[color=rgb(255,]तीसवाँ अध्याय: नियति का खेल[/color]
[color=rgb(235,]भाग - 8[/color]
[color=rgb(128,]अब तक आपने पढ़ा:[/color]
मैं: अच्छा अब आप मेरे साले साहब के कान छोड़ भी दो, देखो बेचारा कितना डर गया है?!
मैंने संगीता को मस्का लगाने के लिए इस तरह प्यार से बात की थी| संगीता ने मेरी बात सुन कर अनिल का कान छोड़ दिया| तभी चरण काका गाँव के मुखिया जी की गाडी में आ गए;
भाईसाहब: अम्मा, देखो मुखिया जी और चरण काका आई गए, तू दुनो जन उनका साथे घर निकर जाओ|
भाईसाहब ने सासु माँ को प्यार से समझाते हुए कहा तथा उन्हें मुखिया जी की गाडी में बिठा आये| सासु माँ, संगीता और चरण काका की गाडी घर जाने के लिए पहले निकली, उनके पीछे-पीछे हमारी गाडी हरिद्वार के लिए निकली|
[color=rgb(51,]अब आगे:[/color]
मुझे लम्बी यात्रा करने का शौक नहीं है, मैं चाहता हूँ की यात्रा आरामदायक व् छोटी हो| अस्पताल से हरिद्वार की दूरी यही कोई 13 घंटे की थी और ये बात मुझे अब जा कर पता चली थी! इतनी बड़ी यात्रा वो भी बैठे-बैठे तथा शारीरिक कष्ट को चुप-चाप सहते हुए करना ही मेरे लिए एक चुनौती थी| खैर, रात के नौ बजे मैंने driver साहब से कह कर गाडी रुकवाई ताकि सब लोग खाना खा सकें, ठीक तभी संगीता का फ़ोन आया| मेरे पास संगीता का फ़ोन था और उसके पास मेरा फ़ोन था इसीलिए हमारी बात हो पा रही थी;
मैं: घर पहुँच गए?
संगीता: हाँ जी अभी पहुँची| आप कैसे हो? दर्द तो नहीं हो रहा कँधे में? आपने कुछ खाया? दवाई ली थी?
संगीता ने एक-एक कर अपने सारे सवाल पूछ डाले| सही भी था, उस बेचारी को मेरे स्वास्थ्य की चिंता थी|
मैं: जान, मैं ठीक हूँ| अभी मैंने गाडी रुकवाई है ताकि सब कुछ खाना खा लें| तुम अब घर पहुँच गई हो तो जा कर खाना खाओ और माँ (मेरी सासु माँ) को भी खाना खिलाओ वरना मैं आपसे बात नहीं करूँगा|
मैंने संगीता से अपनी तबियत के बारे में झूठ बोला था| दरअसल इस एक-डेढ़ घंटे की यात्रा में ही मुझ पर थकावट जोर मारने लगी थी, ऊपर से मेरे बाएँ कँधे का दर्द भी बढ़ गया था|
संगीता: आप न मुझे कुछ ज्यादा ही blackmail कर रहे हो, वापस आओ फिर बताती हूँ मैं!
संगीता की नाक पर बैठा वो प्यारा सा गुस्सा बोल उठा और मैं अपनी पत्नी के इस प्यारभरे गुस्से पर मुस्कुराने लगा| पति-पत्नी के बीच ये प्यारी सी कहा-सुनी का रस अलग हो होता है|
बहरहाल, संगीता मेरी बात मान कर खाना खाने चली गई थी और इधर मैं taxi में अकेला बैठा अपने पाँव पसार कर लेट गया था| अनिल, भाईसाहब और driver साहब खाना खाने बैठ गए थे तथा मेरे बहुत मना करने पर मुझे भी अपने साथ खाना खाने के लिए बुला लिया था| भाईसाहब का मान रखते हुए मैंने अपने लिए आधी प्लेट दाल-चावल मँगाए क्योंकि मैं अस्पताल से ही खाना खा कर निकला था|
उधर संगीता के मायके में आज हुए हत्याकांड से जो कोहराम मचा था उसके बारे में मुझे कोई जानकारी नहीं थी| जब तक संगीता और सासु माँ घर पहुँचे तब तक संगीता की दोनों बहनों के ससुराल वाले अपने-अपने घर लौट चुके थे| शगुन और जानकी के ससुराल वाले निहायती लालची थे तथा ससुर जी की मृत्यु का फायदा उठाने के चक्कर में थे|
वहीं मेरी बात मानते हुए संगीता और सासु माँ ने खाना खा लिया था, सासु माँ चूँकि बहुत थक गई थीं इसलिए वो तुरंत ही सोने चली गईं| वहीं संगीता को मेरी चिंता थी इसलिए वो मुझे पुनः फ़ोन करने लगी लेकिन मेरा फ़ोन व्यस्त था क्योंकि मैं इस वक़्त अपने दोनों बच्चों से बात करने में व्यस्त था| मेरे खाना खाते हुए ही बच्चों का फ़ोन आ गया, पिताजी सब को ले कर railway station पहुँच चुके थे जबकि train आने में अभी एक घंटा बाकी था| बच्चों को मेरे बिना चैन नहीं मिल रहा था इसलिए दोनों बच्चे मुझसे फ़ोन पर बात करने लग पड़े| नेहा को मेरी तबियत की चिंता थी इसलिए उसके सभी सवाल मेरे स्वास्थ्य से जुड़े थे| जबकि आयुष का ध्यान मेरे खाने-पीने पर था इसलिए वो मुझसे पूछ रहा था की मैंने क्या-क्या खाया?!
मैं: बेटा, यहाँ अस्पताल में pizza-chowmein खाने को नहीं मिलती! यहाँ तो सादा घर जैसा खाना दिया जाता है|
मेरी बात सुन आयुष अपने उत्साह में बोला;
आयुष: पापा जी, मैं आपके लिए है न सुबह-सुबह चाऊमीन ले कर आऊँगा! आप और मैं वही नाश्ता करेंगे!
मेरा फ़ोन स्पीकर पर था इसलिए पास बैठे भाईसाहब और अनिल, आयुष की बचकानी बात सुन मुस्कुराने लगे| तभी नेहा ने आयुष की पीठ पर थपकी मारी और उसे डाँट लगाई;
नेहा: चुप कर! तुझे तो बस चाऊमीन खाने का बहाना चाहिए! पता भी है की जिनकी तबियत ठीक नहीं होती उन्हें सादा खाना इसलिए खिलाया जाता है ताकि कहीं पेट न खराब हो जाए|
नेहा बहुत समझदार थी और उसकी समझदारी उसकी बातों से झलकती थी| आयुष को डाँटने के बाद नेहा मुझे समझाते हुए बोली;
नेहा: पापा जी, आप इसकी (आयुष की) बात मत सुनो! इसे कुछ समझ तो है नहीं, आप सादा खाना ही खाना| मैं कल सुबह आ कर आपको अपने हाथ से खाना खिलाऊँगी|
नेहा कभी-कभी मेरी माँ की तरह बात करती थी और उसके इस बचपने पर मुझे बहुत प्यार आता था|
मैं: ठीक है मम्मी जी!
मैंने मजाकिया ढंग में नेहा को मम्मी कहा तो वो जोर से हँस पड़ी! तभी आयुष ने अपनी दीदी के हाथ से फ़ोन खींच लिया और दूसरी तरफ मुँह कर खुसफुसा कर मुझसे बोला;
आयुष: पापा जी, मैं आपके लिए चुपके से चाऊमीन लाऊँगा और हम दोनों छुप कर खा लेंगे!
