापा जी से अलग कर रही हैं!" नेहा ने जैसे ही ये बात स्तुति को बताई स्तुति ने गुस्से में "पपई...पपई" चिल्लाते हुए अपनी मम्मी की गोदी में छटपटाना शुरू कर दिया!

अपनी दोनों बेटियों को यूँ ज़िद्द करते देख संगीता को गुस्सा आ गया और उसने सबसे पहले स्तुति को डाँटा; "ऐ लड़की! चुप कर जा वरना मारूँगी एक!!" अपनी मम्मी का गुस्सा देख स्तुति डर के मारे और जोर से रोने लगी! "और तू नेहा, बाज़ आजा और चुपचाप चल वरना मुझसे बुरा कोई न होगा!" संगीता ने नेहा को घूर कर देखते हुए धमकाया|

"आपसे बुरा कोई है भी नहीं!" नेहा रोते हुए एकदम से बोली| नेहा इस तरह पलट कर जवाब देगी इसकी उम्मीद संगीता को नहीं थी इसलिए संगीता ने नेहा का हाथ छोड़ उसके गाल पर खींच कर थप्पड़ मार दिया!

"बहुत जुबान चलने लगी है तेरी!" संगीता गुस्से से नेहा पर चिल्लाई| नेहा बड़े ही नाज़ुक दिल की बच्ची थी, अभी तक तो उसका दिल बस मेरे लिए खून के आँसूँ बहा रहा था| लेकिन जब संगीता ने उसे थप्पड़ मारा तो ये थप्पड़ नेहा की अंतरात्मा पर पड़ा, जिस कारण नेहा के दिल में उसकी मम्मी के प्रति ज़हर भर गया!

नेहा अब भी रोये जा रहे थी इसलिए माँ ने उसे फिर से अपने गले लगा लिया और उसे लाड-प्यार कर समझाने लगी की वो अपनी ज़िद्द छोड़ दे| "दादी जी...मुझे...मुझे एक बार...पापा जी से...बात करनी है...!" नेहा ने किसी तरह अपना रोना रोकते हुए सिसकते हुए मेरी माँ से विनती की| मेरी माँ अपनी पोती की इस विनती को ठुकरा न पाईं और अपना फ़ोन लेने जाने लगीं की तभी संगीता ने उन्हें रोक दिया; "फ़ोन मत देना माँ, वरना ये बात कर के उन्हें बुलाएगी और कहीं वो आ गए तो फिर बच्चों के प्यार में बहते हुए वो भी इस लड़की की तरह ज़िद्द कर के बखेड़ा खड़ा कर देंगे!" माँ को संगीता की ये बात जचि इसलिए वो फिर से नेहा को समझाने लगीं पर नेहा अपनी ज़िद्द पर अड़ी रही और फ़ोन लेने अंदर जाने लगी| तभी संगीता ने स्तुति को भाईसाहब की गोदी में दिया और नेहा का हाथ पकड़ उसे रोक उसके गाल पर एक के बाद एक 3 थप्पड़ मारे! "एक बार में कही हुई बात तेरे समझ नहीं आती! अब अगर तेरे मुँह से एक भी शब्द निकला न तो तेरा मुँह तोड़ दूँगी!" संगीता ने नेहा को बुरी तरह डरा दिया था! ये डर नेहा पर इस कदर हावी हुआ की उसकी सारी हिम्मत टूट गई और वो घुटनों के बल नीचे गिर रोने लगी!

माँ से घर में हो रही ये मार-पीट सही नहीं जा रहे थी इसलिए उन्होंने संगीता को दूर किया तथा नेहा को अपने सीने से लगा कर उसे चुप करवाया| "बेटा, बस चुप हो जा| मैं...मैं...मानु जब घर आएगा न तेरे से फ़ोन पर बात करवा दूँगी|" माँ ने जब नेहा को उम्मीद की किरण दिखाई तब जा कर नेहा के दिल को थोड़ा चैन आया!

वक़्त की नज़ाक़त ऐसी थी की नेहा के दिल को उम्मीद देना जर्रूरी था| माँ ने नेहा के पूरे चेहरे को चूमा और उसकी मुठ्ठी में पैसे रख उसे लाड करते हुए बोलीं; "बेटा, रास्ते में बिलकुल रोना नहीं है| तू अभी ख़ुशी-ख़ुशी गॉंव जा, मैं कुछ दिनों में मानु के साथ आऊँगी तुझसे मिलने|" माँ ने नेहा को झूठी उम्मीद देते हुए कहा| इधर अपनी दादी जी द्वारा दी गई झूठी उम्मीद को सच मानकर नेहा ने सोच लिया की जब मैं उससे मिलने आऊँगा तो वो कुछ भी कर के मेरे साथ वापस दिल्ली आ जाएगी! अब मेरी बिटिया को क्या पता की उसकी ये इच्छा कभी पूरी नहीं होने वाली!

अब बारी थी आयुष की, माँ ने आयुष को अपने गले लगाया और उसे बहुत लड़-प्यार किया तथा उसकी मुठ्ठी में भी कुछ पैसे रख दिए| "बेटा, जब मैं गॉंव आऊँगी न तब तू मुझे कहानी सुनाना?!" माँ ने आयुष को हँसाने के लिए ये बात कही तो आयुष ने फट से अपना सर हाँ में हिला दिया|

अंतिम बारी थी स्तुति की, अपनी मम्मी के डाँटे जाने से वो अपने बड़े मामा जी से लिपट कर रो रही थी| माँ ने स्तुति को गोदी लिया और उसे चुप कराने के चक्कर में मेरी माँ की आँखों से ही आँसूँ बह निकले! माँ बच्चों को प्यार करने में कोई भेद-भाव नहीं करतीं थीं, लेकिन स्तुति के साथ उनका नाता कुछ अनोखा था| जब कभी मैं घर पर नहीं होता था तो वो मेरी माँ ही थीं जो स्तुति को सँभाल पाती थीं| अपनी दादी जी को स्तुति "दाई" यानी दादी जी कहती थी| आज के बाद माँ को अब स्तुति के मुख से ये शब्द फिर नहीं सुनने को मिलेगा, यही सोच कर मेरी माँ का दिल रो रहा था|

"दाई....पपई...मेरे पपई....?" स्तुति ने सिसकते हुए अपनी दादी जी से सवाल पुछा| स्तुति के सवाल का मतलब था की 'मेरे पापा जी कहाँ हैं?' माँ अपनी पोती का ये सवाल थोड़ा बहुत समझ पाई और अपनी पोती के दिल को तसल्ली देते हुए बोलीं; "बेटा, मानु आएगा न तो सबसे पहले मैं तुझ ही से बात कराऊँगी|" एक नन्ही सी बच्ची क्या जाने की झूठ क्या होता है, उसे तो सब पर ही विश्वास होता है! यही कारण था की स्तुति ने अपनी दादी जी की बात पर विश्वास कर लिया और अपनी अंतिम प्यारी देते हुए माँ से लिपट गई|

एक दादी-पोती का ये मोह देख कर भी संगीता का दिल नहीं पिघला और वो आखिर मेरा घर छोड़ कर चली हो गई!

इधर मैं साइट पर पहुँचा तो पता चला की जो चेक संतोष को कल सुबह सुबह डालना चाहिए था उसने वो चेक शाम को डाला जिस कारण चेक पास नहीं हुआ और उसे पैसे नहीं मिले| इस साइट की लेबर नई थी और पैसे को ले कर कुछ ज्यादा ही किच-किच कर रही थी| जब मैंने एक मालिक की तरह सबको निकालने की झूठी धमकी दी तो सबके सब लाइन पर आ गए और काम शुरू हो गया|

मैंने बैंक में फ़ोन कर चेक का पुछा तो पता चला की चेक आज शाम तक क्लियर हो जायेगा| मैंने ये खबर सारी लेबर को दी और उन्हें ये आश्वसन दिया की कल दोपहर तक सभी को उनकी दिहाड़ी मिल जाएगी| मेरे आश्वासन को पा कर लेबर फिर से काम में लग गई और मैं घर वापस आ गया|

जैसे ही मैं घर में घुसा मुझे घर में एक अजीब सी चुप्पी...अजीब सी ख़ामोशी महसूस हुई! आजतक जिस घर में मेरे बच्चों की किलकारियाँ गूँजती थीं, उस घर में ये सन्नाटा कुछ अप्रिय घटित होने की तरफ इशारा कर रहा था| "नेहा?...स्तुति?...आयुष?" मैंने तीनो बच्चों को आवाज़ दी मगर कोई जवाब नहीं आया| मेरी एक आवाज़ पर मेरे बच्चे उछलते-कूदते हुए मेरे सामने प्रकट हो जाय करते थे परन्तु आज ऐसा नहीं हुआ! किसी की कोई आवाज़ न सुन मेरा मन व्याकुल हो गया और मैं बच्चो को ढूँढने कमरे में जा ही रहा था की इतने में माँ कमरे से बाहर निकलीं| उन्हें देख मैं तीनों बच्चों के बारे में पुछा तो माँ ने मेरा हाथ पकड़ कर मुझे बिठाया और संगीता के जाने के बारे में बताया|

रामायण में जिस प्रकार रावण ने छल कर भगवान राम का ध्यान एक सोने के हिरन पर केंद्रित कर माता सीता का अपहरण किया था| उसी प्रकार संगीता ने मुझे बहाने से साइट पर भेज, मेरे तीनों बच्चों का 'अपहरण' किया था!

जब मुझे संगीता का छल समझ में आया तो जो पहले शब्द मेरे मुख से निकले वो थे; "THAT BITCH!!!" मैं बहुत गुस्से से चीखा और जेब से फ़ोन निकाल कर संगीता का नंबर मिलाया| मेरे मुख से अंग्रेजी में गाली निकली थी जो की माँ समझ नहीं पाईं मगर वो ये तो समझ ही गई थीं की मेरे मुख से गाली निकली है| मेरे मुख से गाली सुन कर भी माँ इस समय खामोश थीं तो बस इसलिए की आज वो अपने बेटे का गुस्सा देख डर गई थीं!

इधर संगीता का कॉल मिला मगर उसने एक घंटी बजते ही मेरा कॉल काट दिया तथा अपना फ़ोन बंद कर दिया! मैंने फिर से उसका नंबर मिलाया पर उसका फ़ोन अब भी बंद था! मैंने नेहा का नंबर मिलाया तो वो नंबर संगीता ने घर से निकलने से पहले ही बंद कर दिया था! मैंने भाईसाहब का नंबर मिलाया, वो तो नंबर बजा मगर संगीता ने पहले ही भाईसाहब को मेरा फ़ोन न उठाने के लिए कह दिया था|

दस मिनट तक मैंने ताबतोड़ भाईसाहब के फ़ोन पर कॉल किया मगर उन्होंने फ़ोन नहीं उठाया| जब भाईसाहब ने मेरा फ़ोन नहीं उठाया तो मैं सबको रोकने के लिए घर से निकलने लगा| मैं घर के दरवाजे तक ही पहुँचा था की माँ ने पीछे से अपनी कसम दे कर मुझे रोक दिया; "तुझे मेरी कसम मानु जो तूने घर से बाहर एक भी कदम बाहर निकाला तो!" माँ की कसम सुन मेरे बाहर जाते हुए कदम वहीं ठहर गए!

एक तरफ संगीता थी जो मुझे अपनी क़सम दे कर मुझे मेरे बच्चों से दूर कर चुकी थी, तो वहीं दूसरी तरफ मेरी माँ मुझे अपनी क़सम से बाँध कर मुझे अपने बच्चों को वापस लाने नहीं जाने दे रही थी!

"मुझे जाने दो माँ, मुझे अपनी बच्चियों को वापस लाना है!" मैंने माँ से खुद को उनकी कसम से आज़ाद करने को कहा| लेकिन फिर माँ ने जो शब्द कहे वो मेरे दिल को भेद गए; "संगीता उनकी माँ है, तेरा उनसे कौनसा खून का रिश्ता है जो तू उनपर इतना हक़ जता रहा है?! आज नहीं तो कल बच्चों ने तो अपने घर लौट ही जाना था!" माँ की कही ये बात मेरे दिल को छल्ली कर गई| मैं उसी वक़्त सब सच कहना चाहता था लेकिन जितना भी गुस्सा और बच्चों को वापस पाने का जूनून मेरे भीतर था वो सब माँ के कहे इस एक वाक्य ने तोड़-मरोड़ डाला था! माँ के कहे इन नुकीले शब्दों से घायल हो कर मैं कुर्सी पर बैठ रोने लगा|

"आपको संगीता की इस घिनौनी चाल के बारे में सब पहले से पता था न माँ?" आँखों में आँसूँ लिए मने माँ से ये सवाल पुछा|

अपने बेटे की आँख में आँसूँ देख माँ मेरे पास आईं और मेरे आँसूँ पोंछते हुए बोलीं; "नहीं बेटा| मुझे लगा था की संगीता कल ही जायेगी, लेकिन जैसे ही तू आज घर से निकला, संगीता ने अपना सारा सामान बाँधा और गॉंव वापस जाने के लिए तैयार हो गई| नेहा और स्तुति बहुत रोये मगर संगीता नहीं मानी!" जैसे ही माँ ने नेहा और स्तुति के रोने की बात कही, मेरे मन ने उस दृश्य की कल्पना कर ली जब मेरी दोनों बच्चियाँ रो रही होंगी और अपनी मम्मी से जबरदस्ती उन्हें गॉंव न ले जाने की दुहाई कर रही होंगी|

मेरी विचारधारा कुछ ऐसी है की कभी तो मैं अपनी चीज़ को पाने के लिए हर तरह के जतन करने से पीछे नहीं रहता, किसी से भी लड़ने से नहीं घबराता और कभी-कभी एक पल में हार मानकर, निराश हो अपने हथियार डाल देता हूँ|

मैं इस वक़्त एक लूटा-पीटा इंसान था जिसने एक झटके में सब कुछ खो दिया था! अब मेरे पास कुछ रह गया था तो वो थे मेरे आँसूँ जिन्हें मैं अब अकेले में बहाना चाहता था| मैं अपने कमरे में आ गया और बिस्तर पर लेट अपने दोनों बच्चों को खोने के ग़म में रोने लगा| वो हर एक दिन जो मैंने अपने बच्चों के साथ ख़ुशी-ख़ुशी बिताया था, उन सभी दिनों की प्यारी-प्यारी यादें दुबारा से जीते हुए मैं रोता रहा| मैं तबतक रोया जबतक की मेरी आँखों का सारा पानी खत्म नहीं हो गया|

जब आँखों का पानी मर गया तो दिल में नफरत पैदा हुई...संगीता के प्रति नफरत! आप जिसे प्यार करते हो वो आपको इतना दुःख तो नहीं दे सकता की आपसे आपके जीने का सहारा तक छीन ले?! ये कैसा प्यार हुआ? अगर संगीता ने मुझे मेरी दोनों बेटियाँ, या कमसकम नेहा को ही मुझे ख़ुशी-ख़ुशी सौंप दिया होता तो मेरे मुँह से संगीता के लिए कोई बद्दुआ न निकलती| लेकिन जिस प्रकार संगीता ने मुझसे मेरी दोनों बेटियाँ छल से छीन ली थीं उसके बाद मेरे मन में उसके रह गई थी तो बस नफरत और ये नफरत पिछलीबार जैसी नहीं थी, जब संगीता ने मुझे खुद को और नेहा को भूल जाने को कहा था| ये नफरत ऐसी थी की अगर संगीता मेरे सामने होती तो मैं उसका खून ही कर देता!

मैंने आजतक संगीता को कभी ऐसा दुःख नहीं दिया की वो मेरे साथ ऐसा खेल खेले! ये दो साल जो उसने मेरे साथ पत्नी के रूप में बिताये, इस समय में मैं उसे जितनी खुशियाँ दे सकता था, उतनी खुशियाँ मैंने उसे दीं| दुनिया के सामने हमारा ये प्यार कभी-कभी ही खुल कर बाहर आता था| फिर चाहे वो आयुष के जन्मदिन पर हम दोनों का एक प्रेमी के जोड़े के रूप में डाँस करना हो या फिर संगीता के भावुक होने पर मेरी माँ के सामने उसका मेरे सीने से लगना हो| मेरी माँ जानती थीं की उनका बेटा अपने जज्बातों को छुपा नहीं पाता और कभी-कभी बिना सोचे समझे सबके सामने अपनी दोस्त रुपी भाभी को अपने गले लगा लेता है, चूँकि माँ की नज़रों में ये बस देवर-भाभी का प्यार था इसलिए वो कुछ नहीं कहती थीं|

'इतना प्यार देने के बावजूद भी संगीता ने आखिर क्यों उसने मेरे साथ ऐसा विश्वासघात किया?' इस एक सवाल ने मुझे बेचैन कर दिया था| अब मैंने कुछ गलत किया नहीं था जिस कारण संगीता ने मेरे साथ ऐसी दग़ाबाज़ी की इसलिए संगीता को दोषी मानते हुए मेरे दिल से उसके लिए आह निकली; "जितना मैं तड़प रहा हूँ, उतना ही तुम भी दुःख भोगोगी!!!" दुःख से तड़प रहे दिल से ये आह निकली थी इसलिए ये आह खाली जाती ऐसा तो हो नहीं सकता था!
 
रात नौ बजे माँ मेरे कमरे में आईं और कमरे की लाइट जलाई, मैं उस समय पीठ के बल लेटा छत को घूर रहा था तथा अपने बच्चों की प्यारी सी यादों में खोया हुआ था| मेरी ये दशा देख कर मेरी माँ को मेरी चिंता हो रही थी| माँ ने मुझे दो-तीन बार झकझोड़ कर उठ कर बैठने को कहा| "बेटा, खाना खा ले...सुबह से तूने कुछ नहीं खाया|" माँ ने जब खाने के लिए पुछा तो मुझे याद आया की कैसे मेरे तीनों बच्चे मुझे अपने हाथों से खाना खिलाया करते थे| वो प्यारभरा दृश्य याद कर मेरी आँखों से आँसूँ बह निकले|

मेरी आँखों में फिर से आँसूँ देख माँ ने मुझे अपने गले लगाया और मेरी पीठ थपथपाकर चुप कराने लगीं| परन्तु मेरी माँ का यूँ मेरी पीठ थपथपाना मुझे स्तुति की याद दिला रहा था, रात को जब स्तुति मेरे सीने पर सर रख कर सोती थी तब मैं इसी प्रकार उसकी पीठ थपथपाकर सुलाया करता था|

मुझे रोता हुआ देख माँ मेरे साथ बैठ गईं तथा मेरे बालों पर हाथ फेरते हुए मुझे समझाने लगीं ताकि मैं अपने बच्चों के मोह से बाहर निकलूँ| लेकिन मेरा मन मुझे बच्चों के मोह से बाहर आने ही नहीं देना चाहता था इसलिए माँ की कही बातें मेरे एक कान से होते हुए दूसरे कान से बाहर निकल रही थीं| मैं एक बुत बन कर माँ की बातें सुन रहा था मगर मेरी आँखों के सामने तो मेरे बच्चों के साथ बिताया हुआ वो सुखद समय किसी फिल्म की तरह चल रहा था|

तभी अचानक से मेरे मन में एक सवाल कौंधा; "माँ...अगर उस दिन संगीता...ख़ुशी-ख़ुशी नेहा और स्तुति को मुझे गोद देने के लिए राज़ी हो जाती तो क्या आप...?" सिसकते हुए मेरे मुख से ये बोल निकले थे इसलिए मैं अपनी बात पूरी नहीं कर पाया|

मेरा सवाल समझते हुए माँ ने मेरी ठुड्डी पकड़ी और बोलीं; "बेटा, मैं तेरा बच्चों से मोह अच्छे से समझती हूँ! यक़ीन मान की अगर संगीता मुझसे इस बारे मैं बात करती तो मैं कभी मना नहीं करती! अपने बेटे की हर ख़ुशी मुझे मंज़ूर है!" माँ के मुख से ये बात सुन मेरा दिल ख़ुशी से खिल गया और मेरे रोते हुए चेहरे पर मुस्कान की किरण चमकने लगी! माँ जिस तरह सख्ती दिखाते हुए मुझे बच्चों से दूर होने को कहती थीं, उसे देख कर मुझे लगता था की शायद मेरी माँ नहीं चाहतीं की मैं बच्चों से अधिक मोह बढ़ाऊँ मगर जब माँ ने अभी ये बात बोली तो मुझे एहसास हुआ की जैसे मेरा अपने तीनों बच्चों से मोह था वैसे ही माँ भी अपने तीनों पोता-पोती से बहुत प्यार करती थीं| आखिर वो मेरे तीनों बच्चे ही थे जिन्होंने मेरी माँ को दादी बनने का सुख दिया था!

बहरहाल, माँ की हाँ मिलने से मैंने सोच लिया था की कल सुबह ही मैं गॉंव के लिए निकलूँगा और सबसे लड़-झगड़ कर अपने तीनों बच्चों को अपने साथ वापस ले कर आ जाऊँगा| फिर चाहे भले ही मुझे किसी से लड़ना पड़े, मैं सबसे लड़ लूँगा! फैसला तो मैंने ले लिया था मगर मेरी माँ मुझे गॉंव जाने नहीं देतीं क्योंकि उन्हें डर था की कहीं गॉंव में फिर से मुझ पर हमला हुआ तो क्या होगा?! अतः मुझे सुबह माँ से झूठ बोल कर गॉंव निकलना था|

अगली सुबह मैं 6 बजे ही गॉंव जाने के लिए तैयार हो कर अपने कमरे से बाहर निकला| मुझे तैयार देख माँ समझ गईं की मेरे दिमाग में कौन सा कीड़ा कुलबुला रहा है! "माँ, मैं कुछ काम सेबाहर जा रहा हूँ...कल सवेरे तक लौट आऊँगा|" इतना सुनना था की माँ भोयें सिकोड़ कर मुझे देखने लगीं और बोलीं; "अगर मुझसे झूठ बोल कर गॉंव गया तो मैं तुझसे कभी बात नहीं करुँगी!" माँ जानती थीं की मैं गॉंव ही जाऊँगा इसलिए उन्होंने मुझे खुली चेतावनी दे दी थी| मेरी माँ की ये चेतावनियाँ कतई खोखली नहीं होती थीं, आजतक उन्होंने जब भी किसी को ऐसी चेतावनी दी हैं तो वो अपनी बात पर अडिग रही हैं! मैं जानता था की माँ की बाँधी गई इस चेतावनी रुपी लक्ष्मण रेखा अगर मैंने लाँघि तो भले ही मैं अपने बच्चों को पा जाऊँ मगर अपनी माँ को खो दूँगा इसलिए मैं जहाँ था वहीं रुक गया|

"माँ....आप जानते हो मैं नेहा, आयुष और स्तुति के बिना नहीं रहा सकता और...और वो दोनों भी मेरे बिना नहीं रह सकते इसीलिए मैं उन्हें वापस लाने जा रहा हूँ| प्लीज मुझे मत रोको, मुझे जाने दो माँ! मेरी ये आखरी ज़िद्द मान लो माँ, उसके बाद आप जो कहोगे मैं वही करूँगा!" मैंने माँ के आगे हाथ जोड़ते हुए विनती की|

"पिछलीबार तुझे गॉंव जाने दिया था तो तेरी जान पर बन आई थी, इस बार फिर वैसा हुआ तो मैं यहाँ अकेली क्या करुँगी? कौन हैं यहाँ तेरे सिवा मेरा? तू क्यों बच्चों के प्यार में अँधा हुआ जा रहा है?! तुझे क्यों ये बात समझ नहीं आती की जबरदस्ती एक माँ से उसके बच्चों को जुदा नहीं किया जाता! कोई तेरा साथ नहीं देगा, बल्कि सब तुझे ही कोसेंगे और फिर उन जंगलियों का क्या भरोसा अगर किसी ने तुझे कुछ कर दिया तो?! नहीं...तू बिलकुल गॉंव नहीं जाएगा! अगर तू गॉंव गया तो हम माँ-बेटे का रिश्ता खत्म!" माँ ने मुझे खोने का अपना डर ज़ाहिर करते हुए मुझसे रिश्ता तोड़ने की धमकी दे दी थी|

मैं इस समय बड़े अजीबो-गरीब हालातों में फँसा था, अगर अपने बच्चों को चुनता हूँ तो जन्म देने वाली अपनी माँ को खो दूँगा और अगर माँ को चुनता हूँ तो अपने खून के अंश को खो दूँगा!

आखिरकर एक माँ के दूध का क़र्ज़, खून के रंग पर भारी पड़ा और एक पिता...एक बेटे के आगे हार गया! सर झुकाये मैं कुर्सी पर बैठ गया और अपनी बेबसी पर आँसूँ बहाने लगा| माँ उठ कर मेरे पास आईं और मेरे आँसूँ पोंछते हुए बोलीं; "बेटा, ठोकर खा कर ही इंसान सीखता है| तुझे तेरे जीवन की इतनी बड़ी ठोकर लग गई है, अब खुद को सँभाल और बच्चों का ये मोह त्याग दे! रिश्ते वही गहरे होते हैं जो माँ-बाप या शादी-ब्याह से जुड़ते हैं| उनके अलावा ये चाचा-ताऊ, भतीजा-भतीजी के रिश्ते बस कुछ पल के होते हैं| कल को तेरी शादी होगी, बीवी होगी, बच्चा होगा तो वही तेरे सगे होंगें|" मेरी माँ बच्चों के लिए मेरे प्यार को तो समझती थीं मगर वो मेरे प्यार को जो चाचा-भतीजा-भतीजी वाला रिश्ते का नाम दे रहीं थीं, ये बात मेरे दिल को बहुत चुभ रही थी!

इस समय मैं एक बेबस और हारा हुआ पिता था, जो चाह कर भी अपने बच्चों को अपने पास नहीं ले कर आ सकता था|

उधर गॉंव में, भाईसाहब सबको ले कर सीधा अपने घर पहुँच गए थे ताकि नेहा की नानी जी सभी से भेटा लें| नेहा जानती थी की उसकी नानी जी मुझे कितना प्यार करती हैं इसलिए उसने अपनी मम्मी के बारे में सारा सच कह दिया| सारी बात सुन नेहा की नानी जी को बहुत गुस्सा आया लेकिन वो संगीता को डांटें उससे पहले ही उसने अपने उठाये इस कदम को ये कह कर जायज करार दे दिया की चूँकि मेरा मोह बच्चों से अधिक है, ऐसे में उनके जाने पर मैं बहुत रोता| मैं अधिक न रोऊँ उसके लिए ही संगीता ने ये छल किया था!

