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Hindi Antarvasna एक अनोखा बंधन - पुन: प्रारंभ


[color=rgb(255,]तीसवाँ अध्याय: नियति का खेल[/color]
[color=rgb(235,]भाग - 8[/color]


[color=rgb(128,]अब तक आपने पढ़ा:[/color]

मैं: अच्छा अब आप मेरे साले साहब के कान छोड़ भी दो, देखो बेचारा कितना डर गया है?!

मैंने संगीता को मस्का लगाने के लिए इस तरह प्यार से बात की थी| संगीता ने मेरी बात सुन कर अनिल का कान छोड़ दिया| तभी चरण काका गाँव के मुखिया जी की गाडी में आ गए;

भाईसाहब: अम्मा, देखो मुखिया जी और चरण काका आई गए, तू दुनो जन उनका साथे घर निकर जाओ|

भाईसाहब ने सासु माँ को प्यार से समझाते हुए कहा तथा उन्हें मुखिया जी की गाडी में बिठा आये| सासु माँ, संगीता और चरण काका की गाडी घर जाने के लिए पहले निकली, उनके पीछे-पीछे हमारी गाडी हरिद्वार के लिए निकली|

[color=rgb(51,]अब आगे:[/color]

मुझे
लम्बी यात्रा करने का शौक नहीं है, मैं चाहता हूँ की यात्रा आरामदायक व् छोटी हो| अस्पताल से हरिद्वार की दूरी यही कोई 13 घंटे की थी और ये बात मुझे अब जा कर पता चली थी! इतनी बड़ी यात्रा वो भी बैठे-बैठे तथा शारीरिक कष्ट को चुप-चाप सहते हुए करना ही मेरे लिए एक चुनौती थी| खैर, रात के नौ बजे मैंने driver साहब से कह कर गाडी रुकवाई ताकि सब लोग खाना खा सकें, ठीक तभी संगीता का फ़ोन आया| मेरे पास संगीता का फ़ोन था और उसके पास मेरा फ़ोन था इसीलिए हमारी बात हो पा रही थी;

मैं: घर पहुँच गए?

संगीता: हाँ जी अभी पहुँची| आप कैसे हो? दर्द तो नहीं हो रहा कँधे में? आपने कुछ खाया? दवाई ली थी?

संगीता ने एक-एक कर अपने सारे सवाल पूछ डाले| सही भी था, उस बेचारी को मेरे स्वास्थ्य की चिंता थी|

मैं: जान, मैं ठीक हूँ| अभी मैंने गाडी रुकवाई है ताकि सब कुछ खाना खा लें| तुम अब घर पहुँच गई हो तो जा कर खाना खाओ और माँ (मेरी सासु माँ) को भी खाना खिलाओ वरना मैं आपसे बात नहीं करूँगा|

मैंने संगीता से अपनी तबियत के बारे में झूठ बोला था| दरअसल इस एक-डेढ़ घंटे की यात्रा में ही मुझ पर थकावट जोर मारने लगी थी, ऊपर से मेरे बाएँ कँधे का दर्द भी बढ़ गया था|

संगीता: आप न मुझे कुछ ज्यादा ही blackmail कर रहे हो, वापस आओ फिर बताती हूँ मैं!

संगीता की नाक पर बैठा वो प्यारा सा गुस्सा बोल उठा और मैं अपनी पत्नी के इस प्यारभरे गुस्से पर मुस्कुराने लगा| पति-पत्नी के बीच ये प्यारी सी कहा-सुनी का रस अलग हो होता है|

बहरहाल, संगीता मेरी बात मान कर खाना खाने चली गई थी और इधर मैं taxi में अकेला बैठा अपने पाँव पसार कर लेट गया था| अनिल, भाईसाहब और driver साहब खाना खाने बैठ गए थे तथा मेरे बहुत मना करने पर मुझे भी अपने साथ खाना खाने के लिए बुला लिया था| भाईसाहब का मान रखते हुए मैंने अपने लिए आधी प्लेट दाल-चावल मँगाए क्योंकि मैं अस्पताल से ही खाना खा कर निकला था|

उधर संगीता के मायके में आज हुए हत्याकांड से जो कोहराम मचा था उसके बारे में मुझे कोई जानकारी नहीं थी| जब तक संगीता और सासु माँ घर पहुँचे तब तक संगीता की दोनों बहनों के ससुराल वाले अपने-अपने घर लौट चुके थे| शगुन और जानकी के ससुराल वाले निहायती लालची थे तथा ससुर जी की मृत्यु का फायदा उठाने के चक्कर में थे|

वहीं मेरी बात मानते हुए संगीता और सासु माँ ने खाना खा लिया था, सासु माँ चूँकि बहुत थक गई थीं इसलिए वो तुरंत ही सोने चली गईं| वहीं संगीता को मेरी चिंता थी इसलिए वो मुझे पुनः फ़ोन करने लगी लेकिन मेरा फ़ोन व्यस्त था क्योंकि मैं इस वक़्त अपने दोनों बच्चों से बात करने में व्यस्त था| मेरे खाना खाते हुए ही बच्चों का फ़ोन आ गया, पिताजी सब को ले कर railway station पहुँच चुके थे जबकि train आने में अभी एक घंटा बाकी था| बच्चों को मेरे बिना चैन नहीं मिल रहा था इसलिए दोनों बच्चे मुझसे फ़ोन पर बात करने लग पड़े| नेहा को मेरी तबियत की चिंता थी इसलिए उसके सभी सवाल मेरे स्वास्थ्य से जुड़े थे| जबकि आयुष का ध्यान मेरे खाने-पीने पर था इसलिए वो मुझसे पूछ रहा था की मैंने क्या-क्या खाया?!

मैं: बेटा, यहाँ अस्पताल में pizza-chowmein खाने को नहीं मिलती! यहाँ तो सादा घर जैसा खाना दिया जाता है|

मेरी बात सुन आयुष अपने उत्साह में बोला;

आयुष: पापा जी, मैं आपके लिए है न सुबह-सुबह चाऊमीन ले कर आऊँगा! आप और मैं वही नाश्ता करेंगे!

मेरा फ़ोन स्पीकर पर था इसलिए पास बैठे भाईसाहब और अनिल, आयुष की बचकानी बात सुन मुस्कुराने लगे| तभी नेहा ने आयुष की पीठ पर थपकी मारी और उसे डाँट लगाई;

नेहा: चुप कर! तुझे तो बस चाऊमीन खाने का बहाना चाहिए! पता भी है की जिनकी तबियत ठीक नहीं होती उन्हें सादा खाना इसलिए खिलाया जाता है ताकि कहीं पेट न खराब हो जाए|

नेहा बहुत समझदार थी और उसकी समझदारी उसकी बातों से झलकती थी| आयुष को डाँटने के बाद नेहा मुझे समझाते हुए बोली;

नेहा: पापा जी, आप इसकी (आयुष की) बात मत सुनो! इसे कुछ समझ तो है नहीं, आप सादा खाना ही खाना| मैं कल सुबह आ कर आपको अपने हाथ से खाना खिलाऊँगी|

नेहा कभी-कभी मेरी माँ की तरह बात करती थी और उसके इस बचपने पर मुझे बहुत प्यार आता था|

मैं: ठीक है मम्मी जी!

मैंने मजाकिया ढंग में नेहा को मम्मी कहा तो वो जोर से हँस पड़ी! तभी आयुष ने अपनी दीदी के हाथ से फ़ोन खींच लिया और दूसरी तरफ मुँह कर खुसफुसा कर मुझसे बोला;

आयुष: पापा जी, मैं आपके लिए चुपके से चाऊमीन लाऊँगा और हम दोनों छुप कर खा लेंगे!

आयुष का बचपना सुन मैं मुस्कुराया और बोला;

मैं: बेटा जी, अगर आपकी दीदी ने देख लिया न तो मैं तो फिर भी बच जाऊँगा क्योंकि मैं बड़ा हूँ लेकिन आपको आपकी दीदी से बहुत मार पड़ेगी!

मेरी बात सुन आयुष फट से बोला;

आयुष: दीदी मुझे पकड़ ही नहीं पाएगी तो मुझे मारेंगी कैसे?

आयुष कुटिल मुस्कान लिए हुए बोला|

हम बाप-बेटा खुसफुसा कर बात कर रहे थे इसलिए नेहा की दिलचस्पी बढ़ गई:

नेहा: क्या खुसुर-फुसर हो रही है?

नेहा किसी मास्टरनी की तरह बोली तो आयुष किसी सकपकाए विद्यार्थी की तरह बोला:

आयुष कु...कुछ नहीं दीदी!

नेहा को शक हुआ तो उसने आयुष के हाथ से फ़ोन ले लिया और मुझसे पूछने लगी की हम बाप-बेटे क्या बात कर रहे थे, तो मैंने आयुष का बचाव करते हुए कहा;

मैं: बेटा, आयुष कह रहा था की वो आपसे तेज़ दौड़ता है और आप उसे पकड़ नहीं सकते|

मेरी बात सुन नेहा एकदम से अकड़ते हुए आयुष से बोली;

नेहा: अच्छा बच्चू?! गाँव चल फिर तुझे तेज़ दौड़कर दिखाती हूँ! न तेरे कान पकड़ कर पापा जी के पास लाई तो कहिओ!

नेहा बड़े ताव में बोली थी जिसे देख आयुष खी-खी कर हँसने लगा था| बच्चों से हुई थोड़ी सी हँसी-मज़ाक से भरी बातों ने मुझे मेरी पीड़ा भुला दी थी|

बच्चों के बाद मेरी माँ ने मुझसे बात की, माँ से बात करते समय मैं इस बात का पूरा ख्याल रख रहा था की माँ को पता न चले की मैं इस वक़्त अस्पताल में नहीं हूँ| साथ ही मैं ये ध्यान रख रहा था की मैं माँ से कोई झूठ न बोलूं, इसलिए मैं माँ के सवालों का जवाब गोल-मोल देने लगा| मुझसे बात करने के बाद माँ ने संगीता से बात करने की इच्छा जाहिर की;

मैं: माँ वो (संगीता) घर पर है, दरअसल अस्पताल में ठहरने की कोई व्यवस्था नहीं थी इसलिए मैंने जबरदस्ती संगीता को घर भेज दिया|

मैं माँ से झूठ नहीं बोलना चाहता था इसलिए में बड़ी चपलता से माँ के सवाल का जवाब गोलमोल कर दिया था| मैंने उन्हीं संगीता के अस्पताल में न रुकने की बात सच्ची ही कही थी और अपने अस्पताल में न होने की बात गोल कर दी थी| अगर माँ को पता चल जाता की मैं इस वक़्त taxi में बैठा हूँ और हरिद्वार जा रहा हूँ तो वो मुझे इतना डाँटती की मेरी ऐसी-तैसी हो जाती! माँ से बात कर मैंने पिताजी से भी बात की मगर उनसे बात बहुत थोड़ी हुई क्योंकि तबतक माँ-पिताजी की train आ चुकी थी और पिताजी को समान तथा बच्चों को अकेले सँभालना था|

माँ-पिताजी से बात कर मैंने फ़ोन रखा ही था की संगीता का फ़ोन आ गया तथा मैंने उसे माँ से अपने द्वारा बोले गए झूठ के बारे में बताया|

संगीता: कल जब माँ-पिताजी यहाँ पहुँचेंगे और उन्हें सच पता चलेगा की आप हरिद्वार गए हो तो वो बहुत गुस्सा करेंगे!

संगीता चिंतित होते हुए बोली|

मैं: जान, हरिद्वार जाने की जिद्द मैंने की थी इसलिए उनकी डाँट भी मैं ही खाऊँगा| तुम्हें बस उन्हें सच बताना है की कैसे मैंने किसी की बात नहीं मानी और हरिद्वार जाने की जिद्द पकड़ ली थी|

मेरी बात सुन संगीता बोली;

संगीता: ऐसे कैसे आपको डाँट सुनने दूँ?! मैं माँ-पिताजी को आपके दिल की बात समझाऊँगी और उन्हें आपको डाँटने नहीं दूँगी|

संगीता कभी-कभी बच्चों जैसी बातें करती थी, इस समय उसे लगता था की उसके समझाने से माँ-पिताजी मान जाएंगे तथा मुझे नहीं डाटेंगे| मैंने संगीता को कुछ नहीं कहा तथा उसे उसकी इस खुशफैमी में रहने दिया|

बहरहाल, रात बहुत हो गई थी और संगीता को आराम करना चाहिए था मगर वो मेरे साथ सारी रात जाग कर बात करना चाहती थी| दरअसल उसे मेरी चिंता थी की कहीं मेरी रात में तबियत खराब न हो जाए इसीलिए अपने मन की तसल्ली के लिए संगीता मुझसे बातें करना चाहती थी| मैंने संगीता को बहुत समझाया की वो सो जाए मगर वो नहीं मानी इसलिए मुझे मजबूरन नींद आने का बहाना करना पड़ा तब जा कर संगीता मानी|

संगीता तो सो गई मगर मेरे लिए ये taxi की यात्रा बड़ी कष्टदाई थी| मुझसे न ठीक से बैठा जा रहा था और न ही मैं ठीक से लेट सकता था| ऊपर से मेरे बाएँ कँधे में दर्द बढ़ गया था, तथा मुझे थोड़ा बुखार भी चढ़ गया था| मैं अपना दर्द चुप-चाप सह रहा था क्योंकि अगर मेरी इस हालत के बारे में भाईसाहब और अनिल को पता चलता तो वो गाडी घर की ओर घुमा देते! अपने दर्द को काबू में करने के लिए मैंने एक painkiller ले ली, कुछ देर बाद जब गोली का असर हुआ तो दर्द थोड़ा कम हुआ|

रात का सन्नाटा था और अनिल बैठे-बैठे ही सो चूका था, वहीं भाईसाहब की भी आगे बैठे हुए आँख लग चुकी थी| गाडी में बस एक driver साहब और मैं ही जगे हुए थे, driver साहब गाडी चलाने में ध्यान दे रहे थे तथा मेरा मन इस वक़्त अंदर से व्यकुल हो रहा था| शरीरिक पीड़ा तो पहले से ही परेशान कर रही थी अब तो मानसिक पीड़ा भी शुरू हो चुकी थी| मेरे कँधे में हो रहा दर्द को मेरे मन ने मेरा प्रायश्चित का नाम दे दिया; 'ये दर्द उस दर्द के आगे कुछ नहीं जो इस वक़्त तेरी बड़की अम्मा सह रही होंगी! तुझे तो मामूली सा दर्द हो रहा है जबकि बड़की अम्मा ने तो अपना बेटा खोया है! इस दर्द को अपना प्रायश्चित समझ और चुपचाप अपना ये दर्द सहता जा!' मेरा मन मुझे धिक्कारते हुए बोला| जब मन धिक्कारता है तो बहुत ग्लानि होती है, वही ग्लानि महसूस कर मेरी आँखों से आँसूँ बह निकले| मुझे पश्चाताप हो रहा था, चन्दर को मारने का नहीं बल्कि अपनी बड़की अम्मा को एक असहनीय दुःख देने का! आजतक मैंने कोई ऐसा काम नहीं किया था जिससे मेरी गर्दन किसी के आगे शर्म के मारे झुक जाए मगर आज मुझे इतनी ग्लानि हो रही थी की मैं अब कभी भी अपनी बड़की अम्मा से नजरें नहीं मिला पाऊँगा! अपनी इसी ग्लानि में डूबे हुए मैंने पूरी रात जागते हुए पार की|

उधर गाँव में दरोगा, SP साहब का दिया हुआ हुक्म बजा रहा था| बहुत छानबीन करने के बाद उसने उस आदमी को धर लिया जिसने चन्दर को कट्टा बेचा था| उस आदमी का नाम कलुआ था और वो खून होने की खबर सुन कर नेपाल भागने की फिराक में था| रात 12 बजे थे जब दरोगा साहब ने उसे बॉर्डर पर धर लिया! पुलिस थाने ला कर दरोगा साहब ने कलुआ के दो डंडे धरे और वो तोते की तरह सब बकने लगा; "हमहि ऊ आदमी (चन्दर) का 5,000/- लेइ के कट्टा बेचन रहन! ऊ कहत रहा की आपन भाई का जान से मारे वाला है!" दरोगा साहब ने कलुआ का ब्यान दर्ज़ किया लिया तथा SP साहब से शबाशी पाने के लिए सुबह होने का इंतज़ार करने लगे|

अगली सुबह सात बजे माँ-पिताजी और बच्चे लखनऊ railway station पहुँच चुके थे| स्टेशन पहुँचते ही माँ ने मुझे फ़ोन किया और अस्पताल का पता पुछा ताकि वो सीधा मुझसे मिलने आ सकें;

माँ: बेटा हम लखनऊ पहुँच गए हैं, अब यहाँ से तेरे पास अस्पताल कैसे आयें?

मैं: माँ, मैं अस्पताल में नहीं हूँ! आप सब संगीता के मायके पहुँचिये, मैं आपसे वहीं मिलूँगा!

देखा जाए तो मैंने माँ से कोई झूठ नहीं बोला था, हाँ बस बात गोल घुमाई थी! मैं अस्पताल में तो था ही नहीं, मेरी भेंट तो सबसे सीधा मेरे ससुराल यानी संगीता के मायके में ही होनी थी| हाँ अपने हरिद्वार जाने की बात मैं गोल कर गया था| माँ आगे कुछ पूछें उससे पहले ही मैंने फ़ोन के network खराब होने का नाटक किया और फ़ोन रख दिया| माँ-पिताजी और बच्चों को घर पहुँचने में लगभग 3 घंटे लगते और उसके बाद माँ द्वारा मेरी क्लास लगनी तय थी!

खैर, मेरी क्लास जब लगती, तब लगती! फिलहाल तो हम हरिद्वार पहुँच चुके थे, घडी में बजे थे 9 और धुप निकल आई थी| मेरे कपड़े बहुत गंदे थे, उन में मेरा और चन्दर का खून लगा था इसलिए मैंने अनिल को कुछ पैसे दिए और अपने लिए दो जोड़ी कुर्ता-पजामा लाने को कहा| एक जोड़ी कुर्ता-पजामा मैंने गाडी में ही पहन लिया तथा मुँह-हाथ धो कर सीधा गँगा जी में डुबकी लगा दी! ठंडे पानी का स्पर्श जैसे ही मेरे गर्म शरीर पर हुआ तो मैं जड़ तक काँप गया मगर ठंडे पानी की परवाज किये बिना मैं अपना प्रायश्चित करने में लग गया|

पहली डुबकी लगाते ही मुझे उस दिन का सारा काण्ड किसी flashback की तरह मेरी आँखों के सामने याद आ गया| "माँ, मैंने एक जानवर की हत्या कर अपने परिवार की रक्षा की है और मुझे इसका नेश मात्र भी गिला नहीं है! गिला है तो बस इस बात का की मैंने अपने बड़की अम्मा की गोद उजाड़ दी! मेरे द्वारा किये इस पाप की आप मुझे जो भी सजा देंगी मैं स्वीकार कर लूँगा, लेकिन मेरे परिवार को मेरे किये पाप की कोई सजा न दीजियेगा!" मैं गँगा मैया से विनती करते हुए बोला|

दूसरी डुबकी लगाते हुए मैं, गँगा मैया से प्रार्थना करने लगा; "माँ, मुझे ताक़त दीजियेगा की मैं एक माँ को उसके बेटे से जुदा करने के लिए, उस माँ से (बड़की अम्मा से) माफ़ी माँग सकूँ! मेरी बड़की अम्मा जो मुझे अपने बेटे की तरह प्यार करती हैं उनके मन में मेरे प्रति नफरत पैदा न होने देना माँ|" गँगा जी में डुबकी लगाने से मेरे पाप भले ही धूल जाते मगर मेरा प्रायश्चित तभी पूर्ण होता जब मैं बड़की अम्मा से माफ़ी माँग लेता और बड़की अम्मा से माफ़ी माँगना इतना आसान नहीं था! मुझे देख कहीं उनके मन में नफरत न पैदा हो बस इसी बात का डर मुझे घेरे हुए था|

तीसरी डुबकी लगा कर मैं अपनी माँ के लिए प्रार्थना करने लगा; "माँ, मेरी माँ मुझे सबसे ज्यादा प्यार करती हैं, मैंने जो पाप किया है उसका बुरा असर मेरे और माँ के रिश्ते पर कभी न पड़े, मेरी माँ मुझे गलत न समझे, मुझे पापी न समझे! मेरी माँ सदैव खुश रहे, तंदुरुस्त रहे तथा हमारा माँ-बेटे का रिश्ता ताउम्र बना रहे| मेरी भी उम्र आप मेरी माँ को देना माँ, उन्हें तनिक भी कष्ट न होने देना माँ|" मैंने एक माँ-बेटे (बड़की अम्मा और चन्दर) का रिश्ता तोडा था और मुझे ये डर था की कहीं मेरे किये इस पाप की सजा के रूम में मेरा और मेरी माँ का रिश्ता न टूट जाए, इसीलिए मैंने ये प्रार्थना की थी|

चौथी डुबकी लगा मैं अपने पिताजी के लिए प्रार्थना करने लगा; "माँ, मेरे पिताजी का उनके भाई-भाभी से अटूट रिश्ता है, मेरे किये इस पाप के कारण उनका ये रिश्ता न टूटने देना| मेरे पिताजी मुझे खुनी न समझें, उनके सर मेरे कारण कभी शर्म से झुकने न देना माँ|" मुझे नहीं मालूम था की बड़के दादा ने चन्दर की मौत पर क्या प्रतिक्रिया दी है इसलिए मैं ये प्रार्थना कर रहा था की मेरे पिताजी और उनके भाई-भाभी का ये रिश्ता कभी न टूटे| मेरी ये खुशफैमी की हमारा पूरा परिवार फिर एक हो जायगा बरकरार थी और मैं इसी खुशफैमी में जीना चाहता था|

पाँचवी डुबकी लगा कर गँगा माँ से प्रार्थना करते हुए बोला; "माँ, मेरी पत्नी संगीता और मेरे होने वाले बच्चे की रक्षा करना, मेरे पाप का बुरा साया कभी मेरी पत्नी और मेरे होने वाले बच्चे पर न पड़े|" ये मेरी गँगा जी आ कर पाप धोने की सबसे बड़ी वजह थी, मैं अपने होने वाले बच्चे पर अपने पापों का बुरा साया नहीं पड़ने देना चाहता था| अपने बेटे को मैं अपने सभी सद्गुण देना चाहता था और अपने दुर्गुणों को मैं अपने बच्चे से कोसों दूर रखना चाहता था|

छठी डुबकी लगाते समय मुझे मेरी बिटिया नेहा की याद आई| भले ही मेरी बेटी ने कभी चन्दर को अपना बाप नहीं माना मगर खून के रिश्ते से तो चन्दर ही नेहा का बाप था| चन्दर की जान ले कर मैं नेहा का भी दोषी बन गया था और मुझे नेहा से भी माफ़ी माँगनी थी| "माँ, मेरी फूल सी बच्ची नेहा को सदैव खुश रखना और मुझे हिम्मत देना की मैं उसके सामने अपने किये पाप का स्वीकार कर सकूँ तथा उससे माफ़ी माँग सकूँ|" एक बात की माफ़ी मुझे अपनी बच्ची से और माँगनी थी, अपनी बच्ची को इतना रुलाने की माफ़ी!

सातवीं डुबकी मैंने आयुष के लिए लगाई, मेरा प्यारा बेटा जो सारे घर को अपने भोलेपन और मुस्कान से कभी मायूस नहीं होने देता था| अपनी भोली बातों से वो सभी का मन मोह लेता था, वो भी मेरे कारण बहुत उदास हो गया था| "माँ, मेरा बेटा आयुष, बड़ा भोला और चंचल स्वभाव का है| वो मुझसे 5 साल दूर रहा है मगर उसमें मुझे मेरा अक्स नज़र आता है, मैं नहीं चाहता की मेरे किये इस बुरे कर्म का कोई भी दुष्प्रभाव मेरे बेटे पर पड़े| मेरी आपसे बस इतनी ही विनती है की मेरा बेटा आयुष सदाचारी बने, उसे सद्गुण मिले और वो हमेशा इसी तरह से खिलखिला कर हँसता -मुस्कुराता रहे|"

इस तरह मैंने सात डुबकी लगाई और अब जा कर मेरा मन हल्का होने लगा था| गँगा जी के पवित्र जल ने मेरे मन-मस्तिष्क पर से चन्दर की हत्या करने का बोझ उतार दिया था| उस पावन जल में खड़े हो कर मुझे ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो मेरे द्वारा किया गया पाप मेरे शरीर से निकल कर बहता हुआ गँगा जी में मिलता जा रहा हो|

खैर, अपने पाप धो कर मैं बाहर आया और उन्हीं गीले कपड़ों में अपने ससुर जी के अस्थि विसर्जन की पूजा में बैठने लगा|

भाईसाहब: मानु, कपडे बदल लो नहीं तो गीले कपड़ों के कारण ठंड लग जायेगी|

भाईसाहब मुझे समझाते हुए बोले, परन्तु मेरे कारण पहले ही अस्थि विसर्जन की पूजा में इतनी देर हो रही थी इसलिए मैंने और देर करना सही नहीं समझा;

मैं: कुछ नहीं होगा भाईसाहब, पूजा समाप्त होने के बाद अभी फिर से डुबकी लगानी है| तब ही कपड़े बदल लूँगा|

मैंने भाईसाहब की बात को हलके में लेते हुए कहा|

आखिर पूजा शुरू हुई और सभी जर्रूरी रस्में मैंने, भाईसाहब तथा अनिल ने मिल कर निभाईं| पूजा समाप्त होने पर हम तीनों ने गँगा जी में डुबकी लगानी थी| भाईसाहब और मुझे तो आदत थी गँगा जी में डुबकी लगाने की क्योंकि हम दोनों ही कभी न कभी हरिद्वार आये थे मगर अनिल का ये पहला मौका था तथा वो पानी में जाने से घबरा रहा था| भाईसाहब तो सबसे पहले डुबकी लगा आये, अब रह गए हम दोनों जीजा-साले तो हम दोनों साथ-साथ सीढ़ी उतरे| आखरी सीढ़ी पर पहुँच अनिल मुझसे बोला; "जीजू, मेरा हाथ पकड़ लेना, मैं आज पहली बार डुबकी लगा रहा हूँ|" अनिल की बात सुन मैं मुस्कुराया और उसे समझाते हुए बोला; "देख बेटा, ज्यादा गहराई में मत जाइयो| मेरे साथ रहिओ और अपनी नाक पकड़ कर फटाफट डुबकी लगाइयो, ज्यादा देर पानी में रहेगा तो बह जायेगा|" मेरी पानी में बह जाने की बात सुन अनिल की हवा टाइट हो गई थी, मैंने उसे हिम्मत बँधाई और हम दोनों जीजा-साले पानी में उतर गए| अनिल मेरी बाईं तरफ था, हम दोनों ने एक साथ डुबकी लगाई पर चूँकि अनिल का यूँ डुबकी लगाना पहलीबार था इसलिए वो पानी में साँस रोक कर एक क्षण रुक गया था जिस करण वो गँगा जी में बहने लगा| मैंने फूर्ति दिखाते हुए एकदम से उसका हाथ थाम लिया और उसे बहने नहीं दिया| इस कुछ पल के बहने के कारण अनिल बेचारा बहुत घबरा गया था, मैंने जैसे तैसे उसे हिम्मत बँधाई तथा उसका हाथ पकड़ कर ही पुनः डुबकी लगाई|

डुबकी लगा कर जब हम दोनों जीजा-साले बाहर निकले तो अनिल ने अपने लगभग बह जाने की बात भाईसाहब को बताई; "घबरा मत अनिल और अपने डर का सामना करना सीख| तेरी जिंदगी में अभी बहुत से मौके आएंगे जहाँ तुझे नए खतरों से जूझना होगा, हो सकता है तब मानु या मैं वहाँ न हो तब तुझे उन खतरों का सामना अपनी सूझ-बूझ और निडर बन कर करना है|" भाईसाहब अपने छोटे भाई को सीख देते हुए बोले| अनिल को समझा कर भाईसाहब मेरे गले लगे और एकदम से भावुक हो कर बोले; "मानु, मुझे माफ़ कर दे! अगर उस दिन (जब श्मशान से लौटते समय जब चन्दर हमें मिला था) मैंने उस हरामजादे चन्दर का टेटुआ खुद दबा दिया होता तो तुझे ये जख्म न मिलता|" भाईसाहब के जज्बात मैं समझता था इसलिए मैं उन्हें समझाते हुए बोला; "भाईसाहब, चन्दर से बैर मेरा था| आपके हाथों उसका खून होता तो खामखा आप और आपके परिवार पर दाग लग जाता| उसने मेरी पत्नी को जान से मारने की कोशिश की, मेरे बच्चे को जान से मारना चाहा तो उसको सजा मेरे हाथों मिलना ही सही था|" मैंने भाईसाहब को ग्लानि के गड्ढे में गिरने से बचा लिया था| इस वक़्त भाईसाहब एक स्तम्भ की तरह थे जिस पर मेरी सासु माँ तथा अनिल का जीवन आश्रित था| उनके यूँ ग्लानि में डूब कर डगमगाने से सारा कुनबा टूट सकता था, इसलिए मैंने अपनी बातों से भाईसाहब को ग्लानि महसूस करने से रोक लिया था|

बहरहाल, पूजा संपन्न हो चुकी थी और पंडित जी अपनी दक्षिणा की राह देख रहे थे| "चलिए भाईसाहब, पंडित जी अपनी दक्षिणा की राह ताक रहे हैं|" मैंने बात घुमाते हुए मुस्कुरा कर भाईसाहब से कहा| हम तीनों पंडित जी के पास पहुँचे तथा उनसे दक्षिणा पूछी, पंडित जी ने अपनी दक्षिणा बहुत अधिक माँगी, जिस पर हम तीनों ने मिलकर उनसे काफी भाव-ताव किया| आज जिंदगी में पहलीबार मैं एक पंडित जी से भावताव कर रहा था और मुझे ये हास्यास्पद लग रहा था| "देखिये पंडित जी, हम कोई अमीर बाप के बेटे नहीं हैं जिनसे आप इतनी दक्षिणा माँग रहे हैं| जितनी हमारी क्षमता है हम आपको उतनी दक्षिणा ही दे रहे हैं| कृपया हमारी विनती स्वीकारें और हमें आशीर्वाद दें|" मैंने पंडित जी के आगे हाथ जोड़ते हुए कहा तथा अपने दोनों हाथों से उन्हें सादर प्रेम सहित 3,001/- रुपये दिए| मेरा आदरभाव देख पंडित जी कुछ कह न पाये और उन्होंने मुस्कुराकर पैसे स्वीकार लिए|

"जीजू, आप कैसे सबका मन मोह लेते हो?!" अनिल मुस्कुराते हुए बोला| अभी मैंने जिस तरह प्यार से बात कर पंडित जी को दक्षिणा के लिए मनाया था उसी को ले कर अनिल मुझसे सवाल पूछ रहा था| "बेटा, हमने पूजा शुरू होने से पहले ही दक्षिणा के बारे में पुछा था न, तो पंडित जी ने कहा था की आप अपनी श्रद्धा अनुसार दीजियेगा| मैंने बस उन्हीं की कही बात को प्यार से उनके सामने प्रसूत किया| पंडित जी ने ये सोच कर मेरी बात मानी की हम तीन आदमी हैं और पूजा संपन्न हो चुकी है इसलिए अब हम चाहें तो बिना पैसे दिए भी जा सकते हैं इसलिए उन्होंने भागते भूत की लंगोटी भली सोच कर ही अपनी दक्षिणा स्वीकार कर ली| कहीं अगर तू अकेला आया होता तो बेटा तुझे तो वो धो कर निचोड़ लेते!" मेरी अंतिम कही बात सुन अनिल हँस पड़ा| "सीख अपने जीजू से कुछ!" भाईसाहब मुस्कुराते हुए अनिल से बोले भाईसाहब को मेरी ये होशियारी-समझदारी अच्छी लगी थी|

गँगा जी में डुबकी लगाने से मेरी पट्टी भीग गई थी इसलिए सबसे पहले हमने पास ही के अस्पताल से मेरी दुबारा पट्टी करवाई| फिर मैंने संगीता को फ़ोन कर सारी बातें बताई, मैंने उसे पूरी तरह से आश्वस्त कर दिया की मैं स्वस्थ-तंदुरुस्त हूँ तब जा कर मेरी पत्नी के दिल को चैन मिला| संगीता अब मेरी ओर से निश्चिंत हो गई थी, उसे चिंता थी तो माँ-पिताजी का सामना करने की| माँ-पिताजी को जैसे ही पता चलता की मैं कल रात ही अस्पताल से हरिद्वार जाने के लिए निकल चूका हूँ तो वो बहुत गुस्सा होते, संगीता तो फिर भी बच जाती क्योंकि माँ-पिताजी मेरे जिद्द करने की आदत को अच्छे से जानते थे इसलिए मेरी बैंड बजना तय था|

संगीता से बात कर मैंने अनिल ओर भाईसाहब के साथ बैठ कर नाश्ता किया तथा अपनी दवाई ली| घडी में बजे थे साढ़े ग्यारह और हम हरिद्वार से घर की ओर निकल रहे थे जब माँ का फ़ोन आया| माँ का फ़ोन देख मैं समझ गया था की वो सब घर पहुँच चुके हैं ओर अब मुझे जोरदार डाँट पड़ने वाली है!

माँ: मानु!!!!!!! तू मुझे बिना बताये हरिद्वार कैसे गया?! तेरी हिम्मत कैसे हुई मुझसे झूठ बोलने की? तेरे दिमाग में भूसा भरा है क्या जो तू इस जख्मी हालत में हरिद्वार गया?! अपनी जिद्द के आगे तुझे किसी का ख्याल नहीं आता न?

माँ बड़ी जोर से मुझ पर चिल्लाते हुए बोलीं| दो बच्चों का बाप था मगर माँ की डाँट सुन कर मेरी फट कर चार हो गई थी!

मैं: माँ.....

मैंने माँ को समझाने के लिए मुँह खोला ही था की माँ ने मुझे फिर झाड़ दिया;

माँ: एकदम चुप! खबरदार जो एक भी शब्द तेरे मुँह से निकाला तो, मैं तेरी टांगें तोड़ दूँगी!

माँ की इस धमकी पर मुझे हँसी आ गई, कारण ये की मेरी माँ ने आज तक मुझे थप्पड़ नहीं मारा था तो मेरी टांगें क्या तोड़तीं?

माँ: कौन भरता है तेरे दिमाग में ये ऊल-जुलूल बातें बोल??! मैंने तुझे कुछ भी कहा या पुछा की तूने जो किया वो क्यों किया? मेरे लिए तूने जो किया वो सही किया और मुझे फक्र है तुझ पर की मेरा बेटा इतना बहादुर है|

माँ का कहने का मतलब था की मैंने चन्दर का खून किया, ये जानकार मेरी माँ ने मुझसे कोई सवाल-जवाब नहीं किया था| उनके लिए उनका बेटा ही सही था और उन्हें अपने बेटे पर गर्व था की उसने अपने परिवार के हित में ये कदम उठाया था|

माँ: जब मैंने तुझसे कुछ कहा नहीं तो ये पाप-पुण्य तेरे दिमाग में कहाँ से आया? कहाँ से सीखता है तू ये सब बातें?

माँ मुझे डाँटते हुए बोलीं| माँ मुझे आज भी वैसे ही डाँट रहीं थी जैसे मेरे बचपन में डाँटती थीं और ये सुख महसूस कर मेरे चेहरे पर डर की जगह मुस्कान आ गई थी|

मैं: माँ, आपका डाँटना हो गया तो मैं कुछ कहूँ?

मैंने बड़े प्यार से अपनी बात रखने की इज्जाजत माँ से माँगी|

माँ: हाँ बोल!

माँ का गुस्सा फुर्र हो चूका था मगर वो मुझे फिर भी अपना झूठा गुस्सा दिखा रहीं थीं ताकि कहीं मैं फिर से हवा में न उड़ने लगूँ|

मैं: माँ, आप जानते हो न की आपका लड़का कितना भावुक है?! मुझे चन्दर की जान लेना का कोई गिला नहीं है, मुझे रत्ती भर ऐसा नहीं लगा की मैंने कोई पाप किया है| मुझे दुःख हुआ तो इस बात का की मैंने अपनी बड़की अम्मा की गोद उजाड़ दी! बस इसी बात को सोच कर मेरा ज़मीर मुझे चैन से नहीं बैठने दे रहा था| मेरी अंतरात्मा कह रही थी की मेरे हाथों एक माँ-बेटे के रिश्ते को तोड़ने का पाप हुआ है| फिर एक डर ये भी था की मैं अपने इन खून से रंगे हाथों से किसी को स्पर्श नहीं करना चाहता था इसीलिए मैंने हरिद्वार जाने की जिद्द पकड़ी| सासु माँ ने, संगीता ने, अनिल ने, भाईसाहब ने यहाँ तक की SP साहब यानी भाईसाहब के साले साहब ने भी मुझे समझाया मगर मैं अपनी जिद्द पर बरकरार रहा|

मैं अपनी जिद्द को कतई जायज नहीं ठहरा रहा, मैं जानता हूँ की मेरी ये जिद्द मेरे लिए कितनी घातक साबित हो सकती थी! मैंने अपनी इस जिद्द से सबक ले लिया है और आगे से मैं कभी ऐसी कोई जिद्द नहीं करूँगा, अगर मैंने कभी जिद्द की न तो आप डंडे से मेरी पिटाई कर देना मैं कुछ भी नहीं कहूँगा|

मेरी बात सुन मेरी माँ को अस्पताल में मेरे मन में उठी उथल-पुथल समझ में आई तथा मेरी माँ का गुस्सा शांत हो गया और मेरी डंडे से पिटाई करने वाली बात पर माँ के चेहरे पर मुस्कान आ गई थी जो की मैं फ़ोन पर बात करने के कारण देख नहीं पाया था मगर मैंने अपनी माँ की मुस्कान को महसूस अवश्य कर लिया था|

मैं: वैसे माँ, आपका बेटा लाख जिद्दी सही मगर आपके बेटे ने कल रात से अभी तक आपसे कोई झूठ नहीं बोला|

मेरी बात सुन मेरी माँ को प्यारा सा गुस्सा आ गया;

माँ: अच्छा?

मैं: और क्या, आप याद करो की क्या मैंने कल रात से ले कर आज सुबह तक आपसे कभी ये कहा की मैं अस्पताल में हूँ?

मेरा सवाल सुन माँ की हँसी छूट गई और वो बोलीं;

माँ: अच्छा...मेरा बेटा बहुत तेज़ हो गया है! आज के बाद तुझसे सारी बात खुल कर ही पूछूँगी, वरना तू तो मुझे बेकूब (बेवकूफ) बना देगा!

माँ मुझे प्यार से ताना मरते हुए बोलीं|

इतने में मेरी बिटिया नेहा आ गई, दरअसल घर पहुँच कर जब माँ-पिताजी और बच्चों को ये पता चला की मैं हरिद्वार गया हूँ तो सभी परेशान हो गए थे| माँ-पिताजी के फ़ोन charge न होने के कारण बंद हो गए थे इसलिए उन्होंने मेरे नंबर से संगीता वाला नंबर जो की मेरे पास था उस पर कॉल करना शुरू कर दिया और तब तक चरण काका ने माँ-पिताजी के फ़ोन चार्ज करने की व्यवस्था कर दी| मैं उस वक़्त घर आने के लिए निकल चूका था और हमारी गाडी किसी ऐसी जगह पर थी जहाँ network नहीं मिल रहा था| मेरा नंबर नहीं मिलने से सब चिंतित थे मगर मेरी बेटी नेहा सबसे ज्यादा चिंतित थी| मेरी बच्ची घबरा गई थी और रोने लगी थी, जब उसे कुछ न सूझा तो वो खेतों में बने मंदिर में मेरे लिए प्रार्थना करने भाग गई| मेरे लिए प्रार्थना कर नेहा जैसे ही घर लौटी तो माँ ने ख़ुशी से उसे पुकारा;

माँ: मुन्नी, देख तेरे पापा का फ़ोन मिल गया|

इतना सुन्ना था की नेहा दौड़ती हुई माँ के पास आई, माँ ने नेहा को फ़ोन दिया तो नेहा एकदम से रोते हुए बोली;

नेहा: पापा जी.....पापा....आप मुझे बिना बताये...क्यों चले गए?

नेहा रोते हुए बोली|

मैं: मेरा बच्चा! मेरा प्यारा बच्चा, रोते नहीं बेटा! आप तो मेरा बहादुर बच्चा हो न?! आप रोओगे तो मुझ पर क्या बीतेगी?

मेरी बात सुन नेहा ने अपना रोना रोका और सिसकने लगी|

मैं: बेटा, आपके नाना जी की अस्थि विसर्जन की पूजा करनी जर्रूरी थी इसलिए मैंने हरिद्वार जाने की जिद्द पकड़ी और आपको मैंने ये बात इसलिए नहीं बताई क्योंकि आप मुझे हरिद्वार जाने थोड़े देते?!

मैंने नेहा से आधा सच कहा था, मैंने अपने पाप धोने की बात नेहा से छुपाई थी क्योंकि मेरी नज़र में नेहा को चन्दर की हत्या होने की बात नहीं पता थी| मैं घर लौट कर नेहा को खुद सब बात बता कर उससे माफ़ी माँगना चाहता था|

नेहा: प....पापा जी....आप कब घर...आओगे?

नेहा सिसकते हुए बोली|

मैं: बेटा जी, हम सब यहाँ से निकल चुके हैं और हमें घर पहुँचने में देर रात हो जाएगी, शायद 12-1 बज जाएँ| आप मेरी जरा भी चिंता मत करना और वहाँ अपनी नानी जी, अपने दादा-दादी जी और आयुष का ध्यान रखना| ठीक है बेटा?!

मैंने नेहा को प्यार से समझा कर आश्वस्त किया|

नेहा: ठीक है पापा जी! मैं आपके आने तक सबका ख्याल रखूँगी और आपका इंतज़ार करुँगी|

नेहा जिम्मेदार बनते हुए बोली| आयुष और पिताजी से मेरी कोई बात नहीं हो पाई क्योंकि दोनों दादा-पोते खाने का प्रबंध करने निकले थे|

नेहा से बात कर मुझे अब जल्दी घर पहुँचना था, हम जल्दी घर पहुँचे उसके लिए मैंने ड्राइवर साहब से अनुरोध किया: "ड्राइवर साहब तनिक जल्दी घर पहुँचा दो, हमार बिटिया बहुत रोवत है|" मेरी कही इस बात पर ड्राइवर साहब बोले; "साहब, आप मुन्नी से कही दिहो की हम आभायें ओकरे पापा का लेइ के आइथ है!" ड्राइवर साहब की बात सुन हम सभी हँस पड़े| फिर driver साहब ने गाडी ऐसी भगाई की मुझे लगने लगा था की शायद एक आध घंटे में मैं घर पहुँच ही जाऊँगा!

थोड़ी देर बाद आयुष का फ़ोन आया और वो मुझसे बात करने के लिए जोश से भरा हुआ था| दरअसल कल शाम से आयुष अच्छा बच्चा बना हुआ था तथा मेरे द्वारा दी गई सभी जिम्मेदारियाँ उसने अच्छे से उठाई थीं और ये खबर मुझे देने के लिए आयुष बहुत उत्सुक था|

आयुष: पापा जी...पापा जी मैंने है नानी जी को chocolate खिलाई और है न नानी जी ने मुझे है न हाजमोला वाली toffee दी! फिर मैंने नानी जी और दादी जी के पैर दबाये और दादा जी के भी पैर दबाये! और मैंने कोई शरारत नहीं की, मैं अच्छा बच्चा हूँ न पापा जी?

आयुष बड़े भोलेपन से बोला| आयुष को अपनी तारीफ सुन्नी थी इसलिए मैंने उसकी तारीफ कर दी;

मैं: आप तो good boy हो! मेरा बेटा इतना समझदार हो गया, मुझे तो यक़ीन नहीं होता?! ऐसे ही मेरे लौटने तक आप सबका ध्यान रखना और मैं है न आपके लिए है न chocolate ले कर आऊँगा|

मैंने आयुष की तारीफ की तथा उसके साथ उसी के अंदाज में बात की जिससे आयुष गर्व से फूला नहीं समाया| आयुष आगे बात करता उससे पहले ही मेरी माँ उससे बोलीं;

माँ: अच्छा बस बेटा, अब अपने दादा जी को भी बात करने दे|

माँ की बात सुन आयुष अपना निचला होंठ फुलाते हुए बोला;

आयुष: लेकिन दादी जी, मुझे अभी पापा जी से और बात करनी है!

आयुष के पास कोई बात करने वाला था नहीं, एक मैं ही था जो की बच्चा बन कर आयुष से बात करता था इसलिए आयुष मुझसे बात करने को उतावला था| उधर आयुष की बात सुन नेहा उसे समझाते हुए बोली;

नेहा: जैसे तू पापा जी का बेटा है न वैसे ही पापा जी दादा जी के बेटे हैं| जैसे तेरा पापा जी से बात करने का मन है, वैसे ही पापा जी का भी दादा जी से बात करने का मन है! अब चुपचाप फ़ोन दे-दे दादा जी को और जा कर बड़ी मौसी जी की खाना बनाने में मदद कर|

नेहा ने आयुष को आदेश देते हुए कहा| आयुष बेचारा क्या कहता वो अपना निचला होंठ फुलाये हुए मुझसे बोला;

आयुष: पापा जी, मैं आपसे बाद में बात करूँगा, अभी आप दादा जी से बात कर लो|

मैं: बेटा उदास नहीं होते, मैं आपके लिए एक नहीं दो chocolate लाऊँगा|

दो chocolate के नाम से आयुष खुश हो गया और ख़ुशी-ख़ुशी फ़ोन अपने दादा जी को दे कर अपनी बड़ी मौसी जी के पास भाग गया|

पिताजी: कैसा है बेटा?

पिताजी की आवाज में बड़ी खुश्की थी, मुझे लग रहा था की उनकी ये खुश्की इसलिए है की मैं उन्हें बिना बताये हरिद्वार निकल आया|

मैं: जी मैं ठीक हूँ| आप सब कैसे हैं? घर पहुँचने में कोई तक़लीफ़ तो नहीं हुई?

मेरे पूछे सवालों का जवाब पिताजी ने बस एक शब्द में दिया;

पिताजी: नहीं

इस एक शब्द ने पिताजी के दिल में मौजूद कश्मकश को महसूस कर लिया था मगर मैं उनकी इस कश्मकश को समझ नहीं पा रहा था| मेरा मन मुझे इस जख्मी हालत में पिताजी को बिना बताये हरिद्वार आने को ही पिताजी की इस कश्मकश का कारण बता रहा था| क्या मेरा सोचना सही था?

बहरहाल, रात के 12 बज गए थे और आज सारा दिन नेहा और आयुष ने मुझे कई बार फ़ोन कर मुझसे बात की| रात के बारह बजे तक सब सो गए थे, बस मेरी माँ, संगीता और नेहा ही जगे हुए थे| सभी महिलायें घर के भीतर सोइ थीं तथा पुरुष चरण काका के यहाँ सोये थे| संगीता ने मुझे फ़ोन किया ये जानने के लिए की हम कहाँ पहुँचे हैं;

संगीता: और कितनी देर लगेगी आपको घर पहुँचने में?

संगीता चिंतित होते हुए बोली|

मैं: बस 10-15 मिनट और| सब सो गए की कोई जगा हुआ है?

संगीता: मैं, माँ (मेरी माँ) और आपकी लाड़ली नेहा जगे हुए हैं|

नेहा का नाम संगीता ने मुँह टेढ़ा कर के लिया था क्योंकि नेहा जिद्द कर के जगी हुई थी| नेहा के जगे होने की बात सुन मैं थोड़ा चिंतित हो गया;

मैं: यार, तुमने क्यों मेरी प्यारी बच्ची को जगा कर रखा है|

संगीता: मैंने नहीं जगा रखा उसे! आपकी लाड़ली आप ही की तरह जिद्दी है, सब ने कहा की सो जा मगर कहती है की मैं पापा के आने के बाद उन्हें अपने हाथों से खाना खिला कर ही सोऊँगी|

संगीता थोड़ा चिढ़ते हुए बोली| मैं जानता था की नेहा मुझे ले कर थोड़ी जिद्दी है और कभी-कभी किसी की नहीं सुनती|

मैं: अच्छा ठीक है देवी जी! मैं आ कर अपनी बिटिया को समझाऊँगा की वो इस तरह जिद्द न किया करे|

क्या कमाल की विडंबना थी, एक जिद्दी बाप अपनी जिद्दी बेटी को जिद्द न करने के लिए समझाने की बात कर रहा था|
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सवा बारह बजे taxi हमारे घर के मुहारे में आ कर रुकी, जब गाडी मुहारे में रुक रही थी तब मैंने देखा की मेरी बिटिया रस्ते पर नजरें जमाये मेरा इंतज़ार कर रही थी| जैसे ही गाडी का दरवाजा खुला और मैं गाडी से बाहर निकला तो नेहा मेरी ओर दौड़ पड़ी| जब मैंने नेहा को अपनी ओर दौड़ते हुए देखा तो मेरे मन में पश्चाताप की पीड़ा उतपन्न हो गई| मैं एकदम से अपने घुटनों पर आ गया और अपना दाहिना हाथ खोल कर नेहा को गले लगाना चाहा| नेहा दौड़ती हुई आई और सीधा मेरे सीने से लग कर रो पड़ी! "प्...पापा जी....I missed you! Promise me पापा....आप अब से कहीं अकेले नहीं जाओगे....आपको कुछ हो गया तो....मैं...." मैं जानता था की नेहा क्या कहने वाली है और मैं ये नेहा के मुँह से नहीं सुनना चाहता था इसलिए मैंने उसकी बात काट दी; "नहीं बेटा, ऐसा नहीं सोचते! मैं वादा करता हूँ की आगे से मैं अपना और भी ज्यादा ध्यान रखूँगा| मैं अपनी बेटी को इस तरह कभी नहीं रुलाऊँगा!" मैंने नेहा की पीठ थपथपाते हुए उसे आश्वस्त करते हुए कहा| अपनी बेटी के इस कदर भावुक होने से मैंने नेहा के सामने अपना प्रायश्चित करने का मौका गँवा दिया था|

इधर नेहा ने अपने आँसूँ पोछे और फिर मेरे बाएँ हाथ को देखा जो की belt में लिपटा हुआ था| नेहा मेरे बाएँ हाथ पर हाथ फेरते हुए फिर से परेशान हो गई थी; "पापा जी, आपको यहाँ दर्द हो रहा है?" नेहा का सवाल सुन मैं मुस्कुराया और उसके सर पर हाथ फेरते हुए बोला; "बेटा, आपके गले लगने के बाद से न कोई दर्द नहीं हो रहा|" मेरा जवाब सुन नेहा फिर से मेरे गले लग गई लेकिन इस बार उसके चेहरे पर आँसूँ नहीं बल्कि उसके चेहरे पर बड़ी प्यारी सी मुस्कान तैर रही थी| नेहा ने मेरे दाएँ हाथ की ऊँगली पकड़ी और हम दोनों बाप-बेटी मेरी माँ और संगीता की ओर चल पड़े|

मैं, माँ के पास पहुँचा ही था की माँ ने एकदम से अपने दोनों हाथ खोल कर मुझे अपने सीने से लगने का निमंत्रण दिया| मैं किसी छोटे बच्चे की तरह माँ के सीने से जा लगा, माँ मेरे सर पर हाथ फेरने लगीं तथा खुद को रोने से रोकने लगीं| मेरी माँ का दिल अपने बेटे को देख कर आज बहुत प्रसन्न था, उनकी ख़ुशी ऐसी थी की मानो मैं कोई जंग जीत कर घर लौटा हूँ| नम आँखों से माँ ने मेरा चेहरा अपने हाथों में लिया तथा मेरे मस्तक को चूमते हुए बोलीं; "बेटा, तूने सच्ची मेरी जान निकाल दी थी! खबरदार जो इस तरह बिना बताये कहीं गया तो, अबकी तुझे डंडे से पीटूँगी!" माँ मुझे प्यार से डाँटते हुए बोलीं| "ओर ये पाप-पुण्य की बातें मत सोचा कर! जब तक मैं न कहूँ की तूने कोई पाप किया है तबतक तू ये ऊल-जुलूल बातें नहीं सोचेगा!" माँ ने मेरे सर पर हाथ फेरते हुए कहा|

अब बारी थी संगीता की जो मेरे गले लगने को व्यकुल थी| मैंने संगीता को गले लगाने के लिए अपना दायाँ हाथ खोला ही था की संगीता एकदम से आ कर मेरे गले लग गई| संगीता को अपने सीने से लगा कर ऐसा लग रहा था मानो किसी ने भट्टी में रखे लोहे की सलाख को एकदम से ठंडे पानी में डाल दिया हो! "I missed you so much!" संगीता खुसफुसाते हुए बोली| "I know जान and I'm sorry जान की मैंने तुम्हें अपने गले लगने के लिए इतना तड़पाया|" मैंने संगीता के सर को चूमते हुए कहा| माँ ने मेरी बात सुन ली थी इसलिए उन्होंने मेरे दाएँ कँधे पर थपकी मारते हुए कहा; "खबरदार मेरी बहु को तूने कभी तंग किया तो!" माँ की बात पर हम चारों हँस पड़े और संगीता मुझे बच्चों की तरह जीभ चिढ़ाने लगी|

माँ ने मुझसे खाना खाने को कहा और नेहा को खाना लेने के लिए भीतर भेज दिया| तभी भाईसाहब taxi वाले को पैसे दे कर अनिल के साथ हमारे पास आ पहुँचे| मैंने माँ से भाईसाहब का तार्रुफ़ संगीता के बड़े भाई के रूप में कराया, भाईसाहब ने मेरी माँ के पाँव छू कर आशीर्वाद लिया| माँ ने भाईसाहब और अनिल से खाने के लिए पुछा तो भाईसाहब ने बताया की हमने रास्ते में खाना खा लिया था| इतने में नेहा मेरे लिए खाने की थाली ले आई, थाली देख कर भाईसाहब बोले; "मानु, तुम्हें भूख लगी आई?" भाईसाहब मुस्कुराते हुए बोले| "बेटा, जब तक ये दोनों बाप-बेटी एक दूसरे को खाना न खिला दें इनका पेट कहाँ भरता है!" मेरी माँ मुस्कुराते हुए नेहा के सर पर हाथ फेरते हुए बोलीं| भाईसाहब ने हम बाप-बेटी का प्यार बस फ़ोन पर बात करते हुए ही देखा था, अब जब उन्होंने अपनी आँखों सेये प्यार देखा तो उन्हें बहुत ख़ुशी हुई|

रात बहुत हो गई थी इसलिए भाईसाहब और अनिल, चरण काका के यहाँ सोने चले गए| इधर हम बाप-बेटी ने एक साथ एक दूसरे को खाना खिलाना शुरू किया| "पापा जी, मैंने आपके लिए अपनी थाली में आधा खाना बचा लिया था|" नेहा एकदम भोली सी आवाज में बोली, उसकी बात सुन माँ और संगीता मुस्कुराने लगे| दरअसल मेरी बिटिया जानती थी की मैं सफर में उलटी आने के डर से बहुत थोड़ा खाना खाता हूँ इसीलिए उसने मेरे लिए खाना बचाया था| "बेटा जी, मैंने भी आधा ही खाना खाया था क्योंकि मैं जानता था की आपने मेरे लिए खाना बचाया होगा|" मैंने नेहा के सर को चूमते हुए कहा|

खाना खा कर अब सोने का समय था, माँ तो घर के भीतर सोने चली गईं और बाहर बस मैं, संगीता तथा नेहा रह गए| चूँकि अब हम बस तीनों ही बचे थे तो मैंने सोचा की मुझे अपनी बेटी से माफ़ी माँग कर अपना प्रायश्चित कर लेना चाहीये| मैं चारपाई पर बैठा था, मैंने नेहा को अपने पास बुलाया और उसके दोनों कँधे पकड़ कर नेहा की आँखों में देखते हुए बोला;

मैं: बेटा...मुझे आपसे माफ़ी माँगनी है! म...मेरे हाथों आपके...प...पापा....का खून हो गया! मैं...I didn't have a choice!

किसे पता था की अपनी ही बेटी से माफ़ी माँगने में इतनी ताक़त लगती है?! असल में ये मेरे भीतर मौजूद ग्लानि थी जो की मुझे अपनी ही बेटी के गुस्सा होने का डर दिखा कर डरा रही थी, जबकि मुझे डरने की कोई जर्रूरत थी नहीं क्योंकि मेरी बेटी बहुत समझदार थी, इतनी समझदारी की मैंने उससे कभी उम्मीद भी नहीं की थी!

नेहा ने मेरे चेहरे को अपने छोटे हाथों से पकड़ा और मेरी आँखों में देखते हुए बड़े गर्व से बोली;

नेहा: मेरे पापा तो आप हो! उस आदमी ने न मुझे कभी बेटी कहा न मैंने उसे कभी पापा!

जिस गर्व से नेहा ने मुझे अपना पापा कहा था उसे सुन मेरा दिल भर आया था| अपनी बेटी से इस प्यार की शायद मैंने उम्मीद नहीं की थी! खैर, नेहा की बात अभी खत्म नहीं हुई थी;

नेहा: मेरे लिए तो आप ही मेरे पापा हो और आपको मुझसे माफ़ी माँगने की कोई जर्रूरत नहीं! मैं जानती हूँ की आपके पास कोई और विकल्प नहीं था वरना आप कभी अपने हाथ गंदे नहीं करते| मुझे दुःख हुआ तो बस आपके जख्मी होने का, मैं बहुत डर गई थी की अगर आपको कुछ हो गया तो मैं क्या करुँगी? इसीलिए मैं इतना रोइ थी और जब आपका आज सुबह फ़ोन नहीं मिला तो मैं खेत में बने मंदिर में प्रार्थना करने चली गई| आपने मुझे सिखाया था की जब कोई रास्ता न सूझे तो भगवान जी से मदद माँगो, मैंने भी वही किया और आप देखो भगवान जी ने आपकी रक्षा की और आपको सही सलामत मेरे सामने ले आये|

नेहा बड़े प्यार से मुझे समझाते हुए बोली| उसकी बातों को सुनकर मैं हैरान था, एक तो मेरे अनुसार नेहा को इस काण्ड के बारे में कुछ पता नहीं होना चाहिए था, लेकिन उसे तो सारी बात पता थी! दूसरी बात ये की, उसे चन्दर की मौत का सुन कर ज़रा भी धक्का नहीं लगा था, उसे चिंता थी तो बस मेरी. अपने पापा जी की! शायद मैंने अपनी बेटी के प्यार को कम आँका था!

मैं: I'm so proud of you my बच्चा!

मैंने नेहा को अपने गले लगाते हुए कहा| आज मुझे मेरी बच्ची पर बहुत गर्व हो रहा था, इतना गर्व की मेरा ये सीना फूल कर कुप्पा हो गया था!

[color=rgb(184,]जारी रहेगा भाग 9 में...[/color]
 

[color=rgb(255,]तीसवाँ अध्याय: नियति का खेल[/color]
[color=rgb(235,]भाग - 9 (2)[/color]

इधर बाहर आंगन में मैं, माँ, सासु माँ, अनिल, चरण काका और भाईसाहब बैठे हुए चाय पी रहे थे| दोनों बच्चे मेरे अगल-बगल बैठ कर मुझसे लिपट गए थे तथा अपनी-अपनी बातों से सभी का मन लगाए हुए थे| तभी आयुष उठा और जा कर उसी puppy को गोदी में उठा लाया| आयुष को puppy उठाये देख मेरी सासु माँ एकदम से बोलीं;

सासु माँ: छी आयुष! धर ऊ कूकूर का नीचे!

मगर आयुष अपनी नानी जी की बात मानने के बजाए उनके puppy को कूकूर कहने पर हँसे जा रहा था और puppy को नीचे नहीं रख रहा था| सासु माँ ने आयुष को बहुत कहा की वो उस puppy के साथ न खेले वरना कहीं पप्पी उसे काट न खाये, पर मेरा बेटा मान ही नहीं रहा था| आखिर माँ ने ही बीच में बोल कर सासु माँ को इत्मीनान दिलाया;

माँ: रहने दो बहन जी, बच्चा है! अब इसके साथ यहाँ खेलने वाला कोई दूसरा बच्चा भी नहीं है|

दरअसल जानकी की बेटी अपने पापा जी के साथ घर जा चुकी थी, यहाँ बस आयुष और नेहा के अलावा कोई छोटा बच्चा था ही नहीं जिसके साथ बच्चे खेल सकते थे|

खैर जब आयुष को अपनी दादी जी की शय मिली तो वो puppy ले कर मेरे नज़दीक आ गया और सबसे उस puppy का तार्रुफ़ करवाते हुए बोला;

आयुष: ये मेरा दोस्त है!

आयुष की बात सुन नेहा को आयुष की टाँग खींचनी थी इसलिए नेहा बीच में बोल पड़ी;

नेहा: अच्छा? तो क्या नाम है इसका?

नेहा का सवाल सुन आयुष बेचारा सोच में पड़ गया की उसने अपने दोस्त का नाम तो रखा ही नहीं? अब चूँकि puppy का नामकरण नहीं हुआ था तो नेहा, आयुष, अनिल लग गए उस छोटे से puppy का नाम रखने! इधर मैं उस puppy को देख कर सोचने लगा था की क्या सच में मुझे इस छोटे से जीव से डरना चाहिए क्योंकि वो बेचारा जीव मुझे बड़ी भोली आँखों से देख रहा था, ऐसा लगता था मानो कह रहा हो की मुझे गोदी ले लो, परन्तु मेरे भीतर मौजूद डर मुझे उस puppy को छूने नहीं दे रहा था|

बहरहाल मामा- भाँजा-भाँजी को उस puppy के लिए कोई उपयुक्त नाम नहीं मिल रहा था, ऐसे में आयुष ने मुझे अपने इस खेल में खींचते हुए बोला;

आयुष: पापा जी, आप ही नाम बताओ न?

अब मैं क्या नाम रखता उस जीव का जिससे मैं खुद घबरा रहा था इसलिए मैंने बिना कोई दिलचस्पी लिए हुए कहा;

मैं: Doggy!

मैंने तो नाम ऐसे ही दे दिया था मगर आयुष को ये नाम प्यारा लग गया था|

आयुष: आज से तेरा नाम है न, doggy है! अब जब मैं doggy नाम बुलाऊँ तो मेरे पास आ जाना|

आयुष अपने भोलेपन में उस puppy से बोला| अब वो बेचारा puppy क्या बात समझता वो तो नीचे उतरने के लिए छटपटाने लगा| आयुष ने जैसे ही उस puppy को नीचे उतारा वो puppy अपनी मम्मी और भाई-बहनों के पास दौड़ गया| आयुष उस के पीछे दौड़ने को हुआ था की उसकी नानी जी ने आयुष को पकड़ कर अपने पास रोक लिया ताकि कहीं आयुष अपने दोस्त के साथ खेलने के चक्कर में अपने सारे कपड़े खराब न कर ले|

आयुष: नानी जी, जब मैं यहाँ नहीं हूँगा न तब आप मेरे दोस्त doggy का अच्छे से ख्याल रखना| उसे खाना खिलाना, नहलाना और उसके लिए एक घर बना देना|

आयुष की बचकानी बात सुन सासु माँ हँस पड़ीं और संगीता की ओर देखते हुए बोलीं;

सासु माँ: बिलकुल तोहरे पर गवा है|

सासु माँ की ये बात सुन हम सभी की दिलचस्पी जगी की भला आयुष संगीता पर कैसे गया है? उधर संगीता एकदम से बोली;

संगीता: हम का किहिन? हम कब कूकूर पालें?