आयुष का बचपना सुन मैं मुस्कुराया और बोला;
मैं: बेटा जी, अगर आपकी दीदी ने देख लिया न तो मैं तो फिर भी बच जाऊँगा क्योंकि मैं बड़ा हूँ लेकिन आपको आपकी दीदी से बहुत मार पड़ेगी!
मेरी बात सुन आयुष फट से बोला;
आयुष: दीदी मुझे पकड़ ही नहीं पाएगी तो मुझे मारेंगी कैसे?
आयुष कुटिल मुस्कान लिए हुए बोला|
हम बाप-बेटा खुसफुसा कर बात कर रहे थे इसलिए नेहा की दिलचस्पी बढ़ गई:
नेहा: क्या खुसुर-फुसर हो रही है?
नेहा किसी मास्टरनी की तरह बोली तो आयुष किसी सकपकाए विद्यार्थी की तरह बोला:
आयुष कु...कुछ नहीं दीदी!
नेहा को शक हुआ तो उसने आयुष के हाथ से फ़ोन ले लिया और मुझसे पूछने लगी की हम बाप-बेटे क्या बात कर रहे थे, तो मैंने आयुष का बचाव करते हुए कहा;
मैं: बेटा, आयुष कह रहा था की वो आपसे तेज़ दौड़ता है और आप उसे पकड़ नहीं सकते|
मेरी बात सुन नेहा एकदम से अकड़ते हुए आयुष से बोली;
नेहा: अच्छा बच्चू?! गाँव चल फिर तुझे तेज़ दौड़कर दिखाती हूँ! न तेरे कान पकड़ कर पापा जी के पास लाई तो कहिओ!
नेहा बड़े ताव में बोली थी जिसे देख आयुष खी-खी कर हँसने लगा था| बच्चों से हुई थोड़ी सी हँसी-मज़ाक से भरी बातों ने मुझे मेरी पीड़ा भुला दी थी|
बच्चों के बाद मेरी माँ ने मुझसे बात की, माँ से बात करते समय मैं इस बात का पूरा ख्याल रख रहा था की माँ को पता न चले की मैं इस वक़्त अस्पताल में नहीं हूँ| साथ ही मैं ये ध्यान रख रहा था की मैं माँ से कोई झूठ न बोलूं, इसलिए मैं माँ के सवालों का जवाब गोल-मोल देने लगा| मुझसे बात करने के बाद माँ ने संगीता से बात करने की इच्छा जाहिर की;
मैं: माँ वो (संगीता) घर पर है, दरअसल अस्पताल में ठहरने की कोई व्यवस्था नहीं थी इसलिए मैंने जबरदस्ती संगीता को घर भेज दिया|
मैं माँ से झूठ नहीं बोलना चाहता था इसलिए में बड़ी चपलता से माँ के सवाल का जवाब गोलमोल कर दिया था| मैंने उन्हीं संगीता के अस्पताल में न रुकने की बात सच्ची ही कही थी और अपने अस्पताल में न होने की बात गोल कर दी थी| अगर माँ को पता चल जाता की मैं इस वक़्त taxi में बैठा हूँ और हरिद्वार जा रहा हूँ तो वो मुझे इतना डाँटती की मेरी ऐसी-तैसी हो जाती! माँ से बात कर मैंने पिताजी से भी बात की मगर उनसे बात बहुत थोड़ी हुई क्योंकि तबतक माँ-पिताजी की train आ चुकी थी और पिताजी को समान तथा बच्चों को अकेले सँभालना था|
माँ-पिताजी से बात कर मैंने फ़ोन रखा ही था की संगीता का फ़ोन आ गया तथा मैंने उसे माँ से अपने द्वारा बोले गए झूठ के बारे में बताया|
संगीता: कल जब माँ-पिताजी यहाँ पहुँचेंगे और उन्हें सच पता चलेगा की आप हरिद्वार गए हो तो वो बहुत गुस्सा करेंगे!
संगीता चिंतित होते हुए बोली|
मैं: जान, हरिद्वार जाने की जिद्द मैंने की थी इसलिए उनकी डाँट भी मैं ही खाऊँगा| तुम्हें बस उन्हें सच बताना है की कैसे मैंने किसी की बात नहीं मानी और हरिद्वार जाने की जिद्द पकड़ ली थी|
मेरी बात सुन संगीता बोली;
संगीता: ऐसे कैसे आपको डाँट सुनने दूँ?! मैं माँ-पिताजी को आपके दिल की बात समझाऊँगी और उन्हें आपको डाँटने नहीं दूँगी|
संगीता कभी-कभी बच्चों जैसी बातें करती थी, इस समय उसे लगता था की उसके समझाने से माँ-पिताजी मान जाएंगे तथा मुझे नहीं डाटेंगे| मैंने संगीता को कुछ नहीं कहा तथा उसे उसकी इस खुशफैमी में रहने दिया|
बहरहाल, रात बहुत हो गई थी और संगीता को आराम करना चाहिए था मगर वो मेरे साथ सारी रात जाग कर बात करना चाहती थी| दरअसल उसे मेरी चिंता थी की कहीं मेरी रात में तबियत खराब न हो जाए इसीलिए अपने मन की तसल्ली के लिए संगीता मुझसे बातें करना चाहती थी| मैंने संगीता को बहुत समझाया की वो सो जाए मगर वो नहीं मानी इसलिए मुझे मजबूरन नींद आने का बहाना करना पड़ा तब जा कर संगीता मानी|
संगीता तो सो गई मगर मेरे लिए ये taxi की यात्रा बड़ी कष्टदाई थी| मुझसे न ठीक से बैठा जा रहा था और न ही मैं ठीक से लेट सकता था| ऊपर से मेरे बाएँ कँधे में दर्द बढ़ गया था, तथा मुझे थोड़ा बुखार भी चढ़ गया था| मैं अपना दर्द चुप-चाप सह रहा था क्योंकि अगर मेरी इस हालत के बारे में भाईसाहब और अनिल को पता चलता तो वो गाडी घर की ओर घुमा देते! अपने दर्द को काबू में करने के लिए मैंने एक painkiller ले ली, कुछ देर बाद जब गोली का असर हुआ तो दर्द थोड़ा कम हुआ|
रात का सन्नाटा था और अनिल बैठे-बैठे ही सो चूका था, वहीं भाईसाहब की भी आगे बैठे हुए आँख लग चुकी थी| गाडी में बस एक driver साहब और मैं ही जगे हुए थे, driver साहब गाडी चलाने में ध्यान दे रहे थे तथा मेरा मन इस वक़्त अंदर से व्यकुल हो रहा था| शरीरिक पीड़ा तो पहले से ही परेशान कर रही थी अब तो मानसिक पीड़ा भी शुरू हो चुकी थी| मेरे कँधे में हो रहा दर्द को मेरे मन ने मेरा प्रायश्चित का नाम दे दिया; 'ये दर्द उस दर्द के आगे कुछ नहीं जो इस वक़्त तेरी बड़की अम्मा सह रही होंगी! तुझे तो मामूली सा दर्द हो रहा है जबकि बड़की अम्मा ने तो अपना बेटा खोया है! इस दर्द को अपना प्रायश्चित समझ और चुपचाप अपना ये दर्द सहता जा!' मेरा मन मुझे धिक्कारते हुए बोला| जब मन धिक्कारता है तो बहुत ग्लानि होती है, वही ग्लानि महसूस कर मेरी आँखों से आँसूँ बह निकले| मुझे पश्चाताप हो रहा था, चन्दर को मारने का नहीं बल्कि अपनी बड़की अम्मा को एक असहनीय दुःख देने का! आजतक मैंने कोई ऐसा काम नहीं किया था जिससे मेरी गर्दन किसी के आगे शर्म के मारे झुक जाए मगर आज मुझे इतनी ग्लानि हो रही थी की मैं अब कभी भी अपनी बड़की अम्मा से नजरें नहीं मिला पाऊँगा! अपनी इसी ग्लानि में डूबे हुए मैंने पूरी रात जागते हुए पार की|
उधर गाँव में दरोगा, SP साहब का दिया हुआ हुक्म बजा रहा था| बहुत छानबीन करने के बाद उसने उस आदमी को धर लिया जिसने चन्दर को कट्टा बेचा था| उस आदमी का नाम कलुआ था और वो खून होने की खबर सुन कर नेपाल भागने की फिराक में था| रात 12 बजे थे जब दरोगा साहब ने उसे बॉर्डर पर धर लिया! पुलिस थाने ला कर दरोगा साहब ने कलुआ के दो डंडे धरे और वो तोते की तरह सब बकने लगा; "हमहि ऊ आदमी (चन्दर) का 5,000/- लेइ के कट्टा बेचन रहन! ऊ कहत रहा की आपन भाई का जान से मारे वाला है!" दरोगा साहब ने कलुआ का ब्यान दर्ज़ किया लिया तथा SP साहब से शबाशी पाने के लिए सुबह होने का इंतज़ार करने लगे|
अगली सुबह सात बजे माँ-पिताजी और बच्चे लखनऊ railway station पहुँच चुके थे| स्टेशन पहुँचते ही माँ ने मुझे फ़ोन किया और अस्पताल का पता पुछा ताकि वो सीधा मुझसे मिलने आ सकें;
माँ: बेटा हम लखनऊ पहुँच गए हैं, अब यहाँ से तेरे पास अस्पताल कैसे आयें?