नेहा की नानी जी, संगीता की चालकी भरी बातों में आ गईं और उन्होंने नेहा को ही समझना शुरू कर दिया की उसे यूँ रोना नहीं चाहिए| इस समय तक नेहा के मन में अपनी मम्मी के प्रति नफरत अपना कब्ज़ा जमा चुकी थी इसलिए नेहा ने चुप-चाप अपनी नानी जी की बात सुन ली| फिर शाम हुई और भाईसाहब सभी को बड़के दादा के घर छोड़ आये| आयुष को तो जाते ही सभी का खूब सारा प्यार मिला, वहीं बेचारी नेहा और स्तुति अकेली रह गईं| स्तुति के लिए ये जगह नई थी, लोग नए थे इसलिए वो बेचारी डरी-सहमी अपनी दिद्दा से लिपटी हुई खड़ी थी| तभी मेरे पिताजी की नज़र स्तुति पर पड़ी, उन्होंने इशारे से स्तुति और नेहा को अपने पास बुलाया| पिताजी के साथ नेहा का मोह पहले से था इसलिए नेहा उनके पास चली गई तथा अपने दादा जी के गले लग कर मुझे याद कर रोने लगी| पिताजी ने सबसे पहले नेहा को लाड कर चुप कराया और फिर स्तुति को गोदी लेने को हाथ बढाए| चूँकि स्तुति ने मेरे पिताजी को आज पहलीबार देखा था इसलिए अपनी गर्दन न में हिलाते हुए वो उनकी गोदी में जाने से मना कर रही थी|

तब नेहा ने अपने दादा जी का तार्रुफ़ स्तुति से करवाया; "स्तुति, ये दादा जी हैं...मेरे पापा जी के पापा जी!" स्तुति ने अपनी दिद्दा की बात बड़े गौर से सुनी, जो बात स्तुति को अच्छी नहीं लगी वो था नेहा को मुझे अपना पापा जी कहना! स्तुति हमेशा मुझे अपना पपई मानती थी और उसके आलावा अगर नेहा मुझे अपना पापा जी कहती तो स्तुति को ये बिलकुल अच्छा नहीं लगता था| अपनी दिद्दा की बात सुन स्तुति ने अपनी तरफ इशारा करते हुए बोली; "पपई के पपई?" अपनी छोटी बहन की बात सुन आखिर नेहा के चेहरे पर छोटी सी मुस्कान आ ही गई और उसने हाँ में अपना सर हिला दिया|

इधर पिताजी जानते थे की नेहा मुझे पापा जी कहती है मगर स्तुति मुझे 'पपई' कह कर बुलाती है ये जानकार उनके चेहरे पर भी मुस्कान छा गई! अपनी पोती को गोदी ले कर लाड करते हुए पिताजी बोले; "मुन्नी, तू बिलकुल मेरे मानु जैसी दिखती है! मानु जब छोटा था न तो तेरी तरह गोल-मटोल था|" आज कई दिनों बाद अपने बेटे के बचपने को याद कर एक पिता के चेहरे पर निर्मम मुस्कान आ गई थी|

उस दिन से जबतक नेहा और स्तुति गॉंव में थे, तब तक उन्हें सिर्फ और सिर्फ मेरे पिताजी से ही सबसे ज्यादा प्यार मिला| कभी- कभार बड़की अम्मा स्तुति को थोड़ा बहुत लाड कर लेती थीं, लेकिन उनके अलावा कोई स्तुति को लाड-प्यार नहीं करता था|

इधर संगीता और बच्चों को संगीता के ससुराल छोड़ जब भाईसाहब घर लौटे तो उन्होंने मुझे फ़ोन किया| उन्होंने बताया की तीनों बच्चे सही-सलामत गॉंव पहुँच गए हैं तथा संगीता के मना करने के कारण उन्होंने, नेहा की नानी जी ने और भाभी जी ने जो मेरा फ़ोन नहीं उठाया उसके लिए उन्होंने माफ़ी माँगी| मैं जनता था की संगीता के कारण ही कोई मेरा फ़ोन नहीं उठा रहा इसलिए मैंने किसी से कोई गिला-शिकवा नहीं किया|

"एक बात पूछनी थी भाईसाहब, आप भी अपनी बहन के छल में शामिल थे?" मेरे द्वारा ये सवाल सुनते ही भाईसाहब मुझे माफ़ी माँगते हुए बोले; "हमका माफ़ कई दे मानु! संगीता हमका फ़ोन करिके कहिस की हम तोहसे झूठ कही की हम सबै दुइ दिन बाद जाए वाले हन| हम पूछें की ई झूठ काहे, तो मुन्नी कहिस की सबका यूँ गॉंव जाए पर तोहार दिल टूट जाइ...एहि से ई झूठ जर्रूरी है!" भाईसाहब की बात सुन मैं समझ गया की संगीता ने मुझसे ही नहीं बल्कि सबसे झूठ कहा है| मैंने आगे भाईसाहब से कुछ नहीं कहा क्योंकि अब उनसे कुछ भी कहना बेकार था!

फिर मेरी बात हुई नेहा की नानी जी और भाभी जी से| नेहा की नानी जी और भाभी जी ने भी मुझे संगीता के इस छल करने की वही सफाई दी जो भाईसाहब ने दी थी की संगीता ने जो किया उसमें मेरी भलाई छुपी थी इसलिए मैं संगीता से गुस्सा न रहूँ, परन्तु मैंने इसके जवाब में उनसे कुछ नहीं कहा| मेरे मन में संगीता के लिए बस नफरत भरी थी और इस समय मेरे मुँह से बस उसके लिए गालियाँ ही निकलनी थीं जो की मैं सबके सामने नहीं देना चाहता था|

मेरा मन नेहा, आयुष और स्तुति से बात करने का था इसलिए मैंने भाईसाहब से विनती की कि वह चुपके से एक बार मेरी तीनों बच्चों से बात करवा दें, अब भाईसाहब रोज़-रोज़ तो अपनी बहन के घर जा नहीं सकते इसलिए उन्होंने कहा की वो जब उस तरफ जाएंगे तो अवश्य मेरी बात करवा देंगे|

दूसरे दिन की बात है, मैं बिस्तर पर पड़ा हुआ संगीता के दिए धोखे के बारे में सोच रहा था| "अगर मैं घर से निकला ही नहीं होता तो संगीता अपने इस नपाक इरादे में कभी कामयाब न होती!" मन में आये इस ख्याल ने मेरा ध्यान संतोष के फ़ोन की तरफ खींचा| मैं एकदम से उठ बैठा और संतोष को फ़ोन मिला दिया; "संतोष, एक बात बता...तूने वो चेक सुबह की बजाए शाम को क्यों जमा किया?" मेरा पुछा ये सीधा सा सवाल सुन संतोष एकदम से खामोश हो गया! संतोष को मैंने कभी अपना मुलाज़िम नहीं माना था, उससे मैं दोस्तों की तरह ही बात करता था| गलतियाँ वो पहले भी करता था लेकिन जब मैं उससे उसकी गलती के बारे में पूछता तो वो सच बोल दिया करता था| परन्तु आज उसका चुप होना ये बता रहा था की उसने ये गलती जानबूझ कर की है!

"संगीता ने बोला था न?" मैंने थोड़ा गुस्से से संतोष से पुछा तो उसके मुँह से "जी" शब्द निकला| दरअसल मैंने संतोष को जब चेक दिया तब संगीता घर में मौजूद थी तथा उसने मेरी संतोष से हुई बात सुन ली थी और उसने इसी का फायदा उठाया था|

"मैंने तुझे कभी अपना नौकर नहीं समझा, हमेशा अपना पार्टनर...अपना दोस्त समझा| तुझे हमेशा इज्जत दे कर बात की और तूने इसका ये सिला दिया?! एक पल में तू संगीता की बताओं में आ गया और मुझसे झूठ बोला...मेरे साथ दगा किया?!

तुझे पता भी है की तेरे बोले इस एक झूठ से मैंने क्या-क्या खोया? तेरे इस एक झूठ की वजह से मैं घर से तेरी मदद करने को निकला, जिसका फायदा उठा कर संगीता मेरी दोनों बच्चियों को ले कर...बिना मुझे बताये गॉंव चली गई! मैं आखरीबार अपनी बच्चियों को गोद ले कर प्यार भी नहीं कर पाया....और ये सब तेरी वजह से हुआ!

आज के बाद तेरे और मेरा कोई लेना-देना नहीं रहेगा...और न ही तू कभी मुझे फ़ोन करेगा!" इतना कह मैंने फ़ोन काट दिया| संतोष को नहीं पता था की उसके एक झूठ के कारण मुझ पर क्या बीती थी इसलिए वो बेचारा मुझसे माफ़ी माँगने मेरे घर आ गया पर मैंने उससे मिलने से भी मना आकर दिया और अपने कमरे में बैठा कुढ़ता रहा! माँ ने ही उसे समझाया की इस समय मेरा दिल बहुत जख्मी है, जब मेरा मन शानत होगा तो वो मुझे समझाएंगी|

3 दिन बीते और ये तीन दिन मेरे लिए कैसे बीते ये बता पाना मुश्किल है| अपने कमरे में खुद को कैद कर मैं बस बिस्तर पर पड़ा हुआ था| माँ खाना ले कर आतीं तो मैं खाने से मना कर देता| मेरा दुःख समझते हुए माँ मुझे लाड-प्यार कर या अपनी कसम से बाँध कर कमसकम दिन में एक बार तो खाना खिला ही देतीं|

चौथे दिन एक अनजान नंबर से फ़ोन आया, फ़ोन बजता देख मेरा दिल बोला की कहीं ये फ़ोन नेहा को तो नहीं? मैंने फौरन फ़ोन उठाया और कान से लगाया; "पापा जी!!!" चार दिन बाद नेहा की आवाज़ सुन मेरी ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा और मैं ख़ुशी के मारे रो पड़ा!

दरअसल नेहा का दिल मुझसे बात किये बिना बेचैन हो रहा था इसलिए वो स्तुति को ले कर, किसी को बिना बताये पड़ोस के गॉंव में अपनी एक पुरानी दोस्त के घर जा पहुँची और वहाँ से नेहा ने मुझे फ़ोन मिलाया था|

"पापा जी....प्लीज....आप यहाँ आ जाओ और मुझे ...और स्तुति को यहाँ से ले जाओ!" नेहा बिलख-बिलख कर रोते हुए बोली| मैं उस वक़्त नेहा से कुछ नहीं छुपाना चाहता था इसलिए मैंने उसे मेरी माँ द्वारा मुझे अपनी कसम से बाँधने के बारे में बता दिया ताकि कहीं मेरी बिटिया मुझे गलत न समझे|

मेरी बात सुन नेहा को भी मेरी जान का भय लगने लगा, साथ ही मेरी बिटिया मेरा अपनी माँ के प्रति दयातित्व को अच्छे से समझ गई| जब नेहा दिल्ली में थी तो उसने देखा था की मेरी माँ मुझसे कितना प्यार करती है| कहीं न कहीं, नेहा भी ऐसा प्यार अपनी मम्मी से चाहती थी मगर संगीता का प्यार करने का ढंग नेहा को कभी समझ ही नहीं आया|

"तो पापा जी...अब हम...कभी नहीं ...?" नेहा सिसकते हुए बोली और अपनी बात अधूरी छोड़ दी| मुझसे सदा के लिए दूर होने का डर नेहा को आगे नहीं बोलने दे रहा था| वहीं नेहा के इस सवाल ने मुझे भीतर से झकझोड़ कर रख दिया था! परन्तु अपनी बिटिया को हिम्मत देने के लिए, उसे उम्मीद देने के लिए मैंने नेहा से कहा; "बेटा, ऐसा मत सोचो! पिछलीबार जब आपकी मम्मी के कारण हम अलग हुए थे तब मैंने आपसे मिलने की उम्मीद कभी नहीं छोड़ी थी और देखो क़िस्मत ने हमें मिलवा दिया था न?! ऐसे ही आप भी हमारे फिर से मिलने की उम्मीद मत छोडो, देखना हम एक न एक दिन ज़र्रूर मिलेंगे!" मैंने नेहा को एक ऐसी उम्मीद बँधा रहा था जिस पर मुझे तनिक भी भरोसा नहीं था!

"ठीक है पापा जी, मैं रोज़ भगवान जी से प्रार्थना करुँगी की वो हम दोनों को जल्दी मिलवाएं|" नेहा के दिल में अपने पापा जी से मिलने की उम्मीद की रौशनी जाग चुकी थी और मेरे लिए यही बहुत था|

नेहा ने अपने आँसूँ पोंछे और मुझसे बोली; "पापा जी, स्तुति से बात कर लो| वो न आपको याद कर के बहुत रोती है|" ये कहते हुए नेहा ने स्तुति को आवाज़ दी| स्तुति तब एक पेड़ के पास खड़ी खेत में जुताई कर रहे बैलों को गौर से देखने में लगी थी| जब नेहा ने उसे आवाज़ दी और बताया की मेरा फ़ोन है तो स्तुति का नाज़ुक सा दिल भावुक हो गया; "पपई...पपई?..." इतना कहते हुए स्तुति रो पड़ी| मेरी गुड़िया जिसे मैं कभी रोता हुए नहीं देख सकता था, वो आज मुझे याद कर फ़ोन पर इस कदर रो रही थी और मैं उसे चुप कराने के लिए गोदी ले कर लाड नहीं कर सकता था! इस बेबसी के एहसास ने मुझे बहुत लताड़ा!

"मेरा बच्चा...मेरा बाबू....बस...रोना नहीं...बेटा...I'm sorry!!!" ये कहते हुए मैं रो पड़ा| मैं स्तुति को गोदी ले कर अपने सीने से लगाना चाहता था मगर संगीता और मेरी माँ की वजह से मैं बँधा हुआ था!

फ़ोन स्पीकर पर था और जब नेहा ने मेरा रोना सुना तो मेरी बेटी मुझे ही हिम्मत देने लगी; "पापा जी, रोना नहीं! आप मेरे और स्तुति को अच्छे पापा जी हो...आप ऐसे रोओगे तो हम पर क्या बीतेगी? प्लीज पापा जी... मैं..मैं स्तुति को समझाऊँगी..." ये कहते हुए नेहा का मन फिर भर आया था| मुझे ये देख कर ख़ुशी हो रही थी की नेहा इतनी बड़ी हो गई है की अपने साथ-साथ मुझे तथा स्तुति को भी सँभालने में लगी हुई है|

"बेटा, अगर आपकी मम्मी ने उस दिन ख़ुशी-ख़ुशी आप दोनों को मुझे गोद दे दिया होता तो आपकी दादी जी ने आपको ख़ुशी-ख़ुशी अपना लिया होता और हम चारों आज ख़ुशी-खुशी रह रहे होते| लेकिन आपकी मम्मी ने जो हमारे साथ (मेरे, नेहा और स्तुति के साथ) जो छल किया उससे आपकी दादी जी का दिल भी दुखा है और यही कारण है की वो मुझे आपको जबरदस्ती वापस लाने के लिए रोक रहीं हैं! आपकी मम्मी ने हमारी ज़िन्दगी में ज़हर घोला है...हमें यूँ जबरदस्ती अलग किया है और इसके लिए मैं आपकी मम्मी को कभी माफ़ नहीं कर सकता! मैं उनसे नफरत करता हूँ!" मैंने अपने गुस्से में बहते हुए सच कह दिया था, उस समय मैं नहीं जानता था की नेहा के दिल में पहले ही अपनी मम्मी के खिलाफ ज़हर घुला हुआ है! "मैं भी मम्मी से नफरत करती हूँ पापा जी और जब स्तुति बड़ी होगी तो मैं उसे भी बताऊँगी की हमारी मम्मी ने हमारे साथ कितना गलत किया!" नेहा गुस्से से अपने दाँत किटकिटाते हुए बोली|

कोई और दिन होता तो मैं नेहा को समझाता की वो अपनी मम्मी के खिलाफ ऐसा न सोचे, लेकिन इस बार मैंने ऐसा कुछ नहीं किया क्योंकि मेरी नज़र में संगीता अपनी बेटी की इस नफरत की हक़दार थी!

उस दिन से कभी-कभी चोरी-छुपे हम बाप-बेटी की फ़ोन पर बातें होने लगी| जितना बेसब्री से नेहा मुझे फ़ोन करने के मौके खोजती थी, उतनी ही बेसब्री से मुझे अपनी बिटिया के फ़ोन का इंतज़ार रहता था|

लेकिन फिर एक दिन हम बाप-बेटी की इस छोटी सी ख़ुशी को बड़के दादा की नज़र लग गई! एक दिन बड़के दादा ने नेहा को चोरी-छुपे घर से निकलते देख लिया, उन्होंने नेहा का पीछा किया और मुझसे फ़ोन पर बात करते हुए रंगे-हाथों पकड़ लिया| उन्हें नेहा का यूँ उनकी चोरी मुझसे बात करना और मुझे 'पापा जी' कहना बहुत बुरा लगा और गुस्से में आ कर बड़के दादा ने नेहा पर हाथ छोड़ दिया! नेहा का फ़ोन तो उससे पहले ही संगीता द्वारा छीना जा चूका था, अब मुझसे फ़ोन पर बात करने की छोटी सी ख़ुशी भी नेहा से छीनी जा चुकी थी|

नेहा ने एक दो बार अपने दादा जी यानी मेरे पिताजी से कहा भी की वो उसे अपना फ़ोन दे दें ताकि नेहा मुझसे बात कर ले मगर पिताजी ने नेहा को मुझसे बात न करने के लिए प्यार से समझा-बुझा कर बात ही खत्म कर दी| इधर मेरा मन अपनी बेटी से बता करने को व्यकुल रहता था इसलिए मैंने बेशर्मी दिखाते हुए बड़के दादा के घर के सारे सदस्यों को फ़ोन किया पर किसी ने मेरा फ़ोन नहीं उठाया| तभी मुझे याद आया की नेहा का जन्मदिन आ रहा है और उसके जन्मदिन के बहाने मैं भाईसाहब को नेहा से मिलने जाने को कह सकता हूँ|

मैंने नेहा, स्तुति और आयुष के लिए गिफ्ट्स पैक कर भाईसाहब के घर भिजवाए| बड़के दादा को शक न हो इसलिए मैंने भाईसाहब से कह दिया की वो ये झूठ कहें की ये गिफ्ट्स उनकी तरफ से हैं| भाईसाहब बच्चों के लिए तोहफे ले कर पहुँचे और नेहा को उसके जन्मदिन की मुबारकबाद दी| सिवाए मेरे पिताजी, आयुष, स्तुति और संगीता के किसी ने नेहा को जन्मदिन की शुभकामनायें नहीं दी थीं| किसी को जैसे फर्क ही नहीं पड़ रहा था की आज नेहा का जन्मदिन है! वो तो भाईसाहब के आने पर बड़के दादा ने ऐसे जताया की जैसे उन्हें नेहा के जन्मदिन की बहुत ख़ुशी है!

फिर भाईसाहब ने तीनो बच्चों को मेरे भेजे हुए तोहफे अपने नाम से दिए तो नेहा तुरंत समझ गई की ये तोहफे उसके मामा जी नहीं बल्कि मैंने भेजे हैं! नेहा ने गुपचुप इशारे से आयुष को बता दिया की ये गिफ्ट मैंने भेजे हैं| वहीं इन गिफ्ट्स में स्तुति का एक मन पसंद खिलौना था जो संगीता मेरे घर में छोड़ गई थी| स्तुति ने जब अपना वो खिलौना देखा तो वो ख़ुशी से "पपई...पापी" कह कर कूदने लगी! वो तो नेहा ने फुर्ती दिखाते हुए स्तुति को गोद में उठाया और उसे गुदगुदी कर हँसा दिया ताकि स्तुति और कुछ न बोल दे!

कुछ देर रूक कर भाईसाहब चलने को हुए तो नेहा उन्हें छोड़ने के बहाने घर से थोड़ा दूर आई| तब भाईसाहब ने नेहा को अपना फ़ोन दिया और बोले; "ले मुन्नी, आपन पापा जी से बात कई ले!" इधर मैं सुबह से फ़ोन हाथ में लिए बैठा था इसलिए जैसे ही नेहा का कॉल आया मैंने एक घंटी में फ़ोन उठा लिया; "Happy birthday मेरा बच्चा! I love you बेटा! आपको आज के दिन की खूबसारी बधाई हो!" मेरी दी गई बधाई सुन नेहा रो पड़ी और बोली; "I miss you पापा जी! I wish आज आप यहाँ होते और मुझे गोदी ले कर लाड-प्यार करते!" अपनी बेटी की इच्छा को सुन मैं रो पड़ा| अपनी बिटिया की सारी इच्छाएं पूरी करने वाला मैं, आज इतना लाचार हो गया था की मैं नेहा की इतनी सी छोटी सी इच्छा को पूरा न कर पाया!

खैर, मुझे रोता हुआ सुन नेहा ने मुझे हिम्मत बँधा कर चुप कराया| मैंने नेहा से उसके स्कूल के बारे में पुछा तो पता चला की बड़के दादा ने आयुष का तो दाखिला नए स्कूल में करवा दिया परन्तु नेहा को पढ़ने भेजने की उन्होंने सख्त मनाही कर दी! "बेटा, आपने इतनी बड़ी बात मुझसे छुपाई?" मैंने नेहा से ये सवाल पुछा, पर बेचारी नेहा मुझे बताती भी तो कैसे?

बड़के दादा के इस रवैय्ये पर मुझे बहुत गुस्सा और मैंने भाईसाहब से नेहा को पढ़ने देने के लिए बात की| भाईसाहब ने बताया की वो पहले ही इस बारे में बड़के दादा से बात कर चुके हैं मगर वो नेहा को आगे पढ़ाने के इच्छुक नहीं हैं| उनका (बड़के दादा का) कहना है की नेहा का ब्याह होना है तो बजाए पढ़ाई पर पैसे बर्बाद किये जाएँ इससे अच्छा है की नेहा को घर के काम-काज सिखाये जाएँ!

अब मैं तो गॉंव आ कर बड़के दादा पर नेहा की पढ़ाई का दबाव बना नहीं सकता था क्योंकि एक तो मेरी माँ मुझे गॉंव जाने नहीं देती और दूसरा बड़के दादा ने मुझे गॉंव आने के लिए मना कर रखा था इसलिए मैंने दूसरा रास्ता खोज निकाला|

भाईसाहब की गॉंव के प्रधान से अच्छी जान-पहचान थी, जिसका फायदा उठाते हुए मैंने भाईसाहब को उसे दिल्ली लाने को कहा| भाईसाहब ने अपनी दूकान का माल लेने तो दिल्ली आना ही था इसलिए वो प्रधान को घुमाने का झाँसा दे कर साथ ले आये| फिर मैं पहले से तय जगह और दूकान के सामने मैं भाईसाहब से ऐसे मिला मानो मैं वहाँ से गुज़र रहा हूँ| मेरा चेहरा घनी दाढ़ी से ढका हुआ था, बाल बढे हुए थे और वजन भी थोड़ा बढ़ चूका था इसी वजह से भाईसाहब को मुझे पहचानने में दिक्क्त हुई|

खैर, मैंने प्रधान से बात घुमा फिरा कर शुरू की और धीरे-धीरे नेहा की पढ़ाई का मुद्दा उठाया| जब मैंने प्रधान को बताया की यहाँ रह कर नेहा स्कूल में अव्वल आती थी और यदि नेहा को पढ़ने दिया जाए तो दसवीं के इम्तेहान में पूरे प्रदेश में अव्वल आएगी जिससे प्रधान जी का नाम अखबार में छपेगा की उनके गॉंव की एक लड़की पूरे प्रदेश में प्रथम आई है| मेरा दिया ये लालच प्रधान जी को भा गया और उन्होंने गॉंव लौटते ही बड़के दादा पर नेहा को स्कूल में भर्ती करवाने का दबाव डाल खुद स्कूल जा कर बीच साल में नेहा का दाखिला करवाया| शुक्र है की प्रधान जी ने मेरा नाम नहीं लिया वरना बड़का दादा कभी नहीं मानते!

मेरी बिटिया की स्कूल में भर्ती हो गई थी और नेहा इससे बहुत खुश थी| अपने पापा जी का प्यार न सही मगर उसे विद्या तो मिल गई, जिससे उसका जीवन संवरने वाला था|

इधर मैं बच्चों के ग़म और संगीता के दिए धोके के कारण इस कदर आहात हो चूका था की मेरा मानसिक संतुलन हिल चूका था! पिताजी का ठेकेदारी वाला काम मैं बंद कर चूका था और मेरा जूतों का ऑनलाइन (online) वाला काम ई-कॉमर्स वेबसाइट (E-commerce websites) ने शिपिंग (shipping) का किराया 10 गुणा बढ़ा कर मेरा भट्टा बिठा दिया था! इस वजह से मैं सारा दिन अपने कमरे में पड़ा रहता था| रात जाग कर काटता था और आधा दिन सोते हुए में निकल जाता था! मैंने खुद को इस तरह से दुनिया से काट लिया था की फ़ोन तो मैं अब इस्तेमाल ही नहीं करता था!

रात के सन्नाटे में मुझे मेरे बच्चों की आवाजें सुनाई देती थीं जो मुझे सोने नहीं देती थीं| दिल में एक आस हमेशा बानी रहती थी की अभी कहीं से नेहा फुदकते हुए आएगी और मेरे सीने से लग जायेगी! अभी आयुष दौड़ता हुआ कमरे में आएगा और मुझसे कहेगा की मुझे कहानी सुनाओ! अभी स्तुति मुझे अपनी प्यारी सी आवाज में बुलाएगी; "पपई"!

ये झूठी उमीदें मुझे रात भर जगा कर रखती थीं, लेकिन कुछ समय बाद जब ये उमीदें टूटती तो मेरा दिल बहुत रोता और गुस्से में मन ही मन संगीता को गाली देता की उसने मेरे साथ इतना बड़ा विश्वासघात किया!

जो इंसान सुबह के 5 बजे उठ जाया जरता था वो अब रो-रो कर 5 बजे सोता था.और ये नींद मेरे लिए ज़रा भी सुखदाई नहीं होती थी क्योंकि जब नींद आती तो सपने आते और सपनो में मुझे बस मेरे तीनों बच्चे नज़र आते थे|

जब दोपहर के 1 बजते तो माँ मुझे उठाने आतीं तो उन्हें रात में रो-रो कर खराब हुआ मेरा चेहरा दिखता| "बेटा" माँ की इस एक आवाज़ पर मेरा बच्चों के साथ लाड-प्यार करने का सपना टूट जाता और मैं एकदम से उठ बैठता| जागने पर मुझे एहसास होता की मैंने बच्चों को बस अपने सपने में देखा था जबकि असलियत में वो मुझसे कोसों दूर हैं! इस एहसास से मेरा नाज़ुक सा दिल रोज़ टूटता और मैं बाथरूम में घुस खूब रोता!

मैं भले ही माँ से अपना ग़म छुपा रहा था मगर माँ तो आखिर माँ होती है, वो अपने बेटे का ग़म महसूस कर रही थी और मुझे बार-बार समझा-बुझा कर मेरे ग़म से निकालने के प्रयास करने में लगी थी| कभी जानबूझ कर मुझे हँसाने बुलाने की कोशिश करती, तो कभी मेरा मन पसंद खाना बना कर मुझे खुश करती, कभी मुझे खुद को घुमाने ले चलने को कहती तो कभी मुझे कहती की मैं उनके साथ बैठ कर कार्टून देखूँ| मैं अपनी माँ को दुखी नहीं करना चाहता था इसलिए उनकी ख़ुशी के लिए मैं झूठ-मूठ हँस लिया करता, जिससे मेरी माँ को इत्मीनान रहता की मेरा मन धीरे-धीरे सही रास्ते की ओर बढ़ रहा है|

इस समय मुझे कोई ऐसा व्यक्ति चाहिए था जिससे मैं अपने दिल की बात कह सकूँ, मैं क्या महसूस कर रहा हूँ ये मैं उसे बता सकूँ, किसी के काँधे पर सर रख कर रो सकूँ, कोई मेरी पीठ थपथपाये और मुझे फिर से उठ कर खड़ा होने के लिए मदद करे| लेकिन मेरा जख्मी दिल मुझे किसी से बात करने ही नहीं देता था, किसी से अपना दुःख साझा करने ही नहीं देता था! मैं चाहता था मैं बस अंदर ही अंदर सड़ता रहूँ और एक दिन ऐसे ही सड़-सड़ कर खत्म हो जाऊँ!