संगीता हैरान होते हुए सासु माँ से बोली तो सासु माँ ने संगीता की सारी पोल-पट्टी खोल दी;

सासु माँ: अरे तोहका का याद होइ, जब तू नानमुन रहेओ तो बहुत शर्रारती रहेओ!

इतना कह सासु माँ ने हम सबको संगीता द्वारा की गई मस्ती की सारी कहानी सुनाई;

सासु माँ: संगीता साल भर की भई रही, तब ऊ सारा टाइम आपन भाईसाहब लगे रहत रही| मुन्ना (भाईसाहब) जब पढ़े जात रहा तब संगीता घर मा कोहराम मचाये देत रही| तब हमरे लगे एक ठो गाय रही और ओकरा एक ठो बछिया रही| बछिया छोट रही तो ई संगीता ऊ से दोस्ती कर लिहिस| जब हम आंगन मा काम करत रहन तो संगीता का भुइयाँ (ज़मीन) पर खेले खतिर बिठाई देत रहन| तब ई संगीता रेंगते-रेंगते ऊ बछिया लगे पहुँच जात और ओकरे साथ खेले लागत| हम कतना ही ई का उठाये के दूर बिठाई मगर ई फिर रेंगत-रेंगत ऊ बछिया लगे पहुँच जाए| एहि से हम संगीता का चारपाई पर बिठाये का शुरू कर दिहिन, मगर चारपाई पर बैठ ई रोये लागत रही| जब तक हम ई का उठाये के बछिया लगे न छोड़ी तब तक ई चुप न होइ| मुन्ना जानत रहा की संगीता का बछिया संगे खेला कतना अच्छा लागत है एहि से जब मुन्ना स्कूल से आवत रहा तब दुनो भाई-बहन ऊ बछिया लगे खेले लागत रहे| कभौं मुन्ना संगीता का उठाये के बछिया के ऊपर बिठाये देत रहा तो कभौं बछिया का खोल देत रहा और बछिया कूदे लागत रही, जब बछिया कूदे तो संगीता खूब जोर से हँसे और ऊ का हँसता देख मुन्ना बहुत हँसे!

संगीता और बछिया की दोस्ती की ये कहानी बड़ी मजेदार थी और हम सभी बहुत हँस रहे थे| वहीं संगीता को कुछ याद ही नहीं था, वो हैरान हो कर सासु माँ को देख रही थी की भला ऐसा कब हुआ?

सासु माँ की इस कहानी ने एक भाई-बहन के बचपन की यादें ताज़ा आकर दी थीं, उन यादों को याद कर भाईसाहब थोड़े भावुक हो गए थे| संगीता ने जब अपने भाईसाहब को भावुक होते देखा तो उसका दिल पिघल गया| जब से बच्चे घर आये थे तब से बच्चों ने भाईसाहब को देखा था मगर किसी ने भी संगीता के डर के मारे भाईसाहब से बच्चों का तार्रुफ़ नहीं कराया था| दोनों बच्चे भाईसाहब को देखते थे मगर कभी उनसे बात नहीं करते थे, दोनों बच्चे मेरे या अपनी दादी जी के साथ रहते थे| आज जब संगीता ने अपने भाईसाहब को भावुक देखा तो उसका दिल किया की आज वो अपने भाईसाहब का तार्रूफ अपने बच्चों से बड़े गर्व से कराये| संगीता ने आयुष और नेहा को अपने पास बुलाया और बड़े गर्व से बोली;

संगीता: बेटा, मैं आज आप दोनों को किसी से मिलवाना चाहती हूँ|

इतना कह संगीता भाईसाहब की तरफ देखने लगी और फिर दोनों बच्चों का ध्यान भाईसाहब के ऊपर केंद्रित करते हुए बोली;

संगीता: जब मैं बहुत छोटी थी न, तभी से मेरे सबसे पहले दोस्त मेरे बड़े भाईसाहब थे| जबतक का मुझे होश है तबतक मेरा भाईसाहब से लगाव बहुत था| वो मुझे गोदी ले कर खूब लाड-प्यार करते थे| आपने अभी सुना न आपकी नानी जी ने बताया की मैं मेरे छुटपन में मैं कैसी थी?!

लेकिन फिर एक दिन भाईसाहब मुझे छोड़ कर चले गए, उन्होंने ये भी नहीं सोचा की उनके बिना उनकी छोटी बहन का क्या होगा? कौन उसे लाड-प्यार करेगा? भाईसाहब के मुझे यूँ छोड़कर जाने से मैं बहुत गुस्सा हुई और उनसे आजतक बात नहीं की|

संगीता ने बच्चों के सामने भाईसाहब से हुई भूल का जिक्र नहीं किया था, उसने जानबूझ कर बात का रुख घुमाते हुए अपने दिल के जज्बात हम सब के सामने रखे की उसे भाईसाहब के घर से जाने पर कैसे महसूस हुआ था| खैर, अपनी बात कह संगीता ने आयुष को आगे कर अपने भाईसाहब की गलती निकालते हुए बोली;

संगीता: आयुष बेटा, अगर नेहा आपको अकेला छोड़कर आपके पापा जी के साथ कहीं घूमने जाए तो आप उससे नाराज़ हो जाते हो न की आपकी दीदी आपको अकेला छोड़ कर क्यों घूमने गई?

अपनी मम्मी के पूछे सवाल पर आयुष फ़ौरन सर हाँ में हिलाने लगा|

संगीता: इसलिए मैं भी अपने भाईसाहब से नाराज़ हो गई थी| क्या मैंने कोई गलती की?

संगीता ने ये सवाल नेहा की ओर देखते हुए पुछा|

नेहा: नहीं मम्मी जी|

नेहा अपनी मम्मी का पक्ष लेते हुए बोली|

संगीता: लेकिन अब मैंने अपने भाईसाहब को माफ़ कर दिया है और आज मैं आप दोनों को आपके मामा जी से मिलवाना चाहती हूँ| इतना कहते हुए नेहा ने भाईसाहब की ओर इशारा किया और दोनों बच्चों से बोली;

संगीता: ये हैं मेरे बड़े भाईसाहब यानी आप दोनों के बड़े मामा जी|

इतना सुन दोनों बच्चे भाईसाहब के पास पहुँचे और उनके पाँव हाथ लगाते हुए एक साथ ख़ुशी से बोले; "नमस्ते बड़े मामा जी!" आयुष और नेहा इस समय इतने प्यारे लग रहे थे की जिस किसी ने भी ये दृश्य देखा वो उन पर मोहित होने पर विवश हो गया| वहीं अपने भाँजे-भाँजी की प्यार भरी नमस्ते और पैर छूने से भाईसाहब बहुत भावुक हो गए थे| उन्होंने अपने दोनों हाथ खोलते हुए दोनों बच्चों को अपने गले लगा लिया और उन्हें आशीर्वाद देते हुए बोले; "जुग-जुग जियो बच्चों!"

बच्चों को आशीर्वाद दे कर भाईसाहब ने संगीता के सामने हाथ जोड़े और अपनी की गई गलती की माफ़ी माँगते हुए बोले; "मुन्नी, मुझे माफ़ कर देना! मैं...मैंने घर छोड़ते समय तेरे बारे में जरा भी नहीं सोचा! लेकिन मेरा यक़ीन मान मुन्नी, तुझसे दूर रह कर मैंने तुझे बहुत याद किया| कई बार सोचा की तेरे ससुराल आकर तुझसे मिल लूँ मगर डरता था की कहीं तू नाराज़ हुई और मुझे डाँट दिया तो? बस इसी कारन मेरी तेरे सामने आने की कभी हिम्मत नहीं हुई|" भाईसाहब की बात सुन संगीता भी भावुक हो गई थी, लेकिन तभी आयुष अपने भोलेपन में बोल पड़ा;

आयुष: बड़े मामा जी, अब से है न मैं आपको मम्मी की डाँट खाने से बचाऊँगा!

आयुष के भोलेपन से भरी बात सुन हम सभी हँस पड़े|

संगीता: अच्छा? तू बचाएगा मेरे गुस्से से?

संगीता प्यारभरा गुस्सा लिए आयुष की टाँग खींचते हुए बोली| तभी सासु माँ आयुष का बचाव करते हुए बोलीं;

सासु माँ: अच्छा? तू हमार नाती का मरिहो? रुको तनिक हम बताइत है|

सासु माँ नक़ली गुस्से का दिखावा करते हुए संगीता से बोलीं| फिर उन्होंने आयुष की तरफ देखते हुए कहा;

सासु माँ: मुन्ना एक ठो डंडा लाओ तो, तोहार मम्मी का हम आभायें सोझाये देइत (सीध करना) है!

सासु माँ ने बस मज़ाक में कहा था मगर आयुष अपनी नानी जी की बात को सच मानते हुए एक डंडा उठा लाया और अपनी नानी जी को देते हुए बोला;

आयुष: ये लो नानी जी!

आयुष का बचपना देख हम सभी हँसने लगे थे| इधर संगीता ने जब आयुष को अपनी ही पिटाई करवाते देखा तो वो प्यारा सा गुस्सा लिए आयुष से बोली;

संगीता: अच्छा बच्चू! तू मुझे पिटवायेगा?

ये कहते हुए संगीता, आयुष को पकड़ने के लिए उठी मगर आयुष अपनी फुर्ती दिखाते हुए उड़न छू हो गया और हम सब बैठे हुए इस दृश्य का लुत्फ़ लेते हुए हँसने लगे|

बच्चों की मासूमियत भरी बातों से घर का माहौल खुशनुमा बना हुआ था| चाहे कितनी बड़ी परेशानी हो, दुःख हो, दर्द हो, तकलीफ हो मगर मेरे दोनों बच्चे अपने प्यार और मासूमियत से हम सभी के चेहरे पर मुस्कान ले आते थे| शायद उनके पास घर में मौजूद दुःख को भाँपने की कोई रहस्मयी ताक़त थी तभी तो वो एकदम से सभी को हँसा देते थे!

बहरहाल, रात हुई और सब ने खाना खाया, जब सोने का समय आया तो आज दोनों बच्चे मेरे साथ सोने की जिद्द करने लगे| अब चारपाई पर तो हम तीनों सो नहीं सकते थे इसलिए मेरे लिए तख़्त पर बिस्तर लगाया गया| आयुष को आदत थी मेरे सीने पर सर रख कर सोने की मगर मेरे कंधे में चोट लगी होने के कारण आज वो मेरी बगल में सोया| नेहा बाहर की ओर सोइ थी मगर उसने करवट मेरी तरफ ही ली थी| चूँकि कल बच्चों का स्कूल था नहीं इसलिए आयुष ने कहानी सुनने की जिद्द पकड़ी और एक के बाद एक तीन कहानी सुनने के बाद ही वो सोया| नेहा तो दो कहानी सुन कर ही सो गई थी, या कम से कम मुझे तो लगा की वो सो चुकी है|

रात का सन्नाटा था, बस रात में बोलने वाले कीड़ों की आवाज आ रही थी जिसे सुनते हुए मैं जाग रहा था| इस सन्नाटे में मेरा मन भटकने लगा था, आज दिन में जो हुआ उसे याद कर मेरा मन फिर दुखी होने लगा था| मेरा दिमाग मुझे दोष दिए जा रहा था की मेरे कारण मेरे माँ-पिताजी के रिश्ते में दरार आ गई है; 'भले ही माँ तुझे कुछ न कहें, मगर सच तो यही है की तू अपने माँ-पिताजी के रिश्ते के बीच आई दरार का कारण बना है!' मेरा दिमाग मुझे धिक्कारते हुए बोला| इतने भर से मेरा मन नहीं भरा तो दिमाग ने मुझे बड़की अम्मा की याद दिला कर उनके रोते हुए चेहरे की कप्लना कर दी जिससे मैं और ग्लानि में डूबने लगा| 'कल मैं बड़की अम्मा से जा कर माफ़ी माँग लूँगा, वो मुझसे बहुत प्यार करती हैं इसलिए वो मेरे हालात समझेंगी और मुझे अवश्य माफ़ कर देंगी|' मैं अपनी ग्लानि से लड़ते हुए पक्का इरादा करते हुए मन ही मन बोला| 'अच्छा? तुझे पक्का यक़ीन है की बड़की अम्मा तुझे अपने बेटे को जान से मार देने के लिए माफ़ कर देंगी?' मेरा दिमाग मुझे फिर से डराते हुए बोला| बड़ी ही अजीब सी कश्मकश थी, मैं अपनी ग्लानि से लड़ना चाह रहा था मगर मेरा अपना मन मुझे डराए जा रहा था| 'एक माँ को उसके बेटे से दूर करने के दुःख से निज़ात पाने के लिए मुझे उस माँ से माफ़ी माँगनी होगी, तभी मेरा पश्चाताप पूर्ण होगा|' मेरा अंतर्मन मुझे होंसला देते हुए बोला तथा मेरे दिमाग में बैठे डर को दबाने लगा|

मेरे भीतर की ये कश्मकश शांत हुई ही थी की नेहा को मेरे जगे होने का एहसा हो गया| वो धीरे से उठी और मेरे सिरहाने आ कर मेरे दोनों गालों को चूमते हुए खुसफुसाई; "पापा जी, आप क्यों जाग रहे हो? नींद नहीं आ रही?" नेहा को जगा हुआ देख मुझे एहसास हुआ की मेरी बेटी को मेरी कितनी फ़िक्र है; "मेरा बच्चा, आओ लेट जाओ| आपने सोने से पहले पप्पी नहीं दी थी न इसलिए नींद नहीं आ रही थी, अब आपने पप्पी दे दी है तो अब नींद आ जाएगी|" मैंने बात बनाते हुए कहा| मेरी बात पर विश्वास कर मेरी बेटी पुनः लेट गई और अपना हाथ आयुष के ऊपर से लाते हुए मेरी कमर पर रख दिया| मैंने भी अपना बायाँ हाथ आयुष के ऊपर से ले जाते हुए नेहा के सर पर रख दिया| नेहा के सर पर हाथ फेरते हुए मेरा मन शांत होने लगा था| दरअसल नेहा के प्यार के कारण ही मेरा दिमाग अब सकारात्मक सोच रहा था, मैं ऐसी कल्पना करने लगा था की मेरी बेटी की सकरात्मक ऊर्जा मेरे भीतर आ रही है जिससे मेरा भटका हुआ मन शांत हो रहा है| अंततः कुछ इस प्रकार मुझे रात में नींद आई और मैं चैन से सो पाया|

अगली सुबह उठ कर मेरी नजरें घडी पर टिकी हुई थी, कब दस बजे और कब मैं अपनी बड़की अम्मा से माफ़ी निकलूँ?! घडी में बजे थे साढ़े नौ, हम सभी ने नाश्ता कर लिया था तथा सब बात कर रहे थे जब हमारे घर के आंगन में एक गाडी आ कर रुकी और उसमें से भाईसाहब की पत्नी यानी भाभी जी तथा उनका बेटा निकले| तभी भाईसाहब घर के भीतर से निकले तथा अपनी पत्नी और बेटे को सबसे पहले मेरे पास ले कर आये और मेरा उनसे परिचय करवाया;

भाईसाहब: मानु, ये तुम्हारी भाभी और भतीजा विराट है|

भाईसाहब की बात सुन मैंने फ़ौरन भाभी जी के पाँव छुए|

भाभी जी: अरे मानु भैया, आपने तो पाँव छू कर मुझे बिलकुल बुढ़िया बना दिया|

भाभी जी मज़ाक करते हुए बोलीं जिस पर हम सब हँसने लगे| भाभी जी मुझे आशीर्वाद देते हुए मेरा हाल चाल पूछने तथा मेरी तारीफ करने लगीं की कैसे मैंने चन्दर रुपी राक्षस से अपने परिवार की रक्षा की| विराट ने आगे बढ़ कर मेरे पाँव छू कर मुझे "नमस्ते फूफा जी" कहा, ये पहलीबार था की किसी ने मुझे फूफा जी कहा हो इसलिए मुझे ये हास्यास्पद लगा तथा मैं हँसने लगा| मुझे हँसता हुआ देख भाईसाहब ने कारण पुछा तो में उन्हें बताया; "जैसे मैंने भाभी जी के पाँव छु कर उन्हें बुजुर्ग होने का आभास करा दिया था वैसे ही विराट ने मेरे पाँव छु कर मुझे बुजुर्ग होने का एहसास करा दिया!" मेरी ये बात सुन हम चारों हँस पड़े|

इतने में संगीता, माँ और सासु माँ घर के भीतर से निकले, सासु माँ तो पहले ही भाभी जी से मिल चुकी थीं इसलिए भाईसाहब ने संगीता से भाभी जी का परिचय करवाया;

भाईसाहब: मुन्नी, ये मेरी पत्नी है और ये है मेरा बेटा विराट|

संगीता ने भाभी जी के पाँव छुए और भाभी जी ने आशीर्वाद देते हुए संगीता को अपने गले लगा लिया| गले लगने के बाद भाभी जी संगीता से बोलीं;

भाभी जी: भई मुझे तो लगा था की हमारी मुन्नी अपने भाईसाहब से नाराज़ है और मुझसे बात भी नहीं करेगी मगर इसने (संगीता ने) तो मुझसे कोई नाराज़गी जताई ही नहीं|

भाभी जी की बात सुन संगीता हाजिर-जवाबी दिखाते हुए बोली;

संगीता: नाराजगी भाईसाहब से थी, अपनी भाभी और भतीजे से थोड़े ही मैं नाराज़ थी|

संगीता की हाजरी जवाबी से सभी बहुत खुश हुए|

सारा परिवार जमा हो गया था और सभी का परिचय भाभी जी से ख़ुशी-ख़ुशी करवाया जा रहा था| जब बच्चों की अपनी बड़ी मामी जी से मिलने की बारी आई तो भाभी जी ने दोनों बच्चों को अपनी गोद में बिठा लिया और उन्हें छोड़ा ही नहीं| दोनों बच्चे थे ही इतने प्यारे की भाभी जी को उन पर अत्यधिक प्यार आ रहा था| सब बातों में लगे थे तो मुझे बिना किसी को बताये अपनी बड़की अम्मा के पास निकलने का मौका मिल गया|

मैं पीछे के रास्ते से घूमता हुआ बड़की अम्मा के पास पहुँचा, उस समय सभी मर्द श्मशान गए हुए थे तथा घर पर केवल महिलाएँ थीं| द्वारे पर बड़की अम्मा ज़मीन पर बैठीं थीं तथा रो-रो कर उनकी हालत खराब थी| उनकी बगल में मामी जी तथा मेरी चारों भाभियाँ बैठी हुई थीं| जैसे ही मेरी नज़र बड़की अम्मा पर पड़ी तो उन्हें यूँ रोता हुआ देख मेरा दिल बैठ गया! एक माँ का दिल दर्द से किस कदर जल रहा था ये देख कर मेरी हिम्मत ही नहीं हो रही थी की मैं उनके सामने जाऊँ! परन्तु मुझे अपने किये पाप का प्रायश्चित तो करना था इसलिए मैंने अपना दिल मज़बूत किया और बड़की अम्मा के आगे खड़ा हो गया|

मुझे आंगन में अकेला खड़ा देख सभी स्त्रियों की नजरें मुझ पर आ टिकीं| जब बड़की अम्मा ने मुझे देखा तो उनकी आँखों में अपने बेटे को खोने का दुःख साफ़ नज़र आ रहा था| जिन आँखों में मैंने सदा अपने लिए बेटे वाला प्यार देखा था उन आँखों में आज सूनापन था| बड़की अम्मा की ये हालत देख मुझे और भी ग्लानि हो रही थी की मैंने आज अपनी बड़की अम्मा को इतना रुलाया, उन्हें इतना दुःख दिया!

मैं: अम्मा....

रूँधे गले से मैंने माफ़ी माँगने के लिए अभी बस बड़की अम्मा को पुकारा ही था की बड़की अम्मा एकदम से रोते हुए बोल पड़ीं;

बड़की अम्मा: ई तू का किहो मुन्ना? तू हमार गोद उजाड़ दिहो?!

बड़की अम्मा ने मुझ पर आरोप लगाते हुए कहा| अपनी बड़की अम्मा के मुँह से ये सुन मैं टूट गया और घुटनों पर गिरते हुए उनसे गिड़गिड़ाते हुए बोला;

मैं: अम्मा, मुझे गलत मत समझो! मैं मजबूर था, अगर मैं गोली नहीं चलाता तो आज मेरे माँ-पिताजी मेरे मरने का दुःख मना रहे होते! मेरे बीवी बच्चे अनाथ हो जाते!

चन्दर मेरी जान लेने के लिए कट्टा ले कर आया था, आप ही बताइये मैं क्या करता? आप जानते हो न अपने मुन्ना (मुझे) को, क्या आपको लगता है की आपका मुन्ना आपके बेटे की जान लेने का इरादा रखता था?! मैंने तो चन्दर को तब भी छोड़ दिया था जब वो दिल्ली में मेरे घर में घुस आया था और संगीता की जान लेना चाहता था!

कोई माने चाहे न माने मगर मेरी बड़की अम्मा दिल ही दिल में ये बात मानती थीं की चन्दर ही कसूरवार था| फिर मेरी छाती में बँधी पट्टी मेरे बेक़सूर होने का दवा चीख-चीख कर रही थी जो की बड़की अम्मा से देखा नहीं जा रहा था, शायद इसीलिए मेरी बात सुन बड़की अम्मा मुझसे नजरें चुराने लगीं थीं| जब मैंने बड़की अम्मा को मुझसे नजरें फेरते हुए देखा तो मैंने उसने माफ़ी माँगते हुए कहा;

मैं: अम्मा, मुझे माफ़ कर देना...मैंने एक माँ के दिल को दुखाया....उससे उसके बेटे को छीन ने का पाप किया है!

मैंने हाथ जोड़ते हुए, रोते हुए अपनी बड़की अम्मा से माफ़ी माँगी| मेरी माफ़ी सुन बड़की अम्मा ने मेरी आँसूँ भरी आँखों में देखा, उन्हें मेरी आँखों में पश्चाताप नज़र आया और वो मुझे माफ़ करने ही वाली थीं की तभी घर में सभी पुरुष सदस्य श्मशान से लौट आये|

बड़के दादा, अजय भैया, अनिल भैया, अशोक भैया, गट्टू मामा जी और अंत में मेरे पिताजी; सभी एक झुण्ड बना कर खड़े हो गए थे| मुझे देखते ही मेरे पिताजी को छोड़ सभी के तेवर गर्म और चेहरे पर नफरत भरा गुस्सा उमड़ आया था|

बड़के दादा: अब हियाँ का लिए खतिर आया है? हमार और केहू बेटा का जान लिए आवा है?

बड़के दादा गुस्से में बोले|

मैं: दादा, मैं यहाँ आपसे और अम्मा से माफ़ी माँगने आया हूँ...

मैं आगे कुछ कहता उससे पहले ही गट्टू गुस्से से भड़कते हुए बोला;

गट्टू: पाहिले तो तू भैया का जान ले लिहो और अब हियाँ दिखावा किये आयो है?

अजय भैया: चुपये-चाप हियाँ से निकर जाओ नाहीं तो तोहार हाथ-पाँव तोड़ी के सरजू जी मा बहा देब!

अजय भैया मुझे धमकाते हुए बोले| गट्टू ने फ़ौरन पास पड़ी लकड़ियाँ, डण्डा, लाठी जो भी उसे मिला वो सब उठा कर उसने अपने तीनों भाइयों को दे दिया| चारों भाई गुस्से से भरे लाठी-डण्डा लिए मुझे खा जाने वाली नजरों से देख रहे थे| मुझे बाकी तीन भाइयों के हमलावर होने से कोई हैरानी नहीं हुई थी, हैरानी हुई थी तो बस इस बात से की अजय भैया जिनसे मेरा रिश्ता सबसे ज्यादा गहरा था वो भी आज मेरे खिलाफ खड़े हो गए थे| वहीं मेरे पिताजी हाथे पीछे बाँधे हुए ख़ामोशी से देख रहे थे, उनके चेहरे पर मेरे लिए कोई चिंता, कोई प्यार नहीं था!

इधर मैं निहत्था बिना डरे बड़के दादा के आगे हाथ जोड़े अब भी खड़ा था| मेरे चेहरे पर कोई खौंफ न देख सभी हैरान थे, क्योंकि सबको लग रहा था की मैं डरकर भाग जाऊँगा! खैर, मैंने सभी को नजरअंदाज किया और बड़के दादा को अपनी बात समझाने लगा;

मैं: दादा, आज जब मेरे चारों भाई लाठी-डंडा ले कर मुझे मारना चाहते हैं तब भी मैं निहथ्था, निडर आपके सामने खड़ा हूँ, ठीक उसी दिन की तरह जब चन्दर कट्टा ले कर मेरी जान लेने आया था| तब चन्दर मेरी जान लेना चाहता था और आज आपके चारों बेटे मेरी जान लेना चाहते हैं| आप ही बताइये मुझे उस दिन क्या करना चाहिए था? अपनी गर्भवती पत्नी को अकेला छोड़ कर, पीठ दिखा कर भाग जाना चाहिए था या फिर चन्दर का सामना करना चाहिए था?

मेरा सवाल सुन बड़के दादा ने अपने चारों बेटों को घूर कर देखा तो चारों ने लाठी-डंडे नीचे फेंक दिए|

मैं: मेरे पास अपनी जान बचाने के लिए कोई विकल्प नहीं था, अगर मैं आज की तरह हाथ जोड़कर चन्दर के सामने खड़ा हो जाता तो क्या वो मुझे ज़िंदा छोड़ देता?

मैंने पुनः बड़के दादा से सवाल पुछा| बड़के दादा मेरे इस सवाल का जवाब जानते थे, वो बदले से अन्धे हो चुके अपने बेटे चन्दर को जानते थे| अगर मैं चन्दर के आगे अपना सर झुका लेता तो वो बिना झिझके मेरे माथे में गोली दाग देता!

मैं: मैं जानता हूँ की मुझसे, एक माता-पिता से उनके बेटे को छीन लेने का पाप हुआ है और अपने उसी किये पाप की माफ़ी माँगने मैं यहाँ आपके सामने खड़ा हूँ|

मैंने पूरे आत्मविश्वास से अपनी बात कही| मेरा आत्मविश्वास देख कर भी बड़के दादा का मन नहीं पसीजा, बल्कि वो तो अपने पुत्र मोह में अन्धे होते हुए बोले;

बड़के दादा: पाहिले हमार बिटवा का मार के, अब तू हियाँ माफ़ी माँगत है, कउनो सरम है की नाहीं?!

बड़के दादा अपने बेटे को खोने के दुःख में इस कदर अन्धे थे की उन्हें मेरी आँखों में पश्चाताप नज़र नहीं आ रहा था|

मैं: अगर शर्म नहीं होती तो मैं यहाँ आपके सामने माफ़ी माँगने क्यों आता?!

बड़के दादा को मेरा ये जवाब अच्छा नहीं लगा था|

खैर, मुझे तो यहाँ बड़के दादा को यक़ीन दिलाना था की उस दिन जो भी हुआ उसमें कसूरवार चन्दर था न की मैं इसलिए मैंने अपनी बात को पुख्ता करने के लिए पुलिस की छानबीन का जिक्र किया;

मैं: ठीक है आपको मेरी बात पर यक़ीन न सही मगर पुलिस ने जो छानबीन कर सबूत जुटाए हैं उन पर तो विश्वास कीजिये!

जब मैंने पुलिस की छानबीन की बात की तो मामा जी एकदम से मेरी बात का काट करते हुए बोले;

मामा जी: अरे काहे की पुलिस?! ऊ सब तो तोहरे ही नाते रिश्तेदारी निभावत हैं! तोहरा सारा इल्ज़ाम तो ऊ ससुर दरोगा हमरे चन्दर पर लगाए दिहिस!

मामा जी का ये आरोप की पुलिस मुझसे रिश्ता निभाते हुए मेरी तरफदारी कर रही है बेबुनियाद था इसलिए मैं इस बात पर उनसे बहस करते हुए बोला;

मैं: पुलिस मेरी रिश्तेदार नहीं, रिश्तेदार तो आप सब हैं| लेकिन जब आपने ही मुझसे मुँह मोड़ लिया तो कानून को अपना काम तो करना ही था न?!

मैंने मामा जी को ताना मारते हुए कहा| मेरी बात सुन मामा जी चुप हो गए थे, इसलिए मैंने अपनी बात आगे जारी रखी;

मैं: और अगर आपको पुलिस पर भरोसा नहीं तो जा कर उस बनिए से पूछो की आखिर चन्दर ने उससे पैसे उधार क्यों लिए थे? थाने में बंद उस आदमी से पूछो की आखिर चन्दर ने उससे कट्टा किस को मारने के लिए खरीदा था? किसी भी निर्दोष पर इलज़ाम लगाना आसान है मगर जब सच सामने आता है न तो किसी की हिम्मत नहीं होती उस सच का सामना करने की इसलिए आपकी तरह सभी उस सच से भागने लगते हैं|

मेरे शूल से पैने शब्द न केवल मामा जी को बल्कि वहाँ मौजूद हर एक इंसान को चुभे थे|

बड़के दादा: निकर जा हमार घर से!

बड़के दादा गुस्से में मुझ पर चीखे| उनकी ये खीज उनके मेरे सवालों का जवाब न दे पाने के कारण पैदा हुई थी|

खैर, बात साफ़ थी की बड़के दादा तो मुझे कभी माफ़ नहीं करने वाले| मैंने अपने अन्तर्मन की शान्ति के लिए माफ़ी माँग ली थी अब यदि पुत्रमोह में अँधा पिता मुझे माफ़ नहीं करता तो ये उनकी मर्जी थी, मेरा कर्म पूरा हो चूका था! मैं बड़की अम्मा के पास पहुँचा और हाथ जोड़कर अपना सर झुका कर उनसे मौन रह कर माफ़ी माँगी| जहाँ तक मैं अपनी बड़की अम्मा को जानता हूँ उन्होंने मुझे अवश्य माफ़ कर दिया होगा| फिर मैं बड़के दादा के पास आया और उन्हें भी मैंने हाथ जोड़कर तथा सर झुका कर मौन रूप से माफ़ी माँगी मगर बड़के दादा अपने क्रोधाग्नि में जल रहे थे इसलिए उन्होंने मेरी ओर पीठ करते हुए मुझसे मुँह मोड़ लिया| अंत में मैं अपने पिताजी के पास पहुँचा और हाथ जोड़े हुए उनसे बोला; "पिताजी, आपका बेटा गलत नहीं है! वो बस अपने पिता, पति और बेटे होने का फ़र्ज़ निभा रहा था| अगर आप मुझे ही दोषी मानते हैं तो ये मत भूलिए की मेरी माँ अर्थात अपनी पत्नी को आप अकेला छोड़ आये हैं तो मुझसे बड़े दोषी तो आप हैं!" मेरी कही बात का पिताजी पर कोई असर नहीं हुआ, उन्होंने भी अपने बड़े भाई की तरह मुझसे मुँह फेर लिया तथा मुझे अपनी पीठ दिखाते हुए दूर चले गए|

मेरे लिए अब इस घर में कुछ नहीं रह गया था, हाँ मैंने यहाँ आ कर अपने बड़के दादा-बड़की अम्मा से माफ़ी माँग कर अपना प्रयाश्चित जर्रूर कर लिया था| अब मैं यहाँ से ग्लानि मुक्त हो कर जा सकता था, परन्तु अपने पिताजी द्वारा किये गए इस तिरस्कार ने मेरा दिल तोड़ दिया था इसलिए मेरा मन हल्का होने के बजाए पिताजी की इस उखड़े व्यवहार से और भारी हो गया था!

आँखों में आँसूँ लिए मैं बड़के दादा के घर से अपने ससुराल जाने के लिए निकला और पूरे रास्ते यही सोचता रहा की आखिर क्यों मेरे पिताजी अपने ही बेटे को कसूरवार मानते हैं? क्या उन्हें अपने भाई पर अपने खून...अपने बेटे से अधिक विश्वास है? पुलिस ने अपनी कारवाही कर सारे सबूत पिताजी के समक्ष प्रस्तुत कर दिए थे तो कम से कम मेरे पिताजी को उन सबूतों का तो यक़ीन करना चाहिए था? और चलो उन्होंने किसी की बात नहीं मानी मगर अपनी पत्नी जिसे उन्होंने इतना चाहा था उसकी बात तो माननी चाहिए थी?! सवाल बहुत थे मेरे दिमाग में पर उनका जवाब एक भी नहीं था मेरे पास!

मुझे लगा था की भाभी जी के आने से सभी का ध्यान उनसे बात करने में लगा होगा और किसी को भी मेरी अनुपस्थिति का पता नहीं चलेगा, परन्तु जब मैं घर लौटा तो सभी हैरान- परेशान बैठे मेरा ही रास्ता देख रहे थे| मुझे देख सभी एक साथ खड़े हो कर मेरे पास आये, सबसे आगे थी मेरी माँ, उनके पीछे संगीता और फिर थीं मेरी सासु माँ| दोनों बच्चों को संगीता ने पहले ही अनिल और विराट के साथ जबरदस्ती घूमने भेज दिया था ताकि बच्चों को घर में हो रही बातों का कुछ पता न चले| इधर माँ एकदम से मेरे गले लग गईं और उन्हें यूँ परेशान देख मेरा सब्र जवाब दे गया, कल मैंने जिस दर्द को अपने सीने में दबाया था वही दर्द आज बाहर छलक आया था; "माँ....मैं....बड़की अम्मा के पास....गया था....और वहाँ पिताजी ने...." मैं रोते हुए आधी बात ही कह पाया था की माँ ने मुझे शांत करवाते हुए कहा; "बस मेरे बच्चे! मैं जानती हूँ तू वहाँ क्यों गया था, लेकिन बेटा मैंने तुझे कहा था न की तुझसे कोई पाप नहीं हुआ है तो तू क्यों अपने मन पर प्रायश्चित करने का बोझ बाँधे हुए है?! और जिस पिता को अपने बेटे का मोह नहीं, उस बेटे को भला अपने बाप का मोह क्यों है?" माँ की बात का मेरे पास कोई जवाब नहीं था, थे तो बस आँसूँ जो थम ही नहीं रहे थे| जब माँ मेरा रोना नहीं रोक पाईं तो उन्होंने संगीता को मौका दिया| पिताजी के जाने के बाद से हम दोनों मियाँ-बीवी ने कोई बात नहीं की थी, दरअसल संगीता डरती थी की कहीं उसने मुझे पिताजी के घर छोड़कर जाने के दुःख से मुझे बाहर निकालने की कोशिश की और मैं भीतर से टूट गया तो मुझे कौन सँभालेगा?! लेकिन आज जब संगीता ने मुझे इस कदर रोता हुआ देखा तो वो मेरा ये रोना बर्दाश्त नहीं कर पाई और सीधा आ कर मेरे गले लग गई| संगीता के गले लगने के बाद मैंने खुद को जैसे-तैसे सँभाला और अपना रोना काबू करने लगा| उसी वक़्त संगीता ने होशियारी से मेरा दायाँ हाथ अपनी कोख पर रख दिया तथा मेरी आँखों में देखते हुए बोली; "आपको अपने होने वाले बच्चे की कसम, आप अबसे यूँ उदास, यूँ गुमसुम नहीं रहोगे! जो हुआ उसे भूल जाओ और अपने इस परिवार को सहारा दे कर सँभालो| आप खुश रहोगे तो माँ खुश रहेंगी, मैं खुश रहूँगी, हमारे बच्चे खुश रहेंगे! आप ही अगर हिम्मत हार जाओगे तो हम सबको कौन सँभालेगा?" संगीता की बातो ने मुझ पर गहरा प्रभाव डाला था| उसकी कसम से बँध मेरे अंतर्मन ने मुझे झकझोड़ दिया था, अपने दुःख में मैं अपने परिवार को सँभालने के बारे में भूल ही गया था|

"I promise जान, मैं अपने इस परिवार को उसी प्रेम और स्नेह से सँभालूँगा जिस स्नेह से माँ ने आज तक हम सभी को प्यार किया है|" मैंने चेहरे पर एक नक़ली मुस्कान चिपकाते हुए कहा| मैंने आज एक बार फिर अपने दर्द को अपने सीने में दफ़न कर लिया था|

ठीक तभी आयुष और नेहा अपने छोटे मामा जी और विराट भैया के साथ घूम कर घर लौटे| मेरी रोने से बेहाल हुई सूरत देख दोनों बच्चे घबरा गए और आ कर मेरी कमर से लिपट गए| " मुझे कुछ नहीं हुआ बेटा, वो जब मैं घर लौटा और आप दोनों को नहीं देखा न तो मैं दुखी हो गया था!" मैंने बच्चों से झूठ बोला तथा घुटने टेक कर दोनों को आपने गले लगा लिया| बच्चे मेरी झूठी बात में आ गए और कस कर मुझसे लिपट गए|

नेहा: पापा जी, अबसे मैं आपको छोड़ कर कहीं नहीं जाऊँगी|

आयुष: मैं तो जहाँ जाऊँगा आपको अपने साथ ले जाऊँगा|

दोनों बच्चे भावुक होते हुए बोले|

मैं: Awww मेरे बच्चों!

ये कहते हुए मैंने बच्चों को लाड कर रोने नहीं दिया| बच्चों को लाड करते देख सभी के चेहरे पर ख़ुशी छलक आई थी| बाकी सब तो मेरा और बच्चों का मोह जानते थे मगर भाभी जी आज ये मोह पहलीबार देख रहीं थीं;

भाभी जी: मानु भैया, इसी तरह मुस्कुराते रहो और मेरे भाँजे-भाँजी को लाड-प्यार करते रहो|

भाभी जी मुस्कुराते हुए बोलीं|

हम सब ने दोपहर का खाना एक साथ खाया और फिर दोनों बच्चे मुझसे लिपट कर सो गए| बच्चे करीब थे इसलिए मेरा मन इस वक़्त केवल बच्चों में लगा हुआ था और मेरे भीतर दबा हुआ दुःख फन नहीं उठा सकता था|

शाम हुई तो सनतोष का फ़ोन आया और वो इस समय बहुत चिंतित था;

संतोष: भैया, मैंने अंकल जी को फ़ोन किया था मगर उन्होंने कहा की अब से सारा काम आप देखेंगे|

ये बात सुन मेरा दिल फिर दुःखा क्योंकि पिताजी एक-एक कर अपने परिवार से सारे नाते-रिश्ते तोड़ते जा रहे थे|

मैं: हाँ.वो.आज से सारा काम मैं ही देखूँगा, तो अब जो भी पूछना हो मुझसे पूछ लियो|

मैंने बहुत भारी मन से ये बात कही|

संतोष: भैया, घर में एक समस्या है इसलिए मुझे अभी गाँव जाना होगा!

संतोष बहुत घबराया हुआ था और ऐसे में मेरा उसे रोकना सही नहीं था|

मैं: ठीक है यार तू चला जा, पैसे चाहिए तो बता मैं transfer कर देता हूँ|

संतोष: नहीं भैया, अगर जर्रूरत होगी तो मैं माँग लूँगा| आप बस वो गुड़गाँव वाली site का काम सँभाल लीजियेगा, वहाँ न तो माल आ रहा है और न ही लेबर आ रही है! नॉएडा वाली site का काम मैंने 2 दिन के लिए मिस्त्री के जिम्मे लगा दिया है, इसलिए वहाँ तो आपके बिना आये भी काम चलता रहेगा|

संतोष की बताई बात बड़ी चिंताजनक थी| मालिक की अनुपस्थिति में लेबर खाली बैठने लगती है इसलिए मेरा दिल्ली वापस जाना बहुत जर्रूरी था|

मैं: ठीक है यार मैं वो सब देख लूँगा, तू ध्यान से गाँव जा|

मैंने बात खत्म करते हुए कहा|

फ़ोन रख कर मैं सोच में पड़ गया था की जबतक ससुर जी की तेरवीं की पूजा नहीं हो जाती, मैं दिल्ली जाऊँ कैसे? फिर अभी सासु माँ रहेंगी कहाँ इस पर भी फैसला करना था| ये सब सोचते हुए मैं सर झुकाये बैठा था जब संगीता मेरे पास आ कर बैठी और बोली;

संगीता: आप फिर से पिताजी को याद कर रहे हो न?

संगीता को लग रहा था की मैं पिताजी के कारण चिंतित हूँ|

मैं: नहीं जान! अभी संतोष का फ़ोन आया था, उसके गाँव में कोई समस्या पैदा हो गई है इसलिए उसे अभी अपने गाँव जाना है| वो बता रहा था की नॉएडा वाली site का काम तो ठीक चल रहा है मगर गुड़गाँव वाली site का काम ठप पड़ा है! न माल आ रहा है और न ही लेबर, ऐसे में मैं यहाँ से गुड़गाँव का काम कैसे सँभालूँ?

मेरी बात सुन संगीता सोच में पड़ गई|

मैं: ऐसा करो, तुम सब यहीं रुको मैं कुछ दिन के लिए दिल्ली जा कर काम शुरू करवा कर आता हूँ.

मेरे अकेले दिल्ली जाने की बात सुन संगीता एकदम से बोली;

संगीता: बिलकुल नहीं! पहले ही आपका जख्म अभी भरा नहीं है, ऊपर से दिल्ली अकेले जा कर वहाँ आपका ध्यान कौन रखेगा? मैं कहे देती हूँ, जाएंगे तो हम सब साथ ही जायेंगे!

संगीता मेरी चिंता करते हुए बोली|

मैं: जान, अभी पिताजी (मेरे ससुर जी) की तेरहवीं की पूजा होनी है, माँ (सासु माँ) कहाँ और किसके साथ रहेंगी इस मुद्दे पर बात करनी है और तुम चाहती हो की हम सब दिल्ली लौट जाएँ?!

हम बात कर ही रहे थे की पीछे से मेरी माँ और सासु माँ आ गए, उन्होंने हमारी बातें सुन ली थीं इसलिए सासु माँ मुझे समझाते हुए बोलीं;

सासु माँ: मुन्ना, तू हमार चिंता नाहीं करो|

इतना कह सासु माँ ने भाईसाहब, अनिल और चरण काका को बुलाया और सभी को सारी बात बताई| सब का कहना था की हमें दिल्ली लौट कर काम संभालना चाहिए ताकि काम में अधिक नुक्सान हो मगर मैंने भी सभी के सामने अपनी चिंता प्रकट कर दी की मैं ससुर जी की तेरहवीं और सासु माँ के रहने का फैसला होने से पहले दिल्ली नहीं जाऊँगा| मेरी चिंता सभी को जायज लगी इसलिए सभी बैठ कर इन दोनों सवालों पर चर्चा करने लगे| सब ने बैठ कर सबसे पहले सासु माँ के यहाँ रहने के विषय पर बात की, चरण काका का कहना था की सासु माँ को भाईसाहब के साथ लखनऊ में रहना चाहिए मगर सासु माँ ये घर छोड़कर नहीं जाना चाहती थीं| सासु माँ की इच्छा का मान रखते हुए भाईसाहब ने ये फैसला किया की वो सहपरिवार यहाँ गाँव में माँ के साथ रहेंगे| उनके लिए इस फैसले से सासु माँ बहुत खुश हुईं मगर किसी ने भाईसाहब के कारोबार और विराट के school के बारे में सोचा ही नहीं था!

मैं: पर भाईसाहब आपका सारा काम-धँधा लखनऊ में है, विराट का स्कूल लखनऊ में है तो आप सब यहाँ माँ के पास कैसे रहेंगे?

मेरा सवाल वाजिब था मगर भाईसाहब ने सब सोच रखा था;

भाईसाहब: मेरा कारोबार मैं यहाँ के बाजार से भी कर सकता हूँ, रही विराट के स्कूल की बात तो उसके board के पेपर होने के बाद मैं उसका दाखिला यहाँ पास के स्कूल में करा दूँगा|

भाईसाहब की बात से अब मैं सासु माँ की तरफ से चिंतामुक्त हो चूका था, अब बस ससुर जी की तेरहवीं की पूजा का फैसला होना बाकी था|

सासु माँ: और मुन्ना तू आपन ससुर जी की तेरहवीं की तनिको चिंता नाहीं करो| आभायें तू आपन काम-धाम सम्भारो, काहे से की अब सब काम तुहिं का सम्भारे का है|

सासु माँ मेरी चिंता कम करते हुए बोलीं, इतने में संगीता भी उन्हीं के साथ हो गई और बोली;

संगीता: पिताजी (मेरे ससुर जी) की तेरहवीं की पूजा, भाईसाहब, माँ और अनिल यहाँ करेंगे तथा हम दिल्ली में कर लेंगे|

संगीता का सुझाव सुन सभी ने हामी भरी और ये फैसला हुआ की हम ससुर जी की तेरहवीं की पूजा दिल्ली में ही करेंगे|

खैर, अब सब बातें साफ़ हो गई थीं तो हम सबने कल सुबह ही दिल्ली निकलना था| कल सुबह की कोई train उपलब्ध नहीं थी इसलिए हमने बस से जाने का फैसला लिया था| अब चूँकि सुबह हम सभी को दिल्ली के लिए निकलना था इसलिए मेरी सासु माँ को मुझ पर और बच्चों पर बहुत प्यार आ रहा था| मुझे उन्होंने अपने पास बिठा लिया तथा मुझसे कहने लगीं;

सासु माँ: जब काम से फ़ारिग (free) हुई जाओ तो हमसे मिले जर्रूर आयो!

मैं: माँ ये भी कोई कहने वाली बात है! मैं तो आ ही जाऊँगा मगर आप भी भाईसाहब के साथ हमारे घर आ जाना, आपके नाती-नातिन ने आपको घुमाना-फिराना है|

मैंने अभी आयुष और नेहा की जिक्र किया ही था की दोनों एकदम से वहाँ प्रकट हो गए और अपनी नानी जी से लिपटते हुए बोले;

नेहा: हाँ नानी जी, आप सब हमसे मिलना दिल्ली आना|

आयुष: अगर आप मुझसे मिलने नहीं आये न तो मैं आपसे बात नहीं करूँगा!

आयुष अपना प्यारभरा गुस्सा दिखाते हुए बोला|

सासु माँ: अरे दादा! हमार नाती हमसे रूठ जाई तो हम कहाँ जाब? हम जर्रूर तोह सबसे मिले आब और फिर तू दोनों भाई-बहन (आयुष और नेहा) हमका सारा दिल्ली घुमाये दिहो!

सासु माँ बच्चों के साथ बच्ची बन अपना बचपना दिखाते हुए बोलीं|

खाना बनने तक हम चारों की प्यार भरी बातें चलती रही| जब खाना बना तो मुझे खाना भाभी जी ने परोसा और प्यार से बोलीं;

भाभी जी: मानु भैया, आज का खाना मैंने बनाया है ताकि आप दिल्ली जा कर ये न कहो की भाभी ने अपने हाथ से खाना बना कर नहीं खिलाया|

भाभी जी मेरे साथ मज़ाक करते हुए बोलीं|

मैं: भाभी जी, खाना तो आपने बना कर परोस दिया मगर बहुत कम दिया!

मैं मज़ाक करते हुए बोला तो भाभी जी को थोड़ी हैरानी हुई कयोंकि उन्होंने एक व्यक्ति के हिसाब से खाना परोसा था| अब उन्हें क्या पता की मेरी थाली में आयुष और नेहा का भी खाना परोसा जाता है| मेरा मज़ाक समझते हुए भाईसाहब भाभी जी से बोले;

भाईसाहब: अरे तुम नहीं जानती, मानु अकेले खाना थोड़े ही खाता है?! आयुष और नेहा भी मानु के साथ खाना खाते हैं|

भाईसाहब की बात सुन भाभी जी मुस्कुराईं और बोलीं;

भाभी जी: अच्छा तो ये बात है! चलो फिर तो आज आयुष और नेहा मेरे साथ खाना खाएंगे|

भाभी जी ने कह तो दिया मगर दोनों बच्चे कहाँ मानते?! वो तो मुस्कुराते हुए अपना सर ना में हिलाने लगे!

अनिल: भाभी, ये दोनों (आयुष और नेहा) बस जीजू के हाथ से ही खाना खाते हैं! आजतक इन्होने मेरे हाथ से खाना नहीं खाया तो आपके हाथ से क्या खाएंगे?!

अनिल की बात सुन भाभी हँस पड़ीं| तभी आयुष अपनी मामी जी का दिल रखने के लिए बोला;

आयुष: बड़ी मामी जी, मैं खाना पापा जी के हाथ से खाता हूँ लेकिन आज रात मैं आपके साथ सोऊँगा! हाँ लेकिन आपको मुझे 2-2 कहानी सुनानी होगी!

आयुष अपनी दो उँगलियाँ दिखाते हुए भाभी जी से बोला| दरअसल आयुष को करवानी थी अपनी तारीफ इसलिए वो इतने उत्साह से अपनी मामी जी को खुश करने में लगा था, वहीं नेहा को बस मुझसे ही प्यार था इसलिए वो बस चुप रह कर मुस्कुरा रही थी| इधर आयुष का ये बालपन देख भाभी जी को उस पर प्यार आने लगा था;

भाभी जी: Awwww मेरा प्यारा भाँजा! मैं दो क्या 4 कहानी सुनाऊँगी!

भाभी जी आयुष को लाड करते हुए बोलीं| मामी और भाँजे की जोड़ी बनते देख सभी हँस पड़े थे|

रात को खाना खा कर हम सब सोये और सुबह तड़के सभी उठ गए थे| भाईसाहब हम सभी को केसरबाग बस डिपो छोड़ने अपनी गाडी से जा रहे थे| सारा सामान pack था और अब समय था सबसे विदा लेने का| सासु माँ हम सबके जाने से बहुत भावुक थीं, इसलिए मेरे गले लग कर वो रो पड़ीं| मैंने सासु माँ को बड़े प्यार से सँभाला तथा जल्दी आने का वादा किया तब जा कर सासु माँ का रोना थमा| मेरे मस्तक को चूम मुझे आशीर्वाद दे सासु माँ बच्चों से गले लगीं और उनके गाल चूम कर उन्हें प्यार तथा आशीर्वाद दिया| इधर मैं भाभी जी के पाँव छू कर उनका आशीर्वाद लेने लगा, मुझे आशीर्वाद देते हुए भाभी जी मुझे निश्चिंत करते हुए बोलीं; "अम्मा (मेरी सासु माँ) की चिंता मत करना| मैं यहाँ उनका अच्छे से ख्याल रखूँगी|" भाभी जी मुस्कुराते हुए बोलीं| "मुझे पूरा विश्वास है भाभी जी की आप माँ (मेरी सासु माँ) का अच्छे से ख्याल रखेंगी|" मैंने भाभी जी पर अपना विश्वास जताते हुए कहा|

भाभी जी से मिल मैं अनिल के पास पहुँचा और उसे गले लग कर आशीर्वाद देते हुए बोला; "बेटा, अब समय है थोड़ा जिंदगी में संजीदा होने का| अच्छे से पढ़ाई करना और जब छुट्टियाँ हो तो यहाँ माँ (मेरी सासु माँ) के पास आ आकर रहना ताकि उन्हें तेरी कमी महसूस न हो| और हाँ एक और बात, कोई भी तकलीफ हो तो सबसे पहले मुझे फ़ोन करना, अगर मुझे फ़ोन नहीं किया न तो मार खायेगा मेरे से!" मैंने प्यार से अनिल को हड़काया था, जिस पर वो सर हाँ में हिलाते हुए मुस्कुराने लगा था|

फिर मैं मिला जानकी, यानी संगीता की छोटी बहन से; "आपसे बात करने का ज्यादा समय नहीं मिला इसलिए आपको बता ही नहीं पाया की आपने कितना स्वाद खाना बनाकर खिलाया! अगली बार आऊँगा तो सिर्फ आपसे ही बात करूँगा|" मैंने मुस्कुराते हुए कहा तो जानकी हँस पड़ी और बोली; "अगली बार कैहा आबो?" उसके पुछसे सवाल का जवाब मैं देता उससे पहले ही संगीता पीछे से बोल पड़ी; "तोहका आपन जीजा से भेटाये का बहुत जल्दी है!" संगीता की मज़ाक में कही बात पर सभी हँस पड़े थे|

अंत में बारी आई विराट की, मैं उसके पास जाता उससे पहले वो ही आगे आया और मेरे पाँव छूने लगा; "अरे-अरे! यार हम दोस्त हैं, दोस्तों की तरह गले मिल यार!" ये कहते हुए मैंने विराट को गले लगा लिया और उससे बोला; "जब आपकी गर्मी की छुट्टियाँ आएँगी न तब आप दिल्ली घूमने आ जाना, मैं आपको तथा आयुष-नेहा को घुमाऊँगा|" जब मैंने विराट को आने का न्योता दिया तो भाभी जी को चुटकी लेने का मौका मिल गया; "सिर्फ विराट ही आये, हम सब न आयें?" भाभी जी की आवाज में उल्हना था और उनके इस उलहाने पर सभी हँस पड़े थे| अब हाजिर-जवाबी थोड़ी बहुत मुझे भी आती थी इसलिए मैं भी देवर की तरह मज़ाक करते हुए उनसे बोला; "भाभी जी, आप अकेले थोड़े ही न आओगे, आपको तो लेने मैं खुद आऊँगा!" मेरी हाजिर जवाबाई देख सभी ने ठहाका लगाया तथा भाभी जी ने प्यार से मेरा कान पकड़ते हुए कहा; "बहुत शैतान हो तुम तो!"

इधर मैं सबसे मिल रहा था और उधर माँ तथा ससंगीता सभी से बारी-बारी मिल रहे थे| बच्चों का जब सबसे मिलने का मौका आया था तो उन्होंने सभी का खूब प्यार पाया था| जानकी और भाभी जी ने जब बच्चों को पैसे देने चाहिए तो दोनों बच्चों ने अच्छे बच्चे बनते हुए पैसे लेने से मना कर दिया| दोनों बच्चों ने अपनी प्यारी-प्यारी पप्पी दे कर अपनी मौसी और बड़ी मामी जी का मन मोह लिया| मुझे अपने बच्चों को यूँ सबका मन मोहते हुए देख गर्व हो रहा था| ऐसा लगता था की समय से पहले ही मेरे दोनों बच्चे सयाने हो चले हैं!
 

[color=rgb(251,]इकत्तीसवाँ अध्याय: घर संसार[/color]
[color=rgb(84,]भाग - 1[/color]


[color=rgb(40,]अब तक अपने पढ़ा:[/color]

अंत में बारी आई विराट की, मैं उसके पास जाता उससे पहले वो ही आगे आया और मेरे पाँव छूने लगा; "अरे-अरे! यार हम दोस्त हैं, दोस्तों की तरह गले मिल यार!" ये कहते हुए मैंने विराट को गले लगा लिया और उससे बोला; "जब आपकी गर्मी की छुट्टियाँ आएँगी न तब आप दिल्ली घूमने आ जाना, मैं आपको तथा आयुष-नेहा को घुमाऊँगा|" जब मैंने विराट को आने का न्योता दिया तो भाभी जी को चुटकी लेने का मौका मिल गया; "सिर्फ विराट ही आये, हम सब न आयें?" भाभी जी की आवाज में उल्हना था और उनके इस उलहाने पर सभी हँस पड़े थे| अब हाजिर-जवाबी थोड़ी बहुत मुझे भी आती थी इसलिए मैं भी देवर की तरह मज़ाक करते हुए उनसे बोला; "भाभी जी, आप अकेले थोड़े ही न आओगे, आपको तो लेने मैं खुद आऊँगा!" मेरी हाजिर जवाबाई देख सभी ने ठहाका लगाया तथा भाभी जी ने प्यार से मेरा कान पकड़ते हुए कहा; "बहुत शैतान हो तुम तो!"

इधर मैं सबसे मिल रहा था और उधर माँ तथा ससंगीता सभी से बारी-बारी मिल रहे थे| बच्चों का जब सबसे मिलने का मौका आया था तो उन्होंने सभी का खूब प्यार पाया था| जानकी और भाभी जी ने जब बच्चों को पैसे देने चाहिए तो दोनों बच्चों ने अच्छे बच्चे बनते हुए पैसे लेने से मना कर दिया| दोनों बच्चों ने अपनी प्यारी-प्यारी पप्पी दे कर अपनी मौसी और बड़ी मामी जी का मन मोह लिया| मुझे अपने बच्चों को यूँ सबका मन मोहते हुए देख गर्व हो रहा था| ऐसा लगता था की समय से पहले ही मेरे दोनों बच्चे सयाने हो चले हैं!