मैं: माँ, मैं अस्पताल में नहीं हूँ! आप सब संगीता के मायके पहुँचिये, मैं आपसे वहीं मिलूँगा!
देखा जाए तो मैंने माँ से कोई झूठ नहीं बोला था, हाँ बस बात गोल घुमाई थी! मैं अस्पताल में तो था ही नहीं, मेरी भेंट तो सबसे सीधा मेरे ससुराल यानी संगीता के मायके में ही होनी थी| हाँ अपने हरिद्वार जाने की बात मैं गोल कर गया था| माँ आगे कुछ पूछें उससे पहले ही मैंने फ़ोन के network खराब होने का नाटक किया और फ़ोन रख दिया| माँ-पिताजी और बच्चों को घर पहुँचने में लगभग 3 घंटे लगते और उसके बाद माँ द्वारा मेरी क्लास लगनी तय थी!
खैर, मेरी क्लास जब लगती, तब लगती! फिलहाल तो हम हरिद्वार पहुँच चुके थे, घडी में बजे थे 9 और धुप निकल आई थी| मेरे कपड़े बहुत गंदे थे, उन में मेरा और चन्दर का खून लगा था इसलिए मैंने अनिल को कुछ पैसे दिए और अपने लिए दो जोड़ी कुर्ता-पजामा लाने को कहा| एक जोड़ी कुर्ता-पजामा मैंने गाडी में ही पहन लिया तथा मुँह-हाथ धो कर सीधा गँगा जी में डुबकी लगा दी! ठंडे पानी का स्पर्श जैसे ही मेरे गर्म शरीर पर हुआ तो मैं जड़ तक काँप गया मगर ठंडे पानी की परवाज किये बिना मैं अपना प्रायश्चित करने में लग गया|
पहली डुबकी लगाते ही मुझे उस दिन का सारा काण्ड किसी flashback की तरह मेरी आँखों के सामने याद आ गया| "माँ, मैंने एक जानवर की हत्या कर अपने परिवार की रक्षा की है और मुझे इसका नेश मात्र भी गिला नहीं है! गिला है तो बस इस बात का की मैंने अपने बड़की अम्मा की गोद उजाड़ दी! मेरे द्वारा किये इस पाप की आप मुझे जो भी सजा देंगी मैं स्वीकार कर लूँगा, लेकिन मेरे परिवार को मेरे किये पाप की कोई सजा न दीजियेगा!" मैं गँगा मैया से विनती करते हुए बोला|
दूसरी डुबकी लगाते हुए मैं, गँगा मैया से प्रार्थना करने लगा; "माँ, मुझे ताक़त दीजियेगा की मैं एक माँ को उसके बेटे से जुदा करने के लिए, उस माँ से (बड़की अम्मा से) माफ़ी माँग सकूँ! मेरी बड़की अम्मा जो मुझे अपने बेटे की तरह प्यार करती हैं उनके मन में मेरे प्रति नफरत पैदा न होने देना माँ|" गँगा जी में डुबकी लगाने से मेरे पाप भले ही धूल जाते मगर मेरा प्रायश्चित तभी पूर्ण होता जब मैं बड़की अम्मा से माफ़ी माँग लेता और बड़की अम्मा से माफ़ी माँगना इतना आसान नहीं था! मुझे देख कहीं उनके मन में नफरत न पैदा हो बस इसी बात का डर मुझे घेरे हुए था|
तीसरी डुबकी लगा कर मैं अपनी माँ के लिए प्रार्थना करने लगा; "माँ, मेरी माँ मुझे सबसे ज्यादा प्यार करती हैं, मैंने जो पाप किया है उसका बुरा असर मेरे और माँ के रिश्ते पर कभी न पड़े, मेरी माँ मुझे गलत न समझे, मुझे पापी न समझे! मेरी माँ सदैव खुश रहे, तंदुरुस्त रहे तथा हमारा माँ-बेटे का रिश्ता ताउम्र बना रहे| मेरी भी उम्र आप मेरी माँ को देना माँ, उन्हें तनिक भी कष्ट न होने देना माँ|" मैंने एक माँ-बेटे (बड़की अम्मा और चन्दर) का रिश्ता तोडा था और मुझे ये डर था की कहीं मेरे किये इस पाप की सजा के रूम में मेरा और मेरी माँ का रिश्ता न टूट जाए, इसीलिए मैंने ये प्रार्थना की थी|
चौथी डुबकी लगा मैं अपने पिताजी के लिए प्रार्थना करने लगा; "माँ, मेरे पिताजी का उनके भाई-भाभी से अटूट रिश्ता है, मेरे किये इस पाप के कारण उनका ये रिश्ता न टूटने देना| मेरे पिताजी मुझे खुनी न समझें, उनके सर मेरे कारण कभी शर्म से झुकने न देना माँ|" मुझे नहीं मालूम था की बड़के दादा ने चन्दर की मौत पर क्या प्रतिक्रिया दी है इसलिए मैं ये प्रार्थना कर रहा था की मेरे पिताजी और उनके भाई-भाभी का ये रिश्ता कभी न टूटे| मेरी ये खुशफैमी की हमारा पूरा परिवार फिर एक हो जायगा बरकरार थी और मैं इसी खुशफैमी में जीना चाहता था|
पाँचवी डुबकी लगा कर गँगा माँ से प्रार्थना करते हुए बोला; "माँ, मेरी पत्नी संगीता और मेरे होने वाले बच्चे की रक्षा करना, मेरे पाप का बुरा साया कभी मेरी पत्नी और मेरे होने वाले बच्चे पर न पड़े|" ये मेरी गँगा जी आ कर पाप धोने की सबसे बड़ी वजह थी, मैं अपने होने वाले बच्चे पर अपने पापों का बुरा साया नहीं पड़ने देना चाहता था| अपने बेटे को मैं अपने सभी सद्गुण देना चाहता था और अपने दुर्गुणों को मैं अपने बच्चे से कोसों दूर रखना चाहता था|
छठी डुबकी लगाते समय मुझे मेरी बिटिया नेहा की याद आई| भले ही मेरी बेटी ने कभी चन्दर को अपना बाप नहीं माना मगर खून के रिश्ते से तो चन्दर ही नेहा का बाप था| चन्दर की जान ले कर मैं नेहा का भी दोषी बन गया था और मुझे नेहा से भी माफ़ी माँगनी थी| "माँ, मेरी फूल सी बच्ची नेहा को सदैव खुश रखना और मुझे हिम्मत देना की मैं उसके सामने अपने किये पाप का स्वीकार कर सकूँ तथा उससे माफ़ी माँग सकूँ|" एक बात की माफ़ी मुझे अपनी बच्ची से और माँगनी थी, अपनी बच्ची को इतना रुलाने की माफ़ी!