दिषु उन दिनों एक लड़की के प्यार में पड़ा हुआ था, जिससे आगे चलकर उसने शादी कर ली| अब उसने मुझे पहले ही संगीता के प्यार में दुबारा पड़ने से मना किया था मगर उसकी बात ना मानते हुए मैं संगीता की बातों में आ गया और अपना ये हाल कर लिया| फिर जब मैंने दिषु से कहा की मैं संगीता से शादी करना चाहता हूँ, तब उसने मुझे मुंबई जाते समय समझाया था की ये मुमकिन नहीं पर मेरा पक्का इरादा देखते हुए वो मुझे सहारा देने के लिए तैयार था मगर संगीता ने बार-बार मेरे शादी के प्रस्ताव ठुकराए तो मैंने ये बात दिषु को नहीं बताई वरना वो संगीता से ही लड़ पड़ता क्योंकि वो मुझे फिर से तड़पते हुए नहीं देख सकता था|

अगर आप सभी को याद हो तो दशहरे के मेले में जब पहलीबार दिषु और संगीता मिले थे, तब दिषु ने कहा था की एक बार तो मैंने इसे (मुझे) टूटने से सँभाल लिया था, दुबारा इसे नहीं सँभाल पाऊँगा और तब संगीता ने बड़े आत्मविश्वास से कहा था की वो ऐसा कभी नहीं करेगी| लेकिन हरबार की तरह इस बार भी संगीता ने अपना वादा तोडा था और इस बात को लेकर दिषु कैसी प्रतिक्रिया देता ये आप सब सोच लीजिये!

खैर, मैं दिषु के सामने दुबारा से अपना ये रंडी-रोना और बच्चों के प्यार में तड़पना नहीं दिखाना चाहता था इसलिए मैंने दिषु से बात करनी ही बंद कर दी थी| वो भी उन दिनों अपने काम और बंदीबाज़ी में ऐसा उलझा हुआ था की वो भी अपने इस 'लूज़र' दोस्त को भूल गया था| हाँ वो whats's app पर message करता था, memes आदि भेजता था और मैं दिखावे के लिए हँसने वाली emoji उसे भेज दिया करता था जिससे उसे कभी शक ही नहीं हुआ की मैं किस दौर से गुज़र रहा हूँ|

खैर लाख ग़म सही पर मेरे जीवन में एक ख़ुशी थी, जो भले ही मुझे कभी-कभी नसीब होती थी मगर उस ख़ुशी के मिलने पर मैं पलभर के लिए ही सही पर बहुत खुश होता था! वो ख़ुशी थी अपने बच्चों से फ़ोन पर बात करना|

जब नेहा का स्कूल में दाखिला हुआ तो नेहा ने कभी-कभी मौका मिलने पर अपनी दोस्त के फ़ोन से मुझे फ़ोन करना शुरू किया| नेहा की दोस्त फ़ोन स्कूल ले कर आती थी तथा नेहा लंच के समय मुझे छुप कर फ़ोन कर बात करती थी और एक दिन उसने आयुष से भी मेरी बात करवाई| "चाचू, आपने जो दीदी के जन्मदिन पर मेरे लिए खिलोने भेजे, कपड़े भेजे और मेरी पसंदीदा चॉकलेट भेजी उसके लिए बहुत सारा थैंक यू! उम्म्माआ!!!" आयुष ख़ुशी से मुझे फ़ोन पर ही पप्पी देते हुए बोला| इतने महीनों बाद ही सही मगर अपने बेटे की इस पप्पी ने मेरा दिल खुश कर दिया था|

"पापा जी, मैं आपसे इतना दूर हूँ फिर भी आपको मेरी हर जर्रूरत...मेरे बारे में कितनी चिंता है| I know आपने ही मेरा स्कूल में एडमिशन करवाया है and I'm very grateful for that! I love you पापा जी!!! उम्म्माआ!" नेहा ख़ुशी से खिलखिलाकर बोली तथा फ़ोन पर ही मुझे पप्पी दी| मेरी बिटिया बहुत होशियार थी, वो जानती थी की मैंने ही कुछ न कुछ तिगड़म लगा कर उसका स्कूल में एडमिशन करवाया है|

"मेरा बच्चा बहुत स्मार्ट है!...बेटा, पढ़ाई पर हर बच्चे का हक़ होता है, वो तो आपके दादा जी (बड़के दादा) को लड़कियों को पढ़ने देना अच्छा नहीं लगता इसलिए वो आपको स्कूल जाने से रोक रहे थे| लेकिन आपके छोटे दादा जी (मेरे पिताजी) ऐसे बिलकुल नहीं हैं, वो बस अपने बड़े भाई के आगे कुछ बोल नहीं पाते इसलिए वो आपका एडमिशन स्कूल में करवाने में असमर्थ थे| लेकिन कोई बात नहीं बेटा, मेरे पिताजी न सही...उनके बेटे ने ही अपनी बिटिया के ख्वाब पूरे करने की कोशिश की!" मैंने फ़ोन पर बड़े प्यार से नेहा को समझाते हुए कहा|

दरअसल परिवार में मेरे पिताजी का औदा अब वो नहीं था जो पहले हुआ करता था| पहले वो दिल्ली में व्यपार करते थे, उनका अपना घर था, पैसा था, एक फ़रमाबरदार बेटा था जो की अंग्रेजी स्कूल तथा कॉलेज में पढ़ा था...इसीलिए पहले जो पिताजी कह देते वो पत्थर की लकीर होती थी| लेकिन जब उनके उस फ़रमाबरदार लड़के के हाथों, अपनी आत्मरक्षा में एक गुंडे की हत्या हुई तो सारे परिवार ने पिताजी से उन्हें दिया हुआ औदा...वो ऊँचा स्थान वापस ले लिया!

मैं पूरे आत्मविश्वास से कह सकता हूँ की जब बड़के दादा ने नेहा को स्कूल में पढ़ने से रोका होगा तो पिताजी ने जर्रूर नेहा का साथ दिया होगा मगर अपने बड़े भाई के आगे उनकी चल नहीं पाई!

बहरहाल, नेहा से बात कर जब मैंने स्तुति के बारे में पुछा तो पता चला की स्तुति मुझे याद कर रोती है, तब दोनों भाई-बहन (आयुष और नेहा) उसे लाड-प्यार कर बहलाते हैं| चूँकि गॉंव में स्तुति की उम्र का कोई बच्चा नहीं था इसलिए वो बेचारी किसी के साथ खेल नहीं पाती थी| तब आयुष अपनी पढ़ाई पूरी कर स्तुति के साथ खेलता, कभी-कभी आयुष अपने दादा जी (मेरे पिताजी) को भी अपने खेल में शामिल कर लेता जिससे स्तुति का मन गॉंव में लगा हुआ था|

अब नेहा मुझे अपने स्कूल से फ़ोन करती थी जहाँ स्तुति मौजूद नहीं होती थी इसलिए स्तुति से मेरी बात ही नहीं हो पाती थी| स्तुति की हाल-खबर मुझे नेहा से मिलती थी, वहीं मैं नेहा के जरिये अपनी प्यारी भेज दिया करता था|

यही कारण था की धीरे-धीरे स्तुति के मन से अपने पपई...अपने पापा जी की याद धुंधली होती जा रही थी! हालाँकि, नेहा और आयुष अपनी छोटी बहन को मेरी याद देते रहते थे पर स्तुति थी तो छोटी ही...मुझे अपने सामने न पा कर मेरी बिटिया मुझे भूलने लगी थी!

ऐसे ही एक दिन मैं नेहा से स्तुति के बारे में पूछ रहा था तो मुझे ऐसा महसूस हुआ की नेहा अपनी बहन के बारे में झूठ बोल रही है! मैंने जब नेहा को अपनी कसम दे कर सच पुछा तो पता चला की स्तुति मुझे लगभग-लगभग भूल ही गई है! मेरी जगह उसे अब अपने बड़े भैया से स्नेह मिलने लगा है इसलिए स्तुति अब सारा समय अपने बड़े भैया के साथ ही खेलते-कूदते हुए बिताती है| तब मुझे समझ आया की ये बात बता कर नेहा मेरे दिल को चोट नहीं पहुँचाना चाहती इसीलिए वो मुझसे झूठ बोल रही थी!

"पापा जी, आपके पास आपकी बड़ी बेटी...आपकी सबसे प्यारी बेटी है न?! मैं आपको सबसे ज्यादा प्यार करती हूँ...स्तुति और आयुष से भी ज्यादा तो मेरे होते हुए आपको उन दोनों की जर्रूरत ही नहीं!" जैसे मैं बच्चों को बातें बना कर बहलाता था, वैसे ही आज मेरी बिटिया मुझे बहला रही थी|

मैंने नेहा के सामने तो खुद को सँभाल लिया मगर नेहा से बात करने के बाद मैं बहुत रोया! मेरी प्यारी बिटिया जिसके पैदा होने के लिए मैंने नौ महीने इंतज़ार किया था, जिसे मैं अपना नाम देना चाहता था, जिसके मुँह से सबसे पहला शब्द माँ नहीं 'पापा जी" निकला था, जो मेरे बिना एक पल नहीं रह पाती थी...वो बिटिया अब अपने पपई को भूलती जा रही थी!

इस ख्याल ने मेरे दिल को इस कदर भेद दिया था की मेरे दिल से बस संगीता के लिए बद्दुआ ही निकल रही थी!

मैं उस समय तक आत्मिक रूप से इतना कमज़ोर हो चूका था की मुझ में किसी भी ग़म को बर्दाश्त करने की शक्ति नहीं थी...लड़ने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता! खैर, अपनी छोटी बिटिया का प्यार खो देने के ग़म से मैं लड़ न पाया और आँखों में आँसूँ लिए अपनी बर्बादी के रास्ते पर दौड़ने लगा|

उस दिन मैंने माँ से शराब पीने की इज्जाजत माँगी; "माँ, आज मेरा मन थोड़ा पीने को कर रहा है!" मैंने सर झुकाये हुए माँ से इजाजत माँगी| पीने को मैं माँ की चोरी बाहर जा कर पी सकता था मगर माँ को इस बात का पता लगने में देर नहीं लगती और फिर उनका दिल बहुत दुखता और मैं अपनी माँ का दिल नहीं दुखाना चाहता था|

इधर मुझे सर झुकाये देख माँ ने बेमन से बस इतना कहा; "ठीक है बेटा! लेकिन तू बाहर जा कर नहीं पीयेगा, घर में चुप-चाप पी लिओ और खाना खाये बगैर नहीं पीना!" मेरी माँ ने मुझे बाहर जा कर पीने से इसलिए मना किया था क्योंकि फिर उन्हें मेरी चिंता रहती की कहीं नशे में मेरे साथ कुछ गलत न हो जाए| घर में पीता तो उनकी आँखों के सामने रहता और माँ मेरे पीने पर नज़र रख सकती थीं|

माँ की इजाजत ले कर मैं एक बोतल ले आया| माँ ने रात को मुझे पेट भर खाना खिलाया और फिर ही मुझे कमरे में जाने दिया ताकि मुझे अधिक न चढ़े, पर मैं तो चढाने के लिए ही पी रहा था! अपने कमरे में पहुँच मैंने एक ही बारी में पूरा गिलास शराब से भर दिया और पीने लगा| हर एक घूँट मुझे संगीता की याद दिलाता था, उसका मुझसे झूठ बोलना, मेरी कसम तोडना, मुझसे बातें छुपाना और आखिर में जो उसने मेरे साथ इतना बड़ा विश्वासघात किया की आज मैं इस शराब रुपी बला को फिर अपने होठों से लगाने पर मज़बूर हो गया| नेट शराब मेरा गला और पेट तो जला ही चुकी थी ऊपर से इन बातों को सकोह कर मेरा दिल भी नफरत की आग में जलने लगा! पूरा जिस्म जब जलने लगा तो दिमाग में पैदा हुआ गुस्सा और उसने मुझे एक के बाद एक घूँट पीने पर मज़बूर कर दिया!

संगीता को कोस कर थकने के बाद मुझे याद आई स्तुति की| वो पहला दिन जब मैंने स्तुति को गोदी में लिया था! वो पहलीबार जब मैंने स्तुति के मस्तक को चूमा था! वो पहलीबार जब मेरी बिटिया ने मेरी ऊँगली को अपनी छोटी सी मुठ्ठी में जकड़ा था! वो पहलीबार जब स्तुति मुस्कुराई थी! वो पहलीबार जब स्तुति ने मुझे पापा जी कह कर बुलाया था! उन सुनेहरे पलों को याद कर मेरा दिल रोने लगा! "इतने महीनों से मैं बच्चों से दूर हूँ की आज मैंने स्तुति को खोया है, फिर कुछ महीनों में आयुष मुझे भूल जायेगा और फिर एक दिन आएगा जब नेहा भी मुझे भूल जाएगी!" रोते हुए मेरे दिल से ये आह निकली| अपनी बातें सुन कर मैं किसी काँच के बर्तन के समान टूट कर चकनाचूर हो गया| उस पल ऐसा लगा जैसे मेरे पास जीने के लिए कुछ नहीं है, बस एक मौत ही मेरे लिए आखरी रास्ता है जिससे मेरे जख्मी दिल को शान्ति मिलेगी!

मैं उस वक़्त इतना हारा हुआ महसूस कर रहा था की मेरे मन में आत्महत्या करने का विचार पैदा हो चूका था| अगर मैं होश में होता तो पक्का अपनी जान ले लेता, लेकिन शराब के नशे ने उस दिन मेरी जान बचा ली! संगीता को कोसते और स्तुति को याद कर रोते हुए मैं कब वो एक गिलास दारु खींच गया मुझे पता ही नहीं चला था इसलिए जब मैंने आत्महत्या करने की सोची तो नशा सर पर सवार हो गया और मैं खड़ा ही नहीं हो पाया! खड़ा होने की कोशिश करते हुए मैं औंधे मुँह गिर पड़ा और नशे के कारण गहरी नींद में खो गया!

अगली सुबह मुझे मेरी माँ ने जगाया और मेरी ये हालत देख कर मुझे डाँटा भी मगर मुझ पर इसका कोई असर ही नहीं हुआ क्योंकि मैंने सोच लिया था की मैंने अगली रात फिर वही पीना और पी कर धुत्त हो कर सो जाना है!

जल्दी ही शराब पीना मेरा नियम बन गया और माँ को मेरी चिंता हो रही थी| उन्होंने मुझे प्यार से समझाया मगर मेरे पल्ले कुछ नहीं पड़ा, फिर उन्होंने मुझे डाँटा मगर मुझ पर इसका भी कोई असर नहीं पड़ा| तब माँ ने अंतिम उपाए के रूप में दिषु को फ़ोन कर सारी बात बताई|

मेरी इस हालत के बारे में सुन शाम के समय दिषु घर आया और मेरी बढ़ी हुई दाढ़ी, बढ़ा हुआ वज़न, झबरे बाल देख सब समझ गया की मैं किस दौर से गुज़र रहा हूँ| उसे मुझ पर बहुत गुस्सा आ रहा था इसलिए उसने मुझे ज़ोर से धक्का दिया की मैं सीधा सोफे पर जा कर गिरा! "आंटी जी, मुझे दस मिनट दीजिये मैं इसकी अक्ल ठिकाने लगाता हूँ|" इतना कह दिषु ने मेरा गिरेबान पकड़ा और मुझे खींच कर कमरे में लाया और बिस्तर पर धकेल कर गिरा दिया! उसने फौरन दरवाजा बंद किया और अपने दाँत पीसते हुए गुस्से से बोला; "बहनचोद! तेरा दिमाग खराब हो गया है जो इस तरह दारु पीने लगा है! पता है आंटी जी कितना परेशान हैं तेरी वजह से?! उसे (संगीता को) जाना था, वो चली गई और साथ ले गई तेरे बच्चों को! इस बात को अपने भेजे में जितना जल्दी उतार ले उतना अच्छा है वरना तू साले खुद भी मरेगा और आंटी जी को भी दुखी करेगा! तू यही चाहता है की तेरी वजह से आंटी जी रोयें, दुखी रहे?" दिषु मुझे डाँट रहा था मगर मुझ पर उसकी डाँट का कोई असर ही नहीं पड़ रहा था, मैं बिस्तर पर पड़ा छत को ताड़े जा रहा था! मेरी ऐसी प्रतिक्रिया देख दिषु को गुस्सा आया और उसने मेरा गिरेबान पकड़ कर मुझे बिठाया और मुझसे बोला; "भोसड़ीवाले, कुछ सुनाई दे रहा है जो मैं कह रहा हूँ?..गांडू साले कुछ तो बोल?!" दिषु मुझे गालियाँ देते हुए झकझोड़ रहा था मगर मेरे पास उससे कहने के लिए कुछ था ही नहीं इसलिए मैं बस उसका चेहरा देखने में लगा था! दिषु को लगा की मैं कहीं पागल तो नहीं हो गया इसलिए उसने मुझसे कहा की वो मुझे कल एक साइकेट्रिस्ट (psychiatrist) के पास ले जाएगा|

डॉक्टर का नाम सुन मैंने उसके हाथों से अपनी टी-शर्ट छुड़ाई और मुस्कुराते हुए बोला; "I don't give a fuck about her (Sangeeta) leaving me! Its.Stuti. छोड़ .you won't understand!" मैं दिषु से सब छुपाना चाहता था इसलिए मैंने अपनी बात अधूरी छोड़ दी| दिषु ने मुझसे पूरी बात जननी चाही मगर मैंने बात ही घुमा दी और उससे वादा कर दिया की मैं अब इस तरह भंड होने की हद्द तक नहीं पीयूँगा| मेरे किये इस वाडे से दिषु को कुछ इत्मीनान मिला इसलिए वो उस समय तो शांत हो गया| लेकिन दिषु को एहसास हो गया था की मेरा दिल बहुत जख्मी है, ऐसे में घर पर रहकर मैं कुढ़ता रहूँगा इसलिए वो मुझे बाहर ले जाने के नए-नए बहाने बनाता था| एक-आध बार तो मैं उसके साथ चला गया, लेकिन उस दौरान उसकी गर्लफ्रेंड का फ़ोन आता था और दोनों 10-15 मिनट तक बातें करते रहते थे| पता नहीं क्यों मुझे उसे उसकी गर्लफ्रेंड से बात करते देख बहुत चिढ होती थी| उसकी गर्लफ्रेंड जानती थी की दिषु मेरे साथ है और क्यों है मगर फिर भी वो जानबूझ कर फ़ोन करती थी, इसके पीछे कारण क्या था ये मुझे बाद में पता चला|

खैर, अगलीबार जब दिषु ने मुझसे कहा की मैं उसके साथ आगरा चलूँ तो मैंने बात बनाते हुए उसे कहा की वो अपनी गर्लफ्रेंड को घुमा लाये ताकि दोनों को थोड़ा सा टाइम साथ बिताने को मिले| दिषु को मेरा दिया ये आईडिया पसंद आया और वो निकल गया उस लड़की के साथ आगरा घूमने!

इधर मैंने अपने आपको थोड़ा बहुत सुधारा था, अब मैं शराब कभी-कभी पीता था और 90ml से ज्यादा नहीं पीता था जिससे माँ को थोड़ा इत्मीनान था की उनका लड़का शराबी नहीं है| घर से बाहर तो मैं कहीं जाता नहीं था इसलिए मैं दिन के समय अब माँ के पास अधिक बैठता था|

मेरी माँ मुझे छोटा बच्चा समझ मुझसे बातें करतीं और मुझे हँसाने की कोशिश करती रहतीं| कभी मेरे बालों में तेल लगातीं, तो कभी मेरा मन-पसंद खाना बनातीं, कभी कोई नई चीज बनाने के लिए मुझसे पूछती तो कभी मुझसे कुछ नया खाना मँगवाने को कहतीं| एक दिन उन्होंने कहा की आज उनका मन मेरे हाथ से बना कुछ खाने को है| माँ जानती थीं की खाना बनाने से मुझे ख़ुशी मिलती है मगर मेरा ये पसंदीदा शौक अब मुझे नहीं भाता था! "मेरा मन नहीं है कुछ बनाने का माँ, मैं बाहर से कुछ मँगा लेता हूँ!" मैंने बात बनाई और माँ का ध्यान दूसरी तरफ मोड़ दिया|

पूरा एक साल मैं दुनिया से पूरी तरह कटा-कटा रहा| मेरी ज़िन्दगी बस घर के भीतर ही सीमित रह गई थी! रात को रोना और दिन में सोफे पर बैठे-बैठे मेरा पूरा दिन कटता था| मेरे रोने और पीने से मेरे भीतर का आत्मविश्वास पूरी तरह खत्म हो चूका था| मुझे कुछ भी नया काम करने से डर लगता था, ऐसा लगता था की मैं कुछ न कुछ गलत कर दूँगा! खाना बनाना और खाना मेरा शौक था, ये शौक अब पूरी तरह खत्म हो चूका था! मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता था की घर में क्या बना है, मैं तो बस इसलिए खाना खाता था की कहीं अगर मुझे कुछ हो गया तो मेरी माँ का क्या होगा?! हँसना तो मैं जैसे भूल गया था, टी.वी. पर कोई मज़ाकिया फिल्म देख कर भी मुझे हँसी नहीं आती थी! दिन भर सुस्ती सी रहती थी और रात भर जाग कर मैं पुरानी बातें याद कर अपनी अलग ही दुनिया में खो जाता था|

मैंने जो पीने की लत लगाई थी उसकी वजह से अब मेरे हाथ-पॉंव काँपने लगे थे| मानसिक रूप से मैं इतना कमज़ोर हो चूका था की मुझे अब गाडी तक चलाने से डर लगता था. घबराहट होती थी की मैं कहीं गाडी से किसी को ठोक न दूँ! इस डर और घबराहट ने मुझे इतना कमज़ोर कर दिया था की मैं खुद को डरपोक और बुज़दिल मानता था, जिस कारण मैं स्वयं की इज्जत नहीं करता था|

अपने बेटे को यूँ बुझा-बुझा देख मेरी माँ को मेरी चिंता हो रही थी इसलिए उन्होंने दिषु से इस बारे में बात की| माँ की सारी बात सुन दिषु ने माँ से कहा की मुझे एक बार साइकेट्रिस्ट (Psychaiatrist) डॉक्टर को दिखाना चाहिए| माँ को साइकेट्रिस्ट डॉक्टर का मतलब नहीं पता था, पर जब दिषु ने बताया की ये एक तरह का दिमाग का डॉक्टर होता है, तो मेरी माँ एकदम से घबरा गईं! उन्हें लगा की उनका बेटा पागल-वागल तो नहीं हो गया? यदि ऐसा हो गया तो वो कैसे मुझे सँभालेंगी?! दिषु ने बड़ी मुश्किल से माँ को यक़ीन दिलाया की ऐसा कुछ नहीं है, ये डॉक्टर बस मुझसे बात कर के उन्हें ये बताएगा की मेरे विचार कैसे हैं, मेरे दिमाग में क्या चल रहा है?!

माँ और दिषु ने डॉक्टर के पास जाने का फैसला कर लिया था और ये बात मुझसे छुपाई गई थी| जब दिषु ने दिन-तरीक...अपॉइंटमेंट सब सेट कर दी तब वो शाम को मुझे ये बात बताने आया| ज़ाहिर है की दिषु की बात सुन मैंने डॉक्टर के पास जाने से साफ़ मना कर दिया और खुद को सुधारने के झूठे वादे करने लगा मगर मेरी माँ ने अपना ब्रह्मास्त्र चलाया और मुझे फिर से अपनी कसम दे कर डॉक्टर के पास जाने को मज़बूर कर दिया|

डॉक्टर के पास पहुँच माँ और दिषु ने मिलकर उन्हें सारी बात समझाई, जिसके बाद डॉक्टर ने अकेले में मुझसे बात करनी शुरू की| उन्होंने मुझसे पुछा की मैं कैसा महसूस करता हूँ? मेरे मन में क्या ख्याल आते हैं? क्या मैं अपनी इस दिनचर्या से खुश हूँ? मैं कहीं बाहर आता-जाता क्यों नहीं? इस तरह अपनी हालत क्यों बना रखी है?

मैं डॉक्टर से अपने जज्बात छुपाना चाहता था इसलिए पहले तो मैं कुछ देर खामोश रहा| परन्तु मेरे खामोश रहने से डॉक्टर साहब के सवाल खत्म नहीं हुए| अब मैं अपना आत्मविश्वास पहले ही खो चूका था इसलिए मेरे पास डॉक्टर के इन सवालों का कोई उपयुक्त जवाब तो था नहीं इसलिए मैंने तरह-तरह के बहाने बनाने लगा और अपनी इसी बेवकूफी में मेरे मुख से ये निकल गया की 1-2 बार मेरे मन में आत्महत्या करने के विचार आये हैं! जैसे ही मैंने आत्महत्या का ज़िक्र किया डॉक्टर ने फट से ये बात लिख ली और तब मुझे एहसास हुआ की मैंने कितनी बड़ी बेवकूफी कर दी है!

खैर, डॉक्टर समझ गया था की मैं बस बहाने बना कर उनके सवालों से बच रहा हूँ इसलिए उन्होंने मुझे प्रेरित करते हुए कहा की मैं यूँ बच्चों के मोह से बँधा न रहूँ, अपनी माँ के बारे में सोचूँ, खुद को सुधारूँ, कहीं घूमने आया-जाया करूँ, दोस्तों के साथ पार्टी करूँ आदि| अब ले-दे कर मेरा एक ही तो दोस्त था और वो साला भी मोहब्बत की डगर पर चल निकला था तो मैं क्या उसे परेशान करता?! मैंने डॉक्टर के सवालों से बचने के लिए झूठ कह दिया की मैं खुद को स्मभालूँगा और इस तरह मायूस हो कर नहीं बैठूँगा| लेकिन डॉक्टर तो आखिर डॉक्टर होता है, वो मेरे जैसे छतीस मरीज देख चूका था इसलिए वो जानत था की मैंने कुछ करना है नहीं और घर जा कर मैंने बस फिर से बैठ जाना है!

मुझसे पौना घंटा बात कर डॉक्टर ने माँ और दिषु को अंदर बुलाया तथा मेरी मानसिक स्थिति के बारे में उन्हें बताते हुए बोला; "आंटी जी, मानु को Major Depresive Disorder या साधारण भाषा में कहूँ तो Major Depression है!" अब मेरी आ को अंग्रेजी समझ आई नहीं मगर बीमारी का इतना बड़ा नाम सुन कर ही मेरी माँ डर गईं!

"ये...ये क्या होता है डॉक्टर साहब?" मेरी माँ घबराते हुए बोलीं| अब डिप्रेशन को हिंदी में समझना बहुत मुश्किल था मगर फिर भी डॉक्टर साहब ने उदहारण देते हुए मेरी माँ को समझाया; "जब हम किसी व्यक्ति से अधिक प्यार करते हैं और अगर वो व्यक्ति हमसे दूर हो जाए, या उसकी मृत्यु हो जाए तो हमारा दिमाग ये सदमा बर्दाश्त नहीं कर पाता| हमारा दिमाग हमें उस व्यक्ति के खोने के ग़म में डूबा देता है, शराब पीने पर मजबूर करता हैं, तरह-तरह की बातें सोचते हुए हमें डराता है, उस व्यक्ति की याद दिला कर बार-बार रुलाता है और कभी-कभी हमें आत्महत्या के लिए भी उकसाता है|

मानु की ये जो हालत है ये सब इसी कारण से है| इसे उन तीनों बच्चों के खुद से दूर चले जाने का इतना दुःख है की इसने खुद को सबसे काट कर रखा हुआ है| ये किसी से बात नहीं करता, अंदर ही अंदर सोच-सोच कर कुढ़ता रहता है| और...सबसे जर्रूरी बात की मानु के मन में एक-दो बार आत्महत्या करने के विचार भी आये थे!" जैसे ही डॉक्टर ने आत्महत्या का नाम लिया मेरी माँ रो पड़ीं! अपनी माँ को यूँ एक डॉक्टर के सामने रोते हुए देख मेरा दिल बहुत दुःखा| मैं फौरन उठ कर खड़ा हुआ और माँ को अपने गले लगा कर उनसे बोला; "सॉरी माँ, मेरे मन में ऐसा विचार गलती से आया था! मैं कभी ऐसा कुछ नहीं करूँगा की मेरी माँ इस दुनिया में अकेली रह जाए!" मेरे आश्वासन से मेरी माँ को हिम्मत मिली और उन्होंने अपने आँसूँ पोंछे|

"तो डॉक्टर साहब इसका इलाज?" मेरी माँ ने हिम्मत दिखाते हुए पुछा|

"आंटी जी इलाज दवाइयों और थेरेपी दोनों से करना होगा| दवाई तो मानु को रोज़ लेनी होगी और थेरेपी के लिए हफ्ते में दो बार मानु को आना होगा!" डॉक्टर साहब मेरी तरफ देखते हुए बोले| डॉक्टर साहब मुझे इलाज बता रहे थे और इधर मैं मन ही मन कह रहा था की मैं मर जाऊँगा लेकिन यहाँ दुबारा नहीं आऊँगा!