[color=rgb(65,]अब आगे:[/color]

सबसे विदा ले कर हम भाईसाहब की गाडी में बैठ गए| आगे मैं और भाईसाहब बैठे थे तथा मेरी गोद में आयुष बैठा हुआ चहक रहा था| पीछे माँ, संगीता और नेहा बैठे थे मगर नेहा का सारा ध्यान मुझ पर था की कहीं आयुष के मेरी गोद में बैठने से मेरे बाएँ कँधे में कोई पीड़ा तो नहीं हो रही| "आयुष, ठीक से बैठ ताकि पापा जी को हाथ में दर्द न हो!" नेहा ने आयुष को सतर्क करते हुए कहा तो आयुष ने शैतानी बंद कर दी और चुपचाप बैठ गया|

रास्ता लम्बा था इसलिए हम सुबह घर से जल्दी निकले थे| मैं, भाईसाहब, संगीता और माँ तो कम बात कर रहे थे मगर दोनों बच्चों की बातें खत्म होने का नाम ही नहीं लेती थीं| आयुष मेरी गोद में बैठा था, उसकी नजरें सामने की ओर थीं मगर वो बराबर पीछे से बोल रही अपनी दीदी के सभी सवालों का जवाब दिए जा रहा था| कभी दोनों भाई-बहन आती जाती गाड़ियों, बसों, ट्रकों को देखते हुए शोर मचाने लगते तो कभी ben 10, ninja hatori और छोटा भीम cartoon को ले कर बातें करने लगते|

खैर, हम सब सुबह 9 बजे केसरबाग बस अड्डे पहुँचे और क़िस्मत से दिल्ली जाने वाली बस भी मिल गई जो की 10 मिनट में छूटने वाली थी| मैंने फटाफट super deluxe volvo बस की 5 टिकट कटाई और तबतक भाईसाहब ने सारा सामान बस में रखवाया तथा मैंने सबको अंदर बस में उनकी सीटों पर बिठाया| माँ और आयुष की सीट सबसे आगे थी, उनके ठीक पीछे मैंने नेहा और संगीता को बिठाया| मेरी सीट नेहा और संगीता की सीट के सामने वाली line में aisle सीट थी| सब को बिठा कर मैं नीचे भाईसाहब से बात करने आया, "भाईसाहब, वैसे कहने की जर्रूरत तो नहीं पर फिर भी एक माँ (मेरी सासु माँ) का बेटा हूँ तो कह रहा हूँ, माँ ने आपको बहुत याद किया है और आपके आने की ख़ुशी उनके चेहरे पर दिखती है| उन्हें खूब सारा प्यार देना तथा पिताजी (मेरे ससुर जी) की कमी महसूस होने मत देना|

अनिल छोटा है और कई बार उसका मन इधर-उधर भटक जाता है, तब उसे एक बड़े भाई की नहीं दोस्त की जर्रूरत होती है जो उसे सही रास्ता दिखाए| आप वो दोस्त बनकर ही उससे बात करना और उसे सही रास्ता दिखाना| बाकी मैं अपने काम को सँभाल कर गाँव का चक्कर अवश्य लगाऊँगा, बीच में आपको समय मिले तो आप सभी दिल्ली में हमारे यहाँ घूमने आना|" मेरी बात सुन भाईसाहब मुस्कुराये तथा मुझे गले लगाते हुए बोले; "मानु, तू ज़रा भी चिंता मत कर| मैं माँ को किसी चीज की कमी नहीं होने दूँगा और रही बात अनिल की तो वो मेरा भाई नहीं बेटे जैसा है, मैं उसे दोस्त बन कर ही सही रास्ता दिखाऊँगा|" भाईसाहब की बात में ख़ुशी और आत्मविश्वास छलक रहा था जिससे मुझे विश्वास हो गया था की यहाँ गाँव में मेरी सासु माँ को अब कोई तकलीफ नहीं होगी|

हमारे खाने-पीने के लिए चिप्स, बिस्किट, चॉकलेट, पानी, thumbs up आदि ले कर मैं और भाईसाहब बस में चढ़े| भाईसाहब ने मेरी माँ के पाँव छू कर उनसे विदाई ली, फिर वो पहुँचे आयुष के पास तो आयुष अपनी सीट पर खड़े होते हुए उनके गले लग गया और बोला; "बड़े मामा जी, आप मुझसे मिलने दिल्ली आओगे न?" आयुष का प्यारभरा सवाल सुन भाईसाहब मुस्कुरा दिए और उसके सर को चूमते हुए बोले; "बिलकुल आऊँगा और जब आऊँगा न तो आपके लिए खूब सारी चॉकलेट और खिलोने लाऊँगा!" इतना सुन आयुष ख़ुशी के मारे कूदने लगा तथा उसका ये बालपन देख हम सभी मुस्कुराने लगे| फिर बारी आई नेहा की, वो अपने मामा जी के गले लग गई और थोड़ी भावुक हो गई; "बड़े मामा जी, नानी जी का ख्याल रखना और मैं बड़ी मामी जी के नंबर पर कॉल करूँ तो मेरी बात उनसे करवा देना|" नेहा को अपनी नानी जी की चिंता थी क्योंकि इतनी सी उम्र में वो अपने नाना जी की मृत्यु होने पर अपनी नानी जी का अकेलापन महसूस करने लगी थी| "आपकी नानी जी की आप जरा भी चिंता मत करना| मैं उन्हें एक-दो दिन में फ़ोन खरीद कर दे दूँगा तो आपका जब मन करे आप अपनी नानी जी से जी भरकर बात करना| आप बस है न अपने पापा जी का ध्यान रखना!" भाईसहाब ने नेहा को आश्वस्त करते हुए कहा तथा उसे मेरी देखभाल करने की जिम्मेदारी दे दी| नेहा ने सर हाँ में हिलाया तथा अपने बड़े मामा जी के पाँव छु कर उनका आशीर्वाद लिया|

अंत में बारी आई संगीता की और वो इस समय थोड़ी भावुक हो गई थी| "मुन्नी, इतने सालों बाद मुझे मेरी बहना मिली मगर हमें बात करने का समय ही नहीं मिला| अगलीबार आना तो एक-आध महीना रुकना ताकि तुझसे आराम से बात तो कर सकूँ|" भाईसाहब भावुक होते हुए बोले| "जी भाईसाहब! आप अपना तथा माँ का ख्याल रखना, माँ कभी-कभी जिद्दी हो जाती हैं और तब वो सिर्फ आयुष के पापा की बात मानती हैं| और अनिल पर नज़र रखना, वो कभी-कभी लापरवाह हो जाता है, उसके ज़रा कान खींच कर रखना!" संगीता ये कहते हुए भावुक हो गई थी, दरअसल वो अपना दुःख मेरे सामने छुपा रही थी| उसे डर था की कहीं उसका ये डर देख मैं भावुक न हो जाऊँ| अब मुझे ही मेरी पत्नी को हँसाना था इसलिए मैं थोड़ा मज़ाक करते हुए बीच में बोल पड़ा; "भाईसाहब, संगीता अगर एक-आध महीने के लिए गाँव आ गई तो मेरा क्या होगा?" मेरे पूछे इस सवाल पर भाईसाहब और मैं जोर से हँसने लगे, जब संगीता ने हम दोनों को हँसते हुए देखा तो उसने प्यार से मेरे दाएँ बाजू पर घूसा मारा| उधर आयुष को मेरी बात समझ नहीं आई थी, उसने जो बात समझी उससे उसने अपने फायदे की बात सोची; "पापा जी, जब मम्मी गाँव जायेंगी न तो हम सब घूमने चलेंगे!" आयुष की ये बात इतनी मज़ाकिया थी की हम सभी खिलखिलाकर हँसने लगे| "अच्छा? तो तू मुझे घर से भगाने के चक्कर में है?" संगीता ने प्यारभरे गुस्से से आयुष से कहा तो आयुष अपनी दादी जी से लिपट कर छुपने लगा| "घर चल, फिर तुझे बताती हूँ!" संगीता अपने प्यारभरे गुस्से में आयुष से बोली| माँ-बेटे की ये प्यारी सी नोक-झोंक देख हम सभी हँसने लगे थे|

बस के चलने का समय हो रहा था इसलिए भाईसाहब सबको "bye" कह घर चल दिए| इधर बच्चों की ये पहली बस यात्रा थी इसलिए मैं उन्हें समझाते हुए बोला; "बेटा अगर bathroom जाना है तो यहीं चले जाओ, क्योंकि अब बस कहाँ रुकेगी ये नहीं पता|" बच्चे मेरी बात मान गए और मेरे साथ bathroom के लिए चल पड़े| हम जैसे ही bathroom से आये की बस का दरवाजा बंद हुआ और बस चल पड़ी| बच्चों और संगीता की super deluxe volvo बस में पहली यात्रा थी इसलिए तीनों उत्साहित थे| बच्चों ने अपनी-अपनी सीट के ऊपर लगी light और AC का outlet देखा तो उन्होंने मुझसे उसके बारे में पुछा| "बेटा, ये reading light है| रात में बस में जब अँधेरा होता है उस समय यदि आपको कुछ पढ़ना है तो आप ये light जला सकते हो| Light के बगल में AC का outlet है, गर्मियों में इसमें से ठंडी-ठंडी हवा आती है|" बच्चों को AC बहुत पसंद था इसलिए बस में लगे AC की बात सुन वो बहुत खुश हुए| आयुष तो कहने लगा की अभी AC चलाया जाए, तो इस पर माँ अपना बचपना दिखाते हुए बोलीं; "बेटा, अगर तूने AC चला दिया तो मेरी तो कुल्फी जम जाएगी!" माँ की बात सुन आयुष ने माँ की कही बात को सच मान लिया और कल्पना करने लगा की उसकी दादी जी की कुल्फी जमने पर कैसी दिखेंगी इसलिए आयुष खिलखिलाकर हँसने लगा|

"पापा जी, बस में तो बहुत बड़े शीशे हैं और ये तो बस बहुत ऊँची है!" नेहा अपने भोलेपन में बोली| "हाँ जी बेटा, इस बस को बनाया ही इस तरह जाता है ताकि ये बस ऊँची रहे| हम जहाँ बैठे हैं इसके ठीक नीचे हम सभी का सामान रखा है, पीछे की ओर AC तथा बस का engine लगा है|" मैंने नेहा के सर पर हाथ फेरते हुए उसे समझा कर उसकी जिज्ञासा शांत की| उधर संगीता, नेहा की बगल में यानी खिड़की के पास बैठी थी, अब उसे करनी थी मुझसे बात इसलिए उसने नेहा को खिड़की पर बैठने को कहा तथा खुद नेहा की जगह aisle वाली सीट पर बैठ गई| "आयुष के पापा, ये सीट तो बड़ी मुलायम और गद्देदार है!" संगीता बड़े प्यार से और धीरे से मुझसे बोली ताकि कोई अन्य हमारी बात न सुन ले| मैं समझ गया की संगीता जानबबूझ कर मुझे रिझाने के लिए ऐसा बोल रही है| संगीता की इस कोशिश को देख मुझे उस पर प्यार आ रहा था और मेरे चेहरे पर मुस्कान फैली गई थी| "नेहा की मम्मी जी, वो तो ट्रैन नहीं मिली इसलिए आपको बस में ले जा रहा हूँ, वरना तो मैंने आज आपको first class AC train में ले जाना था!" मैंने भी संगीता को खुश करने के लिए ये उसी के अंदाज में थोड़ा रोमांटिक होते हुए बात बोली| संगीता मेरी बातों में छुपे रोमांस को भाँप गई थी, तभी तो उसके चेहरे पर शर्मा और हया की महीन रेखा खिंच आई थी| संगीता और अधिक न शर्माए इसलिए मैंने उसका ध्यान चिप्स खाने में लगा दिया|

मैंने एक पैकेट चिप्स माँ और आयुष को दिया तथा एक पैकेट चिप्स मैंने नेहा को दिया| जब मैने नेहा को चिप्स का पैकेट दिया तो उसका चेहरा ख़ुशी के मारे ऐसा खिल गया की मेरा दिल ही धड़कना भूल गया! "Thank you पापा जी!" नेहा ख़ुशी से चहकते हुए बोली और फिर चिप्स खाने में व्यस्त हो गई| बचे हम मियाँ-बीवी तो हमने एक चिप्स के पैकेट में से चिप्स खाना शुरू कर दिया|

कुछ देर बाद आयुष की शैतानियाँ शुरू हुईं, वो अपनी सीट पर खड़ा हो कर पीछे की ओर मुँह कर अपनी दीदी तथा मुझसे बात करने लगा| आयुष कहीं गिर न जाए इसलिए संगीता उसे आराम से बैठने को कहने लगी मगर आयुष सुने तब न?! "बेटा आप यहाँ पीछे आ जाओ और नेहा बेटा, आप अपनी दादी जी के साथ थोड़ी देर के लिए बैठ जाओ|" मैंने दोनों बच्चो को प्यार से समझाते हुए कहा तो दोनों बच्चे मेरी बात मान गए| पीछे आ कर आयुष संगीता वाली सीट (aisle सीट) पर बैठ गया और मुझसे बस को ले कर तरह-तरह के सवाल पूछने लगा| अब मैं कोई engineer तो था नहीं जो सब कुछ जानता हूँगा, मेरे पास जितना भी ज्ञान था उसे मैं आयुष के संग बाँट कर आयुष की जिज्ञासा शांत करने लगा| आयुष छोटा था इसलिए उसकी जिज्ञासा बड़ी थी और इतनी जल्दी शांत होने वाली नहीं थी| संगीता ने जब आयुष को यूँ सवाल पूछते देखा तो वो आयुष को टोकते हुए बोली; "तू चुप-चाप नहीं बैठ सकता?! तबसे पटर-पटर बोले जा रहा है!" संगीता की झिड़की सुन आयुष डर के मारे चुप हो गया था| अब मुझे अपने बेटे पर तरस आ रहा था इसलिए मैंने उसे अपने पास बुलाया और गोदी ले कर उसके सर जो चूमते हुए उसे पुचकारने लगा| संगीता ने जब बाप-बेटे का ये प्यार-दुलार देखा तो उसकी नाक पर वही जाना-पहचाना प्यारा सा गुस्सा आ बैठा| अब संगीता को भी मनाना जर्रूरी था इसलिए मैंने खुसफुसा कर आयुष को आगे करते हुए बोला; "बेटा, मम्मी को माफ़ कर दो और जा कर मेरी ओर से उनके गाल पर पप्पी दे दो!" आयुष मेरी बात मान कर अपनी मम्मी के पास पहुँचा और सीट पर चढ़ कर संगीता के बाएँ गाल पर पप्पी कर के बोला; "ये पप्पी पापा जी ने भेजी है!" आयुष अपने उत्साह में थोड़ा जोर से बोल गया जिससे आस-पास बैठे लोग ये बात सुन कर हँसने लगे! उधर संगीता ऐसी शरमाई की उसके गाल लालम-लाल हो गए थे! "Shut up आयुष!" नेहा आयुष को डाँटते हुए बोली| आयुष को नेहा की डाँट का कोई फर्क नहीं पड़ा वो तो नेहा को जीभ चिढ़ाते हुए अपनी मम्मी से लिपट गया|

कुछ घंटों बाद बस एक ढाबे पर रुकी ताकि यात्रीगण चाय-नाश्ता कर लें| अब भूख लगी थी तो घर से भाभी जी ने जो सबके लिए आलू के परांठें पैक किये थे वो हमने बस में बैठे हुए ही खाये| आयुष को परांठे खाने के बाद भी भूख लगी थी इसलिए वो समोसे खाना चाहता था, तब संगीता उसे समझाते हुए बोली; "बेटा, ज्यादा खा लिया न तो तुझे सुसु-potty आएगी और ये बस अब कहीं नहीं रुकेगी फिर तू सुसु-potty कहाँ जायेगा?! इस बस में तो खिड़की भी नहीं खुलती जिससे तू खिड़की से बाहर निकल कर सुसु-potty कर ले!" अपनी मम्मी की बात सुन बेचारा आयुष सोच में पड़ गया| ऊपर से संगीता ने जो बस खिड़की से निकल कर सुसु-potty करने की बात कही थी उस पर आयुष को गुस्सा आने लगा था की उसकी मम्मी उसका यूँ मज़ाक उड़ा रही हैं, जबकि संगीता की इस बात पर हम सब को बहुत हँसी आई थी| मुझे आयुष को तरसाना अच्छा नहीं लग रहा था, मैं उसके लिए समोसे लेने जा ही रहा था की मेरी माँ ने आयुष को प्यार से समझाया; "बेटा, जब बस से सफर करते हैं न तो थोड़ा कम ही खाते हैं ताकि पेट खराब न हो, दस्त न लग जाएँ, उलटी न होने लगे और बार-बार सुसु-potty न जाना पड़े| अगर आप बीमार पड़ गए तो हमारे लिए बस बार-बार नहीं रुकेगी न?!

हम ऐसा करते हैं की जब हम दिल्ली पहुँचेंगे न तब मैं आपके लिए समोसे और चौमीन पैक करवा लूँगी, वो आप घर जा कर खा लेना| ठीक है बेटा?" माँ ने इतने प्यार से आयुष को बात समझाई को भी खुश हो गया और अपनी दादी जी से लिपट गया| फिर माँ ने मुझे रास्ते के लिए चिप्स-बिस्कुट-नमकीन-फल आदि लेने को कहा ताकि बच्चों को थोड़ा-थोड़ा खिला कर भूखे न रहने दें| मैं सभी खाने-पीने की चीजें ले आया और अपनी सीट पर बैठ गया| बस फिर से चल पड़ी और अगला पड़ाव करीब ढाई बजे आया| ड्राइवर साहब ने बस सभी यात्रीगण के भोजन करने के लिए रोकी थी| जब बस रुकी तो आयुष अपने प्यारभरे गुस्से से अपनी मम्मी को देखने लगा| आयुष के इस प्यारभरे गुस्से का कारण ये था की संगीता ने आयुष को ये कह कर डरा दिया था की अब बस दिल्ली के अलावा कहीं नहीं रुकेगी और बेचारा आयुष बाथरूम नहीं जा पायेगा बस इसी वजह से आयुष गुस्सा था की उसकी मम्मी ने उससे झूठ बोला!! आयुष का ये प्यारभरा गुस्सा देख मुझे हँसी आ रही थी, वहीं संगीता हैरान थी की भला आयुष उसे यूँ गुस्से से क्यों देख रहा है?

"चलो बेटा हम दोनों बाथरूम हो कर आते हैं!" मैंने आयुष का ध्यान बँटाया तो वो मेरी गोदी में चढ़ गया| संगीता को अब भी आयुष का गुस्सा समझ नहीं आया था, तब माँ ने उसे आयुष के गुस्से का कारण बताया तो संगीता हँस पड़ी| बाप-बेटा बाथरूम से हो कर निकले तो मैंने आयुष को खुश करने के लिए पुछा की वो क्या खाना चाहेगा, इस पर आयुष बड़े तपाक से बोला; "नहीं पापा जी, मैं कुछ नहीं खाऊँगा, अगर मुझे potty आ गई तो?" उस समय वहाँ से हमारी बस के driver साहब जा रहे थे, उन्होंने आयुष की बात सुन ली थी इसलिए वो एकदम से बोले; "अरे मुन्ना, तू तनिको चिंता नाहीं करो, हम तोहरे खतिर बस रोक देब!" Driver साहब की कही बात की, वो आयुष के लिए बस रोक देंगे, आयुष के लिए बड़े मायने रखती थी| उसे लग रहा था की वो बहुत बड़ी हस्ती है तभी तो सिर्फ उसके लिए बस रोकी जा रही है! लेकिन बजाए इस बात का घमंड करने के की driver साहब सिर्फ उसके potty जाने के लिए बस रोक रहे हैं, आयुष बड़े अदब से मुस्कुराते हुए driver साहब से बोला; "thank you अंकल जी! लेकिन मेरी वजह से कोई late हो ये अच्छी बात नहीं|" आयुष की बात सुन driver साहब बड़े खुश हुए और उसे आशीर्वाद देने लगे; "शाबाश मुन्ना, जीते रहो!" आयुष अपनी बड़ाई सुन कर शर्माने लगा था तथा मुझसे लिपट कर छुपने लगा| तभी driver साहब मेरी तारीफ करते हुए बोले की मैनें आयुष को कितने अच्छे संस्कार दिए हैं|

खैर, हम बाप-बेटा बस में लौट आये और अपनी-अपनी जगह बैठ गए| बस अभी चली नहीं थी इसलिए संगीता ने मुझे अपने पास बैठने का मूक इशारा किया| मैं उठ कर संगीता के पास बैठा तो वो मेरे कँधे पर सर रख कर आराम से बैठ गई| ये ख़ामोशी ही हमारी एक ख़ास जुबान थी जिसके जरिये हम एक-दूसरे के मन की बातें जान जाते थे|

कुछ समय बाद बस चल पड़ी और मैं पुनः अपनी सीट पर बैठ गया| माँ, नेहा तथा संगीता का समय तो सो कर, मोबाइल में गेम खेल कर या कोई वीडियो देख कर पार हो जाता था, बचे हम बाप-बेटा तो हमारी दिलचस्पी खिड़की से बाहर देखने में अधिक थी| मैंने गौर किया तो पाया की सुबह से ले कर अभी तक आयुष एक पल के लिए भी नहीं सोया था, कभी वो गेम खेलता कभी मुझसे बात करता तो कभी खिड़की के बाहर आती-जाती गाड़ियाँ देख कर खुश रहता| जब सब सोये हुए थे तब मैंने आयुष को इशारा कर अपने पास बुलाया तथा उसे गोदी ले कर खुसफुसा कर उससे पूछने लगा: "बेटा, आपको नींद नहीं आ रही?" मेर सवाल सुन आयुष बड़े उत्साह से बोला; "पापा जी, मुझे न खिड़की से बाहर गाड़ियाँ देखना अच्छा लगता है| इतनी ऊँचाई से गाड़ियाँ छोटी-छोटी दिखती हैं, बिलकुल मेरी hotwheels वाली गाड़ियों की तरह| और न वो जब दूसरी बस हमारी बस की बगल से horn बजाते हुए निकलती है न तो मुझे बड़ा मज़ा आता है!" आयुष की ये भोलीभाली बातें सुन मेरे मन को करार मिल रहा था, ऐसा लगता था मानो मैं अपना बचपन अपनी आँखों एक आगे देख रहा हूँ| "बेटा, आपको पता है, आपका ये शौक बिलकुल मेरी तरह है! मैं भी जब अपने माँ-पिताजी के साथ बस से सफर करता था तो मैं जागते हुए गाड़ियाँ, बस, ट्रक आदि देखा करता था| जब हम रात में सफर करते थे तब दूर किसी के घर से कोई रौशनी आती तो उसे देख कर ये कल्पना करता की अगर मैं उस घर में होता तो क्या कर रहा होता? और तो और सड़क किनारे बने ढाबों की रंगबिरंगी लाइटें देख कर मैं बहुत खुश होता था|" मेरी बात सुन आयुष को खुद पर गर्व होने लगा था तथा उसके चेहरे पर एक प्यारी सी मुस्कान खिल गई थी| हर बेटे को ये जानकार ख़ुशी होती है की उसके पसंद-नपसंद अपने पिताजी जैसे हैं, यही कारन था की आयुष को खुद पर इतना गर्व हो रहा था|

मैं aisle सीट पर बैठा था और वहाँ से बस के सामने का शीशा दिखता था इसलिए मैंने आयुष को अपनी गोदी में सामने की ओर मुँह कर के बिठा दिया| बस के सामने जो भी गाडी या बस दिखती उसे देख आयुष ख़ुशी से ऊँगली दिखा कर मेरा ध्यान उस तरफ खींचता, जवाब में मैं आयुष के सर को चूम लेता| बस फिर क्या था, हम बाप-बेटे के लिए ये एक नया खेल बन गया था| आयुष मुझे गाड़ियाँ दिखाता और मैं उसका सर चूम लेता!

कुछ देर बाद माँ की नींद खुली और वो आयुष को ढूँढने लगीं, जब उन्होंने पीछे मुड़कर हम बाप-बेटे को अपना खेल खेलते देखा तो माँ मुस्कुराने लगीं| फिर कुछ देर बाद संगीता जागी और उसने भी ये खेल देखा तो वो भी मुस्कुराने लगी| तभी नेहा जागी और आयुष को मेरी गोदी में बैठा देख उसकी भी इच्छा मेरी गोदी में बैठने की हुई| उसने अपनी मम्मी की तरफ देखा और इशारों ही इशारे में अपनी इच्छा जाहिर की| संगीता मुस्कुराई और आयुष को अपने पास बुलाते हुए बोली; "आयुष, बेटा एक मिनट सुन तो?" अपनी माँ की आवाज सुन आयुष मेरी गोदी से उतर कर अपनी मम्मी के पास आ गया| इस मौके का फायदा उठा कर नेहा अपनी खिड़की वाली सीट से उठी और एकदम से मेरी गोदी में बैठ गई| जब आयुष ने ये दृश्य देखा तो वो सब समझ गया की ये मिली-बगत माँ-बेटी की थी इसलिए उसके चेहरे पर फिर से प्यारभरा गुस्सा आ गया| आयुष का ये प्यारभरा गुस्सा देख संगीता और मुझे हँसी आ रही थी, संगीता तो हँस रही थी मगर मैं अपनी हँसी दबा रहा था क्योंकि अपनी मम्मी को हँसता हुआ देख आयुष का प्यारभरा गुस्सा बढ़ता जा रहा था, ऐसे में मेरे हँसने पर आयुष मुझ पर भी गुसा हो जाता! अब मैं अपने बच्चे के गुस्से का कारण नहीं बनना चाहता था, मैं आयुष को मनाऊँ उससे पहले ही माँ ने पीछे मुड़कर संगीता को हँसते हुए देख लिया| फिर उनकी नज़र पड़ी आयुष पर जो मुँह फुलाये अपना गुस्सा दिखा रहा था| माँ ने अपनी दादी होने का फ़र्ज़ निभाया और आयुष को पुचकारते हुए बोली; "आजा मेरा बच्चा! तू मेरे पास आ जा, इन सब शैतानों को छोड़!" माँ ने बड़े लाड-प्यार से आयुष को अपने पास बुलाया और उसे अपनी गोदी में बिठा कर उसे बहलाने लग गईं| आयुष ने मुँह फुलाये हुए ही नेहा और अपनी मम्मी की शिकायत अपनी दादी जी से कर दी थी|

अब माँ को आयुष की बचकानी बात पर आ रही थी हँसी लेकिन वो हँसे तो हँसे कैसे? माँ एकदम से पीछे मुड़ीं और मुझे और संगीता को देखते हुए आयुष की तरह अपना झूठ गुस्सा दिखाते हुए बोलीं; "क्यों परेशान करते हो मेरे पोते को तुम दोनों?!" आयुष को लगा की माँ मुझे बेफालतू में डाँट रही हैं इसलिए वो मेरा बचाव करते हुए बोला; "नहीं दादी जी, पापा जी ने कुछ नहीं किया! मम्मी और दीदी ने मुझे पापा जी की गोदी से हटाया!"आयुष की बात सुन माँ हँस पड़ीं और नेहा तथा संगीता को अपना प्यारभरा गुस्सा दिखाते हुए बोलीं; "घर चलो, तुम दोनों को मैं डंडे से मार लगाती हूँ! बताओ मेरे पोते को तंग करते हो तुम दोनों?!" ये सुन संगीता और नेहा डरने के बजाए मुस्कुरा रहे थे, ये दृश्य देख आयुष फिर से उनकी शिकायत करने लगा; "देखो दादी जी, दीदी और मम्मी हँस रहे हैं!" अब माँ ने फिर से प्यारभरे गुस्से से दोनों माँ-बेटी को देखा और बोलीं; "तुम दोनों हँस रहे हो?" देख माँ भी रहीं थीं की दोनों माँ-बेटी हँस रही हैं लेकिन उन्हें आयुष के साथ थोड़ी मस्ती करनी थी इसीलिए वो ये सवाल पूछ रहीं थीं| अब मुझे भी माँ के साथ मिल कर आयुष से मस्ती करनी थी इसलिए मैं भी मज़ाक करते हुए बोला; "आयुष, ऐसा करते हैं की हम बस रुकवा कर दोनों माँ-बेटी को उतार देते हैं, ये दोनों माँ-बेटी अकेले पैदल-पैदल आएँगी!" आयुष मेरी बात तुरंत मान गया और हाँ में सर हिलाने लगा| अब संगीता को मस्ती सूझी और वो भी इस खेल में कूद पड़ी; "ऐसे कैसे उतर दोगे? पैसे दिए हैं मैंने अपने और नेहा की टिकट के! टिकट तो आयुष की नहीं ली थी, बस वाले भैया अगर किसी को उतारेंगे तो आयुष को उतरेंगे!" संगीता मज़ाक में अकड़ते हुए बोली| आयुष को संगीता का मज़ाक सच्चा लगा और वो बेचारा घबराने लगा, कहीं आयुष रो न पड़े इसलिए मैंने ही उसका पक्ष लिया; "अरे ऐसे कैसे उतार दोगे आयुष को? जानती भी हो की आयुष और driver साहब की दोस्ती है! Driver साहब आयुष को नहीं तुम सब को उतार देंगे!" मेरी बात सुन आयुष को इत्मीनान आया और वो खुश हो गया| "आजा मेरा बेटा" ये कहते हुए माँ ने आयुष का ध्यान अपनी बातों में लगा लिया तथा उसे तरह-तरह के खाने-पीने का प्रलोभन देने लगीं| अपनी दादी द्वारा मिले खाने-पीने के प्रलोभन से आयुष फिर से मुस्कुराने लगा था और अपनी दादी जी की खाने-पीने की बातों से उसके मुँह में पानी आ गया था|

इधर नेहा मेरे आयुष का पक्ष लेने से दुखी नहीं थी, वो तो मेरी गोदी में बैठ कर चहक रही थी| "पापा जी, आप मुझे और आयुष को खुश रखने के लिए हमारा पक्ष लेते हो न?" नेहा का प्यारा सवाल सुन मैं मुस्कुरा दिया और बोला; "हाँ जी बेटा!" नेहा बहुत समझदार थी और वो मेरी बातों का अर्थ अच्छे से समझती थी, वो जानती थी की कब मैं उसका या आयुष का पक्ष लेता हूँ|

कुछ देर बाद बस रुकी और मेरी बगल में बैठा लड़का उतर गया, नेहा तब तक अपनी मम्मी के साथ अपनी सीट पर बैठी हुई थी| अगले मोड़ पर बस फिर रुकी तथा वहाँ से एक लड़की चढ़ी, अब चूँकि बस में कोई सीट खाली नहीं थी तो वो लड़की सीधा मेरे सामने आ कर खड़ी हो गई| मैं उठ कर खड़ा हुआ तो वो लड़की खिड़की पर बैठ गई तथा मैं वापस अपनी aisle वाली सीट पर बैठ गया| संगीता ने जब मुझे एक लड़की के साथ बैठे देखा तो वो जलने लगी और जले भी क्यों न, लड़की थी ही इतनी सुंदर!

मैं संगीता की जलन से वाक़िफ़ था इसलिए मैं उस लड़की की तरफ देख भी नहीं रहा था, मेरा ध्यान सामने की ओर था| संगीता को मुझे उस लड़की के पास से उठाना था इसलिए वो कोई तिगड़म सोचने लगी| इधर मेरे दिमाग में एक तरकीब आ गई जिससे संगीता की जलन का इलाज भी हो जाता और मेरी बेटी की अजनबियों से बात करने की झिझक भी खत्म हो जाती| "नेहा, बेटा इधर आओ|" मैंने नेहा को अपने पास बुलाया तथा उसे समझाते हुए बोला; "बेटा, आप यहाँ मेरी सीट पर दीदी के साथ बैठ जाओगे? मैं थोड़ी देर आपकी मम्मी के पास बैठ कर उनसे कुछ जर्रूरी बात कर लूँगा!" मेरी बात सुन नेहा ने अच्छे बच्चों की तरह मेरी बात मानी और मेरी जगह बैठ गई| जब मैं संगीता के पास बैठने लगा तो वो बहुत खुश हुई, अगर यहाँ कोई नहीं होता तो वो पक्का मुझे चूम लेती! जैसे ही मैं बैठा की संगीता ने एकदम से मेरा दायाँ हाथ अपने दोनों हाथों से जकड़ लिया और मेरी दाईं बाजू को चूमते हुए बोली; "thank you जानू!" मैं संगीता के मुझे धन्यवाद देने का कारन जानता था इसलिए मैं मुस्कुराने लगा|

इधर हम मियाँ-बीवी की बातें शुरू हुईं और उधर उस लड़की ने नेहा से बातचीत शुरू कर दी| एक लड़की नेहा से बात कर रही है यही सोच कर मैं शांत था वरना अगर वहाँ कोई लड़का बैठा होता तो मैं कतई नेहा को वहाँ अकेले नहीं बिठाता| बहरहाल, नेहा बड़े अच्छे से उस लड़की से बात कर रही थी और ये देख कर मुझे ख़ुशी हो रही थी की मेरी बेटी धीरे-धीरे इस दुनिया से जुड़ती जा रही है|

बातें करते हुए हमारा समय बीता और हम दिल्ली रात 7 बजे पहुँच गए| बस रुकी तो आयुष सबसे पहले उरने के लिए उतावला हो गया; "बेटा, आप और नेहा सबसे आखरी में उतरोगे क्योंकि आपको ये देखना है की हमारा कुछ समान पीछे छूट तो नहीं गया|" मैंने आयुष को समझाते हुए कहा तो वो मेरी बात मान गया| पहले में उतरा, फिर मैंने सहारा दे कर माँ को उतारा| फिर आई बारी संगीता की, जब मैं संगीता को सहारा दे कर उतारने लगा तो वो ऐसे लजाई जैसे मैंने सबके सामने उसके गालों को चूम लिया हो! अंत में उतरे बच्चे, नेहा आगे थी और आयुष सबसे पीछे| आयुष ने driver साहब की तरफ देखा और हाथ जोड़कर उन्हें "thank you अंकल जी" कहा| एक छोटे बच्चे के thank you कहने से driver साहब बड़े खुश हुए, उन्हें जवाब देना तो आता नहीं था इसलिए उन्होंने भी मुस्कुराते हुए आयुष को "thank you बेटा" कहा|

बस से उतर कर माँ, संगीता और बच्चे एक तरफ खड़े थे तथा मैं बस के नीचे रखा हमारा सामान ले रहा था| बस conductor ने जब मुझे suitcase दिया तो मैंने गलती से suitcase अपने बाएँ हाथ से पकड़ कर उठा लिया! Suitcase में वजन था, अब मैंने छाती पर पट्टी नहीं पहनी थी जिस कारण एकदम से मेरे बाएँ हाथ पर वजन पड़ा तो मेरे बायें हाथ की माँसपेशी में खिंचाव पैदा हुआ नतीजन मेरे बाएँ कँधे के पास लगे टांकें टूट गए! मुझे एकदम से असहनीय दर्द हुआ और मैं सर झुका कर अपना दर्द भरी आह अपने मुँह में दबाने लगा क्योंकि मैं नहीं चाहता था की मेरा परिवार मुझे यूँ दर्द में देख कर चिंता करे|

दर्द तो मैं जैसे-तैसे बर्दाश्त कर रहा था मगर मैंने ये नहीं देखा की मेरे टांकें टूटने से जख्म से खून निकलने लगा है, पहले उस खून ने रुई की पट्टी जो की मेरे जख्म पर बँधी थी उसे भिगोया और उसके बाद खून मेरी कमीज के ऊपर उभरने लगा|

एक छोटा बैग मैंने बाएँ हाथ से उठाया तथा उसे अपने बाएँ कँधे पर टाँग लिया और दाहिने हाथ से मैंने suitcase उठा लिया| बाएँ हाथ से मैंने जो छोटा बैग अपने कँधे पर टाँगा हुआ था उससे मेरी कमीज पर उभर रहा खून छुप गया था| समान उठाये जब मैं अपने परिवार के पास पहुँचा तो नेहा ने बताया की उसने अपनी मम्मी के फ़ोन से taxi बुक कर ली है और taxi वाला बाहर हमारा इंतज़ार कर रहा है इसलिए हम बाहर की ओर चल पड़े| माँ अपनी पोती नेहा का हाथ पकड़ कर चल रहीं थीं| संगीता ने आयुष का हाथ थामा हुआ था और मैं सामान लिए हुए सबसे पीछे आ रहा था| हम में से किसी का भी ध्यान मेरी कमीज और उस पर उभर रहे खून के निशान पर नहीं गया था|

Taxi के नज़दीक पहुँच, driver साहब ने मेरे हाथ से suitcase लिया तथा वो गाडी के ऊपर suitcase बाँधने में लग गए| आयुष आगे बैठना चाहता था मगर आगे कम जगह थी इसलिए आयुष को पीछे अपनी दादी जी की गोदी में बैठना पड़ा| नेहा भी पीछे ही बैठी थी और मैं आगे बैठे हुए अपना दर्द दाँत पीसते हुए बर्दाश्त करने की कोशिश कर रहा था| सारे रास्ते आयुष की बातें चलती रहीं और वो अपनी बातों में सभी का मन लगाए हुए था| जब आयुष मुझसे कुछ पूछता तो मुझे अपना दर्द भूल कर उसकी बात का जवाब मुस्कुराते हुए देना पड़ता क्योंकि अगर किसी को भी मेरे दर्द के बारे में पता चलता तो सभी घबरा जाते|

लगभग घंटे भर बाद हम घर पहुँचे, सबसे पहले मैं taxi से उतरा और तभी मेरा ध्यान मेरी कमीज पर गया जो की मेरे शरीर से खून निकलने के कारण काफी लाल हो चुकी थी! मैं कुछ कहता या करता उससे पहले ही संगीता गाडी से उतरी तथा उसकी नज़र मेरी खून से रंगी कमीज पर पड़ी; "ये...ये क्या हुआ आपको?" संगीता घबराते हुए बोली| मैं संगीता को शांत करता उससे पहले ही नेहा और माँ ने भी मेरी कमीज में लगा खून देख लिया! अब तक driver साहब और आयुष ने भी मेरी कमीज में लगा खून देख लिया था! "बेटा ये खून?" माँ चिंता करती हुई बोलीं| "वो जब मैं बस के नीचे से suitcase उठा रहा था तब गलती से मैंने अपने बाएँ हाथ का इस्तेमाल किया था तभी से मुझे बहुत दर्द हो रहा था, लेकिन तब मैंने नहीं देखा था की खून निकल रहा हो?!" मैंने अपनी कमीज के बटन खोलते हुए कहा| कमीज के बटन खुले तो पता चला की रुई की पट्टी जो मेरे घाव पर बँधी थी वो पूरी तरह से मेरे खून से भीग चुकी थी! ये दृश्य देख माँ, संगीता और दोनों बच्चे घबरा गए| संगीता ने फ़ट से डॉक्टर सरिता को फ़ोन किया और उन्हें सारी बात बताई तथा डॉक्टर सरिता ने तुरंत अपने clinic बुला लिया| Clinic ज्यादा दूर नहीं था मगर मेरा परिवार मुझे ऐसे घेर कर चल रहा था मानो मैं कोई बहुत बड़ी हस्ती हूँ जिसे की Z guard security दी गई हो!

Clinic पहुँच कर डॉक्टर सरिता मुझे अंदर के कमरे में ले गईं, जब डॉक्टर सरिता ने मेरे जख्म के ऊपर से रुई की पट्टी हटाई तो वो जख्म देखते हुए बोलीं; "मानु तुम्हारे टांकें टूट गए हैं!" ये कहते हुए उन्होने पहले मुझे एक injection दिया और फिर मेरा उपचार शुरू कर दिया| माँ, संगीता, नेहा और आयुष बाहर बैठे थे, अब नेहा को हो रही थी मेरी चिंता इसलिए वो उठी और अंदर के कमरे में आ गई| अंदर जो उसने दृश्य देखा उसे देख कर नेहा दहल गई!

मैं clinic के ऊँचे पलंग पर बैठा हुआ था तथा सरिता जी खड़ी हो कर मेरे जख्म को साफ़ कर रहीं थीं| उस एक suitcase को उठाने से पैदा हुए मेरी माँसपेशियों में खिंचाव के कारण मेरे जख्म का मुँह खुल गया था जिससे अंदर की नसें-धमनियाँ नज़र आ रहीं थीं! नेहा ने जब मेरा जख्म देखा तो उसकी आँखें भर आईं और वो चीखते हुए मेरे पास दौड़ पड़ी; "पापा जी!" बाहर बैठे माँ, संगीता और आयुष ने नेहा की चीख सुन ली थी इसलिए वो भी दौड़ते हुए भीतर आये| नेहा मेरी दाईं तरफ मेरा हाथ पकड़े हुए रो रही थी; "बेटा रोते नहीं हैं! आप हो तो मेरी हिम्मत हो, अब अगर आप ही रोओगे तो मुझे हिम्मत किससे से मिलेगी?!" मैंने नेहा को हिम्मत बँधाते हुए कहा| इतने में माँ, संगीता और आयुष कमरे में आ गए थे, उन्हें घबराया हुआ देख मैं उन्हें कुछ कहने वाला हुआ था की सरिता जी ने उन्हें आश्वस्त करते हुए कहा; "कोई घबराने वाली बात नहीं है, आप सब बाहर बैठिये, मैं मानु की पट्टी कर बाहर आती हूँ|" सभी बाहर चले गए थे, बस नेहा मेरे पास खड़ी थी क्योंकि उसे डर था की मुझे कुछ हो जायेगा इसलिए मैंने नेहा को आश्वस्त करते हुए उसे भी बाहर जाने को कहा; "बेटा, आप भी बाहर जा कर अपनी मम्मी के पास बैठो और उनका ख्याल रखो|" नेहा ने मेरी बात मानी और बाहर जा कर अपनी दादी जी तथा मम्मी का ख्याल रखने लगी|

इधर सरिता जी ने मुझसे इस घाव के बारे में पुछा तो मैंने उन्हें सारी बात बता दी, सिवाए इस बात के की पिताजी अपने परिवार को छोड़ कर अपने भाई-भाभी के पास रह रहे हैं| सारी बात सुन सरिता जी मेरे कँधे पर हाथ रखते हुए मुझे हिम्मत देते हुए बोलीं; "you did the right thing." मतलब की वो भी ये मानती थीं की मैंने अपनी तथा अपनी पत्नी की आत्मरक्षा में गोली चला कर कोई गलत नहीं की थी, बस एक मेरे पिताजी थे जिन्हें मैं गलत नज़र आ रहा था!

[color=rgb(124,]जारी रहेगा भाग - 2 में...[/color]
 

[color=rgb(251,]इकत्तीसवाँ अध्याय: घर संसार[/color]
[color=rgb(84,]भाग - 2[/color]


[color=rgb(71,]अब तक अपने पढ़ा:[/color]

सरिता जी ने मुझसे इस घाव के बारे में पुछा तो मैंने उन्हें सारी बात बता दी, सिवाए इस बात के की पिताजी अपने परिवार को छोड़ कर अपने भाई-भाभी के पास रह रहे हैं| सारी बात सुन सरिता जी मेरे कँधे पर हाथ रखते हुए मुझे हिम्मत देते हुए बोलीं; "you did the right thing." मतलब की वो भी ये मानती थीं की मैंने अपनी तथा अपनी पत्नी की आत्मरक्षा में गोली चला कर कोई गलत नहीं की थी, बस एक मेरे पिताजी थे जिन्हें मैं गलत नज़र आ रहा था!

[color=rgb(97,]अब आगे:[/color]

मेरे
घाव को साफ़ कर, उस पर नए टांकें लगवा कर और पट्टी लगवा कर मैं बाहर वाले कमरे में आया| बाहर सभी अधीर हो कर मेरा ही इंतज़ार कर रहे थे, मेरे जख्म को इतने नज़दीक से देख कर सभी बहुत घबराये हुए थे| मुझे देखते ही माँ मेरी चिंता करते हुए बोलीं; "दर्द तो नहीं हो रहा बेटा?" माँ के इस सवाल के जवाब में मैंने सर न में हिला दिया| तभी सरिता जी हाथ धो कर बाहर आईं, उन्हें देखते ही माँ और संगीता ने उनसे मेरे स्वास्थ्य को ले कर सवाल पूछना शुरू कर दिए| सरिता जी ने सभी को आश्वस्त करते हुए कहा की; "आप सभी चिंता मत कीजिये, कोई घबराने की बात नहीं है! वजन उठाने से मानु के टांकें टूट गए थे, मैंने फिर से टांकें लगा कर पट्टी कर दी है|" इतना कह सरिता जी मुझे देखते हुए बोलीं; " ध्यान रहे मानु की कुछ दिनों तक अपने बाएँ हाथ पर ज़रा भी जोर मत डालना!" सरिता जी की हिदायत सुन मैंने हाँ में सर हिलाया|

अब बारी थी मेरे घर की स्त्रीयोँ यानी संगीता और माँ के सवाल पूछने की, उन्होंने एक-एक कर मेरे खाने-पीने से ले कर मैं किस करवट सोऊँ की मुझे दर्द न हो तक के सारे सवाल पूछ लिए| नेहा भी कम नहीं थी उसने मुझे दी जाने वाली सभी दवाइयों के नाम तथा समय कागज पर फिर से लिख लिए| एक बस आयुष था जो मेरे पास खड़ा हुआ सब बातें बड़ी गौर से सुन रहा था और मुझे अपना नैतिक समर्थन (moral support) दे रहा था|

सरिता जी के यहाँ से निकलने से पहले मैंने अपनी कमीज बदल ली ताकि कोई रास्ते में मेरी कमीज पर खून देख कर सवाल-जवाब न करने लगे| रास्ते में घर के लिए दूध-अंडा-ब्रेड लेना था तो माँ ने नेहा को पैसे देते हुए समान लाने को कहा| घर पहुँच कर समान रख कर अभी हम बैठे ही थे की दिषु आ धमका! आँखों में गुस्सा तथा होठों पर गाली लिए दिषु मुझे ही देख रहा था, अगर उसे माँ, संगीता तथा बच्चों का ख्याल न होता तो दिषु ने अभी तक मुझे 10-15 गाली दे दी होती! देखा जाए तो गलती मेरी ही थी क्योंकि मेरे ससुर जी के देहांत वाले दिन से ले कर अभी तक मैंने दिषु को फ़ोन कर के कोई जानकारी नहीं दी थी इसलिए दिषु को आया ये गुस्सा जायज था! लेकिन तभी बच्चों ने अपने दिषु चाचू को देखा तो दोनों दौड़ते हुए जा कर दिषु से लिपट गए| अपने भतीजे और भतीजी के प्यार के आगे दिषु का गुस्सा कम होने लगा था जिससे मुझे इत्मीनान होने लगा था की बच गया मैं आज गाली खाने से! दोनों बच्चों को लाड कर दिषु मेरे सामने बैठ गया और पल भर में उसके चेहरे पर फिर गुस्सा उमड़ आया| संगीता ने जब दिषु को गुस्सा देखा तो उसने सबसे पहले दोनों बच्चों को काम पर लगाया ताकि वो हमारी बातें न सुन लें;

संगीता: आयुष, चल suitcase से सारे कपड़े निकाल कर धोने डाल और बाकी सारा सामान बाहर निकाल कर रख|

अब आयुष को देखने थे cartoon इसलिए वो काम न करने के लिए मुँह बनाने लगा;

आयुष: मम्मी...प्लीज...मेरा cartoon!!!!

आयुष का काम करने में आनाकानी करता देख नेहा उसका बचाव करते हुए बोली;

नेहा: इसे cartoon देखने दो मम्मी, मैं कपड़े निकाल कर धोने डाल देती हूँ|

संगीता: नहीं! तू सबके लिए चाय बना और ये लड़का (आयुष) कपड़े धोने डालेगा!

ये कहते हुए संगीता ने आयुष को थोड़ा गुस्सा किया;

संगीता: आयुष, जो कह रही हूँ वो कर वरना अभी मारूँगी तुझे!

बच्चों को जब भी अपनी माँ से डाँट पड़ती है तो वो अपने पिता की ओर आस लगाए देखते हैं की वो उनका बचाव करें, वही हाल इस समय आयुष का था| अपनी मम्मी की मार के डर से आयुष अपना मुँह फुला कर उठ तो गया परन्तु उसका मन काम करने का कतई नहीं था इसलिए आयुष मेरी आस कर रहा था की मैं उसका बचाव करूँ;

मैं: बेटा, आप मेरे सबसे जिम्मेदार बेटा हो न, तो आपको ये जिम्मेदारी वाला काम करना चाहिए न?

मैंने चपलता से आयुष की बड़ाई करते हुए उसे काम सौंपा तो वो झट से मान गया और अपनी मम्मी द्वारा दिया हुआ काम करने लगा|

बच्चे अपने काम में लग गए थे तो हम बड़ों को बात करने का मौका मिल गया;

दिषु: तू तो बहुत बड़ा आदमी है न, जो तेरे से एक फ़ोन नहीं किया जाता?!

दिषु ने मुझे ताना मारते हुए बात शुरू की|

मैं: भाई...

मैं अपनी सफाई दूँ उससे पहले ही दिषु मुझे फिर से ताना मारते हुए बोला;

दिषु: आंटी जी, जब हम स्कूल में थे तो ये मुझे सारी बातें बताता था, लेकिन जब से शादी हुई है ये मुझे कुछ नहीं बताता|

दिषु माँ की तरफ देखते हुए मुझे तना मारते हुए बोला|

मैं: भाई...

मैंने फिर अपनी सफाई देने के लिए मुँह खोला ही था की दिषु ने फिर मेरी बात काट दी और संगीता से बोला;

दिषु: मैं यहाँ आपसे, आंटी जी से और बच्चों से मिलने आया था| इसने (मैंने) तो आपके पिताजी के स्वर्गवास के बारे में कुछ बताया नहीं, ना ही आपने कुछ बताया.लेकिन आपकी कुछ न बताने की वजह मैं समझ सकता हूँ, आप बहुत दुखी थे मगर इससे (मुझसे) तो एक कॉल भी न हुआ! वो तो आंटी जी ने मेरे घर फ़ोन कर के सब बताया था| मैं चूँकि audit पर था इसलिए पहले नहीं आ पाया, अभी कुछ देर पहले ही घर पहुँचा था और सीधा आपसे मिलने आ गया, मम्मी-पापा भी आएंगे मगर वो सुबह आएंगे|

दिषु मुझसे बहुत गुस्सा था और उसकी बात सुन मैं समझ गया था की ये इस वक़्त कुछ भी सुनने के मूड में नहीं है|

दिषु: आज के बाद तू (मैं) दुबारा मुझे कभी कॉल मत कर दियो!

दिषु मुझे तड़ी देते हुए बोला| फिर वो माँ ओरसंगीता से मुखातिब हुआ ओर बोला;

दिषु: आंटी जी आपको या भाभी आपको मेरा कोई भी काम हो तो आप कॉल करना, बस इसे मत कहना मुझे कॉल करने को! मेरा इससे कोई वास्ता नहीं रहा!

दिषु के हमारी दोस्ती तोड़ने की बात से मैं बहुत दुखी हुआ और उस बुद्धू को अपनी बात समझाने के लिए मैंने अपनी कमीज के चार बटन खोल कर अपनी पट्टी दिखा दी| मेरे कँधे के पास लगी पट्टी देख दिषु एकदम से घबरा गया और मेरे साथ बैठते हुए बोला;

दिषु: ये...ये क्या हुआ तुझे?

दिषु के पूछे सवाल का जवाब संगीता ने उसे शुरू से ले कर आखिर तक हुई सारी बात बता कर दिया| सारी बात सुन दिषु हक्का-बक्का था और उसे मुझे मारे गए तानों पर अफ़सोस हो रहा था|

मैं: सुबह जब मेरी सासु माँ का फ़ोन आया की ससुर जी नहीं रहे तो मैंने सबसे पहले हवाई जहाज की टिकट बुक कराई, उसके बाद मुझे संगीता को संभालना था जिसका की रो-रो कर बुरा हाल था| गाँव पहुँच कर क्रिया में समय लगा और फिर जो कुछ घटित हुआ उसके चलते मैं तुझे फ़ोन करना भूल गया! Sorry भाई!

मैंने संगीता की बात खत्म होने के बाद अपनी सफाई दी जिसे सुनकर दिषु भावुक हो गया और बोला;

दिषु: Sorry भाई, मैंने तुझे गलत समझा! मैं खामखा ही तेरे लिए गुस्सा ले कर बैठा था जबकि तू वहाँ अकेला इतना सब बर्दाश्त कर रहा था!

दिषु को ग्लानि हो रही थी और मैं उसे ग्लानि महसूस करने नहीं देना चाहता था इसलिए मैंने बात का रुख बदलते हुए कहा;

मैं: भाई, तेरा गुस्सा होना जायज है! मैं तेरी जगह होता तो मैं भी गुस्सा होता| अब छोड़ इन बातों को और ये बता की अंकल जी- आंटी जी कैसे हैं?

दिषु: वो सब ठीक हैं|

इतने में नेहा चाय बना कर ले आई और चाय देखते ही दिषु नेहा की तारीफ करने लगा;

दिषु: अरे मेरी भतीजी चाय भी बनाती है?

ये कहते हुए दिषु ने चाय की चुस्की ली और खुश होते हुए बोला;

दिषु: वाह भई वाह! चाय तो बड़ी स्वाद बनाई है नेहा ने!

नेहा की तारीफ हो रही थी और वो थोड़ा शर्मा रही थी, इतने में आयुष पीछे से आ गया| अब उसे सुननी थी अपनी तारीफ इसलिए वो बीच में बोल पड़ा;

आयुष: पापा जी, मैंने सारे कपड़े धोने के लिए डाल दिए और बैग से सारा समान भी निकाल दिया|

आयुष अपना किया हुआ काम गिनाते हुए बोला| आयुष का मकसद अपनी तारीफ सुनना था इसलिए मैंने उसे अपनी गोदी में बिठाते हुए उसकी तारीफ कर दी;

मैं: अरे वाह! आप तो बहुत समझदार हो और हमारी सारी बातें मानते हो| शाबाश!!!

अपनी तारीफ सुन आयुष बहुत खुश हुआ और उसे खुद पर बहुत गर्व हो रहा था| तभी संगीता को इस स्थिति पर चुटकी लेनी थी इसलिए वो मुझे और आयुष को छेड़ते हुए बोली;

संगीता: पता नहीं इस लड़के को तारीफ करवाने का शौक कैसे चढ़ गया?

संगीता का सवाल सुन मैंने भी चुटकी लेते हुए कहा;

मैं: बच्चे सब कुछ इस दुनिया से नहीं सीखते, कुछ गुण उनमें उनके माता-पिता के भी आते हैं| अब मुझे तो अपनी तारीफ करवाने का कतई शौक नहीं, तो ये गुण उसमें तुम्हारे (संगीता के) सिवा और किससे आएगा?

मेरी बात सुन सभी हँस पड़े और संगीता आयुष की तरह प्यारभरा गुस्सा लिए मुझे देखने लगी तथा आँखों ही आँखों में पूछने लगी की उसने कब मुझसे अपनी तारीफ करने को कहा था?!

मैं: शादी के कुछ दिन बाद ही जब तुमने खाना बनाया था तब मुझसे अपने बनाये खाने की तारीफ करने को नहीं कह रही थी?

मैंने संगीता को वो दिन याद दिलाया जब हमने अपने हनीमून पर जाना बच्चों के कारण कनसेल किया था| वो दिन याद कर संगीता शर्म से पानी-पानी हो गई|

दिषु से बातें हो ही रहीं थीं की तभी भाईसाहब का फ़ोन आ गया, वो जानना चाहते थे की हम सभी घर पहुँचे या नहीं| मैंने उन्हें बताया की हम सभी अभी कुछ देर पहले घर पहुँचे हैं, फिर मैंने उनकी बात माँ से करवाई तो माँ ने उन्हें मेरे टांकें टूटने की बात बता दी| मेरे टांकें टूटने की बात से गाँव में सभी चिंतित थे इसलिए मैंने खुद फ़ोन पर बात करते हुए सबको आश्वस्त किया की कोई भी घबराने वाली बात नहीं है|

दिषु के जाने के बाद हम सभी ने खाना खाया, चूँकि माँ ने आयुष को चाऊमीन खिलाने का वादा किया था इसलिए आयुष के लिए चाऊमीन आई और बाकी सब के लिए साधारण खाना आया| चाऊमीन पा कर आयुष बहुत खुश था और अपनी दादी जी को thank you कहते थक नहीं रहा था! अब सोने का समय था, नेहा को मेरी चिंता थी इसलिए वो मेरे पास सोना चाहती थी, परन्तु संगीता ने उसे प्यार से समझा-बुझा कर अपनी दादी जी के पास सोने के लिए मना लिया| मैं पलंग के दाईं तरफ सोता था, चूँकि मेरे बाएँ कंधे में दर्द था इसलिए मेरे लिए बाईं करवट सोना नामुमकिन था| अगर मैं दाईं करवट सोता तो संगीता की तरफ मेरी पीठ होती और संगीता को ये नगवार था इसलिए उसने मुझे जबरदस्ती पलंग के बाईं ओर सोने को कहा ताकि मैं दाईं करवट लूँ तथा मेरा चेहरा संगीता के सामने रहे| संगीता की बात मानते हुए मैं पलंग के बाईं तरफ लेट गया, अब चूँकि कमरे में हम दोनों मियाँ-बीवी अकेले थे तो संगीता को मुझसे बात करने का मौका मिल गया;

संगीता: जानू, मुझे तो कल की चिंता हो रही है! आप इस हालत में अकेले कैसे दो sites का काम संभालोगे?

संगीता मेरी चिंता करते हुए बोली|

मैं: मैं सोच रहा हूँ की एक लड़का रख लूँ, जैसे संतोष काम सँभालता है वैसे ही वो लड़का भी भाग-दौड़ कर के काम सँभाल लेगा|

मैंने अपना सुझाव प्रस्तुत किया, संगीता को मेरा ये सुझाव जचा इसलिए वो मेरे सुझाव का समर्थन करते हुए बोली;

संगीता: हाँ ये सही रहेगा! इससे आप पर काम का ज्यादा बोझ भी नहीं होगा और मुझे आपकी सेहत की चिंता भी नहीं रहेगी|

संगीता का मेरे लिए चिंता करना जायज था इसलिए मैंने उसकी इस चिंता का मान रख कर ही ये फैसला किया था|

संगीता: जानू, एक बात और कहूँ?! मैं आपकी पत्नी हूँ, अर्धांगी हूँ, यानी के आधा अंग हूँ तो फिर आप मुझसे अपना दुःख-दर्द क्यों छुपाते हो? क्या आपको लगता है की आप अपना दुःख-दर्द मुझसे छुपा लोगे?

संगीता ने बड़े प्यार से एक पत्नी की तरह हक़ जताते हुए अपनी बात कही| उसकी बात कहीं तक सही भी थी, परन्तु मुझे भी उसे अपना पहलु समझाना था;

मैं: जान, तुम माँ बनने वाली हो ओर इस समय मुझे तुम्हें खुशियाँ देनी चाहिए न की अपना दुःख-दर्द दे कर चिंता में डालना चाहिए|

मेरी बात सुन संगीता हाजिर जवाबी से बोली;

संगीता: तो क्या मैं सिर्फ आपके सुख की साथी हूँ, दुःख की नहीं? आप अपना दुःख मुझसे बाँटोगे तो क्या पता मैं कोई सुझाव ही दे दूँ?!

ये समय संगीता से बहस करने का नहीं था इसलिए मैंने मुस्कुरा कर हाँ में सर हिलाया ओर संगीता की बात का मान रख लिया| लेकिन भीतर से मैं अपना दुःख उससे साझा करने से डरता था आखिर मैं अपने पिता बनने को लेकर कोई कोताही नहीं बरतना चाहता था|

इधर मुझे नरम पड़ता देख संगीता को मुझसे अपनी बात मनवाने का मन किया और वो मेरे बाएँ गाल को सहलाते हुए बोली;

संगीता: अब इस मुई दाढ़ी को छोल दो! मुझे मेरा जानू बिना दाढ़ी के चाहिए, बड़े साल हुए मैंने आपके गालों को काटा नहीं!

संगीता की बात ने एकदम से दिल में सिहरन पैदा कर दी थी! वहीं संगीता की आँखों में अचानक से लाल-डोरे तैरने लगे थे, उसने एकदम से आगे बढ़ते हुए मेरे होठों पर अपना कब्ज़ा स्थापित कर लिया! हमारा प्रेम का ये प्रसंग अगले चरण तक जाने से पहले ही मैंने संगीता को रोक दिया और उसे अपने सीने से लिपटाये सो गया| आपका प्यार आपके पहलु में हो तो मन इधर-उधर नहीं भटकता, यही कारण था की मैं चैन से सो गया|

रात दो बजे करीब मैंने एक सपना देखा, सपने में पिताजी को देखा जो की घर में मौजूद थे तथा मुझसे बहुत अच्छे से बात कर रहे थे| उस सपने को सच मान कर मेरा दिल ख़ुशी से भर उठा, जब ये ख़ुशी दिल से बर्दाश्त नहीं हुई तो उसने मुझे नींद से जगा दिया, इस आस में की मैं उठूँगा तो पिताजी मेरे सामने खड़े होंगें| लेकिन जब आँख खुली तो वास्तविकता का जोरदार थपेड़ा मेरे गाल पर पड़ा! नींद टूटने पर मुझे याद आया की मेरे पिताजी अपने बेटे और पत्नी को छोड़कर अपने भाई-भाभी के पास जा चुके हैं! सपने में जितना मैं खुश था उतना ही मैं इस वक़्त दुखी था! 'साला चन्दर मरते-मरते भी मेरे परिवार के टुकड़े कर गया!' मेरा दुखी मन बोला| मैंने बहुत कोशिश की अपना मन शांत कर के अपने परिवार को सँभालने पर ध्यान लगाऊँ लेकिन मन शांत नहीं हो रहा था! मैंने आँख बंद कर अपने अंतर्मन में झाकना शुरू किया और गहन विचार किया की कैसे मैं अपने इस दर्द को अपनी पत्नी, माँ और बच्चों के सामने आने से बचाऊँ और अपने परिवार में खुशियाँ भर दूँ?!

उधर नेहा मेरी चिंता में जाग चुकी थी, उसका मन मुझे देखने को लालहित हो गया तो वो उठ कर मेरे कमरे की ओर चल पड़ी| कमरे का दरवाज़ा खुला था इसलिए नेहा दबे पाँव कमरे में आ गई, मैं उस वक़्त आँखें बंद किये पीठ के बल लेटा हुआ अपने अंतर्मन में उतपन्न हुई कश्मकश से जूझ रहा था| तभी नेहा ने अपना हाथ मेरे माथे पर रख मेरा बुखार देखना चाहा, परन्तु उसके ठंडे हाथ के स्पर्श से मेरी आँख एकदम से खुल गई| चिंतित निगाहों से जब मैंने नेहा को अपने सामने देखा तो मुझे कुछ अशुभ घटने का डर सताने लगा; "नेहा....बेटा....क्या हुआ?" मेरे पूछे सवाल के जवाब में नेहा दुखी आवाज में बोली; "पापा जी, आपको बुखार है!" नेहा की आवाज में मेरे प्रति चिंता झलक रही थी और उसे यूँ चिंतित देख कर मुझे दुःख हो रहा था| मैंने मुस्कुराते हुए नेहा के सर पर हाथ फेरा और उसे समझाने ही वाला था की संगीता की जाग खुल गई| उसने नेहा को सामने देखा तो वो भी चिंतित हो गई, संगीता कुछ पूछे उससे पहले ही नेहा एकदम से बोल पड़ी; "मम्मी, पापा जी को बुखार है!" नेहा की बात सुन संगीता ने फ़ौरन मेरा माथा छू कर देखा और नेहा को thermometer लाने को कहा| "आपको बुखार है और आपने मुझे उठाना ठीक नहीं समझा?" संगीता नाराज़ होते हुए बोली| "जान, मुझे खुद नहीं पता था की मुझे बुखार है?! वो तो नेहा अचानक से आई और उसने मेरा माथा छूआ तब जा कर मेरी जाग खुली!" मैंने संगीता को विश्वास दिलाया की मुझे मेरे बुखार चढ़ने के बारे में कुछ नहीं पता था, तब जा कर संगीता मानी वरना वो मुझे आज डाँट ही देती! इतने में नेहा thermometer और crocin की गोली का पत्ता दोनों ले आई|

माँ-बेटी ने मिलकर मेरा बुखार चेक किया तो पता चला की मुझे 100 degree बुखार है, ये देख नेहा घबराने लगी थी; "मेरा बच्चा, घबराते नहीं हैं! 100 degree बुखार तो आम बात है, मैं अभी दवाई ले लेता हूँ, फिर आप देखना सुबह तक मेरा बुखार उतर जायेगा|" मेरी बात सुन नेहा के छोटे से मन को इत्मीनान आया और उसने मुझे अपने हाथों से गोली खिलाई| दवाई ले कर कंबल ओढ़ कर लेटते हुए मैंने नेहा को माँ के पास जा कर आराम से सोने को कहा मगर नेहा को मेरी चिंता थी इसलिए वो मेरे पास सोना चाहती थी| संगीता ने पलंग के बीच जगह बनाई और नेहा को बीच में लेटने को कहा| नेहा हम दोनों मियाँ-बीवी के बीचों-बीच लेटते ही मुझसे कस कर लिपट गई| बेटी के इस प्यारभरे आलिंगन ने मेरे भटकते हुए मन को शांत कर दिया था! बस फिर क्या था, ऐसी नींद आई की सुबह मुझे उठने में देर हो गई!

जब मैं उठा तो मैं कमरे में अकेला था, मेरी नज़र दिवार घडी पर पड़ी तो पता चला की 7 बज गए हैं! मैं फटाफट उठा और site पर जाने के लिए sponge bath कर के तैयार हुआ| तैयार हो कर मुझे करनी थी पूजा इसलिए मैं जैसे ही मंदिर के पास पूजा करने पहुँचा तो पाया की मेरे दोनों बच्चे हाथ जोड़े मेरा ही इंतज़ार कर रहे थे| नहा-धो कर दोनों बच्चे अच्छे से तैयार हो चुके थे, फिर हम तीनों बाप-बेटा-बेटी ने पूजा की| पूजा समाप्त होते ही आयुष अपना दायाँ हाथ बाएँ हाथ पर रखते हुए प्रसाद लेने के लिए सबसे आगे खड़ा हो गया| तब मुझे समझ आया की आज आयुष कैसे इतनी जल्दी तैयार हो गया था! मेरी तरह उसे भी मीठे का शौक जो था! प्रसाद में बस मिश्री थी, मैंने आयुष को दो दाने मिश्री के दिए तो वो ख़ुशी से नाचने लगा!

पूजा समाप्त होने के बाद दोनों बच्चों ने मुझे एक-एक कर अपनी सुबह की good morning वाली पप्पी दी और मेरा हाथ पकड़ कर मुझे अपनी दादी जी यानी के मेरी माँ के पास ले आये| माँ ने सबसे पहले अपना हाथ मेरे माथे पर रख मेरा बुखार चेक किया, मेरा बुखार उतर चूका था इसलिए माँ की आधी चिंता खत्म हो चुकी थी| बाकी बची आधी चिंता उन्हें इस बात की थी की क्या वो मुझे साइट पर काम देखने जाने दें या नहीं?

माँ और आयुष को संगीता ने सुबह कल रात मेरी तबियत खराब होने के बारे में बता दिया था, जाहिर था की माँ मुझे आज काम पर जाने नहीं देने वाली थीं| चाय पीते हुए माँ, संगीता, नेहा और आयुष ने एक टीम मना ली और मुझे काम पर जाने से मना करने लगे;

माँ: बेटा, आज भर आराम कर ले कल चला जाइयो साइट|

माँ बड़े प्यार से मुझे हुक्म देते हुए बोलीं|

संगीता: हाँ, सुबह जा कर आपका बुखार उतरा है! आज आराम करोगे तो कल तक आप पूरी तरह स्वस्थ हो जाओगे|

संगीता ने माँ की बात का समर्थन करते हुए मुझे समझाया|

नेहा: Please पापा जी, आज आप काम पर मत जाओ वरना मुझे सारा दिन आपकी चिंता लगी रहेगी|

अब नेहा पीछे रहने वाली थी नहीं इसलिए उसने भी अपनी चिंता जाहिर की| मैं अपना तर्क दे सब को मेरे साइट पर जाने के लिए मनाता उससे पहले ही आयुष मेरे पास आया और मेरे दोनों हाथों को अपने छोटे-छोटे हाथों मैं पकड़ने की कोशिश करते हुए मेरी आँखों में देखते हुए बड़े प्यार से बोला;

आयुष: Please पापा जी...आप आज कहीं मत जाओ...आप आज घर पर ही रहो! मैं है न आपको खूब सारी प्यारी (पप्पी) दूँगा! फिर न आपके पाँव दबाऊँगा, आपको कहानी सुनाऊँगा, आपको bore नहीं होने दूँगा!

जिस प्यार और दुलार से आयुष ने मुझे घर रुकने को कहा था उससे मैं पिघलने लगा था| मेरा मन नहीं था की मैं अपने बेटे को न कहूँ, लेकिन अब साइट का काम आखिर मुझे ही सँभालना था!

मैं: मेरा प्यारा बच्चा...

ये कहते हुए माने आयुष को अपने गले लगा लिया और उसे अपनी गोदी में बिठा कर उसे प्यार से समझाने लगा;

मैं: बेटा, अगर मैं काम पर नहीं जाऊँगा तो घर में पैसे कैसे आएंगे? और अगर पैसे नहीं आएंगे तो हम सब खाएंगे क्या?

मेरे पूछे गए सवालों से मेरा छोटा सा बच्चा सोच में पड़ गया था, आयुष ज्यादा चिंता न करे इसके लिए मैं उसे लाड करने लगा;

मैं: आपको यही चिंता है न की अगर साइट पर मेरी तबियत खराब हो गई तो आप सभी यहाँ परेशान होंगे? तो मैं आप सबसे वादा करता हूँ की मैं दोपहर 2 बजे तक घर लौट आऊँगा और आपके साथ खाना खा कर आराम करूँगा| अब तो खुश?

मैं समझा आयुष को रहा था मगर मेरा ये जवाब मेरे पूरे परिवार के लिए था| खैर, मेरी बात का असर हुआ और नेहा आ कर मेरे गले लग गई| माँ और संगीता के चेहरे पर भी मुस्कान आ गई की मैं उनकी बात का मान रखते हुए साइट का काम सँभाल रहा हूँ| मुझे साइट पर जाने की इजाजत तो मिल गई थी मगर मेरे घाव को मद्दे नज़र रखते हुए मुझे गाडी चलाने से रोका गया था| साथ ही मैं कहीं गलती से अपने बाएँ हाथ का प्रयोग न करूँ उसके लिए मुझे अपनी छाती पर वो बेल्ट पहननी थी जिसमें मेरा बायाँ हाथ बँधा रहेगा| थोड़ी बंदिशें ही सही पर मुझे काम पर जाने को मिल रहा है, यही सोच कर मैंने सारी बातें मान ली|

नाश्ता कर के मैं घर से सीधा गुड़गांव वाली साइट पहुँचा, इस साइट का काम खत्म होने वाला था परन्तु पिताजी की गैर मौजूदगी में लेबर तंग कर रही थी| साइट पहुँच कर जब मैंने गुस्सा दिखाते हुए लेबर को दौड़ाया तब जा कर काम शुरू हुआ| यहाँ काम शुरू करवा मुझे नॉएडा वाली साइट पर जाना था लेकिन उससे पहले मुझे पहले उठाये माल का भुगतान कर नया माल उठाना था| जिससे हम माल उठाते थे वो थोड़ा टेढ़ा आदमी था और केवल पिताजी उससे काम निकलवा सकते थे| जब मैं उसके पास पहुँचा तो मुझे देख वो माल के दाम बढ़ाने लगा, लड़ने को मैं उससे लड़ सकता था मगर नॉएडा वाली साइट पर माल की जर्रूरत थी और यहाँ लड़ाई कर के नया माल लेने के लिए मेरे पास अभी पैसे नहीं थे!