सातवीं डुबकी मैंने आयुष के लिए लगाई, मेरा प्यारा बेटा जो सारे घर को अपने भोलेपन और मुस्कान से कभी मायूस नहीं होने देता था| अपनी भोली बातों से वो सभी का मन मोह लेता था, वो भी मेरे कारण बहुत उदास हो गया था| "माँ, मेरा बेटा आयुष, बड़ा भोला और चंचल स्वभाव का है| वो मुझसे 5 साल दूर रहा है मगर उसमें मुझे मेरा अक्स नज़र आता है, मैं नहीं चाहता की मेरे किये इस बुरे कर्म का कोई भी दुष्प्रभाव मेरे बेटे पर पड़े| मेरी आपसे बस इतनी ही विनती है की मेरा बेटा आयुष सदाचारी बने, उसे सद्गुण मिले और वो हमेशा इसी तरह से खिलखिला कर हँसता -मुस्कुराता रहे|"
इस तरह मैंने सात डुबकी लगाई और अब जा कर मेरा मन हल्का होने लगा था| गँगा जी के पवित्र जल ने मेरे मन-मस्तिष्क पर से चन्दर की हत्या करने का बोझ उतार दिया था| उस पावन जल में खड़े हो कर मुझे ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो मेरे द्वारा किया गया पाप मेरे शरीर से निकल कर बहता हुआ गँगा जी में मिलता जा रहा हो|
खैर, अपने पाप धो कर मैं बाहर आया और उन्हीं गीले कपड़ों में अपने ससुर जी के अस्थि विसर्जन की पूजा में बैठने लगा|
भाईसाहब: मानु, कपडे बदल लो नहीं तो गीले कपड़ों के कारण ठंड लग जायेगी|
भाईसाहब मुझे समझाते हुए बोले, परन्तु मेरे कारण पहले ही अस्थि विसर्जन की पूजा में इतनी देर हो रही थी इसलिए मैंने और देर करना सही नहीं समझा;
मैं: कुछ नहीं होगा भाईसाहब, पूजा समाप्त होने के बाद अभी फिर से डुबकी लगानी है| तब ही कपड़े बदल लूँगा|
मैंने भाईसाहब की बात को हलके में लेते हुए कहा|
आखिर पूजा शुरू हुई और सभी जर्रूरी रस्में मैंने, भाईसाहब तथा अनिल ने मिल कर निभाईं| पूजा समाप्त होने पर हम तीनों ने गँगा जी में डुबकी लगानी थी| भाईसाहब और मुझे तो आदत थी गँगा जी में डुबकी लगाने की क्योंकि हम दोनों ही कभी न कभी हरिद्वार आये थे मगर अनिल का ये पहला मौका था तथा वो पानी में जाने से घबरा रहा था| भाईसाहब तो सबसे पहले डुबकी लगा आये, अब रह गए हम दोनों जीजा-साले तो हम दोनों साथ-साथ सीढ़ी उतरे| आखरी सीढ़ी पर पहुँच अनिल मुझसे बोला; "जीजू, मेरा हाथ पकड़ लेना, मैं आज पहली बार डुबकी लगा रहा हूँ|" अनिल की बात सुन मैं मुस्कुराया और उसे समझाते हुए बोला; "देख बेटा, ज्यादा गहराई में मत जाइयो| मेरे साथ रहिओ और अपनी नाक पकड़ कर फटाफट डुबकी लगाइयो, ज्यादा देर पानी में रहेगा तो बह जायेगा|" मेरी पानी में बह जाने की बात सुन अनिल की हवा टाइट हो गई थी, मैंने उसे हिम्मत बँधाई और हम दोनों जीजा-साले पानी में उतर गए| अनिल मेरी बाईं तरफ था, हम दोनों ने एक साथ डुबकी लगाई पर चूँकि अनिल का यूँ डुबकी लगाना पहलीबार था इसलिए वो पानी में साँस रोक कर एक क्षण रुक गया था जिस करण वो गँगा जी में बहने लगा| मैंने फूर्ति दिखाते हुए एकदम से उसका हाथ थाम लिया और उसे बहने नहीं दिया| इस कुछ पल के बहने के कारण अनिल बेचारा बहुत घबरा गया था, मैंने जैसे तैसे उसे हिम्मत बँधाई तथा उसका हाथ पकड़ कर ही पुनः डुबकी लगाई|
डुबकी लगा कर जब हम दोनों जीजा-साले बाहर निकले तो अनिल ने अपने लगभग बह जाने की बात भाईसाहब को बताई; "घबरा मत अनिल और अपने डर का सामना करना सीख| तेरी जिंदगी में अभी बहुत से मौके आएंगे जहाँ तुझे नए खतरों से जूझना होगा, हो सकता है तब मानु या मैं वहाँ न हो तब तुझे उन खतरों का सामना अपनी सूझ-बूझ और निडर बन कर करना है|" भाईसाहब अपने छोटे भाई को सीख देते हुए बोले| अनिल को समझा कर भाईसाहब मेरे गले लगे और एकदम से भावुक हो कर बोले; "मानु, मुझे माफ़ कर दे! अगर उस दिन (जब श्मशान से लौटते समय जब चन्दर हमें मिला था) मैंने उस हरामजादे चन्दर का टेटुआ खुद दबा दिया होता तो तुझे ये जख्म न मिलता|" भाईसाहब के जज्बात मैं समझता था इसलिए मैं उन्हें समझाते हुए बोला; "भाईसाहब, चन्दर से बैर मेरा था| आपके हाथों उसका खून होता तो खामखा आप और आपके परिवार पर दाग लग जाता| उसने मेरी पत्नी को जान से मारने की कोशिश की, मेरे बच्चे को जान से मारना चाहा तो उसको सजा मेरे हाथों मिलना ही सही था|" मैंने भाईसाहब को ग्लानि के गड्ढे में गिरने से बचा लिया था| इस वक़्त भाईसाहब एक स्तम्भ की तरह थे जिस पर मेरी सासु माँ तथा अनिल का जीवन आश्रित था| उनके यूँ ग्लानि में डूब कर डगमगाने से सारा कुनबा टूट सकता था, इसलिए मैंने अपनी बातों से भाईसाहब को ग्लानि महसूस करने से रोक लिया था|