विडंबना देखिये, जो लड़का अभी अपनी माँ को ये आश्वसन दे रहा था की वो कभी आत्महत्या नहीं करेगा, वो डॉक्टर के थेरेपी के लिए बुलाने पर कह रहा था की: 'मैं मर जाऊँगा मगर यहाँ दुबारा नहीं आऊँगा|'

खैर सब घर आये और घर आते ही मेरी माँ तथा दिषु मुझे समझाने लग पड़े| डॉक्टर साहब ने मेरी एक दिनचर्या लिखी थी जिसमें उन्होंने कब उठना है, कब योग करना है, कब टहलने जाना है..आदि लिखा था| माँ और दिषु यही बातें मुझे समझाने में लगे थे, वहीं मैं आराम से सोफे पर बैठा इनकी बात को एक कान से सुन दूसरे से निकाल रहा था|

अगले दो-तीन दिन तक माँ किसी मास्टरनी की तरह मेरे पीछे पड़ी रहीं मगर चौथे दिन से सब वही होने लगा जैसे पहले होता था| माँ ने मुझे थेरेपी के लिए जाने को कहा तो मैंने पैसे बर्बाद न करने का बहाना बना कर जाने से मना कर दिया| मुझे सुधरना ही नहीं था तो फिर माँ चाहे जितनी कोशिश कर लें!

मेरे भीतर कोई बदलाव न देख माँ को मदद की जर्रूरत थी| ठीक उसी वक़्त मेरे पिताजी ने माँ का हाल-चाल पूछने के लिए अचानक माँ को फ़ोन किया| माँ ने इस बार बड़े आराम से बात की और पिताजी को मेरी मानसिक स्थिति के बारे में बताया| मेरी ये हालत जानकार बजाए सहनभूति जताने के मेरे पिताजी तिलमिलाते हुए बोले; "ये सब तुम्हारे लाडले के कर्म हैं जो उसके आगे आ रहे हैं! तुम्हारे बेटे ने एक इंसान को मौत के घात उतारा है, तो पागल तो होगा ही न!"

माँ को उम्मीद थी की मेरी इस हालत को जानकार पिताजी को अक्ल आएगी और वो हमारे पास पुनः लौट आएंगे मगर जब उन्होंने पिताजी के मुँह से मेरे लिए "पागल" शब्द सुना तो मेरी माँ को बहुत गुस्सा आया| "मेरा बेटा पागल नहीं है! पागल आप हो जो अपने परिवार को छोड़ कर अपने भैया-भाभी के घर रह रहे हो! मुसीबत की इस घड़ी में जब आपको अपने बेटे को सँभालना चाहिए, उसे सही रास्ता दिखाना चाहिए आप गॉंव में बैठे अपने बेटे को पागल कह रहे हो?! शर्म आनी चाहिए आपको! जब मरोगे तो कौन आपकी चिता को अग्नि देगा? मैं तो नहीं भेजने वाली मानु को, कह देना चन्दर से वही देगा आपकी चिता को आग!" मेरी माँ गुस्से में बहुत ज्यादा बोल गई थीं मगर उन्हें इसका रत्तीभर भी पछतावा नहीं था|

खैर, अपनी पत्नी के मुख से इतनी बड़ी बात सुन पिताजी को बहुत गुस्सा आया और अपने इसी गुस्से में उन्होंने तलाक के कागज़ात भिजवा दिए! अपने माँ-पिताजी के तलाक के कागज़ देख मुझे बहुत बड़ा झटका लगा! तो दूसरी तरफ हमारे खानदान में आजतक तलाक नहीं हुआ था इसलिए सारा परिवार नज़रे गड़ाए बैठा था की अब क्या होगा?! इधर मेरी माँ ने एक क्षण नहीं लिया और मुझसे पुछा की उन्हें अंगूठा कहाँ-कहाँ लगाना है? मैं अपनी माँ की इस प्रतिक्रिया को देख सख्ते में था, मुझे यूँ हैरान और चिंतित देख मेरी माँ बोलीं; "तेरे पिताजी को वैसे भी हमसे कोई लेना-देना है नहीं, तो इन कागजों का क्या मोल?! जल्दी बता मुझे कहाँ अंगूठा लगाना है!" माँ ने इतनी बड़ी बात इतनी आसानी से झेल ली थी और मैं अपने बच्चों के वियोग से उबर ही नहीं पा रहा था!

माँ के अंगूठे के निशान ले कर, मुझे इन कागजों को अटेस्ट करवाना था| जब मैं कागज़ ले कर नोटरी के पास पहुँचा तो मुझे एहसास हुआ की मैं इस दुनिया का पहले लड़का हूँगा जो अपने माँ-बाप का तलाक खुद करवा रहा है! इस एहसास ने मुझे झकझोड़ कर रख दिया था!

ऐसा नहीं था की मुझे अपने पिताजी की कोई आस थी की वो हमारे पास दुबारा लौटेंगे मगर दिल को लगता था की कमसकम मेरे एक पिता तो हैं! परन्तु इस तलाक के बाद तो बस मेरे सर पर मेरी माँ का ही साया रह गया था!

माँ-पिताजी के हुए इस तलाक के लिए गॉंव में सभी ने मुझे दोषी माना और मेरी माँ की बजाए पिताजी से हमदर्दी दिखाने लगे| उन सबकी नज़र में मेरे पिताजी को उनकी पत्नी और लड़के ने घर से निकाल दिया था...अकेला छोड़ दिया था तथा बड़के दादा ने अपने भाई को सहारा दिया था| मैं उम्मीद कर रहा था की गॉंव से कोई तो हमें फ़ोन कर अपनी सहनभूति देगा मगर फ़ोन आया तो बस नेहा की नानी जी का| उन्हें सब बात पहले से पता थी इसलिए वो ही मेरी माँ से हमदर्दी रखती थीं| बातों-बातों में उन्हें मेरी माँ से मेरी हालत के बारे में पता चला तो वो बड़ी चिंतित हुईं और दूसरे ही दिन मेरी हाल-खबर लेने भाईसाहब के साथ आईं|

मुझे हिम्मत देते हुए वो कहने लगीं की अब मैं ही मेरी माँ का सहारा हूँ इसलिए मुझे अपनी तबियत सुधारनी होगी| उनकी कही ये बात मेरे दिल को बहुत चुभी! दरअसल उस समय तक मैं आत्मिक रूप से इतना कमज़ोर हो चूका था की मैं किसी भी जिम्मेदारी को उठाने में अक्षम महसूस कर रहा था| ऐसे में जब नेहा की नानी जी ने मुझे अपनी माँ का सहारा बनने को कहा तो मेरा दिमाग मुझे लताड़ने लगा की मुझ में इतनी भी हिम्मत नहीं की मैं अपनी माँ को सँभाला सकूँ!

माँ-पिताजी के तलाक के बाद मैं अपनी नज़र में और गिर चूका था| खुद को दोष देते हुए मैंने खुद को बहुत लताड़ा था| अगला एक साल मैंने खुद को संवारने की कोशिश की मगर मैं उसमें ज्यादा कामयाब न हुआ| हाँ मैंने पीना थोड़ा कम कर दिया था, अपना काम फिर से शुरू करने की कोशिश कर रहा था| लेकिन अपने बच्चों की जुदाई मुझे अब भी चैन से जीने नहीं दे रही थी!

नेहा और आयुष से मेरी फ़ोन पर बात होती रहती थी तथा तीनो बच्चों के जन्मदिन पर मैं उन्हें तोहफे भेजता रहता था मगर बच्चों को एक बार गले लगाने की मेरी आस धीरे-धीरे कर बुझती सी जा रही थी!

उधर गॉंव में, संगीता के मायके में थोड़ी समस्याएं आ गई थीं| अपनी दादी जी के घर रहते हुए विराट की पढ़ाई में रुकावट आ रही थी| दरअसल, विराट को टूशन की जर्रूरत थी और उसका टूशन गॉंव से दूर था इसलिए अपने स्कूल से निकल विराट पहले टूशन जाता और फिर थक कर शाम 5 बजे घर लौटता| इस भगा दौड़ी के कारण विराट बीमार पड़ने लगा तो नेहा की नानी जी, भाईसाहब और भाभी जी इसका उपाए निकालने लगे|

भाईसाहब ने अपना लखनऊ का घर बेच दिया था तथा उससे बड़ा घर अम्बाला में लिया था, उन्होंने नेहा की नानी जी से कहा की वो उनके साथ वहाँ रहने चलें पर नेहा की नानी जी ने जाने से मना कर दिया| विराट के भविष्य की बात थी तो वहीं भाईसाहब अपनी माँ को भी इस उम्र में अकेला नहीं छोड़ना चाहते थे इसलिए फिलहाल के लिए उन्होंने बीच का रास्ता निकलते हुए ये फैसला किया की वो हफ्ते में दो दिन अपने परिवार के साथ अम्बाला रहेंगे और तीन दिन अपनी माँ के साथ गॉंव| भाईसाहब का मसालों का कारोबार उन्हें गॉंव से ही संभालना था तो उनके लिए यही चुनाव ठीक था|

ये तो बात हुई भाईसाहब के घर की, अब चलते हैं बड़के दादा के घर|

पिछले दो साल नेहा की पढ़ाई के नज़रिये से बड़े जबरदस्त रहे| लगातार दो साल नेहा अपनी क्लास में अव्वल आई थी और उसके अव्वल आने की ख़ुशी घर में सबसे ज्यादा मेरे पिताजी ने ही मनाई थी| पिताजी को ऐसे बच्चे पसंद हैं जो पढ़ाई में अव्वल आते हैं, जब उनकी पोती अव्वल आई तो उन्होंने नेहा को खूब लाड-प्यार किया| वहीं आयुष भी पीछे नहीं था, वो भी अपनी क्लास में दोनों साल अव्वल आया, जिसकी ख़ुशी सबसे अधिक बड़के दादा ने मनाई और पूरे गॉंव को दावत दे डाली!

इधर शहर में मैं और माँ, दोनों बच्चों के प्रथम आने की ख़ुशी अपने ढंग से मनाते थे| माँ मंदिर में पूजा करती थीं तो मैं दोनों बच्चों के लिए भाईसाहब के हाथों नए स्कूल बैग और किताबें भेज कर|

स्तुति चार साल की हो चुकी थी और अब उसका दाखिला स्कूल में होना था| जब नेहा और आयुष स्कूल से आते तो दोनों भाई-बहन मिलकर अपनी छोटी बहन को ABCD पढ़ाते थे, जिस कारण स्तुति की रूचि पढ़ाई में बहुत थी| स्कूल में दाखिला होने से पहले ही स्तुति ने पूरी ABCD याद कर ली थी| जब स्तुति मेरे पिताजी को ABCD गा कर सुनाती तो पिताजी को बहुत ख़ुशी होती थी| अपनी पोती की पढ़ाई में रूचि देखते हुए उन्होंने अपने बड़े भाईसाहब से मिन्नत कर उसका दाखिला स्कूल में करवाने की बात की| स्तुति की स्कूल की फीस कम थी इसलिए बड़के दादा मान गए मगर अब नेहा के नौवीं कक्षा में आने पर उसकी फीस बढ़ गई थी, जिस कारण बड़के दादा नेहा की पढ़ाई पर अब और पैसे बर्बाद नहीं करना चाहते थे| उनका कहना था की साल-दो साल में नेहा का ब्याह कर देंगे और जब नेहा बालिक हो जाएगी तब उसका गौना कर देंगे|

नेहा आगे पढ़ना चाहती थी इसलिए उसने मुझे फ़ोन कर ये सारी बात बताई| मैंने तुरंत भाईसाहब को फ़ोन किया और उनसे कहा की वो नेहा को अपने साथ अम्बाला ले आएं और उसका दाखिला विराट के स्कूल में करवा दें| नेहा के स्कूल का जितना भी खर्चा होगा वो मैं उठाऊँगा| भाईसाहब को इससे कोई आपत्ति नहीं थी बल्कि वो तो खुद चाहते थे की नेहा आगे पढ़े| हाँ पैसे के तौर पर वो थोड़े कमज़ोर थे क्योंकि उनका व्यपार उनके गॉंव और अम्बाला के बीच आने-जाने से थोड़ा डगमगा गया था| चूँकि मैं नेहा के स्कूल का खर्चा उठा रहा था तो उनके लिए कोई दिक्कत की बात नहीं थी|
 
इधर मैंने अपनी माँ को बता दिया की भाईसाहब नेहा को अपने घर अम्बाला ले कर आ रहे हैं और अब नेहा यहीं रहकर पढ़ाई करेगी| माँ को भी ख़ुशी हुई की कमसकम नेहा की पढ़ाई में कोई बाधा नहीं आएगी| माँ ने जो दोनों बच्चों की पढ़ाई के लिए FD करवाई थी, उनके बारे में मुझे याद दिलाते हुए माँ ने कहा की मैं वो सारे पैसे भाईसाहब के अकाउंट में डाल दूँ ताकि उन्हें कभी नेहा की फीस के लिए मुझसे पैसे माँगने ही न पड़ें|

कुछ दिन बाद ही भाईसाहब सीधा पहुँचे बड़के दादा के पास और उनसे कहा की वो नेहा को अपने साथ अम्बाला में रख कर पढ़ाना चाहते हैं| बड़के दादा को नेहा से कोई ख़ास लगाव न था इसलिए उन्होंने नेहा को नहीं रोका| तो वहीं नेहा जानती थी की मैंने ही उसके बड़े मामा जी को भेजा है इसलिए नेहा बहुत खुश थी| नेहा अपने बड़े मामा जी के साथ हँसी-ख़ुशी अम्बाला पहुँची| जैसे ही नेहा ने दरवाजे पर लगी घंटी बजाई मैंने फट से दरवाजा खोला! मुझे दो साल बाद देख नेहा ने आव देखा न ताव और सीधा मेरी गोदी में आने के लिए छलांग लगा दी! मेरी बिटिया लम्बाई में इतनी बड़ी हो गई थी की अब मेरे काँधे तक आती थी मगर उसका बालपन वैसे का वैसा था!

ये दो साल का समय हम बाप-बेटी के लिए दो जन्म के समान था इसलिए गले लगे हुए हम दोनों बाप-बेटी रो पड़े| "I missed you पापा जी!" नेहा रोते हुए बोली|

"I missed you too मेरा बच्चा!" मैंने नेहा के आँसूँ पोछते हुए कहा| हम बाप-बेटी इतने भाव-विभोर हो चुके थे की हमें पता ही नहीं चला की भाईसाहब, भाभी जी और विराट एक पिता-पुत्री का ये प्यारभरा मिलन देख भावुक हो रहे हैं|

"सच मानु, ऐसा प्यार नहीं देखा मैंने!" भाभी जी अपने आँसूँ पोछते हुए बोलीं|

"मानु नेहा के प्यार में बहुत तड़पा है, देखो इसने अपनी क्या हालत बना ली!" भाईसाहब ने भाभी जी से मेरी हालत पर गौर करने को कहा तब जा कर मेरी बेटी ने मेरी बिगड़ी हुई हालत देखि| दरअसल जब नेहा ने मुझे पहलीबार देखा तो उसे बस मेरे गले लगना था इसलिए नेहा ने मेरी सूरत ठीक से नहीं देखि थी, परन्तु जब उसके बड़े मामा जी ने मेरी सूरत देखने को कहा तो मेरी ये बिगड़ी हुई हालत देख मेरी बिटिया घबरा गई!

झबरे से बाल जो की इतने घुंघराले हो गए थे की कंघी करने से भी सीधे नहीं होते थे| दाढ़ी इतनी बढ़ गई थी की मेरे होंठ दाढ़ी के बालों में छुप गए थे| वजन बढ़ गया था और मैं लार्ज से एक्सअल में आ गया था| हमेशा जीन्स-टी-शर्ट या ब्लैज़र पहनने वाला मैं आज नेहा के सामने एक कमीज जो की बाहर निकली हुई थी और पैंट पहने खड़ा था|

नेहा ने जब भी मुझे देखा था तो हमेशा स्मार्ट और अच्छे कपड़े पहने देखा था परन्तु उसने जब मेरी ये हालत देखि तो उसे अपनी आँखों पर विश्वास ही नहीं हुआ! "ये आपने अपनी क्या हालत बना ली पापा जी?" नेहा घबराते हुए बोली| नेहा के बिछोह में मुझ पर क्या बीती मैं ये सब नेहा को नहीं बताना चाहता था इसलिए मैंने बात घुमाते हुए कहा; "अब मेरी बिटिया आ गई है न तो सब ठीक होगा|"

खैर, अब नेहा का स्कूल में दाखिला करवाना था इसलिए मैं और भाईसाहब दोनों गए, जहाँ नेहा के गार्डियन (guardian) के रूप में भाईसाहब ने मेरा नंबर लिखवाया| नेहा में पढ़ाई करने का ऐसा जोश था की उसने पहले ही दिन नए दोस्त बना लिए| पहले दिन जब नेहा के स्कूल की छुट्टी हुई और मैं नेहा को लेने पहुँचा तो नेहा ने अपनी नई सहेलियों से मेरा तार्रुफ़ बड़े गर्व से अपने पापा जी के रूप में करवाया| मुझे ये देख कर बड़ी ख़ुशी हुई की मेरी इतनी बुरी हालत में भी मेरी बिटिया को मुझे सबके सामने पापा जी कहने में कोई शर्म नहीं आ रही|

मैंने उसी वक़्त प्रण लिया की मैं अब खुद को सुधारूँगा ताकि मेरी कोई मेरी बिटिया का मज़ाक न उड़ाए| शाम को मैं अच्छे से अपने बाल कटवा, दाढ़ी छोटी करवा और अच्छे कपड़े पहनकर भाईसाहब के घर लौटा| मेरा ये बदला हुआ रूप-रंग देख भाभी जी ने ज़ोर से सीटी बजा दी! वहीं भाईसाहब और विराट मुझे देख कर दंग थे की मैंने खुद को एकदम से कैसे बदल लिया?! उधर जब नेहा ने मुझे यूँ हैंडसम बना देखा तो वो दौड़ती हुई अंदर गई और मुझे नज़र न लग जाए इसलिए काजल का टीका लगाते हुए बोली; "That's like my पापा जी! I love you पापा जी!"

अगले दिन जब मैं नेहा को स्कूल छोड़ने गया तो उसकी सारी सहेलियाँ एक हैंडसम आदमी को देख दंग रह गईं| "Oh hello girls! मेरे पापा जी को नज़र मत लगाओ!" नेहा ने जब प्यार से अपनी सहेलियों को डाँटा तो सभी ने ज़ोर से ठहाका लगाया| दोपहर को जब मैं नेहा को लेने पहुँचा तो मैं नेहा और उसकी दोस्तों के लिए चॉकलेट तथा चिप्स ले कर पहुँचा| चॉक्लेट और चिप्स पा कर नेहा की सहेलियाँ बहुत खुश हुईं तथा "थैंक यू अंकल जी" कह खिलखिलाने लगीं| उस दिन से नेहा की सभी सहेलियों के सामने मेरी एक हैंडसम अंकल की छबि बन गई थी|

खैर, चूँकि अब नेहा अपने बड़े मामा जी के यहाँ रह कर पढ़ रही थी तो ऐसे में मेरा मन बिना नेहा को मिले मानने वाला तो था नहीं इसलिए मैं हर शनिवार भाईसाहब के घर पहुँच जाता और रविवार रात वापस घर आ जाता| माँ को मेरे नेहा के प्रति बढ़ रहे इस मोह से चिंता हो रही थी की क्या होगा अगर फिर नेहा मुझसे दूर हो गई तो?! अतः माँ ने मुझे समझाना चाहा मगर मेरा मन नहीं मानता था! नेहा के आने के बाद से मैंने खुद को थोड़ा बहुत सुधारा था, यदि माँ मुझे नेहा से मिलने जाने से रोकतीं तो मैं फिर वही मायूस...हारा हुआ लड़का बन कर रह जाता! शायद यही सोच कर माँ ने मुझे नहीं रोका और मेरे अच्छे भविष्य के लिए उन्होंने अपनी अलग तैयारी शुरू कर दी|

इधर मेरा नेहा से प्रत्येक हफ्ते मिलना जारी था, शनिवार और इतवार मेरी बिटिया मेरे साथ ख़ुशी-ख़ुशी बिताती थी| कभी हम बाप-बेटी फिल्म देखने जाते, तो कभी खाना खाने बाहर जाते और कभी घूमने निकल जाते| जब नेहा के स्कूल की छुट्टियाँ होती तो मैं नेहा को घर ले आता| अपनी दादी जी के पास आते ही नेहा उनसे लिपट जाती और माँ को ज़रा सा भी काम नहीं करने देती| गॉंव में रहकर नेहा ने खाना बनाना सीख लिया था इसलिए नेहा अकेली रसोई में घुस कर खाना बनाती| माँ नेहा को रोकने जाती तो नेहा कहती; "दादी जी, मैं अब छोटी बच्ची नहीं हूँ| मैं अब बड़ी हो गई हूँ और मेरे होते हुए आप काम करो ये अच्छी बात थोड़े ही है?!" अपनी पोती से इतनी बड़ी बात सुन माँ नेहा को गले लगा कर लड़ करती और उसे कुछ न कुछ नया बनाना सिखाने लगती|

एक दिन की बता है, मैं और नेहा रात को खाना खाने बाहर गए हुए थे जब नेहा मुझे अपनी सहेली की बात बताने लगी; "पापा जी, मेरी दोस्त शालिनी कह रही थी की तेरे पापा जी कहीं से अंकल नहीं लगते| उन्हें तो भैया कहने का मन करता है!" नेहा की बात सुन मैं ठहाका मारकर हँसने लगा| मेरी हँसी इतनी तेज़ थी की आस-पास बैठे लोग भी मुझे देखने लगे थे!

"आप शालिनी से कहना की वो मुझे भैया ही कहे!" मैंने हँसते हुए कहा तो नेहा भी खिलखिलाकर हँसने लगी| नेहा की सहेलियों को लग रहा था की शायद मेरा बाल-विवाह हुआ होगा इसीलिए मैं तीन बच्चों का पिता होने के बाद भी इतना जवान दिखता हूँ| तब नेहा ने उन्हें सच बताया की कैसे हम बाप-बेटी का रिश्ता कायम हुआ| जब नेहा की सहेलियों को पता चला की मैं अविवाहित हूँ तो उसकी एक दोस्त ने मज़ाक-मज़ाक में कह दिया की मैं उसकी चचेरी बहन से शादी कर लूँ! ये बात सुन मैंने फिर ज़ोर से ठहाका लगाया और पेट पकड़ कर हँसने लगा|

"पापा जी, एक बात पूछूँ?" नेहा अपनी हँसी काबू करते हुए बोली| मैंने हाँ में सर हिला कर नेहा को अनुमति दी तो नेहा थोड़ा गंभीर होते हुए बोली; "पापा जी, मम्मी ने जो किया...उस सबके बाद.आप अब भी उनसे प्यार करते हो?" मैंने नेहा से ऐसे प्रश्न की उम्मीद नहीं की थी इसलिए उसका सवाल सुन मैं हँसते हुए से गंभीर हो गया| संगीता का ज़िक्र होते ही मेरे दिल का ज़ख्म ताज़ा हो गया था और आँसूँ आँखों की दहलीज़ तक पहुँच गए थे| मन तो मेरा संगीता को गाली देने का था परन्तु मैं अपनी बेटी के सामने उसकी माँ को गाली नहीं देना चाहता था इसलिए मैंने शब्दों को सेंसर कर जवाब दिया; "बेटा, मेरे जीवन के ये ढाई साल आपकी मम्मी की वजह से ऐसे गुजरे हैं की मैं आपको बता भी नहीं सकता इसलिए आपकी मम्मी के लिए मेरे दिल में अब भी प्यार होने का सवाल ही पैदा नहीं होता!"

नेहा मेरे जज़्बात समझती थी इसलिए मेरा हाथ अपने हाथों में ले कर नेहा बोली; "I know पापा जी, आप ने मम्मी की वजह से कितना दुःख भोगा है| बड़े मामा जी मुझे अम्बाला आते हुए बता रहे थे की मेरे बिना आप इतना डिप्रेशन में थे की आपने अपनी बहुत बुरी हालत बना ली थी|.And I know आपके मन में मम्मी के लिए कितना गुस्सा है...नफरत है and trust me I understand how badly you want to forget mummy.इसलिए मैं चाहती हूँ की आप अब खुश रहो और इसके लिए अब आपको move on करना होगा! Its time for my पापा जी to get married!" अपनी बेटी के मुँह से अपनी शादी की बात सुन मैं मुस्कुराने लगा| नेहा के सर पर हाथ फेरते हुए मैं बोला; "मेरा बच्चा इतना बड़ा हो गया की वो अपने पापा जी को शादी करने के लिए कह रहा है?!" मेरी बात सुन नेहा मुस्कुराने लगी और हाँ में सर हिलाने लगी|

किसी ने सच ही कहा है, लड़कियाँ कब बड़ी हो जाती हैं, पता ही नहीं चलता!

खैर, मैंने नेहा की कही बात का कोई जवाब नहीं दिया क्योंकि मुझे खुद नहीं पता था की मुझे शादी करनी चाहिए या नहीं?! लेकिन जब मैं घर वापस आया तो माँ ने मेरी शादी की बात उठाई; "बेटा, मैं सोच रही हूँ की तू अब शादी कर ले और अपना घर बसा ले|" नेहा ने जब मेरी शादी की बात उठाई थी तो मैं उस समय तो इस सवाल से बच गया था मगर माँ के सवाल से बच पाना नामुमकिन था इसलिए मैं खामोश हो कर बैठा रहा| मुझे यूँ खामोश देख माँ मुझे समझाते हुए बोलीं; "बेटा, तेरी शादी होगी तो तुझे एक जीवन साथी मिलेगा फिर तेरे बच्चे होंगें तो तेरा मन अपने बच्चों को लाड-प्यार करने में लगेगा और मुझे भी पोता-पोती का सुख मिलेगा|" माँ की बात समझ कर मुझे माँ की सारी प्लानिंग समझ आई| दरअसल मैं कहीं नेहा से फिर अधिक मोह न बढ़ा लूँ और फिर से डिप्रेशन में न चला जाऊँ इसीलिए मेरी माँ 'मेरे हाथ पीले' करना चाहती थीं| एक बार मेरी शादी हो जाती, बच्चे हो जाते तो मैं अपने बच्चों से अधिक मोह करता न की नेहा से!

माँ अपना ये प्लान बनाये बैठीं थी तो मेरे दिमाग में मेरी अपनी प्लानिंग शुरू हो गई थी| मैंने सोच लिया की शादी के बाद मैं जबरदस्ती नेहा को ही गोद ले लूँगा और फिर मुझे नेहा के खोने का भय ही नहीं रहेगा!