इस समय मैं एकदम से अकेला पड़ गया था, धँधे के सभी गुण मैं पिताजी से अभी तक सीख नहीं पाया था क्योंकि कुछ गुण समय के साथ ही आते हैं और आज जब मुझे पिताजी के मार्गदर्शन की जर्रूरत थी वो यहाँ नहीं थे! मैं मन ही मन सोच रहा था की इस कमबख्त आदमी से काम बंद कर के पैसों का जुगाड़ कैसे करूँ की तभी भगवान जी ने मेरी मदद के लिए मिश्रा अंकल जी को भेज दिया| दरअसल मिश्रा अंकल जी भी यहीं से माल उठाया करते थे और वो भी आज यहाँ भुगतान करने आये थे|

मिश्रा अंकल जी को देख मैं उठ खड़ा हुआ और झुक कर उनके पैर छूने लगा, तभी उन्होंने मेरी छाती पर बँधी बेल्ट देखि| मेरी ये हालत देख वो काफी घबरा गए, उन्होंने मुझे आशीर्वाद दे मेरी इस हालत के बारे में पुछा| अब मैं उन्हें अपने घर में हुई सब बातें सेठ के सामने बताना नहीं चाहता था इसलिए मैंने गाँव में accident होने की बात कह कर बात टाल दी|

जो बात मुझे नहीं मालूम थी वो ये की, मिश्रा जी मेरे हाथों हुए चन्दर के खून के बारे में पहले से ही जानते थे क्योंकि वो हमारे ही जिले के रहने वाले थे और कहाँ क्या घट रहा है उससे अच्छे से वाक़िफ़ थे, हाँ वो ये नहीं जानते थे की उस हत्यकांड में मैं जख्मी हुआ था|

मिश्रा अंकल जी: मुन्ना तू ई हालत मा हियाँ का करत हो? घरे चल कर आराम करो!

मिश्रा अंकल जी मेरी चिंता करते हुए बोले|

मैं: जी अंकल जी, वो सेठ जी के बिल का भुगतान करने आया था मगर सेठ जी कह रहे हैं की दाम बढ़ गए हैं, अब पैसे हैं नहीं और माल की जर्रूरत बहुत है!

मैं जानबूझ कर मिश्रा अंकल जी के सामने सेठ जी का सच खोला था क्योंकि मैं जानता था अंकल जी सेठ जी अच्छे से खबर ले लेंगे! मेरी बात सुनते ही मिश्रा अंकल जी ने सेठ जी को डाँट लगाते हुए कहा;

मिश्रा अंकल जी: का हो मुराओ, देखत नाहीं हो की मुन्ना चुटाये गईस है और तू ओकरे संगे रंगबाजी दिखावत हो? चुपेय से जउन हिसाब से मुन्ना पैसा देत है, लेइ लिहो नाहीं तो ई पैसवाओ न मिली! और माल आभायें जहाँ मुन्ना कहत है हुआँ पहुँचाये दिहो वरना तोहार दूकान मा लगा देब आग! जान्यो?

मिश्रा अंकल जी का रौब बहुत था इसलिए उनकी तड़ी पा कर सेठ ने फटाफट मुझसे पैसे लिए और माल नॉएडा वाली साइट पर रवाना कर दिया|

मिश्रा अंकल जी: आपन गाडी लायो है?

मिश्रा अंकल जी को चिंता थी की मैं घर कैसे जाऊँगा इसीलिए उन्होंने ये सवाल पुछा|

मैं: नहीं अंकल जी, मैं cab कर के चला जाऊँगा|

ये सुनते ही मिश्रा अंकल जी एकदम से बोले;

मिश्रा अंकल जी: अरे नाहीं-नाहीं मुन्ना! चलो हम तोहका घरे छोड़ देइत है|

मैं: आप क्यों तकलीफ करते हैं अकंल जी, मैं चला जाऊँगा!

पहले ही अंकल जी की मदद से सेठ जी ने माल भेज दिया था, अब मैं उन्हें और तकलीफ नहीं देना चाहता था इसीलिए मैं उन्हें मना कर रहा था|

मिश्रा अंकल जी: अरे मुन्ना तकलीफ की कउनो बात नाहीं! एक पंथ दुइ काज, तोहका घरो छोड़ देब और दुइ ठो साइट का काम भी तोहका बताये देब|

काम मिल रहा था इसलिए मैं भी मान गया और अंकल जी के साथ उनकी गाडी में अपने घर के लिए चल पड़ा|

गाडी चल पड़ी थी और हमारी बातें भी शुरू हो चुकी थीं|

मिश्रा अंकल जी: मुन्ना, हमार गाँव तोहार गाँव का नियरे है, एहि से आस-पास की सारी खबर हमका लग ही जात है| तोहार ससुराल मा जउन भवा ऊ भले ही तू या तोहार पिताजी हमका नाहीं बताईं लेकिन हम सब जानित है! हम ई नाहीं जानित रहन की ऊ हादसे मा तुहुँ चोटाये गया रहयो|

जब मिश्रा अंकल जी ने ये बात कही तो मैंने उन्हें सारी बात शुरू से ले कर आखिर तक बता दी, पिताजी के हमें छोड़कर अपने भाई-भाभी के पास रहने की बात भी मैंने उन्हें बता दी| सारी बात सुन मिश्रा अंकल जी दुखी होते हुए बोले;

मिश्रा अंकल जी: तोहार पिताजी आपन भाई-भाभी का कतना मूहात हैं ई बात हम जानित है, काहे से की जब तू छोट रहेओ तो तोहार पिताजी हमार दिए हुए ठेके लिए से मना कर देत रहे| जब हम पूछित की काहे ऊ ठेके नाहीं लेत, तो तोहार पिताजी आपन भाई लगे जाए का कउनो न कउनो बहाना बना देत रहे| लेकिन इस बारी तोहरे पिताजी बिल्कुलै गलत हैं, अरे तोहरे जइसन फ़रमाबरदार और नेक बेटा को छोड़ी के ऊ कमबख्त चन्दर के मरे का दुःख मनावत हैं?! हम आज ही ऊ (मेरे पिताजी को) का फ़ोन करि के समझाब, तू चिंता नाहीं करो मुन्ना!

मिश्रा अंकल जी की बातें सही थी, लेकिन वो नहीं जानते थे की पिताजी अब किसी के भी समझाने से नहीं समझने वाले थे, लेकिन मन ससुरे को अब भी आस थी! मैंने मिश्रा अंकल जी को पिताजी को फ़ोन करने से इसलिए नहीं रोका क्योंकि मुझे एक आस अब भी थी की शायद मेरे पिताजी उनकी बात मान लें|

बहरहाल, व्यक्तिगत बातों के बाद मिश्रा अंकल जी ने मुझे 2 साइट के ठेके दिए| ये काम बहुत बड़ा नहीं था मगर मैं सँभाल सकूँ इतना आसान था| बातें करते हुए घर आया और मैंने अंकल जी को घर आने के लिए कहा, परन्तु मिश्रा अंकल जी ने ये कह के मना कर दिया की वो शाम को आंटी जी के साथ हमसे मिलने आएंगे| गाडी से उतर मैं अभी घर की गली में घुसा ही था की आयुष का फ़ोन आ गया; "पापा जी, मुझे भूख लगी है! आप कब आ रहे हो?" आयुष की आवाज में भूख लगने का मीठा सा दर्द साफ़ दिख रहा था और मुझे आयुष की बात पर प्यार आ रहा था, परन्तु मेरा मन इस वक़्त आयुष के साथ थोड़ी मस्ती करने का था! "बेटा मुझे तो अभी आने में बहुत समय लगेगा!" मैंने आयुष के साथ मज़ाक करते हुए कहा| लेकिन मेरी बात सुन आयुष का मुँह बन गया और वो लगभग रोने ही वाला था की मैंने घर के दरवाजे की घंटी बजा दी| दरवाजा नेहा ने खोला था और मुझे देख मेरी बेटी एकदम से खिल गई थी! उधर जैसे ही आयुष की नज़र दरवाजे पर पड़ी उसे मैं खड़ा हुआ नज़र आया| आयुष ने फ़ौरन फ़ोन काटा और मेरे पास दौड़ता हुआ आया| मैंने जल्दी से आयुष को गोद में उठाया और तभी आयुष ने अपना प्यारभरा सवाल पुछा; "पापा जी, आप मेरे साथ मज़ाक कर रहे थे न?" आयुष मेरे दाएँ गाल पर पप्पी देते हुए बोला| "आप भी तो सारा दिन कितनी मस्ती करते हो न, तो मैंने सोचा मैं भी आज आपके साथ थोड़ी मस्ती करूँ!" मैंने आयुष को आँख मारते हुए कहा, मेरा जवाब सुन आयुष खिलखिलाकर हँसने लगा|

आयुष को इतनी भूख लगी थी की उसने मुझे कपड़े तक बदलने नहीं दिए, मेरी गोदी में चढ़े हुए मुझे खींचते हुए आयुष मुझे डाइनिंग टेबल तक ले आया| जैसे ही मैं कुर्सी पर बैठा तो नेहा ने सबसे पहले मेरा बुखार चेक किया, शुक्र है की बुखार नहीं था इसलिए नेहा ख़ुशी से चहक रही थी| फिर हम सभी खाना खाने बैठ गए और हरबार की तरह दोनों बच्चों ने मेरे ही हाथ से खाना खाया| खाना खाने के बाद नेहा ने मुझे दवाई दी तथा आयुष ने जबरदस्ती मुझे सोने के लिए कमरे तक खींचना शुरू कर दिया| बच्चों का मोहपाश इतना जबरदस्त था की मैं चाह कर भी उन्हें मना नहीं कर पाया और दोनों बच्चों को अपने अगल-बगल लिटा कर उनके बीच में सो गया|

शाम हुई तो मैं बच्चों को सोता हुआ छोड़ कर माँ और संगीता के पास आया| माँ ने बताया की दिन में दिषु के माता-पिता मेरे ससुर जी की मृत्यु पर शोक व्यक्त करने आये थे| दिषु ने उन्हें कल हमारी हुई बातें नहीं बताई थीं क्योंकि दिषु अपने घर में हमारे घर की सारी बातें नहीं बताता था इसलिए माँ ने ही उन्हें सारी बातें बताईं| पिताजी के लिए फैसले से वो भी आहित हुए थे पर अंकल जी (दिषु के पिताजी) का कहना था की जब पिताजी का गुस्सा शांत होगा तो वो हमारे पास लौट आएंगे| अभी हम बात कर ही रहे थे की मिश्रा अंकल जी और आंटी जी आ गए| मिश्रा अंकल जी और आंटी जी ने संगीता को अपने सामने बिठा कर मेरे ससुर जी की मृत्यु पर अपना दुःख व्यक्त किया तथा संगीता को हिम्मत बँधाई की उसे कभी भी कोई भी मदद चाहिए हो तो वो सबसे पहले उन्हें ही फ़ोन करे| फिर मिश्रा अंकल जी ने माँ को बताया की उन्होंने पिताजी से बात की थी तथा उन्हें बहुत समझाया भी की वो घर अपने परिवार के पास लौट आयें मगर पिताजी की भाई-भक्ति बीच में आ रही थी जिसने पिताजी की अक्ल पर पर्दा कर दिया था| "भाईसाहब, जब उन्होंने अपने खून.अपने बेटे की नहीं सुनी, अपनी धर्मपत्नी की नहीं सुनी तो वो आपकी बात कहाँ से सुनेंगे| उनकी ये भाई-भक्ति कभी खत्म नहीं होगी!" माँ ने निराश होते हुए कहा| मुझसे अपनी माँ को यूँ निराश नहीं देखा जा रहा था इसलिए में उन्हें सँभालते हुए बोला; "आप निराश क्यों होते हो माँ, आपका बेटा है न आपके पास? तो फिर आपको किसी और की क्या जर्रूरत?" मैंने बड़े गर्व से बात कही थी जिससे मेरी माँ का दिल फिर से खिल गया था| उन्होंने मेरे सर को चूम मुझे आशीर्वाद दिया तथा मुझ पर फक्र करते हुए मिश्रा अंकल और आंटी जी से बोलीं; "ये मेरा बेटा मुझे सबसे ज्यादा प्यारा है, इसके रहते मुझे कोई चिंता नहीं!" माँ के कहे इन शब्दों ने मेरा आत्मविश्वास कई गुना बढ़ा दिया था और मुझ में नया जोश भरने लगा था|
[color=rgb(124,]जारी रहेगा भाग - 3 में...[/color]
 

[color=rgb(251,]इकत्तीसवाँ अध्याय: घर संसार[/color]
[color=rgb(61,]भाग - 3[/color]


[color=rgb(71,]अब तक अपने पढ़ा:[/color]

मिश्रा अंकल जी ने माँ को बताया की उन्होंने पिताजी से बात की थी तथा उन्हें बहुत समझाया भी की वो घर अपने परिवार के पास लौट आयें मगर पिताजी की भाई-भक्ति बीच में आ रही थी जिसने पिताजी की अक्ल पर पर्दा कर दिया था| "भाईसाहब, जब उन्होंने अपने खून.अपने बेटे की नहीं सुनी, अपनी धर्मपत्नी की नहीं सुनी तो वो आपकी बात कहाँ से सुनेंगे| उनकी ये भाई-भक्ति कभी खत्म नहीं होगी!" माँ ने निराश होते हुए कहा| मुझसे अपनी माँ को यूँ निराश नहीं देखा जा रहा था इसलिए में उन्हें सँभालते हुए बोला; "आप निराश क्यों होते हो माँ, आपका बेटा है न आपके पास? तो फिर आपको किसी और की क्या जर्रूरत?" मैंने बड़े गर्व से बात कही थी जिससे मेरी माँ का दिल फिर से खिल गया था| उन्होंने मेरे सर को चूम मुझे आशीर्वाद दिया तथा मुझ पर फक्र करते हुए मिश्रा अंकल और आंटी जी से बोलीं; "ये मेरा बेटा मुझे सबसे ज्यादा प्यारा है, इसके रहते मुझे कोई चिंता नहीं!" माँ के कहे इन शब्दों ने मेरा आत्मविश्वास कई गुना बढ़ा दिया था और मुझ में नया जोश भरने लगा था|

[color=rgb(97,]अब आगे:[/color]

किसी
भी परिवार की नीव उसके बुजुर्गों यानी दादा-दादी या माता-पिता पर टिकी होती है| हमारे परिवार की ये नीव मेरे माँ-पिताजी पर टिकी थी, लेकिन जब पिताजी ने हमारे परिवार की नीव को झकझोड़ कर रख दिया तो मुझे और संगीता को अपना सहारा दे कर इस नीव को मज़बूत बनाना पड़ा ताकि हमारी परिवार रुपी ये इमारत कहीं ढह न जाए| लेकिन हम पति-पत्नी द्वारा दिए गए इस सहारे में एक चीज़ की कमी थी और वो थी तज़ुर्बा! जो तज़ुर्बा माँ और पिताजी को था वो हमें नहीं था, वो (मेरे माता-पिता) जानते थे की किस हालात में कैसे अपने परिवार को सँभालना है| हम दोनों मियाँ-बीवी अपनी तरफ से कोशिश पूरी करते थे हमारे परिवार को सँभालने की मगर फिर भी थोड़ी तो कमी रह ही जाती थी! जहाँ हमारी कोशिशें कम पड़ती थीं वहाँ मेरे आयुष और नेहा अपने प्यार से उस कमी को पूरा कर देते थे! आयुष और नेहा में नजाने कौन सी दिव्य शक्ति थी की वो घर में दुःख को एकदम से भाँप जाते थे तथा अपने प्यार से हमें अपने मोहपाश में बाँध कर चिंता मुक्त कर देते थे!

मिश्रा अंकल जी द्वारा बताई बात से घर में भावुक वातावरण बन गया था, तभी बच्चे उठ गए और सीधा बैठक में आ गए| अपने दादा-दादी (मिश्रा अंकल-आंटी जी) को देख दोनों बच्चों ने मुस्कुराते हुए उनके पाँव छुए| मिश्रा अंकल जी ने आयुष को गोदी में बिठा लिया और आंटी जी ने नेहा को अपने पास बिठा कर उससे प्यार से बात करनी शुरू कर दी| दोनों बच्चों को यूँ हँसता-खेलता देख घर का वातावरण फिर से खुशनुमा होने लगा था| संगीता चाय बनाने के लिए उठने वाली थी की नेहा ने एकदम से चाय बनाने की जिम्मेदारी ले ली| जब नेहा चाय बना कर लाई तो मिश्रा अंकल जी ने चाय पीते हुए नेहा की बड़ी तारीफ की, अब आयुष बेचारे की तारीफ नहीं हुई थी इसलिए माँ को ही उसका पक्ष लेना पड़ा; "भाईसाहब, मेरे दोनों पोता-पोती बड़े जिम्मेदार हैं| आप जानते हो आयुष मुझे रोज़ रात को कहानी सुनाता है और कम्पूटर (computer) पर गेम खेलना सिखाता है!" माँ की बात सुन मिश्रा अंकल-आंटी जी हँसने लगे, मिश्रा आंटी जी ने आयुष को अपने पास बुलाया और उसके गाल चूमते हुए बोलीं; "अरे हमार मुन्ना बहुत नीक है!" आयुष को तारीफ हुई तो उसके गाल शर्म से लाल हो रहे थे और वो शर्माते हुए मुझसे आ कर लिपट गया!

रात को खाना खाने के बाद हम सभी बैठक में बैठे बात कर रहे थे, वहीं नेहा और आयुष अपना कार्टून देखने में व्यस्त थे| मैं, संगीता और माँ किसी नए लड़के को काम पर रखने पर चर्चा कर रहे थे, उस लड़के के सर सारी भाग-दौड़ की जिम्मेदारी सौंप मैं नए ठेके, माल लेने, लेबर प्रबंधित करना आदि कामों पर ध्यान लगा सकता था| माँ को मेरा ये सुझाव बहुत पसंद आया था और वो मुझे अपनी तरफ से कुछ नाम बता रहीं थीं जिनसे मैं बात कर के किसी लड़के को काम पर रखने की बात कर सकता था|

उधर आयुष का ध्यान अपने कार्टून देखने में कम और हमारी बातों पर ज्यादा था| हमारी साइट का कामकाज देखने के लिए नए लड़के को रखने की बात सुन आयुष एकदम से उठ खड़ा हुआ और अपना हाथ ऊपर उठाते हुए कूदने लगा| आयुष का ये बालपन देख हम तीनों (मैं, माँ और संगीता) मुस्कुरा रहे थे, हमें नहीं पता था की आयुष क्यों इस तरह जोश में कूद रहा है, हमें तो उसका ये बचपना देख कर उस पर प्यार आ रहा था| "दादी जी, मैं हूँ न सारा काम देखने के लिए? मैं भाग-दौड़ कर पापा जी का सारा काम सँभाल लूँगा|" आयुष अपने उत्साह में बड़े जोर से चीखते हुए बोला| आयुष की उम्र को देखते हुए उसका यूँ जिम्मेदारी वाला काम उत्साह से अपने सर उठाना क़ाबिल-ऐ-तारीफ था! ये दृश्य देख हम सभी उस छोटे से बच्चे पर मोहित हो रहे थे| आखिर सबसे पहले माँ का प्यार छलक उठा; "ये है मेरा जिम्मेदार बेटा! शाबाश!" माँ ने आयुष की तारीफ करते हुए उसे अपने गले लगाया तथा उसके सर को बार-बार चूमने लगीं| आयुष अपनी दादी जी का प्यार पा कर ख़ुशी से फूला नहीं समा रहा था, वो अपनी दादी जी से लिपट गया और अपनी दादी जी के प्यार का आनंद लेने लगा|

इधर संगीता चुप कैसे रहती, उसे तो आयुष की बात पर चुटकी लेने का मौका मिल गया था; "ठीक ही है माँ, इसे (आयुष को) ही काम पर रख लो| इसे तो तनख्वा भी नहीं देनी होगी, ये तो एक प्लेट चाऊमीन से ही खुश हो जाएगा!" संगीता की कही इस बात पर आयुष के मुँह में एकदम से पानी आ गया और वो अपने होठों पर जीभ फिराने लगा| संगीता की ये बात और आयुष की इस प्रतिक्रिया पर हम सभी ने जोर से ठहाका लगाया|

अगले दिन मैं सबसे पहले सतीश जी से मिला और उन्हें चन्दर के मरने की बात बताई, उन्हें ये बात बताने का कारन ये था की वो संगीता का चन्दर से तलाक फाइनल करवा दें तथा हमारी शादी को जायज़ स्वीकृति मिल जाए| मेरी सारी बात सुन कर सतीश जो को बहुत बड़ा झटका लगा, उन्हें उम्मीद नहीं थी की मेरे जैसा सीधा-साधा लड़का अपनी जान बचाने के लिए अपने ही ताऊ के लड़के को मार सकता है! "भई मानु, मुझे यक़ीन नहीं होता की तुम्हारे जैसा सीधा-साधा लड़का भी मार-काट कर सकता है? लेकिन जो हुआ वो सही हुआ, तुम अपने मन पर कोई बोझ मत रखना की तुमसे कुछ गलत हुआ है| आजकल की दुनिया में या तो तुम लड़ सकते हो या फिर कुचले जा सकते हो| मुझे ख़ुशी इस बात की है की तुमने लड़ने का फैसला किया और अपने परिवार की रक्षा की| हाँ अगर तुम मुझे गाँव से एक फ़ोन कर देते तो मैं यहीं बैठे-बैठे सब कुछ सँभाल लेता|" सतीश जी मेरी हौसला अफ़ज़ाई करते हुए बोले|

"सर, संगीता के बड़े भाईसाहब के साले साहब हमारे ही जिले के SP साहब थे, तो उन्होंने खुद इस केस में अपना हाथ डाला और सब कुछ सुलझा दिया इसलिए आपको तंग करने की जर्रूरत नहीं पड़ी|" मैंने हलीमी से जवाब दिया| मेरा जवाब सुन सतीश जी मेरी पीठ थपथपाने लगे और मुझे आश्वस्त करते हुए बोले; "यार, तकलीफ कैसी?! खैर, अब मैं जल्दी से संगीता का तलाक निपटवा देता हूँ, इसके लिए कुछ कागजी करवाई करनी होगी|" ये कहते हुए सतीश जी ने मुझसे चन्दर का death certificate माँगा| चूँकि वो कागज मेरे पास नहीं था इसलिए मैंने भाईसाहब को फ़ोन कर उनसे इस कागज का जुगाड़ करने को कहा| भाईसाहब ने उसी समय अपने साले साहब को फ़ोन किया और और चन्दर का death certificate सीधा सतीश जी को email करने को कह दिया|

तो कुछ इस तरह मेरे जीवन की एक समस्या का हल चन्दर की मौत ने कर दिया था| 'चलो कहीं तो चन्दर की मौत मेरे काम आई!' मैं मन ही मन बुदबुदाया और अपने काम पर निकल गया|

अगले दो दिन मेरे लिए भाग-दौड़ भरे रहे, गुड़गाँव वाली साइट का काम फाइनल हो चूका था और काम पूरा होने पर पैसे मिलने वाले थे| वहीं मैंने अपनी मदद के लिए एक लड़का 'सरयू' ढूँढ लिया था, सरयू बक्सर, उत्तर प्रदेश का रहने वाला था और यहाँ दिल्ली में correspondence से course कर रहा था| खर्चा चलाने के लिए उसे नौकरी चाहिए थी इसलिए मैंने उससे साफ़-साफ़ बात की; "देख यार, मेरा काम फिलहाल थोड़ा कमजोर है इसलिए मैं फिलहाल तुझे 5,000/- तनख्वा दे सकता हूँ|" 5,000/- थे तो काम मगर मैं इस वक़्त किसी को भी तनख्वा पर रखने की हालत में नहीं था| सरयू का इतनी कम तनख्वा से मन फीका हो रहा था इसलिए मैंने उसे एक आस रुपी लालच दे दिया; "इसके अलावा जो भी ठेके पूरे होंगे उसका 10% मैं तुझे तनख्वा के साथ दे दूँगा| जानता हूँ की ये पैसे बहुत कम हैं मगर ये भी सोच की तुझे काम भी सीखने को मिल रहा है| इस बीच अगर तुझे कोई दूसरी नौकरी मिल जाए तो वो पकड़ लियो, मेरी तरफ से कोई बंदिश नहीं होगी|" मेरी ये बात सुन सरयू ने हाँ में सर हिला दिया और अगले दिन से ही काम शुरू कर दिया|

अगले दिन मैंने सरयू को सारी sites घुमा दी और उसे काम दे कर भगा-दौड़ी पर लगा दिया| मिश्रा अंकल जी द्वारा दिए गए दोनों ठेकों पर काम मैंने शुरू करवा दिया था, मुझे इत्मीनान इस बात का था की इन दोनों ठेकों के खत्म होने से घर की आर्थिक स्थिति मज़बूत होगी| भले ही काम मैंने थोड़ा ही फैलाया था मगर कुछ भाग-दौड़ मुझे भी करनी पड़ रही थी, मेरी इस भगा-दौड़ी का असर मेरे दोपहर को घर न जाने पर पड़ रहा था| लेकिन बच्चे, माँ और संगीता ने मुझसे मेरे दोपहर खाना खाने घर न आने पर कोई शिकायत नहीं की| हाँ इतना जर्रूर है की रात को मैं 7 बजे तक घर पहुँच जाता था और अपने परिवार को पर्याप्त समय देता था|

4-5 दिन बीते थे की शाम 7 बजे संतोष का फ़ोन आया, उसने बताया की वो दिल्ली पहुँच चूका है और सीधा मेरे घर ही आ रहा है| इस समय संतोष का मेरे घर आना किसी अशुभ घटना के घटित होने का सूचक था| संतोष के फ़ोन के बाद मैं सोच में पड़ गया की आखिर क्यों संतोष रात को इस समय मेरे घर आना चाहता है? 'कहीं संतोष काम तो नहीं छोड़ रहा? अगर ऐसा हुआ तो कल से सारा काम मेरे लिए अकेला सँभालना चुनैती भरा काम होगा!' मैं मन ही मन बड़बड़ाया| परन्तु मेरे इतना सोचने से कोई फर्क तो पड़ने वाला था नहीं, क्योंकि जो घटित होना था वो तो घट के ही रहना था!

रात सवा 9 बजे संतोष मेरे घर पहुँचा, तब तक हमने बच्चों को खाना खिला कर सुला दिया था ताकि बच्चे घर में हो रही बातें न सुनें| संतोष ने माँ के पैर छू आशीर्वाद लिया और फिर अपने इस समय आने का प्रयोजन बताया;

संतोष: आंटी जी, मुझे अंकल जी ने फ़ोन कर के अपने पास गाँव बुलाया था| उनके पास आप सबके कुछ कपड़े रह गए थे तो अंकल जी ने मुझे कहा की मैं ये कपड़े आपको पहुँचा दूँ|

संतोष की बात सुन माँ को बहुत गुस्सा आया था| संतोष हमारे घर का सदस्य नहीं था, ऐसे में उसे घर की बातों में शामिल करना माँ को नागवार था| हमें लग रहा था की शायद पिताजी ने संतोष को कुछ नहीं बताया होगा, परन्तु जब संतोष ने आगे अपनी बात कही तो हम तीनों (मुझे, माँ और संगीता) को बहुत बड़ा झटका लगा;

संतोष: आंटी जी, अंकल जी ने कहा है की आप उनके अकाउंट की चेक बुक और उनके पहचान पत्र कूरियर द्वारा भिजवा दें!

जब पिताजी ने अपनी चेक बुक और पहचान पत्र माँगा तो जाहिर था की संतोष ने जर्रूर पुछा होगा की आखिर क्यों पिताजी खुद हमसे बात न कर के उसे आगे रख कर बात कर रहे हैं? जिसके जवाब में पिताजी ने संतोष को सारी बात अवश्य बता दी होगी, तो अब हमें संतोष से कुछ भी छुपाने की जर्रूरत नहीं थी| परन्तु अभी तो पिताजी ने माँ के लिए खासकर एक और फरमान संतोष के हाथों भिजवाया था;

संतोष: और आंटी जी, अंकल जी ने कहा था की मैं आपकी बात उनसे करवा दूँ|

संतोष की ये बात सुन मुझे लगा था की माँ, पिताजी से बात करने को मना कर देंगी मगर माँ गुस्से में भरी बैठीं थीं और उन्हें अपना ये गुस्सा पिताजी पर निकालना था;

माँ: फ़ोन मिला बेटा!

माँ ने संतोष को हुक्म देते हुए कहा तो संतोष ने फ़ट से मेरे पिताजी को फ़ोन मिला दिया और फ़ोन माँ को दे दिया| फ़ोन की एक घंटी बजते ही पिताजी ने फ़ोन उठा लिया था, दरअसल पिताजी ने संतोष को ये आदेश दिया था की वो दिल्ली पहुँचते ही सबसे पहले हमसे मिले और माँ की बात उनसे करवाए इसीलिए पिताजी को संतोष के फ़ोन का पहले से ही इंतज़ार था|

माँ: हाँ!

माँ ने बड़ी कड़क आवाज में फ़ोन कान पर लगाते हुए कहा|

पिताजी: मैंने तुम्हें बस ये कहने के लिए फ़ोन किया था की कल को अगर तुम्हारा बेटा तुम्हें घर से निकाल दे तो यहाँ गाँव मेरे पास आ जाना| मुझे उस लड़के (मेरा) का रत्ती भर विश्वास नहीं, जो अपने ही भाई का खून कर सकता है वो कल को तुम्हें घर से भी निकाल सकता है! मेरी इस बात को ठंडे दिमाग से सोचना और फिर चाहे तो मुझे कॉल कर के मुझसे बात करना|

पिताजी की ये बात हम तीनों (मैं, संगीता और संतोष) में से किसी ने नहीं सुनी थी| उधर पिताजी की कही ये बात सुनते ही माँ का गुस्सा पिताजी पर फ़ट पड़ा;

माँ: आपको अपने बेटे पर भरोसा न हो न सही मगर मुझे मेरे बेटे पर पूरा विश्वास है! न उसने आपको घर से निकाला था और न ही वो कभी मुझे घर से निकालेगा! आप रहो अपने भाई-भाभी के पास और हमें यहाँ चैन से रहने दो! आपको पैसे ही चाहिए न, मानु आपको आपके सारे कागज-पत्री, चेक बुक कॉरिएल (courier) कर देगा! खबरदार जो आज के बाद आपने मुझे या मेरे बेटे को फ़ोन किया तो, मुझसे बुरा कोई न होगा, कहे देती हूँ!

माँ का ऐसा गुस्सैल रूप हमने आज तक नहीं देखा था, उनके इस गुस्से ने पिताजी की बोलती बंद कर दी थी! माँ का गुस्सा ऐसा था की अगर पिताजी उनके सामने होते तो माँ उन्हें फाड़ कर खा ही जातीं!

माँ ने गुस्से में फ़ोन काट दिया और अपना गुस्सा काबू करने लगीं| मैंने जब माँ को खामोश देखा तो मैं उनके पास बैठ गया, इस उम्मीद में की माँ कुछ कहें| जब माँ कुछ नहीं बोलीं तो मैंने ही बात शुरू की;

मैं: माँ?

मेरी बात सुन माँ होश में आईं और उन्होंने हमें पिताजी द्वारा कही हुई सारी बात बताई| माँ से हुई पिताजी की बातों से मुझे बहुत दुःख हुआ और मैं खामोश हो कर सोच में पड़ गया| अभी तक मेरे पिताजी ने मुझ पर खुनी होने की तोहमद लगाई थी लेकिन आज तो उन्होंने मुझ पर अपनी ही माँ को घर से बाहर निकालने का आरोप भी लगा दिया था!

उधर जब माँ ने मुझे खामोश देखा तो वो मुझे हिम्मत बँधाने लगीं;

माँ: बेटा, तू अपने पिताजी की बात को दिल से मत लगा! उनकी अक्ल पर पत्थर पड़े हैं, उन्हें बस अपने भैया-भाभी सही दिखते हैं और अपना खून गलत!

ये कहते हुए माँ ने मुझे अपने गले लगा लिया| मैं और खामोश रह कर माँ का दिल नहीं दुखाना चाहता था इसलिए मैंने नकली मुस्कान लिए हुए सर हाँ में हिलाया|

अब चूँकि संतोष को सारी बात मालूम थी इसलिए मुझे अब उससे एक जर्रूरी सवाल पूछना था;

मैं: तो संतोष, अब तुझे सारी बात पता ही है तो मेरा बस एक ही सवाल है, क्या तुझे मेरे साथ अब भी काम करना है?

मेरा ये सवाल सुन माँ और संगीता दंग थे! जबकि मेरा मकसद संतोष की मेरे और मेरे काम के प्रति निष्ठा जानना था|

संतोष: भैया, मैंने आजतक आपको कुछ भी गलत करते नहीं देखा| आपने अगर चन्दर भैया पर गोली चलाई भी तो इसलिए क्योंकि वो आपको जान से मारने आया था, आप उसकी जान लेने नहीं गए थे इसलिए अगर आपको लगता है की अंकल जी की आपके खिलाफ कही बातों से मैं आपके साथ काम नहीं करूँगा तो मैं आपको बता दूँ की मैं अंकल जी की बातों से ज़रा भी प्रभावित नहीं हूँ| मैं तबतक आपके साथ काम करूँगा जबतक की आप मुझे खुद काम से नहीं निकाल देते!

संतोष की बातों में मुझ पर आत्मविश्वास था, वो दिल से ये बात मानता था की मैं गलत नहीं हूँ तभी वो मेरे साथ काम करने को तैयार हुआ था|

खैर, अब बातें साफ़ हो गई थीं तो अब कम से कम काम को ले कर मुझे कोई चिंता करने की जर्रूरत नहीं थी| मैंने संतोष से काम को ले कर बात करने लगा, मेरी बातों से कोई नहीं कह सकता था की मुझे पिताजी की कही बातों से कितना दुःख हुआ है! मुझे अपना दुःख अपने परिवार के सामने आने से रोकना था इसलिए मैं सबके सामने हँसी का मुखौटा ओढ़े बैठा था|

इधर घर में बातें हो रहीं थीं इसलिए बच्चे जाग गए और आँखें मलते हुए मेरी गोदी में चढ़ गए| बच्चों के प्यारभरे मोहपाश ने मुझे जकड़ लिया था और मेरा दिल ख़ुशी से भरने लगा था| बच्चों ने शायद मेरे भीतर बसी मायूसी को भाँप लिया था तभी तो वो मेरे सीने से लगे हुए चहक रहे थे!

संगीता: तुम दोनों शैतानों को नींद नहीं आती?!

संगीता हँसते हुए बोली| संगीता की बात सुन दोनों बच्चे खिलखिलाकर हँसने लगे|

मैं: मेरे बिना मेरे बच्चों को नींद आती कहाँ है?!

मैंने दोनों बच्चों के सर चूमते हुए कहा| मेरी बात सुन दोनों बच्चों ने मिल कर मेरे दोनों गाल चूम-चूम कर गीले कर दिए|

रात बहुत हो रही थी, माँ ने संतोष से खाना खाने के लिए पुछा तो संतोष ने बताया की उसने ट्रैन से उतरते ही खाना खा लिया था| मैं, संतोष को छोड़ने के लिए उसके साथ बात करते हुए घर से निकला, संतोष को ऑटो करवा कर मैं अकेला घर लौट रहा था की तभी मेरे दिमाग में आज पिताजी की कही बातें घूमने लगीं| पिताजी का यूँ मेरे बारे में इतना गलत सोचना मेरा दिल बर्दाश्त नहीं कर पा रहा था| यही सोच अगर किसी तीसरे व्यक्ति की होती तो मुझे कुछ फर्क नहीं पड़ता मगर अपने ही पिता के अपने बेटे के बारे में ऐसा सोचना मेरे दिल को आहात कर गया था! जब दिल दुःखा तो उसे कोई सहारा चाहिए था, ये सहारा मैं अपने परिवार से नहीं माँग सकता था क्योंकि मैं उन्हें कमजोर दिखता और मुझे यूँ कमजोर देख सबकी हिम्मत टूट जाती| मुझे कोई ऐसा सहारा चाहिए था जिसके बारे में किसी को पता न चले, ऐसा सहारा जो की मुझे कोई व्यक्ति नहीं बलिकी एक वस्तु दे सकती थी!

आज कई दिनों बाद दिल में नशे की हुक जगी! 'संगीता ने जब मुझे खुद से दूर किया था तब इसी नशे ने मुझे सहारा दिया था' ये सोचते हुए मेरे कदम शराब के ठेके की ओर मुड़ना चाहते थे की तभी मेरी अंतरात्मा ने मुझे जकझोड़ते हुए बच्चों की याद दिला दी; 'शराब पी कर न केवल तू अपने पिताजी से किया वादा तोड़ेगा बल्कि अपनी माँ, अपने बीवी-बच्चों से कभी नज़र नहीं मिला पायेगा!' अंतरात्मा की कही ये बात सुन मैं अपने नशे की हुक पर काबू पाने की कोशिश करने लगा| जब आपका दिल दुःखा हो तो वो इस स्थिति में नहीं होता की आपको सही-गलत में फर्क करना सिखाये| उस समय जो आपके दिल को सुकून दे वही चीज़ सही और जो दिल को दुखाये वो गलत होती है! नशा मेरे दिल को सुकून दे सकता था इसलिए मेरा दिल मुझे नशे को पाने से लड़ने नहीं दे रहा था|

'शराब न सही, सिगरेट तो पी ही सकता हूँ?! उसके लिए न तो मैंने किसी से कोई वादा किया था और न ही सिगरेट पीने की खबर किसी को लगेगी| और कौन सी रोज़ पी रहा हूँ, बस आज भर की तो बात है!' मेरे दिमाग को नशे की लत पहले ही थी, वो तो मेरे परिवार के प्यार के कारण ये लत छूट गई थी, ऐसे में आज जब दिल की नशे की माँग की तो दिमाग ने भर-भरकर तर्क मेरे आगे इन शब्दों में परोस दिए| दिल और दिमाग की नशे की हुक के आगे मेरी संकल्प शक्ति जवाब दे गई तथा मेरे कदम मुझे पनवाड़ी की दूकान तक खींच ले गए|

पनवाड़ी के पास पहुँच तो गया मगर सिगरेट लूँ कौनसी ये समझ ही नहीं आया! ऊपर से सिगरेट माँगने में फ़ट अलग से रही थी की कहीं कोई आस-पड़ोस वाला मुझे सिगरेट लेता देख न ले! मैंने अपना फ़ोन निकाला और ऐसे दिखाया जैसे मैं कोई मैसेज पढ़ने में व्यस्त हूँ, जबकि मेरा ध्यान बाकी ग्राहकों पर था| तभी एक लड़का आया और उसने पनवाड़ी से "1 मिंट वाली देना" कहा| जब उसने ये कहा तो पनवाड़ी ने उसे एक सिगरेट निकाल कर दी| मैंने ये नाम तुरंत पकड़ लिया और अपनी नज़र फ़ोन में गड़ाए हुए ही पनवाड़ी से "1 मिंट वाली" सिगरेट माँगी| सिगरेट ले कर मैंने ये तक नहीं देखा की ये कौन सी ब्रांड की है, मैं तो इस सोच में था की ये पीयूँ कहाँ? सबके सामने सिगरेट पी नहीं सकता था, पहलीबार था और सिगरेट का पहला कश लेते ही मुझे खाँसी आती| मेरी किरकिरी न हो इसलिए मैंने सिगरेट अपने घर की छत पर पीने का फैसला किया, वहाँ मुझ पर हँसने वाला कोई नहीं था तथा मैं चैन से बैठ कर सिगरेट पी सकता था| सिगरेट तथा एक chewing gum ले कर मैं घर लौट आया|

घर लौटा तो देखा की मेरे दोनों प्यारे बच्चे सोने का नाम ही नहीं ले रहे! संतोष के इंतज़ार में मैंने, माँ ने और संगीता ने खाना नहीं खाया था, यही कारण था की बच्चे सोने का नाम नहीं ले रहे थे| संगीता ने जब सबके लिए खाना परोसा तो दोनों बच्चे मेरे हाथों खाना खाने के लिए उत्साहित हो कर कूदने लगे| जब मैंने दोनों बच्चों को अपने हाथों से एक-एक कौर खिलाया तब जा कर दोनों बच्चों का उत्साह शांत हुआ और वो सोने के लिए तैयार हुए| जितनी देर बच्चे उत्साह से मेरे सामने कूद रहे थे उतनी देर के लिए मेरा मन शांत था और मेरी सिगरेट पीने की इच्छा नहीं हो रही थी मगर जैसे ही बच्चे सो गए मेरा दिल सिगरेट का नशा पाने के लिए आतुर हो गया!

रात के साढ़े बारह बजे थे और मेरा मन पिताजी की बातें सोच-सोच कर व्याकुल हो गया था तथा सिगरेट पीने की मेरी इच्छा प्रबल हो गई थी| मैं दबे पाँव उठा और छत पर पहुँच गया, छत पर लगी टंकी के पीछे मैं पीठ टिका कर बैठ गया| रात का सन्नाटा था और ठंडी-ठंडी हवा बह रही थी, इस शांत वातावरण में मेरा मन रोने को कर रहा था| पिताजी के साथ बिताई मेरी बचपन की यादें एक-एक कर मेरे दिल को आघात कर रही थीं! मेरे बचपन में मुझे लाड-प्यार करने वाले मेरे पिताजी मुझसे अब नफरत करने लगे थे| "मैंने क्या गलत किया जो आप मुझसे नफरत कर रहे हो?" मैं गुस्से में बड़बड़ाया| चूँकि मैं यहाँ अकेला था इसलिए मुझे चिंता नहीं थी की कोई मेरी बात सुनेगा|

मैंने सिगरेट निकाली और होठों पर लगा कर जलाई, पहला कश अंदर खींचते ही शुरू-शुरू में मुझे मिंट की ठंडक महसूस हुई लेकिन फिर सिगरेट का धुआँ सीधा जा कर गले में लगा और मुझे खाँसी आ गई! शुक्र है की मैंने पहला कश छोटा खींचा था इसलिए अधिक खाँसी नहीं आई, जैसे ही खाँसी रुकी मैंने वैसे ही सिगरेट का अगला कश सँभल कर खींचा ताकि इस बार खाँसी न आये इसलिए इस बार मुझे खाँसी नहीं आई बल्कि गले में ठंडक महसूस होने लगी| सिगरेट पीते हुए नजाने क्यों मेरा मन शांत हो गया था, न पिताजी की कही बातें याद आ रहीं थीं और न ही कोई अन्य चिंता मुझे सता रही थी| मेरे लिए तो ये सिगरेट जैसे कोई जादुई चिराग था, जिसे जला कर मैं अपनी सब चिंताएँ भूल सकता था!

खैर ये मेरी केवल कोरी कल्पना थी, सिगरेट पीने से मुझे कोई 'निर्वाना' नहीं मिल गया था! ये तो बस दिल को नशे की जर्रूरत थी और उसने मेरे दिमाग को ऐसा सोचने पर मजबूर कर दिया था की सिगरेट पीने से मेरी सभी चिंताएँ खत्म हो गई हैं| अगर सच में सिगरेट से चिंताएँ खत्म हो जातीं तो बात ही क्या थी!

सिगरेट पी कर आधे घंटे बाद मैं नीचे आ गया और मुँह धो कर लेट गया| मेरे लेटते ही संगीता की नींद खुल गई और वो मुझसे बच्चों की तरह लिपट गई जिससे मुझे बड़ी मीठी नींद आई| अगली सुबह उठते ही मैंने पिताजी के सभी कागज-पत्तर, उनकी चेक बुक आदि इकठ्ठा की और एक लिफ़ाफ़े में ठीक से पैक कर के संतोष के हाथों पिताजी को गाँव में कूरियर करवा दी|

[color=rgb(124,]जारी रहेगा भाग - 4 में...[/color]
 

[color=rgb(251,]इकत्तीसवाँ अध्याय: घर संसार[/color]
[color=rgb(44,]भाग - 4[/color]


[color=rgb(71,]अब तक अपने पढ़ा:[/color]

सिगरेट पी कर आधे घंटे बाद मैं नीचे आ गया और मुँह धो कर लेट गया| मेरे लेटते ही संगीता की नींद खुल गई और वो मुझसे बच्चों की तरह लिपट गई जिससे मुझे बड़ी मीठी नींद आई| अगली सुबह उठते ही मैंने पिताजी के सभी कागज-पत्तर, उनकी चेक बुक आदि इकठ्ठा की और एक लिफ़ाफ़े में ठीक से पैक कर के संतोष के हाथों पिताजी को गाँव में कूरियर करवा दी|

[color=rgb(97,]अब आगे:[/color]

सरयू
और संतोष के एक साथ होने से मेरा काम अच्छा चल पड़ा था, जहाँ एक तरफ सरयू नॉएडा वाली साइट का काम अच्छे से सँभाल रहा था, वहीं दूसरी तरफ संतोष के साथ मिल कर मैंने हर तरह के ठेके उठाने शुरू कर दिए थे| काम सरयू और संतोष दोंनो मिल कर सँभाल रहे थे तो मैंने अपना ध्यान माल बेचने वाले को ढूँढ निकाला, ये व्यक्ति मेरे अनुसार काम करने को तैयार था| पैसे मैं उसे समय पर दे देता था बदले में वो मुझे माल देने में कतई आनाकानी नहीं करता था| काम चल निकला था और मुझे अब काम को ले कर कोई चिंता नहीं रह गई थी|

मेरे ससुर जी की मृत्यु हुए 12 दिन बीत चुके थे और आज मेरे ससुर जी की तेरहवीं थी, तेरहवीं की पूजा के लिए मैंने सारा प्रबंध पहले ही कर दिया था| सुबह-सुबह हम सब मंदिर पहुँचे और पूरे विधि-विधान से पूजा संपन्न हुई| पूजा के बाद ब्राह्मण भोज और भंडारा रखा गया था| सबसे पहले ब्राह्मण भोज होना था जो की मैंने और बच्चों ने मिल कर पूर्ण किया| बच्चों ने मेरे साथ मिलकर ब्राह्मणो को भोजन परोसा, जब आयुष अपने छोटे-छोटे हाथों से ब्राह्मणो को पूड़ी परोस रहा था तो ये दृश्य बहुत ही प्यारा था| वहीं नेहा और मैं मिल कर आलू की सब्जी तथा सीताफल की सब्जी परोस रहे थे| फिर आई अंत में हलवा परोसने की बारी तो आयुष ने ख़ुशी-ख़ुशी इस काम की जिम्मेदारी ली, आयुष चूँकि छोटा था इसलिए वो हलवे से भरी परात नहीं उठा पा रहा था, तब नेहा ने आगे बढ़ते हुए परात उठाई और आयुष ने धीरे-धीरे सभी ब्राह्मणो को हलवा परोसा|

ब्राह्मण भोज के बाद भंडारा शुरू हुआ, आयुष छोटा था तो उसे अब भूख लग आई थी| माँ ने मुझे इशारे से आयुष की भूख के बारे में बताया तो मैंने आयुष के लिए खुद एक पत्तल में भंडारे का प्रसाद तथा नेहा को अपने छोटे भाई को खाना खिलाने की जिम्मेदारी दे दी| नेहा को आयुष को खाना खिलाते देख मेरा दिल ख़ुशी से धड़क रहा था| भंडारे का भोजन हमेशा स्वाद होता है तभी तो आयुष का चेहरा स्वाद खाना खाने से दमक रहा था! माँ ने जब आयुष को इतना खुश देखा तो उन्होंने आयुष से पुछा; "आयुष बेटा, पेट भर गया?" माँ को लग रहा था की आयुष की भूख खाना खाने से मिट गई इसीलिए आयुष इतना खुश है| "दादी जी, ये खाना तो बहुत स्वाद है?!" आयुष चहकते हुए बोला| आयुष की बचकानी बातें सुन सभी हँस पड़े| "बेटा, भंडारे के भोजन को हम प्रसाद कहते हैं और ये स्वाद इसलिए होता है क्योंकि इसमें भगवान का आशीर्वाद मिला होता है|" मैंने आयुष को प्यार से समझाते हुए कहा| ये मेरा भगवान पर विश्वास था और मुझे ये देख कर ख़ुशी हुई की मेरा बेटा आयुष मेरी बात पर विश्वास कर मेरे दिखाए आस्था के रास्ते पर चल भगवान पर अपनी आस्था मज़बूत कर रहा था|

बच्चो के स्कूल का result मार्च महीने के मध्य में आना था इसलिए बच्चे इस वक़्त चिंता मुक्त अपनी मस्ती में मस्त रहते थे| मैं काम में व्यस्त रहता था इसलिए बच्चों की मस्ती केवल घर के भीतर ही रहती थी| एक बार बच्चों का घूमने का मन था तो माँ उन्हें अपने साथ मंदिर ले गईं जहाँ बच्चों ने कीर्तन में हिस्सा लिया| घर आ कर माँ ने बच्चों की बड़ी तारीफ की कि कैसे बच्चों ने मंदिर में भक्तिमय वातावरण में पूरे उत्साह से हिस्सा लिया|

मैंने आज तक जो भी नशा किया वो हमेशा मेरे काबू में रहा है| मेरा नशा कभी मेरे और मेरे परिवार की खुशियों के बीच नहीं आया क्योंकि मेरी तवज्जो हमेशा से ही मेरे परिवार की तरफ रही है| सिगरेट का नशा मेरी जुबान पर चढ़ चूका था मगर ये लत फिलहाल मेरे काबू में थी| मैं जानता था की सिगरेट की लत बड़ी बुरी होती है इसलिए मैं सिगरेट तभी पीता था जब मन पिताजी की बातों को सोच कर उदास होता था| हफ्ते में 3-4 सिगरेट से ज्यादा मैंने कभी नहीं पी क्योंकि मेरा मानना था की इससे अधिक अगर मैंने पी तो ये लत बेकाबू हो जाएगी|

मेरे बाएँ कँधे पर हुआ जख्म अब धीरे-धीरे भरने लगा था, जिसका सारा श्रेय मेरी बेटी नेहा को जाता है| सुबह काम पर निकलने से पहले और काम से घर लौटने पर मेरी बेटी ही मेरे जख्म को साफ़ कर नई पट्टी किया करती थी| मेरा ये इलाज करते समय मेरी प्यारी गुड़िया एकदम से अस्पताल की नर्स बन जाती थी| पूरी शिद्दत और ध्यान लगा कर नेहा मेरा इलाज करती थी| एक बार आयुष ने मदद करनी चाहि तो नेहा ने उसे डाँट दिया ये कह कर की; "तू दूर रह, बिना हाथ धोये पापा के जख्म को छुएगा तो इन्फेक्शन हो जाएगी!" अपनी दीदी की डाँट खा कर आयुष भाग गया था| वहीं मेरे जख्म के उपचार के बारे में माँ और संगीता, नेहा से ऐसे रिपोर्ट माँगते थे मानो नेहा कोई बहुत बड़ी surgeon हो तथा नेहा भी मेरे जख्म के भरने का विवरण ऐसे ही देती थी जैसे कोई डॉक्टर विवरण देता हो! कुल मिलकर कहूँ तो मेरे घर का माहौल कभी-कभी अस्पताल जैसा बन जाता था!

बहरहाल, होली का पर्व आ गया था और कॉलोनी वालो ने होलिका दहन की तैयारी कर ली थी, शाम को पूजा थी जिसमें हम सभी ने हिस्सा लिया| पूजा संपन्न होने के बाद घर में कल होली खेलने को ले कर कोई बात नहीं हुई, मैं चाहता तो बात उठा सकता था मगर मैंने सबको सरप्राइज देने का मन बना लिया| मैं बहाना कर के घर से गाडी की चाभी ले कर निकला तथा जर्रूरी सामान ले कर गाडी की डिक्की में रख घर लौट आया|

अगली सुबह यानी होली खेलने वाले दिन मैं जल्दी से उठ गया और माँ का आशीर्वाद ले कर उनसे होली मनाने पर बात करने लगा| माँ को होली मनाने से कोई आपत्ति नहीं थी, उनका कहना था की मैं संगीता से एक बार पूछ लूँ| तभी एक-एक कर संगीता, नेहा तथा आयुष उठ गए, मुझे सुबह की गुड मॉर्निंग वाली पप्पी दे कर दोनों बच्चे ब्रश करने चले गए| वहीं मुझे माँ से बात करते देख संगीता सोच में पड़ गई थी इसलिए वो मेरे साथ बैठ गई| मैंने संगीता से होली खेलने पर बात शुरू करते हुए कहा;

मैं: जान, मैं और माँ आज होली खेलने पर बात कर रहे थे|

मेरी बात सुन संगीता अपने पिताजी को याद करने लगी जिस कारण उसका मुँह कुछ फीका पड़ने लगा|

मैं: जान, मैं ये बात अपने लिए नहीं बल्कि हमारे बच्चों की ख़ुशी के लिए कह रहा हूँ| होली का त्यौहार साल में एक बार आता है और मैं अपना बच्चों को इस ख़ुशी के लिए तरसाना नहीं चाहता| हमारे माँ-बाप ने आज तक हमें किसी चीज़ के लिए नहीं तरसाया, जो खुशियाँ वो हमें दे सकते थे उन्होंने हमे दी है इसलिए मैं भी अपने बच्चों को नहीं तरसने दूँगा|

मैं जोश से भरते हुए बोला| अब नया-बया बाप बना था तो मुझ में बच्चों को खुशियाँ देने का जोश कुछ ज्यादा ही था| इधर मेरी इतनी दलील सुनने के बाद भी संगीता के चेहरे पर आये भाव नहीं बदले थे| दरअसल, उसे गाँव के रीते-रिवाजों की चिंता थी, जिनके अनुसार परिवार में किसी की भी मृत्यु होने पर पूरा परिवार कम से कम एक साल तक कोई त्यौहार नहीं मनाता| मैं तो शुरू से ही बगावत करने वाला रहा हूँ इसलिए मुझे इन दकियानूसी रीति-रिवाजों को मानने का शौक नहीं!

मैं: मुझे एक बात बताओ, पिताजी (मेरे ससुर जी) इस समय जहाँ भी होंगे क्या वो ये दृश्य देख कर खुश होंगे की उनके नाती-नातिन त्यौहार में खुश होने के बजाए मुँह लटकाये दूसरों को होली मनाते हुए देख रहे हैं?! अगर आज वो यहाँ होते तो क्या वो बच्चों को खुशियाँ मनाने से रोकते? अरे, उन्हें तो ख़ुशी होती की उनके नाती-नातिन त्यौहार की ख़ुशी से चहक रहे हैं!

मेरे पूछे सवालों से संगीता के भीतर सकारात्मक विचार पैदा हो रहे थे मगर उसे अब भी एक चिंता थी;

संगीता: मैं आपकी बात समझती हूँ, लेकिन आस-पड़ोस वाले क्या कहेंगे? मेरे पिताजी की मृत्यु हुए अभी महीना हुआ है और हम होली मना रहे हैं?!

संगीता की ये चिंता जायज थी मगर उसकी चिंता के आगे मैं अपने बच्चों की ख़ुशी बलि नहीं चढ़ने देने वाला था|

मैं: दुनिया क्या सोचेगी, अगर हम इसी की परवाह करेंगे तो हम तो कभी खुशियाँ ही नहीं मना पाएंगे! क्या हमने दुनिया की सोच का ध्यान रखते हुए शादी की थी? दुनिया का काम ही है दूसरों को ताने मारना, फिर हम क्यों दुनिया की चिंता करें?!

मेरी कही बात का असर संगीता पर होने लगा था और उसके चेहरे पर मीठी सी मुस्कान आ गई थी तथा उसकी ये मुस्कान ही मेरे लिए होली मनाने की उसकी स्वीकृति थी| मैं ये खुशखबरी देने के लिए बच्चों को बुलाने की सोची लेकिन तभी मैंने देखा की बच्चे तो दरवाजे पर खड़े हमारी सारी बात सुन चुके हैं| बच्चों का मन भी होली खेलने का था मगर वो अपनी ये इच्छा हमसे कहने से डरते थे, जब मैं संगीता से होली खेलने पर तर्क-वितर्क कर रहा था तो बच्चों का दिल उम्मीद से भर उठा था| लेकिन बच्चों ने अपनी मम्मी के चेहरे पर होली खेलने की स्वीकृति भरी मुस्कान नहीं देखि थी, इसीलिए बच्चों की होली खेलने की उम्मीद टूट गई थी! मैंने अपने दोनों हाथ खोल कर बच्चों को अपने गले लगने को बुलाया तो बच्चे दौड़ते हुए आ कर मेरे गले लग गए| बच्चे बिना बोले मेरे गले लगे हुए ही होली मनाने की विनती कर रहे थे, एक पल को तो मन कचोटा की मेरे बच्चों को खुशियाँ मनाने के लिए मुझसे मूक विनती करने पड़ रही है, लेकिन फिर अगले ही पल मुझे मेरे बच्चों पर गर्व हुआ की वो दुसरो बच्चों की तरह मुझसे कोई जिद्द नहीं कर रहे थे| मैंने दोनों बच्चों के सर चूमे और उन्हें थोड़ा तड़पाते हुए बोला;

मैं: बेटा, आप दोनों अपनी आँखें बंद करो और जब तक मैं न कहूँ आप दोनों अपनी आँखें नहीं खोलोगे|

मेरी बात सुन बच्चे चकित थे, मेरी आवाज में मौजूद ख़ुशी वो महसूस कर चुके थे मगर मैं उन्हें क्या सरप्राइज देने वाला हूँ इसका वो अंदाजा नहीं लगा पा रहे थे|

खैर, मेरी बात मानते हुए दोनों बच्चों ने अपनी आँखें बंद कर ली| मैंने माँ और संगीता की ड्यूटी लगते हुए कहा;

मैं: माँ आप और संगीता ध्यान रखना की बच्चे कोई बेईमानी न करें तथा जबतक मैं न कहूँ वो आँखें न खोलें|

मेरी बात सुन माँ और संगीता मेरा बचपना देख हॅंस पड़े| माँ तो मेरे बचपने से अच्छी तरह वाक़िफ़ थीं, वो जानती थीं की मुझे सब को सरप्राइज देने में कितना मज़ा आता है इसलिए उनकी जिज्ञासा थोड़ी कम थी| वहीं दूसरी ओर संगीता की जिज्ञासा बच्चों की तरह थी, वो मन ही मन अटकलें लगा रही थी की भला मैंने इस बार क्या सरप्राइज प्लान किया है!

मैं फटाफट गाडी की चाभी ले कर बाहर आया तथा गाडी में कल रात को खरीद कर रखा हुआ समान ले कर दौड़ता हुआ घर आया| सामान ले कर मैं घर के दरवाजे पर चुपचाप खड़ा हो गया ताकि ये सुन सकूँ की कहीं बच्चों ने मेरे जाने के बाद अपनी आँखें तो नहीं खोल ली! लेकिन मुझे ये जानकार हंसी आई की मेरी गैरहाजरी में बच्चे सरप्राइज पाने के लिए बेसब्र हो गए थे, दोनों बच्चे अपनी दादी जी से पूछ रहे थे; "दादी जी, हम आँखें खोल लें?" जिसके जवाब में माँ एकदम से बोलीं; "नहीं-नहीं! तुम्हारा पापा आएगा तो मेरे से लड़ेगा की मैंने क्यों तुम्हें आँखें खोलने दी!" माँ ने ये बात बिलकुल बचकाने ढंग से कही थी जिससे दोनों बच्चों समेत संगीता भी हँस पड़ी!

आखिर मैं दरवाजा खोल कर घर के भीतर आया, मेरे दोनों हाथों में बड़े-बड़े थैले देख माँ और संगीता हैरान हुए क्योंकि उनकी समझ में नहीं आ रहा था की इन थैलों में आखिर है क्या? इधर मैंने ख़ुशी-ख़ुशी एक थैला साइड में रखा और उसमें से बच्चों के लिए होली की दो पिचकारी निकाली तथा बच्चों की तरह उत्साह दिखाते हुए बोला; "बेटा अब आप दोनों अपनी आँखें खोलो!" मेरा इतना कहते ही दोनों बच्चों ने झट से अपनी आँखें खोल ली| मेरे दोनों हाथों में होली की पिचकारी देख दोनों बच्चे ख़ुशी से फूले नहीं समा रहे थे, वहीं माँ और संगीता मुझे बच्चों से ज्यादा उत्साहित देख मेरे इस बचपने पर हँसे जा रहे थे|

मैं दोनों बच्चों के लिए अलग-अलग तरह की पिचकारी लाया था| आयुष के लिए पीठ पर टाँगने वाली टंकी वाली पिचकारी थी तथा नेहा के लिए बन्दूक वाली बड़ी पिचकारी थी| पिचकारी देख दोनों बच्चे दौड़ते हुए मेरे पास आये और मैंने उन्हें पिचकारी कैसे चलाते हैं ये सिखाया| दोनों बच्चे पिचकारी में पानी भरने के लिए बाथरूम में भाग गए और इधर मैंने दूसरे थैले में से मैंने गुलाल, पानी में घोलने वाला रंग तथा नमकीन के पैकेट निकाल कर संगीता को दिए|

संगीता: तो आपने पहले ही सब तैयारी कर ली थी?!

संगीता मुझे प्यार से उल्हाना देते हुए बोली|

मैं: मैं तो इंतज़ार कर रहा था की कब आप सब होली खेलने की बात छेड़ो, जब किसी ने कुछ नहीं कहा तो मुझे अपनी तैयारी तो करनी ही थी!