बहरहाल, पूजा संपन्न हो चुकी थी और पंडित जी अपनी दक्षिणा की राह देख रहे थे| "चलिए भाईसाहब, पंडित जी अपनी दक्षिणा की राह ताक रहे हैं|" मैंने बात घुमाते हुए मुस्कुरा कर भाईसाहब से कहा| हम तीनों पंडित जी के पास पहुँचे तथा उनसे दक्षिणा पूछी, पंडित जी ने अपनी दक्षिणा बहुत अधिक माँगी, जिस पर हम तीनों ने मिलकर उनसे काफी भाव-ताव किया| आज जिंदगी में पहलीबार मैं एक पंडित जी से भावताव कर रहा था और मुझे ये हास्यास्पद लग रहा था| "देखिये पंडित जी, हम कोई अमीर बाप के बेटे नहीं हैं जिनसे आप इतनी दक्षिणा माँग रहे हैं| जितनी हमारी क्षमता है हम आपको उतनी दक्षिणा ही दे रहे हैं| कृपया हमारी विनती स्वीकारें और हमें आशीर्वाद दें|" मैंने पंडित जी के आगे हाथ जोड़ते हुए कहा तथा अपने दोनों हाथों से उन्हें सादर प्रेम सहित 3,001/- रुपये दिए| मेरा आदरभाव देख पंडित जी कुछ कह न पाये और उन्होंने मुस्कुराकर पैसे स्वीकार लिए|
"जीजू, आप कैसे सबका मन मोह लेते हो?!" अनिल मुस्कुराते हुए बोला| अभी मैंने जिस तरह प्यार से बात कर पंडित जी को दक्षिणा के लिए मनाया था उसी को ले कर अनिल मुझसे सवाल पूछ रहा था| "बेटा, हमने पूजा शुरू होने से पहले ही दक्षिणा के बारे में पुछा था न, तो पंडित जी ने कहा था की आप अपनी श्रद्धा अनुसार दीजियेगा| मैंने बस उन्हीं की कही बात को प्यार से उनके सामने प्रसूत किया| पंडित जी ने ये सोच कर मेरी बात मानी की हम तीन आदमी हैं और पूजा संपन्न हो चुकी है इसलिए अब हम चाहें तो बिना पैसे दिए भी जा सकते हैं इसलिए उन्होंने भागते भूत की लंगोटी भली सोच कर ही अपनी दक्षिणा स्वीकार कर ली| कहीं अगर तू अकेला आया होता तो बेटा तुझे तो वो धो कर निचोड़ लेते!" मेरी अंतिम कही बात सुन अनिल हँस पड़ा| "सीख अपने जीजू से कुछ!" भाईसाहब मुस्कुराते हुए अनिल से बोले भाईसाहब को मेरी ये होशियारी-समझदारी अच्छी लगी थी|
गँगा जी में डुबकी लगाने से मेरी पट्टी भीग गई थी इसलिए सबसे पहले हमने पास ही के अस्पताल से मेरी दुबारा पट्टी करवाई| फिर मैंने संगीता को फ़ोन कर सारी बातें बताई, मैंने उसे पूरी तरह से आश्वस्त कर दिया की मैं स्वस्थ-तंदुरुस्त हूँ तब जा कर मेरी पत्नी के दिल को चैन मिला| संगीता अब मेरी ओर से निश्चिंत हो गई थी, उसे चिंता थी तो माँ-पिताजी का सामना करने की| माँ-पिताजी को जैसे ही पता चलता की मैं कल रात ही अस्पताल से हरिद्वार जाने के लिए निकल चूका हूँ तो वो बहुत गुस्सा होते, संगीता तो फिर भी बच जाती क्योंकि माँ-पिताजी मेरे जिद्द करने की आदत को अच्छे से जानते थे इसलिए मेरी बैंड बजना तय था|
संगीता से बात कर मैंने अनिल ओर भाईसाहब के साथ बैठ कर नाश्ता किया तथा अपनी दवाई ली| घडी में बजे थे साढ़े ग्यारह और हम हरिद्वार से घर की ओर निकल रहे थे जब माँ का फ़ोन आया| माँ का फ़ोन देख मैं समझ गया था की वो सब घर पहुँच चुके हैं ओर अब मुझे जोरदार डाँट पड़ने वाली है!
माँ: मानु!!!!!!! तू मुझे बिना बताये हरिद्वार कैसे गया?! तेरी हिम्मत कैसे हुई मुझसे झूठ बोलने की? तेरे दिमाग में भूसा भरा है क्या जो तू इस जख्मी हालत में हरिद्वार गया?! अपनी जिद्द के आगे तुझे किसी का ख्याल नहीं आता न?
माँ बड़ी जोर से मुझ पर चिल्लाते हुए बोलीं| दो बच्चों का बाप था मगर माँ की डाँट सुन कर मेरी फट कर चार हो गई थी!
मैं: माँ.....
मैंने माँ को समझाने के लिए मुँह खोला ही था की माँ ने मुझे फिर झाड़ दिया;
माँ: एकदम चुप! खबरदार जो एक भी शब्द तेरे मुँह से निकाला तो, मैं तेरी टांगें तोड़ दूँगी!
माँ की इस धमकी पर मुझे हँसी आ गई, कारण ये की मेरी माँ ने आज तक मुझे थप्पड़ नहीं मारा था तो मेरी टांगें क्या तोड़तीं?
माँ: कौन भरता है तेरे दिमाग में ये ऊल-जुलूल बातें बोल??! मैंने तुझे कुछ भी कहा या पुछा की तूने जो किया वो क्यों किया? मेरे लिए तूने जो किया वो सही किया और मुझे फक्र है तुझ पर की मेरा बेटा इतना बहादुर है|
माँ का कहने का मतलब था की मैंने चन्दर का खून किया, ये जानकार मेरी माँ ने मुझसे कोई सवाल-जवाब नहीं किया था| उनके लिए उनका बेटा ही सही था और उन्हें अपने बेटे पर गर्व था की उसने अपने परिवार के हित में ये कदम उठाया था|
माँ: जब मैंने तुझसे कुछ कहा नहीं तो ये पाप-पुण्य तेरे दिमाग में कहाँ से आया? कहाँ से सीखता है तू ये सब बातें?
माँ मुझे डाँटते हुए बोलीं| माँ मुझे आज भी वैसे ही डाँट रहीं थी जैसे मेरे बचपन में डाँटती थीं और ये सुख महसूस कर मेरे चेहरे पर डर की जगह मुस्कान आ गई थी|
मैं: माँ, आपका डाँटना हो गया तो मैं कुछ कहूँ?
मैंने बड़े प्यार से अपनी बात रखने की इज्जाजत माँ से माँगी|
माँ: हाँ बोल!