"माँ, आप जब कहोगे...जिससे कहोगे मैं शादी कर लूँगा| आपको मुझसे कुछ भी पूछने की जर्रूरत नहीं है| हाँ इतना ध्यान रखना की लड़की में गुण अपने पसंद के ढूँढना था, मेरा काम शादी निभाना है और मैं कैसे भी निभा लूँगा|" मैंने माँ के दोनों हाथ अपने हाथों में ले कर कहा| अपने फ़रमाबरदार बेटे के मुँह से इतनी बड़ी बात सुन मेरी माँ को बहुत ख़ुशी हुई और उन्होंने ख़ुशी से मेरा मस्तक चूम लिया|

उस दिन से मेरी माँ ने मेरे लिए रिश्ते खोजने शुरू कर दिए| माँ ने ये खबर नेहा की नानी जी को भी दी ताकि वो भी मेरे लिए लड़की ढूँढ सकें| ज़ाहिर है ये खबर उड़ते-उड़ते संगीता तक पहुँच ही गई, मेरी शादी हो रही है ये सुनकर संगीता के प्राण सूखने लगे! अपने प्यार को किसी दूसरे की बाहों में जाते हुए कौन सा मेहबूबा देख सकती है! ये एक ऐसा ग़म है जिसे बर्दाश्त करने के लिए पत्थर का कलेजा चाहिए होता है|

जब संगीता हमारे साथ दिल्ली रहती थी और उसके गॉंव वापस जाने की बात चल रही थी, तब मैं संगीता को खोने के ग़म में मरा जा रहा था| उसी तरह से संगीता मुझे किसी और का होता हुआ सोच कर ग़म में मरी जा रही थी! तब संगीता ने मेरा शादी का प्रस्ताव ठुकरा कर जो पाप किया था, आज संगीता को अपने किये उसी पाप पर पश्चाताप हो रहा था!

संगीता मुझे शादी करने से रोकना चाहती थी मगर अब वो किस मुँह से मुझसे बात करती? फिर उसे ये भी भय था की मैं क्यों उसकी बात मानकर शादी करने से मना करूँगा? इन ढाई- पौने तीन सालों में हमारे बीच कौनसा रिश्ता रह गया था जिसके लिए मैं रुकता!

बहरहाल, जिस प्रकार मैं अपने बच्चों को याद कर कुढ़ रहा था, वही हाल इस वक़्त संगीता का था| संगीता का दिल मुझसे बात करने का था मगर वो जानती थी की मैं उसका फ़ोन उठाऊँगा नहीं| वो मुझसे मिलना चाहती थी परन्तु मेरे घर नहीं आ सकती थी क्योंकि पिछलीबार वो जिस तरह अचानक से अपना सामान बटोर कर गई थी उससे मेरी माँ को दुःख हुआ था, मेरी माँ उससे नाराज़ होंगी इसलिए वो मेरे घर नहीं आ सकती थी|

अपने दिमाग का इस्तेमाल करते हुए संगीता अपनी माँ के साथ आ गई अपने भाईसाहब के घर| अपनी चतुराई दिखाते हुए संगीता ने भाईसाहब से मुझे फ़ोन करवाया और माँ के साथ आने को कहा| नेहा की नानी जी आई हुई हैं ये सोचकर मैं माँ के साथ भाईसाहब के घर पहुँचा| मुझे नहीं पता था की वहाँ संगीता भी होगी वरना मैं कभी भाईसाहब के घर जाता ही नहीं|

मैं और माँ घर पहुँचे तो दरवाजा नेहा ने खोला| अपनी दादी जी के पॉंव छू आशीर्वाद ले कर नेहा सीधा मेरे गले लग गई| हम तीनों अंदर आये और सीधा बैठक में पहुँचे जहाँ सभी मौजूद थे| इतने साल बाद संगीता मुझे देख किसी गुलाब की तरह खिल गई थी मगर जैसे ही मेरी नज़र संगीता पर पड़ी मेरा खून खौल गया और मैं बिना कुछ बोले घर से निकल आया| सभी ने पीछे से मुझे आवाज़ दे कर रोकना चाहा मगर मैंने किसी की नहीं सुनी और घर से दूर आ कर अपना गुस्सा काबू करने में लग गया|

उधर घर पर मेरा ये गुस्सा देख सभी चिंतित और डर गए थे| संगीता का तो डर के मारे हाल ही बुरा था इसलिए वो रोते हुए मेरी माँ से अपने किये छल की माफ़ी माँग रही थी| संगीता का माफ़ी माँगने का ढंग भी निराला था, वो अपने किये को सही साबित करने के लिए सफाई दे रही थी की उसने जो किया उसमें मेरी भलाई छिपी थी| मेरी माँ सीधी-साधी हैं इसलिए वो संगीता की बातों में आ गईं और उसे माफ़ कर दिया|

कुछ देर बाद नेहा ने मुझे फ़ोन किया और घर आने को कहा| अब मैं सारा दिन तो घर से बाहर रह नहीं सकता था और न ही वापस दिल्ली जा सकता था क्योंकि यहाँ माँ अकेली रह जातीं इसलिए मन मारकर मैं भाईसाहब के घर पहुँचा|

बैठक में सब चिंतित बैठे थे, जैसे ही मैं आया की सभी मुझे एक साथ कहने लगे की मैं संगीता को माफ़ कर दूँ| मैंने संगीता की तरफ देखा तो पाया की वो आँखों में आँसूँ लिए और मेरे आगे हाथ जोड़े खड़ी है| संगीता को यूँ हाथ जोड़े देखते ही मेरे सर पर नफरत सवार हो गई! मैं तेजी से उसकी तरफ बढ़ा और खींच कर उसके गाल पर थप्पड़ मारते हुए चिल्लाया; "ढाई साल मुझे डिप्रेशन में सड़ाने के बाद तुम्हें माफ़ी माँगने की याद आई?" मेरा गुस्सा देख भाईसाहब ने फुर्ती दिखाते हुए मुझे कस कर पकड़ संगीता से दूर किया क्योंकि उन्हें डर था की कहीं मैं संगीता को फिर एक थप्पड़ न धर दूँ!

"ये सब इस औरत ने जानबूझ कर किया, सोच समझ कर मेरे खिलाफ प्लानिंग की! मेरे साथ काम करने वाले लड़के से कहा की वो पार्टी का चेक सुबह की बजाए शाम को जमा करे ताकि पैसे को ले कर साइट पर किल्ल्त हो और मुझे मजबूरन साइट पर जाना पड़े...और उसी का फायदा उठाते हुए ये मेरे तीनों बच्चों को ले कर गॉंव भाग गई!

और आप सब जानते हैं इसने ये सब क्यों किया?...क्योंकि मैं नेहा और स्तुति को गोद लेना चाहता था! मैंने कभी किसी के आगे घुटने नहीं टेके मगर इस औरत के आगे मैंने घुटने टेके...भीख माँगी की ये मुझे मेरी दोनों बेटियाँ गोद दे दे...पर इसने मेरी एक न सुनी! यहाँ तक की नेहा ने इसके पॉंव तक पकड़ लिए मगर इसने अपनी ही बेटी को लात मार दी!

जब इसने मेरी बेटी को लात मारी तो मैंने सोच लिया की मैं नेहा और स्तुति को किसी हालत में गॉंव जाने नहीं दूँगा! मैंने इसे चुनौती देते हुए कहा की भाईसाहब के आने पर मैं उन्हें अपना फैसला सुना दूँगा और कानूनी रूप से नेहा और स्तुति को गोद ले कर रहूँगा! कहीं ये मुझसे हार न जाए इसीलिए इसने मेरे साथ ये छल किया! ये जानती थी की दोनों बच्चों के बिना मैं टूट जाऊँगा, लेकिन फिर भी इसने ये सब जानबूझ कर किया! इस औरत की वजह से मेरी बेटी स्तुति अपने पपई को भूल गई....सब इसकी वजह से!

जब ये मेरे बच्चों को ले कर निकली तो मैं पागलों की तरह फ़ोन करता रहा मगर इसने नेहा का फ़ोन बंद कर दिया, अपना फ़ोन बंद कर दिया, भाईसाहब को मेरा फ़ोन उठाने नहीं दिया, भाभी जी और माँ (नेहा की नानी जी को) तक को फ़ोन करने से रोका...ये सब एक रणनीति के तहत करने वाली ये औरत आज मुझसे माफ़ी माँग रही है?!

चलो मुझसे दुश्मनी सही....नफरत सही...मगर मेरी माँ से इसकी क्या दुश्मनी थी? कहाँ थी ये जब मेरे माँ-पिताजी का तलाक हुआ? एक फ़ोन तक किया इसने? नहीं! तब इससे कोई फ़ोन नहीं हुआ, लेकिन पता नहीं क्यों आज इसके भीतर इंसानियत जाग गई?!

आप सब मुझे इसे माफ़ करने की बात कहते हैं मगर मैं मरते दम तक इसे माफ़ नहीं करूँगा!" आज एक बाप बोल रहा था...एक दर्द से छटपटाता हुआ पिता बोल रहा था इसलिए मैं आज सच बोलने से ज़रा भी नहीं डरा, हाँ मुझे इतना ख्याल अवश्य था की कहीं मैं अपने और संगीता के रिश्ते को सब पर जायज न कर दूँ! इन ढाई सालों से मेरे भीतर जितना जहर घुला हुआ था वो सब आज एक ज्वालामुखी की तरह फट कर बाहर आया था| ये सच जो मैंने आजतक अपने भीतर छुपा रखा था उसे सबके सामने ला कर मैंने संगीता को सबके सामने बुरी तरह शर्मिंदा कर दिया था! मुझे अब और कुछ नहीं कहना था इसलिए मैं बाहर आंगन में अकेला आ कर बैठ गया|

उधर बैठक में मेरे मुँह से ये जहरीले शब्द सुन कर संगीता की आत्मा तक छलनी हो चुकी थी! जिसे मैं आजतक 'जान' कह कर बुलाता था उसके लिए आज मेरे मुँह से "इसके' और 'औरत' जैसे शब्द निकले थे इसलिए संगीता के दिल को बहुत ज्यादा ठेस पहुँची थी|

ऊपर से मेरे जाने के बाद नेहा की नानी जी ने संगीता को बहुत डाँटा की उसने इतना बड़ा खिलवाड़ मेरे साथ आखिर क्यों किया! भाईसाहब अपनी बहन को कह तो कुछ नहीं पाए मगर उनकी नज़र में उनकी बहन आज बहुत गिर चुकी थी! भाभी जी अपने पति का अपनी बहन के प्रति प्रेम जानती थीं इसलिए वो डर के मारे कुछ नहीं कह रहीं थीं की कहीं उनके पतिदेव उनपर गुस्सा न हो जाएँ| लेकिन इतना अवश्य था की संगीता उनकी नज़र में भी गिर चुकी थी| एक बस मेरी माँ थीं जो सब कुछ जानने के बाद भी संगीता के साथ खड़ी थीं और सबको शांत करवा उसे सांत्वना दे रही थीं|

कुछ देर बाद संगीता को अकेला छोड़ सब मेरे पास आंगन में आये| मेरा गुस्सा कहीं फिर न फट पड़े इसके लिए नेहा फट से मेरे गले लग गई| नेहा के गले लगने से मेरा गुस्सा ऐसे शांत हुआ था जैसे किसी ने गरमा-गर्म लोहा ठंडे पानी में डाल दिया हो|

नेहा को गले लगा कर मैं आँख बंद किये उस सुख को भोग रहा था जब मेरी माँ बोलीं; "बेटा, बहु ने गॉंव में रहते हुए बहुत दुःख भोगा है| उसकी शादी-शुदा जिंदगी खराब बर्बाद हो चुकी है| चन्दर उससे बात नहीं करता और तेरे बड़के दादा और बड़की अम्मा भी संगीता से ठीक से बात नहीं करते| यही नहीं, कुछ महीने पहले संगीता 'खेते' गई थी और वापस आते समय उसने किसी के उतार किये हुए को लाँघ दिया जिस कारण उसके ऊपर कोई ऊपरी साया आ चूका है इसलिए कभी-कभी वो साया जब संगीता के सर पर सवार होता है तो संगीता का सारा शरीर कँपकँपा जाता है! इस कर के संगीता को वहाँ घर में सब अछूत समझते हैं! नजाने कितने बाबाओं ने झाड़-फूँक की, इसने व्रत आदि किये मगर संगीता के सर से ये साया उतरता नहीं| इतना सब अकेले भोगते-भोगते बेचारी बहुत परेशान है! एक तू ही तो इसका सबसे बड़ा दोस्त है...जो हमेशा उसके सुख-दुःख में साथी रहा है, अब तू भी इसे माफ़ नहीं करेगा तो ये बेचारी कहाँ जाएगी?!" हमारे गॉंव में लोग टोना-टोटका करते रहते हैं और इस चक्कर में वो न जाने कितनी सारी चीजें उतार- फुतार कर फेंकते रहते हैं| कई बार हम लोग जाने-अनजाने में इन चीजों को लाँघ जाते हैं| इस लाँघने के कारण यदि कोई बीमार पड़ जाए तो बड़े-बूढ़े कहते हैं की उस व्यक्ति के सर पर वो बुरा साया आ चूका है| जब माँ ने मुझे संगीता की ये 'कहानी' सुनाई तो मैं समझ गया की ये संगीता का झूठ है| रही बात संगीता के परिवार की निंदा झेलने, अपमान झेलने की बात तो उसकी दोषी खुद संगीता थी इसीलिए माँ की बात सुन कर भी मेरा दिल नहीं पिघला और मैं मौन रहा|

मुझे खामोश देख नेहा की नानी जी आगे आईं और मेरी बगल में बैठ मेरे सर पर हाथ फेरते हुए बोलीं; "मुन्ना, जउन संगीता किहिस ऊ तनिको ठीक नाहीं रहा और ओकरी तरफ से हम माफ़ी मांगित है!" ये कहते हुए नेहा की नानी जी ने मेरे आगे हाथ जोड़े तो मैंने फौरन उनके दोनों हाथ अपने हाथों में पकड़ लिए और बोला; "माँ, अपने थोड़े ही कुछ गलत किया था जो आप माफ़ी माँग रहे हो और अगर आपने ये सब किया भी होता तो भी मैं आपसे नाराज़ नहीं होता क्योंकि आप या मेरी माँ हो, आप जो भी करते उसमें मेरी भलाई छिपी होती है| लेकिन संगीता ने जो किया उसे तो मैं कभी मान ही नहीं सकता की उसने मेरी भलाई के बारे में सोच कर किया था! उसे तो पता नहीं मुझसे कौन सा बदला लेना था?!" मेरी बातों में मेरी दोनों माओं के लिए प्यार था मगर संगीता के लिए बस आक्रोश था!

अब जैसा की होता आया है, माओं को जब अपनी बात मनवानी होती है तो वो अपने बच्चों को हमेशा अपनी क़सम से बाँध देती हैं, वही मेरे साथ उस दिन हुआ| मेरी माँ मेरी दूसरी बगल में बैठ गईं और दोनों माओं ने मेरे एक-एक हाथ को अपने सर पर रख मुझे अपनी-अपनी क़सम से बाँध दिया; "तू मेरा बेटा है न, तो बहु को माफ़ कर दे! तुझे मेरी कसम!" मेरी माँ ने मुझे फट से अपनी क़सम में बाँधते हुए कहा| मैं कुछ कह पाता उससे पहले ही मेरी दूसरी माँ बोल पड़ीं; "तू हमार नीक मुन्ना हो न, तो हमार खतिर संगीता को माफ़ कर दिहो!" एक साथ अपनी दोनों माओं के मोहपाश में बाँधा गया था इसलिए मरता क्या न करता बेमन से मैंने अपना सर हाँ में हिला दिया| मेरी हाँ सुन मेरी दोनों मायें इतनी खुश हुईं की वो मुझसे लिपट गईं और मुझे आशीर्वाद देने लगीं की मैं उनकी सब बातें मानता हूँ|

ये मनोरम दृश्य देख भाईसाहब बोले; "मानु भैया तुम हो नसीब वाले जो तुम्हें एक साथ दो-दो माँ मिलीं| अब मुझे देखो मेरे पास एक ही माँ हैं और वो भी मेरी बात नहीं मानती| मैं कब से कह रहा हूँ की मेरे साथ यहीं रहो तो वो मना कर देती हैं|" भाईसाहब मेरा सहारा ले कर अपनी माँ को मनाना चाह रहे थे|

भाईसाहब की व्यथा समझते हुए मैं फट से बोला; "भाईसाहब आप ऐसा करो की ये घर बेच कर दिल्ली में हमारे घर के नीचे वाला घर ले लो, फिर देखना माँ झट से मेरे पास रहने के लिए मान जाएँगी|" जैसे ही मैंने ये सुझाव दिया नेहा की नानी जी ने फट से कह दिया की अगर ऐसा होता है तो वो दिल्ली रहने के लिए ख़ुशी-ख़ुशी तैयार हैं| उनके इस बचपने को देख हम सभी हँस पड़े!

दोपहर का खाना खाने सब बैठे थे और बेचारी संगीता आस लिए मेरी तरफ देख रही थी की मैं उससे बात करूँगा मगर मैं उसे नज़रअंदाज़ कर अपनी लाड़ली बिटिया को खाना खिला रहा था| खाना खा कर सब आराम कर रहे थे की तभी संगीता ने चतुराई दिखाते हुए नेहा से कहा की वो मुझे छत पर ले आये| उस समय तक नेहा अपनी मम्मी को माफ़ कर चुकी थी इसलिए नेहा ने अपनी मम्मी की बात मानी और मुझे बहाने से छत पर अपने साथ ले आई| जब मैंने संगीता को छत पर देखा तो मैं समझ गया की ये सब संगीता की ही चाल है इसलिए मैं वापस जाने लगा की तभी नेहा और संगीता ने मेरा हाथ थाम लिया| "प्लीज पापा जी, मेरे लिए एक बार मम्मी की बात सुन लो फिर आपका जो फैसला होगा मुझे मंज़ूर होगा|" नेहा ने मुझे अपना वास्ता दिया था इसलिए मैंने रुक गया और हाथ बाँधे संगीता को गुस्से से देखने लगा|

पता नहीं संगीता में ऐसी कौन सी शक्ति थी की वो सभी को अपनी बातों पर विश्वास दिला देती थी| यहाँ तक की नेहा जो अपनी मम्मी से नफरत करती थी वो भी अपनी मम्मी के आगे यूँ नरम पड़ चुकी थी|

खैर, नेहा हम दोनों को अकेला छोड़ कर नीचे आ गई ताकि हम एकबार आपस में बात कर लें|

"मैंने आजतक आपको.आपको बहुत दुःख दिए हैं, जिसकी सजा मुझे भगवान दे रहा है| लेकिन मेरा यक़ीन मानिये मैंने कभी आपका बुरा नहीं चाहा, मैंने हमेशा आपका भला चाहा है मगर मैं बेवकूफ आपका भला करने के चक्कर में हमेशा आपका बुरा कर देती हूँ! आप मुझसे शादी कर नई शुरुआत करना चाहते थे मगर मैं उस समय बहुत डर गई थी इसलिए मैंने कदम पीछे हटा लिए थे क्योंकि मुझ में दुनिया से लड़ने की हिम्मत नहीं थी| जैसा चल रहा था मेरे लिए वही आसान था और मैं उसी से खुश थी| भले ही चोरी-छुपे सही मगर हम साथ तो थे!

आपका नेहा और स्तुति के प्रति मोह देख मैं आपके भविष्य के लिए डर गई थी! मैं भले ही आपको दोनों बच्चियाँ गोद देने के लिए राज़ी हो जाती मगर बप्पा (बड़के दादा) इसके लिए कभी राज़ी नहीं होते! बस इसीलिए मैंने अचानक नेहा और स्तुति को गॉंव लाने की तैयारी की|

मैं जानती थी की इससे आपको दुःख होगा, लेकिन मैंने सोचा की कुछ दिनों में आप इस ग़म से लड़ लोगे और मुझसे नफरत करते हुए फिर से अपनी ज़िन्दगी शुरुआत कर लोगे! मैंने नहीं सोचा था की मेरे उठाये इस कदम से आपकी सारी दुनिया ही उजड़ जाएगी!

और ऐसा मत सोचिये की आपसे अलग रह कर मैं खुश थी! नहीं...मैंने भी आपके बिना दिन कैसे गुजारे ये बस मैं जानती हूँ! वो भेड़िया मुझे नोच खाने को हरपाल तैयार रहता था! मेरी ये जान...मेरा ये जिस्म आपकी अमानत था इसलिए खुद को बचाने के लिए मैं तरह-तरह के जतन करती थी| कभी उससे लड़ती थी तो कभी उससे बचते हुए अपनी माँ के घर आ जाती थी| जब ये सारे हतकंडे कमजोर पड़ने लगे तो मैंने ये भूत-प्रेत का नाटक शुरू किया, जिसके डर से उसने मेरे पास भटकना तक छोड़ दिया!..." संगीता मेरे सामने अपना रोना ले कर बैठ गई थी मगर मुझे उसका ये झूठ और रोना सुनने का ज़रा भी मन नहीं था इसलिए मैंने उसकी बात बीच में काट दी; "मैंने तुमसे कहा था की मेरा भला चाहो? या तुमने मुझसे मेरा भला करने से पहले एक बार भी पुछा? तुमने आजतक जितने फैसले लिए वो मेरे खिलाफ लिए...ये फैसले बस तुम्हारी सहूलत के लिए थे न की मेरे! सच तो ये है की तुम्हें मेरा दिल दुखाने में मज़ा आता है!...और किस सजा की बात कर रही हो तुम? भगवान ने अभी तुम्हें सजा दी ही कहाँ है? तुम बस मुझे दुःख देने के लिए इस दुनिया में आई हो और हरबार तूम मुझे दुःख दे कर कोई न कोई सफाई दे कर बच निकलती हो! लेकिन इस बार नहीं, इस बार तुम्हारी कोई सफाई...तुम्हारा कोई बहाना मेरे सामने नहीं चलेगा|

तुमने मेरा शादी का प्रस्ताव बार-बार इसलिए ठुकराया क्योंकि तुम्हें मेरे साथ मिलकर इस दुनिया से मुक़ाबला नहीं करना था क्योंकि तुम्हें चाहिए बस आराम की ज़िन्दगी| एक ऐसी ज़िन्दगी जिसमें सब कुछ तुम्हारे अनुसार हो, दुनिया की नजरों में धुल झोंक कर हो| सच तो ये है की तुमने कभी मुझसे प्यार किया ही नहीं, अगर मुझसे सच्चा प्यार करती तो मेरे साथ कँधे से कन्धा मिला कर खड़ी रहती और तबतक इस दुनिअय से लड़ती जबतक हमारा एक सुखी परिवार न बस जाता| लेकिन नहीं....तुम्हें चाहिए थे रिश्ते...दुनियादारी...तो चाटो उन रिश्तों को...रहो इस दुनिया में और भुगतो ज़िल्ल्त!

अब आते हैं तुम्हारे दूसरे झूठ पर, तुम मेरा नेहा और स्तुति के प्रति मोह जानती थी| तुम जानती थी की मैं उनके बिना नहीं जी पाऊँगा मगर फिर भी तुमने मेरी दोनों बेटियों को मुझसे छीना! मैं तुम्हारे आगे रोया था, गिड़गिड़ाया था, अपनी बेटियों की भीख तक माँगी मगर तुम्हारा दिल ज़रा भी न पसीजा! अगर तुम मुझसे प्यार करती तो सबके खिलाफ जा कर मुझे मेरी दोनों बेटियाँ दे देती! लेकिन नहीं...तुमने चुना आसान रास्ता और छोड़ दिया मुझे मरने के लिए! मुझे हैरानी है तो इस बात की कि कैसे तुम आज यहाँ छाती ठोक कर झूठ बोल रही हो की तुम्हें नहीं पता था की मेरा क्या हाल होगा?!

जब मैं तुम्हारे आगे गिड़गिड़ा रहा था की मैं नेहा और स्तुति के बिना नहीं जी पाऊँगा, तब तुम्हें नहीं पता था की मेरी दोनों बेटियों के जाने के बाद क्या होगा?! तुम्हें तो शर्म आनी चाहिए की जिस इंसान को तुम इतना प्यार करने का दावा करती हो, वो इंसान तुम्हारे आगे रोया...गिड़गिड़ाया मगर तुमने उसकी मिन्नत को लात मार दी, उसके सारे अरमानो को कुचल कर रख दिया...उससे उसकी जीने की चाह तक छीन ली तुमने!

जब तुम दिल्ली आई थी, तब मैंने आयुष के मुझे पापा जी की जगह चाचू कहने पर कभी तुम्हें दोष नहीं दिया क्योंकि मैंने आयुष के मुख से अपने लिए चाचू शब्द सुनने की कोई आस नहीं की थी| परन्तु आज मन में एक सवाल पैदा होता है की वो कैसी औरत होगी जो अपने बेटे को उसके असली बाप को 'पापा जी' की जगह 'चाचू' कहना सिखाती होगी? कैसा लगता होगा उस औरत को जब उसका बेटा अपने ही बाप को 'चाचू' कह कर बुलाता होगा?

वो तो मेरे बेटे में मेरे गुण आये थे जो उसने भले ही मुझे 'चाचू' कहा मगर उसने हमेशा मेरे अंदर एक पिता को देखा और मैंने भी उसे एक पिता की तरह ही प्यार दिया|

और क्या कहा था तुमने उस दिन जब तुम स्तुति को कंसीव (conceive) करने के लिए मुझसे लड़ पड़ी थी; 'मैं चाहती हूँ की आप इस बच्चे को अपनी गोदी में खिलाओ, उसे अच्छी-अच्छी बातें सिखाओ, उसे वो लाड-प्यार दे सको जो आप आयुष को न दे पाए| यही तुम्हारा मुझे मेरे बच्चों से अलग करने के पाप का प्रयाश्चित होगा|' मैं पूछता हूँ की कहाँ गया वो तुम्हारा पश्चाताप? तुम्हारे उठाये इस कदम के कारण आज मेरी बेटी, मेरा अपना खून स्तुति मुझे...अपने पपई को भूल गई!

स्तुति को मुझसे छीन कर, उसके मन से मेरी सारी यादें मिटा कर तुमने एक बाप-बेटी को अलग करने का जो पाप किया है उसके लिए तुम्हें मैं तो क्या भगवान भी माफ़ नहीं कर सकता!

और ये क्या तुम अपनी इज्जत बचाने का दवा कर रही हो? एक समय था जब मैं तुम्हारी कही हर बात पर आँख मूँद कर विश्वास कर लेता था, लेकिन इतने साल मुझसे दूर रह कर तुम्हारा ये जिस्म अब भी मेरा है, ये बात मैं कैसे मान लूँ? मेरे प्यार को छोड़ कर उस भेड़िये को तुम्ही ने चुना था न?! बजाए मेरे साथ खड़े होने के, तुम्ही गई थी न उस भेड़िये के पास?! तो इतने सालों में उसने तुम्हारा ज़रा सा भी माँस न चखा हो ऐसा तो हो ही नहीं सकता!"

इंसान के शब्दों में बहुत ताक़त होती है, कभी तो ये शहद बनकर सुनने वाले के कानों में घुल जाते हैं तो कभी ये ज़हरीले बाण बन कर सुनने वाले की आत्मा भेद कर रख देते हैं|

आज मेरे कहे ये ज़हरीले शब्द संगीता की अंतरात्मा तक नोच-खंसोट गए थे! खासकर जब मैंने अंत में कहा की संगीता अब पहले की तरह पवित्र नहीं है, उसके जिस्म पर चन्दर का ग्रहण लग चूका है, ये सुनकर तो संगीता घुटनों के बल जा गिरी और फफक कर रोने लगी!