मैंने मुस्कुराते हुए जवाब दिया|

तभी दोनों बच्चे अपनी-अपनी पिचकारी में पानी भरकर आ गए, वो चाहते थे की मैं उनके साथ पिचकारी से होली खेलूँ मगर मुझे अभी उन्हें यहाँ शहर में होली कैसे खेलते हैं ये सिखाना था|

मैं: बेटा पिचकारी से होली बाद में खेलना, पहले हम चारों (मैं, संगीता, आयुष और नेहा) को आपकी दादी जी से आशीर्वाद लेना है|

ये कहते हुए मैंने अबीर का पैकेट उठाया और माँ को दिया, माँ ने एक चुटकी अबीर मेरे माथे पर लगाई तथा मैंने माँ के पाँव छू कर उनका आशीर्वाद लिया| मेरे बाद संगीता को माँ ने अबीर लगाया तथा संगीता ने भी माँ का पाँव छू कर आशीर्वाद लिया| जब बच्चों की बारी आई तो दोनों बच्चे इतना उत्साह में थे की उन्होंने पहले अपनी दादी जी का आशीर्वाद लिया और बाद में माँ ने उन्हें अबीर लगाई|

आयुष को पड़ी थी जल्दी होली खेलने की इसलिए वो मेरा हाथ पकड़ कर छत की तरफ खींच रहा था| आयुष का उत्साह देख माँ उसे टोकते हुए बोलीं; "अरे अभी कहाँ होली खेलने जा रहे हो, मुझे भी तो रंग लगाओ!" माँ ने आयुष की तरह बचकाने ढंग से बात कही| अपनी दादी जी की बात सुन आयुष का जोश देखने लायक था, वो सबसे पहले अपनी दादी जी को रंग लगाने के लिए दौड़ा| गुलाल के पैकेट से मुठ्ठी भर गुलाल ले कर आयुष ने अपनी दादी जी के दोनों गालों पर पोत दिया! आयुष की इस हरकत पर हम सभी ने जोर से ठहाका लगाया तथा माँ ने आयुष को अपने गले लगा लिया| आयुष के बाद बचे हम तीनों ने भी माँ को थोड़ा-थोड़ा गुलाल लगाया| माँ को हमने और माँ ने हमको गुलाल लगा दिया था, अब बचे थे मैं, संगीता तथा दोनों बच्चे जिन्होंने एक-दूसरे को अबीर नहीं लगाई थी| नेहा ने आगे बढ़ते हुए सबसे पहले मुझे गुलाल लगाया तथा मेरे पाँव छु कर मेरा आशीर्वाद लिया| मैंने नेहा को अपने गले लगाया तथा उसके सर को चूमते हुए उसे आशीर्वाद दिया; "जुग-जुग जियो मेरा बच्चा! I love you मेरा बच्चा!" फिर मैंने थोड़ी सी अबीर ले कर नेहा के माथे पर लगाई|

फिर नेहा थोड़ी सी अबीर ले कर अपनी मम्मी के पास गई और संगीता के मस्तक पर लगा, पाँव छू कर अपनी मम्मी का आशीर्वाद लिया| संगीता ने भी नेहा के मस्तक पर अबीर लगा कर नेहा को आशीर्वाद दिया| इधर आयुष मुझे अबीर लगाने के लिए ख़ुशी से कूदता हुआ मेरे पास आया| अपने छोटे-छोटे हाथों से आयुष ने मुट्ठी भर गुलाल ले कर मेरे माथे और गाल पर पोत दिया| आयुष के हाथ थे तो छोटे मगर उसने मेरा पूरा चेहरा गुलाल से पोत दिया था! एक बार फिर आयुष की इस हरकत पर हम सभी को जोरदार हँसी आ गई| आयुष के बचपने को देखते हुए मैंने आयुष को अपने गले लगाया और उसे आशीर्वाद देते हुए बोला; "मेरा प्यारा शैतान बच्चा, जुग-जुग जियो और अपनी प्यारी-प्यारी शैतानियों से हम सभी को हँसाते रहो!" अब मेरी बारी थी आयुष को रंग लगाने की इसलिए मैंने थोड़ा सा गुलाल ले कर आयुष के मस्तक पर लगा दिया जिससे आयुष ख़ुशी से चहकने लगा|

अब आयुष का अगला निशाना थी संगीता और संगीता को अपना पूरा चेहरा गुलाल से नहीं पुतवाना था इसलिए उसने आयुष को पहले ही चेता दिया; "खबरदार जो तूने मेरा चेहरा गुलाल से पोता तो, मारूँगी तुझे खींच कर!" संगीता की प्यारभरी धमकी सुन आयुष हँसने लगा और उसने थोड़ा सा ही गुलाल अपनी मम्मी को लगाया तथा अपनी मम्मी का आशीर्वाद लिया| अब संगीता को सूझी मस्ती और उसने मुट्ठी भर गुलाल से आयुष का पूरा चेहरा पोत दिया! संगीता का ये बचपना देख सभी ने एक जोरदार ठहाका लगाया|

हम सभी को रंग लंग चूका था इसलिए अब बच्चे होली खेलने के लिए नहीं रुकने वाले थे| उन्होंने अपनी दादी जी का हाथ पकड़ा और उन्हें खींच कर छत पर ले जाने लगे| मुझे लगा था की संगीता भी ऊपर छत पर चलेगी मगर वो तो रसोई की तरफ घूम गई| मैंने एकदम से संगीता का हाथ पकड़ा तथा उसे अपने सीने से लगाते हुए बोला;

मैं: अरे कहाँ जात हो? तनिक हमरे संगे होरी (होली) खेल लिहो!

मैंने देहाती में बात की ताकि संगीता हँस पड़े और हुआ भी वही, संगीता मेरी देहाती सुन कर हँस पड़ी!

संगीता: का बात है, आज तो हमरे संगे देहाती बोलत हो?

संगीता होली खेलने से बचना चाह रही थी इसलिए वो मेरी कही बात का रुख जानबूझ कर बदल रही थी|

मैं: तुम कहो तो रोजे (रोज़) तोहसे देहाती मा बात करि!

मैंने संगीता को अपनी बाहों में कसते हुए कहा| दरअसल मेरे भीतर रोमांस का कीड़ा कुलबुला रहा था, जबकि संगीता का मकसद मुझे तड़पाने का था इसीलिए वो यूँ बातें घुमा रही थी!

संगीता: तो फिर ई पक्का भवा, आज से हमरे संगे देहाती मा ही बात किहो!

संगीता अपनी नाक मेरे सीने में रगड़ते हुए बोली| हम दोनों मियाँ-बीवी इसी तरह गले मिले हुए खड़े थे, उस वक़्त न तो संगीता को रसोई में जाने की इच्छा थी और न ही मुझे संगीता के साथ होली खेलना याद था| हमारे लिए तो समा जैसे ठहर गया था और हमें किसी की चिंता नहीं थी!

लेकिन, तभी मेरी बिटिया नेहा मुझे छत पर बुलाने के लिए नीचे आ गई| अपने पापा-मम्मी को सब कुछ भुला कर गले लगे हुए देख नेहा को समझ नहीं आया की वो क्या करे की हमारा ध्यान एक दूसरे पर से भंग हो! जब नेहा को कुछ नहीं सूझा तो वो आ कर हम दोनों से लिपट गई और तब जा कर हम दोनों पति-पत्नी की तंद्रा टूटी! नेहा के एकदम से हमारे कमर में हाथ रख लिपटने से संगीता शर्म से पानी-पानी हो गई थी इसलिए वो मेरे सीने में खुद को छुपाने लगी| इधर मुझे अपनी पत्नी को शर्माने से बचना था इसलिए मैंने नेहा से बात शुरू की;

मैं: क्या हुआ बेटा, आप तो ऊपर होली खेलने गए थे?!

नेहा: पापा जी, आप भी चलो न, आपके बिना हम होली कैसे खेलेंगे?

नेहा की बात सुन मैंने संगीता को उल्हना देते हुए कहा;

मैं: बेटा मैं चल तो लेता मगर जो आपकी मम्मी है न, वो होली खेलने नहीं चल रहीं!

मेरी बात सुन संगीता मेरे सीने से दूर हुई और बनावटी गुस्से से बोली;

संगीता: मैं न जाती होली खेलने!

संगीता सर न में हिलाते हुए बोली और फिर नेहा से मेरी शिकायत करते हुए बोली;

संगीता: तू नहीं जानती नेहा, तेरे पापा जी कितने बड़े शरारती हैं! तेरे पैदा होने से पहले इन्होने गाँव में मेरे ऊपर लोटा भर कर रंग डाल दिया था!

संगीता ने कई साल पुरानी बात नेहा को बताई जब मैं बालपन में था| संगीता ने वो प्यारी-प्यारी याद दिमाग में ताज़ा कर दी थी, वहीं नेहा को मेरी इस शरारत के बारे में जानना था;

नेहा: क्या हुआ था मम्मी, बताओ न?

नेहा ने जिद्द पकड़ते हुए कहा|

संगीता: तेरे पापा जी तब छोटे थे तब एक बार वो गाँव आये हुए थे| दोपहर का समय था और मैं तेरी दादी जी को पाँव रंग लगा रही थी, तब तेरे पापा जी पीछे से आ गए और मुझसे पूछने लगे की ये रंग क्या है? तब तेरी दादी जी ने उन्हें बताया की गाँव-देहात में औरतें ये रंग घोल कर अपने पाँव की एड़ी से ले कर नाखूनों तक रंग लगाती हैं| उस वक़्त पता नहीं तेरे पापा जी को क्या मस्ती सूझी की उन्होंने चुपचाप रंग की पुड़िया उठाई और नल (हैंडपंप) के पास दौड़ गए| वहाँ से उन्होंने एक लोटा उठाया और उसमें पानी भरकर रंग की पूड़िया घोल दी| फिर दबे पाँव मेरे पीछे से आये और मेरे सर पर सारा रंग भरा लोटा उड़ेल दिया! पता है मेरे सारे कपड़े खराब कर दिए थे तेरे पापा ने!

संगीता ने बड़ी अदा के साथ मेरी शिकायत मेरी ही बेटी से की| उधर मेरे बचपन की मस्ती के बारे में सुन नेहा को खूब हँसी आई और वो हँसते हुए ही मुझसे लिपट गई|

संगीता ने अनजाने में जो नेहा के सामने मेरी पोल-पट्टी खोल दी थी उससे मुझे संगीता को छेड़ने का मौका मिल गया था और अब मैं इस मौका का भरपूर मज़ा लेने वाला था|

मैं: अच्छा तो एहि खतिर तू हमरे संगे होरी नहीं खेलत हो?!

मेरे मुँह से देहाती जहाँ संगीता को प्यारी लग रही थी वहीं नेहा को बहुत हँसी आ रही थी|

मैं: अब देखो, हम का करित है! न तोहका रंग के लालम-लाल कर दिहिन तो कहेऊ!

मैंने ताव दिखाते हुए कहा| संगीता जानती थी की जब मुझे ताव आता है तो मैं किसी की नहीं सुनता और फिर वही होता है जो मेरा मन कहता है इसलिए संगीता थोड़ी सी घबराई हुई थी की आज मैं उसे कितना रंग लगाऊँगा!

इधर मेरा छत पर इंतज़ार कर आयुष थक गया था इसलिए वो मुझे खुद बुलाने के लिए नीचे आया| आयुष की नाक पर होली खेलने में हुआ रही देरी के कारन छोटा सा, प्यारा सा गुस्सा बैठा था| उसने जब हम तीनों को आपस में बातें कर समय गँवाते देखा तो वो नाराज़ हो गया, आयुष ने गुस्से से मेरा हाथ पकड़ा और मुझे छत पर खींचने लगा| आयुष के नीचे आने से मुझे संगीता को फँसाने का मौका मिल गया था;

मैं: बेटा एक बात बताओ, आप तो मेरे साथ होली खेल लोगे मगर मैं किसके साथ होली खेलूँ? मैं कब से आपकी मम्मी से कह रहा हूँ की चलो मेरे साथ होली खेलो मगर ये (संगीता) हैं की टस से मस नहीं होतीं!

जिस तरह संगीता ने नेहा से मेरी शिकायत की थी वैसे ही मैंने आयुष से संगीता की शिकायत कर दी| इधर मेरी बात सुन आयुष ने मेरा हाथ छोड़ अपनी मम्मी का हाथ पकड़ा और संगीता को छत की ओर खींच कर ले जाने लगा| आयुष के बालपन और जिद्द पर मोहित हो कर संगीता छत पर जाने के लिए मान गई मगर उसने आयुष को अपना अंग रक्षक बनाने की सोची;

संगीता: मैं एक शर्त पर छत पर चलूँगी, अगर तू मेरी रक्षा अपने पापा जी से करेगा तो! अगर तूने अपने पापा जी को मुझे रंग नहीं लगाने दिया तो आज रात मैं तुझे पिज़्ज़ा खिलाऊँगी!

संगीता ने आयुष को पिज़्ज़ा का लालच दिया तो आयुष ने अपनी कमर कस ली और बड़े गर्व से बोला;

आयुष: ठीक है मम्मी, मैं आपकी रक्षा करूँगा!

आयुष छोटा सा बच्चा था और जिस जोश से वो ये जिम्मेदारी उठा रहा था उससे मुझे उस पर गर्व तथा हँसी दोनों आ रही थी| गर्व इस बात पर की वो अपनी जिम्मेदारी उठाने को झट से तैयार हो जाता था और हँसी इस बात पर की वो अपने पापा के हाथों से अपनी मम्मी को रंग लगते हुए बचाने में असमर्थ साबित होने वाला था!

हम छत पर आ गए और आयुष ने झट से अपनी दादी जी को संगीता द्वारा आयुष को दी गई अपनी रक्षा की शर्त बताई| आयुष की बात सुन माँ को हँसी आ गई और वो आयुष की पीठ थपथपाते हुए उसे होंसला देने लगीं| आयुष जानता था की वो अकेला मुझे अपनी मम्मी को रंग लगाने से नहीं रोक पायेगा इसलिए उसने नेहा को अपनी तरफ मिलाना चाहा;

आयुष: दीदी, आप भी मेरी मदद करोगे न?

आयुष ने बड़ी भोली सी सूरत बनाते हुए नेहा से पुछा ताकि आयुष का भोली सूरत देख नेहा उसे मना न कर पाए मगर नेहा ने पहले ही किसका पक्ष लेना है ये सोच लिया था;

नेहा: मैं नहीं करती तेरी मदद, तू मम्मी की तरफ है तो मैं पापा जी की तरफ!

नेहा ने दो टुक बात कह आयुष को चुप करा दिया था| कहीं दोनों बच्चे लड़ न पड़ें इसलिए मैंने बात का रुख हमारे होली खेलने की तरफ मोड़ दिया;

मैं: अच्छा बेटा, कौन किसकी तरफ है ये बाद में सोचेंगे अभी होली खेलते हैं|

बच्चे तो मेरी बात में आ गए मगर संगीता जानती थी की मैं सबको होली खेलने में व्यस्त कर मौके का फायदा उठा कर संगीता को रंग दूँगा इसीलिए वो सतर्क थी!

खैर, मैंने बच्चों की पिचकारियों में होली का रंग घोल दिया था और दोनों बच्चों ने अपनी-अपनी टीम बनाते हुए आमने-सामने खड़े हो कर होली की जंग की तैयारी कर ली थी| मुझे बस बच्चों को "shoot" का आदेश देना था और बच्चों ने एक दूसरे पर पिचकारी चला देनी थी| तभी मैंने बच्चों को होली खेलने का असली तरीका बताया;

मैं: बेटा, एक-दसूरे को नहीं नीचे गली में जाने वालों को रंगो!

ये कहते हुए मैंने बच्चों को नीचे गली में आने-जाने वालों को दिखाया| शुरू-शुरू में बच्चों को किसी दूसरे पर पिचकारी चलाने में डर लग रहा था इसलिए वो झिझक रहे थे, बच्चों को प्रोत्साहन देने के लिए मैंने नेहा से पिचकारी ले कर गली में जाने वाले एक अंकल जी पर पिचकारी चलाई| जैसे ही अंकल जी पर रंग पड़ा वो ऊपर मुँह कर के देखने लगे, जैसे ही उन्होंने मुझे देखा मैंने ऊपर से हाथ हिलाते हुए उन्हें "होली मुबारक अंकल जी" कहा जिसके जवाब में अंकल जी ने भी "होली मुबारक बेटा" कहा| बच्चों को प्रोत्साहन मिला तो उन्होंने छत पर से नीचे गली में आने-जाने वालों पर रंग बरसाना शुरू कर दिया| कुछ लोग भीगते कुछ बच कर निकल जाते, परन्तु हर व्यक्ति ऊपर की ओर बच्चों को देखता और मुस्कुराते हुए चला जाता|

बच्चे अपने खेल में व्यस्त थे तो मैंने एक बाल्टी में गुबारों में नल द्वारा पानी भरना शुरू कर दिया| जब आयुष ने मुझे गुब्बारों में पानी भरते देखा तो वो उत्सुक हो कर मेरे पास खड़ा हो गया| दरअसल हमारे गाँव में होली बड़े ही सादे ढंग से मनाई जाती थी! औरतें घर के भीतर ही एक दूसरे को थोड़ा-बहुत रंग लगा कर खाना बनाने में लग जातीं और मर्द भांग खा कर थोड़ी हुड़दंग मचा कर अपनी होली मनाते थे| रह गए बच्चे तो उनकी होली बस एक दूसरे पर रंगों वाला पानी फेंकने से मन जाती थी! न आदमी औरतों को रंग लगाते और न ही औरतें आदमियों को रंग लगाते थे! गुब्बारों, पिचकारियों से होली खेलने की तो बात ही भूल जाओ, क्योंकि ये तकनीक अभी तक गाँव में पहुँची ही नहीं थी!

6-7 गुब्बारों में पानी भर मैंने बच्चों को नीचे गली में आने जाने वालों पर गुब्बारा मारना सिखाया| बच्चों का निशाना कच्चा था इसलिए वो गली में आने-जाने वालों को गुब्बारा नहीं मार पा रहे थे| निशानची मैं भी नहीं था मगर अपने बच्चों की ख़ुशी के लिए मैंने गुब्बारे फेंकने का प्रभार सँभाला| कुछ लड़कों का एक झुण्ड गली से गुज़र रहा था तो मैंने फटाफट 2-3 गुब्बारे फेंके जो की 2 लड़कों को जा लगे! बच्चे मेरा ये निशाना देख बड़े खुश हुए और ख़ुशी से उछलने लगे! आयुष और नेहा ने छत पर लगे नल से एक-एक कर गुब्बारे भर कर मुझे ला कर देने शुरू किये और मैंने फटाफट नीचे गली की तरफ फेंकने शुरू कर दिए| जब-जब गुब्बारा किसी को लगता तो बच्चे ख़ुशी से कहकहा लगाने लगते मगर जब निशाना चूकता तो बच्चे मेरा उत्साह बढ़ाने के लिए निशाना कहाँ लगाना है ये सिखाने लगते|

बहरहाल, हमारा ये खेल ज्यादा देर तक नहीं चल पाया क्योंकि गली में आने-जाने वाले कम हो गए थे| अब बच्चों को किसी के साथ तो होली खेलनी थी इसलिए उन्होंने एक-दूसरे को ही पिचकारी मारनी शुरू कर दी| नेहा की पिचकारी में पंप को आगे-पीछे कर हवा का दबाव बनाना पड़ता था इसलिए नेहा की पिचकारी आहिस्ता चलती थी, जबकि आयुष की पिचकारी की टंकी बड़ी थी और उसमें हवा का दबाव बनाने की जर्रूरत नहीं पड़ती थी इसलिए आयुष आसानी से एक बार में ही नेहा को पिचकारी से भीगा देता था! आखिर नेहा की पिचकारी पहले खाली हुई, उसने अपनी पिचकारी रख कर सीधा गुलाल का पैकेट उठा लिया और हाथों में रंग ले कर आयुष के पीछे दौड़ी! आयुष को अपनी जान बचानी थी इसलिए वो पूरी छत में दौड़ने लगा! बच्चों का ये खेल बड़ा मनोहक था और हमें (मुझे माँ और संगीता को) ये खेल देखने में बहुत मज़ा आ रहा था!

बच्चों का खेल चल रहा था तो मैंने सबकी नज़र बचा कर गुलाल का पैकेट उठा लिया| संगीता ने मुझे गुलाल उठाते देख लिया था इसलिए वो भी मेरी नज़र बचा कर नीचे जाने को उठ खड़ी हुई| मेरी तेज़ नज़रों ने संगीता को नीचे जाते हुए पकड़ लिया था, मैंने माँ के सामने ही संगीता को रोकते हुए कहा; "अरे कहाँ जात हो?" मैंने देहाती में संगीता को छेड़ते हुए कहा| मेरी बात सुन संगीता रुक गई और माँ की शर्म कर हँसने लगी| माँ ने मेरी देहाती भासा सुनी तो वो हँसते हुए संगीता से बोलीं; "अरे बैठ जा बहु, नीचे जा कर क्या करेगी?" माँ का सवाल सुन संगीता मुस्कुराते हुए बोली; "माँ, मैं गुजिया और पकोड़े बनाने जा रही थी!" मैं जानता था की संगीता जानबूझ कर रंग लगने से बचने के लिए बहाना कर रही है इसलिए मैंने संगीता को छेड़ते हुए कहा; "गुजिया बनाने का तो बहाना है, असल में संगीता को डर है की कहीं मैं उसे रंग न लगा दूँ!" मेरी बात सुन माँ हँस पड़ीं और संगीता को अपना संरक्षण देते हुए मुझसे बोलीं; "तू जा कर बच्चों के साथ होली खेल!" माँ का आदेश था इसलिए मैंने संगीता को रंगने के अरमानो पर फिलहाल के लिए रोक लगा दी|

उधर नेहा ने आयुष को पकड़ लिया था तथा आयुष का पूरा चेहरा रंग से पोत कर लाल कर दिया था! आयुष छटपटाते हुए मेरे पास दौड़ कर आया और अपनी बहन की शिकायत करने लगा; "देखो न पापा जी, दीदी ने मेरा पूरा चेहरा रंग दिया!" आयुष की शिकायत सुन हम सभी हँस पड़े, माँ ने आगे बढ़कर नेहा का बचाव किया और बोलीं; "और जो तूने नेहा को अपनी पिचकारी मारकर भिगो दिया उसका क्या?" अपनी दादी जी की बात सुन आयुष खी-खी कर हँसने लगा| मेरे हाथों में गुलाल लगा था तो आयुष ने मुझे आँख मारते हुए इशारा किया की मैं ये रंग नेहा को पोत दूँ| हम बाप-बेटे ने टीम बनाई और आयुष ने माफ़ी माँगने के लिए नेहा को मेरे पास बुलाया| जैसे ही नेहा मेरे पास आई की आयुष ने उसे मेरी ओर धक्का दे दिया तथा मैंने झट से नेहा के चेहरे पर गुलाल लगा दिया| मुझे लगा था की मेरे इस तरह नेहा को गुलाल पोतने से नेहा नाराज़ होगी मगर मेरी बेटी तो ख़ुशी से चहक रही थी! नेहा की ये प्रतिक्रिया देख आयुष का प्लान फ्लॉप हो गया और वो हैरानी से नेहा को देखने लगा! अब आयुष को लेना था बदला इसलिए वो बाल्टी में पड़ा आखरी पानी का गुब्बारा उठा लाया और नेहा को खींच कर मारा!

अब नेहा को भी आयुष पर प्यारभरा गुस्सा आना जाहिर था इसलिए वो आयुष को गुब्बारा मारने के लिए दौड़ी, मैंने दोनों बच्चों को रोका तथा उनकी सुलाह कराई और उनका ध्यान गली में आने-जाने वालों पर गुब्बारा मारने पर केंद्रित किया| हम बाप-बेटा-बेटी ने सबसे पहले गुब्बारे भरने शुरू किये, नेहा नल की टोंटी में गुब्बारे लगा कर पानी भरती और आयुष को दे देती, आयुष वो गुब्बारा ला कर मुझे देता तथा मैं उस गुब्बारे को गाँठ लगा कर बंद कर रंग वाले पानी से भरी बाल्टी में डाल देता| ऐसे करते हुए हम तीनों ने 20 मिनट में 40 गुब्बारे भर लिए, फिर हम तीनों ने गली में आने-जाने वालों पर निशाने लगाने शुरू किये, कुछ निशाने सही लगते और कुछ छूट जाते! जब निशाना सही लगता तो हम तीनों बाप-बेटा-बेटी ख़ुशी से चिल्लाते और जब निशाना चूकता तो हम एक-दूसरे को अपने निशाने की trajectory को सही करने पर सलाह देते|

बच्चों के साथ इस खेल में मैं संगीता को रंगने के बारे में लगभग भूल ही गया था, जब मुझे अपनी बात याद आई तो मैंने संगीता को गली में आने-जाने वालों पर गुब्बारे मारने के बहाने से अपने पास बुलाया| संगीता मेरा मकसद अच्छी तरह जानती थी इसलिए वो अपने साथ माँ को भी ले आई, क्योंकि वो जानती थी की माँ के साथ होने पर मैं संगीता को रंगने की कोशिश नहीं कर सकता था! लेकिन संगीता क्या जाने की आज मेरे सर पर रोमांस का भूत किस कदर चढ़ा था?! बिना भाँग पिए ही मैं बावरा हो चूका था और मेरे दिमाग में संगीता को रंगने के खुराफ़ाती कीड़े कुलबुलाने लगे थे!

मैंने संगीता को पानी का एक गुब्बारा दिया तथा उसे नीचे मारने को कहा| संगीता ने पहली कोशिश में जो निशाना लगाया वो चूक गया था इसलिए संगीता को अब दूसरी बार कोशिश करनी थी| उसने फ़ौरन दूसरा गुब्बारा बाल्टी से निकाला और फिर से निशाना लगाया, इस बार भी निशाना चूक गया, अब बच्चों को अपनी मम्मी के कच्चे खिलाड़ी होने पर हँसने का मौका मिल गया था| संगीता को अपने ही बच्चों द्वारा अपना मज़ाक उड़ाया जाना पसंद नहीं था इसलिए उसे आ गया ताव और उसने गुस्से में तीसरी बार फिर गुब्बारा उठा कर निशाना लगाया|

अपने निशाना लगाने के ताव के आगे संगीता का ध्यान अपने खुराफ़ाती पति के ऊपर से हट गया, वो ये भूल गई की मैं कब से उसे रंग लगाने की ताख़ मैं बैठा हूँ| मैंने चुपके से गुब्बारे वाली बाल्टी उठाई जिसमें की बच्चों ने बहुत पहले रंग घोला था और सबसे पहले माँ को इशारा करते हुए संगीता से दो कदम दूर जाने को कहा ताकि कहीं माँ भी न भीग जाएँ| फिर मैं बाल्टी उठाये हुए संगीता के पीछे पहुँचा और बाल्टी उसके सर पर एक बार में ही उड़ेल दी! ठंडा-ठंडा पानी जैसे ही संगीता के सर पर पड़ा वो ठंड से काँप गई! एक ही बार में मैंने बेचारी संगीता को सर से पाँव तक भीगा दिया था!

ये दृश्य देख संगीता को छोड़ हम सब ने खूब जोर से ठहाका लगाया! संगीता की नाक पर प्यारा सा गुस्सा बैठा था जिससे वो मुझे अपनी आँखें बड़ी कर के डराने की कोशिश कर रही थी! परन्तु मुझे संगीता का ये गुस्सा देख कर हँसी आ रही थी इसलिए मैं अपना पेट पकड़ कर जोर से हँसने लगा! आयुष की ही तरह संगीता को लेना था मुझसे बदला इसलिए उसने छत पर पड़ी पौंधों को पानी डालने वाली रबर की पाइप उठाई और नल चालु कर के मुझे पानी से भिगाना शुरू कर दिया| पानी ठंडा था इसलिए मैं खुद को भीगने से बचाने की कोशिश करने लगा, तभी नेहा मेरे बचाव में आ गई और मुझे पानी से भीगने से बचाने लगी| मैंने नेहा को अपनी बाहों में भर कर छुपा लिया ताकि मैं उसे कम से कम भीगने दूँ!

उधर संगीता को हम बाप-बेटी को पाइप से पानी मार कर भिगाने में बड़ा मज़ा आ रहा था! आयुष को भी जोश आ गया और वो अपनी मम्मी के साथ मिल गया| उसने अपनी पिचकारी उठाई और हम बाप-बेटी को पिचकारी से भिगाना शुरू कर दिया| हम बाप-बेटी भी कब तक यूँ ही भीगते, मैंने खुसफुसा कर नेहा से कहा; "बेटा, अब वक़्त आ गया हम बाप-बेटी को अपनी ताक़त दिखाने का! आप आयुष को पकड़ कर रंग लगाओ और मैं आपकी मम्मी को रंग लगाता हूँ!" मैंने नेहा में जोश भरते हुए कहा| हम दोनों बाप-बेटी ने टेबल तक दौड़ लगाई जहाँ पर पानी में घोलने वाला रंग रखा था| संगीता और आयुष जानते थे तकि अब क्या होने वाला है इसलिए उन्होंने हम बाप-बेटी को और कस कर भिगाना शुरू कर दिया| इधर हम बाप-बेटी ने रंग अपने दोनों हाथों में चुपड़ लिया तथा माँ-बेटों (संगीता और आयुष) की तरफ दौड़ लगाई| आयुष ने अपनी पिचकारी जमीन पर छोड़ी और नेहा से बचने के लिए दौड़ पड़ा! वहीं बेचारी संगीता डर के मारे अपनी जगह जड़वत हो गई, उसके हाथ से पानी की पाइप छूट गई तथा उसने सर न में हिलाते हुए मुझे रोकना शुरू कर दिया| मैं अपने दोनों हाथ संगीता को दिखाते हुए बड़े धीरे-धीरे उसकी ओर बढ़ रहा था, इधर संगीता ने डर के मारे एक-एक कर कदम पीछे दिवार की ओर बढ़ाने शुरू कर दिए| "नहीं जानू...प्लीज....जानू....नहीं....सॉरी... मुझसे गलती हो गई..... सॉरी!!!" संगीता मुझसे रंग न लगाने के लिए मिन्नत कर रही थी और मुझे इस तरह संगीता को डरा हुआ देख कर बहुत हँसी आ रही थी इसलिए मैं नक़ली शैतानी हँसी हँसते हुए धीरे-धीरे संगीता की ओर बढ़ रहा था|

आखिर संगीता दिवार और मेरे बीच फँस गई, अब उसके पास मुझसे बचने का कोई रास्ता नहीं रह गया था| "कोई और दिन होता तो आज मैं तुम्हें छोड़ देता मगर आज होली है और बिना तुम्हें...अपनी पत्नी को कस कर रंग लगाए मेरी होली कैसे पूरी होगी?" मैंने संगीता की आँखों में देखते हुए कहा| मेरी बात में छुपी शर्रारत देख संगीता के चेहरे पर प्यारी सी मुस्कान आ गई| मैंने धीरे से अपने दोनों हाथों को संगीता के गोर-गोर गालों पर रगड़ना शुरू किया| इस वक़्त न तो मुझे कोई जल्दी थी और न ही संगीता को कोई जल्दी थी, हम दोनों सब कुछ भूल कर होली के रंगों का आनंद ले रहे थे! संगीता के नरम-नरम गालों पर रंग लगाते हुए मैं सब कुछ भूल गया था! नज़रें संगीता के गुलाबी होठों पर ठहरी थीं और मन कर रहा था की उन गुलाबी पंखुड़ियों का रस निचोड़ लूँ! परन्तु क्या करूँ, छत पर था और दिन दहाड़े, खुले में संगीता के लबों को निचोड़ने में असमर्थ था!

जहाँ मेरा ध्यान संगीता की गुलाबी पंखुड़ियों पर था वहीं संगीता की नजरें मेरी आँखों में झाँकते हुए मेरे मन की बातें पढ़ रहीं थीं! जो रोमांस के कीड़े मेरे भीतर कुलबुला रहे थे अब वही कीड़े संगीता के भीतर भी कुलबुलाने लगे थे! प्रेम की प्यास संगीता को भी थी और उसके लब अब थरथराने लगे थे, उसके दोनों हाथ मेरे हाथों पर आ गए थे| संगीता अपने हाथों का दबाव मेरे हाथों पर बढाए जा रही थी, जिससे की मेरे हाथों का दबाव संगीता के गालों पर बढ़ता जा रहा था! माहौल अचानक ही गर्मागर्म हो गया था और हम दोनों मियाँ-बीवी दुनियादारी भुला बैठे थे, हम किसी भी समय समाज की सीमा को लांघते हुए अपने होठों को मिलाने जा रहे थे की तभी दोनों बच्चों की ख़ुशी से भरी चीख गूँज उठी जिस कारण हमारा ये मिलन अधूरा रह गया!

नेहा ने आयुष को रगड़-रगड़ कर रंग डाला था और बेचारा आयुष खुद को छुड़ा कर अपनी दादी जी से लिपट कर हँसे जा रहा था! बच्चों का मोहपाश मुझे उनकी ओर खींच रहा था, मैं उस ओर बहता उससे पहले ही संगीता ने मेरा हाथ पकड़ लिया और खुसफुसाते हुए मुझे हुक्म देते हुए बोली; "इन दोनों शैतानों को यहीं मस्ती करने दो और चलो मेरे साथ नीचे!" मैं जानता था की नीचे चलने से संगीता का क्या तातपर्य है इसलिए मैं नीचे जाने वाला नहीं था! मैंने जा कर दोनों बच्चों को अपने गले लगा लिया और उन्हें लाड करने लगा| संगीता ने जब मुझे उसकी आज्ञा की अवहेलना करते देखा तो उसने मुझे अपने साथ बहाने से चलने को कहा; "बहुत होली खेल लिए बच्चों के साथ, अब चलो मेरे साथ और कुछ खाने को बनाने में मेरी मदद करो!" संगीता ने प्यार से मुझे माँ के सामने हुक्म देते हुए कहा| अब माँ के सामने संगीता ने ये बात कही थी तो मैं मना कैसे करता इसलिए मजबूरन मुझे संगीता के साथ नीचे जाना पड़ा| मैं सबसे पहले नीचे जाने को मुड़ा की तभी संगीता बच्चों को प्यार से हुक्म देते हुए बोली; "और तुम दोनों शैतानों, अपनी होली खेलो तथा जब खाना बनेगा तो मैं ले आऊँगी! और खबरदार जो माँ को तंग किया तो, मारूँगी जोर से!" संगीता ने दोनों बच्चों को प्यार से हड़काते हुए कहा|

नीचे आते ही संगीता मुझ पर आये अपने प्यार भरे गुस्से को ले कर चढ़ बैठी; "एक बार में कही हुई बात आपको समझ नहीं आती न?" मुझे संगीता के इस प्यारभरे गुस्से को देख हँसी आ रही थी तथा मुझे हँसता हुआ देख संगीता का प्यार भरा गुस्सा बढ़ता जा रहा था; "आपने मुझे रंग लगा कर अपने मन की कर ली न?! अब मुझे मेरे मन की करनी है! चुपचाप जो मैं कह रही हूँ वो करो वरना कहे देती हूँ मैं आपसे बिलकुल बात नहीं करुँगी! कलेश खड़ा कर दूँगी...कलेश!" संगीता मुझे हड़काते हुए बोली|

मैं जानता था की संगीता का मन इस वक़्त प्रेम करने का है मगर मेरे मन में संगीता के चौथे महीने के समय प्रेम-प्रसंग शुरू न करने का डर बैठा था|

मैं: जान, प्लीज समझा करो! तुम्हारा चौथा महीना चल रहा है और इस समय हम 'प्यार' नहीं कर सकते!

मैंने संगीता को समझाते हुए कहा| मेरे चेहरे पर संगीता को 'न' दिख गई थी मगर वो आज मेरी एक नहीं सुनने वाली थी!

संगीता: मुझे और हमारे होने वाले बच्चे को कुछ नहीं होगा, मैंने डॉक्टर सरिता से पूछ लिया है!

संगीता अपने प्यारभरे गुस्से में बोली| इधर उसकी ये बात सुन मैं भौंचक्का रह गया और आँखें फाड़े संगीता को देखने लगा की उसने कैसे इतनी हिम्मत कर के डॉक्टर सरिता से ये बात पूछ ली?!

संगीता: और क्या करती, आप हो की जब भी मैं आपको प्यार करने को कहती हूँ तो आप मेरे चौथे महीना का नाम ले कर मुझे मना कर देते हो, इसलिए मैंने ही बेशर्म बनते हुए डॉक्टर सरिता से पूछ लिया!

संगीता मेरे मन में उठे सवाल का बिना मेरे पूछे ही जवाब देते हुए बोली| अब मेरे पास संगीता को मना कर पाने का कोई और चारा नहीं था, मुझे ढीला पड़ता देख संगीता मुझे आदेश देते हुए बोली;

संगीता: चुप-चाप बाथरूम में चलो और गीजर चालु करो!

संगीता का यूँ मुझे आदेश देना मुझे बहुत अच्छा लग रहा था इसलिए मैं बिना कुछ कहे मुस्कुराता हुआ बाथरूम में घुसा और गीजर चालु कर दिया| पीछे से संगीता हम दोनों के कपड़े तथा तौलिये ले कर बाथरूम के भीतर आई और मुझे दिखाते हुए बड़ी मादकता से दरवाजा बंद कर चिटकनी लगाई!

संगीता की ये अदा देख कर मैं जान गया था की आज तो मेरा कत्ल होने वाला है! बाथरूम छोटा था मगर दो लोगों के प्रेम करने के लिए उसमें पर्याप्त स्थान था! संगीता ने सबसे पहले मेरी टी-शर्ट निकाली और फिर मेरी बनियान निकाली! मेरी गर्दन पर हाथ फेरते हुए संगीता की आँखें नशीली हो चली थीं! धीरे-धीरे मेरी छाती पर से संगीता का हाथ फिसलते हुए निचे की ओर आ पहुँचा तथा अगले ही पल मेरा पजामा ओर कच्छा ज़मीन पर गिर पड़ा!

मैं तो निर्वस्त्र हो चूका था, अब बारी थी संगीता की, एक-एक कर मैंने भी संगीता के वस्त्र निकाल फेंके| मैंने जो संगीता के बदन पर रंग भरी बाल्टी उड़ेली थी उस रंग ने संगीता के गोर जिस्म पर अपनी छाप छोड़ी थी! गोरे बदन पर गुलाबी रंग की धारा देख कर मेरा दिल कुलाचें मारने लगा था! मैंने संगीता को पीछे से अपनी बाहों में भर लिया तथा अपने दोनों हाथों को आगे की ओर उसके सीने ओर पहाड़ों की चोटियों पर फिराने लगा| "सससस....SSSSSS!!!" संगीता सीसियाई क्योंकि आज कई दिनों बाद मैंने इस कदर संगीता को स्पर्श किया था| "जानू.....जल्दी करो....सारा दिन नहीं है हमारे पास!" संगीता मीठी से शिकायत करते हुए बोली| अब देखा जाए तो उसकी बात सही भी थी मगर मैं भी क्या करूँ, मुझे कछुए की रफ़्तार से शुरुआत करना ही पसंद था!

खैर, जल्द ही प्रेम का अगला चरण शुरू हुआ और अभी हम मझधार में ही पहुँचे थे की आयुष नीचे मुझे ढूँढ़ते हुए आ गया| बाहर की ओर से बाथरूम के दरवाजे पर खटखटाते हुए आयुष बोला; "मम्मी जी, पापा जी कहाँ हैं?" आयुष भोलेपन में मेरे बारे में पूछने लगा| इधर बाथरूम के भीतर, आयुष की आवाज से हमारे प्रेम समागम में खलल पड़ गया था जिससे की संगीता चिढ गई थी! "वो बाथरूम में हैं!" संगीता अपने गुस्से में बोली| उसे होश नहीं था की उसके इस जवाब से छोटे से बच्चे के मन में सवाल पैदा हो जायेगा की भला मैं ओर संगीता एक साथ बाथरूम में क्या कर रहे हैं? जब संगीता को इस बात का होश आया तो वो अपनी बात सँभालते हुए बोली; "तेरे पापा जी बाहर गए हैं, अभी आते होंगें! तू जा कर नेहा के साथ होली खेल ओर अपनी दादी जी को तंग मत करना वरना मारूँगी तुझे दो! मैं आधे घंटे में कुछ खाने को बना कर ला रही हूँ!" संगीता की डाँट सुन बेचारा आयुष डर के मारे चुपचाप ऊपर छत पर भाग गया|

आयुष तो छत पर भाग गया मगर इधर संगीता का मुँह टेढ़ा हो गया था! "ये दोनों शैतान दो मिनट चैन से बात भी नहीं करने देते!" संगीता मुझसे बच्चों की शिकायत करते हुए बोली| मुझे संगीता का मूड खराब होने से बचाना था इसलिए मैंने उसके लबों को चूमते हुए उसका मूड दुरुस्त करते हुए कहा; "छोडो बच्चों को जान!" इतना कह मैंने संगीता का ध्यान वापस हमारे प्रेम-प्रसंग की ओर मोड़ दिया| मुझे संगीता को पूर्ण संतुष्टि प्रदान करनी थी वरना आज संगीता बच्चों पर किसी न किसी बात पर बरसती रहती|

अगले 15 मिनट में हमारा समागम पूर्ण हुआ और इस समागम के पूर्ण होने पर संगीता के चेहरे पर संतुष्टि पूर्ण मुस्कान फैली थी! संगीता के चेहरे पर मुस्कान फैली थी और उसकी ख़ुशी ऐसी थी की आज मैं उससे जो माँगू वो मुझे दे दे! "अब जल्दी से नहा लेते हैं वरना माँ क्या कहेंगी?!" संगीता लजाते हुए बोली| संगीता को लजाते देख मुझे उस पर और भी प्यार आ रहा था इसलिए मैंने संगीता को अपनी बाहों में भरते हुए कहा; "देखो तो मेरी लाजवंती पत्नी को, कैसे लाज से दोहरी हो रही है!" मेरी बातें सुन संगीता शर्म से लालम-लाल हो गई तथा मुझसे कस कर लिपट गई! "वैसे जानू...एक बात कहूँ?! इस तरह छुपते-छुपाते प्रेम करने में मज़ा बहुत आता है, ऐसा क्यों?" संगीता का सवाल सुन मैं निरुत्तर हो गया था इसलिए बस मुस्कुरा कर रह गया| वैसे संगीता का सवाल था बड़ा दिलचस्प और आज जा कर मुझे इस सवाल का जवाब मालूम हुआ! संगीता और मेरे रिश्ते की शुरुआत दुनिया की नज़रों से छुपते-छुपाते हुए हुई थी| हमारा वो दुनिया से छुपते हुए रात को मिलना, लोगों की आँखों में धुल झोंकते हुए प्यार करना हमारे भीतर रोमांच पैदा करता था और यही रोमांच हमारे दिलों की धड़कने बढ़ा देता था! अपने इसी रोमांच में बहते हुए हमें हमारा प्रेम-प्रसंग आगे बढ़ाने में आनंद आता था|

खैर, बाथरूम में हमारा प्रेम-प्रसंग पूरा हो चका था और अब समय था नहाने का| "जानू, आप पहले नहा लीजिये" ये कहते हुए संगीता ने नल चालु किया और मुझे नहलाने लगी| संगीता को मुझ पर कुछ अधिक ही प्यार आ रहा था और मुझे उसके इस प्यार को देखते हुए मुस्कुराये जा रहा था| "लाओ मैं आपकी पीठ पर साबुन मल देती हूँ!" ये कहते हुए संगीता ने मुझे अपनी ओर पीठ कर के खड़ा होने को कहा| जैसे ही मैं मुड़ा की संगीता ने चलाकी दिखाते हुए छुपा कर रखा हुआ रंग अपने हाथों में लगाया और मेरे पीछे से अपने हाथ मेरे चेहरे पर लाते हुए मेरा सारा चेहरा रंग से पोत दिया! संगीता की इस हरकत पर मुझे हँसी आ गई और मैं हँसते हुए संगीता से बोला; "यार, तुम्हारी होली खत्म नहीं हुई?" मेरे पूछे इस सवाल के जवाब में संगीता देहाती भाषा में लजाते हुए बोली; "आपके संगे रंग खेरे (खेले) बिना हमार फगवा कहाँ पूर होत?!" संगीता ने ठीक वैसे ही जवाब दिया जैसे मैंने छत पर उसे जवाब दिया था| वहीं संगीता की इस लाज को देख मेरा दिल में प्रेम अगन तेज़ी से धधकने लगी थी!

तभी संगीता की नज़र मेरे जख्म पर हुई पट्टी पर पड़ी, होली खेलने से वो पट्टी गीली हो गई थी इसलिए संगीता ने पट्टी खोली और मेरे जख्म को देखा| मेरा जख्म पहले से काफी भर गया था, पट्टी निकाल संगीता ने मेरे जख्म पर अपने गुलांबी होंठ रख दिए| मेरे जख्म को चूम संगीता मेरी आँखों में देखते हुए बोली; "अब मैंने इसे (मेरे जख्म को) kissi दे दी है तो ये जल्द ही पूरी तरह भर जाएगा!" संगीता को अपनी इस kissi पर कुछ अधिक ही गर्व था, उसने नेहा की अभी तक की हुई सारी मेहनत को दरकिनार कर दिया था! मुझे संगीता के इस बालपन पर प्यार आ रहा था इसलिए मैंने कोई जवाब नहीं दिया बल्कि संगीता के होठों को चूम लिया!

नहा कर मैं सबसे पहले बाहर निकला और फटाफट बेसन घोल कर सब्जियाँ काटीं, संगीता के नहा कर तैयार हो कर आते-आते मैंने पकोड़े बना कर तैयार कर दिए थे| पकोड़े तैयार देख संगीता हैरान हुई और मेरी टाँग खींचते हुए बोली; "चटनी क्यों नहीं पीसी?" संगीता का लहजा बिलकुल वैसा था जैसे कोई सास अपनी बहुरानी को हुक्म देती है! संगीता की इस अदा पर मुझे हँसी आ गई और मैं सिलबट्टा उठा कर चटनी पीसने वाला था की संगीता ने मुझे रोक दिया और मुस्कुराकर बोली; "आप चलो ये पकोड़े ऊपर ले कर, मैं चटनी और चाय बनाकर लाती हूँ|"

पकोड़ों से भरी दो पलटें और सॉस ले कर मैं छत पर पहुँचा, मुझे देखते ही आयुष मुझे फिर से रंगने दौड़ कर आया; "बेटा अब मुझे मत रंगना, मैं अभी नहा कर आया हूँ!" मेरी बात सुन आयुष खी-खी कर हँसने लगा| तभी उसकी नज़र पकोड़ों पर पड़ी और उसने ख़ुशी से कूदना शुरू कर दिया| मैंने पकोड़ों की प्लेट रखी तो माँ पूछने लगीं की मैं बाहर कहाँ गया था, अब अपनी पत्नी के झूठ की लाज रखने के लिए मैंने कह दिया की: "वो मैं कुछ खाने के लिए देखने पास की दुकानों तक गया था मगर वहाँ कुछ मिला नहीं तो वापस आ गया!" माँ ने मेरी बात पर ज्यादा गौर नहीं किया और पकोड़े खाने लगीं| दोनों बच्चों ने अपने हाथ धोये नहीं थे इसलिए मैं ही उन्हें अपने हाथ से पकोड़े खिलाने लगा| बच्चे मेरे हाथ से एक-एक कौर पकोड़े के खाते और फिर छत से नीचे किस को गुब्बारे मारने चले जाते!

दस् मिनट बाद संगीता चटनी और चाय बना कर ऊपर ले आई जिससे पकोड़ों का मज़ा दुगना हो गया| अपनी मम्मी को देख आयुष का मन फिर से अपनी मम्मी को रंग लगाने का किया, आयुष की मस्ती देख संगीता उसे चेताते हुए बोली; "खबरदार जो मुझे फिर से रंग लगाया तो, मारूँगी तुझे खींच के!" आयुष को अपनी मम्मी का डर पता चला तो उसने अपनी मम्मी को रंग लगाने का डर दिखा कर डराना शुरू कर दिया| आयुष अपने दोनों हाथ उठा कर संगीता के नज़दीक आता और रंग लगाने का डर दिखा कर दूर भाग जाता| आयुष के इस खेल को देख माँ को मेरे बचपने की एक बात याद आ गई और उन्होंने बच्चों के सामने वो याद दुहरा दी; "आयुष, जब तेरा पापा (मैं) छोटा था न तब वो भी तेरी तरह शरारती था| गाँव में जब तेरी मम्मी रसोई में खाना बना रही होती तब तेरा पापा चप्पल पहन कर बार-बार उसे छू लेने का डर दिखा के डराता| तेरी मम्मी बहुत कहती की मुझे अगर चप्पल पहन कर छु लिया तो सारा खाना खराब हो जायेगा, लेकिन तेरे पापा को तेरी मम्मी को डराने में बहुत मज़ा आता था|" माँ ने मेरी बचपन की शरारत की बात बच्चों को बताई तो उन्हें खूब हँसी आई, वो तो बच्चों के कपड़े रंगे हुए थे और मैं नहाया हुआ था इसीलिए वो मेरे गले नहीं लगे थे वरना अब तक तो वो मुझसे लिपट गए होते!

पकोड़े खाने के बाद संगीता नीचे जाने लगी तो माँ ने उसे टोकते हुए कहा; "बैठ बहु, नीचे कहाँ जा रही है?!"

"गुजिया बनाने माँ" संगीता मेरी ओर देखते हुए मुस्कुरा कर बोली| संगीता की बात सुन माँ को लगा की जर्रूर मैंने ही गुजिया खाने की फरमाइश की होगी इसलिए माँ मुझे टोकते हुए बोलीं; "तुझे पता भी है गुजिया बनाने में कितना समय लगता है? जब देखो बहु से खाने की फरमाइशें करता रहता है!" माँ ने मुझे प्यार से डाँटते हुए कहा| माँ की बात सुन संगीता मेरा बचाव करते हुए बोली; "नहीं माँ, इन्होने मुझे गुजिया बनाने के लिए नहीं कहा था| मैंने कल रात ही गुजिया बनाने की आधी तैयारी कर ली थी|" संगीता का जवाब सुन माँ को लगा की संगीता मेरा बचाव कर रही है इसलिए माँ मुस्कुराने लगीं तथा उन्होंने बात को आगे नहीं खींचा|

गुजिया बन रही थीं तो मैंने दोनों बच्चों को नहाने के लिए बोला, नेहा बड़ी थी इसलिए वो तो माँ के कमरे वाले बाथरूम में घुस कर अच्छे से रगड़-रगड़ कर नहाई मगर फिर भी उसके मुँह पर थोड़ा-बहुत रंग लगा था| वहीं आयुष को मुझे ही नहलाना पड़ा, इतना रगड़ कर नहाने के बाद भी आयुष का आधा चेहरा रंगा हुआ था ओर ये दृश्य देख कर हम बाप-बेटे को बहुत हँसी आ रही थी| हँसते हुए हम बाप-बेटे बाथरूम से बाहर आये तो संगीता उत्सुक हो कर हमारे पास आई, जब उसने आयुष का आधा रंगा हुआ चेहरा देखा तो वो भी हमारे साथ हँसने लगी|

गुजिया बन चुकी थी और हम बाप-बेटों के मुँह में गुजिया देख कर पानी आ रहा था| "बेटा, गुजिया की तासीर गर्म होती है ज्यादा खाओगे तो पेट दुखेगा!" माँ ने हम बाप-बेटों को चेतावनी दी| माँ की बातों का मान रखते हुए हम बाप-बेटों ने गुजिया सबसे ज्यादा खाई मगर हद्द से ज्यादा नहीं खाईं|

शाम हुई तो गाँव से भाईसाहब का फ़ोन आया, मैंने उन्हें आज की सारी दिनचर्या बताई| मुझे लगा की शायद उन्हें हमारा होली मनाना बुरा लगेगा मगर भाईसाहब तो खुश हुए की मैंने बच्चों का मन मारने के बजाए उनकी ख़ुशी को तवज्जो दी! फिर भाईसाहब ने दोनों बच्चों से बात की, दोनों बच्चों का मन खुशियों से इतना भरा हुआ था की उनकी बातें खत्म ही नहीं हो रही थीं| आधे घंटे तक दोनों बच्चों ने अपनी आज की मस्ती की कहानी पहले भाईसाहब को सुनाई और फिर अपनी नानी जी को! सासु माँ से बात करने का मौका मुझे सबसे अंत में मिला और उन्होंने भी मुझे बच्चों को खुशियाँ देने के लिए मेरी बहुत तारीफ की|

रात होने को आई और खाना खाने के बाद भी मेरे बच्चे मेरा पीछा नहीं छोड़ रहे थे| आज जो मेरे कारण बच्चों ने इतनी शानदार होली मनाई थी उससे मेरे बच्चे ख़ुशी से फूले नहीं समा रहे थे तभी तो वो मुझसे ऐसे लिपटे हुए थे, मुझे लगा की संगीता इससे नाराज़ होगी मगर आज उसका मन संतुष्टि के कारण खुश था इसलिए उसने बच्चों को मुस्कुराते हुए मेरे साथ सोने की इजाजत सामने से दे दी; "बच्चों, आज तुम दोनों अपने पापा जी के साथ सो जाओ| लेकिन ध्यान रखना की पापा आराम से सोएं, उन्हें तंग किया न तो दोनों की खैर नहीं! बच्चों को मेरे साथ सोने की इजाजत मिली तो उनकी ख़ुशी दुगनी हो गई और वो ख़ुशी से मुझसे लिपट गए|

[color=rgb(124,]जारी रहेगा भाग - 5 में...[/color]
 

[color=rgb(251,]इकत्तीसवाँ अध्याय: घर संसार[/color]
[color=rgb(44,]भाग - 5[/color]


[color=rgb(71,]अब तक अपने पढ़ा:[/color]

रात होने को आई और खाना खाने के बाद भी मेरे बच्चे मेरा पीछा नहीं छोड़ रहे थे| आज जो मेरे कारण बच्चों ने इतनी शानदार होली मनाई थी उससे मेरे बच्चे ख़ुशी से फूले नहीं समा रहे थे तभी तो वो मुझसे ऐसे लिपटे हुए थे, मुझे लगा की संगीता इससे नाराज़ होगी मगर आज उसका मन संतुष्टि के कारण खुश था इसलिए उसने बच्चों को मुस्कुराते हुए मेरे साथ सोने की इजाजत सामने से दे दी; "बच्चों, आज तुम दोनों अपने पापा जी के साथ सो जाओ| लेकिन ध्यान रखना की पापा आराम से सोएं, उन्हें तंग किया न तो दोनों की खैर नहीं! बच्चों को मेरे साथ सोने की इजाजत मिली तो उनकी ख़ुशी दुगनी हो गई और वो ख़ुशी से मुझसे लिपट गए|

[color=rgb(97,]अब आगे:[/color]

अब
चूँकि मेरे ऊपर मेरे पूरे परिवार को सँभालने की जिम्मेदारी थी इसलिए मैं काम के प्रति कुछ ज्यादा ही संजीदा हो गया था| छोटे-मोटे ठेकों में मुनाफ़ा कम था इसलिए मुझे किसी बड़े काम की तलाश थी, ऐसा काम जिससे हजारों नहीं लाखों का फायदा हो! उन दिनों नॉएडा-गुड़गाँव में प्लॉटों की बिक्री तेज़ हुई थी, बिल्डर वहाँ प्लाट खरीद कर बहु मंजिला इमारतें बना कर मुनाफे में बेच रहे थे| मुझे ये लाभप्रद मौका लगा और मैंने इसमें हाथ डालने की सोची| थोड़ी छान-बीन कर मैंने एक प्लाट खोज निकाला तथा उसे खरीदने के लिए मैं उसके मालिक से मिलने पहुँचा| 250 गज का प्लाट यही कोई 20 लाख का था, मुख्य सड़क से थोड़ा दूर था इसलिए थोड़ा सस्ते में मिल रहा था|

उस प्लाट के मालिक से बात करते हुए मुझे पता चला की मिश्रा अंकल जी भी इस प्लाट को लेने के इच्छुक हैं, मैं चाहता तो उनसे अधिक पैसे दे कर वो प्लाट ले सकता था मगर मुझे उनके साथ ये चलाकी करनी ठीक नहीं लगी इसलिए मैंने हाथ पीछे खींच लिया| परन्तु उस प्लाट पर मेरा ही नाम लिखा था क्योंकि अगले ही दिन मुझे मिश्रा अंकल जी का फ़ोन आया तथा उन्होंने मुझे मिलने के लिए अपनी साइट पर बुलाया| दरअसल मिश्रा अंकल जी को उस प्लाट के मालिक ने मेरे बारे में बता दिया था की मैंने ये प्लाट लेने का विचार इसलिए छोड़ दिया क्योंकि इस प्लाट में मिश्रा अंकल जी की दिलचस्पी थी| मेरे इस विचार से प्रसन्न हो कर मिश्रा अंकल जी ने मुझे बुलाया था| "मुन्ना ऊ बिकास (विकास उस प्लाट का मालिक) हमका बतावत रहा की तू ओकर प्लाट खरीदा चाहत रहेओ और ई बात जानी के की हम ऊ प्लाट ख़रीदित है तू ऊ प्लाट नहीं लिहो! हमका बहुत ख़ुशी भई की तू आपन पिताजी की तरह ही ईमानदार हो एहि से ऊ प्लाट आज से तोहार भवा! तू ऊ का आपन ढंग से बनवाओ और बेच कर जउन मुनाफ़ा हुई ऊ मा से हमार लागत हमका लौटाए दिहो!" मिश्रा अंकल जी की बात सुन मैं बहुत खुश हुआ लेकिन मैं उनसे कोई एहसान नहीं लेना चाहता था, ज़मीन की खरीद के लिए उन्हें पैसे लौटाने में मुझे समय लगता और इतने समय तक उनके पैसे तथा ब्याज का नुक्सान होता| मैंने अंकल जी से विनती कर उन्हें पैसों के साथ मुनाफे का 20% लेने के लिए मना लिया| मेरी खुद्दारी देख अंकल जी बहुत प्रसन्न हुए और मुझे अपनी नॉएडा की दो नई साइट का काम भी सौंप दिया!

काम अब धीरे-धीरे बढ़ने लगा था इसलिए मेरा बच्चों को दिया जाने वाला समय अब धीरे-धीरे कम होने लगा था| नेहा मेरे व्यस्त होने का कारण समझती थी इसलिए वो मुझसे नाराज़ नहीं थी| वहीं आयुष छोटा बच्चा था और उसे मेरे अचानक से व्यस्त हो जाने से तकलीफ हो रही थी क्योंकि अब उसे मेरा प्यार पर्याप्त मात्रा में नहीं मिल रहा था, नतीजन मेरा बेटा मुझसे रूठ गया था!

एक दिन मुझे साइट से लौटते हुए रात के 10 बज गए, बच्चे और माँ खाना खा कर सो चुके थे बस संगीता मेरी राह देखते हुए जगी थी| मुझे खाना परोसते हुए संगीता ने बताया की आयुष मुझसे खफा है इसलिए आज वो रात को खाना भी नहीं खा रहा था, वो तो माँ थीं जिन्होंने आयुष को लाड-प्यार कर बहलाया तथा अपने हाथ से खाना खिलाया तब जा कर आयुष ने खाना खाया| अब मैं अपने बेटे के नाराजगी कैसे बर्दाश्त करता?! मैंने तुतंत ही सोच लिया की मुझे आयुष को कैसे मनाना है, मैंने अपना फ़ोन उठाया और संतोष को मैसेज कर दिया की मैं कल साइट पर नहीं आ पाउँगा इसलिए सारा काम उसे और सरयू को मिलकर सँभालना होगा|

खाना खा कर मैं सो गया और सुबह 5 बजे उठ कर माँ के कमरे में आ पहुँचा| माँ जाग चुकी थीं और टी.वी. पर भजन सुन रहीं थीं, मुझे जागा हुआ देख पहले तो उन्हें चिंता हुई मगर फिर उन्होंने मेरे चेहरे पर बच्चों के साथ सोने की मुस्कान देखि तो माँ ने मुझे आशीर्वाद देते हुए सोने जाने को कहा| ज्यों ही मैं बिस्तर पर लेटा वैसे ही नेहा को मेरी मौजूदगी का एहसास हो गया और वो मुझसे लिपट गई| वहीं आयुष का मुँह दूसरी तरफ था, मैंने आयुष को धीरे से अपनी बाहों के आगोश में जकड़ा और अपने सीने से चिपका लिया| कुछ समय बाद नींद में जब आयुष को मेरी मौजूदगी का एहसास हुआ तो वो मुझसे एकदम से लिपट गया, उस कुछ क्षण के लिए आयुष का सारा गुस्सा काफूर हो गया था!

7 बजे तो संगीता ने नेहा को जगाया और ब्रश करने भेजा| नेहा के जागने से मेरी भी आँख खुल गई, मैं उठा और आयुष के बालों में हाथ फेरते हुए उसके मस्तक को बार-बार चूम कर जगाने लगा| जब तक आयुष जागा नहीं तब तक मैं उसके चेहरे को देख रहा था जो की अलग ही तेज के कारण दमक रहा था| मैंने 2-4 बार आयुष के मस्तक को चूमा तो आखिर आयुष की नींद खुल ही गई| अँगड़ाई लेते हुए मेरा बेटा उठा और उसकी नज़र सबसे पहले मुझ पर पड़ी| एक क्षण के लिए आयुष के चेहरे पर मुझे देखते ही मुस्कान आ गई लेकिन फिर अगले ही पल उसके चेहरे पर प्यारा सा गुस्सा उभर आया! आयुष अपनी भोयें सिकोड़ और अपना निचला होंठ फुलाये मुझे अपने प्यार भरे गुस्से से देखने लगा| मैं आयुष का गुस्सा होना तो समझ रहा था मगर इस गुस्से का असली कारण नहीं जानता था| "अरे दादा रे! मेरा बेटा मुझसे नाराज़ है?" मैंने आयुष के गुस्से से डरने का अभिनय करते हुए सवाल पुछा| मेरा सवाल सुन आयुष ने गुस्से से अपना सर हाँ में हिलाया| "तो मैं ऐसा क्या करूँ की मेरा बेटा फिर से हँसने लगे और मुझे सुबह की मीठी-मीठी पप्पी दे दे?!" ये कहते हुए मैंने कुछ सोचने का अभिनय किया| मुझे सोचते हुए देख आयुष सोच रहा था की मैं उसे कैसे मनाने वाला हूँ, लेकिन मेरे पास तो उपाए पहले ही तैयार था! मैंने एकदम से आयुष को गुदगुदी करनी शुरू कर दी जिससे आयुष खिलखिलाकर हँसने लगा! आयुष की ये हँसी इतनी जादुई थी की मैं मंत्र-मुग्ध हो कर खो गया था!

हम बाप-बेटे की ये प्यारी सी मस्ती जारी थी की तभी संगीता मुझे बुलाने आ गई; "अब बहुत हो गई बाप-बेटे की मस्ती! चलो जल्दी से तैयार हो जाओ, साइट नहीं जाना है?!" संगीता के पूछे इस सवाल से आयुष का हँसता-खेलता हुआ चेहरा एकदम से उदास हो गया था! जब मैंने अपने बेटे को यूँ उदास होते हुए देखा तो मुझे बहुत दुःख हुआ, अपने बेटे का मन फिर से खुश करने के लिए मैं एकदम से बोला; "आज काम की छुट्टी है, आज का दिन बस मेरे बेटे आयुष के नाम!" मैंने आयुष कीआँखों में देखते हुए कहा| मेरी बात सुन आयुष के चेहरे पर ख़ुशी लौट आई| आयुष मेरे सीने से लग गया और ख़ुशी-ख़ुशी बोला; "I love you पापा जी!" मैंने आयुष को कस कर अपने गले लगाया और उसके सर को चूमते हुए बोला; "I love you too मेरा बच्चा!"

आयुष को अपनी गोदी में ले कर मैं बैठक में आया, मुझे आयुष को लाड करता देख माँ खुश हुईं तथा हम दोनों बाप-बेटों को आशीर्वाद देते हुए बोलीं; "जुग-जुग जियो मेरे बच्चों!" नेहा ब्रश कर के लौटी और वो भी आयुष की तरह मेरी गोदी में बैठ गई, दोनों बच्चे मेरी गोदी में चढ़े हुए मुझसे लिपटे हुए थे| चूँकि आज का दिन मुझे आयुष को लाड-प्यार कर बिताना था इसलिए मैंने आयुष से उसकी फरमाइश जननी चाही; "तो बेटा जी, आप बताओ की आपको आज मेरे साथ क्या मस्ती करनी है?" मेरे पूछे सवाल के जवाब में आयुष एकदम से ख़ुशी से चहकते हुए बोला; "चाऊमीन!!!" आयुष का जवाब सुनते ही दोनों माँ-बेटी (नेहा और संगीता) ने एक साथ अपना सर पीट लिया! आयुष का जवाब और दोनों माँ-बेटी की ये प्रतिक्रिया देख हम माँ-बेटे (मैं और माँ) जोर से हँस पड़े!

"घूम फिर कर तेरी सुई हमेशा चाऊमीन पर ही आती है!" नेहा आयुष को डाँटते हुए बोली| वहीं आयुष पर अपनी दीदी की डाँट का कोई असर नहीं पड़ा, वो तो मुझसे लिपट कर अपनी दीदी को जीभ चिढ़ाने लगा| "बेटा, चाऊमीन तो हम खा लेंगे मगर आपको कहीं बाहर घूमने नहीं जाना?" मैंने आयुष का सर चूमते हुए पुछा तो आयुष मुझसे कस कर लिपट गया तथा सर न में हिलाने लगा| आयुष की इस प्रतिक्रिया का मतलब था की उसे बस मेरे साथ रहना है और मेरे साथ चाऊमीन खानी है, इसके अलावा उसे और कोई सुख नहीं चाहिए|

मैं: पिक्चर चलें?