माँ का गुस्सा फुर्र हो चूका था मगर वो मुझे फिर भी अपना झूठा गुस्सा दिखा रहीं थीं ताकि कहीं मैं फिर से हवा में न उड़ने लगूँ|
मैं: माँ, आप जानते हो न की आपका लड़का कितना भावुक है?! मुझे चन्दर की जान लेना का कोई गिला नहीं है, मुझे रत्ती भर ऐसा नहीं लगा की मैंने कोई पाप किया है| मुझे दुःख हुआ तो इस बात का की मैंने अपनी बड़की अम्मा की गोद उजाड़ दी! बस इसी बात को सोच कर मेरा ज़मीर मुझे चैन से नहीं बैठने दे रहा था| मेरी अंतरात्मा कह रही थी की मेरे हाथों एक माँ-बेटे के रिश्ते को तोड़ने का पाप हुआ है| फिर एक डर ये भी था की मैं अपने इन खून से रंगे हाथों से किसी को स्पर्श नहीं करना चाहता था इसीलिए मैंने हरिद्वार जाने की जिद्द पकड़ी| सासु माँ ने, संगीता ने, अनिल ने, भाईसाहब ने यहाँ तक की SP साहब यानी भाईसाहब के साले साहब ने भी मुझे समझाया मगर मैं अपनी जिद्द पर बरकरार रहा|
मैं अपनी जिद्द को कतई जायज नहीं ठहरा रहा, मैं जानता हूँ की मेरी ये जिद्द मेरे लिए कितनी घातक साबित हो सकती थी! मैंने अपनी इस जिद्द से सबक ले लिया है और आगे से मैं कभी ऐसी कोई जिद्द नहीं करूँगा, अगर मैंने कभी जिद्द की न तो आप डंडे से मेरी पिटाई कर देना मैं कुछ भी नहीं कहूँगा|
मेरी बात सुन मेरी माँ को अस्पताल में मेरे मन में उठी उथल-पुथल समझ में आई तथा मेरी माँ का गुस्सा शांत हो गया और मेरी डंडे से पिटाई करने वाली बात पर माँ के चेहरे पर मुस्कान आ गई थी जो की मैं फ़ोन पर बात करने के कारण देख नहीं पाया था मगर मैंने अपनी माँ की मुस्कान को महसूस अवश्य कर लिया था|
मैं: वैसे माँ, आपका बेटा लाख जिद्दी सही मगर आपके बेटे ने कल रात से अभी तक आपसे कोई झूठ नहीं बोला|
मेरी बात सुन मेरी माँ को प्यारा सा गुस्सा आ गया;
माँ: अच्छा?
मैं: और क्या, आप याद करो की क्या मैंने कल रात से ले कर आज सुबह तक आपसे कभी ये कहा की मैं अस्पताल में हूँ?
मेरा सवाल सुन माँ की हँसी छूट गई और वो बोलीं;
माँ: अच्छा...मेरा बेटा बहुत तेज़ हो गया है! आज के बाद तुझसे सारी बात खुल कर ही पूछूँगी, वरना तू तो मुझे बेकूब (बेवकूफ) बना देगा!
माँ मुझे प्यार से ताना मरते हुए बोलीं|
इतने में मेरी बिटिया नेहा आ गई, दरअसल घर पहुँच कर जब माँ-पिताजी और बच्चों को ये पता चला की मैं हरिद्वार गया हूँ तो सभी परेशान हो गए थे| माँ-पिताजी के फ़ोन charge न होने के कारण बंद हो गए थे इसलिए उन्होंने मेरे नंबर से संगीता वाला नंबर जो की मेरे पास था उस पर कॉल करना शुरू कर दिया और तब तक चरण काका ने माँ-पिताजी के फ़ोन चार्ज करने की व्यवस्था कर दी| मैं उस वक़्त घर आने के लिए निकल चूका था और हमारी गाडी किसी ऐसी जगह पर थी जहाँ network नहीं मिल रहा था| मेरा नंबर नहीं मिलने से सब चिंतित थे मगर मेरी बेटी नेहा सबसे ज्यादा चिंतित थी| मेरी बच्ची घबरा गई थी और रोने लगी थी, जब उसे कुछ न सूझा तो वो खेतों में बने मंदिर में मेरे लिए प्रार्थना करने भाग गई| मेरे लिए प्रार्थना कर नेहा जैसे ही घर लौटी तो माँ ने ख़ुशी से उसे पुकारा;
माँ: मुन्नी, देख तेरे पापा का फ़ोन मिल गया|
इतना सुन्ना था की नेहा दौड़ती हुई माँ के पास आई, माँ ने नेहा को फ़ोन दिया तो नेहा एकदम से रोते हुए बोली;
नेहा: पापा जी.....पापा....आप मुझे बिना बताये...क्यों चले गए?
नेहा रोते हुए बोली|
मैं: मेरा बच्चा! मेरा प्यारा बच्चा, रोते नहीं बेटा! आप तो मेरा बहादुर बच्चा हो न?! आप रोओगे तो मुझ पर क्या बीतेगी?
मेरी बात सुन नेहा ने अपना रोना रोका और सिसकने लगी|
मैं: बेटा, आपके नाना जी की अस्थि विसर्जन की पूजा करनी जर्रूरी थी इसलिए मैंने हरिद्वार जाने की जिद्द पकड़ी और आपको मैंने ये बात इसलिए नहीं बताई क्योंकि आप मुझे हरिद्वार जाने थोड़े देते?!
मैंने नेहा से आधा सच कहा था, मैंने अपने पाप धोने की बात नेहा से छुपाई थी क्योंकि मेरी नज़र में नेहा को चन्दर की हत्या होने की बात नहीं पता थी| मैं घर लौट कर नेहा को खुद सब बात बता कर उससे माफ़ी माँगना चाहता था|
नेहा: प....पापा जी....आप कब घर...आओगे?
नेहा सिसकते हुए बोली|
मैं: बेटा जी, हम सब यहाँ से निकल चुके हैं और हमें घर पहुँचने में देर रात हो जाएगी, शायद 12-1 बज जाएँ| आप मेरी जरा भी चिंता मत करना और वहाँ अपनी नानी जी, अपने दादा-दादी जी और आयुष का ध्यान रखना| ठीक है बेटा?!
मैंने नेहा को प्यार से समझा कर आश्वस्त किया|
नेहा: ठीक है पापा जी! मैं आपके आने तक सबका ख्याल रखूँगी और आपका इंतज़ार करुँगी|
नेहा जिम्मेदार बनते हुए बोली| आयुष और पिताजी से मेरी कोई बात नहीं हो पाई क्योंकि दोनों दादा-पोते खाने का प्रबंध करने निकले थे|
नेहा से बात कर मुझे अब जल्दी घर पहुँचना था, हम जल्दी घर पहुँचे उसके लिए मैंने ड्राइवर साहब से अनुरोध किया: "ड्राइवर साहब तनिक जल्दी घर पहुँचा दो, हमार बिटिया बहुत रोवत है|" मेरी कही इस बात पर ड्राइवर साहब बोले; "साहब, आप मुन्नी से कही दिहो की हम आभायें ओकरे पापा का लेइ के आइथ है!" ड्राइवर साहब की बात सुन हम सभी हँस पड़े| फिर driver साहब ने गाडी ऐसी भगाई की मुझे लगने लगा था की शायद एक आध घंटे में मैं घर पहुँच ही जाऊँगा!
थोड़ी देर बाद आयुष का फ़ोन आया और वो मुझसे बात करने के लिए जोश से भरा हुआ था| दरअसल कल शाम से आयुष अच्छा बच्चा बना हुआ था तथा मेरे द्वारा दी गई सभी जिम्मेदारियाँ उसने अच्छे से उठाई थीं और ये खबर मुझे देने के लिए आयुष बहुत उत्सुक था|
आयुष: पापा जी...पापा जी मैंने है नानी जी को chocolate खिलाई और है न नानी जी ने मुझे है न हाजमोला वाली toffee दी! फिर मैंने नानी जी और दादी जी के पैर दबाये और दादा जी के भी पैर दबाये! और मैंने कोई शरारत नहीं की, मैं अच्छा बच्चा हूँ न पापा जी?
आयुष बड़े भोलेपन से बोला| आयुष को अपनी तारीफ सुन्नी थी इसलिए मैंने उसकी तारीफ कर दी;
मैं: आप तो good boy हो! मेरा बेटा इतना समझदार हो गया, मुझे तो यक़ीन नहीं होता?! ऐसे ही मेरे लौटने तक आप सबका ध्यान रखना और मैं है न आपके लिए है न chocolate ले कर आऊँगा|
मैंने आयुष की तारीफ की तथा उसके साथ उसी के अंदाज में बात की जिससे आयुष गर्व से फूला नहीं समाया| आयुष आगे बात करता उससे पहले ही मेरी माँ उससे बोलीं;
माँ: अच्छा बस बेटा, अब अपने दादा जी को भी बात करने दे|
माँ की बात सुन आयुष अपना निचला होंठ फुलाते हुए बोला;
आयुष: लेकिन दादी जी, मुझे अभी पापा जी से और बात करनी है!