"नहीं...जानू...प्लीज...ऐसा मत...कहो...मैं..अब भी...पाक..साफ़ हूँ" संगीता बिलखते हुए बोली मगर मैं उसे अनसुना कर नीचे आ गया|

मेरे कहे ये ज़हरीले शब्द संगीता के कानों में गूँज रहे थे| ख़ास कर जो मैंने संगीता के चरित्र पर ऊँगली उठाई थी उससे तो संगीता का दिल चकना चूर हो चूका था| वहीं मैं अपने दिल की सारी भड़ास निकाल चूका था, अब मुझे संगीता से न तो कुछ कहना था और न ही सुनना था इसलिए अगले ही दिन मैं माँ को ले कर वापस दिल्ली आ गया| यदि और भाईसाहब के घर रुकता तो सब मेरे पीछे पड़ जाते की मैं संगीता से बात करूँ!

हमारे दिल्ली वापस आने के दो-तीन दिन बाद नेहा की नानी जी ने हमें फ़ोन कर बताया की उनकी जान-पहचान में किसी ने मेरे लिए एक रिश्ता देखा है| जब ये बात संगीता को पता चली तो उसकी जान निकलने लगी| एक तो पहले ही मेरे कहे कड़वे शब्द उसके मस्तिष्क में बार-बार घूमने से वो तिल-तिल मर रही थी, ऊपर से मेरे लिए रिश्ता आने की खबर से उसकी साँस ही गले में अटक गई! मुझे खोने का डर संगीता के लिए हर पल गहराता जा रहा था इसलिए संगीता ने खुद को सजा देने के लिए खाना-पीना छोड़ दिया| नतीज़न पहले तो उसे कमजोरी आई और फिर उसे चढ़ा बुखार| संगीता का ये बुखार हर पल बढ़ता जा रहा था, संगीता को लगा की उसका अंतिम समय अब आ ही गया इसलिए उसने नेहा से मुझे आखरी बार मिलने के लिए बुलाने को कहा|

जहाँ पिछलीबार जब संगीता दिल्ली में थी और मेरे उसे भाभी कहने पर वो बीमार हो गई थी, तब मैं उसकी तबियत के बारे में सुन घबराया हुआ था| वहीं इस बार जब नेहा ने मुझे अपनी मम्मी की खराब हुई तबियत के बारे में बताया तो मुझे कुछ महसूस ही नहीं हुआ, मेरे भीतर जैसे सारे जज़्बात मर चुके थे! नेहा की बात सुनकर भी मैं अम्बाला नहीं जाने वाला था, वो तो माँ ने मुझे जबरदस्ती जाने को कहा तब जा कर मैं अम्बाला के लिए निकला|

भाईसाहब के घर पर संगीता को ले कर सभी लोग बड़े चिंतित थे| उनके अनुसार ये कोई भूत-बाधा है जो संगीता के सर पर सवार हुई है इसलिए नेहा की नानी जी ने डॉक्टर की दवा करने के बजाए किसी तांत्रिक को घर बुलाया हुआ था| जब मैं घर पहुँचा तो मैंने देखा की वो तांत्रिक हवस भरी नजरों से बेसुध हुई संगीता के जिस्म को घूर रहा है और बाकी सबको लग रहा था की यहाँ संगीता का इलाज जारी है| उस पल पता नहीं क्यों मेरे तन-बदन में आग लग गई! "ओ बाबा जी, चलो निकलो आप!" मैंने गुस्से से कहा और उस बाबा को 500/- का नोट दिखाते हुए जाने को कहा| मेरे बात करने के अंदाज़ और मेरे तेवर देख वो बाबा गुस्से से भुनभुनाता हुआ चला गया|

उस बाबा के जाने के बाद नेहा की नानी जी चिंतित होते हुए मुझे कुछ कहने वाली हुई थीं की मैं एकदम से बोल पड़ा; "माँ, आप भी किन ढोंगी बाबाओं के चक्कर में पड़ जाती हो! आपने देखा वो बाबा कितनी गंदी नजरों से आपकी बेटी को देख रहा था!" जब मैंने उस बाबा के बारे में सच बताया तो भाईसाहब बोले; "अब हम क्या करें मानु, मुन्नी यूँ अचानक बीमार पड़ गई...कोई दवाई असर नहीं कर रही थी इसलिए हमने..." भाईसाहब ने अपनी मज़बूरी ब्यान की|

मैं जानता था की क्यों कोई दवाई संगीता पर असर नहीं कर रही, अब जब वो दवाई खाती ही नहीं होगी तो दवाई असर कैसे करेगी?! दरअसल संगीता जानबूझ कर दवाई खाने के बजाए चुपके से फेंक दिया करती थी|

"आप सब यही चाहते हो न की संगीता ठीक हो जाए, तो आप सभी को मुझे उसे डाँटने और जर्रूरत पड़ने पर मारने की छूट देनी होगी! फिर देखना दो दिन...दो दिन में संगीता की तबियत में सुधार आप सभी को देखने को मिलेगा|" मैं अपनी छाती ठोंक कर ये बात कह रहा था की मैं संगीता का तंदुरुस्त कर सकता हूँ इसलिए नेहा की नानी जी बोलीं; "ठीक है मुन्ना, तोहका जो ठीक लागे, ऊ करो लेकिन हमार मुन्नी का तंदुरुस्त कर दिहो!" मुझे छूट मिल चुकी थी इसलिए मैं सबसे पहले एक डॉक्टर को घर लाया| डॉक्टर ने संगीता का चेकअप किया तथा उसे होश में लाने के लिए एक इंजेक्शन लगाया| संगीता के भीतर बहुत कमजोरी थी इसलिए डॉक्टर ने उसे I.V. लगाई तथा दवाइयाँ लिख कर चला गया|

संगीता ने होश में आकर जब मुझे देखा तो उसके दिल को सुकून मिला| इधर मैंने भाभी जी से कहा की वो फटाफट खिचड़ी बनायें| सब लोग मौजूद थे इसलिए संगीता मुझसे कुछ कह न पाई, वो बेचारी तो बस अपनी आँखों से मुझे इशारे कर अपनी बात कहना चाह रही थी| जब खिचड़ी आई तो मैंने संगीता को उठा कर बिठाया और उसे खिचड़ी खाने को कहा| संगीता को करनी थी मुझसे बात इसलिए वो खाने से मना करने लगी| "चुप-चाप खाओ खाना वरना मारूँगा एक खींच कर!" मैंने गुस्से से संगीता को हड़काया तो डर के मारे उसने थोड़ी सी खिचड़ी खाई| अब बारी थी दवाई देने की, मैंने जब संगीता को दवाई दी तो उसे डाँटते हुए बोला; "खबरदार जो ये दवाई फेंकी तो! एक खींच कर लगाऊँगा!" जब मैंने दवाई फेंकने की बात की तो सभी लोग दंग रह गए| "ये आपकी मुन्नी दवाई खाती नहीं फेंक देती थी इसीलिए इस पर कोई दवाई असर नहीं कर रही थी!" मैंने संगीता को पोल-पट्टी खोली तो सभी मुँह बाए मुझे देखने लगे की मुझे ये सब कैसे पता?! इतने सालों से संगीता के साथ रह रहा था तो उसकी आदतें अच्छे से जानता-पहचानता था|

अगले दो दिन रह कर मैंने संगीता का खाना-पीना पुनः शुरू करवाया जिससे संगीता की तबियत में सुधार आने लगा| "माँ, ये भूत-प्रेत आदि से डरने के बजाए भगवान जी का नाम लिया करो और जब आपकी ये बेटी बेलगाम हो जाए तो खींच कर एक मारा करो, फिर देखना ये कभी बीमार नहीं पड़ेगी!" मैंने हँसते हुए नेहा की नानी जी को ये मंत्र दिया तो माँ ने मेरे सर को चूम मुझे आशीर्वाद दिया|

संगीता की तबियत में सुधार आ चूका था इसलिए मैं शाम को वापस निकलने वाला था| इसी बीच संगीता को मुझसे बात करने का एक मौका मिल गया और उसने नेहा को मुझे बहाने से बुलाने को कहा| "जानू, मुझे आपसे कुछ कहना था| मैं लाख बुरी सही लेकिन मैंने कभी आपका भरोसा नहीं तोडा! आपके अलावा मुझे कभी किसी दूसरे आदमी ने नहीं छुआ! चाहो तो मेरी अग्नि परीक्षा ले लो पर मेरे ऊपर कुलटा होने का दाग न लगाओ!" संगीता मेरे आगे हाथ जोड़े, आँखों में आँसूँ लिए बोली|

"जानता हूँ!" मैंने बस इतना कहा| संगीता ने मेरी आँखों में देखा तो उसे मेरी आँखों में वही विश्वास दिखा जो पहले दिखता था| सच बात ये थी की मैंने संगीता के चरित्र पर कभी शक किया ही नहीं| मैं जानता था की वो मरते मर जायेगी मगर किसी पराये मर्द को खुद को छूने नहीं देगी| मैंने वो ताना बस संगीता को दुःख देने के लिए मारा था और मैं अपने इस लक्ष्य में सफल भी हुआ था|

मेरी आँखों में विश्वास देख संगीता मेरे आगे हाथ जोड़कर विनती करते हुए बोली; "जानू, प्लीज ये शादी मत करना! मैं आपको अपनी आँखों के सामने किसी और का होता हुआ नहीं देख सकती! प्लीज जानू! मैं मर जाऊँगी!!!" संगीता रोते हुए बोली| संगीता की बात सुन मुझे एहसास हुआ की संगीता आखिर किस डर से घबराई हुई थी की उसकी ऐसी हालत हुई|

इसके आगे हमारी बात हो पाती उससे पहले ही भाभी जी कमरे में आ गईं| उनके आते ही मैंने मैंने इधर-उधर की बात छेड़ दी जिससे माहौल फिर से सामन्य हो गया|

शाम को मैं सबसे विदा ले कर चला मगर मैं संगीता से विदा लेने उसके कमरे में नहीं गया| बस में बैठ मैं संगीता की बातों को सोचने में लग गया| संगीता के कहे ये अंतिम शब्द की; "मैं आपको अपनी आँखों के सामने किसी और का होता हुआ नहीं देख सकती! प्लीज जानू! मैं मर जाऊँगी" मेरे दिमाग में गूँजने लगे| मैंने कल्पना की कि मुझे कैसा लगता अगर मेरा मेहबूब किसी और की बाहों में जा रहा होता? कैसे मैं उन हालातों से लड़ता? इन हालातों में मेरे पास सिवाए शराब के कोई दूसरा सहारा था नहीं, मैं तो डर के मारे सीधा शराब में ही डूब जाता! पर संगीता के पास तो ये रास्ता भी नहीं था! वो बेचारी या तो मेरी जुदाई के ग़म में पागल हो जाती या फिर मर जाती...और इस सबका दोषी मैं ही होता! मेरी वजह से संगीता खुदखुशी करती तो मैं सारी उम्र खुद को माफ़ नहीं कर पाता और इस ग़म के तले दबकर कुढ़ता रहता!

जानता हूँ ये विचार पढ़कर आप सभी को लगेगा की इतना गुस्सा होने के बावजूद भी मैं संगीता के आगे क्यों नरम पड़ने लगा था? परन्तु ऐसा कतई नहीं था की मैं संगीता से फिर मोहब्बत करने लगा था, मैं उससे नफरत तो बहुत करता था मगर फिर भी उसे जानबूझ कर ऐसा नासूर बनने वाला जख्म नहीं देना चाहता था| अब मैं अपना सारा गुस्सा संगीता के ऊपर निकाल चूका था, मुझे मेरी एक बेटी नेहा मिल चुकी थी तो ऐसे में अब मेरे भीतर संगीता के लिए कोई जज़्बात नहीं बचे थे| लेकिन फिर भी मेरा मन संगीता की बात को सोचते हुए न जाने क्यों विचलित हो रहा था!

शायद मैं शादी की जिम्मेदारी उठाना नहीं चाहता था या फिर मैं संगीता को इतना बड़ा दुःख नहीं देना चाहता...वजह कुछ भी हो मगर मैंने शादी न करने का इरादा कर लिया था|

घर पहुँच कर माँ ने मुझे मेरे लिये आये रिश्ते के बारे में बताया तो मैंने शादी से बचने के लिए अपना पहले से सोचा हुआ बहाना माँ के आगे इस कदर रखा की माँ को ये न लगे की मैं शादी करने से भाग रहा हूँ; "माँ, आपने मेरी कुंडली भेजी है उन्हें? पता है न मैं मांगलिक हूँ, देख लो बाद में कहीं कोई दिक्क्त न हो!" इतना कह मैं उठ कर अपने कमरे में चला गया| मेरी बात सुन माँ ने फौरन मेरी कुंडली लड़की वालों के यहाँ भिजवाई| मुझे अपनी कुंडली पर पूरा विश्वास था इसलिए वही हुआ जो मैंने चाहा था| मेरी कुंडली में मांगलिक दोष इतना कठोर था की लड़की वालों ने शादी से मना कर दिया|

मेरी कुंडली के इस दोष को देख मेरी माँ घबरा गई थीं इसलिए उन्होंने मुझे पंडित जी के पास चलने को कहा| इधर मैंने पंडित जी के बेटे से सेटिंग कर ली थी और उसे झूठ बोलने के लिए राज़ी कर लिया था| माँ के सामने उसने मेरी कुंडली देखि और ग्रहों के ठीक होने तक यानी कमसकम 3 साल इंतज़ार करने का बेसर-पैर का उपाए बता दिया| मेरी भोली भाली माँ अपने बेटे के इस जाल में फँस गईं और कुछ न बोल पाईं| अपनी चतुराई से मैंने शादी की वरमाला से अपनी गर्दन बचा ली थी|

भले ही स्तुति अपने पपई को भूल गई हो मगर आयुष अपने चाचू को नहीं भूला था| मैं भी अपने दोनों बच्चों के लिए उनके जन्मदिन पर खिलोने, कपड़े आदि भिजवाता रहता था| इधर आयुष ने भी अपनी दीदी की तरह अपने एक दोस्त के फ़ोन से मुझे कभी-कभी फ़ोन करता था| उसके स्कूल में क्या-क्या हो रहा है, आयुष ने कोई नई दोस्त बनाई या नहीं, क्रिकेट में आयुष ने कितने रन बनाये आदि की जानकारी आयुष मुझे बड़े चाव से बताता था| एक बार तो आयुष और उसके दोस्त के बीच marvel के superheros को ले कर बहस हो गई जिसका फैसला मैंने फ़ोन पर करवाया|

खैर, बड़के दादा के अधिक लाड-प्यार के कारण आयुष पढ़ाई में थोड़ा ढीला पड़ गया था जिस वजह से वो अपने मिड टर्म के एक्साम्स में अव्वल नहीं आया था! इस पर आयुष को सबसे डाँट पड़ी तब मैंने ही आयुष को फ़ोन पर बात कर सँभाला और भाईसाहब से कह उसकी टूशन का इंतज़ाम करवाया|

इधर नेहा अपने स्कूल की छुट्टियों में कभी-कबार अपनी मम्मी के पास गॉंव जाती थी मगर मेरे पिताजी को छोड़ किसी को भी नेहा के आने से कोई ख़ुशी नहीं होती थी| पिताजी अपनी पोती से उसके स्कूल के बारे में पूछते और उसे खूब-लाड प्यार करते|

गॉंव में कोई नहीं जनता था की मैं नेहा से मिलता हूँ इसलिए जब नेहा घर आती तो आयुष अपनी दीदी से मेरे बारे में सब पूछता| नेहा भी अपने छोटे भाई को बताती की हम बाप-बेटी मिलकर कितनी शैतानी करते हैं| एक-आध बार मैंने नेहा के हाथों आयुष की मनपसंद चॉकलेट भी भेजी, जिसे देख आयुष भावुक हो गया था की इतने सालों से दूर होने पर भी मैं आयुष की कोई पसंद-नपसंद नहीं भूला| आयुष अपनी दीदी के साथ अपने बड़े मामा जी के यहाँ घूमने जाना चाहता था मगर बड़के दादा उसे कहीं आने-जाने ही नहीं देते थे इसलिए मेरे बेटा बस मुझसे फ़ोन पर बात कर के ही खुश हो लिया करता था|

गॉंव में जो पुराने जख्म थे उनपर अब समय के साथ पपड़ी बनने लगी थी| एक दिन अचानक पिताजी ने मुझे फ़ोन किया और इस बार उन्होंने मुझसे बड़े अच्छे से बात की, मेरा हाल-चाल पुछा, माँ का हाल-चाल पुछा| उन्हें पता था की मैं नेहा से मिलता हूँ मगर फिर भी वो खामोश थे क्योंकि अब जा कर उन्हें अपने फ़रमाबरदार बेटे की याद सता रही थी|

पिताजी मुझे गॉंव बुला रहे थे मगर माँ मुझे गॉंव जाने नहीं देती थीं, उन्हें डर था की यदि मैं गॉंव गया तो फिर मेरी जानपर कोई हमला होगा! मैंने ये बात पिताजी को बताई तो उन्हें भी मेरी चिंता हुई तथा उन्होंने मुझे आने से मना कर दिया| मुझसे हुई ये बातें पिताजी बड़के दादा की चोरी अपनी भाभी से बताते थे, एक दिन बड़की अम्मा से मेरी बात हुई और मैंने उन्हें दिल्ली आने को कहा| भाईसाहब से बात कर उन्हें मैंने बड़की अम्मा और नेहा की नानी जी को मेरे घर लाने को कहा| कुछ दिन बाद बड़की अम्मा का आगमन हुआ, मुझे देख अम्मा ने मुझे सीधा अपने गले लगा लिया और मेरे पूरे चेहरे को चूमते हुए वो रो पड़ीं| सही होने पर भी मैंने जो अपने परिवार की ज़िल्ल्त सही, मानसिक तौर पर जंग लड़ी, अपनी माँ का सहारा बना...इन बातों के कारण बड़की अम्मा को मुझ पर बहुत गर्व हो रहा था|

इन कुछ सालों में बड़के दादा को धीरे-धीरे सच पता लगने लगा थी की आखिर उस दिन संगीता के मायके में आखिर क्या घटित हुआ था जिस कारण बड़के दादा का गुस्सा अब ठंडा पड़ने लगा था इसलिए बड़की अम्मा ने कहा की भले ही मेरे-पिताजी का तलाक हुआ हो पर फिर भी मैं माँ को ले कर अब भी गॉंव आ सकता हूँ|

परन्तु मेरी माँ का मेरे पिताजी के प्रति मन फट चूका था, वो तो पिताजी की सूरत तक नहीं देखना चाहतीं थीं इसलिए माँ ने गॉंव जाने से साफ़ मना कर दिया| मैं भी माँ का गुस्सा समझता था इसलिए मैंने आजतक माँ को कभी गॉंव जाने के लिए नहीं कहा| मेरी माँ का बस एक ही सपना है की जब राम मंदिर बनेगा तो वो सीधा अयोध्या जाएंगी|

मैंने अपनी शादी को लटका कर संगीता पर एहसान किया है ये सोचकर संगीता को मुझ पर बहुत प्यार आ रहा था इसलिए अब उसने महीने में एक बार कोई न कोई बहाना कर मेरे घर आना शुरू कर दिया था| कभी वो सभी को (भाईसाहब, भाभी जी, विराट और नेहा) को ले कर आ टपकती तो कभी अपनी माँ को साथ ले कर अनिल के साथ आ जाती|

घर आ कर किसी न किसी बहाने से संगीता मुझसे बात करने की कोशिश करती थी पर मेरी संगीता से बात करने की कोई इच्छा नहीं थी इसलिए मैं अपने ही घर में उससे बचने की कोशिश करता था| लेकिन संगीता बहुत चंट थी, वो कुछ न कुछ तिगड़म लगा कर मुझे अकेला पा कर मुझसे बात करने आ ही जाती थी| "मुझे आपको थैंक यू कहना था, आपने मेरे लिए शादी करने का विचार त्याग दिया..." संगीता मुस्कुराते हुए बोली|

"पहली बात तो ये की अपने मन से ये खुशफहमी निकाल दो की मैं तुम्हारी वजह से शादी नहीं कर रहा| और दूसरी बात ये की तुमने भले ही मुझसे बेवफाई की हो मगर मैं तुम्हारी तरह गिरा हुआ नहीं हूँ जो अपने सर बेवफाई का दाग ले कर जी सकूँ!" मैंने संगीता को ताना मारते हुए कहा और बिना उसकी कोई प्रतिक्रिया लिए वहाँ से चला गया| मेरा मारा ये ताना संगीता को बुरा तो अवश्य लगा होगा मगर फिर भी उसने हँस के ये ताना स्वीकार लिया|

[color=rgb(51,]नेहा[/color][color=rgb(51,] की [/color][color=rgb(51,]बग़ावत[/color]

लगभग साल बीता था और नेहा अब दसवीं कक्षा में आ गई थी| ये साल नेहा और मेरे लिए बहुत अहम था, नेहा के लिए ये साल इसलिए अहम था क्योंकि उसे बोर्ड की परीक्षा देनी थी और मेरे लिए इसलिए क्योंकि इसी साल नेहा के बगावती तेवर सामने आये थे|

नेहा के अम्बाला आने के बाद से ही मैंने उसे थोड़ी-थोड़ी छूट देनी शुरू कर दी थी| तब मुझे नहीं पता था की मेरी दी जाने वाली इस छूट के कारण मेरी बिटिया मुझसे दूर होती जा रही है!

जो शनिवार-इतवार हम बाप-बेटी साथ बिताया करते थे वो समय अब नेहा ने अपनी सहेलियों के साथ बाहर जाने में इस्तेमाल करना शुरू कर दिया था| मैंने इस बात पर कोई आपत्ति नहीं जताई क्योंकि मैं ये मानता था की नेहा अब बड़ी हो चुकी है और ऐसे में मुझे उसे अब थोड़ा 'स्पेस' (space) देना चाहिए| लेकिन नेहा को स्पेस देते-देते मैंने ये नहीं देखा की वो पढ़ाई के प्रति लापरवाह होती जा रही है! वो तो एकदिन भाभी जी ने जब नेहा के स्कूलबैग की तलाशी ली तो उन्हें नेहा के पेपर मिले जिनमें नेहा बड़ी मुश्किल से पास हुई थी! ये खबर मिलते ही मैं दौड़ा-दौड़ा अम्बाला आया और नेहा को समझा कर पुनः पढ़ाई की पटरी पर ले आया| परन्तु ये तो मेरा भ्र्म था, मेरी बिटिया अब कुछ ज्यादा ही सयानी हो गई थी!

वहीं ये खबर जब संगीता तक पहुँची तो उसने अपनी भाभी को पूरी आज़ादी दे दी की वह नेहा को अच्छे से सीधा कर दें! संगीता की हाँ मिलते ही भाभी जी हाथ धो कर नेहा के पीछे पड़ गईं| बीच-बीच में संगीता भी टपक पड़ती थी और नेहा को डाँट-डपट कर चली जाती थी| मैं भी अब हर शनिवार-इतवार आता और नेहा को प्यार से समझाता, तो कभी उसे अंग्रेजी, हिस्ट्री, साइंस पढ़ाने लगता|

इस रोका-टोकी से नेहा का दम घुटने लगा था और उसके भीतर का ज्वालामुखी सुलगने लगा था| अब नेहा अपना ये लावा अपनी मामी जी या अपनी मम्मी पर उड़ेल नहीं सकती थी क्योंकि नेहा जानती थी की ये दोनों जनानियाँ मार-मार कर उसकी जान निकाल देंगी| बचा केवल मैं जिसने आजतक नेहा को कभी डाँटा नहीं था!

नेहा के मिड टर्म एग्जाम के बाद जब मैं उसका रिजल्ट जानने पहुँचा तो नेहा ने मुझसे अपने फ़ैल होने की बात छुपाई| [color=rgb(255,]तब भाभी जी ने नेहा के बैग से उसकी मार्कशीट निकाल कर मुझे दिखाई| साथ ही विराट ने नेहा की इश्कबाजी की पोल मेरे सामने खोल दी| ये सच जानने के बाद मैंने नेहा को कमरे में ले जा कर बहुत डाँटा| हम बाप-बेटी के बीच जो बात हुई उसे आप पढ़ ही चुके हैं| जो बात आपको नहीं मालूम वो ये की भाभी जी ने हम बाप-बेटी की बातें सुन ली थीं![/color]



जब नेहा ने कहा की मैं उसका असली पापा नहीं हूँ तो ये सुनने के बाद मेरा मन उस घर में रुकना का ज़रा भी नहीं था| अपना पिट्ठू बैग ले कर मैं कमरे से बाहर आया तो मैंने भाभी जी को दरवाजे के पास खड़ा पाया| जब मैंने भाभी जी को देखा तो मैंने उनके भीतर अपने प्रति हमदर्दी पाई! वो जानती थीं की मैं नेहा से कितना प्यार करता हूँ और उसके मुँह से ये जहरीले शब्द सुन कर मुझ पर क्या बीती होगी शायद इसीलिए उन्होंने मेरे और संगीता के रिश्ते के बारे में कुछ नहीं पुछा| परन्तु मुझे बैग उठाये देख वो मुझे रोकते हुए बोलीं; "मानु रात के दस बज रहे हैं, इस वक़्त सफर नहीं करते, चलो बैग दो मुझे!" लेकिन मेरा मन इस समय बस अकेले में रोने का था इसलिए मैंने हाथ जोड़ भाभी जी को नमस्ते की और उनके बार-बार रोकने पर भी उनकी अनसुनी कर सीधा बस स्टैंड पहुँचा|

दिल्ली की बस 11 बजे की थी और तबतक मैं बस स्टैंड के एक कोने में बैठा, अपनी बेटी के कहे शब्दों को याद कर रोता रहा| बस आई तो मैंने बस की सबसे पीछे की सीट पकड़ ली और नेहा के बचपन के दिनों को याद करते हुए जागते हुए पूरा सफर सिसकता रहा| जबतक मेरी बेटी छोटी थी तबतक उसका मन कितना निश्छल और पाक-साफ़ था और अब देखो उसके मन में अपने ही पापा जी के लिए इतना जहर घुल गया है!
 
अगली सुबह मैं घर पहुँचा और नहा-धो कर काम का बहाना कर घर से निकल गया| करीब 11 बजे भाईसाहब का फ़ोन आया और वो नेहा के कहे उन कटु शब्दों के लिए शर्मिंदा होने लगे|

दरअसल जब हम बाप-बेटी के बीच ये 'वार्तालाप' हुई तब वो गॉंव में अपनी माँ के पास थे| मेरे घर से निकलने के बाद भाभी जी ने उन्हें सब बताया, जो बात भाभी जी ने नहीं बताई वो थी मेरे और संगीता के रिश्ते की बात!