मैंने आयुष से पुछा तो वो एकदम से ख़ुशी से भर उठा तथा अपना सर हाँ में हिलाने लगा| आयुष की स्वीकृति प्राप्त कर मैंने सभी को अपना फरमान सुनाते हुए कहा;

मैं: तो ये तय रहा की हम सब आज पिक्चर देखने जायेंगे|

परन्तु नेहा मुझे आज के प्रोग्राम के बारे में बताते हुए बोली;

नेहा: लेकिन पापा जी, आज तो छोटी दादी जी (माँ की मित्र तथा हमारे पड़ोस में रहने वालीं कमला आंटी जी) के यहाँ पूजा है इसलिए हम सब वहाँ जा रहे हैं!

मैं: बेटा, तो पूजा में आपकी दादी जी और मम्मी चले जायेंगे, हम तीनों (मैं नेहा और आयुष) पिक्चर चलते हैं|

मैंने नेहा को अपने साथ पिक्चर ले जाने का प्रस्ताव रखा|

नेहा: सॉरी पापा जी, लेकिन छोटी दादी जी ने मुझे ख़ास कर के निमंत्रण दिया है!

नेहा अपने कान पकड़ते हुए बोली| मुझे नेहा के पिक्चर जाने से मना करने का बुरा नहीं लगा था, मुझे उत्सुकता ये सोच कर हो रही थी की भला कमला आंटी जी ने आखिर नेहा को ख़ास निमंत्रण क्यों दिया है?

मैं: बेटा, सॉरी कहने की कोई बात नहीं| लेकिन ये बताओ की आपको ख़ास निमंत्रण क्यों मिला है?

मैंने मुस्कुराते हुए नेहा के सर पर हाथ फेरते हुए सवाल पुछा, परन्तु मेरे पूछे इस सवाल का जवाब मेरी माँ ने दिया;

माँ: पिछली बार जब मंदिर में पूजा थी तब मेरे दोनों पोता-पोती ने बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया था| आयुष पंडित जी के सामने बैठा घंटी बजा रहा था और नेहा पंडित जी से पुस्तक ले कर उसमें से आरती गा रही थी| इस छोटी उम्र में बच्चों की भक्ति देख मंदिर में आये सभी लोगों की जुबान पर बस मेरे बच्चों का ही नाम था|

माँ ने बड़े गर्व से दोनों बच्चों की बड़ाई करते हुए कहा| मुझे भी अपने बच्चों की ये भक्ति देख कर उन पर बहुत गर्व हो रहा था, मैंने दोनों बच्चों के मस्तक चूमते हुए उन्हें शाबाशी देते हुए कहा;

मैं: I'm proud of you मेरे बच्चों!

अपनी तारीफ सुन दोनों बच्चे शर्माने लगे तथा कस कर मेरे सीने से लिपट गए| पिक्चर के लिए मैंने केवल दोनों बच्चों को पुछा था, संगीता को मैं पूछना भूल गया था| शुक्र है की संगीता ने बाद में इस बात को ले कर कोई बतंगड़ नहीं बनाया|

नाश्ता कर के माँ, नेहा और संगीता पूजा के लिए निकले तथा हम बाप-बेटे पिक्चर देखने निकले| आज चूँकि हम दोनों बाप-बेटे अकेले जा रहे थे इसलिए आज आयुष का उत्साह चरम पर था! गाडी में पूरे रास्ते आयुष आगे बैठा हुआ अपनी बातों मेरा ध्यान लगाए हुए था| सिनेमा हॉल पहुँच कर आयुष ने सबसे पहले पॉपकॉर्न खाने की माँग की, पॉपकॉर्न की बाल्टी से पॉपकॉर्न और कोकाकोला पीते हुए हम बाप-बेटों ने मजे से पिक्चर देखि| सुबह का समय था इसलिए सिनेमा हॉल लगभग खाली ही था मगर हम बाप-बेटों को उससे क्या था, हमने तो अपना ध्यान पॉपकॉर्न खाने तथा फिल्म देखने में लगा दिया था| साढ़े बारह बजे तक पिक्चर चली और उसके बाद हम बाहर आ गए| बाहर आयुष को दिखी आइस-क्रीम और आयुष मुझे आइस-क्रीम की दूकान तक खींच ले गया| मैंने आयुष के लिए आइस-क्रीम का कोन लिया जिसमें मशीन द्वारा आइस-क्रीम की खूब ऊँची चोटी बनाई गई थी| आयुष ने ऐसी आइस-क्रीम पहली बार देखि थी इसलिए वो हैरानी से आइस-क्रीम के पहाड़ को देख रहा था| "बेटा जल्दी खाओ वरना सारी आइस-क्रीम पिघल जाएगी!" मैंने आयुष का ध्यान आइस-क्रीम खाने पर खींचते हुए कहा|

आयुष बड़े चाव से अपनी आइस-क्रीम खा रहा था और मैं उसके बराबर में बैठा उसके सर पर हाथ फेर रहा था| इतने में मेरा फ़ोन बज उठा, मैं फ़ोन उठा कर देखने लगा तो मैंने पाया की आयुष का मन उदास होने लगा है! दरअसल, आयुष को डर था की ये फ़ोन साइट से आया होगा और मैं अब आयुष को छोड़कर काम पर चला जाऊँगा! आयुष के चेहरे का उड़ा रंग देख मैंने फ़ोन उठाने के बजाए काट दिया और जैसे ही मैंने फ़ोन काटा वैसे ही आयुष के चेहरे पर ख़ुशी फिर से लौट आई! अब समय था मुझे आयुष को अपने काम में इतना व्यस्त होने का कारण समझाने का;

मैं: बेटा जी, आप मुझसे कल नाराज़ थे?

मैंने बड़े प्यार से आयुष का गाल सहलाते हुए पुछा| मेरा सवाल सुन आयुष का सर झुक गया था, मैंने आयुष का दिल बहलाते हुए उसे प्यार से समझाया;

मैं: बेटा, कभी-कभी मैं काम में फँस जाता हूँ इसलिए आपको समय नहीं दे पाता और उसके लिए I'm sorry बेटा जी! लेकिन please मुझसे नाराज़ मत हुआ करो वरना मैं किससे लाड-प्यार करूँगा?

मैंने प्यार से आयुष को समझाते हुए कहा| जब मैंने आयुष के नाराज़ होने का कारण मेरा उसे समय न देना समझा तो आयुष ने अपने नाराज़ होने कर असली कारण बताया:

आयुष: मैं...आपसे इसलिए नाराज़ नहीं...मेरा रिजल्ट...

आयुष सर झुकाये हुए बोला और अपनी बात अधूरी छोड़ दी| मैं आयुष की बात समझ गया, वो अपने स्कूल के रिजल्ट को ले कर डरा हुआ था तथा मुझसे बात कर अपना डर साझा करना चाहता था| मैंने आयुष को अपने गले लगाया तथा उसका डर भगाते हुए बोला;

मैं: बेटा, अपने स्कूल के रिजल्ट को ले कर आप इतना डर रहे हो? बेटा वो बस एक रिजल्ट है और उसके लिए इतना डरते थोड़े ही हैं? आपने इतनी मेहनत से पढ़ाई की थी, आप बड़े आराम से पास हो जाओगे! भगवान जी न करें मगर अगर आप पास नहीं भी होते तो ऐसे डरते थोड़े ही हैं?! अगले साल और मेहनत करते हैं ताकि अच्छे नम्बरों से पास हो जाओ| बेटा, कभी भी पढ़ाई को ले कर इतनी चिंता नहीं करना, पढ़ाई अपनी पूरी लगन और मेहनत से करना तथा बाकी सब भगवान जी पर छोड़ देना, वो आपकी की गई मेहनत के अनुसार आपको अच्छे नंबरों से पास करवा देंगे|

मैंने आयुष को ठीक वैसे ही समझाया जैसे एक बार मेरी माँ ने मुझे समझाया था|

मैं: मेरी एक और बात हमेशा याद रखना बेटा, आप कितने नंबर लाते हो, क्लास में आप फर्स्ट आते हो या नहीं, ये सब न मेरे लिए मायने रखता है और न ही आपके लिए मायने रखना चाहिए| मेरा प्यार आपको हमेशा उतना ही मिलेगा जितना अब मिलता है| आपको अपना ये बचपन अच्छे से जीना है, अपनी प्यारी-प्यारी शैतानियाँ करनी हैं और हमेशा हँसते रहना है|

मैंने प्यार से आयुष को समझाया तथा अपने गले लगा लिया| मेरी बातों का असर आयुष पर पड़ने लगा तथा उसके चेहरे पर मुस्कान लौट आई और मेरे लिए उसकी ये मुस्कान ही काफी थी|

हम बाप-बेटों को घर लौटते हुए दोपहर के 2 बज गए, चूँकि माँ, संगीता और नेहा पूजा में गए थे इसलिए आज दोपहर का खाना नहीं बनना था| माँ ने मुझे फ़ोन कर सबके लिए कुछ खाना लाने की जिम्मेदारी दी थी, आयुष को तो मैंने आज का आधा दिन दे कर खुश कर दिया था अब बारी थी नेहा को खुश करने की| मैंने नेहा के लिए उसका पसंदीदा खाना यानी छोले-भठूरे पैक करवाए तथा साथ में मैंगो फ्लेवर वाली लस्सी भी ले ली! घर में घुसते ही नेहा को अपने पसंदीदा खाने की खुसबू आ गई और वो आकर सीधा मुझसे लिपट गई|

नेहा और आयुष को सबके लिए खाना परोसने की ड्यूटी दे कर मैं, माँ तथा संगीता के पास बैठ गया| संगीता ने मेरी गैरहाजरी में माँ को मेरा आयुष का दिल खुश करने के बारे में बता दिया था इसलिए जब मैं माँ के सामने बैठा तो माँ ने मुझसे पुछा;

माँ: करा दी अपने बेटे को घुम्मी?

माँ का सवाल सुन मैं हँस पड़ा और सर हाँ में हिलाने लगा|

माँ: बेटा, काम में इतना भी व्यस्त मत हो जाया कर की बीवी-बच्चों को समय ही न दे पाए! बहु और नेहा तो बड़े हैं इसलिए वो तेरे व्यस्त होने से कुछ नहीं कहते मगर आयुष छोटा है, वो छोटी-छोटी बातों को जल्दी दिल से लगा कर तेरे से रूठ जाता है! आगे से ध्यान रखिओ!

माँ मुझे प्यार से समझाते हुए बोलीं|

मैं: माँ, मेरा बेटा आयुष इतना भी छोटा नहीं जितना आप समझते हो! वो मुझसे इसलिए नाराज़ नहीं था की मैं उसे काम में व्यस्त होने के कारण समय नहीं दे रहा था| वो दरअसल अपने स्कूल के रिजल्ट को ले कर डरा हुआ था, ऐसे में उसे अपने पापा जी से थोड़ा प्यार चाहिए था जो की उसे मिल नहीं रहा था| आज आयुष को आइस-क्रीम खिलाते हुए मैंने उसे प्यार से समझाया तथा उसे उसके रिजल्ट के डर से हेमशा-हमेशा के लिए मुक्त कर दिया!

मेरी बात सुन माँ को आयुष के डर के बारे में जानकर दुःख हुआ, इस छोटी सी उम्र में आयुष का अपने रिजल्ट को लेकर इस तरह डरना सही बात नहीं थी| माँ को भी अपनी ओर से आयुष और नेहा को समझना था ताकि वो दोनों फिर कभी इस डर को अपने सीने से लगा कर न बैठें|

उधर नेहा ने सबके लिए खाना परोस दिया था तथा आयुष ने सबकी थालियाँ डाइनिंग टेबल पर लगा दी थी| मैं, माँ और संगीता अपनी-अपनी जगह बैठ गए थे मगर बच्चे, वो दोनों तो मेरे सामने अपना मुँह खोल कर खड़े थे| मैंने एक-एक कर दोनों बच्चों को अपने हाथ से छोले-भटूरों का पहला कौर खिलाया| पहला कौर खाते ही दोनों बच्चों ने ख़ुशी से स्वाद खाना खाने पर अपने सर दाएँ-बायेँ हिलाने शुरू कर दिए| आयुष को तो बस छोले-भटूरे स्वाद लगने की ख़ुशी थी जबकि नेहा ने ये बात पकड़ ली थी की ये छोले-भठूरे आखिर हैं किस दूकान के! "पापा जी, ये छोले-भठूरे दिषु चाचू के ऑफिस के पास वाली दूकान के हैं न?" नेहा के पूछे सवाल के जवाब में मैंने मुस्कुराते हुए सर हाँ में हिलाया| नेहा के इस तरह से छोले-भटूरों का स्वाद पकड़ना गजब था, नेहा की बात सुन माँ और संगीता दंग थे की इतनी छोटी बच्ची ने इतनी जल्दी स्वाद कैसे पहचान लिया? वहीं नेहा को इस समय खुद पर बहुत गर्व हो रहा था की वो कितनी सयानी है की उसने एक ही बार में स्वाद पकड़ लिया!

खैर, खाना खाने के बाद बच्चों को आ रही थी नींद मगर माँ को अभी उनसे एक जर्रूरी बात करनी थी| माँ ने दोनों बच्चों को अपने अगल-बगल बिठाया तथा उनके (बच्चों के) कँधों पर हाथ रख उन्हें प्यार से समझाते हुए बोलीं; "बेटा, आपको पता है की हम आपको स्कूल क्यों भेजते हैं?" माँ ने अपनी बात बच्चों से एक सवाल पूछते हुए शुरू की| आयुष के पास तो अपनी दादी जी के सवाल का जवाब नहीं था इसलिए वो अपना सर न में हिलाने लगा मगर नेहा के पास जवाब था; "दादी जी, आप हमें पढ़ने स्कूल भेजते हो|" नेहा का जवाब सुन माँ मुस्कुराईं और बोलीं; "नहीं बेटा| हम आपको स्कूल इसलिए भेजते हैं ताकि आप स्कूल में अच्छी-अच्छी बातें सीखो, आपके जो विभिन्न विषय हैं उन्हें पढ़कर आप नई-नई चीजें जानो, सीखो, समझो और इस दुनिया में सही-गलत का फैसला करना सीखो! इन सब बातों को सीखने के लिए आपका हमेशा अव्वल आना जर्रूरी नहीं है क्योंकि अगर सब ही अव्वल आएंगे तो ये दुनिया कैसे चलेगी?! जो लोग अव्वल नहीं आते या पीछे रह जाते हैं वो गंदे नहीं होते, वो कड़ी मेहनत करते हैं और अपनी मेहनत और लगन से अव्वल आते हैं|

ज़िन्दगी में मेहनत करना जर्रूरी है और जब हम मेहनत करते हैं तो भगवान जी हमें उस मेहनत का मीठा-मीठा फल देते हैं| आप दोनों का फ़र्ज़ बस मेहनत करना है और फल भगवान जी खुद दे देंगे| आपको उस फल की कतई चिंता नहीं करनी चाहिए, आपको बस अपना कर्म करना चाहिए|" माँ ने बड़े ध्यान से एक रूप-रेखा बाँध कर बच्चों को समझना शुरू किया था| नेहा होशियार थी इसलिए वो तो अपनी दादी जी की सारी बात समझ रही थी, वहीं आयुष भी पीछे नहीं था उसकी उम्र के अनुसार उसके दिमाग ने अपनी दादी जी की बातों का असली मतलब निकालना शुरू कर दिया था|

"अगले हफ्ते आप दोनों बच्चों का रिजल्ट है न?" माँ ने दोनों बच्चों से प्यार से पुछा तो दोनों बच्चों ने अपने सर हाँ में हिला दिए| गौर करने वाली बात ये है की माँ के पूछे इस सवाल से नेहा के चेहरे पर कोई शिकन नहीं पड़ी थी, वहीं आयुष जिसे मैंने आज दोपहर को प्यार से समझाया था वो भी इस समय निश्चिंत था|

"तो बेटा आप दोनों को अपने रिजल्ट को ले कर ज़रा भी भयभीत होने की जर्रूरत नहीं है| रिजल्ट अच्छा हो या बुरा कभी उससे घबराते नहीं हैं! फिर वैसे भी, मेरे प्यारे-प्यारे पोता-पोती ने इतनी सारी मेहनत की है की वो फ़ैल तो हो ही नहीं सकते! आप दोनों बस मन लगा कर पढ़ो और मेहनत करो, रिजल्ट आने पर आप आराम से पास हो ही जाओगे| रही बात अव्वल आने की, तो बच्चों आपके कितने नंबर आते हैं ये मायने नहीं रखता| अब आप ही बताओ कोई आपके पापा से पूछता है की उसके नर्सरी में कितने नंबर आये थे या फिर तीसरी क्लास में कितने नंबर आये थे?! सब आपके पापा के गुण देखते हैं और उन गुणों की तारीफ करते हैं इसलिए अब से कभी अपनी रिजल्ट को ले कर चिंता नहीं करना...ठीक है?" माँ ने प्यार से बच्चों को मेरा उदाहरण देते हुए समझाया| बच्चों को अपनी दादी जी की बात अच्छे से समझ आ गई थी तथा दोनों बच्चे मुस्कुरा रहे थे|

बहरहाल, दिन खुशियों से भरे बीते और आखिर बच्चों के स्कूल का रिजल्ट वाला दिन आ ही गया| मेरे स्कूल का रिजल्ट देने का एक विशेष नियम था, नौवीं कक्षा तक के सभी विद्यार्थियों को रिजल्ट सबसे पहले यानी सुबह 7 बजे दिया जाता था| दसवीं कक्षा से बारहवीं कक्षा के विद्यार्थियों को रिजल्ट 9 बजे से 11 बजे तक दिया जाता था तथा रिजल्ट देते समय कमजोर या फिर फ़ैल होने वाले विद्यार्थियों के माता-पिता व अभिवावकों से विशेष कर बात की जाती थी|

रिजल्ट आने से एक रात पहले मैंने बड़ी मुश्किल से दोनों बच्चों को लाड-प्यार कर उन्हें रात में सुलाया था क्योंकि दोनों बच्चों को अपना रिजल्ट जानने की इतनी उत्सुकता थी की दोनों सो ही नहीं रहे थे| रिजल्ट वाली सुबह बच्चे सबसे पहले उठ गए तथा किसी के कहने से पहले ही तैयार हो कर अपनी दादी जी के पास आशीर्वाद लेने पहुँच गए| बच्चों को इतना उत्साह में देख माँ ने आवाज दे कर मुझे और संगीता को जल्दी उठाया तथा फटाफट तैयार होने को कहा| मुझे अपने बच्चों के रिजल्ट पर पूरा विश्वास था और बच्चों के पास होने की ख़ुशी मैं, माँ तथा संगीता के चेहरे पर देखना चाहता था इसलिए मैंने उन्हें भी अपने साथ चलने को कहा| हर बार की तरह स्कूल जाने से माँ और संगीता ने एक साथ इंकार कर दिया, माँ साथ जाने से इसलिए मना कर रहीं थीं क्योंकि उन्हें सुबह-सुबह तैयार होना पड़ता जबकि संगीता के मना करने का कारण कुछ और था! दरअसल संगीता का मेरे साथ कहीं बाहर जाना मतलब की संगीता को अच्छे से सजना-सँवरना पड़ता, अब अपनी शर्म के आगे संगीता को यूँ सजना-सँवरना अच्छा नहीं लगता था इसीलिए वो मेरे साथ कहीं जाने से मना करती थी|

मुझे कैसे भी सभी को अपने साथ बच्चों का रिजल्ट ले जाना था इसलिए मैंने दोनों बच्चों को गुपचुप इशारा किया, बच्चे मेरा इशारा समझ गए तथा अपनी भोली सी सूरत लिए अपनी दादी जी और अपनी मम्मी से लिपट गए| "दादी जी, आप अगर मेरे साथ स्कूल नहीं जाओगे तो मैं भी रिजल्ट लेने नहीं जाऊँगी!" नेहा अपना मुँह फुलाते हुए अपनी दादी जी से लिपटते हुए बोली| अपनी पोती के मोहपाश से माँ कैसे बच पातीं, उन्होंने नेहा के सर को चूम स्कूल चलने की अपनी रज़ामंदी दे दी!

उधर आयुष भी जा कर अपनी मम्मी की टांगों से लिपट गया तथा अपनी भोली सी शक्ल और तुतलाते हुए बोला; "चलो न मम्मी! मेले (मेरे) सब दोस्तों की मम्मियाँ आएँगी और न मैं आपको स्कूल के छोले-कुलचे भी खिलाऊँगा!" आयुष को लगता था की जैसे हम उसे खाने-पीने का लालच दे कर मना लेते हैं वैसे ही वो भी अपनी मम्मी को खाने-पीने का लालच दे कर मना लेगा| आयुष के छोले-कुलचे खिलाने की बात पर हम सब को हँसी आ गई और अपने बेटे के मोहपाश में बँध कर एक माँ ने हार मान ही ली; "पक्का मुझे छोले-कुलचे खिलायेगा न?" संगीता ने बच्चा बनते हुए आयुष के सर पर हाथ रखते हुए पुछा| आयुष को लगा की उसका ये टोटका चल पड़ा इसलिए वो ख़ुशी से फटाफट अपना सर हाँ में हिलाने लगा|

माँ अपने कमरे में तैयार होने लगीं और हम मियाँ-बीवी अपने कमरे में तैयार होने लगे| सुबह का समय था और बच्चों का रिजल्ट लेने जाने को ले कर मैं थोड़ा रोमांटिक हो रहा था| कमरे का दरवाज़ा बंद कर मैंने संगीता को अपनी बाहों में भर लिया| मेरे सीने से लगते ही संगीता मचलने लगी और मुझे उकसाने के इरादे से बोली; "क्या इरादा है जानू?" संगीता ने बड़े ही मादक ढंग से ये सवाल पुछा| मैं अपनी पत्नी की होशियारी जानता था, वो मुझे प्यार का लालच दे कर बच्चों के स्कूल जाने से बचने का बहना सोच रही थी| "इरादा तो प्रेम करने का है, परन्तु मैं जानता हूँ की ये तुम्हारा स्कूल न जाने का बहाना है इसलिए मेरी तरफ से न है!"




ये कहते हुए मैंने संगीता को अपनी बाहों से आज़ाद कर दिया| संगीता की चालाकी जब नाकामयाब साबित हुई तो वो अपनी नाक पर प्यारा सा गुस्सा ले कर मुझे देखने लगी, वहीं मैं संगीता का ये प्यारभरा गुस्सा देख खिलखिला कर हँसने लगा|

"स्कूल साथ ले जाना है तो साडी निकाल कर दो, वरना मैं नहीं जाने वाली कहीं!" संगीता को मेरा यूँ उस पर हँसना उसे प्यारा सा गुस्सा दिला रहा था इसलिए वो मुझे प्यारभरी तड़ी देते हुए बोली| मैंने अलमारी खोली और अपनी पसंद की साडी, चप्पल, कान की झुमकी, बिंदी तथा चूड़ियाँ निकाल कर पलंग पर रख दी| संगीता मुझे ये सब समान चुन कर निकालते हुए बड़े गौर से देख रही थी, उसे लगा था की मैं उसकी बात सुन कर कुछ नहीं करूँगा मगर मैं तो पूरे मन से सब काम कर रहा था| संगीता के सभी कपड़े रख कर मैं अपने कपड़े ले कर बाथरूम में घुस गया तथा नाहा-धो कर तैयार हो कर निकला| मुझे सजा-धजा देख संगीता की आह निकल गई और वो अपनी ऊँगली दाँतों तले दबाते हुए बोली; "तुस्सी ते बड़े सोणे लग रहे हो!" संगीता के मुँह से अपनी तारीफ सुन मैं मुस्कुराया और बोला; "हूण तुस्सी भी सोणे लगने चाहिए!" इतना कहते हुए मैं अपना ब्लेजर ले कर कमरे से बाहर आ गया|

जिस तरह मैंने संगीता के लिए कपड़े पसंद किये थे वैसे ही दोनों बच्चे अपनी दादी जी के लिए अपनी पसंद के कपड़े चुन रहे थे और माँ चुपचाप बैठीं दोनों बच्चों का ये बचपना देख कर मुस्कुरा रहीं थीं| नेहा अपनी दादी जी के लिए जो साडी पसंद करती वो आयुष को नहीं भाति और जो साडी आयुष पसंद करता वो नेहा को नहीं भाति| बच्चों के लिए किसी भी निष्कर्ष पर पहुँचना मुश्किल हो रहा था इसलिए उन्होंने रेफरी (refree) के रूप में मुझे अपनी बातों में खींच लिया| बच्चों को पसंद थी चमक-धमक वाली साड़ियाँ जबकि माँ ऐसी साड़ियाँ बस खरीद कर रखतीं थीं, पहनती-ओढ़ती नहीं थी| जब बच्चों ने मुझे इस काम में खींचा तो मैंने माँ के लिए एक गुलाबी रंग की साडी निकाली| इस साडी की खासियत ये थी की ये चमक-धमक वाली नहीं थी, बल्कि भारी-भरकम कढ़ाई की गई चौड़े बॉर्डर वाली साडी थी|

बच्चों की नज़र में मेरे द्वारा चुनी हुई ये साडी बड़ी सादी सी थी इसलिए दोनों बच्चे मुँह बनाने लगे और फिर से अपनी-अपनी पसंद की साडी पर बहस करने लगे| "बेटा, आपकी दादी जी चमक-धमक वाली साडी नहीं पहनती, उन्हें इसी तरह की साडी पहनना अच्छा लगता है|" मैंने अपनी पसंद की साड़ी दिखाते हुए समझना चाहा मगर दोनों बच्चे अपनी-अपनी पसंद की साडी अपनी दादी जी को पहनाने के लिए झगडने लगे| मैंने पीछे पलट कर माँ की ओर देखा तो पाया की उन्हें हम तीनों बाप-बेटा-बेटी को इस तरह लड़वाने में बड़ा मज़ा आ रहा है| मैंने सोचा की क्यों न माँ को भी हमारी इस बहस में खींचा जाए इसलिए मैंने बच्चों का ध्यान उनकी दादी की ओर मोड़ते हुए कहा; "ऐसा करते हैं की हम आपकी दादी जी से ही पूछ लेते हैं की वो कौन सी साडी पहनेंगी?" ये कहते हुए मैंने अपनी पसंद की साडी उठाई, नेहा ने अपनी पसंद की साडी उठाई और आयुष ने अपनी पसंद की साडी उठाई| हम तीनों माँ के सामने अपनी-अपनी साडी ले कर खड़े हो गए ताकि माँ हम तीनों में से किसी एक की साडी चुन लें|

माँ ने जब हम तीनों को अपने सामने देखा तो वो समझ गईं की वो जिसकी भी साडी चुनेंगी, बाकी के दो लोगों को बुरा लगेगा की उनकी पसंद की साडी क्यों नहीं चुनी गई इसलिए माँ ने भी अपनी चपलता दिखाई और गहरी साँस छोड़ते हुए बोलीं; "अरे बेटा, मैं बुढ़िया क्या जानूँ की मुझ पर कौनसी साडी अच्छी लगेगी?! तुम तीनों ही फैसला करो की मैं क्या कपड़े पह्नु!" माँ ने बेजोड़ अभिनय करते हुए फिर से हम तीनों बाप-बेटा-बेटी को लड़वाने की तैयारी कर ली थी| माँ ने जब हम बाप-बेटा-बेटी को साडी चुनने के लिए लड़ा दिया तो हम तीनों ने प्यार भरी बहस शुरू कर दी| इतने में संगीता तैयार हो आई और हमारी बहस सुन बीच में बोल पड़ी; "अच्छा बस! मैं बताती हूँ की माँ कौन सी साडी पहनेंगी|" ये कहते हुए संगीता ने माँ के लिए पहले से ऑनलाइन आर्डर कर मँगाई साडी निकाली और माँ को देते हुए बोली; "माँ, आप ये वाली साडी पहनो! ये मैंने पहले ही मँगवा ली थी और फॉल-पीको कर के पूरी तरह से तैयार है|" माँ ने साडी लेते हुए संगीता को आशीर्वाद दिया| माँ साडी ले कर नहाने गईं और इधर हम तीनों बाप-बेटा-बेटी अपनी पसंद की साडी न चुने जाने से प्यार भरे गुस्से से संगीता को देखने लगे, बाजए हमें मनाने के संगीता ने हमें जीभ चिढ़ाई तथा ठेंगा दिखाते हुए बोली; "देख लिया, माँ ने मेरी पसंद की साडी पहनी!" संगीता ने ये बता बस हम तीनों बाप-बेटा-बेटी को जलाने के लिए कही थी और वो अपनी इस प्यारी से कोशिश में कामयाब भी हुई|

तैयार हो कर हम सब बच्चों के स्कूल के लिए निकले, गाडी में आगे माँ बैठीं थीं तथा पीछे संगीता और बच्चे| बच्चों ने आज आगे बैठने के लिए जिद्द नहीं की, लेकिन पीछे बैठ कर भी बच्चों का उत्साह कम नहीं हो रहा था| दोनों बच्चों ने पीछे बैठे-बैठे ही अपनी दादी जी से बात करना जारी रखा| जब हम स्कूल पहुँचे तो पता चला की हम सबसे पहले हैं जो अपने बच्चों का रिजल्ट लेने पहुँचे हैं इसलिए हम सब गाडी में ही बैठ कर इंतज़ार करने लगे| बच्चों को अपने रिजल्ट को ले कर अब थोड़ी-थोड़ी घबराहट हो रही थी इसलिए माँ ने जानबूझ कर बच्चों का ध्यान रिजल्ट लेने के बाद कहीं खाने-पीने जाने पर लगा दिया| बच्चे खाने-पीने जाना चाहते थे मगर उन्हें कहीं न कहीं फ़ैल होने का डर था इसलिए माँ के खाना-खाने के लालच देने पर भी बच्चों के चेहरे पर वो उत्साह नहीं आया जो की आना चाहिए था| बच्चों की चिंता समझते हुए मैंने दोनों बच्चों को समझाते हुए कहा; "बेटा, घबराना नहीं है! आप दोनों का रिजल्ट अच्छा ही होगा और अगर भगवान न करे आपका रिजल्ट खराब हुआ भी तो भी घबराने की बात नहीं, अगले साल आप और ज्यादा मेहनत करना|" मैं बच्चों को डराना नहीं चाहता था बस उन्हें कुछ बुरा होने के लिए पहले से ही तैयार करना चाहता था|

अगले पंद्रह मिनट के भीतर ही बाकी बच्चे तथा उनके माता-पिता व अभिवावक आने लगे इसलिए हम सब भी गाडी से निकल कर स्कूल के भीतर प्रवेश किया| परन्तु प्रार्थना सभा में ही सभी माता-पिता व अभिभावकों को रोक दिया गया| तभी स्टेज पर से घोषणा हुई की सभी बच्चों को अपनी-अपनी क्लास के नाम और नंबर के आगे लाइन बनानी है तथा सभी माता-पिता व अभिभावकों कों सबसे पीछे खड़ा होना है| हम सभी ने घोषणा में जो निर्देश दिए गए थे उनका पालन किया और सबसे पीछे खड़े हो गए| आज जीवन में पहलीबार माँ और संगीता बच्चों को इस तरह लाइन में लगे हुए देख रहीं थीं, तभी तो उनके चेहरे पर प्यारभरी मुस्कान छलक रही थी|

जब मैं छोटा था तब स्कूल में मुझे लाइन में लगे हुए देखने का मौका माँ को नहीं मिला था इसलिए माँ के जहन में एक प्यारा सा सवाल था; "बेटा, जब तू छोटा था तब तू भी ऐसे सुबह-सुबह लाइन में लगता था?" माँ के इस प्यारे से सवाल ने मेरे चेहरे पर प्यारी सी मुस्कान जगा दी थी| "जी माँ" मैं मुस्कुराते हुए बोला| मेरा जवाब सुन माँ के चेहरे पर आई मुस्कान बढ़ गई क्योंकि वो मन ही मेरा बचपना याद कर रहीं थीं| मेरे बचपन के वो सुनहरे दिन जब सुबह-सुबह माँ मुझे स्कूल के लिए तैयार कर के भेजा करती थीं! वहीं मेरे दिमाग में भी मेरे बचपन की स्कूल जाने की मीठी सी याद ताज़ा हो गई थी!

उधर संगीता के चेहरे पर भी फैली मुस्कान हर पल बढ़ती जा रही थी| मेरे अनुसार संगीता भी अपने बचपन के दिनों को याद कर रही थी, जब वो छोटी बच्ची थी तब वो भी अपने स्कूल में लाइन में लगती होगी| शायद उसी दिन को आज याद कर संगीता के मन में ख़ुशी की प्यारी सी गुदगुदी हो रही थी!

बहरहाल, अगले पंद्रह मिनट में बाकी सभी माता-पिता व अभिभावक भी आ गए और स्कूल का कार्यक्रम चालु हुआ| सबसे पहले सभी बच्चों को हर रोज़ की तरह प्रार्थना गाने को कहा गया| सभी बच्चों के साथ मेरा भी बचपना बाहर आया और मैंने भी हाथ जोड़कर अपने स्कूल में सीखी हुई प्रार्थना गाई| मुझे और बच्चों को प्रार्थना गाते हुए देख माँ और संगीता को बहुत ख़ुशी हो रही थी तथा ये ख़ुशी उनके चेहरे से झलक रही थी, उनकी नज़र में मैं इस समय स्कूल जाने वाला प्यारा सा बच्चा था|

प्रार्थना संपन्न होने के बाद प्रिंसिपल मैडम स्टेज पर आईं, मैंने माँ और संगीता के कान में खुसफुसाते हुए बताया की ये हमारे स्कूल की प्रिंसिपल मैडम हैं| उधर स्टेज पर खड़े हो कर प्रिंसिपल मैडम ने आज के इस कार्यक्रम का प्रयोजन बताया; "प्यारे बच्चों और उनके माता-पिता तथा अभिभाववकों, आप सभी का हमारे स्कूल में स्वागत है| जैसा की आप सब जानते ही हैं की आज सभी बच्चों का रिजल्ट की घोषणा की जायेगी, परन्तु उससे पहले मैं आप सभी से हमारे स्कूल की कुछ उपलब्धियाँ बाँटना चाहूँगी| हमारे स्कूल में नर्सरी के बच्चों के लिए (कंपनी का नाम) द्वारा एक चित्रकारी की प्रतियोगिता की गई थी जिसमें प्रथम पुरूस्कार हमारे स्कूल के नर्सरी क्लास C सेक्शन के आयुष मौर्या को मिला है! आयुष बेटा, स्टेज पर आओ!" जैसे ही आयुष का नाम लिया गया मैं, माँ, संगीता और अपनी लाइन में खड़ी नेहा की ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा, हम चारों ने ख़ुशी से जोरदार तालियाँ बजाई! उधर अपना नाम सुन आयुष बेचारा हक्का-बक्का था! प्रिंसिपल मैडम ने उसे स्टेज पर आने को कहा था मगर आयुष बेचारा सोच में पड़ा था की वो स्टेज पर जाए या नहीं?! तभी आयुष की क्लास टीचर आईं और आयुष का होंसला बढ़ाते हुए उसे स्टेज पर जाने के लिए कहा|

'मंचभीरुता' यानी stage fright तो बड़ों-बड़ों को होती है फिर आयुष तो छोटा बच्चा था इसलिए वो डरते-घबराते हुए स्टेज पर चढ़ा| प्रिंसिपल मैडम के पास पहुँच, आयुष को कुछ समझ नहीं आया की उसे आगे क्या करना है इसलिए आनन-फानन में आयुष ने सीधा प्रिंसिपल मैडम के पाँव छु लिए! आयुष इतना प्यारा और गोल-मटोल था की उसके प्रिंसिपल मैडम के पाँव छूने से मैडम उस पर मोहित हो गईं और उन्होंने झुक कर आयुष के गाल पर पप्पी करते हुए उसे आशीर्वाद दिया|

प्रिंसिपल मैडम के आयुष के गाल चूमने पर सभी लोग हँस पड़े तथा आयुष बेचारा शर्म से पानी-पानी हो गया! फिर प्रिंसिपल मैडम ने आयुष को एक टोकरी भर कर चॉकलेट, एक सर्टिफिकेट और कलरिंग सेट भेंट स्वरूप दिया| इतनी सारी चॉकलेट देख आयुष का चेहरा फिर से खिल गया और वो अपने उपहार ले कर स्टेज से नीचे उतर आया| इसके बाद प्रिंसिपल मैडम ने कुछ अन्य बच्चों को बुला कर इनाम दिए जिन्होंने किसी न किसी प्रतियोगिता में हमारे स्कूल का नाम ऊँचा किया था| पुरूस्कार वितरण समाप्त हुआ तो मुझे लगा की अब हमें बच्चों की कक्षा में रिजल्ट लेने जाना होगा मगर अभी हम सभी के चौंकने की बारी थी|

पुरूस्कार वितरण के बाद वाईस प्रिंसिपल मैडम ने माइक सँभाला और बोलीं; "हर साल की तरह इस साल भी सभी कक्षाओं के चारों सेक्शंस में से परीक्षाओं में प्रथम, द्वितीय और तृतीये आये बच्चों का नाम लिया जाएगा| सभी बच्चों से अनुरोध है की वो एक-एक कर स्टेज पर आएं और प्रिंसिपल मैडम से अपनी ट्रॉफी तथा जिन बच्चों को 'PREFECT' चुना गया है वो प्रिंसिपल मैडम से अपना "PREFECT" का बैज (badge) लें|" ये मेरे लिए एक नई जानकारी थी क्योंकि आज तक मुझे रिजल्ट लेने पिताजी के साथ हमेशा क्लास में जाना पड़ता था तथा PREFECT बनाने का समारोह तो स्कूल शुरू होने के बाद प्रार्थना सभा में होता था| मुझे लगता था की आज भी यही रीति-रिवाज़ दोहराया जायेगा मगर जब वाईस प्रिंसिपल मैडम ने ये घोषणा की तो मैं हैरान हुआ| जमाने के साथ स्कूल के रीति-रिवाज़ भी बदल रहे थे; 'चलो कोई बात नहीं, बच्चों का रिजल्ट लेने के लिए थोड़ा और सब्र कर लेते हैं!' मैं ठंडी आह भरते हुए मन ही मन बुदबुदाया| दरअसल, मुझे भी बच्चों की तरह रिजल्ट लेने जाने की जल्दी पड़ी थी परन्तु जब तक ये समारोह खत्म नहीं होता हमें बच्चों का रिजल्ट रुपी रिपोर्ट-कार्ड नहीं मिलने वाली थी!

उधर स्टेज पर खड़ीं वाईस-प्रिंसिपल मैडम ने नर्सरी के बच्चों के चारों सेक्शंस में से वो तीन नाम लिए जो की प्रथम, द्वितीय और तृतीय आये थे; "नर्सरी क्लास के सभी सेक्शंस में जो बच्चा प्रथम आया है वो है डी सेक्शन से आयुष मौर्या, द्वितीय आई है सी सेक्शन से दीप्ती सिंह और तृतीय आई हैं डी सेक्शन से नताशा खरबंदा|" जैसे ही वाईस प्रिंसिपल मैडम ने आयुष का नाम लिया हम पाँचों यानी मैं, माँ, संगीता, नेहा और आयुष दंग रह गए! हमें अपने कानों पर विश्वास नहीं हो रहा था की आयुष प्रथम आया है! जिस तरह से आयुष अपने रिजल्ट को ले कर डरा हुआ था उसे देखते हुए हमने सोचा ही नहीं था की आयुष प्रथम आ सकता है!

वहीं आयुष का जब स्टेज पर से वाईस प्रिंसिपल द्वारा नाम पुकारा गया तो उसे भी अपना नाम लिए जाने पर विश्वास नहीं हुआ! वो तो उसके दोस्तों ने उसकी पीठ पर थपकी मार कर उसे स्टेज पर जाने को कहा तब जा कर आयुष स्टेज पर चढ़ा| आयुष के स्टेज पर चढ़ते ही मुझमें जोश भर गया और मैं बड़ी जोर से ताली बजाने लगा! मेरी देखा-देखि माँ और संगीता ने भी ख़ुशी से भरते हुए जोर से ताली बजानी शुरू कर दी| मैं इस मौके को व्यर्थ नहीं जाने देना चाहता था इसलिए मैंने अपना मोबाइल निकाला और भीड़ में से निकलते हुए स्टेज के नज़दीक आ कर आयुष को प्रिंसिपल मैडम से छोटी सी ट्रॉफी लेते हुए वीडियो बनाने लगा| उधर स्टेज पर आयुष ने प्रिंसिपल मैडम से ट्रॉफी ली और उनके पाँव छु कर फिर से आशीर्वाद लिया| स्टेज से उतरते वक़्त आयुष की नज़र मुझ पर पड़ी और वो दौड़ता हुआ मेरी ओर आया| मैंने फटाफट अपने घुटने नीचे टेके और आयुष को अपनी बाहों में भरते हुए उसे लाड करते हुए बोला; "I'm proud of you बेटा!" बाप-बेटे का ये प्यार भरा लगाव बड़ा ही अनोखा था और कुछ पल के लिए सभी की नज़र हम दोनों बाप-बेटों पर जम गई थी| तब मुझे नहीं पता था की संगीता ने इस मौके को अपने मोबाइल में वीडियो के रूप में हमेशा-हमेशा के लिए कैद कर लिया है!

धीरे-धीरे वाईस प्रिंसिपल मैडम ने बाकी कक्षाओं के बच्चों के नाम लिए और उन्हें ट्रोफियाँ दी गईं| अब आया नंबर तीसरी कक्षा के विद्यार्थियों का, कुछ देर पहले तक मुझे ज़रा भी उम्मीद नहीं थी की मेरे बच्चे प्रथम, द्वितीय या तृतीय आएंगे, मैं तो बस उनकी पास होने की ख़ुशी पाले बैठा था मगर जब आयुष अपनी कक्षा में प्रथम आया तो मेरी उम्मीद नेहा से भी बँध गई; "जब आयुष प्रथम आया है तो नेहा ने तो परीक्षा के दिनों में सबसे ज्यादा मेहनत की थी, वो तो प्रथम अवश्य आएगी!" मैं बहुत धीमी आवाज़ में बुदबुदाया| नेहा की कक्षा का नंबर आने तक मैं बहुत उत्सुक हो गया था, मेरा बालक मन बार-बार कहता था की 'अब नेहा का नाम पुकारा जाएगा! अब नेहा का नाम पुकारा जाएगा!'

"तीसरी कक्षा की जो विद्यार्थी प्रथम आई है वो है डी सेक्शन की नेहा मौर्या, द्वितीय आई है ए सेक्शन की साक्षी शर्मा और तृतीय आये हैं बी सेक्शन के मनीष कुमार| आप सभी बच्चे कृपया स्टेज पर आयें और अपनी-अपनी ट्रॉफी प्रिंसिपल मैडम से लें|" वाईस प्रिंसिपल मैडम ने जैसे ही नेहा का नाम लिया मैं फ़ट से आगे आया और अपने मोबाइल में वीडियो रिकॉर्डिंग चालु की| नेहा अपनी क्लास की लाइन में से निकली और स्टेज के पास पहुँच कर मेरी ओर देखने लगी| नेहा का मन मेरे गले लगने का था इसलिए वो मेरे पास आना चाहती थी, परन्तु मैंने उसे हाथ के इशारे से पहले स्टेज पर जाने को कहा|

आयुष की तरह नेहा भी पहलीबार स्टेज पर चढ़ने से घबरा रही थी| अपनी इस घबराहट को दूर करने के लिए नेहा ने आँख बंद की ओर देवी माँ को याद किया| देवी माँ को याद करने से नेहा में पलभर के भीतर हिम्मत आ गई ओर वो स्टेज पर चढ़ गई| नेहा के अलावा बाकी दो बच्चे भी नेहा के साथ लाइन में खड़े हो गए| तभी प्रिंसिपल मैडम ने वाईस प्रिंसिपल मैडम से माइक लिया और नेहा को अपने पास बुलाया, फिर उन्होंने नेहा के कँधे पर हाथ रख सभी से नेहा की तारीफ करते हुए कहा; "मैं आप सभी बच्चों, उनके माता-पिता व अभिवावकों को नेहा के बारे में कुछ बताना चाहती हूँ| कुछ निजी कारणों से नेहा की पढ़ाई बीच में छूट गई थी, फिर नेहा का शहर आना हुआ और जबतक नेहा का दाखिला हमारे स्कूल में होता आधा साल निकल चूका था! नेहा का आधा साल बर्बाद हो चूका था लेकिन फिर भी नेहा ने हार न मानते हुए बीच साल में दाखिला लिया और अपनी पूरी लगन से मेहनत की| जहाँ नेहा के साथ पढ़ने वाले बाकी बच्चे अपनी पढ़ाई में आगे थे, वहीं नेहा आधा साल पीछे थी! लेकिन नेहा ने हिम्मत नहीं छोड़ी और केवल दो महीने में उसने अपने आधे साल की पढ़ाई पूरी की| जब अंतिम परीक्षा की बारी आई तो नेहा की मेहनत रंग लाई और वो चारों सेक्शंस में प्रथम आई! I'm so proud of you बेटा!" प्रिंसिपल मैडम ने अपनी बात पूरी कर नेहा की पीठ थपथपाते हुए उसे ट्रॉफी दी और नेहा ने अपनी ट्रॉफी ले प्रिंसिपल मैडम के पाँव छु उनका आशीर्वाद लिया| "बेटा, आगे भी इसी तरह से मेहनत करना और हर साल अव्वल आना|" प्रिंसिपल मैडम ने नेहा के कँधे पर हाथ रखते हुए कहा|

नेहा अपनी ट्रॉफी ले कर जा ही रही थी की प्रिंसिपल मैडम ने उसे रोका और वाईस प्रिंसिपल मैडम से स्कूल 'PREFECT' का बैज नेहा को पहनाया| नेहा का स्कूल PREFECT बनना मेरे लिए बहुत बड़ी उपलब्धि थी, परन्तु जब मैंने माँ और संगीता की तरफ देखा तो वो कुछ असमंजस में लगे! दरअसल माँ और संगीता को नहीं पता था की स्कूल PREFECT क्या होता है? तो उनका असमंजस में होना जायज बात थी! "स्कूल PREFECT का बैज यानी बिल्ला नेहा को उसकी पढ़ाई में की गई मेहनत को देखते हुए दिया गया है| स्कूल PREFECT होना बड़े ही गर्व की बात होती है, PREFECT का मतलब होता है की नेहा बाकी बच्चों के लिए एक आदर्श विद्यार्थी है| PREFECT बनने के बाद नेहा को अब स्कूल में जिम्मेदारी दी जाएँगी, आज से नेहा को स्कूल के मान-सम्मान, कायदे-कानून आदि का ख्याल रखना होगा| कोई बच्चा अगर कुछ गलत कर रहा होगा तो नेहा उसकी गलती को सुधारेगी तथा उस बच्चे को सही रास्ता दिखाएगी| प्रत्येक दिन सुबह प्रर्थना सभा में नेहा को ध्यान रखना होगा की कोई बच्चा देर से आ कर लाइन तोड़कर तो नहीं घुस रहा? सभी बच्चों ने अपनी स्कूल ड्रेस दिन के अनुसार पहनी है की नहीं? देर से आने पर बच्चा बिना जुर्माना दिए तो नहीं भाग रहा? स्कूल में जब भी कोई समारोह होगा उसमें नेहा से सब व्यवस्था करने में परामर्श लिया जायेगा तथा उन व्यवस्थाओं के लिए नेहा की ड्यूटी लगाई जाएगी| समारोह में कोई विशेष अथिति आएगा तब नेहा को ही उस अथिति का स्वागत करना होगा| जब भी कभी स्कूल की ओर से बच्चे बाहर जायेंगे तब नेहा को ध्यान रखना होगा की कोई भी बच्चा शैतानी न करे तथा कोई भी बच्चा पीछे छूट न जाए!" मैंने माँ और संगीता को PREFECT की सारी जिम्मेदारियाँ उद्धरण सहित समझा दी| नेहा को मिलने वाली इन सभी जिम्मेदारियों के बारे में सुन माँ और संगीता गर्व से फूले नहीं समा रहे थे| "अरे हमारी गुड़िया तो बहुत बड़ी साहिबा बन गई!" माँ नेहा पर गर्व करते हुए बोलीं| दरअसल मेरी PREFECT की दी गई परिभाषा सुन माँ को लगता था की उनकी लाड़ली पोती इतनी जिम्मेदारियाँ मिलने से किसी कलेक्टर के समान है! माँ की कही बात हास्यास्पद थी परन्तु उनका भोला मन अपनी पोती को अगर कलेक्टर साहिबा मान रहा था, तो मैं कौन होता हूँ उनकी ये ख़ुशी छीनने वाला, मैं बस मुस्कुराते हुए अपने फ़ोन में वीडियो बनाता रहा|

ट्रॉफी ले कर नेहा स्टेज से उतरी तथा मेरी तरफ दौड़ी, मैं भी नेहा को लाड करने के लिए माँ और संगीता को छोड़ कर स्टेज की तरफ बढ़ गया| नेहा मेरे सीने से लग कर भावुक हो गई थी और कहीं वो रो न पड़े इसलिए मैंने उसे लाड करते हुए उसका मस्तक चूमा तथा ख़ुशी से बोला; "मुझे पता था मेरा बच्चा अव्वल आएगा!" ये कहते हुए मैंने नेहा के दोनों गालों की पप्पी ली और उसके सर पर हाथ फेरते हुए बोला; " मेरे बच्चे ने आज मेरा नाम रोशन कर दिया! I'm very proud of my daughter!" ये कहते हुए मैंने नेहा को अपने गले लगाया तथा उसे वापस अपनी लाइन में जा कर खड़े होने को कहा| नेहा को गले लगा कर मेरा मन भर आया था, बच्चों ने आज मुझे इतनी ख़ुशी दी थी की मुझसे कुछ कहा ही नहीं जा रहा था| आँखों में ख़ुशी के आँसूँ लिए मैं, माँ और संगीता के पास पहुँचा| मेरी आँखों में ख़ुशी के आँसूँ देख माँ ने अपन पल्लू से मेरी आँखों में आये आँसूँ पोछे तथा मेरी पीठ थपथपाते हुए माँ ने मुझे रोने से रोक लिया|

नेहा के बाद कुछ अन्य बच्चों को भी PREFECT के बैज दिए गए थे, परन्तु मेरी बिटिया सबसे छोटी और सबसे प्यारी PREFECT दिख रही थी! कुछ समय बाद ट्रॉफी और PREFECT का बैज वितरण समारोह खत्म हुआ और दोनों बच्चे दौड़ते हुए हमारे पास आये| आयुष को तो माँ ने आसानी से गोद में उठा कर उसके गाल चूमते हुए आशीर्वाद दिया मगर नेहा को गोद में उठाना माँ के लिए मुश्किल था! परन्तु माँ को आज बच्चों पर इतना प्यार आ रहा था की माँ ने बड़ी मुश्किल से नेहा को गोदी में उठा लिया और उसके दोनों गाल चूमते हुए नेहा को भी आशीर्वाद दिया|

दोनों बच्चों ने हमें अपनी-अपनी ट्रोफियाँ दिखाईं, मैंने ट्रॉफियों पर क्या लिखा है ये माँ को पढ़ आकर सुनाया तो माँ ने दोनों बच्चों के सर पर हाथ फेरते हुए उन्हें एक बार फिर आशीर्वाद दिया| आयुष ने अपनी चॉकलेट से भरी टोकरी मुझे सँभालने को दी तथा अपना सर्टिफिकेट और कलरिंग सेट अपनी मम्मी को पकड़ने को दिया| मेरे हाथ में चॉकलेट वाली टोकरी देख संगीता का मन ललचा गया और वो बड़े प्यार से आयुष को मस्का लगाते हुए बोली; "आयुष बेटा, मुझे भी चॉकलेट मिलेगी न?" अपनी मम्मी का सवाल सुन आयुष को मस्ती सूझी और वो एकदम से अपना सर न में हिलाने लगा| आयुष की ये प्रतिक्रिया देख संगीता की नाक पर प्यारा सा गुस्सा आ गया जिससे मुझे इस स्थिति का रस लेने का मौका मिल गया; "तुम्हें चॉकलेट नहीं देनी इसीलिए तो आयुष ने चॉकलेट वाली टोकरी मुझे पकड़ने को दी है ताकि तुम कहीं चुपके से चुरा कर चॉकलेट न खा लो!! है न आयुष?" मैंने संगीता को चिढ़ाते हुए आयुष से सवाल पुछा| मेरा सवाल सुन आयुष खी-खी कर हँसने लगा तथा हाँ में सर हिलाने लगा| आयुष ओर मेरी इस जुगलबंदी को देख संगीता को बड़ी जोर से मिर्ची लगी और वो प्यार भरे गुस्से से मुझे देखने लगी| "ये चॉकलेट तो हम बाप-बेटा-बेटी खाएंगे!" मैंने दोनों बच्चों को चॉकलेट खाने के स्वादिष्ट काम में शामिल कर लिया तो दोनों बच्चे अपनी मम्मी को जीभ चिढ़ाने लगे, ठीक उसी तरह जैसे सुबह संगीता हम बाप-बेटा-बेटी को जीभ चिढ़ा रही थी| संगीता को लगी थी मिर्ची इसलिए वो एकदम से मुँह फुला कर माँ से हम तीनों की शिकायत करने लगी; "देखो न माँ, ये तीनों मुझे जीभ चिढ़ा रहे हैं!" माँ संगीता के बचाव में कुछ कहें उससे पहले ही मैं संगीता की गलती निकालते हुए बोला; "अच्छा, वो जो सुबह तुम माँ द्वारा तुम्हारी साडी चुने जाने पर हम तीनों को जीभ चिढ़ा रहीं थी, वो कुछ नहीं था?!" मेरी बात सुन माँ हँस पड़ीं और अपनी बहु की तरफदारी करते हुए बोलीं; "छोड़ इन तीनों शैतानों को, मैं तुझे खूब बड़ी चॉकलेट खिलाऊँगी|!" माँ ने संगीता को बिलकुल वैसे ही लाड किया जैसे वो बच्चों को करती हैं|

बहरहाल इस बचकाने किस्से के बाद हम सब, बच्चों की रिपोर्ट-कार्ड लेने के लिए बच्चों की क्लास की तरफ चल पड़े| सबसे पहले हम आयुष की क्लास में पहुँचे, आयुष की क्लास में 4 बड़े-बड़े गोल टेबल थे जिनके इर्द-गिर्द छोटी-छोटी कुर्सियाँ लगी थीं| माँ ने आज पहलीबार ये नज़ारा देखा था इसलिए वो अपने गाल पर हाथ रखते हुए हैरत से भरकर बोलीं; "आयुष इन कुर्सियों पर बैठता है?" माँ के पूछे इस सवाल के जवाब में आयुष ने फ़ट से अपनी दादी जी को अपनी कुर्सी दिखाई जहाँ वो बैठता था| "माँ. आयुष तो छोटा है इसलिए वो इस छोटी सी कुर्सी पर बैठ सकता है| जब मैं पहलीबार आयुष को स्कूल छोड़ने आया था तो उसने मुझे भी इन्हीं छोटी कुर्सियों पर बैठने को कहा था! अब सोचो मेरे जैसा लम्बा-चौड़ा आदमी कैसे इस कुर्सी पर बैठा होगा?!" मैंने माँ को आयुष के स्कूल में पहले दिन की बात बताई तो माँ, नेहा और संगीता को जिज्ञासा हुई की मैं आखिर कैसे उस दिन इस छोटी सी कुर्सी पर बैठा था? "एक बार फिर, ज़रा बैठ कर दिखाइए न?" संगीता ने किसी नई-नवेली दुल्हन की तरह लजाते हुए कहा| संगीता के इस तरह लजाने से मैं हमेशा से ही फिसल जाय करता हूँ इसलिए संगीता की बात सुनते ही मैं फट से आयुष की कुर्सी पर बैठ गया| मेरे कूल्हों का कुछ हिस्सा ही कुर्सी पर था और बाकी के कूल्हे हवा में तैर रहे थे तथा मेरे दोनों पाँव इस कदर मुड़े हुए थे की मेरे दोनों घुटने मेरे सीने से चिपक गए थे! ये मेरे लिए सच में बड़ी ही कष्टदाई स्थिति थी मगर इसका लुत्फ़ माँ, संगीता और नेहा भरपूर उठा रहे थे! मुझे यूँ सिकुड़ा हुआ बैठा देखा तीनों को बहुत हँसी आ रही थी! एक बस मेरा बेटा था जिसे मेरी इस हालत पर तरस आ रहा था| आयुष ने मेरा हाथ पकड़ कर मुझे सहारा दे कर उठाना चाहा मगर वो छोटा सा बच्चा मुझे कैसे उठाता?! जैसे तैसे मैं उठा और संगीता को उल्हाना देते हुए बोला; "बजाए मुझे सहारा दे कर उठाने के तुम खी-खी कर खींसें निपोर रही थी! ये तो मेरा प्यारा बेटा (आयुष) है जिसे मेरी हालत पर तरस आ गया और उसने मुझे सहारा दे कर उठने में मदद की!" मेरी कही बात पर संगीता फिर से खी-खी करने लगी, वहीं माँ ने मेरी पीठ पर प्यार से थपकी मारते हुए कहा; " इतनी तकलीफ थी तो बैठा ही क्यों था?!" माँ, संगीता के बचाव में बोलीं| अब मैं माँ से कैसे कहता की मैं उस छोटी सी कुर्सी पर अपने बच्चों की मम्मी की ख़ुशी के लिए बैठा था!

खैर, हँसी-मज़ाक खत्म कर हम आयुष की क्लास टीचर के पास आयुष की रिपोर्ट-कार्ड लेने पहुँचे| आयुष की क्लास टीचर हमें पहले से ही जानती थीं क्योंकि वो आयुष के जन्मदिन पर हमारे घर आईं थीं| हमें देखते ही उन्होंने आयुष की तारीफ करनी शुरू कर दी; "आयुष बहुत होशियार बच्चा है! साल के बीच में उसका दाखिला हुआ तो मुझे लगा था की आयुष पीछे रह जायेगा मगर आयुष ने बड़ी मेहनत की| थोड़ी-बहुत शैतानी करता है मगर जब मैं पढ़ाते हुए कुछ भी पूछती हूँ तो सबसे पहले आयुष का हाथ ही खड़ा होता है|" आयुष की क्लास टीचर का ध्यान मेरी तरफ था और ऐसा लग रहा था जैसे वो आयुष के पढ़ाई में तेज़ होने का सारा श्रेय मुझे दे रही हों, जबकि असल में आयुष के पढ़ाई में तेज़ होने का सारा श्रेय तो संगीता को जाता था| "Mam इसका सारा श्रेय आयुष की मम्मी को जाता है! जब आयुष तीन साल का था तभी से उसकी मम्मी ने उसे ABCD पढ़ाना शुरू कर दिया था| साल के बीच में आयुष का दाखिला हुआ तो सही मगर आयुष की पढ़ाई की नीव संगीता द्वारा मज़बूत बनाई गई थी इसलिए आयुष पीछे नहीं रहा!" मैंने जब आयुष के पढ़ाई में तेज़ होने का सारा श्रेय संगीता को दिया तो संगीता शर्म से लालम-लाल हो रही थी! वो मन ही मन मुझे अपनी तारीफ करने से रोकना चाह रही थी मगर मैं उसकी सुने बिना ही उसकी तारीफ किये जा रहा था|

"नई क्लास में जा कर और मेहनत करनी है आयुष, ठीक है?" आयुष की टीचर ने आयुष से पुछा तो आयुष जोश से भरते हुए हाँ में सर हिलाने लगा| इतने में आयुष की नई क्लास टीचर आ गईं, आयुष की पुरानी क्लास टीचर ने नई क्लास टीचर से हमारा तार्रुफ़ कराते हुए कहा; "ये miss मालती हैं और ये ही आयुष की नई क्लास टीचर होंगी|" आयुष की पुरानी क्लास टीचर की बात सुन मैंने, माँ ने, नेहा ने और संगीता ने आयुष की नई क्लास टीचर को नमस्ते की तथा आयुष ने फट से अपनी नई क्लास टीचर के पाँव छु कर आशीर्वाद लिया| "बेटा, आपको आगे भी इसी तरह मेहनत और लगन से पढ़ाई करनी है!" Miss मालती ने आयुष के गाल सहलाते हुए कहा तथा आयुष ने भी अच्छे बच्चे की तरह अपना सर हाँ में हिलाया| "जब स्कूल खुलेंगे न तो मैं आपको क्लास का मॉनिटर बनाऊँगी, फिर आपकी जिम्मेदारी होगी की आप सभी बच्चों को शोर करने से रोकना|" Miss मालती ने आयुष को मॉनिटर बनाने की बात कही तो आयुष जोश से भर उठा और ख़ुशी-ख़ुशी अपना सर हाँ में हिलाने लगा| इधर नेहा Miss मालती की बात सुन धीरे से बुदबुदाते हुए बोली; "ये खुद इतनी शैतानी करता है, ये क्या क्लास का मॉनिटर बनेगा?!" नेहा की ये बात मेरे अलावा किसी ने नहीं सुनी थी इसलिए नेहा के इस व्यंग को सुन मैं बस मूछों में मसुकुरा कर रह गया|

आयुष की नई क्लास टीचर जी से मिल हम नेहा की क्लास की ओर बढ़ चले, रास्ते में आयुष की नई क्लास पड़ी तो मैंने सोचा की आयुष को उसकी नई क्लास भी दिखा दें| आयुष की इस नई क्लास में बच्चों के बैठने के लिए छोटी-छोटी लकड़ी की डेस्क थीं, इन छोटी डेस्कों को देख संगीता के दिल में शरारत सूझी ओर उसने शरारती मुस्कान लिए मुझे देखना शुरू कर दिया| दरअसल, संगीता चाहती थी की मैं इन छोटी डेस्कों पर संगीता को बैठ कर दिखाऊँ, इधर संगीता की इस शरारत भरी मुस्कान को देख मैं उसके मन के भाव समझ गया और एकदम से बोल पड़ा; "मुझे इस छोटी सी डेस्क पर बैठने को कहना भी मत, क्योंकि मैं उसमें घुस कर बैठ तो जाऊँगा मगर बाहर निकलने के लिए डेस्क आरी से कटवानी पड़ेगी!" मैंने हँसते हुए अपनी बात कही तो मेरी इस बात पर सभी ने जोर से ठहाका लगाया|

आयुष की नई क्लास से निकल हम सीधा नेहा की क्लास में पहुँचे| नेहा की क्लास का दृश्य आयुष की क्लास के दृश्य के मुकाबले थोड़ा फीका था! दरअसल आयुष की क्लास में सभी बच्चे पास हो गए थे इसलिए वहाँ का दृश्य उत्साह और खुशियों से भरा था, जबकि नेहा की क्लास में 1-2 विद्यार्थी ऐसे थे जो फ़ैल हो गए थे तथा उनके माता-पिता व अभिभावक उन पर गुस्सा कर रहे थे, वहीं कुछ बच्चे ऐसे भी थे जो पास तो हो गए थे परन्तु उनके नंबर कम आये थे इसलिए उनके माता-पिता व अभिभावक उन्हें कम नम्बर लाने के लिए डाँट रहे थे| नेहा और आयुष ने जब ये दृश्य देखा तो वो घबरा गए, अचानक ही उनके मन में अपने माता-पिता से डाँट खाने का भी बैठ गया| बच्चों को उनके इस डर से आज़ाद कराने तथा बाकी माता-पिता व अभिभावकों को थोड़ा सुनाने के लिए मैंने अपनी आवाज़ थोड़ी ऊँची करते हुए दोनों बच्चों को प्यार से समझाया; "बेटा आपके चाहे कितने भी नंबर आयें, हमारे लिए तो आप हमेशा ही अव्वल हो! जब आप बड़े हो जाओगे तो कोई नहीं पूछेगा की क्लास में आपके कितने नंबर आते हैं, सब देखेंगे तो बस आपके गुण और आपके मम्मी-पापा द्वारा सिखाई गई अच्छी बातें इसलिए घबराना बिलकुल नहीं है!" मेरी बात सुन बच्चे पुनः मुस्कुराने लगे थे, वहीं जो माता-पिता व अभिभावक अभी अपने बच्चों को डाँट रहे थे वो भी खामोश हो गए थे! जब मैंने नेहा की क्लास टीचर जी की तरफ देखा तो पाया की वो मेरी कही बात से बहुत प्रभावित हैं, उन्होंने हमें देखते ही ख़ुशी-ख़ुशी अपने पास बुलाया और नेहा की रिपोर्ट-कार्ड हमें देते हुए बोलीं; "नेहा ने तो कमाल ही कर दिया! जिस बच्ची ने सबसे अंत में दौड़ शुरू की थी उसी ने अव्वल आ कर नया इतिहास ही रच दिया!" नेहा की क्लास टीचर नेहा की तारीफ करते हुए बोलीं| अपनी तारीफ सुन मेरी प्यारी बिटिया शर्मा गई और सर झुका कर अपनी शर्म छुपानी चाही| "मेरी पोती बहुत मेहनती है, स्कूल से घर आते ही अपनी पढ़ाई में लग जाती थी| अपनी पढ़ाई कर के ये ही आयुष को पढ़ाती थी, नतीजा देख लीजिये की आयुष भी अव्वल आया है|" माँ ने नेहा की तारीफ की तथा उसे अपने से सटा लिया ताकि नेहा ज्यादा न शर्माए| "ये तो बात है, नेहा वाक़ई में बहुत मेहनती है! सिवाए पढ़ाई के मैंने नेहा को कभी कोई शरारत करते नहीं देखा| बाकी सभी टीचर्स भी नेहा की बड़ाई करते नहीं थकते|" नेहा की क्लास टीचर ने नेहा की तारीफों के पुल्ल बाँध दिए थे और अपनी बेटी की हो रही तारीफ सुन कर मेरा सीना गर्व से फूलता जा रहा था| "नेहा बेटा, आपकी फोर्थ (चौथी) क्लास की क्लास टीचर भी में ही हूँगी तो जैसे आप इस बार फर्स्ट आये हो वैसे ही आगे भी फर्स्ट ही आना है|" नेहा की क्लास टीचर जी ने नेहा के भीतर हमेशा फर्स्ट आने का जोश भर दिया था, वहीं मेरी बेटी ने अपनी क्लास टीचर की कही बात का मान रखते हुए बड़े गर्व से सर हाँ में हिलाते हुए कहा; "जी mam"!