आयुष के पास कोई बात करने वाला था नहीं, एक मैं ही था जो की बच्चा बन कर आयुष से बात करता था इसलिए आयुष मुझसे बात करने को उतावला था| उधर आयुष की बात सुन नेहा उसे समझाते हुए बोली;
नेहा: जैसे तू पापा जी का बेटा है न वैसे ही पापा जी दादा जी के बेटे हैं| जैसे तेरा पापा जी से बात करने का मन है, वैसे ही पापा जी का भी दादा जी से बात करने का मन है! अब चुपचाप फ़ोन दे-दे दादा जी को और जा कर बड़ी मौसी जी की खाना बनाने में मदद कर|
नेहा ने आयुष को आदेश देते हुए कहा| आयुष बेचारा क्या कहता वो अपना निचला होंठ फुलाये हुए मुझसे बोला;
आयुष: पापा जी, मैं आपसे बाद में बात करूँगा, अभी आप दादा जी से बात कर लो|
मैं: बेटा उदास नहीं होते, मैं आपके लिए एक नहीं दो chocolate लाऊँगा|
दो chocolate के नाम से आयुष खुश हो गया और ख़ुशी-ख़ुशी फ़ोन अपने दादा जी को दे कर अपनी बड़ी मौसी जी के पास भाग गया|
पिताजी: कैसा है बेटा?
पिताजी की आवाज में बड़ी खुश्की थी, मुझे लग रहा था की उनकी ये खुश्की इसलिए है की मैं उन्हें बिना बताये हरिद्वार निकल आया|
मैं: जी मैं ठीक हूँ| आप सब कैसे हैं? घर पहुँचने में कोई तक़लीफ़ तो नहीं हुई?
मेरे पूछे सवालों का जवाब पिताजी ने बस एक शब्द में दिया;
पिताजी: नहीं
इस एक शब्द ने पिताजी के दिल में मौजूद कश्मकश को महसूस कर लिया था मगर मैं उनकी इस कश्मकश को समझ नहीं पा रहा था| मेरा मन मुझे इस जख्मी हालत में पिताजी को बिना बताये हरिद्वार आने को ही पिताजी की इस कश्मकश का कारण बता रहा था| क्या मेरा सोचना सही था?
बहरहाल, रात के 12 बज गए थे और आज सारा दिन नेहा और आयुष ने मुझे कई बार फ़ोन कर मुझसे बात की| रात के बारह बजे तक सब सो गए थे, बस मेरी माँ, संगीता और नेहा ही जगे हुए थे| सभी महिलायें घर के भीतर सोइ थीं तथा पुरुष चरण काका के यहाँ सोये थे| संगीता ने मुझे फ़ोन किया ये जानने के लिए की हम कहाँ पहुँचे हैं;
संगीता: और कितनी देर लगेगी आपको घर पहुँचने में?
संगीता चिंतित होते हुए बोली|
मैं: बस 10-15 मिनट और| सब सो गए की कोई जगा हुआ है?
संगीता: मैं, माँ (मेरी माँ) और आपकी लाड़ली नेहा जगे हुए हैं|
नेहा का नाम संगीता ने मुँह टेढ़ा कर के लिया था क्योंकि नेहा जिद्द कर के जगी हुई थी| नेहा के जगे होने की बात सुन मैं थोड़ा चिंतित हो गया;
मैं: यार, तुमने क्यों मेरी प्यारी बच्ची को जगा कर रखा है|
संगीता: मैंने नहीं जगा रखा उसे! आपकी लाड़ली आप ही की तरह जिद्दी है, सब ने कहा की सो जा मगर कहती है की मैं पापा के आने के बाद उन्हें अपने हाथों से खाना खिला कर ही सोऊँगी|
संगीता थोड़ा चिढ़ते हुए बोली| मैं जानता था की नेहा मुझे ले कर थोड़ी जिद्दी है और कभी-कभी किसी की नहीं सुनती|
मैं: अच्छा ठीक है देवी जी! मैं आ कर अपनी बिटिया को समझाऊँगा की वो इस तरह जिद्द न किया करे|
क्या कमाल की विडंबना थी, एक जिद्दी बाप अपनी जिद्दी बेटी को जिद्द न करने के लिए समझाने की बात कर रहा था|
सवा बारह बजे taxi हमारे घर के मुहारे में आ कर रुकी, जब गाडी मुहारे में रुक रही थी तब मैंने देखा की मेरी बिटिया रस्ते पर नजरें जमाये मेरा इंतज़ार कर रही थी| जैसे ही गाडी का दरवाजा खुला और मैं गाडी से बाहर निकला तो नेहा मेरी ओर दौड़ पड़ी| जब मैंने नेहा को अपनी ओर दौड़ते हुए देखा तो मेरे मन में पश्चाताप की पीड़ा उतपन्न हो गई| मैं एकदम से अपने घुटनों पर आ गया और अपना दाहिना हाथ खोल कर नेहा को गले लगाना चाहा| नेहा दौड़ती हुई आई और सीधा मेरे सीने से लग कर रो पड़ी! "प्...पापा जी....I missed you! Promise me पापा....आप अब से कहीं अकेले नहीं जाओगे....आपको कुछ हो गया तो....मैं...." मैं जानता था की नेहा क्या कहने वाली है और मैं ये नेहा के मुँह से नहीं सुनना चाहता था इसलिए मैंने उसकी बात काट दी; "नहीं बेटा, ऐसा नहीं सोचते! मैं वादा करता हूँ की आगे से मैं अपना और भी ज्यादा ध्यान रखूँगा| मैं अपनी बेटी को इस तरह कभी नहीं रुलाऊँगा!" मैंने नेहा की पीठ थपथपाते हुए उसे आश्वस्त करते हुए कहा| अपनी बेटी के इस कदर भावुक होने से मैंने नेहा के सामने अपना प्रायश्चित करने का मौका गँवा दिया था|
इधर नेहा ने अपने आँसूँ पोछे और फिर मेरे बाएँ हाथ को देखा जो की belt में लिपटा हुआ था| नेहा मेरे बाएँ हाथ पर हाथ फेरते हुए फिर से परेशान हो गई थी; "पापा जी, आपको यहाँ दर्द हो रहा है?" नेहा का सवाल सुन मैं मुस्कुराया और उसके सर पर हाथ फेरते हुए बोला; "बेटा, आपके गले लगने के बाद से न कोई दर्द नहीं हो रहा|" मेरा जवाब सुन नेहा फिर से मेरे गले लग गई लेकिन इस बार उसके चेहरे पर आँसूँ नहीं बल्कि उसके चेहरे पर बड़ी प्यारी सी मुस्कान तैर रही थी| नेहा ने मेरे दाएँ हाथ की ऊँगली पकड़ी और हम दोनों बाप-बेटी मेरी माँ और संगीता की ओर चल पड़े|
मैं, माँ के पास पहुँचा ही था की माँ ने एकदम से अपने दोनों हाथ खोल कर मुझे अपने सीने से लगने का निमंत्रण दिया| मैं किसी छोटे बच्चे की तरह माँ के सीने से जा लगा, माँ मेरे सर पर हाथ फेरने लगीं तथा खुद को रोने से रोकने लगीं| मेरी माँ का दिल अपने बेटे को देख कर आज बहुत प्रसन्न था, उनकी ख़ुशी ऐसी थी की मानो मैं कोई जंग जीत कर घर लौटा हूँ| नम आँखों से माँ ने मेरा चेहरा अपने हाथों में लिया तथा मेरे मस्तक को चूमते हुए बोलीं; "बेटा, तूने सच्ची मेरी जान निकाल दी थी! खबरदार जो इस तरह बिना बताये कहीं गया तो, अबकी तुझे डंडे से पीटूँगी!" माँ मुझे प्यार से डाँटते हुए बोलीं| "ओर ये पाप-पुण्य की बातें मत सोचा कर! जब तक मैं न कहूँ की तूने कोई पाप किया है तबतक तू ये ऊल-जुलूल बातें नहीं सोचेगा!" माँ ने मेरे सर पर हाथ फेरते हुए कहा|