खैर, नेहा ने जो कहा वो उसके विचार थे, उसमें भाईसाहब या किसी की भी कोई गलती नहीं थी इसलिए मैंने भाईसाहब को शर्मिंदा नहीं किया| हाँ, मैंने उनसे इतना अवश्य कह दिया था की इस बात का पता मेरी माँ को नहीं चलना चाहिए क्योंकि मेरी माँ का दिल बहुत दुखता और गुस्से में वो नेहा से सारे रिश्ते-नाते तोड़ लेतीं|

उधर भाभी जी ने संगीता को फ़ोन कर रात हुए इस काण्ड की खबर दे दी| चूँकि भाभी जी ने नेहा के मुँह से मेरे और संगीता के प्यार के बारे में सुन लिया था इसलिए उन्होंने ये सवाल संगीता से पुछा| संगीता के लिए झूठ बोलना मुश्किल था इसलिए उसने भाभी जी को सारा सच बता दिया तथा उन्हें अपनी क़सम दे कर ये बात छुपाने को कहा|

संगीता की सारी बात सुन भाभी जी ने वही कहा जो एक समझदार व्यक्ति कहता| भाभी जी उसे समझाने लगीं की जो हुआ सो हुआ पर अब संगीता को अपनी गृहस्ती सँभालनी चाहिए| परन्तु प्रेम में अंधी हुई संगीता के पल्ले कुछ नहीं पड़ा|

भाभी जी से बात कर संगीता ने नेहा से बात की तथा उसे ढेर सारी गालियाँ देने लगी की उसने मेरा दिल दुखाया तो दुखाया कैसे?! जब संगीता नेहा को डाँट रही थी तब आयुष ने सारी बात सुन ली थी| आयुष पहले ही मुझसे बहुत प्यार करता था, जब उसे पता चला की उसकी दीदी ने मुझे इतनी बड़ी बात बोली है तो उसे भी अपनी दीदी के ऊपर बहुत गुस्सा आया|

संगीता जानती थी की मैं बातों को दिल से लगा लेता हूँ और अपने ग़म के तले दबकर शराब पीने लगता हूँ| इस समय संगीता को मेरी बहुत चिंता हो रही थी इसलिए उसने हाल-चाल लेने के लिए मुझे फ़ोन खनका दिया|

इधर मैं अपनी बेटी के कहे शब्दों के कारण फिर से डिप्रेशन की ओर बढ़ रहा था| मुझे अब किसी पर भरोसा नहीं रह गया था, मुझे लगता की मेरी ज़िन्दगी में हर इंसान बस अपने फायदे के लिए आता है और मुझे अब किसी भी स्वार्थी इंसान की जर्रूरत नहीं थी| मैंने खुद को फिर से आइसोलेट कर लिया और संगीता का नंबर ही ब्लॉक कर दिया|

रात को जब मैं घर लौटा तो शराब की बोतल साथ ले कर लौटा| माँ ने खाने के लिए पुछा तो मैंने कह दिया की मैं खाना खा कर आया हूँ| अपने कमरे में घुस मैं लग गया पीने, जब शराब का सुरूर चढ़ा तो नेहा की कही बातों को फिर से याद कर मेरी आँखें आँसुओं की नदी बहाने लगी| फिर तो रोते-रोते कब नींद आई पता ही नहीं चला| अगली सुबह उठ मैं फिर काम का बहाना कर निकल गया और एक पार्क में अकेला बैठ गया| अपनी सोच में कुढ़ते हुए मुझे नशे की दरकार हुई तो मैंने सिगरेट पीनी शुरू कर दी| फिर वही रात को लौटना और पी कर धुत्त हो कर सो जाना|

लगातार 5 दिन तक मैं ठीक से खा नहीं रहा था और पीने के चक्कर में मैंने अपनी B.P. की दवाई लेनी बंद कर दी थी| ग़म के कारण मेरे दिमाग पर दबाव पड़ रहा था और खाना ठीक से न खाने के कारण मेरे शरीर पर दबाव पड़ रहा था| मेरा बेचारा दिल ये दबाव न सह सका जिस कारण मुझे रात को माइल्ड हार्ट अटैक (mild heart attack) आया| वो रात हम माँ-बेटे ने कैसे काटी ये लिखपाना बहुत मुश्किल है! अगली सुबह मुझे होश आया और धीरे-धीरे मेरी तबियत में सुधार हुआ|

मैं ये बात किसी को नहीं बताना चाहता था इसलिए मैंने माँ से कह दिया की वो ये बात किसी को न बताएं| लेकिन अगले दिन संगीता ने जब माँ को किसी व्रत के बारे में पूछने के बहाने से फ़ोन किया तो बातों-बातों में माँ के मुँह से सारी बात निकल गई| संगीता जानती थी की मुझे माइल्ड हार्ट अटैक क्यों आया होगा इसलिए उसने अपने भाईसाहब को फ़ोन कर दिया| तीसरे ही दिन भाईसाहब सबको (संगीता, आयुष, अनिल और भाभी जी को) लेकर मेरे घर आ पहुँचे|

नेहा की नानी जी नेहा के कारण बहुत शर्मिंदा थीं, उनकी हिम्मत नहीं हुई की वो मेरे सामने आएं इसलिए वो अम्बाला में विराट, स्तुति तथा नेहा की देख-रेख करने रुक गई थीं|

आयुष मुझे इतने सालों बाद इस हालत में देख बहुत डर गया था इसलिए आयुष दौड़ता हुआ बिस्तर पर चढ़ मेरे सीने से लिपट कर रोने लगा! "चाचू...ये आपको..." इतना कह आयुष को खाँसी आ गई तो मैंने आयुष की पीठ थपथपा कर शांत किया|

मेरी ये हालत देख कर सभी चिंतित थे, वहीं संगीता की आँखें आँसूँ से भरी होने के कारण छलछला गई थीं| मैंने इशारे से संगीता को खामोश रहने को कहा क्योंकि उसके ये आँसूँ सभी के मन में सवाल पैदा कर देते|

इधर माँ ने सबको बताया की मैं कितना लापरवाह हूँ जो मैंने अपनी दवाइयाँ लेना बंद कर ये मुसीबत मोल ली| अब मेरी माँ क्या जाने की उनके बेटे का दिल किस कदर टूटा हुआ है!

चूँकि मैंने भाईसाहब से पहले ही कह रखा था की वो असली सच माँ के सामने न आने दें इसलिए माँ की बात सुन सब मुझे समझा रहे थे की मुझे यूँ अपनी सेहत के साथ खिलवाड़ नहीं करना चाहिए|

माँ सभी के लिए चाय बनाने जाने लगीं तो संगीता और भाभी जी उनके साथ रसोई में चले गए| कमरे में मैं, भाईसाहब, अनिल और आयुष थे, तो आयुष ने मुझे अम्बाला में हुई मार-पीट के बारे में बताया| दरअसल, भाईसाहब संगीता, स्तुति, स्तुति की नानी जी, अनिल और आयुष को ले कर पहले अम्बाला पहुँचे थे| वहाँ पहुँच संगीता ने आव देखा न ताव और सीधा नेहा के गाल पर खींच कर एक चाँटा रख दिया तथा उसका गला पकड़ कर दाँत किटकिटाते हुए नेहा से दबी आवाज़ में बोली; "हरामज़ादी! अगर मेरे पति को आज कुछ हो जाता न, तो मैं तेरा टेटुआ दबा कर तेरी जान ले लेती!

'You're not my real father!' यही कहा था न तूने?!....जब तू इनका खून ही नहीं है तो ये ख्याल तो देर-सवेर तेरे मन में आना ही था! आखिर तेरे जिस्म में खून तो एक गंदे आदमी (चन्दर) का ही है, तो उस गंदे खून ने अपना असर तो दिखाना ही था! जब तेरे बाप चन्दर ने इन्हें जान से मारने की कोशिश की थी, तो तू कहाँ पीछे रह सकती थी...तूने भी जानबूझ कर ऐसे शब्द कहे की 'स्तुति के पापा जी' की जान पर बन आई!

आज कान खोल कर मेरी एक बात सुन ले, अगर इस फसाद के बारे में स्तुति की दादी जी (यानी मेरी माँ) को कुछ भी पता चला...उनका दिल दुखा तो तेरे लिए मुझसे बुरा कोई न होगा!..... Now get lost!"
संगीता ने दबी आवाज़ में ये सब इसलिए कहा की कहीं कोई और सुन न ले!

(संगीता की कही ये बातें कोई नहीं सुन पाया था| ये हिस्सा आप सबको पुनः बताने के लिए मैंने update में से उठाया है|)

विधि की विडंबना तो देखिये, जिसने खुद मुझसे सारे रिश्ते तोड़ लिए थे वो अपनी ही बेटी के सामने मुझे अब भी अपना पति कह हक़ जता रही थी|

घर से निकलने से पहले आयुष को अपनी दीदी से बात करने का मौका मिल गया, दोनों भाई-बहन के बीच जो मुझे ले कर झगड़ा हुआ वो आप सभी ने पढ़ ही लिया था| इधर अपने बेटे से ये बातें सुन मुझे आयुष पर बहुत गर्व हो रहा था| जिस बेटी को मैंने सबसे ज्यादा प्यार किया वो अपने पापा जी को नहीं समझ पाई मगर मेरा अपना खून जो मुझे चाचू कहता था वो मुझे अच्छे से समझ रहा था| बुरा लगा तो इस बात का की आयुष को मेरे कारण अपनी दीदी से थप्पड़ खाना पड़ा|

दोपहर को खाने के बाद मुझे अकेला पा कर भाभी जी मुझसे बात करने आईं| उन्होंने बताया की संगीता ने हमारे बारे में सब सच बता दिया है| ये जानकार मुझे बहुत बड़ा झटका लगा क्योंकि मैं मन ही मन ये तैयारी कर के बैठा था की मैं सारा दोष अपने सर ले लूँगा की मैंने संगीता को बहला-फुसला कर अपने प्यार में जबरदस्ती खींचा था मगर संगीता के सच बोलने से सारी बात ही पलट गई थी!
भाभी जी को हमारे ऊपर पहले भी शक हुआ था, जब वो स्तुति के पैदा होने के बाद घर आया करती थीं, लेकिन तब उन्हें लगता था की ये तो बस मेरा लड़कपन है...दिल्लगी करने की आदत है इसलिए वो तब कुछ नहीं बोलीं| हाँ इतना अवश्य था की उन्होंने संगीता को प्यार से इतना कह दिया था की हम दोनों का यूँ सबके सामने दिल्लगी करना ठीक नहीं| (इस हिस्से को मैंने मेरे और संगीता के रसोई में भाभी जी द्वारा पकड़े जाने वाले सीन के रूप में लिखा था|)

"भाभी जी, मैंने संगीता से सच्चा प्यार किया था और मैं हमारे रिश्ते को एक जायज रूप देना चाहता था इसलिए मैंने कई बार संगीता के सामने शादी का प्रस्ताव रखा मगर उसने हर बार मेरा प्यार ठुकरा दिया| जब वो मुझे छोड़ कर और मेरे बच्चों को मुझसे छीन कर ले गई तो मेरे दिल में उसके लिए बस नफरत रह गई|" मैंने भाभी जी से अपने दिल की बात कह दी थी| मेरी बात सुन भाभी जी को यक़ीन हो गया की हम दोनों (मेरे और संगीता) में से मैं ही सबसे सुलझा हुआ हूँ| अतः उन्होंने संगीता को बुलाया और मेरे सामने बिठा कर समझाने लगीं की उसे खुद को सुधारना होगा और मुझसे दूरी बनानी होगी| फिर भाभी जी मुझे समझाते हुए बोलीं की मुझे भी अपने भविष्य के बारे में सोचना चाहिए तथा ग्रहों की स्थिति ठीक होते ही ब्याह कर लेना चाहिए| ज़ाहिर है की संगीता को भाभी जी की बात बहुत चुभी पर फिर भी वो डर के मारे बिना कुछ बोले अपना सर झुका कर उनकी बात सुनती रही|

भाभी जी हमारे (मेरे और संगीता के) प्यार की राज़दार बन गई थीं और उन्होंने हमसे वादा किया था की वो ये राज़ कभी किसी पर ज़ाहिर नहीं करेंगी| भाभी जी दिल की बहुत साफ़ हैं, वो जानती हैं की परिवार को कैसे एक साथ समेट कर रखा जाता है इसीलिए तो भाभी जी का ये वादा आज भी क़ायम है!

जब भाभी जी चली गईं तो संगीता मुझे समझाते हुए कहा की चूँकि नेहा मेरा अपना खून नहीं है ऐसे में मुझे नेहा की बातों को अधिक दिल से नहीं लगाना चाहिए| मेरा बेटा आयुष मेरा अपना खून है, वो अपनी बड़ी बहन नेहा जैसा कतई नहीं है, मुझसे दूर होते हुए भी वो मुझे आज भी उतना ही प्यार करता है जितना पहले करता था|

मेरा मन इस भेद-भाव को नहीं मान रहा था इसलिए मैं भावुक होते हुए बोला; "ऐसा मत कहो...she'll always be my first born! बच्चे जब बड़े होते हैं तो उन्हें personal space चाहिए होता है और जब माँ-बाप इसमें दखलंदाज़ी करते हैं तो बच्चे बगावत कर देते हैं|" नेहा के प्रकरण से मैंने यही सीखा था| मैंने तो संगीता को भी ये सलाह दे डाली की वो आयुष और स्तुति से अधिक उमीदें न बाँधे क्योंकि उन्होंने बड़े हो कर वही करना था जो नेहा ने किया है मगर संगीता एक सख्त माँ थी! भविष्य में यदि ऐसा होता तो संगीता ने मार-मार कर दोनों भाई-बहन को सीधे रास्ते ले आना था!

बहरहाल, दूसरे दिन सब वापस चले गए और इधर मैं खुद को सँभालने की कोशिश में लग गया| माँ के कहने पर दिषु मुझे एक बार फिर साइकिएट्रिस्ट के पास ले गया जहाँ मैंने खुलकर सारी बात बताई| मेरी बात सुन डॉक्टर ने बताया की मैं अभी तक अपने डिप्रेशन से बाहर नहीं आया हूँ| जो थोड़ी बहुत हिम्मत जुटा कर मैं डिप्रेशन से लड़ने की कोशिश कर रहा था वो नेहा के कहे शब्दों के कारण टूट गई थी और मैं फिर से डिप्रेशन के गढ्ढे में गिर चूका था! डॉक्टर ने मुझे थेरेपी लेने को कहा तो मैंने झूठ बोलते हुए कहा की मैं आऊँगा पर मैं कभी थेरेपी लेने गया ही नहीं|

डॉक्टर से मिलकर जब हम बाहर निकले तो दिषु मुझे समझाते हुए बोला की मुझे अब शादी कर लेनी चाहिए| "उससे क्या होगा?" मैंने बात को हँसी में उड़ाते हुए कहा|

"भोस्डिके शादी करेगा तो बीवी आएगी, फिर बच्चे होंगें! मैं चाचा बनूँगा!" दिषु ने थोड़ा मज़ाकिया ढंग से मुझे बात समझानी चाही|

"बच्चे होंगे तो वही करेंगे जो नेहा ने किया?" मैंने एक झूठी मुस्कान के साथ कहा तथा अपनी नजरें फेर लीं| दरअसल नेहा के इस उखड़े बर्ताव के कारण मेरे मन में एक धारणा बन चुकी थी की बच्चे चाहे अपने हो या गोद लिए, उन्होंने बड़े हो कर अपनी आज़ादी के लिए बगावत करनी ही है| ऐसे में जिन बच्चों को हम इतना लाड-प्यार करते हैं, उनके लिए अनेकों कुर्बानियाँ देते हैं....क्या फायदा इतने लाड-प्यार का? इससे तो अच्छा है की केवल अपने माँ-बाप होने का फ़र्ज़ निभाया जाए और उनसे ज़रा सी भी उमीदें न बाँधी जाएँ की वो बड़े हो कर हमारी बातें मानेंगे| मेरी यही सोच मेरी बात से उजागर हो रही थी|

मेरी इस सोच को जानकार दिषु भी वही बोला जो संगीता बोली थी, की चूँकि मेरा नेहा से खून का रिश्ता नहीं इसलिए नेहा ने इतनी बड़ी बात बोली| मैं इस बात को नहीं मानता था इसलिए मैंने दिषु को भी वही समझाया जो मैंने संगीता को समझाया था|

दिषु जानता था की इस समय मेरी मानसिक हालत क्या है इसलिए उसने इस बात को छोड़ मुझे शादी करने के लिए प्रेरित करने लगा| परंतु संगीता से मिले प्यार में धोखे के कारण मेरा प्यार पर से ही विश्वास उठ गया था| "भाई, मेरा तो प्यार-मोहब्बत पर से विश्वास उठ चूका है और ये शादी-ब्याह बस सामाजिक रीति-रिवाज़ हैं जो इंसान को अकेला रहने से बचाने के लिए हैं| शादी-ब्याह के बाद कोई नहीं सुलझा, कोई नहीं सुधरा| पहले संगीता ने मेरा दिल तोडा, फिर नेहा जिसे मैंने अपनी बेटी माना उसने अपने पापा जी का दिल तोडा...अब ऐसे में मेरे पास प्यार बचा ही कहाँ है जो मैं किसी और को दूँ?! जबरदस्ती शादी कर के मैं क्या करूँगा जब मैंने उस लड़की को स्पर्श ही नहीं करना तो?! फिर क्या फायदा होगा इस जबरदस्ती की शादी का? मेरी ज़िन्दगी तो पहले ही बर्बाद हो चुकी है, ऐसे में क्यों मैं शादी कर किसी दूसरी लड़की की ज़िन्दगी बर्बाद करूँ?!" मेरे ऐसे विचार सुन दिषु मुझे तरह-तरह से समझाने लगा मगर मेरा बैरागी मन न माना| शादी से बचने के लिए मैंने दिषु से कह दिया की पहले मैं खुद को सुधारूँगा और जब मैं मेंटली फिट हो जाऊँगा तो मैं शादी करूँगा|

एक व्यक्ति जिसका दिमागी संतुलन हिल चूका हो उसे आप ज्यादा समझा भी नहीं सकते, फिर दिषु के लिए इतना ही बहुत था की मैं अब खुद को सुधारने पर ध्यान देना चाहता था|

घर लौट कर दिषु ने माँ को सारा सच बताया तो मेरी माँ बहुत दुखी हुईं| मैं अपनी माँ को बहुत दुःख दे चूका था इसलिए मैंने इस बार माँ से सच्चा वादा करते हुए कहा की मैं अब इस तरह अपनी ज़िन्दगी और बर्बाद नहीं करूँगा और धीरे-धीरे अपने आपको सुधारूँगा| मेरी बात सुन मेरी माँ ने मेरा मस्तक चूम लिया और मुझे आशीर्वाद देते हुए " विजई हो" कहा|

कई बार जब मैं कोई मुश्किल काम करने जा रहा होता था तो माँ मेरा मनोबल बढ़ाने के लिए ऐसा कहती थीं| मेरा मनोबल बढे न बढे मगर मुझे हँसी अवश्य आती थी क्योंकि ऐसा लगता था की मन काम करने नहीं मैदान-ऐ-जंग में जा रहा हूँ!

अगले दिन से 'मानु सुधारो, मानु आगे बढ़ो' आंदोलन शुरू हुआ| मैंने पीना पूरी तरह से बंद कर दिया, सिगरेट पीनी छोड़ दी, सुबह जल्दी उठना शुरू किया| अपना ठप हो चुके काम को आगे बढ़ाया और ऑनलाइन के बजाए होलसेल का काम शुरू किया| काम बहुत धीमा था परन्तु मैं खुद को व्यस्त रखता था ताकि फिर से बच्चों को याद करने न लगूँ|

काम धीमा था इसलिए दौड़-भाग करने के बाद भी वो परिणाम नहीं मिल रहा था जो चाहिए था इसलिए मैं फिर से हारा हुआ महसूस करने लगा था| तभी एक दिन मेरी मुलाक़ात अपने पुराने ऑफिस में काम कर रहे कुछ सहयोगियों से हुई| उन्होंने बातों ही बातों में बताया की वो ट्रैकिंग करने गए थे| ट्रेकिंग मेरे लिए नई चीज़ थी इसलिए मुझे जोश आ गया और मैंने दिषु से पुछा की क्या वो मेरे साथ ट्रैकिंग पर चलेगा? दिषु कभी ट्रैकिंग पर नहीं गया था इसलिए वो फौरन मान गया| समान पैक कर हम कसोल पहुँचे और ये जान-जोखम में डालकर ट्रेक करने में जो मज़ा आया की क्या कहूँ! वहाँ से वापस आ कर मेरे भीतर एक नई ऊर्जा भर गई थी| दिल्ली लौटते ही मैंने काम सँभाला और मुझ में आये इस नए बदलाव को देख मेरी माँ बहुत खुश हुईं| काम अब भी धीमा ही था परन्तु मुझ में जोश बहुत था| पुरानी सब बातें अब मैं भूलने सा लगा था और अपनी ज़िंदगी को नए ढंग से देख रहा था|

इधर मेरी माँ की उम्र बढ़ रही थी और वो घर पर रह कर ऊब गई थीं इसलिए मैं माँ को यात्रा करवाना चाहता था| जितने भी पैसे मैं इकठ्ठा कर पाया था उन्हें जोड़कर मैं पहले तो माँ को वैष्णो देवी की यात्रा पर ले गया| दिषु भी हमारे साथ आया था तो हमने मिलकर माँ का बहुत ध्यान रखा| इस यात्रा का ज़िक्र मैंने update में पहले किया था परन्तु तब मैंने आपको दिषु के साथ होने का ज़िक्र नहीं किया था|

वैष्णो देवी जी की यात्रा करने के कुछ दिनों बाद मैं और माँ निकले शिरडी के लिए| मेरी माँ को कोई तकलीफ न हो इसके लिए मैं जितनी मुझ में क्षमता होती थी उसके अनुसार सबसे बढ़िया इंतज़ाम करता था| शिरडी में हम 3 दिन रुके थे और इन तीन दिनों में मेरी माँ ने आराम से दर्शन किये| शनिशिंगणापुर की यात्रा मेरे लिए बड़ी यादगार थी क्योंकि वहाँ से लौटते वक़्त ही मुझे एक बड़ा आर्डर मिल गया था|

ये आर्डर पूरा कर मैं और माँ निकले बदरीनाथ धाम की यात्रा पर| ये यात्रा थोड़ी कष्टपूर्ण थी क्योंकि हमें हरिद्वार से डायरेक्ट बस नहीं मिली इसलिए हमें आधा दिन ऋषिकेश में बिताना पड़ा| बस की झटकों भरी यात्रा सह कर हम बद्रीनाथ पहुँचे तो वहाँ रहने का इंतज़ाम नहीं हो पाया था| बड़ी मुश्किल से महँगा कमरा ले कर हम रुके परन्तु भगवान जी के दर्शन बहुत बढ़िया हुए|

अपनी माँ को तीर्थ यात्रा करवाने का अजब ही सुख होता है और इसके आशीर्वाद स्वरूप मेरा जीवन अब सुधरता जा रहा था|

कुछ महीने बीते थे की एक दिन अचानक भाईसाहब संगीता, नेहा, आयुष और स्तुति को ले कर आ गए| मैं तब कुछ काम से बाहर गया हुआ था, जब मैं घर आया तो दरवाजा खोला संगीता ने| संगीता कभी-कभी यूँ अचानक आ जाया करती थी इसलिए मुझे उसे देख कर कुछ ख़ास फर्क नहीं पड़ा| जब मैं बैठक में पहुँचा तो मुझे तीनों बच्चे बैठे हुए दिखे| मुझे देख सबसे पहले आयुष दौड़ा और मेरे पैर छूकर मेरी कमर के इर्द-गिर्द अपनी बाहें लपेटे खिलखिलाने लगा| आयुष के सर पर हाथ रख उसे आशीर्वाद देते हुए मेरी नज़र पड़ी नेहा पर| अपनी दादी जी के सामने नेहा मुझे देख कर झूठ-मूठ का मुस्कुरा रही थी| जब आयुष मुझसे मिल लिया तब नेहा आगे आई और मेरे पॉंव छू कर वापस बैठ गई| साफ़ था की वो ये सब बस दिखावे के लिए कर रही है, दिल से तो हमारा रिश्ता खत्म ही चूका था|

अंत में मैंने देखा स्तुति को जो सोफे पर बैठी मुझे देख मुस्कुरा रही थी और कुछ सोच रही थी| ऐसा लगता था मानो अपने दिमाग पर ज़ोर डाल कर याद कर रही हो की मैं हूँ कौन? संगीता ने जब देखा की स्तुति अब भी सोफे पर बैठी है तो उसने उसे इशारे से मेरे पैर छूने को कहा|

स्तुति के मुझे न पहचानने से मेरा दिल बहुत दुखा था| मेरी बेटी जिसे मैं दिलो-जान से चाहता था, जिसे मैं अपना नाम देना चाहता था वो मुझे इस कदर भूल गई थी की आज अपनी आँखों के सामने देख कर भी मुझे नहीं पहचान रही थी! ये दर्द जब दिलो-दिमाग में ताज़ा हुआ तो मैं नहाने का बहाना कर अपने कमरे में आ गया| कमरे में अकेला था तो मैं रो सकता था, दिमाग में स्तुति को गोदी में ले कर बिताये पल याद आने लगे थे और आँखें उन पलों के याद आने पर ख़ुशी के आँसूँ बहा रही थीं|

मैं उन मनोरम पलों को याद कर खुश हो ही रहा था की तभी पीछे से संगीता ने नेहा को डरा-धमका कर मुझसे माफ़ी माँगने भेज दिया| अब न तो नेहा को मुझसे माफ़ी माँगने में कोई दिलचस्पी थी और न ही मैं नेहा को माफ़ कर सकता था इसलिए हम दोनों ने अपना-अपना फ़र्ज़ निभाया यानी नेहा ने मौखिक रूप से माफ़ी माँगी और मैंने "its okay" कह नेहा की माफ़ी को दरगुज़र किया तथा हम दोनों अपने-अपने रास्ते चल दिए|

नेहा का ये दिखावा खत्म हो गया था इसलिए वो शाम को अपने बड़े मामा जी के साथ अम्बाला लौट गई| घर पर रह गए मैं, माँ, संगीता, स्तुति और आयुष| दोनों के स्कूल की छुट्टियाँ थीं इसलिए भाईसाहब बड़के दादा से ये झूठ बोल कर दोनों को अपने साथ लाये थे की वो बच्चों को अपने पास रखेंगे| जबकि असल में ये सब प्लानिंग थी संगीता की, उसके मन में कुछ अलग ही पक जो रहा था!

आयुष के पास बात करने के लिए बहुत कुछ था इसलिए आयुष कूदते हुए मुझे सब बता रहा था| वहीं स्तुति मुझसे शर्मा रही थी इसलिए वो पूरे घर में घुम रही थी| जब आयुष मुझसे बात कर थक गया तो उसने कागज की एक बॉल बनाई और हम दोनों ने कमरे के अंदर ही क्रिकेट खेलना शुरू कर दिया| हमारा शोर सुन स्तुति कमरे में आई तो आयुष ने उसे भी हमारे खेल मिला लिया| खेलते-खेलते आयुष अपनी छोटी बहन को उसके बचपन की याद दिलाने लगा| जब स्तुति छोटी थी तब हम बाप-बेटे क्रिकेट खेलते थे और स्तुति बॉल पकड़ कर लाने का काम करती थी| पता नहीं स्तुति को कुछ याद आया या नहीं पर स्तुति ने खिलखिलाना शुरू कर दिया था|

खाना खा कर सोने का समय हुआ तो आयुष मेरे कमरे में दौड़ा आया और पलंग पर चढ़ अपनी जगह घेर ली| वहीं स्तुति को अपनी दादी जी से ज्यादा ही प्यार मिल रहा था इसलिए वो अपनी मम्मी के साथ माँ के कमरे में सो गई|

अगले दिन की बात है मैं कंप्यूटर पर अपना कुछ काम कर रहा था| माँ आयुष को ले कर दूकान तक गई हुईं थीं तथा संगीता रसोई में खाना बनाने में लगी हुई थीं| तभी स्तुति मुस्कुराते हुए कमरे में आई और मेरी तरफ बड़े प्यार से देखते हुए बोली; "पपई!!!" जब से स्तुति आई थी तब से वो मुझसे इतना शर्माती थी की बस मुझे मुस्कुरा कर देखती रहती थी| लेकिन 24 घंटे इस घर में रहने से स्तुति के मन में उसके बचपन की यादें जैसे ताज़ा हो गई थीं, उसे उसके प्यारे पापा जी यानी पपई याद आ गए थे!