"और एक खुशखबरी आपके लिए..." नेहा की क्लास टीचर हमसे ये कहते हुए अपने टेबल के दराज़ में कुछ ढूँढने लगीं| इधर हम चारों की उत्सुकता चरम पर थी की भला नेहा के प्रथम आने के साथ ही हमें अब और कौन सी झुशखबरी मिलने वाली है| तभी नेहा की क्लास टीचर ने अपने टेबल के दराज़ से क्लास-मॉनिटर का बैज निकाला और नेहा की कमीज पर PREFECT के बैज के नीचे लगाते हुए नेहा से बोलीं; "बेटा, अब से आप अपनी नई क्लास के मॉनिटर हो!" नेहा के मॉनिटर बनने पर सभी को बहुत ख़ुशी हुई और सबसे पहले आयुष ने नेहा को बधाई दी; "दीदी, आप भी मॉनिटर, मैं भी मॉनिटर!" आयुष का बचपना देख हम सभी हँस पड़े| नेहा ने सबसे पहले अपनी क्लास टीचर के पाँव छु कर आशीर्वाद लिया, फिर एक-एक कर अपनी दादी जी, मम्मी और मेरे पाँव छु कर आशीर्वाद लिया|

नेहा की क्लास टीचर जी से विदा ले कर हम बाहर निकल ही रहे थे की तभी दरवाजे पर नेहा की सहेली रेखा मिल गई| नेहा ने आज पहलीबार किसी बच्चे से हम सभी का तार्रुफ़ करवाया; "पापा जी, ये मेरी बेस्ट फ्रेंड है, रेखा|" हम सब ने रेखा से "hi-hello" की तथा उसके बाद रेखा की मम्मी से नमस्ते की| रेखा ने नेहा की कमीज पर लगा PREFECT और क्लास मॉनिटर का बैज देख लिया था इसलिए रेखा ने नेहा को बधाई दी| रेखा की मम्मी ने भी नेहा को आशीर्वाद देते हुए उसे बधाई दी| रेखा और उनकी मम्मी से विदा ले कर हम बाहर आये तो नेहा ने अपनी नई क्लास देखने की जिद्द की| हम सभी नेहा की नई क्लास में आये तो नेहा ने फौरन सबसे आगे की डेस्क पर हाथ रख उस पर अपना कब्ज़ा स्थापित कर दिया; "दादी जी, मैं न इसी डेस्क पर बैठूँगी!" नेहा क्लास में सबसे आगे बैठेगी ये सुन कर माँ को बड़ी ख़ुशी हुई| नेहा के क्लास में सबसे आगे बैठने को ले कर माँ को मेरे स्कूल के दिन याद आ गए; "ये देख मेरी पोती को, कैसे आगे बैठने के लिए उत्साहित है और एक तू था, तुझे कितना आगे बैठने को कहो मगर तू हमेशा पीछे ही बैठता था!" माँ ने प्यार से मेरे कान पकड़ते हुए बच्चों को मेरे स्कूल के दिनों की बात बताई| वहीं बच्चों ने जब अपनी दादी जी को अपने पापा जी के कान पकड़ते हुए देखा तो दोनों खी-खी कर हँसने लगे| "आह....माँ...माँ...मैं आगे इसलिए नहीं बैठता था क्योंकि टीचर फिर सारे सवाल-जवाब मुझसे करती! अब मैं ठहरा एक औसत छात्र तो मुझे सारे जवाब नहीं पता होते थे, जवाब नहीं देने पर मार पड़ती इसी डर से मैं आगे नहीं बैठता था!" मैंने झूठ-मूठ का दर्द से करहाने का नाटक करते हुए अपने आगे न बैठने का कारण बताया| बच्चों को मेरे इस झूठे अभिनय पर बहुत मज़ा आ रहा था और वो खुलकर कहकहा लगा रहे थे| "लेकिन मेरे पोता-पोती बहुत होशियार हैं, वो हमेशा आगे ही बैठेंगे! समझे बच्चों?" माँ ने मेरे कान पकड़े हुए ही दोनों बच्चों को अपनी बात समझा दी तथा दोनों बच्चों ने भी सर एक साथ हाँ में हिलाते हुए हामी भरी, तब कहीं जा कर माँ ने मेरा कान छोड़ा! हमारे परिवार की इस छोटी सी मस्ती को टीचरों समेत बहुत से लोगों ने देखा और वे मुस्कुराये बिना नहीं रह पाए|

अब बच्चों की रिपोर्ट-कार्ड मिल चुकी थी तो अब बस सबका मुँह मीठा करना रह गया था, परन्तु संगीता को मुँह मीठा करने के बजाए मुँह नमकीन करना था; "आयुष बेटा, तूने तो कहा था की तू मुझे छोले-कुलचे खिलायेगा?" संगीता ने आयुष से पुछा तो आयुष ने ख़ुशी से कूदना शुरू कर दिया| आयुष का यूँ कुछ खाने के लिए ख़ुशी से कूदना और संगीता के बचपने पर हम माँ-बेटे (मैं और माँ) हँस पड़े| उधर आयुष ने अपनी दादी जी और अपनी मम्मी का हाथ पकड़ा और उन्हें कैंटीन की तरफ खींचने लगा| कैंटीन पहुँच कर मैं, माँ और संगीता सीढ़ियों पर बैठ गए तथा दोनों बच्चों ने छोले कुलचे लाने की जिम्मेदारी ली| मुझसे पैसे ले कर दोनों बच्चे अपने दोनों हाथों में छोले-कुलचों के दोने ले कर आये| माँ का मन खाने का नहीं था मगर नेहा ने उन्हें अपने हाथ से छोले कुलचे खिलाये| वहीं आयुष अपनी मम्मी को छोले-कुलचों के छोटे-छोटे कौर खिलाने लगा|

छोले-कुलचे खा कर हम स्कूल से निकल ही रहे थे की हमें रास्ते में एक notice board दिखा जहाँ आयुष की बनाई हुई पेंटिंग लगी थी| हम सब खड़े हो कर वही पेंटिंग देखने लगे| आयुष को पेंटिंग बनाने के लिए 'प्रदूषण' विषय मिला था और मेरे प्यारे बेटे ने अपनी पसंदीदा hotwheels की गाड़ियों की नकल अपनी पेंटिंग में बनाने की कोशिश की थी| आयुष ने दो सड़क बनाईं थीं, जिनमें आयुष ने ढेर साड़ी गाड़ियों के चित्र बनाये थे| आसमान में आयुष ने थोड़ा काला रंग पोता था जो की गाड़ियों के धुएँ के कारण पैदा हुआ प्रदूषण दर्शाता था| हम सब ने जब आयुष की पेंटिंग देखि तो सब ने आयुष की तारीफ की| मुझे गाड़ियों के रंग देख कर आयुष की hotwheels वाली गाड़ियाँ याद आ गईं इसलिए मैंने आयुष को पेंटिंग में बनी गाड़ियाँ दिखाते हुए आयुष की खिलौने वाले गाड़ियों के मारे में पूछना शुरू कर दिया तथा आयुष ने एक-एक कर मुझे उन सभी गाड़ियों के बारे में बताया जो उसने अपनी पेंटिंग में बनाई थीं|

आयुष की पेंटिंग देख हम स्कूल से निकलने वाले थे की तभी हमें प्रिंसिपल मैडम मिल गईं और उन्होंने दोनों बच्चों की जम कर तारीफ की| " मानु बेटा, मैं चाहती हूँ की नेहा स्कूल में होने वाले debate competition में हिस्सा ले, थोड़ी extra curricular activities में हिस्सा लेने से नेहा में self confidence जागेगा|" प्रिंसिपल मैडम की बात सुन मैंने नेहा की ओर देखा तो नेहा ने मुस्कुराते हुए अपना सर हाँ में हिलाना शुरू कर दिया था| "जी जर्रूर mam" मैंने नेहा की ओर से सहमति देते हुए कहा| नेहा को शब्बाशी दे और आयुष के सर पर हाथ रख आशीर्वाद दे प्रिंसिपल मैडम चली गईं, इधर हम सब भी अपनी गाडी में बैठ ख़ुशी-ख़ुशी चल दिए|

[color=rgb(163,]जारी रहेगा भाग - 6 में...[/color]
 

[color=rgb(251,]इकत्तीसवाँ अध्याय: घर संसार[/color]
[color=rgb(61,]भाग - 6[/color]


[color=rgb(40,]अब तक अपने पढ़ा:[/color]

आयुष की पेंटिंग देख हम स्कूल से निकलने वाले थे की तभी हमें प्रिंसिपल मैडम मिल गईं और उन्होंने दोनों बच्चों की जम कर तारीफ की| " मानु बेटा, मैं चाहती हूँ की नेहा स्कूल में होने वाले debate competition में हिस्सा ले, थोड़ी extra curricular activities में हिस्सा लेने से नेहा में self confidence जागेगा|" प्रिंसिपल मैडम की बात सुन मैंने नेहा की ओर देखा तो नेहा ने मुस्कुराते हुए अपना सर हाँ में हिलाना शुरू कर दिया था| "जी जर्रूर mam" मैंने नेहा की ओर से सहमति देते हुए कहा| नेहा को शब्बाशी दे और आयुष के सर पर हाथ रख आशीर्वाद दे प्रिंसिपल मैडम चली गईं, इधर हम सब भी अपनी गाडी में बैठ ख़ुशी-ख़ुशी चल दिए|

[color=rgb(97,]अब आगे:[/color]

बच्चों
के स्कूल का रिजल्ट हमारी उम्मीद से कई गुना अच्छा आया था इसलिए अब जश्न मनाने की बारी थी! "तो बच्चों, रिजल्ट तो आपका बहुत अच्छा आ गया अब आगे क्या प्लान है?" मैंने बच्चों से उनका आज का मस्ती भरा प्लान जानना चाहा मगर मेरे बच्चे इतने सीधे थे की उन्हें आज की ख़ुशी कैसे मनानी है ये पता ही नहीं था! दोनों बच्चे हैरान हो कर मुझे ही देख रहे थे की मैं ही कोई प्लान बनाऊँ|

उस वक़्त समय हुआ था सुबह के 11 और इतनी सुबह हम लंच पर तो जा नहीं सकते थे इसलिए मैंने पिक्चर जाने का प्लान बनाया; "ऐसा करते हैं की हम सब पहले पिक्चर देखने चलते हैं और फिर लंच कर के घर चलते हैं!" मेरा प्लान सुन दोनों बच्चों ने ख़ुशी से चहकते हुए अपनी स्वीकृति दे दी! परन्तु माँ के मन में कुछ और ही विचार था; "नहीं बेटा, पहले हम सब मंदिर जाएंगे और भगवान जी से प्रार्थना कर उन्हें आज के दिन हमें इतनी खुशियाँ देने के लिए शुक्रिया कहेंगे| फिर तुम सब मुझे घर छोड़ देना और अपनी पिक्चर देखने चले जाना!" माँ की आधी बात तो हमें स्वीकार थी की हमें पहले मंदिर जाना चाहिए परन्तु उन्हें अकेले घर छोड़ने की बात पर हम चारों (मैं, संगीता, नेहा और आयुष) में से कोई भी राज़ी नहीं हुआ| "दादी जी, आप भी चलो न पिक्चर?!" नेहा ने अपनी प्यारी सी आवाज में अपनी दादी जी से कहा| "मैं, दादी जी के बिना कहीं नहीं जाऊँगा!" आयुष एकदम से मुँह फुलाते हुए पीछे की सीट से उतर कर आगे की सीट पर आ गया तथा अपनी दादी जी की गोदी में चढ़ उनसे लिपट गया| माँ ने दोनों बच्चों को प्यार से समझाने की कोशिश की मगर बच्चों के साथ-साथ मैं और संगीता भी बच्चे बन कर माँ से बोले; "चलो न माँ, आज बाहर से खाना खाते हैं!" मैं आयुष की तरह तुतलाते हुए बोला| मेरी ही देखा-देखि संगीता भी बच्चों की तरह तुतलाते हुए बोली; "माँ, आप नहीं जाओगे तो कोई नहीं जाएगा!" संगीता की बात में मैं, आयुष और नेहा हाँ में हाँ मिलाते हुए बोले; "हम नहीं जायेंगे...हम नहीं जायेंगे!"

आखिर माँ हम चारों बच्चों के मोह के आगे हार गईं और हम चारों के आगे हाथ जोड़ते हुए बोली; "ठीक है बाबा, पहले मंदिर चलते हैं फिर कुछ बढ़िया सा खाना खाने चलेंगे!" माँ के हमारी बात मानते ही हम चारों ने जोर से जीत की हुँकार भरी और मैंने गाडी सीधा मंदिर की ओर मोड़ दी! मंदिर पहुँचने तक बच्चों ने खाने में अपनी-अपनी फरमाइशें अपनी दादी जी को बता दी थीं| अब मुझे और संगीता को बच्चों की बातों में रस लेना होता था इसलिए हम दोनों मियाँ-बीवी भी बच्चों की तरह माँ से खाने-पीने की अपनी-अपनी फरमाइशें करने लगे| माँ हम चारों के बचपने को देख हँस पड़ीं और बोलीं; "कभी-कभी लगता है की मेरे घर में दो नहीं चार बच्चे हैं!" माँ की बात सही भी थी, हम दोनों पति-पत्नी कभी-कभी अपने बच्चों की तरह बन जाते थे!

खैर, हम सभी मंदिर पहुँचे और सभी ने हाथ जोड़कर भगवान जी से हमारा आज का दिन खुशियों से भरने के लिए शुक्रिया अदा किया| पंडित जी से मिला मिश्री रुपी प्रसाद माँ ने एक-एक कर हम चारों को खिलाया तथा हम सभी के मस्तक चूम कर हमें आशीर्वाद दिया| घड़ी में बज गए थे 12 और अब भूख लग आई थी तथा दोनों बच्चों ने अपने छोटे-छोटे पेट पर हाथ फेरते हुए भूख लगने का इशारा करते हुए मुझे देखना शुरू कर दिया था| बच्चों का इशारा समझ मैंने दोनों बच्चों का हाथ पकड़ कर गाडी तक दौड़ लगाई, जबकि माँ और संगीता पीछे आराम से आ रहे थे|

हम सब पहुँचे एक rooftop restaurant में, ये हम सभी के लिए पहला मौका था किसी open rooftop restaurant में बैठ कर खाना खाने का इसलिए हम सभी थोड़ा उत्साहित थे| मार्च का महीना था और सर्दी लगभग खत्म ही हो चुकी थी, हवा में थोड़ी सी ठंडक थी इसलिए धुप में बैठ कर खाने का मज़ा ही कुछ और था| हम पाँचों ने एक बड़े से फॅमिली टेबल पर कब्ज़ा किया और वेटर ने आ कर मुझे, माँ और संगीता को menu की तीन किताबें दी| एक किताब starters की थी, एक किताब main course की और एक किताब desert की| अब माँ ने आज तक menu देख कर order नहीं किया, उनका कहना होता था की जो खाना है मँगा लो इसलिए मैंने तीनों किताबें उठा कर दोनों बच्चों को देते हुए कहा; "आज आप दोनों बच्चों का दिन है, आपको जो खाना है वो मँगा लो! लेकिन एक बात का ध्यान रहे, ज़रा सा भी खाना बर्बाद नहीं होना चाहिए|" मैंने प्यार से बच्चों को आगाह करते हुए खाना आर्डर करने की जिम्मेदारी दी|

बच्चों को शुरू में तो डर लग रहा था की वो क्या और कैसे आर्डर करें क्योंकि आजतक बच्चों को ऐसी जिम्मेदारी कभी नहीं सौंपी गई थी, लेकिन फिर नेहा ने जिम्मा सँभाला और सबसे पहले starter वाली menu की किताब उठाई| फिर शुरू हुई दोनों भाई-बहन की जुगलबंदी! दोनों बच्चों ने एक-एक dish का नाम और उस dish को बनाने में क्या-क्या ingredients लगे हैं वो समझने लगे| कुछ dish की तस्वीर देख बच्चे समझ जाते थे परन्तु काफी चीजें बच्चों को समझ नहीं आ रहीं थीं इसलिए बच्चों ने मुझसे पूछना शुरू किया;

नेहा: पापा जी ये dumplings क्या होते हैं?

मैं: बेटा, momos को ही dumplings कहते हैं|

मैंने नेहा को समझाया मगर मेरे बच्चों ने आजतक momos कभी खाये ही नहीं थे इसलिए वो मेरी बात नहीं समझे! मैंने नेहा को dumplings आर्डर करने का इशारा किया तो नेहा ने वेटर को पनीर dumplings लिखवा दिए| तभी आयुष की नज़र चाऊमीन की तस्वीर पर गई और आयुष के चेहरे की मुस्कान सौ गुनी हो गई! नेहा अपने छोटे भाई की ये मुस्कान देख कर समझ गई थी की वो क्या चाहता है इसलिए नेहा ने बड़ी बहन होते हुए आयुष को समझाया;

नेहा: चाऊमीन तो तू कभी भी खा सकता है, आज हम कुछ नया खाते हैं!

नेहा ने आयुष के भीतर कुछ नया खाना खाने की उत्सुकता जगा दी थी|

दोनों बच्चों ने मिलकर एक से बढ़कर एक dish आर्डर की, मतलब की starters से ले कर main course तथा desert भी! सबसे पहले आये dumplings और उन्हें देख माँ का मुँह बन गया क्योंकि 200/- रुपये में बस 6 पीस आये थे! मैंने सबसे पहले माँ को एक पीस उठा कर दिया, माँ ने बहुत मना किया मगर बच्चों ने "please...please" की जिद्द की तो माँ ने एक पीस ले लिया| फिर मैंने एक-एक पीस संगीता, बच्चों तथा अपने लिए परोसा| सबसे पहले माँ ने dumplings का पीस चटनी में डुबो कर खाया, मुझे लगा था की माँ को स्वाद खराब लगेगा मगर माँ को तो स्वाद अच्छा लगा था, तभी तो माँ ने बच्चों की तरह ख़ुशी से अपना सर दाएँ-बाएँ हिलाना शुरू कर दिया! माँ का ये बचपना देख हम सभी को हँसी आ गई! माँ के dumplings खाने के बाद, हम सभी ने dumplings खाये और हमें भी ये dumplings स्वाद लगे|

Starters के बाद बारी आई main course खाने की, वेटर ने एक-एक कर खाना टेबल पर रखना शुरू किया| सबसे पहले आई दाल महारानी, फिर vegetable जल फ़्रेज़ी, पुलाओ, सलाद, रायता और रुमाली रोटियाँ आईं| सारा खाना देख माँ बहुत प्रसन्न हुईं और अपने पोता-पोती की बड़ाई करते हुए बोलीं; "आज तो तुम दोनों ने बड़ा स्वाद खाना मँगाया, इतना स्वाद खाना तो तुम्हारे पापा ने भी नहीं खिलाया मुझे!" अपनी दादी जी से तारीफ सुन दोनों बच्चे बहुत खुश हुए और उन्होंने अपने हाथों से पानी दादी जी को खाना खिलाया| अब चूँकि बच्चों का ध्यान अपनी दादी जी को खिलाने में लगा था तो मैंने इस मौके का फायदा उठा कर संगीता को एक कौर खिलाना चाहा परन्तु मेरी शर्म की गठरी पत्नी शर्माने लगी और अपना सर न में हिलाने लगी! "मेला बाबू, मेले हाथ से खाना नहीं खायेगा?!" मैंने खुसफुसा कर तुतलाते हुए कहा तो संगीता का दिल एकदम से पिघल गया और उसने झट से अपना मुख खोल दिया| पहला कौर खाते ही संगीता के चेहरे पर स्वाद खाना खाने की मुस्कान आ गई और वो खुसफुसाती हुए बोली; "आपके हाथ से खाना खाने से तो खाने का स्वाद और बढ़ गया!" संगीता का मकसद यहाँ मुझे प्रेम करने एक लिए उकसाना था, वहीं संगीता की मंशा से अनजान मैं उसकी बात का जवाब देते हुए बोला; "जब मेरा हाथ लगने से खाना इतना ही स्वाद बन जाता है तो फिर मेरे हाथ से खाने से शर्माती क्यों हो?" मेरे पूछे इस सवाल के जवाब में संगीता अपना मुँह नीचे की ओर कर धीमे से मुस्कुराने लगी! मैं संगीता की मुस्कान का कारण समझ रहा था, दरअसल उसे मुझे तड़पाने में सुख मिलता था! मेरे मुँह से अपने लिए 'बाबू' शब्द सुन्ना या मेरा तुतला कर बात करना, संगीता को बहुत भाता था तभी तो वो ऐसे मौके ढूँढती थी की मुझे उसे मनाने के लिए ये हतकंडे अपनाने पड़ें!

उधर बच्चों ने अपनी दादी जी को अपने हाथों से पेट भरकर खिला दिया था, तभी उनकी नज़र अपने मम्मी-पापा पर पड़ी| हम दोनों (मुझे और संगीता) को खुसफुसा कर बातें करते देख बच्चों का मन मेरे हाथ से खाना खाने को करने लगा इसलिए दोनों बच्चे मेरे पास आ कर खड़े हो गए ताकि मैं उन्हें खिलाऊँ! बच्चे जब भी ऐसे अपना मुँह खोल कर मेरे खाना खिलाने की परतीक्षा करते तो मुझे उन पर बहुत लाड आता! अपने बच्चों के मोह से बँध कर मेरा अपनी पत्नी पर से ध्यान हट गया और मैं अपने प्यारे-प्यारे बच्चों को खाना खिलाने लगा, शुक्र है की संगीता ने इस बात का बुरा नहीं लगाया वरना उसे मनाना मेरे लिए नामुमकिन था!

खाना खाने के बाद आई desert खाने की बारी और desert में बच्चों ने fruit sunday, मूँगदाल हलवा मंगवाया था| अब माँ को मीठा पसंद नहीं था इसलिए उन्होंने बच्चों की ख़ुशी के लिए fruit sunday में से चुन-चुन कर एक-दो fruit खा लिए| बाकी बचा मूँगदाल हलवा तो वो माँ को पसंद नहीं था! बचे हम चार तो हमने पेट भरकर desert खाया और जो चीज़ हमें सबसे ज्यादा स्वाद लगी वो थी मूँगदाल हलवा! "बेटा, ज्यादा मूँगदाल हलवा न खा लेना! मूँगदाल हलवे की तासीर गर्म होती है, ज्यादा खा लोगे तो पेट दुखेगा!" माँ हम सभी को प्यार से आगाह करते हुए बोलीं| माँ की बात को मद्देनज़र रखते हुए हमने थोड़ा ही हलवा खाया वरना हम तो एक और प्लेट हलवा मँगवाने वाले थे!

बहरहाल, खाना खा कर हम घर लौटे और हमें पता चला की गली भर में दोनों बच्चों के अव्वल आने की खबर फ़ैल चुकी है! दरअसल, पिताजी के मित्र और अक्षय के दादा जी यानी रमेश अंकल जी ने पूरी गली में बच्चों के अव्वल आने का ढिंढोरा पीट दिया था! अभी हम घर पहुँचे ही थे की पीछे से रमेश अंकल अपने सारे परिवार के साथ घर आ पहुँचे और बच्चों को अव्वल आने के लिए बधाई देने लगे| मैं फौरन बाहर से मिठाई का डिब्बा खरीद लाया और सभी का मुँह-मीठा करवाया| हम सभी बैठक में बैठ कर बात कर रहे थे की तभी रमेश अंकल जी ने पिताजी का जिक्र किया;

रमेश: अरे मुन्ना, तोहार पिताजी कहाँ हैं? उनसे तनिक बात कराओ ताकि हम उन्हें भी बधाई दे दी!

पिताजी का जिक्र होते ही मेरी और माँ की ख़ुशी भाग गई! सच मैं रमेश अंकल जी को बता नहीं सकता था इसलिए मैंने उन्हें झूठ कहने का फैसला किया| परन्तु मैं झूठ कहूँ उससे पहले ही माँ ने बात सँभाली और बोलीं;

माँ: वो क्या है न भाईसाहब, चन्दर की अचानक मौत होने के कारण मानु के पिताजी कुछ दिनों के लिए अपने भैया-भाभी के पास रुक गए हैं| आज सुबह ही हमारी बात हुई थी उनसे, वो बच्चों के रिजल्ट से बहुत खुश थे और जल्दी आने की कह रहे थे|

माँ ने बात सँभाल ली थी, परन्तु माँ के इस तरह परिवार की इज्जत बचाने के लिए झूठ बोलने से मेरे मन में एक टीस उठ रही थी! मैं नहीं चाहता था की कभी मुझे या मेरे परिवार को समाज में किसी तरह का झूठ बोलना पड़े!

इधर, मेरा चेहरा फीका पड़ता देख संगीता ने एकदम से बात का मुख मोड़ दिया और नेहा को भीतर से आवाज दे कर बाहर बुलाया;

संगीता: नेहा...आयुष... बेटा बाहर आओ!

बच्चों को आवाज़ दे संगीता, भाभी (रमेश अंकल की बहु) से बोली;

संगीता: क्या बताऊँ भाभी, ये दोनों बच्चे बड़े शर्मीले हैं!

भाभी: गुणवान बच्चे ऐसे ही होते हैं! जिनके गुण नहीं होते वो बेशर्म होते हैं, जैसे की ये अक्षय!

भाभी ने जब अक्षय में दोष निकाला तो संगीता ने अक्षय का पक्ष लिया और बोली;

संगीता: ऐसा न कहो भाभी!

इतने में आयुष और नेहा फुदकते हुए बाहर आ गए|

संगीता: नेहा, चल सब के लिए चाय बना और आयुष तू अक्षय भैया के साथ जा कर खेल|

संगीता ने दोनों बच्चों को हुक्म देते हुए कहा| अपनी मम्मी का हुक्म सुन नेहा फ़ट से रसोई में घुस गई, वहीं आयुष और अक्षय कमरे में खेलने चले गए| हमारे बच्चे बहुत आज्ञाकारी थे इसलिए ये नज़ारा देख रमेश अंकल, राम अवध भैया और भाभी को बहुत हैरानी हो रही थी|

कुछ समय बाद नेहा ने चाय बना ली थी इसलिए उसने आवाज़ दे कर आयुष को अपने पास बुलाया तथा सबके लिए चाय छान कर आयुष को ले जाने को दी| आयुष बड़ी सावधानी से, छोटे-छोटे कदमों से चाय की ट्रे पकड़े हुए बैठक में आया| मैंने आगे बढ़ कर आयुष के हाथ से ट्रे ली और सभी को चाय के कप उठा कर दिए| पीछे से नेहा भी दो कप चाय और नमकीन ले कर आ गई| रमेश अंकल जी ने दोनों बच्चों को अपने पास बुलाया और उनकी तारीफ करने लगे की बच्चे कितने आज्ञाकारी और समझदार हैं|

आस-पड़ोस के जितने भी लोग हमें जानते थे वो सभी हमें बधाई तथा बच्चों को आशीर्वाद देने आने लगे थे| जो बात मुझे खटक रही थी वो थी की बच्चों को आशीर्वाद दे सभी पिताजी की गैरमौजूदगी पर सवाल उठा रहे थे और मेरी माँ को घर की इज्जत बचाने के लिए बार-बार झूठ बोलना पड़ रहा था| एक पल के लिए मन कर रहा था की मैं सब सच बोल दूँ की मेरे पिताजी ने हम सभी को छोड़कर अपने भैया-भाभी को चुना है, परन्तु मेरे ऐसा कहने पर बात खुलती और फिर मेरे हाथों खून होने की बात सामने आती! तब कोई ये नहीं समझता की वो कैसे हालात थे जब मेरे हाथों गोली चली थी, सबके लिए मैं ही दोषी होता तथा मेरे ही कारण मेरे परिवार की बदनामी होती, बस यही सब सोचकर मैं खामोश था!

रात हुई तो खाना खा कर दोनों बच्चे टी.वी. देखने में व्यस्त थे| मुझे अपनी माँ से कुछ बात करनी थी इसलिए मैं, माँ के कमरे में आ गया तथा मेरे पीछे-पीछे ही संगीता भी आ गई| आस-पड़ोसियों के पिताजी को ले कर पूछे गए सवाल से मेरे भीतर जो आक्रोश भरा हुआ था उसे माँ ने महसूस कर लिए था| इससे पहले की मैं कोई सवाल करूँ, माँ ही मुझे प्यार से समझाते हुए बोलीं;

माँ: बेटा, मैं तेरे दिल में उठी टीस को महसूस कर सकती हूँ| लेकिन...

माँ आगे कुछ कहतीं उससे पहले ही मेरे मन में पैदा हुए सवाल मैंने माँ की बात काटते हुए पूछ लिए;

मैं: लेकिन हम कबतक यूँ झूठ बोलते रहेंगे? और क्यों झूठ बोलें हम? आखिर ऐसा क्या गलत किया है हमने जो हम ही को झूठ बोलना पड़ रहा है? छोड़ा पिताजी ने हमारे परिवार को और झूठ बोल कर सफाई हम दे रहे हैं?!

मेरे सवाल सुन माँ ने मुझे वो सच बताया जिससे मैं आज तक अनजान था!

माँ: बेटा, हर परिवार की पहचान उसके कर्ता यानी घर के सबसे बड़े पुरुष से होती है| हमारे इस परिवार की पहचान हमेशा ही तेरे पिताजी के नाम से होगी और जैसे आज आस-पड़ोस वाले सवाल पूछ रहे थे वैसे ही वो आगे भी सवाल पूछते रहेंगे! जो झूठ मैंने इस समय रचा है, उसी झूठ को आगे भी हमको दोहराना होगा क्योंकि अगर तूने सच बता दिया तो हमारी बहुत बदनामी होगी!

माँ की कही इस बात ने मेरे दिल में झुँझलाहट भर दी थी और मेरा चेहरा एकदम से फीका पड़ गया था!

मैं: मैंने ऐसा क्या काम किया है जो हमारी बदनामी होगी? क्या उस हरामजादे से अपनी और अपनी पत्नी की जान की रक्षा करना गलत था....पाप था?

मैं झुँझलाते हुए बोला|

माँ: तूने कुछ गलत नहीं किया बेटा! लेकिन ये दुनिया तुझे तेरे कर्मों से नहीं, बल्कि तेरे बाप के कर्मों से तुझे आंकेगी और तुझे तथा तेरे परिवार को ताने मारेगी!

माँ की कही ये बात सुन मेरी भवें तन गईं! मैं, माँ की कही बात का सही मतलब नहीं समझ पा रहा था इसलिए माँ ने आज बरसों पुराना सच कह डाला;

माँ: तेरे पिताजी जब शहर आये तो वो बड़े सीधे-साधे थे, उन्हें कोई काम-धाम नहीं आता था इसलिए जब कहीं काम नहीं मिला तो उन्होंने मजदूरी शुरू कर दी| तेरे पिताजी जिस जगह मजदूरी करते थे वहाँ का सुपरवाइजर तेरे पिताजी से बहुत चिढ़ता था और आये दिन उन्हें हर छोटी बात पर झाड़ता रहता था| शुरू-शुरू में तेरे पिताजी सब सहते रहे लेकिन फिर एक दिन उनके सब्र की भी इन्तहा हो गई|

रमेश भाईसाहब से तेरे पिताजी की जान पहचान बन गई थी और ऐसे ही एक दिन तेरे पिताजी रमेश भाईसाहब के घर खाना खाने आये थे| उन्हें (पिताजी को) नहीं पता था की इसी गली में उस सुपरवाइजर का घर है| खाना खा कर निकलते हुए तेरे पिताजी का सामना उस सुपरवाइजर से हो गया| वो सुपरवाइजर नशे में धुत्त था इसलिए उसने तेरे पिताजी को देखते ही गाली बकनी शुरू कर दी! तेरे पिताजी का खून खौल गया और उन्होंने उस सुपरवाइजर को बहुत मारा! तेरे पिताजी के गुस्से को देखते हुए किसी की हिम्मत नहीं पड़ी की कोई बीच-बचाव करे इसलिए सब ख़ामोशी से सर झुकाये देखते रहे|

हालात बहुत गर्म हो गए थे और पुलिस केस बन गया था और तेरे पिताजी इसमें न फँस जाएँ इसलिए रमेश भाईसाहब ने जबरद्स्ती तेरे पिताजी को अम्बाला भेज दिया| 6-7 महीने तक हालात गर्मागर्मी वाले थे इसलिए तेरे पिताजी अम्बाला में ही एक जगह मजदूरी करने लगे| जब हालात ठंडे हुए तो तेरे पिताजी लगभग 1 साल बाद दिल्ली लौट आये और अम्बाला में रहते हुए जो उन्होंने काम सीखा था उसी की बदौलत उन्होंने अपना नया काम शुरू किया| फिर ऐसे ही एक दिन तेरे पिताजी रमेश भाईसाहब से मिलने आये, इस गली में रहने वालों ने जब तेरे पिताजी को देखा तो उन सभी के दिल में जो तेरे पिताजी के प्रति डर था वो फिर से ताज़ा हो गया| उसपर तेरे पिताजी वैसे ही अब लड़ाके हो गए थे, उन्हें जैसे किसी का भय था ही नहीं! सभी उनसे डरते-घबराते थे, तेरे पिताजी ने भी अपना रुबाब दिखाते हुए सभी से काम निकलवाना शुरू कर दिया| तेरे पिताजी ने कई लोगों से पंगा लिया और कितनी ही लड़ाइयाँ की, खौफ ऐसा था तेरे पिताजी का की क्या कहूँ?!

माँ की बातें सुन मुझे यक़ीन नहीं हो रहा था की वो मेरे उन्हीं पिताजी की बात कर रहीं हैं जिन्हें मैंने आजतक सबके सामने हलीमी से पेश आते हुए देखा है! मेरे मन में जिज्ञासा पैदा हुई की आखिर इतने हिंसक प्रवित्ति के मेरे पिताजी एकदम से 'गौ' समान कैसे बन गये? उधर माँ ने मेरी ये जिज्ञासा पढ़ ली थी इसलिए वो मेरी जिज्ञासा शांत करते हुए बोलीं;

माँ: मैं जिस घर में आया का काम करती थी, उसी घर में रंग-रोगन का ठेका तेरे पिताजी ने उठाया था और तभी हमारी पहली मुलाक़ात हुई थी|

माँ ने कुछ इस तरह से अपने और पिताजी की पहली भेंट का जिक्र किया, जिसे सुन मैं और संगीता एक दूसरे को देखने लगे| अभी तक माँ ने जो पिताजी के जिस हिंसक प्रवित्ति का जिक्र किया था उसे मैं भूल चूका था तथा बड़े गौर से अपने माँ-पिताजी की प्रेम कहानी को सुनने लगा|

माँ: तेरे पिताजी ठेकेदार होते हुए भी लेबर के साथ काम करते थे और बहुत डाँट-डपट के काम करवाते थे| मेरा काम उन्हें और उनकी लेबर को चाय-पानी देना होता था इसलिए धीरे-धीरे हम दोनों की बातें शुरू हुईं|

ये कहते हुए मेरी माँ उन प्यार भरे लम्हों को याद करने लगीं तथा उनके चेहरे पर प्यारभरी मुस्कान आ गई| माँ के चेहरे पर आई ये मुस्कान देख मुझे और संगीता को बहुत सुकून मिल रहा था| लेकिन फिर मेरे माँ-पिताजी की प्रेम कहानी में एक कष्टपूर्ण मोड़ आ गया;

माँ: जब रंग-रोगन का काम पूरा हुआ और तेरे पिताजी ने मालिक से पैसे माँगें तो मालिक ने पैसे देने में बड़ी आनाकानी की| लगभग 1 हफ्ते तक मालिक ने तेरे पिताजी को पैसों के लिए दौड़ाया, जिससे तेरे पिताजी को बहुत गुस्सा आया| ऐसे ही एक दिन, तड़के सुबह तेरे पिताजी जहाँ मैं काम करती थी वहाँ आ धमके और अपनी मेहनत के पैसे माँगने लगे| बात काफी गरमा-गर्मी पर पहुँच गई और तेरे पिताजी मालिक से झगड़ पड़े| तब उस मालिक ने मेरे और तेरे पिताजी के बारे में कुछ गंदी बात कह दी, जिसके जवाब में तेरे पिताजी ने आव देखा न ताव सीधा मालिक के गाल पर एक चाँटा जड़ दिया! "हमने प्यार किया है और आज ही शादी भी करेंगे! उसके बाद मेरी बीवी कभी किसी के घर में काम नहीं करेगी! और ये भी सुन ले, अगर आज शाम तक मेरे पैसे मुझे नहीं मिले तो तुझे और तेरे इस घर, दोनों को जला कर राख कर दूँगा! तू जानता नहीं मुझे, गोंडा से हूँ मैं और तुझे ज़मीन में गाड़ने में 1 बार भी नहीं सोचूँगा मैं!" तेरे पिताजी ने उस मालिक को धमकाया और मेरा हाथ पकड़ कर मुझे अपने साथ ले कर चल दिए|

मैं अपना घर छोड़ कर आई थी और दिल्ली में मेरा कोई अपना नहीं था जिसके पास मैं रह सकती थी! मैं तो उसी मालिक के यहाँ आया का काम करती और वहीं रहती थी, लेकिन जिस तरह उस मालिक ने मेरे चरित्र पर कीचड़ उछाला था उसके बाद तो मैं वहाँ एक क्षण नहीं रह सकती थी! वहीं दूसरी तरफ तेरे पिताजी ने मेरे मान-सम्मान की रक्षा की थी इसलिए उनपर विश्वास कर मैं उनके साथ चल पड़ी| हम दोनों सीधा मंदिर पहुँचे लेकिन इससे पहले की हम मंदिर में प्रवेश करें, मैंने तेरे पिताजी के सामने शादी करने के लिए एक शर्त रखी! "मैं एक शर्त पर आपसे शादी करुँगी, शादी के बाद आपको अपना ये लड़ाई-झगड़े वाला रवैया बदलना होगा! हमारी शादी के बाद आप के ऊपर जिम्मेदारियाँ बढ़ जाएँगी और ऐसे में अगर आपको कुछ हो गया तो मैं क्या करूँगी? यहाँ कौन है मेरा जिससे मैं मदद माँगूँगी इसलिए आपको मेरे और हमारे होने वाले बच्चे के लिए सभी से प्यार और सलीके से बात करनी होगी तथा आप कभी भी किसी से मार-पीट नहीं करोगे! अगर आपने ये शर्त कभी भी तोड़ी तो उसी पल आप मेरा और अपन होने वाले बच्चे का मरा हुआ मुँह देखोगे!" मैंने बड़े कड़े शब्दों में तेरे पिताजी के सामने अपनी शर्त रख दी थी|

मेरी सारी बात सुन तेरे पिताजी मुस्कुराये और सर हाँ में हिलाते हुए बोले; "मैं तुम्हें वचन देता हूँ की मैं आज के बाद कभी भी किसी से लड़ाई-झगड़ा नहीं करूँगा| सभी से मैं नरमी से बात करूँगा, हाँ लेकिन मुझे कभी-कभार लेबर को डाँटना पड़ता है इसलिए डाँटना मैं नहीं छोड़ सकता! लेकिन किसी से लड़ाई-झगड़ा कभी नहीं करूँगा, ये वचन मैं तुम्हें देता हूँ!" तेरे पिताजी का मुझे दिया हुआ ये वचन उन्होंने आजतक निभाया और कभी किसी से नहीं उलझे!

तो ये थी मेरे माँ-पिताजी की प्रेम कहानी जिससे मैं आजतक अनजान था| लेकिन अभी माँ की बात पूरी कहाँ हुई थी!

माँ: हमारी शादी होने के बाद हमने बड़े कष्ट झेले मगर जब तू मेरे गर्भ में आया तो भगवान जी की कृपा हम पर बरसने लगी| कामयाबी तेरे पिताजी के कदम चूमने लगी और उनका काम फैलता गया| तुझे याद है जब हमने इस क्लोनी में घर लिया था? उस दिन तेरे पिताजी ने मुझे यहाँ के लोगों के दिल में बैठे अपने प्रति खौफ के बारे में बताया| मैं नहीं चाहती थी की यहाँ के लोग तेरे पिताजी के डर के मारे कुछ गलत बातें करें जिससे तेरे बचपन पर कोई बुरा असर पड़े इसलिए मैंने यहाँ आस-पड़ोस में सभी से दोस्ती कर सबको विश्वास दिलाया की तेरे पिताजी अब पहले की तरह खूँखार नहीं बल्कि सभी से हलीमी से बात करने वाले सभ्य व्यक्ति हैं|

अगर कभी यहाँ हमारे आस-पड़ोसियों को बहु के मायके में घटे काण्ड के बारे में पता चल गया तो सभी तेरे बारे में बुरा सोचेंगे! वो कहेंगे की बाप तो गुंडागर्दी करता ही था, लड़का तो चार कदम आगे निकला...

इतना कह माँ ने अपनी बात अधूरी छोड़ दी, क्योंकि वो मेरे लिए कोई गलत शब्द इस्तेमाल नहीं कर सकती थीं मगर मेरे जख्मी मन ने माँ की अधूरी छोड़ी बात को पूरा कर दिया;

मैं: लोग कहेंगे की; 'बाप तो गुंडागर्दी करता ही था, लड़का तो चार कदम आगे निकलाऔर खुनी बन गया!'

मेरी ये कही बात सुन माँ को गुस्सा आ गया और उन्होंने मेरे गाल पर थप्पड़ धर दिया!

माँ: खबरदार जो ऐसा शब्द दुबारा दोहराया तो! मेरे बेटे ने कोई बुरा काम नहीं किया, हालात के आगे मज़बूर हो आकर उसने वही किया जो कोई भी इंसान करता!

माँ मुझे डाँटते हुए बोलीं| माँ के उस थप्पड़ का मुझे कतई बुरा नहीं लगा, ये तो उनका प्यार था जो मेरे गलत होने पर मुझे सही रास्ता दिखा कर भटकने नहीं दे रहा था| मुझे झपड़ियाने से माँ का दिल दुख था इसलिए उन्होंने मुझे अपने गले लगाया तथा मुझे होंसला देने लगीं|

उस दिन मुझे एक बात समझ आ गई थी, मैं या मेरा परिवार चाहे कितने ही कामयाबी के झंडे गाड़ ले, ये दुनिया मुझे बस मेरे पिताजी के नाम से जानेगी, लेकिन मेरा दिल ये कतई नहीं चाहता था! मुझे अपनी अलग पहचान बनानी थी, ऐसी पहचान जिसके लिए मुझे अपने पिताजी का मोहताज़ न बनना पड़े| कल को अगर कोई मुझे देखे तो ये न पूछे की मेरे पिताजी कहाँ हैं, लोग ये पूछें की मेरी माँ कैसी हैं? मेरे बीवी-बच्चे कैसे हैं? मुझे कभी किसी के आगे अपने पिताजी के हमारे साथ न रहने पर कोई झूठ...कोई सफाई न देनी पड़े और इस सबके लिए मुझे एक नई शुरुआत करनी थी...

[color=rgb(163,]जारी रहेगा भाग - 7 में...[/color]
 

[color=rgb(251,]इकत्तीसवाँ अध्याय: घर संसार[/color]
[color=rgb(44,]भाग - 8(1)[/color]


[color=rgb(71,]अब तक अपने पढ़ा:[/color]

करीब 5 मिनट बाद हम उठ कर चलने लगे तो सरिता जी ने मुझे रोका तथा मेरे जख्म का निरक्षण करने का बहाना कर मुझे भीतर वाले कमरे में जाने क कहा और संगीता को बाहर बैठे रहने को कहा| मैं सरिता जी के असली मतलब से अनजान बना हुआ भीतर के कमरे में पहुँचा और अपनी कमीज के बटन खोल कर अपना जख्म दिखाने लगा| सरिता जी ने पहले मेरे जख्म का निरक्षण किया तथा फिर मेरे दाएँ कँधे पर हाथ रखते हुए मुझे समझाने लगीं; "देखो मानु, मेरी बात का बुरा न लगाना! प्रेगनेंसी के दिनों में औरत का शरीर भर जाता है और वो खुद को कम आकर्षक समझती है| उसे लगता है की उसका पति उसे यूँ भारी-भरकम देख कर किसी पराई औरत के चक्कर में पड़ जायेगा इसलिए वो अपने मर्द को सेक्स के लिए मना नहीं करती परन्तु वो अपने मर्द को खुश रखने के चक्कर में अपने स्वास्थ्य के बिगड़ने का जोख़म उठा लेती है! संगीता भी तुम्हारी ख़ुशी के लिए तुम्हें सेक्स के लिए मना नहीं करेगी मगर अगर उसकी तबियत ज़रा भी खराब हुई तो तुम खुद को कभी माफ़ नहीं कर पाओगे!" डॉक्टर सरिता मुझे गलत समझ रहीं थीं और मैं भी उन्हें सच न बताने के लिए मज़बूर था, आखिर मैं उन्हें कैसे कह सकता था की सम्भोग के लिए मैं नहीं बल्कि मेरी पत्नी संगीता आतुर है!

सरिता जी से इज़ाज़त ले कर हम पति-पत्नी खाना लेने चल पड़े| इस समय हम दोनों ही खामोश थे, संगीता को ग्लानि हो रही थी की उसके कारण आज मेरी डॉक्टर सरिता के सामने किरकिरी हो गई थी! वहीं मैं डॉक्टर सरिता जी की मुझे अकेले में समझाई हुई बात पर गहन चिंतन कर रहा था|

[color=rgb(97,]अब आगे:[/color]

आज
बड़ी ही रोचक स्थिति थी हम दोनों मियाँ-बीवी की, हमेशा एक दूसरे के मन की बातें बिना कहे ही पढ़ लेने वाले हम दोनों, आज एक दूसरे के मन में उतपन्न हुई उथल-पुथल को समझ नहीं पा रहे थे!

संगीता ने होली वाले दिन मुँह मीठा करने के लिए एक प्यारा सा झूठ बोला था| मेरा प्रेम के प्रति डर भगाने के लिए संगीता ने मुझसे झूठ कहा था की उसने डॉक्टर सरिता से इस विषय में (हमारे प्रेम मिलन के लिए) इज़ाज़त ले ली है, जबकि आज जब मैंने डॉक्टर सरिता जी से मुँह मीठा (हमारे प्रेम मिलन) करने के बारे में पूछने पर सरिता जी ने हमें सैय्यम रखने की हिदायत दी थी| अपने इस झूठ को याद कर संगीता को पहले ही मुझसे झूठ बोलने की ग्लानि हो रही थी, ऊपर से कल रात संगीता की जिद्द के कारण जो मैं प्रेगनेंसी के समय सम्भोग करने का सवाल पूछने सरिता जी के पास मुँह उठा कर चला आया था उससे मुझ बेक़सूर पर ही अत्यधिक कामुक होने का ठप्पा लग गया था, इस सब से संगीता को और भी अधिक ग्लानि हो रही थी!

वहीं दूसरी तरफ मैं, सरिता जी की अंत में मुझे समझाई बात के बारे में सोच रहा था| 'क्या सच में संगीता मुझे ले कर इन्सेक्युर (insecure) है? उसे लगता है की उसकी प्रेगनेंसी से आये उसके जिस्म में बदलाव के कारण मेरा मन किसी पराई स्त्री की ओर भटक सकता है?' दिमाग में सवाल उमड़े थे तो मन ने खुद ही उन सवालों का जवाब देना शुरू कर दिया; 'याद है गाँव में कैसे संगीता अपने कौमर्य को ले कर भावुक हो गई थी! फिर यहाँ दिल्ली में जब मैंने उसे पोर्न (porn) दिखाया था तब अपने जिस्म के उभारों को वीडियो में दिखाई जा रही पोर्नस्टार (pornstar) के सामने कम आंकते हुए भी वो भावुक हो गई थी! यहाँ तक की उसे करुणा और मेरे साथ काम करने वाली साधना को देख कर भी जलन होने लगी थी|' इन सभी बातों को सोचते हुए मुझे संगीता का इन्सेक्युर होना जायज लगने लगा था| अब मुझे कुछ ऐसा करना था जिससे संगीता की ये इन्सिक्युरिटी (insecurity) खत्म की जा सके!

अपनी-अपनी सोच में मगन हम दूकान पर पहुँच चुके थे| मैंने जब संगीता से पुछा की वो क्या खायेगी तो संगीता ने मुझे खुश करने के लिए कहा; "मैं कुछ सादा ही खाऊँगी, कल से बाहर से खा रही हूँ कहीं पेट खराब न हो जाए!" मैं संगीता की मुझे खुश करने की कोशिश से मुस्कुरा उठा और हम दोनों मियाँ-बीवी के लिए 2 प्लेट दाल-चवल पैक करवाए, माँ के लिए दाल-रोटी-सब्जी और बच्चों के लिए उनकी मन पसंद चाऊमीन| मुझे अपने लिए दाल-चावल पैक करवाते सुन संगीता एकदम से बोली; "आपको जो खाना है वो आप खाओ, मेरे चक्कर में आप क्यों दाल-चावल खा रहे हो?! मैं कोई छोटी बच्ची थोड़े ही हूँ की आपको स्वाद खाना खाते हुए देख ललचा जाऊँगी!" संगीता बड़े भोलेपन से बोली|

"हाँ भई, तुम कहाँ बच्ची हो! बच्चा तो मैं हूँ न?!" मैंने संगीता को प्यारभरा उल्हाना देते हुए ठीक उसी तरह कहा जैसे कुछ देर पहले संगीता ने आयुष को उल्हाना दिया था! मेरे इस प्यारे से मज़ाक से संगीता के चेहरे पर शर्मीली मुस्कान आ गई और उसकी नजरें अपने आप ही नीची हो गईं| शायद संगीता को कल रात का अपना जिद्द करना याद आ गया था, जिस कारण उसे अब और भी शर्म आ रही थी!

खैर, हम खाना ले कर घर पहुँचे तो माँ और बच्चे हमारा ही इंतज़ार कर रहे थे| अब माँ को भूख लगी थी, परन्तु बच्चों को अपनी नई किताब देखने की उत्सुकता थी| "माँ ने सुबह से कुछ नहीं खाया है, तुमने तो स्कूल में छोले-कुलचे खा लिए न?!" संगीता प्यार से बच्चों को डाँटते हुए बोली| आयुष को लगा की उसकी मम्मी छोले-कुलचे खाने का सारा दोष उसके सर मढ़ रहीं हैं इसलिए आयुष फौरन हाज़िर जवाबी से बोला; "छोले-कुलचे खाने का आईडिया तो आपका था न मम्मी!" ये कहते हुए आयुष दाँत दिखा कर हँसने लगा| जिस हाज़िर जवाबी से आयुष ने कहा था उसे सुन हम सभी खिलखिलाकर हँस पड़े! वहीं बेचारी संगीता शर्मा गई और सर झुका कर मुस्कुराने लगी| मेरी पत्नी अधिक न लजाये इसलिए मैंने एकदम से संगीता को अपनी बाहों में भर कर उसका चेहरा अपने सीने में छुपा लिया| "अच्छा बस, अब कोई मेरी पत्नी को तंग नहीं करेगा!" मैंने आज पहलीबार यूँ बच्चों की बजाए संगीता का पक्ष लिया था, जिस कारण संगीता ख़ुशी से फूली नहीं समा रही थी| बहरहाल, सबने खाना खाया और फिर हमने मिलकर बच्चों की किताबें एक-एक कर देखीं तथा उन पर सभी ने कवर भी चढ़ाये| बच्चे अपनी नई किताबें पा कर बहुत खुश थे और मेरे गालों पर थैंक यू के रूप में अपनी मीठी-मीठी पप्पियाँ बार-बार देते जा रहे थे|

नई किताबों की ख़ुशी ही कुछ और होती है; वो नए कागज की महक, वो सफ़ेद-सफ़ेद नए बेदाग़ पन्ने, वो उन ताज़े पन्नों पर लगी स्याही की खुशबु! मुझे ये देख कर बहुत ख़ुशी हुई की इन सब से जितना मैं खुश होता था उतना ही मेरे बच्चे भी खुश हो रहे थे|

रात के खाना बनाने का समय हो रहा था इसलिए मैंने कमान सँभाली| माँ को यूँ मेरा खाना बनाना मज़ाकिया लग रहा था जबकि संगीता मेरे खाने बनाने को अपने किये कल रात के गुस्से से जोड़ रही थी| जब मैं रसोई में सब्जी काट रहा था तब संगीता चुपके से मेरे पास आई और अपने कान पकड़ मायूस होते हुए बोली;

संगीता: कल रात जो मैंने गुस्से में कहा उसके लिए मुझे माफ़ कर दो!

संगीता के इस तरह से माफ़ी माँगने से मैं पिघल गया और संगीता को अपने गले लगाते हुए उसे समझाने लगा;

मैं: जान, तुम्हारा गुस्सा काफी हद्द तक जायज़ था! अब अगर तुम मुझे प्यार के लिए तडपाओगी तो मैं भी नाराज़ तो हूँगा ही?! खैर, छोडो उन बातों को और अब मुस्कुराओ|

मैंने संगीता के सर को चूमते हुए कहा|

संगीता: तो फिर आप बाहर जा कर बैठो, मैं खाना बनाती हूँ!

संगीता मुस्कुराते हुए बोली|

मैं: नहीं जान, खाना तो मैं ही बनाऊँगा और वो भी ऐसा की तुम उँगलियाँ चाटती रह जाओगी| मैंने अपनी शेखी बघारते हुए कहा| परन्तु संगीता को लगा की मैं उसकी कल रात की कही बात की उसे सबके लिए खाना बनाना होता है, सुन कर अब भी नाराज़ हूँ इसीलिए मैं उसे खाना बनाने नहीं दे रहा|

संगीता: इसका मतलब की आपने मुझे कल रात के लिए माफ़ नहीं किया!

संगीता फिर उदास होते हुए बोली| मुझे संगीता को उदास नहीं करना था इसलिए मैंने उसके दोनों गाल खींचते हुए उसे प्यार से समझाया;

मैं: जान, मैं तुमसे नाराज़ नहीं हूँ| मुझे एहसास हो गया की मैं कितना गलत था, प्रेगनेंसी के इन दिनों में मुझे तुम्हें सबसे ज्यादा खुश रखना चाहिए, तुम्हें अधिक से अधिक समय देना चाहिए और मैं बुद्धू बच्चों को समय दे कर समझता था की तुम्हें भी समय दे रहा हूँ! मुझे मेरी गलती का एहसास हो गया है और मैं अपनी ये गलती सुधारना चाहता हूँ इसलिए आज से तुम कोई भी काम नहीं करोगी! मेरी पत्नी आज से बस आराम करेगी और घर का सारा काम मैं सँभालूँगा!

मैंने बड़े गर्व से घर सँभालने की जिम्मेदारी ली| अब चूँकि संगीता को यूँ मेरा घर का काम करना कतई पसंद नहीं था इसलिए उसने मुझे समझाने की बहुत कोशिश की मगर मैं अपनी जिद्द पर बना रहा| आखिर में वो मेरी शिकायत ले कर माँ के पास पहुँची;

संगीता: देखो न माँ इनको, ये अपना काम-धाम छोड़ कर घर का काम सँभालने की कह रहे हैं!

अपनी बहु की शिकायत सुन माँ मुस्कुराईं और बोलीं;

माँ: अभी कर लेने दे इसे अपने मन की बहु, रात में बात करते हैं|

संगीता को विश्वास था की एक माँ ही हैं जो मुझे सीधा कर सकती हैं इसलिए वो माँ के पास बैठ कर गप्पें लगाने लगी|

उधर बच्चों को आज मुझे पर अधिक ही प्रेम आ रहा था, इसलिए दोनों बच्चे मेरी मदद करने के लिए रसोई में घुस आये| नेहा बड़ी थी इसलिए उसने रोटी बनाने में मेरी मदद करनी चाही, वहीं आयुष छोटा था तो उसका काम बस समान मुझे लाकर देना था| मुझसे आजतक भी रोटियाँ गोल नहीं बनती ऐसे में जब नेहा ने कहा की मैं उसे रोटियाँ बनाना सिखाऊँ तो मैंने भी आव देखा न ताव और नेहा को रोटियाँ बनाना सिखाना शुरू कर दिया| वो बात अलग है की मेरी ही तरह मेरी बेटी से भी रोटियाँ गोल नहीं बनी, हाँ इतना अवश्य था की उसने रोटियाँ पतली बेलीं थीं| आयुष भी पीछे नहीं रहा, उसने भी अपनी दीदी के साथ मिलकर एक रोटी बेली जो की लम्बे भटूरे के आकार की थी!

खाना बना कर जब हम तीनों बाप-बेटा-बेटी ने परोसा तो माँ बड़ी खुश हुईं| माँ ने दोनों बच्चों को खूब लाड प्यार किया और उन्हें आशीर्वाद दिया| अपनी दादी जी से मिले प्यार के कारण दोनों बच्चों ने सबको खाना परोसा| आयुष छोटा था इसलिए वो डाइनिंग टेबल के ऊपर बैठ कर सबको खाना परोसने लगा तथा नेहा ने सभी के गिलासों में पीने के लिए पानी भर कर दिया| जब माँ ने रोटी का टिफ़िन खोला तो उन्हें टिफ़िन में सारी रोटियाँ टेढ़ी-मेढ़ी दिखीं, जिसे देख माँ हँस पड़ीं! माँ को हँसते हुए देख मैंने बड़े गर्व से कहा; "आज की सारी रोटियाँ मेरे दोनों बच्चों ने बनाई हैं! मैंने बस सेंका और रोटियों को फुलाया है!" मेरी बात सुन माँ ने दोनों बच्चों को आशीर्वाद दिया और बोलीं; "शाबाश बच्चों!" फिर माँ, संगीता को प्यार से हिदायत देते हुए बोलीं; "बहु कल इन तीनों (मैं, नेहा और आयुष) को गोल रोटी बनाने की ट्रेनिंग दे दियो!" माँ की बात सुन संगीता ने फौरन हाँ में सर हिलाया| इधर रोज़ बच्चों को खिलाने वाला मैं आज अपने बच्चों के हाथ से खाना चाहता था इसलिए मैंने दोनों बच्चों से कहा की; "बेटा, आज आप दोनों अपने हाथों से मुझे खिलाओ|" मेरी बात सुन नेहा मेरे पास कुर्सी खींच कर बैठ गई तथा मुझे अपने हाथ से खिलाने लगी| उधर आयुष पहले से ही डाइनिंग टेबल के ऊपर ठीक मेरे सामने बैठा था इसलिए उसने भी बड़े चाव से मुझे खाना खिलाना शुरू किया| वहीं माँ और संगीता, हम बाप-बेटा-बेटी का ये प्यार देख मुस्कुरा रहीं थीं|

खाने के बाद अब समय था सोने का और बच्चों ने अपनी दादी जी के पलंग पर अपना कब्ज़ा जमा लिया था| माँ ने बच्चों को 5 मिनट इंतज़ार करने को कहा और मुझे तथा संगीता को बैठक में अपने पास बिठा कर समझाने लगी; "बेटा, बहु ने बताया मुझे की तू अब घर रह कर सारा काम करना चाहता है ताकि बहु को आराम मिले| लेकिन बेटा तेरा काम पर जाना भी जरुरी है न?!" माँ की बात सही थी इसलिए मैंने उन्हें आज जा कर सारी बात बताई; "माँ, मैंने आप सभी को बताया नहीं, मगर मैंने एक बहुत बड़ा ठेका उठाया है|" ये कहते हुए मैंने माँ और संगीता को मेरे नए प्लाट के बारे में बताया| ये बात सुन कर माँ और संगीता बहुत खुश हुए तथा मुझे बधाई देने लगे| "साथ ही जो हमारी गुड़गाँव वाली साइट थी, जिस पर मैं और पिताजी काम कर रहे थे उसके भी सारे पैसे मिल गए हैं| नए प्लाट का काम संतोष सँभाल रहा है और नॉएडा वाली साइट का काम सरयू सँभाल रहा है| मैं यहाँ आस-पास के कुछ छोटे-मोटे ठेके उठा रहा हूँ, जो की मैं घर रह कर आराम से सँभाल सकता हूँ| ऐसा नहीं है की मैं रोज़ घर पर रहूँगा, जर्रूरत पड़ने पर मैं काम देखने जाता रहूँगा| आप यक़ीन मानो माँ, मेरे घर पर रहने से हमारे काम का कतई नुक्सान नहीं होगा|" मैंने अपनी बातों से माँ और संगीता को पूरी तरह संतुष्ट कर दिया था|

माँ अपने कमरे में सोने गईं और हम मियाँ-बीवी अपने कमरे में आ गए| आज जब हम मियाँ-बीवी लेटे तो मैंने संगीता को अपनी बाहों में कस कर भर लिया| मेरे जिस्म से सटते ही संगीता को मेरी देह की गर्माहट महसूस हुई और वो कसमसाते हुए मेरी बाहों में सिमट गई| हम भले ही मुँह-मीठा नहीं कर सकते थे, परन्तु थोड़ा बहुत प्यार तो कर ही सकते थे| संगीता को अपनी बाहों में भरे हुए मैंने उसेक सर को चूमना शुरू कर दिया| मेरे होठों की तपन से संगीता का दिल ख़ुशी से कुलाचें मारने लगा और उसने मेरा हाथ कस कर अपने वक्ष पर दबा दिया| प्रेम अगन दहक चुकी थी इसलिए हम दोनों ही उस अगन की गर्माहट को महसूस कर आनंद के सागर में गोते लगाने लगे थे| हाँ, हम एक बात का ध्यान अवश्य रख रहे थे की कहीं इस प्रेम सागर में गोते लगाते हुए हम कहीं अधिक न डूब जाएँ!