अब बारी थी संगीता की जो मेरे गले लगने को व्यकुल थी| मैंने संगीता को गले लगाने के लिए अपना दायाँ हाथ खोला ही था की संगीता एकदम से आ कर मेरे गले लग गई| संगीता को अपने सीने से लगा कर ऐसा लग रहा था मानो किसी ने भट्टी में रखे लोहे की सलाख को एकदम से ठंडे पानी में डाल दिया हो! "I missed you so much!" संगीता खुसफुसाते हुए बोली| "I know जान and I'm sorry जान की मैंने तुम्हें अपने गले लगने के लिए इतना तड़पाया|" मैंने संगीता के सर को चूमते हुए कहा| माँ ने मेरी बात सुन ली थी इसलिए उन्होंने मेरे दाएँ कँधे पर थपकी मारते हुए कहा; "खबरदार मेरी बहु को तूने कभी तंग किया तो!" माँ की बात पर हम चारों हँस पड़े और संगीता मुझे बच्चों की तरह जीभ चिढ़ाने लगी|
माँ ने मुझसे खाना खाने को कहा और नेहा को खाना लेने के लिए भीतर भेज दिया| तभी भाईसाहब taxi वाले को पैसे दे कर अनिल के साथ हमारे पास आ पहुँचे| मैंने माँ से भाईसाहब का तार्रुफ़ संगीता के बड़े भाई के रूप में कराया, भाईसाहब ने मेरी माँ के पाँव छू कर आशीर्वाद लिया| माँ ने भाईसाहब और अनिल से खाने के लिए पुछा तो भाईसाहब ने बताया की हमने रास्ते में खाना खा लिया था| इतने में नेहा मेरे लिए खाने की थाली ले आई, थाली देख कर भाईसाहब बोले; "मानु, तुम्हें भूख लगी आई?" भाईसाहब मुस्कुराते हुए बोले| "बेटा, जब तक ये दोनों बाप-बेटी एक दूसरे को खाना न खिला दें इनका पेट कहाँ भरता है!" मेरी माँ मुस्कुराते हुए नेहा के सर पर हाथ फेरते हुए बोलीं| भाईसाहब ने हम बाप-बेटी का प्यार बस फ़ोन पर बात करते हुए ही देखा था, अब जब उन्होंने अपनी आँखों सेये प्यार देखा तो उन्हें बहुत ख़ुशी हुई|
रात बहुत हो गई थी इसलिए भाईसाहब और अनिल, चरण काका के यहाँ सोने चले गए| इधर हम बाप-बेटी ने एक साथ एक दूसरे को खाना खिलाना शुरू किया| "पापा जी, मैंने आपके लिए अपनी थाली में आधा खाना बचा लिया था|" नेहा एकदम भोली सी आवाज में बोली, उसकी बात सुन माँ और संगीता मुस्कुराने लगे| दरअसल मेरी बिटिया जानती थी की मैं सफर में उलटी आने के डर से बहुत थोड़ा खाना खाता हूँ इसीलिए उसने मेरे लिए खाना बचाया था| "बेटा जी, मैंने भी आधा ही खाना खाया था क्योंकि मैं जानता था की आपने मेरे लिए खाना बचाया होगा|" मैंने नेहा के सर को चूमते हुए कहा|
खाना खा कर अब सोने का समय था, माँ तो घर के भीतर सोने चली गईं और बाहर बस मैं, संगीता तथा नेहा रह गए| चूँकि अब हम बस तीनों ही बचे थे तो मैंने सोचा की मुझे अपनी बेटी से माफ़ी माँग कर अपना प्रायश्चित कर लेना चाहीये| मैं चारपाई पर बैठा था, मैंने नेहा को अपने पास बुलाया और उसके दोनों कँधे पकड़ कर नेहा की आँखों में देखते हुए बोला;
मैं: बेटा...मुझे आपसे माफ़ी माँगनी है! म...मेरे हाथों आपके...प...पापा....का खून हो गया! मैं...I didn't have a choice!
किसे पता था की अपनी ही बेटी से माफ़ी माँगने में इतनी ताक़त लगती है?! असल में ये मेरे भीतर मौजूद ग्लानि थी जो की मुझे अपनी ही बेटी के गुस्सा होने का डर दिखा कर डरा रही थी, जबकि मुझे डरने की कोई जर्रूरत थी नहीं क्योंकि मेरी बेटी बहुत समझदार थी, इतनी समझदारी की मैंने उससे कभी उम्मीद भी नहीं की थी!
नेहा ने मेरे चेहरे को अपने छोटे हाथों से पकड़ा और मेरी आँखों में देखते हुए बड़े गर्व से बोली;
नेहा: मेरे पापा तो आप हो! उस आदमी ने न मुझे कभी बेटी कहा न मैंने उसे कभी पापा!
जिस गर्व से नेहा ने मुझे अपना पापा कहा था उसे सुन मेरा दिल भर आया था| अपनी बेटी से इस प्यार की शायद मैंने उम्मीद नहीं की थी! खैर, नेहा की बात अभी खत्म नहीं हुई थी;
नेहा: मेरे लिए तो आप ही मेरे पापा हो और आपको मुझसे माफ़ी माँगने की कोई जर्रूरत नहीं! मैं जानती हूँ की आपके पास कोई और विकल्प नहीं था वरना आप कभी अपने हाथ गंदे नहीं करते| मुझे दुःख हुआ तो बस आपके जख्मी होने का, मैं बहुत डर गई थी की अगर आपको कुछ हो गया तो मैं क्या करुँगी? इसीलिए मैं इतना रोइ थी और जब आपका आज सुबह फ़ोन नहीं मिला तो मैं खेत में बने मंदिर में प्रार्थना करने चली गई| आपने मुझे सिखाया था की जब कोई रास्ता न सूझे तो भगवान जी से मदद माँगो, मैंने भी वही किया और आप देखो भगवान जी ने आपकी रक्षा की और आपको सही सलामत मेरे सामने ले आये|
नेहा बड़े प्यार से मुझे समझाते हुए बोली| उसकी बातों को सुनकर मैं हैरान था, एक तो मेरे अनुसार नेहा को इस काण्ड के बारे में कुछ पता नहीं होना चाहिए था, लेकिन उसे तो सारी बात पता थी! दूसरी बात ये की, उसे चन्दर की मौत का सुन कर ज़रा भी धक्का नहीं लगा था, उसे चिंता थी तो बस मेरी. अपने पापा जी की! शायद मैंने अपनी बेटी के प्यार को कम आँका था!
मैं: I'm so proud of you my बच्चा!
मैंने नेहा को अपने गले लगाते हुए कहा| आज मुझे मेरी बच्ची पर बहुत गर्व हो रहा था, इतना गर्व की मेरा ये सीना फूल कर कुप्पा हो गया था!
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