जैसे ही स्तुति ने मुझे पपई कहा तो मेरा दिल पिघल गया और मैंने एकदम से स्तुति को गोदी ले कर अपनी बाहों में जकड़ लिया! वहीं मेरे सीने से लग कर मेरी बिटिया का मन भावुक हो गया था| "I missed you so much मेरा बच्चा!" मैं रुनवासा हो कर बोला तो स्तुति ने मेरे दोनों गालों पर पप्पी कर मुझे रोने नहीं दिया|

उस दिन से स्तुति ने मुझे जितना प्यार दिया उसका सारा ज़िक्र मैंने अंतिम तीन updates में किया था| मेरी छोटी सी बिटिया ने अपने पपई के सूखे पड़े दिल में प्यार की कली खिला दी थी| लेकिन नेहा के कारण जो मैंने सबक सीखा था उसे याद रखते हुए मैं इसबार सतर्क था इसलिए मैं स्तुति के प्यार में इतना नहीं पिघला की फिर से मेरे मन में उसे गोद लेने का विचार पैदा हो|

स्तुति को पा कर मेरा मन प्रसन्न था और इसका फायदा संगीता उठाना चाहती थी इसलिए शाम के समय जब मैं अकेला कुछ काम कर रहा था तब वो मेरे कमरे में आई और बड़े प्यार से इठला कर मुझसे बोली; "जानू...मुझे न आपसे कुछ बात करनी थी|" मेरा मन संगीता से बात करने का नहीं था इसलिए मैंने उसे कोई तवज्जो नहीं दी और कंप्यूटर पर अपना काम करता रहा| अब संगीता को तो अपनी बात कहनी ही थी इसलिए वो शर्माते हुए बोली; "Will you marry me?" संगीता के मुख से निकले इन शब्दों को सुन मुझे बहुत गुस्सा आया और मैंने गुस्से से उसकी तरफ देखा| मुझे यूँ गुस्से में देख संगीता की हवा टाइट हो गई इसलिए वो एकदम से संजीदा हो गई और अपनी बात को विस्तार से समझाते हुए बोली; "तीन साल पहले मैंने आपका प्यार ठुकरा कर बहुत बड़ी गलती की थी! लेकिन अब मैं अपनी ये गलती सुधारना चाहती हूँ! प्लीज मुझसे शादी कर लो!" संगीता हाथ जोड़ते हुए बोली|

"एक बात की दात देता हूँ, तुम्हारे अंदर हिम्मत बहुत है जो तुम मेरा शादी का प्रस्ताव बार-बार ठुकरा कर भी मुझसे शादी की बात कर रही हो|

सच ये है की I don't trust you! As a matter of fact, I will never trust you again! तुमने जो मुझे धोखा दिया, मेरा दिल तोडा उसके बाद तो मुझे प्यार शब्द से ही नफरत हो चुकी है| अब जब तुम्हारे लिए मेरे दिल में कोई जज्बात ही नहीं तो शादी का सवाल ही पैदा नहीं होता|

तुम इतनी गनीमत समझो की अपनी दोनों माओं की कसम की लाज रखते हुए तुम्हें अपनी आँखों के सामने बर्दाश्त कर लेता हूँ, उनकी ख़ुशी के लिए तुमसे थोड़ी बहुत बात कर लेता हूँ|" मैंने संगीता को ताना मारा और उठ कर जाने लगा तो संगीता ने मेरी कलाई थाम ली| मैं जानता था की वो फिर रोना-धोना शुरू करेगी इसलिए मैं अपना हाथ झटकते हुए उसके हाथों की पकड़ से अपनी कलाई छुड़ाई और बाहर आ गया| मैं जनता हु की मेरी बातों से संगीता का दिल बहुत दुख होगा लेकिन मुझे अब इसकी कोई परवाह नहीं थी|

आयुष और स्तुति की 1 हफ्ते की छुट्टी थी लेकिन दोनों दस दिन रह कर भी गॉंव वापस नहीं जाना चाहते थे| ग्यारहवे दिन भाईसाहब सबको ले जाने आये तो स्तुति मेरी गोदी में बैठ बोली; "पपई, मुझे नहीं जाना! मुझे आपके पास रहना है!" स्तुति भावुक होते हुए बोली| अपनी बेटी का भावुक देख मैं भी पिघलने लगा था मगर मैंने खुद को सँभाला और स्तुति को उसकी पढ़ाई की अहमियत के बारे में समझाया तथा उसे खुश करने के लिए भाईसाहब से कह दिया की जैसे ही स्तुति के स्कूल की छुट्टियों हों वो उसे फिर से यहाँ छोड़ जाएँ|

स्तुति ने मेरी बात तो मान ली मगर मुझसे वचन भी लिया की मैं रोज़ उसे उसकी मम्मी के फ़ोन पर कॉल करूँगा और फ़ोन पर कहानी सुनाऊँगा| अपनी पोती की बात सुन माँ एकदम से बोलीं; "तू चिंता मत कर बेटा, मैं और तेरे पपई दोनों तुझसे फ़ोन पर बात करेंगे|" अपनी दादी जी का आश्वसन पा कर स्तुति अपनी दादी जी के गले लग गई और ख़ुशी-ख़ुशी अपने बड़े मामा जी के साथ वापस जाने को तैयार हो गई|

इधर संगीता को मुझसे बात करनी थी मगर मैं जानबूझ कर उससे दूरी बनाये हुए था इसलिए संगीता ने माँ का सहारा लिया और उनसे मेरी शिकायत कर दी की मैं उससे बात नहीं कर रहा| संगीता की शिकायत सुन माँ ने मुझे प्यारभरी डाँट लगाई और एक अच्छे दोस्त की तरह मुझे संगीता से हाथ मिलाने को कहा| माँ का हुक्म था इसलिए मैंने बेमन से संगीता से हाथ मिलाया मगर संगीता ने मेरा हाथ कस कर पकड़ लिया और बेशर्म बनते हुए माँ के सामने बोली; "हाथ तब छोडूंगी जब आप वादा करोगे की मुझे ताने नहीं मारोगे, मुझसे नाराज़ नहीं रहोगे और प्यार से बात करोगे|" संगीता की इस बेशर्मी को देख मैं हैरान था| अब माँ को ये देवर-भाभी का प्यार लग रहा था इसलिए उन्होंने भी संगीता का साथ दिया और मुझे प्यार से डाँटने लगीं| इतने में आयुष और स्तुति भी अपनी मम्मी की तरफ हो गए और मेरा तथा अपनी मम्मी के हाथ पकड़ कर मुझे वादा करने के लिए कहने लगे| अपनी माँ और बच्चों के आगे मैं मजबूर था इसलिए मैंने वादा कर दिया|

वादा किया था तो निभाना भी था इसलिए वो वादा आज भी निभा रहा हूँ|

उधर अम्बाला में नेहा अपनी मनमानी कर रही थी, अपनी बड़ी मामी जी को बुद्धू बना कर...झूठ बोल कर नेहा अपने दोस्तों के साथ घूमने निकल जाती थी| पढ़ाई पर से उसका ध्यान पूरी तरह हट चूका था नतीजन बोर्ड की परीक्षा में नेहा फ़ैल हो गई!

ये खबर जैसे ही गॉंव पहुँची तो सबसे पहले तो संगीता ने अम्बाला पहुँच कर नेहा को अच्छे से कूटा! वहीं बड़के दादा ने नेहा की पढ़ाई छुड़वाने का फैसला किया| नेहा जानती थी की अगर उसकी पढ़ाई छूटी तो उसकी होगी शादी और फिर ये सारी आज़ादी खत्म इसलिए नेहा अपने बड़े मामा जी के आगे गिड़गिड़ाने लगी की उसे एक मौका और दिया जाए| भाईसाहब अपनी भाँजी को यूँ रोता हुआ कैसे देखते, अतः उन्होंने नेहा को एक अंतिम मौका दे दिया|

वहीं दूसरी तरफ नेहा के फ़ैल होने की खबर सुन कर मुझे कुछ महसूस ही नहीं हुआ| मैंने अपने ऊपर गौर किया तो पाया की मेरे भीतर भावनाएं मर चुकी हैं| जबकि असल बात ये थी की मुझे नेहा और संगीता ने बहुत दुःख दिया था इसलिए मेरा मन उनके प्रति इस कदर फट चूका था की मुझे उनकी बातों से अब कुछ महसूस ही नहीं होता था|

हाँ, माँ नेहा के फ़ैल होने की बात से परेशान अवश्य थीं मगर उन्होंने नेहा को डाँटने के बजाए उसे अगले साल फिर से मेहनत करने को कहा| माँ असल बात नहीं जानती थीं वरना वो जर्रूर नेहा को डाँटती|

खैर, मैं रोज़ स्तुति से बात करने के लिए गॉंव फ़ोन करता था इसलिए धीरे-धीरे मेरे और संगीता के बीच एक दोस्ती का रिश्ता फिर से स्थापित हो गया| संगीता का कभी-कभार मेरे घर आना-जाना रहता था इसलिए संगीता हमेशा इस दोस्ती के रिश्ते को लाँघने की कोशिश करती रहती थी मगर मैं हमेशा उससे उपयुक्त दूरी बनाये रहता था| शायद संगीता को लग रहा था की वो दोस्ती के रिश्ते को कम करते-करते फिर से मेरे नज़दीक आ जाएगी, लकिन मैं उससे दूर ही रहता था| हमारी जो भी बातें होती थीं वो सब माँ के सामने होती थीं, अकेले में तो मैं उसे कभी दिखता ही नहीं था|

मेरे जीवन में ये सब घटित हो रहा था की तभी दुनिया में महामारी फैल गई और एकदम से लॉकडाउन लगा दिया गया| दिल्ली स्वस्थ विभाग से कुछ लोग घर आये और मुझे बताया की मैं अपनी माँ का अधिक ख्याल रखूँ क्योंकि ये बिमारी बुजुर्गों के लिए...ख़ास कर उनके लिए जिन्हें शुगर तथा BP की बिमारी है उनके लिए खतरनाक है| मैं अपनी माँ के स्वास्थ्य को ले कर बहुत डर गया था इसलिए मैं कभी-कभी सिर्फ सामान लेने ही निकलता था|

वहाँ गाँव में अचानक स्तुति बीमार पड़ गई थी, जिससे संगीता की हालत खराब हो गई थी| गॉंव में कोई कोरोना को नहीं मानता था, हर कोई बिना मास्क के घूमता था| वहीं जब माँ संगीता को दिल्ली के हालातों के बारे में बताती तो संगीता घबरा जाती थी| जब स्तुति बीमार हुई तो संगीता को डर लगने लगा की कहीं स्तुति को कोरोना तो नहीं हो गया?! संगीता अपनी बेटी का इलाज करवाने शहर ले जाना चाहती थी मगर घर में कोई उसकी मदद करने वाला नहीं था| संगीता ने फौरन अनिल को, जो उन दिनों गॉंव आया हुआ था उसे बुलाया| स्तुति को ले कर अनिल शहर गया मगर वहाँ अस्पताल में कोई बेड खाली न होने के कारण डॉक्टरों ने स्तुति को बिना देखे दवाई लिख कर वापस ले जाने को कहा| उन दिनों बिमारी के कारण दवाइयों की किल्ल्त हो गई थी इसलिए आधी दवाइयाँ अनिल को मिली ही नहीं|

स्तुति के बीमार होने की खबर मुझे सबसे अंत में मिली और मुझे संगीता पर बहुत गुस्सा आया| अनिल से दवाई की पर्ची व्हाट्स अप्प (what's app) पर ले कर मैंने सारी दवाइयाँ खरीदी और गॉंव जाने की तैयारी करने लगा| मेरे गॉंव जाने के नाम से माँ डर गई थीं पर फिर भी उन्होंने मुझे नहीं रोका क्योंकि यहाँ बात थी स्तुति की जिंदगी की|

दिल्ली से लखनऊ की फ्लाइट पकड़ कर मैं स्तुति के लिए दवाई ले कर पहुँचा| इतने सालों बाद मुझे देख सभी हैरान थे| वहीं मेरे पिताजी की ख़ुशी का ठिकाना नहीं था इसलिए उन्होंने कस कर मुझे अपने गले लगा लिया| मुझे यूँ अचानक देख बस बड़की अम्मा, पिताजी, संगीता और आयुष ही खुश थे| उनके अलावा किसी को मेरे आने की कोई ख़ास ख़ुशी नहीं हुई थी|

मैं फटाफट नहाया, और दवाई ले कर स्तुति के पास दौड़ता हुआ पहुँचा| स्तुति उस समय सोइ हुई थी, इसलिए मैं उसके सिरहाने जा कर बैठ गया| जब मैंने स्तुति के मस्तक को छुआ तो मुझे पता लगा की स्तुति को बहुत बुखार है! वहीं मेरे स्पर्श को महसूस कर स्तुति अपनी नींद में मेरा नाम बड़बड़ाने लगी; "प..प..ई!" मुझे ये देख कर हैरानी हुई की स्तुति इतनी बड़ी हो गई मगर वो ज़रा भी नहीं बदली! जब स्तुति छोटी थी और मैं साइट से घर लौटता था तो नींद में ही मेरा स्पर्श महसूस करते ही स्तुति मुझसे लिपट जाती थी, उसी तरह स्तुति इतना बुखार में होते हुए भी मेरा स्पर्श पहचान रही है|

खैर मैंने स्तुति को गोदी में लिया और उसे लाड कर जगाया| जैसे ही स्तुति जागी और मुझे देखा वैसे ही स्तुति का चेहरा ख़ुशी से खिल गया! बुखार होते हुए भी मेरी बिटिया मुझे देख कर इतना खुश हो रही थी की स्तुति सीधा मेरे सीने से लिपट गई और बोली; "पपई.I.love..you!"

"I love you too मेरा बच्चा! अब मैं आ गया हूँ न तो अब मेरा बच्चा जल्दी से ठीक हो जायेगा|" मैंने स्तुति के सर को चूमते हुए कहा|

मैंने स्तुति के लिए लाई हुई दवाई संगीता को दी और कौन सी दवाई कब देनी है वो बताया| मैं अपने साथ कुछ और दवाइयाँ भी लाया था ताकि दुबारा घर में किसी को दवाई की किल्ल्त न हो| मैं गॉंव बस एक दिन रहा और वो पूरा दिन मैं स्तुति के पास था| अगले दिन मुझे दिल्ली वापस निकलना था क्योंकि माँ घर पर अकेली थीं, पर मेरी बिटिया मुझे जाने नहीं दे रही थी|

स्तुति मेरे सीने से लिपट गई और ज़िद्द करते हुए बोली; "हम न जाने देब!" मैंने स्तुति को समझाया की वहाँ घर पर उसकी दादी जी अकेली हैं तो स्तुति एक पल को शांत हुई और कुछ सोचते हुए बोली; "हमहुँ जाब!" स्तुति का बालपन देख एक पिता का दिल पिघलने लगा था| लेकिन मैं स्तुति को साथ ले जा सकता ही नहीं था इसलिए मैं स्तुति को समझाने लगा की चूँकि वो बीमार है ऐसे में उसका यूँ कष्ट भरी यात्रा करना ठीक नहीं| थोड़ी न-नुकुर के बाद स्तुति मान गई लेकिन जब तक मेरी गाडी नहीं आई तब तक वो मेरी गोदी में ही रही|

दिल्ली वापस आने के लिए मैंने अपने एक जानकार जो की धर्म से मुसलमान थे, उनकी गाडी से आना था| अब एक तो मैं चमड़े के जूतों का व्यपार कर रहा था, ऊपर से एक मुसलमान से मेरी दोस्ती थी ये बात बड़के दादा को खटक रही थी इसीलिए उन्होंने मुझसे ज्यादा बात नहीं की| वहीं बड़की अम्मा और मेरे पिताजी बड़ा गर्व महसूस कर रहे थे की मेरे दिल्ली जाने के लिए एक गाडी आ रही है!

जब गाडी आई तो मैं स्तुति को प्यारी कर निकलने लगा| तभी आयुष दौड़ता हुआ आया और मेरे पैर छू मेरा आशीर्वाद लिया| फिर मैंने घर के सभी बड़ों से विदा ली और दिल्ली वापस आ गया|

लॉकडाउन एक सजा कहानी जो मैंने कांटेस्ट के लिए लिखी थी वो दिल्ली आते हुए जो हालात मैंने देखे उन्हें सोचते हुए ही लिखी थी| आप में से जिन लोगों ने उस कहानी को पढ़ा उन्होंने एक पिता का अपनी बेटी के लिए प्यार और तड़प देखि तथा महसूस की|

धीरे-धीरे देश के हालात ठीक होने लगे और लॉकडाउन हट गया तथा स्तुति मेरे पास रुकने के लिए बेरोक-टोक आने लगी| आयुष भी कभी-कभी आता था और तब हम तीनों मिलकर नॉन-वेज खाया करते थे| अब गॉंव में तो बेचारा बड़के दादा के डर के मारे आयुष कुछ खा नहीं पता था इसलिए वो ये सब तभी खता था जब वो दिल्ली आता था| स्तुति को भी इन चीजों का शौक नहीं था मगर मेरे कारण धीरे-धीरे स्तुति को ये शौक लग ही गया|

[color=rgb(51,]नेहा के साथ हुआ हादसा[/color]
समय बीत रहा था और मेरा मानसिक संतुलन अब पहले से बेहतर हो चूका था| मेरा मन पीने का करता था इसलिए कभी-कभी मैं घर पर ही पी लेता था मगर कभी इतनी नहीं पी की मैं नशे में धुत्त हो जाऊँ| लॉकडाउन लगने से पहले मेरा काम थोड़ी बहुत रफ्तार पकड़ रहा था मगर जैसे ही लॉकडाउन लगा मेरा सारा काम ही ठप्प हो गया!

कुछ दिन बीते थे की एक रात 9 बजे भाभी जी का फ़ोन आया| उन्होंने मुझे बताया की नेहा अपने किसी दोस्त के घर स्कूल का प्रोजेक्ट बनाने गई थी मगर वापस आ कर वो बस रोये जा रही है| पता नहीं क्यों पर ये बात सुनकर मैं बहुत डर गया| नेहा से मेरा सारा लगाव खत्म हो चूका था मगर फिर भी उसकी इस हालत के बारे में जानकार नजाने क्यों मुझे गुस्सा आ रहा था!

भाभी जी ने बताया की उन्होंने भाईसाहब को भी फ़ोन किया मगर वो और नेहा की नानी जी किसी शादी में गए थे जहाँ भाईसाहब का फ़ोन मिल नहीं रहा था|

भाभी जी जिस कदर घबराई हुई थीं उससे साफ़ था की जर्रूर नेहा के साथ कुछ गलत हुआ है इसलिए मैंने भाभी जी को समझाया की वो नेहा पर दबाव न डालें तथा जब तक मैं वहाँ न पहुँचू तब तक वो नेहा के साथ ही रहे, उसे एक पल के लिए भी अकेला न छोड़ें ताकि नेहा कहीं कोई गलत कदम न उठा ले|

मेरा मन मुझे डराए जा रहा था की जर्रूर नेहा की इज्जत पर बात बन आई है इसलिए मेरा खून खौलने लगा था| अपने गुस्से में बहते हुए मुझे होश नहीं रहा और मैंने रिवॉल्वर अपने साथ ले ली| माँ को अगर कहता की मैं अम्बाला जा रहा हूँ तो माँ अनेकों सवाल करती इसलिए मैंने दिषु के नाम का झूठ बोला की मैं दिषु के साथ अपने एक दोस्त की देखभाल करने अस्पताल जा रहा हूँ|

साथ में रिवॉल्वर थी तो मुझे ज़रा भी डर नहीं था, ये भी डर नहीं की अगर चेकिंग हुई और मेरे पास रिवॉल्वर निकली तो मैं कितनी बड़ी मुसीबत में फसूँगा! मैं उस वक़्त ऐसे घोड़े पर सवार था की मैं बिना डरे अम्बाला वाली बस में चढ़ गया|

अगली सुबह 5 बजे तड़के मैं अम्बाला उतरा और भाभी जी के घर की तरफ चल दिया| उधर भाभी जी ने कल रात अनिल को फ़ोन कर सारा माजरा बताया था इसलिए वो भी घर पहुँचने वाला था| इधर जैसे ही मैं भाभी जी के घर के बाहर पहुँचा मैंने उन्हें फ़ोन किया| विराट नेहा की दोस्त का घर जानता था इसलिए मैंने भाभी जी से कहा की वो उसे मेरे साथ भेज दें ताकि हम सारी तहकीकात कर सकें की आखिर कल रात हुआ क्या है?

जब तक विराट बाहर आता, इतने में अनिल पीछे से आ गया| फिर हम तीनों सारी ताहिकात करने नेहा के तीन दोस्तों के घर पहुँचे और वहाँ से हमें पिंकी के घर का पता चला| पिंकी के घर पहुँच मैंने विराट को घर वापस भेज दिया| वहाँ जो सच पता चला वो आप सबने पढ़ ही लिया था| सारा सच जानकार मेरा खून उबाले मार रहा था इसलिए मैं पहुँचे उस लड़के के घर और वहाँ जो हुआ वो भी आप सभी ने पढ़ लिया था|

मिश्रा अंकल जी को उस आदमी के पीछे लगा कर मैं और अनिल भाभी जी के घर के बाहर पहुँचे| अनिल मुझे अंदर आने को कह रहा था मगर मेरा मन इस घर में जाने का कतई नहीं था इसलिए मैंने कुछ खाने-पीने को खरीदने का बहाना किया और सीधा बस स्टैंड से बस पकड़ दिल्ली के लिए निकला|

बस अभी डिपो से निकली थी की पीछे से भाभी जी का फ़ोन आया और उन्होंने मेरे घर न आने को ले कर सवाल किया| मैंने उनसे झूठ कहा की चूँकि मैं माँ से झूठ बोल कर आया हूँ इसीलिए मैं नहीं रुका और इस समय मैं बस में बैठ हूँ|

उधर ये खबर गॉंव में संगीता तक पहुँच गई थी और वो भाईसाहब के साथ दोपहर तक अम्बाला पहुँच गई थी| मैंने कैसे उस लड़के को सबक सिखाया इसका सारा प्रसारण अनिल ने सबके सामने कर दिया था इसलिए मुझे एक के बाद एक भाईसहाब, संगीता और भाभी जी के फ़ोन आने लगे| मैंने उन्हें यही समझआया की वो नेहा के साथ थोड़ा सब्र से काम लें, उस पर कोई दबाव न डालें और जर्रूरत पड़े तो किसी कौंसलर (counsellor) से नेहा को मिलवाएं| सब ने मेरी बात मानी और मुझे अम्बाला बुलाने लगे मगर मैंने काम का बहाना बना कर मना कर दिया|

खैर, मैं दिल्ली आ गया था और उधर धीरे-धीरे नेहा को सच पता चलता गया| सच जानकार नेहा को बहुत पछतावा हुआ और वो मुझसे बात करने के लिए फ़ोन करने लगी मगर मैं नेहा की आवाज़ सुनकर ही फ़ोन काट दिया करता था| फिर नेहा ने अपनी दादी जी को फ़ोन किया तथा मुझसे बात करवाने को कहा लेकिन उस समय भी मैं आवाज़ साफ़ न आने का बहाना कर फ़ोन काट दिया करता था|

हारकर नेहा अपने बड़े मामा जी, स्तुति और अपनी मम्मी के साथ घर आ धमकी तथा मुझसे लिपट कर रोने लगी| माँ को कुछ मझ नहीं आ रहा था इसलिए संगीता ने बात सँभालते हुए झूठ बोला की नेहा को फिर से बुरे सपने आने लगे हैं इसी कारण वो बहुत घबराई हुई थी|
खैर, सबके सामने नेहा मुझसे माफ़ी मांग नहीं सकती थी इसलिए नेहा सही मौके का इंतज़ार करने लगी| शाम के समय मौका पा कर नेहा ने मुझसे माफ़ी माँगी मगर मैंने उसे रहीम जी का दोहा सुनाते हुए:

"[color=rgb(255,]रहिमन धागा प्रेम का, मत तोरो चटकाय|[/color]
[color=rgb(255,]टूटे पे फिर ना जुरे, जुरे गाँठ परी जाय||[/color]"
समझाया की अब ये मुमकिन नहीं| इस बातचीत को आप पहले ही पढ़ चुके हैं|

नेहा का दिल बहुत दुखा और वो खुद को सँभाल न पाई! मुझे खोने के सदमे ने नेहा को इस कदर कमज़ोर कर दिया की मेरी ही तरह नेहा का भी मानसिक संतुलन हिल गया| नेहा को सँभालने के लिए आयुष, संगीता और स्तुति अम्बाला पहुँचे मगर कोई नेहा को सँभाल न पाया| उसी बीच मुझे दिषु के साथ ऑडिट पर जाना पड़ा| मेरे ऑडिट पर जाने से मैं स्तुति से बात न कर पाया जिसका मेरी बिटिया को बहुत बुरा लगा! वो तो जब आयुष और नेहा ने मिलकर उसे समझाया तब जा कर मेरी बिटिया समझी!

जब मैं वापस आया तो सब लोग मेरे घर पर मौजूद थे| उस दिन मुझे मेरी ज़िंदगी का एक नायाब तोहफा मेरी लाड़ली बिटिया स्तुति ने दिया| स्तुति ने आज पहली बार मुझे "पपई" की जगह "पापा जी" कह कर बुलाया| स्तुति ने बिना किसी के कुछ कहे मुझे अपना पापा मान लिया था| मैंने स्तुति को समझाया की वो किसी के सामने मुझे पापा जी कह कर न बुलाये, स्तुति समझदार थी इसलिए उसने इस बात को हम बाप-बेटी का एक 'सीक्रेट' मान लिया और तब से ले कर आजतक स्तुति मुझे अकेले में "पापा जी" ही कह कर बुलाती है|

स्तुति तो समझदार थी मगर नेहा सबसे बड़ी हो कर भी नासमझ थी| मैंने एक दिन नेहा से सबके सामने खुल कर बात की तो उसने अपने घबराने की दो वजह बताईं: पहली थी मुझे खो देना और दूसरी थी आदमियों से भय! नेहा के डर की दूसरी वजह का इलाज मैंने नेहा को समझा कर किया तथा भाभी जी ने नेहा को दुनिया में सर उठा कर कैसे चलना है ये सीखा कर किया| पहली वजह जानकार सभी ने मुझ पर दबाव बनाया की मैं नेहा को माफ़ कर दूँ और उसे पहले की तरह अपना लूँ मगर मेरा मन अब खाली था, उसमें किसी के लिए प्यार बचा ही नहीं था!

नेहा की ख़ुशी के लिए मैंने उसे माफ़ तो कर दिया लेकिन उसे बेटी का दर्ज़ा न दे पाया| नेहा के लिए मेरी माफ़ी आधी ख़ुशी थी इसलिए नेहा इससे खुश हो गई| रही बात मेरे नेहा को अपनी बेटी की तरह अपनाने की तो नेहा ने हार न मानते हुए इसका एक हल निकाला; "पापा जी, मैं समझ सकती हूँ की आपका दिल मेरे और मम्मी के कारण बहुत दुखा है...और आप इतनी आसानी से हमें नहीं अपना सकते! कोई बात नहीं...दादी जी (मेरी माँ) ने सिखाया है की हार नहीं मानते...हमेशा कोशिश करते हैं इसलिए आप मुझसे बात तो करोगे न? मैं आपसे मिलने तो आ सकती हूँ न? जैसे आप पहले मुझे घुमाने ले जाते थे, मुझे रोज़ रात को कहानी सुनाते थे...वो सुख तो मैं पा ही सकती हूँ न?! क्या पता धीरे-धीरे आपके मन में मेरे लिए फिर बेटी वाला प्यार पैदा हो जाए?" इस वक़्त अगर मैं न कहता तो नेहा का दिल टूट जाता और फिर शायद उसका वही हाल होता जो मेरा हुआ था इसलिए मैंने झूठे मुँह हाँ कह दी| मेरी हाँ सुन नेहा बहुत खुश हुई और वो आजतक मेरे दिल में एक बेटी के लिए प्यार जगाने में लगी हुई है|


[color=rgb(255,]समाप्त![/color]
 
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