अगली सुबह, नाशत कर हम सभी बैठे थे की तभी मिश्रा अंकल जी का फ़ोन आ गया| उन्होने बताया की नए प्लाट के लिए उन्होंने दो लोगों से बात की है जो अभी से अपने-अपने फ्लैट बुक करना चाहते हैं| हमारे लिए ये बहुत अच्छी खबर थी इसलिए मैंने दोनों पार्टियों से बाहर मिलने की तैयारी कर ली| शाम को जब मैं और संगीता पार्टियों से मिलने जाने वाले थे की तभी दोनों बच्चों ने भी साथ चलने की जिद्द की| तब माँ ने बच्चों को प्यार से समझाया; "बच्चों, तुम्हारे मम्मी-पापा आज काम से जा रहे हैं, तुम दोनों मेरे पास रुको|" अपनी दादी जी की बात मानते हुए बच्चों ने हमें "best of luck" कहा तथा वापसी में अपने लिए चॉकलेट और चिप्स लाने की शर्त रख दी|

बच्चों को "bye" कह हम दोनों पति-पत्नी पार्टी से मिलने एक कॉफ़ी पीने वाली दूकान में पहुँचे| एक-एक कर दोनों पार्टीयाँ हमें मिलने आईं, गौर करने वाली बात ये थी की दोनों ही पार्टियाँ अपनी-अपनी पत्नियों के साथ आई थीं| संगीता ने जब दो सजी-धजी महिलाएँ देखीं तो उसे इन्सिक्युरिटी (insecurity) महसूस होने लगी| मैंने संगीता की इस इन्सिक्युरिटी को दूर करने के लिए अपनी बातों में संगीता को भी शामिल कर लिया| मैं पार्टियों को तथ्य समझा चूका था और अंत में संगीता ने जो घर को घर बनाने की बात कही उससे दोनों ही पार्टियाँ बहुत प्रभावित हुईं तथा हाथों हाथ डील पक्की हो गई|

हम मियाँ-बीवी को हमारे जीवन की ये पहली जीत मिली थी इसलिए हमारे चेहरे ख़ुशी और गर्व से खिले हुए थे| आज की इस मीटिंग से संगीता में आत्मविश्वास जागा था और उसकी इन्सिक्युरिटी काफी हद्द तक कम हो चुकी थी| इस समय संगीता मुझे केवल अपना पति ही नहीं बल्कि बिसनेस पार्टनर समझ रही थी| रात में सोने के समय संगीता आज कुछ अधिक ही आक्रामक थी और मेरे होठों पर अपन पूरा ज़ोर दिखा रही थी| संगीता की ये आक्रामकता मेरे भीतर भी प्रेम अगन को बढ़ा रही थी, परन्तु मैंने फिर भी खुद को किसी तरह काबू कर के रखा हुआ था| "एक दिन मेरे साथ काम पर जाने से तुम इतनी आक्रामक हो जाओगी, अगर ये पहले पता होता तो तुम्हें रोज़ अपने साथ काम पर ले जाता!" मैंने संगीता की गिरफ्त से अपने होंठ छुड़ाते हुए उसे उल्हाना देते हुए कहा| मेरी बात सुन संगीता एकदम से शर्मा गई और मेरे सीने में अपना मुँह छुपा लिया| आज सच में संगीता का आत्मविश्वास चरम पर था और वो इस डील के कामयाब होने का श्रेय खुद को दे रही थी| वहीं मैं अपनी पत्नी के चेहरे पर गर्वपूर्ण मुस्कान देख कर बहुत खुश था और कामना कर रहा था की वो इसी तरह मुस्कुराती रहे|

इसी तरह प्यार से दिन धीरे-धीरे बीत रहे थे और मेरा काम भी अच्छा चल पड़ा था| अखबार में विज्ञापन दे कर मैंने अपने नए प्लाट के लिए दो अन्य पार्टियाँ ढूँढ ली थीं जिनसे मैंने एडवांस ले कर उनके फ्लैट भी बुक कर दिए थे| नॉएडा वाली साइट का काम दिन-रात एक कर के फाइनल हो चूका था तथा उसकी पेमेंट भी आ चुकी थी| मिश्रा कंक्ल जी ने भी जो अपनी दो नई साइट का काम मुझे सौंपा था वो बहुत तेज़ी से आगे बढ़ रहा था तथा मैंने उसकी सारी जिम्मेदारी सरयू को दे दी थी| ऐसा नहीं था की मैं सारा दिन घर रहकर चूल्हा-चौका करता था, बल्कि 2-4 दिन में मैं लंच के बाद साइट का चक्कर लगा लेता था| कभी-कभी जब साइट पर ज्यादा काम होता तो मैं एक दिन पहले ही घर पर खाना बनाने की सारी तैयारी कर लेता था ताकि साइट का काम खत्म कर घर लौट कर मुझे कम से कम समय खाना बनाने में लगाना पड़े|

चूँकि अधिकतर काम मैं घर से करता था इसलिए अक्सर मेरे कान में हेडफोन्स लगे होते थे और मैं खाना बनाते हुए ही संतोष या सरयू को फ़ोन पर आदेश दे रहा होता| ये दृश्य देख कर माँ को मुझ पर बड़ा गर्व होता की कैसे उनका बेटा घर और काम दोनों एक साथ सँभाल रहा है| एक बार माँ ने कहा भी की मैं खाना बनाने के लिए कोई नौकरानी रख लूँ, परन्तु मैंने माँ को मना करते हुए कहा; "माँ, नौकरानी तो मैं रख लूँगा लेकिन आपको उनके हाथ का बना हुआ खाना अच्छा नहीं लगेगा|" मेरी बात सुन माँ ने समझौता करते हुए कहा भी की वो नौकरानी के हाथ का बना खाना खा लेंगी मगर मैं अपनी जिद्द पर कायम रहा|

बहरहाल, घर से काम करने का एक बड़ा नुक्सान था मुझे! दरअसल, साइट पर काम करते हुए कई बार मुझसे गुस्से में गाली निकल जाती थी, परन्तु यहाँ घर पर होते हुए मुझे इस बात का बड़ा ध्यान रखना पड़ता था की कहीं संगीता, माँ या बच्चों की मौजूदगी में मेरे मुँह से गाली न निकल जाए| ऐसे ही एक दिन मैं बड़ा गुस्से में था क्योंकि एक मिस्त्री ने अचानक बिना बताये छुट्टी मार ली थी, मुझे उस मिस्त्री पर बहुत गुस्सा आ रहा था| मैंने उसे फ़ोन कर आज न आने का कारण पुछा तो वो दारु के नशे में टुन्न हो कर मुझसे बात करने लगा| मैं फौरन फ़ोन ले कर छत पर दौड़ा और उसे खूब जोर से गालियाँ देते हुए झाड़ा! चूँकि मैं गुस्से में था तो मेरी गुस्से से भरी आवाज सीढ़ियों से होती हुई नीचे आ रही थी जो की संगीता, माँ और बच्चों ने सुन ली थी| वो तो शुक्र है की किसी ने कुछ भी साफ़-साफ़ नहीं सुना था, न ही किसी ने मेरे मुख से निकल रही गालियाँ सुनी थीं| बात कर के जब मैं नीचे आया तो बच्चे थोड़े सहमे हुए थे तथा दोनों सास-पतुआ मुझे हैरत भरी नजरों से देख रहे थे| मैं समझ गया की सबको पता चल गया की मैं मिस्त्री को फ़ोन पर झाड़ रहा था| "बेटा, इतना गुस्सा नहीं करते वरना तेरी तबियत खराब हो जाएगी|" माँ मुझे प्यार से समझाते हुए बोलीं| मैंने सर हाँ में हिलाते हुए माँ की कही बात का मान किया और "सॉरी माँ" कह कर उनसे माफ़ी माँगी| मेरे माफ़ी माँगते ही दोनों बच्चों को पता चल गया की मेरा गुस्सा शांत हो गया है इसलिए दोनों बच्चे आ कर मेरी टाँगों से लिपट गए|

चूँकि मैं संगीता को घर का कोई काम नहीं करने देता था इसलिए अब संगीता दिनभर माँ के पास ही बैठी रहती| सुबह वो मेरे साथ उठती और माँ के साथ बैठ कर पूजा-पाठ तथा रामायण का पाठ करने लगी| दिनभर जब भी मुझे संगीता अकेला देखती वो आकर मेरे सीने से लग जाती और बार-बार एक ही बात दोहराती; "जानू, रामायण का पाठ करने से हमारी बेटी बड़ी संस्कारी पैदा होगी|" संगीता के इस अटूट विश्वास की लड़की ही पैदा होगी देख मुझे बहुत ख़ुशी होती थी| बेटी पैदा होने की बात से मेरा मन उमंगों से भर उठता और मैं संगीता के होंठ चूम लेता!!

मैंने संगीता को सैर कराने के लिए शाम के समय पार्क ले जाना शुरू कर दिया| फिर एक दिन मुझे पता चला की गर्भवती महिलाओं के लिए कुछ ख़ास तरह का योग होता है| मैंने घर के नज़दीक ही ऐसा योगा केंद्र ढूँढ निकाला और 1,000/- रुपये फीस भर संगीता को वहाँ ले गया| हमारी तरह वहाँ दो जोड़े और आये थे जिस कारण संगीता को असहजता महसूस नहीं हुई| परन्तु यहाँ सब ढकोसले बाजी थी, बजाए कोई योग कराने के हमें क्या-क्या सावधानियाँ बरतनी चाहिए ये बताया गया, पैदा हुए बच्चे को कैसे उठाना है ये बताया गया| ये सब देख-सुन कर संगीता को बहुत गुस्सा आया, वो तो मैं साथ था इसलिए वो अपना गुस्सा दबाये हुए थी वरना संगीता ने तो योगा सिखाने वाली गुरुमाता की क्लास ही लगा देनी थी! घर लौटते समय संगीता गाडी में बैठे हुए बड़ी चिल्लाई की; "कितनी अंधेरगर्दी है, सब के सब लूटने में लगे हुए हैं!" संगीता का गुस्सा देख मुझे हँसी आ रही थी मगर मैं अपनी हँसी दबाये हुए था वरना संगीता मुझ पर भी बरस पड़ती| संगीता का गुस्सा शांत करने के लिए मैंने उसे एक आइस-क्रीम खिलाई, तब कहीं जा कर उसका गुस्सा शांत हुआ|

इधर बच्चों के स्कूल खुल गए थे और आज बच्चों के स्कूल का पहला दिन था| बाकी दिन मुझे बच्चों को स्कूल जाने के लिए जगाना होता था मगर आज तो बच्चे बिना मेरे जगाये ही जाग गए थे| मुझे सुबह की गुड मॉर्निंग वाली पप्पी दे कर दोनों बच्चे खुद तैयार होने लगे| वहीं मैंने फटाफट बच्चों के लिए नाश्ता बनाना शुरू कर दिया| आज बच्चों का स्कूल के नए साल का पहला दिन था इसलिए आज उनके लिए मैंने ख़ास नाश्ता बनाया, जिसके बारे में मैंने बच्चों को कुछ नहीं बताया| जब तक मैंने माँ और संगीता को चाय बना कर दी तब तक दोनों बच्चे तैयार हो कर आ गए| नेहा के हाथ में उसके स्कूल से मिले दो बैज (badge) थे जो की वो चाहती थी की मैं उसकी कमीज में लगाऊँ| मैंने नेहा की कमीज की जेब पर सबसे पहले PREFECT का बैज लगाया और उसके ठीक नीचे क्लास मॉनिटर का बैज लगा कर नेहा के सर को चूमकर उसे आशीर्वाद दिया| वहीं आयुष के पास अभी क्लास मॉनिटर का बैज नहीं था, आयुष दुखी न हो इसलिए मैंने आयुष को याद दिलाते हुए कहा; "बेटा, आज अपनी क्लास टीचर जी से क्लास मॉनिटर का बैज ले लेना, फिर कल से मैं आपकी कमीज में भी बैज लगा कर दूँगा|" मेरी बात सुन आयुष ने अच्छे बच्चे की तरह ख़ुशी-ख़ुशी सर हाँ में हिलाया|

दोनों बच्चों को उनकी स्कूल वैन में बिठा कर मैं घर लौटा तो देखा की संगीता रसोई में पड़े बर्तन जिनमें मैंने बच्चों के लिए ख़ास नाश्ता बनाया है उन्हें सूँघ रही है! मुझे देखते ही संगीता ने फ़ट से अपनी फरमाइश रख दी; "सुबह बच्चों के लिए अंडा बनाया था न, अब मुझे भी अंडा खाना है!" जिस तरह संगीता ने बचकाने ढंग से अपनी माँग रखी थी उसे देख मेरे मुँह से; "awwwwww" निकल गया! मैंने फटाफट अपनी पत्नी के लिए अंडे की भुर्जी बनाई और डाइनिंग टेबल पर परोस दी| माँ के लिए मैंने नमकीन परांठा और अचार परोसा था, परन्तु संगीता ने माँ को अंडे की भुर्जी खिलाने की सोच ली थी| संगीता ने बच्चों की तरह जिद्द पकड़ी और माँ को अपने हाथ से थोड़ी सी भुर्जी खिलाई| ताज़्ज़ुब की बात ये थी की माँ ने संगीता के हाथ से भुर्जी खाल ली थी और उन्हें भुर्जी स्वाद भी लगी थी!

मैं आँखें फाड़े माँ को भुर्जी खाते हुए देख रहा था और मन ही मन सोच रहा था की क्या ये मेरी ही माँ हैं? कहाँ तो माँ को अंडा देखते ही घिन्ना आती थी और कहाँ माँ ख़ुशी-ख़ुशी अंडे की भुर्जी खा रहीं हैं! असल में माँ ने भुर्जी संगीता का दिल रखने के लिए खाई थी और मुझे ये बात माँ ने बाद में बताई थी| "ये तो बड़ी स्वाद है बहु, मैं बेकार ही इससे घिन्न खाती थी!" माँ भुर्जी खा चटखारा लेते हुए बोलीं| जो भी कहो, माँ ने अंडा खा लिया था और मैं इससे बहुत खुश था!

बच्चों के स्कूल से लौटने का समय हो रहा था और खाना तैयार था| मैं बच्चों के लेने के लिए उनकी वैन के स्टैंड पर खड़ा था, जैसे ही वैन आई आयुष ने मुझे देख लिया और सबसे पहले कूदते हुए उतरा| मेरे पास आ कर आयुष ने मुझे अपना क्लास मॉनिटर बैज बड़े गर्व से दिखाया; "देखो पापा जी, मुझे मेरा क्लास मॉनिटर का बैज मिला!" आयुष अपने बैज की तरफ इशारा करते हुए बोला|

"अरे वाह बेटा जी! आपको ढेरों मुबारकबाद! I'm so proud of you my बेटा!" मैंने आयुष को गले लगा कर मुबारकबाद दी| दोनों बच्चों को ले कर मैं घर पहुँचा और फिर शुरू हुई दोनों बच्चों की आज के दिन की कहानियाँ! कैसे आयुष ने आज बच्चों को क्लास मॉनिटर बन शोर करने से रोका, कैसे नेहा जो की स्कूल की सबसे छोटी PREFECT थी उसने आज सुबह प्रार्थना सभा में देर से आये सभी बच्चों को बाहर खड़ा किया, कैसे नेहा ने आज अपनी क्लास में पढ़ रहे बच्चों को हल्ला करने से रोकने के लिए अपनी धौंस से डरा-धमका कर रखा! फिर बच्चों ने मेरे द्वारा बनाये हुए उस ख़ास नाश्ते का जिक्र किया; "पापा जी, आपने क्या स्वाद नाश्ता बनाया था और नाश्ते में आपने क्या कमाल की इनोवेशन (innovation) की थी! आपने तो भुर्जी का बर्गर बना दिया!" नेहा मेरी तारीफ करते हुए बोली| "मम्मी, पापा जी ने है न टिफ़िन में नीचे अंडे की भुर्जी रखी, फिर भुर्जी वाला बर्गर रखा और उसके ऊपर भी अंडे की भुर्जी रखी थी! मेरा पूरा टिफ़िन भुर्जी से भरा हुआ था और मेरे सभी दोस्तों को भुर्जी बहुत स्वाद लगी थी!" आयुष भी मेरी तारीफ करते हुए बोला| अब जाहिर है की ये सुन कर संगीता का मन भी भुर्जी वाला बर्गर खाने को था इसलिए वो मुझसे शिकायत करते हुए बोली; "मुझे तो कभी नहीं खिलाया आपने भुर्जी वाला बर्गर?!" संगीता की इस शिकायत को सुन मैं बस हँस कर रह गया और मेरी हँसी देख संगीता की नाक पर प्यारभरा गुस्सा आ बैठा! खैर, बच्चों की इन आनंद भरी बातों को सुनते हुए हमने खाना कब खा लिया पता ही नहीं चला|

संगीता का बचपना दिन पर दिन बढ़ता जा रहा था| दिन के समय संगीता, माँ के पास रहती और अक्सर माँ की गोदी में सर रख कर आराम करती| शाम होती तो संगीता दोनों बच्चों को पढ़ाने बैठ जाती, अब नेहा पढ़ाई में तेज़ थी इसलिए वो तो अपनी मम्मी के पूछे सवालों का जवाब धड़ाधड़ देती| लेकिन मेरा बेटा आयुष थोड़ा नटखट था इसलिए वो पढ़ाई करते समय जानबूझ कर शैतानी करता था| आयुष की शैतानी देख संगीता को गुस्सा आता और वो उसे डाँट देती! तब आयुष अपना मुँह फुलाये अपनी किताब ले कर मेरे पास रसोई में आ जाता| आयुष का फूला हुआ मुँह देख मैं आयुष को गोद में उठा कर रसोई की स्लैब पर बिठा देता| "पापा जी, मैं मम्मी से नहीं पढ़ूँगा, वो मुझे डाँटती हैं!" आयुष मुँह फुलाये हुए मुझसे अपनी मम्मी की शिकायत करता| "अच्छा...चलो मैं आपकी मम्मी को समझाऊँगा की वो आपको न डाँटें!" मैं आयुष को बहलाते हुए बोला| परन्तु आयुष कुछ और चाहता था; "पापा जी. मुझे आप पढ़ाओ!" आयुष अपनी किताब मेरी ओर बढ़ाते हुए बोला| "आजा मेरा बच्चा, मैं आपको पढ़ाता हूँ|" ये कहते हुए मैं आयुष को पढ़ाता भी और खाना भी बनाता| कुछ भी कहो आयुष को पढ़ना और साथ-साथ खाना बनाने का मज़ा ही कुछ और था!

रात को सोते समय संगीता मुझसे ऐसे कस कर लिपटती जैसे जोरदार सर्दी पड़ रही हो! जब वो दूसरी ओर करवट ले कर लेटती तो मेरा हाथ किसी सीट-बेल्ट की तरह अपने जिस्म के इर्द-गिर्द लपेट लेती! बीच रात में जब भी उसकी आँख खुलती तो वो कभी मेरे गालों पर kiss करती, मेरे हाथ पर kiss करती और कभी मेरे कान की लौ को कचकचा कर काट लेती! मुझे संगीता के इस आक्रामक व्यवहार से अजीब सी उत्तेजना होती और बजाये मेरी नींद खराब होने पर नाराज़ होने के मैं संगीता को अपनी बाहों में कस कर उसे प्यार करने लगता|

बच्चों के स्कूल शुरू होने से मुझ पर काम का बोझ बढ़ गया था इसलिए मुझे अब नशे की दरकार अधिक महसूस हो रही थी, तो सबसे छुपते हुए मेरा छत पर सिगरेट पीना थोड़ा बढ़ गया था| पिताजी के कारण उतपन्न हुई सिगरेट पीने की इच्छा अब मुझे अधिक व्यस्त होने पर सिगरेट पीने के लिए उकसा चुकी थी और देखते ही देखते मेरी ये नशे की आदत मेरी पकड़ से बाहर होती जा रही थी!

इधर मेरा काम अच्छे से चल रहा था और पैसों की आमदनी अच्छी हो रही थी| आस-पड़ोस वाले जब कभी घर आते तो पिताजी के बारे में पूछते और मेरी माँ को घर की इज़्ज़त बचाने के लिए न चाहते हुए भी झूठ बोलना पड़ता| ये बात मुझे बहुत चुभती थी इसलिए मैंने इसका तोड़ निकाला|

'क्यों न मैं कहीं और घर ले लूँ? नई जगह होगी तो वहाँ मुझे कोई पिताजी के बारे में पूछेगा भी नहीं और माँ को भी कोई झूठ नहीं बोलना पड़ेगा|' मेरे दिमाग में उतपन्न हुए इस ख्याल ने मुझे रास्ता दिखा दिया था| मैंने कंप्यूटर पर सबके चोरी-छुपे आस-पास घर देखना शुरू कर दिया| जो घर पसंद आता उसे देखने मैं संगीता को घुमाने के बहाने साथ ले कर चल पड़ता| अब कंप्यूटर पर जो घर दिखता था वो अंदर से तो सुन्दर होता था लेकिन कॉलोनी खराब होती थी इसलिए मैं संगीता के साथ कॉलोनी घूम कर वापस आ जाता था और संगीता को ज़रा भी शक नहीं होता था की हम यहाँ घर देखने आये हैं!

आखिर एक दिन मुझे मेरी पसंद का घर और कॉलोनी दोंनो मिल गए| दूसरी मंजिल पर बना ये घर करीब 450 गज़ में बना था| 3 बड़े कमरे, 3 बाथरूम, 1 रसोई, एक हॉल और एक बड़ी सी छत! इस घर में सब कुछ था और मैं इस घर को खरीदने को इच्छुक था| दिक्कत ये थी की घर बहुत महँगा था और मेरे पास हमारा घर (मेरे पिताजी द्वारा खरीदा हुआ घर) बेच कर भी पैसे पूरे नहीं पड़ रहे थे| अंततः मैंने बैंक से लोन लेने की सोची, लेकिन उससे पहले मुझे ये नया घर अपने परिवार को दिखाना था|

शाम के समय मैंने इस बात का खुलासा सब के सामने किया| बच्चों ने जैसे ही सुना की हम नया घर ले रहे हैं, उन्होंने बड़े जोश से कूदना शुरू कर दिया| वहीं माँ के चेहरे पर एक गर्वपूर्ण मुस्कान थी, गर्व इस बात का की उनका बेटा आज ज़िन्दगी में पहलीबार अपनी मेहनत के पैसों से अपना घर खरीदने जा रहा है| मुझे आशीर्वाद देते हुए माँ ने नए घर को बिना देखे ही खरीदने के लिए हामी भर दी|

उधर संगीता की नाक पर प्यारा सा गुस्सा आ बैठा था क्योंकि मैंने उसे बिना बताये ही घर देखना शुरू किया था| जब संगीता के दिमाग की टियूबलाइट जली तो उसे सब समझ आने लगा की आखिर क्यों मैं उसे ले कर अलग-अलग कॉलोनी में घूमने जाया करता था| "अच्छा...तो इसलिए आप मुझे घुमाने के बहाने अलग-अलग कॉलोनी में ले जाया करते थे!" संगीता मुझसे नाराज़ होते हुए बोली| "मुझे बिना बताये आपने घर ढूँढा...जाओ मैं आपसे बात नहीं करती!" संगीता बिलकुल आयुष की तरह मुँह फुलाते हुए बोली| संगीता का ये बचपना देख मैं, नेहा, आयुष और माँ बहुत जोर से हँसे! माँ और बच्चों के संगीता पर हँसने से उसे कोई फर्क नहीं पड़ा मगर मेरे हँसने का संगीता को बहुत बुरा लगा! वो एकदम से उठी और मुँह फुलाये हुए हमारे कमरे में चली गई| मुझे पता था मेरे ही कारन संगीता नाराज़ हुई है और अगर मैंने उसे अभी नहीं मनाया तो वो इसी तरह मुँह फुलाये रहेगी इसलिए मैं भी संगीता के पीछे-पीछे उसे मनाने चल पड़ा| अब मुझे क्या पता की मेरी पत्नी जानबूझकर मुझसे नाराज़ हुई है ताकि मैं उसे मनाऊँ!

कमरे में पहुँच, संगीता हाथ बाँधे दरवाजे की ओर पीठ किये हुए खड़ी थी| मैं चुपके से दबे पाँव पीछे से आया और संगीता को अपनी बाँहों में भर उसके सर को चूमते हुए तुतला कर बोला; "मेला बाबू, मेले से नालाज़ (नाराज़) है?" मेरे पूछे सवाल के जवाब में संगीता ने छोटे से बच्चे की तरह अपना निचला होंठ फुलाये हुए "हम्म्म" कहा| "तो मैं अपने बाबू को थोला प्याल करूँ, फिर तो मेला बाबू गुच्छा (गुस्सा) नहीं रहेगा न?" इतना सुनना था की संगीता एकदम से मेरी ओर घूमी और झट से अपने होठ आगे कर अपनी आँखें मूँद ली! संगीता का ये बचपना देख मेरा मन अचानक से बावरा हो गया और मैंने उसके रस भरे होठों को अपने कब्जे में कर लिया! करीब मिनट भर बाद जब मैंने संगीता के लबों को आज़ाद किया तो वो आँखों में प्यास लिए मुझे देख रही थी!

ठीक तभी आयुष फुदकता हुआ आया और अपनी मम्मी को मनाने में लग गया; "मम्मी जी" आयुष अपनी मम्मी को मक्खन लगाते हुए बोला| "पापा जी को माफ़ कर दो!" आयुष मेरी पैरवी करते हुए बोला तो संगीता मुस्कुराते हुए उसके गाल सहलाते हुए बोली; "ठीक है, तेरे लिए माफ़ कर देती हूँ! लेकिन तुझे है न मुझे कहानी सुनानी पड़ेगी!" अपनी मम्मी की बात सुन आयुष ख़ुशी से कूद पड़ा और बोला; "मैं आपको दो कहानियाँ सुनाऊँगा!" तो इस तरह से आयुष ने अपनी मम्मी को अपनी बातों से बहला लिया और हम तीनों माँ के पास आ कर बैठ गए|

[color=rgb(163,]जारी रहेगा भाग - 8(2) में...[/color]
 

[color=rgb(251,]इकत्तीसवाँ अध्याय: घर संसार[/color]
[color=rgb(44,]भाग - 8(2)[/color]


[color=rgb(71,]अब तक अपने पढ़ा:[/color]

कमरे में पहुँच, संगीता हाथ बाँधे दरवाजे की ओर पीठ किये हुए खड़ी थी| मैं चुपके से दबे पाँव पीछे से आया और संगीता को अपनी बाँहों में भर उसके सर को चूमते हुए तुतला कर बोला; "मेला बाबू, मेले से नालाज़ (नाराज़) है?" मेरे पूछे सवाल के जवाब में संगीता ने छोटे से बच्चे की तरह अपना निचला होंठ फुलाये हुए "हम्म्म" कहा| "तो मैं अपने बाबू को थोला प्याल करूँ, फिर तो मेला बाबू गुच्छा (गुस्सा) नहीं रहेगा न?" इतना सुनना था की संगीता एकदम से मेरी ओर घूमी और झट से अपने होठ आगे कर अपनी आँखें मूँद ली! संगीता का ये बचपना देख मेरा मन अचानक से बावरा हो गया और मैंने उसके रस भरे होठों को अपने कब्जे में कर लिया! करीब मिनट भर बाद जब मैंने संगीता के लबों को आज़ाद किया तो वो आँखों में प्यास लिए मुझे देख रही थी!

ठीक तभी आयुष फुदकता हुआ आया और अपनी मम्मी को मनाने में लग गया; "मम्मी जी" आयुष अपनी मम्मी को मक्खन लगाते हुए बोला| "पापा जी को माफ़ कर दो!" आयुष मेरी पैरवी करते हुए बोला तो संगीता मुस्कुराते हुए उसके गाल सहलाते हुए बोली; "ठीक है, तेरे लिए माफ़ कर देती हूँ! लेकिन तुझे है न मुझे कहानी सुनानी पड़ेगी!" अपनी मम्मी की बात सुन आयुष ख़ुशी से कूद पड़ा और बोला; "मैं आपको दो कहानियाँ सुनाऊँगा!" तो इस तरह से आयुष ने अपनी मम्मी को अपनी बातों से बहला लिया और हम तीनों माँ के पास आ कर बैठ गए|

[color=rgb(97,]अब आगे:[/color]

अगले
दिन बच्चों की छुट्टी थी इसलिए सुबह ही हम सब नया घर देखने चल दिए| हमारा नया घर एक बहुत बड़ी कॉलोनी में था, आस-पास जितने लोग रहते थे सभी बहुत अमीर थे| रहीसों के साथ रहना, उठना-बैठना आदि मेरे लिए एक सपने समान था| घर के आस-पास जर्रूरत के सभी साधन मौजूद थे और ये कॉलोनी बहुत ही सुरक्षित कॉलोनियों में से एक भी थी|

हम सभी सीढ़ियों से दुसरी मंजिल पर हमारे घर पर पहुँचे तो मैंने घर खोल कर सभी को दिखाया| कौन सा कमरा किसका होगा ये मैंने सबको एक-एक कर बताया| फिर हम सब छत पर पहुँचे और इतनी बड़ी छत देख आयुष सबसे पहले बोला; "पापा जी, यहाँ तो हम आराम से क्रिकेट खेल सकते हैं!" आयुष की बचकानी बात सुन सभी मुस्कुराने लगे| सभी को घर बहुत पसंद आया था और सबने जब घर लेने की हाँ भरी तभी मैंने घर लेने की कागज़ी कारवाही आगे बढ़ाई तथा पंडित जी से गृहप्रवेश की पूजा का दिन तय किया गया|

बच्चों के स्कूल में गर्मियों की छुट्टियाँ हो गई थीं और ठीक तभी हमारे घर में गृह प्रवेश का मुहूरत भी निकला था| दोनों बच्चे समान बाँधने में मेरी मदद कर रहे थे, लेकिन संगीता जी हिटलर की तरह हुक्म देते हुए दोनों बच्चों से लेफ्ट-राइट करवाने में लगी थीं! "ये ठीक से पैक करो", "वो टूट न जाए", "ये पहले पैक करो", "वो पैक किया?" कहते हुए संगीता बच्चों को किसी जनरल की तरह हुक्म देती! बच्चे घबराये हुए से किसी चक्क्रघिन्नी की तरह नाचते हुए अपनी मम्मी का हर हुक्म बजा रहे थे!

सामान पैक हुआ और फिर बारी आई पैक हुआ सामान पुराने घर से नए घर पहुँचाने की| लेबर की मदद से सामान ट्रक में भर कर हम नए घर पहुँचे और फिर दोनों बच्चों ने सारा सामान व्यवस्थ्ति करने में मेरी मदद की| बदले में मैं दोनों बच्चों को उनकी पसंद का खाना खिला दिया करता जिससे दोनों बच्चों में ख़ुशी और उत्साह भरपूर था|

गृह-प्रवेश का मुहूरत आ गया था और पूजा के दिन बहुत सारे मेहमान हमारे घर आये| नए पड़ोसियों से ले कर, मिश्रा अंकल जी, दिषु और उसका परिवार, यहाँ तक की दोनों बच्चों के दोस्त तथा उनके माता-पिता भी आये| पूजा सम्पन्न होने के बाद छत पर जोरदार पार्टी हुई और सभी ने पेट भरकर खाना-पीना किया| इस शानदार पार्टी से सभी बहुत खुश थे और जाते-जाते सभी ने हमें ढेर सारी शुभेच्छा दी|

संगीता की प्रेगनेंसी का छठवाँ महीना शुरू हो चूका था और संगीता को अब मूड स्विंग्स (mood swings) शुरू हो चुके थे तथा संगीता का वो बचपना अब खुल कर बाहर आ रहा था! हम सबसे संगीता का अब एक नया रिश्ता बनने जा रहा था| घर में सबसे छोटा आयुष था इसलिए आयुष के साथ संगीता का माँ-बेटे का नहीं बल्कि दोस्त का रिश्ता बन गया था| दोनों माँ-बेटे सोफे पर बैठ जाते और कभी कार्टून देखने लगते तो कभी दोनों साँप-सीढ़ी खेलने लगते| मुझे हैरानी तो तब होती जब संगीता, आयुष से बिलकुल किसी छोटे बच्चे की तरह बात करती; "आयुष...मेरा है न...मन चॉकलेट...खाने का है!" संगीता बिलकुल छोटे बच्चे की नकल करते हुए बोलती| आयुष को अपनी मम्मी के भीतर अपनी उम्र का एक बच्चा मिल गया था इसलिए वो अब अपनी मम्मी से अपने किसी दोस्त की तरह ही बात करता था| वहीं संगीता का ये बचपना मुझे और माँ को बहुत अच्छा लगता था, माँ को ये चिंता होती थी की कहीं संगीता को कोई नज़र न लग जाए इसलिए वो संगीता की नज़र उतारते हुए नहीं थकती थीं!

माँ के साथ संगीता की शुरू से बनती थी मगर जब संगीता का ये बचपना शुरू हुआ तो माँ ने संगीता को किसी छोटे बच्चे की तरह लाड करना शुरू कर दिया| जैसे हम छोटे बच्चे को लाड करते हुए बात करते हैं, ठीक उसी तरह माँ भी संगीता को लाड करते हुए बात करती थीं| माँ के लाड-प्यार का फायदा उठाते हुए संगीता ने मुझसे अलग-अलग तरह के खाने की माँग करना शुरू कर दिया| कभी कहती की मुझे हलवा खाना है, कभी कहती की मुझे खीर खानी है! कभी-कभी तो संगीता मुझे तंग करने के लिए माँ से कहती की; "माँ आज कुछ नया खाने का मन है!" अपनी बहु की बात सुन माँ मुझे बुलाती और ऐसे हुक्म देती जैसे किसी नौकर को हुक्म दिया जाता है; "मानु...बहु के लिए कुछ अलग बना!" मैं माँ का हुक्म सुन कर जान जाता की ये माँग संगीता की है और जैसे ही मैं संगीता को देखता तो पाता की वो दाँतों तले ऊँगली दबाते हुए मुझे देख कर खींसें निपोर रही है! कभी-कभी मुझे हैरानी होती थी की जिस शक़्स को मुझसे घर का काम करवाना अच्छा नहीं लगता था वही शक़्स मुझे तंग करने के लिए मुझसे एक के बाद एक नए खाने की माँग कर रही है!

वहीं मेरे साथ भी संगीता का रिश्ता बड़ा मनमोहक बन गया था| जब कभी मैं लैपटॉप पर काम कर रहा होता तो वो मेरे पास आती और लैपटॉप एकदम से बंद कर के मेरी गोदी में बैठ जाती| फिर मेरे दोनों हाथों को उठा कर अपने पेट पर रख लेती और अपना सारा भार मेरे सीने पर डालकर ऐसे बैठ जाती मानो मैं कोई कुर्सी हूँ! फिर एकदम से संगीता अपने दोनों गाल फुला लेती और अपने पेट पर हाथ फेरते हुए मुझसे पूछती; "मैं मोटी हो गई हूँ न?" संगीता के इस बचकाने सवाल पर मुझे हँसी आ जाती मगर संगीता के मेरी गोद में बैठे होने से मैं हँस नहीं पता था इसलिए मैं संगीता के फूले हुए गालों को धीरे से दाँतों से काट लेता, जिससे संगीता की सिसकी निकल जाती! बस फिर क्या था, संगीता मेरी गोदी में कुछ इस तरह बैठती की वो मेरे चेहरे को अपने दोनों हाथों में थाम सके और मेरे होठों से अपने होंठ भिड़ा देती! ये मुझे बाद में समझ आया की संगीता ये सब जानबूझ कर करती है ताकि उसके बचपने को देख मैं पिघल जाऊँ और उसे प्यार करने को मज़बूर हो जाऊँ! दिन भर भले ही संगीता माँ के पास रहती मगर रात होते ही वो आ कर मेरे पहलु में सिमट जाती!

अब आते हैं नेहा पर, जिसके साथ संगीता ने X उम्र की लड़की वाला रिश्ता बना लिया था| दोनों माँ-बेटी टी.वी. पर आने वाले नाटक देखतीं और कई बार उन्हीं नाटकों के किरदारों को ले कर बात करने लगतीं| जब नेहा अपना हॉलिडे होमवर्क करने बैठती तो संगीता उसे पढ़ाने के लिए बैठ जाती| कभी-कभी तो दोनों माँ-बेटी पता नहीं किस विषय पर बात करतीं की अचानक ही दोनों की खी-खी की आवाजें आने लगती| जो प्यार नेहा को उसके छुटपन में नहीं मिला वो प्यार अब जा कर नेहा को एक दोस्त के रूप में अपनी मम्मी से मिल रहा था|

संगीता का ये बचपना...उसका ये बालपन देख कर कभी-कभी मुझे डर लगता था की कहीं संगीता का मानसिक संतुलन तो नहीं हिल गया! ऐसे ही एक दिन की बात है, संगीता दोपहर के समय खाना खा कर दोनों बच्चों को साथ ले कर सो रही थी| माँ और मैं बाहर बैठक में बैठे थे जब मैंने माँ से संगीता के बचपने को ले कर सवाल पुछा;

मैं: माँ...संगीता का ये बचपना अचानक बढ़ नहीं गया?

मैंने मुस्कुराते हुए माँ से सवाल पुछा|

माँ: बेटा...संगीता का ये आखरी बच्चा है...मतलब इसके बाद संगीता अब माँ नहीं बन पाएगी, शायद इसीलिए संगीता का ये बचपना आजकल इतना बढ़ा हुआ है|

माँ मुझे समझाते हुए बोलीं| देखा जाए तो माँ की बात सही थी, संगीता की उम्र का वो पड़ाव आ रहा था जिसके बाद संगीता का माँ बन पाना मुश्किल हो जाता| फिर वैसे भी तीन बच्चे हमारे लिए बहुत थे, इसके बाद चौथे बच्चे की आस हमें बिलकुल नहीं थी|

माँ: वैसे अच्छा ही है, संगीता का ये बचपना देख घर में खुशियाँ फैली हुई हैं| मेरे घर में अब दो नहीं तीन बच्चे हैं|

माँ मुस्कुराते हुए बोलीं| जब मैंने माँ की बात पर गहन विचार किया तो मुझे एहसास हुआ की संगीता अपने बचपने से हम सभी का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करना चाहती है| लेकिन माँ की कही अंतिम बात इतनी प्यारी थी की मैंने उनकी बात को सच मान लिया और अपने इस विचार को दबा दिया|

ऐसा नहीं था की संगीता हमेशा खुश ही रहती थी, जब उसे गुस्सा आता था तो बेचारे बच्चों की आफत आ जाती थी| ऐसे ही एक दिन की बात है, सुबह सब को नाश्ता करा कर मैं साइट पर निकल गया था| दोपहर का खाना तैयार था बस मुझे घर आ कर रोटियाँ बनानी बाकी थीं| उस दिन घर में काम करने वाली आंटी जी नहीं आईं इसलिए झाड़ू-पोछे का काम नहीं हुआ था| संगीता बहुत ही सफाई पसंद है इसलिए उसे घर में साफ़-सफाई न होने से चिढ हो रही थी! चूँकि मैंने संगीता को कोई भी काम करने से मना कर रखा था इसलिए वो तो काम कर नहीं सकती थी| तभी संगीता को बैठक से बच्चों की कार्टून देखते हुए ठहाका मारने की आवाज़ आई| उस समय माँ घर पर नहीं थीं इसलिए आज बच्चों को उनकी मम्मी की डाँट से बचाने वाला कोई नहीं था| "आयुष...नेहा!!!" संगीता ने जोर से चीखते हुए दोनों बच्चों को आवाज़ दे कर अपने कमरे में बुलाया| "तुम्हारे पापा जी घर पर नहीं हैं, दादी जी घर पर नहीं हैं तो तुम दोनों अपनी मनमानी करने लगे? सुबह से क्या काम किया है तुम दोनों ने? बस नाश्ता खाया और कार्टून देखने लगे?! देखा नहीं आज घर में झाड़ू-पोछा नहीं हुआ? तुम दोनों इतना सा काम अपने आप नहीं कर सकते? हर काम तुम्हें बोला जाए तभी करोगे? चलो चुप-चाप झाड़ू-पोछा लगाओ!" संगीता ने दोनों बच्चों को झाड़ते हुए काम दिया|

अपनी मम्मी की झाड़ से दोनों बच्चे सकपका गए थे और झाड़ू-पोछा करने के लिए दौड़ पड़े| आयुष छोटा था और लम्बाई में वो झाड़ू से कुछ ही बड़ा था इसलिए आयुष झाड़ू कैसे लगाता?! ऊपर से बेचारा अपनी मम्मी की डाँट सुन इतना डरा हुआ था की उसे समझ नहीं आया की उसे फूल झाड़ू उठाना है या सींक वाला झाड़ू! नासमझी में उसने सींक वाला झाड़ू उठा लिया और जैसे-तैसे अपने छोटे-छोटे दोनों हाथों से झाड़ू पकड़ कर झाड़ू लगाने की कोशिश करने लगा| संगीता ने जब आयुष के हाथ में सींक वाला झाड़ू देखा तो वो एकदम से बेचारे पर बरस पड़ी; "ये कौन सा झाड़ू उठाया है तूने? घर में फूल झाड़ू लगता है, इतना भी नहीं पता तुझे? सारा दिन गेम खेलने में लगा रहता है, कैसे पता होगा कुछ?!" संगीता की डाँट सुन नेहा एकदम सेआयुष के पास पहुँची और उससे बोली; "तू जा कर वो छोटी वाली बाल्टी में पानी भरकर ला मैं झाड़ू लगाती हूँ|" नेहा झाड़ू लगाने लगी और आयुष अपनी मम्मी की आँखों से ओझल हो कर पोछे की बाल्टी में पानी भरने लगा| अपनी मम्मी की डाँट से सकपकाए आयुष से फिर एक गलती हो गई, उसने पोछे की बाल्टी तो भर ली मगर गलती से बाल्टी बिलकुल ऊपर तक भर ली और बाल्टी में अधिक पानी भरने से बाल्टी का वजन बढ़ गया, जिससे आयुष उस बाल्टी को ठीक से उठा नहीं सकता था| हार न मानते हुए आयुष ने धीरे-धीरे बाल्टी को उठा कर छोटे-छोटे कदमों से चलना शुरू किया| जब तक आयुष अपनी बहन के पास पहुचँता बाल्टी का आधा पानी छलक कर पूरे रास्त में बिखर चूका था| अब जाहिर था की संगीता को गुस्सा आएगा ही आएगा, उसने फिर से आयुष को झाड़ दिया; "तुझे कोई काम करने का सहूर नहीं हैं न? एक बाल्टी तक नहीं उठती तुझसे?" अपनी मम्मी की डाँट सुन बेचारा आयुष सर झुकाये सिसकने लगा|

बच्चों की खुशकिस्मती से मैं घर जल्दी लौट आया था, अपनी चाभी से दरवाजा खोल जैसे ही मैं घर के भीतर आया तो घर की हालत देख मैं सब समझ गया| नेहा बेचारी फूल झाड़ू लिए हुए फर्श पर उकड़ूँ बैठ कर झाड़ू लगा रही थी| आयुष बेचारा सर झुकाये खड़ा हुआ सुबक रहा था, उसके ठीक पीछे पोछे की बाल्टी पड़ी थी जिसमें से छलका पानी पीछे ड्राइंग रूम के फर्श पर फैला पड़ा था और अंत में संगीता हमारे कमरे के दरवाजे पर अपनी कमर पर दोनों हाथ रखे खड़ी गुस्से से दोनों बच्चों को देख रही थी|

आयुष को यूँ सुबकता देख और मेरी लाड़ली बेटी को झाड़ू लगाते देख मेरा दिल बहुत दुःखा| "नेहा, झाड़ू छोडो और आयुष को ले कर अपने कमरे में जाओ|" मेरी आवाज़ सुनते ही दोनों बच्चे मुझे देखने लगे और उनकी जान में जान आई| नेहा ने मेरी बात तुरंत मानी और आयुष को ले कर अपने कमरे में चली गई| इधर संगीता भोयें सिकोड़ कर मुझे देख रही थी, वो जानती थी की अगर उसने कुछ कहा तो मैं उस पर बरस पडूँगा इसलिए वो बिना कुछ कहे हमारे कमरे में वापस चली गई| मैं संगीता के पीछे-पीछे कमरे में पहुँचा और दरवाज़ा बंद कर संगीता को समझाने लगा;

मैं: जान, वो छोटे बच्चे हैं...फिर क्यों उन्हें इतना डाँटती हो?

संगीता: कोई छोटे नहीं हैं, ये तो यहाँ रहते हुए इन दोनों (आयुष और नेहा) के पर निकल आये हैं! गाँव में होते तो नेहा घर का सारा काम कर रही होती और आयुष खेतों का काम करना सीख रहा होता!

संगीता की बात सुन मुझे गुस्सा आ गया;

मैं: ENOUGH! ये मेरे बच्चे हैं, जब तक मैं ज़िंदा हूँ मेरे बच्चे न तो चूल्हा-चौका करेंगे और न ही खेत में मजदूरी करेंगे! समझी?!

मैंने संगीता को डाँटते हुए कहा और कमरे से बाहर आ धड़ाम से दरवाजा बंद किया|

बाहर आ कर मैं झाड़ू लगाने लगा की तभी दोनों बच्चे डरे-सहमे से मेरे पास आये| दोनों बच्चों ने मेरी और संगीता के बीच हुई बहस सुन ली थी! मैने दोनों बच्चों को गोदी में उठा कर अपने गले लगाया और उन्हें लाड-प्यार कर बहलाने लगा| चूँकि बच्चों ने मेरी और अपनी मम्मी की बहस सुन ली थी इसलिए दोनों बच्चे सफाई करने में मेरी मदद करना चाहते थे;

नेहा: पापा जी, मैं झाड़ू लगा देती हूँ|

आयुष: और मैं पापा जी...

आयुष आगे कुछ कहे उससे पहले ही मैंने उसकी बात काट दी;

मैं: मेरे बच्चे ये काम थोड़े ही करेंगे?! आपको मेरी मदद करनी है न?

मेरा सवाल सुन दोनों बच्चों ने अपने सर हाँ में हिलाये|

मैं: तो आप दोनों मिलकर डस्टिंग (dusting) करो|

बच्चो ने मेरी बात ख़ुशी-ख़ुशी मानी और डस्टिंग करने का कपड़ा उठा कर दोनों अपने काम पर लग गए| मैंने भी झाड़ू उठाया और सारा घर साफ़ कर दिया| जब माँ लौटीं तो उन्हें संगीता नाराज़ दिखी, आखिर माँ ने ही संगीता को प्यार से समझाया की वो इस तरह गुस्सा न किया करे वरना उसकी और होने वाले बच्चे की सेहत पर इसका बुरा असर पड़ेगा|

शाम के समय जब मैं चाय बना रहा था, माँ और बच्चे टी.वी. देख रहे थे, तब संगीता अपने कमरे से निकली| बैठक में पहुँच उसने अपने दोनों कान पकड़े और सर झुकाये हुए बच्चों से बड़ी ही धीमी आवाज़ में बोली; "सोली (sorry)!" संगीता के यूँ तुतला कर बोलने पर दोनों बच्चे हँस पड़े और आ कर अपनी मम्मी से लिपट गए| बच्चों की माफ़ी मिली तो संगीता कान पकड़े हुए ही मेरे पास रसोई में आई और सर झुकाये हुए तुतला कर बोली; "छोलि (sorry)!" संगीता का बचपना देख मैं खुद को पिघलने से न रोक पाया और उसे अपने गले लगा लिया| इतने में पीछे से बच्चे भी आ गए और हम दोनों से लिपट गए| "बेटा, कभी-कभी है न आपकी मम्मी को ज्यादा गुस्सा आ जाता है! तब है न आप उनसे नाराज़ मत होना उन्हें थोड़ा समय देना ताकि उनका गुस्सा शांत हो जाए| जब आपकी मम्मी का गुस्सा शांत होगा न तो वो आ कर आपको फिर से प्यार करने लगेंगी|" मैंने बच्चों को प्यार से समझाते हुए कहा| बच्चे मेरी बात समझ गए और ख़ुशी-ख़ुशी उन्होंने अपनी मम्मी को माफ़ कर दिया|

बच्चों की गर्मियों की छुट्टियाँ चालु थीं मगर संगीता की प्रेगनेंसी के चलते मैं उन्हीं दिल्ली से बाहर कहीं घुमाने नहीं ले जा सकता था| ऐसे में एक दिन दोनों बच्चों ने कहीं घूमने जाने की जिद्द पकड़ ली| "बेटा, आपकी मम्मी माँ बनने वाली हैं और ऐसे में हम उन्हें ले कर कहीं नहीं जा सकते|" मैंने बच्चों को समझना चाहा तो दोनों बच्चे मुझसे तर्क करते हुए बोले; "तो हम तीनों चलते हैं|" बच्चों को बस घूमने जाने से मतलब था, फिर वो उनकी मम्मी के साथ हो या सिर्फ मेरे साथ| "बेटा, आपकी मम्मी हम तीनों (मैं, आयुष और नेहा) को एक साथ घूमने जाने देंगी? जा कर पूछो पहले?" मैंने बच्चों की जिद्द से पीछे छुड़ाते हुए कहा|

आखिर बच्चे अपनी फ़रियाद ले कर अपनी मम्मी के पास जा पहुँचे| जैसे ही बच्चों ने कहा की वो दोनों मेरे साथ दिल्ली से बाहर घूमने जाना चाहते हैं, वैसे ही संगीता एकदम से बोल पड़ी; "बिलकुल नहीं! तुम दोनों जाओगे घूमने और मैं यहाँ घर पर रह कर बोर हूँ?! तुम जाने देते हो मुझे अपने पापा जी के साथ कहीं अकेले?" संगीता ने बच्चों से तर्क किया तो आयुष हाजिर जवाबी से बोला; "आप गए तो थे आगरा पापा जी के साथ, तब तो हमने मना नहीं किया था!" आयुष की हाजिर जवाबी मैंने रसोई से सुन ली थी और मेरी हँसी छूट गई थी! मेरी हँसी सुन संगीता को मुझ पर प्यारभरा गुस्सा आ गया क्योंकि मैंने अपने गले से मुसीबत उतार के उसके गले में जो पहना दी थी! "वो पुरानी बात है, अब जायेंगे तो सब साथ जायेंगे वरना कोई नहीं जायेगा|" संगीता ने प्यार से अपना फैसला सुनाते हुए कहा|

बच्चे जान गए थे की उनके मम्मी-पापा उन्हें (आयुष और नेहा को) किसी फुटबॉल की तरह समझ, लात मारकर एक दूसरे के पास फेंक रहे हैं ताकि हम दोनों (मैं और संगीता) बाहर घूमने जाने की बात से बच सकें इसलिए दोनों बच्चे अपना मुँह फुला कर बैठ गए| बच्चों ने सीधी ऊँगली से घी निकलने की कोशिश कर ली थी अब उन्हें करनी थी अपनी ऊँगली टेढ़ी और इसके लिए उन्होंने अपनी दादी जी का सहारा लिया|

दोपहर को खाने के समय बच्चे मुँह फुलाये बैठे थे, माँ ने जब देखा की उनके पोता-पोती खाना नहीं खा रहे तो उन्होंने बच्चों से उनकी नाराज़गी का कारण पुछा| आयुष और नेहा ने अपनी दादी जी को शुरू से ले कर अंत तक सारी बात सुना दी| सारी बात सुन माँ ने ही इस समस्या का हल निकाला; "बच्चों, आपके मम्मी-पापा तो घूमने नहीं जा सकते क्योंकि आपकी मम्मी को इस वक़्त ज्यादा से ज्यादा आराम करना है." अपनी दादी जी की आधी बात सुन बच्चे मायूस हो गए| ".ऐसा करते हैं की आप दोनों (आयुष और नेहा) कुछ दिन अपने बड़े मामा जी के यहाँ चले जाओ, थोड़े दिन घूम कर आ जाना|" इतना कह माँ मुझे कहने वाले हुईं थीं की मैं भाईसाहब को फ़ोन करूँ लेकिन तभी आयुष अपना निचला होंठ फुलाये हुए बोला; "मुझे पापा जी के साथ घूमने जाना है!" इतने में नेहा भी आयुष की बात में अपनी हाँ जोड़ते हुए बोली; "हाँ दादी जी, हम पापा जी के साथ ही घूमने जायेंगे|"

सारी बात घूम फिर कर फिर कर उसी मोड़ पर आ गई थी| तब माँ ने बीच का एक रास्ता निकाला और दोनों बच्चों को बहलाते हुए बोलीं; "बच्चों, दिल्ली के बाहर तो तुम सब घूमने नहीं जा सकते इसलिए ऐसा करते हैं की तुम्हारा पापा तुम्हें दिल्ली में ही घुमा देगा|" इतना कह माँ मुझे आदेश देते हुए कहा; "तू कल के कल ही मेरे बच्चों को घुमाने ले जाएगा|" माँ का आदेश सुन मैंने किसी ड्राइवर की तरह हाँ में सर हिलाया| उधर संगीता को घर पर अकेले रहने से तकलीफ थी इसलिए वो एकदम से बच्चों की तरह मुँह फुलाते हुए बोली; "और मैं, माँ?" संगीता के इस बचकाने व्यवहार पर माँ और बच्चे हँस पड़े थे, जबकि मैं अपनी हँसी दबा रहा था वरना संगीता रासन-पानी ले कर मेरे ऊपर चढ़ जाती| "तू मेरे साथ घर पर रहिओ और मैं तुझे अपने हाथों से आइस-क्रीम बना कर खिलाऊँगी|" माँ ने संगीता को बहलाते हुए कहा| आइस-क्रीम खाने के नाम से संगीता के मुँह में पानी आ गया और वो दोनों बच्चों को जीभ चिढ़ा ने लगी| अब आइस क्रीम तो मुझे और बच्चों को भी खाने थी इसलिए हम तीनों भी मुँह में पानी लिए हुए माँ से बोले; "और हमें?" हमारा सवाल सुन माँ पहले तो हँस पड़ीं और फिर हमें सताने के लिए एकदम से अपनी बहु की तरफदारी करते हुए बोलीं; "तुम तीनों तो घूमने जा रहे हो, तुम्हें काहे मिलेगी आइस-क्रीम?!" माँ ने केवल मज़ाक किया था मगर आयुष को ये सच लग रहा था इसलिए वो एकदम से बोला; "फिर मैं नहीं जाऊँगा घूमने, मुझे आइस-क्रीम खानी है!" आयुष के एकदम से घूमने जाने के लिए मना करने पर नेहा गुस्सा हो गई, आखिर आयुष ने एक आइस-क्रीम खाने के लालच में नेहा के घूमने के प्लान को चौपट कर दिया था! दोनों बच्चे कहीं लड़ न पड़ें इसलिए माँ ने ही सुलह कराते हुए कहा; "अच्छा बाबा, सबको मिलेगी आइस-क्रीम!" ये सुन कर आयुष को इत्मीनान हुआ और वो वापस से अपनी दीदी की घूमने जाने वाली 'पार्टी' में जुड़ गया| उधर संगीता को लेनी थी चुटकी इसलिए वो दोनों बच्चों को चिढ़ाते हुए बोली; "मैंने आइस-क्रीम छोड़ दी तब तो खाओगे!" अपनी मम्मी की बात सुन आयुष बेचारा मुँह बना कर अपनी दादी को देखने लगा की वही उसकी आइस-क्रीम की रक्षा करें| "कोई नहीं खायेगा तेरे हिस्से की आइस-क्रीम!" माँ आयुष को आश्वस्त करते हुए बोलीं तब जा कर आयुष को इत्मीनान हुआ की उसके हिस्से की आइस-क्रीम सुरक्षित रहेगी|

चलो भाई कल घूमने जाने का प्लान बन गया था, लेकिन रात होते ही ये प्लान चौपट हो गया! रात के समय नेहा की सहेली रेखा का फ़ोन आया, उसे अपना हॉलिडे होमवर्क पूरा करने में नेहा की मदद चाहिए थी इसलिए वो चाह रही थी की वो यहाँ हमारे घर कुछ देर के लिए आ जाए| नेहा ने फ़ोन होल्ड पर रखते हुए मुझसे पुछा की क्या वो अपनी दोस्त को हमारे घर बुला ले, जिसके जवाब में मैंने ख़ुशी-ख़ुशी अपना सर हाँ में हिला दिया|

अब चूँकि नेहा की दोस्त घर आ रही थी इसलिए बाहर घूमने जाने का प्लान चौपट हो चूका था| मैंने सोचा की मैं ये बात आयुष को समझाऊँ, लेकिन मेरे छोटे साहबजादे को कोई फर्क नहीं पड़ा क्योंकि वो तो आइस-क्रीम खाने की आस में खुश थे! "पापा जी, हम घूमने परसों चलेंगे! कल तो मैं दादी जी की बनाई हुई आइस-क्रीम खाऊँगा|" आयुष अपने होठों पर जीभ फिराते हुए ख़ुशी से बोला| मेरे प्यारे बच्चे छोटी-छोटी खुशियों से ही खुश हो लेते थे, उन्हें कोई बड़ी ख़ुशी के आने की राह नहीं देखनी पड़ती थी|

अगले दिन नेहा की दोस्त रेखा घर आई, आयुष को "hi" कह उसने हम सभी (मेरे, माँ और सनगीता) के पाँव छू कर आशीर्वाद लिया| मैंने दोनों सहेलियों को बच्चों के कमरे में जा कर पढ़ने को कहा और आयुष को संगीता के पास रहने को कहा ताकि कहीं संगीता बोर न हो जाये| इधर मैं एप्रन (apron) पहने नेहा और उसकी दोस्त रेखकी खातिरदारी करने में लग गया| सबसे पहले मैं दोनों बच्चों के लिए कोल्ड ड्रिंक और चिप्स ले कर पहुँचा| मुझे एप्रन पहने देख रेखा को हैरानी हुई क्योंकि उसे उम्मीद थी की रसोई संगीता सँभालती होगी, लेकिन अभी के लिए रेखा ने अपनी जिज्ञासा शांत रखी और मुझसे कोई सवाल नहीं किया|

वहीं चूँकि माँ ने संगीता को आइस-क्रीम बना कर खिलाने का वादा किया था इसलिए माँ भी रसोई में आ गईं| माँ ने आइस-क्रीम बनानी शुरू की और मैंने फटाफट खाना बनाना शुरू किया| 1 बजे तक खाना तैयार हो चूका था और जैसे ही मैंने नेहा और रेखा को खाना खाने के लिए हाथ-मुँह धोने को कहा वैसे ही रेखा खाना खाने से शर्माने लगी| उसकी पढ़ाई पूरी हो चुकी थी और वो घर वापस जाना चाहती थी, इतने में पीछे से संगीता आ गई; "बेटा ऐसे बिना खाना खाये तो हम आपको जाने नहीं देंगे!" संगीता की बात सुन नेहा फट से बोली; "ठीक है मम्मी, फिर तो रेखा हमारे साथ ही रहेगी|" नेहा की बात सुन हम सब ज़ोर से हँस पड़े और रेखा को बिना उसकी मर्जी जाने अपने घर रखने को सभी न हामी भर दी|

थोड़ी न-नुकुर के बाद रेखा आखिर खाना खाने के लिए मान ही गई| रेखा अधिक शर्माए न इसलिए मैंने नेहा, रेखा और संगीता का खाना नेहा के कमरे में परोस कर ला दिया| बचे मैं, माँ और आयुष तो हम तीनों अपना खाना ले कर डाइनिंग टेबल पर बैठ गए|

आयुष: पापा जी. दीदी, रेखा दीदी और मम्मी एक साथ एक कमरे में क्यों खाना खा रहे हैं?

आयुष उत्सुक होते हुए बोला|

मैं: बेटा, रेखा आज पहलीबार हमारे घर आई है और अभी थोड़ा शर्माती है इसलिए वो आपकी मम्मी और दीदी के साथ कमरे में खाना खा रही है|

मैंने आयुष की उत्सुकता शांत करते हुए जवाब दिया|

आयुष: पापा जी, तो मैं भी अपने दोस्तों को घर बुला सकता हूँ?

आयुष के सवाल का जवाब माँ ने मुस्कुराते हुए दिया;

माँ: हाँ बेटा, तू भी अपने दोस्तों को बुला लियो|

अपनी दादी जी से अनुमति मिलते ही आयुष ख़ुशी से फूला नहीं समाया|

उधर नेहा के कमरे में संगीता एकदम से बच्ची बनते हुए नेहा और रेखा की पक्की सहेली बन गई थी| जब रेखा ने देखा की उसकी आंटी (संगीता) उससे बिलकुल दोस्त की तरह पेश आ रहीं हैं तो रेखा ने अपने मन में उठा सवाल पूछ लिया;

रेखा: आंटी जी, ये सारा खाना अंकल जी ने बनाया है?

रेखा ने बात थोड़ा घुमाते हुए पूछी थी| दरअसल उसे जानना था की घर का काम मैं क्यों कर रहा हूँ, संगीता क्यों नहीं कर रही? रेखा का सवाल सुन संगीता जान गई की रेखा असल में पूछना क्या चाहती है|

संगीता: वो क्या है न बेटा, नेहा के पापा मुझे बहुत प्यार करते हैं| मैं माँ बनने वाले हूँ न, इसलिए उन्होंने मुझे कोई भी काम करने से मना कर रखा है और सारे काम की जिम्मेदारी अपने सर ले रखी है|

संगीता की बात सुन रेखा की जिज्ञासा शांत हुई और वो मेरे बनाये खाने की तारीफ करते हुए बोली;

रेखा: वैसे आंटी जी, अंकल जी ने खाना बहुत टेस्टी बनाया है|

मेरी तारीफ सुन संगीता बहुत खुश हुई और बोली;

संगीता: बेटा, अभी तो आपकी दादी जी (यानी माँ) के हाथ की बनी आइस-क्रीम भी बाकी है!

आइस-क्रीम खाने के नाम से ही तीनों सहेलियों के मुँह में पानी आ गया था| खाने के बाद मैंने सभी को आइस-क्रीम परोसी और हम सब ने मिलकर माँ द्वारा बनाई आइस-क्रीम की जम कर तारीफ की|

शाम को रेखा अपने घर चली गई और उसके जाने के बाद मेरी बिटिया मेरे गले लग कर ख़ुशी से बोली; "I love you पापा जी! रेखा को आपके द्वारा बनाया हुआ खाना बहुत अच्छा लगा, वो तो आपकी तारीफ करते नहीं थक रही थी| I'm proud of you पापा जी!" मेरी बेटी को आज अपने पापा पर बहुत गर्व हो रहा था इसलिए आज उसके मन में मेरे लिए कुछ अधिक ही प्यार छलक रहा था| जब मैं रात का खाना बना रहा था तब नेहा मेरी मदद करने आ गई, सब्जी काटने से ले कर रोटी बेलने ता नेहा ने मेरी बहुत मदद की| यहाँ तक की रात को खाना भी नेहा ने मुझे अपने हाथों से खिलाया| बाप-बेटी का ये प्यार देख संगीता को जलन हो रही थी और वो मुझे देखते हुए अपनी जलन जाहिर कर रही थी! जब रात में सोने का समय आया तो नेहा आज मुझसे लिपट कर सोइ और बजाए मुझसे कहानी सुनने के, उसने ही मुझे कहानी बना कर सुनाई|

[color=rgb(163,]जारी रहेगा भाग - 8(3) में...[/color]
 
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